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SC ऑडिट पैनल की रिपोर्ट: केजरीवाल सरकार के ड्रामे के कारण खड़े रहे ऑक्सीजन टैंकर, दूसरे राज्यों को भी झेलनी पड़ी कमी

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए ऑडिट पैनल ने अपनी रिपोर्ट दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जब पूरा देश मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए संघर्षरत था, तब अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने 4 गुणा अधिक ऑक्सीजन की माँग की थी।

इस दौरान राजनैतिक लाभ लेने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने लगातार यह कहा था कि दिल्ली को उचित मात्रा में ऑक्सीजन नहीं प्राप्त हो रही है, इसके कारण दिल्ली को आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन प्रदान करनी पड़ी। यह सब तब हुआ जब बाकी राज्य लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के लिए लगातार प्रतीक्षा कर रहे थे।

ऑडिट पैनल की रिपोर्ट में PESO के द्वारा किए गए अध्ययन को शामिल किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्य टैंकर और कंटेनर की कमी से जूझ रहे थे, वहीं दिल्ली के 4 कंटेनर सूरजपुर आईनॉक्स में खड़े थे। ये कंटेनर इसलिए खड़े थे, क्योंकि दिल्ली में आपूर्ति आवश्यकता से ज्यादा थी और लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन को स्टोर करने की कोई जगह नहीं थी। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि दिल्ली द्वारा जितनी ऑक्सीजन की माँग की जा रही थी, वास्तविक आवश्यकता उससे कहीं कम थी।

PESO के द्वारा किए गए अध्ययन के कुछ निष्कर्ष

अब चूँकि दिल्ली के अस्पतालों में आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध थी। इसलिए ऑक्सीजन निस्तारण में अधिक समय लगने लगा। इससे रिलायंस जैसे अपूर्तिकर्ताओं को भी अपने कंटेनर प्राप्त करने और उन्हें रिफिल करके भेजने में औसत से अधिक समय लग गया।

अंतरिम रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दिल्ली न तो ऑक्सीजन के वास्तविक उपयोग का ऑडिट कर रही थी, न ही इसकी वास्तविक माँग का आकलन कर रही थी। इससे केंद्र सरकार उत्तरी भारत के अन्य राज्यों को ऑक्सीजन आवंटित कर सकने में असमर्थ थी, जहाँ अस्पतालों में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन (LMO) की वास्तविक आवश्यकता थी।

ऑडिट पैनल की रिपोर्ट के अनुसार, 5 मई से 11 मई के बीच पेट्रोलियम एंड ऑक्सीजन सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) द्वारा किए गए अध्ययन में यह भी पाया गया था कि दिल्ली के लगभग 80% प्रमुख अस्पतालों में 12 घंटे से अधिक समय तक LMO का स्टॉक था। औसत दैनिक खपत 282 मीट्रिक टन से 372 मीट्रिक टन के बीच पाई गई और दिल्ली में उस समय मांग की जा रही 700 मीट्रिक टन LMO के लिए पर्याप्त भंडारण सुविधाएँ नहीं थीं।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली सरकार द्वारा LMO की कमी का दावा किया गया था। उसके बाद जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को दिल्ली को 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति बनाए रखने का निर्देश दिया था। वहीं, केंद्र ने विशेषज्ञों के सुझाव के आधार पर 415 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति निश्चित करने की बात कही थी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 9 मई से केजरीवाल सरकार पड़ोसी राज्यों में वैकल्पिक भंडारण स्थान प्राप्त करने की कोशिश कर रही थी क्योंकि उनके पास LMO के लिए भंडारण स्थान समाप्त हो गया था। दिल्ली सरकार ने भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण एयर लिक्विड कंपनी से आवंटित LMO (150 एमटी) की तुलना में कम मात्रा में ऑक्सीजन उठाई थी। केजरीवाल सरकार ने कंपनी से पानीपत और रुड़की में अपने संयंत्रों में उनके लिए LMO स्टोर करने के लिए भी कहा था।

इतना ही नहीं, दिल्ली की AAP सरकार के कारण ओडिशा में लिंडे और JSW झारसुगुड़ा जैसे संयंत्रों को अपने टैंकर होल्ड करने और अन्य राज्यों को आपूर्ति में देरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। दरअसल, दिल्ली सरकार ने उपलब्ध और आवंटित ऑक्सीजन टैंकरों का उपयोग ही नहीं किया अथवा अस्पतालों में स्टोरेज की अनुपस्थिति के कारण टैंकर वापस कर दिए गए। गोयल गैसेस ने सूचित किया था कि दिल्ली के अस्पतालों के पास आवश्यक ऑक्सीजन उपलब्ध है और उनके पास कोई अतिरिक्त भंडारण सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए उनके टैंकर लंबे समय तक इंतजार करते रहे जिसके परिणामस्वरूप अन्य राज्यों को ऑक्सीजन आपूर्ति में कमी हो गई।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने केंद्र सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने पर हंगामा किया और दिल्ली की ऑक्सीजन को रोके रखने के लिए अन्य राज्यों को भी जिम्मेदार ठहराया था। केजरीवाल ने तो प्रोटोकॉल को भी तोड़ा और पीएम मोदी के साथ मुख्यमंत्रियों की गोपनीय बैठक के वीडियो फुटेज को टीवी पर दिखा दिया। मीटिंग में उन्हें यह कहते हुए देखा गया कि दिल्ली को ऑक्सीजन की बहुत अधिक जरूरत है। दिल्ली सरकार का राजनैतिक और मीडिया का ड्रामा इतना अधिक हो गया था कि अंततः सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल देना पड़ा।

ऑपइंडिया इम्पैक्ट: स्कूल में हिंदू बच्चों से नमाज पर एक्शन में NCPCR, फतेहपुर के DM-SP से रिपोर्ट तलब

