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हिंदुत्व… राष्ट्रवाद… मोपला नरसंहार… वकील जे साई दीपक ने लाइव डिबेट में शशि थरूर को कुछ यूँ धोया, 6 बिंदुओं में समझें

हाल ही में शशि थरूर और वकील जे साई दीपक के बीच थरूर की नई किताब, ‘द बैटल ऑफ बिलॉन्गिंग: ऑन नेशनलिज्म, पैट्रियटिज्म, एंड व्हाट इट मीन्स टू बी इंडियन’ की लॉन्चिंग के दौरान हुई चर्चा भारतीय इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डालती है। साई दीपक ने इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता की आलोचना करते हुए 6 महत्वपूर्ण बातें कही हैं।

हिंदुत्व शब्द किसने गढ़ा?

अक्सर हिंदू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का श्रेय हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर को दिया जाता है, लेकिन वकील साई दीपक का कहना है कि हिंदुत्व सावरकर द्वारा नहीं बनाया गया था, बल्कि उनके द्वारा इसे फैलाया गया था। हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1892 में चंद्रनाथ बसु ने किया था और बाद में इस शब्द को विनायक दामोदर सावरकर द्वारा लोकप्रिय बनाया गया।

उपनिवेशवाद की अवधारणा पर

साई दीपक के अनुसार, थरूर अपनी किताब में उपनिवेशवाद की अवधारणा को ठीक प्रकार से समझाने में चूक गए, जो उपनिवेशवाद के बाद के लोगों की अवधारणा है। वे अतीत में फिर से जाने की कोशिश कर रहे हैं। उसे फिर से नहीं बनाना, बल्कि अतीत के मूल्यों को एक स्वदेशी भविष्य का चार्ट बनाने के लिए वर्तमान की संस्थाओं में फिर से लिखना, जो एक एकीकृत दुनिया में संभव नहीं है। साईं दीपक के अनुसार, उनका विचार शायद उपनिवेशवाद के विरोध में स्वदेशी के अधिक से अधिक भाग के साथ एक बेहतर भविष्य बनाने का है। उन्होंने कहा, “यह विचार वर्तमान आंदोलन और इस समाज को जागृत करने के लिए उस व्यापक कैनवास के भीतर रखना है जिसे वैश्विक विद्वान डीकोलोनियलिटी (Decoloniality) के रूप में संदर्भित करते हैं।”

हिंदू-राष्ट्र की हिंदू-पाकिस्तान से तुलना पर

साई दीपक ने धार्मिक सभ्यता के महत्व के बारे में बात करते हुए कहा कि भारत का संविधान हमारी भूमि के लोगों की मूलभूत भावना को दर्शाता है, जिन्होंने बँटवारे के बाद भी कई कठिनाइयों के बावजूद अल्पसंख्यकों की रक्षा की और अपने पड़ोसियों की तुलना में बेहतर काम किया है। उन्होंने अपनी किताब में भारत को हिंदू-पाकिस्तान के रूप में ​बताने पर शशि थरूर की आलोचना की है। साई दीपक के अनुसार, धार्मिक सभ्यता या हिंदू राष्ट्र की हिंदू-पाकिस्तान से तुलना हमारे देश के लोगों का बहुत बड़ा अपमान होगा, क्योंकि बिना धर्मांतरण के विभिन्न धर्मों के लोगों के यहाँ सम्मान के साथ रहने की परंपरा रही है। यहाँ यह बताना जरूरी है कि हमारे पास यूरोप से निकली समकालीन संविधानवाद की अवधारणा नहीं थी, फिर भी भारत ने हमेशा उन लोगों का स्वागत किया है जो हमारे साथ रहने को तैयार हैं।

उपनिवेशवाद के फिल्टर पर

हिंदू सहिष्णुता पर शशि थरूर के दृष्टिकोण का खंडन करने के लिए साई दीपक ने अपनी पुस्तक में उपनिवेशवाद के फिल्टर का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि उपनिवेशवाद का यह फिल्टर सक्रिय रूप से हमारे देश के लोगों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गहरी नींद में डालकर अतीत के महत्वपूर्ण पहलुओं तक पहुँचने से रोकता है। वह शशि थरूर की कश्मीरी हिंदुओं पर ना बोलने, पश्चिम बंगाल में चुनाव के ​बाद हुई राजनीतिक हिंसा, असम में धर्म और पूर्वोत्तर में उग्रवाद की आलोचना करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि थरूर हमेशा से हिंदुओं को जाँच के दायरे में रखते आ रहे हैं। वे कहते हैं, “उपनिवेशवाद या औपनिवेशिक चेतना नामक एक फिल्टर है जो सक्रिय रूप से इस देश के अधिकांश लोगों को अपने अतीत के विशिष्ट पहलुओं तक पहुँचने पर रोकता है।”

राष्ट्रवाद के विचार पर

साई दीपक इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि राष्ट्रवाद का विचार किसी समुदाय के अनुभव से प्रकट नहीं होना चाहिए। भारतीय राष्ट्रवाद की तुलना यूरोपीय राष्ट्रवाद से नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि भारतीय राष्ट्रवाद औपनिवेशिक शोषण के वर्षों बाद यहाँ के लोगों के अनुभव और संघर्ष से पैदा हुआ है। इसलिए यह यूरोपीय राष्ट्रवाद से पूरी तरह से अलग है। राष्ट्रवाद पर वे कहते हैं कि इसे किसी भी समुदाय के सांस्कृतिक अनुभव और ऐतिहासिक अनुभव से अलग नहीं किया जाना चाहिए। यूरोपीय जो मूल रूप से एक उपनिवेशवादी हैं। इसलिए वह सावरकर या किसी और के राष्ट्रवाद के समान नहीं है। ये सभी उपनिवेशीकरण का शिकार हुए हैं।

मोपला नरसंहार पर

थरूर ने अंत में मोपला नरसंहार को क्लीन चिट देने का प्रयास किया, जब लोगों ने मालाबार हिंदू नरसंहार के बारे में उनके पहले के संदर्भ के बारे में पूछा गया, जिसमें उन्होंने मोपला नरसंहार को किसानों और जमींदारों के बीच संघर्ष की घटना, भौगोलिक कारकों और विभिन्न स्थितियों को जिम्मेदार ठहराया था। साई दीपक ने थरूर की दलीलों का जवाब देते हुए कहा, “आप कैसे तय करते हैं कि किसी घटना को सांप्रदायिक रंग देना है। इसे आप अपने अनुसार सांप्रदायिक रंग दें या नहीं, यह सिर्फ इस आधार पर नहीं है कि कौन मारा गया या कौन अपराधी थे, बल्कि यह सुनियोजित और टारगेट किए गए लोगों को मारने के इरादे से किया गया था।

पोर्न और रेप करवाने के आरोपों से घिरी हिरोइन हुईं न्यूड, कहा – ’20 लोगों के बीच कराया फोटोशूट, पेमेंट भी मिल गई’

पोर्न फिल्में बनाने और उन्हें प्रसारित करने के आरोपों से घिरीं ऐक्ट्रेस गहना वशिष्ठ ने एक बार फिर अपनी बोल्ड तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं। गहना वशिष्ठ इन तस्वीरों में टॉपलेस नजर आ रही हैं और उन्होंने इनके साथ एक लंबा नोट शेयर किया है। इस नोट के साथ गहना ने खुद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश की है। बता दें कि पोर्न केस में कुछ ऐक्ट्रेस ने गहना पर रेप करवाने का आरोप लगाया है।

गहना वशिष्ठ ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी दो टॉपलेस तस्वीर शेयर की है। गहना वशिष्ठ ने अपनी इन बोल्ड तस्वीरों को इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह की फोटोज शूट करते वक्त हम करीब 20 लोग थे। मेरा कोई यौन शोषण नहीं हुआ और न तो मैंने ड्रिंक किया था, न ही सेट्स पर जूस लिया था। मैं पूरे होश में थी। मैं सेट्स पर ऑटो में गई और दूसरे ऑटो में सुरक्षित आई। मुझे मेरा पेमेंट भी मिला। सबसे जरूरी बात मैं 18 साल से ऊपर हूँ और एक रेग्युलर आर्टिस्ट हूँ।” 

गहना ने खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए इस पोस्ट में आगे लिखा, “इसलिए प्लीज डेढ़ साल या उससे ज्यादा के बाद मेरे प्रड्यूसर्स पर धारा 370, 376 और 354 के तहत आरोप मत लगाना।” इसी पोस्ट में गहना वशिष्ठ ने आगे एक नोट भी लिखा है, “अगर आपमें से किसी को भी मेरी पोस्ट अपमानजनक लग रही है तो आप मुझे आसानी से ब्लॉक कर सकते हैं, क्योंकि यह मेरा वॉल है तो मुझे पूरा अधिकार है कि मैं यहाँ जो चाहूँ पोस्ट कर सकती हूँ। शुक्रिया।” 

