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अशगुन हुआ सूरत का मंदिर ढहवाना या चुनाव है विजय रुपाणी के इस्तीफे का कारण? नए CM की रेस में कौन-कौन?

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने शनिवार (11 सितंबर, 2021) को राज्यपाल आचार्य देवव्रत को अपना इस्तीफा सौंप दिया। अचानक हुई इस राजनीतिक हलचल से भाजपा को अंदरखाने से जानने वाले भी हैरान रह गए। इसके ठीक एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री व पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अहमदाबाद में थे, लेकिन इस दौरान उनका कोई कार्यक्रम नहीं हुआ और न ही किसी से मुलाकात की खबर सामने आई।

गुजरात में भाजपा के प्रभारी व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का कहना है कि पार्टी के नियमों के हिसाब से नए मुख्यमंत्री का ऐलान किया जाएगा। उनके बयान से ये आशंका मिट जाती है कि भाजपा समय-पूर्व चुनाव चाहती है। गुजरात में एक वर्ष बाद चुनाव हैं और विजय रुपाणी को बतौर सीएम भी 5 साल हो गए थे। बीच में 2017 का विधानसभा चुनाव भी आया, जिसमें पार्टी ने जीत दर्ज की।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष फ़िलहाल अहमदाबाद में ही हैं और पार्टी के विधायकों से मुलाकात कर रहे हैं। मंगलवार को राज्य में पार्टी के सभी विधायकों की बैठक भी बुलाई गई है, जिसमें नए नेता के नाम पर मुहर लगेगी। जब गुजरात में सारी हलचल तेज़ थी, उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अहमदाबाद के सरदारधाम भवन के भूमिपूजन कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे।

जो दो नाम सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं, उनमें से एक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया का है। दूसरा नाम उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल का है। गुजरात मोदी-शाह का गृह राज्य है, ऐसे में यहाँ भाजपा का प्रदर्शन आलाकमान के साख से भी जुड़ा हुआ है। मनसुख मंडाविया की उम्र अभी 50 साल भी नहीं हुई है, ऐसे में भाजपा में युवाओं को तरजीह देने वाली नीति के तहत उनके पक्ष में पलड़ा झुका हुआ लग रहा है।

लेकिन, सवाल ये है कि पार्टी को अचानक नेतृत्व परिवर्तन की ज़रूरत क्यों पड़ गई? याद किया जाए तो पिछले कुछ महीनों में उत्तराखंड में 2 बार और कर्नाटक में भी नेतृत्व बदला जा चुका है। उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीर्थ सिंह रावत को बिठाया गया, लेकिन समस्याएँ कम नहीं हुईं तो 6 महीने बाद फिर नेतृत्व परिवर्तन कर पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया गया। कर्नाटक में भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता येदियुरप्पा का इस्तीफा लेकर उनके ही शिष्य कहे जाने वाले बसवराज बोम्मई को चुना गया।

उत्तराखंड में मंदिरों पर सरकारी एकाधिकार व कई अन्य फैसलों से संत समाज नाराज़ था। कुंभ को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण भी संत समाज की नाराज़गी सामने आई थी। इसी तरह बेंगलुरु में लिंगायत मठों ने एकजुट होकर येदियुरप्पा का समर्थन किया। हालाँकि, भाजपा ने लिंगायत चेहरा ही चुना और उन्होंने सभी मठाधीशों का आशीर्वाद लेने में कामयाबी पाई। कहीं गाँधीनगर के घटनाक्रम में भी कोई धार्मिक एंगल तो नहीं?

सूरत में नगरपालिका द्वारा कई वर्षों पुराने एक मंदिर को ढहाए जाने के कारण श्रद्धालुओं में आक्रोश का माहौल है। राज्य में AAP की एंट्री हुई है, जिसने इस मुद्दे को उठाया है। कापोद्रा इलाके में रामदेवपीर मंदिर को ध्वस्त किया गया। सूरत नगरपालिका पर भी भाजपा का ही शासन है। बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ हुई इस कार्रवाई का स्थानीय लोगों ने विरोध किया। वाल्मीकि समाज की इस मंदिर में विशेष आस्था थी।

