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पुर्तगाल की धमाकेदार जीत, इंग्लैंड रुका, कोलंबिया ने मारी बाज़ी

आज सभी को इंतजार था कि क्या क्रिस्टियानो रोनाल्डो की पुर्तगाल सभी कंट्रोवर्सियों को पीछे छोड़ अच्छा फुटबॉल खेलेगी। भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे पुर्तगाल की टीम ह्यूस्टन स्टेडियम में उज़्बेकिस्तान के खिलाफ मैदान में उतरी। सभी दर्शकों को देखना था कि पुर्तगाल एक टीम के तौर पर खेलती है या अब भी तमाम खिलाड़ी व्यक्तिगत कुंठाओं को लेकर मैदान में उतरेंगे।

मैच शुरू होता है। मैच के छठे मिनट में ही क्रिस्टियानो रोनाल्डो एक गोल दाग देते हैं। पुर्तगाल कमजोर उज़्बेकिस्तान पर लगातार हमले करती रहती है। गेंद ज्यादातर उज़्बेकिस्तान के हाफ में ही घूमती रहती है।

उज़्बेकिस्तान के गोलकीपर काफी अच्छा बचाव करते हैं। इसके बावजूद अटैकिंग रणनीति के साथ मैदान में उतरी रॉबर्टो मार्टिनेज़ की पुर्तगाल यह मैच 5-0 से जीत जाती है। नूनो मेंडेस ने पहले हाफ में पुर्तगाल को मिली एक फ्री-किक पर शानदार गोल दागकर जता दिया कि क्यों वह वर्तमान में संपूर्ण विश्व के सबसे बेहतरीन लेफ्ट बैक माने जाते हैं। क्रिस्टियानो रोनाल्डो इस मैच में दो गोल स्कोर करते हैं। आगे मैच की अंतिम घड़ियों तक वह अपने तीसरे गोल के लिए छटपटाते नजर आते हैं, पर उज़्बेकी गोलकीपर हैट्रिक मारने की उनकी मंशा को धूमिल कर देते हैं।

आगे, बोस्टन में इंग्लैंड का सामना था घाना की टीम से। इनाकी विलियम्स, आय्यू, सेमेन्यो और पार्टे जैसे अनुभवी अटैकिंग माइंडसेट वाले खिलाड़ियों के होते हुए भी कोच कुईरोज़ ने घाना की टीम को 5-4-1 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतारा था। स्टार खिलाड़ियों से सजी इंग्लैंड की टीम ने काफी कोशिशें कीं, मगर आज बेहतरीन डिफेंसिव फुटबॉल खेल रही घाना के आगे उनकी एक न चली। यह मैच 0-0 के स्कोर के साथ ड्रॉ रहा। सभी को लगेगा कि घाना आखिर क्यों इतना रक्षात्मक फुटबॉल खेल रही थी, परंतु टूर्नामेंट में आगे बढ़ने की अपनी उम्मीदों को ईंधन देने के लिए इंग्लैंड जैसी सुगठित टीम के खिलाफ लिया गया एक अंक भी बड़े मायने रखता है।

आगे, इसी ग्रुप की दो टीमों को आपस में भिड़ना था। टोरंटो में क्रोएशियाई टीम का मुकाबला पनामा से होने जा रहा था। क्रोएशियाई टीम के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी था। बुदिमिर द्वारा मैच के 54वें मिनट में लगाए गए गोल की बदौलत क्रोएशिया यह मैच जीत जाती है। लेकिन पनामा ने भी अच्छी फुटबॉल खेली। उपरोक्त दो मैचों के नतीजों के चलते ग्रुप एल में फिलहाल इंग्लैंड एक जीत और एक ड्रॉ के साथ पहले स्थान पर काबिज है। घाना ने इंग्लैंड के खिलाफ ड्रॉ खेलकर एक और अंक अर्जित किया, इसलिए वह दूसरे स्थान पर है। क्रोएशियाई टीम आज की जीत के बावजूद तीसरे स्थान पर है। यह ग्रुप अब काफी रोचक हो गया है।

आगे, मैक्सिको में ग्रुप के का एक अन्य मुकाबला खेला गया। कोलंबिया का सामना था डीआर कांगो की टीम से। यह भी बेहद रोचक मैच रहा। कोलंबिया ने विरोधी गोलपोस्ट पर कुल बीस दफा निशाना लगाया, जिसमें से नौ दफा गेंद टार्गेट पर रही। परंतु इन नौ मौकों में भी कोलंबिया केवल एक ही गोल कर सकी। डेनियल मुन्योज़ के निर्णायक गोल और लुई डियाज़ के नेतृत्व में कोलंबिया ने घातक अटैकिंग फुटबॉल खेली, जिसका तोड़ डीआर कांगो की टीम नहीं ढूंढ सकी और वह 1-0 से यह मैच हार गई।

इस जीत के साथ कोलंबिया पुर्तगाल को दूसरे स्थान पर धकेलते हुए अपने ग्रुप में पहले स्थान पर पहुंच गई है। इसी के साथ कोलंबिया ने राउंड ऑफ़ 32 में भी अपनी जगह लगभग सुनिश्चित कर ली है। इस ग्रुप की स्थिति भी अब बेहद रोमांचक हो गई है।

अब, कल ग्रुप स्टेज के कुल छह मुकाबले खेले जाने हैं। भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे, जहां वैंकूवर में घरेलू समर्थकों के सामने कनाडा की टीम जॉनाथन डेविड के नेतृत्व में स्विट्जरलैंड से भिड़ेगी, वहीं ठीक इसी समय सिएटल में बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना की टीम का सामना होगा कतर के लड़ाकों से।

फिर, रात साढ़े तीन बजे अटलांटा स्टेडियम में मजबूत इरादों के साथ मोरक्को हैती के खिलाफ बड़ी जीत दर्ज कर अपने ग्रुप में ब्राजील पर दबाव बनाने के मंसूबों के साथ खेलती नजर आएगी। और इसी समय मियामी में ब्राजील बनाम स्कॉटलैंड के मैच का किक-ऑफ होगा। ग्रुप सी के ये दोनों मुकाबले इस ग्रुप में ब्राजील और मोरक्को की स्थिति तय करेंगे।

आगे, कल सुबह भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे दक्षिण अफ्रीका की टीम दक्षिण कोरिया से लड़ती दिखेगी और मैक्सिको सिटी में एक बार फिर घरेलू समर्थकों का प्यार दिलों में लिए, उनके समर्थन के साथ, मैक्सिको की टीम चेक रिपब्लिक से लोहा लेती नजर आएगी।

इस प्यारे खेल की प्यारी कहानियां चलती रहेंगी। बतकही जारी रहेगी। फुटबॉल के प्रति अगाध प्रेम मन में लिए आप भी बने रहिएगा साथ।

वीवा ला फुटबॉल।

ब्रिटेन के ‘ग्रूमिंग गैंग’ जैसा है भारत में ‘लव-जिहाद’ और धर्मांतरण का खेल: UP से MP की हिंदू लड़कियाँ इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर, पढ़ें कैसे रचा जाता है षड्यंत्र

ब्रिटेन में दशकों से चले ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल की परतें अब एक-एक कर उठ रही हैं। रोजाना नए खुलासे और पीड़ितों की झकझोर देने वाली गवाहियाँ, कोर्ट की कार्यवाही और यहाँ तक कि ब्रिटेन की संसद में इस स्कैंडल को लेकर होने वाली बहस भी लोगों के लिए एक कौतूहल और सच्चाई जानने का आईना बनती जा रही है। ये कहानियाँ बिलकुल वैसी हैं जो आपको सीधा भारत के लव जिहाद के खेल और ‘मुस्लिम गैंग’ के कुकर्मों से मेल खाती मिलेगी।

पीड़ितों की गवाहियों में उनके साथ होने वाले रेप की भयावह दास्तान जहाँ रोंगटे खड़े दे रही है वहीं पुलिस अधिकारियों का भी पीड़ितों के साथ दुष्कर्म करने और नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने के तरीकों के बारे में खुलकर बात की जा रही है।

ब्रिटेन के ग्रेट यारमाउथ से सांसद रूपर्ट लोव ने भरी संसद में कई लड़कियों की गवाहियाँ पढ़ीं। उन्होंने बताया कि किस तरह से लाखों लड़कियों ने कई वर्षों तक अत्याचार झेला और बार-बार पुलिस और प्रशासन के दरवाजे खटखटाए। इसके बावजूद उनकी शिकायतों को प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया। इसकी वजह से ग्रूमिंग गैंग का मामला इतने बड़े स्तर पर फल-फूल कर हजारों लड़कियों की जिंदगियाँ तबाह करता रहा।

ब्रिटिश नेशनलिटी एक्ट – 1948 के बाद बड़े पैमाने पर इमिग्रेशन शुरू हुआ और इसके लगभग साथ ही ऐसे मामले सामने आने लगे। पहला दर्ज मामला 1955 का है, जब ब्रैडफोर्ड में चार पाकिस्तानी पुरुषों पर एक 15 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगा।

इंडिपेंडेंट इंक्वायरी इनटू चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज यानी IICSA की रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक तक यह प्रवृत्ति एक सोची-समझी साजिश का रूप ले चुकी थी। 1997 के बाद इमिग्रेशन की नई लहर ने इस नेटवर्क को और विस्तार दिया और इसके साथ ही शोषण के मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ने लगी। अपराधियों में ज्यादातर पाकिस्तान से आए मुस्लिम पुरुष थे।

जाँच में यह भी सामने आया कि 87% अपराधी पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुष थे जो टैक्सी चालक, रेस्तराँ मालिक, केयर होम कर्मचारी या अन्य ऐसी भूमिकाओं में थे जहाँ कमजोर लड़कियों तक उनकी आसान पहुँच थी।

उन्होंने टैक्सी, होटल, घरों और कुछ अन्य जगहों पर लड़कियों को ले जाकर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। उन्हें सिगरेट से जलाया, उनके प्राइवेट पार्ट में बोतल फोड़ी, ब्लैकमेल किया, एक शहर से दूसरे शहर में तस्करी की और पीड़िताओं का जबरन धर्म परिवर्तन करवाया।

ग्रूमिंग गैंग क्या होते हैं

ग्रूमिंग गैंग उस संगठित आपराधिक नेटवर्क को कहा जा सकता है, जिसमें नाबालिग या कमजोर स्थिति की लड़कियों को पहले अपने झाँसे में फँसाया जाता है। फिर उन्हें उपहार, झूठे प्रेम, नशे, धमकी या सामाजिक दबाव में लाया जाता है। इसके बाद उनका यौन शोषण किया जाता है।

यह एक ऐसी प्रणाली थी जो वर्षों की आजमाइश के बाद ईजाद की गई थी। सबसे दुखद यह है कि जब-जब संकेत मिले जिनमें लड़कियों का गायब होना, संदिग्ध पुरुषों का स्कूलों के बाहर मंडराना, कम उम्र की लड़कियों का बड़े पुरुषों के साथ दिखना जैसी बातें शामिल रहीं, तब-तब पुलिस और प्रशासन ने इसे ‘सांस्कृतिक संवेदनशीलता’ के नाम पर दरकिनार कर दिया। दशकों तक यही होता रहा।

ब्रिटेन के रॉदरहैम मामले में आधिकारिक जाँच ने 1997 से 2013 के बीच कम-से-कम 1,400 बच्चों के शोषण का अनुमान दर्ज किया था और इसमें प्रशासनिक विफलता भी सामने आई।

लाखों पीड़िताएँ और ग्रूमिंग गैंग का नेटवर्क

इस पूरे मामले में कम से कम 2,50,000 युवा लड़कियाँ ग्रूमिंग गैंग का शिकार बनीं। 87% अपराधियों में पाकिस्तानी मुस्लिम शामिल थे। ब्रिटेन के 149 जिलों में ग्रूमिंग गैंग ने लड़कियों को निशाना बनाया। इनमें रॉदरहैम में 1400+, टेल्फोर्ड में 1000+ पीड़ित समेत कई अन्य जिलों से लड़कियाँ शामिल थीं।

ब्रिटेन में जब इस तरह के मामले सामने आए तो शुरुआत में सरकार ने भी इन मामलों को नजरअंदाज कर दिया। कई संस्थाओं ने इस सामुदायिक सद्भाव का नाम देकर पूरी सच्चाई छुप दी और इसी की वजह से हजारों जिंदगियां खराब हुई, कई परिवार टूटे और लोगों का पुलिस और प्रशासन से भरोसा खत्म हो गया।

रूपर्ट लोव के अनुसार, जिन लड़कियों के साथ ज्यादतियाँ हुई है, उनमें एक ऐसी पीड़िता भी थी जिसके अब्बा इमाम थे। उस पीड़िता ने बताया कि उसके साथ 600 से 700 पुरुषों ने बार-बार रेप किया।

उसके अलावा एक अन्य पीड़िता जब 12 साल की थी, तब उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डालकर फोड़ दी गई और नस्लीय टिप्पणियों के ताने दिए गए। उन टिप्पणियों में यह बात शामिल थी कि ‘गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं।’

भारत में लव जिहाद की तर्ज पर बढ़ रहे ग्रूमिंग गैंग

ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग के जैसे मामले भारत में भी कई वर्षों से सामने आते रहे हैं।भारत में हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए अलग-अलग पैटर्न अपनाए जा रहे हैं। इसमें 1992 का अजमेर का सेक्स स्कैंडल मामला था। इसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले में स्कूली छात्राओं को निशाना बनाया गया। उन्हें भरोसे में लिया गया, उनके साथ सम्बन्ध बनाए गए। फिर उनकी आपत्तिजनक तस्वीरें लेकर ब्लैकमेल कर उनका शोषण किया गया। इस मामले में 32 साल बाद, 2024 में जयपुर की पोक्सो अदालत में 6 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

अजमेर ही एकलौता ऐसा मामला नहीं है, बल्कि भारत में बीते वर्षों में मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल और उत्तर प्रदेश के भी कई शहरों से ऐसे नेटवर्क सामने आ चुके हैं जिनमें मुस्लिम आरोपितों ने कॉलेज की छात्राओं को अपने प्रेम जाल में फँसाया, उन्हें ड्रग्स दिए और उनके अश्लील वीडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल और धर्मांतरण के लिए मजबूर किया।

उत्तर प्रदेश के कुछ मामलों में तो आरोपियों ने झूठी हिंदू पहचान अपनाकर लड़कियों का विश्वास जीता। ‘राम’, ‘सुनील’ या ‘विक्की’ जैसे हिंदू नाम रखे, नौकरी और शादी के सपने दिखाए और जब लड़की पूरी तरह उनके जाल में आ गई, तब असली चेहरा सामने आया। दुष्कर्म, ब्लैकमेल और मतांतरण का वही पुराना तंत्र देखने को मिला।

कहाँ क्या मामले देखने को मिले

शुरूआत अगर मध्यप्रदेश के भोपाल वाले मामले से करें तो इस केस का खुलासा जुलाई 2025 में हुआ। एक ड्रग गैंग चलाने वाले यासीन मछली और शाहवर मछली की गिरफ्तारी हुई। छानबीन में पता चला कि इनका मकसद सिर्फ ड्रग्स की तस्करी करना नहीं था बल्कि इनके निशाने पर हिंदू लड़कियाँ थीं। ये लोग ये लोग हिंदू युवतियों को एमडी (MD) ड्रग देकर शारीरिक शोषण करते थे और उनसे ड्रग भी बिकवाते थे। इनका मकसद लड़कियों को बर्बाद करते हुए धर्मांतरण करवाना था ताकि उनके पास और कोई विकल्प न बचे।

