केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण आंतरिक खुफिया एजेंसी, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के नए चीफ के रूप में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी महेश दीक्षित की नियुक्ति की है।
यह महत्वपूर्ण निर्णय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) की बैठक में लिया गया। महेश दीक्षित आगामी 1 जुलाई से आधिकारिक तौर पर अपना कार्यभार संभालेंगे।
ACC द्वारा जारी आदेश की प्रति
वह वर्तमान आईबी प्रमुख तपन कुमार डेका का स्थान लेंगे, जो 30 जून को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सरकारी आदेश के अनुसार, महेश दीक्षित कम से कम अगले दो वर्षों तक इस शीर्ष पद पर बने रहेंगे। ये कार्यकाल सरकार के आदेश से आगे भी बढ़ सकता है।
25 जून को उनकी नियुक्ति के आधिकारिक निर्देश जारी होने के बाद से ही यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर वह कौन हैं, खुफिया अभियानों में उनका क्या योगदान रहा है और क्यों उन्हें इतनी संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपी गई है। आइए इन्हीं सवालों का जवाब जानते हैं…
कौन हैं महेश दीक्षित और कैसे रहा उनका सफर
महेश दीक्षित, पहले एक डॉक्टर थे, लेकिन बाद में देशसेवा के लिए उन्होंने पुलिस सेवा का रास्ता चुना। वह 1993 बैच के आंध्र प्रदेश कैडर के एक बेहद सम्मानित और अनुभवी आईपीएस अधिकारी हैं।
उनके पास खुफिया मामलों को बेहद बारीकी से संभालने का, आतंकवाद विरोधी अभियानों को दिशा देने का और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर सूझ-बूझ से कौशल दिखाने का 3 दशक का लंबा अनुभव है। उन्होंने जमीनी स्तर से लेकर मुख्यालयों तक कई जगह और कई पदों पर अपनी सेवाएँ दी हैं।
दीक्षित के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक जम्मू-कश्मीर में सब्सिडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल था। साल 2019 के अगस्त माह में जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, तब वहाँ की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति अत्यंत संवेदनशील थी। उस वक्त में और उससे ठीक पहले, महेश दीक्षित ने खुफिया मोर्चे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने न केवल घाटी में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सटीक और समय पर खुफिया जानकारियाँ जुटाईं, बल्कि विभिन्न सुरक्षा बलों के बीच समन्वय स्थापित कर किसी भी अप्रिय स्थिति को टालने में अपना योगदान दिया था।
The Appointments Committee of the Cabinet (ACC) has approved the appointment of Mahesh Dixit, a 1993-batch IPS officer, as the new Director of the Intelligence Bureau (IB).
He will succeed Tapan Kumar Deka and assume charge for a term of two years or until further orders.… pic.twitter.com/3F1DWlHSJq
इसके बाद वर्ष 2023 में श्रीनगर में आयोजित जी-20 (G-20) टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक के दौरान भी सुरक्षा व्यवस्था की पूरी निगरानी महेश दीक्षित के कंधों पर थी। यह चूँकि जम्मू-कश्मीर में होने वाला एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का बड़ा आयोजन था, इसलिए इसमें की गई सुरक्षा व्यवस्था को देखने के बाद दीक्षित के कार्य की काफी सराहना हुई थी।
इसके अलावा बताया ये भी जा रहा है कि कुछ समय पहले उन्होंने ने एक बड़े ‘सफेदपोश’ आतंकवादी नेटवर्क का पर्दाफाश करने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके चलते भी वो काफी चर्चा के केंद्र में थे। उन्होंने यह कार्रवाई श्रीनगर पुलिस से मिली शुरुआती खुफिया जानकारी के आधार पर की गई थी।
जम्मू-कश्मीर के इस चुनौतीपूर्ण अनुभव के बाद, पिछले वर्ष उन्हें नई दिल्ली स्थित आईबी मुख्यालय में ट्रांसफर किया गया था, जहाँ उन्हें स्पेशल डायरेक्टर (विशेष निदेशक) के पद पर पदोन्नत किया गया, तभी से यह तय माना जा रहा था कि वह देश के अगले खुफिया प्रमुख हो सकते हैं।
किसकी जगह नियुक्त होंगे महेश दीक्षित
बता दें कि महेश दीक्षित, जिन तपन कुमार डेका की जगह पद को संभालेंगे वह डेका 1988 बैच के हिमाचल प्रदेश कैडर हैं। उन्होंने जुलाई 2022 से लगातार आईबी का नेतृत्व किया और सरकार ने उनके बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें दो बार सेवा विस्तार भी दिया।
अपने दो साल के कार्यकाल के दौरान डेका ने पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर लगाम लगाने, आतंकवाद विरोधी ग्रिड को मजबूत करने और विभिन्न राज्यों की पुलिस व केंद्रीय एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया। अब इसी दिशा में आगे महेश दीक्षित भी अपने ढंग से काम करेंगे।
IB क्या करती है काम?
गौरतलब है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) भारत की प्रमुख आंतरिक खुफिया एजेंसी है, जो देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नजर रखती है। इसकी स्थापना 1887 में ब्रिटिश शासन के वक्त भले हुई थी, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसे भारत की केंद्रीय खुफिया एजेंसी के रूप में विकसित किया गया। आज IB, गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है और इसका नेतृत्व डायरेक्टर, इंटेलिजेंस ब्यूरो (DIB) करते हैं।
एजेंसी का मुख्य काम आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद और अन्य सुरक्षा खतरों की जानकारी जुटाना और समय रहते सरकार को सतर्क करना है। इसके अलावा, चुनाव के वक्त, वीआईपी सुरक्षा में, बड़े आयोजनों के दौरान, साइबर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर भी IB लगातार निगरानी रखकर रिपोर्ट देने का काम करती है।
महात्मा फुले वाडा वट पूर्णिमा विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। महाराष्ट्र पुरातत्व विभाग ने नया पत्र जारी करते हुए साफ किया है कि संरक्षित स्मारक घोषित होने से पहले महात्मा फुले वाडा में जो परंपराएँ और धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे, उन्हें आगे भी जारी रखा जाएगा।
इस फैसले के साथ ही श्रद्धालुओं के लिए वाडा परिसर में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा करने का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ दिन पहले हिंदू संगठनों ने पहले जारी आदेश का विरोध करते हुए पारंपरिक पूजा जारी रखने की अनुमति देने की माँग की थी और इस संबंध में एक ज्ञापन भी सौंपा था।
23 जून 2026 को सहायक निदेशक (पुरातत्व), पुणे मंडल द्वारा जारी यह नया पत्र खड़क पुलिस स्टेशन, पुणे के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को संबोधित है।
इसमें मुंबई स्थित पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशक के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि महात्मा फुले वाडा को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने से पहले वहाँ जो परंपराएँ और धार्मिक प्रथाएँ चली आ रही थीं, उन्हें वैसे ही बनाए रखा जाए। साथ ही स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वट पूर्णिमा के अवसर पर सालों से चली आ रही परंपरा जारी रहे और कानून-व्यवस्था भी बनी रहे।
यह नया आदेश विभाग के 2 जून को जारी किए गए पुराने आदेश से बिल्कुल अलग है। उस आदेश में पुलिस तैनात करने की बात कही गई थी ताकि वट पूर्णिमा के दिन महात्मा फुले वाडा परिसर में कोई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित न हो सके।
उस आदेश ने विवाद खड़ा कर दिया था क्योंकि उसमें महात्मा ज्योतिराव फुले के कर्मकांड विरोधी विचारों का हवाला दिया गया था। इसे विवाहित हिंदू महिलाओं को स्मारक परिसर में बरगद के पेड़ की पारंपरिक पूजा करने से रोकने की कोशिश के रूप में देखा गया था।
हिंदू संगठनों के ज्ञापन के बाद बदला फैसला
यह फैसला उस समय सामने आया जब हिंदू जनजागृति समिति ने महात्मा फुले वाडा में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा की अनुमति देने की माँग करते हुए एक ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन श्री हेमंत गोसावी को दिया गया था, जिसमें माँग की गई थी कि महात्मा फुले के वैचारिक दृष्टिकोण का हवाला देकर सालों से चली आ रही हिंदू परंपरा को रोका न जाए।
विवाद तब और बढ़ गया जब हिंदू संगठनों, स्थानीय श्रद्धालुओं और वर्षों से वट पूर्णिमा व्रत करने वाली महिलाओं ने 2 जून के आदेश का विरोध किया। उनका कहना था कि यह पूजा कई सालों से शांतिपूर्ण ढंग से होती रही है और इससे स्मारक को किसी प्रकार का नुकसान होने का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने इसे हिंदू धार्मिक परंपरा में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया।
इस मामले में 2 जून के आदेश के खिलाफ 12 पन्नों की कानूनी आपत्ति याचिका भी दाखिल की गई। याचिका में कहा गया कि विभाग का फैसला किसी संरक्षण संबंधी चिंता या स्मारक को वास्तविक नुकसान के आधार पर नहीं, बल्कि महात्मा फुले की वैचारिक व्याख्या के आधार पर लिया गया।
इसमें यह भी कहा गया कि पुरातत्व विभाग ने प्रभावित महिलाओं को सुने बिना, कोई पूर्व सूचना दिए बिना और किसी पुरातात्विक या संरचनात्मक साक्ष्य के अभाव में यह आदेश जारी कर दिया कि पूजा से स्मारक को नुकसान पहुँचता है।
हिंदू चिंताओं पर संज्ञान लेती दिखी फडणवीस सरकार
इस नए आदेश को महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार द्वारा हिंदू संगठनों की चिंताओं पर संज्ञान लेने के एक और उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। इसे केवल विभागीय यू-टर्न नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि राज्य सरकार हिंदू संगठनों और मंदिरों से जुड़े समूहों द्वारा धार्मिक परंपराओं को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर अपने फैसलों में बदलाव करने को तैयार है।
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश शिंदे ने इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने हिंदुओं की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए महात्मा फुले वाडा में पारंपरिक वट पूर्णिमा पूजा जारी रखने की अनुमति दी है।
उनके अनुसार यह नया आदेश दर्शाता है कि हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं द्वारा लगातार उठाई गई आपत्तियों पर सरकार ने ध्यान दिया है। उन्होंने इसे फडणवीस सरकार द्वारा हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने का एक और उदाहरण बताया।
गौरतलब है कि इसी महीने यह दूसरा मौका है जब हिंदू संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के कड़े विरोध के बाद महाराष्ट्र सरकार ने अपने रुख में नरमी दिखाई है या उसे बदला है।
इससे पहले हिंदू संगठनों के विरोध के बाद देवस्थान भूमि कानून का मसौदा भी किया गया था स्थगित
6 जून 2026 को महाराष्ट्र सरकार ने प्रस्तावित महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन मसौदा 2026 को फिलहाल स्थगित कर दिया था। यह फैसला राज्यभर के हिंदू संगठनों, मंदिर संस्थाओं, ट्रस्टियों और धार्मिक समूहों के तीखे विरोध के बाद लिया गया।
इस मसौदे को 7 मई को सार्वजनिक किया गया था और सरकार ने 5 जून तक आपत्तियाँ और सुझाव माँगे थे। सरकार का कहना था कि इस कानून का उद्देश्य देवस्थान की भूमि की सुरक्षा करना, अतिक्रमण हटाना और मंदिर संपत्तियों को कानूनी संरक्षण देना है।
हालाँकि इस मसौदे को लेकर महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, अष्टविनायक मंदिर समिति, विश्व हिंदू परिषद और अलग-अलग मंदिर ट्रस्टियों समेत कई संस्थाओं ने चिंता जताई थी।
उनका कहना था कि मसौदे के कुछ प्रावधानों से देवस्थान भूमि पर मंदिरों का नियंत्रण कमजोर हो सकता है क्योंकि इससे वहाँ के वर्तमान कब्जाधारियों, खेती करने वालों, पुजारियों, प्रबंधकों और अन्य संबंधित लोगों को अधिकार मिलने की संभावना है।
नागपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने घोषणा की थी कि फिलहाल इस मसौदे को स्थगित किया जा रहा है और आपत्तियों पर सुनवाई 15 अगस्त तक जारी रहेगी।
उन्होंने कहा था कि प्रस्तावित कानून को लेकर कई तरह की गलतफहमियाँ पैदा हो गई हैं और उन्हें दूर करने के लिए व्यापक परामर्श प्रक्रिया आवश्यक है। साथ ही उन्होंने दोहराया कि सरकार का उद्देश्य मंदिरों की जमीन की सुरक्षा करना और उन्हें अतिक्रमण मुक्त बनाना है।
मंदिर संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे अपनी संयुक्त लड़ाई की बड़ी जीत बताया था। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक सुनील घनवट ने इसे मंदिर हितैषी फैसला बताते हुए कहा था कि यह मंदिर ट्रस्टियों और हिंदू संगठनों के सामूहिक प्रयासों की बड़ी सफलता है।
हिंदू संगठनों की आपत्तियों के बाद दूसरी बार बदला गया रुख
इसी पृष्ठभूमि में महात्मा फुले वाडा को लेकर जारी नया आदेश भी हिंदू संगठनों द्वारा महाराष्ट्र सरकार के हिंदू समाज की चिंताओं पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के एक और उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
देवस्थान इनाम कानून के मामले में सरकार ने मंदिर संगठनों और हिंदू कार्यकर्ताओं की आपत्तियों के बाद मसौदा स्थगित कर दिया था। वहीं महात्मा फुले वाडा विवाद में अब पुरातत्व विभाग ने नया आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि स्मारक में पहले से चली आ रही परंपराएँ और धार्मिक प्रथाएँ जारी रहेंगी।
यह फैसला हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं द्वारा वट पूर्णिमा पूजा पर रोक लगाने के प्रयास का विरोध किए जाने के बाद सामने आया है।
बंगाल के दक्षिणी कोलकाता के तारातला इलाके में एक निर्माणाधीन गोदाम ढहने से अब तक 11 की मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मलबे को हटाने और फँसे हुए लोगों को ढूँढने के लिए सेना की एडवांस ‘ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार’ (GPR) प्रणाली, NDRF और स्थानीय प्रशासन युद्ध स्तर पर जुटे हुए हैं।
यह दर्दनाक हादसा कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि राज्य की पूर्व TMC सरकार के कार्यकाल में फले-फूले ‘सिंडिकेट राज’ और भ्रष्टाचार का सीधा नतीजा है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस हादसे को ‘पिछली सरकार के पापों का फल’ करार दिया है।
CM शुभेंदु ने साफ कहा कि पूर्व TMC सरकार के ढीले रवैये, घूसखोरी और बिना किसी जाँच-परख के अवैध नक्शों को पास करने की आदत की वजह से आज फिर मासूमों की जान गई है। इस भीषण हादसे के बाद शुभेंदु सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए पिछली सरकार के समय स्वीकृत हुए सभी निर्माणाधीन व्यावसायिक और रिहायशी प्रोजेक्ट्स के काम पर 31 जुलाई तक तत्काल रोक लगा दी है।
तारातला का जानलेवा सच: बिना सॉइल टेस्ट के पास हुआ था नक्शा
कोलकाता के तारातला में श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट की पट्टे पर दी गई भूमि पर यह त्रिस्तरीय निर्माणाधीन गोदाम बनाया जा रहा था। जाँच में यह बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पिछली TMC सरकार के राज में कोलकाता नगर निगम (KMC) ने 17 जनवरी को बिना किसी सॉइल टेस्ट (मिट्टी की जाँच) या लोड टेस्ट के ही इस डिफेक्टिव स्टील-फ्रेम नक्शे को हरी झंडी दे दी थी। भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़े इस ढांचे के कमजोर लोहे के बीम भारी-भरकम कंक्रीट का वजन नहीं संभाल पाए और पूरी छत भरभरा कर काम कर रहे मजदूरों पर गिर गई।
“Building plan of under-construction warehouse that collapsed in Kolkata faulty.”
इस जानलेवा लापरवाही के मामले में पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए गैर-इरादतन हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की है। अब तक इस मामले में गोदाम के मालिक शंभूनाथ बेहरा और स्ट्रक्चरल इंजीनियर कमल सामंत सहित गुलजार हुसैन, दिबाकर भंडारी और अब्दुल हमीद जैसे 5 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती जाँच में ही बिल्डिंग प्लान में गंभीर खामियाँ पाई गई हैं। इसी वजह से 31 जुलाई तक सभी संदिग्ध निर्माण कार्यों को फ्रीज कर उनका कड़ा ‘स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट’ शुरू कर दिया गया है, ताकि 1 अगस्त से केवल वैध परियोजनाओं को ही काम की अनुमति मिले।
TMC नेताओं और प्रमोटरों का गठजोड़: तस्वीरों ने खोला राज
इस हादसे के बाद राजनीतिक गलियारों में तब हड़कंप मच गया जब जाँच के दौरान मलबे में मृत पाए गए मुख्य कॉन्ट्रैक्टर असगर हुसैन की कई तस्वीरें सामने आईं। इन तस्वीरों में असगर हुसैन पूर्व TMC सरकार के कद्दावर मंत्री और कोलकाता के पूर्व मेयर फरहाद हकीम के साथ कई राजनीतिक और निजी कार्यक्रमों में बेहद करीब दिखाई दे रहे हैं। यह तस्वीरें साफ बयां करती हैं कि TMC के शीर्ष नेताओं और अवैध निर्माण करने वाले प्रमोटरों के बीच कितना गहरा और पुराना रिश्ता रहा है।
TMC के इसी कथित ‘कट-मनी’ कल्चर और सिंडिकेट के कारण कोलकाता में नगर निगम के नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जाती रहीं। स्थानीय प्रमोटर मोटी घूस देकर और स्थानीय राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर बिना किसी डर के अवैध निर्माण करते थे। जब भी नगर निगम का कोई ईमानदार अधिकारी इन अवैध निर्माणों को रोकने की कोशिश करता, तो उन्हें TMC नेताओं के करीबी गुंडों द्वारा डराया-धमकाया और प्रताड़ित किया जाता था, जिसके कारण प्रशासन पूरी तरह पंगु बन चुका था।
कोलकाता में 3,000 ‘टाइम बम’: रेड जोन में तब्दील हुए कई इलाके
कोलकाता नगर निगम की वॉचलिस्ट के अनुसार, शहर के टेंगरा, तिलजला, गार्डन रीच, तपसिया, इकबालपुर और बड़ाबाजार जैसे घने इलाकों में करीब 3,000 अवैध और खतरनाक निर्माण आज भी ‘टाइम बम’ बनकर खड़े हैं। TMC के शासनकाल में बिल्डरों ने अवैध रूप से भारी मुनाफा कमाने के चक्कर में नियमों को पूरी तरह ताक पर रख दिया। आलम यह है कि महज 2 मंजिल के स्वीकृत नक्शे पर प्रमोटरों ने जबरन 5-5 मंजिलें तान दीं, जिससे ये इमारतें अब खतरनाक तरीके से एक तरफ झुक रही हैं।
𝗔𝗯𝗼𝘂𝘁 𝟯𝟬𝟬𝟬 𝗯𝘂𝗶𝗹𝗱𝗶𝗻𝗴𝘀 𝘂𝗻𝗱𝗲𝗿 𝗞𝗠𝗖 𝘄𝗮𝘁𝗰𝗵𝗹𝗶𝘀𝘁.
