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उत्तराखंड में धमकियाँ देने वाले निहंग जसदीप सिंह की अश्लील तस्वीरें वायरल: ‘विक्की थॉमस सिंह’ नाम के एक दूसरे निहंग ने खोली पोल, कहा- ये धर्म के नाम पर धंधा करता है

उत्तराखंड के कर्णप्रयाग मारपीट मामले में लगातार धमकियाँ देने वाले निहंग जसदीप सिंह की सच्चाई सबके सामने आ गई है। निहंग जसदीप सिंह की कुछ अश्लील तस्वीरें सामने आई है, जिसमें वह एक दूसरे सिख के साथ हमबिस्तर है। इन तस्वीरों की खुद जसदीप सिंह भी पु्ष्टि कर चुके हैं और उन्होंने कहा कि वह उस समय नशे में थे।

दरअसल निहंग जसदीप सिंह की पोल खुद उन्हीं के एक साथी ‘विक्की सिंह थॉमस’ नाम के निहंग ने खोली है। विक्की थॉमस ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर 11 मिनट का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें सारी बात खुलकर सामने आ गई। वीडियो में विक्की थॉमस ने कुछ तस्वीरें दिखाईं, जिसमें निहंग जसदीप सिंह बिना कपड़ों के एक अन्य सिख युवक के साथ आपत्तिजनक स्थिति में नजर आ रहा है।

जसदीप सिंह उसी सिख समूह में शामिल थे, जिन्होंने हाल ही में उत्तराखंड की सीमा पर गिरफ्तार किए गए चार निहंगो की रिहाई करते हुए हंगामा किया था।

जसदीप सिंह की तस्वीर दिखाते हुए विक्की थॉमस ने जसदीप सिंह के लिए कहा, “धर्म के नाम पर धंधा करता है। बहरूपिया है। धर्म के नाम पर फंडिंग आता है क्या बाहर से, कभी होंडा, कभी बोलेरो खरीदता है।” विक्की थॉमस ने जसदीप सिंह के साथ वीडियो कॉल की स्क्रीन रिकॉर्डिंग भी शेयर की। इसमें जसदीप सिंह मान रहा है कि तस्वीरों में दिख रहा सिख व्यक्ति वो ही है। दोनों के बीच बातचीत के कुछ अंश हैं:

विक्की: मेरे को बता, ये फोटो जो हैं, ये तू है कि नहीं? हां या न?
जसदीप: हाँ, यह मैं ही हूँ। मैं एग्री करता हूं।

विक्की: ओके।
जसदीप: देखो, जो गलतियाँ हुई हैं, मैं मानता हूँ, उन सब चीजों को और एक चीज और…
विक्की (बीच में टोकते हुए): गुनाह बोलते हैं इसको, गलती नहीं। गुनाह बोलते हैं इसको, क्योंकि जो तूने किया है न, वह तो इसके सामने एक परसेंट का भी नहीं है। बाणा धारण किया है तूने।
जसदीप: नहीं… विक्की भाई… देखो, मैं… आपकी पीठ सुनती है। हर एक को मैंने यही बोला कि जिस टाइम मैं अंदर था, उस टाइम मेरा साथ किसी ने नहीं दिया। उस टाइम विक्की भाई ने मेरे घर पर भी फोन कर ये चीज बोली। यहाँ तक कि मेरे साथ भी, जिस टाइम हमारे ऊपर केस हुआ, सब हुआ, तो मेरे पापा को भी ये बात बोली कि अंकल अगर आपको किसी चीज की जरूरत है, कुछ भी है, तो मैं इनके साथ हूँ, मैं खड़ा हुआ हूँ। कोई भी दिक्कत नहीं है। किसी भी चीज की जरूरत पड़े तो आप मुझे फोन करना, मैं हाजिर हूँ। और जब हमारे ऊपर, जिस टाइम ये बीता, जलालाबाद वाले केस की, आपसे बात भी हुई है। आपकी पीठ सुनती है, किसी से भी पूछ लेना, अगर मैंने किसी को न बोला हो कि, ‘हाँ भाई साहब…

विक्की (गुस्से में): मेरे को… तू जो सब… तेरे से, अभी के अभी, जिसके भी मोबाइल में ये फोटो रहेंगे, जिसके भी मोबाइल में, अभी के अभी डिलीट करवा।
जसदीप: मैं इसी करके, मैंने आपको बीच में बताया था न। मैंने देग बंद कर दिया था बिल्कुल ही। मैंने छोड़ दिया था।

विक्की: मेरे भाई देख, मैं अब भी देग पिया हुआ हूँ। तेरे को दिखाऊँ? रगड़ा अभी भी तैयार है मेरा, बेटा। मैं तेरे सामने पिया हुआ हूँ। देख, शक है, कभी ये चीज नहीं बोलना… ये… ये अपना… ये गलत काम करना। और ये बंदा कौन था, जो तेरे साथ है? ये बंदा कौन था? ये भी निहंग था?
जसदीप: हम्म… हम्म…

विक्की: ये कौन है? मेरे को ये बंदा चाहिए। तेरे सिर पर केश हैं महाराज के। तू गुरु का सिंह है। तू कभी कुछ भी करेगा, महाराज मेरे को देगा मेरे हाथ में। और एक बात, मेरे को चुकाने वाला वर्ल्ड में पैदा नहीं हुआ, या तो मैं मर जाऊँगा। मैं सच में जी रहा हूँ मरने के लिए, आज तेरे मुँह पर बोलता हूं। मेरे को कोई फर्क नहीं पड़ता।
जसदीप: विक्की भाई…

विक्की: मैं बोलता हूँ, तेरा इमेज है न, मेरे दिल में एक रोशनी की तरह था। तूने एक झटके में बुझा दिया रे। और आज मैं रोता क्यों हूं? मैं दर्द में हूँ, मैं टूटकर बोल रहा हूँ।

वीडियो में यह भी दिख रहा है कि विक्की थॉमस ने निहंग जसदीप सिंह को बातचीत के लिए बुलाया। थॉमस ने सवाल उठाया कि जसदीप सिंह की लग्जरी लाइफस्टाइल की फंडिंग कौन करता है? आखिर में विक्की थॉमस ने जसदीप सिंह से गुरू महाराज के 5 ककार त्यागने को कहा लेकिन जसदीप ने ऐसा किए बिना वहाँ से उठकर चला गया।

कौन है विक्की थॉमस?

विक्की थॉमस को अब ‘निहंग विक्की सिंह थॉमस’ नाम से जाना जाता है। विक्की ने 2020 में ईसाई धर्म छोड़कर सिख धर्म अपनाया है और निहंग बाना धारण किया। लेकिन विक्की ने अपना पुराना सरनेम थॉमस नहीं बदला। विक्की थॉमस खुद को राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं।

हालाँकि इन्हीं कारणों से विक्की थॉमस अक्सर विवादों में भी रहते हैं। वह साल 2020-21 में किसान आंदोलन में पहली बार चर्चा में आए थे। वह 2021 में दिल्ली के लाल किले में हुई हिंसा में भी शामिल था।

इसके बाद जनवरी 2023 में गोल्डन टेंपल परिसर के पास निहंगों के दो गुटों में हुई हिंसक झड़प में भी विक्की थॉमस का नाम सामने आया था, जिसमें उन्होंने बीच-बचाव का दावा किया था। इसके बाद 2024 में विक्की थॉमस तब विवादों में आए जब उन्होंने कंगना रनौत को फिल्म इमरजेंसी को लेकर जान से मारने की धमकियाँ दी थीं।

कुछ वर्षों पहलें विक्की थॉमस ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के साथ कथित तौर पर रिलेशनशिप में थे। एक वीडियो में वह लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के साथ अपना जन्मदिन मनाते दिख रहे हैं। वीडियो में विक्की थॉमस को लक्ष्मी नारायण का पति बताया गया है। हालाँकि, वीडियो में विक्की थॉमस में निहंग चोला नहीं धारण कर रखा है। फिलहाल लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी भारत के पहले किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर हैं।

इसके अलावा विक्की थॉमस का कॉन्ग्रेस कनेक्शन भी है। सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ फोटो में विक्की थॉमस को कथित तौर पर सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ देखा जा सकता है।

कौन हैं निहंग जसदीप सिंह?

निहंग जसदीप सिंह ने अपनी पहचान एक धार्मिक नेता के रूप में बनाई है। खासतौर पर हाल ही में उत्तराखंड के चमोली जिले के कर्णप्रयाग में निहंग और स्थानीय लोगों के बीच हुई हिंसक झड़प को लेकर जसदीप सिंह ने मोर्चा खोला था। इस मामले में पुलिस ने 4 निहंगों को गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तार निहंगों की रिहाई को लेकर जसदीप सिंह ने लगातार उत्तराखंड पुलिस और प्रशासन को धमकियाँ जारी की थीं। जसदीप सिंह ने 150 से अधिक निंहगों के जत्थे के साथ उत्तराखंड सीमा पर डेरा डाल दिया था और यह भी बताया गया कि गुरुद्वारे पर भी कब्जा किया गया था।

बाद में निहंगों को चमोली कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जब जसदीप सिंह जत्थे के साथ 28 जून को पंजाब लौटे तो यहाँ मोहाली के गुरुद्वारे में एक स्वागत समारोह के दौरान उन पर हमला हुआ।

UPI के विस्तार से लेकर स्वास्थ्य-सुरक्षा-अंतरिक्ष सहयोग तक… जानिए PM मोदी के दौरे से भारत-सेशेल्स के बीच हुए कौन से 19 समझौते, क्या होगा इनका असर

सेशेल्स (Seychelles) की अपनी तीन दिवसीय राजकीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हरमिनी ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊँचाई देने वाले 19 नतीजों से दोनों देशों के रिश्तों और और मजबूती मिलेगी। दरअसल ये केवल समझौते नहीं हैं, बल्कि रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास सहयोग का व्यापक पैकेज हैं।

यह सार्थक कूटनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसमें सिर्फ बातें नहीं, बल्कि ठोस नतीजे हैं जो हिंद महासागर क्षेत्र में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ और भरोसेमंद विकास साझेदार के तौर पर भारत की भूमिका को मजबूत करते हैं।

रक्षा क्षेत्र में मदद और समुद्री सुरक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, खाद्य सुरक्षा और अंतरिक्ष सहयोग तक हर नतीजा ‘आत्मनिर्भर भारत’ की हकीकत और ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है।

प्रमुख समझौते और पहल

  1. भारत-सेशेल्स प्रत्यर्पण संधि- भारत और सेशेल्स ने प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इससे दोनों देशों के बीच कानूनी और सुरक्षा सहयोग को गहरा करने और अंतरराष्ट्रीय अपराध से निपटने में मदद मिलेगी। यह समझौता दोनों देशों को एक-दूसरे के क्षेत्र से भागे हुए अपराधियों और भगोड़ों को वापस लाने के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  2. अंतरिक्ष सहयोग पर समझौता- अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग और अन्वेषण पर MoU हुआ। इससे भारतीय सैटेलाइट एप्लिकेशन का विस्तार होगा। ISRO को मजबूती मिलेगी और इसका वैश्विक मौजूदगी बढ़ेगी। कुल मिलाकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को विश्वसनीय स्पेस पार्टनर मिल रहा है।
  3. सेशेल्स में UPI आधारित डिजिटल भुगतान लागू करने के लिए समझौता- अफ्रीकी देश सेशेल्स में भी अब यूपीआई चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। सेशेल्स में यूपीआई शुरू होने के बाद भारतीय पर्यटक, कारोबारी और प्रवासी समुदाय डिजिटल भुगतान आसानी से कर सकेंगे। फिलहाल दुनिया के नौ देशों में यूपीआई सर्विस मान्य है। इसको लेकर NPCI और सेंट्रल बैंक ऑफ सेशेल्स के बीच समझौता हुआ है।
  4. अम्ब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट समझौता- भारत और सेशेल्स ने विकास परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए ₹1250 करोड़ (लगभग 125 मिलियन डॉलर) के अम्ब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट समझौते पर हस्ताक्षर किए है। यह समझौता आयात-निर्यात बैंक ऑफ इंडिया और सेशेल्स के वित्त मंत्रालय के बीच हुआ है, जिसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और रक्षा में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देना है।
  5. विदेश सेवा क्षेत्र में हस्ताक्षर इसके अलावा विदेश सेवा संस्थानों के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हुए हैं। सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस (SSIFS) और सेशेल्स के विदेश मंत्रालय (MoFAD) के बीच यह समझौता हुआ। इससे दोनों देशों के बीच विनिर्माण और राजनयिक संबंधों को मजबूती मिलेगी।
  6. नाविकों के प्रशिक्षण को लेकर समझौता- सेशेल्स के झंडे तले आवाजाही करने वाले जहाजों पर भारतीयों को सेवा देने का मौका मिलेगा साथ ही नाविकों को प्रशिक्षण और सर्टिफिकेट को मान्यता देने को लेकर एमओयू पर हस्ताक्षर हुए हैं। इससे भारतीय नाविकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और समुद्री क्षेत्र में भारत की वैश्विक भूमिका मजबूत होगी।
  7. सेशेल्स को मेड इन इंडिया जंगी जहाज भारत ने सौंपा- पीएम मोदी के दौरे के दौरान सेशेल्स को एक फास्ट पेट्रोल वेसल (गश्ती पोत) उपहार दिया है। पीएम मोदी ने सेशेल्स कोस्ट गार्ड को पूरी तरह भारत में निर्मित यानी ‘मेड इन इंडिया’ फास्ट पेट्रोल वेसल PS LESPWAR सौंप दिया है। इससे समुद्री सुरक्षा सहयोग मजबूत होगा, हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका मजबूत होगी और भारतीय रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा।

8.Laser Radial Class नौकाएँ और वाहन देना- भारत ने सेशेल्स डिफेंस फोर्स को 10 यूटिलिटी वाहन और 5 सेट लेजर रेडियल क्लास नौकाएँ दे रहा है। इससे भारत की विश्व कल्याण की सोच को मजबूती मिल रही है।

