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‘ॐ से योग की शक्ति बढ़ेगी नहीं, अल्लाह कहने से घटेगी नहीं’: पतंजलि से भी ज्यादा ‘विद्वान’ बने कॉन्ग्रेस वाले सिंघवी, भूले विज्ञान

पूरे विश्व में सोमवार (जून 21, 2021) को 7वाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों का ही नतीजा है कि सितंबर 2014 में उन्होंने UNGA को सम्बोधित करते हुए इसका जिक्र किया और उसी साल दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र ने 177 देशों के समर्थन से 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया गया। लेकिन, कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी इन सबके दौरान ‘ॐ’ को बदनाम करने में लगे हैं।

आयुष मंत्रालय ने 2015 में प्रथम योग दिवस की तैयारियाँ की थी। अब जब 7 वर्षो से इसे मनाया जा रहा है, कॉन्ग्रेस इसे पचा ही नहीं पा रही है कि मोदी सरकार के प्रयासों से भारतीय परंपरा पूरे विश्व में स्वस्थ दिनचर्या के लिए योगदान दे रही है। तभी वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने ट्वीट कर लिखा, “ॐ के उच्चारण से ना तो योग ज्यादा शक्तिशाली हो जाएगा और ना अल्लाह कहने से योग की शक्ति कम होगी।”

अभिषेक मनु सिंघवी ने इस दौरान ये भी नहीं सोचा कि योग और ‘ॐ’ को बदनाम करने की कोशिश कर के वो न सिर्फ भारतीय पुरातन परंपरा का अपमान कर रहे हैं, बल्कि दुनिया भर में पीएम मोदी ने राष्ट्र के प्रति जो सकारात्मक माहौल बनाया है, उसमें नकारात्मकता घुसाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे वो अपना नुकसान तो कर ही रहे हैं, साथ ही अपनी पार्टी कॉन्ग्रेस के चुनावी भविष्य को भी अधर में डाल रहे हैं।

62 वर्षीय अभिषेक मनु सिंघवी के बारे में बता दें कि 2006 से लगातार राज्यसभा सांसद हैं। मारवाड़ी परिवार से ताल्लुक रखने वाले सिंघवी के पिता जैन इतिहास और संस्कृति में पारंगत थे, ऐसे में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो इन चीजों के प्रति जानकारी रखते होंगे। कैम्ब्रिज और हॉवर्ड से पढ़े व्यक्ति को जिम्मेदारी से बयान देना चाहिए। हालाँकि, उनका अश्लील वीडियो भी वायरल हो चुका है। कुछ दिनों पहले एक वर्चुअल सुनवाई में वो बिना पैंट के देखे गए थे।

सबसे पहले बता दें कि योग के साथ ‘ॐ’ शब्द का इस्तेमाल सामान्य है और ये सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है। हिन्दू धर्म के इस सबसे पवित्र शब्द को बौद्ध, जैन और सिख भी इस्तेमाल में लाते हैं। वैदिक संस्कृत से आया ‘ॐ’ उपनिषदों, शास्त्रों, पुराणों और संहिताओं का एक अभिन्न अंग है। योग की शिक्षा लेने वालों को सबसे पहले ‘ॐ’ का महत्व समझाया जाता। पूरे विश्व, स्वर्ग, पाताल और सम्पूर्ण संसार के एकत्व का प्रतीक है ‘ॐ’।

‘नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन’ के पोर्टल पर प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि ‘ॐ’ का उच्चारण करने से एक मानसिक सजगता का भाव आता है। साथ ही इससे शरीर को शांति भी मिलती है। साथ ही ये सेंसरी ट्रांसमिशन के प्रति संवेदनशीलता को भी बढ़ाता है। योग के जनक पतंजलि ने अपने सूत्र को ‘ॐ’ को ईश्वर बताया है। ‘ॐ’ शब्द से शरीर और मन पर प्रभाव को लेकर कई वैज्ञानिक अध्ययन हो चुके हैं।

सड़क छाप आशिक ने एसिड फेंका… 3 साल में 53 सर्जरी से भी बात नहीं बनी: कंगना ने बताया कैसे योग बना रंगोली का सहारा

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21जून) पर अपने परिवार की कुछ तस्वीरें शेयर करते हुए उनसे जुड़े योग के अनुभव बताए। उन्होंने माता-पिता, भाई-भाभी और बहन रंगोली चंदेल की स्टोरी इंस्टाग्राम पर शेयर की। बहन की स्टोरी साझा करते हुए कंगना ने बताया कि कैसे रंगोली के जीवन में एसिड अटैक के बाद अँधेरा छा गया था और वह योग ही था जिसने उनके लिए एक थेरेपी की तरह काम किया।

कंगना रनौत ने इंस्टाग्राम पर लिखा, “रंगोली की योग स्टोरी सबसे ज्यादा प्रेरणा देने वाली है, एक सड़क छाप आशिक ने रंगोली पर एसिड फेंका था, जब वो मुश्किल से 21 साल की थीं। उसे थर्ड डिग्री बर्न हुआ, उसका करीब आधा चेहरा झुलस गया था, एक आँख की रोशनी चली गई थी, एक कान पिघल गया था और ब्रेस्ट भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए थे। रंगोली की 2-3 साल में करीब 53 सर्जरी हुईं, लेकिन वो भी काफी नहीं थीं।”

एक्ट्रेस लिखती हैं,

“मुझे सबसे ज्यादा चिंता उनके मानसिक स्वास्थ्य की थी, क्योंकि उन्होंने बोलना छोड़ दिया था। हाँ, चाहें कुछ भी होता वो एक शब्द नहीं बोलती थीं, बस चीजों को एक टक लगाकर देखती रहती थीं। उस समय रंगोली एक एयरफोर्स ऑफिसर के साथ इंगेज्ड थीं, लेकिन जब उसने एसिड अटैक के बाद रंगोली का चेहरा देखा तो कभी लौटकर उसके पास वापस नहीं आया। लेकिन तब भी रंगोली की आँख में एक आँसू तक नहीं था और न ही उसने एक शब्द कहा था। मुझे डॉक्टर्स ने कहा था कि रंगोली शॉक में है, जिसके बाद उसे थैरेपी दी गईं, साइकेट्रिस्ट की मदद ली गई, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया, कोई मदद नहीं मिली। उस वक्त मुश्किल मैं 19 साल की थी, मैं अपने टीचर सूर्य नारायण के साथ योग करती थी और मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि यह जलने और मनोवैज्ञानिक आघात वाले रोगियों को भी रेटिना ट्रांसप्लांट रिकवरी और खोई हुई दृष्टि पाने में मदद कर सकता है।”

