यूनाइटेड किंगडम (UK) में कई पेट्रोल व डीजल स्टेशन ईंधन की भारी कमी से जूझ रहे हैं, क्योंकि लोग ज्यादा से ज्यादा मात्रा में खरीद कर घर में रख रहे हैं। ‘पैनिक बाइंग’ की वजह से वहाँ के पेट्रोल पम्पों पर अफरातफरी मची हुई है। वहाँ के पेट्रोल पम्पों पर गाड़ियों की लंबी-लंबी लाइनें देखी जा रही हैं। कई गैस स्टेशनों पर भी वही हाल है। दिन पर लाइन में लगने के बाद भी लोगों को ईंधन नहीं मिल पा रहा।
राजधानी लंदन में तो रविवार (26 सितंबर, 2021) को तो ईंधन के लिए मारपीट तक हो गई, जिसे शांत कराने के लिए पुलिस को बुलाना पड़ा। पुलिस ने बताया है कि एक व्यक्ति को मारपीट के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। ‘पेट्रोल रिटेलर्स एसोसिएशन’ ने जानकारी दी है कि सोमवार को लगभग 90% ईंधन स्टेशनों पर पेट्रोल-डीजल व गैस की भारी कमी रही। कहीं-कहीं 50% माल ही उपलब्ध रहा।
कहीं-कहीं तो स्थिति ऐसी हो गई कि वहाँ का 90% ईंधन ख़त्म हो गया और कहीं तो कुछ भी नहीं बचा। बता दें कि PRA नाम का ये संगठन यूके में 65% ईंधन स्टेशनों का प्रतिनिधिमंडल है। ‘ब्रिटिश पेट्रोलियम’ ने भी कहा है कि उसके दो तिहाई पेट्रोल पंप सूखे से गुजर रहे हैं। हालाँकि, सरकार का कहना है कि देश में पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं है। ट्रांसपोर्ट मंत्री ग्रांट शप्पस का कहना है कि देश में पर्याप्त मात्रा में ईंधन मौजूद है।
लेकिन, असली समस्या ये है कि स्टोरेज यूनिट से पेट्रोल पम्पों तक ईंधन को ले जाने के लिए पर्याप्त मात्रा में ट्रक ड्राइवर ही उपलब्ध नहीं हैं। कोरोना वायरस संक्रमण सहित कई कारणों से यूके में ट्रक ड्राइवरों की भारी कमी हो गई है। ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से निकलने के बाद वहाँ से कई कामगार बाहर चले गए। ब्रिटेन के कामगारों की औसत उम्र बढ़ती जा रही है। यूके में काम के लिए सही माहौल न मिलने के कारण भी ऐसा हो रहा है।
अब जब क्रिसमस भी आने वाला है, ऐसे में खाद्य पदार्थों के दाम पर इसका असर देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन एक योजना पर काम कर रहे हैं, जिसके बाद यूके की सेना को पेट्रोल स्टेशनों पर पेट्रोल-डीजल की सप्लाई करने के लिए लगाया जा सकता है। वहाँ की सरकार का कहना है कि ये कमी ‘पैनिक बाइंग’ की वजह से आई है। 5000 ट्रक ड्राइवरों को 3 महीने के अस्थायी वीजा की भी पेशकश की गई है।
BREAKING:
an estimated 50-85% of UK petrol stations (outside of the motorway network) have run out of fuel after Britons engaged in panic buying over the weekendhttps://t.co/Iqc2r1Vbm8
लेकिन, औद्योगिक संगठनों का कहना है कि शॉर्ट टर्म के लिए ही ये योजना काम आएगी। रिटेलर्स से लेकर सामानों की डिलीवरी के लिए क्रिसमस व नए साल के दौरान बड़ी समस्या आ सकती है, अगर कामगारों की कमी की समस्या को दूर नहीं किया गया तो। लोगों का पूछना है कि 5000 वीजा से 1 लाख की कमी कैसे पूरी होगी? ब्रिटेन की सरकार इसे बनावटी समस्या बताते हुए कह रही है कि सब यूनियनों की साजिश है।
यूके के पर्यावरण मंत्री जॉर्ज एसटीस का कहना है कि ये एक बड़ी समस्या नहीं है और दिक्कतें इसीलिए आ रही हैं क्योंकि लोग बिना ज़रूरत के पेट्रोल-डीजल की खरीददारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब ये लोग अपने-अपने कार में तेल भर लेंगे तो स्थिति शांत हो जाएगी। ब्रिटेन ने फ्यूल सेक्टर को राहत भी दी है। कई कंपनियों ने बयान जारी कर इसे ‘माँग में अस्थायी वृद्धि’ बताते हुए कहा कि ये राष्ट्रीय समस्या नहीं है।
उत्तर प्रदेश स्थित कानपुर के वरिष्ठ IAS इफ्तिखारुद्दीन के 3 वीडियोज वायरल हुए हैं, जिसमें वो कथित रूप से मंडलायुक्त पद पर तैनाती के दौरान सरकारी आवास में मुस्लिम कट्टरपंथियों को बुलाकर धर्म-परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले पाठ पढ़ा रहे हैं। उन पर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं। ‘मठ मंदिर समन्वय समिति’ ने इस बाबत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत की है।
कानपुर नगर के पुलिस कमिश्नर ने इस सम्बन्ध में बयान जारी कर कहा, “कानपुर आयुक्त आवास में लिए गए मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन के एक वायरल हुए वीडियो की जाँच कानपुर पुलिस के ADCP East को दी गई है। जाँच की जा रही है कि क्या वीडियो सही है और क्या इसमें कोई अपराध हुआ है।” हालाँकि, कई लोगों का पुलिस से ये भी पूछना है कि जाँच की रिपोर्ट कब तक आएगी और कार्रवाई की समयसीमा क्या होगी।
कानपुर के वरिष्ठ कर्मचारी नेता भूपेश अवस्थी ने भी इस सम्बन्ध में सीएम योगी से शिकायत की है। उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी जाँच का आश्वासन दिया है। वीडियो किसी अच्छे घर का है, जो देखने में सरकारी आवास जैसा लग रहा है। इसमें एक वक्त कुर्सी पर बैठ कर जमीन पर बैठे कुछ मुस्लिमों को सम्बोधित कर रहा है, जिसे IAS इफ्तिखारुद्दीन बताया जा रहा है। भूपेश अवस्थी ने वीडियो को आपत्तिजनक बताते हुए कहा है कि इसमें धर्मांतरण की बातें हैं।
‘UttarPradesh.ORG News’ के अनुसार, ये भी आरोप लगा है कि जब ये कानपुर में थे तो रमज़ान में इनके दफ्तर या घर में कोई कर्मचारी कुछ खा-पी नहीं सकता था। धर्म-परिवर्तन और इस्लाम की आड़ में लोगों को भड़काने का आरोप भी लगा है। ‘सुदर्शन न्यूज़’ ने इसे ‘UPSC जिहाद’ करार दिया है और कहा है कि इस मुद्दे पर वीडियो बनाने से अदालत ने उसे रोक दिया था और ‘खान मार्किट गैंग’ भी इसके खिलाफ हो गया था।
वीडियो में एक अन्य मौलाना कहता है, “पूरे दुनिया के इंसानों को बताओ इस्लाम को आगे बढ़ाओ। अभी पिछले दिनों पंजाब के एक भाई ने इस्लाम कबूल किया तो मैंने उन्हें दावत नहीं दी थी। मैंने कहा कि इस्लाम कबूल करने की वजह क्या थी, तो उन्होंने कहा कि मेरी बहन की मौत। जब उसे जलाया तो वो कपड़े जल गए और वो निर्वस्त्र हो गई। फिर मुझे लगा मेरी बेटी भी है। कल को उसे भी लोग ऐसे ही देखेंगे। इसीलिए, मुझे इस्लाम से अच्छा कोई मजहब नहीं लगा और मैंने कबूल कर लिया।”
कानपुर आयुक्त आवास में लिए गए #IAS मो. इफ्तिखारुद्दीन के एक वायरल हुए वीडियो की जांच @kanpurnagarpol के ADCP East को दी गई है, जांच की जा रही है कि क्या वीडियो सही है और क्या इसमें कोई अपराध हुआ है। @Uppolice
— POLICE COMMISSIONERATE KANPUR NAGAR (@kanpurnagarpol) September 27, 2021
इसमें वो पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी की पुस्तक का भी जिक्र करता है। वो कहता है, “अल्लाह ने हमें उत्तर प्रदेश के रूप में एक ऐसा सेंटर दिया है, जहाँ से हम पूरे देश-दुनिया में काम कर सकते हैं। ऐलान करो दुनिया के इंसानों से कि अल्लाह की बादशाहत और निजामियत पूरी दुनिया में कायम करनी है। हर घर में अल्लाह का दीन दाखिल होना है, करना चाहिए।” इस वीडियो में वो इस्लाम कबूल करने के फायदे भी गिना रहा है।
