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‘नथ है मुगलों की देन’ – अमिताभ बच्चन ‘वाले’ कल्याण ज्वेलर्स ने कहा, सोशल मीडिया पर क्लास लगी तो किया सुधार

सोने, चाँदी और प्लेटिनम के गहनों के नामी-गिरामी ब्रांड कल्याण ज्वेलर्स ने ‘मराठी नथ (Nose Ring)’ के संबंध में अपने ब्लॉग में भ्रामक सूचना देते हुए लिखा कि भारत में यह मुगलों के द्वारा लाई गई। हालाँकि सोशल मीडिया पर इसका विरोध होने के बाद कल्याण ज्वेलर्स ने अपने ब्लॉग से यह हिस्सा हटा दिया है।

कल्याण ज्वेलर्स ने मराठी नथ के बारे में ब्लॉग लिखा जिसमें यह बताया कि नोज रिंग (Nose Ring) भारत में सबसे पहले मुगलों के द्वारा मध्य-पूर्व से लाई गई। हालाँकि इस ब्लॉग के सामने आने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे लेकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।

कल्याण ज्वेलर्स का ब्लॉग (फोटो : सुनयना होले / ट्विटर)

भारत नीति नामक एक पहल की कोर कमेटी की सदस्य सुनयना होले ने इस पर संज्ञान लिया। सुनयना ने कल्याण ज्वेलर्स के इस ब्लॉग का स्क्रीनशॉट ट्वीट करते हुए लिखा, “इतिहास को बदलने की कोशिश न करें। नथ या नोज रिंग को मुगल भारत लेकर नहीं आए। इसका अस्तित्व प्राचीन काल से ही था और यह 9वीं-10वीं शताब्दी के दौरान चलन में आई और स्टेटस सिंबल बनी। सुनयना ने यह भी लिखा कि राजाओं, मंत्रियों और व्यापारियों की पत्नियों एवं अन्य धनी परिवारों की महिलाओं ने नाक के इस खूबसूरत गहने को पहनना शुरू कर दिया था। 15वीं शताब्दी के बाद इस गहने में परिवर्तन देखने को मिला।

सोशल मीडिया पर कल्याण ज्वेलर्स की इस गलती पर आलोचना होने के बाद गहनों के इस ब्रांड ने सफाई देते हुए कहा कि उनके द्वारा यह गलती सुधार दी गई है और ब्लॉग को अपडेट कर दिया गया है।

कल्याण ज्वेलर्स का अपडेटेड ब्लॉग जहाँ उन्होंने मुगलों वाला हिस्सा हटाया है

हालाँकि यह पहला मामला नहीं है जब इस्लामिक कट्टरपंथी मुगलों का गुणगान किया गया है। इसके पहले भी कई बार लिबरल, वामपंथी और इतिहासकारों ने किसी न किसी मुद्दे पर मुगलों का गुणगान करते रहते हैं, चाहे वह व्यंजनों की बात हो या फिर किसी पोशाक की।  

‘अपनी बहन-बेटियों को घर में रखो, योगी सरकार की धौंस मत दो’ – छेड़खानी के बाद बिलाल व सोनू कुरैशी ने धमकाया

अलीगढ़ में एक युवती पर अश्लील टिप्पणी का मामला सामने आया है। अश्लील टिप्पणी करने वालों ने ही उलटा पीड़ित लड़की का बचाव करने वालों को धमकी भी दी। ये घटना तब हुई, जब लड़की कोतवाली चौक से गुजर रही थी। तभी दो बदमाश वहाँ आ गए और उन्होंने अश्लील टिप्पणी की। वहाँ के दुकानदारों ने उनकी इस हरकत का विरोध किया। इस पर बदमाश उलटा उन्हीं पर पिल पड़े और जान से मार डालने की धमकी दी।

बदमाश कहने लगे कि अपनी बहन-बेटियों को घर में ही रखो। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इससे स्थानीय लोग आक्रोशित हो गए। उन्होंने पूर्व महापौर और भाजपा नेता शकुंतला भारती के नेतृत्व शनिवार (जून 26, 2021) को कोतवाली पहुँच कर विरोध दर्ज कराया। उन्होंने माँग रखी कि छेड़खानी करने वाले और धमकी देने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए।

एक व्यापारी ने भी इस मामले में थाने में तहरीर दी है। उक्त व्यापारी बाबरी मंडी के निवासी हैं और फूल चौराहे पर उनकी कपड़े की दुकान स्थित है। उन्होंने पुलिस को दी गई शिकायत में बताया कि ये घटना शुक्रवार को दोपहर 2 बजे की है, जब वो हाथ-मुँह धो कर अपनी दुकान की तरफ लौट रहे थे। तभी बाइक सवार मुस्लिम युवकों ने उक्त लड़की पर अश्लील टिप्पणी की। उनका नाम बिलाल और सोनू कुरैशी बताया गया है।

व्यापारी ने उनकी इस करतूत का विरोध किया तो उन्होंने आगे चलने को कहा। थोड़ा आगे जाने पर एक अन्य व्यापारी की दुकान पर वो वहाँ के सभी लोगों को धमकाने लगे। उन्होंने कहा, “मुझे योगी सरकार की धौंस मत दो। रोका तो जान से मार डालेंगे।” पूर्व महापौर शकुंतला भारती, भाजपा नेता संजू बजाज, हर्षद हिदू और विशाल देशभक्त ने कोतवाली पहुँच कर पुलिस को बताया कि इस घटना से और इसका वीडियो वायरल होने से शहर का माहौल तनावपूर्ण हो गया है।

सीओ प्रथम राघवेंद्र सिंह ने जानकारी दी है कि प्राप्त शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर के दोनों युवकों को खाईडोरा से गिरफ्तार कर लिया गया है। ‘बजरंग दल’ ने भी इस घटना को लेकर आक्रोश जताया है। बजरंग दल के महानगर संयोजक गौरव शर्मा ने शुक्रवार की रात प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखी। संगठन ने संवेदनशील इलाकों में पुलिस की गश्त बढ़ाने और सीसीटीवी कैमरे लगाने की माँग की।

