Netflix की मशहूर सीरीज ‘ब्लैक मिरर’ का वह बेहद चर्चित एपिसोड आपको याद होगा- ‘नोसडाइव’। मुख्य किरदार लेसी स्क्रीन पर अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए अपनी हँसी, अपने आँसुओं और अपनी आत्मा का सौदा कर रही है। वह एक ऐसी दुनिया है जहाँ इंसान की कीमत उसकी धड़कनों के बजाय उसकी स्क्रीन पर चमकते डिजिटल कार्ड्स और फाइव स्टार रेटिंग से तय होती है। हमारा वर्तमान भी ब्लैक मिरर के उस डायस्टोपियन भविष्य से टकराकर चकनाचूर हो चुका है। फिक्शन और हकीकत के बीच की सीमा रेखा गायब हो चुकी है।
इसकी सबसे वीभत्स बानगी देखने को मिली, जब मुंबई के नामी अस्पताल की डॉक्टर सेजल पवार और स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो की एक क्लिप इंटरनेट के एल्गोरिथमिक महासागर में वायरल हुई। एनाटॉमी लैब में मानवता की सेवा के लिए दान किए गए मृत शरीरों के गुप्त अंगों के साइज पर हँसने और उनका मजाक उड़ाने की बात को जिस तरह एक मनोरंजन उत्पाद के रूप में पेश किया गया, वह वस्तुतः अटेंशन इकोनॉमी की सांस्कृतिक सड़न का चरम बिंदु है।
AIMSA strongly condemns the insensitive and disrespectful portrayal of cadavers and body donors for entertainment or comedy.@Rj_pranit ,#Sejal Pawar (MBBS Student). Every cadaver represents a noble individual who chose to contribute to medical education through body donation,… pic.twitter.com/fc8mQnj3Bk
— ALL INDIA MEDICAL STUDENTS' ASSOCIATION (@official_aimsa) June 11, 2026
डॉक्टर सेजल पवार का उस मंच पर खड़े होकर अपनी संवेदनहीनता को ‘कूल’ दिखाना ब्लैक मिरर की लेसी के उसी छटपटाहट का विस्तार है, जहाँ वह एक ऊँची सोशल रेटिंग पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कार्ल मार्क्स ने जिसे थ्योरी ऑफ एलिनेशन/अलगाव का सिद्धांत कहा था, यह उसका आधुनिक संस्करण ही है।
मेडिकल साइंस का छात्र, जिसका बुनियादी रिश्ता जीवन, मृत्यु और मानवीय गरिमा से होना चाहिए था, वह इस डिजिटल पूंजीवाद के सुपरस्ट्रक्चर में अपनी वास्तविक पहचान से पृथक/ एलीनेट ही हो चुका है। एक डॉक्टर का पेशा समाज में बुर्जुआ संभ्रांतवाद का प्रतीक रहा है, लेकिन ‘अटेंशन इकोनॉमी’ ने उसे भी डिजिटल सर्वहारा बना दिया, जिसे जीवित रहने और प्रासंगिक बने रहने के लिए लगातार व्यूज और लाइक्स की भीख मांगनी पड़ती है।
कार्ल मार्क्स ने दास कैपिटल में कमोडिटी फेटिशिज्म की व्याख्या करते हुए बताया था कि कैसे पूंजीवादी व्यवस्था मानवीय मूल्यों को निर्जीव वस्तुओं में बदल देती है। एक मेडिकल कॉलेज की एनाटॉमी लैब में रखा कैडेवर कोई साधारण वस्तु तो नहीं ही होगी, वह तो किसी इंसान का अंतिम मानवीय योगदान है।
लेकिन जब डॉक्टर पवार और प्रणीत मोरे उस मृत देह को एक सस्ते सेक्सुअलाइज़्ड जोक में तब्दील करते हैं, तो वे उस लाश का विमुद्रीकरण कर रहे होते हैं। लेट कैपिटलिज्म के इस वीभत्स दौर में मृत शरीर अब सम्मान के काबिल नहीं रह गया; वह केवल एक शॉक वैल्यू है, एक कच्चा माल है जिससे यूट्यूब पर सरप्लस वैल्यू पैदा की जा सके। यह ब्लैक मिरर की उसी क्रूरता का सजीव प्रसारण है, जहाँ किसी की त्रासदी दूसरे के लिए केवल एक डिजिटल रील का स्क्रीनशॉट है।
कॉमेडियन के मंच पर खड़ी वह डॉक्टर और खुद को आर्टिस्ट कहने वाला वह क्रिएटर, दोनों ही इस मुगालते में हैं कि वे FoE का इस्तेमाल कर रहे हैं। मार्क्स इसे फॉल्स कॉन्शियसनेस कहते हैं। वे आजाद कहाँ हैं? वे तो उस डिजिटल एल्गोरिदम के बंधुआ मजदूर हैं, जो उन्हें लगातार और अधिक आक्रामक, अधिक नग्न और अधिक असंवेदनशील होने पर मजबूर करता है। यूट्यूब का एल्गोरिदम कोई मानवीय संस्था नहीं है, वह पूंजी का वह हिंसक इंजन है जो मानवीय संवेदनाओं के मलबे पर चलता है।
ब्लैक मिरर के उस एपिसोड का अंत तब होता है जब लेसी की रेटिंग शून्य हो जाती है, वह जेल की कोठरी में बंद होती है और अपनी आंखों से उस डिजिटल स्क्रीन को हटते हुए देखती है। तब जाकर वह पहली बार आजाद महसूस करती है।
सेजल पवार की यह वायरल क्लिप हमारे पूरे समाज के ‘नोसडाइव’ की बानगी है। जब तक हम इस रेटिंग, सोशल मीडिया कार्ड्स और व्यूज के पूंजीवादी दलदल को ध्वस्त नहीं करेंगे, तब तक चिकित्सा की प्रयोगशालाएँ और इंसानी लाशें इसी तरह डिजिटल स्पेक्टेकल की वेदी पर चढ़ती रहेंगी।
जरा सोचिए… आप सालों से अपनी छोटी-सी दुकान पर मेहनत करके परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। सब कुछ सामान्य चल रहा है। तभी एक रात चीनी माँगने के बहाने कुछ इस्लामी कट्टरपंथी आपकी दुकान पर आते हैं।
देखते ही देखते वहाँ हिंसक भीड़ जमा हो जाती है और आपका पूरा परिवार उनके निशाने पर आ जाता है। भीड़ आपकी दुकान में घुसकर बर्बरता की सारी हदें पार कर देती है।
आपके कपड़े फाड़ दिए जाते हैं, आपकी पत्नी का गला घोंटकर हत्या कर दी जाती है, आपकी बेटी का होंठ नोच लिया जाता है और आपकी गोद में खेल रहे मासूम बच्चे को हवा में उछालकर बेरहमी से जमीन पर पटक दिया जाता है।
यह किसी फिल्म या काल्पनिक कहानी का दृश्य नहीं है, बल्कि गुजरात के खेड़ा जिले के मटर तालुका से सामने आया एक दिल दहला देने वाला मामला बताया जा रहा है। आरोप है कि चीनी माँगने के बहाने पहुँचे इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने एक निर्दोष हिंदू परिवार पर हमला कर उसे खून से लथपथ कर दिया और पूरे इलाके में दहशत फैला दी।
यह कोई साधारण विवाद या अचानक हुई हिंसा की घटना नहीं बताई जा रही, बल्कि इसके पीछे स्थानीय हिंदुओं को डराने, धमकाने और क्षेत्र से पलायन के लिए मजबूर करने की एक बड़ी साजिश होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि इस पूरी घटना ने इलाके के हिंदू परिवारों में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है।
वहीं पीड़ित पक्ष का दावा है कि मुख्यधारा के कई मीडिया संस्थानों ने इस संवेदनशील मामले के सभी तथ्यों को प्रमुखता से सामने नहीं रखा। ऐसे में केवल ‘ऑपइंडिया’ की टीम घटनास्थल तक पहुँची, जहाँ उसने पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों से बातचीत कर उनकी आपबीती तथा दर्द को लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
ग्राउंड जीरो पर पीड़ित परिवार की दर्दनाक कहानी
हम सबसे पहले गुजरात के खेड़ा जिले के मटर तालुका स्थित GIDC क्षेत्र के पास उस दुकान पर पहुँचे, जहाँ पीड़ित हिंदू परिवार रहता है और अपना व्यवसाय चलाता है। वहाँ हमारी मुलाकात परिवार के मुखिया, उनकी पत्नी और उनकी बेटियों से हुई। परिवार के सभी सदस्यों के शरीर पर हमले के गंभीर निशान साफ दिखाई दे रहे थे।
परिवार के मुखिया, जिन्हें स्थानीय लोग चाचा कहकर बुलाते हैं, इतनी बुरी तरह घायल थे कि उन्हें खड़े होने और चलने-फिरने में भी कठिनाई हो रही थी। उनकी पत्नी के चेहरे पर मारपीट के स्पष्ट निशान थे और पूरा चेहरा सूजा हुआ दिखाई दे रहा था।
वहीं उनकी बेटी भी गंभीर रूप से घायल थी, जिसका होंठ बुरी तरह फट गया था। परिवार के सदस्यों का कहना था कि हमले के दौरान उनके साथ बेहद बेरहमी से मारपीट की गई।
हमने पीड़ित परिवार के मुखिया से बातचीत कर पूरी घटना को विस्तार से समझने की कोशिश की। उन्होंने जो आपबीती सुनाई, वह बेहद भावुक और झकझोर देने वाली थी। परिवार के मुखिया ने बताया कि वह पिछले कई सालों से इसी स्थान पर चाय और नाश्ते की एक छोटी-सी दुकान चला रहे हैं, जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है।
उन्होंने बताया कि उनकी दुकान पर आसपास स्थित GIDC में काम करने वाले मजदूर, कर्मचारी और आसपास के गाँवों के लोग नियमित रूप से चाय-नाश्ता करने आते हैं। सालों से वह इसी व्यवसाय के माध्यम से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं और स्थानीय लोगों के बीच उनकी दुकान एक परिचित स्थान बन चुकी है।
एक चम्मच चीनी के बहाने आतंक और तोड़फोड़
परिवार के मुखिया के अनुसार, पिछले रविवार की रात करीब 8 बजे एक मुस्लिम व्यक्ति उनकी दुकान पर आया। उनका कहना है कि वह व्यक्ति नशे की हालत में दिखाई दे रहा था। उसने बताया कि उसका एक दोस्त बीमार है और उसे तत्काल चीनी की आवश्यकता है।
चाचा के मुताबिक, उन्होंने मानवीय आधार पर उसकी मदद करने का फैसला किया और उससे कहा, “सामने चायदानी के पास रखे डिब्बे में चीनी रखी है, वहीं से ले लो।” उन्हें उम्मीद थी कि वह व्यक्ति जरूरत भर चीनी लेकर चला जाएगा, लेकिन इसके बाद घटना ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया।
परिवार के मुखिया का आरोप है कि चीनी लेने के बाद वह व्यक्ति वहाँ से जाने के बजाय दोबारा दुकान के गोदाम वाले हिस्से में पहुँच गया और वहाँ रखे हिसाब-किताब के कागजात फाड़ने लगा। चाचा के अनुसार, उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, तुम्हें जो चाहिए मुझसे माँग लो, मैं दे दूँगा, लेकिन हिसाब-किताब के कागज इस तरह मत फाड़ो।”
चाचा का कहना है कि उनकी यह बात सुनते ही वह व्यक्ति भड़क उठा और उन्हें तथा उनकी पत्नी को अपशब्द कहने लगा। जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो आरोप के मुताबिक उस व्यक्ति और उसके साथ मौजूद एक महिला ने उन पर हमला कर दिया। परिवार का दावा है कि हमलावरों ने उनके कपड़े फाड़ दिए और उनके साथ मारपीट करते हुए उन्हें घसीटा।
पीड़ित परिवार के अनुसार, जब चाचा अपनी पत्नी और खुद को बचाने की कोशिश कर रहे थे, तब उनकी भी बेरहमी से पिटाई की गई। कुछ देर तक हंगामा और मारपीट करने के बाद हमलावर वहाँ से चले गए। हालाँकि परिवार का कहना है कि हिंसा यहीं समाप्त नहीं हुई।
उनके मुताबिक, घटना के महज दो से तीन मिनट बाद ही स्थिति और भयावह हो गई। आरोप है कि लगभग 10 से 12 लोगों की एक भीड़, जो लाठियों और धारदार हथियारों से लैस थी, दुकान में घुस आई और फिर पूरे परिवार को निशाना बनाते हुए हमला शुरू कर दिया।
पीड़ितों को जान से मारने की मिल रही धमकियाँ
पीड़ित परिवार के अनुसार, दुकान में घुसी भीड़ ने आते ही चाचा को दोबारा निशाना बनाया और उनके साथ बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी। परिवार का आरोप है कि हमलावर लगातार उन पर लाठी-डंडों और मुक्कों से हमला करते रहे, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।
परिवार के सदस्यों का कहना है कि भीड़ में शामिल एक महिला ने चाची के साथ भी हिंसक व्यवहार किया। आरोप है कि उसने उनका गला दबाने की कोशिश की, उनके चेहरे पर कई थप्पड़ मारे और लगातार घूंसे बरसाए, जिससे उनके चेहरे पर गंभीर चोटें आईं।
इसी दौरान परिवार का दामाद भी मौके पर पहुँच गया। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, जैसे ही उसने स्थिति को संभालने और परिवार को बचाने का प्रयास किया, भीड़ ने उसे भी निशाना बना लिया। आरोप है कि उस पर भी जानलेवा हमला किया गया और उसके साथ बुरी तरह मारपीट की गई, जिससे घटनास्थल पर अफरा-तफरी और भय का माहौल पैदा हो गया।
पीड़ित परिवार के अनुसार, हमले के दौरान चाची ने हाथ जोड़कर हमलावरों से अपने दामाद को छोड़ देने की गुहार लगाई। उनका कहना है कि वह रोते हुए कह रही थीं, “उसे जाने दो, उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं।”
लेकिन परिवार का आरोप है कि हमलावरों ने उनकी एक नहीं सुनी और लगातार धमकियाँ देते रहे। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, हमलावर कह रहे थे कि किसी को नहीं छोड़ा जाएगा और भविष्य में भी मौका मिलने पर उन्हें नुकसान पहुँचाया जाएगा।
परिवार का दावा है कि जब उनकी बेटी ने अपने परिजनों को बचाने और बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो हमलावरों ने उसे भी निशाना बना लिया। आरोप है कि उसके साथ बुरी तरह मारपीट की गई, जिससे उसका होंठ गंभीर रूप से घायल हो गया।
पीड़ित परिवार के अनुसार, उस समय उसकी छोटी बच्ची भी मौके पर मौजूद थी। परिवार का आरोप है कि हमले की अफरा-तफरी के बीच बच्ची को भी नहीं बख्शा गया और उसके साथ भी बेहद खतरनाक व्यवहार किया गया।
परिवार का कहना है कि सौभाग्य से बच्ची दुकान में रखे गद्दे पर गिर गई, जिससे उसे गंभीर चोट नहीं आई। परिजनों का मानना है कि यदि ऐसा नहीं होता, तो स्थिति और भी दुखद हो सकती थी।
पीड़ित परिवार के अनुसार, हमले के दौरान स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब भीड़ में शामिल एक व्यक्ति ने धारदार हथियार निकाल लिया। परिवार का आरोप है कि उसने दामाद के सिर पर सीधा वार किया, जिससे उन्हें गंभीर चोट आई।
परिजनों के मुताबिक, वार इतना तेज था कि उनके सिर से भारी मात्रा में खून बहने लगा और वह घटनास्थल पर ही बेहोश होकर गिर पड़े। परिवार का कहना है कि इस दौरान दुकान का पूरा परिसर चीख-पुकार, अफरातफरी और दहशत से भर गया था।
पीड़ित पक्ष के अनुसार, मारपीट और हिंसा का तांडव मचाने के बाद हमलावर वहाँ से फरार हो गए। उनके जाने के बाद घायल परिवार के सदस्य किसी तरह एक-दूसरे को संभालते हुए मदद की तलाश में जुटे और घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुँचाया गया।
खेड़ा में केले का मॉडल? हिंदुओं को पलायन कराने की एक बड़ी योजना?
