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सरफ़रोशी की तमन्ना… जो आजकल AC की हवा के साथ आती है, ताली ठोकते हुए जाती है: AAP की खुशी में अर्चना का दुःख

कन्हैया कुमार कॉन्ग्रेस में आए गए हैं। सवा 4 लाख वोटों से लोकसभा चुनाव हारने वाला व्यक्ति अब 40 लोकसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस का बेड़ा पार लगाएगा, ऐसा चिरयुवा राहुल गाँधी का सपना है। आलम ये है कि दिल्ली के CPI दफ्तर में नेता गर्मी से बेहाल हैं और अब राहुल गाँधी AC की हवा खा रहे हैं, जो कन्हैया कुमार अपने साथ लेकर आए हैं। इस गर्मी के लिए वामपंथी कब अमित शाह को दोष देंगे, इसका इंतजार है।

वैसे अमित शाह से याद आया कि उनसे कैप्टेन अमरिंदर सिंह की मुलाकात की खबर से ही पंजाब में कॉन्ग्रेस की ताली ठुक गई। ‘गुरु’ तो महागुरु निकले और सारा कांड करा कर खुद चलते बने। अब तक जिसे वहाँ पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा बनाया जा रहा था, वो मुखौटा पहन कर निकल लिया। AC की हवा खा रहे राहुल गाँधी के सामने अगर किसी ने ताली बज दी तो वो पक्का कॉन्ग्रेस से निकाला जाएगा, ये तय है।

पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर लिखा भी है कि ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..’, लेकिन पूछने वाले ये भी पूछ सकते हैं कि अब अगर उनके दिल में है तो अब तक कहाँ थी? इस तमन्ना को वो किधर रख कर घूम रहे थे। वैसे भगत सिंह की जयंती के अवसर पर कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी जैसों को पार्टी में लेकर आया गया है। अब जिग्नेश अपने साथ कौन स उपकार साथ लेकर आए हैं, मीडिया इसका पता लगाने में जुटी है।

शायद जिग्नेश मेवानी अपने साथ सिलाई मशीन लेकर आए हों, ताकि राहुल गाँधी का जो कुर्ता नोटबंदी के दौरान फट गया था उसकी मरम्मत की जा सके। वैसे भी कपड़ों के लिए गुजरात विख्यात है। सूरत में कपड़ों की फैक्ट्री में देश भर के कई लोगों को रोजगार मिलता है। या फिर ये भी हो सकता है कि जिग्नेश मेवानी अपने साथ ‘मसाज चेयर’ लेकर आए हों। थाईलैंड वाले ‘मजे’ का एकाध प्रतिशत यहाँ मिल जाए तो भला ऐतराज कैसा?

दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने पोस्टर लगवा दिए हैं। उन पोस्टरों में लिखा है – ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे – अब ये कॉन्ग्रेस का आधिकारिक नारा है।’ ऑपइंडिया इस तरह की चीजों की कड़ी नींद करता है। इसीलिए, क्योंकि ये नारा तो शुरू से कॉन्ग्रेस के दिलोंदिमाग में छप रहा है, इसमें ‘अब’ जैसी कोई बात नहीं है। दिल्ली में बैठी AAP को पता नहीं ये अच्छा लगेगा या नहीं, लेकिन पंजाब को लेकर वो जरूर खुश होगी।

AAP पंजाब में कई दिनों से ‘गुरु’ पर डोरे डाल रही है। जहाँ एक तरफ AAP खुश है, वहीं उधर अर्चना पूरन सिंह की बेचैनी बढ़ गई है क्योंकि उन्हें रह-सह कर यही एक ‘सरकारी नौकरी’ मिली हुई थी। अगर ‘गुरु’ अब फिर से ‘द कपिल शर्मा शो’ में ताली ठोकने का इरादा करते हैं तो उनकी छुट्टी तय है। या फिर क्या पता वो फिर से वैष्णो देवी में एकांतवास के लिए निकल जाएँ, जहाँ से लौट कर उन्होंने इतना उथल-पुथल मचाया था।

RSS की तालिबान से तुलना मामले में जावेद अख्तर को ₹1 का मानहानि का नोटिस: 12 नवंबर को कोर्ट में पेश होने का आदेश

बॉलीवुड में काम करने वाले जावेद अख्तर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की तुलना तालिबान से की थी। उनके इस विवादित के बाद काफी हंगामा हुआ था। इस मामले में RSS कार्यकर्ता विवेक चंपानेरकर ने जावेद अख्तर के खिलाफ मुंबई ठाणे कोर्ट में मानहानि का केस दायर किया था। याचिकाकर्ता ने हर्जाने के रूप में अख्तर से 1 रुपए का हर्जाना माँगा था।

इस मामले में कोर्ट ने जावेद अख्तर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अब अख्तर को 12 नवंबर 2021 को कोर्ट में पेश होने को कहा गया। कोर्ट में वकील आदित्य मिश्रा के जरिए दायर मुकदमे में कहा गया है कि तालिबान द्वारा हाल ही में अफगानिस्तान पर कब्जा किए जाने के मुद्दे पर आयोजित एक डिबेट शो में अख्तर ने हिंदुओं को बदनाम करने के इरादे से तालिबान और आरएसएस को एक समान बताया था।