भोपाल और इंदौर से ऐसी ही एक मुस्लिम गैंग का खुलासा हुआ था। गैंग का मास्टरमाइंड फरहान था। इस गैंग ने निजी कॉलेज में पढ़ने वाली हिंदू लड़कियों को निशाने पर लिया हुआ था। पीड़िताएँ इस मामले में लंबे समय तक चुप थीं, लेकिन बाद में जब एक मामला सामने आया तो एक-एक करके कई लड़कियाँ सामने आईं। उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें नशा देकर उनसे बलात्कार होता था और इसके बाद उनपर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।

इसी तरह का मामला नैनीताल से भी जुलाई में ही सामने आया था। यहाँ 11 वीं क्लास की हिंदू युवती को 30 साल के मुस्लिम युवक ने प्रेम जाल में फँसा रखा था। लड़की का परिवार इतना बेबस था कि उन्हें मदद के लिए हिंदू संगठनों का सहारा लेना पड़ा। परिवार ने गिड़गिड़ा कर बताया कि उनकी बेटी को नशा दिया जाता है, उसे लत लगवा दी गई है। घरवाले इसलिए मजबूर हो गए हैं क्योंकि बेटी परिवार के विरोध पर उतर आई है।

इंदौर के मूसाखेड़ी में भी जीशान खान ने ‘अभिषेक ठाकुर’ बनकर हिंदू युवती को फँसाया हुआ था। उसने लड़की को अपने जाल में उलझाए रखने के लिए उसको ड्रग्स की लत लगाई, फिर उसका यौन शोषण किया और उसे ब्लैकमेल करके उसपर धर्मांतरण का दबाव बनाने लगा।

एक अन्य मामला इंदौर से ही सामने आया। यहाँ सुल्तान रोशन नागोरी ने कोचिंग सेंटर में जाने वाली हिंदू युवतियों को टारगेट करता था। पोल तब खुली जब एक ब्राह्मण लड़की पुलिस के पास शिकायत लेकर पहुँची। युवती ने बताया कि सुल्तान ने उसके साथ शारीरिक शोषण तो किया ही था। साथ में उसे अश्लील फोटो-वीडियो वायरल की धमकी देकर धर्म परिवर्तन का दबाव भी बना रहा था।

इस मामले में पीड़िता ने कॉल सेंटर्स में एक्टिव धर्मांतरण सेल का भी खुलासा किया था। उसका दावा था कि इस सेल में हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए मुस्लिम लड़कों को रखा जाता था। उनका ब्रेनवॉश ये कहकर होता था कि अल्लाह ने तुम्हें हमारे लिए बनाया है। बाद में उन लड़कियों को नशे का आदी बनाया जाता था और उनका शारीरिक शोषण होता था।

यूपी के मैनपुरी में एक दिन एक 17 साल की लड़की अपने घर से अचानक गायब हो गई। घरवालों ने परेशान होकर पुलिस में शिकायत दी। छानबीन हुई तो पता चला कि वो इंस्टाग्राम पर एक मुस्लिम लड़के से बात करती थी। लड़के का नाम अब्दुल्ला था। उसी ने उसे अगवा किया है। पुलिस जहा इसके बाद अब्दुल्ला और लड़की की तलाश में जुटी। वहीं परिवार केवल ये सोचता रहा कि उनकी बेटी के साथ ये सब कैसे हुआ।

बिहार में अंडा बेचने वाले सलमान ने एक मध्य प्रदेश में रहने वाली हिंदू युवती को पबजी खेलने के दौरान हिंदू नाम से प्रेम जाल में फँसाया। लड़की प्रेम में इतना पागल हुई कि वो अपना घर-बार छोड़कर मधुबनी आ गई। यहाँ उसे सलमान ने अपनी असली पहचान बताई। फिर उसे जबरन कलमा पढ़वाकर उसे निकाह किया। लड़की के साथ हुए इस धोखे का खुलासा उस समय हुआ जब लड़की के पिता की शिकायत पर पुलिस ने उसका इंस्टा जाँचा और सामने आया कि वो किसी सलमान के चक्कर में पड़ी हुई थी।

इसी साल मार्च में सामने आए महाराष्ट्र के नासिक में TCS के दफ्तर में हिंदू महिलाओं के यौन शोषण और जबरन धर्म परिवर्तन की कोशिश का मामले में आरोपितों में दानिश शेख, तौफिक अत्तार के साथ निदा खान नाम की ख्वातीन भी शामिल थी। वह लड़कियों को व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़कर धर्म से जुड़ी बातें बताती थी। निदा लड़कियों को मुस्लिम मजहब के रीति-रिवाज अपनाने के लिए प्रेरित करती थी और उन्हें नमाज पढ़ने से लेकर बुर्का पहनने तक की जानकारी और ट्रेनिंग देती थी। मामले की जाँच में हिंदू पीड़िता के फोन से इस्लाम से जुड़े 37 ऑडियो क्लिप और 4 मजहबी ऐप्स भी मिले।

एक व्यक्ति नहीं, पूरा नेटवर्क करता है काम

ब्रिटेन हो या भारत- इन मामलों को समझने के लिए इनके तंत्र को समझना जरूरी है। सतह पर एक आरोपी दिखता है, लेकिन असल में एक पूरा नेटवर्क काम कर रहा होता है। कोई लड़की की पहचान करता है। कौन सी लड़की घर में अकेली है, किसके माता-पिता का झगड़ा है, कौन भावनात्मक रूप से कमजोर है।

इसी तरह कोई अन्य उससे दोस्ती या प्रेम संबंध बनाता है, इसके बाद कोई आर्थिक मदद या सुरक्षा का भ्रम पैदा करता है, कोई वीडियो या फोटो बनाकर ब्लैकमेल करता है और फिर कोई दूसरा व्यक्ति आगे शोषण या दबाव की कड़ी संभालता है ।

अजमेर कांड की रिपोर्टिंग में भी यह सामने आया कि एक पीड़िता को अगली पीड़िता तक पहुँचने के माध्यम की तरह इस्तेमाल किया गया। ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग्स में भी लड़कियों को शराब, नशा, उपहार, वाहन, ठिकाने और भावनात्मक नियंत्रण के जरिए गैंग के भीतर घुमाया जाता था। यही कारण है कि ऐसे मामलों को केवल ‘लड़का-लड़की का निजी मामला’ कहकर टाल देना कई बार गंभीर भूल साबित हो सकता है ।

मध्य प्रदेश में लव जिहाद को लेकर कुछ रिपोर्टों में 283 मामलों का उल्लेख किया गया, जबकि विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के तहत दर्ज मामलों की संख्या भी चर्चा में रही।

हालाँकि इन सभी आँकड़ों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता क्योंकि ये आँकड़े कभी गिने नहीं गए और न ही अब तक खत्म हुए हैं।

निष्कर्ष

ब्रिटेन की वो 12 साल की लड़की जो एक रात में टूट गई और अजमेर की वो छात्रा जिसने अपनी पूरी जवानी न्याय के इंतज़ार में गुजार दी- दोनों की चीख एक ही है। देश अलग है, भाषा अलग है लेकिन दर्द एक ही है।

ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग्स का मामला भारत के लिए एक कठोर चेतावनी है। यह चेतावनी किसी एक समुदाय के खिलाफ नारेबाजी की नहीं, बल्कि संगठित शोषण, यौन अपराध, ब्लैकमेल और मजबूरन धर्मांतरण जैसे आरोपों की गंभीर, निष्पक्ष और नेटवर्क-आधारित जाँच की है ।

अजमेर से लेकर भोपाल, इंदौर, नासिक और उत्तर प्रदेश तक के मामलों ने यह दिखाया है कि यदि समाज समय रहते संकेतों को नहीं समझता तो अपराधी तंत्र पीड़ितों को अकेला कर देता है और न्याय बहुत देर से आता है ।भारत को सचेत होना होगा, क्योंकि जब एक अपराधी के पीछे पूरा तंत्र काम कर रहा हो, तब चुप रहना और चुप करा देना सबसे खतरनाक सह-अपराध बन जाती है ।

Antifa के आतंक पर BBC का पर्दा: हमलावरों को बताया ‘प्रदर्शनकारी’, अमेरिकी कोर्ट ने ICE सेंटर पर हमले और पुलिसकर्मी को गोली मारने को लेकर दी 450 साल की सजा

ब्रिटेन के सरकारी प्रसारक BBC पर पहले भी इस्लामी आतंकियों को मानवीय रूप में दिखाने और विचारधारा से जुड़े लोगों के प्रति सहानुभूति पैदा करने के आरोप लगते रहे हैं, चाहे उन्होंने कितना भी गंभीर अपराध क्यों न किया हो। अब BBC ने अमेरिका के टेक्सास के अल्वाराडो में इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (ICE) केंद्र पर हमला करने और एक पुलिस अधिकारी की गर्दन में गोली मारने वाले एंटीफा (Antifa) के आठ दोषियों को ‘जेल भेजे गए प्रदर्शनकारी’ बताकर उनकी सजा को अलग तरीके से पेश किया है।

450 साल की जेल की सजा पाने वाले आठ Antifa आतंकियों को BBC ने बताया ‘प्रदर्शनकारी’

23 जून 2026 को अमेरिका के टेक्सास के फोर्ट वर्थ स्थित संघीय अदालत ने नॉर्थ टेक्सास के एंटीफा सेल के आठ सदस्यों को कुल मिलाकर 450 साल की जेल की सजा सुनाई। आरोपित बेंजामिन हानिल सॉन्ग, मैरिसेला रुएडा, कैमरून अर्नोल्ड, सवाना बैटन, जैकरी एवेट्स, ब्रैडफोर्ड मॉरिस और डैनियल रोलांडो सांचेज एस्ट्राडा को फरवरी–मार्च 2026 में दोषी ठहराया गया था।

इन सभी को 4 जुलाई 2025 को अल्वाराडो में स्थित प्रेयरीलैंड ICE डिटेंशन सेंटर पर हमले में उनकी भूमिका के लिए दोषी माना गया। इस केंद्र में उन प्रवासियों को रखा जाता था जो अपने देशों में निर्वासन का इंतजार कर रहे थे। 46 गवाहों और 210 सबूतों के आधार पर अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में साबित किया कि आरोपितों ने मिलकर एक संगठित एंटीफा सेल बनाया था।

एंटीफा ‘एक्टिविस्ट’ ने हिंसक हमले की योजना बनाने के लिए एन्क्रिप्टेड एप्लिकेशन, कोड नाम, Faraday बैग और पहले से इलाके की रेकी का इस्तेमाल किया। अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा कि कम से कम 11 Antifa आतंकी ब्लैक ब्लॉक कपड़ों में मौके पर पहुँचे थे और उन्होंने अपने चेहरे ढके हुए थे।

उनके पास कम से कम 11 बंदूकें, बॉडी आर्मर और टॉर्निकेट वाले सैन्य स्तर के फर्स्ट-एड किट मौजूद थे। Antifa आतंकी अपने साथ विस्फोटक और आतिशबाजी सामग्री भी लेकर आए थे। ICE डिटेंशन सेंटर पहुँचने के बाद Antifa आतंकियों ने परिसर की ओर फायरिंग शुरू कर दी और पटाखे और विस्फोटक सामग्री फेंकी। इसके साथ ही उन्होंने प्रेयरीलैंड परिसर में खड़े वाहनों और गार्ड शैक में तोड़फोड़ भी की।

अमेरिका के न्याय विभाग के अनुसार, मुकदमे के दौरान सामने आया कि 4 जुलाई 2025 की रात को कम से कम 11 लोगों ने टेक्सास के अल्वाराडो स्थित प्रेयरीलैंड डिटेंशन सेंटर पर हमला किया। इस केंद्र का इस्तेमाल अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग उन अवैध प्रवासियों को रखने के लिए कर रहा था जिनकी देश से वापसी की प्रक्रिया चल रही थी।

आरोपियों ने काले कपड़े पहन रखे थे और अपने चेहरे ढके हुए थे ताकि उनकी पहचान छिपी रहे और पुलिस के लिए उन्हें अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाए। हमले के दौरान आरोपियों ने पटाखे और आतिशबाजी जैसी चीजें चलाकर और फेंककर माहौल बिगाड़ा।

उन्होंने वाहनों और सुरक्षा चौकी को नुकसान पहुँचाया, गाड़ियों के टायर काट दिए, निगरानी कैमरे तोड़ दिए और दीवारों पर आपत्तिजनक नारे लिख दिए। जब सुधार गृह के कर्मचारियों की 911 कॉल पर अल्वाराडो पुलिस पहुँची, आरोप है कि तब समूह के नेता बेंजामिन हैनिल सॉन्ग, जो पहले अमेरिकी मरीन रिजर्व में रह चुका था, और नाथन बॉमन ने ‘राइफल्स तक पहुँचो’ चिल्लाया और गोलीबारी शुरू कर दी।

सॉन्ग द्वारा चलाई गई गोली एक पुलिस अधिकारी की गर्दन और कंधे के पास लगी। घटना के बाद सॉन्ग वहाँ से भाग गया, लेकिन 15 जुलाई 2025 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में ऐसे सबूत भी पेश किए जिनसे पता चला कि यह हमला योजनाबद्ध तरीके से किया गया था।

जाँच में सामने आया कि आरोपी एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप के जरिए आपस में संपर्क में थे, जिसमें ऑटो-डिलीट फंक्शन था, जिससे एंटीफा सेल के कुछ सदस्यों के संदेश स्थायी रूप से डिलीट हो गए थे।

अल्वाराडो ICE डिटेंशन सेंटर हमले में शामिल आठ एंटीफा आतंकियों को अदालत ने दंगा करने, हथियार और विस्फोटकों के इस्तेमाल, आतंकियों को सामग्री सहायता देने, सरकारी कार्य में बाधा डालने और कानून प्रवर्तन अधिकारी की हत्या की कोशिश जैसे आरोपों में दोषी ठहराया।

फेडरल कोर्ट ने पुलिस अधिकारी की हत्या की कोशिश के मामले में दोषी पाए गए बेंजामिन हैनिल सॉन्ग को 100 साल की जेल की सजा सुनाई। दोषी मैरिसेला रुएडा को 70 साल की जेल, कैमरून अर्नोल्ड को 50 साल की जेल, सवाना बैटन को 50 साल की जेल, जैकेरी एवेट्स को 50 साल की जेल, ब्रैडफोर्ड मॉरिस को 50 साल की जेल, एलिजाबेथ सोटो को 50 साल की जेल और डेनियल रोलांडो सांचेज-एस्ट्राडा को 30 साल की जेल की सजा सुनाई गई।