  1. डोर्नियर विमान का Glass Cockpit Upgrade कर रहा है। इससे रक्षा सहयोग गहरा होगा, सुरक्षा मजबूत होगी और भारत की ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की भूमिका और सशक्त होगी।
  2. सेशेल्स कोस्ट गार्ड के पोत PS Zoroaster का रीफिट पूरा किया गया है। इससे दोनों देशों के द्विपक्षीय सुरक्षा और रक्षा सहयोग मजबूत होगा तथा हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय भागीदार की भूमिका और सशक्त होगी।लेकिन भारत का बड़ा दिल सिर्फ यहीं तक नहीं रुका पीएम मोदी ने सेशेल्स को 6 आधुनिक एम्बुलेंस देने की भी घोषणा की।
  3. एम्बुलेंस का उपहार- सेशेल्स सरकार को 6 आधुनिक एंबुलेंस भारत देने जा रहा है। इससे भारत की भरोसेमंद मानवीय साझेदार की छवि मजबूत होगी और जनकल्याण के जरिए लोगों के बीच संबंध मजबूत होंगे।
  4. 500 मीट्रिक टन चावल की सहायता- भारत ने सेशेल्स की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 500 मीट्रिक टन चावल की सहायता प्रदान की है। यह मानवीय सहायता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान सौंपी गई।
  5. 8500 मीट्रिक टन सीमेंट की सहायता- भारत सेशेल्स के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और विकास परियोजनाओं को गति देने के लिए 8500 मीट्रिक टन सीमेंट दे रहा है। दरअसल इस छोटे से देश की विकास परियोजनाओं से इससे मदद की जा रही है।
  6. स्मारक लोगो लॉन्च- भारत-सेशेल्स राजनयिक संबंधों के 50 वर्ष पूरे होने पर स्मारक लोगो लॉन्च किया है। इससे दोनों देशों के मजबूत होते रिश्ते और लोगों के संबंधों को दिखाता है। दरअसल भारत को हिन्द महासागर में एक अच्छा दोस्त मिला है।
  7. प्रोफेशनल एवं तकनीकी एजुकेशन सेंटर का वर्चुअल शिलान्यास- पीएम मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच प्रोफेशनलों के आने-जाने और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्चुअल सेंटर का शिलान्यास किया गया। इससे दोनों देशों के बीच संस्थागत संबंध आगे और विकसित होंगे और लोगों के बीच सद्भाव बढ़ेगा।
  8. CDRI की सदस्यता- सेशेल्स ने ‘कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर’ (CDRI) का सदस्य बनने का फैसला किया है। यह भारत और सेशेल्स के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान इस अहम निर्णय की घोषणा की गई। सेशेल्स जैसे छोटे द्वीपों वाले विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक खतरा है। CDRI का मुख्य उद्देश्य ऐसे ही कमजोर क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे को मजबूत बनाना है।
  9. 17.जनऔषधि योजना पर समझौता- भारत और सेशेल्स गणराज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच जनऔषधि योजना (Janaushadhi Scheme) के तहत एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस समझौते पर मेसर्स एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड ने हस्ताक्षर किए। यह समझौता सेशेल्स में उच्च गुणवत्ता वाली और सस्ती भारतीय जेनेरिक दवाओं और चिकित्सा से जुड़ी सामग्री के निर्यात और उपलब्धता को सुगम बनाएगा। इससे वैश्विक फार्मा क्षेत्र में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
  10. 18.नए राष्ट्रीय अस्पताल की तैयारी – भारत और सेशेल्स के बीच नए राष्ट्रीय अस्पताल के विकास और प्रारंभिक तैयारियों के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह स्वास्थ्य के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्माण की रूपरेखा तैयार करने की दिशा में अहम है। इससे सेशेल्स के नए राष्ट्रीय अस्पताल खोलने के लिए एक बुनियादी ढाँचा तैयार होगा। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा और भारत की भरोसेमंद विकास साझेदार की भूमिका मजबूत होगी।
  11. 19.कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में समझौता- भारत सरकार और सेशेल्स के बीच कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके तहत 2026-2031 की कार्ययोजना बनाई गई है, जिसका उद्देश्य संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी अध्ययन और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है। यह समझौता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और सेशेल्स सरकार के कृषि विभाग के बीच हुआ है।

      इन समझौतों से दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी। हिंद महासागर में भारत की विश्वसनीय सुरक्षा साझेदार की भूमिका बढ़ेगी। डिजिटल और फिनटेक सहयोग नए स्तर पर पहुँचेगा। अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, शिक्षा और ब्लू इकोनॉमी में दीर्घकालिक सहयोग विकसित होगा और 50 वर्षों पुराने भारत-सेशेल्स संबंधों को नई गति मिलेगी।

      पीएम मोदी ने सेशेल्स दौरे में दोनों देशों की 50 साल पुरानी दोस्ती का जिक्र किया और इसमें नए आयाम जोड़े। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हिंद महासागर हमारा साझा घर है। इसकी सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि हमारी साझा जिम्मेदारी है। भारत का लक्ष्य हिंद महासागर को ‘Ocean of Opportunity’यानी अवसरों का महासागर बनाना है।

      उन्होंने कहा कि भारत और सेशेल्स अजनबी नहीं, बल्कि पुराने मित्र हैं और दोनों देशों के बीच विश्वास, लोकतांत्रिक मूल्यों और लोगों के बीच गहरे संबंध इस साझेदारी की सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का ‘महासागर’ (Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions) विजन सेशेल्स के साथ सहयोग का प्रमुख आधार बनेगा।

      यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को सेशेल्स का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान ‘Guardian of the Blue Horizon’ भी प्रदान किया गया, जिसे उन्होंने जलवायु परिवर्तन से लड़ रहे सभी देशों को समर्पित किया।

      गुजरात के अमरेली में युवक को मारने वाले चार शेरों को उम्रकैद: जानिए कैसे किसी शेर को घोषित किया जाता है ‘आदमखोर’ और क्या होती है पूरी प्रक्रिया

      जंगल में कोई कोर्ट नहीं होती। वहाँ कोई जज नहीं होता, कोई सरकारी वकील नहीं होता और कोई गवाह भी नहीं होता। फिर भी जब जंगल का राजा कहलाने वाला शेर किसी इंसान को अपना शिकार बना लेता है, तो उसके खिलाफ भी एक ऐसी प्रक्रिया शुरू होती है जिसका अंत कई बार खुले जंगल से हमेशा के लिए विदाई में होता है।

      बाहर से देखने वालों को सिर्फ इतना दिखाई देता है कि चार शेरों को आजीवन कैद की सजा हुई, लेकिन इस एक वाक्य के पीछे सबूत, विज्ञान, वन्यजीव प्रबंधन और कई अधिकारियों के फैसलों की एक लंबी कड़ी छिपी होती है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

      अमरेली जिले के राजुला तहसील के कोवाया गाँव में हुई घटना के बाद गुजरात ने भी ऐसा ही एक दुर्लभ फैसला देखा। उत्तराखंड के रहने वाले प्रकाश चंद्र रोजगार के लिए गुजरात आए थे। 15 जून 2026 की रात वह अपने रास्ते से गुजर रहे थे। पींगलेश्वर महादेव के पास अंधेरे में जो हुआ, उसने अगले दिन पूरे राज्य को झकझोर दिया।

      शेर के हमले में उनकी मौत हो गई और शेरों ने उनके शरीर को खा लिया। वन विभाग मौके पर पहुँचा और जाँच शुरू की गई। आसपास के इलाके से चार संदिग्ध शेरों को पकड़ा गया। उनके सैंपल जाँच के लिए भेजे गए और उसके बाद एक ऐसा फैसला लिया गया जो आमतौर पर बहुत कम मामलों में होता है।

      फैसला था कि चारों शेरों को ‘आदमखोर’ घोषित किया जाए और उन्हें पूरी जिंदगी के लिए जंगल से दूर रखा जाए। यह खबर जितनी बड़ी थी, उतना ही बड़ा एक सवाल भी सामने आया। आखिर किसी शेर को ‘आदमखोर’ कैसे घोषित किया जाता है? क्या सिर्फ इंसान पर हमला कर देने से कोई शेर सीधे ‘मैन-ईटर’ बन जाता है? या इसके पीछे भी कोई नियम, कोई तय प्रक्रिया और वैज्ञानिक जाँच होती है?

      तलाजा-महुवा और शेत्रुंजय रेंज के वन अधिकारियों से बातचीत में जो बात सामने आई, वह बताती है कि किसी भी शेर को ‘आदमखोर’ घोषित करना शायद वन विभाग के सबसे कठिन फैसलों में से एक होता है।

      किसी इंसान पर हमला करने का मतलब यह नहीं कि आप ‘नरभक्षी’ हैं?

      यहाँ से पूरी कहानी शुरू होती है। कई लोग मानते हैं कि अगर शेर ने इंसान पर हमला कर दिया तो मामला वहीं खत्म हो गया और अब उसे ‘मैन-ईटर’ मान लिया जाएगा। लेकिन वन विभाग के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं होता। मान लीजिए कोई किसान रात में अपने खेत पर गया हो और झाड़ियों के पीछे बैठी शेरनी अचानक डरकर उस पर हमला कर दे।

      या कोई बूढ़ा शेर अपने शिकार के पास बैठा हो और इंसान गलती से उसके बहुत करीब पहुँच जाए। कई बार शेरनी अपने बच्चों के साथ होती है और उन्हें बचाने के लिए हमला कर देती है। इन सभी परिस्थितियों में हमला हो सकता है, इंसान की मौत भी हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि शेर ने इंसान को अपना भोजन मान लिया है।

      वन विभाग के सामने सबसे पहला सवाल यही होता है कि हमला आखिर हुआ क्यों? क्या यह आत्मरक्षा में किया गया हमला था? क्या यह अपने इलाके की सुरक्षा के लिए था? क्या इंसान अचानक बहुत करीब पहुँच गया था? या फिर शेर ने सच में इंसान को शिकार के तौर पर चुना था? इन सवालों के जवाब मिले बिना किसी भी शेर को ‘मैन-ईटर’ घोषित नहीं किया जाता।

      सबूत तय करते हैं शेर का भविष्य

      कोवाया घटना में भी वन विभाग ने पहले किसी शेर को पकड़ने की जल्दी नहीं दिखाई। पहले घटनास्थल का विवरण तैयार किया गया। शव कहाँ मिला? शरीर के किस हिस्से पर सबसे पहले हमला हुआ? शव को कितनी दूर तक घसीटा गया? शरीर के कौन-से हिस्से खाए गए? आसपास कितने पंजे के निशान थे? क्या यह एक शेर था या पूरा झुंड?

      क्या आसपास कैमरा ट्रैप लगे थे? पिछले कुछ दिनों में उस क्षेत्र में शेरों की क्या-क्या गतिविधियाँ दर्ज की गईं?

      इन सभी सवालों के जवाब घटनास्थल से ही मिलते हैं। जंगल में हर जगह सीसीटीवी नहीं होता और चश्मदीद गवाह भी मुश्किल से ही मिलते हैं। वहाँ सिर्फ जानवरों के पैरों के निशान ही सब कुछ बयां करते हैं। जमीन पर बना हर निशान, झाड़ियों में फंसे बाल, शव की स्थिति और उसके आसपास का हर संकेत वन अधिकारियों के लिए सबूत बन जाता है।

      इसीलिए अधिकारी कहते हैं कि जंगल में जाँच-पड़ताल इंसानी दुनिया की जाँच-पड़ताल से अलग होती है। यहाँ आरोपित नहीं बोलता, सबूत बोलते हैं।

      संदिग्ध शेरों को पकड़ने के बाद ही शुरू होती है जाँच

      घटनास्थल से मिले शुरुआती सबूत जाँच को एक दिशा जरूर देते हैं, लेकिन वन विभाग के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं होता। क्योंकि जंगल में कई बार एक ही इलाके में एक से ज्यादा शेर घूम रहे होते हैं। यह भी संभव होता है कि हमला किसी एक शेर ने किया हो और बाद में उसके साथ मौजूद दूसरे शेर भी शिकार के पास पहुँच गए हों।

      इसलिए अधिकारी बिना पूरी जाँच के किसी एक शेर को तुरंत दोषी नहीं मानते। जब शुरुआती जाँच किसी खास इलाके की तरफ इशारा करती है, तब संदिग्ध शेरों को ट्रैंक्विलाइजर गन की मदद से बेहोश करके सुरक्षित तरीके से पकड़ा जाता है। यह भी बेहद जोखिम भरा काम होता है। खुले जंगल में पूरी ताकत के साथ घूम रहे शेर को जिंदा पकड़ना आसान नहीं होता।

      इसके लिए पशु चिकित्सक, ट्रैकर और अनुभवी वनकर्मी कई घंटों तक उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं। सही मौका मिलने पर ही ट्रैंक्विलाइजर डार्ट छोड़ा जाता है। दवा का असर होते ही पूरी टीम तेजी से उसके पास पहुँचती है, क्योंकि बेहोश हुए जानवर की हालत पर हर पल नजर रखना जरूरी होता है। कोवाया की घटना में भी ऐसा ही किया गया।

      हमले के बाद आसपास के इलाके से चार संदिग्ध शेरों को पकड़ा गया। बाहर से देखने वालों को लगा कि शायद अब फैसला हो गया है, लेकिन असल में फैसला अभी बहुत दूर था।

      चार शेरों में से असली हमलावर कौन? सबसे कठिन प्रश्न

      अमरेली के कोवाया मामले में भी वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि आखिर चारों शेरों को एक साथ कैसे पहचाना और पकड़ा जाए। क्योंकि जंगल में कोई शेर अपना नाम लिखकर नहीं घूमता और कोई भी अधिकारी सिर्फ अंदाज के आधार पर फैसला नहीं ले सकता।

      वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इलाके में शेरों की गतिविधियाँ, घटनास्थल से मिले सबूत, पंजों के निशान, कैमरा ट्रैप में दर्ज तस्वीरें और लैब से मिलने वाली जाँच रिपोर्ट सभी को एक साथ जोड़कर पूरी तस्वीर तैयार की जाती है। इसके बाद तय किया जाता है कि किन शेरों को आगे की जाँच के लिए रखा जाएगा और किनका इस घटना से कोई संबंध नहीं है।

      कोवाया की घटना में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई। चारों संदिग्ध शेरों को पकड़कर उनके सैंपल सासन में जाँच के लिए भेजे गए। इसके बाद जो रिपोर्ट सामने आई, उसने जाँच को नई दिशा दी और आगे का फैसला लेना संभव हो सका।

      प्रयोगशाला तक पहुँचता है सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य

      पकड़े गए शेरों से जरूरी सैंपल लिए जाते हैं और जाँच के लिए भेजे जाते हैं। यह जाँच सिर्फ इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए नहीं होती कि शेर ने इंसान का मांस खाया था या नहीं। जाँच का मकसद यह भी होता है कि घटनास्थल से मिले सबूत, शव की स्थिति, पंजों के निशान, शेरों की गतिविधियाँ और लैब से मिले नतीजे, क्या ये सभी एक ही दिशा की तरफ इशारा कर रहे हैं या नहीं।

      यहाँ अक्सर लोग एक आम गलती कर देते हैं। वे मान लेते हैं कि अगर किसी शेर के सैंपल में मानव अवशेष मिलने की पुष्टि हो गई तो मामला खत्म और वह ‘मैन-ईटर’ साबित हो गया। लेकिन वन विभाग की सोच इतनी सीधी नहीं होती।

      अधिकारी बताते हैं कि किसी जानवर का किसी मृत शरीर से मांस खाना और किसी जीवित इंसान को शिकार के रूप में चुनना, ये दोनों बातें एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए हर सबूत को दूसरे सबूत से जोड़कर देखा जाता है। सिर्फ एक रिपोर्ट के आधार पर अंतिम फैसला नहीं लिया जाता।

      कोवाया मामले में भी अलग-अलग सबूत और लैब की रिपोर्ट एक-दूसरे की पुष्टि करते गए। इसके बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू की गई।

      सक्करबाग सिर्फ एक चिड़ियाघर नहीं, फैसले से पहले का आखिरी पड़ाव

      कई लोगों के लिए सक्करबाग सिर्फ जूनागढ़ का एक चिड़ियाघर है। लेकिन वन विभाग के लिए यह सिर्फ एक जू नहीं है। वर्षों से यहाँ ऐसे वन्यजीवों को रखा जाता है जिनके बारे में कोई विशेष फैसला लिया जाना बाकी होता है या जिन्हें लगातार निगरानी में रखने की जरूरत होती है। यहाँ लाए जाने के बाद पकड़े गए शेर की दोबारा विस्तार से मेडिकल जाँच की जाती है।

      उसके दाँतों की जाँच होती है। यह देखा जाता है कि उसका जबड़ा सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। आँखें, पैर, शरीर पर पुरानी चोटें, उम्र और उसकी पूरी शारीरिक स्थिति का आँकलन किया जाता है। इस जाँच के पीछे भी एक बड़ा कारण होता है।

      अगर कोई शेर बूढ़ा हो गया हो, उसके दाँत टूट गए हों या उसके शरीर में ऐसी चोट हो जिसकी वजह से वह प्राकृतिक शिकार नहीं कर पा रहा हो, तो उसके आसान शिकार की तरफ जाने की संभावना बढ़ जाती है। इसीलिए वन विभाग के लिए शेर की सेहत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना घटनास्थल से मिला कोई सबूत। लेकिन शरीर की जाँच से भी ज्यादा अहम होता है उसका व्यवहार।

      पाँच साल तक किया जा सकता है निरीक्षण लेकिन अमरेली का मामला अलग

      शेत्रुंजय विभाग के असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (ACF) विरलसिंह चावड़ा ने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में ऐसे शेरों के व्यवहार पर लंबे समय तक नजर रखी जाती है। कुछ मामलों में यह समय पांच साल तक भी पहुँच सकता है।

      इस दौरान विशेषज्ञ लगातार देखते हैं कि शेर का व्यवहार सामान्य है या नहीं, वह इंसानों के प्रति किसी असामान्य आकर्षण या आक्रामकता के संकेत तो नहीं दिखा रहा और समय के साथ उसके व्यवहार में कोई बदलाव आ रहा है या नहीं, लेकिन हर मामला इतना लंबा चले, ऐसा जरूरी नहीं होता।

      जाँच के दौरान मिले सभी सबूत इतने स्पष्ट हों कि वे एक ही निष्कर्ष की तरफ इशारा करें, तो फिर सालों तक इंतजार नहीं किया जाता। अधिकारियों के मुताबिक, अमरेली का कोवाया मामला ऐसा ही एक अपवाद था। जाँच, लैब रिपोर्ट और उपलब्ध सबूतों के आधार पर इस मामले में फैसला लेने की प्रक्रिया सामान्य मामलों की तुलना में काफी तेजी से पूरी की गई।

      इसी वजह से इस घटना ने पूरे राज्य का ध्यान खींचा। क्योंकि यहाँ सालों बाद नहीं, बल्कि कम समय में ही चारों शेरों को ‘मैन-ईटर’ घोषित कर दिया गया और फैसला लिया गया कि उन्हें अब दोबारा कभी जंगल में नहीं छोड़ा जाएगा।

      अंततः कौन लेता है ‘आजीवन कारावास’ का निर्णय?