याचिका में कहा गया है कि जावेद अख्तर द्वारा RSS के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणी ‘RSS के खिलाफ एक मत स्थापित करने और पॉलिटिकल स्कोर के लिए एक सुनियोजित प्लान था।’ अगर संसदीय तरीके से अख्तर आरएसएस की आलोचना करते तो एक स्वयंसेवक इसकी सराहना करता, लेकिन दुर्भावनापूर्ण तरीके से किए गए उनके कमेंट ने केस दायर करने के लिए प्रेरित किया।

चंपानेरकर का इस मामले में कहना है कि संगठन की छवि खराब करने के लिए प्रतिवादी (जावेद अख्तर) के मानहानिकारक बयान से वो आहत हुए हैं। उन्होंने अख्तर को 1 रुपए मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी बताया।

क्या कहा था जावेद अख्तर ने

3 सितंबर 2021 को एनडीटीवी के एक शो में अख्तर ने कहा था, “RSS, VHP और बजरंग दल का समर्थन करने वालों की मानसिकता भी तालिबान जैसी ही है।” उन्होंने कहा, “जिस तरह तालिबान एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है। उसी तरह कुछ लोग हमारे सामने हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पेश करते हैं।” जावेद अख्तर ने आगे कहा, “इन लोगों की मानसिकता एक जैसी है। तालिबान हिंसक हैं। जंगली हैं। उसी तरह RSS, VHP और बजरंग दल का समर्थन करने वाले लोगों की मानसिकता एक जैसी है।”

‘भारतीय उत्पादों का बहिष्कार हो, एक्शन ले इस्लामी मुल्क’: असम हिंसा पर मध्य-पूर्व के इस्लामवादी कर रहे प्रोपेगेंडा

असम के दर्रांग जिले में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हुई हिंसा को लेकर मध्य-पूर्व के इस्लामवादियों ने एक टारगेट प्रोपेगेंडा कैंपेन शुरू किया है। आरोप लगाया जा रहा है कि भारत में मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है और सरकार उनकी उपेक्षा कर रही है।

असम की घटना का हवाला दे कुछ लोग हिंदुओं के बहिष्कार की माँग करते हुए अन्य इस्लामी देशों से भारत के खिलाफ एकजुटता की अपील कर रहे हैं। ICESCO के पूर्व महानिदेशक, ए. अलवाजिरी (A. Altwaijri) ने ट्वीट कर नरेंद्र मोदी की हिंदू सरकार पर मुसलमानों को एक सोची समझी नीति के अनुसार प्रताड़ित और बदसलूकी का आरोप लगाया है।

साभार: ट्विटर

एक अन्य व्यक्ति ने ट्विटर पर कहा कि जब तक ‘मुसलमानों की हत्या’ बंद नहीं हो जाती, तब तक इस्लामी देशों को भारत के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए।

साभार: ट्विटर

अब्दुल रहमान अल-नासर ने भारत के खिलाफ इसी तरह के दुष्प्रचार के लिए दर्रांग हिंसा का इस्तेमाल किया। उसने कहा, “खाड़ी में 3 मिलियन (30 लाख) से अधिक हिंदू हैं। वे अरबों डॉलर भारत भेजते हैं। हम उनका सम्मान करते हैं, लेकिन भारत में हमारे भाइयों को सिर्फ इसलिए क्यों मारा जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं?”

साभार: ट्विटर

ट्विटर पर 65,000 से अधिक फॉलोअर्स वाले अल-मुतैरी नाम के एक शख्स ने कहा कि इस्लामिक देशों को भारत के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एक साथ आना चाहिए। उसने कहा, “भारत में मुसलमानों के साथ जो हो रहा है, उसके बारे में लगातार खबरें आ रही हैं। ऐसे में इस्लामिक देशों और मानवाधिकारों का समर्थन करने वाले सभी लोगों को भारत के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एकजुट होना होगा।”

साभार: ट्विटर

अन्य लोग भी भारतीय उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान कर रहे हैं।

साभार: ट्विटर

भारत के खिलाफ दुष्प्रचार में जुटे मध्य-पूर्व के इस्लामवादी दर्रांग हिंसा की सच्चाई को आसानी से नज़रअंदाज कर रहे हैं। वहाँ अतिक्रमण अभियान को लेकर पुलिस पर उन्मादी भीड़ द्वारा हमला किए जाने के बाद कई लोगों को जान गँवानी पड़ी। वहीं कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। स्थानीय मुसलमानों के साथ बातचीत बाद ही अतिक्रमण अभियान चलाया गया था। लेकिन बाद में भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिससे उन्हें आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। मामले की न्यायिक जाँच जारी है।

‘हत्याओं के लिए कुख्यात हैं बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए, 1983 में कॉन्ग्रेस ने बसाया था’: स्थानीय लोगों ने बताई असम हिंसा की सच्चाई

दरांग जिले में 23 सितंबर, 2021 को जब पुलिस अतिक्रमणकारियों से जमीन खाली कराने गई तो जवानों पर हमला बोल दिया गया और 11 पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद वामपंथियों ने राज्य में हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। सरकार बता चुकी है कि 10,000 मुस्लिमों की भीड़ ने पुलिस को घेर कर लाठी-डंडों व ईंट-पत्थर से हमला बोल दिया था, तभी पुलिस ने कार्रवाई की।

