भारत अब स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा चुका है। इसी कड़ी में शुक्रवार (26 जून 2026) को भारतीय रेलवे ने देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल आधारित ट्रेन को का सफल हाई-स्पीड ट्रायल हरियाणा के जिंद-सोनीपत रेलखंड पर किया।
अब जल्द ही इसे यात्री सेवा में उतारने की तैयारी है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि अब भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहाँ हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों का विकास और परीक्षण किया जा रहा है।
हालाँकि, ट्रायल के दौरान ट्रेन ने 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल की लेकिन यात्रियों के साथ इसकी अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। यह 10 कोच वाली ट्रेन 1200 KW क्षमता वाले हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रोपल्शन सिस्टम से चलेगी।
भारतीय रेलवे का कहना है कि यह परियोजना देश में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और भविष्य में रेल परिवहन को पर्यावरण के लिए बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
#WATCH | हरियाणा: आज दिल्ली और जींद के बीच हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल रन हुआ। इस ट्रायल में इमरजेंसी ब्रेकिंग दूरी और ऑसिलेशन पर ध्यान दिया गया।
हाइड्रोजन ट्रेन में डीजल इंजन की जगह हाइड्रोजन फ्यूल सेल का इस्तेमाल किया जाता है। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जिससे ट्रेन की मोटर चलते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में धुआँ या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती बल्कि भाप निकलता है।
यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को डीजल ट्रेनों की तुलना में कहीं अधिक स्वच्छ माना जाता है। इसके अलावा यह तकनीक शोर भी कम करती है, जिससे ध्वनि प्रदूषण में भी कमी आती है। दुनिया भर में इसे भविष्य के हरित परिवहन का महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है।
भारत ने जिंद-सोनीपत रूट को ही क्यों चुना?
भारतीय रेलवे ने हरियाणा के जिंद-सोनीपत सेक्शन को इस परियोजना के लिए पायलट रूट बनाया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह रेलखंड नई तकनीक के परीक्षण के लिए सही माना गया है। यहाँ ट्रैफिक नियंत्रित है और नई प्रणाली की निगरानी करना बाकी जगहों के मुकाबले आसान है।
इस परियोजना के लिए जिंद में हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और रिफ्यूलिंग की विशेष सुविधा तैयार की गई है। यहाँ संपीड़ित हाइड्रोजन गैस को सुरक्षित तरीके से संग्रहित किया जाएगा और ट्रेन में भरा जाएगा। पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) ने इसके लिए आवश्यक लाइसेंस भी जारी कर दिया है।
सुरक्षा के लिए क्या-क्या इंतजाम किए गए हैं?
हाइड्रोजन एक ज्वलनशील गैस है, इसलिए सुरक्षा इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। रेलवे ने इसके लिए कई आधुनिक सुरक्षा व्यवस्थाएँ की हैं।
रिफ्यूलिंग स्टेशन पर हाइड्रोजन लीक डिटेक्टर, फ्लेम डिटेक्टर, 24 घंटे निगरानी प्रणाली और स्टैंडबाय कम्प्रेसर लगाए गए हैं। हाइड्रोजन भरने वाले उपकरणों की नियमित जाँच और सफाई की जाएगी ताकि धूल या किसी तकनीकी खराबी के कारण कोई जोखिम न बने।
इसके अलावा ट्रेन के संचालन और रखरखाव के लिए विशेष मैनुअल तैयार किए गए हैं, जिन्हें रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन (RDSO) से मंजूरी मिल चुकी है। शुरुआती दिनों में प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी ट्रेन के साथ यात्रा करेंगे ताकि किसी भी तकनीकी समस्या का तुरंत समाधान किया जा सके।
शाकूर बस्ती में प्रस्तावित रखरखाव केंद्र पर भी नियमित सुरक्षा ऑडिट और स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू की जाएगी।
भारत के लिए यह उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क वाले देशों में शामिल है। हर दिन लाखों यात्री और बड़ी मात्रा में माल रेल के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचते हैं। ऐसे में यदि भविष्य में डीजल ट्रेनों की जगह धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा से चलने वाली ट्रेनें आती हैं, तो इससे प्रदूषण में कमी लाई जा सकती है।
भारत ने साल 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। रेलवे भी अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहा है। हाइड्रोजन ट्रेन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो भविष्य में देश के अन्य नॉन एलेक्टरीफाईड रेल मार्गों पर भी ऐसी ट्रेनें चलाई जा सकती हैं।
दुनिया में हाइड्रोजन ट्रेनों की क्या स्थिति है?
हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक अभी शुरुआती दौर में है। दुनिया के कुछ ही देशों ने इसे अपनाया है या इसका परीक्षण किया है। जर्मनी ने सबसे पहले नियमित यात्री सेवा में हाइड्रोजन ट्रेनें उतारी थीं। इसके अलावा जापान, चीन और अमेरिका भी इस तकनीक पर काम कर रहे हैं और अलग-अलग परियोजनाओं का परीक्षण कर चुके हैं।
भारत की यह सफलता इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अब वह भी उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जो रेल परिवहन में स्वच्छ ऊर्जा आधारित तकनीक विकसित कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
भारतीय रेलवे के अनुसार जिंद-सोनीपत सेक्शन पर अंतिम हाई-स्पीड ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। अब कुछ नियामकीय मंजूरियाँ और परिचालन संबंधी औपचारिकताएँ पूरी की जाएँगी। इसके बाद इस ट्रेन को यात्रियों के लिए शुरू किया जाएगा।
यदि शुरुआती संचालन सफल रहता है, तो भविष्य में भारतीय रेलवे हाइड्रोजन तकनीक के उपयोग का दायरा बढ़ाने पर विचार कर सकता है। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि भारत स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन के क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना सकेगा।
राजनीति में सुर्खियों में बने रहने के लिए कई बार बिना तथ्यों को जाँचे-परखे आरोप लगा दिए जाते हैं। ऐसा ही कुछ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने किया है। पवन खेड़ा ने India Today की खबर को शेयर करते हुए मोदी सरकार पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वीर बलिदानियों के नाम छुपाने का एक गंभीर आरोप लगाया। कल तक तमाम बड़े मीडिया चैनलों की हेडलाइन भी ये ही थी, कि पहली बार ‘सार्वजनिक किए 6 बलिदानियों के नाम’। लेकिन जब इस दावे की पड़ताल की गई, तो सच कुछ और ही निकला।
दरअसल, जिन बलिदानियों के नाम सरकार द्वारा छुपाने का दावा पवन खेड़ा कर रहे हैं, वे नाम पहले से ही देश के सामने थे। रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना ने उनकी शहादत के तुरंत बाद ही पूरे सम्मान के साथ इसकी जानकारी सार्वजनिक की थी। हाल ही में सरकार ने बस इन नामों को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (नेशनल वॉर मेमोरियल) की आधिकारिक दीवार और वेबसाइट पर दर्ज कराया है, जिसे कॉन्ग्रेस नेता ने ‘नाम छुपाने’ का सियासी रंग दे दिया।
कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने क्या लगाया आरोप?
पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले 6 जांबाजों की सूची साझा की। इन नामों में सूबेदार मेजर पवन कुमार, राइफलमैन सुनील कुमार (वीर चक्र), लांस नायक दिनेश कुमार, एविएशन टेक्निशियन मूड मुरलीनायक, हवलदार सुनील कुमार सिंह और सार्जेंट सुरेंद्र कुमार (वायु सेना पदक) शामिल थे।
इन नामों को पोस्ट करते हुए पवन खेड़ा ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा कि इन बहादुर बेटों ने पहलगाम हमले के बाद देश के सम्मान और हमारी बहनों के सिंदूर की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनके नाम राष्ट्रीय चेतना में अंकित होने चाहिए थे। लेकिन, भाजपा सरकार ने पूरे एक साल तक देश से उनकी शहादत को छुपा कर रखा। उन्होंने आगे सरकार के राष्ट्रवाद पर सवाल उठाते हुए लिखा कि जो सरकार खुद को तिरंगे में लपेटती है, उसने हमारे नायकों को वह सम्मान और पहचान नहीं दी, जिसके वे हकदार थे।
1. Subedar Major Pawan Kumar of Headquarters 10 Infantry Brigade 2. Rifleman Sunil Kumar, Vir Chakra, of 4 Jammu and Kashmir Light Infantry, 3. Lance Naik Dinesh Kumar of 5 Field Regiment 4. Aviation Technician Mood Muralinaik of 851 Light Regiment, 5. Havildar Sunil… https://t.co/awZ9EPGn1y
— Pawan Khera 🇮🇳 ಪವನ್ ಖೇರಾ (@Pawankhera) June 26, 2026
फैक्ट चेक में क्या निकला सच?
जब इस दावे का फैक्ट चेक किया गया, तो पवन खेड़ा के आरोप पूरी तरह से निराधार और झूठे साबित हुए। भारतीय सेना, वायुसेना और रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि इन वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान को कभी छुपाया ही नहीं गया था। जब मई 2025 में पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों को तबाह करने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया गया था, तभी सेना ने समय-समय पर इन जांबाजों की शहादत की जानकारी देश को दी थी। आइए सिलसिलेवार ढंग से देखते हैं कि सच क्या है।
सार्जेंट सुरेंद्र कुमार (वायु सेना पदक): भारतीय वायुसेना (IAF) ने खुद 13 अगस्त 2025 को ट्वीट कर जानकारी दी थी कि तत्कालीन एयर चीफ मार्शल AP सिंह खुद राजस्थान के झुंझुनूं जिले में सार्जेंट सुरेंद्र कुमार के पैतृक गाँव गए थे। वहाँ उन्होंने बलिदानी की माता, पत्नी और बच्चों से मुलाकात कर सांत्वना दी थी। इसे छुपाना कैसे कहा जा सकता है?
Air Chief Marshal AP Singh along with Mrs Sarita Singh paid a visit to village Mehradasi in Jhunjhunu district, Rajasthan, hometown of late Sgt Surendra Kumar, who laid down his life in the line of duty during Op Sindoor. At his home, they met his mother Mrs Nanu Devi, wife Mrs… pic.twitter.com/i5tNtPeTaP
सूबेदार मेजर पवन कुमार: भारतीय सेना की व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने 16 मई 2025 को ही आधिकारिक तौर पर ट्वीट कर सूबेदार मेजर पवन कुमार की वीरता और सर्वोच्च बलिदान को सलाम किया था।
#GOC and all ranks of #WhiteKnightCorps salute the unwavering courage of #Braveheart Subedar Major Pawan Kumar, who made the supreme sacrifice during #OpSindoor. His valour and dedication to duty will always be remembered. We continue to stand with the bereaved family in their…
— White Knight Corps (@Whiteknight_IA) May 16, 2025
हवलदार सुनील कुमार सिंह: सेना की व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने 7 जून 2025 को ट्वीट कर बताया था कि अस्पताल में इलाज के दौरान 6 जून 2025 को हवलदार सुनील कुमार सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। सेना ने उनके परिवार के साथ एकजुटता व्यक्त की थी।
#GOC and all ranks of #WhiteKnightCorps pay heartfelt tribute to #Braveheart Havildar Sunil Kumar Singh who made the supreme sacrifice in the line of duty during #OpSindoor.
After sustaining grievous injuries, he battled valiantly during treatment at Command Hospital and passed… pic.twitter.com/RdPTW6WkO2
— White Knight Corps (@Whiteknight_IA) June 7, 2025
राइफलमैन सुनील कुमार (वीर चक्र): समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) ने 11 मई 2025 को बाकायदा एक Video रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें जम्मू के त्रेवा गाँव में राइफलमैन सुनील कुमार के पार्थिव शरीर को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके निवास स्थान पर लाते हुए दिखाया गया था। राइफलमैन सुनील कुमार को वीर चक्र भी मिला है, शायद कॉन्ग्रेस ये बात भूल गई है।
#WATCH | J&K: Mortal remains of Rifleman Sunil Kumar brought to his residence in Trewa village of Jammu. He lost his life in the line of duty, during the shelling by Pakistan, in RS Pura sector. pic.twitter.com/HEqzE81Ux0
अग्निवीर मूड मुरलीनायक: व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने 20 मई 2025 को ट्वीट कर अग्निवीर मूड मुरलीनायक के सर्वोच्च बलिदान को नमन किया था।
#GOC and all ranks of #WhiteKnightCorps salute AgniVeer Mood Muralinaik, who made the supreme sacrifice during #OpSindoor. His courage and dedication to duty remain etched in our memory. We continue to stand with the bereaved family.@adgpi@NorthernComd_IA
— White Knight Corps (@Whiteknight_IA) May 20, 2025
लांस नायक दिनेश कुमार: सेना ने 7 मई 2025 को ही ट्वीट कर जानकारी दे दी थी कि पुंछ सेक्टर में पाकिस्तानी गोलाबारी के दौरान लांस नायक दिनेश कुमार ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
#GOC and all ranks of #WhiteKnightCorps salute the supreme sacrifice of L/Nk Dinesh Kumar of 5 Fd Regt, who laid down his life on 07 May 25 during Pakistan Army shelling. We also stand in solidarity with all victims of the targeted attacks on innocent civilians in #Poonch Sector.…
— White Knight Corps (@Whiteknight_IA) May 7, 2025
इन सभी आधिकारिक साक्ष्यों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि इन 6 वीरों के नाम और उनकी शहादत की गाथा एक साल पहले यानी साल 2025 में ही देश के सामने आ चुकी थी। सरकार ने केवल इस सैन्य नुकसान को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की डिजिटल और वास्तविक दीवारों पर हमेशा के लिए अंकित किया है, जो कि एक तय प्रक्रिया का हिस्सा है।
बिना पैर-हाथ के आरोप लगाने की ‘कॉन्ग्रेसी’ आदत
इस पूरे मामले से एक बात फिर साफ हो गई है कि कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को फैक्ट चेक करने की आदत ही नहीं है। हेडलाइन बटोरने और सरकार को घेरने की जल्दबाजी में कॉन्ग्रेस के नेता बुनियादी तथ्यों को भी देखना जरूरी नहीं समझते। देश की सुरक्षा और सैनिकों की शहादत जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बिना सोचे-समझे राजनीति करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर पवन खेड़ा ने थोड़ा सा भी समय निकालकर भारतीय सेना या रक्षा मंत्रालय के सोशल मीडिया हैंडल खंगाले होते, तो शायद उन्हें खुद ही शर्मिंदगी उठानी पड़ती। लेकिन बिना देखे, बिना जाँचे आरोप मढ़ देना ही आज की राजनीति का नया टूल बन चुका है, जिसमें कॉन्ग्रेस के नेता पूरी तरह माहिर हो चुके हैं।
अंतिम यात्रा किसी परिवार के लिए केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं होती बल्कि वह भावनात्मक रूप से सबसे कठिन समयों में से एक होती है। ऐसे समय में यदि परिवार को अव्यवस्था, लंबी प्रतीक्षा, असुविधा और अनिश्चित खर्च का सामना करना पड़े तो वह पीड़ा और बढ़ जाती है। बिहार सरकार पिछले कुछ समय से इसी क्षेत्र में बदलाव की दिशा में काम कर रही है।
राज्य में आधुनिक शवदाह गृहों के निर्माण और पुराने श्मशान घाटों को सुविधायुक्त बनाने की पहल इसी सोच का हिस्सा है। राजधानी पटना के बाँसघाट शवदाह गृह को आधुनिक स्वरूप देकर उसके संचालन की जिम्मेदारी ‘सद्गगुरु’ जग्गी वासुदेव की संस्था ईशा फाउंडेशन को सौंपी गई है। हालाँकि, इसे लेकर अब विवाद भी शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं।
पटना में सरकार के पैसे से बने एक शवदाह गृह और श्मशान घाट का संचालन अब जग्गी वासुदेव की संस्था करेगी।
यहां अधिक शुल्क देकर VIP सुविधाओं के साथ अंतिम संस्कार की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी।
कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार संस्था के साथ मिलकर श्मशान का भी ‘व्यवसाय’ कर रही है और इससे गरीबों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। हालाँकि, संस्थान का कहना है कि पूरे प्रयास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है जबकि इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि अंतिम संस्कार व्यवस्था को पारदर्शी, सुविधाजनक और सम्मानजनक बनाना है।
ईशा फाउंडेशन ने ऑपइंडिया को क्या बताया?
