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चलती से दौड़ती हिंदी, 1965 वाली बिंदी नहीं रही अब हिंदी: एक-दूसरे से जुड़े हिंदुस्तान, हिंदी भाषा और हिंदी का बाजार

संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया। इसी स्मृति में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।

आधुनिक हिंदी की बात की जाए तो इस पर महावीर प्रसाद द्विवेदी का बड़ा प्रभाव है। ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक के रूप में वह अपने समय (1903-1920) पूरे हिंदी साहित्य पर छाए रहे। उनकी वजह से ब्रज भाषा हिंदी कविता से हटती गई और खड़ी बोली ने उसका स्थान लिया। हिंदी भाषा को स्थिर, परिष्कृत एवं व्याकरण सम्मत बनाने के लिए उन्होंने बहुत परिश्रम किया। संस्कृत के तत्सम शब्द उस समय से भाषा से हटते चले गए और उनकी जगह उर्दू, फ़ारसी का प्रयोग शुरू हुआ। आजकल भी लेख की शुरुआत परिचय कराते हुए की जाती है, इस परिचयात्मक शैली का प्रयोग उन्होंने ही शुरू किया था।

विश्व में कितनी लोकप्रिय है हिंदी

  • मॉरीशस में हिंदी खासी लोकप्रिय है, जापान में हिंदी की पढ़ाई वर्षों पहले शुरू कर दी गई थी।
  • पिछले साल भारत के शीर्ष राजनयिक अमित कुमार ने कहा था कि अमेरिका में नौ लाख से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं।
  • वर्ल्ड डाटा डॉट इंफो के अनुसार विश्वभर में 566.5 मिलियन लोग हिंदी भाषी हैं।
  • फिजी में 3,92,000 लोग हिंदी बोलते हैं तो न्यूज़ीलैंड में 81,000

समृद्ध होती हिंदी, लेकिन व्याकरण भी जरूरी

कोरोना काल में बहुत से नए शब्द हिंदी में शामिल हुए और आमजन के बीच लोकप्रिय भी होते गए। मीडिया के द्वारा बार-बार प्रयोग किए जाने की वजह से सोशल डिस्टेंस, वेबिनार, इम्युनिटी पॉवर, वायरस, वॉरियर्स, पॉजिटिव, क्वारंटीन, आइसोलेशन जैसे शब्द हिंदी में ही लिखे जाने लगे। जैसे भारत में विश्व की अलग-अलग संस्कृति से आने के बाद भी लोग भारतीय बन गए, वैसे ही हिंदी में भी दूसरी भाषाओं के शब्द शामिल होने के बाद हिंदी के ही हो गए।

संविधान में हिंदी की समृद्धि

अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे, जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

गहन है यह अन्धकारा के लेखक डॉ. अमित श्रीवास्तव कहते हैं कि व्याकरण प्रधान भाषा में होनी चाहिए। स्कूल्स की जगह स्कूलों कहने का अंतर समझ, हिंदी का अधिक प्रसार किया जा सकता है। हिंदी पर लिखी उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ भी हिंदी के लिए कुछ ऐसा ही कहती हैं;
संगीत वाद्य हिंदी
सबकी आराध्य हिंदी
बस पूर्ण हो कि इतनी
साधन और साध्य हिंदी

1965 वाली बिंदी नहीं रही अब हिंदी

1965 में अंग्रेज़ी के पर कटने थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनना था पर दक्षिणी राज्यों के विरोध के कारण हिंदी को मात्र राजभाषा तक सीमित रहते हुए अंग्रेज़ी के साथ अपनी कुर्सी बाँटनी पड़ी थी। अब स्थिति वह नहीं है। हिंदी पूरे देशभर में अंग्रेज़ी की तरह ही रोज़गार देने वाली भाषा के रूप में सामने आई है। यह अंतर वर्ष 1990 के बाद से मीडिया में हिंदी बाज़ार के आधिपत्य की वज़ह से सम्भव हुआ है।

हिंदी की लोकप्रियता और इसमें रोज़गार के अवसरों का अंदाज़ा हम टेलीविजन, इंटरनेट और शिक्षा में हिंदी के आधिपत्य को देखकर लगा सकते हैं। 1959 में दूरदर्शन के रूप में हिंदी का पहला टेलीविजन चैनल आया तो 1999 में पहला हिंदी वेब पोर्टल ‘वेबदुनिया’। आज हिंदी मनोरंजन, चलचित्र, संगीत, समाचार, खेल स्वास्थ्य, धर्म से जुड़े चैनलों की संख्या 100 से अधिक है तो हजारों हिंदी वेब पोर्टल भी इंटरनेट की दुनिया में अपना अधिकार जमाए हुए हैं। स्टेटिस्ता डॉट कॉम के अनुसार भारत में फरवरी 2021 के दौरान ट्विटर का इस्तेमाल करने वाले यूजरों की संख्या 17.5 मिलियन, इंस्टाग्राम यूजरों की संख्या 210 मिलियन, फेसबुक के 410 मिलियन और वाट्सएप यूजरों की संख्या 530 मिलियन है।

मोबाइल में आसानी से हिंदी टाइप करने की सुविधा ने हर उम्र के लोगों तक इसकी पहुँच बना दी है। कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग ज्यादा बढ़ गया और हिंदी के अधिक प्रचार-प्रसार में मदद मिली। हिंदी में पोस्ट लिखने पर आजकल लोग गर्व महसूस करते हैं। ओटीटी प्लेटफार्मों को भी सिनेमा हॉल बंद रहने की वजह से फायदा हुआ और हिंदी कंटेंट बनाने/देखने वालों की भरमार हो गई है। निर्विवाद रूप से हिंदी और उसके बाज़ार को इससे फायदा हुआ। शॉपिंग वेबसाइट अमेज़न ने वर्ष 2018 में अपनी वेबसाइट में हिंदी की सुविधा दी तो फ्लिपकार्ट ने वर्ष 2019 में यह कहते हुए हिंदी सेवा शुरू की कि इससे उनके साथ 20 करोड़ अतिरिक्त ग्राहक जुड़ेंगे।