लेकिन, विपक्ष और मीडिया का गिरोह विशेष ये दुष्प्रचारित करने में जुटा है कि भाजपा सरकार मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा कर रही है। इसी बीच ‘न्यू इंडिया जंक्शन’ नाम के एक यूट्यूब चैनल ने स्थानीय नागरिकों से बात कर के सच्चाई सामने रखी है और असम में चल रहे अतिक्रमण विरोधी अभियान को लेकर फैलाए जा रहे झूठ को भी बेनकाब किया है। इस ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ से सच्चाई का पता चलता है।

दरांग जिले के एक स्थानीय नागरिक लाक्षेदार नाथ ने बताया कि 23 सितंबर, 2021 को जो भी हुआ वो एक असामान्य घटना नहीं थी, क्योंकि उस क्षेत्र में रहने वाले लोग हत्याओं और मारपीट में अभ्यस्त हैं। नैरेटिव ये फैलाया जा रहा है कि असम से मुस्लिमों को भगाने के लिए राज्य सरकार कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है, ताकि प्रशासन को बदनाम किया जा सके।

उन्होंने बताया कि गुवाहाटी हाईकोर्ट के समक्ष अवैध अतिक्रमण का मामला उठाने वाला मुस्लिम व्यक्ति ही था। इसके बाद ही उच्च-न्यायालय ने राज्य सरकार को कार्रवाई का आदेश दिया। इसी तरह रबीन्द्र कुमार नाथ नाम के स्थानीय नागरिक ने बताया कि 1975 से ही यहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों का अतिक्रमण चालू है, जिन्होंने 77,000 एकड़ ही नहीं बल्कि 5000 वर्ष पुराने शिव मंदिर की जमीन भी हथिया ली।

स्थानीय नागरिकों ने बताई असम में हुई हिंसा की सच्चाई

उन्होंने कहा कि घुसपैठियों की इस तरह की हरकत से सबसे ज्यादा परेशानी स्थानीय नागरिकों को हुई है, जिनमें से कई बर्बाद हो गए। उन्होंने न सिर्फ असम के आदिवासियों की संस्कृति को ख़त्म करने की कोशिश की, बल्कि आर्थिक रूप से भी उन्हें नुकसान पहुँचाया। दरांग के सिपाझार में गरुखुटी के निकट स्थित शिव मंदिर के सेवादार प्रसेनजीत ने बताया कि वर्षों से हिन्दू समुदाय के लोग मंदिर के आसपास रहते आए हैं।

उन्होंने कहा कि 1983 चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को बुला यहाँ बसाया। धौलपुर शिव मंदिर के सचिव ने बताया कि 1980 में यहाँ 36 परिवारों को बसाया गया था। धर्मकान्त नाथ ने कहा कि उसी समय बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों ने मंदिर की 500 बीघा जमीन हथिया ली थी और बाद में इसकी अधिकतर जमीनें उनके कब्जे में चली गई। स्थानीय नागरिकों को प्रताड़ित किया गया।

बता दें कि कई ऐसे वीडियोज भी सामने आए हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस नेताओं को धौलपुर के अतिक्रमणकारियों के यहाँ दौरा करते हुए देखा जा सकता है। आखिर जहाँ जमीन खाली कराई जानी थी, वहाँ कॉन्ग्रेस नेताओ ने दौरा क्यों किया? क्या उन्होंने वहाँ जाकर उनसे कहा होगा कि वो सरकारी कार्य में सहयोग करें? न कॉन्ग्रेस का चरित्र ऐसा है और न ही सबूत ऐसा कहते हैं। उन्होंने वहाँ जाकर लोगों को भड़काया और विरोध प्रदर्शन करने लगे।

नेपाल से लगे जिलों में 2.5 गुना बढ़े मुस्लिम, 2 साल में ही 400 मदरसे-मस्जिद: उत्तराखंड में ‘डेमोग्राफिक चेंज’ को लेकर रिपोर्ट में दावा

उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि नेपाल की सीमा से सटे क्षेत्रों में हो रहे ये बदलाव सामान्य नहीं है। इसी स्थिति के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसी ने साल की शुरुआत में गृह मंत्रालय को रिपोर्ट दी थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि कौन से इलाके संवेदनशील हैं और कौन से अतिसंवेदनशील हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन जिलों के नाम रिपोर्ट में दिए गए थे वहाँ हुआ डेमोग्राफिक चेंज कोई हाल-फिलहाल का नहीं है बल्कि साल 2011 में हुए जातिगत जनगणना में वहाँ मजहब विशेष की आबादी में 2.5 गुना वृद्धि दर्ज की गई थी।

सुरक्षा एजेंसी द्वारा गृह मंत्रालय को दी गई रिपोर्ट में कुमाऊँ के तीन क्षेत्रों को संवेदनशील करार दिया गया था। ये क्षेत्र ऊधमसिंह नगर, चम्पावत व पिथौरगढ़ हैं। इनमें पिथौरगढ़ के दो कस्बे धारचूला व जौलजीवी को अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखा गया था। उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों के अलावा उत्तर प्रदेश में भी कई क्षेत्रों को लेकर अलर्ट जारी हुआ था। इसका कारण था कि पिछले 2 साल के अंदर बहराइच, बस्ती व गोरखपुर मंडल से लगी नेपाल सीमा पर वहाँ 400 से अधिक मजहबी शिक्षण संस्थान और मजहबी स्थल खुले, जिसकी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में दी।

डीआइजी डा नीलेश आनंद भरणे ने इस संबंध में बताया कि डेमोग्राफिक चेंज को लेकर सीमावर्ती जिलों में भी चेतावनी जारी की गई है। खुफिया एजेंसियाँ सभी बिंदुओं की जाँच कर रही हैं। पड़ताल के बाद पता चलेगा की संख्या में बढ़ोतरी इतनी तेजी से क्यों हो रही है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, “सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में बांग्लादेश, बिहार, नेपाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा व पंजाब के मध्य सुनियोजित तरीके से मजहब विशेष की ओर से गलियारा तैयार करने की भी जानकारी दी थी। पाकिस्तान को इस गलियारे से जोडऩे की आशंका भी जाहिर की गई है। इसमें बीते 10 वर्षों में शरणार्थियों के नाम पर बड़ी आबादी इस गलियारे में शिफ्ट भी की गई है।”

सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत में सक्रिय हैं। इस संबंध में पहले भी चेतावनी जारी गई थी। कथिततौर पर, योजना के तहत मजहब विशेष के शिक्षण संस्थानों को उन्हीं क्षेत्रों में ज्यादातर खोला जा रहा है जो युद्ध नीति लिहाज से अहम हैं। इसी सूची में उत्तराखंड के पिथौरगढ़, ऊधमसिंह नगर व चम्पावत भी आते हैं और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर व बस्ती मंडल को भी इसी खातिर चुना गया है।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों में मुस्लिम आबादी के बढ़ने का विषय काफी दिनों से चर्चा में हैं। इस बाबत सरकारी खुफिया एजेंसियों को सतर्क भी रखा गया है। कल खबर आई थी कि ऐसा बदलाव नैनीताल में भी देखा गया है। खतरे की बात तो ये है कि वहाँ CRST स्कूल के पीछे ऊपरी पहाड़ी, बारापत्थर समेत अन्य संवेदनशील व प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहले कच्चा मकान बनाए गए, फिर रातोंरात पक्का अवैध निर्माण कर लिए गए हैं। इसके अलावा कई जगह अवैध कब्जे की भी शिकायतें मिली हैं। इस मामले में उत्तराखंड में भाजपा के पूर्व प्रदेश महामंत्री गजराज सिंह बिष्ट ने कहा था, “ये मुस्लिम शुरुआत में आपके पैर पकड़ने आएँगे। फिर आपसे हाथ जोड़ेगे और विनती करेंगे, लेकिन जब यही 1 से 10 हो जाते हैं तो आप इनकी गली में घुस भी नहीं सकते हैं।”

समाज सेवा के लिए गायन छोड़ना चाहती थीं लता मंगेशकर, सावरकर ने समझाया और बनीं सुर की देवी: कहानी राष्ट्रभक्ति के एक रिश्ते की

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिंदुत्व के अग्रदूत वीर सावरकर भारतीय इतिहास के उन शख्सियतों में से हैं जिनकी छवि धूमिल करने के लगातार प्रयास हुए। दशकों तक सरकारें उनकी उपेक्षा करती रहीं और अपमानजनक व्यवहार किया। इन सरकारों में से अधिकतर कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली थी। बहुत ही सक्रिय तरीके से वीर सावरकर की छवि को धूमिल करने के प्रयास हुए ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को कम किया जा सके।

लेकिन भारत रत्न लता मंगेशकर और उनका परिवार उन लोगों में से हैं, जिन्होंने कभी भी कॉन्ग्रेस और उसके वफादारों के बनाए गए सिस्टम के प्रोपेगेंडा पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने पाया कि वीर सावरकर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित देशभक्त और प्रतिभाशाली व्यक्ति थे, जो कविता और लेखन का कार्य भी करते थे।

विनायक दामोदर सावरकर या वीर सावरकर को हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन को स्पष्ट रूप से सामने रखने के लिए जाना जाता है। वे भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, वकील और लेखक थे। उनका जन्म महाराष्ट्र में नासिक जिले के पास भागलपुर गाँव में हुआ था। वे हिंदू महासभा से जुड़े थे और हिंदुत्व के पैरोकार थे। 1910 का साल था जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें क्रांतिकारी समूह ‘इंडिया हाउस’ से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार किया। वीर सावरकर को 1911 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह स्थित सेलुलर जेल में रखा गया था। मार्सिले से ले जाते वक्त वहाँ से भागने की उनकी असफल कोशिशों के बाद उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। सेलुलर जेल में अपनी सजा काटते हुए वीर सावरकर ने कई विषयों पर लिखा था। उनकी लेखनी में मातृभूमि के लिए उनकी तड़प से लेकर हिंदुत्व की समझ को लेकर उनकी गहराई का पता चलता है।

वीर सावरकर और मंगेशकर परिवार के संबंध

स्वर कोकिला लता मंगेशकर और उनका परिवार वीर सावरकर के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों को लेकर हमेशा गौरवान्वित रहा है। हर साल सावरकर की जयंती और पुण्यतिथि पर (28 मई और 26 फरवरी) लता मंंगेशकर हिंदुत्व के इस विचारक को सार्वजनिक तौर पर श्रद्धांजलि देने और अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अमूल्य योगदान को दोहराने से कभी नहीं कतराती हैं।

इसी क्रम में इस साल भी लता मंगेशकर ने सोशल मीडिया के जरिए महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को याद किया था। उन्होंने अपने फॉलोवर्स के साथ वीर सावरकर के साथ पुरानी तस्वीरें साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।