The Buildings Department under the Kolkata Municipal Corporation (KMC) has identified 3,000 buildings in 'red zones' across six boroughs of Kolkata that have grossly violated the civic body's… pic.twitter.com/iZFks8Th72
— The West Bengal Index (@TheBengalIndex) May 16, 2026
शहरी विकास मंत्रालय के ढीले रवैये के कारण कोलकाता के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया। प्रमोटरों ने TMC नेताओं के संरक्षण में शहर के दर्जनों पुराने तालाबों और जल निकायों (Water Bodies) को मिट्टी और मलबे से पाट दिया और उनके ऊपर कमजोर बुनियाद वाली बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दीं। नियमों के मुताबिक दो मकानों के बीच जरूरी खाली जगह (ओपन स्पेस) छोड़ने के नियम का पालन कहीं नहीं किया गया, जिसके कारण ये बस्तियाँ बेहद असुरक्षित और संकरी हो चुकी हैं।
पुरानी तारीखों का खूनी इतिहास: TMC राज के वो खौफनाक हादसे
यह पहली बार नहीं है जब कोलकाता में TMC समर्थित प्रमोटरों के लालच ने लोगों की जान ली है। इससे पहले 18 मार्च 2024 को कोलकाता के गार्डन रीच इलाके (जो कि तत्कालीन शहरी विकास मंत्री फरहाद हकीम का ही निर्वाचन क्षेत्र था) में एक 5 मंजिला अवैध निर्माणाधीन इमारत ढह गई थी, जिसमें 13 मासूम लोगों की मलबे में दबकर मौत हो गई थी। उस समय भी KMC की जाँच में सामने आया था कि प्रमोटर ने लागत बचाने के लिए 16mm की जगह केवल 10mm के पतले लोहे के रॉड इस्तेमाल किए थे और छत पर 50,000 ईंटें लाद दी थीं, जिसे कमजोर पिलर सह नहीं पाए।
इतना ही नहीं, जनवरी 2025 में टॉलीगंज के नकतला इलाके में एक 4 मंजिला इमारत अचानक एक तरफ झुक गई थी, जिसका निर्माण भी साल 2009-10 में एक तालाब को पाटकर किया गया था। वहीं, 14 मई 2026 को अवैध रूप से बनी तिलजला की एक इमारत में भीषण आग लगने से दो लोगों की मौत हो गई, और उससे पहले 26 जनवरी को आनंदपुर में बिना फायर क्लीयरेंस के चल रहे दो अवैध गोदामों में लगी आग में 27 कर्मचारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। TMC राज में हुए ये लगातार हादसे साबित करते हैं कि पैसे के लालच में जनता की सुरक्षा को हमेशा दांव पर लगाया गया।
केंद्र के पैसे का दुरुपयोग
पूर्व TMC सरकार पर न केवल प्रशासनिक ढिलाई बल्कि वित्तीय भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप हैं। केंद्र सरकार द्वारा राज्य के विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए भेजे जाने वाले करोड़ों रुपए के फंड को TMC सरकार ने अपने निजी राजनीतिक प्रचार और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया। केंद्रीय पैसों का इस्तेमाल विकास कार्यों में करने के बजाय सिंडिकेट राज को मजबूत करने में किया गया, जिससे राज्य की कानून व्यवस्था और बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमरा गया।
पीड़ितों के लिए सहायता राशि और शुभेंदु सरकार का कड़ा संकल्प
इस दर्दनाक हादसे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए शोक-संतप्त परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएँ प्रकट की हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तुरंत एक्शन लेते हुए विधानसभा में मृतकों के परिजनों को राज्य सरकार की ओर से 10-10 लाख रुपए और घायलों को 1-1 लाख रुपए की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से मृतकों के परिवारों को 2-2 लाख रुपए और घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता देने का ऐलान किया है।
शुभेंदु सरकार ने साफ कर दिया है कि पिछली सरकार के इस भ्रष्ट तंत्र को अब राज्य में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार ने एक हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर दिया है, जो पूरे राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) और अवैध निर्माणों पर नकेल कसने के लिए काम करेगी। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि 31 जुलाई तक चलने वाले इस सेफ्टी ऑडिट के बाद जितने भी अवैध ढांचे मिलेंगे, उन पर सरकार का सख्त बुलडोजर चलेगा ताकि भविष्य में तारातला और गार्डन रीच जैसे खूनी हादसों को हमेशा के लिए रोका जा सके।
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश पर आपातकाल (Emergency) थोपा था। प्रेस की आजादी पर ताले जड़ दिए गए थे, अखबारों की सुर्खियाँ सत्ता की मंजूरी से तय होती थीं और सरकार से सवाल पूछना अपराध माना जाने लगा था।
आज इमरजेंसी के 51 साल बाद हिमाचल प्रदेश में उठ रहे घटनाक्रम एक बार फिर उसी काले दौर की याद दिला रहे हैं। राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार की नीतियों, बढ़ते कर्ज, घोटालों और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाने वाले डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म News4Himalayan की 20 से अधिक वीडियो पूरे भारत में ब्लॉक करा दी गईं, इसके बाद उसका फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम अकाउंट भी प्रतिबंधित कर दिया गया।
ऐसा भी नहीं है कि चैनल ने कोई छिपी हुई बात बता दी थी, जिन मुद्दों को लेकर आवाज दबाने की कोशिश की गई उनमें से कई मुद्दे तो ऐसे हैं जिन्हें कॉन्ग्रेस पार्टी के अपने नेता पार्टी के भीतर और सार्वजनिक रूप से उठा चुके हैं।
ऐसे में यही सवाल उठता है कि क्या सरकार आरोपों का जवाब देने के बजाय सच दिखाने वालों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है? प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कॉन्ग्रेस पर अब आरोप लग रहे हैं कि सत्ता में आते ही वह वही रास्ता अपना रही है, जिसने 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्यायों में शामिल कर दिया था।
News4Himalayan के शांतनु शुक्ल ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है कि यह केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कार्रवाई नहीं बल्कि सरकार की आलोचना को रोकने और असहज सवालों को दबाने का सुनियोजित प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस रोक को हटवाने के लिए वे हाई कोर्ट का रुख करेंगे।
24 घंटे में 20 से ज्यादा वीडियो हुए ब्लॉक
News4Himalayan के अनुसार, 17 जून 2026 को उसके फेसबुक पेज पर प्रकाशित 20 से अधिक वीडियो भारत में दर्शकों के लिए उपलब्ध नहीं रहे। इन वीडियो में सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों, वित्तीय मामलों, जनहित के मुद्दों और भ्रष्टाचार से जुड़े विषय शामिल थे।
प्लेटफॉर्म का कहना है कि प्रभावित वीडियो में शराब फैक्ट्री से जुड़े घोटाले, हिमाचल पर बढ़ते कर्ज, सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के बजट, स्मार्ट मीटर विवाद, हाई कोर्ट के फैसलों और कॉन्ग्रेस नेताओं से जुड़े खुलासों पर आधारित रिपोर्टें शामिल थीं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार कार्रवाई
News4Himalayan का दावा है कि 17 जून 2026 को उसकी 20 से अधिक वीडियो भारत में ब्लॉक किए जाने के बाद कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ता गया। 18 जून को उसका फेसबुक पेज भी भारत में काफी हद तक प्रतिबंधित या अनुपलब्ध हो गया, जिसके कारण भारतीय उपयोगकर्ता पेज और उस पर मौजूद सामग्री तक स्वतंत्र रूप से नहीं पहुँच पा रहे थे।
इसके कुछ ही दिनों बाद, 21 जून को प्लेटफॉर्म का आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट भी प्रतिबंधित कर दिया गया और उसकी पहुँच सीमित कर दी गई। संस्था का कहना है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हुई इन कार्रवाइयों से जुड़े स्क्रीनशॉट, प्लेटफॉर्म नोटिस और अन्य रिकॉर्ड उसके पास सुरक्षित मौजूद हैं।
News4Himalayan का आरोप है कि वीडियो ब्लॉक होने से शुरू हुई कार्रवाई बाद में उसके प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच गई, जिससे उसकी खबरों और जनहित से जुड़े मुद्दों को लोगों तक पहुँचाने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
कार्रवाई पर उठे सवाल
News4Himalayan का आरोप है कि उसकी वीडियो और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हुई कार्रवाई को लेकर उसे आज तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। संस्था का कहना है कि न तो उसे यह बताया गया कि किस कानून के तहत यह कार्रवाई की गई, न यह स्पष्ट किया गया कि किस कंटेंट को आपत्तिजनक माना गया और न ही यह जानकारी दी गई कि रोक लगाने के पीछे किस प्राधिकरण की भूमिका थी।
प्लेटफॉर्म का दावा है कि कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने या जवाब देने का कोई प्रभावी अवसर भी नहीं दिया गया।
वहीं, News4Himalayan खुद को जनहित के मुद्दों को उठाने वाला स्वतंत्र मीडिया मंच बताता है। उसका कहना है कि वह वर्षों से हिमाचल प्रदेश में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, आउटसोर्स कर्मचारियों की समस्याओं, बढ़ते सरकारी कर्ज, बजट के विश्लेषण, नीतिगत फैसलों और अन्य जनसरोकार के विषयों पर रिपोर्टिंग करता रहा है।
संस्था का दावा है कि उसकी पत्रकारिता किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष तक सीमित नहीं रही बल्कि उसने समय-समय पर कॉन्ग्रेस सरकार के साथ-साथ भाजपा नेताओं और विपक्षी दलों से भी सवाल पूछे हैं।
ऐसे में प्लेटफॉर्म का आरोप है कि सरकार से जुड़े मुद्दों पर की गई आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के बाद उसके खिलाफ हुई यह कार्रवाई कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
News4Himalayan ने कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी को भी निशाने पर लेते हुए सवाल उठाया है कि जो नेता देश और विदेश में प्रेस की स्वतंत्रता की बात करते हैं, क्या वे हिमाचल में मीडिया प्लेटफॉर्म पर हुई इस कार्रवाई पर भी प्रतिक्रिया देंगे। प्लेटफॉर्म ने पूछा कि क्या प्रेस की आजादी का सिद्धांत केवल विपक्ष में रहते हुए ही याद आता है।
पहले भी दर्ज हुईं FIR और शिकायतें
संस्था का दावा है कि यह उसके खिलाफ पहली कार्रवाई नहीं है। उसके अनुसार पहले भी अलग-अलग पुलिस थानों में उसके खिलाफ FIR और शिकायतें दर्ज कराई गईं। इतना ही नहीं, हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष की ओर से उसे विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) का नोटिस भी भेजा गया था।
News4Himalayan का आरोप है कि सरकार और उससे जुड़े लोग आलोचनात्मक पत्रकारिता से असहज हैं और इसी कारण लगातार दबाव बनाया जा रहा है।
प्रेस की आजादी को लेकर सवाल उठाने वाली कॉन्ग्रेस पर खुद गंभीर आरोप
हिमाचल प्रदेश में सामने आए इस पूरे विवाद ने कॉन्ग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दिया है। देशभर में प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाली पार्टी पर अब उसी मीडिया की आवाज दबाने के आरोप लग रहे हैं, जो सरकार से सवाल पूछ रहा था।
News4Himalayan का दावा है कि उसकी जिन रिपोर्टों और वीडियो पर कार्रवाई हुई, उनमें सरकार के कर्ज, नीतिगत फैसलों, घोटालों और प्रशासनिक कामकाज से जुड़े ऐसे मुद्दे उठाए गए थे जिन पर सार्वजनिक बहस होना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।
यह करवाई वहीं कॉन्ग्रेस कर रही है, जिसने सत्ता में आने के बाद से ही प्रेस को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश की है। अपनी खामियों को छुपाने के लिए यह पार्टी या तो मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ कहकर संबोधित करने लगती है या उसकी आम जनता तक पहुँची ही बंद कर देती है और उसके बाद प्रेस की आजादी को लेकर बड़े-बड़े भाषण देती है।
अमेरिका में इस साल नवंबर में होने वाले जनरल इलेक्शन में अपना उम्मीदवार खड़ा करने के लिए हर पार्टी अपने आंतरिक चुनाव कराती है, जिसे देश में प्राइमरी चुनाव (Primary Election) कहा जाता है। डेमोक्रेटिक पार्टी (DSA) के भीतर भी प्राइमरी चुनाव हुआ और 23 जून 2026 को नतीजे सामने आए। इन नतीजों में चर्चा न्यूयॉर्क से चुने मुस्लिम प्रतिनिधि अबर कवास (Aber Kawas) और दारियालिजा एविला शेवेलियर (Darializa Avila Chevalier) की हो रही है। इन ‘हिजाबन’ को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी का समर्थन मिला है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी जोहरान ममदानी के समर्थन से जीते नेताओं पर प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने इस पर मीडिया को घेरते हुए कहा, “मेयर ममदानी ने 3 पक्के वामपंथियों को चुनाव जितवा दिया और इसके लिए बिकाऊ मीडिया (Fake News Media) उनकी जमकर तारीफ कर रहा है। मेयर साहब को बधाई! कल रात मैंने 16-0 का रिकॉर्ड बनाया (यानी जिन 16 लोगों का मैंने समर्थन किया, वे सब जीत गए) और शानदार अमेरिकी देशभक्तों को चुनाव जिताने में मदद की, लेकिन मीडिया ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला।”
Mayor Mamdani pulled through 3 solid Communists, and has received loud and universal applause from the Fake News Media. Congratulations Mr. Mayor! I went 16-0 last night, helping to elect wonderful American Patriots, and the Media doesn’t say a word. Over the last two years, my… pic.twitter.com/0DNiHyt1JA
— Commentary Donald J. Trump Truth Social Posts On X (@TrumpTruthOnX) June 24, 2026
उन्होंने अपनी तारीफ में आगे लिखा, “पिछले दो सालों में, मेरे समर्थन से लोगों को प्राइमरी चुनाव में 259 जीत मिली हैं, और लगभग कोई हार नहीं हुई, फिर भी मीडिया इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता!!! बिकाऊ मीडिया।”
डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं, वह सच है। चर्चा तो हो रही है जोहरान ममदानी का समर्थन मिलने वाले जीते हुए नेताओं की। खासकर अबर कवास और दारियालिजा एविला शेवेलियर की। जहाँ पश्चिमी मीडिया इन नेताओं की जीत पर बड़े-बड़े लेख लिख रही है, वहीं सोशल मीडिया पर इनके पुराने बयान और इनकी पहचान काफी चर्चा में चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर अमेरिकी इन दोनों मुस्लिम नेताओं के मुस्लिम-प्रोपेगेंडा, हमास का समर्थन और अमेरिकियों के लिए घृणा वाली सोच को सामने ला रहे हैं।
कौन हैं अबर कवास?
अबर कवास खुद को फिलिस्तीन का निवासी बताती हैं। उनका दावा है कि उनके अम्मी-अब्बा फिलिस्तीन से माइग्रेट होकर अमेरिका आए थे। कवास के अनुसार, उनका जन्म भी न्यूयॉर्क के ब्रूकलिन में ही हुआ है। कवास ने सिटी कॉलेज ऑफ न्यूयॉर्क से ‘इंटरनेशनल स्टडीज’ की पढ़ाई की है। इससे अलग कवास ने अपनी पहचान अमेरिका में सख्त प्रवासन नीतियों और देश में मुस्लिम-विरोधी रवैये के पीड़ित के रूप में बनाई है।
वो दावा करती है कि जब वह किशोरावस्था में थीं, तब उनके पिता को अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) ने हिरासत में ले लिया और देश से डिपोर्ट कर दिया था। अपनी चुनावी अभियान की वेबसाइट में भी उन्होंने यह जानकारी लिखी है।
इसी पहचान के साथ कवास न्यूयॉर्क के डिस्ट्रिक्ट 12 क्विन्य सीट से डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में 58.3 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत दर्ज की। कवास ने असेंबली मेंबर स्टीवन रागा को 20 प्रतिशत वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ अब वे नवंबर में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बन सकती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस जीत के साथ अबर कवास ने इतिहास रचा है क्योंकि वे न्यूयॉर्क सीनेट के लिए चुनी जाने वाली पहली फिलिस्तीनी मुस्लिम महिला बन गई हैं।
फिलिस्तीन और मुस्लिम-पीड़ित का रोना रोने वाली अबर कवास का बैकग्राउंड निकला ‘आपराधिक’
कवास ने बेशक फिलिस्तीन और अमेरिका में मुस्लिम पीड़ित की रोना रोकर चुनाव लड़ा हो, लेकिन असलियत कुछ और है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर चल रही खबरों में सामने आया कि उनके द्वारा गढ़ी गई इमिग्रेशन के कारण परिवार को डिपोर्ट करने वाली कहानी झूठी है। कवास के परिवार को इसीलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उनके अब्बा ‘अब्दुलकरीम कवास’ एक दोषी अपराधी थे।
अमेरिकी की एक कोर्ट में इसके सबूत भी हैं, जिसे न्यूयॉर्क पोस्ट ने कवर भी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अबर कवास के अब्बा अब्दुलकरीम कवास जॉर्डन के नागरिक थे, जो 1989 में टूरिस्ट वीजा पर अमेरिका आए थे और कभी वापस नहीं गए। यहाँ अब्दुलकरीम का जघन्य अपराधों में नाम सामने आया। 1995 में उन्हें वर्जीनिया की रिचमंड सिटी सर्किट कोर्ट में झूठी गवाही का दोषी पाया गया और इसके 10 साल बाद न्यू जर्सी में प्रॉपर्टी चोरी के आरोप में दोषी पाने के बाद अगस्त 2006 में तीन साल की जेल तक हुई थी।
इसी बीच उनका इमिग्रेशन का मामला भी अदालतों में चलता रहा। एक फेडरल इमिग्रेशन जज ने शुरू में उन्हें 2004 की सुनवाई में उपस्थित न होने पर देश से निकालने का आदेश दिया था। इसके बाद देश में जॉर्ज बुश (George W. Bush) की सरकार के दौरान उन्हें जॉर्डन डिपोर्ट कर दिया गया था। लेकिन अबर कवास अपने चुनावी अभियान के दौरान लगातार ट्रंप प्रशासन की सख्त इमेग्रेशन नीतियों पर इसका ठीकरा फोड़ती रही हैं।
9/11 आतंकी हमलों पर अबर कवास का अमेरिकी-विरोधी बयान
यही नहीं, अबर कवास की सोच भी अमेरिकी-विरोधी है। यह तब और ज्यादा मुखर होकर सामने आया जब अबर कवास ने अमेरिकी के काले पन्नों में दर्ज 9/11 आतंकी हमले पर अपना पक्ष रखा। कवास ने इस आतंकी हमले का जिम्मेदार अमेरिकियों को ही ठहरा दिया और अलकायदा का बचाव किया। कवास के बयान की वीडियो क्लिप भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।
🚨Daughter of illegals Aber Kawas blames 9/11 on America’s capitalism, racism & Islamophobia. Endorsed by Zohran Mamdani for NY Assembly.
This is exactly why we must END birthright citizenship NOW. America is not Islam's conquest pic.twitter.com/QhvmnoqTgK
इस क्लिप में अबर कवास कहती हैं, “पूँजीवाद, नस्लवाद, गोरों को दूसरों से श्रेष्ठ समझना और इस्लामोफोबिया- इन सब चीजों का इस्तेमाल हमेशा से दूसरों की जमीनों पर कब्जा करने और उनके संसाधनों को छीनने के लिए किया गया है। यह बहुत लंबे समय से चला आ रहा है और 9/11 का हमला भी इसी पुरानी सोच और सिलसिले का ही एक हिस्सा था।
कवास आगे कहती हैं, “यह सोचना कि हमें (मुस्लिमों को) एक ऐसे आतंकवादी हमले के लिए माफी माँगनी चाहिए जो सिर्फ चंद लोगों ने किया था जबकि इतिहास में हुए बड़े-बड़े नरसंहारों और गुलामी की प्रथा के लिए कभी किसी ने माफी नहीं माँगी और न ही कोई मुआवजा दिया, यह बात मुझे बहुत गलत और घिनौनी लगती है।”
गौरतलब है कि जिस 9/11 आतंकी हमले की अबर कवास यहाँ बात कर रही हैं, वह आतंकी संगठन अलकायदा ने अंजाम दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन था। उसके नेतृत्व में 11 सितंबर 2001 को अलकायदा के 19 आतंकियों ने अमेरिका के 4 विमानों को हाइजैक किया और उन्हें आत्मघाती बम की तरह इस्तेमाल किया था। इस पूरे हमले में 2,977 मासूम लोगों ने जानें गवाई थीं, जिनमें 90 प्रतिशत अमेरिकन थे।
कौन हैं डारियालिजा अवीला शेवेलियर?
डारियालिजा अवीला शेवेलियर ने भी अपनी पहचान प्रवासी नागरिक के तौर पर मजबूत की है। उनकी चुनावी अभियान की वेबसाइट के अनुसार, वह खुद को अप्रवासन की सख्त नीतियों का पीड़ित होने का दावा करती हैं। उनका डोमिनिकन परिवार है जो फ्लोरिडा से अमेरिका माइग्रेट हुआ था। शेवेलियर बताती हैं कि वह गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहाँ उनके अब्बा ट्रक ड्राइवर और अम्मी एक केस वर्कर हैं, जिसने अपने बचपन का ज्यादा समय वेनेजुएला में अपनी दादा के साथ बिताया है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन और अफ्रीकन स्टडीज में ग्रेजुएशन पूरी की है और फिलहाल सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क (CUNY Graduate Center) से सोशियोलॉजी में पीएचडी की डिग्री पूरी कर रही हैं। कॉलेज के समय से ही शेवेलियर कट्टर वामपंथी आंदोलनों का हिस्सा रही हैं, इस दौरान वह हिजाब भी पहना करती थीं लेकिन प्राइमरी चुनाव में अभियान के दौरान उनका हिजाब गायब दिखा।
शेवेलियर ने फिलिस्तीन समर्थित, ब्लैक लाइव्स मैटर और खासकर अप्रवासन नीतियों के खिलाफ अभियानों का हिस्सा रहकर अपनी पहचान बनाई। इसी पहचान के साथ शेवेलियर ने प्राइमरी चुनाव में 13वें डिस्ट्रिक्ट सीट से जीत हासिल की है। उन्होंने 5 बार के मौजूदा और बेहद शक्तिशाली सांसद एड्रियानो एस्पेलियाट (Adriano Espaillat) को 2,326 वोटो के अंतर से चुनाव में मात दी है।
शेवेलियर के अमेरिकी-विरोधी और प्रो-हमास होने पर सोशल मीडिया पर आलोचना
शेवेलियर को चुनाव में जोहरान ममदानी का समर्थन मिला। इसके बावजूद भी सोशल मीडिया पर अमेरिकन शेवेलियर के खिलाफ बोल रहे हैं, लोग उनके इस्लामी हित और अमेरिकी-विरोधी बयानों और विवादित बैकग्राउंड पर बात कर रहे हैं। यह भी सामने आया है कि शेवेलियर ने अपना इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर लिया है। इसके अलावा लोग उनके डोमिनिकन मूल से होने पर भी सवाल उठा रहे हैं, लोगों का कहना हैं कि वह हैतीयन (Haitian) मूल की हैं।
Please meet Darializa Avila Chevalier, the Mamdani-endorsed DSA candidate for Congress:
A self-proclaimed communist born in Florida to Dominican (or Haitian, it’s not clear) immigrant parents, she converted to Islam claiming that Palestine is the most important issue in her… pic.twitter.com/MpDWXiejgZ
शेवेलियर की सोशल मीडिया हिस्ट्री खंगालकर अमेरिकी बता रहे हैं कि वह अमेरिकन झंडे का इस्तेमाल नैपकिन की तरह करती हैं। इसके अलावा 07 अक्टूबर 2025 को ठीक एक दिन बाद, उन्होंने इजरायली नागरिकों की हत्या का जश्न मनाने वाली एक रैली में भी हिस्सा लिया था। उनके अमेरिकी-विरोधी होने का भी राज खोलते हुए कहा कि वह गोरी महिलाओं को ‘बदसूरत उपनिवेशवादी’ बताती हैं।
इतना ही नहीं अमेरिकन ने बताया कि शेवेलियर कह चुकी हैं कि अपराधियों सहित किसी भी व्यक्ति का निर्वासन (देश से निकालना) उचित नहीं है। वह पुलिस से नफरत करती हैं और उन्हें ‘सूअर’ कहती हैं, अमेरिकी सैनिकों को युद्ध अपराधी बताती हैं और कहती हैं कि अमेरिका एक शर्मनाक देश है। वह सिर्फ़ न्यूयॉर्क से चुनाव लड़ रही हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फ्लोरिडा में उनके जीतने की कोई संभावना नहीं है।”
Darializa Avila Chevalier, who just won the NY-13 Democrat primary, says “Inshallah” if she makes it to Congress, she wants to make sure to reflect her Muslim faith “in the halls of power”. pic.twitter.com/AWMYi40AcO
ऐसा ही उनका एक पुराना वीडियो भी सामने आया, जिसमें शेवेलियर कहती दिख रही हैं कि अगर वह कॉन्ग्रेस में पहुँचती हैं तो ‘इंशाल्लाह’ यह पक्का करना चाहेंगी कि ‘सत्ता के गलियारों’ में उनके मुस्लिम मजहब की झलक दिखे।
निष्कर्ष: न्यूयॉर्क में जोहरान ममदानी ने अपने जैसे दो को बनाया अगला प्रतिनिधि
शेवेलियर और कवास के बैकग्राउंड को देखते हुए लगता है कि यह भी जोहरान ममदानी की राह पर ही हैं। इन्होंने भी न्यूयॉर्क में मुस्लिम-पीड़ित पहचान, हमास को समर्थन और अमेरिकी नीतियों की आलोचना करके ही चुनाव जीता है। लगता है कि न्यूयॉर्क को कई जोहरान मिल गए हैं और इनका प्राइमरी चुनाव जीतने यही अंदेशा है कि ऐसे अमेरिकी विरोधी नेता आम चुनाव भी आसानी से जीत जाएँगे, क्योंकि न्यूयॉर्क पहले से ही सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ रहा है।
हालाँकि इससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या न्यूयॉर्क में सचमुच लोग ट्रंप प्रशासन की नीतियों से परेशान हैं या फिर शहर में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है। वैसे भी आए दिन सोशल मीडिया पर वीडियोज सामने आते रहते हैं कि जिसमें न्यूयॉर्क की सड़कों पर मुहर्रम के शोक हो रहे हैं, टाइम्स स्क्वायर से अजान की आवाजें आती हैं और इसी न्यूयॉर्क में बैठकर जोहरान ममदानी और उसके जैसे नेता अमेरिका के विरोध में बयान देते हैं और आतंकियों के मरने पर शोक मनाते हैं। क्या ऐसे नेताओं को सत्ता में लाकर अमेरिका इस्लामीकरण की ओर है?
महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र में NCP (अजीत पवार गुट) की विधायक सना मलिक के एक बयान पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने सदन में चर्चा के दौरान भारत में भी कुरान पर आधारित कानून लागू करने की माँग की। सना मलिक ने तीन तलाक और बहुविवाह (पॉलिगेमी) का जिक्र करते हुए पाकिस्तान का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा कि जब पाकिस्तान कुरान के नियमों को अपना कानून बना सकता है, तो भारत को भी ऐसा ही करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद बीजेपी विधायकों ने सदन में जमकर हंगामा किया और सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध हो रहा है।
कौन हैं सना मलिक? अब्बू का सियासी बैकग्राउंड
सना मलिक महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया और चर्चित चेहरा हैं। वह मुंबई के अणुशक्ति नगर विधानसभा क्षेत्र से साल 2024 में पहली बार विधायक चुनी गई हैं। सना मलिक वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व मंत्री नवाब मलिक की बेटी हैं। नवाब मलिक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, जो बाद में मुंबई आकर राजनीति में सक्रिय हुए।
राजनीति में कदम रखने से पहले सना मलिक एक आर्किटेक्ट और वकील के तौर पर काम कर चुकी हैं। साल 2024 के चुनाव में नवाब मलिक ने अपनी सीट से बेटी सना को उम्मीदवार बनाया था। सना अपनी पार्टी में अल्पसंख्यक और मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों पर काफी आक्रामक रुख रखती हैं।
विधानसभा में क्यों शुरू हुई बहुविवाह और तीन तलाक पर बहस?
विधानसभा सत्र के दौरान BJP विधायक देवयानी फरांडे ने तीन तलाक कानून को सख्ती से लागू करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने सदन को बताया कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को आज भी प्रताड़ित किया जा रहा है। देवयानी ने इसके लिए पाकिस्तान का उदाहरण दिया था।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में दूसरे निकाह के लिए पहली बीवी की लिखित अनुमति और एक काउंसिल की मंजूरी जरूरी है। इसी सख्त नियम के कारण पाकिस्तान में बहुविवाह की दर सिर्फ एक प्रतिशत है। उन्होंने महाराष्ट्र में भी ऐसे ही कड़े कानून और समान नागरिक संहिता (UCC) लाने की माँग की।
सना मलिक का विवादित तर्क और ‘पाकिस्तानी प्रेम’
BJP विधायक के बयान पर पलटवार करते हुए सना मलिक ने आक्रामक रुख अपना लिया। उन्होंने दलील दी कि बहुविवाह सिर्फ मुस्लिम समाज में नहीं होता, बल्कि हर धर्म में है। सना मलिक ने कहा कि पाकिस्तान ने कुछ नया नहीं किया, उसने सिर्फ कुरान में लिखे मुस्लिम पर्सनल लॉ को ही कानून का रूप दिया है।
सना मलिक ने आगे कहा, “हम इस्लाम में कुरान की शिक्षाओं को मानते हैं। अगर पाकिस्तान इसे लागू कर सकता है, तो भारत को भी कुरान पर आधारित कानून लाना चाहिए, हम इसकी माँग करते हैं।” उनके इस बयान को लोगों ने हिंदुओं और भारतीय व्यवस्था के खिलाफ एक कट्टरपंथी सोच माना।
BJP का करारा पलटवार: ‘देश संविधान से चलेगा, शरिया से नहीं’
सना मलिक के इस बयान पर BJP विधायक अतुल भातखलकर ने सदन में तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि यह देश केवल भारत के संविधान से चलता है, किसी मजहबी ग्रंथ या कुरान से नहीं। उन्होंने साफ किया कि सदन में पाकिस्तान और शरिया की वकालत करने की कोई जरूरत नहीं है।
वहीं, महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने भी सना मलिक को सीधे जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून किसी धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं बनता। कानून समाज में हो रहे अन्याय को रोकने के लिए बनता है, किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं।
नितेश राणे की दो टूक: ‘शरिया चाहिए तो पाकिस्तान चले जाओ’
इस विवाद के बाद महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और BJP नेता नितेश राणे ने सना मलिक पर बेहद तीखा हमला बोला। नितेश राणे ने कहा कि सना मलिक शायद भूल गई हैं कि वह एक हिंदू बहुसंख्यक देश में बैठी हैं। वह भारत की विधायक हैं, पाकिस्तान की संसद में नहीं बैठी हैं।
नितेश राणे ने साफ कहा कि हमारे देश के संविधान में ही समान नागरिक संहिता (UCC) का जिक्र है। जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, वे ही आज धर्म के नाम पर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर किसी को भारत का कानून पसंद नहीं है और शरिया कानून ही चाहिए, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देकर पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
चौतरफा घिरने के बाद सना मलिक ने दी सफाई
चारों तरफ से घिरने और सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल होने के बाद सना मलिक ने अपने बयान पर सफाई जारी की है। सना मलिक ने दावा किया कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। सना ने कहा कि वह पाकिस्तान को कोई आदर्श नहीं मानती हैं।
उन्होंने सिर्फ देवयानी फरांडे के पाकिस्तान वाले संदर्भ पर जवाब दिया था। सना ने कहा कि भारतीय मुसलमान होने के नाते उनका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। भारत का संविधान उन्हें अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है और उन्होंने केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बात रखी थी।
मुंबई में मॉनसून दस्तक दे चुका था। हल्की-हल्की फुहारें शहर की रफ्तार को थाम नहीं पा रही थीं। मैं छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के सामने एक चाय की टपरी पर अपनी चाय का इंतज़ार कर रहा था। चचा ने पतीली में दूध चढ़ा रखा था और बड़े इत्मीनान से अदरक व इलायची कूट रहे थे। तभी सामने स्थित मैकडॉनल्ड्स से निकटवर्ती कॉलेज के कुछ छात्र बाहर निकले। उनके बीच चर्चा का विषय था, फीफा विश्व कप। किसी को मेस्सी पसंद थे, कोई पिछली रात क्रिस्टियानो रोनाल्डो के दो गोलों की तारीफ करते नहीं थक रहा था, तो कुछ लोग ब्राजील के अगले मुकाबले को लेकर बेहद उत्साहित दिखाई दे रहे थे। यही तो विश्व कप की खूबसूरती है। यह सिर्फ मैदान पर नहीं खेला जाता, बल्कि दुनिया की गलियों, कैफे और चाय की दुकानों पर भी उतनी ही शिद्दत से जिया जाता है।
आज फीफा विश्व कप में क्रमशः ग्रुप ए, बी और सी के ग्रुप चरण के कुल छह मुकाबले खेले जाने थे। ग्रुप चरण अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में हर दिन कई रोमांचक मुकाबले देखने को मिल रहे हैं। आज का दिन भी इससे अलग नहीं रहा। मैदान पर उतरी लगभग हर टीम ने अगले दौर की दौड़ में अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
सर्वप्रथम वैंकूवर में स्विट्जरलैंड का सामना कनाडा से था। कनाडाई टीम के पास घरेलू दर्शकों का भरपूर समर्थन था। मुकाबला शुरू होते ही कनाडा ने स्विट्जरलैंड के गोलपोस्ट पर लगातार हमले बोलने शुरू कर दिए। हालांकि, छियालीसवें मिनट में जोहान मनजाम्बी ने रुबेन वर्गास को एक सटीक पास दिया और वर्गास ने शानदार फिनिश के साथ स्विट्जरलैंड को बढ़त दिला दी। यह इस विश्व कप में उनका दूसरा गोल था।
एक बार फिर स्विस समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब ब्रील एम्बोलो के असिस्ट पर जोहान मनजाम्बी ने शानदार गोल दाग दिया। स्कोर 2-0 हो चुका था। टूर्नामेंट में यह मनजाम्बी का तीसरा गोल था और वह लगातार शानदार फॉर्म में दिखाई दे रहे थे।
कनाडा के मुख्य कोच जेसी मार्श ने इसके बाद कुछ अहम बदलाव किए और लियाम मिलर सहित तीन खिलाड़ियों को मैदान में उतारा। इन बदलावों का असर भी तुरंत देखने को मिला। मैच के 76वें मिनट में प्रोमिस डेविड ने गोल दागते हुए स्कोर 2-1 कर दिया। हालांकि, स्विट्जरलैंड ने अंत तक संयम बनाए रखा और कनाडा की वापसी की उम्मीदों पर विराम लगाते हुए मुकाबला 2-1 से अपने नाम कर लिया।
उधर सिएटल में खेले गए इसी ग्रुप के दूसरे मुकाबले में बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना ने सभी को चौंकाते हुए कतर को 3-1 से शिकस्त दी। शानदार टीम गेम और बेहतरीन फिनिशिंग के दम पर बोस्नियाई टीम ने यह जीत दर्ज की। इन दोनों मुकाबलों के बाद ग्रुप बी की तस्वीर लगभग साफ हो गई। स्विट्जरलैंड शीर्ष स्थान पर पहुंच गया, जबकि कनाडा दूसरे स्थान पर रही। बोस्निया और कतर का विश्व कप अभियान यहीं समाप्त हो गया।
इसके बाद अटलांटा में मोरक्को का सामना अपेक्षाकृत कमजोर मानी जा रही हैती से था। ग्रुप सी में शीर्ष स्थान की दौड़ में बने रहने के लिए मोरक्को को प्रभावशाली जीत की जरूरत थी। मैच शुरू होते ही मोरक्को ने आक्रामक फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया। साफ दिख रहा था कि उनकी नजरें सिर्फ जीत पर नहीं, बल्कि बेहतर गोल अंतर पर भी थीं।
लेकिन खेल ने शुरुआती दस मिनट में ही अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। एक आत्मघाती गोल की बदौलत हैती ने बढ़त बना ली। हालांकि, अशरफ हाकिमी ने शानदार गोल कर मोरक्को को बराबरी दिला दी। इसके कुछ ही देर बाद हैती ने पलटवार करते हुए दूसरा गोल दाग दिया और स्कोर 2-1 कर दिया।
मोरक्को के लिए इस विश्व कप में सबसे ज्यादा गोल करने वाले साईबारी एक बार फिर संकटमोचक बनकर सामने आए। हाकिमी के शानदार पास पर उन्होंने बेहतरीन लेफ्ट-फुटेड शॉट लगाते हुए गेंद को जाल में पहुंचा दिया। पहले हाफ की समाप्ति से ठीक पहले स्कोर 2-2 हो चुका था। हैती ने अब तक बेहद साहसी और रोमांचक फुटबॉल खेली थी।
दूसरे हाफ में मोरक्को ने अपने अनुभव का पूरा इस्तेमाल किया। लगातार हमले करते हुए उन्होंने दो और गोल दागे और मुकाबला 4-2 से अपने नाम कर लिया। हालांकि, हैती द्वारा किए गए दो गोल निश्चित रूप से मोरक्को के लिए चिंता का विषय बने रहे।
अब बारी थी उस मुकाबले की जिसका दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों को बेसब्री से इंतजार था। मियामी में ब्राजील की टीम स्कॉटलैंड के खिलाफ मैदान में उतरी। पिछले मैच में चोटिल हुए राफिन्हा की जगह रायन फ्रांसा को शुरुआती एकादश में मौका दिया गया, जबकि बाकी टीम में कोई बदलाव नहीं किया गया।
ब्राजील ने शुरुआत से ही गेंद पर अपना नियंत्रण कायम रखा और लगातार स्कॉटलैंड के गोलपोस्ट पर हमले बोलती रही। राफिन्हा की जगह खेल रहे रायन फ्रांसा ने भी शानदार तालमेल दिखाया और ब्राजील का आक्रमण पहले से अधिक संतुलित नजर आया।
मुकाबले का सबसे भावुक पल तब आया जब 75वें मिनट में ब्राजील के मुख्य कोच कार्लो एंचेलोटी ने नेमार को मैदान में उतारा। पूरा स्टेडियम कई मिनट तक खड़े होकर अपने चहेते स्टार का स्वागत करता रहा। मेस्सी के बाद यदि किसी खिलाड़ी को दुनिया भर के फुटबॉल प्रशंसकों ने इतना स्नेह दिया है, तो वह नेमार ही हैं। जब-जब गेंद उनके पैरों तक पहुंचती, पूरा स्टेडियम उनके नाम के नारों से गूंज उठता।
खैर, आक्रामक फुटबॉल खेलते हुए एक बार फिर विनीसियस जूनियर ने दो गोल दागे, जबकि माथियुस कुन्हा ने एक गोल जोड़ते हुए ब्राजील को 3-0 की शानदार जीत दिला दी। इन दोनों मुकाबलों के बाद ग्रुप सी से अगले दौर में पहुंचने वाली टीमें ब्राजील और मोरक्को बन गईं। हैती का सफर यहीं समाप्त हो गया, जबकि स्कॉटलैंड की उम्मीदें अब सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान वाली टीमों की सूची पर टिकी रहेंगी।
अब बारी थी ग्रुप ए के दोनों मुकाबलों की। एक ओर भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े छह बजे दक्षिण अफ्रीका की टीम दक्षिण कोरिया से भिड़ने वाली थी, तो दूसरी ओर मैक्सिको सिटी में घरेलू समर्थकों के जबरदस्त उत्साह के बीच मेक्सिको का सामना चेकिया से होना था।
पहले बात करते हैं दक्षिण अफ्रीका बनाम दक्षिण कोरिया के मुकाबले की। इस मैच में एक बार फिर विश्व कप ने एक और बड़ा उलटफेर देखा। शानदार अनुशासन और प्रभावी रणनीति के दम पर दक्षिण अफ्रीका ने एशियाई दिग्गज दक्षिण कोरिया को 1-0 से हरा दिया।
दिलचस्प बात यह रही कि लगभग सत्तर प्रतिशत समय गेंद दक्षिण कोरिया के कब्जे में रही, लेकिन वह अपने कब्जे को प्रभावी आक्रमण में नहीं बदल सकी। इसके विपरीत, अपेक्षाकृत कम पज़ेशन के बावजूद दक्षिण अफ्रीका ने विपक्षी गोलपोस्ट पर चौदह बार निशाना साधा और आखिरकार एक गोल के दम पर मुकाबला अपने नाम कर लिया।
दक्षिण कोरिया के लिए यह हार निश्चित ही बड़ा झटका थी। सोन ह्युंग-मिन, ली कांग-इन और ओह जैसे आक्रामक खिलाड़ियों तथा किम मिन-जाए जैसे अनुभवी डिफेंडरों से सजी इस टीम से काफी उम्मीदें थीं। पहले कप्तान सोन ह्युंग-मिन को लेकर मीडिया में हुई अनावश्यक विवादों की चर्चा और फिर मैदान पर उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन न कर पाना, इन दोनों ने दक्षिण कोरिया के अभियान को कठिन बना दिया। हालांकि, इस हार के बाद भी सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान वाली टीमों की दौड़ में उसकी उम्मीदें पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थीं।
खैर, अब नजरें थीं मैक्सिको और चेकिया के मुकाबले पर। घरेलू दर्शकों के अभूतपूर्व समर्थन के बीच मेक्सिको ने शुरुआत से ही आक्रामक तेवर अपनाए। लगातार हमलों के दम पर उसने चेकिया को 3-0 से हराते हुए ग्रुप ए में शीर्ष स्थान हासिल कर अगले दौर का टिकट पक्का कर लिया।
उधर, दक्षिण अफ्रीका ने सभी पूर्वानुमानों को गलत साबित करते हुए ग्रुप ए में दूसरा स्थान हासिल कर अगले चरण में प्रवेश कर लिया। विश्व कप का यही तो आकर्षण है, कागज़ पर बड़ी दिखने वाली टीमें हमेशा मैदान पर बड़ी साबित नहीं होतीं।
अब नजरें अगले मैच दिवस पर थीं।
भारतीय समयानुसार आज रात डेढ़ बजे ग्रुप ई के दोनों मुकाबले खेले जाएंगे। फिलाडेल्फिया में छोटे से कैरेबियाई देश कुराकाओ की टीम का सामना आइवरी कोस्ट से होगा। वहीं न्यू जर्सी के स्टेडियम में जर्मनी की मजबूत टीम इक्वाडोर के खिलाफ मैदान में उतरेगी। यदि कुराकाओ अपना मुकाबला जीत ले और जर्मनी, इक्वाडोर को हरा दे, तो कुराकाओ के लिए अगले दौर का रास्ता खुल सकता है।
इसके बाद भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े चार बजे ग्रुप एफ के दो मुकाबले होंगे। कंसास सिटी में नीदरलैंड्स का सामना ट्यूनीशिया से होगा। इस मैच में दुनिया की नजरें एक बार फिर नीदरलैंड्स के तेज और धारदार आक्रमण पर होंगी।
उधर डलास में जापान और स्वीडन आमने-सामने होंगे। स्वीडन ने इस विश्व कप में कई मुकाबलों में शानदार फुटबॉल खेली है, लेकिन किस्मत कई मौकों पर उसके साथ नहीं रही। इसके बावजूद उसके पास अब भी अगले दौर में पहुंचने का अवसर मौजूद है। जापान और स्वीडन के बीच यह मुकाबला किसी नॉकआउट मैच से कम नहीं होगा। जो टीम जीतेगी, उसके अभियान की उम्मीदें जीवित रहेंगी।
इसके बाद भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े सात बजे ग्रुप डी के अंतिम दो मुकाबले खेले जाएंगे। अपने शुरुआती दोनों मैच हारकर पहले ही विश्व कप से बाहर हो चुकी तुर्की की टीम लॉस एंजिलिस में अमेरिका के खिलाफ औपचारिक मुकाबला खेलने उतरेगी।
उधर, ठीक उसी समय पेराग्वे का सामना शानदार लय में चल रही ऑस्ट्रेलिया से होगा। यदि पेराग्वे यह मुकाबला जीत लेती है तो वह ऑस्ट्रेलिया को पीछे छोड़ते हुए अगले दौर में जगह बना सकती है। यही वजह है कि यह मुकाबला दोनों टीमों के लिए करो या मरो जैसा होगा।
तुर्की का प्रदर्शन इस विश्व कप की सबसे बड़ी निराशाओं में से एक रहा। युवा प्रतिभाओं से सजी इस टीम से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन अच्छा फुटबॉल खेलने के बावजूद वह पूरे टूर्नामेंट में एक भी गोल नहीं कर सकी। ऐसे में उनका अभियान बिना किसी जीत और बिना किसी गोल के समाप्त होता दिखाई दे रहा है।
विश्व कप के 2026 संस्करण से पहले मुख्य टूर्नामेंट में 32 टीमें हिस्सा लिया करती थीं। इस बार पहली बार 48 टीमें मैदान में उतरी हैं। यही कारण है कि हमें कई नए फुटबॉल राष्ट्रों को इस मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। काबो वर्दे, कुराकाओ और कई अफ्रीकी टीमों ने बड़े देशों के सामने भी निडर होकर फुटबॉल खेली है। स्वीडन और नॉर्वे जैसी टीमों ने भी आक्रामक अंदाज़ से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।
हार और जीत खेल का हिस्सा हैं, लेकिन अंतिम सीटी तक संघर्ष करते रहना विश्व कप की असली पहचान है। दुनिया भर में लाखों बच्चे इन मुकाबलों को देख रहे होंगे। शायद आने वाले वर्षों में इन्हीं में से कोई अगला मेस्सी, अगला नेमार या अगला विनीसियस बने।
ग्रुप चरण अब अपने अंतिम मोड़ पर है। कुछ टीमें नॉकआउट में जगह बना चुकी हैं, कुछ की किस्मत अब भी अगले 90 मिनट पर टिकी है और कुछ सपने आखिरी सीटी के साथ टूटने वाले हैं। लेकिन यही तो फीफा विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है, यहां हर मैच एक नई कहानी लिखता है और हर कहानी में किसी नए नायक के जन्म की संभावना होती है।
अब आगे से हर मुकाबले का दबाव कई गुना बढ़ जाएगा। एक छोटी-सी गलती पूरे अभियान का अंत बन सकती है, तो एक शानदार क्षण किसी खिलाड़ी को हमेशा के लिए अमर कर सकता है। विश्व कप अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां केवल फुटबॉल नहीं खेली जाती, बल्कि इतिहास लिखा जाता है। और इतिहास अभी बाकी है।
कभी गेंडा (Rhino), कभी कौआ, कभी कॉकरोच… सुनने में ये सब किसी सर्कस का हिस्सा या इंटरनेट का कोई मीम लग सकता है। लेकिन यकीन मानिए, इनके नाम से किए जाने वाले प्रयोग और उनके नतीजे इतने गहरे हैं कि ये टाइम टाइम पर दुनिया भर की सरकारों की अटेंशन हासिल करने में कामयाब रहे हैं..