कंगना लिखती हैं कि जिस समय रंगोली के साथ यह घटना हुई, उस समय वह बस चाहती थीं कि रंगोली उनसे बात करे। इसलिए वो जहाँ भी जातीं, वहाँ रंगोली को अपने साथ ले जातीं। कंगना लिखती हैं, “यहाँ तक की योग क्लास के लिए भी मैं उन्हें ले जाती, उन्होंने मेरे साथ योग करना शुरू किया और मैंने उनमें एक कमाल का ट्रांसफॉर्मेशन देखा। न सिर्फ वो अपने दर्द और मेरे बुरे जोक्स पर रिएक्ट करने लगीं, बल्कि उनकी एक आँख की रोशनी भी वापस आने लगी। योग हर सवाल का जवाब है, क्या आपने अब तक उसे मौका दिया?”

बता दें कि अपने ऊपर हुए एसिड अटैक को लेकर रंगोली भी सोशल मीडिया पर ट्वीट कर चुकी हैं। 2019 में किए गए एक ट्वीट में उन्होंने बताया था कि कैसे एक आँख और स्तन को नुकसान होने के बाद उन्हें परेशानियाँ झेलनी पड़ीं।  उन्होंने कहा था, “अब भी मैं अपनी गर्दन को नहीं खींच पा रही हूँ, कभी-कभी त्वचा में खुजली इतनी भयंकर होती है कि ऐसा लगता है जैसे मैं मर गई हूँ… भारत में चौंकाने वाले एसिड अटैक सर्वाइवर्स की संख्या बहुत अधिक है, अपराधी कुछ ही हफ़्तों में ज़मानत पर बाहर आ गए, उन्हें इस तरह आज़ाद घूमते देखना बहुत पीड़ादायक होता है।”

‘पापा को क्यों जलाया’: मुकेश के 9 साल के बेटे ने पंचायत को सुनाया दर्द, टिकैत ने दी ‘इलाज’ करने की धमकी

टिकरी सीमा पर ‘किसान आंदोलन’ में मुकेश नाम के किसान को शराब पिला कर ज़िंदा जला दिया गया, ताकि उसे ‘शहीद’ बनाया जा सके। मुकेश की मौत के बाद हरियाणा के झज्जर स्थित बहादुरगढ़ के कसार गाँव में पंचायत हुई, जिसमें रोहतक लोकसभा क्षेत्र से सांसद अरविंद कुमार शर्मा भी मौजूद थे। पंचायत में मुकेश मुदगिल का बेटा राहुल भी पहुँच गया और सीधे सांसद के सामने बैठ गया। उसकी उम्र मात्र 9 साल है।

‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, राहुल ने पंचायत से कहा, “आज फादर्स डे है। सभी बच्चे अपने पापा को याद कर रहे हैं। मुझे भी आज मेरे पापा की याद सता रही है। मेरे पापा ने कभी मुझे नहीं डाँटा। मैंने कभी उन्हें किसी से झगड़ा करते हुए नहीं देखा। आप बस इसका जवाब दे दो कि मेरे पापा को क्यों जलाया?” पंचायत में सन्नाटे के बीच सांसद शर्मा ने आश्वासन दिया कि दोषियों को सज़ा मिलेगी।

उन्होंने सरकार से जवाब माँगा कि किसके कहने पर इतनी बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को हमारे घरों के सामने बिठा दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों की वेश में जब गुंडे गाँव के महिला-पुरुषों को तंग करेंगे तो विवाद होगा ही। ग्रामीणों ने उन अधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया, जिन्होंने आंदोलनकारियों की आड़ में अपराधियों को मुफ्त बिजली-पानी व अन्य सुविधाएँ दी। उनकी भी जाँच की माँग की गई।

पंचायत ने आंदोलनकारियों को बहादुरगढ़ से हटाने, मुकेश हत्याकांड सहित ‘किसान आंदोलन’ में हुई आपराधिक वारदातों की CBI जाँच कराने और मृतकों के परिजनों/गवाहों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के अलावा मुकेश के परिजनों में से किसी को सरकारी नौकरी देने की माँग सरकार के समक्ष रखी। सांसद ने इन मामलों को लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात करने का आश्वासन दिया। उधर इस मामले के मुख्य कृष्ण को जेल भेज दिया गया है।

झज्जर के एसपी राजेश दुग्गल ने कहा है कि इस घटना की जाँच के लिए SIT बनाई गई है, जिसका नेतृत्व झज्जर के DSP नरेश कुमार कर रहे हैं। ये SIT 42 वर्षीय मुकेश की मौत की जाँच करेगी। किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस मामले में एसपी से मुलाकात की, जिन्होंने त्वरित कार्रवाई का भरोसा दिलाया। वहीं कथित किसान नेता दर्शन पाल ने मुकेश के आत्महत्या करने की बात

उधर हरियाणा में ‘भारतीय किसान यूनियन (अंबावता)’ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल नांदल ने कहा कि 10 जुलाई को गाजीपुर सीमा पर एकत्रित होकर किसान दिल्ली की तरफ से हरिद्वार कूच करेंगे। राष्ट्रपति को ज्ञापन देने के साथ ही उत्तराखंड में भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करने की योजना भी बनी है। उधर BKU के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने केंद्र सरकार को फिर से धमकाया है। उन्होंने कहा कि सरकार मानने वाली नहीं है, इसीलिए ‘इलाज’ करना पड़ेगा।

टिकैत ने किसानों को अपने-अपने ट्रैक्टरों के साथ तैयार रहने की भी सलाह दी। उन्होंने ‘जमीन बचाने’ के लिए आंदोलन की बात करते हुए कहा कि केंद्र सरकार अपने मन से ये ग़लतफ़हमी निकाल दे कि किसान वापस जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक तीनों कृषि कानून रद्द नहीं किए जाते और MSP पर कानून नहीं बनता, किसान नहीं लौटेगा। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कह चुके हैं कि भारत सरकार अब भी किसानों से बातचीत के लिए तैयार है।