इस पूरे मॉडल को समझने से पहले यह देखना जरूरी है कि आखिर सरकार ने यह जिम्मेदारी ईशा फाउंडेशन को क्यों दी, यहाँ कौन-कौन सी सुविधाएँ विकसित की गई हैं। ऑपइंडिया ने ईशा फाउंडेशन से इस विषय पर कुछ सवाल किए, जिसका संस्था ने विस्तार से जवाब दिया है नीचे उन सवालों और जवाबों को क्रमवार लिखा गया है।
● ईशा फाउंडेशन ने शवदाह गृह (श्मशान घाट) के संचालन की जिम्मेदारी क्यों संभाली है? ईशा फाउंडेशन शवदाह गृहों का संचालन इस उद्देश्य से करता है कि हर व्यक्ति को सम्मानजनक और गरिमापूर्ण अंतिम विदाई मिल सके। तमिलनाडु सरकार के साथ साझेदारी में फाउंडेशन पिछले 15 वर्षों से शवदाह गृहों का संचालन कर रहा है, जहाँ स्वच्छ और सुव्यवस्थित परिसर, प्रशिक्षित कर्मचारी तथा पारंपरिक अंतिम संस्कार की सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
इन केंद्रों पर अब तक 1,25,000 से अधिक अंतिम संस्कार किए जा चुके हैं। इन सुविधाओं के माध्यम से ईशा ने प्राचीन परंपराओं और मृत्यु संस्कारों को ऊर्जा-आधारित दृष्टिकोण के साथ पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है और इसे व्यावसायिक गतिविधि नहीं बल्कि सेवा के रूप में संचालित किया है।
इसी अनुभव को देखते हुए बिहार सरकार ने ईशा फाउंडेशन की सामाजिक एवं पर्यावरणीय इकाई ‘ईशा आउटरीच’ के साथ साझेदारी की है ताकि राज्य में शवदाह गृहों का संचालन और प्रबंधन किया जा सके, जबकि भूमि का स्वामित्व सरकार के पास रहेगा।
● यह शवदाह गृह मौजूदा सरकारी या नगर निगम के शवदाह गृहों से कैसे अलग होगा? ईशा मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता गरिमा, स्वच्छता और संवेदनशील सेवा पर उसका ध्यान है। इन शवदाह गृहों का पेशेवर तरीके से रखरखाव किया जाता है, शुल्क व्यवस्था पारदर्शी होती है और प्रशिक्षित कर्मचारी पूरे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को संवेदनशीलता के साथ संभालते हैं।
परिसर में पारंपरिक अंतिम संस्कार के लिए समर्पित स्थान और सुव्यवस्थित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे शोकग्रस्त परिवारों का बोझ कम हो सके।
● अंतिम संस्कार के लिए क्या शुल्क तय किया गया है?
इलेक्ट्रिक शवदाह के लिए शुल्क ₹3,500 तय किया गया है, जो नगर निकाय समझौते के तहत अनुमत सीमा के भीतर सबसे कम शुल्क बताया गया है। यह राशि बिजली और रखरखाव संबंधी खर्चों को पूरा करने के लिए निर्धारित की गई है। लकड़ी आधारित अंतिम संस्कार के लिए सेवा शुल्क ₹3,500 रहेगा, लेकिन लकड़ी का खर्च परिवार को स्वयं वहन करना होगा।
● क्या गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए कोई रियायत, मुफ्त सेवा या सरकारी सहायता उपलब्ध होगी?
सेवा की भावना को आगे बढ़ाते हुए, ईशा आउटरीच बांस घाट श्मशान घाट पर अंत्योदय अन्न योजना (AAY) कार्डधारकों के लिए निःशुल्क अंतिम संस्कार सेवा उपलब्ध करा रहा है, ताकि आर्थिक कठिनाई किसी भी व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम विदाई देने में बाधा न बने।
● इसे ‘VIP शवदाह गृह’ क्यों कहा जा रहा है?
इसे विशेष या VIP पहुँच के कारण नहीं बल्कि बेहतर बुनियादी ढाँचे के कारण ऐसा कहा जा रहा है। स्वच्छ परिसर, व्यवस्थित पार्किंग, विशाल प्रतीक्षा क्षेत्र और बेहतर सुविधाओं का उद्देश्य हर परिवार को सम्मानजनक और व्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना है।
● क्या यह पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) मॉडल पर आधारित होगा? प्रदूषण और उत्सर्जन कम करने के लिए कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होगी?
इस शवदाह गृह को पर्यावरण-अनुकूल दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जा रहा है। इलेक्ट्रिक शवदाह इसकी प्रमुख व्यवस्था होगी, जिसे उत्सर्जन नियंत्रित करने वाली चिमनी प्रणाली का समर्थन मिलेगा।
साथ ही लकड़ी आधारित भट्टियों को चरणबद्ध तरीके से LPG आधारित प्रणाली में बदलने का प्रस्ताव है, जो पारंपरिक लकड़ी चिताओं की तुलना में कम प्रदूषणकारी होगी और लकड़ी पर निर्भरता भी कम करेगी। उद्देश्य कम उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव वाला आधुनिक शवदाह केंद्र बनाना है।
● पूरे परिसर का संचालन और प्रबंधन कैसे किया जाएगा? पूरे परिसर का संचालन ईशा आउटरीच द्वारा किया जाएगा, जिसमें मानव संसाधन, सफाई व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, बागवानी और रखरखाव शामिल होगा। इसके अलावा तकनीकी संचालन जैसे भट्टियाँ, विद्युत प्रणाली, प्लंबिंग और अन्य बुनियादी संरचना की जिम्मेदारी भी फाउंडेशन संभालेगा।
● क्या बिचौलियों और अवैध शुल्क वसूली को रोकने के लिए कोई पारदर्शी व्यवस्था होगी? हाँ, पूरी व्यवस्था पारदर्शिता सुनिश्चित करने और बिचौलियों की भूमिका कम करने के उद्देश्य से बनाई गई है। अंतिम संस्कार और परिसर संचालन सीधे प्रबंधित होने के कारण परिवारों को मुख्य सेवाओं के लिए मध्यस्थों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। जहाँ अतिरिक्त पारंपरिक सेवाओं की आवश्यकता होगी, वहाँ स्पष्ट नियमों का पालन किया जाएगा ताकि अनावश्यक शुल्क न लिया जा सके।
● यदि किसी दिन अंतिम संस्कार के मामलों की संख्या अधिक हो जाए तो भीड़ और प्रतीक्षा समय को कैसे संभाला जाएगा? हाँ, अधिक संख्या में मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गई है। यह सुविधा एक समय में 18 अंतिम संस्कार संभाल सकती है और इसमें कई भट्टियाँ, प्रशिक्षित ऑपरेटर तथा पर्याप्त सहयोगी कर्मचारी उपलब्ध रहेंगे।
वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 1–2 मामलों की आवश्यकता है, लेकिन बुनियादी ढाँचा कहीं अधिक क्षमता के अनुसार विकसित किया गया है। साथ ही प्रतीक्षा क्षेत्र, बैठने की व्यवस्था और लगभग 40 वाहनों की पार्किंग सुविधा उपलब्ध होगी।
● क्या ईशा फाउंडेशन ने पटना जैसी व्यवस्था कहीं और भी लागू की है? ईशा फाउंडेशन का ‘कायंथा स्थानम’ मॉडल वर्ष 2010 में तमिलनाडु के कोयंबटूर के नंजुंडापुरम क्षेत्र से शुरू हुआ था, जब पहला शवदाह गृह ईशा को सौंपा गया था। इसके बाद यह मॉडल पूरे राज्य में विस्तारित हुआ। वर्तमान में ईशा तमिलनाडु में 33 शवदाह गृहों का संचालन कर रहा है और पिछले 15 वर्षों में 1,25,000 से अधिक अंतिम संस्कार किए जा चुके हैं।
पिछले वर्ष ईशा ने तमिलनाडु में अपने प्रबंधित शवदाह गृहों पर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के लिए मुफ्त अंतिम संस्कार सेवा भी शुरू की थी।
4.5 एकड़ में बने श्मशान में एक साथ 18 शवों की अंत्येष्टि, जानें क्या है सुविधाएँ
पटना का बांसघाट श्मशान 4.5 एकड़ में फैला है। पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने इसे 89.40 करोड़ रुपए की लागत से विकसित किया है। यहाँ पहले मौजूद श्मशान 1.24 एकड़ में फैला था। इसे एक ऐसे परिसर के रूप में तैयार किया गया है जहाँ अंतिम संस्कार से जुड़ी लगभग पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है।
इस परिसर को आधुनिक स्वरूप दिया गया है और इसे एशिया के सबसे बड़े श्मशान परिसरों में से एक बताया जा रहा है। यहाँ एक साथ 18 अंतिम संस्कार किए जा सकते हैं। इसके लिए तीन तरह की व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं। पहली व्यवस्था पारंपरिक चिता आधारित अंत्येष्टि की है जिसके लिए 8 खुले स्थल बनाए गए हैं।
दूसरी व्यवस्था इलेक्ट्रिक शवदाह इकाइयों की है, जहाँ 4 आधुनिक यूनिट लगाई गई हैं। तीसरी व्यवस्था 6 लकड़ी आधारित पर्यावरण अनुकूल फर्नेस की है जिनमें कम लकड़ी और नियंत्रित प्रक्रिया के साथ अंतिम संस्कार किया जा सकता है। इसके अलावा गैस आधारित फर्नेस की तैयारी भी की जा रही है जिन्हें भविष्य में शुरू किया जाना प्रस्तावित है।
सरकार का कहना है कि इससे लागत और प्रदूषण दोनों कम होंगे, लेकिन चर्चा केवल दाह प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। अंतिम यात्रा में आने वाले लोगों के लिए यहाँ दो बड़े एसी वेटिंग हॉल बनाए गए हैं ताकि लोगों को कठिन परिस्थितियों में भी धूप, भीड़ और असुविधा का सामना न करना पड़े।
6 वुड क्रीमेसन ओवन हैं। इसे बिहार की कंपनी ने तैयार किया हैं। इसमें शव जलाने में कम लकड़ी लगती है। शव 20-25 मिनट में राख हो जाता है। धुंए को बाहर निकालने के लिए चिमनी लगाई गई है। परिसर में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया है, साफ और व्यवस्थित शौचालय बनाए गए हैं, लोगों के लिए कैंटीन की व्यवस्था की गई है।
श्मशान घाट की दीवारों पर पेंटिंग और राजा हरिश्चंद्र की कहानी
इस श्मशान घाट के दीवारों पर पेंटिंग बनाई गई है, जहाँ इंसान के जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन यात्रा और कर्मों के आधार पर स्वर्ग-नरक के मार्ग को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। इसके अलावा राजा हरिश्चंद्र की तस्वीर के साथ उनकी कहानी को उकेरी गई है, यह शोकाकुल लोगों को किसी भी परिस्थिति में सच्चाई और कर्तव्यों के पालन के लिए प्रेरित करेगी।
परिसर की दीवारों पर त्रिशूल बना आकर्षक फ्रेम लगाए गए हैं, जिसे मोक्ष धाम और वैकुंठ धाम नाम दिया गया है। यह एक HPL (हाई प्रेशर लैमिनेट) शीट है। इस व्यू कटर को गुजरात से मंगाया गया है। इसके अलावा परिसर के भीतर अंतिम संस्कार सामग्री उपलब्ध कराने के लिए दुकानें बनाई गई हैं ताकि परिजनों को बाहर भागदौड़ न करनी पड़े।
कपड़े, पूजन सामग्री, अगरबत्ती, लकड़ी, हवन सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुएँ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
आकर्षण का मुख्य केंद्र श्मशान घाट के दो द्वार हैं। इसमें से एक मोक्ष द्वार और दूसरा बैकुंठ द्वार है। दोनों की ऊँचाई 42 फीट है। एक एंट्री और दूसरा निकास पॉइंट है। दोनों द्वार में कांसे से बना ओम चिन्ह स्थापित किया गया है। इन्हें जालंधर के कारीगर ने तैयार किया है।
गंगाजल, अस्थि विसर्जन, मोर्चरी और डिजिटल सेवाएँ, 12 फीट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा
बांसघाट में कई ऐसी व्यवस्थाएँ भी जोड़ी गई हैं जिनकी चर्चा सामान्य रूप से श्मशान घाटों के संदर्भ में कम होती है। यहाँ गंगाजल आधारित दो अलग तालाब बनाए गए हैं। एक स्नान के लिए और दूसरा अस्थि विसर्जन के लिए उपयोग में लाया जाना प्रस्तावित है। दो तालाबों के बीच 12 फुट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की गई है।
प्रतिमा को तमिलनाडु के आदियोगी के तर्ज पर तैयार किया गया है। इसे बनाने के लिए जालंधर से कारीगर आए थे। इसे फाइबर मटेरियल से बनाया गया है। इस 15 फीट ऊँचे त्रिशूल के साथ स्थापित प्रतिमा में शिव की जटाओं से गंगा निकलती दिखाई देंगी और साथ ही आसपास लाइटिंग भी की गई है। वहीं, आगे की तरफ रास्तों पर ग्रीन एरिया को डेवलप गया है।
इसके पीछे तर्क ये है कि बदलती भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हर समय सीधे नदी तक पहुँच आसान नहीं होती। परिसर में मोर्चरी सुविधा भी विकसित की गई है जिससे आवश्यकता होने पर शव को सुरक्षित रखा जा सके। ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग की व्यवस्था को भी जोड़ा गया है ताकि लोगों को लंबी कतारों और अव्यवस्था से राहत मिल सके।
लोग ऑनलाइन स्लॉट भी बुक कर सकते हैं। इसके लिए पटना नगर निगम की वेबसाइट पर जाकर टिकट आईडी जेनरेट करना होगा। व्हाट्सएप चैटबोट 9264447449 के जरिए भी बुकिंग कर सकते हैं। हेल्प डेस्क जैसी व्यवस्था भी रखी गई है ताकि लोगों को दस्तावेज और प्रक्रियाओं में सहायता मिल सके।
वहीं पिकअप सर्विस के लिए मुक्ति रथ भी बुक कर सकते हैं। इसके साथ ही डेथ सर्टिफिकेट के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। सरकार का कहना है कि अंतिम संस्कार जैसी व्यवस्था में डिजिटल सुविधाओं का उद्देश्य सुविधा देना है, न कि परंपराओं को बदलना।
‘डिग्निटी इन डेथ’ : संस्था की मूल सोच
इस पूरे मॉडल के केंद्र में जिस विचार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है ‘डिग्निटी इन डेथ’। ईशा फाउंडेशन का मानना है कि मृत्यु एक मानवीय और भावनात्मक स्थिति है। इसी कारण प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की तैनाती, प्रक्रिया में सहायता, कम प्रतीक्षा समय, परिजनों के साथ सहयोग और व्यवस्थित वातावरण पर जोर दिया गया।
बिहार में अत्याधुनिक तकनीक से 40 शवदाह गृह बनाए जा रहे हैं। इसमें से 20 शवदाह गृह का निर्माण पूरा हो चुका है। उत्तर बिहार के 12 और दक्षिण बिहार के 8 जिलों में आधुनिक शवदाह गृहों का निर्माण हो चुका है। इन तैयार किए गए 20 शवदाह गृहों के सौंदर्यीकरण का काम अंतिम चरण में है, जिसके बाद इन्हें जल्द ही चालू कर दिया जाएगा।
पटना के दीघा घाट में भी ईशा फाउंडेशन की ओर से LPG गैस आधारित श्मशान घाट बनाया जाएगा। इसके अलावा, बेगूसराय के सिमरिया घाट, भागलपुर, गयाजी, सहरसा और छपरा में भी शवदाह गृहों को आधुनिक करने की योजना है। संस्था का यह भी कहना है कि सेवा का उद्देश्य लाभ नहीं बल्कि परिवार को कठिन समय में एक सम्मानजनक अनुभव देना है। सरकार का यह कदम किसी व्यवसाय का विस्तार नहीं बल्कि अंतिम यात्रा को गरिमा देने की कोशिश है।
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में गुरुवार (25 जून 2026) को आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो विनाशकारी भूकंपों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। पिछले 100 वर्षों के इस सबसे शक्तिशाली जलजले में अब तक कम से कम 235 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1,500 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं और सैकड़ों इमारतें जमींदोज हो चुकी हैं।
वेनेजुएला की इस भीषण त्रासदी के बाद भारत के भूवैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के बीच हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर चर्चा बेहद तेज हो गई है। भारतीय वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि भारत और यूरेशियाई टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलन स्थल पर स्थित हिमालयी क्षेत्र में कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, जिसका असर दिल्ली-एनसीआर तक देखने को मिलेगा।
भारत के पास ‘भूदेव’, ये बचाएगा लाखों की जान
इस बड़े खतरे से निपटने के लिए भारत ने हिमालय की कोख में एक बेहद आधुनिक सुरक्षा कवच तैयार किया है, जिसे ‘भूदेव (BhuDEV)’ प्लान नाम दिया गया है। दुनिया के किसी भी देश के पास भूकंप आने से पहले उसकी सटीक भविष्यवाणी (समय, स्थान और तीव्रता) करने की तकनीक आज भी मौजूद नहीं है। लेकिन भूकंप की शुरुआत होते ही तबाही मचाने वाले झटकों के पहुँचने से कुछ सेकंड पहले अलर्ट जारी करने वाली तकनीक विकसित कर ली गई है।
इसी तकनीक को ‘अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (EEW) कहा जाता है, जो आज के समय में लाखों लोगों की जान बचाने का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है।
आईआईटी रुड़की ने तैयार किया है खास सिस्टम
भारत में इस दिशा में सबसे सफल और ऐतिहासिक प्रयास उत्तराखंड सरकार के सहयोग से आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) ने किया है। आईआईटी रुड़की ने एक अत्याधुनिक भूकंप अर्ली वॉर्निंग मोबाइल ऐप और सिस्टम ‘भूदेव’ तैयार किया है। तकनीकी रूप से यह सिस्टम भूकंप के दौरान पैदा होने वाली तरंगों के सिद्धांत पर काम करता है।
जब जमीन के नीचे फॉल्ट लाइनों में हलचल होती है, तो सबसे पहले ‘पी-वेव’ (Primary Wave) निकलती है। यह तरंग बेहद तेज गति से चलती है लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं होता। इसके कुछ सेकंड बाद सबसे विनाशकारी ‘एस-वेव’ (Secondary Wave) और अन्य सतही तरँगें पहुँचती हैं, जो इमारतों को गिराती हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में जमीन के भीतर लगाए गए सेंसरों का घना नेटवर्क इन गैर-नुकसानदेह पी-वेव्स को तुरंत पकड़ लेता है। जैसे ही सेंसर इन तरंगों को डिकोड करते हैं, वे कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए सीधे केंद्रीय सर्वर और आम लोगों के मोबाइल ऐप ‘भूदेव’ पर अलर्ट भेज देते हैं।