      पूरी जाँच पूरी होने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है। बाहर से देखने वालों को लगता है कि लैब की रिपोर्ट आ गई तो फैसला भी हो गया। लेकिन असल में लैब रिपोर्ट पूरी प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा होती है। घटनास्थल से मिले सबूत, पंजों के निशान, शेरों की गतिविधियाँ, मेडिकल जाँच, उनके व्यवहार का आँकलन और लैब से मिले सभी नतीजों को एक साथ इकट्ठा करके वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखा जाता है।

      इसके बाद पूरी फाइल का विस्तार से अध्ययन किया जाता है और फिर अंतिम फैसला लिया जाता है। इस पूरे फैसले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ इतना होता है कि क्या इस जानवर को दोबारा खुले जंगल में भेजना सुरक्षित होगा या नहीं।

      ‘आदमखोर’ घोषित होने के बाद जंगल में नहीं लौटता शेर

      वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इसके बाद संबंधित शेर को दोबारा जंगल में नहीं छोड़ा जाता। वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश पर उसे सक्करबाग, किसी अधिकृत रेस्क्यू सेंटर या किसी अन्य चिड़ियाघर में भेज दिया जाता है, जहाँ वह अपना बाकी का पूरा जीवन बिताता है। यही वजह है कि लोग इसे ‘आजीवन कैद’ कहते हैं।

      यह नियम सिर्फ शेरों पर लागू नहीं होता। एक दिलचस्प बात यह भी है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल गिर के शेरों तक सीमित नहीं है। अगर किसी बाघ, तेंदुए या किसी दूसरे बड़े मांसाहारी वन्यजीव के बारे में वैज्ञानिक जाँच में यह साबित हो जाए कि उसने इंसानों को शिकार के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है, तो उसके साथ भी लगभग ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई जाती है।

      क्योंकि वन विभाग के लिए सवाल यह नहीं होता कि जानवर कौन सा है। असली सवाल यह होता है कि क्या अब वह लगातार मानव जीवन के लिए खतरा बन गया है? अगर जवाब हाँ होता है, तो फिर वन्यजीव संरक्षण और इंसानों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उसे खुले जंगल से दूर रखने का फैसला लिया जाता है।

      ‘आजीवन कैद’ नहीं, सुरक्षा का फैसला: क्यों जंगल में वापस नहीं छोड़े जाते ‘मैन-ईटर’ शेर?

      कोवाया घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक बात बहुत लिखी गई- ‘चार शेरों को आजीवन कैद।’ लेकिन इस शब्द का असली मतलब समझना भी उतना ही जरूरी है। इंसानों की अदालत में आजीवन कैद किसी अपराध की सजा होती है, लेकिन जंगल में ऐसा कोई नियम नहीं होता। यहाँ शेर ने कोई कानून नहीं तोड़ा होता।

      उसने जो किया, वह उसके स्वभाव, परिस्थितियों और उसकी प्राकृतिक प्रवृत्ति का हिस्सा होता है। वन विभाग भी उसे अपराधी की तरह नहीं देखता। वन विभाग के अधिकारी साफ कहते हैं कि यहाँ मकसद जानवर को सजा देना नहीं होता। क्योंकि शेर किसी कानून का उल्लंघन नहीं करता, वह अपने स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है।

      लेकिन जब वैज्ञानिक जाँच में यह सामने आता है कि कोई खास शेर इंसान को अब सिर्फ घुसपैठिया या खतरे के रूप में नहीं, बल्कि शिकार के रूप में देखने लगा है, तब उसे दोबारा खुले जंगल में छोड़ना भविष्य में किसी और हादसे का जोखिम लेना माना जाता है। इसी वजह से ऐसे फैसलों को वन्यजीव प्रबंधन की भाषा में सजा नहीं बल्कि सुरक्षा से जुड़ा फैसला माना जाता है।
      जब कोई जानवर इंसान को शिकार के रूप में अपनाने लगता है, तब मामला सिर्फ एक शेर तक सीमित नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि अगर उसे फिर उसी इलाके में छोड़ा गया, तो क्या किसी और की जान खतरे में पड़ सकती है? इसीलिए ऐसे फैसलों को ‘सजा’ से ज्यादा ‘जोखिम प्रबंधन’ के रूप में समझना ज्यादा सही माना जाता है।

      ‘आजीवन कैद’ नहीं, जंगल से स्थायी विदाई: कोवाया घटना से मिला सबसे बड़ा सबक

      पूरी घटना का सबसे बड़ा सबक शायद यहीं छिपा है। आज गिर के शेर सिर्फ गिर नेशनल पार्क तक सीमित नहीं रह गए हैं। उनकी संख्या बढ़ी है और उनका इलाका भी पहले से बड़ा हुआ है। अमरेली, भावनगर, बोटाद, जूनागढ़ और गिर सोमनाथ के कई इलाकों में अब शेरों की मौजूदगी सामान्य बात बन गई है।

      यह वन्यजीव संरक्षण की एक बड़ी सफलता है। लेकिन इस सफलता के साथ नई जिम्मेदारियाँ भी आई हैं। जहाँ पहले जंगल था, वहाँ आज खेती है। जहाँ पहले शेरों के रास्ते थे, वहाँ अब गाँव हैं और जहाँ पहले सिर्फ जंगली जानवर घूमते थे, वहाँ अब रात में भी वाहन चलते हैं।

      इंसानों और शेरों, दोनों का दायरा बढ़ा है और शायद इसी वजह से दोनों के बीच की दूरी कम हुई है। ऐसे में हर हमला ‘आदमखोर’ होने का सबूत नहीं होता। लेकिन हर घटना यह जरूर याद दिलाती है कि अब गिर संरक्षण का मतलब सिर्फ शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं है। उतना ही जरूरी यह भी है कि इंसानों और शेरों के बीच का संतुलन बना रहे।

      कोवाया घटना में जिन चार शेरों को जंगल से हटाया गया, उन्हें शायद अब कभी गिर के खुले जंगल में लौटने का मौका नहीं मिलेगा। उन्होंने शायद अपना आखिरी खुला सूर्योदय देख लिया है। अब उनका जीवन बाड़ों, एनक्लोजर और इंसानी निगरानी के बीच बीतेगा।

      लेकिन इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सबक शायद शेरों के लिए नहीं, इंसानों के लिए है, क्योंकि यह घटना बताती है कि किसी भी शेर को एक दिन में ‘आदमखोर’ घोषित नहीं किया जाता। ऐसा फैसला भावनाओं या जल्दबाजी में नहीं लिया जाता।

      घटनास्थल से शुरू हुई जाँच पंजों के निशान, फॉरेंसिक सैंपल, मेडिकल जाँच, व्यवहार के अध्ययन और अधिकारियों के अंतिम मूल्यांकन तक पहुँचती है। जब यह सारी कड़ियाँ एक ही निष्कर्ष की तरफ इशारा करती हैं, तभी जंगल के राजा को खुले जंगल से हमेशा के लिए दूर करने का फैसला लिया जाता है।

      शायद इसलिए ‘आजीवन कैद’ से ज्यादा सही शब्द ‘स्थायी विदाई’ हो सकता है। क्योंकि यहाँ सजा किसी अपराधी को नहीं दी जाती। यहाँ एक ऐसा फैसला लिया जाता है जहाँ एक तरफ इंसानों की सुरक्षा होती है और दूसरी तरफ जंगल का राजा।

      वन विभाग के लिए सबसे मुश्किल काम शायद यही होता है कि किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों को जितना संभव हो सके उतना सुरक्षित रखने का रास्ता तलाशना। और जब यह पूरी प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तभी जंगल के राजा को अपने ही जंगल से हमेशा के लिए विदा लेना पड़ता है।

      (मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)






      पहलगाम आतंकी हमले पर UN रैपोर्टियर बेन सॉल ने दिए थे भारत विरोधी बयान, ऑपइंडिया ने उसी समय उठाए थे सवाल: जाँच में चीन से फंडिंग पाने का हुआ खुलासा

      UN वॉच की एक रिपोर्ट ने आतंकवाद-रोधी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर बेन सॉल पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सॉल को चीनी सरकार से फंडिंग मिल रही है।

      स्काई न्यूज के अनुसार, जिनेवा स्थित इस समूह की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सॉल में पश्चिम-विरोधी और इजरायल-विरोधी पक्षपात है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सॉल ने अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठन अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य और आतंकवादी नेता अयमान मोहम्मद रबी अल-जवाहिरी की हत्या की निंदा की थी।

      यूएन वॉच के कार्यकारी निदेशक हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से बात करते हुए कहा, “उन्हें एक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) नहीं होना चाहिए, उन्हें एक अकादमिक होना चाहिए। हमें विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण देखने को मिलना चाहिए।”

      नोयर ने कहा  “संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ को सबसे पहले हमास के आतंकवादियों का विरोध करना चाहिए, ईरान के इस्लामी शासन का विरोध करना चाहिए, लेकिन बेन सॉल ईरान के इस्लामी शासन और उसके आतंकवादी सहयोगियों की बातों को दोहराते हुए दिखाई देते हैं।”

      रिपोर्ट का हवाला देते हुए नोयर ने कहा कि सॉल को चीनी कम्युनिस्ट शासन से 1,50,000 डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने यह भी कहा कि सॉल ने रिपोर्ट की सामग्री का कोई खंडन नहीं किया है। नोयर ने कई ऐसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का नाम लिया, जिनके कार्यालयों को चीन से फंडिंग मिली है।

      हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से कहा, “वह खुद को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ बताते हैं। वह सिडनी में कानून के प्रोफेसर हैं और खुद को स्वतंत्र विशेषज्ञ कहते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि जब उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से 1,50,000 डॉलर मिल रहे हैं, तो वह स्वतंत्र विशेषज्ञ कैसे हो सकते हैं? मैं स्पष्ट कर दूँ। कोई यह नहीं कह रहा कि यह पैसा उनकी निजी जेब में जा रहा है ताकि वह कोई फेरारी खरीद सकें, लेकिन यह उनके कार्यालय को जा रहा है। वही कार्यालय जिसने कभी भी चीन द्वारा आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के नाम पर दस लाख उइगरों को शिविरों में रखने की निंदा नहीं की, जबकि यही वह विषय है जिसके वह विशेषज्ञ होने का दावा करते हैं।”

      उन्होंने कहा कि जबरदस्ती के उपायों (कोअर्सिव मेजर्स) पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टियर एलेना दोहान के कार्यालय को रूस, चीन और कतर से 13 लाख डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य विशेषज्ञ जॉर्ज कैट्रूगालोस का भी नाम लिया, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के कार्यालय के अध्यक्ष हैं।

      नोयर ने कहा कि उनके कार्यालय को चीन से 1,00,000 डॉलर मिले थे, उसी वर्ष जब उन्होंने एथेंस में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पुस्तक के प्रचार के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया था।

      UN वॉच ने संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों द्वारा चीन, कतर, रूस जैसे देशों से संदिग्ध फंडिंग प्राप्त करने और मानवाधिकारों के नाम पर विशेष वैचारिक हितों को बढ़ावा देने के कई मामलों को चिन्हित किया है। संगठन का आरोप है कि ये विशेषज्ञ आतंकवादी घटनाओं और इस्लामी आतंकवाद के पीड़ितों की स्थिति की अनदेखी करते हैं।

      बेन सॉल समेत UN रिपोर्टर्स ने पहलगाम हमले पर भारत को घेरा

      गौरतलब है कि सॉल उन आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष रैपोर्टियरों में शामिल थे, जिन्होंने पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा अपनाए गए आतंकवाद-रोधी उपायों को लेकर मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक संयुक्त प्रेस बयान जारी किया था।

      ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि संयुक्त राष्ट्र के इस विशेष विशेषज्ञ ने आतंकवादी हमले की निंदा तो की थी, लेकिन भारत के आतंकवाद-रोधी अभियानों को, जिनमें अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट सेवाओं का निलंबन और 8000 सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक करना शामिल था, असंगत (डिसप्रोपोर्शनेट) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन बताया था।

      भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों को सामूहिक दंड (कलेक्टिव पनिशमेंट) बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने दावा किया कि अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों से जुड़े परिवारों के घरों, व्यवसायों और संपत्तियों को बिना किसी न्यायालयी आदेश या विधिक प्रक्रिया के मनमाने ढंग से ध्वस्त कर दिया।

      UN वॉच की रिपोर्ट के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि बेन सॉल, जिनसे आतंकवादी कृत्यों की निंदा करने की अपेक्षा की जाती है, पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई की आलोचना क्यों कर रहे थे।

      किसी तरह संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियानों को भी पहलगाम हमले के बाद देशभर में चलाए गए कार्रवाई अभियान से जोड़ दिया। उनका तर्क था कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमानों को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उनका धर्म पहलगाम हमले के आरोपियों जैसा है।

      जबकि असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय से चल रही है, जिनमें मुख्य रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा कर मजार या दरगाह बनाने वाले इस्लामवादी तत्वों तथा अवैध रूप से भूमि पर कब्जा करने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या शामिल हैं। ये अतिक्रमण-रोधी अभियान एक वर्ष से भी अधिक समय से जारी हैं।