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के नूरुल हुदा इंग्लिश मीडियम स्कूल में हिंदू बच्चों से नमाज पढ़वाने को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने डीएम और एसपी से तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट तलब की है। ऑपइंडिया ने इस स्कूल में अंग्रेजी की टीचर रहीं कल्पना सिंह के हवाले से पूरे प्रकरण को उजागर किया था। उन्होंने बताया था कि इस स्कूल में उमर गौतम का आना-जाना था। उसे यूपी एटीएस ने इस्लामी धर्मांतरण के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश करते हुए पिछले दिनों गिरफ्तार किया था।

आयोग ने शुक्रवार (25 जून 2021) को भेजे गए नोटिस में कहा है कि मीडिया में प्रकाशित खबर के आधार पर NCPCR ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम-2005 की धारा 13 (1) (j) के तहत स्वतः संज्ञान लिया है। इस पूरे मामले में जाँच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है। आयोग द्वारा DM से निम्न बिंदुओं पर जवाब देने के लिए कहा गया है;  

  1. क्या विद्यालय में पढ़ने वाले हिन्दू धर्म के बच्चों को किसी अन्य धर्म की उपासना में शामिल किया गया?
  2. क्या बच्चों को अन्य संप्रदाय की पूजा अर्चना में शामिल करने से पहले उनके अभिभावकों से अनुमति ली गई?
  3. अगर स्कूल में पढ़ने वाले किसी बच्चे का धर्मांतरण किया गया है तो उसकी जानकारी
NCPCR द्वारा जारी किया गया नोटिस

NCPCR ने इस मामले में प्रथम दृष्ट्या यह भी स्वीकार किया है कि यह पूरा मामला भारत के संविधान के अनुच्छेद 28(3) का उल्लंघन है। इस मामले में आयोग ने त्वरित कार्रवाई करने के लिए कहा है और यह भी आदेशित किया है कि इस कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट 3 दिनों के भीतर उसे सौंपी जाए।

NCPCR ने फतेहपुर के जिला पुलिस अधीक्षक को भी इस प्रकरण में की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट आयोग को 3 दिन के भीतर भेजने के लिए कहा है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि किस आधार पर कल्पना सिंह के द्वारा की गई शिकायत पर FR लगाया गया?

NCPCR द्वारा जारी किया गया नोटिस

ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश ATS ने मूक-बधिर बच्चों और महिलाओं का धर्मांतरण करने वाले गैंग का पर्दाफाश कर गिरफ्तारी की थी। गिरफ्तार किए गए मौलाना में से एक मोहम्मद उमर गौतम को लेकर फतेहपुर के नूरुल हुदा स्कूल में अंग्रेजी की टीचर रही कल्पना सिंह ने नया खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि उन पर भी धर्मांतरण का दबाव बनाया गया था। साथ ही हिंदू बच्चों को उर्दू और अरबी पढ़ाने का विरोध करने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था।

मुस्लिम प्रोफेसर के संपर्क में आकर MBA पास ऋचा बनी माहीन अली, लौटकर घर नहीं आई: सैलरी से मस्जिद को देती है ₹75000

धर्मांतरण रैकेट के सामने आने के बाद पूरे यूपी भर से हैरान करने वाली बातें निकलकर सामने आ रही हैं। धर्मांतरण मामले में जारी हुई लिस्ट में ऋचा देवी का भी नाम दर्ज है। बताया जाता है कि 2018 में 33 महिलाओं ने धर्मांतरण किया। इन्हें ‘शाइनिंग स्टार्स’ का नाम दिया गया था। घाटमपुर की 26 वर्षीय ऋचा ने कानपुर और प्रयागराज से पढ़ाई की। सिविल सर्विसेज की तैयारी के दौरान वह एक मुस्लिम प्रोफेसर के संपर्क में आई और उसने अपना धर्म बदल दिया। नया नाम रखा गया माहीन अली। 

ऋचा उर्फ माहीन एक कंपनी में जॉब करती है और परिवार से अलग नोएडा में रहती है। गुरुवार (जून 24, 2021) को एटीएस छात्रा के घर पहुँच कर जानकारी जुटाई। परिजनों के मुताबिक जब से ऋचा ने इस्लाम अपनाया है तब से वो घर नहीं आई है। परिजनों का कहना है कि अगर अब लौटकर आई भी तो स्वीकार नहीं करेंगे।

जानकारी के मुताबिक ऋचा को इस तरह से मोटिवेट किया गया कि उसने परिवार से हर रिश्ता तोड़ दिया और हर महीने मिलने वाली सैलरी से 75,000 रुपए मस्जिद में दान करती है। उसने परिजनों के मोबाइल नंबरों को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया है। इतना ही नहीं उसने सोशल मीडिया पर भी परिवार और रिश्तेदारों को ब्लॉक कर दिया है। इसके चलते उसका हाल खबर भी परिजनों को नहीं मिल पाता है। उसका मोबाइल नंबर और नोएडा में कहाँ रहती है यह जानकारी परिजनों ने एटीएस से साझा की है।

मुस्लिम धर्म अपनाने वाली ऋचा अब ट्रेनर बन गई है। अब वह खुद छात्राओं और महिलाओं को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रही है। इस संबंध में भी जाँच एजेंसियों को कई अहम सबूत मिले हैं।

इसके अलावा बताया जा रहा है कि आरोपित उमर गौतम, भगोड़े इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक से भी मिल चुका है। ये भी कहा जा रहा कि उमर, जाकिर के करीबी सहयोगियों में से एक है। उमर को विदेशों से फंडिंग होती थी और इनके आतंकी संगठन से भी संबंध हैं।