रोज़गार के अवसर तो हर साल बढ़ रहे

वर्ष 2018 और 2019 में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए पात्र बनने वाली नेट परीक्षा में हिंदी विषय के अभ्यर्थियों की संख्या से हम हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता का पता कर सकते हैं। दिसम्बर 2018 की नेट परीक्षा में सामान्य श्रेणी से कॉमर्स में उत्तीर्ण 2991 छात्रों के बाद सबसे ज्यादा 1513 छात्र हिंदी के ही थे। 2019 की परीक्षा में यह आँकड़ा बढ़ते हुए कॉमर्स में 3770 तो हिंदी में 1972 पहुँच गया था। जानने वाली बात यह भी है कि इसमें पत्रकारिता के हिन्दीभाषी अभ्यर्थियों के आँकड़े शामिल नहीं हैं।

अब पहले जैसा कुछ नहीं

‘मुझे चाँद चाहिए’ को लेकर पहचाने जाने वाले लेखक सुरेंद्र वर्मा ने एक शोधार्थी से खुद पर शोध किए जाने के बदले 25 हज़ार रुपए माँगे। शोधार्थी ने यह सोचकर कि पैसे माँगने पर लोग लेखक के खिलाफ खड़े हो जाएँगे, उनकी पैसे माँगते वीडियो वायरल कर दी। लेकिन हुआ इसके विपरीत। सारे लेखक सुरेंद्र वर्मा के पक्ष में आ गए और सबको यह बता दिया कि समय अब पहले सा नहीं रहा। हिंदी लिखने-पढ़ने वालों की अब माँग है और उसके लिए पैसे भी देने पड़ेंगे।

नई शिक्षा नीति, सेलेब्रिटी कर सकते हैं मदद

नई शिक्षा नीति से भी हिंदी को फायदा मिलेगा। स्कूली शिक्षा में त्रिभाषा फॉर्मूला चलेगा। पाँचवीं कक्षा तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई का माध्यम बनेगी।

क्या उत्तर, क्या दक्षिण। भारत में जनता खिलाड़ियों और अभिनेताओं को आदर्श मानती है। बालों का स्टाइल हो या खेल, उनके आदर्श जो करते हैं वह ट्रेंड बन जाता है। यह आर्दश हिंदी को बढ़ावा देंगे तो निश्चित ही इसमें और अधिक अवसर बढ़ेंगे।

ओलंपिक पदक विजेता नीरज चोपड़ा के चर्चे आजकल देशभर में हैं। ख़ासकर युवाओं के बीच वह ज्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं। उनका हिंदी के प्रति प्रेम युवाओं को हिंदी के प्रति आकर्षित करने में मदद करेगा। अपने एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने जतिन सप्रू से हिंदी में सवाल पूछने के लिए कहा था तो एक स्पोर्ट्स लिटरेरी फेस्टिवल में भी वह एक पत्रकार से हिंदी में सवाल पूछने के लिए कहते दिखे। अमिताभ बच्चन हो या वीरेंद्र सहवाग दोनों अपने ट्वीट अधिकतर हिंदी भाषा में ही करते दिखते हैं। अमिताभ बच्चन का तो ट्विटर बॉयो भी हिंदी में ही है।

हरिवंश राय बच्चन का लिखा है- तुमने हमें पूज-पूज कर पत्थर कर डाला; वे जो हमपर जुमले कसते हैं हमें ज़िंदा तो समझते हैं। हिंदी का सच भी कुछ ऐसा ही है। हिंदुस्तान, हिंदी भाषा और हिंदी का बाजार एक-दूसरे से जुड़े हैं और भविष्य में बढ़ते ही जाएँगे।

‘नशा देकर रेप किया, अश्लील वीडियो भी शूट कर लिया’: LJP सांसद प्रिंस राज के खिलाफ रेप की FIR, चिराग का भी नाम

लोजपा के सांसद प्रिंस पासवान के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने बलात्कार व आपराधिक साजिश की धाराओं में FIR दर्ज की है। वो चिराग पासवान के चचेरे भाई हैं। समस्तीपुर से सांसद प्रिंस पासवान को चाचा पशुपति कुमार पारस ने पार्टी से बगावत के बाद लोजपा के अपने गुट का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस फिलहाल लोजपा के दो अलग-अलग गुटों का नेतृत्व कर रहे हैं।

पशुपति कुमार पारस को केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री पद भी मिला। तीन महीने पहले एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में लगाए गए आरोपों को आधार बनाते हुए नई दिल्ली स्थित कनॉट प्लेस थाने में प्रिंस पासवान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। FIR में लोजपा नेता और दिवंगत नेता रामविलास पासवान के बेटे चिराग का भी नाम है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी अपने चचेरे भाई के खिलाफ कार्रवाई करने में देरी की।

प्रिंस पासवान लोजपा के उन पाँच सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने चिराग पासवान से बगावत कर लोजपा का अपना गुट बना लिया। 10 फरवरी, 2021 को प्रिंस ने महिला के खिलाफ रंगदारी का मामला दर्ज कराया था। उन्होंने बताया कि वो पुलिस को सबूत भी दे चुके हैं। 17 जून को एक ट्वीट कर उन्होंने आरोपों को नकारते हुए कहा था कि निजी व सार्वजनिक रूप से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के लिए ये सब किया जा रहा है।

पीड़िता का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता सुदेश कुमारी जेठवा ने कहा कि मई में इस मामले की शिकायत पुलिस के समक्ष दर्ज कराए जाने के बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष जुलाई में एक एप्लिकेशन भी डाला है। उन्होंने बताया कि उच्च-न्यायालय ने ही पुलिस को प्रिंस व चिराग के खिलाफ FIR का आदेश दिया है। महिला का कहना है कि प्रिंस के दिए बोतल से पानी पीकर वो बेहोश हो गई थी, जिसके बाद उसका रेप किया गया।

महिला ने बताया कि जब वो होश में आई तो उसका सिर प्रिंस पासवान के कंधे पर था। पीड़िता का कहना है कि जब उसने सवाल पूछे तो प्रिंस ने एक वीडियो दिखाया, जो उन्होंने रिकॉर्ड कर लिया था। बकौल पीड़िता, वीडियो में वो उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाते हुए दिख रहे थे लेकिन उन्होंने अपना चेहरा छिपा लिया था। साथ ही इसे ऑनलाइन जारी करने की धमकी भी दी। चिराग पासवान पर आरोप है कि उन्होंने घटना के बारे में बताए जाने पर पीड़िता पर दबाव डाला कि वो पुलिस में न जाए।