व्यापारियों को धमकी देते बिलाल और सोनू कुरैशी

‘बजरंग दल’ ने कहा कि संगठन इस तरह की घटनाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकता। ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे बाइक सवार दोनों युवक व्यवसायियों को धमकी दे रहे हैं और उनके साथ अभद्रता से पेश आ रहे हैं। अलीगढ़ व्यापारी संघर्ष समिति ने भी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। व्यापारियों ने कहा कि इस तरह की घटनाओं से शहर का माहौल खराब होता है, इसीलिए वो जल्द ही एसपी से मिल कर अपनी बात रखेंगे।

इस्लामीकरण के शिकार मूक-बधिर आदित्य की घर-वापसी: मंदिर जाकर की पूजा, माँ ने IFD के खिलाफ लड़ने का किया फैसला

उत्तर प्रदेश में इस्लामी धर्मांतरण गिरोह का शिकार हुए मूक-बधिर आदित्य ने मंदिर जाकर नारियल फोड़ा और पूजा की। यह जानकारी उनकी माँ लक्ष्मी गुप्ता ने दी है। उन्होंने बताया, ”धर्मांतरण के बाद घर वापसी करने वाले आदित्य के व्यवहार में तेजी से बदलाव हो रहा है। वह लंबे समय बाद शनिवार (26 जून 2021) को मंदिर गया और नारियल फोड़कर भगवान की पूजा की। यह सब देखते हुए हम सभी सुकून महसूस कर रहे हैं।”

दरअसल, धर्मांतरण गिरोह के चंगुल में फँसकर आदित्य गुप्ता अब्दुल्ला बन गया था। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश एटीएस ने धर्मांतरण कराने वाले बड़े गिरोह का पर्दाफाश कर दो मौलानाओं जहाँगीर आलम कासमी और मोहम्मद उमर गौतम को दिल्ली से दबोचा था। ये मूक-बधिर बच्चों को अपना निशाना बनाते थे। वहीं, गिरफ्तारियाँ शुरू हुई तो आदित्य भी अपने घर वापस लौट आया।

दैनिक जागरण के साथ बातचीत में कानपुर स्थित काकादेव हितकारी नगर के आदित्य की माँ ने बताया, “उन्होंने फैसला किया है कि अब वह आईएफडी (इस्लामिक फेडरेशन आफ डेफ) की साजिश के खिलाफ लड़ेंगी और ऐसे वीडियो तैयार करेंगी, जिससे बच्चों को धर्मांतरण का शिकार होने से बचाया जा सके।”

उन्होंंने कहा कि यह सच है कि इंटरनेट मीडिया पर मूक-बधिर बच्चों के लिए हिंदू धर्म व अन्य विषयों पर कोई वीडियो नहीं है। ऐसे में उन्होंने फैसला लिया है कि वह इन बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक और धर्मांतरण से बचाव के लिए कई वीडियो तैयार करेंगी और उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल करेंगी। ताकि और किसी माँ को उनकी तरह इस समस्या का सामना न करना पड़े।

वहीं, एटीएस की जाँच में सामने आया कि इंटरनेट मीडिया पर आईएफडी (IFD) ने अपने धर्म का महिमामंडन और दूसरे धर्मों को गलत बताते हुए सैकड़ों वीडियो तैयार किए हैं। इस तरह मूक-बधिर बच्चों के लिए केवल एकमात्र वही प्लेटफार्म था, इसलिए जो भी यहाँ गया वह फँस गया।

गौरतलब है कि धर्मांतरण के बाद आदित्य जब घर लौटा तो वो आदित्य नहीं, अब्दुल्ला था। वो घर में ही चोरी-छिपे 5 वक़्त की नमाज अदा किया करता था। जब घर वालों को इसकी भनक लगी तो 10 मार्च, 2021 को फरार हो गया। इसके दो दिन बाद कल्याणपुरी थाने में परिजनों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की। इधर ATS ने मूक-बधिर लोगों का धर्मांतरण कराने वाले दो मौलानाओं को गिरफ्तार किया। हालाँकि, इसके एक दिन पहले ही आदित्य घर लौट चुका था। आदित्य को उसके परिजन किसी से मिलने नहीं दे रहे हैं। वो खुद भी किसी से बात नहीं करना चाह रहा है। आदित्य की माँ लक्ष्मी देवी ने अपने बेटे के कारण मूक-बधिर की भाषा सीखी थी।

बता दें नोएडा के सेक्टर-117 स्थित डेफ सोसाइटी के बच्चों को खासकर इस गिरोह ने निशाना बनाया। इनकी साजिश थी कि मूक-बधिर विद्यार्थियों का उपयोग ‘मानव बम’ के रूप में किया जाए। भारत ही नहीं, इन्हें ‘मानव बम’ बना कर विदेश में भी उनका इस्तेमाल करने की साजिश थी। पाकिस्तान और अरब देशों से इन्हें भारी फंडिंग मिल रही थी, जिससे इस्लामी धर्मांतरण का गिरोह फल-फूल रहा था। गाजियाबाद के डासना मंदिर में घुसने वालों से भी इनका कनेक्शन सामने आया है।

UP के इन 17 जिलों में बीजेपी ने दी सबको मात, निर्विरोध चुने जाएँगे जिला पंचायत अध्यक्ष, मतदान 3 जुलाई को

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में होने हैं लेकिन फिलहाल राज्य में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव पूरे रोमांच के साथ चल रहा है। राज्य के 75 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख शनिवार (26 जून) बीत चुकी है और मतदान 3 जुलाई को कराया जाएगा लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा के 17 उम्मीदवारों का चुना जाना लगभग तय हो चुका है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में कुल 18 ऐसे जिले हैं जहाँ जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए मात्र एक ही प्रत्याशी ने नामांकन दाखिल किया है। शनिवार (26 जून) को नामांकन की आखिरी तारीख थी। इसके अलावा नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख 29 जून है, ऐसे में यूपी का राज्य निर्वाचन आयोग इन 18 प्रत्याशियों को निर्विरोध विजयी घोषित कर देगा। इन 18 प्रत्याशियों में से 17 प्रत्याशी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार हैं जबकि 1 प्रत्याशी समाजवादी पार्टी का है।

राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार जिन 18 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन निश्चित है, उनमें मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, अमरोहा, मुरादाबाद, आगरा, इटावा, ललितपुर, झाँसी, बांदा, चित्रकूट, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, गोरखपुर, बुलंदशहर, वाराणसी व मऊ शामिल हैं। इनमें से सिर्फ इटावा में ही सपा के प्रत्याशी निर्विरोध चुने जाएँगे। यहाँ से यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चचेरे भाई अभिषेक यादव के खिलाफ किसी ने भी अपना नामांकन दाखिल नहीं किया है।

