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नमाज, जहरीला साँप, अनपढ़… प्रिय राहुल गाँधी पहले अपने ‘शीर्ष’ दलित नेता खरगे जी को बोलने की मर्यादा का ‘ट्यूशन’ तो दिलवाइए!

लगातार तीन लोकसभा चुनाव में बुरी तरह मुँह की खाने वाली कॉन्ग्रेस अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। राज्यों की बात करें तो अब कॉन्ग्रेस की सरकार कुछ राज्यों जैसे- हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड, तमिलनाडु में रह गई है। एक के बाद एक राज्य उसकी हाथों से फिसलते रहे। इसमें नेताओं के बड़बोले बयान ने भी अहम भूमिका निभाई है।

पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इसमें कॉन्ग्रेस काफी आक्रामक दिखने का प्रयास कर रही है। खास कर असम और केरल में।

यहाँ पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयान लगातार सीमाएँ लाँघ रहे हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने पहले केरल में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाला बयान दिया, उसके बाद उन्होंने असम में इस्लामी तुष्टीकरण की कोशिश की।

असम में खरगे का मुस्लिम तुष्टिकरण वाला दाँव

असम विधानसभा चुनाव प्रचार थमने से चंद घंटे पहले मल्लिकार्जुन खरगे ने रैली के दौरान कहा कि ” यहाँ हिन्दू और मुस्लिम भाई बैठे हैं। अगर कोई जहरीला साँप आपके सामने से गुजर रहा है और नमाज भी पढ़ रहे हैं, तो नमाज छोड़कर पहले उस जहरीली साँप को मारना। ये कुरान में है और मैं यही कहूँगा। आप नमाज तोड़ने की परवाह ना करें। जहरीला साँप है बीजेपी और आरएसएस, इसको अगर आप नहीं मारेंगे, तो आप कभी नहीं बचेंगे।”
असम जैसे संवेदनशील राज्य में, जहाँ घुसपैठियों और बांग्लादेशी मुस्लिम आबादी से जनता त्रस्त है। सरकारी जमीन पर बड़े पैमाने पर कब्जा कर चुके घुसपैठियों से असम के मूल निवासी परेशान हैं। इस चुनाव में घुसपैठियों को बाहर निकालने, एनआरसी, भूमि सुधार जैसे मुद्दे अहम बन गए हैं। ऐसे में मुस्लिमों की तुष्टिकरण के लिए कुरान और नमाज का नाम लेना और बीजेपी-आरएसएस को जहरीला साँप कहना, राजनीतिक के जबदस्त गिरते स्तर को दर्शाता है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस और उसके अध्यक्ष को यह इल्म भी नहीं है कि वह जिस पद पर हैं, उनकी बातें और बर्ताव देश के लोगों को रास्ता दिखाती है। इस तरह का बयान देकर देश को क्या संदेश देना चाहते हैं खरगे?

यही वजह है कि बीजेपी ने भी उन्हें चुनौती दे डाली है कि असम में चुनाव जीत कर दिखाएँ। गृहमंत्री शाह ने खरगे के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव में हार का डर सता रहा है इसलिए बीजेपी-आरएसएस पर इस तरह के बयान दे रहे हैं अध्यक्ष खरगे।

गुजरातियों को ‘अनपढ़’ कहा था खरगे ने

इससे पहले केरल के इडुक्की की एक रैली में उन्होंने गुजरातियों और उत्तर भारतीय राज्यों के लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मोदी गुजरात और दूसरे इलाकों के लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, क्योंकि वे अनपढ़ हैं, लेकिन केरल के लोग पढ़े-लिखे और समझदार हैं, वे बेवकूफ नहीं बनेंगे।

उन्होंने कहा, “केरल के लोग बहुत स्मार्ट हैं। वे बहुत पढ़े-लिखे हैं। मोदीजी… विजय (केरल के CM) आप दोनों गुजरात और दूसरी जगहों के अनपढ़ लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन आप केरल के लोगों को बेवकूफ नहीं बना सकते।”

केरल चुनाव में जाकर गुजरात और दूसरे राज्यों के लोगों को ‘बेवकूफ’ और ‘अनपढ़’ बताना क्या राज्यों में नफरत पैदा नहीं करता? क्या एक राज्य की तुलना में दूसरे राज्य को नीचा दिखाने की ये कोशिश नहीं है? गुजरात में पिछले दो दशक से ज्यादा वक्त से कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं लौटी है, तो अब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष जनता को ही ‘बेवकूफ’ समझने लगे हैं। हिन्दी राज्यों में भी पार्टी का बुरा हाल है। ऐसे में सत्ता से बेदखल होने पर जनता को ‘अनपढ़’ कहना, सिर्फ राज्यों का ही नहीं, देश का अपमान है।