गहना के इस पोस्ट पर लोग राज कुंद्रा का नाम लेकर कॉमेंट कर रहे हैं। एक यूजर ने गहना के फोटो पर कॉमेंट करते हुए लिखा, “राज कुंद्रा की शूटिंग चल रही है क्या?” वहीं दूसरे ने लिखा, “राज कुंद्रा से मिलने के बाद…”

एक अन्य यूजर ने गहना के पोस्ट पर कमेंट करते हुए लिखा, “तेरे प्रोड्यूसर पर किसी ने आरोप नहीं लगाया था। तेरे पर आरोप लगाया था और तू जेल गई थी। उनको बीच में मत ला झूठी।”

बता दें कि फरवरी महीने में कुछ मॉडल्स ने मुंबई पुलिस में गहना वशिष्ठ व अन्य पर आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्होंने जबरन पोर्न और अश्लील फिल्में शूट करवाई थीं। मॉडल्स ने गहना पर शूटिंग के सेट पर रेप करवाए जाने का भी आरोप लगाया था। इसके बाद गहना को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। फिलहाल वह जमानत पर हैं।

बाद में इस मामले की जाँच करते हुए मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने राज कुंद्रा को भी गिरफ्तार कर लिया था। राज कुंद्रा अभी जेल में हैं। बता दें कि गहना लगातार राज कुंद्रा को सपोर्ट कर रही हैं। इस केस की जाँच में पुलिस ने राज कुंद्रा के साथ ही गहना वशिष्ठ पर भी नए आरोप तय किए हैं। गहना ने अंतरिम जमानत के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका भी दाखिल की थी मगर इसे खारिज कर दिया गया। अब गहना के वकील सुप्रीम कोर्ट में जमानत की अर्जी लगाने पर विचार कर रहे हैं।

सभी धर्मों, उत्पीड़ितों और शरणार्थियों वाला स्वामी विवेकानंद का संदेश… अफगानिस्तान और US दोनों पर लागू

19वीं शताब्दी के महायोगी स्वामी विवेकानंद को आम जनमानस अनेकों कारणों से याद रखता है, जैसे- उनके ओजस्वी वक्तव्यों से, तेजस्वी चित्रों से, उनकी ‘विवेक वाणी’ से या फिर कठोपनिषद का यह मंत्र, जो उनके ध्येय वाक्य के तौर पर बोला जाता है- “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” अर्थात “उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”

इन सबके अतरिक्त अगर विवेकानंद की स्मृतियाँ लोगों के मन में किसी कारण से रहती हैं, तो वह है उनका 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शहर शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा के उद्घाटन सत्र में दिया हुआ भाषण, जिसकी शुरूआत उन्होंने ‘अमेरिकावासी बहनों तथा भाइयों’ से की थी और सामने बैठे हुए सम्पूर्ण विश्व से आए हुए लगभग 7 हजार लोगों ने ढाई मिनट से ज्यादा समय तक तालियाँ बजाई थीं।

यह दिनांक साक्षी बना था, भारत से आए हुए एक गुमनाम युवा हिन्दू संन्यासी विवेकानंद के विश्व विजयी स्वामी विवेकानंद बनने का। जिन स्वामी विवेकानंद ने पिछले 5 वर्ष से भर पेट भोजन नहीं किया था, जिनको यह नहीं पता था कि अगली रात उनका निवास कहाँ होगा, जो वर्षों तक भारत की मिट्टी को ही बिस्तर और आसमान को चादर समझकर ओढ़ते आए थे, जिनको अमेरिका में पिछले 3 महीने से मात्र भूख और ठंड ही नहीं बल्कि रंग भेद के कारण अनेकों वार और प्रहारों का भी सामना करना पड़ा था, वह स्वामी विवेकानंद 11 सितम्बर 1893 को विश्व प्रसिद्ध हो गए थे।

अमेरिका के विभिन्न प्रांतों में उनके बड़े-बड़े पोस्टर लगने लगे थे, अखबार उनकी तारीफों से भरे हुए थे। वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने पश्चिम जगत के सामने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और दर्शन को प्रस्तुत किया था। वह स्वामी विवेकानंद ही थे, जिन्होंने प्राचीनकालीन योग दर्शन को पश्चिम के सामने रखा और विश्व प्रसिद्धि दिलाई थी।

11 सितम्बर, 1893 तो 17 दिनों (11 से 27 सितम्बर, 1893) तक चलने वाले विश्व धर्म महासभा का प्रथम दिवस था, जहाँ विवेकानंद ने स्वागत का उत्तर देते हुए ही सबका हृदय जीत लिया था। विवेकानंद ने पहली बार विश्व के सामने पंथ, सम्प्रदाय, जाति, रंग, प्रान्त जैसे संकीर्ण और संकुचित बंधुत्व से भिन्न एक नवीन बंधुत्व ‘विश्व बंधुत्व’ का सन्देश दिया था, जो सनातन धर्म के ग्रंथों का सार है।

स्वामी विवेकानंद अपने भाषण में कहते है, “मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।”

जहाँ एक तरफ दुनिया भर से आए हुए यहूदी, इस्लाम, बौद्ध, ताओ कनफ्यूशियम, शिन्तो, पारसी, कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट इत्यादि धर्मों के अनेकों प्रतिनिधि अपने धर्म को श्रेष्ठ स्थापित करने के लिए यहाँ आए थे, वहीं दूसरी तरफ विवेकानंद के सबको स्वीकार करने वाले संदेश ने वहाँ उपस्थित सभी मनुष्यों को चिंतन में डाल दिया था।

विवेकानंद आगे कहते हैं, “मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूँ जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण दी। मुझे आपको यह बताते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत में आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है।”

इस ऐतिहासिक भाषण के अतिरिक्त विश्व धर्म महासभा में स्वामी विवेकानंद ने पाँच और व्याख्यान दिए थे, जिसमें 19 सितम्बर को ‘हिन्दू धर्म पर निबंध’ शीर्षक व्याख्यान भी अत्यंत चर्चित रहा था। उनको सुनने के लिए लोग घंटों पहले आकर सभागार में बैठ जाते थे।  

128 वर्ष बाद भी क्यों प्रासंगिक है विवेकानंद का भाषण 

जब कोई अभिभावक अपने बच्चे को बाल्यकाल में मोबाइल फोन पर झूठ बोलने को कहता है कि वह घर पर नहीं है, तब उसको यह आभास नहीं होता कि आने वाले समय में यही बच्चा जब युवावस्था में आएगा तो सबसे पहले अपने माता-पिता को ही मोबाइल से लेकर प्रतक्ष्य तौर पर झूठ बोलेगा, जो कि तब उनको ठेस पहुँचाएगा। लेकिन उनको भूलना नहीं चाहिए कि बीज तो उन्होंने ही डाला था कुछ वर्षों पहले।

इसी प्रकार जब महाभारतकालीन गांधार, जो आज का अफगानिस्तान है, वहाँ वर्षों से अपना जीवनयापन कर रहे हिन्दू ,बौद्ध और अन्य पंथो पर मुस्लिम आक्रांताओं ने प्रहार करना शुरू किया तो अन्य मुस्लिमों को लगा था कि यह तो मुस्लिमों और अन्य पंथो के बीच की लड़ाई है। इसमें वह सब सुरक्षित हैं।

हिन्दुओं को चुन-चुन कर मारा जाने लगा। उनकी जनसंख्या, जो कि कभी बहुसंख्या में थी, उसका प्रतिशत धीरे-धीरे हजार में आ पहुँचा। क्रूरता, हैवानियत और बर्बरता को उद्धरण के माध्यम से समझाना मुश्किल है लेकिन 1970 में इतने वर्षों की पीड़ा, दुःख, वेदना, संकट, कष्ट, यातना सहकर भी जो 7 लाख हिन्दू और सिख जनसंख्या वहाँ बची थी, वह आज 7 हजार के आँकड़े तक भी नहीं पहुँच पाएगी।

इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि गैर-मुस्लिम के लिए वहाँ कैसी स्थिति होगी। गैर-मुस्लिम जनसंख्या तो खत्म होने की कागार पर खड़ी है, लेकिन क्रूरता रुकी नहीं। पहले जो मुस्लिम गैर-मुस्लिम के प्रति घृणा रखता था, आज वह अपने साथी मुस्लिम के प्रति रखता है। इसका मूल कारण है कि अपने से अलग मत और पंथ को स्वीकार्यता नहीं है और उसके प्रति सिर्फ घृणा का भाव है।

आज एक मुस्लिम दूसरे मुस्लिम को ही मार रहा है। इसीलिए हमको यह समझना होगा कि वर्षों पहले जो नफ़रत और घृणा का बीज बोया था गैर-मुसलमानों के खिलाफ, आज वह बीज रोपने वालों को भी खोखला कर रहा है। जिसने उस समय आवाज़ नहीं उठाई उस अन्याय के खिलाफ, आज उसे भी उसका नुकसान झेलना पड़ रहा है।