हालाँकि ऐसे सबूत मौजूद थे जो यह साबित करते थे कि दोषी न केवल एंटीफा विचारधारा से जुड़े थे बल्कि उन्होंने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से ICE डिटेंशन सेंटर पर हिंसक हमला किया था, फिर भी BBC ने दोषियों के एंटीफा संबंधों को ‘कथित’ बताया। इस्लामो-लेफ्टिस्ट प्रचार माध्यम ने पुलिस पर गोलीबारी के साथ किए गए एक योजनाबद्ध सशस्त्र हमले को ‘प्रदर्शन’ बताकर पेश किया। 24 जून को BBC ने X पर लिखा, “एंटीफा से कथित संबंध रखने वाले आठ लोगों को ICE सेंटर विरोध प्रदर्शन के मामले में कुल 450 साल की जेल की सजा सुनाई गई।”

BBC की ओर से एंटीफा आतंकियों के हमले और उनकी सजा को सहानुभूतिपूर्ण तरीके से पेश करने, दोषियों को एंटीफा विचारधारा से अलग दिखाने और वामपंथी झुकाव वाले आरोपितों को पीड़ित के रूप में पेश करने की कोशिश को ऑनलाइन कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा।

कई लोगों ने कहा कि जहाँ एंटीफा आतंकियों को आतंकी हमला करने की योजना बनाने और एक कानून प्रवर्तन अधिकारी की गर्दन में गोली मारने के लिए सजा सुनाई गई, वहीं BBC ने उनकी सजा को ‘प्रदर्शन’ करने का एक अनुचित नतीजा बताकर पेश किया।

दरअसल X पर कुछ यूजर्स ने BBC की पोस्ट में संदर्भ जोड़ते हुए लिखा, “इन लोगों को विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि विस्फोटकों के इस्तेमाल वाले एक आतंकी हमले और एक पुलिस अधिकारी की हत्या की कोशिश के लिए सजा सुनाई गई है। दोषी ठहराए जाने के बाद उनके उस समूह से संबंध अब कथित नहीं रहे।”

‘कथित’ शब्द का इस्तेमाल और पुलिस अधिकारी को गोली मारे जाने की बात को नजरअंदाज करना यह दिखाता है कि BBC जैसे वामपंथी मीडिया संस्थानों को अपने वैचारिक विरोधियों या सिर्फ अपना काम कर रहे किसी पुलिस अधिकारी की हत्या की कोशिश तक को कम करके दिखाने में कोई संकोच नहीं है, ताकि वे उन लोगों की छवि साफ कर सकें जिनकी विचारधारा उनसे मेल खाती है।

हत्या की कोशिश के दोषी बेंजामिन सॉन्ग को और मानवीय रूप में पेश करते हुए BBC ने एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें सॉन्ग की माँ होप ने इस ‘दावे’ को खारिज किया कि बेंजामिन ने अधिकारी को गोली मारी थी और कहा कि उसके बेटे का ‘किसी को नुकसान पहुँचाने का इरादा नहीं था।’

कितना चौंकाने वाला और कितना भरोसेमंद है कि हत्या के दोषी के परिवार वाले यह दावा करें कि उसने कोई अपराध नहीं किया।

एक ही लेख में BBC ने न सिर्फ दोषी ठहराए गए लोगों को एंटीफा या ‘एंटी-फासिस्ट’ विचारधारा से अलग दिखाने की कोशिश की, बल्कि खुद इस अतिवामपंथी विचारधारा की छवि भी साफ करने का प्रयास किया।

संक्षेप में, BBC ने कहा, “देखिए, ICE सुविधा पर हमला करने और एक पुलिस अधिकारी को गोली मारने वाले प्रदर्शनकारियों का एंटीफा विचारधारा से कोई संबंध नहीं था। हालांकि उनमें से एक ने एक पुलिसकर्मी की गर्दन में गोली मारी, लेकिन उनका किसी को नुकसान पहुंचाने का इरादा नहीं था। साथ ही, एंटीफा सिर्फ एक विचारधारा है और उसे मानना कोई अपराध नहीं है।”

हालाँकि BBC लंबे समय से ऐसा पैटर्न दिखाता रहा है जिसमें वह सहानुभूतिपूर्ण ‘संदर्भ’ जोड़ता है और ‘कथित’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके उन ‘कार्यकर्ताओं’ के कानूनी रूप से साबित अपराधों को भी हल्का करके दिखाता है जिन्हें उसकी वामपंथी विचारधारा के करीब माना जाता है।

उनका संस्थागत पक्षपात और उन लोगों को बचाने की प्रतिबद्धता इतनी गहरी है जिन्हें दुनिया भर के वाम-उदारवादी अक्सर पीड़ित के रूप में पेश करते हैं, चाहे उनका पिछला रिकॉर्ड कैसा भी रहा हो, कि BBC ने अमेरिका में एंटीफा आतंकियों को मानवीय रूप में पेश करना चुना, लेकिन अपने ही देश ब्रिटेन में हाल ही में जारी रेप गैंग जाँच रिपोर्ट को कवर नहीं किया, क्योंकि उसमें 87 से 95 प्रतिशत तक आरोपितों की पहचान पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुषों के रूप में हुई थी, जिन्होंने मजहबी नफरत के कारण गैर-मुस्लिम लड़कियों को निशाना बनाया।

साल 2022 में भी BBC की लीसेस्टर हिंसा पर रिपोर्टिंग हिंदू-विरोधी पक्षपात से भरी हुई बताई गई थी, जिसमें हिंदुत्व और BJP-RSS को खलनायक दिखाने की कोशिश की गई, जबकि उस हिंसा का RSS, BJP या तथाकथित दक्षिणपंथी उग्रवाद या फासीवादी झुकाव से कोई संबंध नहीं बताया गया था। BBC ने मुस्लिमों द्वारा की गई हिंसा और नफरत का दोष सुविधाजनक तरीके से हिंदुओं पर डाल दिया।

अगस्त 2024 में, जब बांग्लादेश में मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा था, उनके साथ बलात्कार, लूटपाट और हत्याएँ की जा रही थीं, तब BBC ने दावा किया कि ‘फार-राइट’ लोग मुस्लिमों द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के झूठे दावे फैला रहे हैं। मुस्लिम उद्धारवाद की वैचारिक सोच से प्रेरित होकर BBC ने हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमलों और उनके मंदिरों के अपमान को ‘राजनीतिक हिंसा’ या अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी का समर्थन करने का राजनीतिक बदला बताकर पेश किया।

इसी साल मई में BBC ने एक हेडलाइन चलाई- ‘जिंदा रहने के लिए बच्चों को बेचना: अफगान पिता असंभव फैसले लेने को मजबूर।’ इस रिपोर्ट में BBC ने उन अफगान पुरुषों की कहानी दिखाई जो पैसे के बदले अपनी पाँच साल तक की बेटियों को निकाह या सेवा के लिए बेच रहे थे। OpIndia ने रिपोर्ट किया कि BBC ने अफगान अब्बुओं की ‘असंभव परिस्थितियों’ और उनकी मजबूरी को मानवीय रूप देकर पेश किया। नाबालिग लड़कियों की खुली तस्करी और उनके शोषण को प्रमुखता देने के बजाय BBC ने अपनी बेटियों को बेचने वाले पुरुषों के लिए सहानुभूति दिखाई।

स्पष्ट है कि जब हिंसा या अमानवीयता उन वैचारिक या मजहबी समूहों या व्यक्तियों से आती है जिन्हें वामपंथी कारणों के करीब माना जाता है, चाहे वह एंटीफा हो या इस्लामवाद, BBC नरम भाषा का इस्तेमाल करता है, अपनी सहानुभूतिपूर्ण कहानी को संदर्भ के रूप में पेश करता है और दोष सिद्ध होने, सजा सुनाए जाने या स्पष्ट तथ्यों के बावजूद उनके अपराधों को कम करके दिखाता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

बऊबाजार ब्लास्ट के ‘मास्टरमाइंड’ की रिहाई पर SC की रोक, कोलकाता में ‘हिंदुओं को मारना’ चाहता था राशिद खान: पढ़ें- कैसे ममता सरकार ने की थी समय से पहले रिहाई के लिए पैरवी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (22 जून 2026) को दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें 1993 के बऊबाजार विस्फोट मामले के दोषी मोहम्मद राशिद खान को रिहा करने और उसकी सजा में छूट देने का निर्देश दिया गया था। राशिद को पश्चिम बंगाल सरकार ने इस साजिश का मास्टरमाइंड बताया था।

गौरतलब है कि दिसंबर 1992 में अयोध्या स्थित विवादित ढाँचे के विध्वंस के बाद पैदा हुए सांप्रदायिक तनाव के बीच खान ने बम बनाने के लिए पैसे दिए थे। जिसका मकसद मुस्लिमों के जरिए बमों का इस्तेमाल कर कलकत्ता के हिंदुओं को मारना था।

हालाँकि, बम बनाने वाली जगह पर हुए विस्फोट में 69 लोगों की मौत हो गई, जिनमें कोई भी हिंदू नहीं था। इस हादसे में दर्जनों लोग घायल हुए और कोलकाता के घनी आबादी वाले मध्य क्षेत्र बऊबाजार में कई इमारतें ढह गई थीं।

न्यायमूर्ति पी के मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने बंगाल सरकार द्वारा 5 जून को दिए गए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यह अंतरिम आदेश पारित किया।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने तर्क दिया कि इतने बड़े विस्फोट और भारी जनहानि वाले मामले में हाई कोर्ट द्वारा दंड के सुधारात्मक सिद्धांत (रिफॉर्मेटिव थ्योरी ऑफ पनिशमेंट) पर भरोसा करना सही नहीं है। वहीं, खान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम आर शमशाद ने उसकी लंबी कैद, जेल में अच्छे आचरण, बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया। उन्होंने मार्च 2014 में सह-दोषी पन्नालाल जैसवारा को मिली रिहाई का भी उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खान के मामले को अलग माना कि वह इस पूरी साजिश का मास्टरमाइंड था। जब शमशाद ने दलील दी कि खान को कई बार पैरोल मिली और वह हर बार वापस जेल लौटा, तब अदालत ने टिप्पणी की कि उसे जिस अपराध के लिए सजा दी गई, वह लगभग एक आतंकवादी कृत्य था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अपील पर विचार होने से पहले खान को रिहा कर दिया गया, तो राज्य सरकार की चुनौती निरर्थक हो सकती है। इसी आधार पर अदालत ने उसकी रिहाई पर रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित की गई है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने माफी दी और तुरंत रिहाई का दिया आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने 5 जून को खान की याचिका स्वीकार करते हुए आदेश दिया था कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

हाई कोर्ट ने माना कि बऊबाजार विस्फोट कोई व्यक्तिगत अपराध नहीं था बल्कि इसका व्यापक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ा था। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता को ही सजा में छूट (रिमिशन) से इनकार करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब लागू नीति में टाडा के तहत दर्ज मामलों या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अपराधों को स्पष्ट रूप से छूट के दायरे से बाहर नहीं रखा गया हो।

फरवरी 2020 में प्रेसिडेंसी करेक्शनल होम के अधीक्षक द्वारा जारी चरित्र प्रमाण पत्र में खान के व्यवहार को बहुत-बहुत अच्छा बताया गया था। खान ने बिना पुलिस एस्कॉर्ट के 93 दिन पैरोल पर बिताए थे और तय समय के भीतर वापस लौट आया था। इस दौरान उसके खिलाफ किसी तरह की धमकी देने या सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोई शिकायत भी सामने नहीं आई। अदालत के सामने यह भी बताया गया कि खान कई बीमारियों से पीड़ित है।

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि खान के दोबारा किसी अपराध में शामिल होने की संभावना बहुत कम है। अदालत ने कहा कि 33 साल से अधिक समय जेल में बिताने के बाद उसे और अधिक समय तक कैद में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं रह जाता।

हाई कोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए सरकार के पास भेजने के बजाय स्वयं ही खान को सजा में छूट दे दी। अदालत ने कहा कि जब उपलब्ध परिस्थितियाँ उसकी रिहाई को उचित ठहराती हैं, तब मामले को पुनर्विचार के लिए कार्यपालिका (सरकार) के पास वापस भेजने का कोई उद्देश्य नहीं रह जाता।

इसके बाद पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

ममता सरकार के बोर्ड ने 2015 में किया था खान की रिहाई का समर्थन

साल 2007 में CPI-M के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने खान की समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया शुरू की थी। जेल विभाग ने 14 साल की सजा पूरी करने के बाद उसके मामले की सिफारिश की थी लेकिन यह प्रस्ताव रिहाई तक नहीं पहुँच सका था। बाद में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टाडा के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को रिमिशन देने का अधिकार राज्य नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के पास है।

इसके बाद ममता बनर्जी सरकार ने इस प्रयास को फिर आगे बढ़ाया। मार्च 2015 में स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड ने 32 मामलों की समीक्षा कर खान सहित पाँच आजीवन कारावास भुगत रहे दोषियों की समय पूर्व रिहाई की सिफारिश की। इस दौरान मीडिया में भी खान को अच्छा व्यक्ति बताने की कोशिशें हुईं।

हालाँकि, उसकी रिहाई का औपचारिक आदेश जारी नहीं हो सका, क्योंकि वी श्रीहरन मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ श्रेणियों के मामलों में राज्य सरकारों द्वारा रिमिशन की शक्ति के प्रयोग पर अस्थायी रोक लगा दी थी।

इसके बाद खान का मामला इस कानूनी विवाद में उलझ गया कि टाडा जैसे केंद्रीय कानून के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को रिमिशन देने का अधिकार राज्य सरकार के पास है या केंद्र के पास।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 2015 की सिफारिश खान के किसी बाद के दुराचार के कारण वापस नहीं ली गई थी। अदालत ने बाद में रिमिशन से इनकार किए जाने को अधिकार क्षेत्र को लेकर कानूनी भ्रम के कारण आया हृदय परिवर्तन बताया।

हालाँकि, बाद के सालों में पश्चिम बंगाल सरकार का रुख बदल गया। कोलकाता पुलिस की कड़ी आपत्तियों के बाद राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने 29 मई 2017 और 8 अगस्त 2018 को खान की रिहाई की माँग खारिज कर दी। पुलिस ने अपराध की गंभीरता, उसके सामाजिक प्रभाव और खान की भूमिका को आधार बनाया था।

फरवरी 2019 में बंगाल सरकार ने केंद्र को प्रतिकूल सिफारिश भेजी। इसके बाद गृह मंत्रालय ने उसके रिहाई की माँग ठुकरा दी। दिलचस्प रूप से, जिस पश्चिम बंगाल सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड ने 2015 में खान की रिहाई की सिफारिश की थी।

उसी राज्य सरकार ने 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट के रिहाई आदेश को रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस बीच सबसे बड़ा बदलाव यह था कि राज्य की सत्ता TMC के बजाय BJP के नेतृत्व वाली सरकार के हाथों में आ चुकी थी।

खान ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

खान के बेटे ने 2016 में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत लंबित रिमिशन प्रक्रिया की जानकारी माँगी। बंगाल सरकार ने जवाब में पुष्टि की कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने 25 मार्च 2015 को खान की समयपूर्व रिहाई की सिफारिश की थी।

हालाँकि कुछ मामलों में राज्यों की रिमिशन शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के कारण इस निर्णय की दोबारा समीक्षा की गई। जुलाई 2016 में एक अन्य RTI जवाब में भी कहा गया कि राज्य सरकार इस सिफारिश को लागू नहीं कर सकी थी।