साल 1984 की बात है, कनाडा में एक सैटायरिकल पार्टी जन्म लेती है – ‘राइनोसेरोस पार्टी’। उनका चुनावी वादा था कि अगर वे सत्ता में आए, तो ‘ग्रेविटी (Gravity) का नियम ही बैन कर देंगे!’ ये सुनकर हँसी आपको भी आई होगी कि कोई पॉलिटिकल पार्टी फिजिक्स के नियमों को कैसे झूठा साबित कर सकती है? लेकिन जब नतीजे आए, तो पूरी दुनिया हैरान थी। इस मजाकिया पार्टी को जनता ने इतने बंपर ‘प्रोटेस्ट वोट’ दिए कि यह कनाडा की चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। यही प्रयोग पोलैंड में ‘बियर लवर्स पार्टी’ के साथ हुआ। और कुछ ऐसा ही आजकल भारत की राजनीति में भी आप सुन रहे होंगे.. मैं बात कर रहा हूँ कॉकरोच जनता पार्टी की.. और इस वीडियो में मैं आपको इस पार्टी के आइडिया बनने से लेकर आखिरकार 2026 में इसकी ऑफिशियल घोषणा के बीच क्या क्या हुआ, वो सब बताने जा रहा हूँ।
साल 2016 की बात है… एक तरफ भारत की राजनीति में आम आदमी पार्टी का विस्तार हो रहा था, और दूसरी तरफ दिल्ली के एक बंद कमरे में एक विदेशी मास्टरमाइंड के साथ भारत के एक जाने-माने एक्टिविस्ट बैठे थे- ये एक्टिविस्ट थे योगेंद्र यादव। आपको लग सकता है कि ये कोई साधारण मीटिंग थी, लेकिन ऐसा नहीं था। योगेंद्र यादव, जो पिछले एक दशक में कई कंट्रोवर्शियल एंटी-इंडिया मोमेंट्स और अराजकता फैलाने वाले इवेंट के केंद्र में रहे हैं, वहां कुछ “सीक्रेट फॉर्मूले” समझा रहे थे। और जानते हैं इस बातचीत में क्या तय होता है? तीन ऐसे सीक्रेट फॉर्मूले… जो दुनिया की किसी भी चुनी हुई सरकार को घुटनों पर ला सकते हैं। उस वक्त किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह मुलाकात, ठीक 10 साल बाद, यानी आज, जून 2026 में भारत की राजनीति में सबसे बड़ी डिबेट बन जाएगी.. जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को आज सरकार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ बता रही है, क्या वह वाकई अचानक पैदा हुई है? या फिर यह योगेंद्र यादव और उसी पुराने ‘एक्टिविस्ट-नेक्सस’ का एक नया डिजिटल अवतार है?
क्या देश की मोदी सरकार का भी अब वही हाल होने वाला है जो कभी ‘अरब स्प्रिंग’ में वहाँ की सरकारों का हुआ था? क्या वाकई हमारे देश में, पर्दे के पीछे से Regime Change का एक ऐसा इंटरनेशनल ब्लूप्रिंट एक्टिवेट हो चुका है, जो सरकार को सीधे घुटनों पर ले आएगा?
क्या कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी की कल्पना कर सकता है, जो बिना किसी जमीनी रैली के, बिना किसी चुनावी फंड के, महज 7 दिनों के भीतर 2 करोड़ से ज्यादा युवाओं को अपने साथ जोड़ लेती है? एक ऐसी पार्टी जो देश की सबसे बड़ी रूलिंग पार्टी को सोशल मीडिया फॉलोअर्स के मामले में पीछे छोड़ देती है?
सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगता है। लेकिन मई 2026 में भारत ने इस थ्योरी को सच होते देखा। और इसका नाम है – कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)।
सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया। मंत्रियों ने कहा कि इसके पीछे पाकिस्तान और जॉर्ज सोरोस का हाथ है। और हर कोई ये तमाम बातें सुनकर हंस रहा था। आपको भी हँसी आई होगी.. लोगों का कहना है कि कॉकरोच नेशनल सिक्योरिटी के लिए खतरा कैसे हो सकता है? लेकिन इंटरनेट पर CJP की वेबसाइट और सोशल मीडिया हैंडल्स को रातों-रात ब्लॉक कर दिया गया। सवाल यह है कि क्या यह गुस्सा वाकई अचानक फूटा था? या फिर इसके पीछे एक ऐसा ग्लोबल मॉडल काम कर रहा था, जिसकी स्क्रिप्ट सालों पहले लिखी जा चुकी थी?
आज इस वीडियो में हम इस पूरी क्रोनोलॉजी और इसके पीछे के मैकेनिज्म को स्टेप-बाय-स्टेप डिकोड करेंगे। हम समझेंगे कि कैसे सत्ता को चुनौती देने के लिए एक ‘मजाकिया लहजे’, नौटंकी और मीम्स को हथियार बनाया जाता है, जिसे होशियार लोग नाम देते हैं, Laughtivism (हास्य-विरोध)। हम समझेंगे कि फिलीपींस मॉडल के जरिए पब्लिक मेंडेट को कैसे मैनिपुलेट किया जाता है, और सबसे बड़ा सवाल… कि इस पूरे खेल के केंद्र में कहीं वो चेहरा तो नहीं, जिसे इंटरनेट पर बरसों से एक खास नाम से ट्रोल किया जा रहा था, और जो आज अचानक व्लॉगिंग की आड़ में खुद को इस जाल से अलग दिखाने की कोशिश कर रहा है?
CHAPTER 1: आइडिया सीडिंग – ग्लोबल प्लेबुक (सर्बिया से भारत का कनेक्शन)
Ch 1: Global Playbook: Ideology Seeding
इस कहानी की शुरुआत मई 2026 से नहीं, बल्कि अमेरिका के एक राजनीतिक विचारक से होती है। नाम था जीन शार्प (Gene Sharp)। जीन शार्प कोई ऑन-ग्राउंड क्रांतिकारी नहीं थे, न ही कोई राजनीतिक नेता थे। उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन आधुनिक राजनीतिक आंदोलनों की दुनिया में उनका प्रभाव इतना बड़ा है कि कई लोग उन्हें ‘अहिंसक प्रतिरोध का मैकियावेली’ कहते हैं। (The Machiavelli of Non-Violent Resistance)
Sharp का एक बहुत बड़ा और बेसिक विचार था: सत्ता सिर्फ पुलिस, सेना और संसद से नहीं चलती। सत्ता चलती है जनता की ‘सहमति’ और उसके ‘सहयोग’ से। और अगर जनता सहयोग देना बंद कर दे… तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली शासन भी ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है। इसी विचार को उन्होंने अपनी किताब From Dictatorship to Democracy में लिखा, जो बाद में दुनिया भर के छात्र आंदोलनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गाइड बुक बन गई।
CHAPTER 2: सर्बिया – जहाँ पहला प्रयोग हुआ
Ch 2: Serbia’s “Otpor”: Birth of Laughtivism
जीन शार्प के इस विचार का जमीन पर पहला बड़ा प्रयोग हुआ आज से 28 साल पहले, साल 1998 में, सर्बिया में। उस समय सर्बिया पर स्लोबोदान मिलोशेविच (Slobodan Milošević) का शासन था। देश थका हुआ था, आर्थिक संकट में था और युवाओं में भारी असंतोष था। यहीं पर जन्म हुआ एक छात्र आंदोलन का, जिसका नाम था; ‘ओटपोर’ (Otpor), जिसका हिंदी में अर्थ होता है: प्रतिरोध (Resistance)
उन्होंने कोई पारंपरिक विरोध नहीं किया। उन्होंने बंदूकों या लाठियों के सामने सिर्फ नारेबाजी नहीं की। उन्होंने एक बिल्कुल नया हथियार चुना- उन्होंने लोगों को हँसाया, सत्ता का मजाक उड़ाया और व्यंग्य को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
जब पूरी दुनिया गंभीर राजनीतिक भाषण दे रही थी, तब Otpor के Activist सड़कों पर एक बड़ा ड्रम रख देते थे, जिस पर तानाशाह की तस्वीर होती थी। वो आम लोगों से कहते थे कि इसमें सिक्का डालो और सर्बिया के लीडर के सिर पर डंडा मारो। लोग हँसते थे, मजे लेते थे, फोटो खिंचवाते थे। नतीजा क्या हुआ? जनता के भीतर से सत्ता का वो खौफनाक डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा..
यहीं से उभरता है इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड; स्र्द्जा पोपोविच (Srdja Popović)। पोपोविच ने महसूस किया कि अगर आप बंदूक के सामने गुस्सा दिखाएंगे, तो सत्ता आपको कुचल देगी। लेकिन अगर कोई सरकार मीम, पोस्टर, व्यंग्य और चुटकुलों से डरने लगे… तो वह खुद जनता की नजरों में हास्यास्पद और कमजोर दिखने लगती है। इसी विचार को उन्होंने नाम दिया- Laughtivism (Laugh + Activism), यानी हँसी को राजनीतिक हथियार में बदल देना।
CHAPTER 3: डिलेमा एक्शन और ‘lose lose’ कंडीशन
Ch 3: Dilemma Action: Trap Tactics
पोपोविच ने साल 2013 के अपने ‘फॉरेन पॉलिसी’ मैगजीन के लेख और अपनी चर्चित किताब “Blueprint for Revolution” में एक Theory दी; जिसे कहते हैं ‘डिलेमा एक्शन’ (Dilemma Action)।
भारतीय लोकतंत्र में सर्बिया की थ्योरी एवं ‘डिलेमा एक्शन’ अप्लाई करने की विवेचना करते हुए योगेंद्र यादव का बयान इस लिंक पर सुन सकते हैं
यह एक ऐसी कंडीशन है जहाँ आप सरकार के सामने एक ऐसा जाल बुनते हैं कि वह जो भी फैसला ले, नुकसान उसी का होगा। अगर सरकार इस मजाक या मीम्स की अनदेखी करती है, तो आंदोलन को और खुली जगह मिलती है और वह बड़ा होता जाता है। और अगर सरकार इस पर गुस्सा होकर कानूनी कार्रवाई या दमन करती है, तो वह दुनिया और जनता की नजरों में बेहद क्रूर, असहिष्णु और डरपोक दिखाई देने लगती है। इसे कहते हैं ‘बैकफायर इफेक्ट’। साल 2000 में इसी थ्योरी के दम पर सर्बिया के तानाशाह का पतन हो गया।
उन्होंने ब्रिटेन के एक पॉपुलर सर्कस ग्रुप मोंटी पाइथन से प्रेरित होकर सड़कों पर नाटक किए, लोगों के मुद्दों से आसानी से जुड़ने वाले हँसी-मजाक किए और सत्ता का जमकर मजाक बनाया… और इसका परिणाम क्या हुआ? साल 2000 में सर्बिया के लीडर मिलोशेविच का पतन हो गया।
CHAPTER 4: Otpor से CANVAS का ग्लोबल नेक्सस
Ch 4: CANVAS: The Global Revolution School
सर्बिया की सफलता के बाद स्र्द्जा पोपोविच ने एक संगठन बनाया- CANVAS (Centre for Applied Nonviolent Action and Strategies)। नाम बहुत सीधा-साधा लगता है, लेकिन इसका असली मकसद था दुनिया भर के एक्टिविस्ट्स को यह सिखाना कि इस थ्योरी के दम पर आंदोलन कैसे खड़े किए जाते हैं। यह दुनिया भर के एक्टिविस्ट्स के लिए एक पाठशाला की तरह काम करता है
वैसे, इतिहास गवाह है कि जिन भी आंदोलनों के नाम के आगे ‘नॉन-वायलेंस’ या ‘अहिंसा’ का ठप्पा होता है, अक्सर उनका इस्तेमाल एनार्की (अराजकता) को छुपाने के लिए किया जाता है। चाहे फ्रांस की क्रांति हो या कोई और जन-आंदोलन, इतिहास हमें सिखाता है कि इन प्रयोगों के नाम पर अंततः जान और माल का नुकसान सिर्फ आम आदमी का होता है।
खैर, CANVAS ने अलग-अलग देशों के कार्यकर्ताओं और छात्र समूहों को ट्रेनिंग देना शुरू किया। और यह प्रयोग सर्बिया से निकलकर दुनिया भर में फैल गया। चलिए क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में इसके कुछ बड़े उदाहरण देखते हैं।
CHAPTER 5: इटली, आइसलैंड, ग्रीस और स्पेन – नेपाल का ‘डिजिटल एक्सपेरिमेंट’
Ch 5: Digital Experiments: Tech-Driven Disruptions
अगर आपको लगता है कि भारत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसा प्रयोग पहली बार हुआ है, तो आपको साल 2009 का इटली देखना चाहिए। वहाँ एक स्टैंड-अप कॉमेडियन था बेप्पे ग्रिलो (Beppe Grillo)। उसने देखा कि लोग मेनस्ट्रीम मीडिया से दूर जा रहे हैं और इंटरनेट पर समय बिता रहे हैं। बेप्पे ग्रिलो का पूरा करियर सिस्टम का मज़ाक उड़ाने में बीता था। उसने एक ब्लॉग शुरू किया, ऑनलाइन कम्युनिटी बनाई और सिस्टम का मजाक उड़ाते हुए प्रोटेस्ट रैलियां शुरू कीं। नतीजा क्या हुआ? साल 2009 में जनम हुआ Five Star Movement का। यह दुनिया का पहला ‘इंटरनेट-नेटिव’ राजनीतिक आंदोलन था, जिसने साबित किया कि एक ब्लॉग और सोशल नेटवर्क मिलकर एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन सकते हैं।
लेकिन ऐसा नहीं है कि राजनीतिक सिस्टम का मजाक उड़ाकर वोट बटोरने का यह तरीका नया है। इसका सबसे क्लासिक ऐतिहासिक उदाहरण है कनाडा की ‘राइनोसेरोस पार्टी’ (Rhinoceros Party)। जिसका उदाहरण मैंने शुरू में ही आपको दिया था कि सटायर के नाम पर शुरू की गई पार्टी ने वाक़ई में पूरे देश के पॉलिटिकल सिस्टम को हिला दिया और बिना एक भी सीट जीते देश की चौथी सबसे बड़ी ताकत बन गई। यानी जब-जब जनता को भड़काने के लिए मुद्दों की तलाश होती है, तब-तब व्यंग्य और नौटंकी को सबसे बड़ा सियासी हथियार बना लिया जाता है।
यही पैटर्न साल 2008 के आर्थिक संकट के दौरान आइसलैंड में दिखा, जहाँ फेसबुक के जरिए लोगों ने सरकार और संसद को चुनौती दी। साल 2010 में ग्रीस के कर्ज संकट में पहली बार दुनिया ने एक नई ताकत देखी- Outrage Amplification, यानी स्मार्टफोन, फेसबुक और ट्विटर के एल्गोरिदम के जरिए जनता के आक्रोश का कई गुना विस्तार कर देना। साल 2011 में स्पेन में भी यही सेम प्लेबुक अपनाई गई, जहाँ सोशल मीडिया आधारित 15-M आंदोलन से बाद में Podemos नाम की एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी का जन्म हुआ..
सिर्फ सर्बिया, इटली या कनाडा ही नहीं, हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी पिछले कुछ टाइम में एक ऐसी ही राजनीतिक सुनामी देखी गई। वहाँ के युवाओं ने पुरानी राजनीतिक पार्टियों और दशकों से जमे हुए नेताओं से तंग आकर एक बिल्कुल नया रास्ता चुना – ‘रैपर पॉलिटिक्स’ का रास्ता।
साल 2022 के काठमांडू म्युनिसिपल चुनाव में, एक युवा रैपर, बालेन शाह (Balen Shah), ने किसी बड़ी राजनीतिक मशीनरी का सहारा नहीं लिया। उन्होंने सोशल मीडिया, फेसबुक लाइव और अपने गानों के जरिए युवाओं से सीधा कनेक्ट किया। उनका कोई जमीनी कार्यकर्ता नहीं था, न ही कोई पारंपरिक रैली। फिर भी, उन्होंने काठमांडू के मेयर का चुनाव एक भारी अंतर से जीता।
नतीजा यह हुआ कि नेपाल की राजनीति के ‘बड़े खिलाड़ी’ जो सालों से राज कर रहे थे, वे पूरी तरह धराशायी हो गए। यह नेपाल की जनता का एक ऐसा ‘प्रोटेस्ट वोट’ था जिसने साबित कर दिया कि इंटरनेट के दौर में अगर आप जनता की भाषा (चाहे वो रैप हो या मीम) बोलते हैं, तो आप सिस्टम को ‘रिबूट’ कर सकते हैं। बालेन शाह की जीत ने पूरे दक्षिण एशिया के राजनीतिक रणनीतिकारों को एक नया सबक दिया: भाषण की जगह नैरेटिव्स ने ले ली..
नेपाल का यह प्रयोग भी CJP जैसे आंदोलनों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह काम कर रहा है, जहाँ एक गैर-राजनीतिक चेहरा, सिस्टम के प्रति जनता के गुस्से को ‘वोट’ में बदल देता है लेकिन नेपाल में जहाँ यह एक ‘ऑर्गेनिक’ जन-आक्रोश था, वहीं भारत में CJP जैसी पार्टियाँ उसी ‘पैटर्न’ को कॉपी करके एक ‘मैन्युफैक्चर्ड’ आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं। यह ऑर्गेनिक और आर्टिफिशियल के बीच का सबसे बड़ा फर्क है।
CHAPTER 6: अरब स्प्रिंग – क्रांति या रेजिम चेंज का टूल?
Ch 6: Arab Spring: Regime Change Tool
लेकिन इस प्लेबुक का सबसे बड़ा और खौफनाक चेहरा दिखा साल 2011 में, जिसे दुनिया ने नाम दिया- अरब स्प्रिंग (Arab Spring)। ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन, सीरिया… हर जगह ‘फेसबुक और ट्विटर रिवोल्यूशन’ जैसे शब्द गूंजने लगे। और ठीक इसी दौर में स्र्द्जा पोपोविच और उनका CANVAS नेटवर्क अचानक ग्लोबल चर्चा के केंद्र में आ गए।
कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और जांचों में यह बात सामने आई कि मिस्र के ‘अप्रैल 6 यूथ मूवमेंट’ के एक्टिविस्ट ने पहले ही सर्बिया जाकर Otpor और CANVAS के मॉडल्स की बाकायदा ट्रेनिंग ली थी।
व्यंग्य, डिसेंट्रलाइज्ड ऑर्गेनाइजेशन और डिजिटल नेटवर्क को हथियार बनाना… ये सब इसी ट्रेनिंग का हिस्सा थे। ‘6 अप्रैल यूथ मूवमेंट’ जैसे अरब क्रांतिकारियों ने CANVAS (पोपोविच) से सो कॉल्ड non वायलेंस की Toolkit सीखी, लेकिन पोपोविच का मानना है कि तानाशाह को हटाने से ज्यादा मुश्किल Stable Democracy बनाना है। अरब स्प्रिंग की शुरुआत में भले ही सोशल मीडिया और स्थानीय गुस्सा मुख्य कारण दिखे हों, लेकिन परदे के पीछे पोपोविच और CANVAS की पालिसी ने अरब के युवा क्रांतिकारियों को एक टूलकिट दे दी थी..
यहीं से कहानी सबसे विवादास्पद हो जाती है। आलोचकों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने सवाल उठाए कि CANVAS को फंड या सपोर्ट करने वाली संस्थाओं के तार अक्सर USAID, NED और जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी जैसे पश्चिमी नेटवर्कों से क्यों जुड़े मिलते हैं? जो संस्थाएं दुनिया भर में ‘लोकतंत्र और सिविल सोसाइटी’ को बढ़ावा देने का दावा करती हैं, उनका नाम जॉर्जिया, यूक्रेन, वेनेजुएला और मिस्र जैसे देशों में ‘रेजिम चेंज’ (सत्ता पलटने) की कहानियों से क्यों जुड़ जाता है? यानी, यह प्लेबुक सिर्फ एक Organic गुस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक पूरा ग्लोबल ट्रेनिंग मैकेनिज्म काम करता है।
CHAPTER 7: फिलीपींस – सोशल मीडिया का ‘पेशेंट जीरो’
Ch 7: Philippines: The Troll Army Model
अगर अरब स्प्रिंग ने यह दिखाया था कि सोशल मीडिया कैसे सत्ता को उखाड़ सकता है… तो फिलीपींस ने इस स्ट्रेटेजी को एक क़दम आगे जाकर इस्तेमाल किया… और यहाँ से डिजिटल मॉब साइकोलॉजी के प्रयोग देखने को मिले.. साल 2016 के फिलीपींस चुनाव में रोड्रिगो दुतेर्ते ने एक ऐसा खतरनाक मॉडल तैयार किया जो आज हर देश की राजनीति का हिस्सा बन चुका है। दुतेर्ते के अभियान ने लगभग 2 लाख डॉलर खर्च करके 400 से 500 पेशेवर साइबर सैनिकों यानी एक संगठित ‘ट्रोल आर्मी’ (Troll Army) की फौज तैयार की थी।
जिस तरह फिलीपींस में डिजिटल ट्रोल आर्मी का इस्तेमाल जनता की राय को मैनिपुलेट करने के लिए किया गया था, ठीक वही ‘डिजिटल मॉब’ अब भारत में एक ‘पढ़े लिखे Woke युवाओं की पार्टी’ का लबादा ओढ़कर आ गई है।
प्रसिद्ध लेखक पीटर पोमेरांतसेव ने अपनी किताब ‘This Is Not Propaganda’ में इस आधुनिक इंफॉर्मेशन वॉर को अच्छे से समझाया है। वो कहते हैं कि पुरानी तानाशाही जानकारी को ‘छिपाती’ थी, सेंसर करती थी। लेकिन आज की आधुनिक राजनीति जानकारी को छिपाती नहीं, बल्कि इंटरनेट पर सूचनाओं की ऐसी बाढ़ ला देती है, इतने विरोधाभासी नैरेटिव और Conspiracy Theories बाजार में छोड़ देती है कि आम नागरिक पूरी तरह भ्रमित हो जाता है। वह सच और झूठ का फर्क ही भूल जाता है।
फिलीपींस का सबसे बड़ा सबक यही है कि कोई भी देश क्यों न हो, जहाँ कहीं भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल ‘Weaponization of Information’ के लिए हुआ है, वहां का एक ही पैटर्न रहा है, हजारों फेक अकाउंट्स के जरिए एक डिजिटल Manufactured Outrage पैदा करना। भारत में CJP का इस्तेमाल भी ठीक इसी तरह के डिजिटल इकोसिस्टम के जरिए किया जा रहा है..