मानवता खत्म हो गई है, एक दूसरे को स्वीकार करना तो दूर की बात, सहन करने का भी भाव खत्म हो गया है। आज हमें विवेकानंद के 128 वर्ष पूर्व दिए हुए उस संदेश को याद करने की आवश्यकता है, जो संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा देता है।

‘लानत है’ – तैमूर के साथ सैफ अली खान ने जोड़े गणपति बप्पा के सामने हाथ, करीना के पोस्ट पर काफिर, तालिबान… जैसे शब्द

बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर खान ने शुक्रवार (10 सितंबर) को गणेश चतुर्थी के मौके पर पति सैफ अली खान व बेटे तैमूर अली खान के साथ पूजा करते हुए कुछ तस्वीरें इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं। इस पोस्ट पर उन्हें खूब ट्रोल किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स उन्हें काफिर कह रहे हैं। वहीं, कुछ यूजर्स उनकी पोस्ट पर ‘लानत है ऐसे मुसलमानों पर’ लिख रहे हैं।

दरअसल, गणेश चतुर्थी पर करीना ने अपने इंस्टाग्राम पर दो तस्वीरें पोस्ट की। पहली तस्वीर में सैफ और तैमूर गणपति बप्पा की मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़े नजर आ रहे हैं। फोटो में करीना तैमूर को गणेश भगवान के सामने हाथ जोड़ना सिखा रही हैं। दूसरी तस्वीर तैमूर द्वारा चिकनी मिट्टी से बनाए गए भगवान गणेश की है। एक्ट्रेस ने तस्वीरों को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, ”मैं अपने जीवन के सबसे खास लोगों के साथ गणेश चतुर्थी सेलिब्रेट कर रही हूँ और टिम टिम के क्ले के छोटे से गणपति बेहद क्यूट हैं। हैप्पी गणेश चतुर्थी।”

सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों को शेयर करते ही करीना और उनका परिवार को ट्रोलर्स के निशाने पर आ गए। मोहम्मद अफताब आलम नाम के यूजर ने लिखा, ”लानत है, उस बच्चे का कोई कसूर नहीं है, उसे तो जैसी तालीम देंगे वो वैसा ही करेगा। लेकिन सैफ पर लानत है अल्लाह इन्हें हिदायत अता फरमाए आमीन सुम्मा आमीन।” इस पर रिप्लाई देते हुए एक यूजर ने लिखा, “उसको अच्छा तालीम देकर तालिबान बना देना चाहिए?”

वहीं, एक अन्य यूजर ने लिखा, ”सलमान खान के बारे में और शाहरुख के बारे में कुछ नहीं बोलते आप भाईजान? उनके घर में भी तो गणेश जी की पूजा होती है। पूरा घर कई धर्मों के लोगों से भरा हुआ है। आप बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं तो उनको फॉलो ना करें, अल्लाह पर छोड़ दें। जियो और जीने दो।”

हालाँकि, इस दौरान कई सोशल मीडिया यूजर्स ऐसे भी थे, जो करीना और उनके परिवार का बचाव करने उतरे। एक यूजर ने लिखा, ”वाह! लानत लानत, केजरू तुमको मस्जिद में सेक्युलर लगता है और तैमूर मंदिर में तो लानत।”

एक ने लिखा, ”मुझे कभी नहीं पता था कि ‘लानत’ को इतने तरीकों से लिखा जा सकता है। बता दें कि इससे पहले करीना कपूर खान को सोशल मीडिया यूजर्स ने सीता का किरदार निभाने के लिए 12 करोड़ रुपए माँगने पर जमकर ट्रोल किया था। उन्होंने कहा था कि तैमूर की अम्मी माँ सीता के रोल के लायक नहीं हैं।

‘जमानत के लिए आवेदन नहीं करूँगा, सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे’ कहने वाले कॉन्ग्रेसी CM के पिता को 3 दिन में बेल

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल को गिरफ्तारी के तीन दिन बाद जमानत मिल गई। शुक्रवार (सितंबर 10, 2021) को सिविल जज जनक कुमार हिड़को की कोर्ट में उनके वकील गजेंद्र सोनकर ने जमानत याचिका लगाई थी। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। वे अब 21 सितंबर को कोर्ट में पेश होंगे।

बता दें कि नंदकुमार बघेल ने 30 अगस्त को लखनऊ में ब्राह्मण समाज को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। इसके बाद रायपुर सर्व ब्राह्मण समाज के पदाधिकारियों ने चार सितंबर को डीडीनगर थाने में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। 7 सिंतबर को रायपुर पुलिस (Police) ने उन्हें गिरफ्तार कर नीचली अदालत में पेश किया था, जहाँ उन्होंने जमानत के लिए आवेदन करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें 15 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल दिया गया था।

नंद कुमार बघेल ने कहा था कि वह जमानत याचिका प्रस्तुत नहीं करेंगे। वह इस मामले की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे। बाद में, उनके वकील सोनकर ने जमानत याचिका दायर की और तत्काल सुनवाई की माँग की। अब उनको जमानत मिल गई है।

बता दें कि केस दर्ज होने व गिरफ्तारी से पहले राजधानी रायपुर समेत छत्तीसगढ़ के अलग-अलग शहरों में नदंकुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया था। इसके बाद रायपुर के डीडी नगर थाने में एक लिखित शिकायत के बाद नंद कुमार बघेल पर भारतीय दंड संहिता की धारा- 153ए और धारा-505(1)(बी) के तहत केस दर्ज किया गया।

रायपुर के एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि दी गई लिखित शिकायत में संगठन ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री के पिता ने ब्राह्मणों को विदेशी बताकर लोगों से उनका बहिष्कार करने की अपील की थी। उन्होंने कथित तौर पर लोगों से ब्राह्मणों को गाँव में घुसने नहीं देने का भी आह्वान किया था।

नंद कुमार बघेल पर भगवान राम के बारे में भी कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है। पुलिस अधिकारी ने बताया कि संगठन ने अपनी शिकायत में कहा कि मुख्यमंत्री के पिता की कथित टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नंद कुमार बघेल ने ब्राह्मण समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा था, “वोट हमारा, राज तुम्हारा नहीं चलेगा। हम ब्राह्मणों को गंगा से वोल्गा (रूस की एक नदी) भेजेंगे, क्योंकि वे परदेशी हैं। जिस तरह से अंग्रेज लोग आए और चले गए। उसी तरह से ये ब्राह्मण लोग या तो सुधर जाएँ या गंगा से वोल्गा जाने के लिए तैयार हों।”

इस पर विवाद गहराने के बाद मुख्यमंत्री बघेल ने पल्ला झाड़ते हुए कहा था कि वे पिता के रूप में उनका पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन माहौल बिगाड़ने वाले लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि नंद कुमार बघेल की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हुई थी, जिसमें वह पुलिस थाने में आराम से खाना खाते हुए दिखाई रहे थे। तस्वीर में देखा जा सकता था कि उनकी थाली इंस्पेक्टर की टेबल पर लगाई गई थी।

नेटिजन्स ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले के साथ पुलिस थाने में ऐसा व्यवहार करने से बेहद आक्रोशित नजर आए। वायरल तस्वीर पर सोशल मीडिया यूजर्स ने तरह-तरह का कमेंट्स किया था।

कंचन श्रीवास्तव नाम की यूजर ने इस फोटो को शेयर करते हुए लिखा था, ”भूपेश बघेल के पिता ने कथित तौर पर ब्राह्मणों के बारे में अनाप-शनाप बयान दिया था। आज उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया। थाने में अभूतपूर्व स्वागत।”

एक यूजर ने वायरल फोटो पर कमेंट किया, “इस तरह गिरफ़्तार मुझे भी करवा दो, आलीशान महल में 15 साल के लिए बंद कर दो, मैं मना नहीं करूँगी।”

दिलीप निराला नाम के यूजर ने लिखा, ”ब्राह्मणों को गाली देने के आरोप में छत्तीसगढ़ के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नन्द कुमार बघेल पुलिस की गिरफ्त में। अंग्रेजों ने भी लेहरू जी को ऐसी ही जेल में डाला था।”

एक अन्य यूजर ने लिखा,” अगर ऐसे अरेस्ट होते हैं, तो इससे ना होना ज्यादा बेहतर है।”

तालिबान 2.0: पाकिस्तान की कठपुतली या वो खुद शिकार, जिनके लिए हैं दफ्तरों में काम करने वाली औरतें ‘वेश्या’