इसके बाद 8 अगस्त 2016 को खान ने अपने सह-दोषी की रिहाई और बंगाल सरकार की पूर्व सिफारिश का हवाला देते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिमिशन के लिए आवेदन दिया। उसके बेटे ने कई बार रिमाइंडर भेजे जबकि गृह मंत्रालय ने सितंबर और नवंबर 2017 में बताया कि आवेदन अभी विचाराधीन है।

आखिरकार खान ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। उसका तर्क था कि टाडा एक केंद्रीय कानून है, इसलिए रिमिशन पर फैसला लेने का अधिकार नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार के पास है। उसने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा 2017 और 2018 में उसकी रिहाई की माँग खारिज किए जाने को चुनौती दी और समय पूर्व रिहाई के निर्देश की माँग की।

बऊबाजार में सट्टा अड्डे के ऊपर बम बनाए गए

यह मामला 16 मार्च 1993 की रात मध्य कोलकाता के बऊबाजार स्थित 266-268A और 267 बी बी गांगुली स्ट्रीट क्षेत्र में हुए भीषण विस्फोट से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, यह स्थान खान से जुड़े अवैध सट्टा अड्डों के ऊपर या आसपास संचालित एक गुप्त बम निर्माण केंद्र था।

अदालती दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मोहम्मद खालिद ने खान के निर्देश पर नाइट्रोग्लिसरीन और बम व ग्रेनेड बनाने में इस्तेमाल होने वाले अन्य रसायनों की व्यवस्था की थी। इन विस्फोटक सामग्रियों की खरीद और प्रसंस्करण के लिए वित्तीय सहायता खान ने उपलब्ध कराई थी।

अभियोजन के अनुसार, खान का सट्टा कारोबार इस गतिविधि की आड़ बना। सट्टेबाजी से जुड़े लोगों की आवाजाही, शोर-शराबे और देर रात तक चलने वाली गतिविधियों के कारण विस्फोटक सामग्री लाना और बम तैयार करना बिना संदेह पैदा किए संभव हो सका।

सत्र न्यायालय में सुनवाई के दौरान जाँच एजेंसियों ने बताया कि आरोपितों ने अत्यधिक मात्रा में विस्फोटक पदार्थ जमा कर लिए थे, जिन्हें सुरक्षित रूप से संभालना या रखना संभव नहीं था। खालिद को मुख्य बम निर्माता बताया गया जबकि खान को इस पूरी साजिश का वित्तपोषक, आयोजक और संचालन करने वाला मुख्य व्यक्ति बताया गया।

अभियोजन पक्ष का कहना था कि ये बम भविष्य में आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने के लिए बनाए जा रहे थे। बऊबाजार विस्फोट स्वयं नियोजित हमला नहीं था बल्कि बम फैक्ट्री में जमा विस्फोटकों और तैयार उपकरणों के आकस्मिक विस्फोट का परिणाम था।

बताया गया कि शुरुआती चिंगारी के बाद वहाँ रखी विस्फोटक सामग्री में एक के बाद एक धमाके हुए। विस्फोट की तीव्रता से लैब पूरी तरह तबाह हो गई और आसपास की इमारतें भी ध्वस्त हो गईं। घनी आबादी, संकरी गलियों और एक-दूसरे से सटी इमारतों के कारण जनहानि का दायरा और बढ़ गया।

इस प्रकार बऊबाजार विस्फोट किसी सार्वजनिक स्थान को निशाना बनाकर किए गए टाइम-बम हमले से अलग था। अभियोजन के अनुसार, यह घटना एक सक्रिय बम फैक्ट्री का पर्दाफाश थी, जहाँ भविष्य में इस्तेमाल के लिए तैयार किए जा रहे विस्फोटक समय से पहले ही फट गए थे।

69 लोग मारे गए और इमारतें मलबे में तब्दील हो गईं

17 मार्च 1993 को दर्ज किए गए FIR में शुरुआत में 40 लोगों की मौत और कई अन्य के गंभीर रूप से घायल होने का उल्लेख किया गया था। बाद में मृतकों की संख्या बढ़ गई। बाद की न्यायिक कार्यवाही में राज्य सरकार ने बताया कि इस विस्फोट में कुल 69 लोगों की मौत हुई और 46 लोग घायल हुए। आठ इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गईं या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुईं।

मामले की शुरुआत में IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश), 436, 326 और 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं के तहत हुई थी। बाद में मृतकों की संख्या बढ़ने पर हत्या की धाराएँ भी जोड़ दी गईं।

अभियोजन के अनुसार, मलबे की फोरेंसिक जाँच में विस्फोटक अवशेष, तार, टुकड़े और बम निर्माण से जुड़ी अन्य सामग्री बरामद हुई। जाँच एजेंसियों ने यह संभावना खारिज कर दी कि तबाही किसी गैस रिसाव या सामान्य दुर्घटना का परिणाम थी। गवाहों के बयान और घटनास्थल से मिले सबूतों ने भी इस स्थान को खान के अवैध सट्टा कारोबार से जोड़ दिया। मई 1993 में मामले में टाडा की धाराएँ जोड़ी गईं।

टाडा कोर्ट ने खान और उसके साथियों को दोषी ठहराया

2001 में टाडा की नामित अदालत ने मोहम्मद राशिद खान और उसके कई सहयोगियों को दोषी ठहराया। खान को हत्या, आपराधिक साजिश, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के उल्लंघन तथा टाडा के तहत अलग-अलग अपराधों का दोषी पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने मोहम्मद खालिद को बम बनाने वाला प्रमुख व्यक्ति बताया, जबकि खान को पूरी साजिश का आयोजक, वित्तपोषक और संचालन करने वाला मुख्य व्यक्ति बताया गया। बाद के सालों तक पश्चिम बंगाल सरकार ने खान को इस मामले का मास्टरमाइंड बताते हुए उसकी समय से पूर्व रिहाई का विरोध किया।

इसके बाद खान और अन्य दोषियों द्वारा दायर अपीलों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया तथा उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।

अब यह मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है, जहाँ यह तय किया जाएगा कि राशिद खान को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा रिमिशन (सजा में छूट) देना उचित था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई करेगा। तब तक मोहम्मद राशिद खान जेल में ही रहेगा, क्योंकि शीर्ष अदालत द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक के चलते उसकी रिहाई संबंधी दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को फिलहाल लागू नहीं किया जा सकता।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

खेती, शहर और AI… सबको चाहिए पानी, लेकिन भारत के जलाशय दे रहे खतरनाक संकेत: जानें- Moody’s की चेतावनी कितनी भयावह

एक और भारत तपती गर्मी का सामना कर रहा है तो अब दूसरी तरफ गंभीर जल संकट की समस्या भी मुँह बाए खड़ी है। संकट की यह चेतावनी किसी सामान्य संस्था ने नहीं बल्कि वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s) ने दी है। मूडीज का कहना है कि अगर भारत ने जल्द ही अपने जल प्रबंधन यानी वॉटर मैनेजमेंट के सिस्टम में बड़े सुधार नहीं किए तो पानी की कमी सिर्फ लोगों की रोजमर्रा की परेशानी तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इसका असर खेती, उद्योग, शहरों, डिजिटल सेक्टर, सरकारी बजट और देश की आर्थिक स्थिरता तक पहुँच सकता है।

भारत में पानी की समस्या नई नहीं है लेकिन अब यह समस्या बढ़ती जा रही है। पहले पानी की कमी को मुख्य रूप से सूखे, कम बारिश या गर्मियों की समस्या माना जाता था। अब स्थिति बदल चुकी है। देश में आबादी बढ़ रही है, शहर फैल रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं, खेती में पानी की माँग पहले से ही बहुत ज्यादा है और अब डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए डिजिटल सेक्टर भी पानी की माँग बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी अनियमित बारिश और कभी कमजोर मानसून जैसी स्थितियाँ पैदा हो रही हैं।

मूडीज ने भारत के जल प्रबंधन पर सवाल क्यों उठाए

मूडीज ने भारत की जल व्यवस्था को ‘fragmented or inflexible’ बताया है। इसका यह मतलब यह है कि देश में पानी से जुड़े फैसले एक जगह से नहीं लिए जाते। सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, स्थानीय जल संसाधन और पानी के उपयोग से जुड़े बड़े फैसले ज्यादातर राज्य सरकारों के स्तर पर होते हैं। भारत में हर राज्य की जरूरत, प्राथमिकता, राजनीति और नीति अलग-अलग है।

एक राज्य खेती को प्राथमिकता देता है, दूसरा उद्योगों को, तीसरा शहरों की पानी की दरूरत पर ध्यान देता है और चौथा अपने स्थानीय जल स्रोतों के हिसाब से फैसले लेता है। यह व्यवस्था सामान्य समय में तो चल सकती है लेकिन जब पानी की माँग तेजी से बढ़ रही हो और जल स्रोतों पर दबाव हो तब ऐसी बिखरी हुई व्यवस्था बड़ी समस्या बन जाती है।

मूडीज के अनुसार, भारत में यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि पानी का कितना हिस्सा खेती को मिले, कितना घरों को मिले, कितना उद्योगों को मिले और कितना नए डिजिटल सेक्टर को दिया जाए। जब पानी कम हो और माँग ज्यादा हो तब सबसे जरूरी काम होता है पानी का समझदारी से बँटवारा। लेकिन भारत में अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग नीतियों के कारण यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

भारत में खेती में सबसे अधिक पानी का इस्तेमाल

भारत में मौजदू मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। इसका मतलब है कि देश में पानी का सबसे बड़ा उपयोग खेतों में होता है। भारत की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण जीवन के लिए खेती बहुत जरूरी है, इसलिए पानी की जरूरत भी स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब पानी का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो और उसका प्रबंधन कमजोर हो।

कई राज्यों में किसानों को बिजली और पानी पर भारी सब्सिडी मिलती है। इसका उद्देश्य किसानों की मदद करना होता है लेकिन इसका एक दूसरा असर भी पड़ता है। जब पानी बहुत सस्ता या लगभग मुफ्त मिलता है, तो उसके बचाव और सावधानी से उपयोग की भावना कमजोर हो जाती है। कई क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन इसी वजह से बढ़ा है।

किसान सिचांई के लिए बड़े पैमाने पर भू-जल निकालते हैं। कई जगहों पर बिजली सब्सिडी के कारण पंपिंग की लागत कम होती है। इससे पानी निकालना आसान हो जाता है लेकिन जमीन के नीचे का जल स्तर लगातार गिरता जाता है। शुरू में इसका असर दिखाई नहीं देता लेकिन कुछ वर्षों बाद कुएँ, ट्यूबवेल और बोरवेल सूखने लगते हैं। यही स्थिति कई राज्यों में देखने को मिल रही है।

सब्सिडी और पानी की कीमत का बड़ा सवाल

भारत में कई जगह पानी सस्ता है, कई जगह मुफ्त जैसा है और कई जगह उसकी वसूली बहुत कम है। इसका असर जल प्रबंधन पर पड़ता है। जब किसी संसाधन की कीमत बहुत कम रखी जाती है, तो लोग उसके उपयोग को लेकर उतने सावधान नहीं रहते।

मूडीज ने कहा है कि पानी की अत्यधिक सब्सिडी कई बार समझदारी से इस्तेमाल को रोकती है। सरल भाषा में इसका मतलब यह है कि जहाँ पानी सस्ता या मुफ्त मिलता है, वहाँ उसे बचाने की प्रेरणा कम हो जाती है। इससे पानी की माँग बढ़ती है, पाइपलाइन और वितरण व्यवस्था पर दबाव आता है, भूजल तेजी से घटता है और सरकार को अधिक खर्च करना पड़ता है।

डेटा सेंटर और डिजिटल अर्थव्यवस्था का नया दबाव

भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था जल प्रबंधन के सामने एक नई चुनौती बनकर उभर रही है। क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उद्योगों के विस्तार से पानी की माँग और बढ़ने की आशंका है। डेटा सेंटरों में सर्वर कूलिंग और अन्य तकनीकी के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है।

मूडीज ने कहा कि क्लाउड कंप्यूटिंग और AI के विस्तार के चलते डेटा सेंटरों की तेजी से बढ़ती माँग जल पर नया दबाव पैदा कर रही है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पानी की आपूर्ति की भौतिक संरचना भी बेहद मायने रखती है। अगर किसी शहर या क्षेत्र की पानी की आपूर्ति एक ही स्रोत या एक ही उपचार प्रणाली पर निर्भर है, तो उस स्रोत पर तनाव आने से पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ती अनिश्चितता

मूडीज ने जलवायु परिवर्तन को भी भारत के जल संकट का बड़ा कारण बताया है। देश पहले से ही सूखा, बाढ़, गर्मी, अनियमित वर्षा और मानसून की अनिश्चितता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। World Resources Institute की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को हीट स्ट्रेस, बाढ़ और मानसून की अस्थिरता से उच्च क्रेडिट एक्सपोजर है। जल प्रबंधन श्रेणी में भारत की स्थिति और भी गंभीर बताई गई है जिसकी बड़ी वजह पुराना जल ढाँचा, भूजल दोहन और बुनियादी सुविधाओं की कमजोरी है।

जलवायु परिवर्तन के कारण कभी अत्यधिक बारिश होती है, तो कभी लंबे समय तक सूखा पड़ता है। इससे जलाशयों, नदियों, भूजल और शहरी जल आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है। अगर मानसून कमजोर या अनियमित रहा, तो पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह चिंता भी सामने आई कि मानसून समय से पहले आने की उम्मीद के बावजूद एल नीनो जैसी स्थिति बारिश को कमजोर कर सकती है।

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई की अलग-अलग स्थिति

मुंबई की स्थिति इस समय सबसे चिंताजनक उदाहरणों में से एक है। BMC के अनुसार, मुंबई के 7 जलाशयों में कुल क्षमता का केवल 9.33 प्रतिशत पानी बचा है। इसका मतलब है कि शहर के पास लगभग एक महीने का ही पानी उपलब्ध है। जल भंडारण का स्तर पिछले वर्षों की इसी अवधि की तुलना में कम है। इसी कारण मुंबई में पानी की राशनिंग की घोषणा करनी पड़ी।

दिल्ली भी पानी की गंभीर कमी से जूझ रही है। राष्ट्रीय राजधानी के कई इलाकों में 15 से 20 दिनों तक नियमित पानी नहीं मिलने की बात सामने आई है। दिल्ली में अभी लगभग 948 से 950 मिलियन गैलन प्रतिदिन पानी उत्पादन हो रहा है और यह सामान्य स्तर से करीब 50 मिलियन गैलन कम है। इस कमी के कारण सप्लाई में बाधाएँ आ रही हैं और लोगों को पानी के लिए परेशानी झेलनी पड़ रही है।

चेन्नई में लगभग 288 दिनों के पेयजल के लिए पर्याप्त भंडार है। लेकिन विशेषज्ञों की चिंता यह है कि भूजल स्तर में गिरावट, उद्योगों की बढ़ती माँग और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भविष्य में चेन्नई के लिए भी मुश्किलें पैदा कर सकता है। यह बताता है कि आज बेहतर दिख रही स्थिति भी स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं है, अगर प्रबंधन ढाँचा मजबूत न हो।

