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AIMIM का पूर्व नेता रियाजुद्दीन तलाक के 9 साल बाद पहुँचा बीवी के पास, दोस्त के साथ हलाला के लिए बनाया दबाव

तीन तलाक कानून बनने के बाद भी मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताजा मामला नई दिल्ली के जामिया नगर का है। यहाँ नौ साल पहले तीन तलाक देकर अपनी बीवी को छोड़ने वाला शौहर उससे दोबारा निकाह करने के लिए अपने दोस्त को लेकर उसके घर पहुँच गया। आरोपित ने महिला को धमकी दी कि अगर उसने उसके दोस्त के साथ हलाला और उससे दोबारा निकाह नहीं किया तो वह उसे जान से मार डालेगा।

जामिया नगर थाना पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर आरोपित के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है। पीड़िता ने बताया, आरोपित रियाजुद्दीन खान असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का उत्तर प्रदेश में सचिव है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी बताया कि रियाजुद्दीन ने खुद को तलाकशुदा बताकर जनवरी 2012 में उससे निकाह किया था। उसे बाद में पता चला कि वह तलाकशुदा नहीं है।

पीड़िता ने आरोप लगाया कि वह अपनी पहली बीवी के साथ मिलकर उसे परेशान करता था। इसी बीच महिला ने एक बेटे को भी जन्म दिया। साल 2012 के अंत में आरोपित ने पीड़िता को तीन तलाक दे दिया। महिला ने आगे बताया कि 9 साल बाद 19 अगस्त 2021 की रात वह अपने एक दोस्त के साथ मेरे घर पर आया और कहा कि मैं उसके दोस्त के साथ हलाला करके उससे दोबारा निकाह करूँ। जब मैंने उसे ऐसा करने से मना कर दिया तो उसने मेरे साथ जबरदस्ती की, मेरे कपड़े फाड़ दिए और मेरे साथ मारपीट की। शोर सुनकर पड़ोसी बाहर आने लगे, जिसके बाद दोनों भाग गए।

वहीं, दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, रियाजुद्दीन ने बताया कि वह एक सप्ताह पहले ही पार्टी से इस्तीफा दे चुका है। रियाजुद्दीन ने बताया उसकी पूर्व बीवी उसका राजनीतिक करियर खराब करने और उससे पैसे वसूलने के लिए उस पर झूठे आरोप लगा रही है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पीड़िता ने बहु विवाह व निकाह हलाला को गैरकानूनी करार देने के लिए 26 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। इसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय में अभी भी सुनवाई चल रही है।

CM अमरिंदर ने दिल्ली और हरियाणा में किसानों को आंदोलन के लिए उकसाया, कहा- पंजाब में विरोध राज्य के हित में नहीं

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सोमवार (13 सितंबर) को किसान संगठनों को पंजाब की बजाए दिल्ली और हरियाणा में विरोध प्रदर्शन के लिए उकसा कर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। उन्‍होंने किसान संगठनों से कहा कि वे अपना आंदोलन हरियाणा और दिल्‍ली में करें, लेकिन पंजाब में धरना आद‍ि न दें। होशियारपुर में कैप्टन सिंह ने पंजाब को आर्थिक नुकसान पहुँचाने के लिए किसान प्रदर्शनकारियों को दोषी ठहराया।

उन्होंने कहा, ”मैं पंजाब के किसानों को बताना चाहता हूँ कि यह उनकी जमीन है, जहाँ उनके द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन राज्य के हित में नहीं है। इसके अलावा, कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ने किसानों को दिल्ली में प्रदर्शन करने और केंद्र पर कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए दबाव बनाने के लिए उकसाया।”

उन्होंने कहा, “राज्य में विरोध प्रदर्शन करने की बजाए, किसानों को केंद्र पर कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए दबाव बनाना चाहिए।” इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस दौरान किसान प्रदर्शनकारियों को पड़ोसी राज्य हरियाणा में व्यवधान पैदा करने के लिए उकसाया। उन्होंने कहा कि अगर पंजाब में किसानों को रोका जाता तो वे सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर नहीं पहुँच पाते। आप हरियाणा और दिल्ली में जो चाहें करते रहें, लेकिन पंजाब को नुकसान क्यों पहुँचा रहे हैं? उन्होंने किसानों पर पंजाब में 113 जगहों पर विरोध प्रदर्शन कर राज्य के विकास में बाधा डालने का भी आरोप लगाया।

पंजाब के मुख्यमंत्री ने होशियारपुर में एक सरकारी कॉलेज की आधारशिला रखने के बाद इस मामले पर बात की। दरअसल, पंजाब कॉन्ग्रेस शुरू से ही कृषि कानून विरोधी आंदोलन की प्रबल समर्थक रही है और दिल्ली की सीमा पर विरोध प्रदर्शनों को भड़काती रही है।

हाल ही में जब पंजाब में पुलिस ने विरोध कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज और पानी की बौछारें की थी। उस समय अमरिंदर सिंह को हरियाणा के सीएम एमएल खट्टर को करनाल में प्रदर्शनकारी भीड़ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहते हुए देखा गया था।

बता दें कि इससे पहले जुलाई 2021 में पंजाब कॉन्ग्रेस के पूर्व प्रमुख सुनील झाकर ने स्वीकार किया था कि वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ही थे, जिन्होंने किसानों को दिल्ली जाने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए उकसाया था। झाकर ने नवजोत सिंह सिद्धू के पंजाब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के तौर चुने जाने के मौके पर यह कहा था।

उन्होंने खुलासा किया था, “भाजपा नेता अपने घरों में छिपे हुए हैं क्योंकि किसान पार्टी द्वारा पेश किए गए काले कृषि कानूनों के खिलाफ हैं। अगर कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने उनके साथ अच्छे से पेश नहीं आए होते और इन किसानों को बीजेपी के ख़िलाफ दिल्ली नहीं भेजा होता तो हमें पंजाब में इनके आक्रोश का सामना करना पड़ता। यह हमारे सीएम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।”

नसीरुद्दीन शाह ने नाजी जर्मनी से की ‘मोदी सरकार’ की तुलना, कहा- ‘फंडिंग करके बनवाई जा रही है समर्थन में फिल्में’

बॉलीवुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह का मानना है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री इस्लामोफोबिया से ग्रसित है और सबसे बड़ी बात ये है कि इस दिशा में फिल्म बनाने वाले फिल्ममेकर्स को भारत सरकार प्रोत्साहित कर रही है। समाचार चैनल एनडीटीवी से बात करते हुए शाह ने कहा कि उनके तालिबान वाले बयान को गलत ले लिया गया। उन्होंने समझाया कि कैसे पूरे मुस्लिम समुदाय को लेकर उन्होंने कुछ नहीं कहा। 

शाह से जब पूछा गया क्या उनके साथ फिल्म इंडस्ट्री में कभी भेदभाव हुआ है, तो उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानता कि फिल्म इंडस्ट्री में मुस्लिम समुदाय से कोई भेदभाव किया जा रहा है या नहीं। मैं मानता हूँ कि हमारा योगदान अहम है। इस इंडस्ट्री में पैसा ही भगवान है।”

बॉलीवुड के तीन खानों की चर्चा करते हुए शाह ने कहा, “आप यहाँ जितना ज्यादा पैसा कमाते हैं, उसी के मुताबिक आपकी इज्जत होती है। आज भी इंडस्ट्री के 3 खान टॉप पर हैं। उन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती है और आज भी वे रिजल्ट दे रहे हैं। मैंने कभी भेदभाव जैसी बात फील नहीं की। मुझे अपने करियर की शुरुआत में ही नाम की सलाह दी गई थी, लेकिन मैंने अपना नाम बनाए रखा। मैं नहीं मानता कि इससे कोई अंतर पैदा हुआ होगा।” हालाँकि, ये कहते हुए उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि इंडस्ट्री के बाहर भेदभाव मौजूद है।

शाह कहते हैं कि मुस्लिम नेता, यूनियनों के सदस्य और छात्र जब कोई सामान्य बयान भी देते हैं तो उनका विरोध किया जाता है। वहीं जब मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हिंसक बयान दिए जाते हैं तो उस तरह का हल्ला नहीं दिखता। यही नहीं उन्होंने कहा, “मुझे तो बॉम्बे टु कोलंबो और कोलंबो टु कराची की टिकट भी भेज दी गई थी।”

उन्होंने कहा कि कोई कट्टरता नहीं भी है फिर भी फिल्म जगत में बदलाव आ रहे हैं। वह कहते हैं, “सरकार अपने समर्थन में फिल्में बनवाने के लिए उनको (फिल्ममेकर्स) समर्थन दे रही है। उन्हें प्रोत्साहित कर रही है। वित्तपोषित किया जा रहा है। अगर वह लोग प्रचार वाली फिल्में भी बना रहे हैं तो इसे सीधे शब्दों में कहा जाए।”

उनके मुताबिक, नाजी जर्मनी में भी ऐसा प्रयास किया गया था। जो फिल्ममेकर्स लाजवाब थे उन्हें इकट्ठा करके नाजी फिलॉसफी पर फिल्में बनाने को कहा गया। शाह ने कहा कि उनके पास पक्के सबूत नहीं हैं लेकिन ये सब आजकल की फिल्में देख कर समझना लाजिमी है। वह कहते हैं जिस तरह की बिग बजट की फिल्में आ रही हैं। वह कट्टरवादी एजेंडे को नहीं छिपा सकतीं।

अपने तालिबान वाले बयान पर उन्होंने कहा, “ये कोई साधारण समय नहीं है। इस तरह का माहौल बन गया है कि हर कोई नफरत फैलाने को तैयार रहता है। लोग बुरा मानने को तैयार बैठे हैं। अगर वह लोग मेरा बयान सुनेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि मैंने कुछ गलत नहीं कहा।”

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही नसीरुद्दीन शाह ने तालिबान समर्थकों पर अपना बयान जारी किया था। अपनी वीडियो में उन्होंने कहा था, “हालाँकि, अफगानिस्तान में तालिबान का फिर से हुकूमत पा लेना दुनिया भर के लिए फिक्र का बायस (चिंता का विषय) है, इससे कम खतरनाक नहीं है हिन्दुस्तानी मुसलमानों के कुछ तबकों का उन बहशियों की वापसी पर जश्न मनाना।”

उनका वीडियो भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग पर प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया था, जिसमें कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तालिबान को बन्दूक के बलपर अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए सराहा जा रहा था। ऐसा करने वालों में प्रमुख मुस्लिम मौलवियों, कट्टरपंथी मुस्लिमों के साथ लिबरल गिरोह का एक वर्ग भी शामिल था जिसने अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के लिए बधाई दी थी और कहा था कि युद्धग्रस्त देश में तालिबान की जीत पूरे इस्लामी समुदाय के लिए जश्न का क्षण है। 

अब ‘रामचरितमानस’ का जीवन दर्शन पढ़ेंगे BA के छात्र, MP के सिलेबस में महाभारत, योग और ध्यान भी शामिल

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। इसके तहत उच्च शिक्षा विभाग ने बीए के प्रथम वर्ष में रामचरितमानस का पाठ पढ़ाए जाने का निर्णय लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सत्र से ही पाठ्यक्रम में ‘रामचरितमानस का व्यावहारिक दर्शन’ को शामिल कर लिया जाएगा। बताया जा रहा है कि इसे दर्शन शास्त्र विषय में रखा गया है, जिसका 100 नंबर का पेपर रहेगा। यह सभी छात्रों के लिए जरूरी नहीं होगा, बल्कि वैकल्पिक रहेगा।

उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव ने कहा कि बीए प्रथम वर्ष के छात्र अब से रामचरितमानस का जीवन दर्शन पढ़ेंगे। दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर छात्रों को रामचरितमानस का पाठ पढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि जब युवा पढ़ेंगे तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तरह उनमें चरित्र का निर्माण होगा। भगवान राम के चरित्र में कला, साहित्य और संस्कार है। मंत्री ने कहा कि राम के दर्शन से छात्र चरित्र निर्माण कर सकते हैं। यह वैकल्पिक होगा, जिसे कॉलेज में हिंदी और दर्शन विषय हैं।

दरअसल, नई शिक्षा नीति 2020 के तहत प्रदेश के कॉलेजों में बीए फर्स्ट ईयर के नए सिलेबस में महाभारत, रामचरितमानस, योग और ध्यान शामिल किए गए हैं। वहीं, अंग्रेजी के फाउंडेशन कोर्स में फर्स्ट ईयर के छात्रों को सी राजगोपालचारी की महाभारत की प्रस्तावना पढ़ाई जाएगी। अंग्रेजी और हिंदी के अलावा, योग और ध्यान को भी तीसरे फाउंडेशन कोर्स के रूप में पेश किया गया है। इसमें ओम ध्यान और मंत्रों का पाठ शामिल है।

बता दें कि इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों का व्यक्तित्व विकास और उन्हें जीवन मूल्यों से रूबरू करवाना है, जिसकी समाज में आज जरूरत है।

एंटीलिया बम केस-मनसुख हिरेन हत्या मामले में चौंकाने वाली नई एंट्री! जानें कौन है ‘कुरकुरे बालाजी’?