पाकिस्तान और कुछ हद तक चीन को छोड़कर किसी भी अन्य देश ने अंतरिम अफगानिस्तान सरकार को लेकर संतोष नहीं जताया है। पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी की आईएसआई के प्रमुख जनरल फैज़ हामिद तो सरकार बनवाने के लिए काबुल में बैठे ही थे, चीन ने भी अफ़ग़ानिस्तान को 3.1 करोड़ डॉलर की फौरी मदद देने की घोषणा की है। 

हालाँकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी ब्रिक्स देशों के दिल्ली घोषणापत्र पर दस्तखत किए हैं। भारत की अध्यक्षता में गुरुवार (सितंबर 9, 2021) को हुए ऑनलाइन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की गई। इसमें तालिबान का नाम लिए बगैर ये भी कहा गया कि ये सुनिश्चित करना चाहिए कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल दूसरे देशों में आतंक और उग्रवाद फ़ैलाने के लिए न हो। 

अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी ईरान ने तो सबसे कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने पंजशीर घाटी में तालिबान द्वारा नॉर्दन अलायंस को कुचलने की कोशिशों में बाहरी ताकतों यानि पाकिस्तान की भूमिका की कड़ी निंदा की है। उसने ये भी कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव होने चाहिए ताकि वहाँ एक वास्तविक प्रतिनिधित्व वाली सरकार बने।

मौजूदा तालिबान सरकार में पख्तूनों और तालिबान का वर्चस्व है। अफगानिस्तान के अन्य वर्गों जैसे ताजिक और उज़बेकों की इसमें अनदेखी की गई है। शिया सम्प्रदाय को मानने वाले हज़ाराओं को तो प्रतिनिधित्व तक नहीं मिला है। तालिबान और महिला अधिकारों का साँप-छछूँदर का रिश्ता है सो किसी महिला को मंत्रिमंडल में जगह न मिलना तो तकरीबन तयशुदा ही था।

यूँ भी तालिबान के प्रवक्ता जेकरुल्ला हाशिमी ने कहा है कि औरतों का मंत्रिमंडल में क्या काम? उन्होने कहा कि औरतों का असल काम बच्चे पैदा करना है। गुरुवार को काबुल स्थित टोलो न्यूज़ में प्रसारित इस इंटरव्यू में हाशिमी ने कहा कि औरतों को बस ज़्यादा से ज़्यादा अफगानी बच्चे पैदा करने के काम में लगना चाहिए न कि मंत्रिमंडल पद जैसी जिम्मेदारी लेना चाहिए, जिसे वो निभा नहीं सकतीं।

हाशिमी ने अपने इंटरव्यू में कहा, “पिछले 20 साल के दौरान आपके इस मीडिया, अमेरिका और उसकी कठपुतली सरकार ने जो कहा, जो औरतें दफ्तरों में काम करतीं थीं वो वेश्यावृत्ति नहीं तो और क्या है।”

टोलो न्यूज़ के एंकर ने इस पर उन्हें टोका कि वे सभी अफगानी औरतों को वेश्या कैसे कह सकते हैं। इसका मतलब क्या है? क्या घर से बाहर काम करने वाली सभी औरतें वेश्या होती हैं। तालिबान और भारत में उनके पक्ष में बोलने वालों को इसका उत्तर देना चाहिए। इस साक्षात्कार के हिस्से इस ट्वीट में देखे जा सकते हैं।

ये सोच निकलती है इस्लाम की घोर कट्टरपंथी व्याख्या से, जो हक्कानी नेटवर्क जैसे कई तालिबानी मानते हैं। नई अफ़ग़ान सरकार में हक्कानी नेटवर्क को ज़रुरत से ज़्यादा जगह मिली है। हक्कानी यानि पाकिस्तान परस्त इस्लामिक कट्टरपंथी गुट जिसे आईएसआई ने लगातार आतंक के लिए पाला पोसा है।

चार हक्कानियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मालूम हो कि अफ़ग़ानिस्तान के नए गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक़्क़ानी संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हैं। उनके सिर पर एक करोड़ डॉलर का इनाम है। इसी तरह मंत्रिमंडल में शामिल उनके चाचा खलीउर्रहमान हक्कानी के तार अल कायदा से जुड़े रहे हैं।

वे भी घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी है। मंत्रिमंडल में शामिल दो अन्य हक्कानी हैं- नजीबुल्ला हक्कानी और शेख अब्दुल बकी हक्कानी। नजीबुल्ला संयुक्त राष्ट्र द्वारा तो अब्दुल बकी यूरोपीय संघ द्वारा नामित आतंकी हैं।

अब तक अंतरराष्ट्रीय जनमत के सामने एक नया मुखौटा पहन कर आने वाले तालिबान ने अपने असली तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। आम माफ़ी के घोषणा के बावजूद आत्मसमर्पण करने वाले अफ़ग़ान सेनाकर्मियों को क़त्ल किए जाने की खबरें हैं।

खोर प्रान्त के फ़िरोज़कोह इलाके में एक गर्भवती महिला पुलिसकर्मी को उसके बच्चों के सामने ही बर्बरता के साथ मार डाला गया है। मारने से पहले उसके परिवार के सामने ही उसके चेहरे और शरीर को क्षत-विक्षत किया गया। बताया जाता है कि निगारा नाम की इस पुलिसकर्मी को आठ महीने का गर्भ था। 

इस हफ्ते काबुल में होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचल दिया गया है। इन प्रदर्शनों को कवर करने गए कई पत्रकारों को गिरफ्तार कर तालिबान ने क्रूर यातनाएँ दी हैं। इत्तिलातेरोज़ नामक स्थानीय अफगानी अखबार के कर्मियों और संपादक को कोड़े मारे गए हैं। खबर है कि रॉयटर के प्रतिनिधि एवं अन्य पत्रकारों की भी कवरेज करने के कारण पिटाई की गई है।

कुल मिला कर अफ़ग़ानिस्तान को एक नई तालिबानी सरकार नहीं मिली, बल्कि 20 साल पहले के तालिबान अपने दुर्दांत रूप में फिर से काबुल में काबिज़ हो गए हैं। तालिबान की इस नई पारी का कोच पाकिस्तान है, जो नहीं चाहता कि अफ़ग़ानिस्तान कट्टरवाद और इस्लामिक धर्मान्धता की अँधेरी खाई से बाहर निकले।

अफ़ग़ानिस्तान में ‘नियंत्रित अस्थिरता’ और कट्टरवाद पाकिस्तान की नीति का हिस्सा है। उसे लगता है कि इससे वह भारत और मध्य एशिया में अपने हितों को साध लेगा। लेकिन इसमें एक ही अड़चन है वो है कि ये इंटरनेट के ज़माने का अफ़ग़ानिस्तान है। काबुल एवं अन्य अफगानी शहरों में हो रहे प्रदर्शन इसका एक नमूना भर है। यूँ भी आतंक, धर्मान्धता और ‘नियंत्रित अस्थिरता’ एक ऐसे शेर की सवारी है जो संतुलन खोने पर सवार को ही खा जाता है।

तालिबान और पाकिस्तान एक ऐसे बबंडर की ओर बढ़ रहे हैं जो उनसे सँभाले नहीं सँभलेगा। तालिबान में हक्कानियों के दबदबे के बाद मध्य एशिया में कट्टरवाद और भारत में इस्लामी आतंकवाद बढ़ने की गंभीर आशंका हैं। इस सबके बीच भारत को सक्रियतापूर्ण धैर्य और सतर्कता की आवश्यकता है। लेकिन असली संकट में अफ़ग़ान जनता है क्योंकि अमेरिका ने उसे तकरीबन तश्तरी में रखकर हैवानों के सामने परोस दिया है।

दुनिया इन आसन्न संकटों से बेखबर नहीं है। इसीलिए ब्रिटेन की गुप्तचर संस्था एमआई 6 के प्रमुख, अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआईए के प्रमुख और रूस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस हफ्ते नई दिल्ली में थे। रूस और अमरीका इस मामले पर अलग-अलग राय रखने के बावजूद भारत के महत्व को समझते हैं। सब देख चुके हैं कि कट्टरपंथी इस्लाम से प्रेरित आतंकवाद की आग से कोई भी अछूता नहीं रहता।

जनेऊधारी ब्राह्मण, दत्तात्रेय गोत्र, अब कश्मीरी पंडित! लोगों ने लगाई राहुल की क्लास, पूछा- ‘जब कश्मीर से भगाए गए थे, तब कहाँ थी कॉन्ग्रेस?’