उधर हरियाणा के सोनीपत स्थित सिरसा में भी किसानों की महापंचायत हुई। दिल्ली के 12 और हरियाणा के 17 गाँवों के लोग वहाँ पर पहुँचे। उन्होंने एक तरफ से सिंघु बॉर्डर खोलने की माँग करते हुए कहा कि हिंसा नहीं होनी चाहिए और प्रदर्शनकारियों को बैरियर भी नहीं लगाना है। साथ ही केंद्र और राज्य सरकार से मुलाकात की भी बात कही गई। उधर सांसद अरविंद शर्मा ने भी ग्रामीणों की CBI जाँच की माँग का समर्थन किया।

बता दें कि महापंचायत में ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को अल्टीमेटम दिया गया है कि वह 10 दिन के अंदर सिंघु बॉर्डर को खाली करें। ऑपइंडिया ने ही पहली बार इस बात को उजागर किया कि ‘किसान’ आंदोलन के ‘किसान’ ब्राह्मण विरोधी मानसिकता वाले हैं और मुकेश की जान भी इसी मानसिकता ने ली। ग्रामीणों का कहना है कि ये किसान उनके खेतों में शौच के लिए आते हैं, जिससे महिलाओं को परेशानी होती है। ये गाँव में आकर शराब पीकर हुड़दंग करते हैं और महिलाओं से छेड़खानी करते हैं।

3 बच्चों की अम्मी तबस्सुम को इरफान से हुआ इश्क, हथौड़े से शौहर आमिर की हत्या: गूगल सर्च से खुला राज

मध्य प्रदेश में हरदा जिले के खेड़ीपुर में तबस्सुम नामक महिला ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने शौहर की बेरहमी से हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने से पहले महिला ने गूगल पर हत्या करने और उसके बाद लाश को ठिकाने लगाने का तरीका ढूँढा था। वारदात 18 जून 2021 को घटी।

शौहर की हत्या करने के बाद तबस्सुम ने ही पुलिस को सूचना दी, लेकिन पुलिस के सामने उसने खुद को इस बात से अंजान बताया कि यह सब कैसे हुआ था। पुलिस ने वारदात को 24 घंटे साइबर क्राइम सेल की मदद से मामले को सुलझा लिया। सिविल लाइन थाने के प्रभारी राजेश शाहू ने बताया कि मृतक 42 वर्षीय मोहम्मद आमिर खान की हत्या की जाँच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। आरोपित महिला 3 बच्चों की माँ है।

पुलिस ने बताया है कि आरोपितों ने कुछ कॉल डिटेल डिलीट की थी। इसके अलावा इंटरनेट पर हुई बातचीत को भी डिलीट कर दिया था। इससे शक की सुई उसके तरफ गई। महिला ने हत्या और किसी को काबू करने के तरीकों के बारे में गूगल पर सर्च किया था। इसी से वह पकड़ी गई। रिपोर्ट के मुताबिक, महिला की प्रेमी से दोस्ती फेसबुक और व्हाट्सएप चैटिंग से हुई थी।

जाँच के दौरान पुलिस ने पाया कि तबस्सुम का शौहर आमिर महाराष्ट्र में काम करता था। लेकिन, यहाँ आर्थिक तंगी से जूझ रही तबस्सुम मदद के लिए दूसरे शख्स इरफान पर निर्भर रहती थी। इसी बीच दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। कोरोना के दौरान जब आमिर घर लौट आया तो तबस्सुम और इरफान का मिलना मुश्किल हो गया। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए दोनों ने आमिर को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया।

पुलिस के मुताबिक आमिर अस्थमा से पीड़ित था और नियमित दवा लेता था। तबस्सुम ने आमिर की अस्थमा की दवा बदल दी। इसे लेने के बाद वह होश खो बैठा। फिर इरफान ने स्कॉर्फ से आमिर का हाथ बाँध दिया और सिर पर हथौड़ा मार उसकी हत्या कर दी। आरोपित इरफान नगर पालिका में सहायक राजस्व निरीक्षक है।

हरदा जिले के एसपी मनीष कुमार अग्रवाल ने बताया कि इरफान और तबस्सुम के बीच लंबे समय से प्रेम संबंध था। दोनों मोहम्मद आमिर को हटाना चाहते थे। इसलिए साजिश रचकर दोनों ने घटना को अंजाम दिया। दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

जिसकी नींव पर बुलंद हुआ संघ का वट वृक्ष, जिसने गुरु की जगह भगवा ध्वज को किया स्थापित

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्ष 2025 में शतायु हो जाएगा। अपनी सुदीर्घ यात्रा में संघ ने आदर्श, अनुशासन, सामाजिक एवं व्यक्ति निर्माण के कार्य में नित नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। अपनी इस यात्रा में संघ कहीं ठहरा नहीं। निरंतर गतिमान रहा। समय के साथ कदमताल करता रहा। दसों दिशाओं में फैलकर संघ ने समाज जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है, जबकि उसके आगे-पीछे प्रारंभ हुए अनेक अच्छे संगठन काल-कवलित हो गए। उनके उद्देश्य भी श्रेष्ठ थे। संघ अपने कर्मपथ पर अडिग़ रहा, उसका प्रमुख कारण है- सरसंघचालक की अनूठी व्यवस्था।

संघ में सरसंघचालक नेतृत्वकारी पद नहीं है, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणा का केंद्र है। संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के समय से स्थापित मानदंड अब तक स्थायी हैं। सिंहासन बत्तीसी की कहानी हम सबको भली प्रकार ज्ञात है। विक्रमादित्य के प्रताप से सिंहासन ही सिद्ध हो गया था। बाद में, जो भी उस पर बैठा, उसने विक्रमादित्य के सुशासन को ही आगे बढ़ाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक का दायित्व भी श्रेष्ठ संगठन शिल्पी और भारत माँ के सच्चे सपूत डॉ. हेडगेवार के प्रताप से सिद्ध हो गया है। इसलिए संघ की यह परंपरा निर्विवाद और अक्षुण्ण चली आ रही है।