भाजपा के जिन प्रत्याशियों का निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुना जाना तय है, उनमें आगरा से मंजू भदौरिया, गाजियाबाद से ममता त्यागी, मुरादाबाद से डॉ. शेफाली सिंह, बुलंदशहर से डॉ. अंतुल तेवतिया, ललितपुर से कैलाश निरंजन, मऊ से मनोज राय, चित्रकूट से अशोक जाटव, गौतमबुद्ध नगर से अमित चौधरी, श्रावस्ती से दद्दन मिश्रा, गोरखपुर से साधना सिंह, बलरामपुर से आरती तिवारी, झांसी से पवन कुमार गौतम, गोंडा से घनश्याम मिश्रा, मेरठ से गौरव चौधरी, बांदा से सुनील पटेल, वाराणसी से पूनम मौर्या तथा अमरोहा से ललित तंवर शामिल हैं।

राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए शनिवार तक 160 नामांकन दाखिल हुए जिनमें से 6 नामांकन खारिज कर दिए गए। हालाँकि जिन 18 सीटों पर प्रत्याशियों का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय हो चुका है यदि उन्हें छोड़ दिया जाए तो अब शेष बची सीटों पर मुकाबला भाजपा और सपा-रालोद गठबंधन के उम्मीदवारों के बीच ही है। ऐसा इसलिए क्योंकि बहुजन समाज पार्टी ने जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए एक भी प्रत्याशी नहीं खड़ा किया है, वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस ने भी सिर्फ रायबरेली और जालौन में अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

नामांकन वापस लेने की तारीख 29 जून है जिसके बाद राज्य चुनाव आयोग 18 उम्मीदवारों को निर्विरोध विजयी घोषित कर देगा। इसके बाद शेष बची 57 सीटों के लिए चुनाव 3 जुलाई 2021 को संपन्न कराए जाएँगे जहाँ जिला पंचायत सदस्य, अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए मतदान करेंगे।

उत्तर प्रदेश के इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा में है बलरामपुर से भाजपा प्रत्याशी आरती तिवारी। जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए भाजपा ने अपनी सबसे कम उम्र की प्रत्याशी आरती को मैदान में उतारा था। हालाँकि, 21 वर्षीय आरती के विरोध में किसी भी प्रत्याशी ने अपना नामांकन दाखिल नहीं किया, ऐसे में आरती का जिला पंचायत अध्यक्ष चुना जाना तय ही है। आरती बलरामपुर जिले के वार्ड नंबर 17 से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को 8500 मतों से हराकर सबसे कम उम्र की जिला पंचायत सदस्य चुनी गई थीं।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय: प्रेसीडेंसी कालेज से BA करने वाले वह पहले भारतीय, अंग्रेजी नौकरी और उसी के विरोध में ‘वंदे मातरम्’

भारत के राष्ट्रगीत वंदेमातरम के रचयिता और बंगाल के लोकप्रिय उपन्यासकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (बंकिम चंद्र चटर्जी भी) की आज पुण्यतिथि है। 27 जून 1838 को कोलकाता में जन्मे चटर्जी का 8 अप्रैल 1894 को कोलकाता में ही निधन हुआ था। कला के जरिए विदेशी शासन के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले चटर्जी को अपनी इसी क्रांति की वजह से नौकरी तक में प्रमोशन नहीं मिला था, लेकिन उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष नहीं रोका।

चटर्जी को वंदे मातरम के जरिए असंख्य देशवासियों में स्वाधीनता की अलख जगाने वाले महान देशभक्त के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने जीवन भर बंगाली भाषा व संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम किया। चटर्जी ने जब नौकरी के समय लेखन किया, तो उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी। अंग्रेज अफसर लगातार काम में बाधा डालने की कोशिश करते रहे।

बंकिम चंद्र चटर्जी सजग अधिकारी थे। वे अंग्रेजों के सामने कभी झुके नहीं। वे निर्भीक थे और देशभक्त भी थे, जिससे अंग्रेज उनसे नाराज रहते थे। कदम-कदम पर उनका अंग्रेजों से संघर्ष होता था। इसका असर यह हुआ कि काफी मेहनत के बावजूद चटर्जी कभी किसी बड़े ओहदे तक नहीं पहुँच पाए।

बताया जाता है कि इसके चलते बंकिम चंद्र 53 साल की उम्र में ही सेवानिवृत्त होना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा होने नहीं दिया। उनकी मंशा कुछ और थी। हालाँकि, किसी तरह बंकिम चंद्र सेवानिवृत्त होने में सफल रहे और लेखन का काम जारी रखा। इसके बाद उनकी मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई और चटर्जी के ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष को एक नई दिशा मिली थी।

वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने दी पहचान

वंदे मातरम गीत बंकिम चन्‍द्र चटर्जी द्वारा संस्‍कृत में रचा गया। यह स्‍वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था। इसका स्‍थान जन गण मन के बराबर है। इसे पहली बार 1896 में भारतीय राष्‍ट्रीय कॉन्ग्रेस के सत्र में गाया गया था। इसके बाद वंदे मातरम की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।

1920 तक सुब्रमण्यम भारती के साथ कई विद्वानों ने इस गीत का अलग-अलग भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी कर दिया था। इसके बाद वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की पहचान मिल गई। यहाँ तक कि लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम भी वंदे मातरम रखा गया था।

नहीं मिल पाया राष्ट्रगान का दर्जा

वंदे मातरम की गूँज ने अंग्रेजों को हमेशा ही परेशान किया। उनकी इस गीत की वजह से आजादी के लिए पूरा भारत आंदोलित हो उठा था। वे किसी तरह इस गान को रोकना चाह रहे थे। अंग्रेजों की शह पर इस गीत पर विवाद खड़ा किया गया। हालाँकि, देश-विदेश में भारत की आजादी की अलख जगाने वाला गीत को राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका।