      हालाँकि इनका पहलगाम हमले से कोई संबंध नहीं था। गुजरात में पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद जो एकमात्र ध्वस्तीकरण अभियान चला, वह सरकार द्वारा चंडोला झील और उसके आसपास बने अवैध ढाँचों को हटाने के लिए था, जिसे अवैध बांग्लादेशियों का केंद्र माना जाता है। यह कार्रवाई भी गुजरात हाई कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद की गई थी।

      इसके अलावा, यह दावा भी गलत बताया गया कि ‘निर्दोष कश्मीरी नागरिकों’ के घर गिराए गए। अधिकारियों ने घरों को ध्वस्त किया था, लेकिन वे निर्दोष नागरिकों के नहीं थे।

      अधिकारियों ने केवल प्रमाणित आतंकवादियों के घरों को ही गिराया। सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों का इस्तेमाल कर आतंकवादी शाहिद अहमद कुट्टे के शोपियाँ स्थित घर, कुलगाम में सक्रिय जिहादी जाकिर के घर, पुलवामा के मुरन में एहसान-उल-हक शेख के घर, जो 2018 में पाकिस्तान गया था और इसी वर्ष घाटी में घुसपैठ कर लौटा था, फारूक तीवड़ा के घर, जो 1990 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान चला गया था और कभी वापस नहीं लौटा, तथा लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों आदिल हुसैन ठोकर (बीजबेहड़ा, अनंतनाग) और आसिफ शेख (त्राल, पुलवामा) के घरों को ध्वस्त किया। लेख के अनुसार, इनमें से कोई भी व्यक्ति निर्दोष या शांतिप्रिय नागरिक नहीं था।

      (मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

      40 Su-30MKI पर ब्रह्मोस, अब BrahMos-NG की बारी: चीन-पाकिस्तान की नींद उड़ा देगी भारतीय वायुसेना की नई स्ट्राइक पावर, पढ़ें डिटेल्स

      भारतीय वायुसेना की लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ है। करीब 40 सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान अब एयर-लॉन्च ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों से लैस हो चुके हैं। Su-30MKI पहले से ही भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना जाता है और ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इन दोनों के साथ आने से भारत को जमीन और समुद्र दोनों मोर्चों पर लंबी दूरी से तेज और सटीक प्रहार करने की बड़ी ताकत मिली है।

      भारत के पास करीब 270 Su-30MKI लड़ाकू विमान हैं। इनमें से 40 विमानों पर ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम का इंटीग्रेशन हो चुका है और बाकी विमानों पर भी यह काम आगे बढ़ाया जा रहा है। इस अपग्रेड का मतलब है कि भारतीय वायुसेना अब दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के अंदर गहराई तक घुसे बिना भी दूर से सटीक हमला कर सकती है।

      40 Su-30MKI ब्रह्मोस से लैस

      ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सह-निदेशक अलेक्जेंडर मक्सिचेव ने रूस की सरकारी समाचार एजेंसी स्पुतनिक को फ्लीट 2026 इंटरनेशनल मैरीटाइम डिफेंस शो के दौरान बताया कि Su-30MKI विमानों को ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस करने का कार्यक्रम जारी है। उनके अनुसार अभी करीब 40 Su-30MKI लड़ाकू विमान ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस हो चुके हैं।

      यह भारत की एयर स्ट्राइक क्षमता के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है। Su-30MKI भारी हथियार ले जाने वाला लंबी दूरी का मल्टीरोल फाइटर जेट है। वहीं, ब्रह्मोस तेज रफ्तार, सटीक निशाने और भारी मारक क्षमता वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। जब ये दोनों एक साथ काम करते हैं, तो भारतीय वायुसेना को दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर, एयरबेस और नौसैनिक ठिकानों को दूर से निशाना बनाने की क्षमता मिलती है।

      Su-30MKI क्यों है खास

      Su-30MKI एक ट्विन-इंजन, दो सीटों वाला मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। इसे मूल रूप से रूस की सुखोई कंपनी ने विकसित किया था लेकिन भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL इसे लाइसेंस के तहत बनाता है।

      इस विमान में भारतीय, रूसी, फ्रांसीसी और इजरायली एविएशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। Su-30MKI को भारतीय वायुसेना की रीढ़ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हवा से हवा में लड़ाई, जमीन पर हमला और समुद्री लक्ष्यों पर प्रहार जैसे कई तरह के मिशन कर सकता है।

      इसकी बिना रिफ्यूलिंग रेंज करीब 3,000 किलोमीटर बताई जाती है। इसमें भारी हथियार ले जाने की क्षमता है और इसकी उड़ान क्षमता भी मजबूत है। Su-30MKI में थ्रस्ट-वेक्टरिंग इंजन और एडवांस कैनार्ड लगे हैं, जिससे यह हवा में बेहतर मैन्यूवर कर सकता है। यही वजह है कि ब्रह्मोस जैसी भारी और तेज मिसाइल के लिए इसे एक मजबूत प्लेटफॉर्म माना जाता है।

      ब्रह्मोस मिसाइल की ताकत

      ब्रह्मोस मिसाइल भारत के DRDO और रूस के NPO Mashinostroyeniya का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की Moskva नदी के नाम पर रखा गया है। यह रैमजेट-पावर्ड, प्रिसिजन-गाइडेड सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है।

      ब्रह्मोस की रफ्तार करीब Mach 3 है यानी यह लगभग 3700 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है। इतनी तेज रफ्तार के कारण दुश्मन के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।

      यह मिसाइल जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च की जा सकती है। इसका एयर-लॉन्च वर्जन Su-30MKI के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है। जमीन से लॉन्च होने वाली ब्रह्मोस मिसाइल का वजन करीब 3 टन होता है जबकि एयर-लॉन्च ब्रह्मोस का वजन करीब 2.5 टन है। इस मिसाइल को Su-30MKI पर लगाने के लिए विमान में खास बदलाव किए गए हैं।

      ब्रह्मोस कम ऊँचाई पर उड़ान भर सकती है। समुद्र में यह 3 से 10 मीटर की ऊँचाई तक सी-स्किमिंग मोड में उड़ सकती है। इससे दुश्मन के रडार के लिए इसे समय रहते पकड़ना मुश्किल हो जाता है। यह मिसाइल स्टिप डाइव मैन्यूवर के जरिए सटीक हमला भी कर सकती है। इसके विस्तारित रेंज वाले वेरिएंट की मारक दूरी करीब 450 से 500 किलोमीटर बताई जा रही है।

      लंबी दूरी से सटीक हमला

      Su-30MKI और ब्रह्मोस का सबसे बड़ा फायदा स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता है। इसका मतलब है कि भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की पहुँच से बाहर रहकर भी मिसाइल लॉन्च कर सकता है। इससे विमान और पायलट दोनों की सुरक्षा बढ़ती है और लक्ष्य पर हमला भी सटीक रहता है।

      Su-30MKI की करीब 3,000 किलोमीटर की रेंज और ब्रह्मोस की करीब 450 से 500 किलोमीटर की मारक दूरी मिलकर भारत को बहुत लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता देती है। इसका असर जमीन और समुद्र दोनों मोर्चों पर दिखाई देगा। हिंद महासागर क्षेत्र में यह क्षमता खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बड़े युद्धपोतों, एयरबेस, कमांड सेंटर, हथियार डिपो और रडार सिस्टम को निशाना बनाया जा सकता है।

      BrahMos-NG से और बढ़ेगी ताकत

      मौजूदा ब्रह्मोस के बाद अब भारत और रूस BrahMos-NG यानी Next Generation ब्रह्मोस पर काम कर रहे हैं। ब्रह्मोस एयरोस्पेस और DRDO मिलकर इस नई मिसाइल को विकसित कर रहे हैं। मक्सिचेव के अनुसार अगली पीढ़ी की एयर-लॉन्च सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 2028 से 2029 के बीच तैयार हो सकती है।

      BrahMos-NG मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में छोटी और हल्की होगी। मौजूदा एयर-लॉन्च ब्रह्मोस का वजन करीब 2.5 टन है जबकि BrahMos-NG का अनुमानित वजन करीब 1.2 टन बताया जा रहा है। यानी इसका वजन लगभग आधा हो जाएगा।

      इस नई मिसाइल में AI-लेवल गाइडेंस और नेक्स्ट-जनरेशन एवियोनिक्स जैसी आधुनिक तकनीक शामिल किए जाने की बात कही गई है। इसका मकसद मिसाइल को ज्यादा सटीक, तेज और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक बनाना है।

      एक Su-30MKI पर 5 BrahMos-NG

      BrahMos-NG का हल्का वजन भारतीय वायुसेना के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। अभी Su-30MKI आमतौर पर एक ही एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइल लेकर उड़ता है क्योंकि मौजूदा मिसाइल भारी है और उसे विमान के सबसे मजबूत सेंटरलाइन हार्डप्वाइंट पर लगाना पड़ता है।

      BrahMos-NG के हल्का होने के बाद स्थिति बदल सकती है। Su-30MKI में कई हार्डप्वाइंट होते हैं। हालाँकि सभी हार्डप्वाइंट भारी हथियारों के लिए नहीं बने होते लेकिन सेंटरलाइन और इनबोर्ड विंग पायलन जैसे मजबूत हिस्सों पर हल्की मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। विशेष लॉन्चर और ड्यूल-इजेक्टर रैक के जरिए भविष्य में एक Su-30MKI पर कई BrahMos-NG मिसाइलें लगाई जा सकती हैं।

      रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में एक Su-30MKI 5 BrahMos-NG मिसाइलों तक ले जाने में सक्षम हो सकता है। अगर यह क्षमता पूरी तरह ऑपरेशनल होती है, तो एक ही विमान एक मिशन में कई सैन्य लक्ष्यों पर हमला कर सकेगा।

      पाकिस्तान और चीन के लिए नई चुनौती

      BrahMos-NG की मल्टी-टारगेट क्षमता पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए चुनौती बन सकती है। पाकिस्तान के लिए इसका मतलब होगा कि एक ही मिशन में कई एयरबेस, रडार स्टेशन, कमांड पोस्ट, हथियार डिपो, मिसाइल ठिकाने या नौसैनिक ठिकाने निशाने पर आ सकते हैं।

      अगर किसी बड़े सैन्य अभियान की स्थिति बनती है, तो भारतीय वायुसेना कम विमानों से ज्यादा प्रभावी हमला कर सकेगी। पहले जहाँ एक Su-30MKI एक ब्रह्मोस मिसाइल लेकर एक बड़े लक्ष्य पर हमला कर सकता था तो वहीं भविष्य में वही विमान कई BrahMos-NG मिसाइलों के साथ कई अलग-अलग सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकेगा।

      चीन के संदर्भ में भी यह क्षमता अहम होगी। चीन का J-20 स्टील्थ फाइटर उसकी बड़ी सैन्य ताकतों में गिना जाता है। लेकिन BrahMos-NG जैसी स्टैंड-ऑफ मिसाइल के कारण Su-30MKI को दुश्मन के एयर डिफेंस क्षेत्र में गहराई तक जाने की जरूरत नहीं होगी। वह दूरी से ही सुपरसोनिक मिसाइल लॉन्च कर सकेगा। इससे दुश्मन के स्टील्थ फाइटर और एयर डिफेंस सिस्टम की चुनौती का असर कुछ हद तक सीमित किया जा सकता है।

      नौसेना और निर्यात के लिए भी अहम

      BrahMos-NG केवल वायुसेना के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय नौसेना के लिए भी अहम हो सकती है। इसका छोटा आकार और हल्का वजन इसे युद्धपोतों और भविष्य के कई लड़ाकू विमानों पर लगाने की संभावना बढ़ाता है। इससे भारत के पास एक ऐसा कॉमन सुपरसोनिक हथियार होगा जिसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल किया जा सकेगा।

      भारत ब्रह्मोस को रक्षा निर्यात के बड़े हथियार के रूप में भी देख रहा है। भारत ने ‘ब्रह्मोस’ की आपूर्ति के लिए फिलीपींस और वियतनाम के साथ आधिकारिक समझौते किए हैं तो वहीं इंडोनेशिया के साथ डील अंतिम चरण में है और यूएई (UAE) के साथ बातचीत चल रही है। मिडिल ईस्ट में तनाव के चलते UAE अपनी सैन्य खरीद बढ़ा रहा है और भारत इस मौके को रक्षा निर्यात के लिहाज से अहम मान रहा है।

      भारत-रूस का ब्रह्मोस प्रोजेक्ट 1998 में शुरू हुआ था। अब यह दोनों देशों के सबसे सफल रक्षा सहयोगों में गिना जाता है। मौजूदा ब्रह्मोस ने भारत को तेज, सटीक और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता दी है। वहीं BrahMos-NG इस क्षमता को अगले स्तर पर ले जा सकती है।

      बच्चों के लिए बेअसर साबित हो रहा सोशल मीडिया बैन, ऑस्ट्रेलिया से आई रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा: अब अल्बानीज सरकार बदलने जा रही रणनीति, जानें- क्या है नया प्लान?

      ऑस्ट्रेलिया की लेबर पार्टी की सरकार ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लागू प्रतिबंध को और कड़ा करने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज का कहना है कि बड़ी टेक कंपनियाँ मौजूदा कानून का पूरी तरह पालन नहीं कर रही हैं, इसलिए सरकार अब उन्हें जवाबदेह बनाने के लिए नए अधिकार और कड़े दंड लागू करेगी।

      यह कदम ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में किशोरों की मानसिक सेहत, सोशल मीडिया की लत, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन शोषण को लेकर चिंताएँ लगातार बढ़ रही हैं।

      क्या है नया प्रस्ताव?

      ऑस्ट्रेलियन सरकार के नए प्रस्ताव के मुताबिक, 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने या बनाए रखने से रोकने की जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म कंपनियों की होगी।

      यदि कोई कंपनी इस नियम का पालन करने में विफल रहती है तो उस पर अधिकतम 99 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 540 करोड़ रुपये) तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। यह पहले निर्धारित 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की अधिकतम सीमा का दोगुना है।

      यह कानून प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लागू होगा, जिनमें TikTok, Facebook,YouTube,Snapchat शामिल है। दिसंबर से इन कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उन्होंने नाबालिगों को अकाउंट बनाने या इस्तेमाल करने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं।

      ई-सेफ्टी कमिश्नर के अधिकार बढ़ेंगे

      सरकार ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट की शक्तियां भी बढ़ाने जा रही है। वे सोशल मीडिया कंपनियों से यह माँग सकेंगी कि वे एज वेरिफिकेशन के लिए उठाए गए कदमों का प्रमाण दें। वह उन थर्ड-पार्टी कंपनियों से भी जानकारी माँग सकेंगी, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को एज वेरिफिकेशन तकनीक उपलब्ध कराती हैं। यदि कंपनियाँ आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं करातीं हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी।

      प्रधानमंत्री अल्बानीज ने कहा, “ये बदलाव दिखाते हैं कि हम सोशल मीडिया कंपनियों के कानून पालन नहीं करने को लेकर कितना गंभीर है।”

      ई-सेफ्टी कमिश्नर इनमैन ग्रांट ने हाल ही में ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ में अपनी निराशा जताते हुए और कहा कि सोशल मीडिया पर उम्र की पाबंदी से जुड़े मौजूदा कानून उन्हें ‘मजबूत अधिकार’ नहीं देते हैं।

      उन्होंने कहा, “मैं बस इतना कहूँगी कि एक रेगुलेटर उतना ही अच्छा काम कर सकता है जितने उसे साधन और संसाधन दिए जाते हैं।”

      प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने कहा कि उनका मानना ​​है कि बड़ी टेक कंपनियाँ ‘कानून का पालन करने के लिए काफी कुछ नहीं कर रही हैं।’ शनिवार (27 जून 2026) को दिए बयान में उन्होंने कहा, “सोशल मीडिया पर अभी भी बहुत सारे बच्चे हैं।” उन्होंने कहा कि सरकार दुनिया के सबसे कड़े सोशल मीडिया आयु-प्रतिबंध कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू कराना चाहती है और टेक कंपनियों द्वारा नियमों की अनदेखी को गंभीरता से ले रही है।

      योजना के तहत किए जा रहे बदलावों में जो कंपनियाँ 16 साल से कम उम्र के बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने से रोकने में नाकाम रहती हैं, उन पर लगने वाला ज्यादा से ज्यादा जुर्माना $49.5 मिलियन यानी ₹322.27 करोड़ से दोगुना होकर $99 मिलियन यानी लगभग ₹644.5 करोड़ से ₹653.4 करोड़ के बीच हो जाएगा।

      क्यों सरकार कानूनी पाबंदी को सख्त कर रही है?