संघ के स्थापना वर्ष 1925 से 1940 तक डॉ. हेडगेवार का जीवन विश्व के सबसे बड़े संगठन का आधार बनाने में अनवरत लगा रहा। यशस्वी संगठन का उपयोग डॉ. हेडगेवार ने कभी भी अपने प्रभाव के लिए नहीं किया। उन्होंने संघ को सदैव राष्ट्रहित के लिए तैयार किया। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार एक दूरदृष्टा थे। उन्हें क्रांतिकारी, राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में कार्य का अनुभव था। अपने उन सब अनुभवों और भविष्य को ध्यान में रखकर ही डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को व्यक्ति केंद्रित संगठन नहीं, बल्कि विचार केंद्रित संगठन का स्वरूप दिया।

संघ आत्मनिर्भर बने, इसके संबंध में भी उन्होंने पर्याप्त प्रयास किए। आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए गुरु पूजन की परंपरा प्रारंभ की। हम जानते हैं कि गुरु पूजन के अवसर पर गुरु दक्षिणा में स्वयंसेवकों से आई राशि से ही संघ का संचालन होता है। 1928 में गुरु पूर्णिमा के दिन से गुरु पूजन की परंपरा शुरू हुई। जब सब स्वयंसेवक गुरु पूजन के लिए एकत्र हुए तब सभी स्वयंसेवकों को यही अनुमान था कि डॉक्टर साहब की गुरु के रूप में पूजा की जाएगी। उनका अनुमान स्वाभाविक ही था, क्योंकि किसी भी सांस्कृतिक, सामाजिक या धार्मिक संगठन के संस्थापक ही उसके सर्वेसर्वा बन जाते हैं। व्यक्ति केंद्रित ऐसे संगठन संस्थापक के साथ ही समाप्त हो जाते हैं या फिर अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं।

बहरहाल, डॉ. हेडगेवार ने संघ में व्यक्ति पूजा को निषेध करते हुए प्रथम गुरु पूजन कार्यक्रम के अवसर पर जो कहा, वह अत्यंत महत्व का है। उन्होंने कहा, “संघ ने अपने गुरु की जगह पर किसी व्यक्ति विशेष को मान न देते हुए परम पवित्र भगवा ध्वज को ही सम्मानित किया है। इसका कारण है कि व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, फिर भी वह कभी भी स्थिर या पूर्ण नहीं रह सकता। अतएव व्यक्ति विशेष को गुरु के स्थान पर रखकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बनाने की अपेक्षा इतिहास, परंपरा एवं राष्ट्रीयता का समन्वित प्रतिबिंब भगवा ध्वज हमारे गुरु के रूप में सम्मानित है। इससे मिलने वाली स्फूर्ति किसी भी मनुष्य से मिलने वाली स्फूर्ति की अपेक्षा श्रेष्ठ है।”

जिन डॉक्टर साहब ने स्वयं को संगठन के ‘गुरु’ के स्थान पर नहीं रखा, फिर भला वह अपने लिए सरसंघचालक का पद क्यों तय करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक के पद का निर्माण की घटना अनोखी है, जो श्रद्धा भाव को प्रकट करती है। संघ के अनुशासन को दिखाती है। उस विराट व्यक्तित्व का दर्शन कराती है, जो भव्य महल की बालकनी में बैठना पसंद नहीं करते, बल्कि स्वयं को नींव में खपाने के लिए आतुर दिखते हैं। अमूमन किसी भी संगठन के प्रारंभ होने से पहले ही उसका नाम, कार्यपद्धति एवं पदनाम तय हो जाते हैं। किंतु, संघ के संबंध में यह सब महत्वपूर्ण बातें बाद में तय हुईं।

संघ का नाम पहली शाखा लगने के छह माह बाद तय हुआ- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। सरसंघचालक, सरकार्यवाह और प्रचारक जैसे पदों का निर्माण चार वर्ष बाद हुआ। संघ के प्रमुख स्वयंसेवकों की दो दिन की एक बैठक 9 और 10 नवंबर 1929 को नागपुर में हुई। इस बैठक में ही विश्वनाथराव केलकर, तात्याजी कालीकर, आप्पाजी जोशी, बापूराव मुठाल, बाबासाहब कोलते, बालाजी हुद्दार, कृष्णराव मोहरीर, मार्तंडराव जोग एवं देवईकर ने अन्य स्वयंसेवकों से विचार-विमर्श करके सरसंघचालक के पद का निर्माण किया।

रोचक बात यह है कि इस पूरे विचार-विमर्श से डॉक्टर साहब को दूर रखा गया। बैठक के दूसरे दिन जब डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों के मार्गदर्शन के लिए आए तो आप्पाजी जोशी ने आदेश दिया, “सरसंघचालक प्रणाम एक, दो, तीन।” स्वयंसेवकों ने डॉ. हेडगेवार को सरसंघचालक के रूप में प्रणाम किया। यह सब होता देख डॉ. हेडगेवार एकदम सकते में आ गए। कार्यक्रम के बाद उन्होंने आप्पाजी जोशी से कहा, “यह मुझे पसंद नहीं है कि अपने से बड़े आदरणीय त्यागी पुरुषों का प्रणाम ग्रहण करूँ।” उन्होंने सरसंघचालक के पद के प्रति भी अस्वीकृति का भाव प्रकट किया। किंतु, आप्पाजी जोशी ने स्पष्ट कहा कि यह संघ का सामूहिक निर्णय है। संगठन के हित में आपको अप्रसन्न करने वाली यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी। एक आदर्श स्वयंसेवक की भाँति डॉक्टर साहब ने संघ के सामूहिक निर्णय को स्वीकार कर लिया।