इस दौरा कई लोग रोते-बिलखते भी दिखे। लेकिन, मंदिर को जमींदोज कर दिया। लोग सवाल उठा रहे थे कि अगर किसी अन्य सरकार ने ये कार्रवाई की होती तो भाजपा बड़ा आंदोलन करती, लेकिन उसकी ही सरकार में ये सब हो रहा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल के साथ भी उनके मतभेद सामने आए थे। पिछले 4 चुनावों से वहाँ भाजपा-कॉन्ग्रेस के वोट शेयर का अंतर बी घट रहा है – 10.04%, 9.49%, 9% और फिर 7.7%।

भाजपा ने ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ के जरिए कई राज्यों में जनसंपर्क शुरू किया है। गुजरात में मनसुख मंडाविया और केंद्रीय पशुपालन मंत्री पुरुषोत्‍तम रुपाला को भेजा गया। दोनों ने पाटीदार समुदाय को रिझाने की कोशिश की है। 2017 में हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाले पाटीदार आंदोलन ने भाजपा को खासा नुकसान पहुँचाया था। AAP और AIMIM अबकी मैदान में है और TMC भी भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने में लगी गई।

मुस्लिम ही राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष क्यों? मोदी सरकार ने तोड़ी कॉन्ग्रेसियों की ‘परंपरा’, वाजपेयी ने भी किया था

केंद्र सरकार ने भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और अवकाश प्राप्त आईपीइस अफसर इक़बाल सिंह लालपुरा को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के इतिहास में ऐसा केवल दूसरी बार हुआ है, जब एक गैर मुस्लिम को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इसके पहले 2003 में स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में तत्कालीन एनडीए सरकार ने सरदार तरलोचन सिंह को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था। इस नियुक्ति के पहले आयोग के अध्यक्ष सैय्यद एसजीएच रिज़वी थे। आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष अतीफ रिज़वी हैं।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन 1978 में जनता पार्टी की सरकार के समय हुआ था और उसके पहले अध्यक्ष एमआर मसानी थे। हालाँकि तब आयोग संवैधानिक तौर पर स्वतंत्र नहीं था फिर भी उसके पास अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर सरकार को सलाह देने की एक भूमिका थी।

आयोग के पहले अध्यक्ष मसानी अधिक दिनों तक अध्यक्ष नहीं रहे और उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। पर उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए गए सारे अध्यक्ष मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज, या कहें तो दूसरे सबसे बड़े समुदाय से रहे। आयोग के एक अध्यक्ष जस्टिस एमएच बेग तो दो अपने कार्यकाल के दौरान दो बार इसके अध्यक्ष नियुक्त किए गए।

लगता है जैसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के समय तमाम सरकारों की यही सोच रही कि अल्पसंख्यक समुदाय में केवल एक ही समुदाय है और वह है मुस्लिम समुदाय। यदि यह सोच न होती तो अल्पसंख्यकों में शामिल बाकी समुदाय के लोगों में से किसी को आयोग का अध्यक्ष बनाया जाता।

पहली बार वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सरदार तरलोचन सिंह को आयोग का अध्यक्ष बनाया और अब दूसरी बार वर्तमान सरकार ने इक़बाल सिंह लालपुरा की नियुक्ति की है। वैसे यदि देखा जाए तो एक एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्था का रहना अपने आप में बड़ी विसंगति है पर यदि ऐसी कोई संस्था है भी तो क्या यह आवश्यक नहीं कि आयोग के पदों पर अन्य समुदाय के लोगों की भी नियुक्ति हो?

1992 में आयोग को संवैधानिक संस्था का दर्जा दिए जाने के बाद आयोग के पास अपना बजट, निर्णय लेने का अधिकार और अल्पसंख्यकों के कल्याण की योजनाएँ बनाने के अलावा कुछ मामलों में एक सिविल कोर्ट के जितना अधिकार है। ऐसे में क्या यह आवश्यक नहीं था कि पदों पर नियुक्तियों को लेकर सरकारें पारदर्शिता अपनाती?