      जानकारी के मुताबिक, 16 साल से कम उम्र के 85 प्रतिशत से ज्यादा टीनएजर्स ने उन सोशल मीडिया ऐप्स का इस्तेमाल जारी रखा, जबकि उनमें से दो-तिहाई ने बताया कि उन्हें उम्र की जाँच की गई थी। 16 साल से कम उम्र के लगभग 54 से 68 प्रतिशत बच्चों ने अपने अकाउंट्स का इस्तेमाल जारी रखा। दरअसल ऑस्ट्रेलियाई टीनएजर्स को सेल्फ डिक्लियर यानी खुद अपनी उम्र बताने का विकल्प मौजूद था। इस विकल्प की कई देशों ने आलोचना की है, क्योंकि यह तरीका बहुत असरदार नहीं है।

      इसके साथ ही, स्टडी में यह भी पता चला कि16 साल से कम उम्र के टीनएजर्स ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल जारी रखने के लिए दूसरे तरीके अपनाए। लगभग 15 से 19 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उन्होंने प्लेटफॉर्म्स तक पहुँचने के लिए नकली अकाउंट्स का इस्तेमाल किया, जबकि 9 से 29 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि वे किसी और के अकाउंट का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया पर गए। लगभग 11 प्रतिशत टीनएजर्स ने कहा कि उन्होंने पाबंदियों से बचने के लिए प्राइवेट ब्राउजर्स का इस्तेमाल किया। बहुत कम टीनएजर्स ने VPN का इस्तेमाल करने की बात कही।

      कुल मिलाकर, स्टडी में पाया गया कि कानून लागू होने के बाद 12 से 13 साल के बच्चों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल वैसा ही रहा। 14 से 15 साल के बच्चों में इसमें कमी आई, लेकिन 16 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में यह बढ़ा।

      ऑस्ट्रेलिया पहले ही 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सबसे कड़े प्रतिबंध लागू करने वाले देशों में शामिल है। अब सरकार का उद्देश्य केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि टेक कंपनियाँ वास्तव में उसका पालन करें।

      यदि ये संशोधन संसद से पारित हो जाते हैं, तो ऑस्ट्रेलिया दुनिया में सोशल मीडिया कंपनियों पर आयु सत्यापन और बाल सुरक्षा को लेकर सबसे सख्त नियामक व्यवस्था रखने वाले देशों में और मजबूत स्थिति में पहुँच जाएगा।

      ऑस्ट्रेलिया में पारित 2024 के कानून में क्या है ?

      ऑस्ट्रेलिया ने 2024 में दुनिया के सबसे कड़े सोशल मीडिया कानूनों में से एक पारित किया था। इसके तहत 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट रखना प्रतिबंधित होगा। यह नियम दिसंबर 2026 से पूरी तरह लागू होना है। कानून का उद्देश्य बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाना है।

      इस कानून की खास बात यह है कि इसकी जिम्मेदारी बच्चों या उनके माता-पिता पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों पर डाली गई है यानी यदि कोई 16 साल से कम उम्र का बच्चा फेसबुक या टिकटॉक पर अकाउंट बना लेता है, तो जिम्मेदारी उस बच्चे की नहीं बल्कि उस प्लेटफॉर्म की होगी जिसने उसे अकाउंट बनाने दिया।

      सरकार का मानना है कि टेक कंपनियाँ केवल औपचारिक दावे कर रही हैं, लेकिन प्रभावी एज वेरिफिकेशन लागू नहीं कर रही हैं। सरकार तीन बड़े बदलाव करने जा रही है। सबसे पहले सोशल मीडिया कंपनियों पर जुर्माना दोगुना करने जा रही है। सरकार चाहती है कि इतना बड़ा आर्थिक दंड कंपनियों को नियमों का पालन करने के लिए मजबूर करे। इसकी सुरक्षा के लिए ई-सेफ्टी कमिश्नर को अधिक अधिकार दिए जा रहे हैं।

      अभी तक उनके पास कंपनियों से जवाब माँगने के पर्याप्त कानूनी अधिकार नहीं हैं। नए संशोधन के बाद वह कंपनियों से लिखित प्रमाण माँग सकेंगी। पूछ सकेंगी कि आयु जाँच कैसे की जा रही है? किस तकनीक का उपयोग हो रहा है? कितने नाबालिगों के अकाउंट रोके गए? किन मामलों में कार्रवाई की गई?

      यदि कंपनी जानकारी नहीं देती या गलत जानकारी देती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसके अलावा तीसरी कंपनियों को भी जवाबदेह बनाया जा रहा है। दरअसल कई सोशल मीडिया कंपनियाँ खुद उम्र की जाँच नहीं करतीं हैं। वे इसके लिए दूसरी टेक कंपनियों यानी थर्ड पार्टी की सेवाएँ लेती हैं। कानून को सख्त किए जाने के बाद सरकार इन कंपनियों से भी पूछताछ कर सकेगी यानी यदि कोई एजेंसी उम्र जांच की तकनीक उपलब्ध करा रही है, तो उसे भी रिकॉर्ड और जानकारी देनी होगी।

      सरकार क्यों कर रही कानून को सख्त

      ऑस्ट्रेलियन सरकार का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के बीच सोशल मीडिया के कारण कई गंभीर समस्याएँ बढ़ी हैं। बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य खराब हुआ है। डिप्रेशन, एंग्जायटी, अकेलापन, आत्मसम्मान में कमी आ रही है। बच्चों के साइबर बुलिंग का खतरा काफी बढ़ गया है। बच्चों को ऑनलाइन गाली, धमकी, ट्रॉलिंग जैसे दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
      बच्चों के यौन शोषण का खतरा बढ़ा है। सरकार का कहना है कि अपराधी सोशल मीडिया के जरिए बच्चों से संपर्क करते हैं और बच्चों को अपने झाँसे में लेकर शिकार बनाते हैं। इन्हें रोकना जरूरी है।

      बच्चों में एल्गोरिदम की लत पड़ने का खतरा है। सरकार का आरोप है कि सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिदम बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं। इससे पढ़ाई प्रभावित होती है, नींद कम होती है, स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ जाता है और उनका शारीरिक विकास भी प्रभावित होता है।

      हालाँकि, अधिकांश टेक कंपनियाँ कहती हैं कि बच्चों की सुरक्षा उनकी भी प्राथमिकता है। वे पहले से सुरक्षा उपाय लागू कर रही हैं, लेकिन एज वेरिफिकेशन बहुत बड़ा सवाल है क्योंकि 100% सही पहचान करना तकनीकी रूप से आसान नहीं है। उनका मानना है कि बहुत सख्त पहचान प्रणाली से सभी यूजर्स की प्राइवेसी खतरे में पड़ सकती है।

      फ्रांस ने भी बच्चों के लिए अभिभावकों की अनुमति संबंधी नियम बनाए हैं। ब्रिटेन में ऑनलाइन सेफ्टी कानून के तहत प्लेटफॉर्म पर नई जिम्मेदारियाँ डाली गई हैं। अमेरिका के एक साथ तो नहीं लेकिन कई राज्यों ने एज वेरिफिकेश और अभिभावक की सहमति से जुड़े अलग-अलग कानून बनाए गए हैं। लेकिन 16 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला प्रमुख देश है।

      यदि प्रस्तावित संशोधन संसद से पारित हो जाते हैं, तो दिसंबर 2026 से सोशल मीडिया कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उन्होंने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म पर आने से रोकने के लिए प्रभावी तकनीकी और प्रशासनिक उपाय किए हैं। ऐसा न करने पर उन्हें 99 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना, जाँच और दूसरे कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल ऑस्ट्रेलिया का उद्देश्य केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि उसके वास्तविक अनुपालन को सुनिश्चित करना है, जो दुनिया के हर देश के बच्चों की पहली समस्या बन चुकी है।

      ‘मैं 15000 लोगों को मारना चाहता था’: पढ़ें- कौन है फैय्याज प्रेमजी जो ‘इम्युनिटी बूस्टर’ बताकर बाँट रहा था जहरीले कैप्सूल, कितना खतरनाक होता है ‘जिंक फॉस्फाइड’

      मुंबई पुलिस ने मुहर्रम जुलूस के दौरान जहरीले कैप्सूल बांटने वाले फय्याज प्रेमजी ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है और पुलिसिया पूछताछ में बड़े खुलासे किए हैं। न्यूज 18 ने पुलिसिया सूत्रों के हवाले से बताया है कि उसका टारगेट जुलूस में शामिल कम से कम 15 हजार लोगों को मारना था। शुक्रवार को मुहर्रम के आशुरा जुलूस के दौरान उसने पेन किलर और इम्यूनिटी बढ़ाने के नाम पर कैप्सूल्स बांटे थे।

      दरअसल यह जहरीला जिंक फॉस्फाइड था, जिसे खाने के बाद करीब 11 लोगों की तबियत बिगड़ गई। पुलिस को जानकारी मिलते ही आरोपित फय्याज प्रेमजी को गिरफ्तार किया गया। शनिवार को उसे कोर्ट में पेश किया गया और फिलहाल वह पुलिस की दो दिन की रिमांड में है।

      जुलूस में शामिल 15 हजार लोगों को मारने का टारगेट

      जानकारी के मुताबिक, फय्याज प्रेमजी मुहर्रम के जुलूस में शामिल लोगों को जिंक फॉस्फाइड खिलाकर मारना चाहता था। इस कैप्सूल्स को उसने ‘दर्द की दवा’ और ‘इम्यूनिटी बूस्टर डोज’ बताया और महिलाओं को देने लगा। ये कैप्सूल्स अधिक से अधिक हाथों में पहुँच पाए, इसके लिए उसने कैप्सूल्स को ऊपर उछाला। उसके पास से 14900 कैप्सूल्स बरामद किए गए हैं।

      इस दौरान एक व्यक्ति ने उसे खाया और उसकी तबियत बिगड़ने लगी। उसे लगातार उल्टियाँ हो रही थी और पेट में ऐठन के साथ तेज दर्द था। डीसीपी जयंत मीणा के मुताबिक, नजदीक के अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया तो डॉक्टर को मामला संदिग्ध लगा। उसने मरीज से पूछा तो उसने कैप्सूल खाने की बात बताई। डॉक्टर ने पुलिस को जानकारी दी और अलर्ट किया और पुलिस ने घेराबंदी कर फैय्याज प्रेमजी को पकड़ा।

      फय्याज शिया समुदाय का बताया जा रहा है, लेकिन वह शियाओं के इस विशाल जुलूस को क्यों टारगेट कर रहा था, इसको लेकर पुलिस पूछताछ कर रही है। मुंबई में मुहर्रम के मौके पर जेजे फ्लाईओवर जंक्शन से शुरू हो कर आरामबाग कब्रिस्ताशियाओं का जुलूस निकलता है, जिसमें देश विदेश के लोग शामिल होते हैं। लेकिन फैय्याज मातम में शामिल लोगों को टारगेट कर रहा था और शारीरिक दर्द से परेशान लोगों को दर्द से राहत के नाम पर ये जहरीला कैप्सूल मुफ्त दे रहा था।

      इस दौरान बताया जा रहा है कि 11 लोगों ने ये कैप्सूल खाई थी। इसके बाद इनकी तबियत तेजी से खराब होने लगी और जुलूस से ही इन्हें अस्पताल ले जाया गया। इनमें तुरंत इलाज मिल गया और इनकी जान बच गई।

      जानकारों के मुताबिक, लोगों की तबियत खराब होता देख एक महिला को फय्याज पर शक हुआ। उसने इस कैप्सूल को खोला और उसे अजीब सा पाउडर मिला, तब उसने पुलिस को इसकी जानकारी दी।

      कहाँ से खरीदा 50 किलो जहरीला जिंक फॉस्फाइड

      पुलिस के मुताबिक, उसने पूछताछ में माना है कि वह जूलूस में शामिल लोगों को मारना चाहता था। उसने ऑनलाइन 40000 खाली कैप्सूल्स और 50 किलो जिंक फॉस्फाइड ऑर्डर किया था। जिंक फॉस्फाइड चूहों को मारने की दवा के तौर पर घरों में भी इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा ये खतरनाक कीटनाशक है। इसे खेतों में भी इस्तेमाल किया जाता है।

      आरोपित फय्याज प्रेमजी पुणे से कुछ दिनों पहले मुंबई आया था। पहले वह इधर उधर घूमा और दक्षिण मुंबई के एक होटल में ठहरा यहीं से उसने कैप्सूल की डिलीवरी दी थी।

      कौन है फैय्याज प्रेमजी

      पुलिस की जाँच में पता चला है कि फैयाज प्रेमजी शिया मुस्लिम है। वह बीबीए कर चुका है। वह पुणे में अपने अब्बू का पेंट कंपनी संभालता है। उसका निकाह हो चुका है, लेकिन अपनी बीवी से अलग रहता है। उसकी अम्मी और बहन ईरान में रहते हैं। वह 2019 के बाद कई बार ईरान और इराक जा चुका है। पिछले साल भी वह दो बार ईरान गया था। DCP जयंत मीणा के अनुसार, उसने स्पष्ट रूप से जुलूस को टारगेट करने और लोगों को नुकसान पहुँचाने की बात कही।

      जिंक फॉस्फाइड क्या होता है

      जिंक फॉस्फाइड एक जहरीला रासायनिक पदार्थ है। इसका इस्तेमाल चूहों और कीड़े मकोड़ों को मारने के खेत-खलिहानों में किया जाता है। पेट में जाने के बाद यह ‘फॉस्फीन गैस’ बनाता है, जिससे शरीर के अँग काम करना बंद करने लगते हैं। यह गैस हृदय, फेफड़े, लीवर, किडनी और दिमाग को निस्क्रिय करने लगता है। इसका कोई एंटीडोट मौजूद नहीं है। लेकिन तुरंत अस्पताल में ले जाने पर मरीज को उसके असर ने निजात दिलाई जा सकती है। देर होने पर ये पूरे शरीर में फैल जाता है, फिर मरीज को बचाना काफी मुश्किल हो जाता है।

      एक रात… चार कहानियां: फ्रांस की हैट्रिक, स्पेन की जीत और काबो वर्दे का चमत्कार

      गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने One Hundred Years of Solitude में लिखा था, “There is always something left to love.”