धर्मांतरण के दोनों आरोपित इस वक्त पुलिस की रिमांड पर हैं और उनसे लगातार पूछताछ कर रही है। आरोप है कि इन दोनों आरोपितों ने एक हजार से ज्यादा लोगों का धर्म परिवर्तन करवाया है। एटीएस के मुताबिक, उमर और जहाँगीर न सिर्फ लालच, बल्कि डरा-धमका कर भी धर्म परिवर्तित करवाते थे।

गौरतलब है कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के नोएडा में ए़टीएस की टीम ने धर्मान्तरण कराने वाले दो मौलानाओं को गिरफ्तार किया। इसमें से एक उमर गौतम पहले हिंदू ही था। वह करीब 30 साल पहले धर्मान्तरण कर मुस्लिम बन गया था। इसके बाद से ही वह दिल्ली के जामिया नगर इलाके में इस्लामिक दावा सेंटर चला रहा था। यहीं से धर्मान्तरण का सारा खेल खेला जाता है।

गिरफ्तार किए गए मोहम्मद उमर गौतम को लेकर फतेहपुर के एक स्कूल में अंग्रेजी की टीचर रही कल्पना सिंह ने खुलासा करते हुए बताया था कि उन पर भी धर्मांतरण का दबाव बनाया गया था। हिंदू बच्चों को उर्दू और अरबी पढ़ाने का विरोध करने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था।

फतेहपुर की कल्पना सिंह के अनुसार वह नूरुल हुदा इंग्लिश मीडियम स्कूल अंग्रेजी की टीचर थीं। उन्होंने बताया कि उनके स्कूल में भी उमर गौतम का आना-जाना लगा रहता था। फरवरी 2020 में भी वह स्कूल आया था। उसके साथ 20-25 अन्य मौलाना भी थे। उन मौलानाओं ने कल्पना पर भी धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया था।

3 महीने-10 बार मालिक, अनिल देशमुख को दिए ₹4 करोड़: रिपोर्ट्स में दावा, ED ने नागपुर-मुंबई के ठिकानों पर मारे छापे

महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के नागपुर और मुंबई के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने छापा मारा है। एजेंसी एनसीपी नेता के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जाँच कर रही है। इस बीच ईडी सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बड़ा दावा किया गया है। इसके मुताबिक मुंबई के 10 बार मालिकों ने तीन महीने के भीतर देशमुख को कथित तौर पर 4 करोड़ रुपए दिए थे।

जानकारी के मुताबिक, देशमुख के ख़िलाफ़ दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नए खुलासे होने के बाद ईडी 4 जगह छापेमारी कर रही है। इसमें देशमुख का नागपुर वाला आवास भी शामिल है। इसके अलावा जाँच एजेंसी मुंबई में देशमुख के पर्सनल असिस्टेंट कुंदन शिंदे और पर्सनल सेक्रेट्री संजीव पलांदे के घर भी छापेमारी कर रही है। इस मामले में ईडी ने अब तक 10 बार मालिकों के बयान रिकॉर्ड किए हैं। इससे पहले ED देशमुख के घर पर 25 मई को छापेमारी कर चुकी है। ED से पहले CBI ने भी उनके 12 ठिकानों पर छापे मारे थे

बता दें कि देशमुख के ख़िलाफ़ वसूली का यह मामला इसी साल मार्च में खुला था। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र में दावा किया था कि अनिल देशमुख ने निबंलित एपीआई सचिन वाजे को मुंबई के 1750 रेस्तरां और बार से 100 करोड़ रुपए वसूलने का टारगेट दिया था।

इन आरोपों को देशमुख ने सिरे से नकार दिया था। लेकिन इस वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। ईडी ने अप्रैल में सीबीआई द्वारा दर्ज प्राथमिकी के आधार पर देशमुख के खिलाफ कथित तौर पर अवैध रिश्वत लेने का मामला दर्ज किया था। सीबीआई ने कहा था कि देशमुख ने अनुचित लाभ हासिल करने के लिए अपने आधिकारिक पद का इस्तेमाल किया और सिंह के आरोप के अनुसार मुंबई पुलिस में तबादलों और पोस्टिंग को भी प्रभावित किया।

उल्लेखनीय है कि जिस निलंबित पुलिसकर्मी सचिन वाजे को टारगेट देने की बात कही गई थी उसके खिलाफ एंटीलिया बम केस और मनसुख हिरेन की मौत मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी जाँच कर रही है। वाजे ने NIA कोर्ट में एक पत्र जमा किया था जिसमें देशमुख के विरुद्ध लगाए गए सभी आरोपों को सच कहा था। साथ ही शिवसेना नेता व परिवहन मंत्री अनिल परब पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। वाजे का कहना था कि देशमुख ने पुलिस विभाग में उसकी बहाली के लिए 2 करोड़ रुपए देने को कहा था।

‘देवी-देवताओं की मूर्तियाँ फेंकी, अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए’: हिंदू महिला पर इस्लाम कबूलने का दबाव, 3 गिरफ्तार

गुजरात पुलिस ने गुजरात धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2021 के तहत एक हिंदू महिला को जबरन इस्लाम में परिवर्तित करने के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात सरकार द्वारा कानून पारित किए जाने के बाद से गुजरात पुलिस द्वारा लव जिहाद विरोधी कानून के तहत यह तीसरा मामला दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 23 साल की एक महिला ने बुधवार (जून 23, 2021) को वडोदरा के फतेहगंज थाने में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें पति मोहिब पठान पर जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करने का आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता ने पुलिस को बताया कि वह पहली बार 2018 में आरोपित से मिली थी, जब वह उसकी ट्यूशन कक्षाओं में जाती थी। पीड़िता ने बताया कि दोनों ने एक-दूसरे का फोन नंबर लिया और आपस में बातचीत करने लगे।

इसके अलावा, महिला ने कहा कि पठान ने उसे उससे शादी करने के लिए कहा और उसे आश्वासन दिया कि उसे उसके धर्म का पालन करने की अनुमति दी जाएगी। इस जोड़े ने अगस्त 2020 में शादी का पंजीकरण कराया था, जिसके बाद वह पठान के साथ उसके घर पर रहती थी।