यह चेतावनी मिलने का समय इस बात पर निर्भर करता है कि कोई खास शहर या इलाका भूकंप के केंद्र (Epicenter) से कितनी दूरी पर स्थित है। यदि कोई क्षेत्र भूकंप के केंद्र के बिल्कुल नजदीक है, तो वहाँ लोगों को संभलने का समय लगभग न के बराबर मिलेगा, लेकिन केंद्र से दूर स्थित घने बसे मैदानी शहरों को कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक का अमूल्य मार्जिन मिल जाता है।
इस बेहद महत्वपूर्ण समय अंतराल का उपयोग बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए किया जा सकता है। कुछ ही सेकंड के इस लाइफ-सेविंग मार्जिन के दौरान स्वचालित प्रणालियों के जरिए हाई-स्पीड ट्रेनों को रोका जा सकता है, घरेलू और औद्योगिक गैस पाइपलाइनों की सप्लाई को ऑटोमेटिक कट किया जा सकता है, मेट्रो सेवाओं को स्टेशनों पर ही थामने के निर्देश दिए जा सकते हैं और बिजली ग्रिडों को नियंत्रित कर बड़े शॉर्ट-सर्किट या आगजनी की घटनाओं को टाला जा सकता है। इसके साथ ही बहुमंजिला इमारतों और घरों में मौजूद आम नागरिकों को खुले मैदानों या सुरक्षित स्थानों पर भागने का मौका मिल जाता है।
भारत सरकार के वैज्ञानिक प्रतिष्ठान इस तकनीक को और अधिक सटीक और व्यापक बनाने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं। सरकार ने इस संबंध में संसद को भी आधिकारिक रूप से अवगत कराया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, “हिमालयी क्षेत्र में भूकंप की पूर्व चेतावनी (EEW) के लिए एक रियल-टाइम सिस्मिक नेटवर्क पूरी तरह से शुरू कर दिया गया है। इसके साथ ही, नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (NCS) क्षेत्रीय डेटा का इस्तेमाल करते हुए पी-वेव्स (P-Waves) का तेजी से पता लगाने, भूकंप की तीव्रता का तत्काल अनुमान लगाने और संभावित झटकों की जल्द भविष्यवाणी करने के लिए नए प्रोटोटाइप एल्गोरिदम भी विकसित कर रहा है।”
गढ़वाल और कुमाऊँ में तैनात हैं खास सेंसर
वर्तमान में ये एडवांस सेंसर मुख्य रूप से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों की सक्रिय भ्रंश रेखाओं (Active Fault Lines) के पास घने नेटवर्क के रूप में स्थापित किए गए हैं। देश के सबसे संवेदनशील सीस्मिक जोन-5 के बेहद करीब होने के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि गढ़वाल या कुमाऊँ क्षेत्र में 8 या 9 तीव्रता का कोई बड़ा भूकंप आता है, सीस्मिक जोन-4 में आने वाले दिल्ली-एनसीआर को इस अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए संभलने के लिए लगभग 40 से 60 सेकंड का बहुमूल्य समय मिल सकता है, जो राजधानी में मची भारी तबाही और लाखों मौतों को रोकने में गेम-चेंजर साबित होगा।
वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो भूकंप की पूर्व चेतावनी देने के मामले में जापान, ताइवान और अमेरिका दुनिया के सबसे उन्नत देश माने जाते हैं, जहाँ इस तकनीक ने हजारों जिंदगियाँ बचाई हैं। वेनेजुएला की ताजा और भयानक त्रासदी भारत को सचेत करती है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन ‘भूदेव’ जैसे आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम के विस्तार, भूकंप-रोधी निर्माण तकनीकों और जन-जागरूकता के बेहतरीन तालमेल से देश को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और हैंडलिंग में कथित गड़बड़ी का मामला अब जाँच के सबसे अहम दौर में पहुँच गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर इस मामले में FIR दर्ज हुई है। इसके बाद पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 आरोपितों को गिरफ्तार किया। आरोप है कि मंदिर में आने वाले दान की गिनती, रखरखाव और उससे जुड़ी व्यवस्था में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुईं।
यह मामला पहली बार 7 जून को सामने आया था। इसके बाद यूपी सरकार ने 13 जून को SIT का गठन किया। SIT ने 23 जून को एडिशनल चीफ सेक्रेटरी गृह संजय प्रसाद को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। इसी रिपोर्ट के दो दिन बाद कार्रवाई तेज हुई और मंदिर से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपितों में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जानेंगे कि ये 8 लोग कौन हैं इन पर क्या आरोप हैं।
FIR की कॉपी का एक हिस्सा
रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव
रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित चेहरा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का पूर्व ड्राइवर बताया जाता है और VHP के कारसेवकपुरम से भी जुड़ा रहा है। बताया गया है कि मंदिर की व्यवस्थाओं में उसका हस्तक्षेप रहता था और दानपात्रों की निगरानी से लेकर उन्हें बेसमेंट तक पहुँचाने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका थी।
आरोप है कि दानपात्रों की चाबियाँ भी उसी के पास रहती थीं और ट्रस्ट के लोगों से करीबी होने के कारण वह मनमाने तरीके से काम करता था। FIR और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी शुरुआती चरण में चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी हुई और उससे अयोध्या व आसपास के जिलों में संपत्तियाँ बनाने के आरोप लगे। हालाँकि, टिन्नू यादव ने कैश काउंटिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया है और आरोपों के पीछे कुछ ‘जलने वाले लोगों‘ को जिम्मेदार बताया है।
रामशंकर मिश्रा
रामशंकर मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप है। यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने बेटे अनुकल्प मिश्रा और दामाद लवकुश मिश्रा को भी चढ़ावा गिनने के काम में लगवाया।
पुलिस के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रामशंकर मिश्रा अन्य आरोपितों के साथ मिलकर दान की रकम में कथित हेराफेरी करते थे और कैश सॉर्टिंग प्रक्रिया के दौरान CCTV फुटेज में भी दिखे। जाँच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने तय वित्तीय प्रक्रिया को दरकिनार करने में भूमिका निभाई और लंबे समय तक कथित गड़बड़ी को आसान बनाया।
अनुकल्प मिश्रा
अनुकल्प मिश्रा, रामशंकर मिश्र का बेटा है और वह भी दान की रकम गिनने और संभालने की प्रक्रिया में शामिल था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अयोध्या के मिल्कीपुर क्षेत्र के बसावन गाँव का निवासी है। उसका संबंध ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा से भी बताया गया है।
अनुकल्प की ड्यूटी चढ़ावा गिनने के काम में लगती थी। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि कैश काउंटिंग के दौरान रकम में कथित हेराफेरी की गई और अनुकल्प के घर से चोरी की रकम बरामद होने का दावा भी किया गया है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि CCTV फुटेज और बरामदगी के आधार पर उसकी भूमिका की जाँच की जा रही है।
लवकुश मिश्रा
लवकुश मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम का हिस्सा था। आरोप है कि चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी के बाद उसके निपटान यानी ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी लवकुश पर थी। कहा गया है कि उसने मंदिर से चोरी कर करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है।
शुरुआती जाँच में उसके घर से रकम बरामद होने के दावे सामने आए थे। कुछ रिपोर्ट्स में उसके घर से करीब 12 लाख रुपए कैश मिलने की बात कही गई है। जाँच एजेंसियाँ इस रकम के स्रोत की जाँच कर रही हैं और आरोप है कि वह अनुकल्प मिश्रा के साथ मिलकर दान की रकम की हेराफेरी में सक्रिय रूप से शामिल था।
अविनाश शुक्ला
अविनाश शुक्ला को मंदिर की व्यवस्था और दान की रकम से जुड़ी प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति बताया गया है। रिपोर्ट्स में उसे मंदिर का अटेंडेंट या काउंटिंग टीम से जुड़ा सदस्य बताया गया है। आरोप है कि वह दान की रकम को सुरक्षित तरीके से काउंटिंग रूम तक पहुँचाने और गिनती की प्रक्रिया में शामिल था।
पुलिस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि वह उस कथित सिंडिकेट का अहम सदस्य था, जिस पर चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी का आरोप है। उसके बैंक खाते से करीब 5 लाख रुपए बरामद होने की चर्चा भी रिपोर्ट्स में सामने आई है। उस पर दान की रकम के कथित दुरुपयोग और उससे संपत्ति बनाने के आरोप लगाए गए हैं।
मनीष कुमार यादव
मनीष कुमार यादव, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का भतीजा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह टिन्नू यादव के छोटे भाई बलराम यादव का बेटा है। पुलिस के हवाले से कहा गया है कि मनीष मंदिर में दान की रकम गिनने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल था।
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसके घर से भी चोरी की रकम बरामद हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान उसके घर से करीब 36 लाख रुपए नकद मिलने का दावा किया गया है। जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह रकम कहाँ से आई और इसका संबंध कथित गबन से किस तरह जुड़ता है।
सुभाष चंद्र श्रीवास्तव
सुभाष चंद्र श्रीवास्तव पूर्व बैंक कर्मचारी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें राम मंदिर में कैश काउंटिंग स्टाफ का प्रभारी बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी दान की रकम की गिनती करने वाले कर्मचारियों की निगरानी और पूरी काउंटिंग प्रक्रिया को देखना था। बैंकिंग पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इस काम की निगरानी के लिए रखा गया था।
FIR और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन पर निगरानी में कथित लापरवाही और अनियमितताओं में संलिप्तता के आरोप हैं। जाँच एजेंसियाँ यह देख रही हैं कि उनके प्रभारी रहते हुए दान की रकम की गिनती में कथित गड़बड़ी कैसे हुई।
करुणेश पांडेय
करुणेश पांडेय पर दान की रकम से जुड़ी रसीदों और वित्तीय रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी का आरोप है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा के साथ पूरी साजिश में शामिल था। जाँच एजेंसियों का दावा है कि वह श्रद्धालुओं के चढ़ावे को संभालने वाली कोर टीम का हिस्सा थे।
एक रिपोर्ट के अनुसार, उनकी जिम्मेदारी दान की रकम को गिनती वाले कमरे तक पहुँचाने से भी जुड़ी थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने रकम और रिकॉर्ड की हेराफेरी में भूमिका निभाई और कथित गड़बड़ी से संपत्ति अर्जित की।
सोशल मीडिया पर पैगंबर मोहम्मद और हजरत आयशा के खिलाफ कथित तौर पर की गई एक टिप्पणी को लेकर इस समय देश के कई राज्यों में भारी बवाल मचा हुआ है। मुंबई की रहने वाली नाजिया इलाही खान के एक पुराने बयान के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के कई शहरों में अचानक मुस्लिम समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए हैं।
इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी का एक Video सोशल मीडिया पर Viral हुआ। इसके बाद ओवैसी पर भीड़ को भड़काने और ‘सर तन से जुदा’ जैसे खतरनाक नारों के लिए उकसाने के आरोप लग रहे हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि FIR के बहाने इस्लामी कट्टरपंथी किस दंगे या हिंसा की साजिश को अंजाम देना चाहते हैं?
महाराष्ट्र में पहली FIR और रजा एकेडमी का एक्शन
इस पूरे विवाद की कानूनी शुरुआत महाराष्ट्र से हुई। मुंबई महानगर क्षेत्र के भिवंडी में स्थित शांति नगर थाने में स्थानीय निवासी रविश मोमिन और अदनान अंसारी की शिकायत पर नाजिया इलाही खान और पॉडकास्ट होस्ट दिव्या सिंह के खिलाफ देश की पहली FIR दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 19 जून को इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई एक पॉडकास्ट रील में नाजिया ने आपत्तिजनक बयान दिए जिससे मुस्लिम समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं।
इसके साथ ही मुंबई के पाधोनी थाने में रजा एकेडमी के अध्यक्ष अलहाज मुहम्मद सईद नूरी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पहुँचा और नाजिया की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। एडवोकेट इरफान शेख की शिकायत पर पुलिस ने जीरो FIR दर्ज की। डीसीपी रागसुधा के मुताबिक, इस मामले का मुख्य अधिकार क्षेत्र पश्चिम बंगाल में आता है, इसलिए केस को आगे की जाँच के लिए वहाँ ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
मालेगाँव और हैदराबाद में बढ़ा कानूनी शिकंजा
महाराष्ट्र के मालेगाँव में भी ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल इस्लाम के पदाधिकारियों की शिकायत पर नाजिया के खिलाफ एक और FIR दर्ज की गई। संगठन के प्रतिनिधि सूफी नुरुल अयन साबरी ने बताया कि नाजिया लंबे समय से मुस्लिम समुदाय, उनकी मजहबी हस्तियों और त्यौहारों के खिलाफ विवादित बयान दे रही हैं। उन्होंने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है।
दूसरी तरफ, हैदराबाद में भी विभिन्न इस्लामी संगठनों के प्रमुख उलेमाओं ने चारमीनार जोन के डीसीपी किरण खरे प्रभाकर से मुलाकात कर नाजिया के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत में आरोप लगाया गया कि नाजिया ने हिंदुओं से सरकारी और निजी नौकरियों में मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करने की अपील की थी। प्रतिनिधिमंडल ने इस बयान को सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक सीधा खतरा बताया।
उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भारी विरोध प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश में भी इस बयान को लेकर अचानक गुस्सा भड़क उठा है। बलरामपुर के उतरौला कोतवाली में समाजसेवी फिरोज खान और डॉ सलमान जमशेद की तहरीर पर नाजिया के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। वहीं बागपत के बड़ौत कोतवाली में एडवोकेट आकिब चौधरी के नेतृत्व में मुस्लिम समाज ने देर रात थाने का घेराव किया। पुलिस ने बड़ौत में निष्पक्ष जाँच का भरोसा देते हुए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है।
इसके अलावा बरेली में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रदेश महासचिव नदीम कुरैशी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल कोतवाली पहुँचा और तहरीर सौंपी। रामपुर के मिलक में भी भैंसोड़ी शरीफ के सैकड़ों लोग रात के समय सीओ रजवीर सिंह परिहार के दफ्तर पहुँचे और शिकायती पत्र देकर सख्त कार्रवाई की माँग की। शामली के थानाभवन में भी युवा जन सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ आसिफ की अगुवाई में थाना प्रभारी को ज्ञापन दिया गया।
अलीगंज में ज्ञापन और मध्य प्रदेश-कश्मीर तक फैली आग
उत्तर प्रदेश के अलीगंज और आंवला के लीलौर बुजुर्ग में सैकड़ों लोगों ने इकट्ठा होकर SDM विदुषी सिंह से मुलाकात की और नाजिया के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की माँग उठाई। इस प्रदर्शन में भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हुए, जिन्होंने कहा कि सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। इटावा में भी AIMIM के जिलाध्यक्ष शमशाद हुसैन वारसी ने डीएम और एसएसपी को ज्ञापन सौंपा।
मध्य प्रदेश के जबलपुर में भी गोहलपुर थाने का मुस्लिम समाज और युवाओं ने भारी घेराव किया और तुरंत FIR की माँग की। वहीं जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में BJP के को-मीडिया प्रभारी साजिद यूसुफ शाह ने नाजिया के बयान की कड़ी निंदा की और कहा कि BJP अल्पसंख्यक मोर्चा से उनका कोई संबंध नहीं है। जम्मू-कश्मीर बीजेपी ने घोषणा की है कि वे इस बयान के खिलाफ श्रीनगर पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराएँगे।
क्या यह देश का माहौल खराब करने की कोई बड़ी साजिश है?