मोपला मुस्लिमों द्वारा मालाबार में किए गए हिंदू नरसंहार को साल 2021 में 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। मोपला हिंदू नरसंहार इतिहास के पन्नों में सबसे बर्बर नरसंहारों में से एक है। इस दौरान केरल के मालाबार में हजारों हिंदुओं को मोपला मुस्लिमों द्वारा मारा गया था। इसकी शुरुआत तुर्की में खलीफा की पुन: स्थापना की माँग करने वाले खिलाफत आंदोलन को लेकर हुई थी जिसे व्यापक स्तर पर कॉन्ग्रेस नेताओं का समर्थन प्राप्त था, खासतौर से एमके गाँधी का। गाँधी जी को जहाँ लग रहा था कि ये ‘राष्ट्रवादी मुसलमान’ ब्रिटिशों से लड़ने में मदद करेंगे। वहीं वो इस तथ्य को सहज तौर पर नकार रहे थे मोपला मुसलमानों की लड़ाई तो इसलिए थी कि वो ब्रिटिशों को निकाल कर इस्लामी हुकूमत कायम कर सकें।
ब्रिटिश रिकॉर्ड गवाही देते हैं कि 10000 हिंदुओं को कट्टर मोपला मुस्लिमों ने मारा था जिसकी शुरुआत 1921 से हुई थी। कम्युनिस्ट फिर भी दशकों से हिंदू नरसंहार पर लीपापोती करने का काम करते रहे हैं और अब जब भाजपा/आरएसएस ने मालाबार हिंदू नरसंहार पर बात करने के लिए प्रोग्राम आयोजित किया तो उन्होंने फिर जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।
दरअसल, केरल में कम्युनिस्ट पार्टी अब एक ‘पर्यटन सर्किट’ विकसित करने की योजना बना रही है, जो ‘किसान विद्रोह’ की याद में मालाबार ‘विद्रोह’ के स्थलों को जोड़ती है। राज्य के पर्यटन मंत्री मोहम्मद रियास ने अलाप्पुझा में कहा कि पर्यटन विभाग मलप्पुरम में विद्रोह से संबंधित सभी महत्वपूर्ण स्थलों को जोड़ने वाला एक सर्किट विकसित करेगा। उन्होंने कहा कि यह बहुत सारे पर्यटकों और इतिहास के छात्रों को आकर्षित करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मालगाड़ी त्रासदी’ को एक त्रासदी कहना गलत है, क्योंकि यह अंग्रेजों द्वारा जानबूझकर किया गया ‘नरसंहार’ था।
रियास ने कहा कि इसे त्रासदी कहना ऐसा होगा जैसे ये कोई आपदा है जबकि ये एक जानबूझकर किया गया नरसंहार था जिसे ब्रिटिशों ने कराया था। उन्होंने कहा, “हम त्रासदी शब्द का उपयोग कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल अंग्रेजों ने किया था और ये करना अभागे पीड़ितों के साथ बहुत गलत है।” पूरे नरसंहार को किसान विद्रोह बताते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा ने जो नरसंहार कहा, वो गलत था।
मालगाड़ी त्रासदी का सच जिसे कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘बेचारे मोपला पीड़ितों’ का नरसंहार कहा है
एक ओर जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी उस मालगाड़ी त्रासदी को ब्रिटिशों द्वारा किया गया नरसंहार कहने का दबाव बना रही है और ये बता रही है कि ब्रिटिशों ने अभागे पीड़तों को मारा…सच्चाई इन सबसे अलग है। कम्युनिस्ट इतिहासकार बताते हैं कि ये त्रासदी जलियाँवाला बाग नरसंहार जैसी थी जिसमें ब्रिटिशों ने भारतीय सिखों को गोली मारी और उनकी हत्या की। यहाँ तक कि अपने कालीकट में दिए गए भाषण में महात्मा गाँधी ने भी अंग्रेजों के व्यवहार की तुलना जलियाँवाला बाग से की थी। मगर ऐसी तुलना के समय ये ध्यान रखना जरूरी है कि जलियाँवाला बाग नरसंहार में मारे गए सभी निहत्थे सिख राष्ट्रवादी थे।
वहीं मोपला मुसलमान, हत्यारे थे, दंगाई थे जिन्होंने हिंदू नरसंहार को अंजाम दिया। सैंकड़ों महिलाओं का रेप किया। इस भयावह नरसंहार के दौरान 70 से 90 मुसलमान पकड़े गए थे जिन्होंने हिंदू महिलाओं को मारा या उनका बलात्कार किया था। मोपला मुसलमानों में से 56 की मौत 19 नवंबर 1921 को तिरुर से कोयंबटूर के पास पोद्दानूर सेंट्रल जेल ले जाने के लिए एक मालगाड़ी में दम घुटने से हुई थी। इसके बाद 6 और कैदियों की मौत अस्पातल ले जाते वक्त हुई थी जबकि 8 की मौत अस्पताल में हुई थी।
अब यह तो दिलचस्प है कि कट्टरपंथी मोपला मुसलमानों द्वारा मारे गए 10000 से अधिक हिंदुओं के नरसंहार को जमींदारों के ख़िलाफ़ छेड़ा गया किसानों का विद्रोह बताने वाले दम घुटने से होने वाली मौत को नरसंहार कह रहे हैं। आप देख लीजिए कि यही वो सबूत है जो बताता है कि कैसे मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की आदत हिंदुओं के जीवन को कोई मोल नहीं रहने देती।
क्या मालाबार हिंदू नरसंहार जमींदारों के विरुद्ध छेड़ा गया किसान ‘विद्रोह’ था?
कम्युनिस्ट पार्टी ने केवल मालगाड़ी त्रासदी में मारे गए मोपला मुस्लिमों को अभागे पीड़ित कहने का काम नहीं किया बल्कि हिंदुओं के सारे नरसंहारों पर हमेशा से पर्दा डालती रही है। ये सब कम्युनिस्ट और उनके इतिहासकार व राजनेताओं की मदद से हुआ जिन्होंने इस पूरे नरसंहार को जमींदारों के विरुद्ध शुरू हुआ एक किसान विद्रोह कहा। मार्क्सवादी इतिहासकारों ने दशकों से दावा किया है कि नरसंहार की वास्तविक उत्पत्ति के बारे में बात करने का कोई भी प्रयास संघ द्वारा ‘विद्रोह’ को सांप्रदायिक बनाने का एक प्रयास है और इसकी शुरुआत में कोई हिंदू-मुस्लिम उपक्रम नहीं था।
हालाँकि, वह कम से कम कभी-कभी ये स्वीकार कर लेते हैं कि हिंदुओं की वास्तविकता में हत्या की गई थी। लेकिन उनका दावा कुछ अलग ढंग से होता है जैसे वह कहते हैं कि उस समय के जमींदारों ने किसानों के साथ बुरा व्यवहार किया और इसीलिए 1921 में किसानों ने जमींदारों के ख़िलाफ़ विद्रोह किया था। हिंदुओं के नरसंहार को सही बताने के लिए उन्होंने बड़ी आसानी से कह दिया कि जमींदार जो थे वो हिंदू थे और जो किसान थे वो मुसलमान थे। आगे इसी पाखंड में वो हिंदुओं के बलात्कार और हत्याओं को जस्टिफाई करते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कोई दैवीय प्रतिशोध था और अमीर, अभिमानी, शोषक हिंदू जमींदारों के खिलाफ दलितों और उत्पीड़ितों का विद्रोह था।
ऐसा करके, वे न केवल हिंदुओं पर थोपे गए जिहाद को धो पोंछते हैं, बल्कि यह भी दावा करते हैं कि हिंदुओं की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि हिंदुओं ने मुसलमानों पर अत्याचार किया। यह उनकी गलती है। उन्होंने वही काटा जो उन्होंने बोया था।
कम्युनिस्टों ने क्या लिखा है मोपला मुस्लिमों के लिए अपनी वेबसाइट पर
पूरे नरसंहार का सच बिलकुल अलग है। हिंदुओं के मोपला नरसंहार को बामुश्किल हमारी इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है लेकिन खिलाफत आंदोलन जिसने इसे भड़काया उस पर लीपापोती की जाती है। हमारी इतिहास की किताबों में हमें ये जानकारी दी जाती है कि हिंदू मुस्लिम जब एक साथ ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ लड़ने आगे आए उसे खिलाफत आंदोलन कहा गया। जबकि हकीकत ये है कि तुर्की में खलीफा के पद की पुन: स्थापना के लिए खिलाफत आंदोलन किया जा रहा था न कि स्वराज्य की माँग को लेकर। वो ब्रिटिश को भगाना चाहते थे लेकिन इसलिए ताकि इस्लामी हुकूमत काबिज हो सके। महात्मा गाँधी ने ऐसे समय में उनको समर्थन दिया और हिंदुओं से बिन लड़े मर जाने को कहा।