महिला ने अपनी शिकायत में पठान पर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया और मना करने पर उसकी पिटाई की। पुलिस ने बताया कि शादी के एक महीने बाद पठान ने उसे अपना नाम बदलने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया। बाद में, पठान ने एक काजी को बुलाया और इस्लाम के अनुसार निकाह की रस्में निभाईं।

हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ फेंक दीं

पीड़ित महिला ने यह भी आरोप लगाया कि पठान ने उसे उसके धर्म के अनुसार पूजा करने की अनुमति नहीं दी और उसके द्वारा लाई गई देवी-देवताओं की मूर्तियों को फेंक दिया। महिला ने शिकायत में पठान के पिता इम्तियाज पठान और बड़े भाई मोहसिन पठान का भी नाम लिया है।

महिला ने अपनी शिकायत में कहा कि जब वह घर पर अकेली थी तो उसके बड़े भाई मोहसिन ने उससे छेड़छाड़ करने की कोशिश की थी। महिला ने कहा कि जब उसने इसके बारे में बताया तो उसने इसका कोई विरोध नहीं किया। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि पठान ने बच्चे का नाम शिव रखने के बाद उसकी पिटाई की थी। बुधवार को पठान फिर से हिंसक हो गया और महिला ने घर छोड़ कर पुलिस से संपर्क किया।

शिकायत के बाद पुलिस ने मामले के तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। वडोदरा पुलिस ने कहा कि वे यह जानने के लिए जाँच कर रहे हैं कि घटना में कोई और शामिल तो नहीं है। एसीपी परेश भेसनिया ने कहा कि आरोपितों पर आईपीसी की धारा 354, 498-ए और 377 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

गुजरात सरकार ने हाल ही में विधानसभा में गुजरात धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2021 पारित किया था, जिसमें “विवाह द्वारा जबरन धर्मांतरण” पर रोक लगाई गई थी। यह अधिनियम गुजरात विधानसभा के हाल ही में समाप्त हुए बजट सत्र में पारित किया गया था और राज्यपाल आचार्य देवव्रत द्वारा अनुमोदित किया गया था।

नए कानून के तहत दो और मामले

गुजरात पुलिस पहले ही कानून के लव जिहाद को खत्म करने के लिए दो अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार कर चुकी है। 19 जून को, गुजरात पुलिस ने संशोधित अधिनियम के तहत पहला मामला दर्ज किया और वडोदरा के तरसाली इलाके में एक परिवार के पाँच लोगों सहित 6 लोगों को गिरफ्तार किया। इस मामले में एक मुस्लिम युवक ने ईसाई बनकर महिला को प्रेम जाल में फँसाया और फिर उसके साथ दुष्कर्म कर उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें खींच लीं। बाद में इन्हीं तस्वीरों के जरिए उसने जबरन निकाह किया और उसका गर्भपात करवाता रहा।

एक अन्य मामले में, इमरान अंसारी नाम के एक 23 वर्षीय व्यक्ति को गुजरात पुलिस ने 19 वर्षीय जैन लड़की के अपहरण और बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया था। आरोपित ने पीड़िता के साथ ‘रोमांटिक संबंध’ बनाकर उसे बहकाया। पश्चिम बंगाल के रहने वाले अंसारी ने कथित तौर पर 10 जून को लड़की का अपहरण कर लिया था।

पीड़िता के घर से लापता होने के बाद मामला सामने आया था। इसके बाद लड़की के परिवार ने गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई और उसके लापता होने के पीछे अंसारी का नाम लिया। आरोपित पहले पीड़िता को राजस्थान के अजमेर और बाद में मध्य प्रदेश ले गया। आरोपित ने पीड़िता का यौन शोषण भी किया था।

‘बाबा का ढाबा’ वाले कांता प्रसाद को आत्महत्या के लिए उकसाया गया? यूट्यूबर गैंग का है हाथ? पुलिस में शिकायत दर्ज

“बाबा का ढाबा” के मालिक कांता प्रसाद घर लौट आए हैं। वो सफदरजंग अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने शराब के साथ नींद की गोलियाँ ली थीं और आत्महत्या की कोशिश की थी। कांता प्रसाद मतलब “बाबा का ढाबा” के मालिक के घर लौटने से बड़ी खबर है उनका यूट्यूबर (YouTuber) गौरव वासन पर आरोप लगाना।

मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कांता प्रसाद ने पुलिस के सामने अपना बयान दर्ज कराया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कई यूट्यूबर उन्हें कॉल करते थे। कॉल करके उनसे यूट्यूबर गौरव वासन से माफी माँगने के लिए कहते थे। इसी कारण से अवसाद में चले गए थे और आत्महत्या की कोशिश की थी।

“बाबा का ढाबा” के मालिक कांता प्रसाद और उनके द्वारा यूट्यूबर गौरव वासन पर लगाए गए आरोप के मामले में अभी तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। पुलिस शुरुआती जाँच में उन यूट्यूबर की भूमिका की जाँच कर रही है, जो कांता प्रसाद को कॉल करते थे।

दिल्ली पुलिस के डीसीपी (दक्षिण जिला) अतुल कुमार ठाकुर ने मीडिया को बताया है कि 81 वर्षीय कांता प्रसाद की हालत स्थिर है और वह घर वापस आ गए हैं।

कांता प्रसाद के बेटे ने इससे पहले पुलिस को बताया था कि उसके पिता ने शराब और नींद की गोलियां खाई थीं। उनकी पत्नी बादामी देवी ने कहा था कि उन्होंने मालवीय नगर में अपना नया रेस्तरां बंद कर दिया था, जो पिछले साल दिसंबर में खुला था, और अपने पुराने सड़क किनारे स्टॉल पर वापस चले आए थे क्योंकि नई दुकान को चलाने की लागत लगभग 1 लाख रुपए थी, जबकि आय थी केवल 30,000 रुपए के आसपास।