इस पूरे मामले के घटनाक्रम को अगर ध्यान से देखा जाए, तो इसमें एक गहरी और सोची-समझी साज़िश की बू आती है। नाजिया इलाही खान का बयान कुछ दिन पुराना है, लेकिन कई दिनों तक शांत रहने के बाद अचानक एक ही दिन, एक साथ देश के कई राज्यों के शहरों में मुस्लिम समाज का सड़कों पर उतर आना सामान्य बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के रामपुर, बरेली, मेरठ से लेकर महाराष्ट्र के मालेगाँव और मध्य प्रदेश के जबलपुर तक जिस तरह अचानक इस्लामी भीड़ जुटी, वह साफ इशारा करता है कि इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है जो बैकस्टेज से इस पूरी भीड़ को कोऑर्डिनेट कर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है। आमतौर पर देखा गया है कि देश में इस तरह के धार्मिक मुद्दों पर शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद अचानक भारी हिंसा भड़क उठती है। ऐसे में जुमे से ठीक एक दिन पहले पूरे देश में एक सोची-समझी रणनीति के तहत ‘डॉग व्हिसलिंग’ की गई। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं के Video Viral करना सिर्फ एक बहाना था, असली मकसद गुरुवार को सड़कों और थानों पर अपना भारी शक्ति प्रदर्शन दिखाना था, ताकि शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों को भड़काकर देश को दंगे की आग में झोंका जा सके। इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर ऐसी पुरानी बातों का सहारा लेकर माहौल खराब करने का षड्यंत्र रचते हैं, जिससे देश की सुरक्षा और आपसी भाईचारे को गंभीर खतरा पैदा होता है।
“Commitment is an act, not a word.” दार्शनिक जाँ-पॉल सार्त्र का यह कथन केवल जीवन पर ही नहीं, खेल पर भी उतना ही सटीक बैठता है। विश्व कप जैसे मंच पर इरादे नहीं, प्रदर्शन मायने रखता है। बीती रात और आज सुबह खेले गए ग्रुप चरण के मुकाबलों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि फुटबॉल में कोई भी टीम केवल नाम के दम पर नहीं जीतती। हर मिनट, हर पास और हर गोल अपनी कहानी लिखता है।
फिलाडेल्फिया में कुराकाओ की टीम का मुकाबला आइवरी कोस्ट से था। कुराकाओ ने शुरुआती बढ़त लेने के कई प्रयास किए, लेकिन उसके सभी हमले नाकाम रहे। कभी आर्सेनल के लिए खेल चुके स्टार खिलाड़ी निकोलास पेपे ने सातवें मिनट में गोल कर अपनी टीम को बढ़त दिलाई और दूसरे हाफ में एक और गोल दागते हुए जीत पर मुहर लगा दी। तीन मैचों में नौ गोल खाने और लगातार दो हार झेलने के बाद कुराकाओ का विश्व कप सफर यहीं समाप्त हो गया।
इसके बाद न्यू जर्सी के स्टेडियम में ग्रुप ई का सबसे बड़ा मुकाबला खेला गया, जहां जर्मनी का सामना इक्वाडोर से था। मैच की शुरुआत तेज रही। युवा फ्लोरियन विर्ट्ज़ ने लीरोए साने को शानदार पास दिया और साने ने उसे गोल में बदलकर जर्मनी को बढ़त दिला दी। इस गोल को लेकर विवाद भी हुआ क्योंकि इक्वाडोर का मानना था कि बिल्ड-अप में फाउल हुआ था, लेकिन VAR ने गोल को बरकरार रखा।
इक्वाडोर ने हालांकि संयम नहीं खोया। सात मिनट बाद ही नील्सन अंगुलो ने गोल कर स्कोर 1-1 कर दिया। दूसरे हाफ में दोनों टीमों के बीच संघर्ष जारी रहा, लेकिन 77वें मिनट में गोंजालो प्लाटा ने शानदार गोल दागकर जर्मनी को स्तब्ध कर दिया। इस ऐतिहासिक जीत के साथ इक्वाडोर ने लगभग दो दशक बाद विश्व कप के नॉकआउट चरण में जगह बनाई। पीली जर्सी पहने समर्थकों का उत्साह देखते ही बन रहा था।
ग्रुप एफ में कन्सास सिटी में नीदरलैंड का सामना ट्यूनीशिया से हुआ। ट्यूनीशिया इस टूर्नामेंट में अब तक संघर्ष करती नजर आई थी और इस मुकाबले में भी शुरुआती दस मिनट के भीतर ही नीदरलैंड ने 2-0 की बढ़त बना ली। ब्रायन ब्रॉबी ने एक बार फिर गोल किया। दूसरे हाफ में मस्तौरी ने ट्यूनीशिया के लिए एक गोल कर उम्मीदें जगाईं, लेकिन हाल ही में टॉटनहैम से जुड़े डिफेंडर वान हेके ने 62वें मिनट में गोल कर नीदरलैंड की 3-1 की जीत सुनिश्चित कर दी। टीम ऑरांजे ने शानदार प्रदर्शन के साथ अगले दौर में अपनी जगह पक्की कर ली।
इसी ग्रुप के दूसरे मुकाबले में डलास में जापान और स्वीडन आमने-सामने थे। जापान ने 3-4-3 जबकि स्वीडन ने 3-4-1-2 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। दोनों टीमें लगातार आक्रमण करती रहीं।
56वें मिनट में रित्सु दोआन के पास पर दाएज़ेन माएदा ने शानदार फिनिश करते हुए जापान को बढ़त दिलाई। लेकिन यह बढ़त ज्यादा देर कायम नहीं रह सकी। छह मिनट बाद विक्टर ग्योकेरेज़ के पास पर एंथनी इलांगा ने बेहतरीन लेफ्ट फुटेड कर्लर लगाकर स्कोर 1-1 कर दिया। जापान को जीत के कई मौके मिले, लेकिन स्वीडिश गोलकीपर ने शानदार बचाव करते हुए उन्हें गोल से दूर रखा। मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त हुआ। जापान एक जीत और दो ड्रॉ के साथ ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहते हुए अगले दौर में पहुंच गया, जबकि 48 टीमों वाले इस विश्व कप प्रारूप में सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान वाली टीमों में शामिल होने के कारण स्वीडन ने भी नॉकआउट चरण का टिकट हासिल कर लिया। अगले दौर में समुराई ब्लूज़ का सामना ब्राज़ील से होगा।
इसके बाद ग्रुप डी के मुकाबले खेले गए। लॉस एंजिलिस में पहले ही अगले दौर में पहुंच चुकी अमेरिकी टीम ने तुर्किये के खिलाफ अपनी शुरुआती एकादश में नौ बदलाव किए। इसके बावजूद तीसरे मिनट में क्रिस्टोफर ट्रस्टी के गोल से अमेरिका ने बढ़त बना ली। हालांकि अर्दा गुलेर ने दसवें मिनट में बराबरी दिलाई और यिल्माज़ ने तुर्किये को आगे कर दिया।
दूसरे हाफ की शुरुआत में सेबास्टियन बेर्हाल्टर ने अमेरिका के लिए स्कोर 2-2 कर दिया। मुकाबला ड्रॉ की ओर बढ़ता दिख रहा था, लेकिन इंजुरी टाइम के 90+8वें मिनट में कान अयहान ने गोल दागकर तुर्किये को 3-2 की यादगार जीत दिला दी।
इसी समय सैन फ्रांसिस्को में ऑस्ट्रेलिया और पैराग्वे के बीच मुकाबला खेला गया। दोनों टीमें पूरे मैच में गोल नहीं कर सकीं और मुकाबला 0-0 से समाप्त हुआ। इस परिणाम के साथ कंगारू टीम ग्रुप डी में दूसरे स्थान पर रहते हुए अगले दौर के लिए क्वालिफाई करने में सफल रही।
अब नजरें अगले मुकाबलों पर हैं। भारतीय समयानुसार आज रात ग्रुप आई में नॉर्वे और फ्रांस आमने-सामने होंगे, जबकि इराक का सामना सेनेगल से होगा। इसके बाद ग्रुप एच में काबो वर्दे और सऊदी अरब के बीच मुकाबला खेला जाएगा, वहीं स्पेन और उरुग्वे की टक्कर भी खास आकर्षण का केंद्र रहेगी। सुबह ग्रुप जी में बेल्जियम, न्यूज़ीलैंड, मिस्र और ईरान की टीमें मैदान पर उतरेंगी, जहां नॉकआउट की आखिरी तस्वीर काफी हद तक साफ होती नजर आएगी।
विश्व कप का ग्रुप चरण अब अपने निर्णायक मोड़ पर है। यहां हर मैच केवल तीन अंकों की लड़ाई नहीं, बल्कि उम्मीदों, दबाव और इतिहास के बीच लिखा जाने वाला एक नया अध्याय है। कुछ टीमें अपने सपनों को आगे बढ़ा रही हैं, तो कुछ का सफर यहीं थम रहा है। यही फुटबॉल की सबसे बड़ी खूबसूरती है, यह आखिरी सीटी बजने तक किसी कहानी का अंत तय नहीं होने देता। अगले मुकाबलों में कौन इतिहास रचेगा और किसका सपना टूटेगा, इसकी कहानी भी हम आपके लिए लेकर आएंगे।
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने सोमवार (22 जून 2026) को राज्य विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपना पूर्ण बजट पेश किया। इस बजट में निवेश, बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की गई।
वहीं गुरुवार (25 जून 2026) को प्रकाशित SBI रिसर्च की विस्तृत विषयगत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, यह बजट निवेश-आधारित विकास और दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है।
SBI की इस रिपोर्ट में केवल नवीनतम बजट के प्रावधानों का ही विश्लेषण नहीं किया गया, बल्कि पश्चिम बंगाल की आर्थिक यात्रा को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी रखा गया।
विश्लेषण में बताया गया कि कभी भारत के सबसे मजबूत आर्थिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल रहा पश्चिम बंगाल, पिछले कई दशकों में धीरे-धीरे अपनी स्थिति खोता गया और अब उसके सामने राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुँचने की चुनौती है।
SBI रिपोर्ट ने पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था का इतिहास बताया
SBI रिसर्च रिपोर्ट का सबसे उल्लेखनीय पहलुओं में से एक पश्चिम बंगाल की दीर्घकालिक आर्थिक यात्रा का विश्लेषण है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दशक के शुरुआती वर्षों में पश्चिम बंगाल ने मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज की थी।
वर्ष 2012-13 में राज्य की नॉमिनल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वृद्धि दर 13.6% तक पहुँच गई थी, जो 2013-14 में बढ़कर 14.4% हो गई। हालाँकि देश के अन्य हिस्सों की तरह पश्चिम बंगाल को भी कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर झटका लगा। वर्ष 2020-21 में आर्थिक गतिविधियाँ लगभग ठप हो जाने के कारण राज्य की नाममात्र और वास्तविक दोनों वृद्धि दरें नकारात्मक स्तर पर पहुँच गई थीं।
ग्राफ एसबीआई रिसर्च के माध्यम से
लॉकडाउन की अवधि के बाद राज्य की अर्थव्यवस्था में मजबूत सुधार देखने को मिला। वर्ष 2021-22 में नाममात्र नॉमिनल वृद्धि दर बढ़कर 17.4% हो गई, जबकि वास्तविक वृद्धि दर 11.6% तक पहुँच गई। इसके बाद से आर्थिक वृद्धि स्थिर बनी हुई है।
साल 2025-26 के संशोधित अनुमानों के अनुसार, नॉमिनल वृद्धि दर 9.9% और वास्तविक वृद्धि दर 7.6% रहने का अनुमान है। वहीं वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में नॉमिनल वृद्धि दर 7.9% रहने का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र पर आधारित है, जिसका ग्रोस वैल्यू ऐडेड-GVA (Gross Value Added-GVA) में 58.3% योगदान है। उद्योग क्षेत्र का योगदान 21.6% है, जबकि कृषि क्षेत्र अभी भी 20.1% की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है।
हालाँकि विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रति व्यक्ति आय से जुड़ा है। SBI रिसर्च के अनुसार, वित्त वर्ष 1977-78 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 1266 रुपए थी, जो उस समय राष्ट्रीय औसत 1194 रुपए से अधिक थी। उस समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में राज्य देश के सभी राज्यों में पांचवें स्थान पर था।
हालाँकि इसके बाद के दशकों में राज्य की सापेक्ष स्थिति लगातार कमजोर होती गई। वित्त वर्ष 2011-12 तक पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 56693 रुपए रह गई और इस आधार पर राज्य भारतीय राज्यों में 21वें स्थान पर पहुँच गया।
इसके बाद राज्य की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ। वित्त वर्ष 2024-25 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर लगभग 1.81 लाख रुपए हो गई, जिससे उसकी रैंकिंग सुधरकर 19वें स्थान पर पहुँच गई। इसके बावजूद यह राष्ट्रीय औसत 2.35 लाख रुपए से काफी पीछे है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय अखिल भारतीय औसत से लगभग 23% कम है।
वित्त वर्ष 2011-12 से 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय में 3.20 गुना वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर यह वृद्धि 3.28 गुना रही। इससे संकेत मिलता है कि राज्य अब भी देश की समग्र आर्थिक प्रगति की गति से पीछे चल रहा है।
पश्चिम बंगाल ने अपनी आर्थिक बढ़त कैसे खो दी
यह गिरावट कई दशकों में फैले राजनीतिक, औद्योगिक और संरचनात्मक कारकों का संयुक्त परिणाम है। स्वतंत्रता के समय और 1960 के दशक तक पश्चिम बंगाल भारत के इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल सेंटर में से एक था। कोलकाता वित्त, मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, चाय और जूट उद्योगों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
स्थिति में बदलाव 1970 और 1980 के दशक के दौरान शुरू हुआ। राजनीतिक अस्थिरता, श्रमिक अशांति, लगातार हड़तालें, घेराव और बिजली की कमी ने कारोबार के लिए माहौल को लगातार मुस्किल बना दिया। इसके चलते कई बड़े औद्योगिक घरानों ने अपने ऑपरेशन महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ट्रांसफर कर दिए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1977 में सत्ता में आई वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) सरकार ने ऑपरेशन बर्गा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भूमि सुधार और ग्रामीण विकास पर विशेष जोर दिया। हालाँकि इन नीतियों से कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ और ग्रामीण आजीविका मजबूत हुई, लेकिन बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण सीमित ही रहा।
इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल उस मैन्युफैक्चरिंग उछाल का पूरा लाभ नहीं उठा सका, जिसने देश के कई पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
समय के साथ राज्य की अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र पर अधिक निर्भर होती चली गई। हालाँकि बैंकिंग, रिटेल और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) जैसे क्षेत्रों में वृद्धि हुई, लेकिन यह इतनी नहीं थी कि अन्य राज्यों की तुलना में समान गति से आय बढ़ाने के लिए आवश्यक बड़े पैमाने पर हाई सैलरी वाले रोजगार पैदा किए जा सकें।
केंद्रीय फंड पर बनी हुई है निर्भरता ज्यादा
SBI की रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के वित्तीय ढाँचे के एक और महत्वपूर्ण पहलू को भी सामने लाती है, जो केंद्र सरकार से मिलने वाले धन पर राज्य की लंबे समय से चली आ रही निर्भरता है।
विश्लेषण के अनुसार, पश्चिम बंगाल को अपने कुल रेविन्यू का 50% से अधिक हिस्सा लगातार केंद्र सरकार से करों में हिस्सेदारी और ग्रांट के रूप में मिलता रहा है।
वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों के अनुसार, केंद्र से प्राप्त करों में राज्य की हिस्सेदारी कुल राजस्व प्राप्तियों का 34% रहने का अनुमान है, जबकि केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान का योगदान 22% है। इस प्रकार, दोनों को मिलाकर राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का 56% हिस्सा केंद्र सरकार से आने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल का खुद का कर पिछले कई वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है। साल 2010-11 में राज्य के अपने कर संग्रह का योगदान कुल राजस्व प्राप्तियों में 45% था। वहीं एक दशक से अधिक समय बाद भी वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों में यह आंकड़ा घटकर 41% पर ही है।
नॉन टैक्स रेविन्यू के मामले में स्थिति और भी अधिक उल्लेखनीय है। रिव्यू पीरियड के अधिकांश वर्षों में राज्य का स्वयं का गैर-कर राजस्व कुल प्राप्तियों का लगभग 3% ही बना रहा है।
समय के साथ राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों टोटल रेवेन्यू रैपिटस रिसिप्ट में निश्चित रूप से वृद्धि हुई है। यह साल 2010-11 में 47264 करोड़ रुपए से बढ़कर साल 2026-27 में अनुमानित 3.2 लाख करोड़ रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। इसके बावजूद, SBI के आंकड़े बताते हैं कि राज्य अब भी अपने रेवेन्यू बेस का उल्लेखनीय विस्तार करने में संघर्ष कर रहा है और केंद्र सरकार से मिलने वाले वित्तीय हस्तांतरण पर काफी हद तक निर्भर बना हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, सालों से केंद्र सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल अब भी भारी कर्ज के बोझ का सामना कर रहा है।
बजट की भाषा अब कल्याण से विकास की ओर बढ़ती दिखी
SBI अध्ययन के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक पिछले 16 साल में प्रस्तुत किए गए बजट भाषणों का विषयगत विश्लेषण है। रिपोर्ट के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के दौरान पेश किए गए शुरुआती बजटों का मुख्य फोकस कल्याणकारी और पुनर्वितरण आधारित नीतियों पर रहा। कई बजट चक्रों में सामाजिक कल्याण सबसे प्रमुख विषय बना रहा है।
हालाँकि मौजूदा भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026-27 का बजट प्राथमिकताओं में एक उल्लेखनीय बदलाव को दर्शाता है। SBI ने इस बदलाव को पुनर्वितरण से क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक आर्थिक विकास लॉंग टर्म इकोनॉमिक डेवलपमेंट की दिशा में संक्रमण बताया है।
इस बदलाव का सबसे स्पष्ट संकेत निवेश पर बढ़ते जोर से मिलता है। वर्ष 2026-27 के बजट भाषण में निवेश विषय का उल्लेख अब तक के सर्वोच्च स्तर 4.5% पर पहुँच गया, जो पिछले कुछ वर्षों के स्तर की तुलना में काफी अधिक है।