जब हमने पीड़ित परिवार के मुखिया से पूछा कि आखिर उनके परिवार को इस तरह निशाना क्यों बनाया गया, तो उन्होंने अपनी आशंकाएँ और आरोप विस्तार से बताए। उनका दावा था कि वह कई वर्षों से इस क्षेत्र में रहकर अपना व्यवसाय चला रहे हैं, लेकिन कुछ स्थानीय लोगों को उनकी मौजूदगी और कारोबार से आपत्ति है।
परिवार के मुखिया का आरोप है कि इस तरह की घटनाओं के जरिए इलाके के हिंदू परिवारों में भय का माहौल पैदा करने की कोशिश की जाती है, ताकि वे अपना घर-बार और व्यवसाय छोड़कर वहाँ से चले जाएँ।
उन्होंने दावा किया कि यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर दबाव और डर का वातावरण बनाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। हालाँकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी है और मामले की जाँच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है।
इसी दौरान पीड़ित परिवार का दामाद भी गाँव लौट आया, जो नडियाद के एक अस्पताल में दो दिनों तक उपचार कराने के बाद घर पहुँचा था। उसकी हालत अभी भी कमजोर दिखाई दे रही थी और वह ज्यादा बातचीत करने की स्थिति में नहीं था।
इसके बावजूद उसने बताया कि घटना के समय वह अपने ससुर की दुकान पर कुछ सामान लेने गया था। उसका आरोप है कि वहाँ मौजूद भीड़ ने उस पर धारदार हथियार से हमला किया, जिससे उसके सिर में गंभीर चोट आई और वह बेहोश हो गया।
दामाद ने दावा किया कि हमले में शामिल सभी लोग उसी भीड़ का हिस्सा थे जिसने दुकान और परिवार के अन्य सदस्यों पर भी हमला किया था। फिलहाल पूरे मामले की जाँच जारी है और पुलिस आरोपों की सत्यता की पड़ताल कर रही है।
परिवार के बड़े बेटे ने भी बातचीत के दौरान दावा किया कि यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित हमला था। उनका कहना था कि यदि घटना पूरी तरह से आकस्मिक होती, तो शुरुआती विवाद के महज कुछ ही मिनटों के भीतर बड़ी संख्या में लोग हथियारों के साथ घटनास्थल पर नहीं पहुँच सकते थे।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में किसी मामूली विवाद के बाद इतनी जल्दी 10 से 12 लोगों का एक समूह एकत्र होकर मौके पर पहुँचना आसान नहीं है। उनके अनुसार, यह हमला पहले से तय हो सकता है।
परिवार के बड़े बेटे ने यह भी दावा किया कि उनके परिवार को पहले भी इसी प्रकार की हिंसा और धमकियों का सामना करना पड़ा है। उनका कहना था कि कुछ साल पहले भी इसी स्थान पर उनके परिवार पर हमला हुआ था।
परिवार का आरोप है कि ऐसी घटनाओं का उद्देश्य उन्हें डराना और इलाके में असुरक्षा का माहौल पैदा करना है। हालाँकि, इन सभी दावों और आरोपों की पुष्टि जाँच एजेंसियों द्वारा की जानी बाकी है और मामले की जाँच जारी है।
एक्सक्लूसिव: गरमाला गाँव से सनसनीखेज खुलासा, अपराधी बेखौफ
पीड़ित परिवार और कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि मातर और उसके आसपास के क्षेत्रों में इस प्रकार की हिंसक घटनाएँ कोई नई बात नहीं हैं। मामले की पड़ताल के दौरान हमारी मुलाकात गरमाला गाँव के एक हिंदू युवक से हुई, जिसने आरोप लगाया कि कुछ महीने पहले उस पर भी जानलेवा हमला किया गया था।
युवक ने कैमरे पर अपनी आपबीती सुनाते हुए कई गंभीर आरोप लगाए, जिनसे क्षेत्र की कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होते हैं। युवक ने बताया कि जनवरी में उत्तरायण पर्व के दौरान उसके साथ यह घटना हुई थी।
उसका दावा है कि उसके खेत के पास स्थित एक आवासीय क्षेत्र में रहने वाले कुछ लोगों के साथ उसका विवाद हुआ था। युवक के अनुसार, उत्तरायण के दिन छतों पर मौजूद कुछ लोग उसके परिवार की महिलाओं के सामने गलत भाषा का इस्तेमाल करते थे, जिससे तनाव की स्थिति पैदा हो जाती थी।
उसने यह भी आरोप लगाया कि पतंगबाजी के दौरान इस्तेमाल होने वाली डोर और अन्य सामग्री बार-बार उनके खेतों में फेंकी जाती थी, जिससे खेतों में काम करने वाले लोगों, पशुओं और पक्षियों को खतरा पैदा होता था।
युवक का कहना है कि जब उसने इसका विरोध किया, तो विवाद बढ़ गया और बाद में उस पर हमला किया गया। हालाँकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित घटनाओं के बारे में स्थानीय प्रशासन तथा पुलिस के रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
गरमाला गाँव के उस युवक ने बताया कि जब उसने विवाद के दौरान सामने मौजूद लोगों से हाथ जोड़कर कहा, “भाई, घर की महिलाएँ यहाँ खड़ी हैं, उनके सामने इस तरह की गालियाँ मत दो,” तो स्थिति शांत होने के बजाय और अधिक तनावपूर्ण हो गई। युवक का दावा है कि उसकी यह बात सुनकर कुछ लोग भड़क गए और उससे तीखी बहस करने लगे।
युवक के अनुसार, देखते ही देखते विवाद हिंसक हो गया। उसका आरोप है कि भीड़ में शामिल एक व्यक्ति ने अचानक बड़ा चाकू निकाल लिया और पीछे से उसकी पीठ पर वार कर दिया। युवक का कहना है कि वार इतना गंभीर था कि चाकू गहराई तक धंस गया, जिससे उसके शरीर के अंदरूनी अंगों को गंभीर क्षति पहुँची।
उसने बताया कि इसके बाद उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा और कई ऑपरेशनों से गुजरना पड़ा। युवक के मुताबिक, चिकित्सकों के लगातार प्रयासों के बाद ही उसकी जान बच सकी।
युवक ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बावजूद हमले में शामिल लोग आज भी क्षेत्र में खुलेआम घूम रहे हैं। उसका कहना है कि इससे पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है तथा लोगों के मन में कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
मातर क्षेत्र में प्रवास के दौरान हमने कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे अनेक स्थानीय लोगों से बातचीत की। बातचीत के दौरान कई लोगों ने गरमाला गाँव का जिक्र किया और दावा किया कि वहाँ से जुड़े कुछ तत्वों का नाम क्षेत्र में होने वाले विवादों और तनावपूर्ण घटनाओं में अक्सर सामने आता है।
स्थानीय निवासियों का कहना था कि क्षेत्र में शांति और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासन को निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए। हालाँकि, स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित जाँच एजेंसियों और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।
झील के किनारे संदिग्ध मंदिर और नशेड़ियों का अड्डा
रिपोर्टिंग के दौरान हमें एक और ऐसा पहलू सामने आया, जिसे स्थानीय लोग इस पूरे विवाद से जोड़कर देख रहे हैं। GIDC क्षेत्र के पास, पीड़ित हिंदू परिवार की दुकान से कुछ दूरी पर एक झील स्थित है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि झील के किनारे एक मजहबी संरचना मौजूद है, जिसे वे दरगाह के रूप में पहचानते हैं। कुछ निवासियों ने आरोप लगाया कि रात के समय वहाँ लोगों की आवाजाही रहती है और कई बार वहाँ असामाजिक गतिविधियाँ होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि रविवार को हुई हिंसा में शामिल कुछ लोग घटना से पहले इसी क्षेत्र में मौजूद थे। हालाँकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और इनकी सत्यता की जाँच संबंधित एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है।
जब हम स्वयं झील के किनारे पहुँचे, तो वहाँ एक मजहबी संरचना दिखाई दी, जिसका मुख्य द्वार बंद था। इसके बाद कई सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं।
यह संरचना किसकी है? जिस भूमि पर यह बनी है, उसका स्वामित्व किसके पास है? क्या इसके निर्माण के लिए सभी आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी अनुमतियाँ प्राप्त की गई थीं? और क्या यह निर्माण-संबंधित नियमों के अनुरूप है?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रशासनिक रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेजों और संबंधित विभागों की जाँच से ही स्पष्ट हो सकते हैं। फिलहाल, स्थानीय स्तर पर इस संरचना को लेकर कई तरह की चर्चाएँ और दावे जरूर मौजूद हैं, लेकिन उनकी पुष्टि आधिकारिक जाँच के बाद ही संभव है।
हिंदू संगठनों ने कड़ी चेतावनी जारी की: जिहादी गतिविधियाँ बंद करो, अन्यथा तुम्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा
रिपोर्टिंग के दौरान हमारी मुलाकात नडियाद जिले के एक स्थानीय हिंदू संगठन के पदाधिकारी से भी हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने क्षेत्र की कानून-व्यवस्था और हाल के घटनाक्रमों को लेकर अपनी चिंताएँ व्यक्त कीं।
उनका दावा था कि झील के आसपास कुछ लोगों द्वारा शराब सेवन और अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों की शिकायतें पहले भी स्थानीय स्तर पर उठाई गई हैं। हालाँकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित प्रशासनिक या पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में मटर तालुका में सामुदायिक तनाव से जुड़ी घटनाओं को लेकर स्थानीय लोगों के बीच चिंता बढ़ी है। उनके अनुसार, विभिन्न अवसरों पर विवाद और टकराव की घटनाएं सामने आई हैं, जिनकी निष्पक्ष जाँच और प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।
बातचीत के दौरान उन्होंने नवरात्रि जैसे धार्मिक आयोजनों का भी उल्लेख किया। उनका दावा था कि पूर्व में कुछ लोगों द्वारा गरबा आयोजनों को लेकर आपत्तियाँ और धमकियाँ दी गई थीं, जिससे स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल बना था। हालाँकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित पुलिस रिकॉर्ड, शिकायतों और प्रशासनिक दस्तावेजों के आधार पर ही की जा सकती है।
स्थानीय संगठनों का कहना है कि क्षेत्र में शांति, कानून-व्यवस्था और सभी समुदायों के बीच सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासन को प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे घटना के सामने आने के बाद से ही पीड़ित परिवार के संपर्क में हैं और उन्हें उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं, प्रशासनिक सहायता तथा सामाजिक सहयोग के संबंध में मदद प्रदान कर रहे हैं।
उनका कहना था कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए वे संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रख रहे हैं और मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे हैं।
बातचीत के दौरान संगठन के पदाधिकारियों ने क्षेत्र में कथित असामाजिक और हिंसक गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियाँ हो रही हैं, तो उनके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
साथ ही उन्होंने प्रशासन से माँग की कि दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
संगठन के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि वे मामले को कानूनी और लोकतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाएँगे तथा पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास जारी रखेंगे।
उनका कहना था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अपराधियों को जवाबदेह ठहराना संबंधित प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है और इसी प्रक्रिया के तहत दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन और अवैध भूमि सौदों लगा है प्रश्नचिह्न
हमने सुबह से लेकर देर शाम तक पूरे क्षेत्र में रहकर अलग-अलग पक्षों से बातचीत की। इस दौरान हमने पीड़ित परिवार की आपबीती सुनी, स्थानीय निवासियों से बात की, सामाजिक संगठनों का पक्ष जाना और क्षेत्र की परिस्थितियों का जायजा लिया।
बातचीत के दौरान कई स्थानीय लोगों ने दावा किया कि पिछले कुछ सालों में इलाके की जनसांख्यिकीय और सामाजिक परिस्थितियों में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। कुछ निवासियों का मानना है कि इन परिवर्तनों के साथ-साथ सामुदायिक तनाव और विवादों की घटनाओं को लेकर भी उनकी चिंताएँ बढ़ी हैं।
हालाँकि इन दावों का मूल्यांकन आधिकारिक जनगणना और प्रशासनिक आँकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है। स्थानीय लोगों द्वारा बार-बार गरमाला गाँव का उल्लेख किया गया। कई निवासियों ने वहाँ की स्थिति को संवेदनशील बताते हुए कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासनिक सतर्कता बढ़ाने की माँग की।