CHAPTER 8: भारत में गिरोह – द CANVAS नेक्सस
Ch 8: India: The CANVAS Nexus Uncovered
और यहीं से हमारे दिमाग़ में एक सवाल भी आता है कि क्या भारत में मई 2026 में उभरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का इस ग्लोबल प्लेबुक से कोई सीधा संबंध है? चलिए कड़ियों को जोड़ते हैं। और जानते हैं कि क्या रेजिम चेंज के इन तमाम प्रयागों के बाद अब बारी भारत की थी…?
साल 2016 में पोपोविच भारत आते हैं, LSE इंडिया समिट में। वहाँ उनकी मुलाकात होती है आम आदमी पार्टी (AAP) के सह-संस्थापक और राजनीतिक सिद्धांतकार योगेन्द्र यादव से। पिछले कुछ सालों में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स यानी LSE वैश्विक स्तर पर Anti-India Narrative गढ़ने का एक नया और सबसे बड़ा मंच बनकर उभरा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मंच के तार सीधे भारतीय आंदोलनों के चेहरों से जुड़े हैं? मुकुलिका बनर्जी, LSE के इसी इकोसिस्टम और वहाँ के साउथ एशिया सॉलिडैरिटी ग्रुप्स में ये मुकुलिका बनर्जी बेहद सक्रिय रही हैं।
जब घर का ही कोई सदस्य उस विदेशी यूनिवर्सिटी के थिंक-टैंक में बैठा हो जो नैरेटिव तय करता है, तो कड़ियाँ जोड़ना आसान हो जाता है।
आपको याद होगा, अप्रैल 2023 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) के छात्र करण कटारिया का मामला काफी चर्चा में रहा था.. करण कटारिया LSE स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में GS की पोजीशन के लिए उम्मीदवार थे। लेकिन उनके खिलाफ एक स्मीयर कैंपेन चलाया गया, करण कटारिया ने कहा था कि कैंपस में उनके खिलाफ नफरत फैलाने के लिए सोशल मीडिया और पर्चों का इस्तेमाल किया गया। उन्हें एक्स्ट्रिमिस्ट हिंदू बताकर चुनाव प्रक्रिया से Disqualified कर दिया गया।
यानी हर बार ‘नॉन-वायलेंट मूवमेंट’, ‘डेमोक्रेसी’, ‘रेज़िस्टेंस’ और ‘सिविल सोसाइटी’ के नाम पर जो नेटवर्क एक्टिव दिखता है, उसके सेंटर में कहीं न कहीं योगेन्द्र यादव और उनसे जुड़े लोग दिखाई देते हैं।
यही वजह है कि साल 2016 में जब CANVAS का मास्टरमाइंड स्र्द्जा पोपोविच भारत आता है, तो उसके स्वागत के लिए इसी LSE इंडिया समिट का मंच चुना जाता है। और वहाँ उसकी सीधी मुलाकात होती है आम आदमी पार्टी के सह-संस्थापक योगेन्द्र यादव से। दोनों के बीच एक लंबी, रिकॉर्डेड बातचीत होती है जिसमें पोपोविच आंदोलन के तीन मुख्य कोर सिद्धांत समझाते हैं…
1- आंदोलन का वैयक्तिकरण (Personalization): संघर्ष ऐसा हो जिसे आम आदमी व्यक्तिगत रूप से महसूस करे..
2- न्यूनतम प्रवेश बाधाएं (Low Entry Barriers): आंदोलन से जुड़ना इतना आसान और भय-मुक्त हो कि कोई भी शामिल हो सके- जैसे सिर्फ एक मीम शेयर करना या दीवार पर ग्राफिटी बना देना।
3- वर्चुअल से रियल का सफर: सोशल मीडिया के व्यूज को जमीनी एक्टिविस्ट/वॉलंटियर्स में बदलना।
पोपोविच का सबसे घातक हथियार रहा है ‘हँसी को शस्त्रीकरण (Weaponizing Humor)’। उन्होंने अपनी वर्कशॉप्स में एक्टिविस्ट्स को सिखाया कि कोई भी सत्ता मजाक को गंभीरता से नहीं लेती, और यहीं से वो अपनी कमजोरी दिखा बैठती है।
CJP इसीलिए कोई अचानक से भड़का हुआ जन-आक्रोश नहीं है, असल में यह पोपोविच की उस ‘हैंडबुक’ का एक आधुनिक डिजिटल अपडेट है, जिसे ‘कॉकरोच’ के नाम से भारत में लागू किया जा रहा है.. और उसके 2016 में बताए हुए ये तीनों सिद्धांत यहाँ कैसे फिट होते हैं – इस क्रोनोलॉजी को समझिए।
जो योगेन्द्र यादव इस पूरे मैकेनिज्म को समझ रहे थे, उन्हीं की पार्टी यानी ‘आम आदमी पार्टी’ के लिए साल 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में Meme-based campaign कौन संभाल रहा था? उनका एक यंग वॉलंटियर था – अभिजीत दिपके। जो बाद में बॉस्टन यूनिवर्सिटी में PR की पढ़ाई करने चला जाता है… ध्यान देने वाली बात है कि इस आंदोलन के रणनीतिकार खुद डिजिटल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन की दुनिया से हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि एल्गोरिदम के साथ कैसे खेलना है और किसी भी छोटे से मुद्दे को Global Narrative कैसे बनाना है।
योगेंद्र यादव और पोपोविच की उस मीटिंग को एक ‘पॉलिटिकल लैब’ की तरह समझिए। उस मीटिंग के तुरंत बाद, CANVAS के सिद्धांतों का पहला प्रयोग भारत में AAP के जरिए किया गया। और यहाँ हर जगह एक सूत्रधार था – योगेंद्र यादव – अगर आप पिछले 5-6 सालों की क्रोनोलॉजी देखें, तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है:
टेस्टिंग फेज (CAA-किसान आंदोलन): शाहीन बाग और किसान आंदोलनों के दौरान हमने पहली बार ‘विदेशी टूलकिट’ और संदिग्ध फंडिंग का मैकेनिज्म देखा। ED की जांच में यह खुलासा हुआ था कि कैसे कुछ विपक्षी नेताओं के तार सीधे उन नेटवर्क्स (जैसे PFI) से जुड़े थे, जिन्होंने देश में एनार्की फैलाने के लिए कैश रूट किया था। यह सिर्फ़ प्रोटेस्ट नहीं था, यह पोपोविच की ‘सॉफ्टवेयर ट्रेनिंग’ का भारतीय जमीन पर बीटा-टेस्टिंग था। किसान आंदोलन में भी योगेंद्र यादव फ्रंट फुट पर थे..
नैरेटिव बिल्डिंग (राहुल गांधी का सहारा): इन आंदोलनों को जब मुख्यधारा के नेताओं, जैसे राहुल गांधी और AAP के संजय सिंह, का समर्थन मिला, तो इन्हें ‘पॉलिटिकल ऑक्सीजन’ मिली। जांच एजेंसियों ने बताया था कि AAP के संजय सिंह के तार सीधे PFI, के उस मनी-ट्रेल नेटवर्क से जुड़े हुए थे, जो शाहीन बाग और दिल्ली के एंटी-CAA प्रोटेस्ट में पीछे से ‘फाइनेंशियल फ्यूल’ झोंक रहा था। और इस पूरे खेल का अल्टीमेट गोल क्या था? जमीन पर एक ऐसा भारी असंतोष और अराजकता का माहौल खड़ा कर देना, जिससे देश की सरकार पूरी तरह बैकफुट पर आ जाए।
यहाँ से यह क्लियर हो गया कि विदेशी स्ट्रैटेजी और विपक्षी नैरेटिव एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। और योगेंद्र यादव राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का भी एक चेहरा थे..
मास्टरी (लॉफ़्टिविज़्म और AAP): अरविंद केजरीवाल की राजनीति को याद कीजिए, वो रेनॉल्ड्स पेन, वो वैगन-आर कार और वो नौटंकी वाला अंदाज़.. तब लोगों ने इसे महज ‘ड्रामा’ समझा, लेकिन असल में यह CANVAS की ‘लॉफ़्टिविज़्म’ (Laughtivism) ट्रेनिंग का हिस्सा था। सत्ता का मजाक उड़ाकर खुद को ‘आम आदमी’ से जोड़ना और फिर उसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना। इस AAP पार्टी के तो शुरुआती मेंबर्स में से एक योगेंद्र यादव ख़ुद ही थे.. और इसी AAP के डिजिटल वॉलंटियर थे अभिजीत दीपके।
अभिजीत दिपके जैसे वॉलंटियर्स इसी ‘टैलेंट पाइपलाइन’ का हिस्सा थे। उन्हें पता था कि मीम्स और सोशल मीडिया के जरिए जनता के सेंटीमेंट को कैसे कैप्चर करना है।
और यहीं से एंट्री होती है उस पीढ़ी की, जिसने ‘डिजिटल वॉरफेयर’ को अपना पेशा बना लिया। अभिजीत दिपके जैसे युवा, जो उस वक्त AAP के वॉलंटियर थे, उन्हें उसी हैंडबुक की ट्रेनिंग दी गई।
दिपके नाम का ये वॉलंटियर उस ‘टैलेंट पाइपलाइन’ का पहला प्रोडक्ट था जो सीधे उस ग्लोबल नेक्सस से जुड़ा था। यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि जिस व्यक्ति ने 2020 में AAP के लिए मीम-कैंपेन की कमान संभाली, वही आज CJP के पीछे का मास्टरमाइंड है। ये कड़ियां दिखाती हैं कि कैसे पोपोविच की थ्योरी को पहले ‘टेस्ट’ किया गया और अब उसे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के जरिए एक बड़े पैमाने पर लॉन्च किया गया है..
CHAPTER 9: द ट्रिगर – अपमान का शस्त्रीकरण और CJP का उदय
Ch 9: CJP: Weaponizing Youth Insecurity
यानी ग्लोबल इंस्टीट्यूशन की ट्रेनिंग, विपक्ष का नैरेटिव और देश में टाइम टाइम पर एनार्की भड़काने के लिए आने वाली फंडिंग का यह पूरा आर्किटेक्चर पर्दे के पीछे पहले से ही लोड था। बस इंतजार था तो भारतीय जमीन पर एक ऐसे ‘लाइव ट्रिगर’ का, जिसे पब्लिक सेंटीमेंट के साथ जोड़कर ब्लास्ट किया जा सके।
और वो सटीक ट्रिगर मिला 15 मई 2026 को।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर लॉयर्स के पदनाम को लेकर एक PIL (संजय दुबे बनाम रजिस्ट्रार जनरल) की सुनवाई चल रही थी। बार-बार दायर होने वाली वाहियात PIL पर नाराजगी जताते हुए CJI सूर्यकांत ने एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो युवा अपने पेशे में रोजगार नहीं पाते, वे ‘कॉकरोच की तरह’ आरटीआई एक्टिविज्म, सोशल मीडिया और पत्रकारिता की ओर मुड़ जाते हैं और व्यवस्था पर हमला करने वाले ‘समाज के परजीवी’ बन जाते हैं।
भले ही, अगले ही दिन कोर्ट ने लिखित सफाई दी कि यह बयान सिर्फ फर्जी डिग्री धारकों के लिए थी, न कि सामान्य युवाओं के लिए। लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। अभिजीत दिपके के लिए यह एक परफेक्ट ‘अपॉर्च्यूनिटी मोमेंट’ था। उसने युवाओं के इस कथित ‘अपमान’ और उनकी दबी-कुचली इनसिक्योरिटी को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। ठीक अगले दिन, 16 मई 2026 को उसने गठन कर दिया- ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का।
CJP ने खुद को एक ‘व्यंग्यात्मक नागरिक सामूहिक’ कहा। इसकी सदस्य बनने की शर्तें सीधे युवाओं की हताशा से रिलेट करती थीं: आप बेरोजगार हों, शारीरिक रूप से आलसी हों लेकिन वैचारिक रूप से सक्रिय हों, और दिन में 11 घंटे इंटरनेट पर बिताते हों। उसने सटायर किया लेकिन लोगों ने इसे पर्सनलाइज किया, और ख़ुद से रिलेट करने लगे – इस उम्र में हर कोई दिन में दस बार याद दिलाता है कि तुम किसी काम के नहीं हो – और CJP ने इस फैक्टर को इस्तेमाल कर लिया..
हर जनरेशन में ऐसे युवाओं की कमी नहीं होती जिन्हें समाज में यूजलेस फील कराया जाता है। घर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक इस age में दिनभर में करीब करीब 2-4 बार तो रोज़ ही बच्चों को ये सुनने को मिलता है कि तुम यूजलेस हो.. CJP ने इस यूजलेस होने की भावना को ही युवाओं की ताकत और ‘कूल फैक्टर’ बना दिया।
नतीजा क्या हुआ? एक जैकपॉट। 48 घंटे में 40,000 सदस्य और हैशटैग #MainBhiCockroach वायरल। 5 दिनों में 1 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स और 7 दिनों में 2 करोड़ फॉलोअर्स! दावा किया गया कि इन्होंने देश की रूलिंग पार्टी (BJP) के ऑफिशियल इंस्टाग्राम हैंडल को भी पीछे छोड़ दिया।
CHAPTER 10: घोषणापत्र का जाल और सरकार की दुविधा
Ch 10: Manifesto Trap: Government Under Siege
लेकिन क्या यह सिर्फ एक मजाक था? नहीं। इस मजाक के पीछे जो मेनिफेस्टो तैयार किया गया था, वह लोगों को इस तरह से बताया गया जैसे ये समस्याएं देश में पहले कभी थी ही नहीं और सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन से ही इनको ठीक किया जा सकता है –
और इस बहाने जो सपना इनके मेनिफेस्टो में बेचा जा रहा है वो क्या है?
न्यायिक सुधार – Judicial Reform: किसी भी रिटायर्ड चीफ जस्टिस को तुरंत राज्यसभा की सीट या सरकारी पदनाम नहीं मिलेगा
चुनावी जवाबदेही – Electoral Integrity : अगर किसी नागरिक का वैध वोट बिना वजह काटा गया, तो मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधे UAPA लगेगा।
मीडिया की स्वतंत्रता: बड़े कॉर्पोरेट घरानों (अडानी-रिलायंस) के मीडिया हाउसों के लाइसेंस रद्द होंगे और पक्षपातपूर्ण एंकरों के बैंक खातों की जांच होगी।
इसके साथ ही, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज के इनपुट पर यह जोड़ा गया कि यह पार्टी पूरी तरह से RTI के दायरे में होगी और पीएम केयर्स की तर्ज पर कोई गोपनीय फंड नहीं बनाएगी।
CJP के मेनिफेस्टो की इन बातों को आप देखेंगे तो आपको लगेगा कि ये सभी बातें हर किसी को आकर्षित करती हैं, क्रांतिकारी किस्म की बातें हैं सभी.. लेकिन अगर आप देखेंगे तो राहुल गांधी तो ख़ुद लंबे टाइम से इन्हीं संस्थाओं पर हमला कर रहा है – और वो लगातार फेल भी होते रहे हैं – चाहे चुनाव आयोग को लेकर झूठ बोलते जाना या CEC पर वर्बल अटैक करना – न्यायपालिका को भी राहुल गांधी लगातार बिका हुआ कहते रहे हैं ताकि उसको भी डिस्क्रेडिट कर सकें.. और मीडिया के ख़िलाफ़ तो राहुल गांधी और उनके दरबारी लगातार लगे हुए हैं… आप देखेंगे तो CJP वाले कोई नई बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि इन तीनो मुद्दों पर राहुल गांधी लंबे टाइम से हमलावर ही है..
उदाहरण के लिए मीडिया की आजादी की ही बात को ले लो- कांग्रेस काल में क्या थी मीडिया की आजादी? पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता था, राइटर और सिंगर्स को कांग्रेस के टाइम पे सेंसर किया जाता था? मजरूह सुल्तानपुरी को तो नेहरू के ख़िलाफ़ नज़्म लिखने के लिए ही जेल में डाल दिया था… PM केयर्स से लेकर ये सब मुद्दे क्रांतिकारी और बड़े न्यूट्रल लगते हैं – लेकिन कोर में इन सबके सिर्फ़ और सिर्फ़ किसी भी तरह एनार्की क्रिएट कर के सत्ता हासिल करना ही होता है…
और वही हुआ जो पोपोविच के मॉडल में लिखा था। सरकार ने पैनिक होकर दमनकारी कदम उठाए। केंद्रीय मंत्रियों ने आरोप लगाया कि CJP के 49% फॉलोअर्स पाकिस्तान से हैं और इसके पीछे जॉर्ज सोरोस का हाथ है।
आख़िर में खुफिया ब्यूरो (IB) की रिपोर्ट पर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर CJP के एक्स हैंडल को ब्लॉक कर दिया, वेबसाइट उड़ा दी गई। लेकिन यहाँ सरकार अनजाने में ‘बैकफायर इफेक्ट’ का शिकार हो गई। जैसे ही सेंसरशिप लागू हुई, युवाओं के बीच यह संदेश और पुख्ता हो गया कि सत्ता वाकई एक डिजिटल मीम से डर गई है। आंदोलन को और जन-सहानुभूति मिल गई..
CHAPTER 11: ध्रुव राठी और कॉकरोच का कनेक्शन
Ch 11: The Rathee-Cockroach Connection Revealed
अब आते हैं इस पूरी इनवेस्टिगेशन के सबसे दिलचस्प और अंतिम पड़ाव पर। इस पूरे विवाद के बीच एक और समानांतर ट्रैक चल रहा है। भारत के सबसे बड़े यूट्यूबर्स में से एक- ध्रुव राठी, जिनके 36 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं, उन्होंने भी इस CJP आंदोलन का खुलकर समर्थन किया.. और हमें यहाँ से पता चलेगा कि आखिर यह ‘कॉकरोच’ शब्द आया कहाँ से और CJP के पीछे ध्रुव राठी का क्या कनेक्शन है?
इसे महज एक राजनीतिक आंदोलन समझना भूल होगी, यह एक ‘बिजनेस मॉडल’ है। बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ जब डिजिटल वॉरफेयर के लिए कंपनियों को हायर करती हैं, तो वे उनसे ‘डेमो’ मांगती हैं कि आप कैसे रातों-रात नैरेटिव सेट कर सकते हैं?
लेकिन यहाँ एक बहुत गहरी क्रोनोलॉजी और छुपा हुआ पैटर्न है, जिस पर आपका ध्यान जाना बेहद जरूरी है।
बहुत सारे सोशल मीडिया हैंडल्स पिछले कई सालों से ध्रुव राठी को काउंटर करने के लिए एक खास नाम से ट्रोल करते थे और वो नाम क्या था? ‘जर्मन कॉकरोच’। जरा सोचिए, इस नई उभरी पार्टी का नाम और Symbol क्या है? कॉकरोच! क्या यह महज एक इत्तेफाक है कि जिस नाम का इस्तेमाल एक कंटेंट क्रिएटर को ‘ट्रोल’ करने के लिए किया जा रहा था, ठीक उसी नाम और कीड़े को एक वेल प्लानंड पॉलिटिकल इवेंट का चेहरा बना दिया गया? ताकि उस गाली को एक ‘मेडल’ में बदला जा सके?
और दूसरा बड़ा विरोधाभास देखिए। ध्रुव राठी, जो हमेशा सरकार विरोधी पोलिटकल प्रॉपगैंडा वीडियो बनाने के लिए जाने जाते हैं, वो ठीक इसी टाइमलाइन के आस-पास अचानक से ‘लाइफस्टाइल व्लॉगिंग’ और ट्रेवल व्लॉगिंग करने लगते हैं। वो खुद को एक न्यूट्रल, पारिवारिक व्लॉगर के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं। आखिर क्यों?
क्या यह अचानक हुआ हृदय परिवर्तन है? या फिर यह खुद को इस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के सीधे ऑर्गेनाइज्ड लिंक से दूर दिखाने की एक सोची-समझी रणनीति है? क्योंकि कोई भी समझदार व्यक्ति जानता है कि भारत जैसे विशाल देश में, 2 करोड़ युवाओं की सेना रातों-रात सिर्फ एक अदालती बयान पर खड़ी नहीं हो सकती। इसकी तैयारी, इसके पीछे के ग्लोबल मॉडल्स की समझ इस पूरे इकोसिस्टम के पास पहले से मौजूद थी। ध्रुव राठी इस इकोसिस्टम के शीर्ष पर बैठे ‘डिजिटल एम्प्लीफायर’ हैं।
और आप देखिए, विजेता दहिया नाम का ये हिंदुओं को गाली देने वाला आदमी, जो ध्रुव राठी के वीडियो की स्क्रिप्ट लिखता है, वो आज इस कॉकरोच जानता पार्टी का प्रवक्ता बन गया है? ये सब सिर्फ़ कोसिंस्डेंस नहीं था.. बस एक मौके की तलाश थी..