जिस वीडियो से फेमस, उसी यूट्यूबर गौरव वासन पर आरोप

‘बाबा का ढाबा’ के मालिक कांता प्रसाद का आर्थिक तंगी के कारण रोता हुआ वीडियो पिछले साल 2020 में इंटरनेट पर वायरल हुआ था। यूट्यूबर गौरव वासन द्वारा शेयर किए गए वीडियो में वह असहाय दिख रहे थे। इस वीडियो के वायरल होने के बाद उनका ढाबा चल निकला। लेकिन कुछ दिनों बाद ही कहानी में ट्विस्ट आ गया था।

कांता प्रसाद ने यूट्यूबर गौरव वासन पर धोखाधड़ी, विश्वासघात, पैसों के हेर-फेर, आपराधिक साजिश का आरोप लगाया था। इसके अलावा वासन पर यह भी आरोप लगा था कि उन्होंने जानबूझकर केवल अपने और अपने परिवार/दोस्तों के बैंक डिटेल और मोबाइल नंबर दानदाताओं के साथ साझा किए और कांता प्रसाद को कोई भी जानकारी दिए बिना विभिन्न प्रकार के भुगतानों के माध्यम से दान की भारी राशि इकट्ठा की।

‘कुरान को UP पुलिस ने नाले में फेंका’ – TheWire ने चलाई फर्जी खबर, बाराबंकी मस्जिद विध्वंस मामले में FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश पुलिस ने बाराबंकी अवैध मस्जिद विध्वंस मामले के संबंध में एक वीडियो डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से गलत सूचना का प्रचार करके समाज में दुश्मनी फैलाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल- द वायर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

गुरुवार (जून 24, 2021) को, बाराबंकी पुलिस ने कहा कि उन्होंने पोर्टल और द वायर के तीन पत्रकारों – सिराज अली, मोहम्मद अनीस और मुकुल एस चौहान के खिलाफ मामला दर्ज किया है। एक अन्य व्यक्ति की पहचान मोहम्मद नईम के रूप में की गई है, जिसने हाल ही में बाराबंकी में एक अवैध मस्जिद को गिराए जाने पर झूठा प्रचार किया था।

दिलचस्प बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस और द स्क्रॉल ने मोहम्मद अनीस को द वायर का पत्रकार बताया, हालाँकि एफआईआर में उसकी पहचान एक स्थानीय के रूप में हुई है। वीडियो में मोहम्मद अनीस को एक स्थानीय के रूप में दिखाया गया है, जो मस्जिद विध्वंस के बारे में दावा कर रहा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 153, 153-ए, 505 (1) (बी), 120 बी (आपराधिक साजिश) और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया।

23 जून को द वायर ने वीडियो डॉक्यूमेंट्री में दावा किया था कि जिला प्रशासन ने शहर में 100 साल पुरानी मस्जिद को अवैध रूप से ध्वस्त कर दिया। इसके लिए द वायर ने कुछ मुस्लिमों का साक्षात्कार लिया था, जिन्होंने दावा किया था कि वे मस्जिद की समिति के सदस्य थे। उन्होंने दावा किया था कि सदस्यों के पास इस बात का सबूत था कि संरचना कानूनी थी।

द वायर वीडियो में मोहम्मद अनीस

अपने डॉक्यूमेंट्री में, द वायर ने कहा था कि इलाके के मुस्लिमों ने मस्जिद के विध्वंस का विरोध किया था और कहा था कि पुलिस अधिकारियों ने लाठीचार्ज का सहारा लेकर इसे शांत किया था। द वायर ने दावा किया था कि बाराबंकी पुलिस ने विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया और उनके धार्मिक ग्रंथों को नाले में फेंक दिया।

वामपंथी पोर्टल द्वारा लगाए गए ऐसे आरोपों का खंडन करते हुए बाराबंकी पुलिस ने स्पष्ट किया कि द वायर द्वारा किए गए दावे झूठे थे। इसमें आगे कहा गया कि द वायर अपनी वेबसाइट पर अवैध मस्जिद के विध्वंस के बारे में गलत सूचना का प्रचार करके सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहा था।

बाराबंकी के जिलाधिकारी आदर्श सिंह ने गुरुवार रात एक बयान में कहा, “23 जून को, ऑनलाइन समाचार पोर्टल, द वायर ने अपने ट्विटर हैंडल पर रामसनेही घाट तहसील परिसर के बारे में एक वीडियो डॉक्यूमेंट्री शेयर किया। डॉक्यूमेंट्री में उन्होंने झूठी और निराधार जानकारी दिखाई है। वीडियो में कई गलत और निराधार बयान शामिल हैं, जिनमें एक यह भी है कि प्रशासन और पुलिस ने धार्मिक ग्रंथों को नाले और नदी में फेंक दिया। यह गलत है। ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस तरह की गलत सूचना के साथ द वायर समाज में वैमनस्य फैलाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है।”

तस्वीर साभार: बाराबंकी पुलिस

पुलिस अधीक्षक (बाराबंकी) यमुना प्रसाद ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री में मोहम्मद नईम नाम का एक व्यक्ति था, जिसने ‘धार्मिक पुस्तकों को नदी और नाले में फेंकने के झूठे दावे’ किए। मोहम्मद अनीस ने दावा किया था कि उनके कुरान और हदीस को सीवर में फेंक दिया गया था। अधिकारी ने कहा, “एक पुलिस अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज की गई है, जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। आगे की कार्रवाई चल रही है।”