इसके अलावा कुछ लोगों ने क्षेत्र में कृषि भूमि के उपयोग, भूमि खरीद-बिक्री और निर्माण गतिविधियों को लेकर भी शिकायतें दर्ज कराईं। उनका आरोप था कि कुछ स्थानों पर भूमि उपयोग संबंधी नियमों के उल्लंघन की जाँच की जानी चाहिए। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित राजस्व अभिलेखों, भूमि रिकॉर्ड और प्रशासनिक जाँच के आधार पर ही संभव है।
रिपोर्टिंग के दौरान झील के किनारे स्थित एक धार्मिक संरचना को लेकर भी कई सवाल स्थानीय लोगों द्वारा उठाए गए। कुछ निवासियों ने इसकी वैधता, भूमि स्वामित्व और निर्माण संबंधी अनुमतियों की जाँच की माँग की।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
वामपंथी छात्र संगठन ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA)’ ने हाल ही में ‘कॉकरोचेस ऑन द स्ट्रीट्स’ नाम से एक सप्ताह भर लंबा देशव्यापी अभियान शुरू करने की घोषणा की। यह अभियान दिल्ली में शुरू हुआ और इसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की गई। यह अभियान 11 जून से शुरू होकर 18 जून तक चलेगा।
पहले दिन यानी 11 जून को AISA के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस, कमला नगर, पटेल चेस्ट, गुर्मंडी और विजय नगर जैसे इलाकों में प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने कॉकरोच के मुखौटे पहनकर विरोध जताया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
इस प्रदर्शन की घोषणा 6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा जंतर-मंतर पर किए गए प्रोटेस्ट के बाद की गई। उस प्रदर्शन में भी नीट एग्जाम पेपर लीक जैसे मुद्दों को आधार बनाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग करने की बातें कही गई थी। हालाँकि बाद में प्रोटेस्ट की जमीनी हकीकत ये पता चली कि वहाँ भी वामपंथी ही घुसे थे, जिन्होंने मौका देखकर आजादी-आजादी और ‘जय भीम’ जैसे नारेबाजी की।
AISA ने भले ही आधिकारिक रूप से CJP को अपना समर्थन न दिया हो, लेकिन CJP के प्रदर्शन में AISA की नेहा बोरा सबसे आगे खड़ी दिखीं। अब यहाँ ये बात तो किसी से छिपी नहीं है कि आखिर AISA अपनी विचारधारा और राजनैतिक एजेंडे को धकेलने के लिए क्या-क्या करता है। बस वही काम बोरा भी यहाँ ‘शिक्षा व्यवस्था में सुधार’ के नाम पर करती हुई मिलीं।
बोरा ने मीडिया से बात करते हुए शिक्षा व्यवस्था के पूरे मुद्दे को UAPA केस में आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम से जोड़ दिया। बेशर्मी से नेहा ने खालिद और इमाम पर लगे गंभीर आरोपों को धो-पोंछने काम किया। साथ ही उनकी करतूतों पर रिपोर्ट करने वाली मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ और बीजेपी आईटी सेल वाले करार दिया। उसने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम को गोदी मीडिया ने देशद्रोही दिखाया है।
उसने दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की साजिश रचने वालों को ‘आम छात्र’ बताया और कहा कि उनका राजनीतिक उत्पीड़न हो रहा है। बोरा ने न्यायपालिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम सालों से जेल में बंद हैं क्योंकि उन्हें जमानत नहीं मिल रही है। हालाँकि ये कहते हुए वह चालाकी से इस सच को छुपा ले गईं कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर की थी कि शुरुआती जाँच में 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश में उनकी भूमिका के साफ सबूत मिलते हैं।
नेहा बोरा की ब्राह्मणों के खिलाफ घृणा और उसकी सफाई
अपने आपको छात्रों के अधिकार के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता बताने वाली नेहा बोरा दंगे भड़काने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने जैसे गंभीर अपराधों को ही धो-पोंछने का काम नहीं करतीं, बल्कि वो खुलेआम ब्राह्मण समुदाय के लोगों के खिलाफ जहर उगलने का, नफरत फैलाने का काम करती हैं।
अपनी एक वीडियो में नेहा बोरा समझाती हैं कि ब्राह्मणवाद क्या है। उनके अनुसार- सोसायटी में अगर एक समाज दूसरे वर्ग पर अत्याचार करता है तो वो भी ब्राह्मणवाद है और अगर एक समाज दूसरे समाज को दबाता है तो वो भी ब्राह्मणवाद है। कुल मिलाकर नेहा बोरा के अनुसार भारतीय समाज में किसी भी तरह का भेदभाव, भले ही उसका जाति से कोई लेना-देना न हो, लेकिन उसे ‘ब्राह्मणवाद’ के सिर मढ़ा जा सकता है।
‘डरा हुआ मुसलमान’ नैरेटिव
इसी तरह बोरा के एक पॉडकास्ट इंटरव्यू को देख पता चलता है कि कैसे उन्हें हिंदुओं की एकता देख चुभन होती है और वो मानती हैं कि अगर जाति भुलाकर देश के हिंदू एकजुट होंगे तो देश का मुस्लिम असुरक्षित महसूस करेगा ही।
इसमें कोई हैरानी की बात हीं है कि नेहा बोरा भारत में रहते हुए फिलीस्तीन के लिए आए दिन रोना रोती हैं। उसके एक्स हैंडल पर इजरायल की निंदा करने वाले तमाम पोस्ट हैं। इसके अलावा बोरा का कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़कर अपना वैचारिक और राजनैतिक एजेंडा फैलान भी हैरान करने वाला नहीं हैं।
Join CITIZENS' CALL
Against the genocide of Palestinian & siege of Gaza! India must end complicity in genocide! Release all hostages of #FreedomFlotilla!
अपने आपको छात्रों का संगठन कहने वाले AISA ने हमेशा से यही किया है कि पहले छात्र अधिकार के नाम पर वो बच्चों से जुड़ते हैं और बाद में उनके दिमाग में वामपंथ वाला जहर घोलना शुरू करते हैं। इस बार भी वह यही कर रहे हैं। उन्हें कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में एक अवसर दिख रहा है, जिसके जरिए वो अपने एजेंडे को हवा दे सकते हैं।
नोट: यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए आर्टिकल के आधार पर बनाई गई है, जिसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
भारत को साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आधिकारिक रूप से पोलियो-मुक्त घोषित किया था। 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में आखिरी पोलियो मरीज मिलने के बाद देश ने इस खतरनाक बीमारी पर लगभग जीत हासिल कर ली थी।
लेकिन अब गाजियाबाद से आई एक खबर ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। गाजियाबाद के विजयनगर क्षेत्र स्थित डूंडाहेड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के दूषित पानी के नमूनों में वैक्सीन-डेरिवेद पोलियो वायरस (VDPV) टाइप-1 की पुष्टि हुई है।
इसके बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड में आ गया है। हालाँकि अधिकारियों ने साफ कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है। जिले में 107 से अधिक स्वास्थ्य टीमें सक्रिय की गई हैं, जो घर-घर जाकर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण कर रही हैं और यह सुनिश्चित कर रही हैं कि कोई भी बच्चा पोलियो की खुराक लेने से वंचित न रह जाए।
गाजियाबाद में आखिर क्या मिला?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि गाजियाबाद में किसी बच्चे में पोलियो की पुष्टि नहीं हुई है। वायरस केवल सीवर के पानी के नमूनों में पाया गया है। स्वास्थ्य विभाग हर महीने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से नमूने लेकर उनकी जाँच करता है। इसी नियमित निगरानी के दौरान डूंडाहेड़ा STP के नमूने में VDPV टाइप-1 मिला।
VDPV वह वायरस होता है जो ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) के कमजोर वायरस से विकसित होता है। सामान्य परिस्थितियों में यह नुकसान नहीं पहुँचाता, लेकिन यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक टीकाकरण कमजोर रहे तो यह वायरस बदल कर फैल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सीवर में वायरस मिलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि पोलियो दोबारा फैल गया है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि निगरानी और टीकाकरण को लगातार मजबूत बनाए रखना होगा।
पोलियो क्या है और यह इतना खतरनाक क्यों माना जाता है?
पोलियो एक अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है जो मुख्य रूप से पाँच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। यह वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद नर्वस सिस्टम पर हमला करता है और कई मामलों में स्थायी लकवे (पैरालिसिस) का कारण बन सकता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई संक्रमित लोगों में शुरुआत में कोई गंभीर लक्षण दिखाई नहीं देते। वे सामान्य रूप से स्वस्थ नजर आते हैं, लेकिन वायरस उनके शरीर में मौजूद रहता है और दूसरे लोगों तक फैल सकता है।
गंभीर मामलों में पोलियो सांस लेने वाली मांसपेशियों को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे मरीज की मौत तक हो सकती है। इसी वजह से दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ पोलियो को मानव इतिहास की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक मानते हैं।
भारत ने पोलियो पर कैसे पाई थी जीत?
एक समय भारत दुनिया में पोलियो के सबसे बड़े केंद्रों में से एक था। हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी का शिकार हो रहे थे। इसके बाद सरकार ने ‘दो बूंद जिंदगी की’ अभियान शुरू किया। गाँव-गाँव, शहर-शहर और घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई गई। लाखों स्वास्थ्यकर्मी, आशा कार्यकर्ता और स्वयंसेवक इस अभियान से जुड़े।
इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि 13 जनवरी 2011 को हावड़ा में आखिरी पोलियो मामला सामने आया। इसके बाद लगातार तीन साल तक कोई नया मामला नहीं मिला और 27 मार्च 2014 को WHO ने भारत को पोलियो-मुक्त घोषित कर दिया। यह भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानी जाती है।
दुनिया में अब भी कहाँ-कहाँ मौजूद है पोलियो?
आज भी दुनिया पूरी तरह पोलियो मुक्त नहीं हुई है। वर्तमान समय में केवल दो देश ऐसे हैं पाकिस्तान और अफगानिस्तान जहाँ वाइल्ड पोलियो वायरस (Wild Poliovirus Type-1) लगातार पाया जाता है।
WHO के अनुसार, 2025 में अक्टूबर तक दुनिया भर में वाइल्ड पोलियो के 38 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 की इसी अवधि में यह संख्या 62 थी। सभी मामले केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मिले।
हालाँकि मामलों की संख्या कम हुई है, लेकिन सीवर के पानी और पर्यावरणीय नमूनों में वायरस की मौजूदगी लगातार सामने आ रही है। इसका मतलब है कि वायरस कई क्षेत्रों में चुपचाप फैल रहा है।
यही कारण है कि WHO अभी भी पोलियो को अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति (Public Health Emergency) मानता है।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पोलियो खत्म करना इतना मुश्किल क्यों है?
पोलियो एलिमिनेशन की वैश्विक लड़ाई में सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान और अफगानिस्तान बने हुए हैं। आँकड़ों की बात करे तो पाकिस्तान में साल 2023 में वाइल्ड पोलियो वायरस के 6 मामले सामने आए थे, लेकिन 2024 में यह संख्या बढ़कर 74 हो गई।
इसके बाद 2025 में 24 मामले दर्ज किए गए। हालाँकि WHO के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों से 245 पर्यावरणीय (सीवेज) नमूनों में पोलियो वायरस की पुष्टि हुई, जिससे साफ है कि वायरस अभी भी कई क्षेत्रों में सक्रिय है। खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, कराची और क्वेटा जैसे इलाके आज भी पोलियो के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।
वही अफगानिस्तान में साल 2023 में वाइल्ड पोलियो के 6 मामले दर्ज किए गए थे। 2024 में यह संख्या बढ़कर 25 हो गई, जबकि 2025 में अक्टूबर तक 4 मामले सामने आए हैं। WHO के आँकड़ों के अनुसार, 2025 में 30 पर्यावरणीय नमूनों में भी पोलियो वायरस मिला है।
दक्षिणी और पूर्वी अफगानिस्तान अभी भी वायरस के मुख्य गढ़ माने जाते हैं। अफगानिस्तान के कई इलाकों में राजनीतिक अस्थिरता, सुरक्षा संबंधी समस्याएँ और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच के कारण बच्चों तक टीकाकरण पहुँचाना कठिन हो जाता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों का पहुँचना आज भी चुनौती बना हुआ है।
The Technical Advisory Group’s latest review of polio eradication efforts in Afghanistan and Pakistan highlighted important progress in reducing the geographical spread of the virus, while underscoring the critical work that remains to stop transmission.
