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पीएम मोदी की शासन शैली का ‘गुजरात मॉडल’: कोरोना संकट और 2022 के चुनाव पर CM विजय रुपाणी से खास बातचीत

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी हर सोमवार और मंगलवार को लगभग पूरी दोपहर और शाम तक लोगों से मिलकर उनकी समस्याओं के बारे में समझते हैं, ताकि उन्हें बेहतर तरीके से सेवाएँ दी जा सकें। उनकी ये जनसभाएँ समाज के विभिन्न वर्गों के साथ उनकी मासिक बातचीत ‘मोकला माने (खुलकर बात)’ का विस्तार हैं। लोगों के साथ नियमित तौर पर रुपाणी का यह ‘जन संवाद’ उन्हें इस बात का विश्वास दिलाता है कि अगले साल (2022) होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान गुजरात के लोग एक बार फिर से भाजपा को ही चुनेंगे।

हालाँकि, प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव होने में अभी एक साल का वक्त है। लेकिन, इसको लेकर उत्सुकता उस वक्त जगी, जब आम आदमी पार्टी (AAP) ने पार्टी की गुजरात इकाई में कुछ नए लोगों को शामिल किया। इसके बाद अरविंद केजरीवाल जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया कि गुजरात ‘राजनीति में बदलाव’ के लिए तैयार हैं। इससे पहले इसी साल फरवरी 2021 में आम आदमी पार्टी ने सूरत के निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया था, जिससे पार्टी को दिल्ली के बाहर अपनी छाप छोड़ने की उम्मीद दिखी थी।

हालाँकि, मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का मानना ​​है कि AAP के पास गुजरात के लिए कोई विजन नहीं है। इसलिए वो यहाँ दावेदार नहीं हैं। इसके अलावा पार्टी ( AAP) के पास गुजरातियों को देने के लिए कोई सार्थक विकल्प भी नहीं है।

मंगलवार को अपनी पब्लिक मीटिंग से पहले ऑपइंडिया को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में सीएम ने कहा, “गुजरात एक राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश है। भ्रष्टाचार के खिलाफ नवनिर्माण आंदोलन यहीं से शुरू हुआ था। देश के स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत भी गाँधीजी और सरदार पटेल ने गुजरात से ही की थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुड गवर्नेंस के आंदोलन की शुरुआत भी गुजरात से ही की थी। गुजरात अब तक दो दलीय राज्य ही रहा है। यहाँ जनता ने कॉन्ग्रेस या बीजेपी दोनों में से एक को ही चुना है। राज्य की जनता बीते 25 सालों से भाजपा को चुन रही है। वहीं कॉन्ग्रेस तो लगभग पूरे भारत से ही खत्म हो गई है।”

गुजरात के मुख्यमंत्री ने इस बात को बताया कि आखिर वो आम आदमी पार्टी को प्रदेश में दावेदार क्यों नहीं मानते हैं? उन्होंने कहा कि राज्य में पार्टी (AAP) के पास न तो कोई नेता है और न ही कोई कार्यकर्ता। आज जो भी उसमें शामिल हो रहे हैं वो या तो दूसरे राजनीतिक दलों के असंतुष्ट लोग हैं या फिर उन लोगों ने उनका स्वागत ही नहीं किया था। गुजरात में फ्रीबीज (मुफ्तखोरी) की राजनीति काम नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस ने भी लोगों को कर्जमाफी जैसी मुफ्त सुविधाएँ देने की कोशिश की थी, लेकिन फिर भी वह नहीं जीत पाई।

रुपाणी ने कहा कि वर्ष 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस ने अपनी जाति की राजनीति खूब चली थी। बावजूद इसके गुजरात के लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिया। उन्होंने कहा कि 2017 में प्रदेश में करीबी मुकाबला होने के बाद भी वर्ष 2019 में राज्य ने सभी 26 लोकसभा की सीटें भाजपा को दिया।

राज्य की राजनीति से जुड़े ऑपइंडिया के सवालों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री रुपाणी ने कहा कि वर्तमान में उनका फोकस राज्य के शासन पर है न कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अभी-अभी कोरोना वायरस के दूसरी लहर को नियंत्रित किया गया है और प्रशासन इस बात को सुनिश्चित करने में लगा हुआ है कि अगर प्रदेश में कोविड की तीसरी लहर आती है तो हमें किसी तरह की चुनौती का सामना नहीं करना पड़े।

चुनौतियों और उससे निपटने के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “यह बहुत बड़ी चुनौती थी। हमारे पास आपूर्ति से 5-6 गुना अधिक माँग थी। लेकिन, हम सबने मिलकर इससे निपटने की कोशिश की। हमारे पास बहुत ही डायनमिक डैशबोर्ड है, जिसके जरिए हमें पूरे गुजरात के सभी विभागों से रियल टाइम डेटा मिलता है। कोरोना काल के दौरान राजकोट, वडोदरा, अहमदाबाद और सूरत के हालात का जायजा लेने के लिए मैंने वहाँ के डॉक्टरों और लोगों से रियल टाइम में बात की। 30 अप्रैल 2021 को दूसरी लहर के दौरान सबसे 14,600 नए संक्रमित मिले थे। बीते दिन 100 से भी कम नए संक्रमित मिले थे। लेकिन, अगर तीसरी लहर का प्रकोप होता है तो हम प्रतिदिन 25,000 नए संक्रमितों के लिए तैयार हैं। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री से लेकर ब्यूरोक्रेट तक इसमें शामिल थे, क्योंकि इससे निपटना सामूहिक जिम्मेदारी थी।”

मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि प्रदेश में कोरोना की तीसरी लहर अगर आती है तो राज्य इसके लिए पूरी तरह से तैयार है। हालाँकि, उद्देश्य यह सुनिश्चित करने का है राज्य में तीसरी लहर आए ही न। प्रदेश के 6 बड़े शहरों अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट, जामनगर और गाँधीनगर में बड़े पैमाने पर लोगों का वैक्सीनेशन किया जा रहा है। राज्य सरकार यहाँ पर नजर बनाए हुए है। सीएम ने विश्वास जताया कि टीकाकरण की यही तेजी रही तो जुलाई 2021 के अंत तक सरकार इन प्रमुख जिलों के साथ-साथ जूनागढ़ और भावनगर के 70% से अधिक लोगों का टीकाकरण कर लेगी।

कोरोना की दूसरी लहर से सबक लेते हुए राज्य सरकार ने ऑक्सीजन बेड समेत दूसरे चिकित्सा आपूर्तियों की क्षमता को बढ़ाया है। उन्होंने कहा, “15 मार्च को हमारे पास 41,000 ऑक्सीजन बेड थे। एक महीने के भीतर हमने ऑक्सीजन बेड्स की क्षमताओं को बढ़ाकर 57,000 कर दिया। कोरोना की पहली लहर के दौरान ऑक्सीजन की आवश्यकता अधिकतम 300 मीट्रिक टन थी। लेकिन इस बार यह बढ़कर 1180 मीट्रिक टन हो गई है। तीसरी लहर को देखते हुए हम 1800 मीट्रिक टन ऑक्सीजन के लिए तैयार हैं। हम पूरे गुजरात में 300 ऑक्सीजन प्लाँट्स लगाने जा रहे हैं। इसमें से 150 स्थापित भी हो चुके हैं। एक सेंट्रलाइज्ड इन्फॉर्मेशन डैशबोर्ड की स्थापना की योजना है, जिसके जरिए लोग राज्य के विभिन्न शहरों के अस्पतालों में बेड्स की उपलब्धता के बारे में आसानी से जान सकेंगे।

64 वर्षीय भाजपा नेता विजय रुपाणी का मुख्यमंत्री के तौर पर इस साल अगस्त 2021 में 5 साल का कार्यकाल पूरा हो जाएगा। रुपाणी ने ऑपइंडिया को बताया कि वो न केवल इस बात को सुनिश्चित करने में लगे हैं कि राज्य में कोरोना की तीसरी लहर न आए, बल्कि कोविड की पहली दो लहरों के कारण राज्य का विकास कार्य भी पटरी से न उतरने पाए।

सीएम ने कहा, “कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान गुजरात देश का एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसने कम्प्लीट लॉकडाउन नहीं किया था। हमने उद्योगों को खुला रखा और दफ्तर कम क्षमताओं के साथ काम करते रहे।” कोविड के कारण सबसे अधिक प्रभावित उद्योगों में से एक पर्यटन को पुनर्जीवित करने पर उन्होंने कहा, “गुजरात को सोमनाथ, अंबाजी जैसे पवित्र स्थलों के साथ धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में जाना जाता है। हम बनासकाँठा सीमा पर ‘बॉर्डर टूरिज्म’ के रूप में नया पर्यटन क्षेत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं।” गुजरात की कुल 3,323 किलोमीटर की सीमा में से लगभग 506 किलोमीटर की सीमा पाकिस्तान से लगती है।

सौराष्ट्र क्षेत्र गुजरात के कुल क्षेत्रफल का लगभग एक तिहाई है। इस क्षेत्र के विकास के बारे में बात करते हुए सीएम ने कहा कि वहाँ एम्स जैसे अस्पताल, हवाई अड्डे और 6 लेन राजमार्गों का निर्माण किया जा रहा है, जो इस क्षेत्र को राजकोट के रास्ते अहमदाबाद से जोड़ते हैं। प्रदेश के सीएम रूपाणी खुद भी राजकोट से हैं और यह राजकोट II निर्वाचन क्षेत्र था, जहाँ फरवरी 2020 में पीएम मोदी ने पहली चुनावी जीत दर्ज की थी।

मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने विकास के लक्ष्यों और एजेंडे को पूरा करने में जरूरी मार्गदर्शन और समर्थन देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया। उन्होंने याद किया कि इस साल मई 2021 में जब चक्रवाती तूफान तौकते ने गुजरात में तबाही मचाई तो इससे निपटने में पीएम मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सबसे ऊपर थे। भाजपा नेता ने कहा, “पीएम मोदी अगले दिन ही गुजरात आए थे। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संपर्क में थे, एनडीआरएफ भेजे, गृहमंत्री अमित शाह भी लगातार हमसे संपर्क में थे। इसके अलावा केंद्र ने 1,000 करोड़ रुपए की राहत पैकेज की भी घोषणा की।”

उन्होंने राज्य में ‘संस्था निर्माण’ की संस्कृति का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया, जिन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शासन में उनकी मदद करने के लिए इन्हें स्थापित किया था। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तकनीकों का इस्तेमाल करते थे, उसी तरह से राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री भी प्रभावी ढंग से तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

‘सीएम डैशबोर्ड’ तकनीक का ऐसा ही प्रभावी उपयोग है, जो कि मुख्यमंत्री के कार्यालय को रियल टाइम में हालात पर नजर रखने और विभिन्न सरकारी योजनाओं और प्रस्तावों को प्राप्त करने में मदद करता है। कोरोना संकट के दौरान इस डैशबोर्ड का इस्तेमाल प्रभावी ढंग से किया गया था।

यह पूछे जाने पर कि उन्हें दूसरे मुख्यमंत्रियों की तरह राष्ट्रीय मीडिया में बार-बार या ‘प्रभावी रूप से’ क्यों नहीं देखा जाता है? इस पर गुजरात के सीएम ने कहा कि वह अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने में विश्वास करते हैं और भले ही वह राष्ट्रीय मीडिया में दिखाई न दें। वह आसानी से सुलभ व्यक्ति हैं जो लोगों की प्रतिक्रियाओं को महत्व देते हैं। यही कारण है कि वह सप्ताह में दो दिन लोगों से मिलने और उनकी बात सुनने में बिताते हैं।

(यह साक्षात्कार ऑपइंडिया के सीईओ राहुल रौशन और अंग्रेजी वेबसाइट Opindia की संपादक निरवा मेहता ने किया था)

‘देश में लाखों मस्जिद, 5 बार अरबी में सुनाई जाती है अजान, सब समझे महत्व इसलिए हिंदी में भी बजाई जाए’

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रचार साहित्य विभाग के सह प्रभारी विकास प्रीतम सिंह ने बुधवार (जून 30, 2021) को सरकार और मुस्लिम मौलवियों से मस्जिदों में अज़ान पढ़ने के लिए अरबी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि देश भर में लाखों मस्जिदों से दिन में पाँच बार अरबी में अज़ान पढ़ी जाती है, जबकि करोड़ों भारतीय अरबी जानते या समझते नहीं हैं।

विकास प्रीतम सिंह ने ट्वीट करते हुए लिखा, “देश की लाखों मस्जिदों से दिन में 5 बार अरबी भाषा में सुनाई जाने वाली अजान इस देश के करोड़ों गैर अरबी लोगों को समझ नहीं आती है। अतएव सरकार एवं मुस्लिम इंतजामिया से निवेदन है कि अजान के महत्व और खासियत से सभी को परिचित करवाने के लिए इसका हिन्दी अनुवाद भी मस्जिदों से बजना चाहिए।”

गौरतलब है कि मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अजान पर रोक को लेकर लगातार आवाज उठती रही है। इसी साल मई में इससे जुड़ी याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में अफजल अंसारी बनाम यूपी सरकार का केस लाया गया था। इस केस में हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि अजान इस्लाम का आवश्यक एवं अटूट अंग है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं है।

इसी साल मार्च में गोवा में लाउडस्पीकर पर अजान देने पर प्रतिबंध लगाया गया था। वहीं कर्नाटक में राज्य वक्फ बोर्ड ने रात 10 बजे से सुबह 5 बजे के बीच मस्जिदों और दरगाहों पर लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसी तरह झारखंड हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर सड़क पर नमाज पढ़ने और माइक से अजान देने पर रोक लगाने की माँग भी की गई थी।

भारत में, कानून के अनुसार, लाउडस्पीकर का उपयोग रात में (रात 10:00 बजे से 6:00 पूर्वाह्न के बीच) बंद परिसर को छोड़कर नहीं किया जाना चाहिए। कानून में यह भी कहा गया है कि शोर का स्तर 11dB (A) से अधिक नहीं हो सकता। कई अदालतों के आदेश में कहा गया है कि अधिकारियों को ध्वनि प्रदूषण के कारण धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकरों के उपयोग को प्रतिबंधित करना सुनिश्चित करना चाहिए।

बिलाल फिलिप्स और जाकिर नाइक से जुड़े हैं धर्मांतरण गिरोह के तार, स्टिंग से खुलासा: कानपुर के 8 कट्टरपंथी यूपी पुलिस की रडार पर

उत्तर प्रदेश में इस्लामी धर्मांतरण गिरोह के मामले में नित नए खुलासे हो रहे हैं। गिरफ्तार मौलाना मोहम्मद उमर गौतम के धर्मांतरण गिरोह के पीछे का मास्टरमाइंड बिलाल फिलिप्स को बताया जा रहा है, जो भगोड़ा इस्लामी उपदेशक ज़ाकिर नाइक का करीबी है। ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद दावा किया कि उमर के सहयोगी सुफियान ने खुलासा किया कि ज़ाकिर नाइक और बिलाल फिलिप्स से उसके सम्बन्ध रहे हैं।

माना जा रहा है कि इस गिरोह के तार खूँखार आतंकी संगठन ISIS से भी जुड़े हो सकते हैं। ‘रिपब्लिक’ के स्टिंग ऑपरेशन में सुफियान जासूसी कैमरे के सामने कहता है, “डॉक्टर फिलिप्स एक ऑनलाइन इस्लामी विश्वविद्यालय चलाते हैं। इसके परीक्षा सेंटर दिल्ली स्थित ‘इस्लामिक दावा सेंटर (IDC)’ के दफ्तर में ही स्थित है। इसके मुख्य सेंटर हैदराबाद में है। छात्र घर से ही कोर्स कर सकते हैं, लेकिन परीक्षा देने IDC के केंद्र पर आते हैं।”

उसने दावा किया कि IDC के पास उन छात्रों के आईडी कार्ड्स से लेकर सारे विवरण हैं। उसने बताया कि IDC और IOU के बीच करार हुआ था, जिससे मौलाना मोहम्मद उमर गौतम बिलाल फिलिप से जुड़ा हुआ है और वो ज़ाकिर नाइक से। उसने बताया कि उमर ने बिलाल से मुलाकात भी की थी। कज़ाख़स्तान में एक ‘सर्व धर्म सम्मलेन’ में उमर ने खुद को ‘भारतीय प्रतिनिधि’ के रूप में पेश किया था।

बिलाल फिलिप्स से IDC के सम्बन्ध – रिपब्लिक के स्टिंग से खुलासा

बिलाल भी वहाँ पहुँचा हुआ था। बिलाल फिलिप्स की एंट्री कई देशों ने प्रतिबंधित कर रखी है, जिसमें भारत भी शामिल है। उसने लगभग 6 भारतीय मुस्लिमों को ISIS में शामिल कराया है। बिलाल फिलिप्स ज़ाकिर नाइक के इस्लामी चैनल ‘पीस टीवी’ पर भी आता है। वो खुद को सुधारवादी बताता है, लेकिन उस पर इस्लामी आतंकी संगठनों में भर्ती कराने का आरोप है। उसका जन्म जमैका के किंग्स्टन में हुआ था, लेकिन उसके जीवन का अधिकतर हिस्सा कनाडा के टोरंटो में गुजरा है।

उधर यूपी पुलिस को पता चला है कि कानपुर के 8 कट्टरपंथी मुस्लिम मौलाना मोहम्मद उमर गौतम के संपर्क में थे। कानपुर व इसके आसपास होने वाली उसकी सभाओं के लिए यही भीड़ जुटाने का काम करते थे। इन आठों का इतिहास क्राइम ब्यूरो खँगाल रहा है। ये गैर-मुस्लिमों को उमर की सभाओं में ले जाते थे और फिर धन का प्रलोभन देकर उनका इस्लामी धर्मांतरण कराते थे। फोन पर भी IDC के लोग गैर-मुस्लिमों का माइंडवॉश करते थे।

‘सिख लड़कियों से लव जिहाद पर बादल और सिद्धू चुप क्यों? दिल्ली से आकर फुटेज खा रहे नेता’: रमणीक सिंह मान

जम्मू कश्मीर में सिख समुदाय की लड़कियों के अपहरण, निकाह और जबरन धर्मांतरण के आरोप का चर्चा जोर पकड़ा हुआ है। इसी बीच राजनीतिक विश्लेषक रमणीक सिंह मान ने श्रीनगर जाकर पूरी स्थिति को समझा है और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को अवगत कराया है। उन्होंने कहा कि सिख समुदाय की लड़कियों को निशाना बनाए जाने के दो मामले ही सामने आए हैं, लेकिन यहाँ आकर उन्हें पता चला कि ऐसे अनेकों मामले हैं।

उन्होंने बताया कि एक सिख लड़की का जबरन निकाह कराए जाने के बाद भी उसे प्रताड़ित किया गया। वो 4 महीने की गर्भवती थी, जिसके बाद उसके पेट पर लात मारी गई। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और उन्हें घाटी से भगाए जाने के बाद 2000 में चित्तसिंहपुरा में 35 सिखों को मार डाला गया था। उन्होंने कहा कि तब से लेकर आज तक सिख समुदाय चट्टान की तरह इस्लामी कट्टरवाद का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि ‘यूनाइटेड सिख कश्मीर’ संस्था के जरिए कई सिख युवा जम्मू कश्मीर में एकता का प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने बताया कि हालिया धर्मांतरण विवाद और ‘लव जिहाद’ के तहत जम्मू कश्मीर में अधेड़ उम्र के लोग अपनी से आधी उम्र की लड़कियों के साथ निकाह कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर इन घटनाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों को कभी क्रेडिट नहीं दिया जाता है।

रमणीक सिंह मान ने इस बात से दुःख जताया कि कोई एक राजनेता दिल्ली से आ जाता है तो वो पूरी मुद्दे को हाईजैक कर लेता है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली से आए ये नेता जम्मू कश्मीर के जिन नेताओं को मीडिया के सामने ललकारते हैं, असल में वो उनकी ही मेहमाननवाजी का लुफ़्त भी उठाते हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं को मुद्दे से भटकाने का आरोप लगाते हुए कहा कि असल में जमीन पर संघर्ष कर रहे लोगों का क्रेडिट वो चुरा लेते हैं। उन्होंने कहा कि सिरसा भी ‘सिद्धू ब्रीड’ के ही नेता हैं।

उन्होंने कहा कि असल मुद्दा कुछ और है, उसे तो छिपा दिया जाता है और उससे लोगों का ध्यान भटका दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सिख लड़कियों के खिलाफ जबरन धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ बड़े ही व्यवस्थित तरीके से पूरी साजिश के साथ हर जगह किया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि दोनों हाथ उठा कर ‘हाल्लेलुज्जाह’ का नारा लगाने वाले कैसे सिख हित में काम कर सकते हैं? उन्होंने पूछा कि पाकिस्तान जाकर वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी फ़ौज के मुखिया को गले लगाने वाले सिखों के लिए क्या करेंगे?

रमणीक सिंह मान ने इस बात नाराजगी जताई कि अब तक अकाली दल के मुखिया सुखबीर सिंह बदल या फिर कॉन्ग्रेस के नवजोत सिंह सिद्धू ने अब तक इस मामले पर चूँ तक नहीं किया है। उन्होंने राजनेताओं से अपील कि की वो सिर्फ मीडिया में बने रहे के लिए बयान न दें, बल्कि समुदाय के साथ मजबूती से खड़े हों। उन्होंने कहा कि ज्ञान देने वाले देते रहें, हमलोग पीड़ित महिलाओं की मदद करेंगे और इसके लिए जो भी ज़रूरी होगा किया जाएगा।

इससे पहले शिरोमणि अकाली दल के नेता परमजीत सिंह सरना ने मंजिंदर सिंह सिरसा के बयान पर कश्मीरियों से माफी माँगते हुए उसे भड़काऊ करार दिया था। उन्होंने दल की ओर सिरसा के बयान पर कश्मीरियों से माफी माँगी थी और ये भी कहा था कि उन्हें मुस्लिम संगठनों ने सहयोग दिया। उन्होंने कहा था, “मैं लड़की के घरवालों से मिला। मामला सुलझ गया है। लड़की की जिससे शादी हुई वह उसे जानती थी।”

मंजिंदर सिंह सिरसा ने अपने बयान में कहा था, “मैं श्रीनगर के स्थानीय नेताओं, मौलानाओं और मुफ्तियों से सिख बेटियों के समर्थन में आने का अनुरोध करता हूँ। सीएए के विरोध के दौरान मुस्लिम बेटियों को सुरक्षित घर पहुँचाने में सिख सबसे आगे थे, लेकिन कोई भी मुस्लिम नेता सिख लड़कियों के जबरन धर्मांतरण के खिलाफ आवाज उठाने नहीं आया। मैं श्रीनगर में स्थानीय सिख समुदाय के साथ जबरन निकाह और सिख बेटियों के धर्मांतरण के विरोध में शामिल हो रहा हूँ, जो दूसरे धर्म के बुजुर्गों से शादी करने के लिए मजबूर है। ”

कोरोना से मौत तो परिजन मुआवजे के हकदार, 6 हफ्ते में गाइडलाइन बनाए NDMA: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोरोना महामारी से जिनकी मौत हुई है उनके परिजन मुआवजे के हकदार हैं। इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को छह सप्ताह के भीतर दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा गया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी कहा है कि वह केंद्र सरकार को मुआवजे के तौर पर एक विशेष राशि ही देने का निर्देश नहीं दे सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने पीड़ित परिवारों को 4 लाख रुपए बतौर मुआवजा देने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की अपील की थी। साथ ही कोविड के कारण जान गँवाने पर मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया में भी सरलीकरण की गुहार लगाई थी। SC ने कहा कि कोविड पीड़ितों को अनुग्रह राशि सहित राहत का न्यूनतम मानक प्रदान करना राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के लिए वैधानिक रूप से अनिवार्य है।

कोर्ट ने COVID पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा तय किया जाएगा कि पीड़ितों को कितनी राशि दी जाए। 6 हफ्ते में गाइडलाइन तैयार की जाएगी।

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कोर्ट कोई मुआवजा तय नहीं कर सकती। सरकार अपनी नीति के मुताबिक पीड़ित परिवार को राहत देने का निर्णय ले सकती है। कोर्ट ने कहा कि सरकार अपने संसाधन के हिसाब से मुआवजा या राहत पर नीति तय कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी नियम और संसाधन के मुताबिक मुआवजा तय कर सकती है।

याचिका में केंद्र और राज्यों को आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 के तहत कोरोना के कारण जान गँवाने लोगों के परिवारों को चार लाख रुपए का मुआवजा देने का अनुरोध किया गया था। याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा था कि आपदा प्रबंधन कानून में मुआवजे का प्रावधान केवल भूकंप, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं पर ही लागू है, जिसे कोरोना महामारी पर लागू नहीं किया जा सकता है।

डेथ सर्टिफिकेट में ‘कोरोना से मौत’ लिखना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कोविड संक्रमण के कारण होने वाली मौतों के मामले में डेथ सर्टिफिकेट जारी करने को आसान बनाने के लिए उचित दिशा-निर्देश भी जारी करे। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी आदेश दिया है कि डेथ सर्टिफिकेट पर मौत की वजह ‘कोरोना से मौत का दिन’ लिखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोविड से मृत व्यक्ति के परिवारों को अनुग्रह सहायता देना आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 12 के तहत निर्धारित ‘राहत के न्यूनतम मानकों’ का हिस्सा है।

15000 घटनाएँ, 25 मौतें, 7000 महिलाओं से बदसलूकी: बंगाल हिंसा पर HC के पूर्व चीफ जस्टिस के नेतृत्व वाली टीम की रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल में 2 मई 2021 को विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक हिंसा भड़क उठी थी। इस दौरान हिंसा की करीब 15 हजार घटनाएँ हुई। इसमें 25 लोगों की मौत हो गई और करीब 7000 महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई। यह दावा सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे प्रमोद कोहली की अगुवाई वाली फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट में की गई है।

यह रिपोर्ट मंगलवार (29 जून 2021) को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी को सौंपी गई थी। यह टीम सिविल सोसायटी ग्रुप ‘कॉल फॉर जस्टिस’ ने हिंसा की जाँच के लिए गठित की थी। रिपोर्ट में कहा गया है, “स्पष्ट संकेत है कि ज्यादातर घटनाएँ छिटपुट नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित, संगठित और षड्यंत्रकारी थे।”

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के 16 जिले चुनाव के बाद हुई हिंसा से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा, “रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव के बाद हुई हिंसा के कारण कई लोगों ने पश्चिम बंगाल में अपना घर छोड़ दिया है और असम, झारखंड और ओडिशा में शरण ली है।”

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ खतरनाक अपराधी, माफिया डॉन और आपराधिक गिरोह, जो पहले से ही पुलिस रिकॉर्ड में थे, ने कथित तौर पर इन घातक हमलों को अंजाम दिया। जिससे यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को चुप कराने को लिए इन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आवासीय और वाणिज्यिक संपत्तियों को नष्ट करने और तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम देने का एकमात्र उद्देश्य लोगों को उनकी आजीविका से वंचित करना और उन्हें आर्थिक रूप विकलांग करना था।

बंगाल में मंगलवार को पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था, “रिपोर्ट कहती है कि हिंसा एक सुनियोजित साजिश थी और अपराधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ शामिल थे। इसमें कहा गया है कि पुरुषों की हत्या की गई और महिलाओं का बलात्कार किया गया। कई राज्यों में चुनाव हुए लेकिन ऐसी हिंसा कहीं नहीं देखी गई। महिलाओं को सबसे अधिक हमलों का सामना करना पड़ा, जबकि राज्य की मुख्यमंत्री एक महिला हैं।”

गौरतलब है कि रिपोर्ट में बंगाल की सीएम को राज्य में हिंसा रोकने में नाकाम बताया गया है। ये भी बताया गया है कि टीम को कई जगहों पर क्रूड बम और पिस्टल की अवैध फैक्ट्री मिली। कमेटी के सदस्यों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट 63 पेज की है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए टीम पश्चिम बंगाल गई थी, जहाँ से 200 से ज्यादा तस्वीरें, करीब 50 से ज्यादा वीडियो एनालिसिस कर इसे तैयार किया गया। यह टीम ग्राउंड पर भी लोगों से मिली। रिपोर्ट ये भी बताती है कि हिंसा में सिर्फ उन लोगों को निशाना बनाया गया जिन्होंने अपना वोट एक निश्चित पार्टी को नहीं दिया।

आरफीन शाह ने हिन्दू महिला से की शादी, फिर ससुर के साथ निकाह का बनाया दबाव, मना करने पर छोड़ दिया: J&K में ‘लव जिहाद’

जम्मू कश्मीर में ‘लव जिहाद’ की एक पीड़िता ने न्याय के लिए उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा से गुहार लगाई गई। ये मामला ऐसे समय में आया है, जब दो सिख लड़कियों के जबरन निकाह और इस्लामी धर्मांतरण का मुद्दा चर्चा में है। निकिता सैनी मूल रूप से पंजाब की रहने वाली है और वो जालंधर में एक ऑर्थोपेडिक अस्पताल में कार्यरत थीं। उनकी शादी उधमपुर के आरफीन शाह के साथ हुई थी। उन्होंने बताया कि आरफीन 9वीं-10वीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान उनका क्लासमेट था।

‘JK Media’ के आशीष कोहली से बात करते हुए निकिता ने बताया कि व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर उनका क्लासमेट होने की वजह बात होती थी, जो दोस्ती में बदल गई। बकौल निकिता, आरफीन को उनके बारे में सब कुछ पता था। बकौल निकिता, जनवरी 2021 में अचानक से उसने अपनी माँ का इलाज करवाने को कहा, जो कैंसर की मरीज थी। निकिता ने इसमें उसकी मदद की। आरफीन को पता था कि निकिता का पहले पति के साथ तलाक हो चुका है।

निकिता ने बताया, “आरफीन और उसकी अम्मी ने मुझे बताया कि वो लोग विधवाओं और तलाकशुदा महिलाओं की मदद करते हैं। साथ ही कहा कि वो लोग एकदम खुले विचारों वाले हैं और कभी धर्म-परिवर्तन करने के लिए नहीं कहेंगे। अकेली महिला होने के कारण मुझे भी लगा कि मुझे सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत है, इसीलिए मैंने हामी भर दी। फिर सहारनपुर में मेरा इस्लामी रीति-रिवाज से निकाह हुआ।”

निकिता ने बताया कि जब बताया कि खुद को लिबरल बताने वाले उन लोगों ने निकाह के समय उनका नाम नफ़ीज़ा रख दिया, जिसे देख कर वो चौंक गईं। निकिता ने बताया कि सवाल पूछने पर पति और सास ने इसे एक दस्तावेजी औपचारिकता बताया। इसके बाद हरिद्वार ले जाकर मनसा देवी मंदिर में हिन्दू प्रक्रिया से शादी हुई। कुछ दिन बाद उन्हें हरिद्वार बुलाया गया। इसके बाद जो हुआ, वो चौंकाने वाला था।

निकिता ने बताया कि उधमपुर बुलाने के बाद पूरे परिवार ने उनकी ‘काउंसिलिंग’ की, जिसमें पति के अलावा सास-ससुर और ससुर के भाई भी मौजूद थे। उन पर दबाव बनाया जाने लगा कि वो अपने ससुर से निकाह कर लें। बकौल निकिता, उनकी सास ने दावा किया कि उन्होंने 2007 के बाद से ही अपने पति के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाए हैं, क्योंकि वो कैंसर की मरीज थीं। निकिता का कहना है कि तब घर की बात घर में ही रही, लेकिन सुबह फिर दबाव बनाया जाने लगा।

इसके बाद उन्हें लालच दिया गया कि उनके ससुर अपनी संपत्ति उनके नाम पर कर देंगे। फिर उन्हें 20,000 रुपए प्रति महीने देकर रखने की बात की गई। निकिता ने बताया कि इस दौरान उनके पति ने उनका साथ देने का दिखावा किया और दोनों कुंजवानी में शिफ्ट हो गए। इसके कुछ दिनों बाद वो फिर से अपने पिता से निकाह करने को कहने लगा और कहा कि घर की बात घर में ही रहेगी, किसी को पता नहीं चलेगा।

निकिता सैनी ने ‘JK Media’ के आशीष कोहली को बताई अपनी कहानी

निकिता ने अपना दर्द सुनाते हुए कहा कि एक दिन अचानक से उनका पति गायब हो गया और कुछ दिनों बाद उसकी तरफ से एक संदेश भिजवाया गया कि वो तलाक दे दें नहीं तो बहुत बड़ी समस्या हो जाएगी। उन्हें धमकी दी जाने लगी। निकिता ने इस मामले में FIR भी दर्ज कराई गई। उन पर परिवार के एक सदस्य के अपहरण का आरोप लगाया। बाद में पता चला कि वो फैमिली टूर पर था। तब निकिता ने तंग आकर आत्महत्या की धमकी दी।

पुलिस ने घर में मिल-बैठ कर मामला सुलझाने की बात कही। निकिता ने बताया कि उनके पति के परिवार की बंदूक फैक्ट्री है और वो ‘जियो और जीने दो’ नामक NGO भी चलाते हैं। उन्हें न्यूड वीडियो और फोटोग्राफ वायरल करने की धमकी दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस मदद की बजाए डेट पर डेट दे रही है। उन्होंने अपनी जान का खतरा बताते हुए कहा कि वो मीडिया के सामने आई हैं, ताकि उनके साथ जो हुआ वो किसी और के साथ न हो। उन्होंने अपने पति के खिलाफ कार्रवाई की भी गुहार लगाई।

असम में डॉक्टर को घसीट-घसीट कर मारने में बच्चे भी थे शामिल: 29 दिन में चार्जशीट, 36 आरोपित

असम के होजाई जिले स्थित एक कोविड केयर सेंटर में डॉक्टर से मारपीट के मामले में पुलिस ने 29 जून 2021 को चार्जशीट दाखिल कर दी। इसमें तीन नाबालिगों समेत 36 लोगों को आरोपित बनाया गया है। असम पुलिस के स्पेशल डीजी जीपी सिंह ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है।

उन्होंने इसके लिए होजाई जिले के पुलिस अधीक्षक बरुन पुरकायस्थ और जाँच अधिकारी रोजी तालुकदार की तारीफ भी की ही। डीजी ने ट्वीट में कहा है, “होजाई के उदाली में डॉक्टर पर हमले के मामले में पुलिस ने कानून का उल्लंघन करने वाले 3 बच्चों सहित 36 आरोपितों के खिलाफ केवल 29 दिनों में चार्जशीट दाखिल की है।”

मध्य असम के होजई जिले के उदाली कोविड केयर सेंटर में 1 जून 2021 को एक मरीज की मौत के बाद डॉक्टर सेजु कुमार सेनापति के साथ भीड़ ने मारपीट की थी। इस हमले में डॉक्टर बुरी तरह से घायल हो गए थे। उन्हें भी सर्जरी की जरूरत पड़ी थी। उस दौरान घटना के 24 घंटे के भीतर पुलिस ने 24 आरोपितों को गिरफ्तार किया था। इनमें मोहम्मद कमरुद्दीन, मोहम्मद जैनलुद्दीन, रेहनुद्दीन, सईदुल आलम, रहीमुद्दीन, राजुल इस्लाम, तैयबर रहमान और साहिल इस्लाम शामिल थे।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें बदमाशों का समूह अस्पताल के भीतर घुस कर डॉक्टर के कपड़े उतार कर उन्हें घसीट-घसीट कर पीट रहा था। लात-घूसों से डॉक्टर की पिटाई की गई थी। उनमें से एक अपने हाथ में बर्तन लेकर ताबड़तोड़ वार कर रहा था।

74% मुस्लिमों को चाहिए शरिया कोर्ट, 80% को मजहब से बाहर औरतों की शादी नहीं कबूल: अमेरिकी थिंक टैंक ने भी माना- हिंदू ज्यादा सहिष्णु

अमेरिका वाशिंगटन में स्थित थिंक टैंक ‘Pew Research Centre’ ने भारत में विभिन्न धर्मों को लेकर अध्ययन किया है और अपना रिपोर्ट जारी किया है। Pew के रिसर्च के अनुसार, भारत की जनसंख्या विविधता भरी है और धर्म में खासी आस्था रखती है। दुनिया के अधिकतर हिन्दू, जैन और सिख भारत में ही रहते हैं, लेकिन साथ ही ये दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले देशों में से भी एक है। यहाँ बौद्ध और ईसाईयों की जनसंख्या भी दसियों लाख में है।

‘Pew Research Centre’ के अनुसार, उसने कोरोना काल से पहले 2019-20 में 29,999 भारतीयों को लेकर एक सर्वे किया, जिसमें यहाँ राष्ट्रवाद, धार्मिक आस्था और सहिष्णुता को लेकर अध्ययन किया गया। भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 17 भाषाओं में स्थानीय स्तर के लोगों द्वारा सर्वे कराया गया। इसमें पाया गया कि भारत के लोग धार्मिक रूप से सहिष्णु हैं, लेकिन वो अपना धार्मिक जीवन अलग-अलग जीना पसंद करते हैं।

रिसर्च के अनुसार, 84% लोगों ने खुद को ‘सच्चा भारतीय’ बताते हुए सभी धर्मों के सम्मान की बात कही, जबकि 80% ने कहा कि अपने धर्म का एक हिस्सा होने भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना दूसरे धर्मों का सम्मान करना। 6 धर्मों के लोगों ने बताया कि वो भारत में अपने धर्म के क्रियाकलाप स्वतंत्रता से करते हैं। अधिकतर ने बताया कि दूसरे धर्मों के लोग भी यहाँ पूरी आज़ादी के साथ आने धार्मिक क्रियाकलाप करते हैं।

इस रिसर्च में दावा किया गया है कि 85% हिन्दुओं ने माना कि एक सच्चा भारतीय सभी धर्मों का सम्मान करता है, जबकि 78% मुस्लिमों ने ऐसा कहा। हालाँकि, रिसर्च का ये भी दावा है कि यहाँ सभी धर्मों के लोग अलग-अलग जीना पसंद करते हैं क्योंकि अधिकतर ने अपने सबसे विश्वासी मित्र के रूप में अपने ही धर्म के व्यक्ति का नाम लिया। 67% हिन्दुओं ने कहा कि उनकी महिलाओं द्वारा किसी अन्य धर्म में शादी करना ठीक नहीं है।

पुरुषों को लेकर भी 65% हिन्दुओं की यही राय थी। वहीं मुस्लिमों में 80% ने महिलाओं और 76% ने पुरुषों को लेकर ये बात कही। 64% हिन्दुओं ने कहा कि भारत का सच्चा नागरिक होने के लिए हिन्दू होना ज़रूरी है और उनमें से 80% ने कहा कि इसके लिए हिंदी भाषा भी आवश्यक है। हिन्दू धर्म को भारतीयता से जोड़ कर देखने वालों में 76% ने खुद को अंतरधार्मिक विवाह के खिलाफ बताया। जबकि हिन्दू धर्म को भारतीयता से जोड़ कर न देखने वालों में ने ये राय रखी।

उत्तर भारत में 69%, मध्य भारत में 83% और दक्षिण भारत में 42% हिन्दुओं ने हिन्दू पहचान को राष्ट्रवाद के साथ जोड़ा। हिन्दू और हिंदी को जोड़ कर देखने वालों में से 60% भारतीयों ने बताया कि उन्होंने भाजपा को वोट दिया था। 72% हिन्दुओं ने कहा कि बीफ खाने वाला हिन्दू नहीं हो सकता। रिसर्च में इसकी पुष्टि की गई कि गाय को हिन्दू पवित्र मानते हैं। 49% ने कहा कि ईश्वर में विश्वास न करने वाले हिन्दू नहीं हो सकता और 48% ने कहा कि मंदिर नहीं जाने वाले हिन्दू नहीं हो सकता।

‘Pew Research Centre’ के अध्ययन के मुताबिक, 74% मुस्लिमों ने कहा कि मुस्लिमों को अपने मजहब की शरिया अदालत में ही जाना चाहिए। 1937 से ही भारत में मुस्लिमों के लिए मजहबी मामलों को निपटाने के लिए एक अलग न्यायिक व्यवस्था है, जिसे ‘दारुल-उल-क़ज़ा’ कहते हैं। काजी के अंतर्गत काम करने वाले इन अदालतों का फैसला मानने के लिए कानूनी रूप से किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता।

हालाँकि, रिसर्च में ये भी पाया गया कि दूसरे धर्मों के लोगों द्वारा मुस्लिमों की इस माँग का समर्थन करने की संभावना न के बराबर है। 48% मुस्लिमों ने कहा कि 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम संबंधों पर बुरा असर पड़ा, जबकि हिन्दुओं में ऐसा मानने वाले मात्र 37% हैं। वहीं सिखों में 66% की यही राय है। 37% हिन्दुओं ने इसे हिन्दू-मुस्लिम संबंधों के लिए अच्छा बताया। 43% हिन्दुओं ने कहा कि भारत-पाक विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम संबंधों पर अच्छा असर पड़ा।

‘Pew Research Centre’ ने पाया कि 97% भारतीय नागरिक ईश्वर में विश्वास करते हैं। वहीं उनमें से 80% ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि ईश्वर का अस्तित्व है। साथ ही बताया गया है कि 29% सिख, 22% ईसाई और 18% मुस्लिम महिलाओं ने कहा कि वो बिंदी लगाती हैं। वहीं 77% मुस्लिम और 54% ईसाई हिन्दू धर्म के ‘कर्म सिद्धांत (Karma)’ में विश्वास रखते हैं। हिन्दुओं में से 7% ईद और 17% क्रिसमस मनाते हैं।

सपा नेता उम्मेद पहलवान पर NSA, गाजियाबाद में बुजुर्ग के साथ मारपीट को दिया था ‘जय श्री राम’ का रंग

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित लोनी में मुस्लिम बुजुर्ग से मारपीट के मामले को साम्प्रदायिक रंग देने के आरोपित सपा नेता उम्मेद पहलवान पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की गई है। रासुका की कार्रवाई के बाद उम्मेद को एक साल तक जमानत मिलना मुश्किल है।

उम्मेद पहलवान को इस मामले में 19 जून 2021 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। आरोपित ने फेसबुक लाइव के जरिए लोगों को भड़काने और मारपीट की वारदात को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित फिलहाल 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में डासना जेल में बंद है। पुलिस ने कहा है कि आरोपित के खिलाफ पहले से ही 5-6 केस दर्ज हैं। सपा नेता ने ही अब्दुल समद नाम के साथ मारपीट को उसकी दाढ़ी काटने और जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाने की बात जोड़ साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी।

अब्दुल समद से मारपीट के केस में गाजियाबाद पुलिस अब तक 11 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। पूछताछ में पता चला है कि केस दर्ज होने के बाद खुद को फँसता देख उम्मेद पहलवान ने अब्दुल समद से हलफनामे पर यह लिखवाने की कोशिश की थी कि उससे जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाया गया था। इसके बाद आरोपित ने वीडियो को वायरल कर दिया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस ने ट्विटर से इसे रोकने को कहा था। हालाँकि, माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ने इसे वायरल होने दिया, जिसके बाद उसके खिलाफ भी केस दर्ज किया गया था।