ऐसा करके गाँधी ने कट्टर इस्लाम को और बढ़ावा दे दिया। गाँधी मानते थे कि खिलाफत को उनका समर्थन भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश विरोधी जज्बात को भड़काएँगे। इस आंदोलन को पहला आंदोलन कहा गया जिसने ब्रिटिशों के विरुद्ध असहयोग आंदोलन को मजबूत किया।
कट्टरवादियों को गाँधी के समर्थन ने हिंदुओं की मौत, हिंदू महिलाओं के रेप, उनके सिर कलम और धर्मांतरण जैसी घटनाओं को जन्म दिया। जिन्होंने परिवर्तित होने से मना किया उन्हें काट दिया गया। कहा जाता है कि प्रेगनेंट महिलाएँ भी नहीं छोड़ी गईं थी। हिंदुओं के खून से सड़कें रंगी थीं और बिन पैदा हुआ नवजात सड़क पर खुला मरा पड़ा था।
मोपला मुसलमानों द्वारा किए गए अत्याचार के बारे में यह तथ्य कि यह किसान विद्रोह नहीं था, पर इतिहास में इसे सावधानीपूर्वक दर्ज किया गया है, हालाँकि इसका एक बड़ा हिस्सा केरल में कम्युनिस्टों द्वारा मिटा दिया गया था।
जहाँ मार्क्सवादी इतिहासकारों ने 1921 में हिंदुओं के नरसंहार को मुस्लिम किसानों द्वारा हिंदू जमींदारों के खिलाफ एकतरफा विद्रोह के रूप में चित्रित किया, वहीं कई अन्य अपराधों ने मोपला मुसलमानों और मालाबार हिंदुओं के बीच संघर्ष को चिह्नित किया। 50 से अधिक ऐसी घटनाएँ जहाँ मोपला मुसलमानों ने हिंदुओं का नरसंहार किया था, दीवान बहादुर सी गोपालन द्वारा लिखित पुस्तक द मोपला विद्रोह, 1921 में दर्ज की गई थी, जो कालीकट, मालाबार के डिप्टी कलेक्टर थे। इस पुस्तक को मालाबार में हुई घटनाओं के सबसे प्रामाणिक लेखों में से एक माना जाता है।
ध्यान देने योग्य बात है कि जब मोपला मुसलमान ऐसे ऐतिहासिक अपराध को अंजाम दे रहे थे। उससे कहीं पहले अंग्रेजों ने 1852 में एक विशेष आयुक्त नियुक्त किया था, उनका नाम टीएल स्ट्रेंज था जिनका काम था कि पता लगाएँ कि आखिर मोपला मुसलमान नियमित रूप से हिंदुओं को मारते क्यों हैं।
1852 की यह रिपोर्ट भी ‘किसान विद्रोह’ वाले दावों को झुठलाती है। इसमें टीएल स्ट्रेंज ने कहा था,
“किसी भी खतरे को जमींदारों द्वारा किसानों के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। बावजूद इसके दक्षिणी तहसील में मोपला आबादी इन प्रकोपों का दोष जमींदारों पर मढ़ने की कोशिश कर रही है। वे इसके लिए खूब कोलाहल कर रहे थे। मैंने इस मामले में पूरा ध्यान दिया है और मुझे विश्वास है कि हालाँकि किसानों की व्यक्तिगत कठिनाई के उदाहरण हो सकते हैं, लेकिन हिंदू जमींदार अपने किसानों के प्रति सामान्य चरित्र, चाहे मोपला या हिंदू, नरम, न्यायसंगत और सहनशील हैं। मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि मोपला के काश्तकारों का आचरण ठीक नहीं है। वो सामान्यतः अपने दायित्वों से बचने के लिए झूठी और कानूनी दलीलों का सहारा लेते हैं। ऐसे में इसको लेकर कड़े उपाय किए जाते हैं।”
उन्होंने आगे कहा:
“इन सभी मामलों में एक विशेषता सामान्य रही है कि उन्हें सबसे निश्चित कट्टरता द्वारा सभी को चिह्नित किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता था। इस तरह की घटनाएँ जिन हिस्सों में है, वहाँ हिंदू मोपलाओं के डर में जी रहे हैं। अधिकतर अपने अधिकारों के लिए वहाँ के हिंदू मोपलाओं के इस तरह के डर में खड़े हैं कि ज्यादातर उनके खिलाफ अपने अधिकारों के लिए दबाव बनाने की हिम्मत नहीं करते हैं। कई मोपला यहाँ किराएदार हैं, लेकिन वे अपना किराया नहीं देते हैं। इसके अपने रिस्क भी हैं और इसीलिए अच्छा है कि वहाँ से बेदखल हो जाएँ।”
इसके अलावा भी कई ऐसे सबूत हैं जो बताते हैं कि उस समय हिंदुओं को इस्लामी कट्टरता की भेंट चढ़ना पड़ा था न कि किसी किसान विद्रोह का।
हालाँकि, (पाकिस्तान या भारत का विभाजन, पृष्ठ 146, 147 पर) डॉ अम्बेडकर कहते हैं:
“(खिलाफत) आंदोलन मुसलमानों द्वारा शुरू किया गया था। जिसे गाँधी द्वारा दृढ़ता और विश्वास के साथ अपना लिया गया। इसने शायद कई मुसलमानों को आश्चर्यचकित कर दिया होगा। ऐसे कई लोग थे जिन्होंने खिलाफत आंदोलन के नैतिक आधार पर संदेह किया और गाँधी को आंदोलन में भाग लेने से रोकने की कोशिश की, जिसका नैतिक आधार ही इतना संदिग्ध था।
उन्होंने कहा, “ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ऐसा विद्रोह समझ आता। लेकिन सबसे ज्यादा हैरानी हिंदुओं के साथ हुए व्यवहार के कारण होती है।” उन्होंने लिखा, “मोपलाओं के हाथों हिंदुओं की दुर्दशा हुई। नरसंहार, जबरन धर्मांतरण, मंदिरों की अपवित्रता, महिलाओं पर अत्याचार, जैसे कि गर्भवती महिलाओं को चीरना, लूटपाट, आगजनी और विनाश। संक्षेप में, क्रूर और पूरी बर्बरता का प्रयोग मोपलाओं द्वारा हिंदुओं पर स्वतंत्र रूप से किया गया….ये कोई हिंदू मुस्लिम दंगा नहीं था। बल्कि ये नरसंहार था। कितने हिंदुओं को मारा गया, चोट पहुँचाई गई, उनका धर्मांतरण करवा दिया गया, इसकी सीधे-सीधे कोई गणना नहीं है। लेकिन संख्या बहुत बड़ी है।”
नई दिल्ली में आईसीएचआर के पूर्व अध्यक्ष डॉ एम जी एस. नारायणन ने इस संबंध में लिखा,
“गाँधीजी उस समय राजनीतिक रूप से अपरिपक्व थे कि वो ब्रिटिश भारत के संदर्भ में यह मान रहे थे कि भारत में गरीब और अनपढ़ मुस्लिम समुदाय को आसानी से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एक सक्रिय राजनीतिक संघर्ष में खींचा जा सकता है। मुसलमानों को खुश करने के लिए, उन्होंने… खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, जिसे अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध के अंत में तुर्की में समाप्त कर दिया था। बाद में महात्मा गाँधी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने की अपनी इस मूर्खता पर खेद व्यक्त किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी- नुकसान हो चुका था। मुसलमानों को सामाजिक सुधार और आधुनिक शिक्षा के लिए मनाने के बजाए, खिलाफत ने उनकी रूढ़िवादी धार्मिक प्रवृत्ति को वैध बनाया और बाहरी दुनिया के बारे में उनके डर और संदेह को जगाया। इसने उनकी सांप्रदायिकता को और मजबूत किया, जो अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब के दिनों से निष्क्रिय पड़े हिंदू काफिरों के खिलाफ नफरत के रूप में पनपी थी।”
न केवल भारतीय नेता और इतिहासकार, बल्कि एनी बेसेंट, जो एक ब्रिटिश थियोसोफिस्ट, समाजवादी और सुधारक थीं, उन्होंने हिंदुओं के मालाबार नरसंहार के बारे में विस्तार से लिखा था।
एनी बेसेंट, जिन्होंने 1921 के वसंत में मालाबार में पहले ‘सुधार सम्मेलन’ की अध्यक्षता की थी, ने भी इस घटना के बारे में विस्तार से लिखा था।
एनी बेसेंट ने फ्यूचर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स (थियोसोफिकल पब्लिशिंग हाउस, 1922, पृष्ठ 252) में लिखा था,
“चौथा कार्यक्रम औपचारिक रूप से 1 अगस्त 1920 को शुरू किया गया था; एक साल में स्वराज की प्राप्ति होनी थी और 1 अगस्त 1921 को मालाबार विद्रोह में पहला कदम उठाया गया। उस जिले के मुसलमान (मोपला) हथियार तैयार करने के तीन सप्ताह के बाद, विद्रोह के लिए एक निश्चित क्षेत्र में लक्ष्य के साथ आगे बढ़े, वो भी यह विश्वास करते हुए कि ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया है और वो आजाद हैं।”