तालिबान शासन के बाद महिला स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका भी सीमित हुई है। कई समुदायों में महिलाओं के घर-घर जाने पर प्रतिबंध या परेशानियाँ होने के कारण छोटे बच्चों तक वैक्सीन पहुँचाने में दिक्कत आती है।
वहीं पाकिस्तान में भी स्थिति आसान नहीं है। कराची, पेशावर, क्वेटा और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में बड़ी आबादी लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाती रहती है। इसके अलावा कुछ इलाकों में वैक्सीन को लेकर गलतफहमियाँ और विरोध भी देखने को मिलता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लाखों बच्चे ऐसे हैं जो नियमित टीकाकरण से छूट जाते हैं। यही बच्चे वायरस के प्रसार का सबसे बड़ा कारण बनते हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुली आवाजाही भी वायरस को एक देश से दूसरे देश तक पहुँचाने में मदद करती है।
यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक दोनों देशों से पोलियो पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, तब तक दुनिया पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकती।
क्या भारत के लिए खतरा बढ़ गया है?
भारत में फिलहाल कोई पोलियो मरीज नहीं मिला है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि देश में पोलियो वापस आ गया है। लेकिन गाजियाबाद में मिले वायरस ने यह जरूर दिखा दिया है कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
आज अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ पहले से कहीं अधिक हैं। हर दिन हजारों लोग अलग-अलग देशों से भारत आते-जाते हैं। यदि किसी क्षेत्र में टीकाकरण कमजोर पड़ जाए तो वायरस को फैलने का मौका मिल सकता है।
इसी कारण से भारत सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार सीवेज सर्विलांस, पर्यावरणीय निगरानी और टीकाकरण कार्यक्रम चला रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत टीकाकरण नेटवर्क है। यदि यह व्यवस्था लगातार सक्रिय रही तो पोलियो दोबारा पैर नहीं जमा पाएगा।
पोलियो से बचाव के लिए क्या करना जरूरी है?
पोलियो से बचने का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पाँच साल तक के सभी बच्चों को समय पर पोलियो की खुराक जरूर मिलनी चाहिए।
इसके अलावा कुछ सामान्य सावधानियाँ भी बेहद जरूरी हैं –
बच्चों का नियमित टीकाकरण कराएँ।
साफ और सुरक्षित पानी का इस्तेमाल करें।
खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोएँ।
बच्चों को स्वच्छ वातावरण में रखें।
सरकारी टीकाकरण अभियानों में सक्रिय सहयोग करें।
यदि किसी बच्चे में हाथ-पैर कमजोर पड़ने या लकवे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
गाजियाबाद के सीवर में पोलियो वायरस जरूर मिला है, लेकिन यह घबराने वाली स्थिति नहीं है। अभी तक किसी बच्चे में पोलियो संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है और स्वास्थ्य विभाग पूरी सतर्कता के साथ निगरानी कर रहा है।
इससे ये समझ आता है कि भारत ने पोलियो पर जीत जरूर हासिल की है, लेकिन इस जीत को बनाए रखने के लिए लगातार सतर्क रहना होगा। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अब भी वायरस की मौजूदगी पूरी दुनिया के लिए चुनौती बनी हुई है।
कश्मीर की धरती पर आज दो बिल्कुल अलग और विरोधी तस्वीरें दुनिया के सामने हैं। नियंत्रण रेखा यानी LOC के एक तरफ भारत का जम्मू-कश्मीर और लद्दाख है, जहाँ विकास, कनेक्टिविटी और शांति का एक नया दौर जारी है। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर (Kashmir) यानी PoK है, जहाँ की जनता बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रही है और सड़कों पर खून बह रहा है।
भारत का कश्मीर जहाँ एशिया की सबसे बड़ी सुरंगों और रिकॉर्ड तोड़ पर्यटन के जरिए खुशहाली की नई इबारत लिख रहा है, वहीं पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आटे, दाल और बिजली के संकट ने एक बहुत बड़े जन-आक्रोश और विद्रोह का रूप ले लिया है। इस पूरे हालात को समझने के लिए आजादी के बाद से लेकर आज तक की पूरी कहानी को जानना जरूरी है, जो यह साफ करती है कि कैसे भारत ने कश्मीर (Kashmir) में अपने नागरिकों को खुशहाली दी और पाकिस्तान ने सिर्फ तबाही और दमन का रास्ता चुना।
आजादी के बाद का इतिहास और पाकिस्तान के कब्जे की शुरुआत
साल 1947 में देश की आजादी के बाद जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ था, तब कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी फौज ने कबाइलियों के भेष में कश्मीर पर विश्वासघाती हमला कर दिया। भारतीय सेना ने बहादुरी से जवाब देते हुए दुश्मनों को खदेड़ना शुरू किया, लेकिन जब तक युद्ध विराम हुआ, तब तक पाकिस्तान ने कश्मीर (Kashmir) के एक बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया था। भारत के इस हिस्से को ही आज हम पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर यानी Pok कहते हैं।
पाकिस्तान ने इस पूरे क्षेत्र को चालाकी से 2 हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्से को वह खुद ‘आजाद जम्मू कश्मीर’ कहता है, जो दरअसल एक दिखावा है। इसके दूसरे और बड़े हिस्से को पाकिस्तान ने ‘गिलगित-बाल्टिस्तान’ के नाम पर अलग कर दिया। आजादी के बाद से ही भारत ने अपने नियंत्रण वाले कश्मीर (Kashmir) को गले लगाया और उसे देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार काम किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने Pok के संसाधनों का जमकर दोहन किया, लेकिन वहाँ के नागरिकों को बुनियादी अधिकार और विकास से हमेशा महरूम रखा।
भारत के कश्मीर का सफर: आतंक के साए से बाहर आकर तरक्की की राह
भारत के जम्मू-कश्मीर ने दशकों तक सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेला है। पाकिस्तान ने हमेशा इस खूबसूरत घाटी में खून बहाने और इसे अस्थिर रखने की नापाक कोशिशें कीं। इसके बावजूद भारत सरकार और भारतीय सेना ने कभी भी कश्मीर (Kashmir) के लोगों का साथ नहीं छोड़ा। विपरीत परिस्थितियों में भी भारत ने घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया और आतंकवादियों का खात्मा करके शांति स्थापित करने में सफलता पाई। स्थानीय युवाओं को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए रोजगार और शिक्षा के अवसर दिए गए।
पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा स्थिति में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। घाटी में कभी आम बात बन चुकी पत्थरबाजी और महीनों तक रहने वाले बंद अब पूरी तरह बीती बात हो चुके हैं। सेना और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले नागरिकों को एक सुरक्षित माहौल दिया है। आतंकवाद की कमर टूटने के बाFद अब कश्मीर (Kashmir) घाटी के लोग बिना किसी डर के खुलकर सांस ले रहे हैं और व्यापार कर रहे हैं।
रिकॉर्ड तोड़ पर्यटन और आर्थिक खुशहाली का नया दौर
शांति स्थापित होने का सबसे बड़ा और सीधा फायदा जम्मू-कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र को मिला है। कश्मीर (Kashmir) घाटी की खूबसूरती को देखने के लिए अब हर साल देश और विदेश से रिकॉर्ड तोड़ संख्या में पर्यटक पहुँच रहे हैं। डल झील के शिकारे से लेकर गुलमर्ग के बर्फ से ढके पहाड़ों तक हर जगह पर्यटकों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। पर्यटन में आई इस ऐतिहासिक तेजी ने स्थानीय होटल मालिकों, शिकारे वालों, टैक्सी ड्राइवरों और हस्तशिल्प के छोटे व्यापारियों की आमदनी को कई गुना बढ़ा दिया है।
सिर्फ पर्यटन ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नई नीतियों के कारण जम्मू-कश्मीर में उद्योग, IT, कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है। आज कश्मीर का युवा बंदूक और पत्थर छोड़कर स्टार्टअप संस्कृति की तरफ बढ़ रहा है। सरकार की मदद से युवा अब नौकरी खोजने के बजाय खुद का नया कारोबार शुरू कर रहे हैं। दूरदराज के गाँवों तक बिजली, पक्की सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएँ और मजबूत डिजिटल नेटवर्क पहुँच चुका है, जिससे आम लोगों का जीवन स्तर बहुत बेहतर हुआ है।
इंफ्रास्ट्रक्चर का अजूबा: जोजिल सुरंग और वंदे भारत ट्रेन
भारत सरकार ने कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से हर मौसम में जोड़े रखने के लिए हजारों करोड़ रुपए की कई बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ शुरू की हैं। इसी कड़ी में लद्दाख को कश्मीर (Kashmir) घाटी से जोड़ने वाली सामरिक रूप से बेहद अहम ‘जोजिला सुरंग‘ का काम अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है। समुद्र तल से लगभग 11,578 फीट की भारी ऊँचाई पर बन रही यह 13.15 किलोमीटर लंबी सुरंग एशिया की सबसे लंबी दो दिशा वाली सड़क सुरंग होगी। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण लद्दाख का संपर्क देश से कट जाता था, लेकिन यह सुरंग बनने के बाद साल के 365 दिन सुरक्षित आवाजाही हो सकेगी।
इसके अलावा दुनिया का सबसे ऊँचा ‘चिनाब रेल पुल’ और जम्मू-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक जैसी अद्भुत परियोजनाएँ बनकर तैयार हो रही हैं। देश की सबसे आधुनिक ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ ट्रेन अब सीधे कश्मीर (Kashmir) तक पहुँचने के लिए तैयार है। इन सड़कों और रेलवे नेटवर्क के बनने से न केवल आम जनता की यात्रा आसान हुई है, बल्कि सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों तक रसद और भारी सैन्य साजो-सामान पहुँचाना भी बेहद आसान और सुरक्षित हो गया है। कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान ने इसी रास्ते को रोकने की साजिश रची थी, लेकिन जोजिला सुरंग बनकर अब दुश्मन के खिलाफ एक अभेद्य ढाल बन चुकी है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले PoK का सच: आटे, दाल और बिजली के लिए तरसती आवाम
भारत के कश्मीर (Kashmir) की इस सुनहरी तस्वीर के ठीक उलट, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आज हालात पूरी तरह बेकाबू और खतरनाक हो चुके हैं। रावलकोट, मुजफ्फराबाद, मीरपुर और गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाकों में पिछले कई महीनों से भीषण विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। पाकिस्तान की भयंकर आर्थिक कंगाली की सबसे बड़ी मार Pok की आवाम (जनता) पर पड़ी है। वहाँ आटे और सब्सिडी वाले गेहूँ की भारी कमी हो गई है, जिससे लोग दाने-दाने को मोहताज हैं।
इसके साथ ही पाकिस्तान सरकार ने बिजली के बिलों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी है। स्थानीय लोगों का सबसे बड़ा गुस्सा इस बात पर है कि Pok के पानी और संसाधनों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान बिजली बनाता है, लेकिन वहाँ के निवासियों को ही अँधेरे में रखकर महँगी बिजली बेची जाती है। इस भारी भेदभाव और आर्थिक शोषण के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
राजनीतिक दमन और ‘आजाद कश्मीर’ का सबसे बड़ा धोखा
Pok में जनता सिर्फ आर्थिक तंगी से ही परेशान नहीं है, बल्कि वे अपने राजनीतिक अधिकारों को कुचले जाने के खिलाफ भी लड़ रहे हैं। जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) नाम का स्थानीय संगठन इस पूरे जन-आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है। प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी माँग Pok विधानसभा में पाकिस्तान में रह रहे शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करने की है।
स्थानीय निवासियों का साफ आरोप है कि पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियाँ मुजफ्फराबाद में अपनी कठपुतली सरकार बनाने के लिए इन 12 सीटों का इस्तेमाल करती हैं। इन सीटों के जरिए बाहर के लोगों को लाकर चुनाव जिताया जाता है, जिससे असली स्थानीय कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व और उनकी आवाज पूरी तरह दबा दी जाती है। जब भी वहाँ के लोग अपने इस हक के लिए आवाज उठाते हैं, तो पाकिस्तानी हुकूमत उन्हें देशद्रोही बताकर जेलों में ठूस देती है।
गिलगित-बाल्टिस्तान का जनसांख्यिकीय बदलाव और शिया उत्पीड़न
पाकिस्तान ने सिर्फ कश्मीरियों की आवाज ही नहीं दबाई, बल्कि गिलगित-बाल्टिस्तान के पूरे सामाजिक ताने-बाने को ही नष्ट कर दिया है। साल 1947 में जब पाकिस्तान ने इस इलाके पर कब्जा किया था, तब यहाँ शिया और इस्माइली मुसलमानों की आबादी लगभग 80 से 85 फीसदी हुआ करती थी। इन लोगों की अपनी एक अलग भाषा, संस्कृति और पहचान थी। ब्रिटिश काल से ही यहाँ ‘स्टेट सब्जेक्ट रूल’ लागू था, जिसके तहत कोई भी बाहरी व्यक्ति यहाँ जमीन नहीं खरीद सकता था और न ही बस सकता था।