SBI रिसर्च के माध्यम
गवर्नेंस और राजकोषीय प्रबंधन फिस्कल मैनेजमेंट भी एक बार फिर बजट की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरे हैं। बजट विमर्श में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 2.1% हो गई है, जो सार्वजनिक पब्लिक फिनान्स और प्रशासनिक दक्षता में सुधार पर नए सिरे से दिए जा रहे जोर को दर्शाती है।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि कई नए विषय उभरकर सामने आए हैं, जिन्हें पहले के वर्षों में कम महत्व मिला था।
पर्यटन और संस्कृति का उल्लेख रिकॉर्ड स्तर 1% तक पहुँच गया। जलवायु और पर्यावरण का हिस्सा बढ़कर 0.8% हो गया, जो उपलब्ध आंकड़ों की श्रृंखला में सबसे अधिक है। वहीं शिक्षा का हिस्सा भी 0.8% रहा, जबकि स्वास्थ्य का योगदान 0.7% दर्ज किया गया।
टेक्नोलॉजी एण्ड आर्टफिशल इन्टेलिजन्स का उल्लेख बढ़कर 0.6% तक पहुँच गया, जो हाल के वर्षों में लगातार बढ़ते रुझान को दर्शाता है। वहीं आन्ट्रप्रनर्शिप की हिस्सेदारी 0.4% के उच्च स्तर पर बनी रही।
SBI के अनुसार, ये रुझान एक व्यापक विकासवादी दृष्टिकोण की ओर संकेत करते हैं, जिसका केंद्र आर्थिक क्षमता निर्माण, निवेश सृजन और करियर ओरिएंटेड क्षेत्रों के विकास पर है।
सीरीज में सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाला बजट
रिपोर्ट में बजट भाषणों का भाषाई विश्लेषण भी किया गया है। इसके लिए सकारात्मक और नकारात्मक शब्दों के संतुलन को मापने हेतु बिंग सेंटिमेंट लेक्सिकॉन का उपयोग किया गया।
विश्लेषण के परिणाम बताते हैं कि वर्ष 2026-27 के बजट में पूरे उपलब्ध डेटा सेट के दौरान सबसे अधिक आशावादी भाषा का प्रयोग किया गया है।
SBI रिसर्च के अनुसार, नवीनतम बजट में साल 2010-11 से ट्रैकिंग शुरू होने के बाद का सबसे अधिक नेट सेंटिमेंट स्कोर दर्ज किया गया है। बजट भाषण में सकारात्मक शब्दों की हिस्सेदारी भी अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई, जो विस्तारवादी और अत्यधिक महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण को दर्शाती है।
विश्लेषण यह भी दिखाता है कि कोविड-19 महामारी से उत्पन्न व्यवधानों के बाद साल 2021-22 से इस दिशा में स्पष्ट रूप से लगातार बढ़ता हुआ रुझान देखने को मिला है।
ग्राफ SBI रिसर्च के माध्यम से
इस श्रृंखला में सबसे कम सेंटिमेंट स्कोर कोविड-19 महामारी के तुरंत बाद वाले साल 2021-22 में दर्ज किया गया था। इसके बाद से हर साल सेंटिमेंट में लगातार सुधार हुआ और अंततः साल 2026-27 के बजट में अब तक के सबसे अधिक आशावाद को दर्शाने वाला रिकॉर्ड-उच्च स्तर दर्ज किया गया।
SBI के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि नीति-निर्माता अब राज्य के भविष्य को संकट प्रबंधन के बजाय आर्थिक वृद्धि, निवेश और लॉंग टर्म ट्रैन्स्फर्मैशन के इर्द-गिर्द अधिक मजबूती से दिखा रहे हैं।
पिछली रिपोर्ट्स में TMC राज में आर्थिक गिरावट की कही गई थी बात
SBI की यह रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के दीर्घकालिक आर्थिक प्रदर्शन को लेकर पहले सामने आ चुके विश्लेषणों की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनमें राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी।
इससे पहले ऑपइंडिया ने फिन्स्केप्टिक्स द्वारा प्रकाशित एक वित्तीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया था कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के शासनकाल के दौरान पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय संरचनात्मक गिरावट देखने को मिली।
उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बीच-बीच में आर्थिक वृद्धि के कुछ दौर आने के बावजूद, अन्य प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल की समग्र आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई।
रिपोर्ट में राज्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट, राष्ट्रीय औसत की तुलना में प्रति व्यक्ति आय की धीमी वृद्धि और केंद्र सरकार से मिलने वाले फाइनैन्शल ट्रांसफर पर बढ़ती निर्भरता को प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया गया था।
नई SBI रिसर्च रिपोर्ट इन राजनीतिक निष्कर्षों पर कोई टिप्पणी नहीं करती, लेकिन उसका ऐतिहासिक विश्लेषण भी यह दर्ज करता है कि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर वित्त वर्ष 1977-78 में देश का पाँचवाँ सबसे समृद्ध राज्य रहा पश्चिम बंगाल आज 19वें स्थान पर पहुँच चुका है।
साथ ही SBI के आकलन के अनुसार साल 2026-27 का बजट निवेश, सुशासन सुधार, प्रौद्योगिकी को अपनाने और आर्थिक क्षमता निर्माण पर अधिक जोर देकर इस आर्थिक दिशा को बदलने का प्रयास करता हुआ दिखाई देता है।
हालाँकि यह बदलाव कई दशकों से चली आ रही इस सापेक्ष गिरावट को वास्तव में पलट पाएगा या नहीं, इसका स्पष्ट उत्तर आने वाले सालों में ही मिलेगा। फिलहाल यह रिपोर्ट एक ऐसे राज्य की विस्तृत तस्वीर पेश करती है, जो कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित आर्थिक ढाँचे से आगे बढ़कर विकास और आर्थिक वृद्धि केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहा है, लेकिन साथ ही अपनी लंबी आर्थिक यात्रा से पैदा हुई चुनौतियों का भी सामना कर रहा है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज तबस्सुम खान द्वारा 12 जून 2026 को ‘मॉब लिंचिंग’ से जुड़े एक मामले में 7 लोगों को उम्रकैद दिए जाने का फैसला चर्चा में है। कहीं इन लोगों को गौ-रक्षक बताया जा रहा है तो कहीं फैसले से जुड़ी अन्य तरह की चर्चाएँ हैं। कई जगह लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और ऊपरी अदालत जाने की बात कह रहे हैं।
इन चर्चाओं के बीच हमने जज तबस्सुम खान के उस फैसले को पढ़ने और यह समझने की कोशिश की, कि किस तरह वे उम्रकैद देने के नतीजे तक पहुँची हैं। इस फैसले में कई जगह कई सवाल उठते हैं जिनकी हम बिंदुवार चर्चा करेंगे। इसका मकसद बस यह समझना है कि इस केस में क्या सबूत थे, गवाह थे और कैसे यह नतीजा मिला। सबसे पहले शुरुआत इस केस को समझने से करते हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह समझने के लिए अभी हम कोर्ट के फैसले का ही सहारा लेंगे। हालाँकि, आगे इसमें कुछ अलग वर्जन भी मिलेंगे लेकिन अभी शुरुआती मामला कोर्ट ने यही बताया है। यह मामला 3 अगस्त 2022 की रात करीब 12:30 बजे नंदरवाड़ा रोड, ग्राम बराखड़, थाना सिवनीमालवा क्षेत्र में हुई मारपीट और हत्या से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, फरियादी शेख लाला अपने साथी नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ ट्रक MH/MP-40-CD-8751 (कोर्ट ने दो अलग-अलग नंबर लिखे हैं) से जा रहा था।
इससे पहले 2 अगस्त 2022 की शाम करीब 5-6 बजे वे नंदरवाड़ा पहुँचे थे। वहाँ सेट्टी नामक व्यक्ति ने कॉल करके उन्हें माल भरने बुलाया था। आरोप है कि नंदरवाड़ा नहर किनारे खेत के पास से ट्रक में गाय-बैल जैसे जानवर भरवाए गए, जिन्हें महाराष्ट्र के अमरावती ले जाया जा रहा था।
अभियोजन के मुताबिक, जब ट्रक 3 अगस्त 2022 को रात करीब 12:30 बजे बराखड़ गाँव के पास नंदरवाड़ा रोड पर पहुँचा, तब 10-12 गाँव वालों ने रास्ता रोक लिया। इसके बाद शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की गई। पुलिस मौके पर पहुँची और घायलों को अस्पताल ले गई। मारपीट में आई चोटों के कारण इलाज के दौरान नजीर अहमद की मौत हो गई। शेख लाला की रिपोर्ट पर ग्राम बराखड़ के 10-12 अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 147, 148, 341, 307 और 302 IPC के तहत मामला दर्ज किया गया।
विवेचना थाना प्रभारी निरीक्षक जितेंद्र सिंह यादव द्वारा की गई। घटनास्थल से खून लगी घास, सादी घास, खून लगी मिट्टी, सादी मिट्टी, चप्पलें और लकड़ी के टुकड़े जब्त किए गए। साथ ही, मृतक नजीर अहमद का पोस्टमार्टम कराया गया। इसके अलावा चश्मदीद गवाह यज्ञेश कुमार तिवारी के धारा 164 CrPC के बयान कराए गए जिनमें आकाश सराठे, गौरव यादव, आकाश उर्फ पिन्टोली, राजू उर्फ राजेन्द्र कौशल, चेतन मराठा, देवेंद्र कोरी, संदीप उर्फ राजा, दीपक उर्फ बाबा केवट, भोला बाथव, पवन बाथव, कन्हैया बाथव, प्रकाश कौशल, अज्जू राठौर और बल्लू रघुवंशी के नाम सामने आए।
जाँच के दौरान शेख मुश्ताक और शेख लाला के मरणासन्न कथन भी लिखे गए। तहसीलदार ललित सोनी द्वारा शिनाख्तगी (पहचान) मेमो तैयार किए गए। जब्त सामान FSL जाँच के लिए भोपाल भेजा गया। बाद में दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय उर्फ अज्जू राठौर, प्रकाश कौशल, पवन बाथव, अमर उर्फ भोला बाथव, कन्हैया बाथव और बल्लू उर्फ अनुज रघुवंशी के खिलाफ पूरक अभियोग पत्र पेश किया गया।
12 जून 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने इन 7 आरोपितों को IPC की धारा 302, 307, 148, 149 के तहत दोषी ठहराया और सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई। आरोपितों ने खुद को निर्दोष बताया था और कहा था कि उन्हें झूठा फँसाया गया है।
गाड़ी में गाय या सब्जियाँ?: एक बुनियादी सवाल का नहीं मिला कोई जवाब
इस घटना को लेकर जो थ्योरी सबसे पहले सामने आई वो कथित गो-रक्षा से जुड़ी थी। दावा किया गया कि उन्हें बचाने के लिए लोगों के साथ मारपीट और हत्या तक हुई। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस मामले के पीड़ितों ने अपनी गवाही में ट्रक में गाय होने से ही इनकार किया है।
अपने फैसले के पैरा 33 में जज तबस्सुम खान ने लिखा है, “फरियादी शेख लाला व आहत सैय्यद मुश्ताक ने कहा कि …वे लोग बस से अमरावती से सिवनीमालवा सब्जी का ट्रक लेने रात्रि लगभग 11:00 बजे आये थे। वे बस से उतरे तो नजीर सिवनीमालवा के पास एक गाँव ले गया और कहा कि गाँव से ट्रक अमरावती ले जाना है।”
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
पैरा 34 में जज ने लिखा, “शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक को अभियोजन द्वारा सूचक प्रश्न पूछे जाने उन्होंने इन सुझावों से इंकार किया है कि एक ट्रक में जानवरों को लेकर जा रहे थे, तब आरोपितों ने ट्रक पकड़ा था और उनके साथ मारपीट की थी।”
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
इसके आगे चलने पर पैरा 36 में लिखा है, “निरीक्षक जितेंद्र सिंह यादव ने कहा कि फरियादी ने बताया कि नंदरवाड़ा के सेट्टी नामक व्यक्ति ने मोबाइल फोन करके उसे माल भरने बुलाया था। वह अपने ट्रक को लेकर अपने साथियों नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ नंदरवाड़ा पहुँच गया था, जहाँ सेट्टी ने नंदरवाड़ा नहर के किनारे, खेत के पास उसके ट्रक में जानवर, जिसमें गाय ढोर भरवा दिए थे, जिन्हें वह लेकर अमरावती महाराष्ट्र जाने के लिए निकला।”
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
पैरा 95 में एक बार फिर इस बात का जिक्र आता है। जज ने फैसले में लिखा, “यदि उस ट्रक में जानवरों का परिवहन बिना किसी अनुज्ञप्ति के किया जा रहा था तो ट्रक के वाहन स्वामी व अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरूद्ध पृथक से कार्यवाही करने का आधार था।”
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
हालाँकि, इस पूरे मामले को पढ़ने से यह समझ नहीं आता कि अगर इस कथित ट्रक में जानवर या गाय थीं तो दोनों पीड़ितों ने अदालत में अपनी गवाही क्यों बदली? या इस मामले पर पुलिस ने क्या छानबीन की।
उस रात क्या हुआ था: सबकी अपनी कहानी लेकिन सच क्या?
इस मामले में अभियोजन की कहानी शुरू से अंत तक एक जैसी नहीं रहती। घटना की रात क्या हुआ, ट्रक में क्या सामान था, हमला कहाँ हुआ, हमलावर कितने थे और मारपीट की शुरुआत कैसे हुई जैसे बुनियादी सवालों पर रिकॉर्ड में अलग-अलग बातें सामने आती हैं। कहीं, 10-12 गाँव वालों द्वारा ट्रक रोककर हमला करने की बात है तो कहीं 50-60 से लेकर 100-150 लोगों तक की।
घटना के विवरण भी अलग-अलग हैं। ऐसे में यह सिर्फ मामूली अंतर नहीं बल्कि घटना की मूल संरचना पर ही गंभीर विरोधाभास है। इन्हें अदालत को दोषसिद्धि से पहले बहुत कठोरता से परखना चाहिए था लेकिन अदालत ने क्या किया वो भी समझने की कोशिश करेंगे।
इस घटना का पहला विवरण पैरा 33 में शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक की अदालत में दी गई गवाही के रूप में आता है। अदालत में उन्होंने अभियोजन की पुरानी कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि वे लोग अमरावती से बस से सिवनीमालवा सब्जी का ट्रक लेने रात लगभग 11 बजे आए थे। शेख लाला ने ट्रक चालू किया और सैय्यद मुश्ताक व नजीर अहमद ट्रक में बैठ गए। जब वे रात करीब 11 बजे गाँव से निकले और लगभग 20 मिनट की दूरी पर पहुँचे, तब सामने से एक पिकअप तेज गति से आई और उनके ट्रक से टक्कर होते-होते बची।
ट्रक का संतुलन बिगड़ा लेकिन वह पलटने से बच गया। शेख लाला ने ट्रक रोक दिया, तब पिकअप वाले आए और उनके साथ मारपीट करने लगे। पिकअप में करीब 8-10 लोग बताए गए। उनसे बचने के लिए वे गाँव की तरफ भागे, तो गाँव वाले बाहर आ गए और उन्हें चोर समझ लिया। इसके बाद गाँव वालों ने भी मारपीट शुरू कर दी।
इस संस्करण में गाँव वालों की संख्या लगभग 100-150 बताई गई है। इसमें जानवरों की जगह सब्जी के ट्रक की बात है और चोर समझकर गाँव वालों द्वारा मारपीट की बात आती है। हालाँकि, अगले दोनों संस्करणों में यह कहानी बदल जाती है।
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
कोर्ट के फैसले में इस मामले का दूसरा विवरण पैरा 36 में देहाती सूचना के रूप में आता है। इसमें IO जितेंद्र सिंह यादव बताते हैं कि शेख लाला ने अस्पताल में क्या सूचना दी थी। इसके मुताबिक, शेख लाला अपने ट्रक और साथियों नजीर अहमद व शेख मुश्ताक के साथ 02/08/2022 की शाम 5-6 बजे नंदरवाड़ा पहुँचा। वहाँ सेट्टी ने नंदरवाड़ा नहर के किनारे खेत के पास ट्रक में जानवर (गाय-ढोर) भरवाए थे। इसके बाद वे जानवरों को लेकर अमरावती (महाराष्ट्र) जाने निकले।
03/08/2022 की रात करीब 12:30 बजे जब ट्रक बराखड़ गाँव के पास नंदरवाड़ा रोड पर पहुँचा, तो वहाँ खड़े 10-12 गाँव वालों ने ट्रक रोक लिया। फिर उन लोगों ने शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक को लाठी-डंडों से पीटा। पुलिस मौके पर आई और उन्हें अस्पताल ले गई। मारपीट में आई चोटों के कारण नजीर अहमद की मौत हो गई। इस संस्करण में हमलावर 10-12 अज्ञात गाँव वाले बताए गए हैं और शिकायत बराखड़ गाँव के लोगों के विरुद्ध की गई है।
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तीसरा विवरण पैरा 42 में नायब तहसीलदार के सामने दर्ज बयानों को लेकर आता है। नायब तहसीलदार नीलेश पटेल के अनुसार शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक के कथनों में लिखा था कि घटना नंदरवाड़ा गाँव के आगे बायपास के पास रात लगभग 1 बजे हुई। इसमें कहा गया कि 50-60 लोगों ने उन्हें मारा। बयान में यह भी लिखा था कि आयशर ट्रक में लगभग 30 जानवर भरे हुए थे और माल/जानवर देखकर गाँव वालों ने ट्रक रोका और मारना शुरू कर दिया।
इस विवरण में यह नहीं बताया गया कि मारपीट करने वाले कौन लोग थे, वे किस गाँव के थे, उनके नाम क्या थे, किसने कौन-सा हथियार इस्तेमाल किया था या ट्रक के आगे ट्रैक्टर-ट्रॉली या कोई दूसरा वाहन अड़ाकर रास्ता रोका गया था। इसलिए इस संस्करण में भी हमलावर अज्ञात ही रहते हैं, लेकिन संख्या 10-12 से बदलकर 50-60 हो जाती है और स्थान बराखड़ गाँव के पास से बदलकर नंदरवाड़ा गाँव के आगे बायपास के पास बताया जाता है।
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चौथा महत्वपूर्ण संदर्भ पैरा 43 में आता है, जहाँ अदालत खुद इन तीनों विवरणों के बीच अंतर नोट करती है। कोर्ट ने अलग-अलग कहानी बताए जाने का जिक्र किया है। कोर्ट मानती है इनमें अंतर है लेकिन कोर्ट का कहना है कि पीड़ित स्थानीय निवासी नहीं थे इसलिए जिस बराखड़ गाँव के पास घटना हुई उसका नाम ही FIR में पहली बार बताया गया। अदालत ने इसे स्वाभाविक माना है।
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वहीं, पैरा 44 में कोर्ट ने माना कि फरियादी शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक अपने पहले वाले बयान से पलट गए। कोर्ट ने माना कि उनके पीछे दौड़ने वालों में बच्चे, औरतें और आदमी सभी शामिल थे। गाँव में अंधेरा था, इसलिए वे किसी को ठीक से देख नहीं पाए। उन्होंने यह भी कहा कि मारपीट करने वालों का चेहरा देखकर भी वे उन्हें पहचान नहीं सकते। लेकिन अदालत अभियोजन के कहने पर मानती है कि बाद में इन्हीं घायल लोगों से आरोपितों की शिनाख्त करवाई गई थी और उस शिनाख्त में उन्होंने आरोपितों को पहचान लिया था।
क्या जिनको सजा मिली, वाकई उनकी पहचान हुई थी?