एंटीलिया बम केस में और कारोबारी मनसुख हिरेन की हत्या मामले में पूर्व पुलिस कमिशनर परमबीर सिंह की भूमिका संदिग्ध है। ऐसे में NIA को मामले की जाँच के दौरान एक नई जानकारी मिली। बताया जा रहा है कि पूर्व कमिशनर परमबीर सिंह (Param Bir Singh) ने अपने फोन के जरिए संपर्क करने के लिए कथित तौर पर FaceTime ID का प्रयोग किया था। इसमें उन्होंने अपना नाम ‘कुरकुरे बालाजी’ रखा हुआ था।

NIA को अपनी पड़ताल में इस फेसटाइम आईडी का मालूम चला जिसका इस्तेमाल मनसुख हिरेन के मर्डर मामले में हुआ था। इसका जिक्र जाँच एजेंसी ने अपनी 1000 पन्नों की चार्जशीट में भी किया है। इसमें ऐप्पल कंपनी से आया रिस्पांस भी शामिल है। मिड डे की रिपोर्ट बताती है कि एक खुफिया अधिकारी जोसेफ डी सिल्वा ने अप्रैल के पहले हफ्ते में एक व्यक्ति को कुछ फोन के साथ बुलाया और कहा कि सिंह अपना हैंडसेट बदलना चाहते हैं। सिंह ने उस समय व्यक्ति से Iphone लिया। इसके बाद उनके जूनियर ने इसमें आईडी बनाई।

अधिकारी के मुताबिक, डीजी होमगार्ड के ऑफिस में नेटवर्क की समस्या थी इसलिए उसने बाहर आकर फेसटाइम आईडी और पासवर्ड बनाया था। आईडी बनाने वाले अधिकारी के मुताबिक, फेसटाइम आईडी का ये नाम इसलिए रखा गया क्योंकि उस समय वहाँ कुरकुरे बालाजी का पैकेट रखा हुआ था। पासवर्ड के बारे में उन्होंने कहा कि उनको वो नहीं याद।

NIA ने इसी ईमेल आईडी की जानकारी के लिए जुलाई में ऐप्पल कंपनी को एक लेटर लिखा था। 20 जुलाई को इसका जवाब देते हुए ऐप्पल कंपनी ने ज़िप फ़ाइल में तमाम जानकरी NIA को दी थी। इस जानकरी के मुताबिक जिस ईमेल आईडी से बात की जा रही थी उसका पहला नाम कुरकुरे और आखिर नाम बालाजी है। इस जवाब के बाद यह बात पक्की हो गई थी कि उन्हें मिली जानकारी से ये नाम मैच हो रहा था। ऐप्पल कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक इस आईडी से कई बार फेस टाइम पर बात की गई थी।

बता दें कि एनआईए ने 8 जुलाई को ऐप्पल से अनुरोध किया था कि वह जाँच में तेजी लाने के लिए अकॉउंट की डिटेल्स को विवरण साझा करें- जिसमें क्लाउड आईडी का आईपी विवरण, पंजीकरण विवरण, प्रोडक्ट खरीद विवरण के साथ-साथ स्टोर की जानकारी जहाँ से हैंडसेट खरीदा गया था, गूगल अकॉउंट का नाम और पंजीकरण की तारीख शामिल हो।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले NIA द्वारा दायर 10,000 पन्नों की चार्जशीट से पता चला था कि पूर्व पुलिस प्रमुख परमबीर सिंह ने इस मामले में आतंकी समूह जैश-उल-हिंद की संलिप्तता का हवाला देकर जाँच को गुमराह किया था। एक साइबर एक्सपर्ट के बयान के मुताबिक सिंह ने रिपोर्ट में आतंकी संगठन की भूमिका का जिक्र करने के लिए 5 लाख रुपए दिए थे।

साइबर एक्सपर्ट ने 5 अगस्त को एनआईए के समक्ष परमबीर सिंह के कहने पर रिपोर्ट में बदलाव की बात कबूली थी। उसने बताया था, “सीपी मुंबई के आग्रह पर मैंने सीपी मुंबई के कार्यालय में बैठकर अपने लैपटॉप पर एक रिपोर्ट तैयार की, जो एक पैराग्राफ में थी और मैंने इसे सीपी मुंबई को दिखाया। रिपोर्ट पढ़ने के बाद परमबीर सिंह सर ने मुझसे एंटीलिया मामले में जिम्मेदारी लेते हुए टेलीग्राम चैनल पर ‘जैश-उल-हिंद’ के पोस्टर डालने के लिए कहा।”

जिंदा है तालिबानी ‘नेता’ मुल्ला बरादर, ऑडियो जारी कर कहा- ‘मैं पूरी तरह सुरक्षित, उड़ाई गई मौत की अफवाह’

तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने अपनी मौत की अफवाहों का खंडन करने के लिए सोमवार (सितंबर 13, 2021) को एक ऑडियो टेप जारी किया।

टोलो न्यूज के मुताबिक अफगानिस्तान में तालिबान सरकार में उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने एक ऑडियो संदेश में पुष्टि की कि वह जीवित हैं और कहा कि वह घायल भी नहीं हुआ था। तालिबान के प्रवक्ता मोहम्मद नईम ने इस मैसेज को ट्वीट किया। बता दें कि तालिबान के बीच झड़पों में बरादार के घायल होने या मारे जाने की खबरें सामने आई थीं।