इस आयोग के अध्यक्ष के रूप में डॉक्टर हामिद अंसारी और वजाहत हबीबुल्ला भी काम कर चुके हैं, जिन्हें हम वर्षों तक अन्य पदों पर देखते रहे हैं। ऐसे महानुभावों की नियुक्ति कुछ-कुछ वैसा ही आभास देती है जैसे आरक्षण का लाभ लेने वाला क्रीमी लेयर करता है। वर्षों से ऐसी नियुक्तियों का ही परिणाम है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा अल्पसंख्यक कल्याण के लिए किए गए काम पर सार्वजनिक चर्चाओं में केवल मुस्लिम समाज का जिक्र होता है।

यह विडंबना है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की उपस्थिति और उसे मिली संवैधानिक शक्तियों के बावजूद केवल मुस्लिमों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाने के लिए जस्टिस सच्चर कमिटी का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के कार्यालय द्वारा किया गया। ऐसे ही अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा रोकने के लिए प्रिवेंशन ऑफ कम्युनल एंड टार्गेटेड वायलेंस बिल (2011), जिसे लेकर पूरे देश में सरकार की आलोचना हुई, को ड्राफ्ट करने का काम सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली नेशनल एडवाइजरी कॉउंसिल ने किया था।

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का ऐसे राजनीतिक क़दमों के विरुद्ध क्या रवैया रहा? यह जानना दिलचस्प होगा कि संवैधानिक तौर पर मान्यता प्राप्त आयोग के गठन और उसे मिली शक्तियों के बावजूद ऐसे राजनीतिक फैसलों को लेकर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की क्या भूमिका रही?

इक़बाल सिंह लालपुरा की आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति सरकार की नीयत और संविधान के प्रति उसकी आस्था, दोनों को दर्शाता है। राजनीतिक पंडित और विशेषज्ञ इसके बारे में अपने विचार रखेंगे पर यह प्रश्न अपनी जगह खड़ा रहेगा कि अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में हमेशा एक समुदाय के लोगों को प्राथमिकता क्यों मिलती रही है? आशा है कि भविष्य में अल्पसंख्यक आयोग और उसमें नियुक्ति को लेकर सरकारें पारदर्शिता बरक़रार रखेंगी। यह संविधान और लोकतंत्र दोनों के लिए आवश्यक है।

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अपने पद से इस्तीफा दिया, जानिए क्या कुछ बोले

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने शनिवार (11 सितंबर, 2021) को राज्यपाल आचार्य देवव्रत को अपना इस्तीफा सौंपा। अचानक हुए इस घटनाक्रम ने सबको हैरान कर दिया है क्योंकि भाजपा के अंदरखाने के लोग भी इससे अनजान थे। उनके इस्तीफे से पहले गाँधीनगर में कुछ बैठकें हुईं। विजय रुपाणी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा का अवसर देने के लिए भाजपा आलाकमान को धन्यवाद दिया।

विजय रुपाणी ने कहा कि नेतृत्व का बदलते रहना भाजपा की प्रकृति में ही है। हालाँकि, उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के अंतर्गत जनसेवा का काम करते रहने का भी वादा किया। उन्होंने कहा कि पिछले 5 वर्षों में बार-बार लोगों ने भाजपा में अपना विश्वास जताया है। इससे पहले भाजपा उत्तराखंड और कर्नाटक में भी नेतृत्व-परिवर्तन कर चुकी है। कर्नाटक में येदियुरप्पा व उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत व उससे पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस्तीफा देना पड़ा था।

विजय रुपाणी 7 अगस्त, 2016 को गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे। आनंदीबेन पटेल के इस्तीफे से ये पद खाली हुआ था, जो फ़िलहाल उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं। मई 2012 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद आनंदीबेन पटेल के नाम पर मुहर लगी थी। उससे पहले मोदी ही गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और उन्होंने भाजपा को राज्य में एक के बाद एक तीन विधानसभा चुनाव जिताए थे।

‘Pak ने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी’: वायरल ऑडियो में तालिबान ने लताड़ा, सारे सीक्रेट दस्तावेज ले गई ISI

जहाँ एक तरफ तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार का गठन कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान ने अपनी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के मुखिया को कई बड़े अधिकारियों के साथ हाल ही में काबुल भेजा था। अब एक नए लीक हुए ऑडियो से तालिबान व पाकिस्तान की दरार सामने आई है। पाकिस्तान काबुल में तालिबानी शासन को अपने हिसाब से नचाना चाहता है। इस ऑडियो से पाकिस्तान की मुसीबतें बढ़ गई हैं।

दरअसल, उस ऑडियो में कथित रूप से एक तालिबानी कमांडर दूसरे से बात करते हुए कह रहा है कि किस तरह पाकिस्तान ने पूरी दुनिया में तालिबान की बेइज्जती कराई है, संगठन की छवि को ठेस पहुँचाया है। इस ऑडियो में आ रही आवाज़ मुल्ला फज़ल की बताई जा रही है। वो फ़िलहाल अफगानिस्तान का ‘उप-रक्षा मंत्री’ है। एक पंजाबी अतिथि से बात करते हुए उसने कहा कि किस तरह ISI प्रमुख तालिबानी शासन में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