बता दें कि पीड़िता ने खुद बताया था कि वह प्रिंस राज के साथ लंबे समय तक रही है। दिल्‍ली की रहने वाली पीड़िता 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान प्रिंस के समर्थन में प्रचार करने के लिए समस्‍तीपुर भी गई थी। पार्टी में टूट के बाद चिराग ने एक पत्र में लड़की का नाम लेते हुए बताया था कि कैसे उन्होंने इस मामले में अपने चचेरे भाई प्रिंस राज की मदद की थी। उक्त लड़की दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में सक्रिय रही है और पासवान परिवार के सभी लोगों की परिचित भी थी।

सांसद प्रिंस पासवान दिवंगत रामविलास पासवान के भाई दिवंगत रामचंद्र पासवान के बेटे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में रामचंद्र पासवान ने समस्तीपुर से चुनाव जीता था, लेकिन उनके असामयिक निधन के बाद उनके बेटे ने यह चुनाव लड़ा था। युवती ने आरोप लगाया था कि मार्च 2020 में सांसद प्रिंस राज ने पहली बार उसे वेस्टर्न कोर्ट में बुलाया और वहाँ नशीला पदार्थ पिलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। युवती ने कहा है कि वह खुदकुशी करने की भी कोशिश कर चुकी है।

वो जाट राजा जिन्होंने अफगानिस्तान में बनाई भारत की पहली सरकार: नेहरू ने दी उपेक्षा, मोदी सरकार में सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में मंगलवार (14 सितंबर, 2021) को राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर विश्वविद्यालय का शिलान्यास की तारीख़ चुनी। एक जाट राजा और स्वतंत्रता सेनानी को सही सम्मान देने का कार्य मोदी सरकार ने किया है। कोल तहसील में 92.27 एकड़ की भूमि में इस विश्वविद्यालय का निर्माण होगा। अब तक अलीगढ़ सिर्फ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के लिए ही जाना जाता था।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह का पहले संक्षिप्त परिचय दे देते हैं। उनका जन्म 1 दिसंबर, 1886 में हाथरस के एक जाट राजपरिवार में हुआ था। वो एक समाज सुधारक रहे, स्वतंत्रता सेनानी थे और साथ में क्रांतिकारी भी। उन्होंने पहले मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेजिएट स्कूल और फिर AMU से अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी की। युवावस्था में ही वो राजनीति में सक्रिय हो गए थे। हालाँकि, उन्होंने AMU से अपना स्नातक पूरा नहीं किया था।

लेकिन, 1997 में जब AMU अपना शताब्दी समारोह मना रहा था, तब उन्हें मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने कॉलेज के साथियों के साथ 1911 के बाल्कन युद्ध में भी हिस्सा लिया था। मुरसान रियासत के राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने दिसंबर 1914 में भारत छोड़ दिया और जर्मनी में शरणार्थी के रूप में रहने लगे। ऐसा इसीलिए, क्योंकि वो अंग्रेजों की वॉन्टेड सूची में थे।

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब वो यहाँ लौटे। 1957 में हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने मथुरा से चुनाव लड़ा और वो सांसद चुने गए। इसी चुनाव में भारतीय जनसंघ (BJS) से अटल बिहारी वाजपेयी भी हिस्सा ले रहे थे, लेकिन वो चौथे स्थान पर रहे थे। लेकिन, वो बलरामपुर से भी चुनाव लड़ रहे थे और वहाँ से जीत कर लोकसभा पहुँचे। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने निर्दलीय लड़ते हुए कॉन्ग्रेस के चौधरी दिगंबर सिंह को मात दी थी। उन्हें 95,202 वोट प्राप्त हुए थे। दादाभाई नैरोजी और बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित महेंद्र ‘स्वदेशी आंदोलन’ का भी हिस्सा थे।

उन्होंने 1915 में अफगानिस्तान में भारत की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया, जिसके वो राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ ‘जिहाद’ की भी घोषणा की थी, जिसके बाद ब्रिटिश ने उनके सिर पर इनाम भी रखा था। बाद में वो जापान चले गए। वहाँ 1940 में उन्होंने ‘एग्जीक्यूटिव बोर्ड ऑफ इंडिया’ का गठन किया। महात्मा गाँधी की अहिंसा में विश्वास रखने वाले महेंद्र प्रताप ने वृन्दावन में अपने महल को ‘प्रेम महाविद्यालय’ नामक पॉलिटेक्निक कॉलेज में तब्दील कर दिया।

वो ‘पंचायती राज’ में विश्वास रखते थे क्योंकि उनका मानना था कि इससे न सिर्फ भ्रष्टाचार घटेगा, बल्कि आम आदमी के हाथों में ज़्यादा से ज़्यादा शक्तियाँ व अधिकार आएँगे। वो खुद को हमेशा ‘कमजोर व दुर्बलों का सेवक’ कहते थे। उन्हें 1932 में नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था। 29 अप्रैल, 1979 को 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया था। उन्होंने 1929 में AMU को एक प्लॉट भी लीज पर दिया था।

भाजपा व RSS नेता कई वर्षों से माँग कर रहे थे कि अलीगढ़ में उनके नाम पर युनिवर्सिटी की स्थापना की जाए। 2019 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके नाम पर अलीगढ़ में राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। 1 दिसंबर, 1915 को काबुल में भारत की पहली निर्वासित सरकार के वो राष्ट्रपति थे। ये भी जानकारी दे दें कि 1977 में एएमयू के कुलपति प्रोफेसर एएम ख़ुसरो ने यूनिवर्सिटी के शताब्दी समारोह में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को मुख्य अतिथि बनाया था।

इस तरह मोदी सरकार उन लोगों को सम्मान देने का कार्य कर रही है, जिन्हें पिछली सरकारों द्वारा अब तक भुलाया जाता रहा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाना-पहचाना नाम रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक लेखक व पत्रकार भी थे। जब उन्होंने भारत की निर्वासित सरकार का गठन किया था, तब दुनिया प्रथम विश्व युद्ध से जूझ रही थी। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने भी यही कार्य किया था। महात्मा गाँधी से उनके संपर्क ज़रूर थे, लेकिन वो कॉन्ग्रेस के नेता नहीं थे।