बरादर ने तालिबान द्वारा पोस्ट किए गए एक ऑडियो संदेश में मौत की अफवाहों के लिए ‘फेक प्रोपेगेंडा’ को जिम्मेदार ठहराया। बता दें कि मीडिया में ऐसी खबरें और अफवाहें थीं कि वह प्रतिद्वंद्वी तालिबान गुटों के बीच गोलीबारी में घायल होने के बाद दम तोड़ दिया था।

अब सामने आए ऑडियो क्लिप में बरादर ने कहा, “मेरे निधन की खबर मीडिया में आई थी। पिछली कुछ रातों से मैं यात्राओं पर गया हूँ। इस समय मैं जहाँ भी हूँ, हम सब ठीक हैं, मेरे सभी भाइयों और दोस्तों। मीडिया हमेशा फर्जी प्रोपेगेंडा प्रकाशित करता है। इसलिए, उन सभी झूठों को बहादुरी से खारिज करें और मैं आपके लिए 100 प्रतिशत पुष्टि करता हूँ कि कोई समस्या नहीं है।”

तालिबान के सर्वोच्च नेता हबीतुल्लाह अखुंदजादा के भी कई साल पहले मारे जाने की अफवाह फैली थी, लेकिन तालिबान के प्रवक्ता ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने से सिर्फ दो हफ्ते पहले खुलासा किया कि वह जीवित था और कंधार में था। हालाँकि, अब उसके बारे में फिर से अफवाह है कि वह COVID-19 या फिर बमबारी में मारा गया है।

कौन है मुल्ला अब्दुल गनी बरादरी

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर 1994 में तालिबान के चार सह-संस्थापकों में से एक है। इंटरपोल के अनुसार, मुल्ला बरादर का जन्म 1968 में अफगानिस्तान के उरुजगान प्रांत में देहरादून जिले के वीतमक गाँव में हुआ था। वह अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई की तरह पोपलजई जनजाति का दुर्रानी पश्तून है।

तालिबान की स्थापना के बाद, जल्द ही वह एक सैन्य रणनीतिकार और कमांडर के पद तक पहुँचा और एक प्रमुख नेता बन गया। जब ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ के दौरान तालिबान सरकार को अमेरिकी सेना द्वारा गिरा दिया गया था, मुल्ला बरादर उप रक्षा मंत्री के रूप में कार्यरत था।

2010 में, उसे दक्षिणी पाकिस्तानी शहर कराची में एक संयुक्त यूएस-पाकिस्तानी ऑपरेशन में अमेरिकी बलों द्वारा गिरफ्तार किया गया था। 21 सितंबर, 2018 को, पाकिस्तानी अधिकारियों ने अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत के लिए एक शर्त के रूप में मुल्ला बरादर को अपनी हिरासत से रिहा कर दिया। वह तालिबान के उन गिने-चुने लोगों में से एक है, जिसने अमेरिका और अफगान सरकार के साथ बातचीत का समर्थन किया।

ज्ञानी जैल सिंह की जान दुर्घटना में गई या फिर कोई योजना बनाई गई? BJP में शामिल होकर पोते इंद्रजीत ने क्या कहा, सुनिए

पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के पोते इंद्रजीत सिंह सोमवार (13 सितंबर 2021) को बीजेपी में शामिल हुए। दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सदस्यता ली। इस दौरान केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।

इंद्रजीत सिंह ने इस मौके पर कहा कि आज उनके दादा की इच्छा आखिरकार पूरी हो गई। उन्होंने कहा, “हर कोई जानता है कि गाँधी परिवार के प्रति वफादार होने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया। कॉन्ग्रेस पार्टी ने उन्हें चोट पहुँचाई थी।” सिंह ने कहा कि जब वह फिल्म जगत में अपना करियर बनाने की कोशिश कर रहे थे, तभी उन्हें पूर्व राष्ट्रपति ने दिल्ली बुलाया ताकि वह राजनीति में शामिल हो सकें।

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इंद्रजीत सिंह ने बताया, “उन्होंने (ज्ञानी जैल सिंह) मुझे फोन किया और अटल बिहारी वाजपेयी से आशीर्वाद लेने के लिए कहा। उन्होंने मुझे लाल कृष्ण आडवाणी से मिलने और आशीर्वाद लेने के लिए भी भेजा। आपको याद होगा कि जब मदन लाल खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे तो मैंने उनके लिए काफी रैलियाँ की थीं, हालाँकि, मैं उस वक्त बीजेपी में शामिल नहीं हुआ था। ज्ञानी जी चाहते थे कि मैं भाजपा में शामिल हो जाऊँ न कि उस (कॉन्ग्रेस) पार्टी में।”

उस हादसे पर सवाल जिसमें दादा की हुई थी मौत

उन्होंने कहा, “वो मुझे राजनीति के लिए तैयार कर रहे थे, लेकिन तभी वो हादसा हो गया जिसने उनकी जान ले ली। मैं इसमें नहीं जा रहा हूँ कि उनकी जान किसी दुर्घटना में गई थी या फिर इसकी कोई योजना बनाई गई थी। हम इसके बारे में किसी और दिन बात करेंगे। मेरा मार्गदर्शन करने वाला उस समय कोई नहीं था, इसलिए मैं वापस पंजाब चला गया।” सिंह ने आगे कहा कि बाद में उन्होंने सामाजिक कार्य करना शुरू किया और विश्वकर्मा समाज के सदस्यों को एक छत के नीचे लाने के लिए पूरे भारत की यात्रा की।

उन्होंने बताया कि वह कुछ समय पहले भाजपाके राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से उनकी मुलाकात हुई थी। इस दौरान नड्डा ने उनसे उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों के बारे में पूछा था। सिंह ने कहा कि उनके सामाजिक कार्यों के बारे में जानने के बाद नड्डा ने उन्हें भाजपा में शामिल होने की पेशकश की थी।

दामाद ने 2019 में ली थी सदस्यता

2019 में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के दामाद सरवन सिंह चन्नी भी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और अन्य नेताओं की मौजूदगी में बीजेपी में शामिल हुए थे। ज्ञानी जैल सिंह ने 1982 से 1987 के बीच भारत के 7वें राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया था। उन्होंने भारत के गृह मंत्री के रूप में भी कार्य किया। उन्हें 1972 में कॉन्ग्रेस शासन के दौरान पंजाब का मुख्यमंत्री भी चुना गया था।