वह कहती हैं, “उन्होंने खिलाफत राज की स्थापना की, एक राजा का ताज पहनाया, हत्याएँ की और भारी मात्रा में लूटपाट की, और उन सभी हिंदुओं को मार डाला या भगा दिया जो धर्मांतरण को तैयार नहीं थे। कहीं न कहीं लगभग एक लाख लोगों को उनके घरों से निकाल दिया गया था, और उनके पास जो कपड़े थे, सब कुछ छीन लिया गया।”
मालाबार में हिंदुओं के खिलाफ मोपला मुसलमानों द्वारा किए गए नरसंहार के इतने व्यापक रिकॉर्ड होने के बाद किसी के मन में यह संदेह नहीं है कि वो वास्तव में जिहादी तत्व थे जिनके कारण हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ। ये नरसंहार स्पष्ट तौर पर उस इच्छा का परिणाम था जो मोपला मुस्लिम चाहते थे कि ब्रिटिशों के जाने के बाद इस्लाम की स्थापना हो। और इसी प्रक्रिया में, वो सच्चे खलीफा स्टाइल में हिंदू काफिरों को बेरहमी और निर्दयता से मार रहे थे।
इतना सबके बावजूद कम्युनिस्ट सरकार आज टूरिज्म सर्किट बनाकर हिंदुओं के जख्मों पर नमक छिड़कना चाहती है ताकि मोपला मुस्लिमों को राष्ट्रवादी करार दिया जा सके जिन्होंने ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिंदुओं का साथ दिया। वह लोगों की स्मृतियों से मालाबार हिंदू नरसंहार की बातें मिटा चुके हैं। अब वह उन आवाजों को बदनाम करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं जो धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि इतिहास से सीखना जरूरी है वरना वहीं चीज होती रहेगी।
मोपला मुस्लिमों की बर्बरता पर लीपापोती और ISIS के टॉयलेट क्लीनर
ये समझना बेहद जरूरी है कि मोपला मुसलमान मालाबार में क्या चाहते थे जब उन्होंने इस्लामी खिलाफत स्थापित करने की कोशिश की जो कि तुर्क साम्राज्य से प्रतिबिंबित था। तुर्क साम्राज्य इस्लाम के कट्टरपंथी सिद्धांतों पर आधारित था और जबकि मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इस्लाम के खलीफा के तहत भी बहुलवाद और भाईचारे के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। सच्चाई बिलकुल अलग है। कई ऐसे मामले हैं जब कट्टर जिहाद के नाम पर खलीफा के शासन के नाम पर काफिरों पर हमला हुआ जैसे ईसाई और अर्मेनियाई पर। यह वह मॉडल है जिसका कट्टरपंथी मोपला मुसलमान अनुकरण करना चाहते थे अपने उम्माह के भ्रम में। वो इस्लाम के खलीफा के लिए अपनी निष्ठा रख रहे थे न कि भारत राष्ट्र के लिए जिसके लिए भारतीय सेनानी लड़ रहे थे।
मोपला अंग्रेजों को भगाना चाहते थे। इसलिए नहीं कि वे भारत की संप्रभुता में विश्वास करते थे बल्कि इसलिए कि वे इसके स्थान पर एक इस्लामी खिलाफत स्थापित करना चाहते थे। इस मजहबी जंग के लिए उन्होंने जो नाम चुना, वह ‘खिलाफत आंदोलन’ था। एक ऐसा नाम जिसका गलत अर्थ समझने के लिए लोग आजाद थे और जब एमके गाँधी ने इस ख़िलाफत आंदोलन को समर्थन दिया तो लोगों ने इस खिलाफत को ‘खिलाफ’ समझ लिया और ये समझा कि मोपला मुस्लिम भी ब्रिटिशों के खिलाफ़ हैं। मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इस गलत व्याख्या को आज तक आगे बढ़ाया और बार-बार दोहराया कि मोपला मुसलमान अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ रहे थे।
वास्तव में, खिलाफत आंदोलन का नाम ‘खलीफा’ के लिए रखा क्योंकि वे इस्लाम के तुर्की खलीफा के अधिकार को बनाए रखने के लिए लड़ रहे थे। आधिकारिक तौर पर, खिलाफत का अर्थ ‘खलीफा’ से है जो- विशेष रूप से पैगंबर की मृत्यु के बाद इस्लामी समुदाय के नेतृत्व को संदर्भित करता है।
आज के समय में खिलाफत का सही उदाहरण ISIS की स्थापना के साथ देखा जा सकता। उन्होंने अपना खलीफा बनाया जिसने इस्लामी कानून और शरिया के आधार पर इराक और सीरिया में राज किया। हालाँकि, इस बीच विश्व ने उस आतंक को ये कहकर कम कर दिया कि आईआईएसएस एक आतंकी संगठन है जो इस्लाम का इस्तेमाल हत्या और बलात्कार के लिए कर रहा है। लेकिन सच ये है कि आईएसआईएस इस्लाम पर चल रहा था जैसे तालिबान शरिया लागू करके अफगानिस्तान में चल रहा है।
इसलिए 1921 के मोपला मुस्लिमों की तुलना ISIS आतंकियों से करना ज्यादा गलत नहीं है। वो भी खिलाफत की माँग ही करते हैं। यह ‘राष्ट्रवादी आंदोलन’ है जिसका एमके गाँधी ने समर्थन किया और उस समय के मोपला मुस्लिम आतंकवादियों को प्रोत्साहित किया। कट्टरपंथी मुसलमानों का यही आतंकवादी आंदोलन आज कम्युनिस्ट ऐसे दिखाना चाहते हैं जैसे वो हिंदू जमींदारों के अत्याचार के विरुद्ध शुरू हुआ किसान विद्रोह था।
यह सच में हैरानी की बात नहीं है कि भारत के केरल को आईएसआईएस आतंकवादियों के लिए सबसे प्रमुख भर्ती का स्थान होने की विशिष्ट उपलब्धि क्यों प्राप्त है। केरल की कम्युनिस्ट पार्टी ने भले ही 100 साल पहले हुए हिंदू नरसंहार को धो दिया है लेकिन केरल के कट्टरपंथी मुसलमानों ने साबित कर दिया है कि अगर कोई उन्हें खलीफा की स्थापना की संतुष्टि देता है तो वो ISIS के टॉयलेट क्लीनर भी बनने को तैयार हैं।
केरल के सीएम ने खुद स्वीकार किया कि 2019 तक 100 से ज्यादा मलयाली ISIS में शामिल हो गए थे। जबकि केरल के ये मुसलमान दर्जनों में ISIS में शामिल हो रहे हैं, इस बारे में कई रिपोर्टें आई हैं कि ISIS इन भारतीय आतंकवादियों को कैसे देखता है और जोर देता है कि वे शौचालय साफ करें। जहाँ ये युवा आतंकवादी काफिरों का सिर कलम करने, शरीयत थोपने और खिलाफत स्थापित करने के सपने के साथ इराक और सीरिया जाते हैं, वहीं दुनिया के अन्य हिस्सों से आईएसआईएस के अन्य जिहादियों के लिए शौचालय साफ करने के लिए इन युवा आतंकवादियों को भर्ती किया जाता है। आश्चर्यजनक बात ये है कि खिलाफत को लेकर इनकी इच्छा इतनी प्रबल है कि इन्हें वो काम भी पसंद आ जाता है।
अगर इन आधुनिक जिहादियों को आईएसआईएस जिहादियों के शौचालयों की सफाई करने में कोई आपत्ति नहीं है, तो आपको यह मानना होगा कि मोपला मुसलमानों के अपराधों को धोना, जो 1921 में ही आज के आईएसआईएस जैसी खिलाफत स्थापित करना चाहते थे, कुछ ऐसा है जो स्वाभाविक रूप से इनमें और इनसे सहानुभूति रखने वालों में आता है।
इस्लामी खलीफा की चाह रखने वालों के शौचालय साफ करने से लेकर अब नरसंहार को छिपाने का प्रयास… केरल अक्सर ‘काफिरों’ के घाव पर नमक छिड़कने में सबसे आगे रहा है और उनके कटे सिर, क्षत-विक्षत शरीर से मुँह फेरता रहा है। वहीं की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी अब फिर इतिहास लिखना चाहती है ताकि जब दोबारा ऐसी कोई स्थिति सामने आए तो आँख पर पट्टी बाँधे रखने वाले हिंदू उससे भी गुरेज न करें। ये सब हैरान करने वाला नहीं है बल्कि एक चेतावनी जैसा है- जब हिंदू काफिरों का जिहादी नरसंहार करेंगे, तो कम्युनिस्ट उनके साथ खड़े होंगे और हमारे दिमाग में ये डालेंगे कि नरसंहार तो हमारी ही गलती थी।