लेकिन ध्रुव राठी इस बार सामने आकर सीधे संगठन का ठप्पा क्यों नहीं लगाना चाहते? इसके पीछे एक बैकस्टोरी है। पिछले लंबे समय से वो जिस Gen Z को अपनी ताकत मानकर चल रहे थे, उसने उन्हें निराश किया था। कुछ महीनों पहले ही, न्यू ईयर की शाम को; जब यही एज ग्रुप; पार्टी और एंजॉय करने के मूड में होता है, गिग वर्कर्स के नाम पर मार्केट ठप्प करने और अनरेस्ट पैदा करने की कोशिश की गई थी। उन्हें लगा था कि युवाओं का गुस्सा भड़केगा और सरकार बैकफुट पर आ जाएगी। इसके पीछे भी वही डिजिटल टूलकिट काम कर रही थी जिसे ध्रुव राठी जैसे इन्फ्लुएंसर्स ने ऑनलाइन हवा दी थी।
लेकिन हुआ क्या? ग्राउंड पर कोई प्रोटेस्ट पकड़ ही नहीं पाया और वो सिर्फ सोशल मीडिया पर एक हैशटैग बनकर रह गया। यही वजह है कि इस बार, उन्होंने खुद को ‘न्यूट्रल व्लॉगर’ के मास्क के पीछे छुपा लिया, ताकि सीधे नैरेटिव का ठप्पा न लगे और बैक-एंड से मॉडल को अप्लाई किया जा सके।
तो इस पूरी इनवेस्टिगेशन से हमें क्या समझ आता है? इसके तीन बड़े निष्कर्ष हैं:
1- जब सिस्टम किसी नाराज वर्ग को ‘कॉकरोच’ या ‘परजीवी’ कहता है, तो मॉडर्न कम्यूनिकेशन स्ट्रेटेजी उसी नाम को अपना हथियार बना लेती है। CJP ने ‘कॉकरोच’ शब्द को एक ऐसे जीव के रूप में री-ब्रांड कर दिया जो परमाणु हमले में भी सरवाइव कर सकता है, यानी कभी न खत्म होने वाला रेजिस्टेंस।
2- स्ट्रक्चरल रिजीडिटी का नुकसान: सरकार जब एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन को दबाने के लिए सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और आईटी एक्ट की धारा 69(ए) जैसे गंभीर टूल का इस्तेमाल करती है, तो वह अनजाने में पोपोविच के ‘डिलेमा एक्शन’ के जाल में फंसकर उसे सही साबित कर देती है। यानी सरकार ने अगर एक्शन लिया, तो आंदोलन और बढ़ेगा, और आंदोलन को वैधता मिलेगी.. और अगर कोई एक्शन ना लिया, तो ये लोग अपनी हरकतों को रिपीट करते ही रहेंगे.. और इसे ही कहते हैं चित भी मेरी पट भी मेरी..
3- लोकतंत्र का नुकसान: सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें जीत किसकी हो रही है? सच तो यह है कि इसमें देश के आम नागरिक और लोकतंत्र का नुकसान हो रहा है। फिलीपींस मॉडल की ही तरह, आज भारतीय राजनीति भी ‘आक्रोश के एल्गोरिदम’ (Outrage Algorithms) के जाल में उलझ चुकी है। जहाँ युवाओं को यह सिखाया जा रहा है कि केवल मीम्स, डिजिटल ट्रोलिंग और सोशल मीडिया हैशटैग के दम पर ‘रेजिम चेंज’ किया जा सकता है।
नतीजा यह है कि गंभीर सामाजिक और नीतिगत मुद्दे; जैसे शिक्षा सुधार, वास्तविक रोजगार और पेपर लीक, पीछे छूट गए हैं, और उनकी जगह डिजिटल मीम्स, ट्रोल आर्मी और फॉरेन फंडिंग के डिजिटल बहस ने ले ली है।
यह खेल सत्ता हासिल करने या उसे बचाने का हो सकता है, और इसे चलाने वाले लोगों के मकसद और टूल्स वही हैं जो सर्बिया में थे, जो नेपाल में थे, जो बांग्लादेश में थे… और अब हमारे देश में अजमाए जा रहे हैं। अभिजीत दिपके और ध्रुव राठी का यह इकोसिस्टम, जिसे हम ‘कैनवास नेक्सस’ कह रहे हैं, उन सभी मॉडल्स को भारत में उतारने की कोशिश की, जहाँ डिजिटल शोर के जरिए सत्ता पलटी जाती है, लेकिन भारत के लोकतंत्र में विदेशी जमीन पर तैयार की गई ये डिजिटल प्लेबुक हमेशा फेल साबित हुई है। क्योंकि इस देश के वोटर का मिजाज कोई विदेशी एल्गोरिदम तय नहीं कर सकता।
विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद बवाल मच गया है। विदेश मंत्रालय ने बुधवार (24 जून 2026) को 14वें ‘पासपोर्ट सेवा दिवस’ पर एक कार्यक्रम में बताया कि पासपोर्ट मुख्य रूप से यात्रा का दस्तावेज है और इसे नागरिकता के सबूत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। हालाँकि, अधिकारियों ने साफ किया कि यह सिर्फ भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है लेकिन यह नागरिकता साबित करने वाला दस्तावेज नहीं है।
जुलाई 2025 की ही बात है जब सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने कहा था कि आधार कार्ड कोई नागरिकता का सबूत नहीं है। वोटर ID कार्ड को भी नागरिकता का दस्तावेज नहीं माना जाता है। तो अब इस बात पर बहस छिड़ गई कि जब पासपोर्ट, आधार कार्ड और वोटर ID जैसे दस्तावेज नागरिकता का सबूत नहीं है तो फिर नागरिकता का सबूत है क्या? सबसे पहले बात पासपोर्ट और इसके नागरिकता का डॉक्यूमेंट ना होने की करते हैं।
पासपोर्ट होता क्या है?
पासपोर्ट वह सरकारी दस्तावेज है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति भारत से बाहर यात्रा कर सकता है और विदेश में अपनी पहचान/राष्ट्रीयता दिखा सकता है। भारत में पासपोर्ट का कानूनी आधार पासपोर्ट ऐक्ट, 1967 (Passports Act, 1967) है। इस कानून का उद्देश्य ही ‘पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज जारी करना’ और भारत से बाहर जाने को रेगुलेट करना है। यानी इसका काम यात्रा को वैध बनाना है ना कि नागरिकता का अंतिम फैसला देना।
भारत में पासपोर्ट का इतिहास क्या रहा है?
भारत में पासपोर्ट व्यवस्था की शुरुआत पहले विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। उससे पहले भारतीय पासपोर्ट जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। 1915 में ब्रिटिश सरकार ने Defence of India Act लागू किया और इसके तहत भारत में आने-जाने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य कर दिया गया।
युद्ध खत्म होने के बाद यह कानून समाप्त हो गया लेकिन सरकार चाहती थी कि पासपोर्ट व्यवस्था जारी रहे जिससे भारत की प्रणाली ब्रिटिश साम्राज्य के दूसरे देशों और दुनिया के बाकी देशों जैसी हो सके। इसी कारण 1920 में भारतीय पासपोर्ट ऐक्ट बनाया गया। बाद में पासपोर्ट ऐक्ट, 1967 आने के बाद इसी कानून का नाम ‘Passport (Entry into India) Act, 1920’ कर दिया गया। यह कानून आज भी भारत में प्रवेश करने वालों के लिए पासपोर्ट की अनिवार्यता से जुड़ा है और इसे गृह मंत्रालय देखता है।
आजादी के बाद पासपोर्ट जारी करने का विषय केंद्र सरकार के पास आया और इसे विदेश मंत्रालय को सौंपा गया। 1954 तक राज्य सरकारें विदेश मंत्रालय की ओर से पासपोर्ट जारी करती रहीं। फिर मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई और नागपुर में पहले पाँच रीजनल पासपोर्ट ऑफिस बनाए गए। 1959 में विदेश मंत्रालय के अधीन केंद्रीय पासपोर्ट और इमीग्रेशन संगठन बनाया गया।
पासपोर्ट से जुड़ा बड़ा कानूनी बदलाव 1966 में आया। सतवंत सिंह साहनी बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया कानून से तय होनी चाहिए ताकि सरकार मनमाने तरीके से पासपोर्ट रोक या जारी न कर सके। इसके बाद सरकार ने 1967 में पासपोर्ट अधिनियम लाया और फिर पासपोर्ट ऐक्ट, 1967 बनाया। यह कानून 24 जून 1967 से लागू हुआ। इसी तारीख को विदेश मंत्रालय हर साल पासपोर्ट सेवा दिवस के रूप में मनाता है।
बाद में पासपोर्ट ऐक्ट में 1978, 1993 और 2001 में संशोधन हुए। इसी कानून के तहत केंद्र सरकार ने पासपोर्ट नियम बनाए हैं। पासपोर्ट आवेदन फॉर्म और उससे जुड़ी जानकारी भी इन्हीं नियमों का हिस्सा मानी जाती है।
क्या गैर-भारतीयों को भी मिल सकता है पासपोर्ट?
Passports Act की धारा 3 कहती है कि कोई व्यक्ति भारत से बाहर जाने का प्रयास तभी कर सकता है, जब उसके पास वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज हो। धारा 4 पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेजों की श्रेणियाँ बताती है। इसलिए पासपोर्ट को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि यह व्यक्ति की विदेश यात्रा के लिए अनुमति और पहचान का दस्तावेज है। विदेश में यह भारतीय राज्य की ओर से व्यक्ति की पहचान/राष्ट्रीयता को प्रस्तुत करता है लेकिन नागरिकता का मूल पासपोर्ट नहीं है।
ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि तो क्या किसी ऐसे शख्स को भी पासपोर्ट मिल सकता है जो भारत का नागरिक नहीं है। इसका सीधा जवाब है, हाँ और यह हमें पासपोर्ट ऐक्ट में ही मिलता है। पासपोर्ट ऐक्ट की धारा 20 कहती है, “केंद्र सरकार ऐसे व्यक्ति को, जो भारत का नागरिक न हो, पासपोर्ट या यात्रा-दस्तावेज जारी कर या करवा सकेगी यदि उस सरकार की यह राय हो कि ऐसा करना लोकहित में आवश्यक है।“
पासपोर्ट ऐक्ट की धारा 20
पासपोर्ट क्यों नहीं है नागरिकता का सबूत?
यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सामान्य तौर पर भारतीय पासपोर्ट भारतीय नागरिकों को जारी होता है, इसलिए पासपोर्ट बहुत मजबूत साक्ष्य माना जा सकता है। लेकिन कानून की भाषा में साक्ष्य और निर्णायक सबूत अलग चीजें हैं। पासपोर्ट किसी व्यक्ति की नागरिकता के पक्ष में साक्ष्य हो सकता है लेकिन यह अपने आप नागरिकता का अंतिम प्रमाण-पत्र नहीं बन जाता।
विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट मैनुअल में यह बात साफ तौर पर कही गई है कि पासपोर्ट धारक की नागरिकता का साक्ष्य देता है लेकिन यह किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति से संबंधित अन्य साक्ष्यों की ही श्रेणी में शामिल है। इसका कारण यह है कि पासपोर्ट में पूर्ण नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता है।
पासपोर्ट मैनुअल
इसका दूसरा कारण यह है कि पासपोर्ट जारी करने वाली अथॉरिटी नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं करती है। पासपोर्ट के लिए दस्तावेज, पुलिस सत्यापन और पासपोर्ट के आधार पर जाँच की जाती है लेकिन नागरिकता का वास्तविक कानूनी ढाँचा नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे जुड़े नियम हैं। अगर किसी मामले में नागरिकता विवाद पैदा हो जाए तो पासपोर्ट आपका अंतिम जवाब नहीं होगा बल्कि वह केवल एक साक्ष्य जैसा होगा।
विपक्ष का हंगामा और सरकार का जवाब?
कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार के इस बयान पर सवाल उठाते हुए X पर लिखा, “पासपोर्ट जारी करने से पहले सरकारी एजेंसियाँ जिनमें पुलिस भी शामिल है, आखिर किस बात की जाँच करती हैं? विदेशी देशों और इमिग्रेशन काउंटरों का क्या होगा? क्या अब उन्हें यह मानना चाहिए कि भारतीय पासपोर्ट रखने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि भारतीय नागरिक ही हो?”
Modi govt has said that Passport is not a proof of citizenship
• Isn’t passport a document issued by a sovereign nation to its citizens for international travel?
• Does this mean non-Indian citizens have been issued an Indian passport?
कपिल सिब्बल ने भी उन पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने X पर लिखा, “24 जून 2026 को कहा गया कि ‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का दस्तावेज नहीं।’ तो फिर नागरिकता का प्रमाण कौन-सा दस्तावेज है? अगर BLO मेरी नागरिकता पर शक कर सकता है और मुझे वोट देने के अधिकार से वंचित कर सकता है, तो इसका नतीजा क्या होगा? भाजपा चुनाव जीत जाएगी। अब मामला सुप्रीम कोर्ट के हवाले है।”
MEA June 24, 2026 :
“A passport is a travel document, and not a document of citizenship.”
Which document then is proof of citizenship?
BLO can doubt my citizenship Deprive me of my vote
इस मामले पर विपक्ष के सवाल और हंगामे के बीच सरकार ने भी जवाब दिया है। PTI ने केंद्र सरकार के सूत्रों के हवाले से लिखा है, “पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रहा है और मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में इस दस्तावेज को लेकर कोई नया फैसला नहीं लिया है।”
सूत्रों का कहना है, “विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने की मीडिया रिपोर्टों पर कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं, सूत्रों ने कहा कि यह कोई कल लिया गया नया फैसला नहीं है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा।”
STORY | Passport was never citizenship proof: Govt sources
Passport has never been a citizenship proof and no new decision was taken on the document by the Modi government in the last 12 years, government sources said on Thursday.
पहले भी अदालतें कह चुकी हैं कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं
यह कोई नई बात नहीं है जब पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया है। 2013 के एक फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि पासपोर्ट, आधार कार्ड या जन्म प्रमाणपत्र को अकेले नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट 4 लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिन पर बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने का आरोप था।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में 2013 की यह रिपोर्ट छपी है। इस रिपोर्ट में लिखा गया है, ”जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट और आधार कार्ड यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते कि आप भारतीय नागरिक हैं। खासकर अगर आपका जन्म एक जुलाई 1987 के बाद हुआ है।”
बॉम्बे हाईकोर्ट का एक हालिया फैसला भी इसी बात को साफ करता है। अगस्त 2025 में ‘बाबू अब्दुल रूफ सरदार बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में जस्टिस अमित बोरकर ने बांग्लादेशी नागरिक की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। उस व्यक्ति पर अवैध रूप से भारत में घुसने और फर्जीवाड़े के जरिए दस्तावेज हासिल करने का आरोप था।
अदालत ने कहा कि भारत में नागरिकता या राष्ट्रीयता से जुड़े सवालों को तय करने के लिए नागरिकता ऐक्ट, 1955 मुख्य और नियंत्रक कानून है। यही कानून बताता है कि कौन भारतीय नागरिक हो सकता है, नागरिकता कैसे हासिल की जा सकती है और किन परिस्थितियों में नागरिकता खत्म हो सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आधार कार्ड, PAN कार्ड या वोटर ID जैसे दस्तावेज होने भर से कोई व्यक्ति अपने आप भारत का नागरिक नहीं बन जाता।
नागरिकता तय करने का असली कानून कौन-सा है?