जब हम संघ की सरसंघचालक परंपरा को देखते हैं तो ध्यान आता है कि तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस ने स्वास्थ्य कारणों से अपने ही जीवन काल में 1994 में सरसंघचालक का दायित्व प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया को सौंप दिया। इसी परंपरा को रज्जू भैया ने आगे बढ़ाया और सरसंघचालक का दायित्व सुदर्शनजी को सौंपा। सुदर्शनजी ने यह दायित्व वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को सौंपा। यह तीनों महान विभूतियों ने सरसंघचालक के पद से निवृत्ति के बाद एक आदर्श स्वयंसेवक की तरह ‘सरसंघचालक’ के मार्गदर्शन में शेष संघ जीवन जिया। जिसे सरसंघचालक का दायित्व सौंपा, उसके ही मार्गदर्शन में सहज स्वयंसेवक की तरह संघकार्य करने की यह अनूठी परंपरा आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव हेडगेवार के जीवन से स्थापित हुई। हालाँकि, वह तत्वरूप में परिवर्तित होने तक अर्थात् देहावसान तक सरसंघचालक पद पर रहे। किंतु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रूपी वृहद परिवार के मुखिया के रूप में सरसंघचालक की भूमिका और आदर्श को उन्होंने अपने जीवन एवं विचार से स्थापित कर दिया था।

वर्ष 1933 में डॉक्टर साहब ने जो घोषणाएँ कीं, उनसे ही एक स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक के आचार-व्यवहार को दिशा मिलती है। वह कहते हैं, “इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता अथवा संस्थापक मैं न होकर आप सब हैं। यह मैं भली भाँति जानता हूँ।” अद्वितीय संगठन की स्थापना का श्रेय न लेकर डॉक्टर साहब ने स्वयंसेवकों को संदेश दिया है कि व्यक्तिगत कुछ नहीं, सब सामूहिक है। संगठन में श्रेय लेने की होड़ नहीं होनी चाहिए। यदि किसी ने कुछ श्रेष्ठ कार्य प्रारंभ किया है, या फिर दिए गए कार्य का सम्पादन सफलतापूर्वक किया है, तो उसका श्रेय लेने से बचना चाहिए। वह कहते हैं, “आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद (सरसंघचालक) पर कार्य किया है, इतने ही आनंद से आपके द्वारा चुने हुए नए सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वस्त स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूँगा। संघचालक की आज्ञा का पालन स्वयंसेवकों द्वारा बिना किसी अगर-मगर के होना अनुशासन एवं कार्य प्रगति के लिए आवश्यक है। नाक से भारी नथ, इस स्थिति को संघ कभी उत्पन्न नहीं होने देगा। यह संघ कार्य का रहस्य है।”

हम देखते हैं कि आद्य सरसंघचालक के इस विचार का संघ में सबने अक्षरश: पालन किया है। बालासाहब देवरस, रज्जू भैया और सुदर्शनजी ने सरसंघचालक के अधिकार सौंपने के बाद जैसा डॉक्टर साहब ने कहा, वैसा ही स्वयंसेवक जीवन जिया। डॉक्टर साहब आगे और अधिक कठोरता बरतते हुए घोषणा करते हैं, “आपको जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हैं। मेरे लिए अपने व्यक्तित्व के मायने नहीं, संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है। अत: संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूँगा। संघ कार्य के समय किसी भी प्रकार के संकट अथवा मान-अपमान की मैं कतई चिंता नहीं करूँगा।” सोचिए, संगठन के हित में स्वयं के लिए भी संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक क्या विचार रखते हैं? वह किसी भी प्रकार संगठन के कार्य को प्रभावित नहीं होने देना चाहते। संघ कार्य बढ़े इसके लिए वह स्वयं भी पीछे रहने को भी तैयार हैं। इससे अधिक लोकतांत्रिक विचार क्या हो सकता है जब संगठन का मुखिया कह रहा है कि मेरी अयोग्यता से संघ को क्षति हो रही हो तो मेरे स्थान पर योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वयंसेवक स्वतंत्र हैं।

डॉक्टर साहब ने एक आदर्श मुखिया की भूमिका को स्थापित किया। उन्होंने अपने आदर्श चरित्र से सरसंघचालक परंपरा को स्थापित किया। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संगठन और राष्ट्र के लिए स्वाह कर दिया। शरीर में जब तक रक्त की एक भी बूँद रही, वह राष्ट्रसेवा में समर्पित रहे। वह जो कहते थे, उसे जीवन में अक्षरश: जीते भी थे। आद्य सरसंघचालक के रूप में वह सदैव स्वयंसेवकों के लिए प्रकाशपुंज और प्रेरणा के स्रोत बने रहे। आज भी उनका जीवन-दर्शन संघ के स्वयंसेवकों को संघ-जीवन की दिशा देता है। एक व्यक्तित्व कैसे तत्व में परिवर्तित होता है, उसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार।

(लेखक लोकेन्द्र सिंह स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

राम मंदिर वाले चंपत राय पर अभद्र टिप्पणी, फर्जी दस्तावेज शेयर किए: पूर्व एंकर, महिला समेत 3 पर FIR

‘विश्व हिंदू परिषद (VHP)’ के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष और ‘राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय पर आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में 3 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। यूपी पुलिस ने रविवार (जून 20, 2021) को इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि आरोपितों में एक महिला भी शामिल है। बिजनौर के संजय बंसल ने ये शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने खुद को चंपत राय का भाई बताया है।

संजय बंसल बिजनौर के ही रहने वाले हैं। नगीना पुलिस थाने के प्रभारी कृष्ण मुरारी दोहरे ने कहा कि विनीत नाम के व्यक्ति ने अपने फेसबुक पोस्ट में चंपत राय पर कई आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियाँ की। बंसल ने अपनी शिकायत में विनीत के उक्त फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया। संजय बंसल के अनुसार, जब उन्होंने उस फेसबुक प्रोफ़ाइल से जुड़े नंबर पर कॉल किया तो बताया गया कि नगीना की रहने वाली एक महिला के कहने पर ये लिखा गया है।

फेसबुक पोस्ट में गाली-गलौज की भाषा का भी उपयोग किया गया था और साथ ही करोड़ों हिन्दुओं को ठेस पहुँचाने वाली बातें थीं। दरअसल, संजय बंसल को उनके मित्र राजीव गुप्ता ने ये पोस्ट व्हाट्सएप्प के माध्यम से भेजा था और कहा था कि वो उनके परिवार का पहले काफी सम्मान करते थे, लेकिन ये पढ़ कर लगता है कि चंपत राय और उनके परिवार सम्मान के योग्य नहीं है। इससे संजय बंसल को खासी ठेस पहुँची।