कुछ अन्य विषयों की चर्चा करें उससे पहले अब शिनाख्तगी की ही बात कर लेते हैं। कोर्ट ने बताया कि इन्हीं घायल लोगों ने आरोपितों को पहचान लिया था। लेकिन क्या कहानी वाकई इतनी सीधी है। तो सीधा सा जवाब है नहीं। और यह हम क्यों कह रहे हैं इसे भी कोर्ट के फैसले से समझने की कोशिश करते हैं।
सबसे पहले TIP की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि शुरुआती रिपोर्ट में आरोपित नामजद नहीं थे। पैरा 36 में शेख लाला के कथित बयान के आधार पर लिखा गया कि बराखड़ गाँव के पास 10-12 गाँव वालों ने ट्रक रोका लेकिन इसमें किसी आरोपित का नाम नहीं है। पैरा 14 में भी निरीक्षक जितेंद्र यादव ने स्वीकार किया कि अस्पताल से प्राप्त सूचना में घटना करने वालों के नाम या पहचान का जिक्र नहीं था। पैरा 33 में शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक की अदालत वाली गवाही आती है। दोनों ने कहा कि वे आरोपितों को नहीं पहचानते। उन्होंने घटना का अलग विवरण दिया।
दरअसल आरोपितों के नाम और पहचान घटना के चश्मदीद गवाह यज्ञेश तिवारी से आए थे और इसका जिक्र पैरा 3 में है। आगे हम यज्ञेश तिवारी और अन्य गवाहों की स्थिति भी जानने की कोशिश करेंगे कि किस तरह उन्होंने एक कहानी बनाई थी। एक के बाद एक गवाहों ने आरोपितों को पहचानने से इनकार कर दिया। जिससे शिनाख्तगी का महत्व और अधिक बढ़ गया।
अब तक के फैसले के सार से यह समझ आ चुका है कि घटना के तुरंत बाद पीड़ितों द्वारा दिए गए कथित बयान में भी किसी आरोपित की पहचान नहीं है। पैरा 44 शिनाख्तगी से जुड़ा सबसे सीधा और गंभीर विरोधाभास है। इसमें अदालत लिखती है कि शेख लाला और मुश्ताक ने स्वीकार किया…गाँव में अंधेरा था और इसलिए वे किसी को देख नहीं पाए।
उन्होंने यह भी कहा कि मारपीट करने वालों का चेहरा देखकर भी पहचान नहीं सकते। लेकिन इसी के बाद अदालत लिखती है कि अभियोजन के अनुसार इन्हीं पीड़ितों से आरोपितों की शिनाख्तगी करवाई गई थी जिसमें उन्होंने आरोपितों को पहचाना था। यही शिनाख्तगी का सबसे बड़ा विरोधाभास है। जो गवाह कहते हैं कि अंधेरे में किसी का चेहरा नहीं देख पाए और पहचान नहीं सकते, उन्हीं पर अभियोजन शिनाख्तगी आधारित कर रहा है।
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पैरा 45 में IO जितेन्द्र सिंह यादव ने बताया कि आरोपितों की शिनाख्तगी के लिए JMFC और तहसील कार्यालय को पत्र भेजे गए और शेख लाला तथा मुश्ताक को शिनाख्तगी में उपस्थित रहने के लिए पत्र भेजे गए। शिनाख्तगी कार्यवाही तहसीलदार ललित सोनी द्वारा कराई गई।
पैरा 46 में तहसीलदार ललित सोनी ने कहा कि वे 19/12/2022 को उपजेल परिसर सिवनीमालवा गए थे। प्रत्येक आरोपितों के साथ मिलते-जुलते हुलिए के 4 अन्य लोगों को मिलाया गया था और शेख लाला तथा मुश्ताक ने हाथ के इशारे से पहचान की थी। लेकिन इसी पैरा में यह भी लिखा है कि शिनाख्तगी कार्रवाई के साक्षी अमन चौरसिया और देवेंद्र कौशल के बयान अभियोजन द्वारा नहीं कराए गए।
पैरा 48 में शेख लाला और मुश्ताक ने न्यायालय में कहा कि पुलिस उन्हें शिनाख्तगी कार्यवाही के लिए जेल लेकर गई थी। जेल में जेलर साहब ने कहा था कि अभिरक्षा में मौजूद आरोपितों की शिनाख्त करो। लेकिन दोनों ने यह भी कहा कि उन्होंने आरोपितों को पहचाना नहीं। उन्होंने शिनाख्तगी पंचनामा पर हस्ताक्षर मान लिए लेकिन अभियोजन के सूचक प्रश्नों पर इंकार किया कि उन्होंने आरोपितों को सही पहचाना था। यह मूल विरोधाभास है। रिपोर्ट कहती है कि पहचान हुई लेकिन पहचान करने वाले दोनों लोग अदालत में कहते हैं पहचान नहीं की।
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पैरा 50 में बचाव पक्ष ने कहा कि शिनाख्तगी पंचनामा पर उपजेल अधीक्षक के हस्ताक्षर या सील नहीं है। तहसीलदार ने इसे स्वीकार किया। पैरा 51 में अदालत ने कहा कि तहसीलदार की कार्यवाही अखंडित है लेकिन उसी पैरा में अदालत ने यह भी माना कि स्वयं शिनाख्तकर्ता शेख लाला और मुश्ताक ने कार्यवाही का समर्थन नहीं किया। यही विरोधाभास सबसे निर्णायक है कि प्रक्रिया कराने वाले लोग कहते हैं पहचान हुई लेकिन पहचान करने वाले लोग उसे नकारते हैं।
पैरा 53 में अदालत ने कहा कि फरियादीगण ने TIP का समर्थन नहीं किया, जिससे यह संभावना दिखती है कि वे प्रभावित यानी (Win Over) होकर अदालत में बयान दे रहे हैं। लेकिन इस निष्कर्ष के लिए अदालत ने कोई साक्ष्य नहीं बताया कि उन्हें किसने, कब और कैसे प्रभावित किया। यह एक और महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि अदालत पहचानकर्ताओं की गवाही को इसलिए कम महत्व दे रही है कि वे प्रभावित हो गए होंगे लेकिन यह केवल अनुमान के आधार पर कहा गया है।
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पैरा 75 में अदालत फिर कहती है कि तहसीलदार ललित सोनी ने विधिवत शिनाख्तगी कराई और शिनाख्तकर्ताओं ने वर्तमान आरोपितों को सही पहचाना। लेकिन उसी पैरा में अदालत यह भी मानती है कि शिनाख्तकर्ता इस कार्यवाही का समर्थन नहीं करते। अदालत ने तहसीलदार की निष्पक्षता को आधार बनाया कि उसकी आरोपितों से कोई दुश्मनी नहीं थी। लेकिन TIP में असली प्रश्न तहसीलदार की दुश्मनी या निष्पक्षता का नहीं बल्कि यह है कि जिन गवाहों ने कथित रूप से पहचान की, वे अदालत में उस पहचान को स्वीकार करते हैं या नहीं।
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पैरा 56 में अदालत ने कहा कि चश्मदीद गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया, लेकिन अभियोजन अपना मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य से भी साबित कर सकता है। यानी कोर्ट भी यह मान चुकी है कि शिनाख्त की कार्रवाई में गड़बड़ी है।
कुल मिलाकर शिनाख्तगी से जुड़ी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अभियोजन की पूरी पहचान तीन कमजोर कड़ियों पर खड़ी है। पहली कड़ी यह कि FIR और शुरुआती सूचना में आरोपित अज्ञात थे। दूसरी कड़ी यह कि बाद में जिन लोगों ने पहचान की बताई गई, वही लोग अदालत में कहते हैं कि उन्होंने पहचान नहीं की और अंधेरे में किसी को देख भी नहीं पाए। तीसरी कड़ी यह कि TIP की प्रक्रिया में कई औपचारिक कमियाँ हैं जैसे स्वतंत्र गवाह पेश नहीं हुए, जेल अधीक्षक की सील/हस्ताक्षर नहीं है।
जो गवाह था, असल में वो गवाह नहीं था…
इस मामले में आरोपितों के नाम सबसे पहले सीधे FIR से नहीं आए थे। देहाती सूचना में केवल ’10-12 अज्ञात गाँव वालों’ की बात थी। आरोपितों के नाम आने की मुख्य कड़ी यज्ञेश कुमार तिवारी है।
पैरा 3 में अभियोजन की कहानी के रूप में लिखा गया कि विवेचना के दौरान चश्मदीद साक्षी यज्ञेश कुमार तिवारी के धारा 164 CrPC के न्यायालयीन कथन दर्ज कराए गए और उन्हीं कथनों में 14 लोगों के नाम आए। ये नाम थे- आकाश सराठे, गौरव यादव, आकाश उर्फ पिन्टोली, राजू उर्फ राजेन्द्र कौशल, चेतन मराठा, देवेंद्र कोरी, संदीप उर्फ राजा, दीपक उर्फ बाबा केवट, भोला बाथव, पवन बाथव, कन्हैया बाथव, प्रकाश कौशल, अज्जू राठौर और बल्लू रघुवंशी। यानी अभियोजन के अनुसार अज्ञात भीड़ से नामजद आरोपितों तक पहुँचने का सबसे बड़ा आधार यज्ञेश का कथन था।
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पैरा 37 में इसी बात को विस्तार से लिखा गया है। IO जितेंद्र सिंह यादव ने कहा कि उसने यज्ञेश तिवारी, शेख लाला, सैय्यद मुश्ताक, सुयश तिवारी, आयुष उर्फ अवि मिश्रा, अवधेश तिवारी, अजय तिवारी और गब्बू उर्फ अनिरुद्ध के कथन लिए थे। इसी पैरा में अदालत ने लिखा कि घटना 03/08/2022 की थी और उसी दिन यज्ञेश तिवारी के धारा 164 CrPC के बयान भी कराए गए, जिसमें उसने स्वयं को चश्मदीद बताया और 14 आरोपितों द्वारा घटना करना बताया।
हालाँकि, अदालत में आते ही यज्ञेश पूरी तरह पलट गया। उसने कहा कि वह आरोपितों को नहीं जानता, शेख लाला को नहीं जानता, मृतक नजीर को नहीं जानता और मुश्ताक को भी नहीं जानता। उसने कहा कि घटना के समय वह अपने परिवार सहित UP गया हुआ था और वापस आने पर गाँव की चर्चा तथा अखबार से घटना के बारे में पता चला। उसने अभियोजन के इस सुझाव से भी इंकार किया कि घटना के समय वह बराखड़ में था, चिल्लाने की आवाज सुनकर रोड पर पहुँचा था और उसने आरोपितों को लाठी-डंडे लेकर ट्रक रोकते तथा मारपीट करते देखा था।
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पैरा 69 में IO ने कहा कि वह बराखड़ खुर्द जाकर पूछताछ कर रहा था, तभी वहाँ चश्मदीद साक्षी यज्ञेश तिवारी मिला और उससे जानकारी ली गई। बचाव पक्ष ने इस पर सवाल उठाया कि यज्ञेश कहाँ मिला, उसके कथन कहाँ लिए गए और घायल गवाहों ने यह क्यों नहीं बताया कि मौके पर कोई चश्मदीद मौजूद था। पैरा 70 में अदालत ने कहा कि घटना रात 12 से 1 बजे के बीच अचानक भीड़ द्वारा की गई थी, इसलिए पीड़ितों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे हर विवरण को दें। लेकिन यह अदालत का स्पष्टीकरण था। यज्ञेश की वास्तविक मौजूदगी पर प्रत्यक्ष समर्थन किसी अन्य गवाह से नहीं मिला।
पैरा 71 में अदालत ने यज्ञेश के पलटने के बावजूद रोजनामचा सान्हा का सहारा लिया। इसमें लिखा गया कि घटना वाले दिन के रोजनामचा सान्हा क्रमांक 30 में यह दर्ज है कि यज्ञेश कुमार तिवारी की निशानदेही पर नक्शा बनाया गया और यज्ञेश के बयानों में आरोपितों के नाम आए। यानी अदालत ने यह माना कि यज्ञेश ने घटना वाले दिन ही नाम बताए थे फिर भले ही बाद में वह अदालत में मुकर गया था।
पैरा 73 में अदालत ने बचाव पक्ष के इस तर्क को देखा कि यज्ञेश ने घटना नहीं देखी और अपने विरोधियों के नाम पुलिस को बता दिए। पैरा 74 में अदालत ने फिर यह स्वीकार किया कि यज्ञेश ने न्यायालय में स्वयं को चश्मदीद मानने से इंकार किया और अभियोजन का समर्थन नहीं किया, इसलिए चश्मदीद साक्ष्य का अभाव है। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि यह महत्वपूर्ण परिस्थिति है कि घटना के तुरंत बाद यज्ञेश के कथन लिए गए और उसके 164 CrPC कथन में सभी आरोपितों के नाम बताए गए थे।
अन्य कथित चश्मदीद गवाहों की बात पैरा 38 में आती है। अवधेश तिवारी, सुयश तिवारी, अजय तिवारी और आयुष मिश्रा ने आरोपितों को पहचानने से इंकार किया और घटना की कोई जानकारी नहीं होना बताया। अनिरुद्ध उर्फ गब्बू तिवारी ने इतना जरूर कहा कि वह आरोपितों को पहचानता है क्योंकि वे सिवनीमालवा के निवासी हैं, लेकिन उसने भी घटना की जानकारी होने से इंकार किया। इन सभी गवाहों ने अभियोजन के सूचक प्रश्नों पर यह मानने से इंकार किया कि उन्होंने आरोपितों को लाठी-डंडे लेकर ट्रक ड्राइवर और उसके साथियों से मारपीट करते देखा था। अदालत ने पैरा 38 के अंत में खुद लिखा कि फरियादी और कथित चश्मदीदों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया।
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
इस तरह गवाहों की पूरी स्थिति यह बनती है कि FIR में आरोपित अज्ञात थे, नाम यज्ञेश के कथित तत्काल पुलिस/164 बयान और रोजनामचा से आए लेकिन यज्ञेश अदालत में पूरी तरह मुकर गया। घायल गवाह शेख लाला और मुश्ताक ने आरोपितों को पहचानने से पहले ही इंकार कर दिया है। बाकी कथित चश्मदीद गवाहों ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया। शिनाख्तगी करने वाले गवाहों ने अदालत में शिनाख्त से इंकार किया।
जिस ‘खून लगे डंडे’ के आधार पर दिया फैसला… उस आधार पर भी हैं ये सवाल
इस मामले में अदालत ने कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के मुकर जाने के बाद सबसे ज्यादा भरोसा बरामद डंडों, कपड़ों और उन पर मिले मानव खून पर किया। यही वह मुख्य भौतिक/वैज्ञानिक साक्ष्य है, जिसके सहारे अदालत ने कहा कि आरोपितों की संलिप्तता साबित होती है। लेकिन इस सबूत में कई गंभीर कमजोरियाँ हैं। बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए, असली वस्तुएँ अदालत में प्रदर्शित नहीं हो सकीं, FSL ने केवल ‘मानव रक्त’ बताया, यह नहीं बताया कि वह रक्त मृतक नजीर का था या नहीं और ब्लड ग्रुप/DNA की जाँच भी सामने नहीं आई।
पैरा 57 में अभियोजन ने सबसे पहले आरोपितों अमर उर्फ भोला बाथव से बरामदगी की कहानी रखी। IO जितेन्द्र सिंह यादव ने कहा कि 27 नवंबर 2022 को भोला से पूछताछ हुई और उसने बताया कि जिस डंडे से मारपीट की थी, वह घर में छिपाकर रखा है और घटना के समय पहने कपड़े भी घर के पीछे वाले कमरे में रखे हैं। फिर उसके घर गोटियापुरा से काले रंग का लोवर और एक बाँस का डंडा जब्त किया गया।
यहाँ दिक्कत यह है कि घटना 03 अगस्त 2022 की थी और बरामदगी 27 नवंबर 2022 को दिखाई गई यानी करीब चार महीने बाद। इतने लंबे समय बाद कोई आरोपित कथित हत्या का डंडा और कपड़ा अपने घर में सुरक्षित रखे, यह बात अपने आप में सख्त प्रमाण नहीं बनती जब तक उस डंडे और कपड़े को मृतक या घटना से वैज्ञानिक रूप से जोड़ा न जाए।
इसके बाद के पैरा में IO ने कन्हैया बाथव, दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय, प्रकाश कौशल, पवन बाथव और बल्लू के घर से भी खून लगे डंडे या कपड़े मिलने की बात दोहराई है। लेकिन सभी कथित बरामदगियाँ कई महीने बाद की है और हर एक कहानी एक जैसी है।