बंकिम चन्‍द्र चटर्जी बंगला के प्रख्यात उपन्यासकार, कवि, गद्यकार और पत्रकार तो थे ही, दूसरी भाषाओं पर भी उनके लेखन का व्यापक प्रभाव पड़ा। आज भी भारतीय जनमानस के बीच वह राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त ‘वन्दे मातरम्’ के रचयिता के रूप में जाने जाते हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान ‘वन्दे मातरम्’ गीत क्रांतिकारियों की प्रेरणा का स्रोत तो था ही, आज भी राष्ट्रवादी इस पर गर्व करते हैं। दरअसल बंगला समाज, साहित्य और संस्कृति के उत्थान में सामाजिक, शैक्षिक आंदोलन से जुड़े विचारकों राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, प्यारीचाँद मित्र, माइकल मधुसुदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और ठाकुर रवीन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती आदि ने अग्रणी भूमिका निभाई। इसका असर पूरे देश की भाषायी समृद्धि पर पड़ा। यह एक तथ्य है कि बंकिम से पहले बंगला साहित्यकार संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसंद करते थे।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 27 जून, 1838 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा नामक गाँव में एक समृद्ध, पर परंपरागत बंगाली परिवार में हुआ था। मेदिनीपुर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली के मोहसीन कॉलेज में दाखिला लिया। किताबों के प्रति बंकिम चंद्र चटर्जी की रुचि बचपन से ही थी। वह शुरुआत में आंग्ल भाषा की ओर भी आकृष्ट थे, पर कहते हैं कि अंग्रेजी के प्रति उनकी रुचि तब समाप्त हो गई, जब उनके अंग्रेजी अध्यापक ने उन्हें बुरी तरह से डाँटा था। इसी के बाद से उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव उपजा। वह एक मेधावी व मेहनती छात्र थे पर पढ़ाई के साथ-साथ उनकी रुचि खेलकूद में भी थी।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय की शादी महज ग्यारह वर्ष की आयु में ही हो गई थी। अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद, उन्होंने पुनर्विवाह किया। साल 1856 में उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया और 1857 के पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में प्रेसीडेंसी कालेज से बीए की उपाधि लेने वाले वह पहले भारतीय बने। उन्होंने क़ानून की डिग्री भी हासिल की और पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने 1858 में ही डिप्टी मजिस्ट्रेट का पदभार सँभाला और 1891 में सरकारी सेवा से रिटायर हुए।

वह एक सुगढ़ पाठक थे और बंगला और संस्कृत साहित्य में अपनी भरपूर पैठ बनाई। सरकारी नौकरी में रहते हुए उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन, जिसे अंग्रेज गदर कहते थे, पर अंग्रेजों की प्रतिक्रिया और भारतीयों पर उनके दमनचक्र को बहुत नजदीक से देखा था। इस दौर में भारतीय शासन प्रणाली में आकस्मिक परिवर्तन हुआ, और शासन भार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में न रहकर महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया। कहने को तो भारतीय सीधे ‘महान’ ब्रिटिश साम्राज्य की प्रजा बन गए थे, पर उनका जीवन और भी दूभर हो गया था।

सरकारी नौकरी में होने के कारण बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय किसी सार्वजनिक आन्दोलन में प्रत्यक्षतः भाग नहीं ले सकते थे, पर उनका मन कचोटता था। इसलिए उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए जागृति का संकल्प लिया। बंकिम चंद्र चटर्जी कविता और उपन्यास दोनों लिखने लगे और दोनों ही विधाओं में न केवल पारंगत बने, बल्कि एक से बढ़कर एक रचनाओं से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का पहला उपन्यास ‘रायमोहन्स वाईफ’ अंग्रेजी में था। साल 1865 में उनकी प्रथम बांग्ला कृति ‘दुर्गेशनंदिनी’ प्रकाशित हुई। उस समय उनकी उम्र केवल 27 वर्ष थी। फिर उनकी अगली रचनाएँ 1866 में कपालकुंडला, 1869 में मृणालिनी, 1873 में विषवृक्ष, 1877 में चंद्रशेखर, 1877 में रजनी, 1881 में राजसिंह और 1884 में देवी चौधुरानी आईं। उन्होंने ‘सीताराम’, ‘कमला कांतेर दप्तर’, ‘कृष्ण कांतेर विल’, ‘विज्ञान रहस्य’, ‘लोकरहस्य’, ‘धर्मतत्व’ जैसे ग्रंथ भी लिखे।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने साल 1872 में मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ का भी प्रकाशन किया। ‘बंगदर्शन’ ने बंगाली पत्रिका का नया पर्व शुरू किया। रबीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे लेखक ‘बंग दर्शन’ में लिखकर ही साहित्य के क्षेत्र में आए। वे बंकिमचंद्र चटर्जी को अपना गुरु भी मानते थे। उनका कहना था कि, ‘बंकिम बंगला लेखकों के गुरु और बंगला पाठकों के मित्र हैं।’ बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का सबसे चर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में प्रकाशित हुआ, जिससे प्रसिद्ध गीत ‘वंदे मातरम्’ लिया गया है।

आनंदमठ में ईस्ट इंडिया कंपनी के वेतन के लिए लड़ने वाले भारतीय मुसलमानों और संन्यासी ब्राह्मण सेना का वर्णन किया गया है। हालाँकि यह किताब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता का आह्वान करती है, पर वहाँ के हालातों के वर्णन के चलते इस उपन्यास पर काफी विवाद भी रहा। बहरहाल ‘वंदे मातरम्’ गीत की प्रसिद्धि का आलम यह था कि इसे स्वयं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया।

सच कहें तो बंगला साहित्य की मार्फत भारतीय जनमानस तक पैठ बनाने वालों में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय वह पहले साहित्यकार हैं, जिन्हें विश्वव्यापी ख्याति मिली। उनकी रचनाओं के अनुवाद दुनिया की कई भाषाओं में हुए, और कई पर फिल्में भी बनीं। यह एक दुर्लभ गुण था कि सरकारी नौकरी में रहते हुए भी बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने लेखन से देश में राष्ट्रवाद का अलख जगाया। एक ओर विदेशी सरकार की सेवा और दूसरी ओर देश के नवजागरण के लिए उच्च कोटि के साहित्य की रचना करने जैसा दुरूह काम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के लिए ही सम्भव था।

आज भी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की लोकप्रियता का यह आलम है कि पिछले डेढ़ सौ सालों से उनके उपन्यास विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो रहे हैं और कई-कई संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। उनके उपन्यासों में नारी की अन्तर्वेदना व उसकी शक्तिमत्ता बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई है। उनके उपन्यासों में नारी की गरिमा को नई पहचान मिली है और भारतीय इतिहास को समझने की नई दृष्टि। वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे। उन्हें भारत का एलेक्जेंडर ड्यूमा भी कहा गया।