हालाँकि उन्होने सोशल मीडिया पर इसके लिए खेद प्रकट कर दी और कहा कि उनके मन में गुजरातियों के लिए काफी सम्मान है। ऐसी टिप्पणियाँ रैली में कर उन्होंने जनता को ठेस पहुँचा दी और अब चुपके से खेद जता कर उसपर मरहम लगने की उम्मीद कर रहे हैं।

कर्नाटक चुनाव में पीएम मोदी को कहा था ‘साँप’

इससे पहले भी मल्लिकार्जुन खरगे ने ‘जहरीला साँप’ शब्द का इस्तेमाल किया था। वक्त था कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023। एक चुनावी रैली के दौरान उन्होने पीएम मोदी की तुलना ‘जहरीले साँप’ से की थी। उन्होंने कहा था कि मोदी जहरीला साँप की तरह हैं। आप इसे जहर समझें या न समझें, लेकिन अगर आप इसे चखेंगे, तो मर जाएँगे…आप सोच सकते हैं कि क्या ये जहर ठीक है। खरगे के खिलाफ कोर्ट में भी अर्जी दायर की गई थी।

महाकुंभ पर भी विवादित बयान

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खरगे न सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण वाले बयान देते हैं, बल्कि सनातन को अपमानित करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते। प्रयागराज महाकुंभ 2025 में जब लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाने के लिए त्रिवेदी के तट पर जुटे थे, उस वक्त खरगे ने कहा कि डुबकी लगाने से गरीबी दूर नहीं होगी और न ही किसी का पेट भरेगा।

मध्यप्रदेश के महू में रैली के दौरान उन्होंने गंगा स्नान को रोजी-रोटी से जोड़ा और तंज कसा। यह न सिर्फ उन करोड़ों लोगों का अपमान था, जो डुबकी लगाने के लिए देश के कोने-कोने से आए थे, बल्कि यह सनातन का भी अपमान था। क्या खरगे ऐसा ही बयान किसी दूसरे धर्म की परंपरा को लेकर दे सकते हैं?

इतना ही नहीं उन्होंने पीएम मोदी और गृहमंत्री शाह के लिए कहा था कि इनलोगों ने इतने पाप किए हैं कि उन्हें डुबकी लगाने से भी स्वर्ग नहीं मिलेगा। कॉन्ग्रेस का कोई नेता महाकुंभ में डुबकी लगाने तो नहीं गया था। अब शायद बगैर डुबकी लगाए ही उन्हें स्वर्ग मिलने का भान हो गया हो, तो बात अलग है।

RSS पर प्रतिबंध लगाने की खरगे ने की थी माँग

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 31 अक्टूबर 2025 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर कहा था कि आरएसएस पर फिर से प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने कहा था कि देश में कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के लिए यही संगठन जिम्मेदार है। हालाँकि उन्होंने इसे व्यक्तिगत विचार कहा, लेकिन खरगे के बयान के बाद सियासी बवाल हुआ था।

आरएसएस दुनिया की सबसे बड़ी स्वंयसेवी संस्था है। 100 साल का स्वर्णिम इतिहास वाली इस संस्था ने देश को दो सबसे सफल प्रधानमंत्री दिए हैं। एक नरेन्द्र मोदी और दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी। समाज को सही दिशा दिखाने वाली इस संस्था को जनता ने सिर आँखों पर बिठाया है। इस पर आरोप मढ़ कर खरगे जी कॉन्ग्रेस को कैसा मार्गदर्शन कर रहे हैं?

दरअसल कॉन्ग्रेस अपनी दयनीय हालत के लिए अपने कर्मों को नहीं, देश की जनता, आरएसएस, बीजेपी और पीएम मोदी को जिम्मेदार ठहराती है। 60 साल राज करने के बाद भी जनता एक के बाद एक तीन लोकसभा चुनावों और कई राज्यों में हरा चुकी है। सत्ता से बेदखल होने का दुख खरगे जी को इतना हो गया है कि अब जनता को ही बेवकूफ और अनपढ़ समझने लगे हैं।

कॉन्ग्रेस के नेताओं के विवादित बोल हमेशा चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुँचाते रहे हैं। चाहे वह सोनिया गाँधी का पीएम मोदी पर दिया गया ‘मौत का सौदागर’ वाला बयान हो या राहुल गाँधी का बिहार चुनाव के दौरान दिया गया ‘नाचने वाला’ बयान। फिलहाल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खरगे की बारी है, जिन्होंने केरल से असम तक बीजेपी-आरएसएस पर आपत्तिजनक टिप्पणी की और मुस्लिम तुष्टिकरण वाला बयान दिया।