पैरा 66 में यह कमजोरी और गंभीर हो जाती है। अजय पांडे, सुमेर राठौर और विजय केवट ने आरोपितों को पहचानने से इंकार किया। सुमेर राठौर और विजय केवट ने बल्लू उर्फ अनुज के मेमोरेण्डम और जब्ती पत्रक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए लेकिन यह मानने से इंकार किया कि मेमोरेण्डम, जब्ती और गिरफ्तारी की कार्रवाई उनके सामने हुई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस ने उनसे हस्ताक्षर करने को कहा था। इसलिए उन्होंने सिर्फ हस्ताक्षर कर दिए।
अदालत ने खुद लिखा कि पंच गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और मेमोरेण्डम, जब्ती तथा गिरफ्तारी के संबंध में केवल विवेचक जितेंद्र सिंह यादव की गवाही उपलब्ध है। यह इस पूरे भौतिक सबूत की सबसे बड़ी कमजोरी है।
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
पैरा 67 में अदालत ने IO की गवाही को बचाने की कोशिश की। अदालत ने करमजीत सिंह बनाम स्टेट का हवाला देकर कहा कि पुलिस अधिकारी की गवाही को केवल इसलिए संदेह से नहीं देखा जा सकता कि वह पुलिस वाला है। यह सिद्धांत सामान्य रूप से सही है। लेकिन इस केस में समस्या केवल यह नहीं है कि गवाह पुलिस अधिकारी है। समस्या यह है कि प्रत्यक्षदर्शी गवाह मुकर गए, TIP के गवाह मुकर गए, बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए और फिर भी बरामदगी को केवल IO के बयान पर स्वीकार किया गया। ऐसे में IO की गवाही को बहुत सावधानी से परखना चाहिए था।
पैरा 76 में अदालत ने फिर लिखा कि जब जब्त संपत्ति अदालत में मँगाई गई तो जानकारी मिली कि वह FSL से वापस प्राप्त नहीं हुई। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि IO के कथन अखंडित हैं और उसने संपत्ति FSL भोपाल भेजी थी, जिसका ड्राफ्ट, जमा पावती और FSL रिपोर्ट रिकॉर्ड पर है। यहाँ दिक्कत यह है कि जब वस्तुएँ अदालत में प्रदर्शित ही नहीं हुईं, पंच गवाह बरामदगी से मुकर गए और केवल IO कह रहा है कि वही वस्तुएँ भेजी गईं, तो पूरी चेन का भार एक ही पुलिस अधिकारी पर आ गया।
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
पैरा 77 में FSL रिपोर्ट का विवरण है। अदालत ने लिखा कि FSL को सीलबंद 14 बंडल/बॉक्स/पैकिट मिले, जिनमें आरोपितों से जब्त लोवर, डंडे, जींस, टी-शर्ट और शर्ट शामिल थे। पैरा 78 में FSL का मुख्य निष्कर्ष है। रिपोर्ट के अनुसार A, B, C, D, E, F, G1, G2, I, K, N1 और N2 पर मानव रक्त पाया गया। यानी भोला के लोवर और डंडे, पवन के लोवर और डंडे, कन्हैया के लोवर और डंडे, दीपक की जींस और टी-शर्ट, प्रकाश की शर्ट, अज्जू का लोवर, बल्लू की टी-शर्ट और लोवर पर मानव रक्त बताया गया। सबसे बड़ी बात यह है कि FSL ने सिर्फ ‘मानव रक्त’ कहा गया। उसने यह नहीं बताया कि यह रक्त नजीर अहमद का था। यह भी नहीं बताया कि यह रक्त शेख लाला या मुश्ताक का था। ब्लड ग्रुप या DNA मिलान का कोई स्पष्ट निष्कर्ष रिकॉर्ड में नहीं है। इसलिए यह वैज्ञानिक रूप से अधूरी कड़ी है।
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
बचाव पक्ष ने कहा कि जब मृतक का ब्लड ग्रुप जाँचा ही नहीं गया, तो केवल किसी वस्तु पर खून मिलने से मामला सिद्ध नहीं होता। अदालत ने यह तर्क यह कहकर खारिज किया कि वर्तमान मामले में जब्त लाठी, डंडे और कपड़े आरोपितों के घर से मिले हैं और उन पर खून लगा था।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपितों ने यह बचाव नहीं लिया कि कपड़े उनके नहीं थे और यह भी साबित नहीं हुआ कि पुलिस से उनकी कोई पुरानी रंजिश थी। यहाँ अदालत ने फिर भार आरोपितों की तरफ मोड़ दिया, जबकि मूल प्रश्न यह था कि अभियोजन यह साबित करे कि वह रक्त मृतक या घटना से जुड़ा था।
अदालत ने धारा 106 Evidence Act 109 का इस्तेमाल किया। अदालत ने कहा कि जब आरोपितों के घर से जब्त कपड़ों और लाठी-डंडों पर मानव रक्त मिला, तो यह बताने का दायित्व आरोपितों पर था कि वह रक्त कैसे आया। अदालत ने कहा कि आरोपितों ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।
यह निष्कर्ष बहुत विवादास्पद है, क्योंकि धारा 106 तभी लागू होती है जब अभियोजन पहले मूल तथ्य मजबूती से साबित कर दे। यहाँ मूल तथ्य ही विवादित हैं कि बरामदगी के गवाह मुकर गए, वस्तुएँ अदालत में प्रदर्शित नहीं हुईं और FSL ने केवल मानव रक्त बताया, मृतक का रक्त नहीं। ऐसे में केवल ‘स्पष्टीकरण नहीं दिया’ कहकर अभियोजन की कमी पूरी नहीं की जा सकती।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतक का ब्लड ग्रुप पता नहीं किया गया और FSL रिपोर्ट में भी परीक्षण किए गए प्रदर्शों के ब्लड ग्रुप का उल्लेख नहीं है, इसलिए मामला सिद्ध नहीं होता। अदालत ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि आरोपितों के मेमोरेण्डम से घर से बरामदगी हुई, वस्तुओं पर मानव रक्त पाया गया और घटना वाले दिन रोजनामचा में यज्ञेश ने सभी आरोपितों के नाम बताए थे।
यहाँ अदालत ने ब्लड ग्रुप/DNA की कमी को निर्णायक नहीं माना। लेकिन यही अपील का बड़ा बिंदु बनता है कि जब पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर था और प्रत्यक्ष पहचान कमजोर थी तो ऐसे में ब्लड ग्रुप या DNA की अनुपस्थिति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए था।
बचाव पक्ष ने एक और महत्वपूर्ण बात उठाई कि जब्त हथियारों यानी डंडों के बारे में डॉक्टर से कोई जाँच नहीं कराई गई। यानी डॉक्टर से यह नहीं पूछा गया कि मृतक या घायल गवाहों की चोटें इन्हीं जब्त डंडों से आ सकती थीं या नहीं। अदालत ने माना कि डंडों की जाँच डॉक्टर से नहीं कराई गई लेकिन इसे केवल अनियमितता कहा और बताया कि डॉक्टर ने बताया था कि चोटें सख्त और भोथरी वस्तु से आ सकती थीं।
कोर्ट के फैसले का एक हिस्सा
इस पूरे सबूतों को सरल भाषा में समझें तो अदालत ने कहा कि आरोपितों के घरों से डंडे और कपड़े मिले, उन पर मानव रक्त मिला, इसलिए आरोपितों को बताना चाहिए था कि खून कैसे आया। लेकिन यह चेन अधूरी है। जिन गवाहों के सामने बरामदगी लिखी गई, वे अदालत में मुकर गए।
उन्होंने कहा कि पुलिस ने सिर्फ हस्ताक्षर कराए। FSL ने केवल मानव रक्त बताया, यह नहीं बताया कि वह रक्त मृतक नजीर का था। ब्लड ग्रुप या DNA नहीं मिला। डॉक्टर से यह भी नहीं पूछा गया कि चोटें इन्हीं डंडों से आई थीं। इसलिए यह सबूत संदेह पैदा कर सकता है लेकिन क्या यह दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार बनाता है?
उम्रकैद की सजा देते समय कोर्ट ने माना कि आरोपितों ने भीड़ के रूप में मिलकर मॉब लिंचिंग की थी। कोर्ट के अनुसार, सभी आरोपितों ने विधि-विरुद्ध जमाव बनाया, वे लाठी-डंडों जैसे घातक हथियारों से लैस थे और उन्होंने बलवा करते हुए बहुत बेरहमी से मारपीट की। इसी मारपीट के कारण नजीर अहमद को गंभीर चोटें आईं और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। कोर्ट ने यह भी माना कि इसी घटना में शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक को भी चोटें आईं। इन्हीं बातों को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने आरोपितों को उम्रकैद की सजा देने का आधार बनाया।
कुल मिलाकर इस फैसले को पढ़ने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब घटना की शुरुआत से लेकर अंत तक कई अहम बातें साफ नहीं हैं, तो दोषसिद्धि तक पहुँचना कितना सुरक्षित था। शुरुआती रिपोर्ट में आरोपित अज्ञात थे। घटना को लेकर तीन अलग-अलग विवरण सामने आए। कहीं 10-12 लोगों की बात है, कहीं 50-60 लोगों की और अदालत में घायल गवाहों ने 100-150 लोगों तक की बात कही। कहीं ट्रक में गाय-ढोर बताए गए, तो अदालत में वही गवाह सब्जी का ट्रक बताते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को घटना का चश्मदीद बताया गया, वे अदालत में अभियोजन के साथ खड़े नहीं हुए। यज्ञेश तिवारी (जिसके बयानों से आरोपितों के नाम आए) उसने अदालत में खुद को चश्मदीद मानने से ही इंकार कर दिया। घायल गवाह शेख लाला और सैय्यद मुश्ताक ने भी आरोपितों को पहचानने से इंकार किया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अंधेरा था और वे मारपीट करने वालों का चेहरा देखकर पहचान नहीं सकते।
इसके बाद अदालत ने बरामद डंडों और कपड़ों पर मिले मानव रक्त को अहम आधार माना। लेकिन यहाँ भी बड़ा सवाल बचता है। बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने उनसे केवल हस्ताक्षर कराए थे। FSL ने सिर्फ इतना बताया कि वस्तुओं पर मानव रक्त था। यह नहीं बताया कि वह रक्त मृतक नजीर अहमद का था। न ब्लड ग्रुप मिला, न DNA मिलान हुआ। डॉक्टर से यह भी नहीं पूछा गया कि चोटें इन्हीं डंडों से आई थीं या नहीं।
ऐसे में यह मामला कई गंभीर सवाल छोड़ता है। अदालत ने जिन परिस्थितियों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त माना, उन पर ऊपरी अदालत में फिर से गहराई से विचार होना स्वाभाविक है। क्योंकि आपराधिक मुकदमे में संदेह कितना भी मजबूत हो लेकिन वह पक्के सबूत की जगह नहीं ले सकता।
इस्लामी और वामपंथी सोच के लोग हमेशा से किसी न किसी तरह हिंदुओं का विरोध करते आए हैं, कभी खुलकर तो कभी दबे छिपे तरीके से। ये लोग भारतीय सेना को भी लगातार अपना निशाना बनाते रहते हैं। कश्मीर में जब हमारी सेना आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो ये लोग सेना को ही विलेन यानी विद्रोही साबित करने में जुट जाते हैं। ये बिना सोचे-समझे सेना पर यह झूठा आरोप भी लगाते हैं कि सेना हिंदुओं के पक्ष में राजनीति कर रही है।
इनका असली मकसद सिर्फ इसलिए सेना को बदनाम करना है क्योंकि सेना इनके मनमुताबिक बनी नकली धर्मनिरपेक्षता की बातों को नहीं मानती। इसी तरह के एक नए विवाद में ‘The Wire’ नाम की वेबसाइट ने अली अहमद नाम के एक लेखक की बातों को बढ़ावा दिया है। इस लेखक ने भारतीय सेना को चेतावनी देते हुए कहा है कि सेना का हिंदी भाषा और हिंदुत्व की तरफ बढ़ता झुकाव देश के लिए ठीक नहीं है।
सेना में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ के बहाने हिंदू नफरत का खेल- The Wire में दावा
‘The Wire’ नाम की वेबसाइट का कहना है कि भारतीय सेना पर हिंदुत्व का असर बढ़ रहा है, इसीलिए वहाँ हिंदी भाषा और हिंदू धर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेखक अली अहमद ने अपने लेख में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए किया है। 24 जून को छपे उसके लेख की हेडलाइन यानि शीर्षक था कि भारतीय सेना का हिंदी और हिंदुत्व के प्रति नया लगाव गंभीर नतीजे ला सकता है।
‘The Wire’ के इस लेख में दावा किया गया कि सेना अपनी बातचीत और दफ्तरों में जो हिंदी का इस्तेमाल कर रही है, वह सरकार के राजनीतिक कंट्रोल का इशारा है। लेखक अली अहमद के मुताबिक सेना पर जबरन हिंदी थोपकर उसका हिंदूकरण करने की बड़ी साजिश चल रही है। अपनी बात को सही दिखाने के लिए अली अहमद ने सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हरचरणजीत सिंह पनाग के एक पुराने लेख का सहारा लिया।
पनाग ने लिखा था कि जनता भारतीय सेना पर इसलिए भरोसा करती है क्योंकि वह हमेशा से धर्मनिरपेक्ष रही है और राजनीति से दूर रही है। वैसे तो देश की जनता हमेशा से सेना की इस समझदारी और राजनीति से दूरी की तारीफ करती है, लेकिन सेना की यह खूबी वैसी धर्मनिरपेक्षता बिल्कुल नहीं है जैसी इस्लामी-वामपंथी लोग चाहते हैं। इन हिंदू-विरोधी लोगों की नजर में धर्मनिरपेक्षता का असली मतलब सिर्फ यह है कि सरकारी दफ्तरों या नीतियों में गैर-हिंदू, खासकर मुस्लिम मान्यताओं और परंपराओं को जगह मिले।
अगर सेना या राजनीति में कहीं भी हिंदू धर्म की छोटी सी झलक भी दिख जाए, तो ये लोग तुरंत चिल्लाने लगते हैं कि लोकतंत्र खत्म हो गया और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। यहाँ यह जानना बहुत जरूरी है कि HS पनाग वही पूर्व फौजी अफसर हैं जिन्होंने साल 2019 में एक बहुत विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा चुनाव जीतकर आते हैं, तो सरकार के खिलाफ तख्तापलट कर देना चाहिए।
मोदी और हिंदुत्व के प्रति पनाग की यह नफरत इंटरनेट पर कई बार देखी जा चुकी है। सितंबर 2021 में उन्होंने ‘बीटिंग रिट्रीट’ कार्यक्रम का एक Video पोस्ट किया था, जिसमें सेना का बैंड एक हिंदू आरती की धुन बजा रहा था। पनाग ने इस Video को एक मजाक उड़ाने वाले और झूठे शीर्षक के साथ शेयर किया ताकि लोगों को लगे कि मोदी सरकार सेना के कार्यक्रमों में जबरन हिंदू रीति-रिवाज थोप रही है, जबकि सच्चाई यह है कि सेना में आरती की धुन बजाने की यह परंपरा बहुत पुरानी है।
अब अगर अली अहमद के उसी झूठ पर वापस आएँ जिसे उसने सेना में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ का नाम दिया है, तो पहली बात यह है कि सेना की बातचीत, ट्रेनिंग सेंटरों या स्मारकों में हिंदी को अभी जबरन शामिल नहीं किया गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी पूरे देश की राजभाषा है, हालांकि इसके साथ सरकारी कामों में अंग्रेजी इस्तेमाल करने की भी पूरी छूट दी गई है।
भारतीय सेना में हिंदी भाषा का इस्तेमाल आजादी के तुरंत बाद से ही शुरू हो गया था। साल 1951 से ही तत्कालीन सरकार ने सेना के तीनों अंगों में देवनागरी लिपि वाली हिंदी का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया था। उस समय देश में हिंदुत्व की विचारधारा वाली सरकार नहीं थी। सैन्य अधिकारियों के लिए हिंदी की परीक्षाएँ पास करना जरूरी था और जवानों को देवनागरी लिपि सिखाई जाती थी।