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, “राममोहन ने बंग साहित्य को निमज्जन दशा से उन्नत किया, बंकिम ने उसके ऊपर प्रतिभा प्रवाहित की। बंकिम के कारण ही आज बंगभाषा मात्र प्रौढ़ ही नहीं, उर्वरा और शस्यश्यामला भी हो सकी है।” 8 अप्रैल, 1894 को भारत माता के सपूत, महान साहित्यसेवी, देशसेवी और सच्चे भारतीय की मृत्यु से केवल बंगाल ही नहीं बल्कि पूरा भारत शोक में डूब गया था। 

टोक्यो ओलंपिक और मिल्खा सिंह पर ‘मन की बात’, वैक्सीनेशन पर अफवाहों से बचने का पीएम मोदी ने दिया संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (27 जून 2021) को 78वीं रेडियो पर ‘मन की बात’ के जरिए देश को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने टोक्यो ओलंपिक, वैक्सीनेशन, कोरोना और जल संरक्षण को लेकर बात की। पीएम ने वैक्सीन लगवाने को लेकर जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से बताया कि 100 साल की उम्र में उनकी माँ ने भी वैक्सीन लगवा ली है।

ओलंपिक खेलों के विषय में मन की बात करते हुए पीएम मोदी ने हाल ही में दिवंगत हुए महान एथिलीट मिल्खा सिंह को याद करते हुए कहा, “ओलंपिक खेलों की बात हो रही हो तो मिल्खा सिंह जैसे महान एथिलीट को कौन भूल सकता है। कुछ दिन पहले ही कोरोना की वजह से वे हमसे छिन गए। जब वे अस्पताल में थे तो मैंने उनसे बात की थी। मैंने उनसे आग्रह किया था कि 1964 के टोक्यो ओलंपिक में आपने देश का प्रतिनिधित्व किया था। इस बार हमारे खिलाड़ी टोक्यो जा रहे हैं, जिनका मनोबल आप को बढ़ाना है।” प्रधानमंत्री ने बताया कि बीमार होते हुए भी वो इसके लिए तैयार हो गए थे।

पीएम ने कहा कि हर खिलाड़ी का अपना संघर्ष रहा है। टोक्यो जा रहे इन खिलाड़ियों को देश का गौरव बढ़ाना है। हमें जाने-अनजाने इन खिलाड़ियों पर दवाब बनाने के बजाय उनका साथ देना है।

रिकॉर्ड टीकाककरण का जिक्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना के खिलाफ हमारी जंग अभी जारी है। कुछ दिन पहले ही इस मामले में देश ने एक अभूतपूर्व काम किया था। 21 जून 2021 को कोरोना वैक्सीनेशन के अगले चरण की शुरुआत के दिन ही एक ही दिन में 86 लाख से ज्यादा लोगों ने मुफ्त टीका लगवाया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि टीकाकरण को लेकर अफवाह फैलाने वालों को एक तरफ छोड़िए, हम अपना काम करते हुए ये सुनिश्चित करेंगे कि सभी को इसका टीका लगे। हमारे वैज्ञानिकों पर भरोसा रखें।

आदिवासियों पर बनेगी केस स्टडी

कोरोना के खिलाफ जारी जंग के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि विश्व के लिए कभी न कभी हमारे आदिवासी भाई-बहन केस स्टडी बनेंगे कि किस तरह से उन्होंने कोरोना से लड़ाई में अपनी सूझबूझ का परिचय दिया था। गाँव के लोगों ने क्वारंटाइन सेंटर बनाकर किसी को भी भूखा सोने नहीं दिया।

जल संरक्षण देश सेवा का ही एक रूप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल संरक्षण पर मन की बात के जरिए संदेश देते हुए कहा कि मानसून आ गया है। बादल जब बरसते हैं तो केवल हमारे लिए ही नहीं बरसते। वो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बरसते हैं। मैं जल सरंक्षण को देश सेवा का एक ही रूप मानता हूँ।

मध्य प्रदेश के किशोरी लाल से की बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वैक्सीनेशन को लेकर मध्य प्रदेश के किशोरी लाल से बात की। इस दौरान पीएम ने उनसे वैक्सीन को लेकर फैले भ्रम को लेकर पूछा। इस पर किशोरी लाल ने बताया कि उनके रिश्तेदार कहते हैं कि वैक्सीन लगवाने से लोगों की मौत हो जाती है। इस पर पीएम मोदी ने उनसे अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील करते हुए कहा कि हमें जिंदगी बचानी है, लोगों को बचाना है।

‘जज ने सिख लड़की को मुस्लिम पक्ष को सौंपा, परिजनों से पूछा तक नहीं’: J&K में अपहरण और जबरन धर्मांतरण का मामला

जम्मू कश्मीर से खबर आई है कि वहाँ दो सिख लड़कियों का अपहरण कर के जबरन उनका इस्लामी धर्मांतरण करा दिया गया। इनमें से एक लड़की के बारे में कहा जा रहा है कि उसकी शादी जबरन एक मुस्लिम लड़की से कर दी गई। उस लड़की का अब तक पता नहीं चल सका है। जबरन इस्लामी धर्मांतरण का ये मामला शनिवार (जून 26, 2021) को सामने आया। एक घटना घटना बड़गाम जिले की है।

बड़गाम में एक 18 साल की सिख लड़की को लालच देकर उसे फाँसा गया और फिर उसे मुस्लिम बना दिया गया। ‘शिरोमणि अकाली दल’ के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा और ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (SGPC)’ ने भी इस मामले को सोशल मीडिया पर उठाया है और जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा से हस्तक्षेप की माँग की है। दूसरा मामला राजधानी श्रीनगर के महजूर नगर की है।

वो अपनी एक मुस्लिम दोस्त की शादी अटेंड करने गई थी। ये लड़की नाबालिग नहीं थी। वहीं शादी समारोह में आए एक अन्य मुस्लिम लड़के से उसकी जबरन शादी करा दी गई। बड़गाम के गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के अध्यक्ष संतपाल सिंह ने बताया कि उस लड़की की दिमागी हालत ठीक नहीं थी। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम युवक ने प्यार और शादी का झाँसा देकर उसे फँसाया। उन्होंने कहा कि एक सिख लड़की को जबरन इस्लाम कबूल करवा दिया गया।