भारत में नागरिकता का मूल ढाँचा संविधान और नागरिकता ऐक्ट, 1955 से आता है। संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 में नागरिकता से जुड़े मूल प्रावधान हैं। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अधिग्रहण, समाप्ति और नागरिकता से संबंधित सभी मामलों पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है। इसी आधार पर नागरिकता ऐक्ट, 1955 बनाया गया।
यही कानून बताता है कि कौन व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाएगा, कौन भारतीय नागरिक बन सकता है, और किन हालात में किसी की नागरिकता खत्म हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति जन्म से भारतीय है, विदेश में भारतीय माता-पिता से पैदा हुआ है, या बाद में रजिस्ट्रेशन/नेचुरलाइजेशन के जरिए भारतीय नागरिक बनना चाहता है, तो इन सभी मामलों के नियम इसी कानून में दिए गए हैं।
गृह मंत्रालय के Indian Citizenship Online Portal पर भी साफ बताया गया है कि भारतीय नागरिकता नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत प्राप्त की जा सकती है। इस कानून के अनुसार नागरिकता मुख्यत: पाँच आधारों पर मिल सकती है। धारा 3 के तहत जन्म से नागरिकता, धारा 4 के तहत वंशानुक्रम द्वारा नागरिकता, धारा 5 के तहत पंजीकरण द्वारा नागरिकता, धारा 6 के तहत देशीकरण यानी naturalisation द्वारा नागरिकता और धारा 7 के तहत किसी भू-भाग के भारत में समावेशन के आधार पर नागरिकता।
indiancitizenshiponline.nic.in
सबसे जरूरी बात यह समझनी है कि भारत में हर नागरिक के पास अलग से कोई एक जैसा ‘नागरिकता प्रमाण पत्र’ होना जरूरी नहीं होता। भारत में करोड़ों लोग जन्म से भारतीय नागरिक हैं लेकिन उनके पास अलग से ‘Indian Citizenship Certificate’ नहीं होता।
जिन लोगों ने बाद में भारत की नागरिकता ली है, उनके लिए अलग व्यवस्था होती है। अगर किसी व्यक्ति को पंजीकरण के जरिए भारतीय नागरिकता मिली है, तो उसे Certificate of Registration मिलता है। अगर किसी व्यक्ति को देशीकरण यानी naturalisation के जरिए नागरिकता मिली है, तो उसे Certificate of Naturalisation मिलता है। इसी तरह CAA के तहत पात्र लोगों को नागरिकता मिलने पर भी सरकार की ओर से प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। ऐसे मामलों में यही प्रमाण पत्र नागरिकता का साफ दस्तावेज माना जाता है।
हालाँकि, जो लोग भारत में पैदा हुए हैं और जन्म से नागरिक हैं, उनके पास आम तौर पर ऐसा कोई अलग नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं होता। ऐसे लोगों की नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, उनके नागरिकता से जुड़े रिकॉर्ड, स्कूल के दस्तावेज, निवास से जुड़े रिकॉर्ड, सरकारी कागजात और जरूरत पड़ने पर अन्य सहायक दस्तावेज देखे जा सकते हैं। यानी जन्म से नागरिकता वाले मामलों में कोई एक दस्तावेज हर स्थिति में अंतिम प्रमाण नहीं होता बल्कि दस्तावेजों और कानून के आधार पर पूरी स्थिति देखी जाती है।
इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि दिल्ली में अगर आपको ‘राष्ट्रीयता प्रमाण-पत्र’ चाहिए तो उसके लिए आवेदन करना होता है। इसमें आवेदक की जानकारी के साथ-साथ कुछ सहायक डॉक्यूमेंट भी माँगे जाते हैं। दिल्ली सरकार की वेबसाइट पर दिए गए इस फॉर्म में इन कागजातों का जिक्र है। आवेदनकर्ता को सबसे पहले पूरा भरा हुआ आवेदन फॉर्म जमा करना होता है, जिसे क्लास-1 गजेटेड अधिकारी से सत्यापित कराना जरूरी है।
इसके साथ आधार नंबर देना होता है। अगर आधार नंबर उपलब्ध नहीं है, तो आधार एनरोलमेंट नंबर देना होगा और पहचान के लिए PAN कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड या पहचान पत्र में से कोई एक दस्तावेज देना होगा। आवेदनकर्ता के आधार कार्ड पर लिखा नाम आवेदन में दिए गए नाम से मेल खाना चाहिए।
आवेदन जमा करते समय या वेरिफिकेशन के समय आवेदनकर्ता की फोटो वेब कैमरे से ली जाएगी। यह फोटो आधार कार्ड पर लगी फोटो से मेल खानी चाहिए। इसके अलावा निर्धारित फॉर्मेट में शपथपत्र देना होगा। अगर मामला 18 साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़ा है, तो शपथपत्र किसी वयस्क व्यक्ति की ओर से दिया जाएगा।
वर्तमान पते के प्रमाण के लिए वोटर कार्ड, बिजली बिल, पानी बिल, टेलीफोन बिल जैसे दस्तावेज दिए जा सकते हैं। इसके साथ भारत का जन्म प्रमाण पत्र या देशीकरण से जुड़ा प्रमाण पत्र भी जमा करना होगा। इसके अलावा क्लास-1 गजेटेड अधिकारी से नागरिकता के संबंध में प्रमाण पत्र भी देना होगा।
राष्ट्रीयता प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन का एक हिस्सा
भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज कानूनी रूप से मान्य माने जाएँगे, इस पर कोई एक साफ और अंतिम सूची सामने नहीं दिखती। 20 दिसंबर 2019 को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने NRC से जुड़े सवाल-जवाब में कहा था कि नागरिकता साबित करने के लिए जन्म की तारीख और जन्म-स्थान से जुड़े दस्तावेज दिए जा सकते हैं। हालाँकि, उसी जवाब में यह भी साफ किया गया था कि ऐसे स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
दिसंबर 2019 में केंद्र सरकार की ओर से जारी प्रेस रिलीज में भी यही बात दोहराई गई थी। सरकार ने कहा था कि नागरिकता के प्रमाण के तौर पर कौन-कौन से दस्तावेज स्वीकार किए जाएँगे, इस बारे में अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। यानी उस समय तक सरकार ने आधार, पासपोर्ट, वोटर ID, PAN कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र या किसी अन्य दस्तावेज को अलग से नागरिकता का अंतिम प्रमाण घोषित नहीं किया था।
फरवरी 2020 में संसद में भी सरकार से यही सवाल पूछा गया था कि क्या आधार, पासपोर्ट, वोटर ID, PAN कार्ड या जन्म प्रमाण पत्र को नागरिकता का पक्का प्रमाण माना जा सकता है। इस पर गृह मंत्रालय ने किसी एक दस्तावेज को अंतिम प्रमाण नहीं बताया। मंत्रालय का जवाब यही था कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके नियमों के आधार पर होगा। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत में नागरिकता का सवाल किसी एक कागज से नहीं बल्कि कानून और दस्तावेजों की पूरी जाँच से तय होता है।
22 जून 2026 को विकिपीडिया ने अपने को-फाउंडर लैरी सैंगर पर कम्युनिटी बैन लगा दिया। एडिटर्स के एक ग्रुप ने उन पर ऑफ़-विकि कैन्वसिंग (विकिपीडिया के बाहर प्रचार करने), प्लेटफॉर्म को विचारधारा की लड़ाई का अखाड़ा बनाने और मौजूदा कंटेंट सिस्टम के खिलाफ यूजर्स को एकजुट करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था, जिसके बाद उन्हें इनसाइक्लोपीडिया में बदलाव करने से रोक दिया गया।
Well, that’s that—I’ve been blocked by Wikipedia “indefinitely” for unstated reasons, by the “consensus” of a mob. There was no due process, no prosecutor, no dispassionate judge, no jury, no interpretation of law. All my judges were self-selected and hated me. 🤣 pic.twitter.com/N57BRWTG4K
इस पर अंतिम फैसला एडमिनिस्ट्रेटर्स के बीच लंबी बातचीत के बाद लिया गया, जिसमें सैंगर पर बैन लगाने को लेकर ‘सहमति’ बनी। फैसला सुनाने वाले एडमिनिस्ट्रेटर का कहना था कि सैंगर ने विकी के बाहर कैंपेनिंग (ऑफ-विकी कैनवासिंग) की थी, वे ‘एनसाइक्लोपीडिया को रचनात्मक’ बनाने वाले लोगों में नहीं थे और उन्होंने गुमनाम एडिटर्स की पहचान उजागर करने (आउटिंग) की माँग की थी और इसको लेकर चिंता जताया था। इसे भी ‘नियम का उल्लंघन’ माना गया।
शुरुआत में एक एडमिनिस्ट्रेटर ने सैंगर को तभी बैन कर दिया, जब उनके मुद्दे पर 72 घंटे की चर्चा खत्म भी नहीं हुई थी। हालाँकि इस कार्रवाई को वापस ले लिया गया। इसके बाद प्रक्रिया के पूरे होने का इंतजार किया गया । इसके बाद एक दूसरे एडमिनिस्ट्रेटर ने औपचारिक तौर पर कम्युनिटी बैन की सजा को लागू कर दिया।
यह कार्रवाई सैंगर के CNN-News18 पर आने और विकिपीडिया के साफ तौर पर वामपंथी झुकाव, हिंदू-विरोधी मानसिकता और उसके सोर्स-कंट्रोल सिस्टम के बारे में बात करने के बाद लिया गया। उन्होंने खुल कर कंजर्वेटिव और गैर-वामपंथी प्रकाशनों को बाहर रखने के तरीके के बारे में बताया था । इसके कुछ दिनों बाद ही उनपर बैन लगाने की कार्रवाई हुई।
दरअसल इस इंटरव्यू का जिक्र विकिपीडिया की आंतरिक कार्यवाही में किया गया और उन्हें हटाने की माँग करने वाले एडिटर्स ने इसका इस्तेमाल किया। गौरतलब है कि सैंगर विकिपीडिया के मुखर आलोचक रहे हैं और उन्होंने कई बार आरोप लगाया है कि इस पर वामपंथी विचारधारा का कब्जा हो गया है। 2020 में OpIndia के साथ बातचीत के दौरान भी उन्होंने ऐसा ही कहा था।
कब शुरू हुआ ये मामला
यह विवाद सैंगर के ‘विकिप्रोजेक्ट इंटेलेक्चुअल डाइवर्सिटी’ (WPID) का प्रस्ताव रखने और सोशल मीडिया के जरिए बाहर से लोगों को इस चर्चा में शामिल होने के लिए कहने पर शुरू हुआ। उन्होंने मानना था कि यह एडिटर्स का ऐसा ग्रुप होगा, जो निष्पक्ष फैसला लेने, सच्ची जानकारी देने, ज्यादा सोर्स का इस्तेमाल करने, एडमिनिस्ट्रेटिव जवाबदेही के साथ-साथ उन नजरियों को जगह देगा, जिन्हें विकिपीडिया से बाहर कर दिया गया है।
इस प्रोजेक्ट में एक ‘पॉलिसी स्कैनर’ भी शामिल था जो 90 से ज्यादा पॉलिसी पेजों, नोटिसबोर्ड और अंदरूनी चर्चाओं पर नजर रखता। सैंगर ने कहा कि यह सिर्फ यूजर्स को जरूरी बहसों के बारे में अलर्ट करेगा और किसी को यह नहीं बताएगा कि क्या लिखना है या कैसे वोट करना है।
हालाँकि विकिपीडिया एडिटर्स का दावा था कि इस प्रोजेक्ट का मकसद आर्टिकल को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि एक लॉबिंग ग्रुप की तरह काम करना था। उनका दावा था कि स्कैनर एक जैसी सोच वाले एडिटर्स को पॉलिसी विवादों की ओर ले जा सकता है, जिससे विकिपीडिया की ‘आम सहमति’ प्रभावित हो सकती है। उन्होंने WPID की ‘भरोसेमंद सोर्स’, ‘उचित महत्व’ और ‘दरकिनार किए गए विचारों’ से जुड़े नियमों पर फिर से विचार करने की माँग पर भी आपत्ति जताई।
करीब 5 दिनों में 113 एडिटर्स ने 396 कमेंट्स किए, जिसके बाद प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। क्लोजिंग नोट में कहा गया कि WPID मुख्य रूप से एक एडवोकेसी और पॉलिसी-लॉबिंग ग्रुप के तौर पर काम करेगा और इसके स्कैनर और लोगों को जोड़ने की कोशिशों से ‘ऑर्गनाइज़्ड कैनवासिंग या वोट-स्टैकिंग’ (संगठित तरीके से वोट जुटाने या हेरफेर करने) का खतरा है।
विकिपीडिया एडिटर्स ने जिस तरह से WPID के खिलाफ विरोधी तेवर अपनाए, वह उम्मीद के मुताबिक ही था। विकिपीडिया के को-फाउंडर सैंगर इस प्लेटफॉर्म पर ज्यादा स्पष्टता और जवाबदेही लाना चाहते थे, जो वामपंथी प्रोपेगैंडा का अड्डा बन गया है। विकिपीडिया अक्सर अपने फैसलों को आम सहमति की तरह पेश करता है, लेकिन जब एक ग्रुप ने उस सहमति के पीछे की वैचारिक मान्यताओं पर सवाल उठाने की कोशिश की, तो उसे खतरनाक माना गया।
CNN-News18 का इंटरव्यू सैंगर के खिलाफ सबूत बन गया
सैंगर 20 जून 2026 को CNN-News18 के ‘प्लेन स्पीक’ पॉडकास्ट में शामिल हुए। इंटरव्यू के दौरान, सैंगर ने कहा कि विकिपीडिया की मुख्य समस्या यह है कि वह किसे भरोसेमंद सोर्स मानता है, इस पर उसका कंट्रोल है। उन्होंने बताया कि प्लेटफॉर्म ज्यादातर वामपंथी और पहले से तय सोर्स को चुनता है, जबकि कंजर्वेटिव या दक्षिणपंथी झुकाव वाले पब्लिकेशन को बाहर रखता है। ऐसे में आर्टिकल को निष्पक्ष कैसे कहा जा सकता है, इसमें सिर्फ घोषित सोर्स के पहलू को सही ढंग से दिखाया जाता है।
भारत के बारे में बात करते हुए सैंगर ने कहा कि उनका मानना है कि विकिपीडिया का हिंदू-विरोधी झुकाव एक सच्चाई है, हालाँकि उन्होंने माना कि वे इसकी ‘असली वजह’ को पक्के तौर पर साबित नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि पश्चिमी वामपंथी पत्रकार अक्सर मुसलमानों का नजरिया दिखाने की कोशिश करते हैं और उसकी ओर झुके होते हैं। यही विचारधारा विकिपीडिया के स्रोतों के जरिए आ गई है।
सैंगर ने यह भी कहा कि वामपंथियों ने विकिपीडिया पर भी उसी तरह कब्जा कर लिया है, जैसे उन्होंने दूसरे सांस्कृतिक संस्थानों पर किया था। उनके मुताबिक, 2010 तक विकिपीडिया का झुकाव BBC और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसा होने लगा था । ब्रेक्जिट और डोनाल्ड ट्रंप के पहले चुनाव के बाद यह और भी साफ हो गया।
जब उनसे पूछा गया कि जो भारतीय और हिंदू विकिपीडिया को पक्षपाती मानते हैं, वे क्या कर सकते हैं, तो सैंगर ने उन्हें विकिपीडिया और WPID से जुड़ने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सक्रिय रूप से एडिट करने वाले लोगों का समुदाय ज्यादातर पाठकों की सोच से कहीं छोटा है। उनका मानना है कि भारत में इतने पढ़े-लिखे लोग हैं कि वे कई काबिल लेखक तैयार कर सकते हैं जो यह सीख सकें कि यह प्लेटफॉर्म कैसे काम करता है। ……………. इसी बात से विकिपीडिया के एडिटर्स नाराज हो गए। उन्होंने इन बातों को ‘कैन्वसिंग’ (समर्थन जुटाने की कोशिश) का सबूत बताया। उन्होंने इस निमंत्रण को भारतीय या हिंदू एडिटर्स का ग्रुप तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा, ताकि अंदरूनी हालात को बदला जा सके। ऐसे एडिटर्स उस गलत जानकारी को ठीक कर सकते हैं जो भारत और हिन्दुओं के खिलाफ फैलाई जा रही है। इसलिए इसे विकिपीडिया के अस्तित्व के लिए खतरा बता दिया गया।
विकिपीडिया ने उन्हें बैन क्यों किया?
OpIndia ने उस चर्चा को देखा जिसका लिंक सैंगर ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर शेयर किया था। एडमिनिस्ट्रेटर्स की चर्चा सिर्फ एक सोशल-मीडिया पोस्ट या एक टीवी इंटरव्यू से कहीं अधिक थी।
सैंगर ने कहा कि विकिपीडिया से जुड़े लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या WPID को मंजूरी दी जानी चाहिए। कई लोगों ने इसका विरोध किया तो कुछ ने समर्थन। एडिटर्स का तर्क था कि अपने 90000 से ज्यादा फॉलोअर्स को बेवजह परेशान करने जैसा है, क्योंकि इसमें विकिपीडिया के बाहर उन्हें ‘पक्षपातपूर्ण जानकारी’ मिलेगी।
उन्होंने एक पुरानी पोस्ट का भी जिक्र किया, जिसमें सैंगर ने लिखा था कि वामपंथियों ने विकिपीडिया पर कब्जा कर लिया है और कोई वजह नहीं है कि दूसरे लोग ‘वापस कब्जा’ न कर सकें। सैंगर ने बाद में ऐसी भाषा के इस्तेमाल पर अफसोस जताया, लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे कि विकिपीडिया पर विचारधारा के आधार पर कब्जा कर लिया गया है।
अन्य आरोपों में यह दावा भी शामिल था कि उन्होंने हाल के दिनों में बहुत कम आर्टिकल एडिट किए हैं। अपना ज्यादातर वक्त विकिपीडिया में सुधार लाने में लगाई हैं। गुमनाम एडमिनिस्ट्रेटर्स की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि ताकतवर और ऊँचे पदों पर बैठे लोगों की पहचान सार्वजनिक होनी चाहिए। इसका उनके विरोधियों ने ‘डॉक्सिंग’ (किसी की निजी जानकारी सार्वजनिक करना) की तरह पेश किया। हालाँकि सैंगर ने इस आरोप को खारिज कर दिया।
सैंगर बुरी नीयत से निजी जानकारी उजागर करने और पॉलिसी बना कर उन्हें सार्वजनिक करने के बीच फर्क बताया। उन्होंने तर्क दिया कि गुमनाम यूजर्स जवाबदेही के बिना लाखों लोग जिस कंटेंट को पढ़ते हैं, उसे तय कर सकते हैं, इसमें योगदान देने वालों को ब्लॉक कर सकते हैं। लोगों की साख पर असर डाल सकते हैं, लेकिन पहचान उजागर नहीं कर सकते, ये कैसा इंसाफ है।
सैंगर ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘मॉब ट्रायल’ कहा
सैंगर ने अपने एक बयान में कहा कि विकिपीडिया अब निष्पक्ष नहीं रहा और यह पूरी तरह से एक गुमनाम ‘भीड़’ के नियमों से चलने वाली ‘अराजक’ बन गया है। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया के प्रशासकों ने उन्हें हटाने से पहले कोई औपचारिक आरोप तय नहीं किए, कोई उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई और मनमाने ढंग से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग उनका बचाव कर सकते थे, उन्हें डराया-धमकाया गया था।
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कैन्वसिंग (समर्थन जुटाने की कोशिश) के बारे में उन्होंने तर्क दिया कि विकीप्रोजेक्ट के आवेदकों से प्रतिभागियों को जोड़ने की उम्मीद की जाती थी और उन्हें ऐसा कोई नियम नहीं मिला जो स्पष्ट रूप से विकी के बाहर लोगों को जोड़ने (रिक्रूटमेंट) पर रोक लगाता हो। उन्होंने कहा कि CNN-News18 वाली अपील विकिपीडिया से जुड़ने का निमंत्रण थी, न कि किसी खास फैसले को प्रभावित करने की कोशिश।
उन्होंने पॉलिसी में बदलाव की माँग करने के अपने अधिकार का भी बचाव किया। सैंगर विकिपीडिया की मूल निष्पक्षता नीति (न्यूट्रैलिटी पॉलिसी) बनाने में मुख्य रूप से शामिल थे। उन्होंने तर्क दिया कि उसकी नीति पर सवाल उठाने का मतलब इनसाइक्लोपीडिया पर हमला नहीं माना जा सकता।
हालाँकि उनके बचाव से एडिटर्स का ग्रुप संतुष्ट नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया कोई अदालत नहीं है, चेतावनियाँ एडमिनिस्ट्रेटर्स की तरफ से ही आएँ, ऐसा जरूरी नहीं है और उनके लंबे-चौड़े जवाब खुद ही उनके विघटनकारी व्यवहार का सबूत था।
जिमी वेल्स ने अनिश्चितकालीन प्रतिबंध को ‘बेतुका’ बताया
विकिपीडिया के सह-संस्थापक जिमी वेल्स ने सार्वजनिक तौर पर प्रस्तावित अनिश्चितकालीन प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया। सैंगर का समर्थन उन्होंने तब आया जब दोनों के बीच बातचीत बंद थी और एक समय उन्होंने सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को ब्लॉक भी कर दिया था। अपने बयान में सैंगर ने कहा कि उन्होंने वेल्स को पहले ही अनब्लॉक कर दिया था और उनसे भी ऐसी ही उम्मीद थी।
This situation just gets more and more interesting.