उनका बयान विभाजनकारी, वैमनस्यपूर्ण और नफरत से भरा था। हालाँकि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि वे व्यक्तिगत बयान नहीं देते और उनके कहने का मतलब विचारधारा साँप की तरह हैं, जिसे चाटते ही मौत हो जाएगी। लेकिन राजनीति में बयान काफी मायने रखते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि कॉन्ग्रेस ने 60 साल के शासनकाल में क्या बोया, जिसे काटते वक्त उसे जहर की याद आ रही है। भ्रष्टाचार, वंशवाद, परिवारवाद से लेकर देश के विभाजन का आरोप कॉन्ग्रेस पर लगते रहे हैं। ऐसे में अपने प्रतिद्वंदी पार्टी को निचले स्तर पर आकर गालियाँ देना उनके राजनीतिक दिवालिएपन को दर्शाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब कॉन्ग्रेस ने व्यक्तिगत तौर पर पीएम मोदी, बीजेपी या आरएसएस पर आपत्तिजनक बयान दिया है, बुरी तरह हारी है।

‘मुसलमान बनो, विदेश से पैसा मिलेगा’: गुजरात में लालच देकर गिरोह ने सैकड़ों हिंदुओं से पढ़वाया कलमा, जानिए HC ने 2 मौलवियों की याचिका को खारिज कर क्या कहा?

गुजरात हाईकोर्ट ने 2021 में सामने आए धर्मांतरण मामले में दो मौलवियों की याचिका खारिज कर दी है। यह मामला भरूच जिले के आमोद तालुका से जुड़ा है। जस्टिस गीता गोपी की एकल पीठ ने 30 मार्च 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान और रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से पहली नजर में धर्मांतरण की गतिविधियों के संकेत मिलते हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है।

यह मामला नवंबर 2021 का है, जब आमोद पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंकड़िया गाँव और आसपास के आदिवासी इलाकों में करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। इस मामले में पुलिस अब तक कई आरोपियों के खिलाफ तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर चुकी है।

आरोपित मौलवी सरफराज उर्फ जावेद और रमिज राजा उर्फ औवेश अब्दुल गनी ने पहले सेशन कोर्ट में खुद को केस से हटाने की माँग की थी लेकिन वहाँ से उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों के खिलाफ गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट और आईपीसी के तहत मामले दर्ज हैं।

कोर्ट में क्या दलील दी गई?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील उमर फारूक एम. खराड़ी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गलत फैसला दिया है और आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों मौलवियों को झूठा फँसाया गया है और उन्हें काफी लंबे समय बाद तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में आरोपित बनाया गया है।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि दोनों लोग पेशे से मौलवी हैं और मजहब का प्रचार करना उनका काम है। वकील ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत धर्म का प्रचार करना एक मौलिक अधिकार है और इसलिए केवल धार्मिक गतिविधियाँ करने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनता।

सरकार ने किया साजिश का पर्दाफाश

सरकारी वकील भार्गव पंड्या ने बचाव पक्ष की दलीलों का विरोध करते हुए कोर्ट में कहा कि यह मामला सिर्फ धर्म प्रचार का नहीं बल्कि गरीब लोगों को लालच देकर धर्मांतरण कराने की एक सोची-समझी साजिश है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि आरोपित जावेद मुफ्ती पहले भी कई भोले-भाले ग्रामीणों के धर्मांतरण में सक्रिय रहा है।

जाँच में सामने आया है कि आरोपित लोगों को नकद पैसे, नए कपड़े और दवाइयाँ देते थे। इसके अलावा, आदिवासी परिवारों को एयर कूलर, वाटर कूलर, ठेले (हैंडकार्ट) और नमाज के लिए चटाई या चादर जैसी सुविधाओं का लालच देकर इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता था।

मुख्य शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसावा ने आरोप लगाया कि साल 2018 में उन्हें और अन्य परिवारों को लालच देकर धर्मांतरण कराया गया था और उनके आधार कार्ड तक बदल दिए गए थे। वहीं, अन्य गवाहों ने भी पुलिस को बयान देकर बताया कि आरोपित रमिज राजा लोगों को सुविधाएँ देने का वादा करके धर्मांतरण करवाता था।

पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने 2019 की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी अक्सर लग्जरी कारों में कंकड़िया गाँव आते थे। गाँव का एक व्यक्ति वहाँ नियमित बैठकें आयोजित करता था, जहाँ नमाज पढ़ी जाती थी और इस्लाम की जानकारी देने के नाम पर भाषण होते थे। पुलिस ने कोर्ट को यह भी बताया कि इन बैठकों के वीडियो सबूत के तौर पर उनके पास मौजूद हैं।

