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हैदराबाद का करमनघाट मंदिर: मंगल नहीं… रविवार को होती है हनुमान पूजा, मंदिर तोड़ने आया औरंगजेब काँपा था डर से

तेलंगाना के हैदराबाद (प्राचीन भाग्यनगर) में स्थित है करमनघाट हनुमान मंदिर। भारत के किसी भी अन्य हिस्सों में स्थित हनुमान जी के मंदिरों से अलग इस मंदिर में मंगलवार या शनिवार की बजाय रविवार को हनुमान जी की विशेष पूजा की जाती है। हैदराबाद के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक करमनघाट हनुमान मंदिर को भी औरंगजेब ने तोड़ने का प्रयास किया था, लेकिन हनुमान जी के चमत्कार के चलते वह इस मंदिर का कुछ नहीं कर सका। तो आइए आपको इस मंदिर के उस रोचक इतिहास से रू-ब-रू कराते हैं, जिसके कारण यह मंदिर अद्वितीय है।

जब राजा ने सुना राम नाम का जाप

12वीं शताब्दी (सन् 1143 के आसपास) का दौर था। काकतीय वंश के राजा प्रोला द्वितीय जंगल में शिकार के लिए गए हुए थे। थक कर जब वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे, तब उन्हें उस घने जंगल के बीचोंबीच भगवान राम का जाप सुनाई दिया। राजा को आश्चर्य हुआ कि इस जंगल में कौन है, जो भगवान राम का जाप कर रहा है। जब राजा उस स्थान पर पहुँचे तो उन्हें वहाँ हनुमान जी की एक अद्भुत बैठी हुई प्रतिमा दिखाई दी। इसी प्रतिमा के भीतर से भगवान राम के जाप की आवाज सुनाई दे रही थी। इसके बाद राजा अपनी राजधानी लौट आए और उन्होंने हनुमान जी के इस अद्भुत मंदिर की स्थापना की।

औरंगजेब के छूटे पसीने

करमनघाट मंदिर के निर्माण के लगभग 400 वर्षों के बाद यहाँ इस्लामिक आक्रांता औरंगजेब भी आया था। उस समय औरंगजेब भारत भर में हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने के मिशन पर था और उसने कई मंदिरों को नष्ट भी कर दिया था। इसी क्रम में जब वह अपनी सेना के साथ इस मंदिर को तोड़ने के लिए आया तो उसकी सेना करमनघाट हनुमान मंदिर के परिसर के भीतर प्रवेश भी न कर सकी। गुस्से में औरंगजेब ने खुद मंदिर को नष्ट करने के लिए हथियार उठाया, लेकिन जैसे ही वह मंदिर के नजदीक पहुँचा, उसे एक भयंकर गर्जना सुनाई दी। इस आवाज को सुनकर औरंगजेब भय से काँप उठा और उसके हाथ से हथियार छूट गए।

उसी समय एक आकाशवाणी हुई, ‘मंदिर तोड़ना है राजा, तो कर मन घट’ जिसका मतलब था कि अगर मंदिर को तोड़ना चाहता है तो अपने मन (हृदय) को ताकतवर बना। हालाँकि, औरंगजेब इस घटना के बाद चुपचाप मंदिर से चला गया। इसी आकाशवाणी के कारण इस मंदिर का नाम करमनघाट हुआ।

मंदिर के विशेष विधान

खुद की रक्षा करने वाले हनुमान जी के इस मंदिर में कुछ विशेष लेकिन रोचक विधान हैं। मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा ध्यान मुद्रा में है, लेकिन उन्हें एक सैनिक के समान वेशभूषा पहनाई जाती है। इसके अलावा, यहाँ हनुमान जी की पूजा में नारियल का उपयोग किया जाता है।

करमनघाट मंदिर में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा (फोटो : exploretemples.in)

इस मंदिर की एक अन्य रोचक परंपरा है। भारत के अन्य हनुमान मंदिरों में मंगलवार या शनिवार को हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है, लेकिन करमनघाट का हनुमान मंदिर इस मामले में अलग। इस मंदिर में रविवार को विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

द्रविड़ शैली में बनाए गए इस मंदिर में हनुमान जी के अलावा श्री राम, भगवान शिव, देवी सरस्वती, माता पार्वती, संतोषी माता, भगवान वेणुगोपाल और भगवान जगन्नाथ स्वामी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। मंदिर में श्रीरामनवमी, हनुमान प्रकटोत्सव और अन्य हिन्दू त्यौहारों पर विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। मंदिर के प्रशासन द्वारा ‘अन्नदानम’ का आयोजन किया जाता है। इसके तहत भक्तों, गरीबों और असहाय लोगों को मुफ़्त में भोजन उपलब्ध कराया जाता है।

कैसे पहुँचें?