      शायद यही बात फुटबॉल पर सबसे ज़्यादा लागू होती है। क्योंकि हर विश्व कप में कुछ सपने टूटते हैं, कुछ राष्ट्र इतिहास लिखते हैं, कुछ खिलाड़ी अमर हो जाते हैं और कुछ कहानियाँ ऐसी जन्म लेती हैं जिन्हें स्कोरलाइन से नहीं, भावनाओं से याद रखा जाता है। यह खेल केवल नब्बे मिनट का नहीं होता। यह करोड़ों लोगों की उम्मीदों, पीढ़ियों की तपस्या और एक पूरे राष्ट्र की पहचान का उत्सव होता है। इसीलिए विश्व कप का हर दिन किसी महाकाव्य के नए अध्याय जैसा लगता है।

      अब फीफा विश्व कप अपने उस पड़ाव पर पहुंच चुका था, जहां हर बीतते दिन के साथ कुछ सपने हमेशा के लिए टूटने वाले थे, तो कुछ कहानियां अमर होने जा रही थीं। जैसे-जैसे टूर्नामेंट आगे बढ़ रहा था, कई देशों को अपना सामान समेटकर वतन लौटना पड़ रहा था, जबकि कुछ टीमें इतिहास की नई इबारत लिखने से बस एक कदम दूर थीं। यही विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है; यहां एक टीम की जीत, किसी दूसरी टीम के सपनों की आखिरी शाम भी होती है।

      जहाँ एक ओर फ्रांस जैसी दिग्गज टीम ने अपनी ताक़त का शानदार प्रदर्शन किया, वहीं अटलांटिक महासागर के बीच बसे एक छोटे से द्वीप-समूह काबो वर्दे ने पूरी दुनिया को याद दिला दिया कि फुटबॉल में चमत्कार अभी मरे नहीं हैं।

      जैसे-जैसे फीफा विश्व कप अपने निर्णायक दौर की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कई देशों की यात्रा समाप्त होती जा रही है। दक्षिण कोरिया, कुराकाओ, स्वीडन और कांगो जैसी टीमों ने आख़िरी मिनट तक संघर्ष किया। वहीं तुर्की जैसी टीमों को अच्छा फुटबॉल खेलने के बावजूद उम्मीद से पहले टूर्नामेंट छोड़ना पड़ा।
      लेकिन एक बात तय है; इन कुछ हफ़्तों में हर टीम ने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का सम्मान और स्नेह अर्जित किया।

      क्या आपने हैती को खेलते देखा?

      विश्व कप से बाहर होने के बावजूद उन्होंने ऐसा निडर और आकर्षक फुटबॉल खेला कि हर तटस्थ दर्शक उनका प्रशंसक बन गया। ब्राज़ील, मोरक्को और स्कॉटलैंड जैसी मज़बूत टीमों वाले कठिन ग्रुप में भी उन्होंने अपने स्वाभाविक खेल से किसी के सामने घुटने नहीं टेके। विशेषकर एटलस लायंस के विरुद्ध उनका मुकाबला लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
      और यही तो विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

      कई देशों के लिए इस मंच तक पहुँचना ही एक सपना होता है।

      दूसरी ओर इटली जैसा देश है, जहाँ फुटबॉल केवल खेल नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। कभी अवसर मिले तो नेपल्स की गलियों में जाइए या वहाँ के फुटबॉल इतिहास को पढ़िए। महसूस होगा कि यह खेल वहाँ लोगों की धड़कनों में बसता है। चार बार का विश्व विजेता इटली 2018 और 2022 के बाद 2026 विश्व कप के लिए भी क्वालिफाई नहीं कर सका, जिससे वह लगातार तीसरी बार फुटबॉल के सबसे बड़े मंच से बाहर रह गया। इन कटु अनुभवों के बावजूद भी यह इस खेल की सुंदरता है कि यह किसी महान परंपरा को हमेशा के लिए खत्म नहीं होने देता। और इसी वजह से हैती, काबो वर्दे और ऐसे तमाम छोटे देशों को इस मंच पर बेख़ौफ़ खेलते देखना मन को एक अलग ही संतोष देता है।

      फ्रांस बनाम नॉर्वे | डेम्बेले का तूफ़ान

      अब बात करते हैं आज के पहले मुकाबले की, जो बोस्टन स्टेडियम में ग्रुप I के अंतर्गत फ्रांस और नॉर्वे के बीच खेला गया। दोनों टीमें अपने शुरुआती दोनों मुकाबले जीतकर पहले ही नॉकआउट चरण में जगह बना चुकी थीं। ऐसे में दोनों कोचों ने जोखिम लेने के बजाय अपने कई प्रमुख खिलाड़ियों को आराम दिया और बेंच स्ट्रेंथ को मौका दिया।

      लेकिन फ्रांस की बेंच भी आखिर फ्रांस की ही बेंच थी। मैच की शुरुआती सीटी बजते ही फ्रेंच टीम ने गेंद पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। किलियन एमबाप्पे, उस्मान डेम्बेले, देज़िरे दोऊ और माइकल ओलिसे लगातार नॉर्वे के गोलपोस्ट पर हमले बोल रहे थे। शुरुआती बीस मिनट के भीतर ही नॉर्वे के गोलकीपर एगिल सेल्विक को कई कठिन बचाव करने पड़े।

      लेकिन दबाव कब तक झेला जाता?

      बीस मिनट पूरे होने से पहले ही उस्मान डेम्बेले ने दो शानदार गोल दागकर फ्रांस को 2-0 की बढ़त दिला दी। दोनों गोल लगभग किसी कलाकार की पेंटिंग जैसे थे।

      दाहिने किनारे से गेंद लेकर भीतर की ओर कट करना, डिफेंडर को पीछे छोड़ना और फिर गेंद को शानदार कर्ल के साथ दूर वाले कॉर्नर में पहुँचा देना, ऐसे गोल किसी भी राइट विंगर का सपना होते हैं। दोनों बार सेल्विक ने पूरा प्रयास किया, लेकिन गेंद केवल उनकी निगाहों के सामने से निकलती हुई जाल में जा समाई।

      हालाँकि नॉर्वे ने भी हार नहीं मानी।

      डेम्बेले के दूसरे गोल के कुछ ही क्षण बाद क्रिस्टोफ़र ऑसगार्ड ने शानदार व्यक्तिगत प्रयास करते हुए चार फ्रांसीसी खिलाड़ियों को छकाया और माइक मैन्याँ को कोई मौका दिए बिना गेंद गोलपोस्ट में पहुँचा दी। स्कोर 2-1 हो चुका था और स्टेडियम में मौजूद नॉर्वे के समर्थक अपने पारंपरिक ‘वाइकिंग क्लैप’ से पूरी टीम का उत्साह बढ़ाने लगे।

      लेकिन फ्रांस की आंधी अभी थमी नहीं थी।

      32वें मिनट में एक बार फिर डेम्बेले ने लगभग उसी अंदाज़ में अपना तीसरा गोल दाग दिया। यह केवल हैट्रिक नहीं थी, बल्कि तकनीक, गति और आत्मविश्वास का अद्भुत प्रदर्शन था।

      इस हैट्रिक के साथ डेम्बेले 2026 विश्व कप में लियोनेल मेसी और जोनाथन डेविड के बाद हैट्रिक लगाने वाले तीसरे खिलाड़ी बने। साथ ही यह विश्व कप इतिहास के सबसे यादगार पहले हाफ़ प्रदर्शनों में से एक बन गया।

      पहले हाफ़ की समाप्ति तक फ्रांस 3-1 से आगे था।

      दूसरे हाफ़ में भी फ्रांस ने अपना दबदबा बनाए रखा। इस बार देज़िरे दोऊ ने शानदार फिनिश के साथ टीम का चौथा गोल दाग दिया और मुकाबला पूरी तरह फ्रांस की मुट्ठी में चला गया।

      अंतिम सीटी बजते ही स्कोरबोर्ड पर 4-1 चमक रहा था।

      तीनों मुकाबले जीतकर फ्रांस ने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया और अब अगले दौर में उसका सामना स्वीडन से होगा। वहीं नॉर्वे भी दूसरे स्थान पर रहते हुए नॉकआउट चरण में पहुँच गया, जहाँ उसकी टक्कर आइवरी कोस्ट से होगी।

      सेनेगल बनाम इराक | एक रेड कार्ड जिसने मैच की दिशा बदल दी

      उधर, टोरंटो में इसी ग्रुप के दूसरे मुकाबले में अफ्रीका की मजबूत टीम सेनेगल का सामना इराक से था। दोनों टीमों के लिए यह मुकाबला प्रतिष्ठा के साथ-साथ उम्मीदों की आख़िरी डोर भी था। शुरुआती दो मैचों में निराशाजनक प्रदर्शन के कारण दोनों लगभग टूर्नामेंट से बाहर मानी जा रही थीं, लेकिन फुटबॉल में अंतिम सीटी बजने से पहले कोई कहानी पूरी नहीं होती।

      सेनेगल ने शुरुआत से ही आक्रामक तेवर अपनाए।

      मैच के चौथे ही मिनट में मिले कॉर्नर पर हबीब दियारा ने शानदार हेडर लगाकर गेंद को सीधे जाल में पहुँचा दिया। शुरुआती बढ़त ने सेनेगल का आत्मविश्वास और बढ़ा दिया, जबकि इराक पर दबाव साफ़ दिखाई देने लगा। लेकिन असली मोड़ आया तेरहवें मिनट में।

      इराकी डिफेंडर रेबिन सुलाका ने एक बेहद लापरवाह और खतरनाक टैकल कर दिया। रेफरी ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें सीधे रेड कार्ड दिखाया। अब इराक को लगभग अस्सी मिनट तक दस खिलाड़ियों के साथ खेलना था। किसी भी टीम के लिए यह किसी पहाड़ चढ़ने जैसा कठिन काम होता है।

      इसके बावजूद इराक ने पहले हाफ़ में अनुशासित रक्षण का परिचय दिया। दस खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद उन्होंने सेनेगल को लगातार गोल करने से रोके रखा। पहला हाफ़ समाप्त होने तक स्कोर 1-0 ही था और इराक अभी भी मुकाबले में बना हुआ था।

      दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही सेनेगल के कोच ने एक साथ चार बदलाव किए। यही फैसला मैच का निर्णायक क्षण साबित हुआ।

      नई ऊर्जा के साथ मैदान में उतरी सेनेगल की टीम ने मानो आक्रमण की रफ्तार कई गुना बढ़ा दी। अगले पच्चीस मिनट के भीतर उन्होंने लगातार तीन गोल दागकर स्कोर 4-0 कर दिया। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित किया पापे गुएये ने, जिन्होंने दो बेहतरीन गोल किए। उनकी टाइमिंग, मूवमेंट और फिनिशिंग ने इराकी रक्षा पंक्ति को पूरी तरह बिखेर दिया। दस खिलाड़ियों के साथ संघर्ष कर रही इराकी टीम अब मानसिक रूप से भी टूटती दिखाई दे रही थी।
      फिर भी सेनेगल यहीं नहीं रुका।

      उन्होंने आख़िरी मिनट तक वही तीव्रता बनाए रखी और लगातार इराकी गोलपोस्ट पर हमले करते रहे। मैच समाप्त होने से पहले उन्होंने एक और गोल जोड़ दिया और अंतिम स्कोर 5-0 पर जा पहुँचा। यह जीत केवल तीन अंक भर नहीं थी। यह सेनेगल की आक्रामक क्षमता का भी प्रदर्शन थी।

      हालाँकि ग्रुप की दूसरी भिड़ंत में फ्रांस की जीत के कारण फ्रांस और नॉर्वे ने सीधे अगले दौर में जगह बना ली। नॉर्वे अब राउंड ऑफ़ 32 में आइवरी कोस्ट से भिड़ेगा, जबकि सेनेगल की उम्मीदें अब दूसरे ग्रुपों के परिणामों पर टिकी थीं। अगले चौबीस घंटों में तय होना था कि उनका सफ़र यहीं समाप्त होगा या अभी कहानी में एक और मोड़ बाकी है।

      स्पेन बनाम उरुग्वे | अनुभव बनाम जिद

      भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े पाँच बजे ग्रुप H के दो मुकाबले शुरू हुए। एक ओर ग्वाडलाहारा में स्पेन का सामना मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे से था। दूसरी ओर, ह्यूस्टन में काबो वर्दे और सऊदी अरब आमने-सामने थे। इन दोनों मैचों पर पूरे ग्रुप की तस्वीर टिकी हुई थी।

      स्पेन और उरुग्वे से एक-एक अंक हासिल कर चुकी काबो वर्दे की टीम इतिहास रचने से केवल एक कदम दूर थी। यदि वह सऊदी अरब से हारने से बच जाती और उधर उरुग्वे स्पेन के खिलाफ जीत दर्ज नहीं कर पाता, तो पहली बार विश्व कप के नॉकआउट चरण में पहुँचने का सपना सच हो जाता।

      दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के सामने भी एक बेहद कठिन लेकिन संभव समीकरण था। अगर वह काबो वर्दे को हरा देता और उरुग्वे स्पेन के खिलाफ़ अंक हासिल कर लेता, तो कहानी पूरी तरह बदल सकती थी। यही गणित दोनों मैदानों पर एक साथ खेला जा रहा था।

      स्पेन ने 4-3-3 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। उरुग्वे के तेज़ और शारीरिक खेल को ध्यान में रखते हुए कोच ने मार्कोस ल्योरेंटे को प्राथमिकता दी, जबकि मिडफ़ील्ड में मिकेल मेरिनो को मौका मिला। यह बदलाव शुरुआत से ही स्पेन के खेल में दिखाई भी दिया।

      मैच की पहली सीटी के साथ उरुग्वे ने अपनी पहचान के अनुरूप बेहद आक्रामक और फिजिकल फुटबॉल खेलना शुरू किया। शुरुआती कुछ मिनटों तक स्पेन दबाव में दिखाई दिया, लेकिन धीरे-धीरे उसने गेंद पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। दोनों टीमें लगातार मौके बना रही थीं, लेकिन दोनों ओर रक्षण भी उतना ही मजबूत था। ऐसा लग रहा था कि पहला हाफ़ बिना गोल के समाप्त होगा।

      लेकिन 42वें मिनट में स्पेन ने वह दरवाज़ा खोल दिया जिसकी उसे तलाश थी।

      दाहिने फ्लैंक से मार्कोस ल्योरेंटे ने सटीक क्रॉस भेजा। बॉक्स के भीतर मौजूद एलेक्स बाएना ने उरुग्वे के दो डिफेंडरों के बीच से शानदार शॉट लगाया। गोलकीपर फर्नांडो मुसलेरा गेंद को रोक तो पाए, लेकिन उसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सके। गेंद उनके हाथों से फिसलती हुई गोललाइन पार कर गई।

      स्पेन ने बढ़त बना ली थी।

      उरुग्वे की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। पहले हाफ़ की समाप्ति से ठीक पहले मैनुएल उगार्ते चोटिल हो गए और उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा। उनकी जगह निकोलस डे ला क्रूज़ को उतारा गया।

      लेकिन क्या यह बदलाव मैच की दिशा बदल पाएगा?