देश के जलाशयों की स्थिति और गिरता भंडारण

Central Water Commission की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश के निगरानी वाले जलाशयों में कुल 63.232 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध है। यह सामान्य भंडारण से करीब 24% अधिक है लेकिन हालिया गिरावट चिंता पैदा करती है। 30 अप्रैल 2026 को देश के 166 जलाशयों में 71.082 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल क्षमता का 38.72 प्रतिशत था। 14 मई की रिपोर्ट तक यह घटकर 63.232 बिलियन क्यूबिक मीटर, यानी कुल क्षमता का 34.45 प्रतिशत रह गया। इसका अर्थ है कि केवल दो सप्ताह में करीब 8 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी कम हो गया।

13 प्रमुख जलाशयों में 50% कम जल

इस गिरावट ने चिंता इसलिए बढ़ाई है क्योंकि 13 प्रमुख जलाशयों में जल स्तर सामान्य भंडारण के 50 प्रतिशत से नीचे पहुँच गया है। 30 अप्रैल को ऐसे जलाशयों की संख्या नौ थी लेकिन अब यह बढ़कर 13 हो गई है। यह तेजी से गिरते जल स्तर का संकेत है।

इसके अलावा कुल 31 जलाशय ऐसे हैं जहाँ पानी का स्तर सामान्य भंडारण के 80 प्रतिशत या उससे कम पर आ गया है। इनमें 13 जलाशय 50 प्रतिशत से नीचे हैं जबकि 18 जलाशय 51 से 80 प्रतिशत के बीच हैं। इन 18 में से तीन जलाशय 51 से 60 प्रतिशत के बीच, सात जलाशय 61 से 70 प्रतिशत के बीच और आठ जलाशय 71 से 80 प्रतिशत के बीच हैं। जलाशयों पर यह दबाव कई राज्यों तक फैला है।

जलाशयों की गिरती स्थिति आने वाले दिनों में पीने के पानी की आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ा सकती है। जलाशय सिर्फ शहरों और गाँवों की पेयजल जरूरतों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि वे खेती और जलविद्युत उत्पादन के लिए भी जरूरी हैं। अगर गर्मी बढ़ती रही और मानसून कमजोर या देर से प्रभावी हुआ, तो जिन राज्यों में जलाशय पहले से आधे से नीचे हैं, वहाँ संकट और गंभीर हो सकता है।

सुधार नहीं हुए तो गहराएगा संकट

मूडीज की चेतावनी का सार यही है कि भारत को जल प्रबंधन को केवल स्थानीय या मौसमी समस्या मानकर नहीं चलना चाहिए। यह राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता, सार्वजनिक वित्त, औद्योगिक विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।

कृषि में अत्यधिक पानी की खपत, सब्सिडी आधारित मूल्य व्यवस्था, राज्यों के बीच बिखरी हुई नीतियाँ, कमजोर बुनियादी ढाँचा, भूजल दोहन, डेटा सेंटरों की बढ़ती माँग और जलवायु परिवर्तन ये सभी कारक मिलकर भारत के जल संकट को बड़ा बना रहे हैं।

अगर भारत को आने वाले वर्षों में बड़े जल संकट से बचना है तो लंबे समय तक की योजना, बेहतर जल शासन, जल वितरण में लचीलापन, बुनियादी ढाँचे में निवेश और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को प्राथमिकता देनी होगी। मूडीज की चेतावनी साफ संकेत देती है कि पानी का सवाल अब सिर्फ जीवन का नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, विकास और वित्तीय स्थिरता का भी सवाल है।

धर्म- संस्कृति की रक्षा, NGOs पर सख्ती: जानिए भारत के नए FCRA नियमों से कैसे लगेगी विदेशी फंडिंग से होने वाले धर्मांतरण पर लगाम

केंद्र सरकार ने विदेशी चंदे को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 (FCRA Amendment Rules, 2026) लागू कर दिए हैं। गृह मंत्रालय ने जो नए नियम बनाए हैं, उनमें धार्मिक गतिविधियों की पूरी सूची जारी की गई है, साथ ही धर्मांतरण से जुड़ी एक्टिविटीज पर पूरी तरह रोक लगाया गया है।

इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी धन प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों और अन्य संस्थाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी को और मजबूत बनाना है।

FCRA नियमों में 10वाँ संशोधन

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 (FCRA Rules) में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। यह FCRA नियमों में 10वाँ संशोधन है, हालाँकि यह समझना जरूरी है कि सरकार ने मूल FCRA अधिनियम, 2010 में कोई बदलाव नहीं किया है।

केवल उसके तहत बने नियमों और प्रक्रियाओं को संशोधित किया गया है। जैसे कि एफसीआरए पंजीकरण के लिए कौन पात्र है, उन्हें औपचारिक रूप से क्या घोषित करना होगा, उन्हें प्राप्त विदेशी धन के हर एक रुपये का हिसाब कैसे देना होगा, और किन गतिविधियों पर अब पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

इन नए नियमों का उद्देश्य विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों की जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाना है। अब किसी संस्था को FCRA पंजीकरण के लिए अपने उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताने होंगे। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक या आर्थिक कार्यों में से किस क्षेत्र में वह काम करती है, ये बताना पड़ेगा।

सरकार ने विदेशी धन के उपयोग पर निगरानी भी बढ़ा दी है। संस्थाओं को यह बताना होगा कि पैसा कहाँ से आया, उसका उपयोग किस काम में हुआ और प्रत्येक रुपये का हिसाब रखना होगा। सोशल मीडिया खातों और डोनर की जानकारी देना भी अनिवार्य किया गया है।

नए नियमों में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों पर विशेष जोर दिया गया है। धार्मिक और सामाजिक कार्यों की अनुमति रहेगी, लेकिन विदेशी धन का उपयोग धर्म परिवर्तन कराने के लिए नहीं किया जा सकेगा।

इसके अलावा, निष्क्रिय संगठनों पर भी शिकंजा कसा गया है। जिन संस्थाओं ने लंबे समय तक कोई उल्लेखनीय गतिविधि नहीं की है, उनके लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कठिन होगा। सरकार चाहती है कि केवल सक्रिय और पारदर्शी संगठन ही विदेशी फंड प्राप्त कर सकें।

कुल मिलाकर, इन बदलावों का मकसद विदेशी धन के उपयोग को अधिक पारदर्शी बनाना, उसके दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल केवल घोषित और वैध उद्देश्यों के लिए ही हो।

लंबे समय से विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग किया जाता रहा है

जब 2011 में मूल विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम तैयार किए गए थे, तब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्ता में थी। उस समय, इन नियमों के तहत ‘धार्मिक’, ‘शैक्षिक’, ‘सामाजिक’ या ‘सांस्कृतिक’ जैसे व्यापक और लचीले उद्देश्यों के लिए पंजीकृत संगठनों को बाहरी दान स्वीकार करने की अनुमति दी गई थी, जबकि इन उद्देश्यों का वास्तव में मतलब क्या था, इसकी जाँच कम की गई। बुनियादी जानकारी दी जाती थी, वार्षिक रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य था और पंजीकरण जरूरी था। हालाँकि नियमों में ‘धार्मिक उद्देश्य’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। इसके गंभीर परिणाम हुए।

यूपीए शासन के दौरान, जब सोनिया गाँधी का सत्ताधारी गठबंधन पर काफी प्रभाव था, तब यह नियामकीय खामी सामने आई। 2011 के नियमों की अस्पष्टता का फायदा कई संगठनों ने उठाया। धार्मिक प्रचार-प्रसार का एक ऐसा ही उदाहरण था जाकिर नाइक का प्रचार-प्रसार। उस पर निगरानी काफी कम थी।

2005 और 2007 के बीच दुबई में पीस टीवी और उसके प्रचार नेटवर्क की स्थापना के बाद विदेशी फंडिंग नियमों की अनदेखी की गई। इसी समय गाँधी परिवार से जुड़े संगठनों में चीन की एंट्री को लेकर चिंताएँ भी सामने आईं। सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राजीव गाँधी फाउंडेशन और राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट, दोनों के एफसीआरए पंजीकरण 2022 में रद्द कर दिए गए क्योंकि इनमें अनियमितता पाई गई और नियमों का उल्लंघन सामने आया।

बाद के वर्षों में, केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकारों की खुफिया रिपोर्टों ने लगातार यह जानकारी दी गई कि विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसका उपयोग धार्मिक क्रियाकलाप, शिक्षा और धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाना था, लेकिन इसका इस्तेमाल संगठित धर्मांतरण और लोगों को लालच देकर या बहला फुसलाकर धर्म परिवर्तन के लिए किया जा रहा था। खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में ये बखूबी जारी था। गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक 20000 से अधिक एफसीआरए पंजीकरण निलंबित या रद्द किए जा चुके हैं, जिनमें से एक कारण धर्मांतरण गतिविधि को बताया गया है।

झारखंड, मणिपुर और मुंबई में काम करने वाले चार ईसाई प्रचारक संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस को गृह मंत्रालय ने सितंबर 2020 में निलंबित कर दिया था। यह निलंबन जनजातीय लोगों के धर्मांतरण से संबंधित खुफिया रिपोर्टों के आधार पर किया गया था। 2020 में ही 13 और गैर सरकारी संगठनों के लाइसेंस भी निलंबित कर दिए गए थे।

वर्ल्ड विजन इंडिया, चर्च की सामाजिक कार्रवाई सहायक संस्था और इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया जैसे प्रमुख संगठनों का पंजीकरण 2024 में रद्द कर दिया गया। इन सभी मामलों में एक ही पैटर्न था: कल्याणकारी या धार्मिक उद्देश्यों के लिए पंजीकरण, लेकिन जमीन पर इनका उद्देश्य टारगेटेड धर्मांतरण अभियान था। ये लोग कमजोर, गरीब और जनजातीय लोगों को फोकस करते और उनके धर्मांतरण का पूरा प्रयास करते थे। इसके लिए विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल किया जाता था।

धर्मांतरण से निपटने के लिए नियमों में स्पष्टता की जरूरत थी

एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकरण कराने के इच्छुक सभी संगठनों को अब सरकार ने जिन लक्ष्यों का अपने अधिसूचना में उल्लेख किया है उसमें से किसी एक को चुनना होगा। इन्हें पाँच हिस्सों में बाँटा गया है। सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षिक। यदि आपका उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो आप पंजीकरण नहीं करा सकते।

नियमों में अब स्पष्ट रूप से तय कर दिया गया है कि धार्मिक समुदाय के कई समूहों के लिए गतिविधियाँ ‘ धर्म परिवर्तन को छोड़कर ‘ संचालित की जानी चाहिए। धार्मिक शिक्षा, धार्मिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण, स्वदेशी मान्यताओं का संरक्षण, सत्संग, प्रवचन, ध्यान साधना सत्र इसमें शामिल हैं। साथ ही स्वदेशी और जनजातीय धार्मिक मान्यताओं का दस्तावेजीकरण, रखरखाव और पुनरुद्धार भी प्रभावित श्रेणियों में शामिल हैं।

अंतिम श्रेणी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि स्वदेशी आस्था के संरक्षण या पुनरुद्धार का दशकों तक व्यवस्थित धर्मांतरण के लिए बहाने की तरह इस्तेमाल किया था। अब नियमों ने एक ऐसी सीमा निर्धारित की है जो कानूनी रूप से सही और सभ्यतागत रूप से विवेकपूर्ण दोनों है। नए नियम के तहत कुछ गतिविधियों की अनुमति दी गई है, लेकिन धर्म परिवर्तन को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।

विदेशी नागरिकों से जुड़े नियम सख्त किए गए

संशोधित नियमों के अनुसार, जिन संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारियों में भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) के अलावा अन्य विदेशी नागरिक शामिल हैं, उन्हें सामान्यतः एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति नहीं दी जाएगी। हालाँकि, केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में अपवादस्वरूप अनुमति प्रदान कर सकती है।

नए नियम में ‘प्रमुख पदाधिकारी’ का अर्थ विस्तार से समझाया गया है, इसमें कंपनियों के निदेशक, व्यवसायों में साझेदार, न्यासी, हिंदुओं का संयुक्त परिवार के मुखिया और प्रभावी प्रबंधन नियंत्रण रखने वाले कोई भी व्यक्ति शामिल हैं। इससे उस कमी को दूर किया गया है, जिसमें नाममात्र के भारतीय अधिकारी शीर्ष पद पर बैठे होते थे और वास्तविक नियंत्रण विदेशी व्यक्ति के हाथों में होता था, जो बाहर से काम करते थे।

नए नियम में धन के लेन-देन को पारदर्शी बनाया गया है। इसे और सख्त किया गया है। पंजीकरण के दौरान गैर-सरकारी संगठनों को अपने सभी सोशल मीडिया खातों की जानकारी देना अनिवार्य है। डोनर या मध्यस्थों से मिलने वाले दान के मामले में वास्तविक डोनर या दान के मूल स्रोत का खुलासा होना आवश्यक है। यदि किसी संस्था को विदेशी धन डोनर एडवाइज्ड फंड (DAF) या अन्य मध्यस्थ वित्तीय माध्यमों से प्राप्त होता है, तो उसे अंतिम दाता (Ultimate Donor) की जानकारी देना अनिवार्य होगा। इससे विदेशी फंडिंग के स्रोतों की बेहतर निगरानी हो सकेगी।

नियमों के अनुसार, एफसीआरए पंजीकरण के नवीनीकरण और पंजीकरण रद्द होने से बचने के लिए संस्था को पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये की विदेशी राशि को अनुमोदित गतिविधियों पर खर्च करना होगा। अगर पहले से अनुमति मिल चुकी है तो रकम प्राप्त करने वाले ग्रुप को अगली किश्तें तभी दी जाएँगी जब पिछली किश्त का 75% उपयोग हो चुका हो। दूसरे शब्दों में, निष्क्रिय लाइसेंस स्वतः समाप्त हो जाएँगे।

एफसीआरए के तहत पंजीकृत सभी मौजूदा संगठनों को अधिसूचना की तारीख से एक वर्ष के भीतर नए शेड्यूल के अंतर्गत अपने उद्देश्यों और संचालन के तरीकों की औपचारिक घोषणा करनी होगी। यह संक्रमणकालीन प्रावधान सार्वजनिक जवाबदेही अनिवार्य बनाता है और यह केवल प्रशासनिक नहीं है। आजकल, प्रत्येक संगठन को विशिष्ट और स्पष्ट रूप से परिभाषित लक्ष्यों के प्रति औपचारिक रूप से प्रतिबद्ध होना आवश्यक है।

यदि कोई संस्था अपने कार्यक्षेत्र में नए राज्य, केंद्र शासित प्रदेश या अतिरिक्त उद्देश्य जोड़ना चाहती है, तो प्रत्येक अतिरिक्त प्रविष्टि के लिए 300 रुपए बतौर शुल्क जमा करना होगा। पहले से पंजीकृत संगठनों को नए नियम लागू होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर अपने उद्देश्यों और कार्यक्षेत्र की जानकारी देनी होगी।