आरोप है कि विनीत ने संजय बंसल को फोन पर धमकी भी दी। बिजनौर के SP धर्मवीर सिंह ने कहा कि उस शिकायत के आधार पर विनीत, रजनीश और अलका के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है। फर्जी दस्तावेज बनाने और आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में उन पर IPC की 15 और IT एक्ट की 2 धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। ये मामला राम मंदिर ट्रस्ट पर जमीन खरीद में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा है, जिसका चंपत राय तथ्यवार जवाब दे चुके हैं।

विनीत नारायण का फेसबुक प्रोफ़ाइल

फिर भी उस पोस्ट में चंपत राय के परिवार को भी घसीट लिया गया था और उन पर भी फर्जी आरोप लगाए गए थे। जब हमने विनीत के बारे में खँगाला तो पता चला कि उनका पूरा नाम विनीत नारायण है, जो ‘DD1’ के एंकर रहे हैं और फ़िलहाल ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के अध्यक्ष हैं। JNU से पढ़े विनीत नारायण ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में भी रिपोर्टर और ‘हिंदुस्तान’ में कॉरेस्पोंडेंट रहे हैं। उन्होंने अलका लाहोटी नामक महिला की संपत्ति पर कब्ज़ा करने का आरोप चंपत राय पर लगाया।

बता दें कि चंपत राय अविवाहित हैं और अपने घर न के बराबर ही आते-जाते हैं। चंपत राय सुप्रीम कोर्ट में चली राम मंदिर के मुकदमे की सुनवाई में मुख्य पैरोकार एवं पक्षकार रहे हैं। 1980-81 में चंपत राय ने प्रोफेसर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और RSS के प्रचारक बन गए। 1985 में उन्हें मेरठ विभाग का प्रचारक नियुक्त किया गया। 1986 में विहिप में प्रान्त संगठन मंत्री बना कर भेजा गया। वर्ष 1991 में चंपत राय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाकर अयोध्या भेज दिया गया।

नवंबर 18, 1946 में जन्मे चंपत राय की उम्र 75 वर्ष से भी ज्यादा है। 1996 में विहिप ने उन्हें संगठन का केंद्रीय मंत्री बनाया। 2002 में संयुक्त महामंत्री और फिर अंतरराष्ट्रीय महामंत्री के रूप में प्रमोट किया गया। 1975 में जब इंदिरा गाँधी ने देश में लोकतंत्र ख़त्म कर के आपातकाल की घोषणा की थी, तब राय को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उनके कॉलेज तक पहुँची थी। जेल में उनके 18 महीने गुजरे। 

लश्कर आतंकी मुदस्सिर पंडित ढेर, 3 पुलिसकर्मी-2 काउंसलर की हत्या में था वांछित: पाकिस्तान का असरार भी मारा गया

जम्मू-कश्मीर के सोपोर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के टॉप कमांडर मुदस्सिर पंडित समेत तीन आतंकियों को मार गिराया। बारामुला जिले के सोपोर में रविवार (20 जून 2021) देर रात सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ शुरू हुई थी, जो सोमवार (21 जून 2021) तक चली।

सुरक्षा बलों को गुंड ब्रथ गाँव में आतंकियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी। इसके बाद गाँव के तांत्रे मोहल्ले की घेराबंदी कर घर-घर तलाशी शुरू की गई। सुरक्षा घेरा सख्त होता देख आतंकियों ने सुरक्षा बलों पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने मुदस्सिर समेत तीन आतंकियों मार गिराया। मुदस्सिर हाल में 3 पुलिस जवानों, दो पार्षदों और दो नागरिकों की हत्या में वांछित था।

साभार: आजतक

कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक विजय कुमार ने बताया, “लश्कर-ए-तैयबा का कुख्यात आतंकवादी मुदस्सिर पंडित सोपोर में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया। वह हाल में तीन पुलिसकर्मियों, दो पार्षद और दो आम नागरिकों की हत्या में शामिल था।” मुदस्सिर पर 10 लाख रुपए का इनाम भी रखा गया था। जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुताबिक इलाके को घेरकर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

आईजीपी विजय कुमार के मुताबिक, मुठभेड़ के दौरान मारे गए तीन आतंकियों में एक पाकिस्तानी आतंकी भी है। उसकी पहचान असरार उर्फ अब्दुल्ला के तौर पर हुई है। वह उत्तरी कश्मीर में 2018 से सक्रिय था। 

इससे पहले जम्मू-कश्मीर की पुलिस ने बारामूला जिले में नार्को टेरर माड्यूल का भांडाफोड़ करते हुए 12 लोगों को अरेस्ट किया था। आरोपितों के पास से सुरक्षाबलों ने 11 पैकेट हेरोइन, कैश समेत 10 ग्रेनेड, चार पिस्टल और भारी संख्या में कारतूस जब्त किया था। आरोपितों के पास से 21.5 लाख रुपए कैश व एक लाख रुपए का चेक भी मिला था।

‘आरोग्यम् परमम् भाग्यम्’: PM मोदी ने कोरोना महामारी में योग का महत्व समझाया, संत तिरुवल्लुवर और गीता को किया उद्धृत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (जून 21, 2021) को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के अवसर पर सम्बोधन दिया। सातवें योग दिवस के अवसर पर सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आज जब पूरा विश्व कोरोना महामारी का मुकाबला कर रहा है तो योग उम्मीद की एक किरण भी बना हुआ है। उन्होंने कहा कि जब कोरोना के अदृश्य वायरस ने दुनिया में दस्तक दी थी, तब कोई भी देश, साधनों से, सामर्थ्य से और मानसिक अवस्था से, इसके लिए तैयार नहीं था।

बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हम सभी ने देखा है कि ऐसे कठिन समय में, योग आत्मबल का एक बड़ा माध्यम बना। योग ने लोगों को भरोसा जताया कि हम इस बीमारी से लड़ सकते हैं। महान तमिल संत तिरुवल्लुवर के उद्धरण को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि अगर कोई बीमारी है तो उसकी जड़ तक जाओ, बीमारी की वजह क्या है वो पता करो, फिर उसका इलाज शुरू करो। योग यही रास्ता दिखाता है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत के ऋषियों ने, भारत ने जब भी स्वास्थ्य की बात की है, तो इसका मतलब केवल शारीरिक स्वास्थ्य नहीं रहा है। इसीलिए, योग में फिजिकल हेल्थ के साथ साथ मेंटल हेल्थ पर इतना जोर दिया गया है। जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा था, तो उसके पीछे यही भावना थी कि ये योग विज्ञान पूरे विश्व के लिए सुलभ हो। आज इस दिशा में भारत ने UN, WHO के साथ मिलकर एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि सबको साथ लेकर चलने वाली मानवता की इस योग यात्रा को हमें ऐसे ही अनवरत आगे बढ़ना है। कोई भी स्थान हो, कोई भी परिस्थिति हो, कोई भी आयु हो, हर एक के लिए योग के पास कोई न कोई समाधान जरूर है। उन्होंने याद दिलाया कि हमारे ऋषियों-मुनियों ने योग के लिए “समत्वम् योग उच्यते” ये परिभाषा दी थी। उन्होंने सुख-दुःख में समान रहने, संयम को एक तरह से योग का पैरामीटर बनाया था।

7वें ‘योग दिवस’ के अवसर पर पीएम मोदी का सम्बोधन

पीएम मोदी ने कहा कि आज इस वैश्विक त्रासदी में योग ने इसे साबित करके दिखाया है। कोरोना के इन डेढ़ वर्षों में भारत समेत कितने ही देशों ने बड़े संकट का सामना किया है। प्रधानमंत्री ने ध्यान दिलाया कि दुनिया के अधिकांश देशों के लिए योग दिवस कोई उनका सदियों पुराना सांस्कृतिक पर्व नहीं है। इस मुश्किल समय में, इतनी परेशानी में लोग इसे आसानी से भूल सकते थे, इसकी उपेक्षा कर सकते थे। लेकिन इसके विपरीत, लोगों में योग का उत्साह और बढ़ा है, योग से प्रेम बढ़ा है।

उन्होंने कहा कि पिछले डेढ़ सालों में दुनिया के कोने कोने में लाखों नए योग साधक बने हैं। योग का जो पहला पर्याय, संयम और अनुशासन को कहा गया है, सब उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज अस्पतालों से ऐसी कितनी ही तस्वीरें आती हैं जहां डॉक्टर्स, नर्सेस, मरीजों को योग सिखा रहे हैं, तो कहीं मरीज अपना अनुभव साझा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने पुरातन श्लोक को दोहराया:

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यम्,
दीर्घ आयुष्यम् बलम् सुखम्।
आरोग्यम् परमम् भाग्यम्,
स्वास्थ्यम् सर्वार्थ साधनम्॥

इसका अर्थ समझाते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि योग-व्यायाम से हमें अच्छा स्वास्थ्य मिलता है, सामर्थ्य मिलता है, और लंबा सुखी जीवन मिलता है। हमारे लिए स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा भाग्य है, और अच्छा स्वास्थ्य ही सभी सफलताओं का माध्यम है। उन्होंने गीता के श्लोक ‘तं विद्याद् दुःख संयोग- वियोगं योग संज्ञितम्।’ का अर्थ समझाते हुए कहा कि दुखों से वियोग को, मुक्ति को ही योग कहते हैं। उन्होंने के मूलभूत तत्वज्ञान और सिद्धांत को बरकरार रखते हुए इसे जन-जन तक पहुँचाने की बात कही।

‘उठो भारत, अपनी आध्यात्मिकता से जगत पर विजय प्राप्त करो’: हर समय और काल की जरूरत है योग

हर राष्ट्र का अपना एक चरित्र होता है, जो एक दिन में रूप नहीं लेता। उसके पीछे अनेकों वर्षों का इतिहास होता है। अगर हम अपने राष्ट्र भारत की बात करें तो उसका स्थान दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं के अंतर्गत विकसित हुए देशों में आता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सिन्धु घाटी-सरस्वती सभ्यता से विकसित हुआ भारत उन चुनिंदा देशों की श्रृंखला में आता है, जो अपने मूल रूप में आज भी जीवंत है।

इस नित्य नूतन, चिर पुरातन सनातन संस्कृति में निरंतरता से अनेकों पद्धतियाँ चली आ रही हैं, जिनमें से एक है योग पद्धति। चाहे सिन्धु घाटी-सरस्वती सभ्यता में मिले पुरातात्विक स्रोत हों या सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद, उपनिषद या श्रीमद्भगवतगीता हों, भगवान बुद्ध और महावीर का जीवन हो या महर्षि पतंजलि का दर्शन, स्वामी विवेकानंद का विश्व दिग्विजय हो या आज 21वीं सदी का भारत, अगर सब में कोई कोई आयाम एकरूप है तो वह है योग। 

संपूर्ण मानवता के लिए भारत की दी हुई सौगात है योग। इसका लोहा विश्व भर ने अनेकों बार माना है और आज जब कोरोना महामारी ने मनुष्य जाति को झकझोर कर रख दिया है, तब भी इसकी प्रासंगिकता सबके लिए एक उपहार की तरह ही है। चाहे अवसाद, उदासीनता और मानसिक रोगों से मुक्ति पाना हो या शारीरिक बीमारी से, योग एक रामबाण इलाज के तौर पर उभर कर आया है। 

यह जानना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि योग में निहित आसन और प्राणायाम हमें दैनिक जीवन में रोगों से मुक्त तो रखते ही हैं, लेकिन योग मात्र आसन, प्राणायाम और मुद्राएँ ही नहीं हैं, बल्कि योग जीवन जीने की एक पद्धति है। वह पद्धति जो मनुष्य को अपने हर जीवन के पहलू से जोड़ना सिखाती है। योग दर्शन भारतीय षड् दर्शनों में से एक है, जो मनुष्य जाति को योगमय जीवन जीने की पद्धति से परिचय करवाती है।

लगभग 140 से 150 ईसा पूर्व जन्मे महर्षि पतंजलि ने ‘अष्टाङ्ग योग’ से प्रसिद्ध आठ अंगों वाले योग मार्ग को जन साधारण से परिचित करवाया था। अष्टांग योग में प्रथम पाँच अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार। यह पाँच ‘बहिरंग’ और इसके बाद आने वाले तीन अंग- धारणा, ध्यान और समाधि को ‘अंतरंग’ के नाम से भी जाना जाता है।