द वायर वीडियो का स्क्रीनशॉट
द वायर का स्क्रीनशॉट

बाराबंकी मस्जिद विध्वंस

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में प्रशासन द्वारा क्षेत्र में 100 साल पुरानी लेकिन अवैध रूप से निर्मित ‘मस्जिद’ को गिराने के बाद विवाद छिड़ गया था। 17 मई को एसडीएम के निर्देश के बाद अवैध निर्माण को तोड़ा गया।

अधिकारियों ने जिले के राम सनेही घाट क्षेत्र में ‘तहसील’ परिसर के अंदर स्थित एक अवैध आवासीय संरचना की पुष्टि की थी। अधिकारियों के अनुसार, वहाँ रहने वाले लोगों को अपने दावे का समर्थन करने वाले दस्तावेज पेश करने के लिए कहा गया था, लेकिन नोटिस दिए जाने के बाद वे भाग गए।

हालाँकि, स्थानीय मुस्लिम संगठनों और विपक्ष ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि ‘मस्जिद’ कानूनी है। यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने जिला प्रशासन की कार्रवाई को अवैध बताते हुए इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

मुस्लिम संगठनों को झटका देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 2 अप्रैल को इस संबंध में दायर याचिका का निस्तारण कर दिया था, जिससे यह साबित हो गया था कि निर्माण अवैध था। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में दायर याचिका का निपटारा करने के बाद द वायर ने मामले के बारे में गलत सूचना फैलाई थी।

मोगा हत्याकांड: RSS के 25 स्वयंसेवकों ने बलिदान देकर खालिस्तानी आतंकियों की तोड़ी थी ‘कमर’

खालिस्तानी और जिहादी आतंकवाद हो या नक्सलवाद या फिर दुश्मन देशों की गुप्तचर एजेंसियाँ… आखिर इनमें साझा क्या है? उत्तर है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ इनका स्वभाविक और साझा दुश्मन है। देश में जब भी, जहाँ भी और किसी भी तरह की राष्ट्रविरोधी गतिविधि होती है, तो संघ स्वत: इनके सामने आ खड़ा होता है।

पंजाब में डेढ़ दशक तक चले आतंकवाद के दौर में भी संघ ने आतंकवाद को इस तरह नाकों चने चबवाए कि खाकी निक्कर डालने वाला हर व्यक्ति पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादियों का दुश्मन नम्बर वन बन गया और इसी का परिणाम निकला मोगा में 25 जून, 1989 को संघ की शाखा पर हुआ आतंकी हमला, जिसमें 25 स्वयंसेवकों ने अपना जीवन बलिदान कर देश की एकता-अखण्डता को सम्बल प्रदान किया।

इस घटना के बारे में शहीद स्मारक से जुड़े पदाधिकारी डॉ राजेश पुरी बताते हैं कि आतंकवादियों ने संघ का ध्वज उतारने के लिए कहा था, पर स्वयंसेवकों ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और उनको रोकने का यत्न किया था, पर किसी की बात न सुनते हुए आतंकवादियों ने अन्धाधुन्ध फायरिंग करनी शुरू कर दी थी, जिसमें 25 कीमती जानें गईं थीं। इस घटना ने न केवल पंजाब में हिन्दू-सिख एकता को नवजीवन दिया बल्कि आतंकवाद पर भी गहरी चोट की क्योंकि घटना के अगले ही दिन उस जगह दोबारा शाखा लगी, जिससे आतंकियों के हौसले पस्त हो गए और हिन्दू-सिख एकता जीत गई।

25 जून, 1989 को (अब के शहीदी पार्क) रोजाना की ही तरह भारी तदाद में शहर निवासी सैर के लिए आए थे। रोजाना की तरह उस दिन भी जहाँ नागरिक पार्क में सैर का आनन्द ले रहे थे, वहीं दूसरी तरफ शाखा भी लगी हुई थी। इस दिन शहर की सभी शाखाएँ नेहरू पार्क में एक जगह पर लगी थीं और संघ का एकत्रीकरण था। सुबह 6 बजे संघ का विचार शुरू हुआ तो अचानक 6.25 पर सभा को सम्बोधित कर रहे स्वयंसेवकों पर आतंकवादियों ने आकर हमला कर दिया, हर तरफ भगदड़ मच गई। गोलियों की बरसात रुकने के बाद हर तरफ खून का तालाब दिखाई दे रहा था। घायल स्वयंसेवक तड़प रहे थे। गोलियाँ लगने के कारण कई सेवकों के शरीर भी बेजान हो गए और कईयों ने अस्पताल में जाकर अन्तिम सांस ली।

इस गोली कांड के दौरान जहाँ 25 लोग बलिदान हो गए, वहीं शाखा में शामिल लोगों के साथ आसपास के करीब 31 लोग घायल भी हो गए थे। इस गोली कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था लेकिन फिर भी आरएसएस सेवकों ने हिम्मत नहीं छोड़ी और अगले ही दिन 26 जून, 1989 को फिर से शाखा लगाई। बाद में नेहरू पार्क का नाम बदल कर शहीदी पार्क कर दिया गया, जो आज देशभक्तों के लिए तीर्थस्थान बना हुआ है।

अमर बलिदानी

इस गोली कांड में बलिदानी होने वालों में लेखराज धवन, बाबू राम, भगवान दास, शिव दयाल, मदन गोयल, मदन मोहन, भगवान सिंह, गजानन्द, अमन कुमार, ओमप्रकाश, सतीश कुमार, केसो राम, प्रभजोत सिंह, नीरज, मुनीश चौहान, जगदीश भगत, वेद प्रकाश पुरी, ओमप्रकाश और छिन्दर कौर (पति-पत्नी), डिंपल, भगवान दास, पण्डित दुर्गा दत्त, प्रह्लाद राय, जगतार राय सिंह, कुलवन्त सिंह शामिल हैं।