महात्मा गाँधी खुद कहते थे कि वो 1915 से ही राजा महेंद्र प्रताप सिंह के प्रशंसक हो गए थे। बकौल मोहनदास करमचंद गाँधी, जब वो दक्षिण अफ्रीका में थे तभी राजा की ख्याति उनके पास पहुँच गई थी। उन्होंने राजा के त्याग व बलिदान की प्रशंसा करते हुए बताया था कि उनके साथ उनका पत्र-व्यवहार होता रहा है, जिससे उन्हें महेंद्र प्रताप को अच्छे से जानने का मौका मिला। 1946 में भारत लौटे महेंद्र प्रताप वर्धा में गाँधी से मिलने भी गए थे।

हालाँकि, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली प्रथम भारतीय सरकार ने उनके अनुभव व योग्यता का फायदा नहीं उठाया और उन्हें कोई पद भी नहीं दिया। जर्मनी और जापान के करीबी रहे महेंद्र प्रताप जानते थे कि नेहरू की विदेश नीति में ये दोनों देश भारत के मित्र नहीं हैं। जिन चौधरी दिगंबर सिंह को 1957 में राजा साहब ने हराया था, उन्होंने उन्हें 1962 में मात से बदला भी ले लिया। दिगंबर भी उस जमाने के बड़े जाट नेता थे।

लेकिन, दोनों के सम्बन्ध काफी मधुर थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह पर ‘अभिनंदन ग्रन्थ’ का प्रकाशन कार्य चौधरी दिगंबर सिंह ने अपने हाथों में ले रखा था। वो चुनाव प्रचार के दौरान एक बार दिगंबर सिंह की जीप भी ले गए थे। शैक्षिक संस्थानों के लिए उन्होंने अपनी संपत्ति में से खूब दान दिया। उनके पिता की सर सैयद अहमद खान से दोस्ती थी, तभी उन्होंने AMU को अपनी 3.8 एकड़ जमीन लीज पर दी थी।

आज भी AMU की सेंट्रल लाइब्रेरी, मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में राजा महेंद्र प्रताप सिंह की एक बड़ी तस्वीर लगी हुई है। उनकी कई पुस्तकें वहाँ सँजो कर रखी गई है और उन पर सेमिनार व गोष्ठियों का आयोजन होता रहता है। रूसी क्रांति से प्रभावित रहे महेंद्र प्रताप ने अपनी सरकार में मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली को प्रधानमंत्री बनाया था। 1925 में उन्होंने तिब्बत जाकर दलाई लामा से भी मुलाकात की थी।

हालाँकि, 1962 की हार के बाद राजा महेंद्र प्रताप सिंह राजनीतिक व सार्वजनिक जीवन में कम ही सक्रिय रहे। नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित करते समय उन्हें दुनिया में अफगानिस्तान का अघोषित राजदूत बताया गया था। उन्होंने जर्मन विमान से रूस जाकर लेनिन से भी मुलाकात की थी। उन्होंने कई देशों का दौरा कर के अफगानिस्तान के लिए वित्त जुटाया था और भारत में अंग्रेजों की क्रूरता व अत्याचार से दुनिया को वाकिफ कराया।

याद हो कि पिछले साल लीज समाप्त होने के बाद जाट राजा के वंशजों ने माँग की थी कि AMU विश्वविद्यालय के आगरा स्थित स्कूल का नाम बदल कर उनके नाम पर रखा जाए और साथ ही महेंद्र प्रताप सिंह द्वारा एएमयू को दी गई बाकी जमीन उन्हें वापस कर दी जाए। लीज 90 वर्षों के लिए था। सिंह के प्रपौत्र चरत प्रताप सिंह के अनुसार, उन्होंने 2018 में लीज की समाप्ति के बारे में विश्वविद्यालय को कानूनी नोटिस दिया था।

‘ममता से लड़ाई के लिए शुभेंदु ही काफी, मोदी की हार के इंतजार में जिहादी’: इंटरव्यू में नंदीग्राम के नायक की दो टूक

पश्चिम बंगाल की तीन विधानसभा सीटों भवानीपुर, समशेरगंज और जंगीपुर में 30 सितंबर को उपचुनाव होने हैं। इनमें से भवानीपुर सीट पर सबकी नजरें हैं, क्योंकि यहाँ से खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही हैं। विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम में मुँह की खाने वाली ममता के लिए सीएम पद पर बने रहने के लिए उपचुनाव में जीत जरूरी है।

नंदीग्राम में ममता को पटखनी कभी उनके बेहद करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी ने दी थी। विधानसभा चुनावों से पहले शुभेंदु बीजेपी में आए थे। बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने कहा था कि नंदीग्राम से पार्टी जिसको टिकट देगी उसकी जीत की वे गारंटी लेंगे। जब उन्हें ही मैदान में उतारा गया तो उन्होंने खुली घोषणा की थी कि अगर वो नंदीग्राम हारे तो राजनीति छोड़ देंगे। चुनावों में जीत के बाद वे बीजेपी विधायक दल के नेता चुने गए थे।

दैनिक भास्कर को दिए एक इंटरव्यू में शुभेंदु ने उपचुनावों, बंगाल की राजनीति सहित कई मुद्दों पर विस्तार से बात की है। उपचुनाव में प्रचार से बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के दूर रहने को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उपचुनाव में प्रचार नहीं करता। ममता बनर्जी को हारी हुई विधायक बताते हुए कहा कि उनसे लड़ने के लिए किसी केंद्रीय नेता की जरूरत नहीं है। इसके लिए शुभेंदु अधिकारी खुद काफी हैं और इसे वे नंदीग्राम में साबित कर चुके हैं।

भवानीपुर में ममता के मुकाबले बीजेपी ने तेजतर्रार वकील प्रियंका टिबरीवाल पर दाँव लगाया है। विधानसभा चुनाव और नगर निगम चुनावों में हार चुकीं प्रियंका को उम्मीदवार बनाने को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में शुभेंदु ने राज्य में चुनाव बाद हुई हिंसा को लेकर उनकी तरफ से लड़ी गई लड़ाई की सराहना की। कहा कि वे अदालत के भीतर और बाहर दोनों जगह पर लड़ीं जिससे लोग अपने घर लौट सके। उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में प्रियंका की हार से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि ममता खुद हारीं हुईं उम्मीदवार हैं।

गौरतलब है कि इसी साल 2 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे। नतीजों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की जीत सुनिश्चित होते ही विपक्षी दलों खासकर बीजेपी से जुड़े लोगों और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाया गया था। लूट, हत्या, बलात्कार के कई मामले सामने आए थे। पीड़ितों की आवाज उठाने में प्रियंका टिबरीवाल ने जिस तरह भूमिका निभाई, माना जा रहा है कि उसकी वजह से ही बीजेपी नेतृत्व ने उपचुनावों में उन पर भरोसा जताया है।