नोट: मूल रूप से अंग्रेजी में नुपूर शर्मा द्वारा लिखी इस रिपोर्ट का अनुवाद जयंती मिश्रा ने किया है। मूल लेख इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत के मामले में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। जाँच में पता चला है कि बाघंबरी मठ और महंत नरेंद्र गिरि के कमरे के सामने लगे सभी सीसीटीवी कैमरे उस दिन बंद कर दिए गए थे, जिस दिन महंत की संदिग्ध मौत हुई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूरा मठ सीसीटीवी की निगरानी में है। यहाँ 43 कैमरे लगाए गए हैं। इनमें से 15 सीसीटीवी कैमरे पहली मंजिल पर महंत नरेंद्र गिरि के कमरे के सामने लगाए गए हैं।
महंत के कमरे के सामने लगे 15 सीसीटीवी कैमरे
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस को इस मामले में तब संदेह हुआ जब उन्होंने जाँच में पाया कि मठ की पहली मंजिल पर 15 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, जहाँ महंत का कमरा था, लेकिन 20 सितंबर 2021 को उन सभी को बंद कर दिया गया था। इसी दिन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष अपने कमरे में मृत पाए गए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को बिना सीसीटीवी कैमरों के यह पता लगाने में मुश्किल हो रही है कि महंत घटना के दिन पहली मंजिल पर अपने कमरे में कैसे और कब पहुँचे। इसके अलावा, पुलिस यह भी पता नहीं लगा पा रही है कि घटना के वक्त कोई कमरे में था या महंत के कमरे में जाने के बाद कोई अंदर गया था।
ये कुछ अनसुलझे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अभी तक पहेली बना हुआ है। जाँच के मुताबिक मठ के प्रवेश द्वार से लेकर महंत नरेंद्र गिरि के कमरे तक लगे कैमरों में घटना की कोई रिकॉर्डिंग नहीं है।
हालाँकि, मठ के कुछ सदस्यों ने पुलिस को बताया कि 20 सितंबर 2021 को मठ में बिजली जाने की वजह से कैमरे अचानक बंद हो गए थे। अन्य ने कहा कि कैमरों से जुड़ी एक डीवीआर मशीन कुछ दिन पहले खराब हो गई थी, जिससे कैमरों ने काम करना बंद कर दिया था। ऐसे में पुलिस का इन बातों पर विश्वास करना और मामले की जाँच करना मुश्किल हो रहा है।
प्रयागराज में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि की मौत की जाँच केंद्रीय जाँच एजेंसी (CBI) कर रही है। सीबीआई ने रविवार (26 सितंबर 2021) को प्रयागराज कोर्ट के समक्ष एक आवेदन दायर कर मौत के मामले में तीन संदिग्धों आनंद गिरि, आद्या तिवारी और संदीप तिवारी की 10 दिन की हिरासत की माँग की थी। उनके पास से कुछ इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बरामद हुए हैं।
गौरतलब है कि प्रयागराज में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महंत का शव बाघमबरी मठ में सोमवार (20 सितंबर 2021) को फाँसी के फंदे से लटकता मिला था। महंत की मौत की जाँच के लिए सीबीआई ने 6 सदस्यीय टीमों का गठन किया है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (27 सितंबर 2021) को सिंगल जज के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें अरविंद केजरीवाल का कोरोना काल में गरीब किराएदारों को भुगतान करने का वादा लागू करने योग्य बताया गया था। चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की खंडपीठ ने कहा कि इस फैसले पर तब तक रोक लगाई जाती है, जब तक मामले की अगली सुनवाई नहीं हो जाती। इस मामले में अगली सुनवाई 29 नवंबर 2021 को होगी।
Delhi High Court stays ruling on enforcing CM Arvind Kejriwal press conference promise on payment of rent
जस्टिस प्रतिभा सिंह ने 22 जुलाई के आदेश में उस फैसले को लागू करने योग्य बताया था, जिसमें केजरीवाल ने कहा था कि वह असमर्थ किराएदारों के किराए का भुगतान करेंगे। 29 मार्च 2021 को कोरोना महामारी के दौरान सीएम अरविंद केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दिल्ली सरकार गरीब किराएदारों की तरफ से किराए का भुगतान करेगी। यदि कोई किराएदार किराए का भुगतान करने में असमर्थ है। हालाँकि, यह फैसला लागू नहीं किया गया था, जिसको लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई है। दिल्ली सरकार ने जस्टिस प्रतिभा सिंह के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए सीनियर वकील मनीष वशिष्ठ ने कहा, “ऐसा कोई वादा नहीं किया गया था। हमने सिर्फ इतना कहा था कि प्रधानमंत्री के आदेश का पालन करें। हमने मकान मालिकों से किराए के लिए किराएदारों को मजबूर न करने को कहा था और ये भी कहा था कि अगर किराएदारों को कोई साधन नहीं मिलते हैं तो सरकार इस पर गौर करेगी।”
इस पर हाई कोर्ट ने पूछा, “तो क्या आपका इरादा भुगतान करने का नहीं है? यहाँ तक कि एक फीसदी भी नहीं?” कोर्ट ने कहा, ”यह बहुत हैरानी की बात है कि इतनी कम राशि के लिए दिल्ली सरकार जो सभी राज्यों में अपने आपको सबसे बेहतर और सबसे अधिक बजट वाला होने का दावा करती है, वो मना कर रही है।”
इस पर मनीष वशिष्ठ ने कहा, “केवल तभी जब माँग हो।” उन्होंने दावा किया कि कोई भी व्यक्ति उनके पास राहत माँगने नहीं आया। वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील गौरव जैन ने अदालत के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि उनके क्लाइंट के पास किराए का भुगतान करने का कोई साधन नहीं है।
बता दें कि जस्टिस सिंह ने उस दौरान दिल्ली सरकार को सीएम द्वारा किए गए वादे को पूरा करने के लिए एक नीति बनाने का आदेश दिया था। उन्होंने 22 जुलाई 2021 को अपने आदेश में कहा था कि अरविंद केजरीवाल का प्रेस कॉन्फ्रेंस किया गया वादा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इतिहास देखें तो असम के दरांग जिले के धोलपुर में गत बृहस्पतिवार (23 सितंबर) को सरकारी जमीन पर से अवैध कब्जा हटाने की प्रक्रिया में जो हिंसा हुई वह पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं थी। इसलिए नहीं कि राज्य सरकार इसके लिए तैयार थी बल्कि इसलिए क्योंकि सरकारी संपत्ति पर से कब्ज़ा हटाने की प्रक्रिया ऐसी ही होती रही है जिसमें हिंसा का एक पूरा सिलसिलेवार इतिहास रहा है और यह किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। रेलवे की जमीन, राज्य सरकारों की जमीन, केंद्र सरकार के किसी विभाग की जमीन हो, ऐसी हिंसा समय-समय पर कई जगहों पर देखने को मिली है। इस बात के भी उदाहरण हैं जब सरकारों या उनके विभागों द्वारा चलाए गए ऐसे बेदखली अभियान असफल भी रहे हैं।
हिंसा अप्रत्याशित नहीं रही हो पर जो बात ध्यान देने योग्य है वह ये है कि बेदखली के इस अभियान के पहले राज्य सरकार और अवैध कब्ज़ा करने वालों के बीच एक न्यूनतम समझौता हुआ था जिसके अनुसार कब्ज़ा हटाने के परिणामस्वरूप विस्थापितों को राज्य सरकार के नियमों के तहत जमीन दी जानी थी। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पहले से तयशुदा प्रक्रिया के बावजूद असम पुलिस पर इस तरह का हमला क्यों हुआ और इसके पीछे अवैध कब्जाधारकों की क्या मंशा थी? साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा हिंसा के पीछे जिस षड्यंत्र की बात कर रहे हैं, उसे क्या बिना छानबीन के नजरअंदाज किया जा सकता है? अवैध घुसपैठियों द्वारा इतनी बड़ी सरकारी जमीन और संसाधनों की ऐसी लूट क्या कोई देश चुपचाप सहन कर सकता है?