कश्मीर में सिख लड़की का अपहरण-धर्मांतरण

उन्होंने कहा कि ये स्पष्ट रूप से ‘लव जिहाद’ का मामला है और सरकार इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। उन्होंने बताया कि एसपी ने लिखित में आश्वासन दिया था कि सिख लड़की को खोज कर परिवार के हवाले किया जाएगा, लेकिन कोर्ट का आदेश उनके खिलाफ आ गया। उन्होंने बताया कि जज ने मुस्लिम पक्ष के हक़ में फैसला दिया और लड़की को उसे ही सौंप दिया, जो एक तरह का अन्याय है।

संतपाल सिंह ने कहा कि लड़की के परिजनों को कोर्ट के भीतर भी नहीं जाने दिया गया था और उन्हें कोविड-19 प्रोटोकॉल का बहाना बना कर बाहर ही बिठा दिया गया था। पुलिस ने कहा कि अंदर भीड़ होगी, इसीलिए वो बाहर ही बैठें। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम लड़के के परिजनों को कोर्ट के भीतर जाने दिया गया और लड़की के परिवार के बिना ही उसका बयान दर्ज कर लिया गया। पूरी सुनवाई के दौरान लड़की के परिजनों को भीतर बुलाया तक नहीं गया।

संतपाल सिंह की माँग है कि कम से कम 1 सप्ताह के लिए जज को उस लड़की को परिजनों को सौंपना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इसके बावजूद लड़की मुस्लिम लड़के के साथ जाना चाहती होगी, तो फिर कोई नहीं रोकेगा। उन्होंने प्रदेश के मुस्लिम बहुसंख्यकों से पीड़ितों के पक्ष में खड़े होने की अपील की। उन्होंने याद दिलाया कि मुस्लिम लड़कियों को मुंबई और पुणे से वापस लाकर सिख समुदाय ने ज़रूरत के समय उनकी मदद की थी।

मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी मामले को उठाया

उन्होंने मुस्लिमों से अपील की कि वो आगे आएँ और उनका समर्थन करें, क्योंकि कश्मीर की घाटी में भाईचारा कायम रखने के लिए ये आवश्यक है। उन्होंने बताया कि जिस मुस्लिम लड़के से शादी करा दी गई है, उसकी पहले ही 2-3 शादियाँ हो चुकी हैं। उन्होंने LG से भी अपील की कि लड़की एक सप्ताह परिजनों के साथ रहे और इसके बावजूद अगर वो उसी मुस्लिम लड़के के साथ जाना चाहती है, तो परिजन कुछ नहीं कहेंगे।

इस दौरान वहाँ मौजूद एक अन्य सिख व्यक्ति ने सवाल दागा कि ऐसी कौन सी व्यवस्था है जहाँ लड़की के परिजनों की ही नहीं सुनी जाती? उन्होंने पूछा कि लड़की के परिजनों की सुने बिना जज कैसे फैसला सुना सकता है? साथ ही ये सवाल भी दागा कि एक ही दिन में फैसला सुनाने की क्या जल्दी थी? उन्होंने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा कि लड़की का 4 दिन पहले ही अपहरण कर लिया गया था।

उस लड़की को पुलिस ने चन्दूशा से रेस्क्यू किया था। उस लड़की को 2 दिन रिमांड पर रखने के बाद कोर्ट में पेश किया गया। इस मामले को जानने वाले लोगों ने कहा कि जज ने सुनवाई के दौरान पूछा तक नहीं कि लड़की के परिजन कहाँ हैं। सिखों ने जम्मू कश्मीर में भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने की माँग की। जाँच की माँग करते हुए सिखों ने कहा कि माता-पिता के हस्ताक्षर के बिना लड़की को कैसे किसी को सौंपा जा सकता है?

मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी इन आरोपों की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि घाटी में ‘लव जिहाद’ के कई मामले सामने आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि ये अल्पसंख्यकों के प्रति दोहरे रवैये की ओर इशारा करता है। वहीं तजिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा कि कश्मीर में सिखों के साथ पिछले 70 वर्षों से दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है और उनके लिए कुछ नहीं बदला है। उन्होंने कहा कि जहाँ सिख दूसरे समुदाय की लड़कियों की रक्षा करते हैं, हमारे लिए बहुसंख्यक मुस्लिमों में से एक व्यक्ति ने भी आवाज़ नहीं उठाई है।

एसपी का वीडियो भी आया सामने

‘सिख संगत’ ने श्रीनगर जुडिशल कॉम्प्लेक्स में प्रदर्शन भी किया। SGPC ने कहा कि कम से कम लड़की के परिजनों को तो इस कार्रवाई के पहले विश्वास में लेना चाहिए था। स्थानीय एसपी ने फिर से लड़की को उसके परिजनों को सौंपने का आश्वासन देते हुए उनसे प्रदर्शन स्थल खाली करने को कहा। एसपी को एक वीडियो में कहते सुना जा सकता है कि लड़की ने कोर्ट में ड्रामा किया और पुलिस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया।

ट्विटर पर चाइल्ड पोर्न कंटेंट, फिर भी एक्शन नहीं: NCPCR ने दिल्ली पुलिस को किया FIR के साथ तलब

ट्विटर और केंद्र सरकार में जारी विवाद के बीच माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट पर पोर्न कंटेट के मामले में बाल अधिकारों के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCPR) ने कड़ा रुख अपना लिया है। आयोग ने 29 जून 2021 को दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम डिपार्टमेंट के डीसीपी को पेश होने का आदेश दिया है। इसके साथ ही ट्विटर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा है।

आयोग ने दिल्ली पुलिस के डीसीपी अन्येश रॉय से पूछा है कि पिछले महीने 29 मई 2021 को पत्र लिखने के बाद भी ट्विटर के खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया।

NCPCR के प्रमुख प्रियंक कानूनगो ने एएनआई को बताया कि डीसीपी साइबर क्राइम को ट्विटर के खिलाफ फाइल होने वाले एफआईआर की एक कॉपी के साथ व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होने को कहा है। आयोग ने कहा, “ट्विटर ने पोर्नोग्राफिक और बाल यौन दुर्व्यवहार को लेकर NCPCR द्वारा की गई पूछताछ के दौरान झूठी और भ्रामक जानकारी दी थी, जो पोक्सो अधिनियम के तहत एक गंभीर अपराध था।”