अगर हम पाँच यम जिसके अंतर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं और पाँच नियम जिसके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान आते हैं, का भी पालन करने का प्रयास करें, जो कि समाज के प्रति और अपने व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन और नैतिकता से हमारा परिचय करवाते हैं तो हम योग के मार्ग पर चल पड़े हैं, यह हम अनुभव करेंगे।

इस भारतीय योग धरोहर को अगर किसी ने प्रमुखता से विश्व भर से परिचित करवाया तो वह हैं युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद, जिनके ‘भक्ति योग’, ‘कर्म योग’ और ‘ज्ञान योग’ पर व्याख्यान सुनने के लिए विदेशी धरती पर भी हजारों लोग उमड़ पड़ते थे। व्याख्यानों के अतिरिक्त स्वामी जी कक्षाएँ भी लेते थे और योग मुद्राएँ भी सिखाते थे।

अमेरिका और इंग्लैंड में तो स्वामी जी को सुनने के लिए लोगों का ताँता लग जाता था। अपने ‘राजयोग’ विषय पर दिए गए व्याख्यानों में स्वामी जी अत्यंत सूक्ष्म बिंदुओं को भी विश्व भर के सामने बहुत ही सरलता के साथ प्रस्तुत करते थे। राजयोग के अंतर्गत स्वामी जी प्राण, प्राण का आध्यात्मिक रूप, प्रत्याहार और धारणा, ध्यान और समाधि सहित अन्य विषयों पर प्रकाश डालते हैं।

यह सारी जानकारी उनके द्वारा रचित पुस्तक ‘राजयोग’ में भी निहित है। इसके अतिरिक्त स्वामी जी ने पतंजलि योगसूत्र के अंतर्गत जन साधारण के लिए जटिल माने जाने वाले विषय जैसे समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और अन्य से भी पश्चिम जगत को परिचय करवाया था।

अब समय आ गया है कि हम स्वामी विवेकानंद के आह्वान को चरितार्थ करें, जो उन्होंने 1897 में मद्रास में ‘हमारा प्रस्तुत कार्य’ विषय पर दिया था। वे कहते हैं, “चारों ओर शुभ लक्षण दिख रहे हैं और भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों की फिर से सारे संसार पर विजय होगी।” वे आगे कहते हैं, “उठो भारत, तुम अपनी आध्यात्मिकता द्वारा जगत पर विजय प्राप्त करो।” हमें विश्व पर विजय प्राप्त करनी है, लेकिन किसी की जमीन हड़प कर या फिर गोला-बारूद के सहारे युद्ध करके नहीं, बल्कि अध्यात्म से।

21वीं सदी में जहाँ एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग को आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ अब यह दायित्व हर भारतीय का भी बनता है कि वह अपनी इस सनातन परंपरा को अपनाए, दिनचर्या के हर भाग में सम्मिलित करे और विश्व का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करे, क्योंकि विश्व की निगाहें तो भारत पर ही हैं जहाँ योग का उद्भव हुआ है।

21 जून से सभी को लगेगी मुफ्त कोरोना वैक्सीन, CoWin पोर्टल पर पहले से रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं

भारत में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ फ्री वैक्सीनेशन अभियान के नए चरण की शुरुआत 21 जून यानी कल से होने वाली है। इस चरण में केंद्र सरकार 18 साल से ऊपर सभी लोगों को मुफ्त में वैक्सीन मुहैया करवाएगी। इस संबंध में 7 जून को ऐलान किया गया था। 

सरकार ने कहा था कि राज्य को अब टीका बनाने वाली कंपनियों से वैक्सीन नहीं खरीदनी होगी। 75% वैक्सीन केंद्र खरीदेगा और इसे राज्यों को मुफ्त में वितरित करेगा। बता दें कि बाकी बचे 25 फीसद वैक्सीन की खरीदारी निजी अस्पताल सीधे टीका निर्माता कंपनी से कर सकते हैं। लेकिन ये आँकड़ा राज्य और केंद्र शासित प्रदेश निजी अस्पतालों की माँग को अपने रिकॉर्ड में रखेंगे, ताकि राज्य के सभी अस्पतालों को समान हिस्सा मिल सके।

21 जून से शुरू होने वाले इस चरण में Cowin.gov.in पर पहले रजिस्ट्रेशन कराना भी जरूरी नहीं है। सभी सरकारी और निजी टीकाकरण केंद्रों पर ही यह सुविधा लोगों को मुहैया कराई जाएगी। इस चरण में किस राज्य को कितनी खुराक मिलेगी ये इस बात पर निर्भर होगा कि राज्य की आबादी क्या है, वहाँ कितने कोरोना मामले हैं और टीकाकरण की बर्बादी तो नहीं की गई आदि।

केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया जा रहा ये अगला चरण भले ही सभी 18 साल के ऊपर के लोगों को वैक्सीन मुफ्त में मुहैया करवाएगा। लेकिन यदि किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता, फ्रंट लाइन वर्कर, 45 वर्ष की आयु वाले नागरिक और फिर वे नागरिक जिनकी दूसरी खुराक बाकी है तो उन्हें वैक्सीन का शॉट देना पहली प्राथमिकता होगी। इसके बाद 18 वर्ष और उससे अधिक के नागरिकों को टीकाकरण में प्राथमिकता दी जाएगी। केंद्र का कहना है कि जनसंख्या समूह के भीतर 18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों के लिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेश वैक्सीन की आपूर्ति के आधार पर प्राथमिकता तय की जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि भारत में पहला टीकाकरण अभियान 16 जनवरी से शुरू 30 अप्रैल तक चला था। इस दौरान केंद्र सरकार की नीति यह रही कि उसने टीका निर्माताओं से 100% वैक्सीन की खरीद की और उन्हें राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को मुफ्त में दिया। बाद के चरण में सरकार ने उदारीकृत नीति को लागू किया और टीका बनाने वाली कंपनियों से 50 प्रतिशत वैक्सीन खरीदी। वहीं बाकी की खरीददारी 50% राज्य और निजी अस्पतालों ने की।