जन्मभूमि पर चाहिए थी यूनिवर्सिटी, भूमि घोटाले का ‘मनगढंत आरोप: अब वोट के लिए ‘राम भक्त’ बनें सिसोदिया-संजय, पहुँचे अयोध्या

मनीष सिसोदिया रामलला के दर्शन करने अयोध्या पहुँच गए। महत्वपूर्ण घोषणा है, खासकर इसलिए क्योंकि यही सिसोदिया श्री राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर नहीं बल्कि विश्वविद्यालय चाहते थे। अब जबकि राम मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है, “मंदिर वहीं बनाएँगे पर तारीख नहीं बताएँगे” जैसे व्यंग्यात्मक नारे अब नहीं सुने जाएँगे। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर संघर्ष और अदालती लड़ाई किसने लड़ी, यह जगजाहिर है। दशकों तक चले आंदोलन का विरोध किस-किस स्तर पर हुआ और किसने-किसने किया, ये तथ्य भी अब इतिहास के दस्तावेजों का हिस्सा बन चुके हैं। 


सत्तासीन सेक्युलर राजनीतिक दलों ने कब और क्या-क्या किया, उसका जिक्र राजनीतिक तौर पर हमेशा होता रहेगा। कारसेवकों पर गोलियाँ बरसाने से लेकर चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने तक, सारे तथ्य सरकारी दस्तावेज में समा चुके हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अदालती कार्रवाई में कैसे दरकिनार करने की कोशिशें हुईं, यह भी किसी से नहीं छिपा। सर्वोच्च न्यायालय में मुक़दमे की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव तक रोकने की सिफारिश किसने की, वह भी अब ऐतिहासिक दस्तावेजों का हिस्सा है। कौन श्री राम जन्मभूमि स्थल पर विश्वविद्यालय चाहता था, कौन अस्पताल और कौन स्मारक, यह आने वाले कई दशकों तक याद किया जाएगा। 

श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर जिन लोगों ने विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनवाने की इच्छा जाहिर की थी उनमें आम आदमी पार्टी के नेता प्रमुख थे। मनीष सिसोदिया का एक वीडियो आज भी जब तब चलने लगता है जिसमें वे मंदिर की जगह एक विश्वविद्यालय बनाने की इच्छा जाहिर करते हुए देखे जाते हैं। पार्टी के अन्य नेता भी समय-समय पर श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर न बनाए जाने की इच्छा जाहिर कर चुके थे। यह सब उस तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के नाम पर तब किया गया जब सेकुलरिज्म फैशन में था और सब फैशनेबल दिखना चाहते थे। यहाँ तक कि अंतिम प्रयास के रूप में श्री राम जन्मभूमि न्यास पर जमीन घोटाले का निराधार आरोप लगाने में भी नहीं हिचके।
   
अब फैशन बदल गया है और साथ-साथ सिसोदिया और केजरीवाल भी। श्री राम जन्मभूमि के मुक़दमे में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव आए तब अरविन्द केजरीवाल ने खुद को विधानसभा में दिल्ली के बुजुर्गों का श्रवण कुमार घोषित कर दिया और यह वादा किया कि उनकी सरकार अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद दिल्ली के हर बुजुर्ग को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ स्थल के दर्शन फ्री में करवाएगी। अब उत्तर प्रदेश में चुनाव आ रहे हैं तो मामला दिल्ली सरकार से आगे जाकर पार्टी और उसके नेताओं तक पहुँच गया है। यही चुनाव का मौसम है जो सिसोदिया को अचानक रामलला की याद आ गई है और वे अयोध्या जा तो रहे हैं पर उनके लिए जाने से अधिक महत्वपूर्ण जाते हुए दिखना है।  

अब आम आदमी पार्टी के नेताओं के लिए उत्तर प्रदेश में एंट्री मन ही मन “प्रविसि नगर कीजे सब काजा, हृदय राखि कोसलपुर राजा” के गायन से शुरू होती है। अभी तक मन में चल रहे इस गायन की आवाज़ जल्द ही मुँह से निकलेगी। चुनाव आ रहे हैं तो मन ही मन गायन करने वाले बाकायदा समूह बनाकर अयोध्या काण्ड का पाठ करेंगे। केजरीवाल श्रवण कुमार बनेंगे। सिसोदिया और संजय सिंह भी कुछ न कुछ बन लेंगे। इन्हें देखकर भारत भर को वीर सावरकर का वह वक्तव्य याद आयेगा कई; यदि जनेऊ पहनने से वोट मिलेंगे तो कॉन्ग्रेसी सूट के ऊपर जनेऊ धारण करने लगेंगे।

‘भारतीय कंटेंट पर 3 कंपनियों का राज, अंग्रेजों को फ़िल्में बेच खुश हैं बॉलीवुड के नेता’: अब दिल्ली की फ़ाइल खोलेंगे विवेक अग्निहोत्री

फिल्म अभिनेता विवेक अग्निहोत्री ने अपनी फिल्मों के जरिए अनसुलझे संजीदा विषयों को उठाने का अभियान छेड़ रखा है। ताशकंद और कश्मीर के बाद अब उनकी अगली फिल्म है – ‘The Delhi Files’, जिसका फर्स्ट लुक पोस्टर उन्होंने सोमवार (13 सितंबर, 2021) को जारी किया। इससे पहले ‘The Tashkent Files‘ में वो पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की असामयिक संदिग्ध मौत का मुद्दा उठा चुके हैं।

इसी तरह वो ‘The Kashmir Files‘ नामक फिल्म भी बना रहे हैं, जिसमें इस्लामी आतंकवाद का असली चेहरा सामने आएगा। सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रखने के लिए जाने जाने वाले विवेक अग्निहोत्री इससे पहले चॉकलेट (2005), दन दना दन गोल (2007), हेट स्टोरी (2012), बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम (2016) और जुनूनीयत (2016) जैसी फिल्मों का निर्देशन भी कर चुके हैं।

साथ ही उन्होंने ‘Urban Naxals: The Making of Buddha in a Traffic Jam’ और ‘Who Killed Shastri?: The Tashkent Files’ नामक पुस्तकें भी लिखी हैं। वो अक्सर यूट्यूब पर ‘VRA TV’ के जरिए लोगों से संवाद करते रहते हैं। विज्ञापन एजेंसियों के साथ अपने करियर की शुरुआत करने वाले विवेक अग्निहोत्री ने 90 के दशक में कुछ सीरियलों का भी निर्देशन किया। ‘मोहम्मद एंड उर्वशी’ नामक शॉर्ट फिल्म को लेकर उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा जान से मार डालने की धमकी भी मिल चुकी है।