इसी मामले में पिछले महीने (मई 2021) NCPCR ने दिल्ली पुलिस से ट्विटर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए कहा था। जबकि पिछले साल NCPCR ने गूगल, ट्विटर, व्हाट्सएप, एप्पल इंडिया जैसी कंपनियों को नोटिस जारी कर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटीरियल (CSAM) कंटेट को रोकने और उन्हें हटाने के बारे में पूछा था। इसके साथ ही आयोग ने आईटी मंत्रालय से माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म तक बच्चों की पहुँच को खत्म करने का अनुरोध किया था।

NCPCR ने क्या लिखा पत्र में

नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) ने दिल्ली पुलिस को अपनी हाल की पूछताछ के आधार पर ट्विटर के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा है। आयोग ने पत्र में दावा किया था कि माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफार्म ट्विटर पर बाल यौन दुर्व्यवहार सामग्री (सीएसएएम) आसानी से मिल जा रही है।

आयोग ने यह भी कहा कि ट्विटर पर डार्क वेब टूलकिट भी उपलब्ध है। ऐसे में यह कंटेंट आसानी से सभी तक पहुँच रहा है। प्रियंक कानूनगो ने दिल्ली पुलिस से पोक्सो एक्ट की धारा 11, 15 और 19 व आईटी एक्ट व आईपीसी के प्रावधानों के तहत ट्विटर के खिलाफ कार्रवाई करने का अनुरोध किया है।

अपने पहले पत्र में कानूनगो ने लिखा था, “13 साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों को ट्विटर के इस्तेमाल की अनुमति देने से उनकी पहुँच वहाँ तक वो जाती है, जिसके लिए उस उम्र में छूट नहीं होती।”

मुस्लिम डॉक्टर के परिवार को ₹1 Cr, दिवंगत हिंदू कॉन्स्टेबल की पत्नी खा रही दर-दर की ठोकर: मजहब देख मदद करते हैं केजरीवाल?

अपने अक्सर सुना होगा कि नेता वादे करते हैं और फिर भूल जाते हैं। चुनाव के दौरान बड़ी-बड़ी घोषणाएँ की जारी हैं और जीतने के बाद नेता उसे पूरे नहीं करते। देश में एक नेता ऐसा भी है, जो मजहब देख कर निर्णय लेता है कि किसी पीड़ित की सहायता करनी है कि नहीं, या फिर किसी मृतक के परिजनों को घोषित मुआवजा देना है कि नहीं। अरविंद केजरीवाल सरकार की बेरुखी के कारण दिवंगत कॉन्स्टेबल अमित कुमार की विधवा दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर है।

अमित कुमार राष्ट्रीय राजधानी के पहले ऐसी पुलिसकर्मी थे, जिन्होंने खतरनाक कोरोना वायरस संक्रमण के कारण अपनी जान गँवाई। कोरोना काल में भी जान हथेली पर रख कर ड्यूटी करने वाले और फिर अपने सर्वोच्च बलिदान देने वाले अमित कुमार के परिजनों के लिए दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने 1 करोड़ मुआवजे की घोषणा तो कर दी, लेकिन अभी तक उन्हें एक फूटी कौड़ी तक नहीं दी गई है।

दिल्ली उच्च-न्यायालय में अमित बंसल की पीठ ने जुलाई 23, 2021 को इस मामले की सुनवाई की तारीख के रूप में मुकर्रर की है और दिल्ली सरकार को नोटिस देते हुए जवाब माँगा है। मई 2020 में ही दिल्ली सरकार ने कोविड-19 से जान गँवाने वाले युवा कॉन्स्टेबल अमित कुमार के परिजनों के लिए मुआवजा की घोषणा की थी, लेकिन अब एक साल से एक महीना अधिक बीतने के बावजूद इस पर अमल नहीं हो सका है।

ऐसा नहीं है कि ये वादा चोरी-छिपे किया गया था। खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर के अमित कुमार की मौत पर दुःख जताया था और परिवार को 1 करोड़ रुपए बतौर मुआवजा देने की घोषणा की थी। पत्नी पूजा ने अंत में हार कर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दिल्ली सरकार के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में कहा कि ‘प्रशासनिक कारणों’ से मुआवजे की राशि देने में देर हुई है। साथ ही दावा किया कि कई लोगों को मुआवजा देने के लिए दिल्ली सरकार कदम उठा रही है।

आश्चर्य की बात ये है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री खुद जाकर जब किसी मृतक के परिजनों को 1 करोड़ रुपए की सहायता राशि सौंप सकते हैं तो अमित कुमार के मामले में कोई अधिकारी तक उनके घर क्यों नहीं जा सकता? इसी साल मई में GTB अस्पताल में तैनात युवा डॉक्टर अनस मुजाहिद की मौत के बाद केजरीवाल मुस्तफाबाद के भागीरथी विहार स्थित उनके घर गए थे, परिजनों को ढाँढस बँधाया था और 1 करोड़ रुपए का चेक सौंपा था।

किसी को दिवंगत डॉक्टर मुजाहिद के परिजनों को मिली मदद से दिक्कत नहीं होनी चाहिए, लेकिन दिल्ली में दारू-शराब की होम डिलीवरी करने वाली सरकार क्या अमित कुमार से सिर्फ इसीलिए भेदभाव करती है कि वो हिन्दू हैं? या इसीलिए भेदभाव करती है कि हिंदू वोट-बैंक नहीं होते? एक बात और… यहाँ दिवंगत डॉक्टर मुजाहिद और अमित कुमार राणा के बीच जो अंतर है, उसे भी समझना होगा।

मुजाहिद के पिता भी डॉक्टर थे, जबकि अमित कुमार राणा एक सामान्य परिवार से थे। सोचिए, उस परिवार पर क्या गुजरी होगी जहाँ पति की मौत के बाद विधवा पत्नी और 3 साल का बेटा भी कई दिनों तक कोरोना से जंग लड़ते रहे। दिल्ली में दारू-शराब की होम डिलीवरी करने वाली सरकार जब अमित कुमार से सिर्फ इसीलिए भेदभाव करे कि वो हिन्दू हैं और हिंदू वोट-बैंक नहीं होते हैं, तो इससे जरूर लोग निराश होंगे।