लेकिन साल 1974 में पाकिस्तान की जुल्फिकार अली भुट्टो सरकार ने इस नियम को पूरी तरह खत्म कर दिया। इसके बाद पाकिस्तान के पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों से बड़ी संख्या में सुन्नी मुसलमानों को लाकर यहाँ जबरन बसाया गया। इस साजिश के तहत स्थानीय शिया आबादी को अल्पसंख्यक बनाने की कोशिश की गई। सभी अच्छी सरकारी नौकरियाँ और जमीनें बाहरी लोगों को दे दी गईं, जिससे स्थानीय लोगों में पाकिस्तान के खिलाफ गहरी नफरत और नाराजगी पैदा हो गई है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पाकिस्तानी फौज की बर्बरता और खूनी दमन
Pok में अपनी जायज माँगों को लेकर किया जा रहा जनता का शांतिपूर्ण आंदोलन तब हिंसक विद्रोह में बदल गया, जब पाकिस्तानी प्रशासन ने दमनकारी नीतियाँ अपनानी शुरू कर दीं। पाकिस्तान सरकार ने नागरिक अधिकारों की बात करने वाले संगठन जेएएसी (JAAC) को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत एक आतंकी संगठन घोषित कर दिया। पुलिस ने इस संगठन के दफ्तरों को सील कर दिया और 100 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
तनाव तब और बढ़ गया जब पुलिस की गोलीबारी में एक स्थानीय व्यापारी और कार्यकर्ता शाहजेब हबीब की मौत हो गई। इस मौत के बाद जब रावलकोट के अस्पताल के बाहर हजारों लोग जमा हुए, तो पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और पैरामिलिट्री फोर्स ने निहत्थे आम नागरिकों पर सीधे गोलियाँ और आंसू गैस के गोले दागे। इस सैन्य बर्बरता में अब तक 20 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 200 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। स्थिति को छिपाने के लिए पूरे Pok में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएँ बंद कर दी गई हैं और पर्यटकों को इलाका छोड़ने का हुक्म दिया गया है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान बेनकाब
Pok में जारी इस कत्लेआम और मानवाधिकारों के हनन पर भारत सहित पूरी दुनिया ने पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाई है। भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान अपने अवैध कब्जे वाले क्षेत्र में बर्बरता कर रहा है और अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए झूठी कहानियाँ गढ़ रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से माँग की है कि पाकिस्तान को इन गंभीर अत्याचारों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए।
वैश्विक मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस कार्रवाई को मानवाधिकारों का खतरनाक पतन बताया है। इसके अलावा, ब्रिटेन के 50 से ज्यादा सांसदों ने अपनी सरकार को पत्र लिखकर Pok में इंटरनेट बंदी और प्रदर्शनकारियों की मनमानी गिरफ्तारियों पर गहरी चिंता जताई है। दुनिया भर में रहने वाले कश्मीरी और मानवाधिकार कार्यकर्ता अब खुलकर पाकिस्तान के इस दोहरे रवैये की आलोचना कर रहे हैं, जो खुद को कश्मीरियों का हमदर्द बताता है लेकिन अपने कब्जे वाले कश्मीर (Kashmir) के लोगों पर गोलियाँ बरसाता है।
विकास बनाम विनाश का साफ अंतर
आज नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ का अंतर पूरी दुनिया के सामने बिल्कुल साफ हो चुका है। एक तरफ भारत का जम्मू-कश्मीर है, जहाँ केंद्र सरकार ने अरबों रुपए का बजट देकर विकास, रोजगार, आधुनिक शिक्षा और बुनियादी ढांचे की नदियाँ बहा दी हैं। यहाँ का नागरिक आज सुरक्षित महसूस करता है और देश के विकास में अपना योगदान दे रहा है।
दूसरी तरफ पाकिस्तान का अवैध कब्जा है, जहाँ सिर्फ बंदूक की गूँज, महँगाई का रोना, सेना का अत्याचार और जनता की चीखें सुनाई दे रही हैं। कश्मीर (Kashmir) की ये दो तस्वीरें गवाह हैं कि भारत जहाँ अपने लोगों को खुशहाली और तरक्की की राह पर ले जा रहा है, वहीं पाकिस्तान ने कश्मीर के सुंदर हिस्से को सिर्फ एक बदहाल और प्रताड़ित कॉलोनी बनाकर छोड़ दिया है।
मोदी जेल जाएँगे… अरे, आप चिंता मत करिए। ना हम कोई PIL डालने जा रहे हैं, ना यह लेख उस फैशन का हिस्सा है जिसमें सुबह उठते ही ‘मोदी हटाओ’ से दिन शुरू होता है। यह शीर्षक लिखना जरूरी था। इसलिए नहीं कि नरेंद्र मोदी को सचमुच जेल जाना चाहिए बल्कि इसलिए कि अब ऐसा लगने लगा है कि अगर इस देश में किसी प्रधानमंत्री को बड़ा बनना है तो शायद जेल जाना एक अनिवार्य योग्यता हो गई हो।
आपको यह अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन जरा गौर करिएगा… वामपंथी पत्रकार अजित अंजुम ने लिखा कि नरेंद्र मोदी ‘इस जन्म में’ नेहरू से बड़े नहीं हो सकते। कारण? क्योंकि नेहरू जेल गए, स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, किताबें लिखीं और संस्थान बनाए आदि-आदि।
अब यहाँ थोड़ा रुकिए। बस एक सीधा सा सवाल खुद से पूछिए कि क्या किसी प्रधानमंत्री की महानता का पैमाना सचमुच यही है? और अगर यही है तो फिर नरेंद्र मोदी तो छोड़िए, स्वतंत्रता के बाद पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति कभी बड़ा प्रधानमंत्री हो ही नहीं सकता है।
मोदी इस जन्म में तो नेहरु से बड़े नहीं हो सकते . चाहे मंत्रियों को मंदिर भेजकर पूजा अर्चना करवा लें . चाहे NDA नेताओं से वंदना करवा लें . चाहे भक्तों से तालियां बजवा लें . चाहे मीडिया से चौबीसों घंटे चाटुकारिता करवा लें . नेहरु होने के लिए सालों – साल जेल में गुजारने होते हैं .… pic.twitter.com/4ITKgJkECA
जरा ठहरकर सोचिए। क्या किसी प्रधानमंत्री की महानता का पैमाना वही होगा जो किसी दूसरे युग के नेता पर लागू था? क्या इतिहास को परिस्थिति से काटकर देखा जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल कि जो व्यक्ति 1950 में पैदा हुआ है तो उससे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? क्या मोदी टाइम मशीन में बैठकर अंग्रेजों के खिलाफ जेल यात्रा कर आते, तभी उन्हें ‘योग्य’ माना जाता?
लेकिन चलिए, अंजुम साहब की बात मान लेते हैं कि मोदी बड़े प्रधानमंत्री नहीं हैं। लेकिन आखिर क्यों नहीं हैं? शायद इसलिए कि उन्होंने लाल किले से खड़े होकर किसी बड़े दार्शनिक व्याख्यान की जगह टॉयलेट की बात कर दी। शायद इसलिए कि उन्होंने विश्व इतिहास पर किताब लिखने की जगह गरीब की रसोई का धुआँ देखने की कोशिश कर दी। शायद इसलिए कि वह उस एलीट यानी अभिजात राजनीतिक संस्कृति से नहीं आए जहाँ सत्ता एक विरासत की तरह मिलती रही।
जरा 2014 का वह पहला लाल किले वाला भाषण याद कीजिए। लोगों को उम्मीद रही होगी कि नया-नया प्रधानमंत्री है तो वैश्विक शक्ति, भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था, सभ्यता, लोकतंत्र जैसे भारी-भारी शब्दों से अपने लच्छेदार भाषण को सजाएगा। लेकिन नरेंद्र मोदी ने क्या कहा? उन्होंने शौचालय की बात कर दी, उन्होंने सफाई की बात कर दी।
साल दर साल बीतते गए और प्रधानमंत्री मोदी के काम आम लोगों तक पहुँचते रहे। कथित वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग को संतुष्ट करने के बजाय, उन्होंने देश के आम लोगों का जीवन आसान बनाने की बीड़ा उठाया। खुले में शौच से लेकर खुले में कूड़ा फेंकने तक, जो बातें बुद्धिजीवी वर्ग के लिए गरीब-गुरबा की, पिछड़ेपन की बात थी, वो उन्होंने कहनी शुरू कीं। उन्होंने बैंक खाते की बात की। गैस कनेक्शन की बात की। हर घर बिजली की बात की। हर घर नल से पानी की बात की। गरीब के सिर पर छत की बात की।
अब आप सोचिए, यह सुनकर भारत का यह खास बौद्धिक वर्ग असहज ही तो हो गया होगा ना? क्योंकि भाई, प्रधानमंत्री शौचालय की बात करता अच्छा थोड़ी लगता है! प्रधानमंत्री को तो बड़े विजन की बात करनी चाहिए, एलीट क्लास की बात करनी चाहिए, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलनी चाहिए। लेकिन मोदी ने तो जाकर उस भारत की बात कर दी जिसे लंबे समय तक ‘सिस्टम’ ने देखा ही नहीं था, उसकी तरफ से पीठ फेर ली थी।
अब यहाँ एक असहज सवाल उठता है कि अगर 2014 में किसी प्रधानमंत्री को लाल किले से खड़े होकर यह कहना पड़ रहा था कि देश को शौचालय चाहिए, तो आखिर पिछले 67 साल में हुआ क्या था? यह सवाल शायद बहुत लोगों को पसंद नहीं आएगा लेकिन पूछना तो पड़ेगा ना।
आखिर क्यों करोड़ों महिलाएँ खुले में शौच जाने को मजबूर थीं? क्यों गाँव की बेटियाँ शौच के लिए अँधेरा होने का इंतजार करती थीं? क्यों एक महिला की गरिमा राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं थी? क्या इसलिए कि इस विषय पर बात करना ‘लोअर क्लास’ माना जाता था?
जरा गाँवों की जिंदगी को याद कीजिए। शहरों में बैठकर हममें से बहुत लोग समझ ही नहीं पाते कि खुले में शौच सिर्फ सुविधा का नहीं, सम्मान का सवाल था। बीमारी का सवाल था। सुरक्षा का सवाल था लेकिन इस पर ध्यान दिया तो बस मोदी ने।
लेकिन जब स्वच्छ भारत की बात हुई, तब उसका मजाक उड़ाया गया। झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाने की बातें हुईं। ठीक है, आलोचना कीजिए। हर नीति की होनी चाहिए। लेकिन एक ईमानदार सवाल तो पूछिए कि क्या समस्या सचमुच थी या नहीं?
इसी तरह बैंक खाते की बात को देख लीजिए। आज बैंक खाते और UPI हमारे लिए इतना सामान्य हो गया है कि लगता है जैसे हमेशा से था। लेकिन जरा पीछे जाइए। करोड़ों गरीब बैंकिंग सिस्टम से बाहर थे। सरकारी पैसे बीच में गायब हो जाते थे।
ओडिशा में 1985 में राजीव गाँधी ने कहा था कि सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए भेजे गए 1 रुपए में से केवल 15 पैसे ही लाभार्थियों तक पहुँचते हैं, बाकी 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बैंक खाते ना होना था, फिर DBT आया। अब लाभार्थी को 1 रुपए का पूरा एक रुपया मिलता है।
जनधन योजना आई और इसमें करोड़ों खाते खुले। पहली बार गरीब के हाथ में बैंक पासबुक आई। अब यहाँ कोई कह सकता है कि अरे, खाता खुल गया तो क्या क्रांति हो गई? ठीक सवाल है लेकिन फिर यह भी पूछिए कि दशकों तक क्यों नहीं खुला? आखिर गरीब को अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने में इतना समय क्यों लगा?
और उज्ज्वला योजना? चलिए, उस पर भी बात कर लेते हैं। अगर आपने कभी गाँव की रसोई नहीं देखी तो शायद समझना मुश्किल होगा। लकड़ी के चूल्हे का धुआँ, आँखों में जलन, साँस की दिक्कत, धुएँ से भरा हुआ पूरा घर और यह करोड़ों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी थी।
शहरों के एसी कमरों में बैठकर शायद यह सिर्फ एक ‘डेटा पॉइंट’ लगता होगा लेकिन मोदी ने इसे समझा और आज करोड़ों महिलाओं का जीवन बदला है। हाँ, सिलिंडर को लेकर सवाल उठते हैं, उठते रहेंगे और उठने भी चाहिए लेकिन बदलाव आया है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है।
इसी तरह बिजली। आज अगर कोई बच्चा रात में पढ़ पा रहा है, मोबाइल चार्ज हो रहा है, पंखा चल रहा है तो हमें यह सामान्य लगता है। लेकिन कुछ वर्ष पहले तक ही भारत में ऐसे गाँव भी थे जहाँ अँधेरा ही जीवन था। लालटेन में पढ़ना, गर्मी में सोना, बिजली का सिर्फ नाम सुनना।
और पानी? क्या हम भूल गए कि 21वीं सदी के भारत में करोड़ों महिलाएँ रोज कई किलोमीटर चलकर पानी लाती थीं? क्या यह सामान्य बात थी? क्या यह विकासशील राष्ट्र की पहचान थी? जब ‘हर घर जल’ जैसी योजनाएँ आईं, तो कहा गया कि अभी सब जगह नहीं पहुँचा। ठीक बात है कि कुछ चुनौतियाँ हैं। लेकिन यह भी तो पूछिए कि 70 साल तक यह राष्ट्रीय प्राथमिकता क्यों नहीं थी?
तो सवाल मोदी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसने दशकों तक यह स्थिति रहने दी। अब यहाँ कुछ लोग कहेंगे कि अच्छा, तो क्या नेहरू ने कुछ किया ही नहीं? बिल्कुल किया और इसे नकारना मूर्खता होगी। उन्होंने नए भारत की संस्थागत नींव रखी। बड़े शैक्षणिक संस्थान बने। लोकतंत्र को शुरुआती स्थिरता मिली। इतिहास के साथ ईमानदारी का मतलब है कि योगदान को स्वीकार किया जाए।
लेकिन इतिहास के साथ ईमानदारी का मतलब यह भी है कि सवाल पूछे जाएँ। चीन नीति पर सवाल होंगे। लाइसेंस-परमिट राज पर सवाल होंगे। कश्मीर की जटिलता पर सवाल होंगे।
लेकिन भारत में एक अजीब चलन है कि नेहरू पर सवाल पूछो तो आप ‘इतिहास विरोधी’ हो जाते हैं। वहीं, अगर आप मोदी की आलोचना करें तो आप ‘बौद्धिक’ कहलाते हैं। दूसरी ओर मोदी की किसी उपलब्धि का जिक्र करो तो आपको ‘भक्त’ कह दिया जाता है। इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा वर्षों से यह कैसा लोकतांत्रिक विमर्श खड़ा कर दिया गया है?