लता मंगेशकर ने सावरकर को ‘भारत माता का सच्चा सपूत’ बताते हुए उन्हें पिता समान बताया। वीर सावरकर जब जीवित थे तो लता मंगेशकर उन्हें ‘तात्या’ के नाम से संबोधित करती थीं। यह शब्द पिता या बुजुर्ग पुरुष के लिए सम्मान में इस्तेमाल किया जाता है।

पिछले साल प्रसिद्ध गायिका ने सावरकर को याद करते हुए कहा था कि उनका नाम मंगेशकर परिवार के हृदय में दर्ज था। ट्वीट के साथ ही उन्होंने एक वीडियो भी शेयर किया था जिसे लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर ने संगीतबद्ध किया था। यह गीत वीर सावरकर ने उनके पिता के नाटक ‘संन्यास खडग’ के लिए लिखा था।

साल 2019 में लता ने अपने परिवार और स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बीच रहे करीबी संबंध को याद करते हुए एक ट्वीट किया था। महान गायिका ने कहा था, “वीर सावरकर जी और हमारे परिवार के बहुत घनिष्‍ठ संबंध थे, इसलिए उन्होंने मेरे पिताजी की नाटक कंपनी के लिए नाटक ‘संन्यास खडग’ लिखा था। नाटक का पहली बार मंचन 18 सितम्बर 1931 को हुआ था। इसका एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था।”

वीर सावरकर वह सलाह

यह एक अल्पज्ञात तथ्य है कि अपने करियर की शुरुआत में लता मंगेशकर ने अपना समय और ऊर्जा समाज सेवा और गरीबों के कल्याण के लिए समर्पित करने के लिए गायन छोड़ने का मन बना लिया था। लेखक यतींद्र मिश्रा ने अपनी पुस्तक ‘लता: सुर गाथा‘ में खुलासा किया है कि कैसे वीर सावरकर ने लता मंगेशकर को यह निर्णय लेने से रोका और उन्हें गायन जारी रखने के लिए प्रेरित किया।

अपनी पुस्तक में मिश्रा कहते हैं कि लता ने किशोरावस्था में ही समाज सेवा करने का निश्चय कर लिया था। इसके लिए वह क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के साथ विचार-विमर्श और परामर्श कर रहीं थी और विभिन्न तरीकों पर विचार-विमर्श कर रही थीं, ताकि वह अपने संकल्पों को पूरा कर सकें। एक समय ऐसा भी आया जब लता समाज के लिए गायन छोड़ने जा रही थीं। उस वक्त सावरकर ने उनसे मिलकर उन्हें समझाया और उन्हें उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर की याद दिलाई जो उस समय भारतीय शास्त्रीय संगीत और आर्ट फर्ममेंट में अग्रणी थे।

सावरकर ने ही लता को समझाया था कि संगीत और गायन के प्रति समर्पित होकर भी वो समाज की सेवा कर सकती हैं। इसके बाद लता मंगेशकर ने संगीत में करियर बनाने को लेकर अपनी धारणाओं को बदला। सावरकर की सलाह पर अमल करते हुए वो पूरी तरह से संगीत की दुनिया में डूब गईं और इसका परिणाम ये हुआ कि वे महान गायिका बनकर उभरीं। अगर लता मंगेशकर को सावरकर की सलाह नहीं मिलती तो ये दुनिया उत्कृष्ट गायकों में से एक (लता मंगेशकर) से वंचित रह जाती।

वीर सावरकर के महान त्याग के बावजूद इतिहास इस स्वतंत्रता सेनानी के प्रति कभी भी नरम नहीं रहा है। साल 1947 में देश की आजादी के बाद से ही सरकारों ने सावरकर को तिरस्कार का पात्र बनाया। इतना ही नहीं उन्हें गाँधी जी की हत्या के केस में फँसाया गया था। बाद में सबूतों की कमी के कारण उन्हें बरी कर दिया गया।

हाल ही में लेखक विक्रम संपत स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर पर अपने समापन खंड ‘सावरकर: ए कंटेस्टेड लिगेसी 1924-1966’ के साथ सामने आए। इसमें उन्होंने सावरकर के असाधारण जीवन के अंतिम चरण का वर्णन किया है। यह पुस्तक 26 जुलाई 2021 को जारी की गई थी। इसमें वीर सावरकर को झूठा बदनाम करने और उनकी प्रतिष्ठा धूमिल करने के लिए लगातार कॉन्ग्रेस सरकारों और लेफ्ट-लिबरल्स बुद्धिजीवियों द्वारा किए गए जोरदार प्रयासों को लेकर चल रही बहस को तेज कर दिया है।

सावरकर की रचना, लता मंगेशकर के भाई बर्खास्त

वीर सावरकर द्वारा लिखी गई कविताओं पर मंगेशकर परिवार, जिसमें लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर और उनकी अन्य बहनें व इकलौते भाई हृदयनाथ संगीत के धुनों की रचना कर रहे थे। उनका यह कार्य वीर सावरकर को सदा खलनायक बताने की कोशिश करने वाली कॉन्ग्रेस को नहीं जँचा। नतीजा यह हुआ कि कॉन्ग्रेस के शासनकाल के दौरान ऑल इंडिया रेडियो ने 1954 में हृदयनाथ मंगेशकर को वीर सावरकर की कविताओं पर उनकी संगीत रचना के लिए बर्खास्त कर दिया था।