दो दिवसीय दौरे पर जम्मू पहुँचे कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी ने शुक्रवार (सितंबर 10, 2021) को कहा कि जब वे जम्मू-कश्मीर आते हैं तो उन्हें लगता है कि वो अपने घर आ गए हैं। उन्होंने कहा कि उनके परिवार का जम्मू-कश्मीर से पुराना रिश्ता है। 

इस सरकार ने जम्मू-कश्मीर के भाईचारे पर किया आक्रमण

राहुल गाँधी ने कहा, “मैं एक महीने में दो बार जम्मू-कश्मीर आया हूँ और जल्द ही लद्दाख भी जाना चाहता हूँ। मैंने श्रीनगर में कहा था कि जम्मू-कश्मीर में आते ही मुझे लगता है कि मैं घर आया हूँ। ये प्रदेश (यूटी) पहले राज्य था, इसका मेरे परिवार से पुराना रिश्ता है। यहाँ आकार मुझे बहुत खुशी होती है। लेकिन दुख इस बात का है कि जो आपकी संस्कृति है, उसे भाजपा और आरएसएस तोड़ने का काम कर रही है। इस सरकार ने जम्मू-कश्मीर के भाईचारे पर आक्रमण किया है।”

घट गई है लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की ताकत

राहुल गाँधी ने कहा कि माता वैष्णो देवी के धाम में दुर्गा जी, लक्ष्मी जी और सरस्वती जी विराजमान हैं। दुर्गा वो शक्ति हैं जो रक्षा करती हैं। लक्ष्मी जी लक्ष्य को पूरा करती हैं और सरस्वती जी ज्ञान देती हैं। ये तीनों शक्तियाँ जब घर और देश में होती हैं तो तरक्की होती है। जीएसटी, नोटबंदी और किसानों के लिए लाए गए कानूनों से भारत में माता लक्ष्मी की शक्ति घटी है। हिंदुस्तान के हर संस्थान में आरएसएस के लोग बैठाए गए हैं, जिससे माता सरस्वती की शक्ति घटी है। 

मैं और मेरा परिवार कश्मीरी पंडित, अपने भाइयों की हम मदद करेंगे

राहुल गाँधी ने कहा, “आज मैंने अपने कश्मीरी पंडित भाइयों से बात की। उन्होंने बताया कि भाजपा ने हम लोगों से केवल छलावा किया है। मैं अपने कश्मीरी पंडित भाइयों को विश्वास दिलाता हूँ कि हम आपकी मदद करेंगे। मैं भी कश्मीरी पंडित हूँ, मेरा परिवार भी कश्मीरी पंडित है।”

राहुल गाँधी के इस संबोधन के बाद सोशल मीडिया पर लोग उनकी जमकर क्लास ले रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं। लोग सवाल कर रहे हैं इससे पहले यही कॉन्ग्रेस और कभी खुद राहुल गाँधी ने जोर देकर अपनी पहचान ‘जनेऊधारी ब्राह्मण’, तो कभी ‘दत्तात्रेय गोत्र वाले ब्राह्मण’ बताई थी लेकिन अब ‘कश्मीरी पंडित’ पर जोर है।

सोशल मीडिया यूजर अमर्त्य भारद्वाज ने ट्वीट करते हुए पूछा, “जब कश्मीरी पंडित भगाए गए थे, तब कहाँ थी कॉन्ग्रेस।”

रवींद्र कुमार गुप्ता ने लिखा, “1990 के बाद से जब सत्ता में थे, तब कश्मीरी ब्राम्हण कभी याद नहीं आए। “घड़ियाली आँसू”

विपिन प्रधान लिखते हैं, “जब कश्मीरी पंडित अपने घर से बेघर हुए उनका कत्लेआम हो रहा था लाखों की तादाद में घर छोड़ कर भागे थे। तब कहाँ थे ये महाशय। ये तो एयर कंडीशन घर में बैठे सत्ता का सुख भोग रहे थे। ये महाशय बहुत दोगले और सत्ता के भूखे हैं। देश के जनता को अब मगरमच्छ के आँसू से नही बहका सकते।”

एक यूजर ने लिखा, “नौटंकी बंद करिए ..कश्मीरी पंडितों की इस दुर्दशा के ज़िम्मेदार भी आपका परिवार/पार्टी है।”

निर्भय सिंह ने सवाल दागते हुए पूछा, “%&ये जब 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों को भगाया जा रहा था तब पप्पू की अम्मी और अब्बू क्या कर रहे थे?”

गौरव गुप्ता ने लिखा, “अरे कुछ तो शर्म कर दोगले इंसान, तुम्हारी सरकार के राज़ मे कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ना पड़ा! महिलाओं और लड़कियों के साथ क्या हुआ वो सब जानते है! अगर तुम कहते हो तुम कश्मीर पंडित हो तो बताओ, 1990 मे कहाँ थे तुम?”

आशीष कुमार शर्मा लिखते हैं, “परिवर्तन की लहर तो है, अभी तक जो महबूबा मुफ्ती, फारूख अब्दुल्ला, जिलानी से मिलते थे अब कश्मीरी पंडितों से मिलने लगे। मोदी जी सही जा रहे हो।”

आशु चौहान ने लिखा, “अरे वाह! कश्मीरी पंडितों को नरसंहार कराकर उनका बलात धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें कश्मीर से बेघर करके अब उनका हमदर्द बन रहे हो.. बेशर्मी की भी हद पार कर दी पप्पू ने तो..”

अखिलेश कुमार ने लिखा, “जिसका खून में ही मिलावट हो वो क्या पंडितो को सहयोग करेगा।”

बता दें कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद राहुल का जम्मू संभाग का यह पहला दौरा है। पिछले एक महीने में जम्मू-कश्मीर के दौरे पर वे दूसरी बार आए हैं। इससे पहले वे नौ व 10 अगस्त को श्रीनगर आए थे, जहाँ उन्होंने पार्टी कार्यालय का उद्घाटन किया था। इससे पहले उन्होंने गुरुवार (सितंबर 9, 2021) को माँ वैष्णो देवी के दरबार में हाजिरी लगाई थी। जिस पर भड़कते हुए लोगों ने कहा था, “पहले जो सिर्फ मस्जिद-मजारों पर ही नजर आते थे उन्हें अब हर चुनाव से पहले हिंदूओं को रिझाने के लिए मंदिर-मंदिर घूमना पड़ रहा है। मोदी है तो मुमकिन है।”

‘हिंदू धर्म खत्म कर देंगे, सबको मार देंगे’: राजनीति से प्रेरित थी बंगाल हिंसा, CBI के 34 FIR में से कई में ‘TMC गुंडों’ के नाम

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की जाँच के सिलसिले में अब तक 34 प्राथमिकी दर्ज की हैं। सीबीआई की वेबसाइट पर अपलोड की गई प्राथमिकी के अनुसार, केंद्रीय एजेंसी को इनमें से कम से कम दस एफआईआर में ये स्पष्ट हो गया था कि विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जीत के बाद हुई चुनाव के बाद की हिंसा राजनीति से प्रेरित थी। इसके अलावा, इन 10 एफआईआर में कम से कम 8 में राज्य के सत्तारूढ़ दल के सदस्यों के अपराधियों के नाम का उल्लेख है।

बीजेपी कार्यकर्ताओं पर टीएमसी के गुंडों ने किया हमला

सीबीआई की वेबसाइट पर अपलोड एक एफआईआर 25 अगस्त 2021 की है। इसका नंबर RC0562021S0005 है। अयान मंडल की ओर से की गई इस शिकायत में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि 14 अगस्त 2021 को दोपहर के करीब 3 बजे टीएमसी के 8 गुंडे उन्हें और उनके भाई को खींचकर एक मुस्लिम बहुल इलाके में ले गए और लाठी तथा लोहे की रॉड से पिटाई की। इस मामले में अबुल शेख, आलमगीर शेख, उज्जवल घोष और अन्य को आरोपित बनाया गया है। ये सभी नदिया के चापरा स्थित हृदयपुर के निवासी हैं। पीड़ित ने कहा है कि उन्हें बीजेपी समर्थक होने की वजह से निशाना बनाया गया।

साभार: cbi.gov.in
साभार: cbi.gov.in

टीएमसी ज्वाइन करो, नहीं तो जिंदगी नरक कर देंगे

बंदना खेत्रपाल की ओर से 25 अगस्त 2021 को शिकायत दर्ज कराई गई थी। इस संबंध में दर्ज एफआईआर की संख्या RC0562021S0004 है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे बीजेपी से जुड़े होने की वजह से उनके बेटे की हत्या की गई। बंदना ने कहा है, “मेरा बेटा कुश खेत्रपाल बीजेपी कार्यकर्ता था। कनन खेत्रपाल, मोतीलाल खेत्रपाल, एसएल कुमार खेत्रपाल, दिलीप खेत्रपाल ने कई बार मेरे बेटे को टीएमसी के लिए काम करने कहा। उन्होंने कहा था कि BJP के लिए काम किया तो जिंदगी नरक कर देंगे।” चुनाव में टीएमसी की जीत के बाद 6 मई को उनके बेटे को वे लोग जबरन अपने साथ ले गए और 8 मई को उसका शव मिला। एफआईआर के मुताबिक शरीर पर चोट के कई निशान थे।