तालिबान ने अपनी सरकार में ताजिक, उज्बेक और हाजरा जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के अलावा पिछली सरकारों के नेताओं को जोड़ कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि बनाने की योजना बनाई है। लेकिन, ISI चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद ने काबुल का दौरा कर सरकार गठन में हस्तक्षेप किया। इस ऑडियो में तालिबान व ISI चीफ के बॉडीगार्ड्स के बीच फायरिंग की एक घटना का भी जिक्र किया गया है।

अमेरिका द्वारा आतंकी संगठन घोषित किए गए ‘हक्कानी नेटवर्क’ के सिराजुद्दीन हक्कानी को तालिबानी शासन का ‘गृह मंत्री’ बनाया गया है। अलकायदा के साथ आत्मघाती हमलों को अंजाम दे चुका सिराजुद्दीन संगठन के संस्थापक का बेटा है और अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी FBI की ‘मोस्ट वॉन्टेड’ की सूची में है। जबकि तालिबान का दोहा समूह उदारवादी चेहरों को सरकार में चाहता था। लेकिन, तालिबान की योजना अब फेल होती दिख रही है।

ये भी खबर है कि अफगानिस्तान सरकार के कई गोपनीय दस्तावेज भी ISI के हाथ लग गए हैं। काबुल में मानवीय सहायता लेकर पहुंचे तीन C-170 विमान दस्तावेजों से भरे बैग लेकर रवाना हुए हैं। इधर तालिबान ने अपना शपथग्रहण समारोह भी टाल दिया है। खबर है कि पाकिस्तान बड़ी मात्रा में गोपनीय दस्तावेज, हार्ड डिस्क्स और अन्य डिजीटल सूचनाएँ ले गया है। इससे भारत पर भी असर पड़ने की आशंका है।

‘ईसाई लड़कियों के साथ नारकोटिक्स जिहाद’: बिशप के बयान पर भड़के केरल CM विजयन, कॉन्ग्रेस ने भी कहा – ‘सोच-समझ कर बोलिए’

केरल के कैथोलिक बिशप ने हाल ही में राज्य में ईसाई लड़कियों के साथ ‘लव जिहाद’ को लेकर चिंता जताई थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भड़क गए हैं। केरल के कोट्टयम में सायरो मालाबार चर्च पाला धर्मप्रांत के ‘मार जोसेफ कल्लारंगट’ नामक विशप के बयान पर आक्रोश जताते हुए सीएम विजयन ने कहा कि जिम्मेदार पदों पर कार्यरत व्यक्तियों को इस तरह के बयान देने में सावधानी बरतनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि समाज में धर्म के आधार पर विभाजन पैदा करने वाले बयान नहीं दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा, “पाला बिशप एक काफी प्रभावशाली व धार्मिक विद्वान हैं। हमलोग पहली बार ‘नारकोटिक्स जिहाद’ नाम का कोई शब्द सुन रहे हैं। नारकोटिक्स की समस्या किसी एक खास धर्म को ही निशाना नहीं बनाती। ये पूरे समाज पर अपना दुष्प्रभाव डालती है। इसे लेकर हम काफी चिंतित हैं।”

उधर ‘डेमोक्रेटिक युथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI)’ के एए रहीम ने कहा कि बिशप का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है और तथ्यों व पुष्ट सूचनाओं के बिना इस तरह के बयान जिम्मेदार लोगों को नहीं देने चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे केरल के सभ्य समाज की सहिष्णुता व अच्छाई का तानाबाना बिगड़ेगा। ‘केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी’ के अध्यक्ष पीटी थॉमस ने कहा कि ऐसे बयानों से राज्य के सामाजिक तानेबाने बिगड़ेंगे।

बता दें कि केरल के कोट्टयम में सायरो मालाबार चर्च पाला धर्मप्रांत के ‘मार जोसेफ कल्लारंगट’ नामक एक बिशप ने अपने बयान में कहा था कि केरल में कैथोलिक लड़कियाँ अब ‘लव और नार्कोटिक जिहाद’ की शिकार हो रही हैं। उन्होंने यह बात कोट्टायम जिले के कुरुविलंगाडु में एक चर्च समारोह में बोली थी, जो उनके सूबे के अंतर्गत आता है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि कट्टरपंथी ऐसे तरीकों का इस्तेमाल उन जगहों पर कर रहे हैं जहाँ हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और कैथोलिक परिवारों को इस संबंध में सावधान रहना चाहिए।