22 जून को नियमों में किए गए बदलाव का महत्व सिर्फ इतना ही नहीं है। यह व्यवस्थित रूप से तैयार किए जा रहे सरकार के व्यापक विधायी ढाँचे का हिस्सा है। विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026, मार्च में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। फिलहाल यह विचाराधीन है। विधेयक मूल एफसीआरए अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव करता है।

अब तक के नियम के मुताबिक, जब किसी संगठन का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो विदेशी रकम से वर्षों में बनाई गई उसकी संपत्तियाँ मसलन भूमि, मकान, अस्पताल, विद्यालय और उपकरण अक्सर कानूनी रूप से हाशिए पर चले जाते हैं। इस विधेयक से यह समस्या पूरी तरह से दूर हो जाएगी।

एफसीआरए नियमों के उल्लंघन की स्थिति में संस्था पर दुरुपयोग की गई राशि का 30 प्रतिशत या 1 लाख रुपये, जो भी अधिक हो, तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह दंड बिना अनुमति विदेशी चंदा प्राप्त करने, प्रशासनिक खर्च की निर्धारित सीमा से अधिक खर्च करने तथा धन का अनधिकृत गतिविधियों या क्षेत्रों में उपयोग करने पर लागू होगा।

सभ्यता और संस्कृति की होगी रक्षा

भारत की कार्रवाई भय से प्रेरित नहीं है। जिस सभ्यता ने गुरु ग्रंथ साहिब, त्रिपिटक, वेद और उपनिषदों को जन्म दिया, वह स्वतंत्र धार्मिक अनुष्ठानों या खुले धार्मिक विमर्श से नहीं डरती। लेकिन विदेशी धन के दम पर होने वाले धर्मांतरण परियोजनाओं को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके माध्यम से व्यवस्थित रूप से कमजोर लोगों, गरीबों, असहायों , जनजातीय लोगों को टारगेट किया जाता है। विदेशों से सारी योजनाएँ निर्देशित होती हैं और फलती-फूलती हैं। हर सच्चा लोकतंत्र विदेशी धन के हेरफेर से अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने की रक्षा करता है। अमेरिका में FARA लागू है। फ्रांस में विदेशी धार्मिक संगठनों पर कड़े नियम लागू हैं। भारत का कड़ा FCRA ढाँचा सामाजिक आत्मनिर्णय का एक सामान्य अभ्यास है, कोई अपवाद नहीं।

22 जून, 2026 को जारी नियमों की अधिसूचना सटीक, तर्कसंगत और लंबे समय से विचाराधीन है। संसद की सहमति के बाद वर्तमान संशोधन विधेयक को अमली जामा पहनाया जा सकेगा। इन संशोधनों को मिलाकर एक स्पष्ट लेकिन महत्वपूर्ण गारंटी मिलती है कि भारत की जनता की सहायता करने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति बिना किसी प्रतिबंध के ऐसा कर सकता है, बशर्ते वह भारत की शर्तों पर, स्पष्ट इरादों और घोषित लक्ष्यों के साथ ऐसा करे और विदेशी फंड की मदद से किसी भी धर्मांतरण एजेंडा का पालन न करे। भारत के धार्मिक ताने-बाने की अब पूरी सतर्कता से रक्षा करने की दिशा में यह अहम पहल है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसके मूलरूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ना NOC, ना इमरजेंसी EXIT और बेसमेंट में क्लासेस… लखनऊ कोचिंग अग्निकांड के बाद सख्त हुए CM योगी, 100+ संस्थान सील: पढ़ें- अब तक क्या-क्या हुआ?

लखनऊ के अलीगंज स्थित एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगने से 15 छात्रों की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में कोचिंग संस्थानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पूरे प्रदेश में फायर सेफ्टी ऑडिट चलाया जा रहा है। अब तक 100 से अधिक कोचिंग संस्थानों को सील किया जा चुका है। जाँच में फायर NOC की कमी, अवैध निर्माण, बेसमेंट में क्लास, आपातकालीन निकास का अभाव और भवन मानकों के उल्लंघन जैसी गंभीर खामियाँ सामने आई हैं।

लखनऊ में क्या हुआ था और CM योगी सरकार का एक्शन

लखनऊ के अलीगंज इलाके में एक व्यावसायिक भवन में भीषण आग लग गई थी। इस हादसे में 15 लोगों की जान चली गई। मृतकों में बड़ी संख्या में छात्र और युवा शामिल थे। शुरुआती जाँच में सामने आया कि जिस भवन में गतिविधियाँ चल रही थीं, वहाँ सुरक्षा मानकों (Standards) की भारी अनदेखी की गई थी।

घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना कार्यक्रम बदला और सीधे घटनास्थल पहुँचे। उन्होंने अस्पताल में घायलों से मुलाकात की। इसके बाद पूरे मामले की उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दिए गए। हादसे के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशभर में विशेष अभियान चलाने का आदेश दिया।

पुलिस, प्रशासन, विकास प्राधिकरण, अग्निशमन विभाग और विद्युत सुरक्षा विभाग की संयुक्त टीमें गठित की गईं। सभी जिलों में कोचिंग सेंटरों, हॉस्टलों, अस्पतालों, नर्सिंग होम, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और अन्य व्यावसायिक भवनों की जाँच शुरू कर दी गई। अधिकारियों को मिशन मोड में फायर सेफ्टी ऑडिट करने के निर्देश दिए गए।

मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि यह हादसा पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी है। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने निर्देश दिया कि कोई भी कोचिंग संस्थान बेसमेंट में नहीं चलेगा। बेसमेंट में किसी भी तरह की कमर्शियल गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।

अगर बेसमेंट पार्किंग के लिए स्वीकृत है तो उसका उपयोग केवल पार्किंग के लिए ही किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आवासीय भवनों का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। जिस उद्देश्य के लिए भवन को स्वीकृति मिली है, उसी उपयोग की अनुमति होगी।

SIT जाँच और जिम्मेदार अधिकारियों पर शिकंजा

हादसे की जाँच के लिए मुख्यमंत्री ने विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया। टीम को 7 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया। SIT ने घटनास्थल का निरीक्षण किया। फॉरेंसिक टीम ने मोबाइल फोन, पहचान पत्र और अन्य साक्ष्य जब्त किए। घायलों और प्रत्यक्षदर्शियों से भी पूछताछ की गई। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने 2016 से 2019 के बीच तैनात 19 अधिकारियों और इंजीनियरों की सूची SIT को सौंपी है।

इन अधिकारियों पर अवैध निर्माण को नजरअंदाज करने के आरोप हैं। पुलिस ने भवन मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला, गेमिंग जोन संचालक तुषांक कृष्ण जायसवाल, पेट क्लीनिक संचालक रामकृष्ण उपाध्याय और नेटवर्किंग कार्य से जुड़े सुरेश कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगाने में जुटी हैं कि अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के लिए कौन-कौन जिम्मेदार था।

खान सर के सेंटर समेत इन बड़े शहरों में हुई ताबड़तोड़ सीलिंग

प्रयागराज में जाँच के लिए 10 टीमों का गठन किया गया। यहाँ 97 पंजीकृत कोचिंग संस्थानों में केवल 15 के पास फायर NOC पाई गई। सिविल लाइंस स्थित खान ग्लोबल स्टडीज को भी सील कर दिया गया। जाँच में कई सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की बात सामने आई।

प्रयागराज के 97 रजिस्टर्ड सेंटरों में से सिर्फ 15 के पास ही वैध फायर NOC पाई गई है। वहीं कानपुर के सबसे बड़े एजुकेशन हब काकादेव में भी प्रशासन ने एक साथ 30 से ज्यादा कोचिंग सेंटरों को सील कर दिया है। इसके अलावा मिर्जापुर में भी करीब एक दर्जन सेंटरों पर प्रशासन का डंडा चला है और उन्हें बंद कर दिया गया है।

वाराणसी में क्या कार्रवाई हुई

वाराणसी विकास प्राधिकरण ने जाँच अभियान शुरू किया। शहर के अलग-अलग इलाकों में 8 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया। एलेन और आकाश जैसे बड़े कोचिंग ब्रांड भी कार्रवाई की जद में आए। शिवपुर और सिकरौल में निरीक्षण के दौरान एलेन सेंटर बिना स्वीकृत नक्शे और भवन मानकों के विपरीत संचालित मिलता पाया गया। मुख्य अग्निशमन अधिकारी के अनुसार पूरे शहर में केवल 14 कोचिंग संस्थानों के पास फायर NOC है। बाकी संस्थान बिना आवश्यक अनुमति के संचालित पाए गए।

लखनऊ हादसे के बाद हाई कोर्ट के सुरक्षा संबंधी निर्देशों का भी हवाला दिया जा रहा है। वाराणसी में सेंट्रल बार एसोसिएशन ने DM को ज्ञापन देकर सभी कोचिंग सेंटर, हॉस्टल और होटलों की 10 दिनों में जाँच कराने की माँग की है। सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों को तत्काल सील करने की भी माँग उठी है।

गाजियाबाद में सबसे बड़ा अभियान

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने 206 भवनों को चिह्नित किया। पहले ही दिन 62 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया। इन संस्थानों के पास फायर NOC नहीं थी। अग्निशमन विभाग ने 81 कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरी की जाँच की। 35 संस्थानों में गंभीर खामियाँ मिलने पर नोटिस जारी किए गए।

कानपुर के काकादेव में 30+ सेंटर सील

कानपुर के सबसे बड़े कोचिंग हब काकादेव में बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई। 30 से अधिक कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया। सबसे गंभीर मामला बेसमेंट का मिला। जिन जगहों को पार्किंग के लिए स्वीकृति मिली थी, वहाँ सैकड़ों छात्रों के लिए क्लासरूम बना दिए गए थे। कई संस्थानों की फायर NOC भी वैध नहीं पाई गई।

मिर्जापुर, जौनपुर और चंदौली में भी जाँच

मिर्जापुर में करीब एक दर्जन कोचिंग सेंटर सील किए गए। जौनपुर और चंदौली में भी संयुक्त टीमें लगातार निरीक्षण कर रही हैं। जाँच में फायर सेफ्टी मानकों के उल्लंघन और भवन संबंधी अनियमितताओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

नोएडा में बिना रजिस्ट्रेशन चल रहे सेंटर बंद

नोएडा में कई संस्थानों की जाँच हुई। सेक्टर-149 का एक कोचिंग सेंटर बिना रजिस्ट्रेशन और फायर सुरक्षा प्रमाणपत्र के संचालित पाया गया। एक अन्य संस्थान वैध लाइसेंस के बिना चल रहा था। दोनों को सील कर दिया गया और दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किए गए।

कोचिंग संस्थानों के लिए पहले से क्या नियम थे

सरकार ने पहले ही फायर सेफ्टी नियम लागू कर रखे थे। 9 मीटर से अधिक ऊँची इमारतों, ग्राउंड प्लस 2 या उससे अधिक मंजिल वाले भवनों और 20 या उससे अधिक छात्रों की क्षमता वाले कोचिंग संस्थानों के लिए फायर NOC जरूरी है।

ऐसे संस्थानों में 2 सुरक्षित निकास मार्ग होने चाहिए। अग्निशामक यंत्र, स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म और पर्याप्त वेंटिलेशन अनिवार्य हैं। विद्युत सुरक्षा व्यवस्था भी मानक के अनुरूप होनी चाहिए। फायर NOC के लिए भवन का स्वीकृत नक्शा जमा करना होता है।

फायर सेफ्टी लेआउट देना होता है। इलेक्ट्रिकल सेफ्टी सर्टिफिकेट और स्वामित्व या किरायेदारी के दस्तावेज भी आवश्यक होते हैं। अग्निशमन विभाग की टीम स्थल निरीक्षण करती है। सभी मानक पूरे होने पर 15 से 30 दिन के भीतर NOC जारी की जाती है।

फिर कोचिंग संस्थानों ने किन नियमों का पालन नहीं किया

जाँच में सामने आया कि बड़ी संख्या में संस्थानों के पास फायर NOC ही नहीं थी। कई भवनों का नक्शा स्वीकृत नहीं था। कई जगह बेसमेंट में क्लासरूम बनाए गए थे। अधिकांश भवनों में आपातकालीन निकास नहीं मिला। कई जगह अग्निशामक यंत्र तक नहीं थे। कुछ संस्थानों में स्मोक डिटेक्टर और फायर अलार्म भी नहीं लगे थे।

निरीक्षण के दौरान सीढ़ियों पर बिजली के मीटर लगे मिले। कई भवनों में लकड़ी का अत्यधिक सामान रखा था। सीढ़ियों पर एसी यूनिट लगी हुई थीं। कई संस्थानों में आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं था। अग्निशमन उपकरणों का अभाव भी मिला। विद्युत सुरक्षा व्यवस्था भी खराब पाई गई।

योगी सरकार का रुख साफ है कि छात्रों की सुरक्षा सर्वोपरि है। सरकार ने निर्देश दिया है कि कार्रवाई निष्पक्ष हो लेकिन सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। प्रदेशभर में जारी अभियान से यह भी स्पष्ट हो गया है कि वर्षों से चल रही कई अनियमितताएँ अब प्रशासन के निशाने पर हैं।

आने वाले दिनों में और संस्थानों पर कार्रवाई की संभावना है। यह अभियान केवल फायर NOC तक सीमित नहीं है, बल्कि अवैध निर्माण, भवन उपयोग, रजिस्ट्रेशन और आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्थाओं की भी व्यापक जाँच की जा रही है।

कंगाली से जूझते बांग्लादेश को ‘काले धन’ का सहारा, विदेश में जमा ₹21.8 लाख करोड़ पर नजर: बर्बादी की कगार पर कपड़ा उद्योग, कभी इसी ‘मॉडल’ से मोदी सरकार को कोसते थे वामपंथी

बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल के दौरान कथित तौर पर देश से बाहर भेजी गई 230 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति वापस लाने की कोशिशें तेज कर रही है। इससे पहले मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने कहा था कि बांग्लादेश से 234 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम ‘चोरी‘ की गई थी। सरकार ने यह भी कहा था कि इस धन की वापसी में मदद करना ब्रिटेन की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है।

लेकिन अब मौजूदा सरकार इस 230 अरब डॉलर की राशि को वापस लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वहीं पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियाँ और बढ़ गई हैं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह भी कहा था कि शेख हसीना के शासन के अंतिम वर्षों में हर साल लगभग 16 अरब डॉलर बांग्लादेश से बाहर भेजे जा रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नई सरकार ने विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर दिए हैं। तारिक रहमान सरकार इस मामले में अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने की कोशिश कर रही है और बड़े उद्योगपतियों व शेख हसीना के शासनकाल से जुड़े लोगों के खिलाफ कानूनी मामले भी दर्ज कर रही है।

हालाँकि, सरकार इस धन को वापस लाने के लिए बेहद उत्सुक है, लेकिन उसे इस बात का भी एहसास है कि यह काम आसान नहीं है। बांग्लादेश के पास विदेशों में छिपाई गई संपत्तियों का पता लगाने और उनसे जुड़े जटिल कानूनी मामलों को संभालने का पर्याप्त अनुभव नहीं है। यह काम भूसे के ढेर में सुई ढूँढने जैसा माना जा रहा है।

बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है कि अगर कोई बड़ी रकम वापस मिलती भी है तो इसमें कई साल, बल्कि दशकों तक लग सकते हैं। वहीं, शेख हसीा के सत्ता से हटने और देश छोड़ने के बाद से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी काफी कमजोर हो गई है।

बांग्लादेश सरकार के अधिकारी खुद मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश का बैंकिंग क्षेत्र लगभग ढहने की स्थिति में पहुँच गया है। बैंकों को खराब कर्ज (NPL) कुल ऋण का करीब 30 से 35 प्रतिशत तक पहुँच गए हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक स्तरों में से एक है। कई बैंक आर्थिक रूप से इतने कमजोर (Insolvent) हो गए हैं कि वे अपने दम पर चलने की स्थिति में नहीं हैं। कुछ बैंकों को दूसरे बैंकों में मिलाना (Merge) पड़ा है।

वहीं बांग्लादेश का विदेश मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve), जो 2021 में शेख हसीना सरकार के दौरान लगभग 48 अरब डॉलर तक पहुँच गया था, 2024 तक घटकर 20 अऱब डॉलर के स्तर पर आ गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे खराब प्रबंधन और वित्तीय गड़बड़ियाँ भी एक बड़ा कारण है।

इसके अलावा वित्त वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर घटकर 3.49 प्रतिशत रह गई। हालाँकि, 2025-26 के वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 4.6 से 4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

ईरान के खिलाफ अमेरका और इजरायल के युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट का भी बांग्लादेश पर गंभीर असर पड़ा है। बांग्लादेश अपनी तेल और ईंधन की जरूरतों का लगभग 95 प्रतिशत आयात करता है, इसीलिए बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव डाला है। बांग्लादेश के वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने हाल ही में कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण पिछले तीन महीनों में देश के खजाने को लगभग 4 अरब डॉलर का ‘नुकसान’ हुआ है।

आर्थिक दबाव बढ़ने के कारण बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से 3 अरब डॉलर का कर्ज माँगना पड़ा है। इसके लिए देश के IMF, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे संस्थानों से सहायता की माँग की है। यह कदम तब उठाया गया जब चालू वित्त वर्ष में देश का राजकोषीय घाटा बढ़कर अनुमानित 3.6 प्रतिशत तक पहुँच गया।

इस बीच वित्त मंत्री महमूद चौधरी ने कहा कि BNP के नेतृत्व वाली सरकार उन संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर रही है, जिन्हें वह ‘लूटी गई संपत्ति’ बताती आई है। उन्होंने कहा, “इस समय जब देश गंभीर वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहा है, तब जितनी भी रकम वापस मिल सके, वह हमारे लिए मददगार साबित होगी।”

इस साल अप्रैल में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बांग्लादेश की संसद को बताया कि विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लेने के प्रयास और मजबूत किए जा रहे हैं। इसके लिए संबंधित देशों के साथ जानकारी साझा करने, संपत्तियों की पहचान करने और कानूनी सहयोग बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विदेशों में जमा या भेजी गई अवैध संपत्तियों को वापस लाना उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है।

बांग्लादेश उन संपत्तियों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है जो ब्रिटेन, अमेरिका, UAE और सिंगापुर सहित कई देशों में मौजूद हैं। इसके लिए नए केंद्रीय बैंक गवर्नर मोहम्मद मुस्ताकुर रहमान की अगुवाई में एक विशेष टास्क फोर्स भी बनाई गई है, जिसका काम विदेशों में मौजूद बांग्लादेसी धन का पता लगाना और उसे वापस लाना है।

वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने कहा कि वित्तीय गड़बड़ियों के कारण कई बैंकों की वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो गई है। उनके अनुसार, कुछ बैंकों की बैलेंस शीट ‘शून्य या घाटे’ में पहुँच गई, जिसके चलते सरकार को उनमें फिर से पूँजी डालनी पड़ी। चौधरी ने कहा, “शेख हसीना से जुड़े कारोबारी और राजनेता लगभग 234 अरब डॉलर देश से बाहर ले गए, जिससे बैंकिंग क्षेत्र गंभीर संकट में आ गया।”

इसी कारण जून 2026 में रहमान सरकार को बैंकिंग क्षेत्र को संभालने और उसे फिर से मजबूत बनाने के लिए 3.2 अरब डॉलर का आपातकालीन सहायता पैकेज देने का फैसला करना पड़ा।

महँगाई भी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। नए केंद्रीय बैंक गवर्नर द्वारा कई महीनों तक सख्त मौद्रित नीतियाँ अपनाने के बावजूद महँगाई दर 8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, जो दक्षिण एशिया में सबसे अधिक मानी जा रही है। मई 2026 तक बांग्लादे की महँगाई दर 9.42 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल 2026 में 9.04 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि एक महीने में महँगाई और बढ़ गई, जिससे लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च भी बढ़ता जा रहा है।

ईरान युद्ध से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भी बांग्लादेश में आम लोगों के लिए भोजन, ईंधन, किराया और अन्य जरूरी सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। देश अभी कोविड-19 महामारी के असर से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दीं।

बांग्लादेश में गरीबी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश की कुल गरीबी दर 27.9 प्रतिशत है, जबकि 9.3 प्रतिशत लोग सबसे ज्यादा गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। इसका मतलब है कि देश की एक चौथाई से भी अधिक आबादी राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

इसके अलावा कई ऐसे परिवार जो पहले गरीबी रेखा से ‘थोड़ा ऊपर’ थे, अब बढ़ती महँगाई के कारण फिर से गरीबी की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी आय कीमतों में हो रही बढ़ोतरी के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही है।

सरकारी कर्ज भी बांग्लादेश के लिए चिंता का विषय बन गया है। देश पर कुल सार्वजनिक कर्ज 22 लाख करोड़ टका से अधिक हो चुका है, जो उसकी GDP का लगभग 40 से 42 प्रतिशत है। इस महीने बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया कि अगर सरकार अगले वित्त वर्ष में कोई नया कर्ज भी नहीं लेती, जो कि संभव नहीं माना जा रहा, “तब भी उसे पहले से लिए गए कर्ज के मूलधन और ब्याज की अदायगी के लिए लगभग 4.35 ट्रिलियन टका खर्च करने पड़ेंगे।”

पिछले दो वर्षों में राजनीति में उथल-पुथल के कारण बांग्लादेश में निवेश में बड़ी गिरावट आई है। नई सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन देश में समय-समय पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा और अशांति के कारण निवेशकों का भरोसा पूरी तरह बन पा रहा है। इसलिए कई निवेशक नया पैसा लगाने या नई परियोजनाएँ शुरू करने से बच रहे हैं।

बात करें बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग की, जो कभी उसकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, आज मुश्किल दौर में गुजर रहा है। करीब 23 अरब डॉलर कीमत वाला यह उद्योग तैयार रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र को धागा और अन्य सामग्री उपलब्ध कराता है। रेडीमेड गारमेंट्स क्षेत्र बांग्लादेश की कुल निर्यात आय का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा देता है। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और भारत के साथ बढ़े तनाव ने इस उद्योग की समस्याओं को और बढ़ा दिया है।

वहीं, भारत यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे भारतीय कपड़ा और परिधान उद्योग को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। अमेरिका पहले से ही भारतीय कपड़ा उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है, जहाँ हर साल लगभग 10.5 से 11 अरब डॉलर के उत्पाद निर्यात किए जाते हैं।

फरवरी 2025 में मोदी सरकार ने कपड़ा मंत्रालय का बजट बढ़ाकर 5,272 करोड़ रुपए कर दिया, जो पिछले वित्त वर्ष के 4,417 करोड़ रुपए से अधिक था। माना गया कि यह कदम उन कंपनियों को आकर्षित करने के लिए उठाया गया, जो बांग्लादेश से अपना कारोबार दूसरी जगह ले जाना चाहती थीं। इससे बांग्लादेश की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गईं।

मई 2025 में भारत ने बांग्लादेशी सामानों पर कुछ बंदरगाह प्रतिबंध लगाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम मुहम्मद यूनुस के भारत के प्रति सख्त रुख के ‘जवाब’ में उठाया गया था। इन प्रतिबंधों से बांग्लादेश को 77 करोड़ डॉलर से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है।

हालाँकि शेख हसीना के शासनकाल में भी बांग्लादेश कोई आदर्श आर्थिक मॉडल नहीं था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 2022 से 2025 के बीच देश ने कई क्षेत्रों में पीछे की ओर कदम बढ़ाए हैं। इसका मतलब है कि गरीबी कम करने और आर्थिक सुधार के क्षेत्र में हुई कई वर्षों की प्रगति कमजोर पड़ती दिखाई दी।

साफ हो गया है कि आज बांग्लादेश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। इसी कारण सरकार विदेशों में भेजी गई 230 अरब डॉलर की संपत्तियों को वापस लाने की कोशिश कर रही है।

दिलचस्प बात यह है कि यही बांग्लादेश कभी भारत के कुछ उदारवादी टिप्पणीकारों द्वारा एक सफल आर्थिक मॉडल के रूप में पेश किया जाता था। उनका कहना था कि आकार में छोटा होने के बावजूद आर्थिक विकास के मामले में ‘बांग्लादेश भारत से आगे’ निकल रहा है। जर्मनी में रहने वाले यूट्यूबर ध्रुव राठी, मोदी विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ वामपंथी मीडिया संस्थानों ने भी समय-समय पर ऐसे दावे किए।

कुछ भारतीय उदारवादी टिप्पणीकार और राजनीतिक समूह ‘बांग्लादेश चमत्कार’ की कहानी को बढ़ावा देते रहे, ताकि मोदी सरकार की आलोचना की जा सके। लेकिन वे भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाओं, आबादी और राजनीतिक परिस्थितियों के बड़े अंतर को नजरअंदाज करते रहे। जहाँ बांग्लादेश की GDP लगभग 450 अरब डॉलर है, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है, जो उससे 8-9 गुना बड़ी है।

यह सच है कि भारत ने पहले अपने कपड़ा उद्योग की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया था और इस क्षेत्र में बांग्लादेश को बढ़त हासिल थी। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी और विविध है, इसलिए अब वह इस क्षेत्र में भी तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।

कुछ भारतीय उदारवादी यह भी कहते रहे हैं कि प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) के मामले में बांग्लादेश भारत से थोड़ा आगे है। उनके अनुसार बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,911 डॉलर है, जबकि भारत की 2,812 डॉलर। वे इसे भारत के लिए चिंता का विषय बताते हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह अंतर कई बार मुद्रा विनिमय दरों और बांग्लादेश की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था के कारण दिखाई देता है।

केवल कुछ चुनिंदा आँकड़ों को देखने के बजाए पूरी तस्वीर पर ध्यान देना चाहिए। भारत की अर्थव्यवस्था आकार, संपत्ति और विविधता के मामले में बांग्लादेश से कहीं बड़ी है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि बांग्लादेश चावल, बिजली और अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है।

लेकिन मोदी सरकार और भाजपा का विरोध करने वाले राजनीतिक और वैचारिक कारणों से भारत की उपलब्धियों को कम करके दिखाते हैं। पहले भी इन्होंने यह तर्क दिया था कि ‘तालिबान शासित अफगानिस्तान की मुद्रा भी भारतीय रुपए से मजबूत है’, जिसे उन्होंने भ्रामक तुलना बताया है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

साँप की मिस्ट्री, बाली की ट्रिप और लोहागढ़ का किला: 20 साल की सिया ने 3 बार रची थी मंगेतर केतन को मारने की साजिश, जानिए कैसे पुलिस की पड़ताल में सब पोल खुली

पुणे के दो बिजनेसमैन के बच्चे सिया और केतन जल्द ही शादी के बँधन में बँधने वाले थे। लेकिन सगाई के बाद से ही सिया के मंसूबे कुछ ठीक नहीं थे। वह एक दूसरे लड़के चेतन से प्यार करती थी। अब मंगेतर केतन को बीच से हटाने के लिए उसने हत्या की प्लानिंग शुरू कर दी थी। पहली बार केतन बच गया, लेकिन दूसरी बार सिया और उसके प्रेमी चेतन की फुल प्रूफ प्लानिंग सफल हो गई। लेकिन केतन के परिवार के शक और पुलिस की जाँच ने सिया और उसके प्रेमी चेतन को आखिर पकड़ ही लिया।

यह मामला लव अफेयर का है। 20 साल की सिया गोयल पुणे के मसाला व्यापारी की बेटी है और 24 साल के केतन अग्रवाल के पिता का रीयल एस्टेट में बड़ा नाम है और केतन भी पिता की कंपनी में ही डायरेक्टर था। दोनों की जोड़ी एकदम फिट दिखाई देती थी। दोनों परिवारों के बीच जब से रिश्ता हुआ था तब से घर में खुशियों की लहर थी। पूरा परिवार सिया और केतन की 25 नवंबर 2026 को होने वाली शादी की तैयारियों में जुटा हुआ था। लेकिन इसी बीच उन्होंने केतन को खो दिया।

केतन की मौत को शुरुआत उनकी ही मंगेतर सिया गोयल ने हादसा बताया। सिया के मुताबिक, 18 जून 2026 को लोनावला के पास लोहागढ़ किले में दोनों ट्रेकिंग करने गए थे, तभी केतन अग्रवाल का पहाड़ी से पैर फिसल गया। यह कहानी उसने केतन के परिवार को सुनाई। लेकिन परिवार को यकीन नहीं हुआ, उन्हें शक था कि उनके बेटे की मौत कोई हादसा नहीं बल्कि सोची-समझी हत्या है। बेटे का अंतिम संस्कार करने के बाद केतन का परिवार पुलिस के पास गया, बेटे की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करवाई और पुलिस की जाँच में उनका शक सही निकला।

18 जून वाले दिन आखिर क्या हुआ, हादसा या हत्या?