      दूसरा हाफ़: उरुग्वे की आख़िरी जंग

      दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही यह साफ़ हो गया कि उरुग्वे अब खोने के लिए नहीं, लड़ने के लिए मैदान में उतरा है। स्पेन की कोशिश थी कि गेंद को अधिक से अधिक समय अपने कब्ज़े में रखा जाए और खेल की रफ़्तार अपने अनुसार नियंत्रित की जाए। दूसरी ओर उरुग्वे के सामने केवल एक ही रास्ता था, जल्द से जल्द बराबरी का गोल।

      क्योंकि उसी समय ह्यूस्टन में खेले जा रहे दूसरे मुकाबले में काबो वर्दे सत्तर मिनट बीत जाने के बाद भी सऊदी अरब को गोल करने से रोक चुका था। अगर दोनों मैचों के नतीजे ऐसे ही रहते, तो उरुग्वे का विश्व कप अभियान यहीं समाप्त हो जाता।

      यही बेचैनी अब उनके हर आक्रमण में दिखाई देने लगी थी।

      मैक्सिमिलियानो अराउजो लगातार बाएँ छोर से स्पेनिश रक्षा पंक्ति को चुनौती दे रहे थे। उनके क्रॉस और तेज़ रन बार-बार स्पेन के डिफेंडरों की परीक्षा ले रहे थे। दूसरी ओर उनाई सिमोन लगातार एकाग्रता के साथ अपने गोलपोस्ट की रक्षा कर रहे थे। कई मौकों पर उन्होंने शानदार बचाव करते हुए स्पेन की बढ़त बरकरार रखी।

      जैसे-जैसे समय बीतता गया, उरुग्वे की हड़बड़ाहट बढ़ती चली गई।

      आख़िरी बीस मिनटों में मैच पूरी तरह भावनाओं और दबाव का खेल बन चुका था। स्पेन गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहा था, जबकि उरुग्वे हर कीमत पर बराबरी चाहता था।

      इसी बीच स्पेन के पास मैच समाप्त करने का सुनहरा अवसर आया। फेरान टोरेस गोलकीपर के सामने लगभग अकेले थे, लेकिन उनका शॉट उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा और मुसलेरा ने राहत की साँस ली। यह मौका चूकने के बाद भी स्पेन ने संयम नहीं खोया।

      दूसरी ओर उरुग्वे का धैर्य अब जवाब देने लगा था।

      मैच के अंतिम क्षणों में अगुस्तीन कानोबियो ने युवा डिफेंडर पाऊ कुबार्सी पर बेहद ख़तरनाक टैकल कर दिया। रेफरी ने बिना देर किए उन्हें सीधे रेड कार्ड दिखाया। निर्णय से नाराज़ कानोबियो कुछ देर तक रेफरी से बहस करते रहे, लेकिन फैसला बदलने वाला नहीं था।

      अब उरुग्वे की उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं। कुछ ही मिनट बाद अंतिम सीटी बजी और स्पेन ने यह मुकाबला 1-0 से अपने नाम कर लिया। तीनों मैचों में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्पेन ग्रुप में शीर्ष स्थान के साथ अगले दौर में पहुँच गया। उधर, कभी विश्व फुटबॉल की सबसे बड़ी ताक़तों में गिने जाने वाले मार्सेलो बिएल्सा के उरुग्वे का सफ़र एक बार फिर ग्रुप चरण में ही समाप्त हो गया।

      वहीं… एक छोटे-से द्वीप ने इतिहास लिख दिया

      लेकिन उस समय ग्वाडलाहारा से लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर दूर ह्यूस्टन में किसी और कहानी का जन्म हो रहा था। काबो वर्दे के खिलाड़ी अपने मैच के अंतिम क्षणों में बार-बार मोबाइल फोन और स्टेडियम की बड़ी स्क्रीन की ओर देख रहे थे। उनकी निगाहें अब अपने मुकाबले पर नहीं, स्पेन और उरुग्वे के स्कोर पर टिकी थीं।

      जैसे ही ग्वाडलाहारा से अंतिम सीटी बजने की खबर पहुँची, पूरा स्टेडियम मानो भावनाओं से भर उठा। काबो वर्दे ने कर दिखाया था।

      अटलांटिक महासागर के बीच बसे इस छोटे-से द्वीपीय राष्ट्र ने अपने पहले ही फीफा विश्व कप में नॉकआउट चरण में जगह बना ली थी। खिलाड़ी एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे। कोई घुटनों के बल बैठ गया।

      कोई आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। यह केवल एक ड्रॉ नहीं था। यह वर्षों के संघर्ष, सीमित संसाधनों और अनगिनत सपनों की जीत थी।

      कुछ ही क्षण बाद कैमरा काबो वर्दे के अनुभवी गोलकीपर वोजिन्हा पर गया। उनकी आँखें नम थीं। फिर प्रसारण में स्टैंड्स में बैठी उनकी माँ दिखाई दीं, जो खुशी से झूम रही थीं।

      इसके बाद कैमरा सीधे काबो वर्दे की राजधानी प्राइया पहुँचा। सड़कों पर हजारों लोग जश्न मना रहे थे। ढोल बज रहे थे। राष्ट्रीय ध्वज हवा में लहरा रहे थे।

      लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। शायद पूरे देश ने पहली बार महसूस किया कि विश्व फुटबॉल अब केवल बड़े देशों का मंच नहीं रहा। मैदान पर खिलाड़ी अपने कोच बूबिस्ता को कंधों पर उठाकर हवा में उछाल रहे थे। बूबिस्ता के चेहरे पर वर्षों की मेहनत का संतोष साफ़ दिखाई दे रहा था।

      कहा जाता है कि बचपन में उन्होंने अपने गाँव में एक छोटे-से टेलीविज़न पर डिएगो माराडोना और लोथार मथायस को खेलते देखा था। वहीं से उन्होंने एक दिन अपने देश को विश्व कप तक पहुँचाने का सपना देखा।

      वर्षों बाद वही सपना आज हक़ीक़त बन चुका था। यह विश्व कप के लिए काबो वर्दे का सातवाँ क्वालिफिकेशन प्रयास था। पहली बार वे सफल हुए। और पहली ही बार में उन्होंने नॉकआउट चरण में जगह बनाकर इतिहास रच दिया।

      फुटबॉल बार-बार हमें यही सिखाता है; कभी-कभी चमत्कार भी मेहनत का दूसरा नाम होते हैं। लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

      अब अगले दौर में काबो वर्दे के सामने विश्व विजेता अर्जेंटीना थी। मियामी में एक ओर होंगे लियोनेल आंद्रेस मेसी.. दूसरी ओर होंगे वोजिन्हा। एक तरफ़ विश्व फुटबॉल का सबसे बड़ा सितारा। दूसरी तरफ़ एक ऐसे छोटे देश का सपना, जिसने दुनिया को यकीन दिलाया कि साहस का कोई आकार नहीं होता।

      क्या काबो वर्दे एक और उलटफेर कर पाएगा? या फिर अर्जेंटीना की ताक़त इस खूबसूरत कहानी का अंत लिख देगी? इन सवालों का जवाब हमें अगले दौर में मिलेगा।

      कहीं लहराई तलवारें, कहीं चाकू गोदकर ले ली जान तो कहीं AK-47 दिखा फैलाई दहशत: मुहर्रम पर कई राज्यों में इस्लामी कट्टरपंथियों ने की हिंसा, जानें कुछ मामले

      देश के अलग-अलग हिस्सों से मुहर्रम के दौरान विवाद, झड़प और हिंसा की कई घटनाएँ सामने आई हैं। कहीं जुलूस के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी आपस में ही लड़ पड़े और जान लेने तक पर उतर आए तो कहीं उपद्रव शांत करने पहुँचे सुरक्षाकर्मियों को भी इनकी हिंसा का सामना करना पड़ा।

      इस्लामी कट्टरपंथी कहीं तलवार लहराते दिखे तो कहीं से एके47 लहराने का वीडियो सामने आया। हिंदू त्योहार तो इनके निशाने पर रहते ही है, अपने कथित पाक त्योहारों पर भी इनकी हिंसात्मक प्रवृत्ति सामने आ ही जाती है। ऑपइंडिया ऐसी ही सारी घटनाओं को एक साथ संकलित कर रहा है।

      बिहार के समस्तीपुर में मुहर्रम पर हिंसा, युवक की चाकू गोदकर हत्या, पुलिस पर भी लाठियों से हमला

      बिहार के समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर थाना क्षेत्र में मुहर्रम जुलूस के दौरान एक युवक की चाकू मारकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया। घटना कल्याणपुर थाना क्षेत्र के गोपालपुर भुट्टा चौक की बताई जा रही है, जहाँ मोहर्रम के अवसर पर ताजिया जुलूस निकाला जा रहा था।

      मृतक की पहचान 22 वर्षीय जावेद के रूप में हुई है। जुलूस के दौरान जावेद करतब देख रहा था या उसमें शामिल था, तभी गाँव के ही हैदर नामक युवक ने उस पर चाकू से हमला कर दिया। आरोप है कि हैदर ने सीधे जावेद के सीने पर वार किया और मौके से फरार हो गया।

      घटना के बाद जावेद गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। स्थानीय लोगों और पुलिस की मदद से उसे इलाज के लिए सदर अस्पताल पहुँचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उपचार के दौरान उसे मृत घोषित कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि आरोपित पहले से आपराधिक प्रवृत्ति का है और उसकी जल्द गिरफ्तारी होनी चाहिए।

      मामले में सदर DSP-2 संजय कुमार ने बताया कि आरोपित की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी जारी है।

      दूसरी घटना मथुरापुर थाना क्षेत्र के रामनगर सारी गाँव में हुई, जहाँ मोहर्रम जुलूस के दौरान दो पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ। कहासुनी जल्द ही हिंसक मारपीट में बदल गई, जिससे इलाके में तनाव फैल गया। झड़प की सूचना पर मौके पर पहुँची पुलिस और प्रशासन की टीम पर उग्र भीड़ ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया।

      हमले में तीन पुलिस जवान घायल हो गए, जिन्हें समस्तीपुर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घायल जवानों का इलाज चल रहा है।

      मुंबई में मुहर्रम जुलूस में जहर से भरे चूहे मारने वाले 14900 कैप्सूल जब्त

      मुंबई में मुहर्रम जुलूस के दौरान जहर मिली चूहे मारने वाली गोलियाँ बाँटने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने पुणे निवासी फैयाज प्रेमजी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उसके पास से 14 हजार से ज्यादा कैप्सूल जब्त किए हैं। घटना जेजे और भायखला इलाके से गुजर रहे मुहर्रम जुलूस के दौरान सामने आई।

      पुलिस पेट्रोलिंग टीम ने एक व्यक्ति को संदिग्ध तरीके से कैप्सूल वितरित करते देखा, जिसके बाद उससे पूछताछ की गई और उसके पास मौजूद सामग्री जब्त कर ली गई। जाँच में बरामद कैप्सूलों को लेकर पुलिस ने दावा किया कि उनमें जिंक फॉस्फाइड मिलाया गया था, जो अत्यधिक जहरीला रसायन माना जाता है।

      DCP जयंत मीणा के अनुसार, आरोपित के पास से 14,900 भरे हुए कैप्सूल मिले हैं। पूछताछ में उसने बताया कि उसने 30 हजार खाली कैप्सूल और लगभग 50 किलो जिंक फॉस्फाइड मंगवाया था और कई दिनों तक उन्हें भरने का काम किया। मामले में एक व्यक्ति के बीमार पड़ने की भी जानकारी सामने आई है, जिसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

      जाँच में यह भी पता चला है कि फैयाज वर्ष 2019 से 2025 के बीच कई बार ईरान और इराक गया था, जबकि पिछले एक साल में ही वह 19 बार ईरान और इराक गया था। पुलिस अब इन यात्राओं के उद्देश्य, डिजिटल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, वित्तीय लेनदेन और संपर्कों की जाँच कर रही है।

      बिहार के मुजफ्फरपुर में मुहर्रम जुलूस के दौरान हिंसक झड़प

      बिहार के मुजफ्फरपुर में भी मुहर्रम जुलूस के दौरान कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति बन गई। मुजफ्फरपुर जिले के हथौड़ी थाना क्षेत्र में निकाली जा रही मातमी जुलूस के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी आपस में भिड़ गए। विवाद की शुरुआत दो महिलाओं के बीच हुई कहासुनी से हुई, जो धीरे-धीरे बढ़कर दो समूहों के बीच मारपीट में बदल गई।

      देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चलने लगे। इस झड़प में कई लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई है। घटना की जानकारी मिलते ही पहले से तैनात पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुँची और किसी तरह स्थिति पर काबू पा लिया गया।

      मामले को लेकर मुजफ्फरपुर के SSP कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि जुलूस के दौरान दो महिलाओं के बीच शुरू हुआ विवाद बाद में दो गुटों के बीच संघर्ष में बदल गया। उन्होंने बताया कि इस घटना में तीन लोग घायल हुए हैं और पूरे मामले की जाँच की जा रही है।

      मुजफ्फरपुर के कई इलाकों में भड़की हिंसा, ड्यूटी पर तैनात ASI मुस्तकिम खान ने भी उठाई तलवार

      मुजफ्फरपुर जिले के हथौड़ी, औराई, पीयर और कांटी थाना क्षेत्रों में अलग-अलग जगहों पर तनाव की स्थिति बनी। पीयर थाना क्षेत्र के बरियारपुर चौक पर ताजिया मिलन के दौरान शुरू हुआ विवाद बाद में हिंसक झड़प में बदल गया और दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चले।

      इसके अलावा कांटी थाना क्षेत्र के दामोदरपुर स्थित सेंट्रल बैंक के पास ताजिया जुलूस के दौरान करतब दिखाने और रास्ता देने को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हो गया, जो बाद में मारपीट तक पहुँच गया। इसी बीच मुजफ्फरपुर से एक और वीडियो सामने आया, जिसमें वर्दी पहने एक पुलिसकर्मी तलवार से करतब दिखाते नजर आए।

      बताया गया कि वीडियो कांटी थाने में तैनात ASI मुस्तकिम खान का है। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उनकी ड्यूटी मुहर्रम जुलूस में लगी थी और उसी दौरान किसी ने वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

      बिहार के भागलपुर में रेलवे स्टेशन पर तलवारें लेकर घुसे कट्टरपंथी, नारेबाजी कर पैदा की दहशत

      बिहार के भागलपुर में मुहर्रम के दौरान रेलवे स्टेशन परिसर में बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों के घुसने का मामला सामने आया है। यहाँ 100 से अधिक कट्टरपंथी हाथों में तलवारें लेकर स्टेशन परिसर में पहुँच गए और सीढ़ियों और प्लेटफॉर्म पर नारेबाजी करते रहे। इस दौरान स्टेशन पर मौजूद यात्रियों में असहजता और डर का माहौल देखने को मिला।

      घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कई यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों पर शस्त्र प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाए हैं तथा कार्रवाई की माँग की है। मामले पर पहले स्टेशन मास्टर अजय ने कहा था कि वीडियो की जाँच की जाएगी।

      इसके बाद रेल प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए मामला दर्ज कर लिया। मालदा रेल मंडल की जनसंपर्क पदाधिकारी रूपा मंडल ने बताया कि वायरल वीडियो सामने आने के बाद रेलवे सुरक्षा बल (RPF) से विस्तृत रिपोर्ट माँगी गई थी। जाँच के आधार पर रेलवे अधिनियम की धारा 147 और 145 के तहत FIR दर्ज की गई है।

      वीडियो में दिख रहे लोगों की पहचान की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

      ‘ले फिर आ गए’ लिखी वैन को क्रेन पर लटकाकर उड़ाया, मोहर्रम के जुलूस में कट्टरपंथियों ने मचाया हुड़दंग

      मध्य प्रदेश के उज्जैन में मंगलवार (23 जून 2026) की रात मोहर्रम के जुलूस के दौरान किए गए एक प्रदर्शन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हंगामा मच गया। वायरल वीडियो में एक टाटा मैजिक वैन को क्रेन की मदद से करीब 40 फीट की ऊँचाई पर लटकाया गया था।