खालिस्तानी आतंक की गोली से बलिदान हुए वीर

गोली काण्ड में प्रेम भूषण, राम लाल आहूजा, राम प्रकाश कांसल, बलवीर कोहली, राज कुमार, संजीव सिंगल, दीनानाथ, हंसराज, गुरबख्श राय गोयल, डॉ. विजय सिंगल, अमृत लाल बांसल, कृष्ण देव अग्रवाल, अजय गुप्ता, विनोद धमीजा, भजन सिंह, विद्या भूषण नागेश्वर राव, पवन गर्ग, गगन बेरी, रामप्रकाश, सतपाल सिंह कालड़ा, करमचन्द और कुछ अन्य स्वयंसेवक घायल हुए थे।

निहत्थे दंपति ने आतंकियों को ललकारा

गोलीकाण्ड के बाद छोटे गेट से भाग रहे आतंकवादियों को वहाँ मौजूद एक साहसी पति-पत्नी ओम प्रकाश और छिन्दर कौर ने बड़े जोश से ललकारा और पकड़ने की कोशिश की लेकिन एके-47 से हुई गोलीबारी ने उनको भी मौत की नीन्द सुला दिया। साथ ही आतंकवादियों को पकड़ते समय पास के घरों के पास खेल रहे 2-3 बच्चों में से डेढ़ साल की डिम्पल को भी मौत ने अपनी तरफ खींच लिया।

मौत के सामने डटे स्वयंसेवक

जब सभा हो रही थी तो अचानक पिछले गेट से भाग-दौड़ की आवाज सुनाई दी। पता चला कि वहाँ से आतंकी अन्दर घुस आए हैं बावजूद इसके कोई भागा नहीं और उनका डटकर सामना किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आतंकवादियों ने आते ही सभा में स्वयंसेवकों से ध्वज उतारने के लिए कहा लेकिन स्वयंसेवकों से साफ मना कर दिया। इस पर आतंकवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी।

10 साल की उम्र में गोलीकांड आँखों से देखने वाले एक नौजवान नितिन जैन ने बताया कि उनका घर शहीदी पार्क के बिल्कुल सामने था। रविवार का दिन होने के कारण वह सुबह पार्क में चला गया। जैसे ही आतंकवादियों ने धावा बोलकर गोलियाँ चलानी शुरू कीं, वह धरती पर लेट गया और जब आतंकवादी भाग रहे थे तो सभी ने उनको पकड़ने की कोशिश की। नितिन भी इसको खेल समझ कर भागने लगा, तो एक व्यक्ति ने उसको पकड़ कर घर भेजा।

दंगा चाहने वाले भी हुए निराश

ये दिन वे थे, जब दिल्ली सहित देश के सिख विरोधी दंगों की आग में अभी तपिश जारी थी। आतंकियों ने तो संघ पर हमला कर हिन्दू-सिख एकता में दरार डालने का प्रयास किया ही, साथ में कुछ दंगा सन्तोषियों ने भी कहना शुरू कर दिया कि सिखों ने अब लगाया है शेर की पूँछ को हाथ। संघ ने न तो देश में सांप्रदायिक माहौल खराब होने दिया और न ही शहर में। अगले ही दिन शाखा लगा कर आतंकियों व देशविरोधी ताकतों को संदेश दिया कि हिन्दू-सिख एकता को कोई तोड़ नहीं सकता और न ही सिख पंथ के नाम पर चलने वाला आतंकवाद पंजाबी एकता को तोड़ सकता है।

25 जून के अगले दिन संघ के स्वयंसेवक गीत गा रहे थे – कौन कहंदा हिन्दू-सिख वक्ख ने, ए भारत माँ दी सज्जी-खब्बी अक्ख ने’ अर्थात कौन कहता है कि हिंदू-सिख अलग-अलग हैं, ये तो भारत माता की बाईं और दाईं आँख के समान हैं। संघ के इस गीत को सुन कर आतंकियों ने भी माथा पीट लिया था।

अगली ही सुबह जब स्वयंसेवकों की ओर से शाखा का आयोजन किया गया तो उस दौरान बलिदानियों की याद को जीवित रखने के लिए शहीदी स्मारक बनाने का संकल्प लिया गया। इसी कार्य के अधीन मोगा पीड़ित मदद और स्मारक समिति का भी गठन हुआ।

मोगा बलिदानियों की याद में शहीदी पार्क

शहीदी स्मारक की नींव का पत्थर 9 जुलाई को माननीय भाऊराव देवरस द्वारा रखा गया। इस स्मारक का उद्घाटन 24 जून, 1990 को रज्जू भैया द्वारा किया गया। आज भी हर साल बलिदानियों की याद में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है।

  • लेखक: राकेश सैन

दिल्ली सरकार ने ऑक्सीजन जरूरत को 4 गुना बढ़ा कर दिखाया… 12 राज्यों में इसके कारण संकट: सुप्रीम कोर्ट पैनल

दिल्ली को ऑक्सीजन की जितनी आवश्यकता थी, उससे चार गुना से अधिक बढ़ा कर दिखाया गया। यह कहीं और से नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट की ऑक्सीजन ऑडिट टीम से निकला आँकड़ा है। 25 अप्रैल से 10 मई तक दूसरे कोविड लहर के चरम के दौरान दिल्ली की सरकार ने ऐसा किया। इस आँकड़े के सार्वजनिक होने के बाद केजरीवाल सरकार कटघरे में खड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट की ऑक्सीजन ऑडिट टीम ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि दिल्ली को अतिरिक्त ऑक्सीजन की आपूर्ति ने अधिक कोरोना केस वाले 12 राज्यों में ऑक्सीजन की आपूर्ति में संकट पैदा कर दिया। SC द्वारा नियुक्त ऑक्सीजन ऑडिट सब-ग्रुप की रिपोर्ट में कहा गया है, “सकल विसंगति (लगभग चार गुना) थी। दिल्ली सरकार द्वारा दावा की गई वास्तविक ऑक्सीजन खपत (1140 MT) गणना की गई खपत से लगभग चार गुना अधिक थी।”