उनकी नई फिल्म की पोस्टर की बात करें तो उसमें पीछे लाल रंग में हमारा राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बना हुआ है, जिसे हम अक्सर ‘अशोक स्तंभ’ पर देखते हैं। सामने एक पंजाबी बच्चे की तस्वीर है। पोस्टर डार्क थीम में है। भारत की अनसुनी कहानियों को खँगालने के बीड़ा उठाए विवेक रंजन अग्निहोत्री का कहना है कि ये सबसे बोल्ड ट्राइलॉजी है। हमने विवेक अग्निहोत्री से बात की और जाना कि उनकी अगली फिल्म ‘The Delhi Files’ में क्या होगा।

सवाल: आपकी नई फिल्म का थीम क्या है? एक निर्देशक के रूप में आप कौन सी कहानी कहना चाह रहे हैं? कश्मीर और ताशकंद का तो स्पष्ट था, इस बार कहानी क्या होगी?
मैं इस बार थीम बहुत ज़्यादा स्पष्ट करना भी नहीं चाह रहा था क्योंकि कोरोना का समय है। ऊपर से माहौल आजकल ऐसा है कि ज़रा सा कुछ करो तो लोग आपके ऊपर तलवारें-बंदूकें लेकर चढ़ने लगते हैं। मुख्य रूप से मैं प्रजातंत्र को लेकर कुछ कहना चाह रहा हूँ, जहाँ ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ और स्वतंत्रता की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। देखा जाए तो ये चीजें 70 वर्षों में कभी ठीक से रही ही नहीं। ‘द ताशकंद फाइल्स’ में मेरा मुख्य उद्देश्य था ‘Right To Truth’, अर्थात जब मैंने पता लगाना चाहा कि इस देश के लोगों को सत्य जानने का अधिकार है कि नहीं तो पता चला कि नहीं है। इसी तरह ‘द कश्मीर फाइल्स’ जो है वो ‘Right To Justice’, अर्थात न्याय के अधिकार पर आधारित है। कश्मीर एक मुद्दा है, लेकिन ऐसे कई मुद्दे हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल में हिंसा हुई, मोपला नरसंहार को ले लीजिए – क्या उन लोगों को न्याय मिला ये मिलेगा? भारत में एक बहुत बड़ी चीज है कि यहाँ जान की कोई कीमत नहीं है। ‘Right To Life’, मतलब क्या लोकतंत्र लोगों के जीवन की रक्षा करता है? यहाँ हजारों लोग मर जाएँ तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे लिए लोकतंत्र में तीन बड़े मुद्दे हैं – सत्य, न्याय और जीवन। ये उसकी अंतिम कड़ी है। इसमें बताया जाएगा कि किस तरह हमारी सरकारों ने हमारे जीवन के अधिकार को ख़त्म कर दिया है – हमारे संविधान में, शासन में।

सवाल: क्या आप 2020 दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे को छू रहे हैं या 1984 का सिख नरसंहार पर मुख्य फोकस होगा?
दिल्ली दंगा तो इस पूरी कहानी में एक छोटा सा हिस्सा है। पूरी कहानी ये है कि किस तरह हमने लोगों की जान को आँकड़ों व संख्याओं में कैद कर दिया है। लोगों के जीवन की प्रतिष्ठा का क्या। पंजाब को लेकर भी अब तक जो नैरेटिव रहा हो, वो गलत रहा है। हाँ, जब निकलेगा तो सिख नरसंहार की बात आएगी ही।

सवाल: मान लीजिए अभी यूपीए की सरकार आगे आ जाती है तो क्या होगा? फिल्म बन पाएगी? सज्जन सिंह और जगदीश टाइटलर जैसे कॉन्ग्रेस नेता सिख दंगों के मुख्य आरोपित रहे हैं। क्या आपको ये डर नहीं है कि फिल्म बंद हो जाएगी?
डर क्या… अब तो ऐसा हो गया है कि हमें खतरों से खेलने का शौक सा हो गया है। अभी जम्मू कश्मीर गया तो तो मेरे खिलाफ फतवे जारी कर दिए गए। मीडिया में भी चला था। असल में बात कुछ यूँ था कि मैं शूटिंग कर रहा था, फिर नौबत ऐसी आ गई कि भारतीय सेना और CRPF के लोगों को हमें घेर कर चलना पड़ा। हुआ कुछ यूँ कि मैं वहाँ के कुछ युवा लड़के-लड़कियों के साथ भोजन कर रहा था, जिसमें वहाँ की एक RJ भी हैं। मैं शाकाहारी हूँ। मैंने सोशल मीडिया के जरिए लिखा था कि अब कश्मीर और भारत एक हो गए हैं तो सिर्फ कश्मीरी ही नहीं, शाकाहारी भोजन भी मिलने चाहिए। मैंने लिखा था कि अब मैं आ गया हूँ तो कुछ बदलाव लाता हूँ। इस पर मुझे उनके भोजन के ऊपर टिप्पणी करने के आरोप लगाए गए और अजीबोगरीब बातें कर के फतवा जारी कर दिए। कॉन्ग्रेस वालों ने ट्वीट्स किए। इसी डर से लोग फ़िल्में नहीं बनाते। जिन मुद्दों पर बातें की जानी चाहिए, उन पर इसी डर से क्रिएटिव लोग फ़िल्में नहीं बनाते। अगर मैं भी ये कहानियाँ नहीं कहूँगा तो कोई और करेगा ही नहीं। इसीलिए, ये बहुत ज़रूरी है।