130 मदरसों को अनुदान देगी झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार, नमाज के लिए विधानसभा में अलॉट किया था अलग कमरा

झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार मुस्लिमों को नमाज के लिए विधानसभा में अलग कमरा अलॉट करने के बाद अब राज्य के 130 मदरसों को अनुदान देने की तैयारी कर रही है। इसके लिए शुक्रवार (10 सितंबर, 2021) को झारखंड एकेडमिक काउंसिल को हुई बैठक में आपसी सहमति के बाद रास्ता साफ हो गया है। बोर्ड की बैठक में विधायक सुदीप कुमार सोनू, नारायण दास और दीपिका पांडे शामिल रहीं। दरअसल, इस बात को लेकर जाँच चल रही थी कि 182 मदरसा सरकार के नियमों के मुताबिक काम करते हैं या नहीं।

इस मामले की जाँच के लिए गठित कमेटी ने झारखंड एकेडमिक काउंसिल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, जिसमें ये पाया गया है कि राज्य में 182 में 130 मदरसे सरकारी नियमों के तहत काम कर रहे हैं, इसलिए अब उन्हें अनुदान मिलने का रास्ता साफ हो गया है। हालाँकि, अभी 52 ऐसे मदरसे हैं, जिनकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है।

एकेडमिक काउंसिल की बैठक में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा को लेकर भी चर्चा की गई। इसके अलावा साल आयोजित होने वाली विभिन्न परीक्षाओं पर भी मंथन किया गया। इस दौरान आलिम फाजिल परीक्षा पर चर्चाएँ की गईं। इसका आयोजन 14 से 18 सितंबर के बीच किया जाएगा। आलिम की पहली पाली की परीक्षा सुबह 9:45 से 1:00 बजे तक होगी और दूसरी दोपहर 2 बजे से शाम सबा 5 बजे तक आयोजित होगी।

नमाज के लिए अलग कमरा भी अलॉट किया था

गौरतलब है कि इससे पहले विधानसभा में राज्य सरकार ने मुस्लिमों को नमाज अदा करने के लिए अलग से कमरा आवंटित किया था। इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से आदेश जारी होने के बाद इसका काफी विरोध किया गया था।

इस मामले में राज्य सरकार पर तुष्टिकरण करने का आरोप लगाते हुए बीजेपी विधायक अनंत ओझा ने ट्वीट किया था, “ये क्या स्पीकर साहब ,अब राज्य की सबसे बड़ी पंचायत भी तुष्टिकरण को पोषित करने की राह पर? झारखंड विधानसभा में नमाज़ अदा करने के लिए कक्ष। झारखंड की जनता सब देख रही है। सर्वधर्म समभाव की मूल आत्मा को कलंकित करने वाला निर्णय।”

ज़िन्दगी की लड़ाई हार गई मुंबई की गैंगरेप पीड़िता, 3 दिन बाद मौत: दरिंदों ने प्राइवेट पार्ट में डाल दिया था रॉड, पीटा भी था

मुंबई की 30 साल की रेप पीड़िता ने तीन दिन बाद शनिवार (11 सितंबर) को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। रेप पीड़िता का इलाज घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल में चल रहा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन दिनों से महिला की हालत बेहद नाजुक बनी हुई थी। दरिंदों द्वारा की गई बर्बरता की वजह से उसके शरीर से काफी खून बह गया था, वह वेंटिलेटर पर थी। डॉक्टरों ने उसे बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उसे नहीं बचा सके।

अस्पताल प्रशासन ने पीड़िता की मौत की पुष्टि कर दी है। वहीं, गृहमंत्री दिलीप वलसे पाटील ने आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि इस मामले पर मेरी नजर है और हर पल की अपडेट ले रहा हूँ।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 9 सितंबर को 30 वर्षीय महिला महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के साकीनाका इलाके के खैरानी रोड पर बलात्कार के बाद बेहोशी की हालत में मिली थी। रेप के बाद दरिंदों ने पीड़िता को रॉड से पीटा फिर उसे उसके प्राइवेट पार्ट में डाल दिया। मौके पर पहुॅंची पुलिस ने खून से लथपथ महिला को अस्पताल पहुॅंचाया था।