उस घटना के सालों बीतने के बाद एबीपी माझा को दिए एक इंटरव्यू में हृदयनाथ मंगेशकर ने स्वीकार किया था कि वीर सावरकर की लिखी कविताओं का चयन करने के कारण उन्हें ऑल इंडिया रेडियो से निकाल दिया गया था। मंगेशकर ने मराठी में कहा था, “मैं उस समय ऑल इंडिया रेडियो में काम कर रहा था। मैं 17 साल का था और मेरी सैलरी 500 रुपए प्रति माह थी। यह आज मूँगफली की तरह होगा, लेकिन उस समय 500 रुपए मोटी रकम होती थी। लेकिन मुझे ऑल इंडिया रेडियो से निकाल दिया गया था, क्योंकि मैंने वीर सावरकर की प्रसिद्ध कविता ‘ने मजसी ने परत मातृभूमि, सागर प्राण तालमला’ के लिए एक संगीत रचना बनाने का विकल्प चुना था।”

लता मंगेशकर ने साल 2009 में सावरकर द्वारा लिखी गई लोकप्रिय कविता ‘ने मजसी ने परत मातृभूमिला, सागर प्राण तालमला’ को लिखे जाने के 100 साल बाद याद किया कि कैसे इस कविता ने देशभक्ति की भावना जगाई और न केवल मराठी बल्कि सभी भारतीयों के लिए प्रेरणादायक बनी थी। उस दौरान रोते हुए लता मंगेशकर ने अफसोस जताया था कि वीर सावरकर को स्वतंत्र भारत में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

मूल रूप से यह लेख जिनित जैन ने अंग्रेजी में लिखी है। इसका अनुवाद कुलदीप सिंह ने किया है। मूल लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

अलीगढ़ के मदरसे में जंजीरों से बँधे थे बच्चे, रोने की आवाज सुन पहुँचे लोग: मौलवी गिरफ्तार, देखें Video

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से दिलदहलाने वाला मामला सामने आया है। अलीगढ़ के ऊपरकोट इलाके के एक मदरसे में मौलाना ने मासूम बच्चों को तालीम देने के नाम पर लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों से जकड़ कर रखा था। मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस ने मौलाना को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ शुरू कर दी है।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में मोहल्ला लड़िया के मदरसा जामिया तलीम उल कुरान में तीन से चार मासूम बच्चों को लोहे की जंजीर से बाँधा हुआ दिखाया गया है। यहाँ के मदरसे के मौलाना फहीमुद्दीन ने इन बच्चों को जंजीर से बाँधकर रखा था।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि मौलवी दबंग और आपराधिक प्रवृति का है और बच्चों से मारपीट करता था। लोगों ने बताया कि जब उन्होंने बच्चों के रोने की आवाजें सुनी, तो वे वहाँ गए और देखा कि बच्चों को मदरसे में लोहे की जंजीरों से बाँधकर रखा गया है। वहीं, मदरसा के संचालक फहीमुद्दीन ने इन आरोपों का खंडन किया है। उसने कहा, “ऐसी कोई बात नहीं है। परिजनों की सहमति से बच्चों को जंजीर से बाँधा जाता है, क्योंकि वे पढ़ने के बजाय भाग जाते हैं। यहाँ एक बच्चे को उसके माँ-बाप बाँध कर गए हैं। मैंने नहीं बाँधा है।”

एबीपी न्यूज के मुताबिक जो वीडियो वायरल हो रहा है उसमें एक नहीं बल्कि चार बच्चे जंजीरों में बँधे हुए थे। सीओ प्रथम राघवेंद्र सिंह ने बताया कि मोहल्ला लड़िया मामले में आरोपित मौलवी फहीमुद्दीन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इस संबंध में उससे पूछताछ की जा रही है। वहीं, पीड़ित बच्चे को चाइल्ड लाइन के हवाले कर दिया गया है। पुलिस ने बताया कि जिन बच्चों को जंजीरों में बाँधकर रखा गया है, उनका भी पता लगाया जा रहा है, जिससे कि उनके माता-पिता से भी पूछताछ की जा सके।

नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से दिया इस्तीफा, सोनिया गाँधी को लिखे पत्र में कही ये बात

पंजाब कॉन्ग्रेस में चल रहे घमासान के बीच मंगलवार (28 सितम्बर, 2021) को पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिद्धू ने 72 दिन बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

कुछ दिन पहले ही पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। उसके बाद से सिद्धू पर सुपर सीएम होने के भी आरोप लग रहे थे। सिद्धू ने सोनिया गाँधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है। 

कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को संबोधित अपने त्यागपत्र में सिद्धू ने लिखा, “समझौता करने से व्यक्ति का चरित्र खत्म हो जाता है। मैं पंजाब के भविष्य और पंजाब की जनता के कल्याण के एजेंडा से कभी समझौता नहीं कर सकता हूँ। उन्होंने आगे लिखा, इसलिए मैं पंजाब प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूँ। मैं कॉन्ग्रेस की सेवा करता रहूँगा।”

हालाँकि, सिद्धू ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखे खत में कहा कि वे कॉन्ग्रेस पार्टी के सदस्य बने रहेंगे। 