ये आरोप भी है कि ज़िंदा रहते अमित कुमार के इलाज के लिए दिल्ली सरकार ने समुचित व्यवस्था नहीं की थी। उनके सहयोगी उनकी मौत के बाद नाराज़ थे। उनकी बातें भी सीएम केजरीवाल को आज सुननी चाहिए, भले 1 साल बाद। अमित कुमार के साथियों का कहना था कि अगर वो कोई बड़े अधिकारी होते तो उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती करा दिया गया होता, लेकिन वो सिर्फ एक कॉन्स्टेबल थे और इसीलिए सही समय पर उन्हें इलाज नहीं मिला।

अमित कुमार की मौत के बाद दिल्ली के मुखिया ने क्या लिखा था, वो देखिए – “अमित जी अपनी जान की परवाह ना करते हुए कोरोना की इस महामारी के समय हम दिल्ली वालों की सेवा करते रहे। वे खुद करोना से संक्रमित हो गए और हमें छोड़ कर चले गए। उनकी शहादत को मैं सभी दिल्लीवासियो की ओर से नमन करता हूँ। उनके परिवार को 1 करोड़ रुपए की सम्मान राशि दी जाएगी।” उन्होंने LG के ट्वीट को कोट करते हुए ये वादा किया था। देखिए:

32 वर्षीय अमित कुमार कोरोना पॉजिटिव साबित होने के मात्र 6 घंटे बाद ही चल बसे थे। उन्होंने साँस लेने में तकलीफ, बुखार और कफ की शिकायत की थी। उनकी मौत के बाद पूर्वी दिल्ली के सांसद गौतम गंभीर ने कहा था कि दिल्ली प्रशासन की गलती से ये हुआ है। उन्होंने अमित कुमार के बच्चे को अपने बच्चे की तरफ देखभाल का भरोसा दिया था। ‘गौतम गंभीर फाउंडेशन’ ने तो थोड़ी-बहुत मदद की भी, लेकिन प्रदेश सरकार निष्क्रिय हो गई।

अमित कुमार के बारे में बता दें कि वो हरियाणा के सोनीपत के रहने वाले थे। उनका एक चार साल का बेटा है। भारत नगर स्थित पुलिस थाने में उनकी ड्यूटी थी। बगल में ही स्थित गाँधी नगर में वो अपने एक दोस्त के साथ एक किराए के फ़्लैट में रहते थे। ‘क्राइम रिकार्ड्स यूनिट’ में उनकी ड्यूटी लगी हुई थी। जब वो बीमार हुए, तब भी वो ड्यूटी पर ही थे। उससे पहले 36 पुलिसकर्मी दिल्ली में कोरोना संक्रमित हुए थे, लेकिन किसी की मौत होने का ये पहले मामला था।

ये भी याद दिलाना ज़रूरी है कि एक बलिदानी पुलिसकर्मी के परिवार को दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर करने वाली दिल्ली सरकार ने निर्भया के नाबालिग बलात्कारी को एक सिलाई मशीन और 10,000 रुपए दिए थे। दिल्ली सरकार के ‘महिला एवं बाल विकास’ ने एक महिला के बलात्कारी को ये इनाम दिया था। जेल से छूटने के बाद उसे और उसके परिवार को सरकारी खर्चे पर दिल्ली लाया गया था।

फिर अमित कुमार जैसे रक्षक के परिवार से दिल्ली की AAP सरकार को क्या दिक्कत है? जब अमित कुमार कोरोना संक्रमित थे तो सुबह से उनके साथ उन्हें कई अस्पतालों में लेकर गए थे, लेकिन किसी ने भर्ती नहीं किया। 8-9 अस्पतालों में उनके साथ उन्हें लेकर भटके। उस समय दिल्ली सरकार कुछ नहीं कर पाई, लेकिन मृत्यु के बाद मुआवजे का ऐलान कर के वाहवाही बटोर ली। वो मुआवजा, जो अब तक नहीं मिला है।

जम्मू एयरपोर्ट पर ड्रोन से आतंकी हमला, पठानकोट दोहराने की साजिश: 2 आतंकी गिरफ्तार

जम्मू के एयरपोर्ट में रविवार (27 जून 2021) को दो बड़े विस्फोट हुए। इससे वहाँ अफरा-तफरी मच गई। देर रात करीब 2 बजे हुए इस धमाके के बाद बम डिस्पोजल स्क्वाड और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुँच गई।

इलाके को सील कर जाँच शुरू कर दी गई है। हमले के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया है। शुरुआती जाँच में माना जा रहा है कि ऐसा करके पाकिस्तान ने 2016 में हुए पंजाब के पठानकोट हमले को दोहराने की कोशिश की है।

पहले विस्फोट के कारण हवाईअड्डे के तकनीकी क्षेत्र में एक इमारत की छत गिर गई। धमाका इतना तेज था कि इसकी आवाज दो किलोमीटर दूर तक सुनी गई। दूसरा विस्फोट जमीन पर हुआ। न्यूज 18 ने सूत्रों के हवाले से इस विस्फोट में दो लोगों के घायल होने का दावा किया है।

न्यूज 18 की रिपोर्ट से उलट रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि जम्मू वायु सेना अड्डे में धमाके से कोई जवान हताहत नहीं हुआ है और न ही कोई साजो-सामान की हानि हुई है। मामले की जाँच चल रही है।

इस मामले में एयरफोर्स ने ट्वीट किया, “जम्मू एयर फोर्स स्टेशन के तकनीकी क्षेत्र में रविवार (27 जून 2021) की सुबह दो कम तीव्रता वाले विस्फोट की सूचना मिली। पहले विस्फोट से एक इमारत की छत को मामूली क्षति हुई है, जबकि दूसरा खुले क्षेत्र में हुआ।”

दो आतंकी भी गिरफ्तार

रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को गिरफ्ताऱ किया है। इसमें से एक के पास से 4.7 किलो आईई़डी मिला है। एक आतंकी लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी है।

पठानकोट हमले को दोहराने की साजिश

रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती जाँच से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आतंकी 2016 में हुए पठानकोट हमले को जम्मू में दोहराना चाहते थे। गौरतलब है कि 2016 में जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े आतंकियों ने पठानकोट एयरबेस पर आत्मघाती हमला किया था। इसके बाद 36 घंटे तक चले एनकाउंटर के बाद 5 आतंकियों को ढेर कर दिया गया था। उस दौरान तीन जवान भी बलिदान हुए थे।