असम के बाद ही एक मामला उत्तराखंड में हुआ जिसमें टिहरी बाँध पर बनी एक मस्जिद को हटाने की माँग को लेकर प्रशासन और स्थानीय लोगों में एक झड़प हुई और उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। थोड़ा पीछे जाएँ तो इस महीने के शुरुआत में दिल्ली के फ्लाईओवर पर एक छोटी सी मस्जिद हटाने की माँग करने वाले स्थानीय लोगों और उस इलाके के पुलिस अफसर के बीच एक झड़प हुई थी और उसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। आज गुरुग्राम में सार्वजनिक जगह पर लगातार नमाज पढ़ने को लेकर स्थानीय लोगों ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि नमाज पढ़ने वालों के जुटने की वजह से इलाके में महिलाओं का आना-जाना दूभर हो गया है। इस तरह की तमाम घटनाएँ आये दिन सोशल मीडिया पर न केवल रिपोर्ट होती हैं बल्कि उन्हें लेकर लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी देखने और पढ़ने को मिलती हैं।
टिहरी डैम पर अवैध बना दी गयी मस्जिद को हटाने की माँग करते स्थानीय युवा, पुष्कर धामी जी देवभूमि को दानव ग्रसित कर रहा है, अधिकारियों पर दबाव बनाइये। pic.twitter.com/HZGurgWgNw
ये घटनाएं हमारे समय का दस्तावेज हैं और हमें किसी तरह का संदेश दे रही हैं। उस संदेश को समझना हमारे लिए चुनौती है पर उससे भी बड़ी चुनौती यह है कि संदेश समझने के बाद हम क्या करते हैं। यदि हम असम की घटना को ही देखें तो यह हमसब के लिए आश्चर्य की बात होगी कि जब देश के छोटे किसानों (करीब 65 प्रतिशत) के पास औसत रूप से एक एकड़ से भी कम जमीन है तब असम के एक जिले में प्रति व्यक्ति करीब 200 बीघे जमीन पर घुसपैठियों ने न केवल अवैध कब्ज़ा कर रखा है बल्कि उसे छोड़ने के एवज में जमीन की माँग भी करते हैं।
इस अवैध कब्ज़े को हटाने के लिए लगभग दो महीने से सरकार और कब्ज़ाधारकों के बीच बातचीत हो रही थी। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे तमाम अवैध कब्ज़े होंगे जिन्हें हटाने के लिए सरकारों को बड़ी मेहनत करने की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए अधिकतर सरकारें इस मेहनत से बचती रहती हैं जिसका परिणाम यह होता है कि अवैध कब्ज़े की जमीन बढ़ती जाती है।
यही कारण है कि दशकों की यथास्थिति को बदलने की मंशा और वादे करके आई सरकारों के लिए ऐसे अवैध कब्ज़े बहुत बड़ी चुनौती है। यह आम भारतीय के लिए ख़ुशी की बात होनी चाहिए कि वर्तमान की असम और उत्तर प्रदेश सरकार ऐसे अवैध कब्ज़े हटाने का प्रयास तो करती हैं। ऐसा करने के लिए केवल संविधान और कानून लागू करना चुनौती है और इसके लिए जिस नैतिक बल की आवश्यकता है वह अधिकतर राज्य सरकारों और उसके नेतृत्व में नहीं मिलता। दशकों के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का परिणाम यह है कि देश के बहुत बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा हो गया है और उसे हटाना केवल सरकारों के लिए कानून व्यवस्था की चुनौती नहीं बल्कि राष्ट्रीय सभ्यता के लिए भी चुनौती है।
भारतवर्ष पर अवैध कब्ज़े केवल देश के बंटवारे और विस्थापितों का परिणाम नहीं है। यह परिणाम है अवैध घुसपैठ, राजनीतिक तुष्टिकरण और योजनाबद्ध धार्मिक विस्तारवाद का। जब देश के प्रधानमंत्री देश को अपने संबोधन में बताते हैं कि; देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है तो वह बात देश के पास बाद में पहुँचती है और कब्ज़ा ग्रुप के पास पहले पहुँचती है। जब अवैध घुसपैठियों को देश के संविधान और कानून के तहत अपराधी नहीं बल्कि वोटर समझा जाता है तो उसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जब विपक्ष में रहने वाला नेता अवैध घुसपैठ पर सत्ता में आने के बाद यू-टर्न लेता है तब उससे अवैध कब्ज़ा ग्रुप को बल मिलता है। यथास्थिति को बदलने के लिए प्रयासरत सरकारें क्या कर पाती हैं, इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है।
उत्तर प्रदेश इस समय चुनावी मौसम में रंगा है। 2022 में विधानसभा चुनाव होना है। इससे पहले राज्य में 2017 में विधायकी का चुनाव हुआ था। बबुआ कहे जाने वाले साहब मुख्यमंत्री होते थे। चुनाव हार गए। कहते हैं कि मुख्यमंत्री का आधिकारिक हाउस खाली करने से पहले वे टोटी भी उखाड़ ले गए।
Quora पर तो लोग बकायदा सवाल-जवाब भी खेल लेते हैं: श्रीमान अखिलेश यादव को टोटी चोर क्यों कहा जाता है?
साभार: hi.quora.com
अब इसी तरह की एक फिल्म बिहार में रिलीज हुई है, जहाँ अभी पंचायत चुनाव चल रहे हैं। खबर है कि कॉमरेड क्रांति कुमार एयर कंडीशनर (AC) ‘उखाड़कर’ ले गए हैं। वो भी कॉमरेडों के उस दफ्तर से जहाँ वे रहते थे। अब आप इसे किसी ‘भक्त’ की खबर मान खारिज कर दें या रवीश कुमार इसे ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से निकला ज्ञान बता दें, उससे पहले ही बता देता हूँ कि ये खुलासा एक कॉमरेड ने ही किया है।
इस कॉमरेड का नाम है रामनरेश पांडेय। ये वाले पांडेय जी का उस वाले पांडेय जी से कोई रिलेशन नहीं है, जिन्हें भक्त रवीश कुमार का भाई बता बलात्कार वाली बात करने लगते हैं। वे पांडेय जी कॉन्ग्रेसी हैं और ये वाले पांडेय जी सीपीआई के बिहार प्रदेश सचिव। इसी सीपीआई के नेता अपने क्रांति कुमार भी हैं, जिनके पिछले कुछ दिनों से हाथ थामने के चर्चें जोरों पर हैं।
रामनेरश पांडेय ने एक मीडिया संस्थान को बताया कि कन्हैया कुमार ने प्रदेश कार्यालय के अपने कमरे में लगा AC ले जाने की इजाजत माँगी थी। पार्टी ने यह कहते हुए कि ‘यह आपकी संपत्ति है, आप इसे ले जा सकते हैं’ इजाजत भी दे दी। पांडेय जी के इस बयान ने अच्छे दिन आने की मुहर भी लगा दी है। इससे अच्छे दिन क्या हो सकते हैं कि एक ‘आंगनबाड़ी सेविका’ का बेटा वातानुकूलित सुख ले!
एक अजीब संयोग यह भी है कि मुख्यमंत्री पद से विदाई के बाद नेताजी ने जब टोटी उखाड़ी थी, उससे पहले उन्होंने कॉन्ग्रेस कुमार के साथ ही हाथ मिलाया था। खूब नारे भी लगे थे- यूपी को ये साथ पसंद है। अब क्रांति कुमार जब दफ्तर से एसी उखाड़कर ले जा रहे हैं तो उनके भी कॉन्ग्रेस कुमार के साथ ही हाथ मिलाने के चर्चे हैं। वैसे भी जब हाथ साथ वाली बात हो तो हाथ की सफाई बनती भी है!
वैसे हमे कॉमरेडों के दावों पर रत्ती भर भी यकीन नहीं। इन्हीं कॉमरेडों के कैंप से शेहला रशीद के बैग में कंडोम मिलने की बात भी निकली थी। यह भी संयोग है कि तब शेहला भी बिहार में थी और अपने क्रांति कुमार ही चुनाव लड़ रहे थे।
एक फिल्म आई थी कटी पतंग। उसका एक गाना था- जिस गली में तेरा घर न हो बालमा, उस गली से हमे तो गुज़रना नहीं… अब जिस गली में राष्ट्रवाद की लौ न जले उस गली से अपने को क्या। टोटी उखड़े या एसी!
कन्हैया कुमार के कॉन्ग्रेस में जाने की अटकलों के बीच उनसे जुड़ी एक और खबर सामने आई है। यह कोई सियासी खबर नहीं है और ना ही उनका कोई बड़ा क्रांतिकारी कदम है। दरअसल, कन्हैया पटना स्थित सीपीआई (CPI) कार्यालय के जिस कमरे में बैठते थे, उससे AC निकालकर ले जाने के कारण सुर्ख़ियों में हैं। सीपीआई के प्रदेश सचिव रामनरेश पांडेय ने लाइव हिंदुस्तान से बातचीत में कन्हैया के CPI कार्यालय से एसी ले जाने की बात कही है। पार्टी के प्रदेश सचिव ने बताया कि कन्हैया ने कहा है कि उन्होंने कहीं और कमरा ले लिया है, इसलिए वह कार्यालय से AC ले जा रहे हैं।
पांडेय ने बताया, ”जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष ने अपने और अपने लोगों के लिए प्रदेश कार्यालय के कमरे में एक एयर कंडीशनर (AC) लगवाया था। उन्होंने एसी ले जाने के लिए हमसे अनुमति भी माँगी थी। हमने उनसे कहा कि यह आपकी ही संपत्ति है। आप इसे ले जा सकते हैं।” बताया जा रहा है कि कन्हैया कुमार ने अपने पार्टी प्रमुख से भी यह बात कही है कि उन्होंने कहीं और कमरा ले लिया है। वह एसी लेकर जा रहे हैं, जिसे वहाँ लगाएँगे।
कन्हैया के कांग्रेस का हाथ थामने से इतर खबर यह भी है कि पटना में अजय भवन में वह जिस कमरे में बैठते थे, उससे AC भी निकालकर ले गए। पार्टी के राज्य सचिव रामनरेश पांडेय ने कहा कि कन्हैया ने कहा कि कहीं और कमरा ले लिए हैं, तो AC ले जा रहे हैं।https://t.co/a1vBMmQDeN