इस घटना का एक CCTV वीडियो भी सामने आया, जिसके आधार पर पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि दिल्ली के निर्भया कांड जैसी दिल दहला देने वाली वारदात को मुंबई के साकीनाका में देर रात 2.30 से 3 बजे के बीच अंजाम दिया गया था। गिरफ्तार आरोपित की पहचान मनोज चौहान के तौर पर हुई है। पुलिस ने उसके साथ कुछ और लोगों के इस वारदात में शामिल होने की आशंका जताई हैं।

आरोपित के खिलाफ आईपीसी की धारा 307, 376, 323 और 504 के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया गया है कि देर रात तकरीबन 3:30 बजे कंट्रोल रूम को साकीनाका के खैरानी रोड पर एक महिला के खून से लथपथ पड़े होने की सूचना मिली थी। मौके पर पहुॅंची पुलिस उसे तत्काल राजावाडी अस्पताल ले गई।

बता दें कि इससे पहले पुणे में 14 साल की लड़की के साथ गैंगरेप के मामले में 13 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। सभी आरोपितों ने पीड़िता के साथ 5 अलग-अलग ठिकानों पर 48 घंटे के भीतर कई बार रेप किया। इसमें लड़की का दोस्त, क्लास 4 के 2 रेलवे कर्मचारी और 11 ऑटोरिक्शा वाले भी शामिल थे।

‘फिल्म में महिलाएँ भी हैं’: ‘भूत पुलिस’ की समीक्षा कर के फँस गया ‘इंडिया टुडे’, यामी गौतम ने लगा दी क्लास

हॉरर-कॉमेडी ‘भूत पुलिस’ का प्रीमियर शुक्रवार (सितंबर 10, 2021) को ‘डिज्नी+हॉटस्टार’ एप पर हुआ। फिल्म में अभिनेता अर्जुन कपूर, यामी गौतम, सैफ अली खान और जैकलीन फर्नांडीज ने मुख्य भूमिका निभाई है। फिल्म को जहाँ पॉजिटिव रिव्यू मिल रही है, वहीं यामी गौतम मीडिया, खासकर ‘इंडिया टुडे’ द्वारा फिल्म की समीक्षा के डायन सेक्सिस्ट रवैया अपनाए जाने से खुश नहीं हैं

अभिनेत्री ने 10 सितंबर को ट्विटर पर ‘भूत पुलिस’ की समीक्षा की हेडलाइन से महिला कलाकारों के नाम हटाने के लिए मीडिया हाउस को आड़े हाथों लिया।

इंडिया टुडे के फिल्म रिव्यू पर प्रतिक्रिया देते हुए अभिनेत्री यामी गौतम ने ट्वीट किया, “फीडबैक के लिए धन्यवाद, लेकिन मीडिया पोर्टलों के लिए इस तथ्य को स्वीकार करने का समय आ गया है कि एक फिल्म महिला समकक्षों की भी होती है और हेडलाइन को लिखते समय इस पर सम्मानपूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए!” यामी गौतम के इस ट्वीट पर अभी तक इंडिया टुडे की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

यामी गौतम ने हाल ही में फिल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ के निर्देशक आदित्य धर से शादी की। जिसके बाद ‘वोक’ लिबरलों ने उन्हें ‘खारिज’ कर दिया था। यामी को हिंदू पोशाक में उनकी तस्वीरों पर प्रशंसा मिलने से परेशान लिबरलों ने दोनों को खारिज करने के लिए उनके पति को ‘स्टॉक’ किया।

यामी गौतम को अभिनेता विक्रांत मैसी द्वारा उनकी शादी के लुक के लिए भी मज़ाक उड़ाया गया था। इस तस्वीर में यामी ने सुंदर लाल बनारसी रेशम की साड़ी पहनी थी। यामी गौतम के इंस्टाग्राम पोस्ट पर विक्रांत मैसी ने टिप्पणी की कि वह “राधे माँ की तरह शुद्ध और पवित्र दिख रही थीं।”

इंडिया टुडे की बात करें तो यह एक ऐसा मीडिया हाउस है, जो अपनी घटिया पत्रकारिता के लिए एक बार नहीं बल्कि कई बार बदनाम हुआ है। घटनाओं को सनसनीखेज बनाने के लिए घटनाओं को अत्यधिक नाटकीय बनाने के अलावा, इंडिया टुडे पर एक से अधिक मौकों पर फेक न्यूज फैलाने का भी आरोप है।