सवाल: OTT को लेकर आपका क्या कहना है? वहाँ अक्सर वामपंथियों की फ़िल्में/सीरीज आ जाते हैं। लेकिन, आप जैसे राष्ट्रवादी निर्देशकों के कंटेंट वहाँ नहीं दिखते। इसका कारण क्या है?
इसका कारण बड़ा स्पष्ट है। तीन कंपनियाँ आज पूरे भारत में मनोरंजन के कंटेंट पर अपना राज चलाती हैं – डिज्नी हॉटस्टार, अमेज़ॉन और नेटफ्लिक्स। ये तीनों अमेरिका में खुद को ‘सामाजिक न्याय का योद्धा’ बताती हैं। इनके जो पदाधिकारी हैं, वो पूरे के पूरे वामपंथी सोच वाले हैं। अमेज़ॉन का संचालन करने वाले तो कार्ड होल्डर कम्युनिस्ट्स हैं। जब वहाँ इन्हीं लोगों की सत्ता है तो वो क्यों राष्ट्रवादियों को मौका देंगे। ‘The Kashmir Files’ के सम्बन्ध में डील करने के लिए एक OTT संस्था ने मुझे बुलाया था। उन्होंने कहा कि एक समस्या ये है कि आपको इस फिल्म में ‘इस्लामी आतंकवाद’ का नाम नहीं लेना होगा। मैंने पूछा कि इस शब्द का प्रयोग क्यों नहीं कर सकते, क्योंकि इन्हीं लोगों ने तो हिन्दुओं को वहाँ से भगाया है। इस पर वो अपनी अंतरराष्ट्रीय नीति की बात करने लगे। मैंने पूछा कि अगर मैं यहूदियों की कहानी बनाता हूँ और दूसरे विश्व युद्ध की घटनाओं के बारे में बताता हूँ तो क्या मैं नाजी शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा, जिन्होंने यहूदियों का नरसंहार किया? इस पर वो कहने लगे कि ये अलग बात है। मैंने पूछा कि वो अलग बात और ये अलग बात कैसे हो गई? दोनों जगह लोग मरे। पीड़ितों को मारने वालों के बारे में क्यों नहीं बोल सकते? वो कहने लगे कि आपको ये भी कहना पड़ेगा कि मुस्लिमों को भी मारा गया, ये भी कहना पड़ेगा। मैंने कहा कि माफ़ कीजिए, मैं फिल्म बना लूँगा। एक-डेढ़ साल हमें संघर्ष करना पड़ा, लेकिन किसी तरह फिल्म बन गई।

सवाल: ‘The Kashmir Files’ कितनी बन गई है?
इस फिल्म का निर्माण पूरा हो गया है। हम सिर्फ थिएटर्स खुलने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि इसे रिलीज किया जाए। थिएटर खुलने इसीलिए भी काफी आवश्यक हैं, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत का कोई भी कंटेंट भारत में रहेगा ही नहीं और तीन कंपनियाँ उनकी मालिक हो जाएँगी – डिज्नी, नेटफ्लिक्स और अमेज़ॉन। भारत सरकार से इस सम्बन्ध में मैंने गहन बातचीत की। केंद्र सरकार ने बताया कि उन्होंने राज्यों को अनुमति दे दी है थिएटर्स खोलने की, लेकिन महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार इसीलिए नहीं खोल रही है क्योंकि 60% फिल्मों का कारोबार मुंबई व महाराष्ट्र से आता है। जैसे ही खुलेगी, मैं फिल्म रिलीज कर दूँगा। फिल्मों से कमा कर हजारों करोड़ रुपयों की संपत्ति बनाने वाले ‘बॉलीवुड के नेताओं’ के मुँह पर ताले जमे हुए हैं,’क्योंकि वो अंग्रेजों को अपनी फ़िल्में बेचने में खुश हैं। इसीलिए, मैं इसके खिलाफ अभियान चला रहा हूँ। कोई आवाज़ उठाने को तैयार नहीं है। बॉलीवुड का मतलब सिर्फ 10 स्टार्स नहीं हैं, 30-40 लाख झुग्गी-झोपड़ी वालों को खाने के लाने पड़ गए हैं। सिंगल स्क्रीन्स के बाहर पार्किंग वालों से लेकर पान-समोसे बेचने वाले तक – उन सभी की दुकानें बंद हैं। बॉलीवुड में फिल्मों में काम करने वाले घर पर बैठे हैं। 50-100 रुपयों में मनोरंजन चाहने वालों को तो परेशानी है।

सवाल: महाराष्ट्र सरकार आपको अब भी परेशान कर रही है क्या? आपको एक बार खासा परेशान किया गया था।
ये वो समय था जब पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग हुई थी और मैंने इसके खिलाफ खासी आवाज़ उठाई थी। इसके बाद मेरे ससुराल में फोन कॉल किया पुलिस ने। अप्रैल की बात है, जब कोरोना चालू ही हुआ था। मेरे घर पुलिस आ गई थी। मैं और मेरी पत्नी काफी देर तक सड़क पर बैठे रहे। उन्होंने कहा कि मुझे इस बारे में कुछ नहीं लिखना है। मैंने ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की बात की तो उन्होंने कई धमकियाँ दी। पुलिस अधिकारी ने कहा कि मैं खुद आपका लिखा पसंद करता हूँ, लेकिन अनिल देशमुख (महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री, अभी फरार) का आदेश है कि आपको रोका जाए। उन्होंने इसीलिए ऐसा आदेश दिया था, क्योंकि सोनाक्षी सिन्हा ने ट्वीट कर दिया था कि विवेक अग्निहोत्री ने मेरे बारे में कुछ कहा है तो उन पर कार्रवाई की जाए। मेरे खिलाफ आधी रात में कार्रवाई का आदेश दिया गया। जब कुछ नहीं मिला तो कहा गया कि मेरे सोशल मीडिया हैंडल्स में गड़बड़ी है, इसीलिए सभी ट्वीट्स हटाए जाएँ। मुझे सबको अनफॉलो करना पड़ा। कोरोना का समय था, हमने सोचा कि इसके खिलाफ कैसे लड़ाई लड़ें। मैं बॉलीवुड में अकेला ही हूँ, जो उद्धव ठाकरे सरकार के खिलाफ बोलता हूँ। मुझे कहा गया कि आप कश्मीर पर फिल्म बना रहे हैं, आपको जान का खतरा है इसलिए सिक्योरिटी लेनी पड़ेगी। सिक्योरिटी का अर्थ है कि पुलिसवाले मेरी हर गतिविधि पर नजर रखेंगे। मैंने कह दिया कि आप बिल्डिंग के बाहर सुरक्षा लगा दीजिए, मुझे सिक्योरिटी नहीं चाहिए। मुझे थाने में हाजिरी देने को कहा गया। मुझसे पत्र लिखवाया गया कि क्यों सुरक्षा नहीं चाहिए। मुझे तंग किया जाता रहा है उनके स्तर से। लेकिन ये भी एक दौर है, जो गुजर जाएगा।