इंटरव्यू के दौरान मुस्लिम तुष्टिकरण को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में शुभेंदु ने कहा कि तालिबान इंतजार कर रहा था कि अमेरिका में ट्रंप की हार हो और अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना भागे। इसी तरह भारत में जिहादी मोदी की हार का इंतजार कर रहे हैं। लिहाजा लोग जानते हैं कि मोदी का समर्थन करने से देश को मजबूती मिलेगी। कुछेक बीजेपी विधायकों के पार्टी छोड़ने को लेकर उन्होंने कहा कि एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत ऐसे लोगों पर कार्रवाई होगी और उनके क्षेत्रों में कुछ समय बाद उपचुनाव होंगे।

‘कमर में हाथ डाल नीचे खींच लिया… समझ नहीं पाई क्या हो रहा’: ‘अल्लाहु अकबर’ वाली रैली में महिला किसान नेता से बदतमीजी

केंद्र सरकार द्वारा कृषि सुधार के क्रम में लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ कई किसान संगठन पिछले एक साल से आंदोलन करने में लगे हुए हैं और भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं। किसान आंदोलन के महिला चेहरों में एक पूनम पंडित भी हैं, जो पहले डांसर एवं मॉडल सपना चौधरी की बाउंसर हुआ करती थीं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की रहने वाली किसान नेता पूनम पंडित के साथ मुजफ्फरनगर ‘किसान महापंचायत’ में दुर्व्यवहार हुआ।

हाल ही में राकेश टिकैत सहित ‘भारतीय किसान यूनियन (BKU)’ ने मुजफ्फरनगर में भाजपा के खिलाफ रैली आयोजित की थी, जहाँ से ‘अल्लाहु अकबर’ का भी नारा दिया गया। वहाँ पूनम पंडित को मंच पर चढ़ने से रोक दिया गया। इसके बाद कई मीडिया संस्थानों से बात करते हुए पूनम पंडित ने कुछ गंभीर आरोप लगाए। कभी हरियाणा के करनाल में नौकरी करने वाली पूनम पंडित का कहना है कि कृषि कानूनों की बारीकियों को समझने के बाद वो ‘किसान आंदोलन’ से जुड़ीं।

पूनम पंडित खुद को अंतरराष्ट्रीय शूटर भी बताती हैं। नेपाल में स्वर्ण पदक जीतने का दावा करने वाली पूनम पंडित को इस बात का मलाल है कि एक कलाकार होने के बावजूद सपना चौधरी किसानों के समर्थन में नहीं आईं। उन्होंने कुछ लोगों पर ज़हर फैला कर ‘किसान आंदोलन’ को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि यही कारण है कि मुजफ्फरनगर में उनके साथ बदतमीजी की गई थी।

इस सम्बन्ध में पूनम पंडित ने बताया, “एक लड़के ने मुझे कोली भर के, अर्थात कमर में हाथ डालकर नीचे खींच लिया। इसके बाद मुझे मंच पर चढ़ने से रोक दिया गया। उसने धमकाया कि मैं किसी भी हालत में तुम्‍हें मंच पर नहीं चढ़ने दूँगा। मेरे साथ धक्‍का-मुक्‍की भी की गई। मैं पसीने से तरबतर हो गई और मेरी तबीयत भी खराब हो गई थी। मैं कुछ समझ ही नहीं पाई की मेरे साथ ये क्या किया जा रहा है।”

पूनम पंडित ने दावा किया कि खुद BKU प्रवक्ता राकेश टिकैत ने उन्हें महापंचायत में आमंत्रित किया था। बाद में राकेश टिकैत ने उन्हें मंच पर भी जगह दी। आखिरी दम तक ‘किसान आंदोलन’ से जुड़ी रहने की बात करते हुए पूनम पंडित ने बताया कि वो अभी 25 साल की हैं और उन्होंने हाल ही में अपनी छोटी बहन की शादी की है। उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं और माँ ने ही बच्चों की परवरिश की है।

हरियाणवी और यूपी के लहजे में भाषण देने वाली पूनम पंडित का कहना है कि कई लोग उन्हें पसंद नहीं करते और उनके साथ पहले भी दुर्व्यवहार हो चुका है। टिकरी सीमा पर चल रहे प्रदर्शन में भी उन्हें रोक दिया गया था। करनाल में किसानों पर लाठीचार्ज का आरोप लगा कर हुए आंदोलन में भी वो सक्रिय रही थीं। हरियाणा को अपने घर जैसा बताने वाली पूनम पंडित ने कहा कि कुछ लोगों की नफरत के कारण वो हार नहीं मान सकतीं।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने किसान नेता पूनम पंडित की तस्वीर शेयर करते हुए उन पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगा उन्हें ‘विश्वासघाती’ भी कह रहे हैं। ध्रुव राठी जैसों ने उनकी तस्वीर शेयर कर के दावा किया कि वो भाजपा दफ्तर में बैठी हुई हैं। लोगों का कहना है कि पूनम पंडित इन तस्वीरों को एडिटेड बता रही हैं, लेकिन भाजपा दफ्तर में बैठे उनके वीडियोज को लेकर वो क्या कहेंगी? लोग उन्हें ‘किसान आंदोलन’ से अलग करने की माँग भी कर रहे हैं।

‘निजामुद्दीन मरकज में जारी रहेगी तालाबंदी, ये जाँच का हिस्सा’: दिल्ली HC से बोली मोदी सरकार, वक्फ बोर्ड ने डाली थी याचिका

केंद्र सरकार ने सार्वजनिक एंट्री के लिए दिल्ली में स्थित निजामुद्दीन मरकज को खोले जाने से इनकार कर दिया है। मोदी सरकार ने कहा कि निजामुद्दीन मरकज अभी जाँच का हिस्सा है और इस मामले के दुष्प्रभाव सीमा पार भी पड़े हैं, इसीलिए कूटनीतिक रूप से विचार-विमर्श भी इसमें शामिल है। ‘दिल्ली वक्फ बोर्ड’ ने हाईकोर्ट में एक याचिका डाल कर कहा था कि मरकज का प्रांगण तालाबंद नहीं रखा जाना चाहिए।