जब केतन के अंतिम संस्कार के चार दिन बाद सिया उनके घर पहुँची। यहाँ सिया की बातचीत केतन की बहन से हुई। केतन की बहन ने सिया से घटना वाले दिन को लेकर कई सवाल किए लेकिन सिया के जवाबों में हिचकिचाहट साफ दिखाई दी। केतन की बहन को सिया पर शक हुआ। यहीं से पुलिस को इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने में मदद मिली। परिवार की शिकायत पर पुलिस ने घटनास्थल की जाँच शुरू की और सिया के फोन कॉल डिटेल्स भी खंगाली।

सिया के कॉल डिटेल्स में चेतन चौधरी का नाम बार-बार सामने आया। पूछने पर पता लगा कि 22 साल का चेतन उसका बॉयफ्रेंड है। दोनों के बीच जनवरी 2026 से जून तक छह महीने में 2004 कॉल्स हुए हैं। पुलिस के मुताबिक दोनों के बीच 238 घंटे बातचीत हुई है। इतनी लंबी बातचीत ने पुलिस का ध्यान खींचा और दोनों से पूछताछ शुरू की।

सख्ती से पूछताछ में पुलिस को पता लगा कि 18 जून 2026 को ट्रेकिंग के लिए केतन और सिया लोहागढ़ किले गए थे। यहाँ 400 फीट गहरी खाई से सिया और उसके प्रेमी चेतन ने केतन को धक्का दिया था। बाद में केतन का शव खाई से बरामद हुआ था। सबके सामने आ गया कि केतन की मौत कोई हादसा नहीं थी। पुलिस ने सिया को गिरफ्तार कर लिया है।

चेतन की गतिविधियों पर पुलिस को गहराया शक

यहाँ शक पहले सिया पर ही था लेकिन उसका प्रेमी चेतन भी इस हत्या में शामिल है, इसका पता लगाने के लिए पुलिस की चेतन की 18 जून 2026 की संदिग्ध गतिविधियों पर नजर गई। चेतन का फोन का इंटरनेट सुबह 7 बजे से लेकर शाम 5.40 बजे तक बंद था। पुलिस ने इसे जाँच के लिए अहम सबूत की तरह देखा।

पुलिस को पूछताछ में पता लगा कि हत्या वाले दिन चेतन अपना फोन अपनी दुकान पर ही छोड़ गया था। उसने लोकेशन ट्रेसिंग से बचने के लिए ऐसा किया। वह अपने एक कर्मचारी का फोन लोहागढ़ लेकर गया था। इससे सामने आया कि लोहागढ़ किले में हत्या वाले दिन चेतन भी सिया के साथ ही था। पुलिस को ऐसी कई कड़ी हाथ लगी हैं जो चेतन को इस हत्या से जोड़ती हैं।

सीसीवीटी में कैद हुआ आरोपित चेतन (फोटो साभार: dainik bhaskar)

पुलिस की जाँच में यह शक पक्का भी हो गया। पुलिस ने लोहागढ़ किले के टिकट काउंटर का सीसीटवी फुटेज खंगाला। सीसीटवी में केतन और सिया एक साथ दिख रहे हैं लेकिन उनके ठीक कुछ मीटर पीछे एक व्यक्ति भी दिखाई दे रहा है जिसने 33 डिग्री सेल्सियस के तापमान में भी हुडी पहनी हुई थी। वह अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहा था। पुलिस की जाँच में सामने आया कि यह व्यक्ति चेतन ही था। पुलिस ने चेतन को गिरफ्तार कर लिया है।

एक बार में नहीं, तीन बार में हत्या की प्लानिंग हुई सफल: साँप मिस्ट्री

पुलिस जाँच में यह भी सामने आया कि सिया और चेतन ने पहले भी दो बार केतन को मारने की साजिश की थी, जिसमें वह फेल हो गए थे। 31 मई 2026 को भी केतन को लोहागढ़ किला ले जाया गया था वहाँ भी केतन को धक्का देने का प्लान बना था। यहाँ केतन को धक्का दिया ही था लेकिन वह झाड़ी पकड़कर बच गया और खुद को बचाने के लिए सिया ने ‘साँप-साँप’ चिल्लाना शुरू कर दिया। यह पहली प्लानिंग फेल हो गई।

इसके बाद 14 जून 2026 को दोबारा लोहागढ़ किला जाना का प्लान सिया ने बनाया। क्योंकि केतन ट्रेकिंग का शौकीन था तो लोहागढ़ किले जैसी जगह जाने के लिए मनाना सिया के लिए मुश्किल नहीं हुआ। लेकिन केतन की माँ ने उसे जाने से मना कर दिया। इसके बाद 18 जून 2026 को सिया ने फिर एक बार वही प्लानिंग को अंजाम दिया और केतन की सबसे प्यारी चीज ट्रेकिंग को ही उसकी मौत की वजह बना दिया।

यह भी पता लगा कि लोहागढ़ किले में केतन अपनी मंगेतर सिया का प्री-बर्थडे सेलिब्रेट करने गया था। वह सिया को कुछ स्पेशल गिफ्ट करने वाला था। लेकिन उससे पहले ही सिया ने पहाड़ से धक्का देकर केतन को मौत के घाट सुला दिया। और सिया अपने प्रेमी चेतन के साथ वापस लौट आई।

केतन के घर में शादी की खुशियाँ मातम में बदली

केतन और सिया की शादी अरेंज थी, जो दोनों परिवारों की सहमति से तय हुई थी। दोनों परिवार शादी से बहुत खुश थे। शादी इसी साल 25 नवंबर को राजस्थान के उदयपुर स्थित एक शाही पैलेस में होने वाली थी। शादी में परिवार ₹17 करोड़ खर्च करने वाला था। मेहमानों के लिए दो चार्टर्ड प्लेन की भी व्यवस्था की गई थी।

लेकिन केतन की हत्या के बाद सिया का असली चेहरा सामने आ गया। केतन के पिता विशाल अग्रवाल ने कहा, “अगर वह (सिया) शादी नहीं करना चाहती थी, तो वह बस मना कर सकती थी, हम तुरंत शादी कैंसिल कर देते। उन्होंने इतना बड़ा और कठोर कदम उठाने का फैसला क्यों किया? उनकी सोच कैसी है? उनकी सोच इतनी बेरहम है कि किसी का 26 साल का बेटा मारा जा सकता है… समाज को ऐसी बेरहम सोच पर ध्यान देने की जरूरत है। यह सोच कहाँ से आती है- उनके परिवार से, उनकी परवरिश से?…”

केतन के पिता ने सरकार से इस केस को फास्ट-ट्रैक करने की अपील की और यह भी माँग की कि अपराधियों को जल्द से जल्द सजा दी जाए। उन्होंने कहा कि अपराधियों को फाँसी की सजा से कम कुछ नहीं मिलना चाहिए।

वहीं केतन की माँ ने कहा, “मेरे बेटे की मौत के लिए सिया और उसका बॉयफ्रेंड जिम्मेदार हैं। सिया ने मुझे धोखा दिया और झूठ बोला। मैं सिया, उसका बॉयफ्रेंड, उसके माता-पिता और बुआ-फूफा के लिए मौत की सजा की माँग करती हूँ।”

जिस सिया के प्यार में पागल था केतन, उसने ही दी मौत

सिया और केतन की बेशक अरेंज मैरिज क्यों न थी, लेकिन केतन अपनी मंगेतर सिया से बहुत प्यार करता था। दोनों की फरवरी 2026 में सगाई हो चुकी थी। सगाई की तस्वीरों में दोनों एक परफेक्ट जोड़ी की मिसाल पेश कर रहे हैं। तस्वीरों में केतन बेहद खुश दिखाई दे रहा है।

सिया औऱ केतन की सगाई की तस्वीरें (फोटो साभार: AajTak)

केतन सगाई के बाद से ही सिया को अपनी पत्नी मान चुका था। उसने सिया को शादी के लिए प्रपोज भी किया था। सामने आई वीडियो में केतन ने सिया के लिए सरप्राइज प्लान किया है। केतन ने सिया के लिए अपनी गाड़ी फूलों से सजाई है जिसे देख सिया खुश होती है और दोनों गले मिलते हैं। ऐसे ही एक वीडियो में एक होटल में केतन अपनी मंगेतर सिया को घुटनों पर बैठकर प्रपोज करता दिख रहा है। दोनों खूब डांस भी करते हैं।

केतन ने सिया के बर्थडे के लिए काउंटडाउन भी शुरू किया था, जिसे सिया ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी रीशेयर किया था। केतन के दोस्तों ने बताया कि वह सिया के बर्थडे के लिए काफी उत्साहित था। केतन ने सिया के बर्थडे के लिए महाबलेश्वर के एक लग्जरी रेसॉर्ट में 40 कमरे भी बुक कराए थे। इसके अलावा लोहागढ़ किले पर प्री-वेडिंग फोटोशूट की भी तैयारी चल रही थी।

जहाँ तक तरफ केतन अपना सबकुछ सिया पर लुटाने को तैयार था वहीं सिया मन ही मन केतन को पसंद नहीं करती थी, वह अपने प्रेमी चेतन के साथ जिंदगी बसाने के सपने बुन रही थी। जब शादी से पहले केतन और सिया बाली घूमने जाने वाले थे, तब सिया ने पासपोर्ट खो जाने का बहाना देकर ट्रिप कैंसिल कर दी। क्योंकि उसके दिमाग में केतन को मारने की साजिश चल रही थी। और आखिरकार उसने इस प्यारे रिश्ते और एक होनहार बेटे केतन की जिंदगी छीन ली।

कॉन्ग्रेस की ‘भगवा आतंक’ वाली थ्योरी को किया फेल, दुनिया को आतंकी इशरत का सच बताया: पढ़िए उन RVS मणि के बारे में सब, जिन्हें मोदी सरकार ने दिया पद्म पुरस्कार

केंद्रीय गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आर वी एस मणि को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया है। उन्हें सिविल सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मु्द्दों पर सिस्टम के अंदर रहकर भी अपनी आवाज बुलंद की, ये उनके साहस का सम्मान है।

कौन हैं आरवीएस मणि

आरवीएस मणि पूर्व आईएएस अधिकारी हैं। वे केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव रहे। आंतरिक सुरक्षा में एक विशिष्ट सरकारी अधिकारी के रूप में उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने यूके के मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से मानव संसाधन विकास में एम.एस.सी और दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की है। वे संस्कृत भाषा के ज्ञाता हैं और उन्हें भगवत गीता और वैदिक ग्रंथों का अच्छा ज्ञान है।

2006-10 तक वे गृह मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा विभाग में तैनात थे। वे एक निजी विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं। राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर पाँच पुस्तकें उन्होंने लिखी है। उन्होंने सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद अपनी किताबों को प्रकाशित किया, जिसमें यूपीए सरकार के काले कारनामों का जिक्र है।

‘भगवा आतंकवाद’ की कहानी गढ़ने का किया विरोध

आरवीएस मणि ने तथाकथित ‘भगवा आतंकवाद‘ की अवधारणा को खारिज करते हुए इसे एक सोची‑समझी राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने अपनी आपबीती और आंतरिक सुरक्षा मामलों पर राजनीतिक हस्तक्षेप के खुलासों को अपनी पुस्तक, ‘The Myth of Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs 2006-2010’ में विस्तार से बताया है।

किताब में उन्होंने कहा है कि 2009 में गृह मंत्रालय में राजनीतिक नेतृत्व ने उन पर ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने वाले दूसरे हलफनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया था। उन्होंने दावा किया कि हिंदुओं को बदनाम करने और उन्हें आतंकवादी बताने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश रची गई थी।

उन्होंने किताब में लिखा है कि 2006 में नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में बम विस्फोट के बाद तत्कालीन पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटिल बैठे थे और उन्हें बुलाया गया था। मणि से विस्फोट को लेकर सवाल पूछे गए थे, जिसमें उन्होंने खास मजहबी समूह के आतंकी हमलों की जानकारी दी थी। इस जानकारी से वे खुश नहीं थे। उनका कहना है कि उनकी बातचीत में नांदेड़, बजरंग दल आदि के बार-बार संदर्भ थे। उन्होंने कहा है कि नांदेड़ विस्फोट के बाद पहली बार ‘भगवा आतंक’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।

किताब में कहा गया है कि मक्का मस्जिद धमाके के मामले में असली आरोपितों को बचाकर निर्दोष लोगों को फँसाया गया, जिन्हें बाद में 2018 में क्लीन चिट मिली। मालेगाँव विस्फोट मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस केस में भी साध्वी प्रज्ञा और एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी पुरोहित को जानबूझकर फँसाया गया। मालेगाँव विस्फोट में सबूत रहते हुए भी उसे दरकिनार कर दिया गया और नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया गया।

यह पहला मौका था जब कथित तौर पर हिंदू संगठनों की भागीदारी की रिपोर्ट मुंबई एटीएस से गृह मंत्रालय को भेजी गई थी और साध्वी प्रज्ञा को मुख्य आरोपी बनाया गया था। वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं है कि मोटरसाइकिल, जो एटीएस के अनुसार प्रमुख साक्ष्य था (जिसकी बाद में व्याख्या हुई कि साध्वी प्रज्ञा द्वारा बेच दी गई थी) को प्लांट किया गया था या नहीं, लेकिन एटीएस द्वारा लगाए गए समय ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनका कहना है कि मुंबई धमाकों के दौरान एटीएस को गिरफ्तारी करने में 5 महीने से अधिक का समय लगा जबकि मालेगाँव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी में केवल 35 दिन लगे।

इशरत जहाँ मामले में जबरदस्ती हलफनामे पर हस्ताक्षर कराया गया-मणि

आरवीएस मणि ने दावा किया कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को जेल भेजने की साजिश रची गई थी। मणि के अनुसार, उन्होंने जो हलफनामा साइन किया था, उसमें खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट शामिल थी, जिसमें इशरत जहां को लश्कर‑ए‑तैयबा से जुड़ा बताया गया था। उनका कहना है कि इशरत जहाँ और उसके साथ मौजूद लोगों का उद्देश्य तत्कालीन गुजरात सरकार के शीर्ष नेतृत्व यानी मोदी और शाह को निशाना बनाना था।

मणि ने यूपीए सरकार के दौरान इशरत जहाँ मामले में दाखिल 2 अलग-अलग तरह के हलफनामे को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने दावा किया कि पहले हलफनामे में इशरत जहाँ को लश्कर ए तैयबा का ‘कार्यकर्ता’ बताया गया था, जो आतंकी मॉड्यूल का हिस्सा थी और भारत में बड़े बड़े नेताओं को अपना निशाना बनना चाहती थी।

यह हलफनामा खुफिया एजेंसी के रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था। इसमें इशरत जहाँ के आतंकी बैकग्राउंड के बारे में जानकारी दी गई थी। दूसरा हलफनामा कुछ हफ्ते बाद दाखिल किया गया, जिसमें खुफिया जानकारी नदारद थे और गुजरात पुलिस की कार्रवाई का भी इससे कोई लेना-देना नहीं था। यह तत्कालीन यूपीए सरकार ने बनवाया था और इस पर मणि को राजनीतिक दबाव में हस्ताक्षर करने पड़े थे।

उन्होंने ‘डिसेप्शन ए फैमिली दैट डिसीव्ड द होल नेशन’, ‘भगवा आतंक एक षड्यंत्र’ और दलाल जैसी किताबें में इनसब की विस्तार से चर्चा की है। आरवीएस मणि ने यह भी कहा कि 2004 में अहमदाबाद के पास हुई घटना को गलत तरीके से एनकाउंटर बताया गया, जबकि वह एक क्रॉस‑फायर की स्थिति थी, जिसमें पहले गोली दूसरी ओर से चलाई गई थी।

उनके अनुसार, इशरत जहाँ के साथ दो और लोग थे जो अवैध तरीके से सीमा पार कर पाकिस्तान से भारत में घुसे थे, लेकिन तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक कारणों से उसे निर्दोष और ‘बिहार की बेटी’ बताने की कोशिश की। ये लोग इशरत जहाँ के साथ एनकाउंटर में मारे गए। इशरत जहाँ एक आतंकवादी थी, इसकी पुष्टि बाद में मुंबई हमले का मास्टरमाइंड डेविड कोलमैन हेडली ने भी किया था।

मणि ने अपनी किताब में यूपीए शासन के दौरान आतंकी जाँच में किस तरह से राजनीतिक हस्तक्षेप किया जाता था, उसकी भी चर्चा की है। मणि ने उस समय के सीबीआई निदेशक के एक कथित बयान के बारे में बताया है कि ‘काली दाढ़ी’ और ‘सफेद दाढ़ी’ को जेल भेजने की बात कही गई थी। उनका दावा है कि यह इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ओर था।