सवाल: फिल्म ‘The Delhi Files’ में आज़ादी के बाद की घटनाएँ होंगी या आप मुगलों द्वारा किए गए नरसंहारों को भी छुएँगे?
नहीं, मैं सिर्फ आज़ाद भारत की घटनाएँ उठाऊँगा। उससे पहले तो हमारे हाथ में कुछ नहीं था, लेकिन भारत जब स्वतंत्र हुआ तो उसके बाद से तो हमारी सरकार है। भारतीय लोग ही तब से शासन चला रहे हैं। मैं तो उन लोगों को गुनहगार मानता हूँ, जिन्होंने भारत की सरकार आज़ाद भारत में चलाई। इसी के ऊपर ये फिल्म है। मेरी कहानी भारत के विभाजन से लेकर आज तक की है। विभाजन के समय का कत्लेआम भी बिलकुल रहेगा।

गृह मंत्रालय ने सस्पेंड किया 9 NGO का FCRA लाइसेंस, ईसाई-इस्लामी समूहों के अलावा पेगासस से भी जुड़े हैं तार

गैर लाभकारी संगठनों (NGO) की आड़ में चल रहे ईसाई और इस्लामी संगठनों पर सख्ती बरतते हुए गृह मंत्रालय ने अब तक इस साल में 9 और पिछले डेढ़ महीने में 6 संगठनों के विदेशी फंडिंग लाइसेंस को निलंबित कर दिया है। जानकारी के मुताबिक एफसीआरए के तहत अब सिर्फ 22,708 सक्रिय एनजीओ और अन्य संघ पंजीकृत हैं।

मालूम हो कि ये एनजीओ लंबे वक्त से फंड का दुरुपयोग करने के कारण जाँच के दायरे में थीं। इससे पहले 27 अगस्त को सुन्नी नेता शेख अबूबकर अहमद से जुड़े केरल के एक NGO, ‘मरकज़ुल इघासथिल कैरियाथिल हिंडिया’ का एफसीआरए लाइसेंस कैंसिल किया गया था। उन पर भी फंड के दुरुपयोग और 2019-20 में वार्षिक एफसीआरए रिटर्न के दौरान तथ्यों को गलत ढंग से पेश करने का आरोप था।

एनजीओ को 146 करोड़ रुपए विदेशों से मिले थे। 35 दानदाता थे जिनमें से 28 केवल यूएई से थे जबकि अन्य ओमान, तुर्की, और ब्रिटेन से थे। इस एनजीओ से पहले लखनऊ की अल हस एड्यूकेशन एंड वेल्फेयर ऑर्गेनाइजेशन पर गाज गिरी थी। फिर हरियाणा के मेवात ट्रस्ट एड्यूकेशनल वेल्फेयर का भी लाइसेंस 180 दिन के लिए सस्पेंड हुआ था।

ईसाई समूहों की बात करें तो ओडिशा की ‘पीपुल्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ एम्पॉवरमेंट ऑफ ट्राइबल एंड हेवनली ग्रेस मिनिस्ट्रीज’ और मदुरई की ‘रुश फाउंडेशन’ को निलंबन का सामना करना पड़ा था। इसके बाद बेंगलुरु स्थित ‘सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज’ और आंध्र प्रदेश से बाहर संचालित होने वाला मिशनरी संगठन ‘होली स्पिरिट मिनिस्ट्रीज’ शामिल है।

पेगासस से जुड़े है तार

बता दें कि गृह मंत्रालय द्वारा जिन एनजीओ के FCRA अप्रूवल निलंबित हुए हैं उनमें कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव नामक एनजीओ भी शामिल है। इसके FCRA अप्रूवल को इस साल जून में सस्पेंड किया गया था। ये सारी जानकारी टाइम्स ऑफ इंडिया में सोमवार को प्रकाशित हुई है। CHRI के अलावा मंत्रालय ने पूरे साल भर में 8 अन्य (कुल 9) NGO को अप्रूवल देने से मना किया है।

ज्ञात हो कि जिस CHRI के FCRA अप्रूवल को सस्पेंड किया गया था उसमें एक सदस्य मदन लोकुर भी हैं। लोकुर वहीं शख्स हैं जिन्हें बंगाल सरकार ने कथित पेगासस जासूसी मामले में जाँच के लिए गठित आयोग का नेतृत्व करने के लिए कहा था। मदन लोकुर सीएचआरआई की कार्यकारी समिति के सदस्य हैं। ये एक ऐसी संस्था है जिसे साल 2021 में अमेरिकी विदेश विभाग (अमेरिकी दूतावास), नई दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग, कनाडा के उच्चायोग से भारी योगदान मिला।

यूएस की ओर से इस संस्था को किए गए योगदान का उद्देश्य ‘भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में बंदियों के लिए वकालत और आउटरीच कार्यक्रम’ चलाना था। यूके के लिए ये ‘भारत में न्याय की गति पर शोध और विदेशी राष्ट्रीय बंदियों और अपराध के शिकार लोगों पर उनका प्रभाव’ जानने के लिए था। वहीं कनाडा के लिए योगदान “Reimbursement of Expenditure” के उद्देश्य से था। इनके अलावा, सीएचआरआई को केलिडोस्कोप डायवर्सिटी ट्रस्ट, फ्रेडरिक नौमैन स्टिफ्टंग-जर्मनी, द हैन्स सीडल फाउंडेशन और अन्य से भी योगदान मिला है।

एनजीओ के लिंक द वायर के फाउंडिंग एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन से भी हैं। इस समूह की एक पहल साउथ एशिया मीडिया डिफेंडर्स नेटवर्क (SAMDEN) भी है। इस SAMDEN के कोर मेंबर्स में बांग्लादेश के महफूज अनम, नेपाल के हिमाल की कनक मणि, सलिल त्रिपाठी, मृणाल पांडे, सिद्धार्थ वरदराजन,संजोय हजारिका, न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व पत्रकार, जॉन जुब्रजाइकी (सिडनी के पत्रकार) शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पेगासस मामले में जाँच के लिए 2 सदस्यीय आयोग गठित किया था। उस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर को सौंपी गई थी।