इंडिया टुडे के स्टार पत्रकार, प्रोपेगेंडिस्ट-इन-चीफ राजदीप सरदेसाईने झूठ को फैलाने और खबरों को सनसनीखेज बनाने की कला में लगभग महारत हासिल कर ली है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में कोविड -19 पीड़ितों के लिए श्मशान घाट के बारे में झूठ बोलना हो या गणतंत्र दिवस का विद्रोह या सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस या सीएए के बारे में उनका प्रोपेगेंडा, राजदीप ने झूठ और डर फैलाने का एक भी मौका नहीं छोड़ा है।

‘आज एक सपना पूरा हुआ’: नीरज चोपड़ा ने माता-पिता के लिए किया कुछ ऐसा कि गदगद हुए लोग, कहा – आप हमारी प्रेरणा

टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारतीय भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा का एक और सपना पूरा हो गया है। उन्होंने शनिवार (11 सितंबर) को सोशल मीडिया पर ट्वीट करके इसकी जानकारी दी है। ट्विटर पर नीरज ने लिखा, ”आज जिंदगी का एक सपना पूरा हुआ जब अपने माँ-पापा को पहली बार फ्लाइट पर बैठा पाया। सभी की दुआ और आशीर्वाद के लिए हमेशा आभारी रहूँगा।” इसके साथ ही उन्होंने अपने माता-पिता के साथ तीन तस्वीरें भी शेयर की हैं, जिसमें वह बेहद खुश नजर आ रहे हैं। उनकी इस पोस्ट पर फैंस की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है।

एक यूजर ने लिखा, ”सर, आप हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। मेरे जैसे लाखों मिडल क्लास युवाओं को प्रेरणा देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

एक अन्य यूजर ने उनकी तस्वीर ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा, ”वाह! नीरज चोपड़ा। इन तस्वीरों ने मेरा दिन बना दिया। दिल और आत्मा दोनों खुश हो गई। आप धन्य हैं सूबेदार जी। धन्य माता-पिता और धन्य संतान। इन तस्वीरों को देखकर खुशी के आँसू छलक पड़े।”

हरियाणा के पानीपत जिले के खांद्रा गाँव में 24 दिसंबर 1997 को पैदा हुए नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत कर देश का नाम रोशन किया है। ऐसा कारनामा करने वाले वो भारत के पहले ट्रैक एंड फील्ड इवेंट्स (एथलेटिक्स) के खिलाड़ी हैं। इस उपलब्धि के बाद नीरज ने कई इंटरव्यू में हिन्दी में जवाब देकर भारतीय मातृभाषा को सर्वोपरि रखकर अपने चाहने वालों का दिल जीत लिया।

हालाँकि, इस दौरान कई पल ऐसे भी आए जब स्वर्ण पदक विजेता को पत्रकारों और मीडिया गिरोह के लोगों द्वारा पूछे गए सवाल के कारण शर्मसार भी होना पड़ा। इसमें प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार, आर्ट क्यूरेटर राजीव सेठी, रेडियो जॉकी मलिष्का और पत्रकार नविका कुमार शामिल हैं, जिन्होंने नीरज से उनकी निजी जिंदगी से जुड़े ऐसे सवाल किए, जिससे वह इंटरव्यू के दौरान असहज हो गए। राजीव सेठी ने तो हद ही कर दी उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के साथ एक इंटरव्यू में नीरज से बेहुदा प्रश्न पूछा आप अपनी एथलेटिक ट्रेनिंग के साथ सेक्स लाइफ का संतुलन कैसे बनाकर रखते हैं। इस दौरान उन्हें काफी शर्मिंदगी महसूस हुई थी।

हिंदू वोट चाहिए, हिंदू भीड़ चाहिए लेकिन… देवी-देवता नहीं: कॉन्ग्रेसी राहुल गाँधी का यह राजनीतिक दर्शन या रणनीति?