टीएमसी के गुंडों ने हिंदू धर्म को खत्म करने की धमकी दी: मृतक की माँ

एक अन्य शिकायत टुंपा मांझी ने की है, जिसकी प्राथमिकी संख्या RC0562021S0012 है। इसके मुताबिक, 26 अगस्त 2021 को टीएमसी के पाँच गुंडों ने (सभी नाम प्राथमिकी में दर्ज हैं) ने पहले से बने प्लान के तहत लोहे की छड़, हथियार, बम से उनके घर पर हमला किया। तोड़फोड़ के बाद उसके 22 साल के बेटे का अपहरण कर लिया। टुंपा मांझी के बेटे को बेरहमी से पीटा। खून से लथपथ बलराम मांझी जमीन पर गिर पड़े, लेकिन आरोपित उन पर हमला करते रहे।

बाद में जब आरोपितों को पुलिस के आने की खबर मिली तो वे वहाँ से फरार हो गए। टुंपा मांझी ने आरोप लगाया, “उन्होंने हमें धमकी दी कि वे हमारा हिंदू धर्म खत्म कर देंगे और भाग गए।” टुंपा माझी ने कहा कि हमें देर रात गाँव से बाहर नहीं निकलने दिया गया। मेरे घायल बेटे को उसी दिन बर्दवान के बिम्स अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ रात करीब 10 बजे उसकी मौत हो गई। पीड़ित की माँ ने टीएमसी के गुंडों पर 10 लाख रुपए का नुकसान करने का भी आरोप लगाया है।

पति नहीं मिला तो टीएमसी के गुंडों ने पत्नी की ही हत्या कर दी

सीबीआई द्वारा 27 अगस्त 2021 को दर्ज की गई एफआईआर संख्या RC0562021S0017 में शिकायतकर्ता ममोनी खेत्रपाल ने बताया है कि टीएमसी के गुंडे उनके पड़ोसी अनिल खेत्रपाल और उसके बेटे को 3 मई को ढूँढने आए थे। जब उन्हें वहाँ बाप-बेटे नहीं मिले तो गुंडों ने अनिल की पत्नी पर बेरहमी से धारदार हथियार से हमला कर दिया। पीड़िता को पश्चिम बंगाल के बर्धमान के जमालपुर अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया।

शिकायतकर्ता फगल मंडी द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी के अनुसार, उनके भाई की हत्या 5 मई 2021 को एक पार्टी विशेष के प्रति राजनीतिक झुकाव के कारण कर दी गई थी।

हत्या के बाद अंडकोष को भी मसल दिया गुंडों ने

एक एफआईआर दिनेश कीर्तनिया की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई है। उनके 31 वर्षीय भाई दिलीप कीर्तनिया की 17 अप्रैल की रात हत्या कर दी गई थी। दीनानाथ ने बताया है कि उनके परिवार का लंबे समय से बीजेपी से जुड़ाव रहा है। दिलीप पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनके परिवार को बीजेपी के लिए काम नहीं करने की धमकी दी गई थी।

एफआईआर में कहा गया है, “17 अप्रैल को दिलीप बीजेपी के बूथ कैंप ऑफिस में काम कर रहे थे। इसी दौरान दोपहर के करीब 2:30 बजे उनलोगों ने उन्हें फिर धमकी दी। उनसे कहा- तू अब भी BJP के लिए काम कर रहा है, आज तुझे मार डालेंगे।” दीनानाथ ने अपनी शिकायत में कहा है कि पार्टी ऑफिस से काम निपटाने के बाद दिलीप घर लौट आए। खाना खाया। टीवी देखा और फिर सो गए। रात के करीब एक बजे वे पेशाब के लिए घर से बाहर निकले और इसी दौरान उन पर पीछे से हमला किया गया।

सुबह के 5 बजे उनकी माँ ने अपने बेटे का शव देखा। दीनानाथ के मुताबिक दिलीप की हत्या के लिए बदमाश उनके घर के बाहर घात लगाए बैठे थे। उनके सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया। वे जिंदा नहीं बचे यह सुनिश्चित करने के लिए उनका गला और अंडकोष दबाया गया। माँ ने सुबह जब उनकी लाश देखी तो उनके मुँह और नाक से खून बह रहा था।

भाजपा से जुड़े होने के कारण मार डाला

सुफल अधिकारी नाम के शिकायतकर्ता ने एफआईआर लिखवाया है कि टीएमसी के 16 गुंडों ने उनके भतीजे हरन अधिकारी की हत्या करने के साथ अपनी राजनीति महत्वाकांक्षा के चलते कई अन्य लोगों पर भी बेरहमी से हमला किया। उन्होंने कहा कि टीएमसी कार्यकर्ताओं ने अख्तर मोल्ला नाम के एक व्यक्ति के घर के सामने ईंटों और फावड़ियों से हरन पर हमला कर दिया। इसके बाद हरन अधिकारी ने दम तोड़ दिया, जबकि कई अन्य लोग अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे।

आज हमने एक को मारा, कल सबको मारेंगे

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के दत्तपुकुर की रहने वाली मारुफा बीबी ने शिकायत दर्ज कराई है कि 3 मई को सुबह करीब 5:30 पर जब वे लोग अपने खेत पर गए थे तो बदमाशों ने उसके पति और परिवार के अन्य सदस्यों पर हमला कर दिया था। बदमाशों ने पीड़िता को घेर लिया और उसे बेरहमी से पीटा।

जब मारुफा बीबी के पति ने भागने की कोशिश की तो उन्होंने उस पर बम फेंका, जिससे उसका दाहिना हाथ फट गया और पसली की हड्डियाँ फट गईं। मारुफा बीबी के पति की मौके पर ही मौत हो गई। भागते समय गुंडों ने उनसे कहा: “आज हमने एक को मार डाला, कल हम तुम्हारे परिवार के सभी सदस्यों को मार डालेंगे”।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे इसी साल 2 मई को आए थे। नतीजों में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की जीत सुनिश्चित होते ही राज्य में राजनीतिक हिंसा भड़क उठी थी। विपक्षी दलों खासकर, बीजेपी से जुड़े लोगों और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाया गया।

कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई बंगाल हिंसा के मामलों की जाँच कर रही है। हाई कोर्ट ने 19 अगस्त को केंद्रीय एजेंसी को जाँच का आदेश देते हुए 6 सप्ताह के भीतर स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। इस सिलसिले में सीबीआई अब तक 34 केस दर्ज कर चुकी है।

‘गौ रक्षा धर्म, दुखी हूँ कॉन्ग्रेस ने सरकार को बदनाम करने के लिए मेरी चोट की तस्वीर का किया इस्तेमाल’: गौ रक्षक ने दर्ज कराई शिकायत

28 अगस्त को करनाल में किसान प्रदर्शनकारियों के एक समूह की हरियाणा पुलिस के साथ हिंसक झड़प हुई थी। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज किया और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। पुलिस की कार्रवाई के बाद, कॉन्ग्रेस नेताओं और कॉन्ग्रेस समर्थकों ने कथित पुलिस बर्बरता के बारे में सोशल मीडिया पर शिकायत करना शुरू कर दिया था।

महासचिव प्रियंका वाड्रा, रणदीप सुरजेवाला और इमरान प्रतापगढ़ी सहित कई सोशल मीडिया हैंडल ने अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए एक व्यक्ति की तस्वीर का इस्तेमाल किया था, जिसके सिर पर गहरा घाव था। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस पार्टी के आधिकारिक मुख्य हैंडल ने ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ पर हमला करने के लिए हरियाणा पुलिस को दोषी ठहराने के लिए तस्वीर का दुरुपयोग किया था।

झूठे दावों के साथ टिंकू की तस्वीर साझा कर रहे कॉन्ग्रेसी नेता (साभार: Swarajya)

तस्वीर को कई सोशल मीडिया हैंडल द्वारा साझा किया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि गहरी चोट वाला व्यक्ति किसानों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता का शिकार है।

हालाँकि, स्वराज्य पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति का पता लगाया और पाया कि उसकी तस्वीर का इस्तेमाल कॉन्ग्रेस के हैंडल ने झूठा दावा करने के लिए किया है कि वह एक किसान प्रदर्शनकारी था और हरियाणा पुलिस ने उसके साथ बर्बरता की।

स्वाति शर्मा ने फोटो में दिख रहे शख्स टिंकू दयामा से बात की। वह गुरुग्राम के रहने वाले हैं। दयामा ने कहा कि उन्हें यह जानकर काफी दुख हुआ कि उनकी चोट की तस्वीर का इस्तेमाल कॉन्ग्रेस के हैंडल ने अपने राजनीतिक प्रचार के लिए किया है।

स्वाति से बात करते हुए, दयामा ने खुलासा किया, “जब मैंने पोस्ट देखे तो मुझे बहुत दुख हुआ। मुझे गौ रक्षा व्हाट्सएप ग्रुप पर इसकी जानकारी मिली। वे राजनीतिक लाभ के लिए मेरी चोटों का दुरुपयोग कैसे कर सकते हैं?”