Jimmy Wales, despite blocking me here on X (I unblocked him some time ago, he could return the favor), actually defended me on Wikipedia. This might make him look good to you all, but not so much to a lot of the Wikipedia blob. pic.twitter.com/qp0xuGU9Wj
वेल्स ने कहा कि विकिपीडिया के लिए बौद्धिक विविधता जरूरी है और चेतावनी दी कि इस मामले से निष्पक्षता कमजोर हो सकती है। उन्होंने इस विचार को ‘बेतुका’ बताया कि सैंगर के व्यवहार के कारण उन पर अनिश्चित काल के लिए प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, और एडिटर्स से आग्रह किया कि वे थोड़ा सोचें कि वे क्या कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वह सैंगर के बौद्धिक विविधता और सोर्सिंग नीतियों पर विचार रखने के अधिकार का बचाव करने को तैयार हैं, भले ही वह उन सभी विचारों से सहमत न हों। वेल्स के अनुसार, एडिटर्स को बात सुननी चाहिए, सम्मानपूर्वक असहमति जतानी चाहिए, प्रस्तावों पर बहस करनी चाहिए और अगर उन्हें WPID से कोई दिक्कत हो, तो उसे खारिज कर देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस तरह से किसी पर प्रतिबंध लगाना गलत है। दिलचस्प बात यह है कि वेल्स लंबे समय से विकिपीडिया पर लोगों या स्रोतों पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन करते रहे हैं। OpIndia भी इसका शिकार हुआ है, क्योंकि विकिपीडिया इस मीडिया हाउस को ‘विश्वसनीय’ स्रोत नहीं मानता, जबकि ‘द वायर’ जैसे फेक-न्यूज फैलाने वाले और प्रोपेगैंडा प्लेटफॉर्म को अपनी विश्वसनीय सूची में रखता है।
वेल्स ने उन वैचारिक समूहों तक पहुँचने का भी बचाव किया जो खुद को विकिपीडिया से अलग-थलग महसूस करते थे। उन्होंने कहा कि अगर कंजर्वेटिव लोगों को यह यकीन हो जाए कि विकिपीडिया सिर्फ वामपंथी प्रोपेगैंडा है, तो वे इससे दूर रहेंगे, जिससे अंदरूनी तौर पर चर्चाओं में कंजर्वेटिव आवाजें नहीं होंगी और पक्षपात का खतरा बढ़ जाएगा।
उन्होंने असंतुष्ट यूजर्स को भाग लेने के लिए आमंत्रित करने और वोट में बाधा डालने या दुर्व्यवहार करने के लिए लोगों को शामिल करने के बीच अंतर बताया। वेल्स ने यह भी कहा कि सैंगर का व्यवहार और अधिक शालीन हो सकता था और उन्हें कुछ बातों के लिए माफी माँगनी चाहिए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने सीधे हस्तक्षेप करने के लिए संस्थापक-स्तर के किसी अधिकार का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया, जबकि अगर उन्हें सच में लगता कि सैंगर को जवाबदेही की माँग करने का पूरा अधिकार है, तो उन्हें ऐसा करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि उनका कोई प्रशासनिक कार्रवाई करने का इरादा नहीं था और वह केवल एडिटर्स को विकिपीडिया के मूल्यों की याद दिलाने के लिए वहाँ मौजूद थे। आखिरकार उनकी आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया गया और प्रतिबंध लगा दिया गया।
सैंगर के खिलाफ मामला बनाते समय विकिपीडिया एडिटर्स ने OpIndia को निशाना बनाया
विकिपीडिया एडिटर्स ने कार्यवाही के दौरान बार-बार OpIndia को निशाना बनाया और लैरी सैंगर ने जब इस पब्लिकेशन का समर्थन किया, तो उसे बैन करने के लिए ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया।
सैंगर के CNN-News18 इंटरव्यू का जिक्र करते हुए विकिपीडिया एडिटर Newslinger ने OpIndia को ‘एक धुर-दक्षिणपंथी मुस्लिम-विरोधी वेबसाइट बताया, जिसे 2020 में एक विकिपीडिया एडिटर की निजी जानकारी सार्वजनिक करने (डॉक्सिंग) के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया था।’ एडिटर ने आगे बताया कि सैंगर ने OpIndia और Swarajya को हिंदू धार्मिक सिद्धांतों को समझने के लिए ‘महत्वपूर्ण धार्मिक स्रोतों’ में से एक बताया था।
(स्रोत-विकिपीडिया)
सैंगर के खिलाफ कार्रवाई का समर्थन कर रहे एडिटर Newslinger ने सैंगर पर आरोप लगाया कि उन्होंने ‘उन वेबसाइट्स को फिर से शामिल करने की वकालत की थी जिन्हें एडिटर्स की निजी जानकारी सार्वजनिक करने (डॉक्सिंग) के कारण ब्लैकलिस्ट किया गया था, जिनमें ब्रेटबार्ट न्यूज और ऑपइंडिया शामिल हैं।’
(स्रोत-विकिपीडिया)
OpIndia पर ध्यान देना कोई इत्तेफ़ाक नहीं था। विकिपीडिया के एडिटर्स ने इस पब्लिकेशन के लिए सैंगर के बचाव को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया कि वह कथित तौर पर ‘भरोसेमंद न माने जाने वाले सोर्स’ को प्लेटफॉर्म पर वापस लाना चाहते थे। असल में एक भारतीय पब्लिकेशन, जिसने विकिपीडिया के हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी पक्षपात को बड़े पैमाने पर डॉक्यूमेंट किया था, उसी का इस्तेमाल उस व्यक्ति के खिलाफ सबूत के तौर पर किया गया, जिसने वैचारिक गेटकीपिंग पर सवाल उठाए थे।
OpIndia को सालों से विकिपीडिया की दुश्मनी का सामना करना पड़ा है। इस पब्लिकेशन को तब ब्लैकलिस्ट कर दिया गया जब उसने विवादित विकिपीडिया पेजों को कंट्रोल करने वाले लोगों की जाँच की। प्रभावशाली एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स की भूमिका को डॉक्यूमेंट किया और यह उजागर किया कि कैसे असुविधाजनक तथ्यों को जोड़ने की कोशिशों को अक्सर रोक दिया जाता था।
2020 में सैंगर के साथ OpIndia के पिछले इंटरव्यू के दौरान एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा ने बताया था कि विकिपीडिया ने पूरी वेबसाइट को तब ब्लैकलिस्ट कर दिया था, जब उन्होंने उन एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स के बारे में लिखा था, जो पक्षपाती पेजों को लॉक कर रहे थे और यह सुनिश्चित कर रहे थे कि उन्हें सही करने की कोशिश न हो सके।
सेंगर ने जवाब दिया, “उनमें कोई तहजीब नहीं है। मैं क्या कहूँ? मैं लंबे समय से इस तरह की बातें कह रहा हूँ, लेकिन हालात और खराब हो गए हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि 2015 के आसपास से विकिपीडिया में ‘तेजी से गिरावट’ आई है। चाहे वह पक्षपातपूर्ण रवैया हो या फिर इसकी एडिटिंग कम्युनिटी का बंद हो जाना।
हाल की घटनाओं से साफ पता चला कि यह सिस्टम कैसे काम करता है। विकिपीडिया एडिटर्स ने OpIndia की जो छवि बनाई, उसे ही अंतिम सच मान लिया गया। जब सेंगर ने उस पहचान पर सवाल उठाए, तो इसे गलत व्यवहार का सबूत मान लिया गया। इस बात पर कोई गंभीरता से विचार नहीं किया गया कि क्या OpIndia को इसलिए ब्लैकलिस्ट किया गया था क्योंकि उसकी जाँच-पड़ताल ने विकिपीडिया के जमे-जमाए एडिटर्स के अधिकार और गुमनामी को चुनौती दी थी।
इस तरह प्लेटफॉर्म के एडिटर्स ने उस आलोचक और उस पब्लिकेशन दोनों को निशाना बनाया, जिन्होंने विकिपीडिया की समस्या को उजागर किया था। सैंगर पर OpIndia का बचाव करने को गलत तरीके से लिया गया और Wikipedia के एडिटोरियल गुट के बारे में OpIndia के खुलासों का इस्तेमाल उन्हें बैन लगाने के लिए किया गया।।
Wikipedia का हिंदू-विरोधी रवैया
Wikipedia के बारे में सैंगर की आलोचना OpIndia द्वारा 2024 में प्रकाशित 187 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट के नतीजों से मेल खाती है। इस रिसर्च में Wikipedia की आंतरिक चर्चाओं, एडिटिंग हिस्ट्री, सोर्स-क्लासिफिकेशन सिस्टम, एडमिनिस्ट्रेटर हायरार्की, फाइनेंशियल डिस्क्लोजर और विकिमीडिया फाउंडेशन के फंडिंग संबंधों की जाँच की गई, जिसमें भारत और हिंदू-संबंधी विषयों पर खास ध्यान दिया गया।
इस रिपोर्ट ने Wikipedia के उस दावे को चुनौती दी गई, जिसमें कहा जाता है कि ओपन इनसाइक्लोपीडिया है जिसे बिना किसी केंद्रीय संपादकीय हस्तक्षेप के बिना पैसे लिए काम करने वाले वॉलंटियर्स स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। इसमें बताया गया कि कैसे एडमिनिस्ट्रेटर्स और प्रभावशाली एडिटर्स का एक छोटा समूह यह तय करता है कि किन सोर्स का हवाला दिया जा सकता है, किन तथ्यों को आर्टिकल में रखा जा सकता है, विवादित विषयों में कौन भाग ले सकता है और किन कंट्रीब्यूटर्स को प्लेटफॉर्म से ब्लॉक किया जा सकता है।
रिसर्च के समय दुनिया भर में Wikipedia के केवल 435 एक्टिव एडमिनिस्ट्रेटर्स थे। ये एडमिनिस्ट्रेटर्स यूजर्स को ब्लॉक कर सकते थे, एडिटिंग पर रोक लगा सकते थे, विवादित पेजों को सुरक्षित कर सकते थे, आर्टिकल हटा सकते थे, विवादों को सुलझा सकते थे और प्रतिबंध लागू कर सकते थे। इनके ऊपर आर्बिट्रेशन कमेटी थी, जो असल में Wikipedia की सबसे बड़ी आंतरिक निर्णय लेने वाली संस्था के तौर पर काम करती है।
इनमें से ज्यादातर प्रभावशाली यूजर्स छद्म नामों (pseudonyms) से काम करते थे। उनकी पहचान, जुड़ाव, नियोक्ता और हितों के संभावित टकराव के बारे में जनता को पता नहीं था, जबकि उनके फैसलों का असर उन आर्टिकल्स पर पड़ता था जिन्हें लाखों लोग पढ़ते थे। यह स्ट्रक्चर लोगों की सामूहिक समझ से चलने वाला कोई खुला सिस्टम नहीं था। यह एक संपादकीय पदानुक्रम (editorial hierarchy) था जिसमें गुमनाम लोगों के पास वैसी ही शक्तियां थीं, जैसी पारंपरिक पब्लिशिंग संस्थाओं में एडिटर्स के पास होती हैं।
‘विश्वसनीय सोर्स’ का सिस्टम कैसे पक्षपातपूर्ण होता है
Wikipedia खास तौर पर कंटेंट को कंट्रोल करता है। एक बार जब किसी पब्लिकेशन को प्रतिबंधित या ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है, तो उसकी रिपोर्ट का इस्तेमाल आमतौर पर Wikipedia के आर्टिकल्स में जानकारी के समर्थन के लिए नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब है कि तथ्य के तौर पर सही रिपोर्ट, एक्सक्लूसिव बयान या सीधे उद्धरण (direct quotation) को भी सिर्फ इसलिए खारिज किया जा सकता है, क्योंकि Wikipedia के एडिटर्स ने उस पब्लिकेशन पर रोक लगा रखी है, जिसमें वह जानकारी है। डोजियर में बताया गया है कि OpIndia और Swarajya को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था, जबकि The Wire, Scroll, Newslaundry और The Print जैसे वामपंथी झुकाव वाले प्रकाशनों को स्वीकार्य माना गया। Al Jazeera, BBC, The Guardian, CNN और The New York Times जैसे अंतरराष्ट्रीय आउटलेट्स के साथ भी कहीं बेहतर व्यवहार किया गया।ो
इससे Wikipedia यह दावा कर पाता है कि कोई लेख निष्पक्ष रूप से अपने स्रोतों को दिखाता है, जबकि उसके एडिटर्स पहले ही दूसरे पक्ष को दिखाने वाले स्रोतों को हटा चुके होते हैं।
एक उदाहरण भारत की नौसेना क्षमताओं पर The Wire की रिपोर्टिंग से जुड़ा है। रिटायर्ड कमोडोर जयदीप माओलंकर ने प्रकाशन पर आरोप लगाया कि उसने भारतीय नौसेना की उपलब्धियों को कम दिखाने के लिए उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया। OpIndia ने उनके बयान को कवर किया, लेकिन Wikipedia के एडिटर्स ने The Wire के लेख में इस विवाद को शामिल करने से इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि माओलंकर का अपना स्पष्टीकरण खुद से प्रकाशित स्रोत था, जबकि OpIndia का हवाला नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि उसे पहले ही ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था।
सही जानकारी को शामिल नहीं किया गया, ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि वह गलत थी, बल्कि Wikipedia के स्रोत-नियंत्रण सिस्टम ने उस प्रकाशन को ही हटा दिया था, इस वजह से हुआ।
डोजियर में The Wire से जुड़े गलत जानकारी वाले अन्य विवादों के प्रति Wikipedia के रवैये की जाँच करते समय भी इसी तरह का विरोध देखा गया। असहज तथ्यों को जोड़ने के प्रयासों में देरी की गई, उन्हें कमजोर किया गया या खारिज कर दिया गया। जबकि गैर-वामपंथी प्रकाशनों के बारे में नकारात्मक विवरणों को उसी वैचारिक समूह द्वारा स्वीकृत स्रोतों का उपयोग करके प्रमुखता से पेश किया गया।
लेखों में हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी नैरेटिव
डोजियर में भारत से संबंधित कई लेखों की जाँच की गई, जिनमें 2020 के दिल्ली दंगे, गोधरा ट्रेन अग्निकांड, ‘जय श्री राम’ का नारा, ‘हिंदू आतंकवाद’, नरेंद्र मोदी, प्रेस की स्वतंत्रता और भारतीय लोकतंत्र से जुड़े लेख शामिल थे।
इसमें दर्ज किया गया कि कैसे हिंदू पीड़ितों, इस्लामी हिंसा और वामपंथी नैरेटिव को बनाए रखने के लिए ‘असहज’ सबूतों को कम करके आँका गया। उसे दबा दिया गया। जबकि एक्टिविस्ट संगठनों और विदेशी प्रकाशनों के दावों को Wikipedia के आधिकारिक नैरेटिव में प्रमुखता दी गई।
गोधरा ट्रेन अग्निकांड पर लेख में OpIndia ने पाया कि हिंदू यात्रियों की सुनियोजित हत्या को ऐसी भाषा और नैरेटिव के जरिए कम करके दिखाया गया, जिसमें विवादित थ्योरी को प्रमुखता दी गई थी। ‘हिंदू आतंकवाद’ से जुड़े लेखों में बरी होने के फैसलों, सबूतों की कमी और अभियोजन पक्ष के कई दावों को गलत साबित कर आरोपों और राजनीतिक शब्दावली को अधिक प्रमुखता दी गई।
गोधरा ट्रेन जलाने पर आर्टिकल में, OpIndia ने पाया कि हिंदू यात्रियों की सुनियोजित हत्या को भाषा और फ्रेमिंग के जरिए कमजोर किया गया, जिससे विवादित थ्योरीज सामने आईं। ‘हिंदू आतंकवाद’ से जुड़े आर्टिकल में, आरोपों और पॉलिटिकल टर्मिनोलॉजी को बरी होने, सबूतों की नाकामी और कई प्रॉसिक्यूशन क्लेम के फेल होने से ज्यादा अहमियत मिली।
OpIndia ने ‘जय श्री राम’ के ट्रीटमेंट की भी जाँच की, यह तर्क देते हुए कि विकिपीडिया हिंदू धार्मिक अभिव्यक्ति को हिंसा और धमकी से जोड़ने वाली दुश्मनी भरी रिपोर्टों पर बहुत ज्यादा निर्भर था। इसके नतीजे में बने आर्टिकल में सिर्फ नारे से जुड़े विवादों के बारे में ही नहीं बताया गया, बल्कि अभिव्यक्ति को ही एक नेगेटिव पॉलिटिकल और कम्युनल नजरिए से दिखाने में मदद की गई।
ये बातें इसलिए मायने रखती हैं, क्योंकि विकिपीडिया सिर्फ अपनी वेबसाइट तक ही सीमित नहीं रहता। इसके आर्टिकल Google पर खास तौर पर दिखाए जाते हैं, नॉलेज पैनल में इस्तेमाल किए जाते हैं, आर्टिफिशियल-इंटेलिजेंस सिस्टम द्वारा कोट किए जाते हैं और पत्रकारों, छात्रों और रिसर्चर्स द्वारा बैकग्राउंड मटीरियल के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं।
जून 2024 में भारत को विकिमीडिया प्रोजेक्ट्स पर लगभग 796 मिलियन पेज व्यू मिले, जबकि भारतीय इंग्लिश विकिपीडिया में कंट्रीब्यूट करने वालों के सबसे बड़े ग्रुप में शामिल थे। भारतीय आम चुनाव, नरेंद्र मोदी, NDA, लोकसभा और भारत के बारे में आर्टिकल को लाखों व्यूज मिले। इसलिए, विकिपीडिया पर एक गलत एंट्री यह तय कर सकती है कि दुनिया भर में किसी भारतीय इवेंट, ऑर्गनाइजेशन या पब्लिक फिगर को कैसे समझा जाएगा।
विकिमीडिया ने उस एडिटर को फंड दिया जिसने सेंगर और ऑपइंडिया को टारगेट किया
डॉसियर में विकिपीडिया के एडिटर और एडमिनिस्ट्रेटर के लिए विकिमीडिया फाउंडेशन के आर्थिक सपोर्ट की भी जाँच की गई। इसमें न्यूजलिंगर के मामले को हाईलाइट किया गया, वही एडिटर जिसने बाद में सेंगर को टारगेट करने में अहम भूमिका निभाई।
न्यूजलिंगर ने विकिपीडिया की हमेशा चलने वाली सोर्स लिस्ट पर बहुत काम किया था। प्लेटफॉर्म के भरोसे के इंटरनल असेसमेंट के अनुसार पब्लिकेशन को क्लासिफाई करती है। बाद में उन्हें सोर्सर नाम के एक प्रोजेक्ट के लिए विकीक्रेड प्रोग्राम के जरिए फंडिंग मिली।
प्रपोजल में सोर्सर को एक ब्राउजर एक्सटेंशन और एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस के तौर पर बताया गया था, जो विकिपीडिया की सोर्स रेटिंग को इनसाइक्लोपीडिया से भी आगे ले जाएगा। इसे इंटरनेट यूजर्स को उनके पढ़े जा रहे पब्लिकेशन की क्वालिटी के बारे में बताने और डेवलपर्स को विकिपीडिया के भरोसेमंद क्लासिफिकेशन को दूसरी टेक्नोलॉजी में शामिल करने की इजाजत देने के लिए डिजाइन किया गया था।
अपने प्रपोजल में, न्यूजलिंगर ने कहा कि उन्होंने 20 महीने तक हमेशा चलने वाली सोर्स लिस्ट को बनाए रखा और बताया कि हजारों एडिटर्स ने इसका इस्तेमाल यह तय करने के लिए किया कि पब्लिकेशन विकिपीडिया पर दावों का समर्थन कर सकते हैं या नहीं। डॉसियर में तर्क दिया गया कि इसलिए विकिमीडिया एक सोर्स-क्लासिफिकेशन सिस्टम के इंस्टीट्यूशनलाइजेशन और बड़े पैमाने पर फैलाव के लिए फंडिंग कर रहा था, जिसे पहले से ही विचारधारा से प्रेरित एडिटर्स ने बनाया था।
उसी एडिटर ने बाद में सेंगर के CNN-News18 इंटरव्यू को विकिपीडिया कंट्रीब्यूटर की तरफ से देखी गई सबसे गलत हरकतों में से एक बताया। उन्होंने सेंगर पर भारतीयों को उकसाने का आरोप लगाया, ऑपइंडिया की ब्लैकलिस्टिंग का बचाव किया और कम्युनिटी बैन की माँग की।
डॉसियर में विकिपीडिया को पब्लिशर मानने की सिफारिश क्यों की गई
डॉसियर में, ऑपइंडिया ने यह नतीजा निकाला कि विकिपीडिया को अब खुद को एक पैसिव बिचौलिए के तौर पर पेश करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
इसके एडिटर सोर्स चुनते हैं, जानकारी हटाते हैं, खास तरह के कंटेंट को कमीशन या प्रमोट करते हैं, पेज लॉक करते हैं, एक एडिटोरियल लाइन लागू करते हैं और उन कंट्रीब्यूटर को बाहर कर देते हैं जो उस लाइन को चुनौती देते हैं। विकिमीडिया फाउंडेशन एडिटिंग, सोर्स असेसमेंट, कम्युनिटी प्रोजेक्ट और टेक्नोलॉजिकल टूल्स से जुड़े ग्रांट भी देता है जो जानकारी को पेश करने के तरीके पर असर डालते हैं।
OpIndia ने सुझाव दिया कि विकिपीडिया को भारत में कानूनी तौर पर एक पब्लिशर माना जाए और उसके प्लेटफॉर्म पर दिखने वाले कंटेंट के लिए सीधे तौर पर जवाबदेह बनाया जाए। इसने भारत में विकिमीडिया के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, ग्रांट और एक्टिविटी की जाँच की भी माँग की, खासकर इसलिए क्योंकि फाउंडेशन भारतीयों से डोनेशन इकट्ठा करता है और देश से जुड़े प्रोजेक्ट को फंड करता है, बिना अपने असर के बराबर कोई सीधी ऑफिशियल मौजूदगी बनाए।
OpIndia ने आगे एक भारतीय ब्राउजर एक्सटेंशन की सिफारिश की, जो विकिपीडिया आर्टिकल में भेदभाव और गलत जानकारी की पहचान कर सके और इस बात की जाँच की जाए कि क्या गूगल-विकिमीडिया का रिश्ता भारतीय पब्लिकेशन के लिए एंटी-कॉम्पिटिटिव नतीजे पैदा करता है। जब विकिपीडिया किसी भारतीय सोर्स को ब्लैकलिस्ट करता है और गूगल उसी समय घटनाओं के विकिपीडिया के वर्जन को ऊपर उठाता है, तो प्रभावित पब्लिकेशन न केवल रिप्रेजेंटेशन खो देता है बल्कि विजिबिलिटी, क्रेडिबिलिटी, ट्रैफिक और रेवेन्यू भी खो देता है।
डोसियर में विकिपीडिया को पब्लिशर मानने की सलाह क्यों दी गई?
डोसियर में OpIndia ने यह निष्कर्ष निकाला कि विकिपीडिया को अब खुद को एक पैसिव इंटरमीडियरी (निष्क्रिय मध्यस्थ) के तौर पर पेश करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
इसके एडिटर सोर्स चुनते हैं, जानकारी हटाते हैं, खास तरह के कंटेंट को बढ़ावा देते हैं या तैयार करवाते हैं, पेज लॉक करते हैं, एक एडिटोरियल लाइन तय करते हैं और उस लाइन को चुनौती देने वाले योगदानकर्ताओं को बाहर कर देते हैं। विकिमीडिया फाउंडेशन एडिटिंग, सोर्स के मूल्यांकन, कम्युनिटी प्रोजेक्ट्स और तकनीकी टूल से जुड़े ग्रांट भी देता है, जो इस बात पर असर डालते हैं कि जानकारी कैसे पेश की जाती है।
OpIndia ने सलाह दी कि भारत में विकिपीडिया को कानूनी तौर पर एक पब्लिशर माना जाए और उसके प्लेटफॉर्म पर दिखने वाले कंटेंट के लिए उसे सीधे तौर पर जवाबदेह बनाया जाए। इसने भारत में विकिमीडिया के वित्तीय लेन-देन, ग्रांट और गतिविधियों की जाँच की भी माँग की, खासकर इसलिए क्योंकि फाउंडेशन भारतीयों से दान इकट्ठा करता है और देश से जुड़े प्रोजेक्ट्स को फंड देता है, जबकि उसका कोई सीधा आधिकारिक अस्तित्व नहीं है जो उसके प्रभाव के बराबर हो।
OpIndia ने आगे एक ऐसे भारतीय ब्राउज़र एक्सटेंशन की भी सलाह दी जो विकिपीडिया लेखों में पक्षपात और गलत जानकारी की पहचान कर सके, और इस बात की जाँच की भी माँग की कि क्या Google-विकिमीडिया का रिश्ता भारतीय प्रकाशनों के लिए प्रतिस्पर्धा-विरोधी नतीजे पैदा करता है। जब विकिपीडिया किसी भारतीय सोर्स को ब्लैकलिस्ट करता है और Google साथ ही साथ घटनाओं के विकिमीडिया वाले वर्शन को ऊपर लाता है, तो प्रभावित प्रकाशन न केवल अपना प्रतिनिधित्व खो देता है, बल्कि उसकी दृश्यता, विश्वसनीयता, ट्रैफिक और राजस्व भी कम हो जाता है।
सेंजर पर लगे बैन ने अब डोसियर की मुख्य चेतावनी को सही साबित कर दिया है। विकिपीडिया का पक्षपात किसी एक वॉलंटियर की कभी-कभार होने वाली गलती नहीं है। इसे इसके सोर्स लिस्ट, गुमनाम एडमिनिस्ट्रेटर, आंतरिक प्रतिबंधों, ग्रांट और बिग टेक से मिलने वाले ज़बरदस्त प्रचार के जरिए सुरक्षित रखा जाता है।
वामपंथी कब्जे से इनकार करना हुआ मुश्किल
यह पूरा घटनाक्रम ने उस समस्या का जीता-जागता उदाहरण है, जिसका जिक्र सेंजर सालों से करते आ रहे हैं। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो दावा करता है कि कोई भी इसे एडिट कर सकता है, उसने अपने ही एक एडिटर को तब बैन कर दिया जब उन्होंने कम प्रतिनिधित्व वाले विचार के लोगों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। विविधता की बात करने वाली कम्युनिटी ने बौद्धिक विविधता को एक संगठित खतरे के तौर पर देखा। निष्पक्ष होने का दावा करने वाले सिस्टम ने हिंदू-विरोधी पक्षपात के बारे में दिए गए एक इंटरव्यू का इस्तेमाल सबूत के तौर पर किया। इसमें सिस्टम को लेकर आवाज उठाने वाला व्यक्ति यहाँ बने रहने के लायक नहीं था।
विकिपीडिया के एडिटर इस बात पर जोर देते हैं कि सेंजर को उनके व्यवहार के लिए बैन किया गया था, न कि उनकी राय के लिए। फिर भी पूरी प्रक्रिया यह बताती है कि मुख्यधारा के सोर्स की आलोचना, OpIndia के बचाव में दिए गए तर्क, हिंदुओं और कंजर्वेटिव लोगों के शामिल होने के बारे में उनकी राय, और मौजूदा वैचारिक व्यवस्था द्वारा बनाए गए नियमों को उनकी चुनौती, इस बैन की मुख्य वजह है।
नतीजा यह है कि विकिपीडिया की कंटेंट मशीनरी उन विरोधी स्वर से बची रहती है, जो उसके पक्षपात को उजागर कर सकती हैं। इसके को-फ़ाउंडर को अब उसी संस्था से हटा दिया है, जिसे बनाने में उन्होंने मदद की थी। उन्हें इसलिए नहीं हटाया गया कि उन्होंने लेखों में तोड़-फोड़ की या मनगढ़ंत जानकारी डाली, बल्कि इसलिए हटाया गया कि उन्होंने खुलकर उस ‘लेफ्टिस्ट गेटकीपिंग’ को चुनौती दी जो यह तय करती है कि दुनिया के ‘सबसे प्रभावशाली ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया’ पर कौन-से तथ्य, स्रोत और नजरिए मौजूद रह सकते हैं।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)