‘दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड’ ने ये भी कहा कि तबलीगी जमात के निजामुद्दीन मरकज की वास्तविक प्रकृति को पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए। हालाँकि, अमित शाह के प्रभार वाले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में प्रतिक्रिया दाखिल करते हुए इस माँग का विरोध किया। मंत्रालय ने कहा कि मरकज, मस्जिद और इसके संचालक जाँच का हिस्सा हैं, जो अभी चल ही रही है। इस मामले में FIR भी दर्ज हुई थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, मस्जिद बँगलेवाली मरकज, काशिफ उल-उलूम मदरसा और बस्ती निजामुद्दीन के प्लॉट्स को लेकर नोटिस जारी किए जा चुके हैं और इसके स्वामित्व के डॉक्युमेंट्स को तलब कर के इसकी जाँच की जा रही है। 31 मार्च, 2021 से ही मरकज़ तालाबंद है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार व पुलिस से जवाब माँगा था। अब इस मामले की अगली सुनवाई नवंबर में होगी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस से भी कहा कि वो हमेशा के लिए किसी संपत्ति को नहीं रख सकती, क्योंकि FIR होने के बाद इसे सीज किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस से पूछा कि वो कब तक इस संपत्ति को रखना चाहती है और उसने किससे इसका स्वामित्व लिया। उच्च-न्यायालय ने कहा कि इसे आपको कभी न कभी तो लौटाना होगा। केंद्र के अनुसार, तबलीगी जमात के 1300 विदेशी इसमें रहते हुए पाए गए थे।

इसीलिए, इस मामले में अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के हिसाब से भी काम किया जा रहा है और इसके प्रभाव सीमा पार भी पड़ेंगे। इसीलिए, तर्क दिया गया कि जाँच की प्रक्रिया सही हो इसके लिए संपत्ति को सही स्थिति में रखना आवश्यक है। दिल्ली पुलिस ने कहा कि 5 लोगों को रोजाना 5 समय नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई है, इसीलिए इसमें मूलभूत अधिकारों के हनन का सवाल नहीं उठता। 15 अप्रैल को अदालत ने 50 लोगों को नमाज पढ़ने की इजाजत दी थी।

गौरतलब है कि पिछले साल कोरोना की शुरुआत के समय जब सरकार इन कोशिशों में जुटी थी कि किसी प्रकार से ये कोरोना चेन टूट जाए उस समय दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में तबलीगी जमात के मजहबी कार्यक्रम हुए, जिसमें प्रशासन के दिशा-निर्देशों और लॉकडाउन का खुला उल्लंघन किया गया। इसके बाद हज़ारों लोग अलग-अलग राज्यों में जाकर छिप गए। उन्हें खोजने गए पुलिसकर्मियों और उनकी स्क्रीनिंग के लिए गई मेडिकल टीम पर हमले हुए।

भारत की भाषा संबंधी बहस में हिंदी की भूमिका: मातृभाषा के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर अमित शाह तक का योगदान

2019 में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि भारत की भाषाओं और बोलियों की विविधता को एक बाधा के बजाए शक्ति के स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए। विज्ञान भवन में बोलते हुए गृह मंत्री ने बताया था कि कैसे हिंदी सभी भारतीय भाषाओं में सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा है। यह एक एकीकृत भाषा के रूप में कार्य कर सकती है और गैर-देसी ज़बानों की भूमिका को बदल सकती है।

भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान करने की प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता प्रमुखता से स्पष्ट है। 2020 की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में बच्चे की मातृभाषा में शिक्षण के लिए दी गई प्राथमिकता का आधार ही यही है। एनईपी 2020 का मातृभाषा पर मजबूत ध्यान यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे की ऊर्जा एक नई भाषा सीखने के बजाए सीखने की अवधारणाओं पर खर्च की जाए। एनईपी आदिवासी भाषाओं की रक्षा के महत्व को भी दर्शाती है। मेरे गृह राज्य तेलंगाना में अनुसूचित क्षेत्रों वाले कम से कम 10 जिले हैं। आदिवासी समुदायों जैसे लाम्बाद, कोया, गोंड, युरकल, चेन्चस और अन्य के बच्चे आदिवासी भाषाओं के प्रचार के साथ-साथ उससे होने वाले लाभ को भी पा सकेंगे।

संविधान निर्मात्री सभा में बहस

वास्तव में, भाषा के रूप में पार्टी को भाषावादियों द्वारा कैसे चित्रित किया जाता है, इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा सभी भाषाओं और बोलियों का सम्मान करने का रास्ता दिखाया है। पार्टी की समावेशी भाषा नीतियों के उदाहरणों के लिए 13 सितंबर 1949 को संविधान निर्मात्री सभा में हुई बहस को फिर याद करने की जरूरत है। हिंदी की भूमिका पर एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई बहस पर (मुंशी-अयंगर समझौता फॉर्मूला) भारतीय जनसंघ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा:

“ऐसा क्यों है कि गैर-हिंदी भाषी प्रांतों से जुड़े कई लोग हिंदी को लेकर थोड़े परेशान हो गए हैं? अगर हिंदी के नायक मुझे ऐसा कहने के लिए क्षमा करेंगे, तो क्या वे अपनी माँगों और हिंदी को लागू करने में इतने आक्रामक नहीं थे? उन्होंने जो चाहा, वह मिल गया, भारत की संपूर्ण जनसंख्या के सहज और इच्छुक सहयोग से ‘शायद जो उन्हें उम्मीद थी, उससे कहीं अधिक।”

मुंशी-अयंगर समझौता फॉर्मूला ने हमारे संविधान के अनुच्छेद 343 के लिए आधार बनाया, जो हिंदी को देवनागरी लिपि में आधिकारिक भाषा (राजभाषा) के रूप में पहचान देता है। डॉ. मुखर्जी अन्य क्षेत्रों में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के हठी रुख के लिए हिंदी क्षेत्र वाले कॉन्ग्रेस नेताओं को फटकार रहे थे।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और उसके वैचारिक अग्रदूत जनसंघ ने अपने स्थापना के दिनों से ही सभी भारतीय भाषाओं के प्रचार और संरक्षण का समर्थन किया है। वास्तव में, डॉ. मुखर्जी का भाषण, भाषा नीतियों के लिए पार्टी के समावेशी दृष्टिकोण का एक खाका रहा है:

“भारत कई भाषाओं का देश रहा है। यदि हम अतीत में जाएँ तो पाएँगे कि इस देश में सभी लोगों द्वारा किसी एक भाषा को स्वीकार करने के लिए मजबूर करना किसी के लिए भी संभव नहीं रहा है। मेरे कुछ मित्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि एक दिन ‘आ सकता है जब भारत में एक भाषा और केवल एक भाषा होगी’। सच कहूँ, तो मैं ऐसे दृष्टिकोण को साझा नहीं करता हूँ …।”

जबकि उन राजनेताओं ने नई दोष-पंक्तियों को खोजने में रुचि रखते हुए जानबूझकर हिंदी की स्थिति को ‘राजभाषा’ (आधिकारिक भाषा) के साथ ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में मिलाया है। सरकार का दृढ़ विश्वास है कि कोई भी भारतीय भाषा किसी भी अन्य से कम नहीं है।

भारत की समृद्ध विविधता का श्रेय कई भाषाओं और विशाल साहित्य एवं मौखिक इतिहास तथा परंपराओं को दिया जा सकता है, जो हमारी भाषाओं में मौजूद है।

आठवीं अनुसूची- अधिक भाषाओं को शामिल करने में भाजपा की भूमिका

शुरू में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 14 भाषाओं को अपनाया गया था, जो कि राजभाषा संबंधी संसद की समिति में शामिल की जानी थी। इसमें असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू और उर्दू शामिल थीं। आदिवासी भाषाओं जैसे संथाली और तिब्बती-बर्मी भाषाओं जैसे नेपाली, मणिपुरी और बोडो को शुरू में कोई स्थान नहीं दिया गया था।

22 जून 1962 को जनसंघ के यूएम त्रिवेदी सिंधी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए लोकसभा में एक निजी सदस्य विधेयक लेकर आए और 17 अगस्त 1962 को अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे राज्यसभा में पेश किया। सदन में बहस के दौरान, जब पूछा गया कि क्या सिंधी को उर्दू लिपि में लिखा जाना है, तो वाजपेयी ने जवाब दिया:

“सिंधी लोगों द्वारा लिपि का प्रश्न सुलझाया जाएगा। हमें इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि वे चाहें, तो स्वयं की लिपि को बरकरार रख सकते हैं या देवनागिरी को अपना सकते हैं। लेकिन, हमारे लिए, हिंदी भाषी लोगों के लिए, इस मामले में अपनी राय व्यक्त करना उचित नहीं होगा…।”

अप्रैल 1967 में निरंतर दबाव के बाद, सिंधी को संविधान के बीसवें संशोधन के माध्यम से आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया। 1990 के दशक में मीतेई, नेपाली और कोंकणी संविधान के 71वें संशोधन के माध्यम से प्रस्तुत की गईं। दोनों, 21वें और 71वें संशोधनों में निजी सदस्य विधेयकों के माध्यम से सरकार पर नई भाषाओं को जोड़ने के लिए जोर दिया गया। भाजपा ने इन बिलों में से प्रत्येक को बिना शर्त समर्थन दिया।

दिसंबर 2003 में श्री एलके आडवाणी द्वारा 92वाँ संशोधन पेश किया गया और बोडो, संथाली, मैथिली एवं डोगरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। देश की भाषाई विविधता के लिए पार्टी की प्रतिबद्धता ने पहली मुंडा भाषा, यानी संथाली को अनुसूचित भाषाओं की सूची में जोड़ा।

विशेष निर्देश- अनुच्छेद 351

इन सबमें संविधान के अनुच्छेद 351 के माध्यम से हिंदी की विशेष भूमिका है। अनुच्छेद 351 का विशेष निर्देश केंद्र को हिंदी के प्रसार को बढ़ावा देने और इसे विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपता है ताकि यह अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में एवं अपने संवर्धन को सुरक्षित कर सके।

इसकी सहायता के लिए जून 1975 में गृह मंत्रालय के स्वतंत्र विभाग के रूप में राजभाषा विभाग की स्थापना की गई। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, यह पूछने की आवश्यकता होगी कि क्या किसी अन्य भारतीय भाषा की कीमत पर हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है अथवा क्या हिंदी संघ की अन्य भाषाओं के साथ सहर्ष अस्तित्व में हो सकती है?

गृह मंत्री ने 2019 में हिंदी दिवस पर उस बहस को सुस्पष्ट ढंग से सुलझा दिया था- एक एकीकृत भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका न तो स्थिति और न ही अन्य भारतीय भाषाओं के कद को प्रभावित करेगी।

(जी. किशन रेड्डी भारत सरकार में मंत्री हैं और सिकंदराबाद लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह लेख उन्होंने 2020 में हिंदी दिवस पर लिखा था जिसे दोबारा प्रकाशित किया जा रहा है)

हनुमान मंदिर के पुजारी की अज्ञात लोगों ने की पीट-पीटकर हत्या: सभी आरोपित फरार, जाँच में जुटी MP पुलिस

मध्य प्रदेश के धार जिले के ज्ञानपुरा के हनुमान मंदिर के पुजारी की रविवार (12 सितंबर) रात अज्ञात लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इस हमले में पुजारी को बचाने की कोशिश में मंदिर का चौकीदार भी घायल हो गया है। धार के सिटी एसपी देवेंद्र धुर्वे ने बताया कि रविवार रात 8:30 बजे के करीब मंदिर में बैठे पुजारी को वहाँ 3 से 4 लोग दिखाई दिए।

पुजारी ने केवल उनसे यही पूछा कि आप यहाँ क्या कर रहे हैं। इतनी छोटी सी बात पर आरोपित भड़क गए और उनसे गाली गलौज करने लगे। इसके बाद उन्होंने पुजारी को डंडों से पीटना शुरू कर दिया। पुजारी को इन दबंगों से बचाने के प्रयास में 26 वर्षीय चौकीदार राहुल भी घायल हो गया। दोनों को ग्रामीणों ने घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया। सोमवार (13 सितंबर 2021) सुबह गंभीर रूप से घायल पुजारी अरुणदास ने इलाज के दौरान अस्पताल में दम तोड़ दिया। पुलिस ने बताया कि अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है। सभी आरोपितों की तलाश जारी है।