टिंकू हरियाणा पुलिस द्वारा घायल ‘किसान प्रदर्शनकारी’ नहीं है। बल्कि वह एक गौ रक्षक है जिसे गुरुग्राम के पास पशु तस्करों के एक समूह को रोकने की कोशिश करते समय सिर में गहरी चोट लगी थी।

टिंकू दयामा गौ रक्षक हैं, न कि ‘किसान प्रदर्शनकारी’

कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेताओं के भ्रामक दावों से नाराज टिंकू ने गुरुग्राम पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कहा गया था कि कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा राजनीतिक प्रचार के लिए उनकी तस्वीर का दुरुपयोग किया गया है।

Email by Tinku to the police
टिंकू दयामा की पुलिस से शिकायत (साभार: Swarajya)

हरियाणा पुलिस के साइबर सेल को अपनी ईमेल शिकायत में, टिंकू दयामा ने कहा है कि कॉन्ग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए दुर्भावनापूर्ण रूप से उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल किया था और झूठे दावे करते हुए हरियाणा पुलिस को बदनाम करने की कोशिश की थी।

टिंकू की शिकायत में कहा गया है कि 25 अगस्त को गुरुग्राम अंतर्गत राजेश पायलट चौक उल्लावास गाँव के पास पशु तस्करों से भिड़ने के दौरान उनके सिर में गंभीर चोट आई थी। इस घटना से संबंधित एक FIR 26 अगस्त को पहले ही हरियाणा पुलिस में दर्ज की जा चुकी है। उन्होंने कृषि कानूनों का विरोध कर रही हिंसक भीड़ के हिस्से के रूप में गलत तरीके से चित्रित किए जाने पर नाराजगी व्यक्त की है।

टिंकू ने अपनी शिकायत में कहा है कि प्रतापगढ़ी द्वारा साझा की गई पोस्ट को हजारों अन्य लोगों द्वारा साझा किया गया था और हरियाणा सरकार की छवि खराब करने के लिए एक शातिर राजनीतिक एजेंडे का प्रचार करने के लिए उनकी चोट और व्यक्तिगत पीड़ा की तस्वीर का इस्तेमाल देखकर उन्हें दुख हुआ है।

बजरंग दल की मदद से टिंकू गायों को पशु तस्करों से बचाने का काम करता है

स्वराज्य में स्वाति की रिपोर्ट के अनुसार, टिंकू के समूह ‘गौ रक्षा दल’ में स्थानीय स्वयंसेवक शामिल हैं जो एक दूसरे को सचेत करते हैं और पशु तस्करों को ट्रैक करने और रिपोर्ट करने के लिए काम करते हैं। वे स्वयंसेवकों के एक व्हाट्सएप समूह के माध्यम से संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्ट करते हैं, जैसे मवेशियों को तंग वैन या मिनी-ट्रकों में जबरन डालना, अवैध लेनदेन आदि। गौ रक्षा दल उसका पीछा करता है और पशु तस्करों को रोकने की कोशिश करता है एवं स्थानीय पुलिस को अपराधियों को पकड़ने में मदद करता है।

टिंकू के समूह के स्वयंसेवक भी गौशालाओं में भेजकर गायों के पुनर्वास का काम करते हैं।

टिंकू ने कहा है कि गौ रक्षक का प्राथमिक लक्ष्य गायों को वध से बचाना है। उन्होंने कहा, “तस्करों को पकड़ना हमेशा गौण होता है क्योंकि उन्हें जमानत मिल जाता है और वो अपनी गतिविधियाँ फिर से शुरू कर देते हैं।”

गौ रक्षा धर्म है

टिंकू की माँ ने उन्हें लगे चोट को याद करते हुए बताया कि टिंकू गंभीर रूप से घायल हो गया था और गौ माता के आशीर्वाद के कारण ही वह जीवित है। टिंकू एक गुर्जर है और वे एक गुर्जर गाँव में रहते हैं। उनका परिवार छोटा किसान हैं। परिवार का मानना है कि गौ सेवा ही उनका धर्म है और गाँव वाले भी बताते हैं कि टिंकू बहुत अच्छा काम कर रहा है।

टिंकू के परिवार को यह समझ में नहीं आता कि मुख्यधारा के मीडिया में गौ रक्षकों को कुख्यात अपराधियों के रूप में कैसे चित्रित किया जाता है। उनका मानना है कि गौ रक्षा धर्म है और गौ रक्षा दल के स्वयंसेवकों को गाँव में प्यार और सम्मान दिया जाता है। जब पत्रकार ने कहा कि मुख्यधारा का मीडिया अक्सर गौ रक्षकों को गुंडों के रूप में चित्रित करता है, तो टिंकू ने कहा, “यह केवल आपके शहरों में होता है।”

पुलिस के साथ काम करते हैं गौ रक्षक

स्वराज्य रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि कैसे गौ रक्षक अक्सर पुलिस के साथ काम करते हैं। टिंकू ने बताया कि गौ रक्षक दल कभी भी पुलिस को सूचित किए बिना हस्तक्षेप नहीं करता है और अक्सर स्थानीय पुलिस पशु तस्करों को रोकने के लिए उनकी मदद लेती है।

टिंकू के परिवार ने बताया कि जब ग्रामीणों को टिंकू की चोट के बारे में पता चला, तो कई लोग उसके पास अस्पताल गए और बड़ों ने उसके पैर भी छुए, लोगों ने गायों को वध से बचाने के उसके पवित्र कार्य की सराहना की।

रिपोर्ट के मुताबिक, इलाके में काम करने वाले ज्यादातर गौ तस्कर मेवात क्षेत्र के मेव मुसलमान हैं। मेवात पशु तस्करी और अन्य अपराधों में तेजी से वृद्धि के लिए कुख्यात रहा है। 2019 में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने क्षेत्र में पशु तस्करी के मामलों पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए राज्य सरकारों को फटकार लगाई थी।

अदालत ने कई सुनवाई के दौरान, पुलिस प्रमुख से विस्तृत कारण बताने को कहा था कि 2015 के बाद से राज्य के गोहत्या विरोधी कानूनों के तहत दर्ज 800 मामलों में से किसी भी आरोपित को दोषी क्यों नहीं ठहराया गया था। पुलिस ने तब अदालत को सूचित किया था कि पुलिसकर्मी मेवात में बेहद प्रतिकूल माहौल में काम करते हैं, जिसमें अक्सर जान जोखिम में पड़ जाती है।

जमीनी हकीकत के विपरीत, मुख्यधारा का मीडिया गौ रक्षकों को लिंचिंग करने वाला और गुंडों के रूप में चित्रित करता है, जबकि तस्करों को निर्दोष पीड़ितों के रूप में उसके कुकर्मों को छिपाता है।

‘डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’: अमेरिकी साम्राज्यवाद, अफगानिस्तान में उसकी शर्मनाक हार; तालिबान से ध्यान हटाने की कुटिल चाल

अमेरिका में हुए 9/11 हमले के बाद वह दुनिया के सर्वाधिक मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला देश बन गया है। खुलेआम गाली-गलौज के बावजूद संयुक्त राज्य अमेरिका ने कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन पर दूसरों को व्याख्यान देते हुए दुर्व्यवहार के लिए दोषी होने से खुद को बचाने में कामयाबी हासिल की है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि उसके पास मीडिया का ऐसा शक्तिशाली ग्रुप है जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान और रक्षा ठेकेदारों से बहुत अधिक प्रभावित है।

दूसरी बात यह है कि पश्चिमी शिक्षाविद अमेरिकी साम्राज्यवाद की नीतियों को बहुत अधिक पसंद करते हैं। ताकि इस बात पर विचार कर सकें कि दुनिया भर के कई देशों पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। जब भी मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले पर चर्चा के लिए परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती हैं तो उनका मीडिया और पश्चिमी शिक्षाविदों का एक समूह तुरंत उसके बचाव में आ जाता है और किसी दूसरे मुद्दे को उठाना शुरू कर देता है। ऐसे में हमें भी ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन को भी इसी तरह से देखना चाहिए।

‘वैश्विक हिंदुत्व’ का दावा अपने आप में बहुत ही हास्यास्पद है क्योंकि ‘वैश्विक हिंदुत्व’ जैसा कुछ है नहीं। इस्लामी आतंकवाद के अलावा इस दिन और युग में सही मायने में देखा जाय तो केवल वैश्विक राजनीतिक घटना अमेरिकी साम्राज्यवाद है। इसके अलावा दूसरी कोई राजनीतिक विचारधारा वैश्विक स्तर की नहीं है।