गौरतलब है कि जब से राहुल गाँधी की ‘युवा टीम’ का हिस्सा बन कर कन्हैया कुमार के कॉन्ग्रेस में जाने की अटकलें शुरू हुई हैं, तब से उनकी वामपंथी पार्टी CPI की नींद उड़ी हुई है। सभी मीडिया रिपोर्ट्स इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि मंगलवार (28 सितंबर, 2021) को कन्हैया कुमार के अलावा जिग्नेश मेवानी भी कॉन्ग्रेस में शामिल होने वाले हैं।
वहीं, CPI के नेताओं और कार्यकर्ताओं के दिल की धड़कन बढ़ाते हुए कन्हैया कुमार ने चुप्पी साधी हुई है। ‘हिंदुस्तान’ की खबर के अनुसार, पिछले सप्ताह दिल्ली स्थित CPI दफ्तर में नेता/कार्यकर्ता कन्हैया कुमार का इंतजार करते रह गए, लेकिन वो नहीं पहुँचे। JNU छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को उस दिन पार्टी ने बयान देने को कहा था। कॉन्ग्रेस में जाने को लेकर उन्हें चुप्पी तोड़ने को कहा गया था।
उत्तराखंड में टिहरी बाँध के पास लैंड जिहाद का मामला सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, 2000 के दशक की शुरुआत में खंड-खाला कोटि कॉलोनी में साइट पर एक अवैध मस्जिद बनाई गई थी, जो बाँध के करीब है और तब से हिंदू संगठनों ने इसे हटाने के लिए कई बार कोशिशें की है। हाल ही में, सितंबर 2021 के पहले सप्ताह में, स्थानीय हिंदुओं के एक समूह ने मस्जिद के खिलाफ नए सिरे से विरोध प्रदर्शन शुरू किया और 150 वर्ग मीटर से अधिक भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त करने के प्रयासों को तेज किया।
ऑपइंडिया ने मामले के बारे में और अधिक जानने के लिए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति अक्षत बिलजवान से संपर्क किया। 6 सितंबर को अक्षत और खंड-खाला कोटी कॉलोनी क्षेत्र के हिंदू समुदाय के अन्य सदस्यों ने पर्यटन विभाग को आवंटित भूमि का अतिक्रमण कर टिहरी बाँध के पास बनाई गई अवैध मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
बता दें कि टिहरी बाँध के निर्माण के समय कई इमारतों, खेतों और धार्मिक संरचनाओं को हटा दिया गया था। संपत्तियों के सभी कानूनी मालिकों को अन्य स्थानों पर विस्थापित कर दिया गया और अधिकारियों ने उन्हें मुआवजा दिया या फिर इसके बदले में कहीं और जमीन दिया। निर्माण के दौरान, बाँध बनाने वाली कंपनी (JP) ने मुस्लिम श्रमिकों के लिए एक अस्थाई मस्जिद का निर्माण किया। प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद, कंपनी और कर्मचारी चले गए, लेकिन अस्थाई मस्जिद को नहीं हटाया गया।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और यहाँ तक कि स्थानीय भाजपा नेताओं सहित कई हिंदू संगठनों ने मस्जिद को हटाने की कोशिश की। इसके बाद भी प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। अक्षत ने कहा कि मस्जिद से कुछ ही मीटर की दूरी पर CISF बेस है जो बाँध की सुरक्षा करता है, लेकिन अतिक्रमणकारियों के खिलाफ किसी ने कार्रवाई नहीं की।
अक्षत ने कहा, “हर शुक्रवार को सैकड़ों मुसलमान यहाँ नमाज अदा करने आते हैं। नमाज अदा करने के बाद ज्यादातर लोग सड़क पर ही बैठ जाते हैं। पास में ही एक कॉलेज है और इस सड़क से अक्सर मोहल्ले की महिलाएँ गुजरती हैं। खासकर शुक्रवार को इलाके में उत्पीड़न के अनगिनत मामले सामने आए हैं, जहाँ सौ से ज्यादा मुस्लिम सड़क के किनारे बैठे रहते हैं। हमने कई बार शिकायत की है, लेकिन कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं है।”
मस्जिद का संचालन करने वाले व्यक्ति के बारे में बात करते हुए अक्षत ने कहा, “मस्जिद में आने वाले स्थानीय नहीं हैं। यह एक छोटा सा इलाका है, और हम लोगों को उनके चेहरे से पहचान सकते हैं। स्थानीय लोगों की पहचान करना मुश्किल नहीं है क्योंकि सभी के पास आईडी है। लेकिन जो लोग इस मस्जिद में जाते हैं वे स्थानीय नहीं हैं और उन्हें ट्रैक करना लगभग असंभव है। मस्जिद का प्रबंधन करने वाला मौलवी (मोहम्मद उस्मान) भी मस्जिद से थोड़ी दूर पर रहता है। हालाँकि सभी जानते हैं कि यह अवैध है फिर भी यह अवैध ढाँचा अभी भी खड़ा है।”
अवैध मस्जिद के खिलाफ 6 सितंबर का विरोध प्रदर्शन
छह सितंबर को अक्षत व अन्य ने धरना पर बैठ कर अवैध रूप से अतिक्रमण की गई जमीन पर बनी मस्जिद को हटाने और बाँध की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नारेबाजी की। अक्षत द्वारा फेसबुक पर साझा किए गए एक वीडियो में उन्होंने कहा, “जब बाँध बनाया जा रहा था, तो कंपनी ने मुसलमानों को नमाज अदा करने के लिए अस्थाई जगह दी थी। अब कंपनी और कर्मचारी क्षेत्र छोड़कर जा चुके हैं। जमीन पर्यटन विभाग को हस्तांतरित कर दी गई है। मौके पर पर्यटन विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस के अधिकारी मौजूद थे। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पाया कि मस्जिद अवैध है।”
वरिष्ठ अधिकारियों से बात करते हुए, अक्षत ने यह भी बताया कि लव जिहाद के भी कुछ मामले उस क्षेत्र में सामने आए, जहाँ मुस्लिम पुरुषों ने अपनी हिंदू पहचान बता कर हिंदू लड़कियों को लुभाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अगर स्थानीय लोगों को पता चलता है कि कोई स्थानीय लड़कियों और महिलाओं को लुभाने की कोशिश कर रहा है या उन्हें परेशान करने की कोशिश कर रहा है, तो वे खुद कार्रवाई करेंगे। उन्होंने कहा, “यह पहला मामला नहीं है। हम रोजाना ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। हम जिस पर्वतीय क्षेत्र में रहते हैं वह शांत स्थान माना जाता है। हम अब ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकते। अगर पुलिस और प्रशासन ऐसा करने में विफल रहता है तो हमें कार्रवाई करनी होगी।”
अक्षत द्वारा ऑपइंडिया के साथ शेयर किए गए दो दस्तावेजों के अनुसार, 6 सितंबर को मस्जिद के आसपास एक संयुक्त सर्वेक्षण किया गया जिसमें प्रशासन को पता चला कि मस्जिद अवैध थी। कुछ अन्य संरचनाएँ थीं जिनमें कुछ दुकानें आदि शामिल थीं, वह भी अतिक्रमण की गई जमीन पर बनी थीं। मस्जिद का प्रबंधन करने वाले मौलवी मोहम्मद उस्मान भी मौके पर मौजूद थे। उन्हें प्रशासन द्वारा सूचित किया गया था कि मस्जिद अवैध थी और इसे हटाया जाना था। मस्जिद के आसपास बनी अस्थाई दुकानों को भी इसी तरह के निर्देश दिए गए थे।
Joint survey report. Source: Akshat Bijalwan
अक्षत ने प्रशासन द्वारा दिए गए निर्देशों के बारे में बात करते हुए कहा कि प्रशासन ने मस्जिद के आसपास की अस्थाई दुकानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की और उन्हें हटा दिया। उन्होंने कहा, “वे क्षेत्र में किसी भी अस्थाई दुकान को तेजी से हटाना सुनिश्चित करते हैं, जो एक अच्छी बात है। हालाँकि जब बात मस्जिद की आती है तो हर कोई किसी और पर आरोप मढ़ रहा है और कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं है।”
मस्जिद के प्रशासक ने माँग की है कि उन्हें मस्जिद के पुनर्निर्माण के लिए एक वैकल्पिक भूमि प्रदान की जानी चाहिए। अक्षत ने कहा, “माँग के खिलाफ हमें कड़ी आपत्ति है। जब प्रशासन द्वारा संरचना को अवैध माना गया है, तो उन्हें वैकल्पिक भूमि क्यों मिलनी चाहिए, इसका मतलब अतिक्रमण की गई भूमि को वापस लेना है। सरकार उन्हें जमीन के एक हिस्से पर कानूनी कब्जा देगी। यह अस्वीकार्य है।”
इसके बाद मस्जिद के प्रशासक ने राज्य अल्पसंख्यक आयोग में याचिका दायर की। दिलचस्प बात यह है कि अल्पसंख्यक आयोग ने मामले का तुरंत संज्ञान लिया। इसने अवैध संरचना को हटाने की प्रक्रिया में और देरी की। अक्षत ने कहा, “मैं हैरान हूँ कि अल्पसंख्यक आयोग मामले में शामिल हो गया। वे जानते हैं कि संरचना अवैध है। वे प्रशासन से मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन देने के लिए कैसे कह सकते हैं? यह सिस्टम का मजाक है।”
25 सितंबर की घटना
प्रशासन ने मस्जिद के प्रशासक को ढाँचे को हटाने के लिए 15 दिन का समय दिया था। जो कि 21 सितंबर को पूरा हो गया। हालाँकि, मस्जिद अभी भी वहीं पर खड़ी है। 25 सितंबर को अक्षत और अन्य ने क्षेत्र का फिर से दौरा करने और प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अधिकारी मौके पर पहुँचे। चर्चा के दौरान एक अधिकारी की अक्षत से बहस हो गई, जिसके बाद स्थिति लगभग हाथ से निकल गई। अधिकारी ने अक्षत को अपनी आवाज नीचे करने के लिए कहा जिसके बाद अक्षत बिगड़ पड़े।