मार्च 1951 से आर्मी एजुकेशन कोर ने सभी सैन्य कर्मियों और प्रशिक्षकों को हिंदी सिखाने के लिए खास कोर्स शुरू किए थे। साल 1952 में थल सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों के साथ मिलकर एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी ताकि हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू किया जा सके।
भारत जैसे विविधता वाले देश में हिंदी को अपनाना देश के एकीकरण का एक बड़ा हिस्सा था। इसका मकसद अंग्रेजी के उस प्रभाव को खत्म करना था जो ब्रिटिश गुलामी की पहचान था। मौजूदा मोदी सरकार ने सेना से औपनिवेशिक काल की पुरानी परंपराओं को हटाने के लिए कई कदम जरूर उठाए हैं। इसके बावजूद सेना में हिंदी के इस्तेमाल को एक नया राजनीतिक बदलाव बताना बिल्कुल गलत है, जैसा कि अली अहमद और ‘The Wire’ पेश कर रहे हैं।
सेना की कई टुकड़ियों में अलग-अलग राज्यों के सैनिक होते हैं, जिनके बीच आपसी तालमेल और ट्रेनिंग के लिए हिंदी एक संपर्क भाषा का काम करती है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि सेना दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं से नफरत करती है या उन पर रोक लगाती है। हिंदी को जोड़ने वाली भाषा के रूप में इस्तेमाल करने की यह नीति दशकों पुरानी है।
यहाँ कुछ सीधे सवाल उठते हैं कि आखिर इस्लामी-वामपंथी लोग सेना में हिंदी के इस्तेमाल का विरोध क्यों करते हैं? अगर हिंदी का प्रसार हो भी रहा है तो इसमें गलत क्या है? क्या हिंदी एक भारतीय भाषा नहीं है जिसे देश के करीब 43 फीसदी लोग बोलते हैं? इन सभी सवालों का जवाब ‘The Wire’ के उस दावे में छिपा है जिसमें उन्होंने हिंदी के प्रसार को हिंदुत्व के एजेंडे और हिंदूकरण से जोड़ दिया है।
इसका सीधा मतलब यह है कि ये इस्लामी-वामपंथी लोग हिंदी को सिर्फ हिंदुओं की भाषा मानते हैं और इसीलिए सेना में इसके इस्तेमाल को हिंदूकरण का नाम देते हैं। यह सच है कि हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं और संस्कृत का जुड़ाव हिंदू धर्म से है, भले ही इतिहास में सभी हिंदू संस्कृत या हिंदी नहीं बोलते थे।
लेखक अली अहमद ने यहाँ भाषा का सांप्रदायिकरण करके देश को बाँटने की पुरानी चाल चली है। ‘हिंदी हिंदुओं की और उर्दू मुसलमानों की भाषा है’ का यह विवाद 19वीं और 20वीं शताब्दी के हिंदी-उर्दू विवाद से जुड़ा है। 19वीं सदी में उत्तर-पश्चिम प्रांतों के मुस्लिम एलीट वर्ग, खासकर सर सैयद अहमद खान ने अदालतों और प्रशासन में हिंदी का विरोध किया था।
सर सैयद अहमद खान वही व्यक्ति हैं जिन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी, जिसके कारण आगे चलकर धर्म के नाम पर भारत का हिंसक बँटवारा हुआ। उन्होंने फारसी-अरबी लिपि वाली उर्दू को मुस्लिम पहचान और मुस्लिम शासन से जोड़कर बढ़ावा दिया और देवनागरी लिपि में हिंदी के इस्तेमाल को हिंदुओं का प्रयास बताया। इसके जवाब में हिंदुओं ने देवनागरी हिंदी को अपनी मूल और आम लोगों के लिए आसान भाषा के रूप में आगे बढ़ाया।
यह पूरा विवाद साल 1837 में तब शुरू हुआ जब अंग्रेजों ने उत्तर भारत की अदालतों और प्रशासन में फारसी की जगह उर्दू को आधिकारिक भाषा बना दिया। चूंकि मुस्लिम वर्ग उर्दू जानता था, इसलिए यह नीति उनके फायदे में थी। लेकिन हिंदू समुदाय को उर्दू लिपि की जानकारी न होने के कारण नुकसान हो रहा था, जबकि उनकी आबादी ज्यादा थी।
इसके विरोध में वाराणसी और पूरे क्षेत्र के हिंदुओं ने देवनागरी लिपि लागू करने की माँग की। साल 1867 तक आते-आते सैयद अहमद खान इस सोच को बढ़ावा देने लगे कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते और मुसलमानों के लिए एक अलग देश होना चाहिए। हालाँकि बाद में साल 1900 में अंग्रेजों ने हिंदी और उर्दू दोनों को कागजों पर बराबर का दर्जा दे दिया, लेकिन यह विवाद कभी सिर्फ भाषा का नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक और सांप्रदायिक इरादे थे।
धर्मनिरपेक्षता के दोहरे पैमाने और सेना पर झूठे आरोप
उस दौर में मुसलमानों ने प्रशासनिक व्यवस्था में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए उर्दू को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया था। वहीं दूसरी तरफ हिंदू सिर्फ उस भाषा को पहचान दिलाना चाहते थे जिसे वे आसानी से पढ़ और लिख सकते थे। महात्मा गाँधी ने दोनों पक्षों को शांत करने के लिए हिंदी और उर्दू को मिलाकर ‘हिंदुस्तानी’ भाषा का एक सेक्युलर विकल्प दिया था, लेकिन इससे भी दोनों पक्षों का विवाद खत्म नहीं हुआ।
आजादी और विभाजन से पहले मुस्लिम नेताओं ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए भाषाओं का सांप्रदायिकरण किया। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने मुस्लिम पहचान के रूप में उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा चुना, जबकि वहाँ की बड़ी आबादी के हिसाब से पंजाबी को यह दर्जा मिलना चाहिए था। वहीं दूसरी तरफ भारत ने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाया।
यह सच है कि हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं और 19वीं सदी में मुसलमानों द्वारा उर्दू को अपनी खास पहचान बनाने के जवाब में हिंदी का उभार हुआ था। इसके बावजूद हिंदी सिर्फ हिंदुओं की या उनके लिए कोई विशेष भाषा नहीं है। उत्तर भारत में एक बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, जिसमें से पढ़े-लिखे लोग बिना किसी दबाव के उर्दू के साथ-साथ हिंदी भी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं।
इसलिए हिंदी को केवल हिंदुओं की भाषा कहना पूरी तरह गलत है। सेना या किसी भी सरकारी विभाग में हिंदी का इस्तेमाल होना किसी भी तरह से सेना का ‘हिंदूकरण’ नहीं है। ‘The Wire’ को इस बात से भी बड़ी परेशानी है कि थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंदिरों में दर्शन करने क्यों जाते हैं।
लेखक अली अहमद ने लिखा कि जनरल द्विवेदी का मंदिर जाना देश के राजनीतिक बदलाव को जानबूझकर समर्थन देने जैसा है। लेखक ने सवाल उठाया कि क्या उन्होंने यह सब अपने निजी फायदे के लिए किया या फिर सैन्य नेतृत्व को सरकार से ऐसा करने का कोई गुप्त इशारा मिला है। यह देखना काफी हैरान करने वाला है कि यही इस्लामी-वामपंथी गुट तब चुप रहता है जब सेना के अधिकारी कश्मीर में लोगों से जुड़ने के लिए नमाज में शामिल होते हैं।
तब उनके लिए वह नमाज शांति और सद्भाव का प्रतीक बन जाती है, लेकिन जब सेना प्रमुख जगन्नाथ मंदिर जाते हैं, तो उसे सेना का हिंदूकरण और बहुसंख्यकवाद का नाम दे दिया जाता है। अगर देश में सचमुच हिंदुत्व के आधार पर सेना का हिंदूकरण हो रहा होता, तो अली अहमद जैसे मुस्लिम लेखक को वर्तमान सेना प्रमुख की निष्ठा पर सवाल उठाने और उनके धार्मिक अधिकारों पर हमला करने के लिए जेल में डाल दिया जाता।
अपने इस लेख में ‘The Wire’ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी निशाना साधा और यह झूठा दावा किया कि संघ खुद को हिंदू धर्म का पर्याय मानता है। लेखक ने RSS पर विविधता को खत्म करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही भाजपा की चुनावी जीत पर दुख जताते हुए लेखक ने रोना रोया कि सेना ने अपनी ताकत और सम्मान को बहुसंख्यक राजनीति के पक्ष में झुका दिया है। लेखक का दावा है कि पहले के धर्मनिरपेक्ष दौर में सेना राजनीति से दूर थी, लेकिन अब एक ही पार्टी के बढ़ते प्रभाव के कारण सेना का राजनीति से अलग रहना बेअसर हो गया है।
सेना के शौर्य और परंपराओं पर वामपंथी एजेंडे का हमला
लेखक अली अहमद ने मौजूदा हिंदू-समर्थक सरकार के प्रति अपनी नफरत के कारण भारतीय सेना की निष्पक्षता और उसके पेशेवर अंदाज पर भी खुलेआम सवाल उठाए हैं। उनके इस पूरे लेख का कुल मिलाकर यही मतलब है कि भारतीय सेना के बड़े अधिकारी अब मंदिरों में जा रहे हैं। उनका दावा है कि सेना में कथित तौर पर हिंदी और हिंदुत्व को बढ़ावा देकर उसके धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्युलर स्वरूप को खत्म किया जा रहा है।
असल में भारत एक अनोखा देश है जिसका आधुनिक ढांचा धर्मनिरपेक्ष है। यह धर्मनिरपेक्षता सिर्फ इसलिए बची हुई है क्योंकि यहाँ बहुसंख्यक आबादी हिंदू है और इस देश की आत्मा हिंदू सनातन धर्म से जुड़ी हुई है। हिंदू धर्म को कभी भी देश की राजनीति या सैन्य व्यवस्था से अलग नहीं किया जा सकता। भारतीय सेना विदेशी हमलों और दुश्मनों से देश की रक्षा करते समय किसी नागरिक का धर्म नहीं पूछती, भले ही सामने वाले दुश्मन अक्सर मुस्लिम देश से हों और पीड़ित होने वाले ज्यादातर हिंदू हों।
धर्मनिरपेक्षता का मतलब अपने धर्म को छोड़ देना नहीं होता, बल्कि इसका मतलब यह है कि आपका धार्मिक विश्वास आपके सरकारी काम के बीच में न आए। भारतीय सेना कश्मीर में आम जनता तक पहुँच बनाने के लिए उर्दू और स्थानीय कश्मीरी भाषा का भी इस्तेमाल करती है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि मोदी सरकार के राज में हमारी सेना का इस्लामीकरण हो रहा है?
सच तो यह है कि भारतीय सेना की कई रेजिमेंटों के युद्धघोष (वार क्राई) और उनके आदर्श वाक्य दशकों पुराने हैं, जो हिंदू देवी-देवताओं और सिख गुरुओं के नाम पर आधारित हैं। इन्हें किसी भी तरह से मौजूदा सरकार का कोई ‘हिंदूकरण एजेंडा’ नहीं कहा जा सकता। भारतीय सेना में सैनिक युद्ध के मैदान में अपना हौसला बढ़ाने के लिए हमेशा से अपने भगवान को याद करते आए हैं। इसके कई बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं।
जैसे राजपूताना राइफल्स का युद्धघोष ‘राजा रामचंद्र की जय’ है, तो राजपूत रेजिमेंट ‘बोल बजरंग बली की जय’ का नारा लगाती है। इसी तरह डोगरा रेजिमेंट ‘ज्वला माता की जय’, सिख रेजिमेंट ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, गढ़वाल राइफल्स ‘बद्री विशाल लाल की जय’, कुमाऊं रेजिमेंट ‘कालिका माता की जय’ और जम्मू-कश्मीर राइफल्स ‘दुर्गा माता की जय’ के नारे के साथ आगे बढ़ती है।
इस सब को देखते हुए अगर आने वाले समय में अली अहमद या ‘The Wire’ इस बात पर भी सवाल उठा दें कि सेना में ‘अल्लाह’ के नाम पर कोई युद्धघोष क्यों नहीं है, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होगी। सेना में हिंदू परंपराओं का पालन सैनिक पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण राजस्थान का तनोट माता मंदिर है, जिसकी देखरेख साल 1965 से सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान कर रहे हैं।
इस मंदिर की कहानी यह है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित होने के बावजूद साल 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान की भारी गोलाबारी से इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ था। मंदिर परिसर में गिरे पाकिस्तानी बम फटे ही नहीं और वे आज भी मंदिर में दर्शन के लिए रखे हुए हैं। हमारे जवान आज भी वहाँ रोज आरती करते हैं।
इसी तरह सिख रेजिमेंट बड़ी धूमधाम से बैसाखी मनाती है जहाँ सैनिक सम्मान के साथ गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिर पर रखकर पाठ करते हैं। इसके साथ ही भारतीय सेना के बैंड आज भी ‘अबाइड विद मी’ नाम की पारंपरिक ईसाई प्रार्थना की धुन बजाते हैं, जो दिखाता है कि सेना सभी परंपराओं का सम्मान करती है।
भारतीय सेना में सैनिकों को समय-समय पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने के लिए हर धर्म के धार्मिक गुरुओं या शिक्षकों की भर्ती की जाती है। इन गुरुओं में पंडित, मौलवी, ग्रंथी, पादरी और बौद्ध भिक्षु सभी शामिल हैं। मौजूदा सरकार या सैन्य नेतृत्व ने इनमें से किसी भी परंपरा पर रोक नहीं लगाई है। ऐसे में लेखक अली अहमद का यह दावा पूरी तरह गलत साबित होता है कि सेना बहुसंख्यक राजनीति के दबाव में आकर हिंदुत्व का एजेंडा चला रही है और अपनी पुरानी परंपराओं को छोड़ रही है।
लेखक अली अहमद जिसे सेना का ‘राजनीतिकरण’ कह रहे हैं, वह असल में भारत के सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच बढ़ा हुआ बेहतर तालमेल और सहयोग है। यह बदलाव किसी निजी फायदे के लिए नहीं आया है। यह बदलाव भाजपा सरकार के उस मजबूत रुख के कारण आया है जो पिछली कॉन्ग्रेस सरकार से बिल्कुल अलग है।
साल 2008 में मुंबई के 26/11 हमलों में जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने कई भारतीयों को मार डाला था, तब तत्कालीन सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया था। सच तो यह है कि एक राष्ट्रवादी सरकार स्वाभाविक रूप से सेना की जरूरतों और उसकी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझती है। वह उन्हें तेजी से पूरा करती है जिससे दोनों के बीच एक बेहतरीन तालमेल बनता है।
इसे राजनीति से प्रेरित नहीं कहा जा सकता। एक मजबूत और जीवित लोकतंत्र में पेशेवर सेना और चुनी हुई सरकार इसी तरह मिलकर काम करती हैं। हालाँकि जो लोग भाषाओं पर धर्म का ठप्पा लगाते हैं और सेना प्रमुख के हिंदू होने पर सवाल उठाते हैं, वे भारतीय सेना की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे लोग इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि भारत अब उस पुराने और दिखावे वाले ‘धर्मनिरपेक्षता’ के ढर्रे को छोड़ रहा है। उस पुराने ढर्रे में सिर्फ हिंदू मान्यताओं को दबाया जाता था और दूसरे धर्मों के दिखावे को ही शांति, भाईचारा और देश की असली पहचान मान लिया जाता था।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)