यहाँ तक कि अपनी अधिनायकवादी प्रवृतियों के बावजूद चीन भी अपने राजनीतिक दर्शन का विदेशों में प्रसार नहीं करता है। रूस भी इस तरीके की हरकतें नहीं करता है। जबकि, काबुल में हमने ये देखा कि तालिबानी जॉर्ज फ्लॉयड के एक भित्ति चित्र पर पेंटिंग कर रहा था। अब हमें आप य़े बताएँ कि आखिर अफगानों का जॉर्ज फ्लॉयड से क्या लेना-देना है? काबुल में सभी जगहों पर फ़्लॉइड का भित्ति चित्र क्यों है? ये घटनाएँ ऐसी हैं, जिनके बारे में पश्चिमी शिक्षाविद बात तक नहीं करना पसंद करते हैं।

इन तथ्यों को दरकिनार कर वे वैश्विक साजिश का दावा कर दूसरों पर उंगली उठाने में बहुत तेज होते हैं। इसी तरह से टकर कार्लसन को यह कहने का शौक है, “वे आप पर जो भी आरोप लगाते हैं, वे खुद इसके लिए दोषी हैं।”

इसी क्रम में भारत को पराजित करने के लिए पश्चिमी शिक्षाविदों के एक समूह ने एक नई तकनीक की खोज की है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद अब अमेरिका जिहादी संगठन के साथ साझेदारी करना चाहता है। ऐसे में ये पश्चिमी शिक्षाविद इसे हिंदुत्व पर हमला करने का सबसे अच्छा वक्त मान रहे हैं। हम यह पूछने के लिए विवश हैं कि अगर इन शिक्षाविदों को मानवाधिकारों की वास्तव में इतनी ही फिक्र है तो ये लोग पहले अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान से जवाबदेही क्यों नहीं माँगते? आखिर दान की शुरुआत घर से होती है।

अफगानिस्तान में अमेरिकी अत्याचार

यह खुद को उन अत्याचारों की याद दिलाने का सबसे सही समय है, जो अमेरिका और उसका समर्थन प्राप्त मिलिशिया ने अफगानिस्तान में किए हैं। अमेरिका के लगातार चार राष्ट्रपति महिलाओं और बच्चों की हत्या के दोषी हैं। ऐसे में ये पश्चिमी शिक्षाविद जो बाइडेन को बचकर निकल जाने का मौका दे रहे हैं।

आनंद गोपाल ने हाल ही में न्यू यॉर्कर में लिखा था, “एक लड़ाई के दौरान शकीरा के पति के चाचा अब्दुल सलाम ने एक दोस्त के घर में शरण ली। लड़ाई समाप्त होने के बाद, वह नमाज़ अदा करने के लिए एक मस्जिद में गया। वहाँ पर कुछ तालिबान भी थे। इसके बाद एक कोएलिशन एयर स्ट्राइक में अंदर लगभग सभी लोग मारे गए। अगले दिन शोक मनाने वाले अंतिम संस्कार के लिए एकत्रित हुए, जिसके बाद दूसरी हड़ताल में एक दर्जन से अधिक लोग मारे गए। लौटाए गए शवों में अब्दुल सलाम उनके चचेरे भाई और छह से पंद्रह साल के उनके तीन भतीजे थे।”

उन्होंने लिखा, “अब्दुल रहमान नाम का एक किसान अपने छोटे बेटे के साथ कूड़ा-करकट बीन रहा था तभी उसे आसमान में अफगान सेना की गनशिप दिखाई दी। वो इतना नीचे उड़ रही थी कि उसने याद किया, “कलाश्निकोव भी उस पर गोली चला सकते थे।” हालाँकि, अच्छी बात ये थी कि वहाँ केवल आम लोग थे कोई तालिबानी नहीं। जैसा कि अपेक्षित था उन्होंने गोलियाँ चला दी और ग्रामीण दाएँ-बाएँ गिरने लगे। इसके बाद भी वे लगातार हमले करते रहे।” एक अन्य गवाह ने कहा, “जमीन पर कई लाशें पड़ी हुई थीं, खून बह रहा था और लोग कराह रहे थे।” ग्रामीणों के मुताबिक, कई छोटे बच्चों समेत कम से कम पचास नागरिक मारे गए थे।

ये कोई अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि अफगानिस्तान में अमेरिकी कब्जे की सामान्य ट्रेंड है। इतना ही नहीं अमेरिकी सेनाओं का मिलिशिया के साथ भी संबंध है, जिन पर महिलाओं और लड़कों के साथ बलात्कार और हत्या करने का आरोप है। खुद को अफगान महिलाओं का रक्षक बताने वाली अमेरिकी सेना और मिलिशिया दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से कई महिलाओं और बच्चों की हत्या कर दी। लेकिन, पश्चिमी शिक्षाविद इस मामले में अमेरिकी नेताओं से जवाबदेही की माँग करने के बजाय दूसरों पर उंगली उठाने में लगे हैं।

इस्लामी आतंकवाद का सबसे बड़ा समर्थक है अमेरिका

अफगानिस्तान में 20 साल के युद्ध की समाप्ति के बाद अब संयुक्त राज्य अमेरिका ने यह संकेत दे दिया है कि वो तालिबान के साथ एक कार्यशील साझेदारी स्थापित करना चाहता है। ऐसे कई हैरान कर देने वाले उदाहरण हैं, जहाँ अमेरिका ने अपनी विदेश नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए जिहादी समूहों के साथ सशस्त्र गठबंधन किया।

यह सभी जानते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने सीरिया में बशर अल-असद को सत्ता से हटाने के लिए जिहादी संगठनों को हथियार सप्लाई किए थे। अमेरिका ने इसको लेकर दावा किया था कि वो वहाँ के ‘उदारवादी विद्रोही समूहों’ को हथियार दे रहा है, जबकि वो इस बात को भलीभाँति जानता था कि ये हथियार अल कायदा से जुड़े समूहों के हाथों में जा रहे थे। अमेरिका के इन्हीं हथियारों में से कई ISIS के हाथ लग गए, जिसके दम पर उसने एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया था।

अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का बुरी तरह से उल्लंघन करने के बावजूद अमेरिकी साम्राज्यवाद की शायद ही किसी पश्चिमी शिक्षाविद और मीडिया ने कभी आलोचना की हो। इनकी असलियत ये है कि ये लोग साम्राज्यवाद और दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दखल देने को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो ये शिक्षाविद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कथित मानवाधिकारों के हनन के लिए भारत के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के लिए जो बाइडेन प्रशासन से माँग कर रहे हैं।

वर्तमान ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन ऐसे व्यक्तियों की शाही कल्पना है, जिन्हें विभिन्न पश्चिमी विश्वविद्यालयों के विभागों द्वारा समर्थन दिया गया है। सवाल ये है कि आखिर अमेरिका किस अधिकार से भारत और हिंदुत्ववादियों, या उस मामले के लिए किसी और को मानवाधिकारों के मामलों पर व्याख्यान करने देता है?

मुस्लिमों का नरसंहार हिंदुत्व ने नहीं, बल्कि अमेरिकी साम्राज्यवाद ने किया है। हिंदुत्व ने मुस्लिम महिलाओं और बच्चों की हत्या नहीं की, अमेरिकी साम्राज्यवाद ने किया है। हिंदुत्व ने दुनिया भर में जिहादी समूहों को सशस्त्र और समर्थित नहीं किया है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका ने ऐसा किया है। लेकिन फिर भी ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन करने वाले चाहते हैं कि दुनिया हिंदुत्व को लेकर चिंता करे।

ऐसे लोग पहले अपना घर देखें

‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन के आयोजकों का हिंदूफोबिया स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जबकि वे दावा करते हैं कि वे एक ‘राजनीतिक विचारधारा’ के खिलाफ हैं, न कि एक धर्म के। जबकि यह अक्सर देखा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदुओं को केवल उनकी आस्था के कारण निशाना बनाया जाता है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि 20 वीं शताब्दी में हिंदुओं ने जो नरसंहार झेले हैं और आज भी उत्पीड़न जारी है, इसके बावजूद ये सभी ‘हिंदुफोबिया’ से ग्रसित हैं। वे दावा करते हैं कि वे हिन्दुओं नहीं बल्कि हिंदुत्व के खिलाफ हैं, लेकिन उनकी हर कार्रवाई से यह साबित होता है कि हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक ही हैं।

दूसरों पर उंगली उठाने से पहले ऐसे शिक्षाविदों को अमेरिकी साम्राज्यवाद के विनाशकारी परिणामों और दुनिया भर में इसके कहर के बारे में जरूर विचार करना चाहिए। जब तक वे युद्ध अपराधों के अमेरिकी अपराधियों को न्याय के दायरे में नहीं लाते उन्हें बाकी सभी के बारे में शांत रहना चाहिए।