हैदराबाद मुख्य शहर से करमनघाट हनुमान मंदिर की दूरी लगभग 10 किलोमीटर है। हैदराबाद में ही अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा स्थित है। मंदिर से हवाईअड्डे की दूरी लगभग 22 किलोमीटर है। इसके अलावा, सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन से करमनघाट मंदिर की दूरी लगभग 18 किलोमीटर है। सिकंदराबाद देश के लगभग सभी बड़े शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। हैदराबाद के महात्मा गाँधी बस टर्मिनल से हनुमान मंदिर की दूरी 12 किलोमीटर है। नागपुर, चेन्नई, बेंगलुरु, अमरावती और कई अन्य शहरों से हैदराबाद बस के माध्यम से भी पहुँचना काफी आसान है।   

UP में एक साथ 9 मेडिकल कॉलेज: PM मोदी करेंगे लोकार्पण, योगी सरकार में अब तक 45 नए मेडिकल कॉलेज

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार लगातार स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए कार्य कर रही है। इसी क्रम में शनिवार (03 जुलाई) को यह घोषणा की गई कि राज्य को एक साथ 9 मेडिकल कॉलेज मिलने जा रहे हैं। सीएम आदित्यनाथ ने अपने आवास पर अधिकारियों के साथ की बैठक में उन्हें निर्देशित किया कि लगभग तैयार हो चुके 9 मेडिकल कॉलेजों के लोकार्पण की तैयारी शुरू की जाए। इसी महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन मेडिकल कॉलेजों का लोकार्पण करेंगे।

2017 से पहले थे मात्र 12 मेडिकल कॉलेज:

यूपी के सीएम आदित्यनाथ का यह मानना है कि राज्य के प्रत्येक जिले में एक मेडिकल कॉलेज होना चाहिए। इसी महत्वाकांक्षा के चलते उनकी सरकार ने प्रयास शुरू किए। योगी सरकार के इन्हीं प्रयासों का नतीजा है कि 2017 से पहले जहाँ राज्य में मात्र 12 मेडिकल कॉलेज थे, वर्तमान में इनकी संख्या बढ़कर 48 हो चुकी है। इसके अलावा 13 अन्य मेडिकल कॉलेजों के निर्माण का कार्य चल रहा है। जिन 9 मेडिकल कॉलेजों का लोकार्पण पीएम मोदी द्वारा किया जाना है वो देवरिया, एटा, फतेहपुर, गाजीपुर, हरदोई, जौनपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़ और सिद्धार्थनगर में बनाए गए हैं।

सीएम आदित्यनाथ ने इन कॉलेजों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतने का सख्त निर्देश दिया था। इसका पालन करते हुए इन कॉलेजों में 70% फ़ैकल्टी का चयन भी हो चुका है। इसके अलावा सरकार के प्रवक्ता द्वारा यह भी जानकारी दी गई कि 450 से अधिक संकाय सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है और मेरिट के आधार पर योग्य शिक्षकों का चयन भी किया जा रहा है।

देश की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को योगी सरकार ने अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा। इसका प्रमाण कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान भी मिला जब राज्य में सीएम आदित्यनाथ के नेतृत्व में न केवल संक्रमण की दूसरी लहर को रोकने के उपाय किए गए, बल्कि तीसरी लहर से लड़ने की व्यवस्थाएँ भी पुख्ता की गईं।

राज्य में 441 ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना की जा रही है, जिनमें से 131 ऑक्सीजन प्लांट सक्रिय भी हो चुके हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर एवं रायबरेली में एम्स की स्थापना के साथ 6 नए सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक की स्थापना भी की गई है।

खुदरा, थोक व्यापारियों को MSME में शामिल किए जाने का स्वागत

यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने खुदरा और थोक व्यापारियों को एमएसएमई के अंतर्गत शामिल किए जाने के निर्णय का स्वागत किया है। सीएम आदित्यनाथ ने ट्वीट करके कहा कि एमएसएमई को अर्थव्यवस्था में विकास का इंजन माना गया है। ऐसे में खुदरा और थोक व्यापार को इसमें शामिल करने से न केवल अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलेगी, बल्कि रोजगार भी सृजित किए जा सकेंगे। केंद्र सरकार के इस फैसले से उत्तर प्रदेश के लाखों खुदरा और थोक व्यापारियों को लाभ मिलेगा।

पीएम मोदी ने भी ट्वीट करके जानकारी दी थी, “हमारी सरकार ने खुदरा एवं थोक व्यापार को एमएसएमई में शामिल करने का निर्णय लिया है। इससे हमारे करोड़ों व्यापारियों को वित्तीय और दूसरे लाभ लेने में आसानी होगी, जिससे वो अपना व्यापार बढ़ा पाएँगे।“

ज्ञात हो कि शुक्रवार (2 जुलाई 2021) को भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्री नितिन गडकरी ने खुदरा और थोक व्यापार को एमएसएमई के तहत शामिल करने का ऐलान किया। उन्होंने कहा था कि Covid-19 की दूसरी लहर के दौरान खुदरा और थोक व्यापारियों के व्‍यवसाय पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। इसी के चलते खुदरा व थोक व्‍यवसाय को एमएसएमई के दायरे में लाने का निर्णय लिया गया है।

इस फैसले के बाद खुदरा और थोक व्यापारी भी अपने व्यवसाय का एमएसएमई के तहत पंजीकरण करा सकेंगे। इस निर्णय से लगभग 2.5 करोड़ से अधिक व्यापारियों लाभ मिलने की संभावना है। इसके अलावा इन व्यापारियों को आरबीआई की गाइडलाइंस के तहत प्राथमिकता के आधार पर ऋण मिलने में भी आसानी होगी।

कीलों वाली लकड़ी से पीट-पीट कर बेटी को मार डाला… क्योंकि दूसरी बीवी को खुश करना था