बता दें कि पंजाब में आज ही नए मंत्रियों के बीच विभागों का बँटवारा हुआ है और इसके चंद घंटे बाद ही सिद्धू ने सोनिया गाँधी को इस्तीफा भेज दिया। इसके पीछे कुछ कारण खास है फिलहाल सबकुछ ठीक नहीं ये कयास लगाए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि आज मंगलवार को ही पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात पर अटकलों का सिलसिला अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि नवजोत सिद्धू ने इस्तीफा देकर नया धमाका कर दिया। वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि सिद्धू इकबाल प्रीत सहोता को डीजीपी बनाए जाने से नाराज थे। इसके साथ ही कुछ और संभावित कारण बताए जा रहे हैं।

सिद्धू की नाराजगी के मुख्य कारण: रिपोर्ट्स

  1. राणा गुरजीत सिंह को नवजोत सिंह सिद्धू के विरोध के बावजूद मंत्री बनाना
  2. सुखजिंदर रंधावा को गृह विभाग देना
  3. एपीएस देयोल को एडवोकेट जरनल बनाना
  4. कुलजीत नागरा को मंत्रिमंडल में शामिल न करना
  5. मंत्रिमंडल के गठन ओर मंत्रियों के पोर्टफोलियो बँटवारे में सिद्धू की राय न लिया जाना
  6. सीएम न बनाए जाने से नाराजगी

सौरव गांगुली को 2 एकड़ जमीन का आवंटन रद्द, ममता सरकार पर जुर्माना: हाई कोर्ट ने माना- सत्ता का मनमाना इस्तेमाल

पश्चिम बंगाल के आवास निगम ने कुछ साल पहले पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली को एक शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के लिए 2 एकड़ की जमीन आवंटित की थी। अब उसी जमीन के मद्देनजर कलकत्ता हाई कोर्ट ने गांगुली पर 10 हजार रुपए की टोकन लागत और बंगाल सरकार व उसके आवास निगम पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। आरोप है कि सौरव को बिना टेंडर और कम कीमत पर जमीन दी गई।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, ये जमीन सौरव की ओर से पहले ही सरेंडर की जा चुकी है, लेकिन फिर भी कोर्ट ने सत्ता के मनमाने इस्तेमाल के लिए पश्चिम बंगाल हाउसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (डब्ल्यूएचआईडीसीओ) और राज्य सरकार पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। वहीं गांगुली के ऊपर 10 हजार की टोकन लागत लगाई गई।

कोर्ट ने पाया कि ये जमीन गलत ढंग से आवंटित हुई थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने आवंटित प्रक्रिया के दौरान आवास निगम के आचरण पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि गांगुली शर्तों को निर्धारित करने में सक्षम थे, फिर भी जमीन इस तरह आवंटित हुई जैसे वो राज्य संपत्ति न होकर कोई प्राइवेट कंपनी है जिसे अपनी संपत्ति अपने ढंग से डील करने की अनुमति हो, वो भी कोई कानूनी प्रक्रिया के बिना।

बेंच ने कहा कि गांगुली को कानून के मुताबिक काम करना चाहिए था। हाई कोर्ट ने दोहराया कि यदि गांगुली खेलों के विकास में रुचि रखते थे, विशेष रूप से क्रिकेट, तो वह उभरते क्रिकेटरों को प्रेरित करने के लिए कई मौजूदा खेल प्रतिष्ठानों से जुड़ सकते थे।

पीठ ने कहा कि देश हमेशा खिलाड़ियों के लिए खड़ा होता है। खासकर जो इंटरनेशनल स्‍तर पर देश का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। यह सच है कि सौरव गांगुली ने क्रिकेट में देश का नाम रोशन किया है, लेकिन जब बात कानून और नियमों की आती है तो संविधान में सब समान है। कोई भी उससे ऊपर होने का दावा नहीं कर सकता।

बेंच ने गांगुली द्वारा लिखित पत्र की जाँच में पाया कि पत्र की सामग्री से यह और स्पष्ट हो गया है कि इसका इस्तेमाल पूर्ण रूप से वाणिज्यिक उपक्रमों के लिए होना था। इसके अलावा आवेदन में कहीं ये बात नहीं थी कि ये एक आवंटन एक चैरिटेबल इंस्टिट्यूशन के लिए है।

बता दें कि पूरा मामले ये है कि गांगुली के शैक्षणिक संस्‍था को बंगाल सरकार ने कोलकाता के न्‍यू टाउन एरिया में नियमों के विपरीत जमीन दी थी और इसी के बाद जनहित याचिका में बीसीसीआई अध्‍यक्ष और गांगुली एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसायटी को स्‍कूल के लिए आवंटित 2 एकड़ जमीन पर सवाल खड़ा किया गया था।

सबसे पहले मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में आया था। सौरव गांगुली ने तब किसी तरह की परेशानी में फँसने से बचने के लिए जमीन वापस कर देने का फैसला किया और उसे लौटा दिया। फिर दूसरी जमीन देने का प्रस्ताव दिया गया और उसके ख़िलाफ़ भी हाई कोर्ट में केस दर्ज हुआ। दावा था कि सौरव को बिन टेंडर और कम दाम पर जमीन आवंटित हुई थी।

‘हम क्षत्रिय, गुर्जर क्षेत्र का नाम’: सम्राट मिहिर भोज के वंशज का PM मोदी को पत्र, राजपूतों के आंदोलन को समर्थन