क्या करोड़ों लोग जो मोदी को वोट देते हैं, सब अंधभक्त हैं? क्या गरीब महिला जिसे घर मिला, गैस मिली, बैंक खाता मिला क्या वह किसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है? या वह अपने अनुभव से फैसला कर रही है? असल में शायद समस्या मोदी नहीं हैं। समस्या वह बदलाव है जिसका मोदी प्रतीक बन गए।
एक ऐसा नेता जो खुलकर मंदिर जाता है। जो भारतीय सभ्यता की बात करता है। जो हिंदू प्रतीकों से दूरी बनाकर राजनीति नहीं करता। जो अंग्रेजी बौद्धिक एलीट वर्ग से मंजूरी लेने की कोशिश नहीं करता। यहीं टकराव पैदा होता है। और शायद इसीलिए बार-बार यह साबित करने की कोशिश होती है कि मोदी चाहे कुछ कर लें, वे बड़े प्रधानमंत्री नहीं हो सकते।
अंजुम साहब, इतिहास थोड़ा निर्दयी होता है। वह पत्रकारों की सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं लिख जाता है। वह लोगों की जिंदगी देखकर फैसला करता है। उसने नेहरू को भी उनके दौर से आँका, इंदिरा को भी, वाजपेयी को भी और आगे मोदी को भी करेगा।
और जब इतिहास यह देखेगा कि क्या गरीब के जीवन में बदलाव आया है, क्या बुनियादी सुविधाएँ बढ़ीं है, क्या शासन अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा है, क्या भारत का आत्मविश्वास बदला है तो शायद बहस कुछ और होगी।
शायद नरेंद्र मोदी एक वर्ग के लिए बड़े प्रधानमंत्री नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने किसी एलीट विचार की नहीं बल्कि गाँव, गरीब और रसोई की बात की। उन्होंने गाँव की बेटी के शौचालय की बात की। उन्होंने सिर्फ इतिहास लिखने की नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी बदलने की राजनीति की। शायद यही बात इस एलीट वर्ग को सबसे ज्यादा असहज करती है। या यूँ कहें कि गरीब पृष्ठभूमि से आना वाला ‘चायवाला’ प्रधानमंत्री बुद्धिजीवी वर्ग को कभी पचा ही नहीं।
केन्या की राजधानी नैरोबी का ‘जोमो केन्याटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ इन दिनों एक बड़े विवाद की वजह से चर्चा में है। केन्या सरकार लंबे समय से इस एयरपोर्ट का विस्तार और आधुनिकीकरण करना चाहती थी।
शुरुआत में यह प्रोजेक्ट भारत के अडानी समूह को मिलने की चर्चा थी, लेकिन बाद में सरकार ने इसे एक चीनी सरकारी कंपनी को सौंप दिया। अब इस फैसले को लेकर आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं।
अडानी समूह ने दिया था सस्ता प्रस्ताव
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी समूह इस एयरपोर्ट को विकसित करने के लिए करीब 2 अरब डॉलर (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) का निवेश करने को तैयार था। यह परियोजना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत प्रस्तावित थी।
इसका मतलब था कि परियोजना में बड़ा निवेश प्राइवेट कंपनी करती और केन्या सरकार पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ नहीं पड़ता। इस मॉडल का फायदा यह भी था कि सरकार को टैक्सपेयर्स के पैसे से परियोजना की लागत नहीं उठानी पड़ती और देश पर नया कर्ज लेने का दबाव कम रहता।
फिर चीन को कैसे मिला प्रोजेक्ट?
बाद में केन्या सरकार ने यह परियोजना चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंप दी। बताया जा रहा है कि चीनी कंपनी इस काम के लिए करीब 2.9 अरब डॉलर (करीब 24–25.5 हजार करोड़ रुपए) ले रही है। यह राशि अडानी समूह के प्रस्ताव से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कम लागत वाला विकल्प मौजूद था तो ज्यादा महंगे प्रस्ताव को क्यों चुना गया। कहा जा रहा है कि इस फैसले के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक वजहें भी हो सकती हैं।
भारत की राजनीति और विवाद का असर?
इस मामले का संबंध भारत की राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। सितंबर 2024 में कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने केन्या में अडानी परियोजना के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार और अडानी समूह पर सवाल उठाए थे।
The Adani Group’s proposed takeover of the airport in Nairobi, Kenya, has led to widespread protests in the country, with the Kenya Aviation Workers Union calling for a strike to demonstrate its opposition. This is a matter of grave concern for India, because the non-biological…
रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानी समूह को लेकर बने विवादों और राजनीतिक माहौल ने केन्या में इस परियोजना को संवेदनशील बना दिया। उनका कहना है कि इसी वजह से चीनी कंपनी को मौका मिला और उसने यह बड़ा ठेका हासिल कर लिया।
फर्जी प्रेस रिलीज और सूचना युद्ध की भी चर्चा
इस विवाद के दौरान सितंबर 2024 में अडानी समूह के नाम से एक कथित प्रेस रिलीज सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उसमें केन्याई अधिकारियों को धमकी देने जैसी बातें लिखी गई थीं। बाद में अडानी समूह ने इसे पूरी तरह फर्जी बताया।
इसके अलावा मई 2026 में फ्रांस की सरकारी एजेंसी विजिनम ने दावा किया कि चीन के सरकारी प्रसारक CGTN से जुड़े कुछ नेटवर्क AI की मदद से चीन सपोर्ट मटीरियल और नैरेटिव फैलाने का काम कर रहे थे। इसके बाद डिजिटल दुष्प्रचार और सूचना युद्ध को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई।
केन्या, भारत और चीन के लिए क्या मायने हैं?
माना जा रहा है कि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा जोखिम केन्या के सामने है। अगर परियोजना की लागत ज्यादा रहती है तो सरकार को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है, जिसका बोझ देश के नागरिकों और टैक्स पेयर्स पर पड़ेगा।
भारत के लिए यह झटका माना जा रहा है क्योंकि अफ्रीका में बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ रही थी। वहीं चीन के लिए यह सौदा अफ्रीका में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक और अवसर माना जा रहा है।
केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की महिला विधायक फातिमा तहिलिया के एक रेस्टोरेंट उद्घाटन कार्यक्रम में पारंपरिक तेल का दीपक निलाविलक्कु जलाने पर शुरु हुआ विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।
3 जून 2026 को कोझिकोड में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ की बैठक में कहा गया था कि मुसलमानों का ऐसे धार्मिक कार्यों में शामिल होना, जिनका इस्लाम में कोई आधार नहीं है, सही नहीं माना जाता।
संगठन ने फातिमा तहिलिया को इस्लाम से बाहर निकालने की धमकी तक दे दी लेकिन आए दिन कट्टरता का ज्ञान देने वाले इस पर शांत बैठे हैं। सेक्युलरिज्म की बातें करने वालों को साँप सूँघ गया है।
सेक्युलरिज़्म तब खत्म होता है जब इस्लाम शुरू होता है: केरल के मुसलमान और गहरे इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि हिंदू अपने धर्म को सेक्युलर बनाने में लगे हैं।
केरल में निलाविलक्कु विवाद के बीच यह पहली बार नहीं है जब किसी मुस्लिम संगठन ने मुसलमानों को गैर-मुस्लिम धार्मिक परंपराओं से दूर रहने की सलाह दी हो। ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ पहले भी मुसलमानों को निलाविलक्कु जलाने से बचने की सलाह दे चुका है।
दरअसल, संगठन पर लंबे समय से अधिक कट्टर इस्लामी सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। फरवरी 2026 में संगठन ने एक प्रस्ताव पास कर मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी पर चिंता जताई थी। संगठन का कहना था कि महिलाओं को ऐसी गतिविधियों से दूर रहना चाहिए जो उन्हें उनकी ‘मुख्य जिम्मेदारियों’ से भटका सकती हैं।
इससे पहले 2021 में सामस्था से जुड़े छात्र संगठन सामस्था केरल सुन्नी छात्र संगठन (SKSSF) ने केरल से अलग मुस्लिम बहुल ‘मालाबार राज्य’ बनाने की माँग की थी। संगठन की पत्रिका ‘सत्यधारा’ के संपादक अनवर सादिक फैजी ने कहा था कि नया मालाबार राज्य बनाया जाए और उसकी राजधानी कोझिकोड हो। इस माँग के पीछे मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अधिक होने का तर्क दिया गया था।
2019 में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का विरोध दोहराते हुए कहा था कि महिलाओं को घर पर ही नमाज पढ़नी चाहिए। उस समय संगठन के महासचिव के. अलीकुट्टी मुसलियार ने कहा था कि धार्मिक मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में केवल धार्मिक नेताओं की बात मानी जानी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि कड़े धार्मिक विचारों के बावजूद सामस्था खुद को केरल का अपेक्षाकृत ‘मध्यमार्गी’ मुस्लिम संगठन बताता है। फरवरी 2026 में संगठन ने जमात-ए-इस्लामी की कथित ‘थियोक्रेटिक’ विचारधारा का विरोध करते हुए उसे ‘चरमपंथी’ करार दिया था।
2022 में सामस्था से जुड़े एक सुन्नी नेता नसर फैजी कूडाथायी ने कुडुम्बश्री स्वयंसेवकों को दिलाई जाने वाली उस संवैधानिक शपथ का विरोध किया था जिसमें मुस्लिम महिलाओं को पिता की संपत्ति में समान कानूनी अधिकार देने की बात कही गई थी। उनका कहना था कि यह कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है क्योंकि इस्लामी उत्तराधिकार नियमों में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में दोगुना हिस्सा मिलता है।
केरल में कई मुस्लिम संगठन पहले भी मुसलमानों को ‘ओणम’ में पूरी तरह शामिल न होने की सलाह दे चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि ओणम का संबंध महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथाओं से है। कुछ संगठनों ने कहा कि बहुदेववादी (Polytheistic) या ‘काफिर’ माने जाने वाले समुदायों के त्योहार मनाना ‘शिर्क’ की श्रेणी में आ सकता है।
2016 में कुछ सलाफी प्रचारकों ने खुले तौर पर ओणम और क्रिसमस को मुसलमानों के लिए ‘हराम’ बताया था। उनका कहना था कि इन त्योहारों की जड़ें गैर-इस्लामी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं।
अगस्त 2025 में एक मुस्लिम स्कूल शिक्षिका खादिजा का मामला भी सामने आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने मुस्लिम छात्रों से ओणम समारोह में हिस्सा न लेने को कहा था। शिक्षिका ने कथित तौर पर कहा था कि मुसलमानों को इस्लाम के अनुसार जीवन जीना चाहिए और ओणम जैसे बहुदेववादी त्योहारों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि दूसरे धर्मों की परंपराओं में शामिल होना ‘शिर्क’ की ओर ले जा सकता है।
कुल मिलाकर, केरल में मुस्लिम संगठनों, मौलानाओं और शिक्षकों के बीच मजहबी रीति-रिवाजों को लेकर कड़ा रुख देखने को मिलता रहा है। निलाविलक्कु विवाद के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि धार्मिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हाल ही में केरल के पलक्कड़ में बन रही एक अधूरी जिम बिल्डिंग राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई थी। वजह यह थी कि सोशल मीडिया पर इसे ‘इस्लाम-फ्रेंडली जिम‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। जिम के मुस्लिम मालिक नवास मुथु टी ने कहा था कि वह एक ऐसा नया मॉडल लाने जा रहे हैं, जिसमें ‘फिटनेस और आस्था’ को जोड़ा जाएगा और जो इस्लामी रीति-रिवाजों व परंपराओं के अनुसार होगा।
केरल के मुसलमान अपने धर्म का पालन करने को लेकर पूरी स्पष्टता रखते हैं। मुस्लिम संगठन भी यह सुनिश्चित करते हैं कि समुदाय, खासकर युवा, ‘सेक्युलरिज्म’ की तय सीमा से आगे न जाएँ और इस्लामी मान्यताओं से दूर न हों।
इसके उलट, केरल के हिंदुओं के व्यवहार को लेकर भी बहस होती रही है। मलयाली हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग दूसरे धर्मों की मान्यताओं को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है जबकि अन्य समुदाय अपनी मजहबी पहचान को खुलकर सामने रखते हैं। इसी संदर्भ में ओणम के ‘सेक्युलराइजेशन’ या ‘डी-हिंदुइजेशन’ (हिंदू पहचान कमजोर करने) की चर्चा भी होती है।
हालाँकि, ओणम नई फसल से जुड़ा त्योहार माना जाता है लेकिन इसका मुख्य आधार हिंदू धार्मिक कथा है। सदियों से ओणम को राजा महाबली की वापसी के उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। हाल के वर्षों में इसे केवल एक ‘हार्वेस्ट फेस्टिवल’ यानी फसल उत्सव तक सीमित करके पेश किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में ओणम की हिंदू धार्मिक जड़ों को कमजोर किया जा रहा है।