अफ्रीका को मध्य-पूर्व के देशों से जोड़ने वाले इस्लामिक देश मिस्र (Egypt) से एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जिसको सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँगे। यह सोचकर ही कोई सिहर उठेगा कि कोई अपनी दूसरी बीवी को खुश करने के लिए अपनी ही नाबालिग बेटी की पीट-पीटकर हत्या कर देगा। लेकिन, यह सच है और ऐसा हुआ है।

मिस्र के क्वेना शहर में एक व्यक्ति ने अपनी दूसरी पत्नी को खुश करने के लिए अपनी 15 वर्षीया बेटी की कीलों वाली लकड़ी से पीट-पीटकर हत्या कर दी। हत्या के आरोप में पुलिस ने उस शख्स और मदद करने के आरोप में उसकी बीवी को गिरफ्तार कर लिया है।

कहा जा रहा है कि नाबालिग लड़की अपनी अपनी सौतेली माँ के साथ झगड़ा करती थी। किशोरी अपने पिता से दूसरी पत्नी को तलाक देने के लिए भी कहती थी। व्यक्ति ने अपनी दूसरी पत्नी को खुश करने के लिए पहली पत्नी से पैदा हुई अपनी बेटी को कीलों वाली लकड़ी के तख्ते से पीटना शुरू कर दिया। गहरी चोट के कारण लड़की लहूलुहान हो गई और अंतत: अपनी जान गँवा बैठी।

जाँच के दौरान पता चला कि पिता ने बेटी की हत्या करने के बाद अपनी दूसरी पत्नी की मदद भी ली। दूसरी बीवी ने हत्या वाली जगह से खून को साफ किया और उसके बाद पति-पत्नी दोनों ने मिल कर शव को अज्ञात स्थान पर दफन कर दिया।

बाद में उस आदमी की दूसरी पत्नी ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि उसकी सौतेली बेटी गायब हो गई है। हालाँकि, पुलिस को उस पर संदेह हुआ और उससे गहन पूछताछ शुरू कर दी। पूछताछ में महिला ने अपना अपराध कबूल कर लिया। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।

कृषि कानूनों पर शरद पवार का नया बयान ‘किसान’ संगठनों पर चोट: राजनीति या भविष्य देख लिए?

राजनीति आधारित कृषि और कृषि आधारित राजनीति पर शरद पवार की वरिष्ठता का सम्मान सभी करते हैं। ऐसे में कृषि कानूनों पर हो रहे प्रदर्शन के बीच उनका नया बयान महत्वपूर्ण है। पवार के अनुसार कृषि कानूनों को रद्द न करके, उनके जिस अंश से लोगों को शिकायत है, उसमें सुधार करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए। कृषि कानूनों पर यह बयान उनके अभी तक के दृष्टिकोण के बिलकुल उलट है, क्योंकि अब तक शरद पवार कानूनों को रद्द करने के पक्षधर थे। उनका यह बयान महा विकास अगाड़ी में शामिल मित्र दलों के नजरिए से पूरी तरह अलग है, क्योंकि कॉन्ग्रेस के साथ-साथ शिवसेना ने कृषि कानूनों का न केवल शुरू से विरोध किया है, बल्कि दोनों दल कानूनों को पूरी तरह से रद्द करने के पक्ष में भी रहे हैं।

शरद पवार का यह बयान महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीति को देखते हुए तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही इसे निकट भविष्य में राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। पिछले सात महीने से चल रहे किसान आंदोलन का केंद्र रहे पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव दूर नहीं हैं। ऐसे में पवार का बयान बाकी विपक्षी दलों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा करेगा। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पवार के इस बयान का स्वागत करते हुए उन्हें अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने के लिए धन्यवाद भी दिया।

केंद्र सरकार हमेशा से कृषि कानूनों को लेकर किसान संगठनों और राजनीतिक दलों से बातचीत के लिए तैयार थी, पर कानूनों का विरोध करने वाले किसान संगठन और उनका समर्थन कर रहे राजनीतिक दल इन पर किसी भी तरह की बातचीत की संभावना को नकारते आए थे। विपक्षी दलों और संगठनों के अनुसार किसान आंदोलन को रोकने का एकमात्र रास्ता है कानूनों को पूरी तरह से रद्द करना। कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि कृषि सम्बंधित कानूनों पर बातचीत न करके उन्हें रद्द करने की माँग ऐसी है, जो न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था के अपितु लोकतंत्र की परंपरा के भी विरुद्ध है। बातचीत के जरिए समस्याओं का समाधान खोजने की परंपरा भारतीय लोकतंत्र का आधार रही है। बिना बातचीत के किसी भी विषय पर अड़ जाना लोकतांत्रिक राजनीति में लगभग असंभव है।

किसान संगठन या उनके समर्थक विपक्षी दलों ने कभी यह भी बताने की जहमत नहीं उठाई कि उन्हें इन कानूनों के किन हिस्सों या धाराओं से शिकायत है और क्यों है। इसके उलट इन कानूनों के प्रति उनका विरोध पूर्वानुमानों और अफवाहों पर आधारित रहा है। कानून सम्बंधित विमर्शों में कभी उद्योगपतियों द्वारा किसानों की जमीन हथियाने की बात की गई तो कभी सरकार द्वारा भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को हटा देने के तथाकथित आशंकाओं की। कभी यह कहा गया कि सरकार की नीतियाँ उद्योगपति तय कर रहे हैं तो कभी यह कहा गया कि सरकार देश बेच रही है। मतलब आधारहीन बातों और बयानों का एक ऐसा चक्र जिनके शोर में तर्क वगैरह के लिए स्थान नहीं बचता। ये ऐसी बातें हैं, जो आम भारतीयों के मन में भी किसान संगठनों और उनके समर्थक राजनीतिक दलों की मंशा को लेकर शक पैदा करती हैं।

शरद पवार के अचानक ऐसे दिए गए बयान के पीछे क्या कारण हो सकता है? यह ऐसा प्रश्न है जिसे लेकर केवल अनुमान लगाए जा सकते हैं। अपने मित्र राजनीतिक दलों की तरह पवार भी अभी तक कृषि कानूनों को पूरी तरह से रद्द किए जाने के पक्षधर थे। चूँकि वे दस वर्षों तक केंद्र सरकार के कृषि मंत्री भी रह चुके हैं और महाराष्ट्र में उन्हें किसानों का नेता भी माना जाता रहा है, इसलिए उनका अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार निश्चित तौर पर आश्चर्यचकित करता है।

किसान आंदोलन और लगातार हो रहे विरोध के बीच ही एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे बड़े राज्यों में किसानों के उत्पाद खरीदने की प्रक्रिया को सरकार ने और सरल कर दिया। किसानों के उत्पाद का मूल्य बिना किसी बिचौलिए के उनके अकाउंट में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर मैकेनिज्म के सहारे हो गया। साथ ही इस वर्ष कुछ उत्पादों का मूल्य न केवल पहले की अपेक्षा अधिक मिला, बल्कि उत्पादों की रिकॉर्ड खरीद भी हुई। ऐसे में एक प्रश्न यह उठता है कि सरकार की ओर से किए जाने वाले प्रयासों और उनसे होने वाले संभावित बदलाव को क्या अनुभवी शरद पवार बाकी राजनेताओं से पहले पहचान रहे हैं? देखा जाए तो चल रहे किसान आंदोलन को देश के बाकी राज्यों के किसानों का समर्थन मिलता दिखाई नहीं दे रहा है और शायद शरद पवार इस बात का प्रभाव समझ रहे हैं।

इसके अलावा, महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले करीब चार महीनों से हलचल देखी जा रही थी जिससे लग रहा था कि सब कुछ ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की प्रधानमंत्री के साथ हाल में हुई मुलाकात ने हलचल और तेज कर दी है। शिवसेना और भाजपा के बीच फिर से नजदीकियों के अनुमान लग ही रहे थे कि पवार ने यह बयान दे दिया। इससे लग रहे कयासों में एक और कयास जुड़ गया कि कहीं पवार खुद ठाकरे का कोई खेल तो बिगाड़ना नहीं चाहते? उधर एनसीपी के नेताओं के खिलाफ केंद्रीय जाँच एजेंसियों की कार्रवाई हाल के दिनों में तेज होती दिखाई दी है। राज्य के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के साथ-साथ अजीत पवार पर भी प्रवर्तन निदेशालय सख्त दिखाई दे रहा है। ऐसे में यह अनुमान लगाना स्वाभाविक है कि पवार साहब के बयान के पीछे इन घटनाओं की भूमिका भी हो सकती है।

उधर पवार की प्रशांत किशोर से मुलाकात और एक तीसरा फ्रंट गढ़ने की कोशिशों से कॉन्ग्रेस खुश नहीं दिखाई देती। राहुल गाँधी के साथी नेताओं ने इस बैठक के खिलाफ बयान भी दिए। साथ ही इस विषय पर कॉन्ग्रेस हाई कमान की चुप्पी और पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के नेताओं के समय-समय पर आये बयानों से लगता है कि महा विकास अगाड़ी के घटक दलों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है। ऐसे में कृषि कानूनों पर पवार के नए बयान को लेकर अनुमान चाहे जो लगें, पर महत्वपूर्ण बात यह है कि किसानों के समर्थक राजनीतिक दलों में सबसे वरिष्ठ नेता ने अपने बयान से विपक्षी राजनीतिक दलों और किसान संगठनों के एकतरफा दृष्टिकोण में दरार डाल दी है कि कृषि कानूनों को रद्द करना ही एकमात्र रास्ता है।


‘उसने मुझे वैक्सीन लगाई, वो न तो डॉक्टर है न नर्स’ – TMC महिला नेता पर आरोप, कहा – पोज दे रही थी

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) की एक नेता द्वारा एक महिला को कोरोना वायरस का वैक्सीन लगाने का मामला सामने आया है। हालाँकि टीएमसी नेता का कहना है कि उसने सिर्फ पोज दिया है, वैक्सीन नहीं लगाई।

मामला आसनसोल का है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आसनसोल म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (AMC) के द्वारा शनिवार (03 जुलाई) को रेड लाइट एरिया कुलटी में टीकाकरण कैंप का आयोजन किया गया था। इस सरकारी टीकाकरण कैंप में AMC की डेप्युटी मेयर तबस्सुम आरा मौजूद थीं। जब टीकाकरण चल ही रहा था तब तबस्सुम ने नर्स से वैक्सीन से भरा सिरिंज लिया और एक महिला को लगा दिया।

हालाँकि, इस पूरे मामले में विवाद उत्पन्न होने के बाद टीएमसी नेता तबस्सुम आरा ने कहा कि उन्होंने महिला को कोई वैक्सीन नहीं लगाई है। आरा ने कहा कि उन्होंने तो सिर्फ इंजेक्शन के साथ पोज दिया है ताकि फोटो ली जा सके और इसके द्वारा लोगों में जागरूकता फैले।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जिस महिला को इंजेक्शन लगाया गया है, उस महिला ने भी बताया है कि उसे वैक्सीन लगाई गई है और जिस महिला ने उसे वैक्सीन लगाई, वह न तो डॉक्टर थी और न ही नर्स।

इस मामले पर टिप्पणी करते हुए बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी अकेले ही डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक की भूमिका अदा करती हैं। ऐसे में उनकी पार्टी की नेता (तबस्सुम) ने बस उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है।

एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर्स के राज्य महासचिव मानस गुप्ता ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि तबस्सुम ने कोई ट्रेनिंग ली है या नहीं, लेकिन किसी भी नेता को वैक्सीन नहीं लगानी चाहिए, जागरूकता के लिए भी नहीं। क्योंकि, कोरोना वायरस की वैक्सीन एक डीप इंट्रा-मस्क्युलर वैक्सीन होती है और बिना ट्रेनिंग के इसे लगाए जाने से दूसरे दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

हालाँकि, यह पहला मामला नहीं है जब बंगाल में कोरोना वायरस की वैक्सीन के संबंध में कोई विवाद उत्पन्न हुआ है। इससे पहले खुद को आईएएस अधिकारी बताकर एक व्यक्ति द्वारा फर्जी टीकाकरण कैंप का आयोजन किया गया था। बीजेपी ने इसे केंद्र के खिलाफ बड़ी साजिश बताते हुए इसकी सीबीआई जाँच कराने की माँग की थी। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया था कि यह TMC की एक साजिश है।

इस मामले में आरोपित देबांजन देब के ट्विटर अकाउंट पर टीएमसी के कई मंत्रियों और नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें देखी गईं। इनमें मंत्री फिरहाद हकीम, मंत्री सुब्रत मुखर्जी से लेकर सांसद डॉ शांतनु सेन आदि शामिल हैं। हालाँकि. टीएमसी नेतृत्व ने इस मामले में किसी भी प्रकार की संलिप्तता से पूरी तरह इनकार किया था।

कोहली और प्रियंका एक पोस्ट के लेते हैं इतने पैसे, ‘किसानों’ के समर्थन में ट्वीट करने पर रिहाना को 4.5 करोड़ रुपए?

हॉपर इंस्टाग्राम रिच-लिस्ट 2021 जारी हुई है, जिसमें बताया गया है कि प्रियंका चोपड़ा जोनस इंस्टाग्राम पर प्रत्येक प्रमोशनल पोस्ट के लिए 3 करोड़ रुपए लेती हैं। अमेरिका में बस चुकी बॉलीवुड अभिनेत्री इस साल इंस्टाग्राम की इस रिच-लिस्ट में 27वें स्थान पर हैं।

हर साल जारी होने वाली इस सूची में प्रियंका चोपड़ा पिछले साल 19वें स्थान पर काबिज थीं। महान फुटबॉल खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो इस सूची में पहले स्थान पर हैं, जो इंस्टाग्राम पर एक प्रमोशनल पोस्ट के लिए 11 करोड़ रुपए की फीस लेते हैं। 

प्रियंका चोपड़ा के अलावा विराट कोहली ही एकमात्र भारतीय हैं, जो इस सूची में शामिल हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली एक प्रमोशनल पोस्ट के लिए 5 करोड़ रुपए की फीस लेते हैं। कोहली इस सूची में 19वें स्थान पर हैं।

अर्जेन्टीना के फुटबॉल खिलाड़ी लियोनेल मेसी 8.7 करोड़ रुपए की फीस के साथ 7वें स्थान पर हैं। हॉपर इंस्टाग्राम रिच-लिस्ट में शामिल अन्य सेलिब्रिटी हैं, ड्वेन ‘द रॉक’ जॉनसन (2nd), एरियाना ग्रैन्ड (3rd), काईली जेनर (4th), सेलेना गोम्ज (5th) और किम कारदाशियाँ (6th)। इसके अलावा, इस लिस्ट में बियॉन्से (8th), जस्टिन बीबर (9th) और बार्सिलोना के फुटबॉल खिलाड़ी नेमार (16th) भी शामिल हैं।  

हाल ही में किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट करके विवादों में आने वाली रिहाना भी इस सूची में शामिल हैं। रिहाना ने ट्वीट किया था, ‘हम इसके बारे में बात क्यों नहीं करते हैं’। यह संभावना भी जताई गई थी कि रिहान ने पैसों के लिए यह ट्वीट किया था। इस सूची के अनुसार, रिहाना एक प्रमोशनल पोस्ट के लिए 4.5 करोड़ रुपए लेती हैं।

‘कुरान और इस्लाम का अपमान’ करने पर 23 साल की लड़की को साढ़े तीन साल जेल और 4.5 लाख रुपए का जुर्माना

मोरक्को में 23 वर्षीया एक मोरक्कन-इटालियन युवती को दो साल पुराने एक मामले में साढ़े तीन साल की जेल की सजा सुनाने के साथ ही 6,000 अमेरिकी डॉलर (भारतीय मुद्रा के अनुसार 4,47,111 रुपए) का जुर्माना लगाया गया है। आरोपित को यह सजा ‘कुरान और इस्लाम का अपमान’ करने के लिए सुनाई गई।

आरोपित ने कथित तौर पर कुरान की छोटी आयतों में से एक, सूरत अल कवथर को विकृत कर दिया। युवती ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर उसका नाम बदलकर कुछ ऐसा कर दिया जो ‘अपमानजनक’ था।

पिता के अनुसार, युवती को इस महीने की शुरुआत में रबात हवाई अड्डे पर गिरफ्तार किया गया था जब वह फ्रांस से आ रही थी। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को नहीं पता था कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। 

दरअसल, यह मामला अप्रैल 2019 का है। युवती के पिता ने बताया कि उसने फेसबुक पर कुरान के आयत की नकल करते हुए अरबी वाक्यांश साझा किए। उन्होंने बताया कि उसे अरबी भाषा की समझ नहीं थी, इसलिए उसने बिना कंटेंट को जाने ही उसे साझा कर दिया। मराकेश में एक मजहबी संघ द्वारा उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बाद कानूनी कार्यवाही शुरू हुई।

उसके पिता ने कहा कि युवती को ‘इस्लाम मजहब का अपमान’ करने के लिए साढ़े तीन साल की जेल की सजा और लगभग 6,000 अमेरिकी डॉलर का जुर्माना लगाया गया। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, “मैंने आज उससे मुलाकात की, वह पूरी तरह से टूट चुकी है। उन्होंने उसका भविष्य बर्बाद कर दिया है।” उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर परिवार अपील दायर करेगा।

बता दें कि मोरक्को के दंड संहिता के अनुच्छेद 267 में ‘इस्लाम का अपमान करने’ के अपराध के लिए 6 महीने से दो साल की जेल की सजा का प्रावधान है, लेकिन अगर इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के माध्यम से सार्वजनिक रूप से अपराध किया जाता है तो सजा अधिकतम पाँच साल तक बढ़ जाता है।

UP जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भगवा लहर: 75 जिलों में 67 पर जीत, तोड़ा सपा का रिकॉर्ड

उत्तर प्रदेश में आज (03 जुलाई) जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ। इसके साथ ही चुनाव परिणाम भी घोषित किए जा रहे हैं। मुजफ्फरनगर, रायबरेली, हाथरस, रामपुर और उन्नाव समेत 67 जनपदों में भाजपा प्रत्याशियों की जीत हुई है। हालाँकि, 21 भाजपा प्रत्याशी पहले ही विजयी घोषित किए जा चुके थे, क्योंकि उनके विरोध में कोई नामांकन ही दाखिल नहीं हुआ था। 67 जनपदों में भाजपा के प्रत्याशियों की जीत के बाद समाजवादी पार्टी का रिकॉर्ड भी टूट गया। सपा ने 75 में 63 जनपदों में जीत दर्ज की थी।

जिन सीटों पर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दलों में कड़ा मुकाबला होने की आशंका जताई जा रही थी, उनमें से एक मुजफ्फरनगर की सीट भी थी। यहाँ से भाजपा समर्थित प्रत्याशी डॉ. वीरपाल निर्वाल के सामने भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) प्रत्याशी सत्येन्द्र बालियान थे। मुजफ्फरनगर किसान आंदोलन के कारण पूरे देश में चर्चा में आए राकेश टिकैत का गृहनगर है। माना जा रहा था कि किसान आंदोलन और राकेश टिकैत के भाजपा विरोधी अभियान के चलते मुजफ्फरनगर में जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है, लेकिन परिणाम इसके विपरीत रहे। भाजपा प्रत्याशी डॉ. निर्वाल को जहाँ 30 वोट प्राप्त हुए, वहीं बीकेयू प्रत्याशी सत्येन्द्र बालियान को मात्र 3 वोट से संतोष करना पड़ा।

शामली और बिजनौर में भाजपा और विपक्षी पार्टी के प्रत्याशियों के बीच काँटे की टक्कर अवश्य रही। हालाँकि, दोनों ही जनपदों में भाजपा प्रत्याशी को ही जीत हासिल हुई। शामली में जहाँ भाजपा प्रत्याशी मधु को 10 वोट प्राप्त हुए, वहीं सपा-रालोद गठबंधन प्रत्याशी अंजलि 9 वोट हासिल कर सकीं। इस तरह शामली में भाजपा ने मात्र एक वोट से बाजी मार ली। बिजनौर में भी भाजपा प्रत्याशी साकेन्द्र प्रताप सिंह ने सपा गठबंधन के प्रत्याशी चरणजीत कौर को हरा दिया।

अयोध्या में भाजपा प्रत्याशी की जीत हुई है। यहाँ से भाजपा की उम्मीदवार रोली सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई हैं। उन्हें 30 वोट मिले, जबकि प्रमुख विपक्षी पार्टी सपा के प्रत्याशी को मात्र 10 वोट ही मिले। अयोध्या में सपा सदस्यों ने क्रॉस वोटिंग करते हुए भाजपा के पक्ष में ही मतदान किया।

रायबरेली में विपक्ष जीत की उम्मीद में था। यहाँ से भाजपा समर्थित प्रत्याशी रंजना चौधरी के विरोध में कॉन्ग्रेस और सपा गठबंधन ने पूर्व सांसद अशोक सिंह की बहू आरती सिंह को उतारा था। हालाँकि, कॉन्ग्रेस समर्थित प्रत्याशी को महज 22 वोट ही मिल सके। रंजना ने 30 वोट हासिल करते हुए जीत हासिल की।

उत्तर प्रदेश के इन जिला पंचायत चुनावों में सबसे बड़ा उलटफेर मुलायम सिंह यादव के गढ़ मैनपुरी में देखने को मिला। यहाँ भाजपा प्रत्याशी अर्चना भदौरिया ने सपा प्रत्याशी मनोज यादव को हरा दिया। अर्चना को जहाँ 18 वोट प्राप्त हुए, वहीं यादव को 11 वोट ही मिले।

उत्तर प्रदेश में इस बार हुए पंचायत चुनाव काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे थे। ऐसा इसलिए क्योंकि 2022 में यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में जिला पंचायत के इन चुनावों को यूपी विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जा रहा था। काफी समय से विपक्षी नेता भी लगातार यूपी में भाजपा के खिलाफ लामबंद नजर आ रहे थे। हालाँकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा भी लगातार चुनावों को लेकर अपनी रणनीति बनाती रही।

हाथरस जैसे जिले में भाजपा की जीत यह बताती है कि भाजपा के खिलाफ चलाया गया विपक्ष का प्रोपेगेंडा पूरी तरह से असफल रहा। हाथरस में दलित युवती के बलात्कार और उसकी हत्या के बाद विपक्षी पार्टियों ने भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर दिया था। इसके अलावा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की जीत कई मायनों में अलग है, क्योंकि महीनों से चल रहे किसान आंदोलन को भाजपा के लिए खतरा माना जा रहा था और यह संभावना जताई जा रही थी कि इसका सबसे ज्यादा असर पश्चिमी यूपी के इलाकों में पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश में अलग-अलग इलाकों की बात करें तो भाजपा ने पश्चिमी क्षेत्र की 14 में से 13 जिलों पर जीत हासिल की। इसके अलावा अवध क्षेत्र के 13 में से 13, कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के 14 जिलों में से 13, वाराणसी और उसके आसपास के इलाकों के 12 में से 10 और ब्रज एवं गोरखपुर क्षेत्रों में से क्रमशः 11 और 7 जिलों में भाजपा की जीत हुई है। इस तरह 75 जिलों में हुए जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में सीएम आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा 67 जिलों में विजयी हुई।

मुस्लिमों से चर्चा करेंगे लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के मुद्दे पर पूरी तरह प्रतिबद्ध: असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जनसंख्या नियंत्रण नीति को लेकर गंभीर नजर आ रहे हैं। रविवार (04 जुलाई) को सीएम सरमा मुस्लिम समुदाय के 150 बुद्धिजीवियों और प्रतिष्ठित नागरिकों से जनसंख्या नियंत्रण नीति और परिवार नियोजन के विषय में चर्चा करेंगे। सीएम सरमा ने यह भी कहा कि वह मुस्लिम समुदाय से चर्चा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण पर उनका रुख स्पष्ट है।

सीएम के साथ बैठक में शामिल होने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों को 8 समूहों में बाँटा गया है। इनसे शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, मुस्लिम महिलाओं के वित्तीय सशक्तिकरण और स्वयं सहायता समूह के बारे में चर्चा की जाएगी तथा उनसे सुझाव लिए जाएँगे।

न्यूज18 से चर्चा करते हुए सीएम सरमा ने कहा, “असम की जनसंख्या में अल्पसंख्यकों का योगदान 37% है। इस जनसंख्या का एक बड़ा भाग वंचित और अशिक्षित है। बीते कुछ सालों में असम आर्थिक और सामाजिक पैमाने पर और भी बेहतर स्थिति में हो सकता था। आप महिलाओं को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि उनके ऊपर परिवार का दबाव है। हालाँकि, यह समय है कि महिलाएँ अपना विरोध दर्ज करें और समाज के तौर पर हम उनके सशक्तिकरण का प्रयास करें।“

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सख्त नजर आ रहे हैं, इसके लिए वह लगातार समाज के प्रत्येक वर्ग से चर्चा कर रहे हैं और उनका यह मानना है कि इस नीतिगत निर्णय में सब की सहमति शामिल रहे। सीएम सरमा ने इस मुद्दे पर युवाओं से भी चर्चा की थी और उन्होंने यह भी दावा किया है कि उन्हें ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट यूनियन (AAMSU) के दोनों गुटों का समर्थन प्राप्त है।    

सीएम सरमा ने कहा कि वह मुस्लिम समुदाय के सशक्तिकरण के लिए प्रयास करते रहेंगे और उनसे लगातार बातचीत होती रहेगी लेकिन जनसंख्या नियंत्रण नीति और परिवार नियोजन को लेकर उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है। इस मुद्दे पर उठने वाले राजनैतिक विरोध पर उन्होंने यह भी कहा, “वो मुझे कुछ भी कह सकते हैं। मुझ पर एक समुदाय विशेष के खिलाफ कार्य करने का आरोप भी लगा सकते हैं, लेकिन मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता। मेरी सरकार ने वही किया, जो तार्किक है। मुस्लिम महिलाओं का सशक्तिकरण मेरी सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है।“

हाल ही में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने असम में राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने के लिए 2 बच्चों की नीति (Two-Child Policy) को लागू करने का फैसला किया। घोषणा के अनुसार, कर्जमाफी या अन्य सरकारी योजनाओं के लाभ लेने के लिए इस नीति का परिपालन करना अनिवार्य होगा। हालाँकि, यह भी निर्णय लिया गया कि चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों पर फिलहाल यह नीति लागू नहीं होगी। असम सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए 2 बच्चों की नीति (Two-Child Policy) सबके लिए अनिवार्य होगी और सभी समुदायों पर इसे लागू करने के लिए चरणबद्ध तरीका अपनाया जाएगा।

सीएम सरमा ने अल्पसंख्यक समुदाय से अपील करते हुए कहा था कि वे जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन की नीति अपनाएँ। उन्होंने कहा था कि गरीबी का मुख्य कारण लगातार आबादी बढ़ना है, लिहाजा समुदाय के सभी प्रतिनिधियों को आगे आकर इस दिशा में सरकार का समर्थन करना चाहिए।

पैरों में गिर पड़े पूर्व सपा सांसद: भतीजे को जिताने के लिए ‘राजनीति’, वीडियो वायरल

उत्तर प्रदेश जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के नतीजे आने लगे हैं। हाथरस, महाराजगंज और मुलायम सिंह यादव के गढ़ मैनपुरी में बीजेपी की जीत हुई है, तो वहीं समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। इसी क्रम में चंदौली से एक वीडियो सामने आया, जिसमें पूर्व सांसद और समाजवादी पार्टी के नेता रामकिशुन यादव सपा के जिला पंचायत उम्मीदवार और अपने भतीजे की जीत के लिए पार्टी के जिला पंचायत सदस्यों के पैर पड़ रहे हैं। रामकिशुन को चंदौली का कद्दावर नेता माना जाता है।

पकड़े सदस्यों के पैर

सपा नेता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह सपा सदस्यों से एकजुट रहने की विनती कर रहे हैं और अध्यक्ष पद के उम्मीदवार तेज नारायण यादव को जिताने की अपील कर रहे हैं। अपने इज्जत की दुहाई देते हुए रामकिशुन ने सदस्यों के पैर पकड़ लिए। जब उनसे पूछा गया कि वह पैर क्यों पकड़े तो रामकिशुन ने कहा कि पार्टी के सम्मान की खातिर वह किसी का भी पैर छू सकते हैं।

रामकिशुन यादव ने कहा, “मैं समाजवादी पार्टी के लिए पैरों पर गिर सकता हूँ। मैंने कोई माँग नहीं की। पार्टी की खातिर मैंने पैर पकड़े।” उन्होंने आगे कि कहा कि पैर पर गिरना कोई बड़ी बात नहीं है। वह कोई दूसरे नहीं, बल्कि हमारी ही पार्टी के सिपाही हैं। आपसी विवाद था, इसलिए वे उनको समझा-बुझा रहे थे।

जानकारी के मुताबिक, समाजवादी पार्टी के जिला पंचायत सदस्य जिले कार्यालय में बैठक कर रहे थे। इसी दौरान कुछ नेताओं के आपस में किसी बात को लेकर विवाद होने लगा। तभी पूर्व सांसद रामकिशुन ने अपने सदस्यों को काफी समझाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वह विवाद करते रहे। यह सब देख पूर्व सांसद जी सदस्यों के पैरों पर  गिर पड़े और कहने लगे कि वह अपनी ही पार्टी के सदस्य को ही वोट करें।

पूर्व सांसद का भतीजा सपा से अध्यक्ष पद का उम्मीदवार

सपा ने चंदौली जिला पंचायत अध्यक्ष पद का उम्मीदवार तेज नारायण यादव को बनाया है। तेज नारायण निर्दलीय लड़कर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीते थे। बाद में सपा ने उन्हें टिकट देकर अध्यक्ष पद के लिए अधिकृत प्रत्याशी बनाया। तेज नारायण यादव पूर्व सांसद रामकिशुन यादव के भतीजे हैं। 

चंदौली में जिला पंचायत सदस्यों की कुल संख्या 35 है। जिला पंचायत अध्यक्ष पद की जीत के लिए कुल 18 का आँकड़ा चाहिए, जबकि समाजवादी पार्टी के पास 14 सदस्य हैं। वहीं, बीजेपी के पास 08 सदस्य हैं। इसके अलावा 09 निर्दलीय व अन्य हैं। ऐसे में सपा के पास सबसे अधिक सदस्य हैं। सपा के अधिकृत प्रत्याशी तेज नारायण को मिलने वाले वोटों की संख्या सपा से जीते जिला पंचायत सदस्यों की पार्टी के प्रति निष्ठा को तय कर देगी।