जहाँ एक तरफ सम्राट मिहिर भोज को’गुर्जर’ बताया जा रहा है और इसे लेकर बड़ा विवाद भी खड़ा हो गया है, नागौद रियासत के उनके वंशजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर निवेदन किया है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जाना चाहिए। ‘किला नागौद’ से लिखे गए पत्र में ‘राजकुमार’ अरुणोदय सिंह परिहार ने कहा कि ‘गुर्जर’ या ‘गुज्जर’ सबसे बड़ा और सबसे विवादित शब्द है। उन्होंने कहा कि गुर्जर शब्द का अर्थ गुर्जर प्रदेश में राज करने वाले राजाओं से सम्बंधित है, न कि किसी जाति-समुदाय से।

उन्होंने इतिहास को एक विस्तृत व विवाद का विषय बताते हुए कहा कि ‘आदिवराह’ सम्राट मिहिर भोज, नागभट्ट द्वितीय के प्रत्यक्ष वंशज थे और रामभद्र के पुत्र थे, जिसके प्रमाण स्वरूप कई शिलालेख भी मिले हैं। उन्होंने उन सिक्कों का भी जिक्र किया है, जिस पर ‘आदिवराह’ अंकित है। उन्होंने आरोप लगाया कि इतिहास में कई बार ‘राजपूत’ शब्द का गलत अर्थ निकाला गया है। उन्होंने सम्राट मिहिर भोज को ‘गुर्जर’ बताए जाने का विरोध किया है।

राजकुमार अरुणोदय सिंह परिहार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रेषित पत्र में लिखा है, “मिहिर भोज ने ‘गुर्जराधिपति’ की पदवी धारण की और ‘गुर्जर देश’ पर शासन स्थापित किया। इस पूरे क्षेत्र को गुर्जर के रूप में जाता था था, इसीलिए वो गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के रूप में भी विख्यात हैं। कुछ समुदायों ने गलत धारणा और गलत व्याख्या कर के दावे किए हैं कि सम्राट मिहिर भोज उनके पूर्वक हैं – ये गलत है।”

इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ने भी ‘गुर्जर देश’ का जिक्र किया है, जहाँ प्रतिहार वंश का शासन था। उनके अनुसार, ‘आदिवराह’ मिहिर भोज ने ‘गुर्जर देश’ पर शासन किया था, इसीलिए उन्हें गुर्जराधिपति कहा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागौद राजवंश उन्हीं के वंशज हैं और वो क्षत्रिय राजपूत हैं। उन्होंने खुद को नागौद का राजकुमार बताते हुए ‘ऐतिहासिक साक्ष्यों व अधिकार’ के साथ इसकी वकालत की कि साम्राट मिहिर भोज क्षत्रिय राजपूत थे।

अरुणोदय सिंह ने मिहिर भोज की वंशावली भी पीएम मोदी को भेजी

उन्होंने दावा किया क़ नागौद, हमीरपुर, अलीपुरा, शोहरतगढ़ के परिहार उनके ही वंशज हैं। उन्होंने लिखा, “मिहिर भोज का अन्य जाति से होना गलत है। उनके नाम की प्रतिमाएँ व स्थानों का निर्माण करवाया जा रहा है, परन्तु उनका जाति-परिवर्तन किया जा रहा है, जो इतिहास के साथ सरासर छेड़छाड़ है। हमारे 1300 वर्ष पुराने मान-सम्मान को ठेस पहुँचाया जा रहा है और हम दृढ़ता से इसका विरोध करते हैं।”

वंशावली का अगला भाग

पत्र के साथ-साथ उन्होंने सम्राट मिहिर भोज और प्रतिहार वंश की वंशावली भी राजाओं व वंशजों के नामों के साथ संलग्न की है। इसमें 730 ईश्वी में नागभट्ट से लेकर वर्तमान राजा शिवेंद्र प्रताप सिंह तक के नाम का जिक्र है। सम्राट मिहिर भोज को इसमें नागभट्ट द्वितीय का पोता बताया गया है। शिवेंद्र से पहले राजा रुदेंद्र प्रताप सिंह और महेंद्र प्रताप सिंह का नाम है। अब देखना ये है कि इसके बाद विवाद थमता है या नहीं।

वहीं उन्होंने राजपूत समाज को समर्पित एक वीडियो बनाते हुए उनके द्वारा एकता का प्रदर्शन किए जाने को सराहनीय करार दिया और उनका धन्यवाद दिया। उन्होंने दादरी में हुए विरोध प्रदर्शन की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से राजा मिहिर भोज का जाति-परिवर्तन किया जा रहा है, वो इतिहास व उनके मान-सम्मान के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय इतिहास रक्त व बलिदान से लिखी गई है, जिसे इतनी आसानी से बदला नहीं जा सकता।

बता दें कि इसे ‘इतिहास की चोरी’ का नाम देते हुए राजपूत समाज के लोग कह रहे हैं कि उनसे उनकी पहचान व उनके पूर्वजों की अस्मिता न छीनी जाए। ऐसा नहीं है कि आक्रोशित सिर्फ राजपूत ही हैं। गुर्जर समाज में भी आक्रोश है, क्योंकि उनका आरोप है कि सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के दौरान ‘गुर्जर’ शब्द को हटा दिया गया। उनका कहना है कि प्रतिमा का उद्घाटन तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक वापस वहाँ ‘गुर्जर’ शब्द नहीं लिख दिया जाता।