उन्होंने कहा, “अधिकारी इलाके में नए थे। हम उन्हें नहीं जानते और वह नहीं जानते कि हम किन समस्याओं का सामना कर रहे हैं। जब उन्होंने मुझसे आवाज नीची करने को कहा, तो मुझे समझ नहीं आया कि मैंने क्या गलत कहा।” उन्होंने स्थल पर विरोध कर रहे अपने साथियों के साथ मस्जिद की ओर मार्च करने की कोशिश की। लेकिन पुलिस ने उन्हें रोका और पीछे धकेल दिया। अक्षत और उसके साथी मौके पर मौजूद पुलिस को एसडीएम को बुलाने के लिए कहते रहे क्योंकि वे जानना चाहते थे कि प्रशासन ने क्या कार्रवाई की।
SDM ने दिया मस्जिद को हटाने का आश्वासन
अंत में जब एसडीएम अपूर्वा सिंह मौके पर पहुँची तो उन्होंने मौजूदा स्थिति से अवगत कराया। अक्षत ने ऑपइंडिया के साथ वीडियो साझा किया जिसमें एसडीएम के साथ चर्चा देखी जा सकती है। उसने कहा, “ यहाँ पर जो लोग मस्जिद का प्रबंधन कर रहे थे, उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग से संपर्क किया है। कानून के मुताबिक हमें उनका जवाब देना होगा और आगे कदम उठाना होगा, जिसमें समय लग रहा है। उन्होंने मौके पर मौजूद सभी लोगों को आश्वासन दिया कि प्रशासन के लिए मस्जिद अतिक्रमण की जमीन पर है, उसे हटा दिया जाएगा। एसडीएम ने कहा, “मैं वादा नहीं कर सकती कि इसे एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने में हटा दिया जाएगा, लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकती हूँ कि इसे हटा दिया जाएगा।”
एसडीएम ने महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं पर बात करते हुए स्थानीय लोगों से ऐसी घटनाओं को पुलिस के संज्ञान में लाने को कहा। उन्होंने पुलिस को शुक्रवार को सुरक्षा बढ़ाने के भी निर्देश दिए ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। उन्होंने कहा, “मैं आपसे अनुरोध कर रही हूँ कि अतिक्रमण और छेड़खानी के मुद्दे को आपस में न मिलाएँ। मैंने पुलिस से शुक्रवार को सुरक्षा बढ़ाने को कहा है ताकि ऐसी घटनाओं पर काबू पाया जा सके। हम अवैध ढाँचे को हटा देंगे, लेकिन हमें कानून का पालन करना होगा।”
उन्होंने आगे कहा कि सभी को अदालतों का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें रुकना होगा। सड़क किनारे अतिक्रमण हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं। एसडीएम ने आगे कहा, “प्रशासन के पास दिशानिर्देश हैं, और हम संरचना को हटा सकते हैं, लेकिन हमें प्रक्रिया का पालन करना होगा। आपको हम पर भरोसा करना होगा। मैं समझती हूँ कि अविश्वास की समस्या है, लेकिन मैं आपको आश्वासन दे रही हूँ कि ढाँचा हटा दिया जाएगा।”
जनवरी में उठा था मामला
यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे को उठाया गया है। जनवरी 2021 में टिहरी के भाजपा विधायक धन सिंह नेगी ने यह मुद्दा उठाया था। ऑपइंडिया हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कई बार टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (THDC) से संपर्क किया, लेकिन किसी ने भी उनकी याचिका पर ध्यान नहीं दिया। क्षेत्र में स्थित मस्जिद को बाँध के निर्माण के दौरान हटा दिया गया था। हालाँकि, इस अवैध ढाँचे को निर्माण के दौरान अस्थाई आधार पर खड़ा किया गया था। बाँध बनाने वाली कंपनी तो चली गई, लेकिन मस्जिद वहीं रही, जिससे स्थानीय लोगों को काफी परेशानी हो रही है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
शनिवार की क्लिप का एक हिस्सा ट्विटर पर गोपाल गोस्वामी द्वारा साझा किया गया था, जिन्होंने मस्जिद को हटाने की माँग की थी। इसके बाद कई नेटिजन्स ने इस माँग को दोहराया।
टिहरी डैम पर अवैध बना दी गयी मस्जिद को हटाने की माँग करते स्थानीय युवा, पुष्कर धामी जी देवभूमि को दानव ग्रसित कर रहा है, अधिकारियों पर दबाव बनाइये। pic.twitter.com/HZGurgWgNw
पत्रकार अभिजीत मजूमदार ने भी इस मुद्दे को उठाया और पुष्कर सिंह धामी से सवाल किया।
Are your Uttarakhand police defending the illegal masjid near Tehri lake, @pushkardhami, despite locals’ demands to stop demographic takeover? https://t.co/xFcZ8KN39y
ऑपइंडिया ने एसडीएम से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन मामले के बारे में विस्तार से बात नहीं हो पाई।
लैंड जिहाद की समस्या
गौरतलब है कि लैंड जिहाद का यह पहला मामला सामने नहीं आया है। हाल ही में, हमारी एक रिपोर्ट में सूरत और गुजरात के अन्य शहरों के मामलों का विवरण दिया गया था। चौंकाने वाली घटना में अशांत क्षेत्र अधिनियम की धज्जियाँ उड़ाई गई और धोखे से भवन निर्माण की अनुमति ली गई। सूरत के अदजान इलाके में एक मंदिर के बगल में रेहान हाइट्स प्रोजेक्ट निर्माण के लिए एक मुस्लिम स्वामित्व वाली एंटरप्राइजेज ने हिंदू साथी को सामने पेश कर निर्माण की अनुमति ली, जो कि कानून को धोखा देने जैसा था। अनुमति मिलने के बाद हिंदू पार्टनर को डील से बाहर कर दिया गया।
हाल के दिनों में अवैध मस्जिदों और मजारों की कई दूसरी घटनाएँ भी सामने आई हैं। जून में, यूपी सरकार ने हरदोई में एक अवैध मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था। मार्च में, यूपी पुलिस ने उत्तर प्रदेश के मैनाथर जिले के इमरतपुर उधो गाँव में एक मुस्लिम व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जहाँ उसने एक हिंदू की जमीन पर मजार बनाने की कोशिश की।
जब से राहुल गाँधी की ‘युवा टीम’ का हिस्सा बन कर कन्हैया कुमार के कॉन्ग्रेस में जाने की अटकलें शुरू हुई हैं, तब से उनकी वामपंथी पार्टी CPI की नींद उड़ी हुई है। सभी मीडिया रिपोर्ट्स इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि मंगलवार (28 सितंबर, 2021) को कन्हैया कुमार के अलावा जिग्नेश मेवानी भी कॉन्ग्रेस में शामिल होने वाले हैं। CPI के नेता इस मामले में मीडिया में सफाई देते-देते थक चुके हैं।
CPI के नेताओं और कार्यकर्ताओं के दिल की धड़कन बढ़ाते हुए कन्हैया कुमार ने चुप्पी साधी हुई है। ‘हिंदुस्तान’ की खबर के अनुसार, पिछले सप्ताह दिल्ली स्थित CPI दफ्तर में नेता/कार्यकर्ता कन्हैया कुमार का इंतजार करते रह गए, लेकिन वो नहीं पहुँचे। JNU छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को उस दिन पार्टी ने बयान देने को कहा था। कॉन्ग्रेस में जाने को लेकर उन्हें चुप्पी तोड़ने को कहा गया था।
इस खबर में ये भी लिखा है कि CPI नेताओं ने एक गुट ने कन्हैया कुमार को मनाने की भी कोशिश की थी। इस बातचीत के दौरान उन्होंने शर्त रख दी कि उन्हें बिहार में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए। साथ ही उन्हें प्रत्याशियों का चयन करने वाली शीर्ष चुनावी समिति का अध्यक्ष बनाया जाए, उन्होंने ऐसी शर्त भी रख दी। 2 अक्टूबर को CPI की नैशनल काउंसिल की बैठक पर सभी की नजरें टिकी हैं। देखना है कि इसमें कन्हैया कुमार हिस्सा लेते हैं या नहीं।
भगत सिंह की जयंती के मौके पर सीपीआई नेता कन्हैया कुमार और गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी मंगलवार को कांग्रेस में शामिल होंगे.
लेकिन, वो वहाँ गए ही नहीं। कन्हैया कुमार और CPI के बीच के रिश्ते वैसे भी अच्छे नहीं चल रहे हैं, क्योंकि कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ उनकी कई बैठकें हुई हैं। पार्टी के जनरल सेक्रेटरी डी राजा ने उन्हें इन ‘अफवाहों’ को खारिज करने के लिए कहा था। डी राजा ने मीडिया में भी बयान देते हुए इन रिपोर्ट्स को आधारहीन और तथ्यों से परे बताया था। पार्टी मुख्यालय में कई नेता उनका इंतजार करते रह गए, लेकिन वो नहीं पहुँचे।
कहा जा रहा है कि इसके बाद नेताओं ने उन्हें मैसेज व फोन कॉल्स भी किए, लेकिन कन्हैया कुमार का कोई जवाब नहीं आया। उन्हें प्रेस कॉन्फ्रेंस करना था, जिसकी तैयारियाँ धरी की धरी रह गईं। डी राजा ने कहा कि कुछ दिन पहले पार्टी मुख्यालय में हुई मुलाकात में खुद कन्हैया कुमार ने इसे अफवाह बताया है। कॉन्ग्रेस के केसी वेणुगोपाल ने इसकी पुष्टि की है कि राहुल गाँधी से कन्हैया कुमार की मुलाकात हुई है।