      वैन के ऊपर दो युवक लाल झंडे लहराते दिखाई दिए और कुछ देर बाद वाहन में जोरदार विस्फोट जैसा दृश्य नजर आया। वैन पर ‘ले फिर आ गए’ लिखा हुआ था।

      घटना का वीडियो इंस्टाग्राम अकाउंट ‘परवेज एडिट्स 2.0’ पर भी शेयर किया गया था। वीडियो सामने आने के बाद हरिद्वार के संत स्वामी शिवानंद गिरि और हिंदू संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई। हिंदू जागरण मंच ने जिला प्रशासन से पूछा कि क्या इस तरह के प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी।

      मामले में पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। उज्जैन पुलिस के अनुसार जुलूस की अनुमति थी, लेकिन किसी भी तरह के विस्फोटक इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस ने आयोजक शोएब खान, झंडे लहराने वाले जाहिद खान और तस्लीम खान तथा क्रेन मालिक गोपाल माली के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

      यूपी के देवरिया में मुहर्रम जुलूस के दौरान करतब दिखाते आग की चपेट में आया युवक

      उत्तर प्रदेश के देवरिया में मुहर्रम जुलूस के दौरान करतब दिखाते समय एक युवक आग की चपेट में आकर घायल हो गया। घटना जिला मुख्यालय स्थित मालवीय रोड पर हुई। युवक को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ इलाज के बाद उसकी हालत स्थिर और खतरे से बाहर बताई जा रही है।

      सदर कोतवाली क्षेत्र के बांस देवरिया निवासी सद्दाम खान फाइव स्टार क्लब की ओर से ताजिया जुलूस में शामिल हुआ था। जुलूस के दौरान वह लोहे के एक ड्रम के भीतर बैठकर करतब प्रस्तुत कर रहा था। इसी बीच ड्रम में जल रही आग अचानक भड़क गई और उसके कपड़ों तक पहुँच गई, जिससे वह झुलस गया।

      घटना के बाद मौके पर कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। हालाँकि अखाड़े के सदस्यों और आसपास मौजूद लोगों ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए आग बुझाई और युवक को सुरक्षित बाहर निकाला। समय पर आग पर काबू पा लेने के कारण बड़ा हादसा टल गया।

      इसके बाद सद्दाम खान को तत्काल एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसका इलाज जारी है। क्षेत्राधिकारी नगर संजय रेड्डी ने बताया कि मालवीय रोड पर मुहर्रम जुलूस निकाला जा रहा था। इसी दौरान यह घटना हुई। पुलिस के अनुसार स्थिति नियंत्रण में रही और कोई अन्य अप्रिय घटना नहीं हुई

      यूपी के बरेली में मुहर्रम जुलूस में नोट उड़ाने पर बवाल, चले लाठी-डंडे, 20 घायल

      उत्तर प्रदेश के बरेली में मुहर्रम के जुलूस के दौरान बिथरी क्षेत्र के पदारथपुर गाँव में रुपए उड़ाने को लेकर मुस्लिमों में आपस में ही विवाद हो गया, जो कुछ ही देर में हिंसक झड़प में बदल गया। दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट और लाठी-डंडे चले, जिसमें करीब 15 से 20 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

      हालात बिगड़ते देख पुलिस को हल्का बल प्रयोग कर स्थिति को नियंत्रित करना पड़ा। गाँव में शाम के समय मुहर्रम का जुलूस निकाला जा रहा था और बड़ी संख्या में लोग उसमें शामिल थे। इसी दौरान जुलूस में कुछ लोगों ने रुपए उड़ाने शुरू कर दिए। रुपए उठाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी और धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई।

      इसी बात को लेकर दो पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो बाद में झगड़े में बदल गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने पहले दोनों पक्षों को समझाकर शांत कराने की कोशिश की, लेकिन जब स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती दिखाई दी तो पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया और लाठियाँ फटकारकर भीड़ को हटाया।

      बाद में थाने से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाकर स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित किया गया। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, झगड़े और माहौल खराब करने में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। इसके लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और चिह्नित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी की जाएगी।

      यूपी के वाराणसी में मुहर्रम जुलूस के दौरान बढ़ा विवाद

      मुहर्रम के मौके पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में नई सड़क–औरंगाबाद मार्ग पर निकाले जा रहे ताजिया जुलूस के दौरान दो गुटों के बीच विवाद की स्थिति बन गई। देखते ही देखते बड़ी संख्या में मुस्लिम मौके पर जमा हो गए, जिससे कुछ समय के लिए क्षेत्र में अफरातफरी और तनाव जैसा माहौल बन गया।

      घटना चेतगंज और लक्सा थाना क्षेत्रों की सीमा पर होने के कारण दोनों थानों की पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और स्थिति को संभालने में जुट गई। पुलिस अधिकारियों ने लोगों से संयम बरतने और जुलूस को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने की अपील की। हालांकि कुछ लोगों के हंगामे के कारण हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।

      इसके बाद पुलिस ने विवाद कर रहे लोगों को मौके से हटाया और भीड़ को नियंत्रित कर स्थिति सामान्य कर दी। हालात शांत होने के बाद ताजिया जुलूस अपने तय मार्ग पर आगे बढ़ गया। घटना में किसी के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं मिली है।

      यूपी के प्रयागराज में मुहर्रम के जुलूस में DJ की टक्कर से टूटा मंदिर का चबूतरा

      उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में मुहर्रम जुलूस के दौरान एक विवाद सामने आया। बहरिया थाना क्षेत्र के नेवादा गाँव में जुलूस के दौरान डीजे वाहन की टक्कर से मंदिर का चबूतरा क्षतिग्रस्त हो गया। घटना के बाद गाँव में कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति बन गई।

      मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ और एहतियात के तौर पर इलाके में पीएसी तैनात कर दी गई ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में स्थिति को नियंत्रित किया गया। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त हुए मंदिर के चबूतरे की मरम्मत भी कराई गई।

      सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियोज मौजूद हैं, जिनमें कट्टरपंथी तलवारें लहराते, उत्पात मचाते, नारेबाजी करते और यहाँ तक की राइफल लहराते भी दिख रहे हैं।

      त्योहार किसी भी समुदाय का हो, रमजान हो, होली हो, रामनवमी हो या मुहर्रम इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा फैलाने की घटनाएँ सामने जरुर आती हैं।

      लड़कियों को फँसाओ, निकाह से पहले प्रेग्नेंट करो और बच्चा ले लो… क्या है ‘जिहाद अल-अकबर’, जिसके जरिए हिंदू महिलाओं के धर्मांतरण की साजिश कर रहे कट्टरपंथी

      राजस्थान के कोटा शहर से धर्मांतरण और महिलाओं के शोषण का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। पुलिस ने बजरंग दल की शिकायत पर मुख्य आरोपित मनीष शर्मा उर्फ मोइन खान को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित के पास से हिंदू लड़कियों और महिलाओं के आपत्तिजनक Video मिले हैं। वह सोशल मीडिया पर ग्रुप चलाकर इस पूरे नेटवर्क को ऑपरेट कर रहा था।

      अब पुलिस और खुफिया एजेंसियों का पूरा फोकस मोइन खान के मोबाइल से मिल रहे नए सुरागों पर है। मोइन के फोन से डिलीट किए गए डेटा और पाकिस्तान से आए 3 सीक्रेट ऑडियो ने हड़कंप मचा दिया है। इस खुलासे के बाद एक खतरनाक एजेंडा सामने आया है, जिसे ‘जिहाद अल अकबर’ का नाम दिया गया है। पुलिस अब इन कड़ियों को सिलसिलेवार तरीके से जोड़ने में जुटी है।

      क्या है ‘जिहाद अल अकबर’ और इसे किसने बनाया है?

      जिहाद अल अकबर‘ सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स के जरिए चलाया जा रहा एक सुनियोजित डिजिटल एजेंडा है। मोइन खान के मोबाइल से मिले सीक्रेट ऑडियो के मुताबिक, इस खतरनाक साजिश को पाकिस्तान में बैठे कट्टरपंथी आकाओं ने तैयार किया है। ऑडियो में पाकिस्तानी शख्स दावा करता है कि वे लोग इस मिशन पर साल 1992 से काम कर रहे हैं।

      जब पाकिस्तान में नया-नया इंटरनेट आया था, तभी से इस ऑनलाइन साजिश का ताना-बाना बुना जा रहा है। इस मिशन को चलाने के लिए पाकिस्तान के हैंडलर्स खुद कभी सीधे सामने नहीं आते हैं। वे भारत में मौजूद अपने स्थानीय एजेंटों को टेलीग्राम, स्नैपचैट और डिस्कॉर्ड जैसे ऐप्स के जरिए गाइड करते हैं। इसके लिए बकायदा सीक्रेट ग्रुप और चैनल बनाए गए हैं, जहाँ से पूरा नेटवर्क चलता है।

      क्यों बनाया गया यह मिशन और क्या है इसका असली मकसद?

      इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत में बड़े पैमाने पर हिंदू महिलाओं का धर्म परिवर्तन करवाना और ईशनिंदा करवाना है। पाकिस्तानी हैंडलर्स फेक सोशल मीडिया आईडी का इस्तेमाल करके भारत की आंतरिक सुरक्षा और अखंडता को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। इसके जरिए देश में हिंदुओं के अंदर ही हिंदू धर्म के प्रति नफरत का बीज बोने की कोशिश की जा रही है।

      इसके अलावा, इस साजिश के जरिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे राष्ट्रहित में काम करने वाले संगठनों को भी निशाना बनाने का प्लान था। पाकिस्तानी आका सोशल मीडिया पर ‘इंटरफेथ डाटा’ यानी हिंदू-मुस्लिम से जुड़ा डेटा इकट्ठा करना चाहते हैं। उनका मकसद भारत के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से तोड़ना और देश को आंतरिक रूप से कमजोर करना है।

      स्थानीय लड़कों और कॉलेज के दोस्तों को कैसे किया जा रहा है ट्रेन?

      दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, इस साजिश को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय एजेंटों को अपने ही कॉलेज मेट्स और दोस्तों को जगाने का टास्क दिया जाता है। मोइन के फोन से मिले ऑडियो में पाकिस्तानी हैंडलर्स ‘वकास’ नाम के लड़के को समझाते हैं। वे कहते हैं कि अपने कॉलेज मेट और दोस्त जो मुस्लिम लड़के हैं, उनको जगाओ और उनके साथ गुप्त मीटिंग करो।

      इन लड़कों को भड़काने के लिए सबसे पहले मजहबी बातें दिखाई और समझाई जाती हैं। उन्हें झूठ बोला जाता है कि दूसरे लोग उनके मजहब के साथ क्या गलत कर रहे हैं। फिर उन्हें अपनी सीक्रेट टीम के बारे में बताया जाता है। जब लड़के जोश में आकर साथ चलने को तैयार हो जाते हैं, तब उन्हें धीरे-धीरे और तरीके से आगे का काम करने के लिए ट्रेन किया जाता है।

      शादीशुदा हिंदू महिलाओं को कैसे किया जा रहा है टारगेट?

      इस पूरे एजेंडे के तहत शादीशुदा हिंदू महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को खास तौर पर जाल में फँसाया जाता है। ऑडियो में पाकिस्तानी शख्स कहता है कि उन्हें ऐसी हिंदू लड़कियाँ और महिलाएँ चाहिए, जिनके वीडियो में ‘मंगलसूत्र और माथे का सिंदूर’ साफ दिखाई दे। इन महिलाओं को पहले फेक आईडी के जरिए प्यार के जाल में फँसाया जाता है।

      ग्रुप में चल रहे एजेंडे की सच्चाई को बिना किसी कहानी के सीधे शब्दों में लिखा गया है। इसका मतलब है, ‘किसी हिंदू लड़की या फिर महिला को प्यार में फँसाओ, निकाह से पहले ही प्रेग्नेंट कर दो और 9 महीने बाद बच्चा ले लो। बच्चा पैदा होने के बाद वो मुसलमान बन चुकी होगी।’ इसके बाद महिलाओं से देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ अश्लील वीडियो बनवाकर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है।

      मोइन खान के बारे में अब तक क्या-क्या पता चला है?

      पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपित मनीष शर्मा मूल रूप से हिंदू था, जिसने बाद में धर्म परिवर्तन कर अपना नाम मोइन खान रख लिया था। वह कोटा के विज्ञान नगर का रहने वाला है और केवल 10वीं तक पढ़ा-लिखा है। वह एक दुकान पर काम करता था और साल 2021 में उसकी शादी हुई थी, जिससे उसका एक 4 साल का बच्चा भी है।

      मोइन खान पिछले कई सालों से टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म्स पर पाकिस्तानी संगठनों के संपर्क में था। उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध लगने पर बजरंग दल के हेल्पलाइन नंबर पर शिकायत मिली थी। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने उस पर नजर रखना शुरू किया। जब उसका फोन चेक किया गया, तो उसमें हिंदू धार्मिक प्रतीकों के साथ लड़कियों के हजारों आपत्तिजनक वीडियो और अश्लील कंटेंट बरामद हुए।

      पाकिस्तान से आए सीक्रेट ऑडियो क्लिप्स में और क्या-क्या बातें हैं?

      मोइन खान के मोबाइल से मिले तीन अलग-अलग ऑडियो क्लिप्स ने इस अंतरराष्ट्रीय साजिश की पुष्टि की है। पहले ऑडियो में पाकिस्तानी शख्स कहता है कि हमारा यह काम नया नहीं है और हम साल 1992 से काम कर रहे हैं। दूसरे ऑडियो में वह कहता है कि इनके जहन में यह चीज बिठा दो कि मुस्लिम सुप्रीम है और इनका भगवान कुछ नहीं है।

      तीसरे ऑडियो में पाकिस्तानी हैंडलर भारत में बैठे वकास नाम के लड़के को बिल्कुल सेफ साइड रखने की बात करता है। वह कहता है कि मैं पाकिस्तान में बैठा हूँ, इसलिए तुम कभी सामने मत आना वरना सुरक्षा की दिक्कत हो जाएगी। वह वकास से कहता है कि अगर मैं तुम्हें ग्रुप का एडमिन बना देता, तो RSS के लोग तुम्हारी आईपी आईडी नोट कर तुम्हारे घर पहुँच जाते।

      इस पूरे मामले में अब तक क्या-क्या कानूनी कार्रवाई हुई है?

      बजरंग दल कार्यकर्ता योगेश रेनवाल की शिकायत पर 15 जून 2026 को कोटा के विजयनगर और उद्योग नगर थाने में मामला दर्ज किया गया था। आरोपित मनीष शर्मा उर्फ मोइन खान के खिलाफ आईपीसी की धारा 196(1)(a), 196(1)(b), 299, 352 और आईटी एक्ट की धारा 66, 67, 67A के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेजा गया है। उद्योग नगर थाना सीआई मांगेलाल ने बताया कि आरोपित का मोबाइल फोन फोरेंसिक जाँच (FSL) के लिए भेजा गया है।

      बजरंग दल ने 22 जून को इस पूरे मामले की ऑनलाइन शिकायत केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी है। हिंदू समाज-कोटा ने भी प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर कड़ी कार्रवाई और पूरे नेटवर्क की जाँच की माँग की है। जयपुर में एटीएस ने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी बबीता से खदीजा बनी महिला को पकड़ा था, जिससे जोड़कर भी एजेंसियाँ अलर्ट हैं। मामले को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ और मंत्री मदन दिलावर ने जांच के बाद दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिया है।