सोशल मीडिया युग में बिना फोटो/क्रिएटिव के शुभकामनाएँ अधूरी लगती हैं। आज गणेश चतुर्थी के दिन यह बात फिर से साबित हुई। राहुल गाँधी ने एक क्रिएटिव अटैच करते हुए ट्विटर पर लोगों को गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ दीं पर उस क्रिएटिव में गणेश जी नहीं दिखे। मोदक, दीया, फूल वगैरह तो थे पर गणेश जी नहीं। लोगों ने पूछा कि गणेश चतुर्थी पर बने क्रिएटिव में गणेश जी क्यों नहीं हैं? कुछ ने यह अनुमान भी लगाया कि शायद राहुल गाँधी ने जानबूझकर ऐसा किया है और क्रिएटिव में से गणेश जी को क्रॉप कर दिया। ऐसे अनुमान के पीछे कारण भी हैं। 


हाल ही में राहुल गाँधी द्वारा परालिम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित अंतील को बधाई देते हुए उन्हीं की एक फोटो का इस्तेमाल किया। राहुल गाँधी ने सुमित की जिस फोटो का इस्तेमाल किया था, उसमें उनके गले में ॐ का एक लॉकेट दिखाई दे रहा था जो राहुल गाँधी द्वारा इस्तेमाल किए गए फोटो में दिखाई नहीं दे रहा था। इसकी वजह ने सोशल मीडिया यूजर्स ने राहुल की आलोचना करते हुए यह कहा कि उन्होंने जानबूझकर उसे क्रॉप कर दिया क्योंकि उन्हें हिन्दुओं के देवी-देवताओं और उनके धार्मिक प्रतीकों से चिढ़ है।

आज भी कई ट्विटर यूजर्स की यही शिकायत थी। अधिकतर शिकायतें यह कहते हुए की गई कि राहुल गाँधी ने जानबूझकर गणेश जी को क्रिएटिव से निकाल दिया। कुछ शिकायतों का आधार यह था कि गणेश चतुर्थी पर बधाई के लिए ऐसा क्रिएटिव कौन इस्तेमाल करता है, जिसमें गणेश जी की उपस्थिति ही न हो? यह प्रश्न मुझे तर्कपूर्ण लगता है।

हिन्दू देवी-देवताओं में सबसे अधिक लोकप्रिय गणेश जी ही हैं। मूर्तिकार भी सबसे अधिक उनकी ही प्रतिमाएँ और मूर्तियाँ बनाते हैं। ऐसे में गणेश चतुर्थी के दिन क्रिएटिव बनाने वाला कोई व्यक्ति उन्हें ही कैसे भूल सकता है? ऐसे में यदि कोई शंका जाहिर करे तो इस बात में आश्चर्य कैसा? 

राहुल गाँधी इस समय वैष्णो देवी के दर्शन खातिर जम्मू की यात्रा पर हैं। तो क्या यह यात्रा दिखावे की है? क्या यह साबित करने के लिए है कि राहुल गाँधी हिन्दू हैं? कोई हिन्दू है, यह बात बार-बार साबित करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? वैसे भी जो दो दिनों की धार्मिक यात्रा पर है, वह गणेश चतुर्थी पर ऐसा क्रिएटिव इस्तेमाल करने की सोचेगा जिसमें गणेश जी न हों? हाल ही में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर शुभकामना वाले ट्वीट के साथ अटैच किए गए क्रिएटिव में भी श्रीकृष्ण नहीं थे।

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि कहीं न कहीं यह राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस पार्टी का राजनीतिक दर्शन है कि हिंदू देवताओं या हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं करना है। यदि ऐसा है तो फिर लोगों की यह शिकायत तथ्यपूर्ण है कि वे अपने ट्वीट में जानबूझकर देवी-देवताओं या हिन्दू धार्मिक प्रतीकों को जगह नहीं देते। 

यदि पिछले कुछ वर्षों की राजनीति की जाँच हो तो पता चलेगा कि एक नेता के तौर पर राहुल गाँधी और एक दल के तौर पर कॉन्ग्रेस का इस बात में पुख्ता विश्वास है कि राजनीति में सच से अधिक महत्वपूर्ण धारणाएँ होती हैं। ऐसे में यह आश्चर्य की बात है कि धारणाओं में विश्वास करने वाला नेता और उसका दल किन परिस्थितियों में देश के हिंदुओं के मन में पनपने वाली धारणाओं को नहीं समझ रहे?

अगले वर्ष कई राज्यों में चुनाव होने हैं। हिंदू वोट लेने की कवायद में कॉन्ग्रेस पार्टी असम में अपने मित्र बदरुद्दीन अज़मल से किनारा कर चुकी है पर उसके नेता हिंदुओं के साथ अपने संवाद में हिंदुओं के देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करने से क्यों बचते हैं? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर राहुल गाँधी ही दे सकते हैं।