5 मई को कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के चरम के दौरान, शीर्ष अदालत की न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने केंद्र को दिल्ली को 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति बनाए रखने का निर्देश दिया था, जबकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विशेषज्ञों का हवाला देते हुए बताया था कि दिल्ली को लगभग 415 मीट्रिक टन LMO की आवश्यकता है। दिल्ली सरकार द्वारा ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी पर चिंता जताने के बाद यह निर्देश आया था।

हालाँकि, SC ने एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया की अध्यक्षता वाली ऑडिट टीम को मुंबई में लागू ‘ऑक्सीजन के इष्टतम उपयोग’ के मॉडल की जाँच करने के लिए भी कहा था। सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतरिम रिपोर्ट में, सब-ग्रुप ने कहा कि उसने “NCTD की सटीक ऑक्सीजन आवश्यकता की गणना” करने के लिए एक प्रपत्र मसौदा तैयार किया और इसे 260 अस्पतालों में प्रसारित किया। सभी प्रमुख अस्पतालों सहित कम से कम 183 अस्पतालों ने ऑक्सीजन की खपत के आँकड़ों के साथ प्रतिक्रिया दी।

इसमें कहा गया कि दिल्ली सरकार के अनुसार 183 अस्पतालों में वास्तविक LMO खपत 1140 मीट्रिक टन थी, लेकिन अस्पताल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वास्तविक खपत केवल 209 मीट्रिक टन थी। अगर ऑक्सीजन आवंटन के लिए केंद्र द्वारा सुझाए गए फॉर्मूले को नियोजित किया जाता, तो 289 मीट्रिक टन की आवश्यकता होती और दिल्ली सरकार के फार्मूले के अनुसार यह 391 मीट्रिक टन होती।

सब-ग्रुप ने उल्लेख किया, “केंद्र सरकार द्वारा उपयोग किया जाने वाला सूत्र विशेषज्ञों के एक समूह द्वारा तैयार किया गया था और इसका उपयोग विभिन्न राज्यों को LMO आवंटन करने के लिए किया जाता है। इस फॉर्मूला का मानना है कि गैर-आईसीयू बेड में से केवल 50% ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। दिल्ली सरकार मानता है कि 100% गैर-आईसीयू बेड ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। गणना दोनों सूत्रों का उपयोग करके की गई थी।”

गौरतलब है कि अप्रैल-मई की अवधि के दौरान, राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन, उपलब्ध बेड और COVID-19 मरीजों के इलाज के लिए आवश्यक दवाओं की बड़ी कमी देखी गई थी। 20 अप्रैल, 2021 को, दिल्ली ने 24 घंटे की अवधि के दौरान लगभग 28,000 नए COVID-19 मामले दर्ज किए थे।

‘अपनी मर्जी से मंतोष सहनी के साथ गई, कोई जबरदस्ती नहीं’ – फजीलत खातून ने मधुबनी अपहरण मामले पर लगाया विराम

बिहार के मधुबनी जिले के बिस्फी थाना क्षेत्र के बलहा घाट निवासी फजीलत खातून के कथित अपहरण मामले में नया मोड़ आया है। फजीलत खातून ने इस मामले में वीडियो जारी कर बताया कि वो अपनी मर्जी से दलित लड़के मंतोष सहनी के साथ भागी है।

वीडियो में फजीलत ने बयान देते हुए कहा, “मैं अपनी और अपनी मम्मी-पापा की मर्जी से मंतोष सहनी के साथ भागी हूँ। मेरे साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। मुझे किसी ने अपहरण नहीं किया है। मेरे मम्मी-पापा हमेशा मुझे डाँटते रहते थे और कहते थे कि मंतोष सहनी के साथ भाग जा। वह बहुत पैसा वाला है, तुझे बहुत खुश रखेगा। मेरी मम्मी लोगों के बहकावे में आकर केस की है। वह मुझे फँसाना चाहती है, ताकि किसी भी तरह से मेरा घर बर्बाद हो और मैं उससे अलग हो जाऊँ।”

फजीलत ने आगे बताया, “मैं दो बार घर से भागी थी। पहली बार मंतोष मुझे वापस घर-परिवार के पास छोड़ गया। इसके बाद मम्मी मुझे टॉर्चर करने लगी कि क्यों आई घर पर। नहीं ले गया तुझे? फिर से भाग जा। इसके बाद वह मुझे मारने-पीटने लगी, गालियाँ देने लगी। बोलने लगी कि चली जा, क्यों आई है। फिर मैंने मंतोष सहनी को चलने के लिए बोला। वो नहीं आ रहे थे, फिर भी मैं उनको जबरदस्ती लेकर आई। पुलिस प्रशासन से निवेदन है कि वह मंतोष सहनी के घर-परिवार पर कोई कार्रवाई न करें। मैं अपनी म्ममी-पापा और चाचा-चाची के कहने पर आई हूँ। अब मैं वापस नहीं जाऊँगी, जाएगी तो लाश ही।”

उल्लेखनीय है कि आरोप लगाया जा रहा है कि मंतोष सहनी सहित कुल 4 लड़कों ने फजीलत खातून का अपहरण कर लिया। इस मामले में मजलिस मधुबनी बिस्फी की टीम  ने ‘पीड़ित’ परिवार से मिल कर परिवार को न्याय दिलाने और परिवार के साथ खड़े रहने का आश्वासन दिया। इसके साथ ही AIMIM बिहार के स्थानीय नेता लड़की के परिवार से मिल कर सख्त कार्रवाई की माँग की।

AIMIM ने इस बाबत प्रेस कॉन्फ्रेंस भी किया। हालाँकि अब फजीलत के बयान से पूरा मामला साफ होता नजर आ रहा है कि उसके साथ साथ किसी तरह की जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। वो अपने परिवार की मर्जी से मंतोष सहनी के साथ गई।