हिंदू त्योहारों के धार्मिक पक्ष को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है और उन्हें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम या कार्निवाल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। गैर-हिंदू समुदाय भी इन परंपराओं को नए तरीके से अपनाने या परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं।
तमिलनाडु में हिंदू विरोधी द्रविड़ लोग पोंगल या मकर संक्रांति के साथ भी यही कर रहे हैं। वहाँ पोंगल को उसके हिंदू धार्मिक संदर्भ से अलग कर केवल ‘तमिल कृषि पर्व’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे केरल में ओणम को ‘सांस्कृतिक त्योहार’ कहा जाता है।
केरल में एक वर्ग के बीच बीफ (गोमांस) खाने को लेकर भी बहस होती रही है। आलोचक कहते हैं कि कुछ लोग इसे “सेक्युलर पहचान” या “संस्कृति” के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं, जबकि हिंदू धार्मिक ग्रंथों में गाय की हत्या और गोमांस खाने का विरोध बताया गया है। वहीं कुछ लोग इसे स्थानीय खानपान, इतिहास और सांस्कृतिक मिश्रण का हिस्सा मानते हैं।
इसी तरह, केरल के हिंदुओं के एक हिस्से के लिए बीफ (गाय का मांस) खाना कूल, दिखावे और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है जबकि वेदों जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में गोहत्या और गाय का मांस खाने पर सख्त रोक है। गाय का मांस खाने को ‘हमारे इतिहास, मिली-जुली संस्कृति और खाने का हिस्सा’ बताने की साजिश की जाती है।
यह एक विडंबना है कि रेप करने वाले जिहादी जो प्यार का नाटक करके या नकली धार्मिक पहचान बताकर हिंदू महिलाओं को फँसाते हैं, वे हमेशा हिंदू महिलाओं को गाय का मांस खाने के लिए मजबूर करते हैं। यह काम काफिरों के धर्म का बड़ा मजाक उड़ाने और बेइज्जत करने की इस्लामी सोच का हिस्सा है। वे इन कामों को काफिरों पर इस्लामी जीत के काम के रूप में पसंद करते हैं।
यही ‘सेक्युलर-प्रोग्रेसिव’ लोग तब चुप्पी साध लेते हैं जब कुछ मुस्लिम व्यक्ति या संगठन रूढ़िवादी या विवादित बयान देते हैं और अपने समुदाय के लोगों को उन कामों से दूर रहने को कहते हैं, जिन्हें हिंदू धार्मिक परंपरा या अनुष्ठान मानते हैं। कुछ मौकों पर मुस्लिम संगठन अपनी सुविधानुसार संविधान और सेक्युलरिज्म का सहारा लेते नजर आते हैं, खासकर तब जब धार्मिक अधिकारों या पहचान से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं।
इस्लाम मानने वाले सेक्युलरिज़्म का नाम लेकर पर्सनल-लॉ से सुरक्षा और हिजाब या हलाल जैसे मुद्दों पर सरकार का सपोर्ट माँगते हैं ताकि इस्लामिक पहचान और सांप्रदायिक आजादी बनी रहे। इस बीच ज्यादातर हिंदू या तो दबाव में हैं या अपनी मर्जी से अपने ही धार्मिक-सांस्कृतिक भावों को कमजोर कर देते हैं, अपने ही त्योहारों से उनकी असली धार्मिकता छीन लेते हैं ताकि दिखावटी सांप्रदायिक सद्भाव और सेक्युलरिज्म बना रहे।
एक ओर मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और सिद्धांतों को लेकर बिना समझौते वाला रुख अपनाता है, भले ही उसके कुछ पहलुओं को दूसरे लोग रूढ़िवादी या पिछड़ा मानें। वहीं दूसरी ओर हिंदू समाज का एक हिस्सा दूसरे समुदायों को समायोजित करने को ही अपनी उदारता और बहुलतावाद का प्रतीक मानने लगा है। चाहे चाहें या न चाहें, भारत में सेक्युलरिज्म का बोझ हिंदू समाज ही उठाता है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
ओमान के तट के पास अमेरिकी नौसेना के मिसाइल हमले का शिकार हुए ‘Settebello’ तेल टैंकर पर मौजूद तीन लापता भारतीय नाविकों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। केंद्रीय जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए शवों की पहचान होने की बात कही है। इस हादसे में जान गँवाने वाले हिमाचल प्रदेश के 23 वर्षीय डेक कैडेट आदित्य शर्मा के पिता ने सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक और परेशान करने वाली अपील जारी की है। उनके इस संदेश ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों की कार्यप्रणाली और युद्ध क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिता का दर्दनाक संदेश: ‘नरक जैसे माहौल में 20 घंटे काम करने का दबाव था’
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राजेश शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने विदेश मंत्रालय को टैग करते हुए अपने बेटे आदित्य शर्मा को ढूँढने की गुहार लगाई थी। उन्होंने शिपिंग कंपनी से मिले उस वॉट्सऐप मैसेज को भी साझा किया, जिसमें लिखा था, “खेद के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हमारे पास एक जहाज ‘MT Settebello’ पर अमेरिकी नौसेना ने मिसाइल से हमला किया है और क्रू के तीन सदस्य लापता है।”
I am father of one of the three crew missing. Aditya Sharma is my son. Please help to locate and find him. Below shipping company message to me. My son has reported exploitation by senior at ship and want to quit this ship in April. We…
राजेश शर्मा ने आरोप लगाया कि उनका बेटा लंबे समय से जहाज पर अपने सीनियर अधिकारियों द्वारा किए जा रहे शोषण से परेशान था। आदित्य ने अप्रैल में ही इस नौकरी को छोड़ने की इच्छा जताई थी और एक आधिकारिक शिकायत भी दर्ज कराई थी। हालाँकि, वरिष्ठ क्रू मेंबर्स ने दबाव बनाकर उसे वह शिकायत वापस लेने पर मजबूर किया। इसके बाद जहाज पर उसके लिए नरक जैसा माहौल बना दिया गया और उसे रोजाना 20-20 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया गया। पीड़ित पिता का कहना है कि उनके पास इस पूरे शोषण और बातचीत के पुख्ता चैट रिकॉर्ड मौजूद है।
न भारत का झंडा, न भारत का जहाज: एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का सच
समुद्री रिकॉर्ड और जाँच से स्पष्ट होता है कि जिस ‘Settebello’ (या मारिवेक्स/मिरवेक्स) जहाज पर यह हमला हुआ, उसका भारत से कोई सीधा प्रशासनिक संबंध नहीं था। इस जहाज पर ‘पलाऊ’ देश का झंडा लगा हुआ था और इसकी पैरेंट कंपनी ‘अरिहंत शिपिंग इंक’ पनामा में रजिस्टर्ड थी। इस जहाज का इतिहास बताता है कि इसका नाम पहले ‘अरिहंत’ (Arihant) था, जिसे बाद में बदलकर ‘मारिवेक्स’ और फिर ‘सेटीबेलो’ किया गया। हालाँकि, जहाजों की अंतरराष्ट्रीय पहचान संख्या यानी इसका ‘IMO नंबर’ (9464156) हमेशा एक ही रहा। यह पूरी तरह से एक निजी अंतरराष्ट्रीय शिपिंग नेटवर्क का हिस्सा था, जिसमें भारतीय नाविक केवल रोजगार के लिए काम कर रहे थे।
जहाज बनाने वाली कंपनी पर पाबंदी क्यों लगी थी?
बात दिसंबर 2025 की है। अमेरिका के वित्त विभाग ने इस जहाज और इसे चलाने वाली कंपनी ‘अरिहंत शिपिंग’ पर पाबंदी (प्रतिबंध) लगा दी थी। यह कंपनी पनामा देश में रजिस्टर्ड थी। अमेरिका का आरोप था कि यह जहाज जुलाई 2025 से चोरी-छिपे ईरान का तेल और कोलतार यहाँ-वहाँ पहुँचा रहा था। यह काम अमेरिकी नियमों के बिल्कुल खिलाफ था। पाबंदी लगने के बाद भी कंपनी ने चालाकी की। उन्होंने जहाज का नाम तो बदल दिया, लेकिन उसे उसी खतरनाक इलाके में चलाना जारी रखा।
अमेरिकी सेना के मुताबिक, ईरान ने समुद्र का एक मुख्य रास्ता (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) रोकने की कोशिश की थी। इसके जवाब में अमेरिकी नौसेना ने ईरान के सभी बंदरगाहों की ‘नौसैनिक नाकेबंदी’ कर दी। नौसैनिक नाकेबंदी का सीधा मतलब यह है कि कोई शक्तिशाली देश अपनी सेना के दम पर किसी दूसरे देश के समुद्री रास्तों को चारों तरफ से घेर लेता है, ताकि वहाँ कोई भी व्यापारिक जहाज आ-जा न सके।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह जहाज उस समय खाली था। अमेरिकी सेना ने इसे रुकने और उनके निर्देशों को मानने के लिए कहा, लेकिन जहाज ने बात नहीं मानी। उसने नाकेबंदी को तोड़कर ईरानी बंदरगाह की तरफ बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद अमेरिकी सेना के एक F-18 लड़ाकू विमान ने इस जहाज के इंजन और स्टीयरिंग रूम को निशाना बनाते हुए मिसाइल दाग दी।
हमले का वो खौफनाक मंजर और नाविकों का आखिरी संदेश
मिसाइल लगते ही जहाज के इंजन रूम में भयंकर आग लग गई। जहाज में पानी भरने लगा और वह धीरे-धीरे समुद्र में डूबने लगा। यह हादसा ओमान के तट से सिर्फ 28 किलोमीटर दूर हुआ था। इस बड़े संकट के बीच, जहाज पर मौजूद भारतीय नाविकों ने अपनी जान बचाने के लिए ‘फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया’ (FSUI) को एक बहुत ही डरावना इमरजेंसी मैसेज (डिस्ट्रेस कॉल) भेजा।
जहाज के एक क्रू मेंबर ने डर से काँपते हुए संदेश में कहा, “सर, हम मोटर टैंकर ‘मारिवेक्स’ से बोल रहे हैं… हमारे जहाज पर आग लग गई है और यह डूब रहा है। अमेरिकी नौसेना ने हमारे इंजन रूम पर मिसाइल मारी है। जहाज के नीचे एक बड़ा छेद हो गया है। यहाँ मौजूद सभी 24 क्रू मेंबर्स भारतीय हैं। कृपया जल्दी मदद भेजिए, हमें तुरंत सहायता की जरूरत है।”
यह संदेश मिलते ही ओमान की रॉयल एयरफोर्स तुरंत एक्शन में आई। उन्होंने मसीरा द्वीप से अपना एक मिलिट्री हेलीकॉप्टर रवाना किया। ओमान के सैनिकों ने बेहद सूझबूझ दिखाई और समुद्र में डूबते जहाज से 21 भारतीय नाविकों को सुरक्षित हवा में लिफ्ट (एयरलिफ्ट) कर लिया। लेकिन अफसोस, इस भयानक हमले में हिमाचल के आदित्य शर्मा समेत 3 भारतीय नाविकों को नहीं बचाया जा सका।
भारत सरकार का सख्त कदम और कड़ा विरोध
इस हमले के बाद भारत सरकार ने बहुत सख्त रुख अपनाया है। दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राजदूत जेसन मीक्स को अपने दफ्तर बुलाया (तलब किया)। भारत ने इस हमले पर गहरी चिंता जताई और अमेरिका के सामने अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में साफ कहा कि समुद्र में व्यापार करने वाले आम जहाजों पर बार-बार होने वाले ये हमले बेहद चिंताजनक हैं।
यह इस इलाके में चल रही लड़ाई का बहुत बुरा नतीजा है। भारत ने माँग की है कि आम जहाजों और रास्तों को निशाना बनाना तुरंत बंद होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से सभी जहाजों को समुद्र में बिना किसी रोक-टोक के आने-जाने की आजादी मिलनी चाहिए। इसके साथ ही, भारत के जहाजरानी मंत्री ने अधिकारियों को बड़े आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि सुरक्षित बचे 21 भारतीय नाविकों को जल्द से जल्द देश वापस लाया जाए। साथ ही, जिन नाविकों की इस हादसे में मौत हुई है, उनके पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ उनके परिवारों तक पहुँचाया जाए ताकि उनका अंतिम संस्कार हो सके।
पश्चिम एशिया की लड़ाई और भारतीयों पर मंडराता खतरा
इस हादसे से एक बहुत ही दुखद बात सामने आई है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के देशों में जो लड़ाई चल रही है, उसमें बिना किसी गलती के हमारे बेकसूर भारतीय मजदूर और कामगार मारे जा रहे हैं। दुनिया भर में समुद्र के रास्ते जो व्यापार होता है, उसमें भारतीयों का बहुत बड़ा रोल है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है जो जहाजों के लिए नाविक (नाव चलाने वाले लोग) भेजता है। दुनिया के सभी व्यापारिक जहाजों पर काम करने वाले कुल लोगों में से लगभग 10% अकेले भारतीय हैं। यही वजह है कि जब भी किसी विदेशी जहाज पर हमला होता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान हमारे भारतीय भाइयों को ही उठाना पड़ता है।
यह खतरा सिर्फ समुद्र तक ही सीमित नहीं है। खाड़ी (मिडिल ईस्ट) देशों की धरती पर भी जो मिसाइल और ड्रोन हमले हो रहे हैं, उनकी वजह से वहाँ काम करने वाले भारतीय मजदूर और नौकरीपेशा लोग लगातार परेशान हो रहे हैं। आँकड़ों को देखें तो इस लड़ाई और अशांति की वजह से अब तक कुल 8 भारतीयों की मौत हो चुकी है। इसमें हाल ही में कुवैत में जान गँवाने वाले एक और भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब किसी शिपिंग कंपनी पर पहले से पाबंदी लगी हो और खतरा साफ दिख रहा हो, तो क्या अपने थोड़े से मुनाफे के लिए इन बेकसूर नौजवानों की जान दांव पर लगाना सही है?
पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने की जारी कार्रवाई में एक बात एकदम साफ हो गई है और वो यह है कि जो लोग खुद मानते हैं कि वे अवैध रूप से भारत में घुसे, जिन्होंने खुद दलालों को पैसे देकर बॉर्डर पार किया, जो यहाँ आकर सरकारी योजनाओं का फायदा उठाते रहे, वही लोग आज कुछ मीडिया संस्थानों के नजर में ‘बेचारे’ हैं। लेकिन जो सरकार कानून लागू कर रही है, देश की सीमाओं की रक्षा कर रही है, उन्हें वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट्स में ‘मुस्लिम-विरोधी’ बनाकर पेश किया जा रहा है।
जहाँ खुद घुसपैठियों ने बता रहे हैं कि कैसे वे BSF की गश्त पर नजर रखकर सिर्फ 10 मिनट में बॉर्डर पार कर लेते थे और TMC के शासन में उन्हें इसमें मदद मिली। यह कबूलनामा किसी और ने नहीं, खुद इन घुसपैठियों ने दिया है। लेकिन इस सच को छुपाकर इन्हीं लोगों को ‘पीड़ित’ और ‘बेचारे’ बताने की होड़ मची है।
यह नैरेटिव अचानक नहीं बना, इसे बड़े सोचे समझे तरीके से तैयार किया गया है। इस नैरेटिव को खड़ा करने में सबसे आगे है कतर सरकार का मुखपत्र अल जजीरा (AL Jazeera), जिसने भारत के खिलाफ खबरें गढ़ने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। उसके साथ कंधे से कंधा मिला रही हैं भारत की वामपंथी झुकाव वाले मीडिया पोर्टल ‘स्क्रॉल‘ (Scroll) और ‘द वायर‘ (The Wire), जो हर उस मौके को लपकती हैं जहाँ भारत सरकार को घेरा जा सके। आइए देखते हैं कि इन रिपोर्ट्स में असल में क्या लिखा है।
अल जजीरा ने खुद बांग्लादेशी नागरिकों को माना अवैध, फिर भी दिया ‘पीड़ित’ का दर्जा
अल जजीरा ने 10 जून 2026 को रिपोर्ट प्रकाशित की। इसे गुरविंदर सिंह ने लिखा है। रिपोर्ट की हेडलाइन है ‘Bengal pushes out Muslim Bangladeshis, deepening religious tensions’ यानी पहले शब्द से ही यह तय कर दिया गया कि यह मामला धर्म का है। इसमें ‘Bangladeshis’ नहीं लिखा, सीधे ‘Muslim Bangladeshis’ लिखा। रिपोर्ट के मेडाडेटा और कैटेगरी में इस रिपोर्ट को ‘Islamophobia’ यानी इस्लाम-विरोधी टैग के साथ फाइल किया गया है, जिससे तय किया गया कि इस घुसपैठिए-विरोधी कार्ऱवाई को मुस्लिम-विरोधी के रूप में पेश करना है।
अल जजीरा की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
इसमें हकीमपुर बॉर्डर पर खड़े रायसुल इस्लाम और उनके परिवार की कहानी से शुरुआत होती है, जो कि देखने में बिल्कुल एक इमोशनल स्टोरी लगती है। लेकिन जरा ध्यान से पढ़िए। रिपोर्ट में जो सबसे दिलचस्प बात है, वो यह है कि खुद रायसुल इस्लाम ने माना कि उन्होंने एक दलाल को करीब 250 डॉलर (लगभग ₹24000) देकर परिवार सहित बॉर्डर पार किया। यानी यह अवैध घुसपैठ थी, इसमें कोई दो राय नहीं।
अल जजीरा की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
एक और शख्स मिराजुल गाजी ने भी माना कि वे परिवार सहित पाँच साल पहले बेहतर मौके की तलाश में भारत आए थे। यानी न इलाज का बहाना, न कोई आपदा, सिर्फ बेहतर कमाई के लिए अवैध तरीके से घुसपैठ। लेकिन अल जजीरा ने इन्हें ‘पीड़ित’ के रूप में पेश किया, न कि उस ‘अपराधी’ के तौर पर जो खुद अपना अपराध स्वीकार कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि बंगाल से घुसपैठियों को भगाने की कार्रवाई को धार्मिक पहचान से उतनी ही प्रेरित है जितनी कानूनी दर्जे से। ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया डायरेक्टर को कोट किया गया, तीस्ता सेतलवाड़ जैसी विवादित एक्टिविस्ट को कोट किया गया, लेकिन सरकार के पक्ष को जानबूझकर हाशिये पर रखा गया। यानी एक कानूनी घुसपैठ-विरोधी अभियान को धीरे-धीरे ‘मुस्लिमों के खिलाफ षडयंत्र’ में बदल दिया गया।
स्क्रॉल ने भारत की राजनीति में बांग्लादेश को दखल देने का दिया लाइसेंस
स्क्रॉल ने तो बांग्लादेश को भारत की राजनीति में दखल देने का लाइसेंस ही थमा दिया। स्क्रॉल ने ढाका ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट को अपने प्लैटफॉर्म में चेपकर भारत सरकार के प्रति अपनी ‘घृणा’ दिखलाई। यानी नजरिया बांग्लादेश का था, लेकिन था भारत के खिलाफ और स्क्रॉल ने उसे जगह भी दी।
इस रिपोर्ट का विश्लेषण करें तो एंगल बिल्कुल साफ है। हेडलाइन ही सीधे भारत के खिलाफ लिखी गई- ‘View from Bangladesh: India forcing people across the border is becoming a test of ties’ यानी सीधा जजमेंट दे दिया कि भारत इन घुसपैठियों को ‘जबरदस्ती’ सीमा पार भेज रहा है।
स्क्रॉल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
जबकि खुद अल जजीरा की रिपोर्ट में इन्हीं घुसपैठियों ने माना कि वे स्वेच्छा से लौटने आए क्योंकि उन्हें डर था। सरकार ने भी ‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति की घोषणा की थी और लोग खुद सरेंडर कर रहे थे। मतलब इन बांग्लादेशी नागरिकों को पता था कि घुसपैठिए हैं इसीलिए वापस लौटने लगे। लेकिन हेडलाइन में ‘जबरदस्ती’ शब्द डालकर पूरी कहानी पलट दी गई।
स्क्रॉल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बांग्लादेश के लिए यह मुद्दा सिर्फ बॉर्डर मैनेजमेंट नहीं बल्कि संप्रभुता, मानवाधिकार और राजनयिक मानदंजों की परीक्षा है। अब सोचिए, जो लोग अवैध रूप से भारत की संप्रभुता का उल्लंघन करके आए, उन्हें वापस भेजना बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन है? यह तर्क उल्टा है। असल में बांग्लादेश को चाहिए कि अपने नागरिकों को घुसपैठ से रोके, लेकिन उलटे भारत पर ही आरोप लगाए जा रहे हैं।
स्क्रॉल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि भारत में बांग्लादेशी प्रवासन एक संवेदनशील घरेलू राजनीतिक मुद्दा बन गया है, खासकर BJP सरकार में। लेकिन पूरी रिपोर्ट में एक बार भी यह नहीं पूछा गया कि बांग्लादेश के लोग अवैध रूप से क्यों आ रहे हैं? बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी क्या है? सारा ठीकरा भारत पर फोड़ दिया गया।
द वायर ने घुसपैठियों को भगाने को बताया ‘सजा’
वामपंथी मीडिया द वायर ने भी इसी नैरेटिव से 9 जून 2026 को रिपोर्ट प्रकाशित की और इसकी हेडलाइन ही बता देती है कि एजेंडा क्या है। आसिफ फारुख ने लिखी इस रिपोर्ट की हेडलाइन है- ‘At Bengal’s Borders, Pushbacks Are Punishment’
द वायर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
यहाँ हेडलाइन में ही फैसला सुना दिया गया। कहा गया कि घुसपैठियों को वापस भेजना ‘सजा’ है, यह द वायर की मानसिकता है। जो लोग अवैध रूप से भारत में घुसे उनके लिए यहाँ रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। लेकिन उन्हें वापस भेजने को ‘सजा’ बताना इसी एजेंडे का हिस्सा है।
द वायर की रिपोर्ट से स्क्रीनशॉट
रिपोर्ट में कहा गया कि घुसपैठियों की संख्या के बारे में वर्षों से बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए जाते रहे हैं, जबकि सरकारी जवाब भी कभी सटीक संख्या नहीं द सके। लिखा कि जब अनिश्चित आँकड़े राजनीतिक यकीन बन जाते हैं, तो आम मजदूर इसकी कीमत चुकाते हैं। यहाँ द वायर का तर्क यह है कि चूँकि घुसपैठियों की सही संख्या पता नहीं है, इसलिए किसी को वापस नहीं भेजना चाहिए। द वायर से इस तर्क की उम्मीद करना हैरान कर देने वाला नहीं है।
‘हाँ, हम बांग्लादेश से हैं’: जब घुसपैठियों ने खुद कबूला कि कैसे तोड़ा भारत का कानून
यह वो बात है जिसे अल जजीरा, स्क्रॉल और द वायर जैसे मीडिया संस्थान जानबूझकर पर्दे के पीछे रखते हैं। जो लोग आज कैमरों के सामने ‘पीड़ित’ बनकर पेश किए जा रहे हैं, उन्हीं लोगों ने खुले मुँह स्वीकार किया है कि उन्होंने किस तरह भारत का कानून तोड़ा, किस तरह यहाँ की सरकारी व्यवस्था का गलत फायदा उठाया और किस तरह सालों तक यह सब चलता रहा।
कई घुसपैठियों ने खुद बताया कि वे दलालों को पैसे देकर भारत में घुसे। एक ने कहा कि बॉर्डर पार कराने वाले को 2,000 रुपए दिए और आधार कार्ड बनवाने के लिए 2,000 से 3,000 रुपए अलग से चुकाए। TMC के नेताओं ने भी उनकी इस प्रक्रिया में मदद की। यानी यह पूरा एक नेटवर्क था, कोई मजबूरी नहीं।
इनके बस्ती बसाने का तरीका भी सुनिए। दलालों ने पहले राशन कार्ड बनवाया, राशन कार्ड से आधार हुआ, आधार से PAN कार्ड, वोटर ID और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगा। कुछ घुसपैठिए तो दशकों से यहाँ रह रहे थे, वोट डाल रहे थे और हर सरकारी योजना का लाभ उठा रहे थे। बेंगलुरु में हुए एक स्टिंग ऑपरेशन में भी यही सामने आया कि घुसपैठिए बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में खुलकर रह रहे थे, उनके पास आधार, PAN कार्ड और बैंक की सुविधाएँ तक थीं।
इंडिया टुडे से बात करते हुए एक घुसपैठिए सलाम डाली ने माना कि वह गरीब था इसलिए भारत आया। जो लोग वापस जाने की कतार में थे, उनमें से अधिकतर के पास आधार, PAN, राशन कार्ड और वोटर ID थे। यानी भारत के उन नागरिकों का हक मारा जा रहा था जिनके लिए ये योजनाएँ बनी थीं। लेकिन इन मीडिया संस्थानों ने इस पहलू पर एक शब्द नहीं लिखा।
जो दशकों तक नहीं हुआ, वो शुभेंदु सरकार ने हफ्तों में कर दिखाया
केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने साफ कहा था कि जब बंगाल में कमल खिलेगा, तब घुसपैठ रुकेगी। उन्होंने तत्कालीन ममता सरकार पर आरोप लगाया था कि वह घुसपैठियों को आधार और वोटर कार्ड दिलवाकर उन्हें वोट बैंक बना रही थीं और 450 किलोमीटर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को जमीन तक नहीं दे रही थी। तब BJP ने वादा किया था और बंगाल की जनता ने भरोसा किया था।
इसके बाद 09 मई 2026 को शुभेंदु अधिकारी की बंगाल के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेते ही काम शुरू हो गया। सीएम अधिकारी ने खुद घोषणा कि कि उनकी सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत देश से निकाला जाएगा। इस नीति के तहत जिलों-जिलों में ‘होल्डिंग सेंटर’ भी बनाए जा रहे हैं।
इतना ही नहीं सीएम शुभेंदु ने सात दिनों के भीतर BSF को बांग्लादेश सीमा की बाड़बंदी के लिए 600 हेक्टेयर जमीन भी दे दी। वही जमीन जिसके लिए BSF ने ममता सरकार को 10 पत्र लिखने के बाद भी एक इंच नहीं मिली थी।
बांग्लादेश की तरह ही बौखलाया वामपंथी-इस्लामी मीडिया
अब जरा सोचिए। एक तरफ घुसपैठिए खुद मान रहे हैं कि उन्होंने पैसे देकर दलाल कि जरिए भारत में घुसपैठ की, फर्जी दस्तावेज बनवाए और सरकारी योजनाओं का लाभ लिया। दूसरी तरफ अल जजीरा, स्क्रॉल और द वायर इन्हीं लोगों को ‘पीड़ित’ बताकर भारत सरकार पर ‘मुस्लिम-विरोधी’ का टैग लगा रहे हैं। क्योंकि घुसपैठ के पूरे तंत्र पर लगाम लगाई जा रही है, इसीलिए इनको अब मानवाधिकार की भी बातें याद आ रही हैं।
लेकिन जिन घुसपैठियों ने खुद माना कि उन्होंने अवैध रूप से भारत में प्रवेश किया, उन्हें वापस भेजना कौन सा अमानवीय काम है? यह तो हर देश का बुनियादी अधिकार है। और जो बांग्लादेश आज भारत पर ‘अंतरराष्ट्रीय नियमों’ का ज्ञान दे रहा है, उसके विदेश मामलों के सलाहकार ने खुद माना कि उन्होंने नई दिल्ली को 12 से 13 पत्र लिखे हैं, यानी दबाव बनाने की पूरी कोशिश है।
यह दबाव इसलिए नहीं है कि बांग्लादेश को अपने नागरिकों की परवाह है, बल्कि इसलिए है कि बंगाल में BJP आने के बाद वह रास्ता बंद हो गया जो ममता के राज में खुला था। जो बांग्लादेश ममता सरकार के दौरान चुपचाप अवैध घुसपैठ और तस्करी चलाता रहा, वही अब BJP सरकार आने से बौखला गया है। यह बौखलाहट ही असली जवाब है उन सभी वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी मीडिया की रिपोर्ट्स का जो भारत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं।