मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि मंदिर की प्रतिमा एक बच्चे के समान है और उसकी संपत्ति की सुरक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है। मद्रास हाईकोर्ट ने मंदिर के प्रतिमा को एक नाबालिग बच्चे के समान बताया। जस्टिस RMT टीका रमन तमिलनाडु के पलानी मंदिर की भूमि पर कब्ज़ा किए कुछ लोगों को बेदखल करने का आदेश दिया। ये ऐसे लोग हैं, जिनके परिवार कई वर्षों से मंदिर की संपत्ति पर कब्ज़ा कर के बैठे हुए थे।
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा, “कानून के हिसाब से मंदिर की प्रतिमा एक नाबालिग बच्चे के समान है। कोर्ट उस नाबालिग बच्चे का अभिभावक है, व्यक्ति का भी और संपत्ति का भी। कोर्ट को मंदिर की संपत्ति की ऐसे ही रक्षा करनी है, जैसे नाबालिग बच्चे की।” कोर्ट ने ये भी कहा कि उक्त मंदिर को 60 सालों तक उसकी संपत्ति के इस्तेमाल से रोका गया। साथ ही बचाव पक्ष मंदिर की संपत्ति पर अपना अधिकार साबित करने में नाकाम रहे।
जिस संपत्ति को लेकर फैसला सुनाते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने ये बात कही, उस संपत्ति को ‘इनाम’ के रूप में अंग्रेजों ने 1863 में कुछ लोगों को दे दिया था। बचाव पक्ष का कहना था कि कई पुश्तों ने इस जमीन पर उनका मालिकाना हक़ रहा है, इसीलिए वो ही इस संपत्ति के स्वामी हैं। हालाँकि, कोर्ट ने पाया कि बचाव पक्ष ने कहा था कि वो मंदिर को किराया देते हैं, इसका अर्थ है कि वो मालिक नहीं बल्कि किराएदार हैं।
Equating an idol to a minor child, the Madras High Court has come to the rescue of the famous Sri Dhandayudhapani temple in Palani by restoring its vast property worth several lakhs of rupees, to the shrine.https://t.co/DTuQPhDfsR
इसीलिए उस संपत्ति में किसी भी पट्टा पर मालिकाना दावा करने से कोर्ट ने उन लोगों को रोक दिया। तमिलनाडु में ‘इनाम अबॉलिशन एक्ट’ भी आया था, लेकिन इसके तहत तहसीलदार स्तर पर हुए समझौते के बाद ये लोग मंदिर की संपत्ति पर बने हुए थे। चूँकि जमीन के मालिकाना हक़ का दावा करने वाले लोग दबंग हैं और इसके लिए विभिन्न संदिग्ध माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे थे, मद्रास हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वो 4 सप्ताह में मंदिर की संपत्ति खाली कराएँ।
कमिश्नर को इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने को कहा गया है। ये जमीन कुल 60.43 एकड़ की है। ये पेरियाकुमारापलयम गाँव में स्थित है। ये गाँव तिरुपुर के धारापुरम क्षेत्र में पड़ता है। इस संपत्ति पर कोर्ट ने मंदिर के देवता मुरुगन स्वामी का अधिकार माना। पलानी में स्थित इस मंदिर का पूरा नाम ‘अरुल्मिगु धनदायुथपानी स्वामी मंदिर’ है। ये तमिलनाडु के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। ये एक प्राचीन मंदिर है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे मंदिर हैं जो अपने इतिहास और अपनी प्रचीन परंपराओं के साथ अपनी वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों की वास्तुकला कुछ ऐसी है कि आज भी नवीन तकनीकी और विज्ञान की सुविधाओं के बाद भी इस प्रकार की वास्तुकला को हकीकत में उतार पाना बहुत ही मुश्किल है। ऐसा ही एक मंदिर स्थित है महाराष्ट्र के औरंगाबाद की एलोरा की गुफाओं में। यह मंदिर मात्र एक चट्टान को काटकर और तराशकर बनाया गया है। हम बात कर रहे हैं एलोरा के कैलाश मंदिर की जिसे बनाने में मात्र 18 वर्षों का समय लगा। लेकिन जिस तरीके से यह मंदिर बना है, ऐसे में अनुमान यह लगाया जाता है कि इसके निर्माण में लगभग 100-150 सालों का समय लगना चाहिए।
संरचना एवं निर्माण का रहस्य
ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार एलोरा के कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम के द्वारा सन् 756 से सन् 773 के दौरान कराया गया। मंदिर के निर्माण को लेकर यह मान्यता है कि एक बार राजा गंभीर रूप से बीमार हुए तब रानी ने उनके स्वास्थ्य के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की और यह प्रण लिया कि राजा के स्वस्थ होने पर वह मंदिर का निर्माण करवाएँगी और मंदिर के शिखर को देखने तक व्रत धारण करेंगी। राजा जब स्वस्थ हुए तो मंदिर के निर्माण के प्रारंभ होने की बारी आई, लेकिन रानी को यह बताया गया कि मंदिर के निर्माण में बहुत समय लगेगा। ऐसे में व्रत रख पाना मुश्किल है। तब रानी ने भगवान शिव से सहायता माँगी। कहा जाता है कि इसके बाद उन्हें भूमिअस्त्र प्राप्त हुआ जो पत्थर को भी भाप बना सकता है। इसी अस्त्र से मंदिर का निर्माण इतने कम समय में संभव हो सका। बाद में इस अस्त्र को भूमि के नीचे छुपा दिया गया।
भगवान शिव का निवास माने जाने वाले कैलाश पर्वत के आकार की तरह ही इस मंदिर का निर्माण किया गया है। 276 फुट लंबे और 154 फुट चौड़े इस मंदिर को एक ही चट्टान को तराशकर बनाया गया है। इस चट्टान का वजन लगभग 40,000 टन बताया जाता है। मंदिर जिस चट्टान से बनाया गया है उसके चारों ओर सबसे पहले चट्टानों को ‘U’ आकार में काटा गया है जिसमें लगभग 2,00,000 टन पत्थर को हटाया गया। आमतौर पर पत्थर से बनने वाले मंदिरों को सामने की ओर से तराशा जाता है, लेकिन 90 फुट ऊँचे कैलाश मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे ऊपर से नीचे की तरफ तराशा गया है। कैलाश मंदिर एक ही पत्थर से निर्मित विश्व की सबसे बड़ी संरचना है।
औरंगाबाद के एलोरा का कैलाश मंदिर (फोटो साभार : इंडिया टेल्स)
इस मंदिर में प्रवेश द्वार, मंडप तथा कई मूर्तियाँ हैं। दो मंजिल में बनाए गए इस मंदिर को भीतर तथा बाहर दोनों ओर मूर्तियों से सजाया गया है। मंदिर में सामने की ओर खुले मंडप में नंदी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हुए हैं। कैलाश मंदिर के नीचे कई हाथियों का निर्माण किया गया है और यह मंदिर उन्हीं हाथियों के ऊपर ही टिका है। इस्लामिक आक्रांता औरंगजेब ने इस मंदिर को नुकसान पहुँचाने का बहुत प्रयास किया लेकिन छोटे-मोटे नुकसान के अलावा वह इसे किसी भी प्रकार की क्षति पहुँचाने में असफल रहा।
कुछ अनसुलझे तथ्य
मंदिर की दीवारों पर अलग प्रकार की लिपियों का प्रयोग किया गया है जिनके बारे में आजतक कोई कुछ भी नही समझ पाया। ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में मंदिर के नीचे स्थित गुफाओं पर शोधकार्य शुरू कराया गया, लेकिन वहाँ हाई रेडियोएक्टिविटी के चलते शोध को बंद करना पड़ा। इसके अलावा गुफाओं को भी बंद कर दिया गया जो आज भी बंद ही हैं। ऐसी मान्यता है कि इस रेडियोएक्टिविटी का कारण वही भूमिअस्त्र और मंदिर के निर्माण में उपयोग किए गए अन्य उपकरण हैं जो मंदिर के नीचे छुपा दिए गए थे।
हालाँकि जिस तरीके से कैलाश मंदिर का निर्माण किया गया है, पुरातत्वविद यह अनुमान लगाते हैं कि इस मंदिर के निर्माण में कम से कम 100-150 वर्षों का समय लगना चाहिए। लेकिन मंदिर का निर्माण मात्र 18 वर्षों में हुआ। यही कारण है कि मंदिर के निर्माण में दैवीय सहायता की भी संभावना जताई जाती है। मंदिर से जुड़ी एक और विचित्र बात यह है कि यह भगवान शिव को समर्पित है, लेकिन मंदिर में न तो कोई पुजारी है और न ही यहाँ किसी प्रकार की पूजा-पाठ की कोई जानकारी मिलती है।
कैसे पहुँचे?
कैलाश मंदिर, औरंगाबाद शहर से 30 किमी दूर स्थित है। मंदिर का सबसे नजदीकी हवाईअड्डा औरंगाबाद ही है जो दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, तिरुपति, अहमदाबाद और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा रेलमार्ग से हैदराबाद, दिल्ली, नासिक, पुणे और नांदेड़ जैसे शहरों से भी औरंगाबाद पहुँचा जा सकता है। कैलाश मंदिर से औरंगाबाद रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 28 किमी है। महाराष्ट्र की सार्वजनिक परिवहन सेवा की बसों के माध्यम से राज्य के लगभग सभी बड़े शहरों से औरंगाबाद पहुँचने के लिए बस सेवा उपलब्ध है। पुणे से मंदिर की दूरी लगभग 250 किमी है। इसके अलावा मुंबई से कैलाश मंदिर लगभग 330 किमी की दूरी पर स्थित है।
जम्मू कश्मीर में आज (29 जून 2021) सुबह भारत पाक सीमा पर तीन ड्रोन को भारतीय एजेंसियों ने खदेड़ा है। ड्रोन के जरिए आतंक फ़ैलाने की ये नई साजिश बेहद खतरनाक है। इससे पहले इसी के जरिए रविवार (27 जून 2021) को जम्मू-कश्मीर पर केंद्र की राजनीतिक पहल के 4 दिन के भीतर ही जम्मू के वायुसेना अड्डे पर ड्रोन के दो हमले हुए। इन आतंकी कार्रवाई में कोई अधिक नुकसान तो नहीं पहुँचा पर इसका मतलब ये कतई नहीं लगाया जा सकता कि ये हमले खतरनाक नहीं हैं। इस पूरे घटनाक्रम की गहरी पड़ताल बहुत ज़रूरी है।
जम्मू के वायुसेना अड्डे पर 27 जून को तड़के अचानक दो ड्रोन आए थे। इनमें प्रत्येक में कोई 2 किलो विस्फोटक पदार्थ थे, जिसे वहाँ गिराने के बाद ये चले गए। हवाई अड्डे में इनसे छोटे विस्फोट हुए। जिस जगह हमला हुआ वह भारत-पाक सीमा से बहुत दूर नहीं है। इसी तरह सोमवार और मंगलवार को भी भारत पाक सीमा के कुछ हिस्सों में ड्रोन के जरिए आतंक फ़ैलाने की नाकाम कोशिश हुई है। क्या ये नए किस्म के हमले आतंकवादियों, अलगाववादियों और इस्लामी कट्टरपंथियों व पाकिस्तान की गंभीर हताशा के परिणाम हैं? या फिर ये जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को फिर से एक नया रंग देने की कोशिश है?
पाकिस्तान की ISI अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद से कश्मीर घाटी में अपना असर खोती जा रही है। पिछले हफ्ते बृहस्पतिवार यानी 24 जून 2021 को जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों से केंद्र की जो बातचीत हुई उससे ऐसा लगा कि राज्य का माहौल पूरी तरह बदल सकता है। जम्मू में ड्रोन से किए गए विस्फोट ये बताते हैं कि पाकिस्तान अब आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए कश्मीरी युवक नहीं जुटा पा रहा है। इसीलिए अब उसने मानव रहित ड्रोन के इस्तेमाल से खून-खराबा करने का जिम्मा खुद अपने हाथ में ले लिया है। ये ड्रोन कहाँ से उड़ाए गए और इसके पीछे कौन आतंकवादी संगठन है? इसकी जाँच एजेंसियों के हाथ में है। देर-सबेर वे इस साजिश का पता लगा ही लेंगी। लेकिन, आतंकवाद के इस नए और खतरनाक हथियार के अंतर्निहित कारणों का विश्लेषण बेहद ज़रूरी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर 24 जून को नई दिल्ली में जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दलों- पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, कॉन्ग्रेस, बीजेपी, पैंथर्स पार्टी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, सीपीएम पार्टी के नुमाइंदों और केंद्र के साथ बातचीत हुई। बातचीत के बाद जो बयान आए वे काफी आशावादी लगे। इससे जो संकेत निकले वह बड़े स्पष्ट हैं। पहला, किसी भी राजनीतिक दल ने इस बातचीत का बहिष्कार नहीं किया। दूसरा, सभी पार्टियों ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की इस राजनीतिक पहल का आमतौर पर स्वागत किया। तीसरा, जम्मू कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया शुरू करने और उसमें शामिल होने में सभी ने अपनी सहमति जताई।
गुजरे जमाने की बात हुआ अनुच्छेद 370
बैठक से एक बात और भी निकली कि सभी राजनीतिक दल वहाँ चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए भी राजी हो गए। कुल मिलाकर इस बैठक में 370 को हटाने को लेकर कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया। यानी इन राजनीतिक दलों ने यह मान लिया है कि अब अनुच्छेद 370 का समाप्त होकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होना इतिहास की बात हो गई है। 370 का हटाया जाना अब राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की निरर्थकता को अब इन पार्टियों ने परोक्ष रूप से लगता है स्वीकार कर लिया है।
यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक दल जब बात करेंगे तो उनमें कई मतभेद भी होंगे, लेकिन बुनियादी राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने की हामी भरके सभी राजनीतिक दलों ने जम्मू-कश्मीर में आगामी चुनावों के लिए एक जमीन तैयार की है। इस बैठक का सबसे सकारात्मक परिणाम यही है।
हालाँकि, कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि बातचीत का न्योता देकर केंद्र सरकार झुक गई है। उनका तर्क है कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सरकार ने कड़ा रुख अपनाया था। वहाँ के नेताओं को गिरफ्तार भी किया गया था। प्रधानमंत्री अगर अब उन्हीं नेताओं से बातचीत कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि उन्हें झुकना पड़ा है। हालाँकि यह तर्क समझ में नहीं आता, क्योंकि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की तत्परता को उसका झुकना कैसे बताया जा सकता है? असलियत में तो यह उसकी नीतियों की सफलता का ही द्योतक है। इस बैठक में कई पूर्व मुख्यमंत्री शामिल थे जो अनुच्छेद 370 को लेकर पहले बड़े बड़े बयान देते रहे हैं। वे ताल ठोंक कर कहते रहे हैं कि अगर अनुच्छेद 370 हटा तो वे ईंट से ईंट बजा देंगे। अनुच्छेद 370 हट गया तो वे ईंट तो क्या घाटी में एक कंकड़ भी नहीं हिला पाए।
उनका इस बैठक में आना और आगे होने वाली राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने को सहमति देना बताता है कि ये नेता भी समझ चुके हैं कि अब जम्मू-कश्मीर का खास दर्ज़ा दोबारा वापस नहीं आने वाला। ये विश्लेषक भारत की इस बड़ी कूटनीतिक विजय को शायद पचा नहीं पा रहे। उन्हें लगता ही नहीं था कि जम्मू-कश्मीर से हिंसा, राजनीतिक मारामारी, आतंकवाद और विदेशी हस्तक्षेप को खत्म भी किया जा सकता है।
वैसे देखा जाए तो अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद जम्मू कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया का शुरू होना यह नई बात नहीं है। इससे पहले केंद्र सरकार ग्राम पंचायतों के चुनाव करवाकर यह सिद्ध कर चुकी है कि जम्मू-कश्मीर के अंदर एक नया जमीनी नेतृत्व तैयार हो रहा है। इन पंचायत चुनावों में 51.7 % से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। कुल 280 जिला पंचायत सदस्य चुने गए जिनमें 100 महिलाएँ भी चुनी गईं। वहाँ बिना हिंसा के चुनाव भी हो सकते हैं पहले ऐसा कभी सोचा नहीं गया था। इस सफलता से वहाँ राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत तो हो ही चुकी थी। इसलिए चाहे वह पीडीपी हो चाहे वह नेशनल कॉन्फ्रेंस अथवा अन्य राजनीतिक दल वे समझ चुके हैं कि अगर इसमें उन्होंने हिस्सा नहीं लिया तो वह वहाँ पर अप्रासंगिक हो सकते हैं।
ध्यान देने की बात है कि अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद जम्मू कश्मीर के अंदर कोई बड़ा बवाल नहीं पैदा हुआ। जो राजनीतिक नेता अनुच्छेद 370 की ओट में यह कहते थे कि उनकी लाश पर ही जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किया जा सकता है, उन्हें भी अब एहसास हो गया है कि अलगाववाद, हिंसा, आतंकवाद और इस्लामी कट्टरवाद की जो फसल राज्य के अंदर पिछले कई दशकों से बोई जा रही थी वह सूखने लगी है।
इन गर्मियों में कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी का प्रायः नदारद हो जाना क्या बताता है? पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद वहाँ कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पाने के संकेत बड़े स्पष्ट है। कुल मिलाकर वहाँ हिंसा और आतंक के मामलों में भी कमी आने का मतलब है कि जम्मू कश्मीर के लोग देश के अन्य हिस्सों की तरह जमीनी लोकतंत्र और विकास की राह देख रहे थे। जम्मू-कश्मीर के कुछ दलों और परिवारों ने वहाँ हिंसा और आतंकवाद की आड़ लेकर अपनी मठाधीशी कायम की हुई थी। हिंसा और आतंक का चक्र उन्हें खूब रास आता था। वहाँ का अवसरवादी राजनीतिक नेतृत्व इस दुश्चक्र को ढाल की तरह इस्तेमाल कर भारत सरकार और भारत की जनता को तकरीबन ब्लैकमेल करते रहे हैं।
24 जून की बैठक के संकेत बहुत साफ है यह कि अब जनता के साथ वहाँ के राजनीतिक दल भी जम्मू-कश्मीर के इस नए अध्याय में देश की ताल से ताल मिलाने को तैयार हैं। 28 जून को जम्मू के वायुसेना अड्डे पर ड्रोन के हमलों को कश्मीर घाटी में तेज़ी से चल रही इस सामान्यीकरण की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा सकता है। पिछले कई दशकों से चल रहा आतंकवाद, इस्लामी कट्टरवाद और अलगाववाद का घातक खेल पाकिस्तान और कुछ स्थानीय तत्वों ने मिलकर चला रखा था। इसी षड्यंत्र के तहत पाकिस्तान से हथियार और पैसा आता रहा और घाटी में कट्टरपंथी इस्लामिक सोच को पानी मिलता रहा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने और गृह मंत्री अमित शाह ने दूरंदेशी और साहस दिखाते हुए अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का अकल्पनीय फैसला अगस्त 2019 में लिया था। जिस तरह से पूरे देश ने उनका साथ दिया इससे अब पाकिस्तान में घोर निराशा है। पाकिस्तान सेना की आतंकवाद की फैक्ट्री के ढाँचे को इससे गहरी चोट पहुँची है। दुनिया में भी इस पर कोई खास हलचल नहीं हुई थी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जनमत भी समझ गया है कि कश्मीर के नाम पाकिस्तान पर पूरी दुनिया में इस्लामी कटटरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है।
पाकिस्तानी सेना, इस्लामी कट्टरवाद और आतंक की दूकान चलाने वालों का धंधा अब मंदा पड़ने लगा है। आतंक की इसी बुझती हुई आग को हवा देने की कोशिश थे जम्मू के ये ड्रोन हमले। भारत सरकार और देश के लोगों को अभी काफी समय तक सतर्क रहना होगा, ताकि इस्लामिक कट्टरपंथी विचार से प्रेरित आतंकवादी संगठन और पाकिस्तान की सेना फिर से जम्मू कश्मीर में नफरत की फसल को न बो पाए।
महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या करने के मामले में मंगलवार (29 जून 2021) को ठाणे की जिला अदालत ने 14 और आरोपितों को जमानत दे दी। वहीं वकील अमृत अधिकारी ने बताया कि एडिशनल सेशन कोर्ट (special designated court) के जस्टिस आरएस गुप्ता ने 18 अन्य आरोपितों की जमानत अर्जी खारिज कर दी है।
Maharashtra | 14 more accused given bail by Thane Sessions Court in Palghar mob lynching case of April 2020
अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 30 जुलाई मुकर्रर की है। उस दौरान आरोप तय होने की उम्मीद जताई जा रही है। नागा साधु हत्याकांड मामले में पुलिस ने कुल 201 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से 75 मुख्य आरोपित हैं। इस मामले में स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर सतीश मानेशिंदे अभियोजन पक्ष की ओर से पेश हुए, जबकि वकील पीएन ओझा साधुओं के परिवार से हैं।
गौरतलब है कि पालघर में साधुओं की लिंचिंग का मामला एक साल पुराना है। पिछले साल अप्रैल माह में जूना अखाड़ा के महंत कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70 वर्ष) और महंत सुशील गिरी महाराज (35 वर्ष) अपने ड्राइवर निलेश तेलगडे (30 वर्ष) के साथ मुंबई से गुजरात अपने गुरु भाई को समाधि देने के लिए जा रहे थे। लेकिन 16 अप्रैल 2020 की रात पालघर के दहानु तालुका के आदिवासी बहुल गडचिंचले गाँव में सैकड़ों लोगों की भीड़ ने उन तीनों पर हमला किया और उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी।
ईसाई मिशनरियों ने बोया घृणा का बीज, 500 की हत्यारी भीड़ ने 2 साधुओं की ले ली जान: 181 आरोपितों को मिल चुकी है जमानत
यह पूरी घटना वहाँ मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों के सामने हुई थी। आरोपितों ने साधुओं के साथ एक ड्राइवर और पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया था। हमले के बाद साधुओं को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। जब देश भर में लॉकडाउन लगा हुआ था, उस दौरान दरिंदों ने इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया।
केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर के अकाउंट ब्लॉक करने के मामले में ट्विटर फँस गया है। इस संबंध में संसदीय समिति ने मंगलवार (29 जून 2021) को ट्विटर से दो दिनों में जवाब माँगा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की अध्यक्षता वाली सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसद की स्थायी समिति ने सचिवालय को 2 दिनों के भीतर ट्विटर से लिखित में जवाब माँगने का निर्देश दिया है।
Parliamentary panel for IT headed by Congress leader Shashi Tharoor directed the secretariat to seek in writing from Twitter within two days on what basis Twitter accounts of IT Minister Ravi Shankar Prasad & Shashi Tharoor were blocked. Letter to Twitter likely to be sent today
माइक्रो ब्लॉगिंग साइट से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर समिति ट्विटर के अधिकारी को तलब कर सकती है। मालूम हो कि शुक्रवार (25 जून 2021) को केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के ट्विटर अकाउंट को एक घंटे तक के लिए लॉक कर दिया गया था। वहीं, इसके बाद कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी ट्वीट कर यह जानकारी दी कि उनका भी अकाउंट कुछ समय के लिए ब्लॉक कर दिया गया था। थरूर ने उसी समय कहा था कि इसे लेकर संसदीय समिति ट्विटर से जवाब माँगेगी।
If the committee does not get a satisfactory reply from Twitter, then the committee can summon the Twitter official.
बता दें कि केंद्र के नए आईटी नियमों को लेकर बीते कुछ दिनों से ट्विटर और सरकार के बीच तनातनी जारी है। जहाँ एक ओर मोदी सरकार माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर से नए आईटी नियमों को मानने के लिए कह रही है। वहीं दूसरी ओर ट्विटर इससे मानने से इनकार कर रहा है। इसको लेकर भारत सरकार ने कंपनी को फटकार भी लगाई थी। ट्विटर की ओर से जारी बयान में अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर चिंता जाहिर करने पर सरकार ने कंपनी को कहा था कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है न कि ट्विटर जैसी किसी निजी लाभकारी, विदेशी संस्था की।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने बयान में कहा था कि ट्विटर को इधर-उधर सिर मारना बंद करना चाहिए और भारतीय कानून का पालन करना चाहिए। कानून बनाना और नीति बनाना संप्रभु राष्ट्र का विशेषाधिकार है और ट्विटर सिर्फ एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। भारत की कानूनी नीति की रूपरेखा क्या होनी चाहिए, यह तय करने में इसका कोई अधिकार नहीं होगा। हाल ही में केंद्र ने ट्विटर का इंटरमीडियरी का दर्जा भी खत्म कर दिया था।
शिरोमणि अकाली दल के नेता परमजीत सिंह सरना ने मंगलवार (जून 29, 2021) को मंजिंदर सिंह सिरसा के बयान पर कश्मीरियों से माफी माँगते हुए उसे भड़काऊ करार दिया। उन्होंने दल की ओर सिरसा के बयान पर कश्मीरियों से माफी माँगी और ये भी कहा कि उन्हें मुस्लिम संगठनों ने सहयोग दिया।
उन्होंने स्थानीय मुस्लिम संगठनों व कश्मीर के टॉप मौलवी मिरवाइज उमर फारूख और प्रशासन की सराहना की। साथ ही बताया कि महिला की अपनी पसंद के युवक से मंगलवार को शादी हो गई है और मामला भी सेटल हो चुका है। उन्होंने कहा, “मैं लड़की के घरवालों से मिला। मामला सुलझ गया है। लड़की की जिससे शादी हुई वह उसे जानती थी।”
सरना ने कहा कि अगर महिला ने अपहरण के आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति से शादी कर ली होती तो प्रशासन उसे उसके परिवार को नहीं सौंपता। वह बोले “हम मीरवाइज और मुस्लिम संगठनों जैसे लोगों से भी मिले। जिस तरह से उन सभी ने हमारे साथ सहयोग किया, हम उसे जीवन भर नहीं भूलेंगे।”
उन्होंने कहा, “हम उपराज्यपाल (मनोज सिन्हा), प्रशासन और सभी मुस्लिम संगठनों और कई मस्जिदों के इमामों के शुक्रगुजार हैं जो हमसे मिले। मैंने उनसे यह भी कहा कि चूँकि हम अल्पमत में हैं, इसलिए आपको (बहुमत को) हमारा ख्याल रखना होगा।”
बता दें कि जम्मू कश्मीर में रविवार को सिख महिला के अपहरण के बाद इस मामले ने तूल पकड़ा था। पुलिस ने बताया था कि उसे 29 साल के मुस्लिम व्यक्ति ने किडनैप किया और बाद में उसका धर्मपरिवर्तन करवाया गया। इस मामले को सरना ने पहले शर्मनाक बताते हुए कहा था कि इसके ख़िलाफ़ सारी कौम को एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए। हालाँकि आज उन्होंने अपने सिरसा के बयान पर माफी माँगी।
The local Sikh community of Jammu and Kashmir urges @AmitShah Ji to get a strong law implemented in Jammu & Kashmir (Just like Uttar Pradesh & Madhya Pradesh) mandating Permission of parents in inter-religion marriages to stop these forced Nikahs of Sikh minority girls@ANIpic.twitter.com/Tk6suVnYyu
मंजिंदर सिंह सिरसा ने बयान में कहा था, “मैं श्रीनगर के स्थानीय नेताओं, मौलानाओं और मुफ्तियों से सिख बेटियों के समर्थन में आने का अनुरोध करता हूँ। सीएए के विरोध के दौरान मुस्लिम बेटियों को सुरक्षित घर पहुँचाने में सिख सबसे आगे थे, लेकिन कोई भी मुस्लिम नेता सिख लड़कियों के जबरन धर्मांतरण के खिलाफ आवाज उठाने नहीं आया।”
सिरसा ने यह भी कहा था, “मैं श्रीनगर में स्थानीय सिख समुदाय के साथ जबरन निकाह और सिख बेटियों के धर्मांतरण के विरोध में शामिल हो रहा हूँ, जो दूसरे धर्म के बुजुर्गों से शादी करने के लिए मजबूर है। मैं भारत सरकार से घाटी में इस तरह के निकाह के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह करता हूँ। सिख समुदाय जबरन धर्म परिवर्तन को बर्दाश्त नहीं करेगा।”
पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के तारकेश्वर में चुनावी नतीजों के बाद हुई हिंसा मामले पर राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा है। ये पत्र राजीव जैन को संबोधित है। इसमें उन्होंने बताया है कि उनके विाधानसभा क्षेत्र में सत्ताधारी पार्टी टीएमसी ने लगातार लोगों पर अत्याचार किए। पत्र में उन्होंने जोर दिया कि लोगों के साथ ये सब इसलिए हुआ क्योंकि उनका झुकाव भाजपा की ओर है।
पत्र में उन्होंने कहा, “भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के घरों की व्यवस्थित रूप से पहचान की गई, वहाँ लूटपाट की गई और उनको ध्वस्त कर दिया गया। कई श्रमिकों पर बेरहमी से हमला किया गया, जबकि अन्य को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। सैकड़ों लोग बेघर हो गए और कई अपनी जान बचाने के लिए तारकेश्वर से भाग गए। इनमें से कुछ लोग अभी भी घर नहीं लौट पा रहे हैं।”
पत्र का स्क्रीनशॉट
उन्होंने बताया कि कैसे राज्य में भाजपा कार्यकर्ताओं के बिजनेस को जबरन बंद करवा दिया गया था और सत्ताधारी सरकार ने उन्हें अपनी आजीविका कमाने की अनुमति देने के लिए ‘प्रोटेक्शन मनी’ की माँग की थी। पत्र में राज्यसभा सांसद ने कुल 9 मामलों पर प्रकाश डाला है, जहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने हिंसा और बर्बरता की।
उन्होंने बताया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा दो (अज्ञात) भाजपा कार्यकर्ताओं को उनके घरों में घुसने से रोकने के लिए धमकी दी गई। वहीं पेशे से डॉक्टर एक भाजपा कार्यकर्ता के चैंबर पर कब्जा कर लिया गया और उसे टीएमसी क्लब में बदल दिया। एक मुस्लिम व्यक्ति को भी ईद के दौरान नमाज पढ़ने से रोक दिया गया, क्योंकि वह भाजपा समर्थक था। स्वप्न दासगुप्ता बताते हैं कि, क्षेत्र में एक महासचिव के घर में तोड़फोड़ हुई और एक भाजपा कार्यकर्ता, जो पेशे से कार डीलर है, उसकी सभी कारों को टीएमसी के गुंडों ने तोड़ दिया और सबकुछ क्षतिग्रस्त कर दिया।
पत्र का स्क्रीनशॉट
राज्यसभा सांसद ने लिखा, “इस संबंध में तारकेश्वर थाने में पूर्व में दर्ज एक शिकायत संलग्न कर रहा हूँ, जिस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। शिकायत में चुनाव के बाद की हिंसा के 260 से अधिक पीड़ितों की सूची है। यह न तो पूर्ण है और न ही संपूर्ण है, लेकिन आपको कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त प्रारंभिक बिंदु प्रदान करेगी।”
उन्होंने आगे अनुरोध करते हुए लिखा, “जितना जल्दी हो सके, मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि एक कमेटी का दौरा किया जाए ताकि पीड़ितों के लिए राहत का आँकलन हो और उसके लिए मंजूरी मिले। इस दौरान, समिति प्रथम दृष्टया में अपराध के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और उन अधिकारियों की पहचान करे जिन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी बनाए रखी। इसके अलावा, जो लोग हिंसा के डर से भाग गए थे, उन्हें अपने घरों और व्यवसाय के स्थानों पर लौटने के सक्षम किया जाए।”
बंगाल में राजनीतिक हिंसा
गौरतलब है कि बंगाल में चुनावी जीत के बाद टीएमसी द्वारा की जा रही हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। नतीजों के बाद सिर्फ भाजपा के 2 दर्जन से ज्यादा कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों के समूह (जीआईए) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट में इस मामले पर प्रकाश देते हुए यह उल्लेख किया गया था कि चुनाव जीतने के बाद टीएमसी के क्रोध का उन लोगों को सामना करना पड़ रहा है जो हिंदू थे और भाजपा को वोट दिया था।
रिपोर्टों के अनुसार, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, घरों में तोड़फोड़ की गई, दुकानों को लूटा गया और इन सबसे डरकर कई हिंदू परिवार खुद को बचाने के लिए पड़ोसी राज्यों में चले गए। कई महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी गवाही में, भाजपा को समर्थन देने के कारण क्रूर बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और यौन उत्पीड़न के साथ-साथ उन पर किए गए अन्य अत्याचारों का खुलासा भी किया है।
अमेरिका स्थित ग्लोबल हेल्थ रिसर्च संस्था इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेडिकल एंड इवैल्यूएशन (IMHE) ने अगस्त 2021 तक भारत में कोविड-19 से 1.4 से 1.6 मिलियन यानी 14 से 16 लाख लोगों के मरने का अनुमान लगाया था। IHME सीएटल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन का स्वतंत्र रिसर्च विंग है। उसका यह अनुमान 25 से 30 अप्रैल के बीच के डेटा पर आधारित है।
हालाँकि, महीनों बाद ऐसा प्रतीत होता है कि इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेडिकल एंड इवैल्यूएशन (IMHE) ने उस समय कोविड मौतों का जो अनुमान लगाया था, वह बिल्कुल गलत था। क्योंकि उसके ताजा आँकड़े इसके उलट हैं। यहाँ ध्यान दें कि ताजा आँकड़े अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लॅन्सेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट है, जिसमें IHME के अनुमानों को गलत साबित किया गया है। हालाँकि, अब यू-टर्न लेते हुए IHME ने द लॅन्सेट की रिपोर्ट सामने आने के बाद अगस्त तक 1.6 मिलियन (16 लाख) मौतों के पूर्वानुमान को 1 मिलियन (10 लाख) मौतों तक सीमित कर दिया है।
फिर भी, IHME द्वारा कोरोना से होने वाली मौतों का लगाया गया पूर्वानुमान अभी भी अपने निशान से बेहद दूर है। उदाहरण के लिए वर्तमान पूर्वानुमानों के अनुसार, भारत में आज यानी 29 जून को COVID-19 से अनुमानित मौतों की संख्या 1.11 मिलियन (11 लाख) है। यह मृत्यु की वर्तमान संख्या का 2.8 गुना है, जो कि 3.97 लाख है।
मौतों की अनुमानित संख्या की तुलना में रिपोर्ट की गई मौतों की संख्या में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है। इस तरह अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए अनुमान IHME के नियोजित संदिग्ध तरीकों और उसके गलत इरादों पर सवाल उठाते हैं। शायद, संगठन का उद्देश्य वास्तव में COVID-19 से संबंधित मौतों की वास्तविक संख्या को पेश करना नहीं है, बल्कि अनुमानित मौतों को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर मोदी सरकार की छवि खराब करना है।
भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर अब स्थिर होती दिख रही है। इन दिनों देश भर के जारी आँकड़ों से स्पष्ट है कि कोरोना वायरस की बेकाबू दूसरी लहर पर काबू पा लिया गया है। हर दिन कोरोना के कम मामले सामने आना, यह साबित करता है कि भारत में स्थिति अभी नियंत्रण में है। देश अब ऑक्सीजन संकट का सामना भी नहीं कर रहा है, जैसा कि अप्रैल 2021 में अचानक दूसरी लहर के कहर बरपाने से ऑक्सीजन, अस्पतालों में बेड, आइसोलेशन वार्ड सेंटर, वेंटिलेटर और अन्य उपकरणों का संकट गहरा गया था। हालाँकि, मोदी सरकार चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाने, वेंटिलेटर और अन्य आवश्यक उपकरणों का लगातार विस्तार कर रही है, ताकि कोरोनो वायरस की तीसरी लहर से निपटा जा सके।
इसके अलावा भारत अपने टीकाकरण अभियान को तेजी से बढ़ा रहा है। 21 जून से जब से केंद्र सरकार ने देश के सभी राज्यो में टीकाकरण अभियान का कार्यभार संभाला है, तब से वैक्सीन लगवाने वालों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। टीकाकरण केंद्रों की साप्ताहिक छुट्टी के दिन यानी रविवार को छोड़कर लगातार हर हफ्ते 50 लाख का आँकड़ा पार कर रहा है। इस सप्ताह सोमवार को भारत ने एक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है। दरअसल, टीकाकरण के मामले में भारत संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आगे निकल गया है। भारत में अब तक लगभग 32.5 करोड़ से अधिक लोग COVID-19 वैक्सीन की कम से कम एक खुराक ले चुके हैं।
हालाँकि, ऐसा प्रतीत होता है कि आईएचएमई द्वारा मौतों का लगाया गया अनुमान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। अत्यधिक बढ़ाचढ़ा कर मौत के आँकड़े बताते हुए IHME ने सभी मानकों को दरकिनार कर दिया। इसके बजाए अगस्त 2021 तक 1.14 मिलियन (11 लाख से अधिक) मौतों के अविश्वसनीय अनुमानों को पेश कर इसने मोदी सरकार के खिलाफ अपने पूर्वाग्रह जगजाहिर कर दिया है।
द लॅन्सेट के पूर्वानुमान के बाद IMHE ने अपना अनुमान किया कम
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब आईएचएमई ने ऐसे अनुमान लगाए हैं, जो तर्कसंगत नहीं हैं। इससे पहले मई में, IHME द्वारा इस्तेमाल किए गए संदिग्ध मॉडल ने अनुमान लगाया था कि भारत में कोरोना से अगस्त 2021 तक 1.4 से 1.6 मिलियन (14 से 16 लाख) लोगों की मौत हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लॅन्सेट ने तब IHME रिपोर्ट का हवाला देते हुए मोदी सरकार के खिलाफ अपना दुष्प्रचार किया था।
इसने एक लेख प्रकाशित किया था, जो ढेरों गलतियों से भरा हुआ था। जिसकी व्याख्या आम आदमी भी कर सकते हैं। लेख में कहा गया है, “भारत को जब तक टीका लगाया जा रहा है, तब तक SARS-CoV-2 ट्रांसमिशन को जितना संभव हो कम करना चाहिए। जैसे-जैसे मामले बढ़ते जा रहे हैं, सरकार को सटीक आँकड़े समय पर प्रकाशित करने चाहिए। इसके साथ ही जनता को स्पष्ट रूप से समझाएँ कि क्या हो रहा है और महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन के अलावा क्या आवश्यक है।”
IHME ने अपने कोविड मॉडल को संशोधित किया
भले ही IHME ने अनुमान लगाया था कि भारत में अगस्त 2021 तक 1.4 से 1.6 मिलियन (14 से 16 लाख) लोगों की मौत होगी। वहीं, द लॅन्सेट में प्रकाशित लेख ने इसे लगभग 1 मिलियन (10 लाख) मौतों तक ही सीमित कर दिया। ऐसे में साफ दिखाई देता है कि द लॅन्सेट ने अपने लेख से 600000 मौतों में से 300000 मौतों को कम कर दिया है। यह दर्शाता है कि यहाँ तक कि वे भी आईएचएमई के अत्यधिक बढ़ाचढ़ा कर पेश किए गए आँकड़ों पर विश्वास नहीं करते थे। द लॅन्सेट ने जैसे ही भारत में 1 मिलियन मौतों की भविष्यवाणी की, उसके बाद तुरंत IHME ने अपने मॉडल को संशोधित किया।
इसमें दो राय नहीं है कि 1 मिलियन (10 लाख) का आँकड़ा भी एक अतिश्योक्ति ही है। इस तरह के आँकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। IHME ने नवंबर 2020 में नियमित रूप से 1000 से अधिक कोविड-19 मौतों का अनुमान लगाया था, जबकि उस दौरान कोरोना अपने पीक पर भी नहीं था। इसने 29 जून तक की रिपोर्ट में मौतों की संख्या के संबंध में वर्तमान डेटा को बदलने की जहमत भी नहीं उठाई थी। स्पष्ट रूप से, अधिक यथार्थवादी अनुमानों को प्रतिबिंबित करने के लिए अपने मॉडल को मौलिक रूप से फिर से तैयार करने की आवश्यकता आईएचएमई के लिए प्राथमिकता नहीं थी, जो खुद को COVID-19 संबंधित रुझानों का सबसे प्रमुख भविष्यवक्ता बताने से नहीं थकता है।
अगस्त तक 50 लाख लोगों की मौत, NDTV ने भी लोगों को काफी डराने का काम किया
द लॅन्सेट और IMHE के अलावा अन्य लोगों ने भी कोरोना से भारत में होने वाली मौतों को लेकर जमकर प्रोपेगेंडा फैलाया और लोगों को डराने का काम किया। कोरोना की रफ्तार कम होने के बीच NDTV ने भी लोगों को काफी डराने का काम किया। उन्होंने महामारी विज्ञानी एरिक फीगल-डिंग (epidemiologist’ Eric Feigl-Ding) को आमंत्रित किया। एरिक ने एक चौंका देने वाला दावा किया कि अगस्त 2021 तक भारत में कोरोना से 5 मिलियन यानी 50 लाख लोगों की मौत का आँकड़ा पार हो जाएगा।
पत्रकार विष्णु सोम के साथ इंटरव्यू के दौरान, एरिक फीगल-डिंग ने दावा किया, ”भारत में कोरोना के आँकड़ें बेहद खराब हैं। मरने वालों की संख्या ठीक से नहीं बताई जा रही है। भारत में 1 अगस्त तक लाखों लोगों की मौत होना निश्चित है।”
लेकिन जैसा कि सब जानते हैं एनडीटीवी के हाथों एरिक के रूप में एक तुरूप का इक्का लग गया था, जिसके बहाने इस चैनल ने देश में कोरोना वायरस के मामलों को लेकर अपनी राय व्यक्त की थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि एरिक एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ नहीं है। हार्वर्ड टीसी चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (Harvard TC Chan School of Public Health) के अनुसार, एरिक फीगल-डिंग एक सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारी विज्ञानी (public health epidemiologist), पोषण विशेषज्ञ (nutritionist) और स्वास्थ्य अर्थशास्त्री (health economist) हैं। वह एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ भी नहीं है, बल्कि एक पुरानी महामारी विज्ञानी है।
5 मिलियन का आँकड़ा और भी हास्यास्पद है। फीगल-डिंग ने टिप्पणी की थी कि अप्रैल और अगस्त के बीच लगभग 2430000 लोगों की मौत हो जाएगी। वहीं, यहाँ पर वह (ndtv) 5 मिलियन यानी 50 लाख मौतों की भविष्यवाणी कर रहे थे। इतनी बड़ी संख्या में मौत का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव दूरगामी होगा। इससे देश के बड़े हिस्से में अराजकता फैल जाएगी, लेकिन ऐसी घटनाएँ कहीं देखने को नहीं मिलीं।
कोरोन वायरस पर एक ‘स्टार एक्सपर्ट’ के रूप में एरिक का उदय किसी भी स्वास्थ्य शोधकर्ता, महामारी विज्ञानी या वैज्ञानिक के लिए अस्वाभाविक था। उन्हें कोरोना वायरस पर एक शोध पत्र पढ़ने का मौका दिया गया और उन्होंने पिछले साल जनवरी में एक महामारी के फैलने की भविष्यवाणी की। इस प्रसिद्धि के बाद, कई महामारी विज्ञानी उनकी साख पर सवाल उठाने के लिए आगे आए। नाम न छापने की शर्त पर एक महामारी विज्ञानी ने क्रॉनिकल ऑफ हायर एजुकेशन को बताया कि एरिक फीगल-डिंग की संक्रामक रोगों पर शोध शून्य है। यानी यह उनकी पृष्ठभूमि के विपरित है।
मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने का प्रयास
ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करने के प्रयास में द लॅन्सेट, आईएचएमई (IHME) और एनडीटीवी (ndtv) ने कोविड मौतों का बढ़ा-चढ़ाकर अनुमानित आँकड़ा पेश किया है। COVID मौतों के अनुमान की सटीकता शायद ही चिंता का विषय हो, लेकिन यह सब देखकर तो केवल यही लगता है कि उन्होंने ऐसा मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने के लिए किया है।
फिल्ममेकर करण जौहर ने अपने नए प्रोजेक्ट का ऐलान किया है। ये फिल्म महान वकील सी. शंकरन नायर पर आधारित होगी। फिल्म का टाइटल ‘द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ सी. शंकरन नायर’ है। इस बायोपिक को फ्लोर पर लाने के लिए धर्मा प्रोडक्शंस और स्टिल मीडिया कलेक्टिव ने हाथ मिलाया है।
करण ने ट्विटर पर एक पोस्ट शेयर कर इस फिल्म की जानकारी दी है। उन्होंने लिखा है, ”The Untold Story Of C. Sankaran Nair फिल्म कोर्ट रूम की लड़ाई को उजागर करेगी, जिसमें शंकरन नायर जलियाँवाला बाग हत्याकांड की सच्चाई को बाहर लाने के लिए ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ते हैं।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फिल्म वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित है। फिल्म रघु पलट (शंकरन नायर के परपोते) और उनकी पत्नी पुष्पा पलट द्वारा लिखी गई किताब ‘द केस दैट शुक द एम्पायर’ (The Case That Shook the Empire) पर आधारित है। फिल्म का निर्देशन करण सिंह त्यागी करेंगे। वहीं, करण जौहर, अपूर्व मेहता और आनंद तिवारी इसे प्रोड्यूस कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि जल्द ही फिल्म की लीड कास्ट को लेकर घोषणा की जाएगी।
फिल्ममेकर ने ट्वीट किया, ”द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ सी.शंकरन नायर’ (The Untold Story of C. Sankaran Nair) को बनाते हुए और ऐतिहासिक इंसान को पर्दे पर उतारते हुए बहुत एक्साइटेड हूँ।
Extremely excited and honoured to be bringing the untold story of C. Sankaran Nair, a historic man to the big screens. Directed by @karanstyagi. pic.twitter.com/klJgD1FNZp
इसके अलावा करण जौहर के अपकमिंग प्रोजेक्ट्स की बात करें तो ‘शेरशाह’ इस लिस्ट में सबसे ऊपर है। इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और कियारा आडवाणी लीड रोल में हैं। वहीं फिल्म ‘लाइगर’ को लेकर भी चर्चा है। इसमें साउथ एक्टर विजय देवरकोंडा मुख्य किरदार निभाएँगे और अनन्या पांडे उनके अपोजिट नजर आएँगी।
सी. शंकरन नायर कौन हैं?
वायसराय की काउंसिल में चेत्तूर शंकरन नायर एकमात्र भारतीय थे। हालाँकि, उन्होंने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के तुरंत बाद अपना इस्तीफा दे दिया था। शंकरन नायर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “लगभग हर दिन मुझे अमृतसर के जलियाँवाला बाग में नरसंहार और मार्शल लॉ प्रशासन के सबसे कठोर रवैये को लेकर व्यक्तिगत तौर पर व पत्रों के माध्यम से शिकायतें मिल रही थीं। उस समय, मैंने पाया कि लॉर्ड चेल्सफोर्ड (वायसराय) ने पंजाब में जो किया जा रहा था, उसके लिए मंजूरी दे दी थी। यह मेरे लिए बेहद चौंकाने वाला था।”
इस्तीफा देने के बाद शंकरन नायर अंग्रेजों द्वारा पंजाब में किए गए नरसंहार के खिलाफ लड़ाई लड़ने लंदन गए थे। सी. शंकरन नायर और उनकी अदालती लड़ाई का भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। पूरे भारत में स्वतंत्रता संग्राम को प्रज्ज्वलित करने के लिए उनके संघर्ष की सराहना की जाती है।
पाकिस्तान की विवादित टिकटॉक स्टार हरीम शाह के निकाह की खबर ने हलचल मचाई हुई है। अजीब बात ये है कि हरीम दावा कर रही हैं कि उन्होंने सिंध प्रांत के पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के एक विधायक से निकाह किया है लेकिन ये विधायक कौन है, इस बात पर वह मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। नतीजन प्रांत के सभी विधायकों की शामत आई है। सबके हाथ और घड़ियाँ चेक हो रही हैं।
दरअसल, कई विवादों के चलते सोशल मीडिया पर चर्चा में बनी रहने वाली हरीम की हाल में शादी को लेकर एक तस्वीर सामने आई थी। इसमें उनके साथ एक मर्द का भी हाथ है। ऐसे में विधानसभा गेट के बाहर ही विधायकों की हथेली और घड़ियाँ चेक होने लगी, जिसके बाद ज्यादातर ने ऐसे किसी निकाह से इंकार किया है। कुछ विधायकों ने तो ये कहकर पीछा छुड़ाया, “ विश्वास करो। मैं वो आदमी नहीं हूँ… चाहे तो हाथ और घड़ी देख लो।”
अब ट्विटर पर अलग-अलग विधायकों की तस्वीर शेयर करके कहा जा रहा है कि शायद वह हरीम के शौहर हों। कुछ लोग इसे टिकटॉक स्टार का पब्लिसिटी स्टंट भी बता रहे हैं। बता दें कि इसी साल फरवरी में हरीम शाह ने इंस्ट्राग्राम पर वीडियो शेयर कर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चीफ बिलावल भुट्टो के प्रति अपने प्यार को स्वीकार किया था। इसके अलावा वह मुफ्ती अब्दुल कवि को कैमरे के सामने थप्पड़ मारने के चलते भी चर्चा में आई थी।
हरीम ने प्रधानमंत्री इमरान खान के सबसे करीबी मंत्री शेख रशीद के ऊपर अश्लील बातचीत करने का आरोप लगाकर भी तहलका मचाया था। इसके अलावा अभी जल्द ही शाह को पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के कॉन्फ्रेंस रूम में बैठे देखा गया था। इसका हल्ला इसलिए मचा था क्योंकि यह वही कमरा था, जहाँ पाकिस्तान के वरिष्ठ राजनयिकों की बैठक होती है।
उल्लेखनीय है कि जियो न्यूज से बात करते हुए हरीम शाह ने शादी को लेकर खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि उनके शौहर एक नामी व्यक्ति हैं और पीपीपी के मेंबर और प्रांतीय मंत्री भी हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके पति की पहले भी एक शादी हो चुकी है और सिंध की राजनीति में भी उनका ऊँचा कद है। इस समय पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की कमान पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल के हाथों में है।
जब शाह से उनके शौहर की पहचान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “मैं एक सीधी-सादी लड़की हूँ, लेकिन मेरे पति पहले से ही शादीशुदा हैं। वह अपनी पहली पत्नी को मना लेंगे, फिर हम एक हफ्ते के भीतर उनके नाम और अपनी शादी का ऐलान कर देंगे।” उन्होंने शो में बताया कि वो जल्द ही अपने प्रशंसकों के साथ कार्यक्रम की तस्वीरें साझा करेंगी। हरीम का यह भी कहना था कि केवल उनके करीबी दोस्त ही इस निकाह के बारे में जानते हैं। पीपीपी चीफ बिलावल भुट्टो ने उनकी शादी अटेंड नहीं की थी। लेकिन एक वरिष्ठ महिला नेता वहाँ जरूर आई थी। दोनों 4 जुलाई को तुर्की जाने वाले हैं। वहाँ से लौटकर वह सारी घोषणा करेंगे।