गौरतलब है कि ज्ञानपुरा गाँव के कड़बान पहाड़ी पर स्थित हनुमान मंदिर में 65 वर्षीय पुजारी अरुणदास पिछले 6-7 सालों से अपनी सेवा दे रहे थे। बताया जा रहा है कि वह यूपी के रहने वाले थे। पुलिस ने उनके परिजन को हत्या की सूचना दे दी है। इस मुद्दे को लेकर टीआई रणजीत सिंह बघेल ने कहा कि टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण कर आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। उनसे जुड़े सबूत जुटाए जा रहे हैं। जल्द ही आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

AIMIM का पूर्व नेता रियाजुद्दीन तलाक के 9 साल बाद पहुँचा बीवी के पास, दोस्त के साथ हलाला के लिए बनाया दबाव

तीन तलाक कानून बनने के बाद भी मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताजा मामला नई दिल्ली के जामिया नगर का है। यहाँ नौ साल पहले तीन तलाक देकर अपनी बीवी को छोड़ने वाला शौहर उससे दोबारा निकाह करने के लिए अपने दोस्त को लेकर उसके घर पहुँच गया। आरोपित ने महिला को धमकी दी कि अगर उसने उसके दोस्त के साथ हलाला और उससे दोबारा निकाह नहीं किया तो वह उसे जान से मार डालेगा।

जामिया नगर थाना पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर आरोपित के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है। पीड़िता ने बताया, आरोपित रियाजुद्दीन खान असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का उत्तर प्रदेश में सचिव है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी बताया कि रियाजुद्दीन ने खुद को तलाकशुदा बताकर जनवरी 2012 में उससे निकाह किया था। उसे बाद में पता चला कि वह तलाकशुदा नहीं है।

पीड़िता ने आरोप लगाया कि वह अपनी पहली बीवी के साथ मिलकर उसे परेशान करता था। इसी बीच महिला ने एक बेटे को भी जन्म दिया। साल 2012 के अंत में आरोपित ने पीड़िता को तीन तलाक दे दिया। महिला ने आगे बताया कि 9 साल बाद 19 अगस्त 2021 की रात वह अपने एक दोस्त के साथ मेरे घर पर आया और कहा कि मैं उसके दोस्त के साथ हलाला करके उससे दोबारा निकाह करूँ। जब मैंने उसे ऐसा करने से मना कर दिया तो उसने मेरे साथ जबरदस्ती की, मेरे कपड़े फाड़ दिए और मेरे साथ मारपीट की। शोर सुनकर पड़ोसी बाहर आने लगे, जिसके बाद दोनों भाग गए।

वहीं, दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, रियाजुद्दीन ने बताया कि वह एक सप्ताह पहले ही पार्टी से इस्तीफा दे चुका है। रियाजुद्दीन ने बताया उसकी पूर्व बीवी उसका राजनीतिक करियर खराब करने और उससे पैसे वसूलने के लिए उस पर झूठे आरोप लगा रही है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पीड़िता ने बहु विवाह व निकाह हलाला को गैरकानूनी करार देने के लिए 26 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। इसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय में अभी भी सुनवाई चल रही है।

CM अमरिंदर ने दिल्ली और हरियाणा में किसानों को आंदोलन के लिए उकसाया, कहा- पंजाब में विरोध राज्य के हित में नहीं

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सोमवार (13 सितंबर) को किसान संगठनों को पंजाब की बजाए दिल्ली और हरियाणा में विरोध प्रदर्शन के लिए उकसा कर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। उन्‍होंने किसान संगठनों से कहा कि वे अपना आंदोलन हरियाणा और दिल्‍ली में करें, लेकिन पंजाब में धरना आद‍ि न दें। होशियारपुर में कैप्टन सिंह ने पंजाब को आर्थिक नुकसान पहुँचाने के लिए किसान प्रदर्शनकारियों को दोषी ठहराया।

उन्होंने कहा, ”मैं पंजाब के किसानों को बताना चाहता हूँ कि यह उनकी जमीन है, जहाँ उनके द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन राज्य के हित में नहीं है। इसके अलावा, कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ने किसानों को दिल्ली में प्रदर्शन करने और केंद्र पर कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए दबाव बनाने के लिए उकसाया।”

उन्होंने कहा, “राज्य में विरोध प्रदर्शन करने की बजाए, किसानों को केंद्र पर कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए दबाव बनाना चाहिए।” इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस दौरान किसान प्रदर्शनकारियों को पड़ोसी राज्य हरियाणा में व्यवधान पैदा करने के लिए उकसाया। उन्होंने कहा कि अगर पंजाब में किसानों को रोका जाता तो वे सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर नहीं पहुँच पाते। आप हरियाणा और दिल्ली में जो चाहें करते रहें, लेकिन पंजाब को नुकसान क्यों पहुँचा रहे हैं? उन्होंने किसानों पर पंजाब में 113 जगहों पर विरोध प्रदर्शन कर राज्य के विकास में बाधा डालने का भी आरोप लगाया।

पंजाब के मुख्यमंत्री ने होशियारपुर में एक सरकारी कॉलेज की आधारशिला रखने के बाद इस मामले पर बात की। दरअसल, पंजाब कॉन्ग्रेस शुरू से ही कृषि कानून विरोधी आंदोलन की प्रबल समर्थक रही है और दिल्ली की सीमा पर विरोध प्रदर्शनों को भड़काती रही है।

हाल ही में जब पंजाब में पुलिस ने विरोध कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज और पानी की बौछारें की थी। उस समय अमरिंदर सिंह को हरियाणा के सीएम एमएल खट्टर को करनाल में प्रदर्शनकारी भीड़ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहते हुए देखा गया था।

बता दें कि इससे पहले जुलाई 2021 में पंजाब कॉन्ग्रेस के पूर्व प्रमुख सुनील झाकर ने स्वीकार किया था कि वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ही थे, जिन्होंने किसानों को दिल्ली जाने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए उकसाया था। झाकर ने नवजोत सिंह सिद्धू के पंजाब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के तौर चुने जाने के मौके पर यह कहा था।

उन्होंने खुलासा किया था, “भाजपा नेता अपने घरों में छिपे हुए हैं क्योंकि किसान पार्टी द्वारा पेश किए गए काले कृषि कानूनों के खिलाफ हैं। अगर कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने उनके साथ अच्छे से पेश नहीं आए होते और इन किसानों को बीजेपी के ख़िलाफ दिल्ली नहीं भेजा होता तो हमें पंजाब में इनके आक्रोश का सामना करना पड़ता। यह हमारे सीएम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।”