सरकारी वकील ने कहा कि गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2003 की धारा 5 और 2008 के नियम 3, 4 और 5 के तहत धर्मांतरण के लिए जो कानूनी अनुमति जरूरी है, उसका इस मामले में कहीं पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पालन न होना ही इस गतिविधि को अवैध और आपराधिक साबित करने के लिए पर्याप्त है और इसलिए आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आखिरकार, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को मान लिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में सबूतों और गवाहों के बयानों की जाँच करने के बाद ऐसा लगता है कि मामला बनता है। इसके अलावा, इस बात के भी सबूत हैं कि ये मौलवी सिर्फ धर्मांतरण करवाने के इरादे से ही बैठकें कर रहे थे। कोर्ट ने साफ किया कि ट्रायल कोर्ट ने सही फैसला लिया था और हाईकोर्ट इसमें कोई दखल नहीं देगा। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।

इसी मामले में गुजरात HC पहले भी अन्य आरोपितों की याचिकाएँ खारिज कर चुका है जिनमें FIR रद्द करने की माँग की गई थी। अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने ऐसी कुल सात याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस दौरान कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी भी की थी। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति खुद धर्म परिवर्तन करने के बाद दूसरों को भी धर्म बदलने के लिए उकसाता या लालच देता है, तो उसे सिर्फ ‘पीड़ित’ नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति को आरोपित भी माना जा सकता है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

क्या था पूरा मामला?

भरूच जिले के आमोद तालुका में जनजातीय हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किया गया यह सामूहिक धर्मांतरण कोई एक-दो साल की घटना नहीं थी बल्कि 2006 से 2021 तक चलने वाली एक सुनियोजित साजिश थी।

पुलिस जाँच के मुताबिक, कंकड़िया गाँव के करीब 37 जनजातीय हिंदू परिवारों के 100 से ज्यादा लोगों को लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था जिसमें विदेश से फंडिंग और स्थानीय स्तर पर सक्रिय गिरोह शामिल था। इनका मुख्य मकसद गरीब जनजातीय लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तन कराना था।

इस मामले की शुरुआत शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसंतभाई वसावा से हुई। उन्होंने बताया कि 2018 में उन पर दबाव डालकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया और उनका नाम बदलकर ‘सलमान पटेल’ कर दिया गया। बाद में उन्होंने पुलिस को बताया कि इलाके के लोग बेहद गरीब थे और आरोपितों ने इसी का फायदा उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआत में उन्हें शरिया कानून के मुताबिक जीवन जीने के लिए कहा गया लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि यह सब लालच और धोखे का खेल था।

जाँच में सामने आया कि आरोपितों ने धर्मांतरण के लिए ‘इनाम, लालच और दबाव’ की नीति अपनाई थी। गरीब आदिवासियों को पैसे, अनाज, नौकरी, पक्के मकान और शादी जैसी झूठी उम्मीदें दी जाती थीं। उन्हें लगातार यह बताया जाता था कि हिंदू धर्म में कुछ नहीं है और इस्लाम ही बेहतर है। इस पूरे खेल में कानूनी धोखाधड़ी भी की गई। गाँव वालों को बहलाकर सूरत ले जाया जाता था और वहाँ उनसे गाड़ी में बैठाकर दस्तावेजों पर साइन करवाए जाते थे ताकि उनके आधार कार्ड और अन्य सरकारी पहचान पत्रों में नाम और धर्म बदल दिया जाए।

नवंबर 2021 में आमोद पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में कई स्थानीय और विदेशी लोगों को आरोपी बनाया गया। इसमें शब्बीर और समद बेकरीवाला जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, लंदन में रहने वाले हाजी अब्दुल्ला फेफड़ावाला का नाम मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर सामने आया जो विदेश में धर्मांतरण की संख्या दिखाकर फंडिंग जुटाता था।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, आरोपित इस पूरी गतिविधि को एक ‘व्यवसाय की तरह चलाते थे जिसमें हर धर्मांतरण पर विदेश से पैसा मिलता था और उसी पैसे से आगे और लोगों को लालच दिया जाता था। धर्मांतरण के बाद जनजातीय बच्चों को जंबूसर और हजीरा के मदरसों में भेजा जाता था, जहाँ उनका ब्रेनवॉश किया जाता था।

इसके अलावा, उन्हें तबलीगी जमात के जरिए मालेगाँव और मुंबई जैसे शहरों में धार्मिक कार्यक्रमों में ले जाया जाता था ताकि उन्हें उनकी मूल संस्कृति से पूरी तरह अलग किया जा सके। गुजरात पुलिस ने इस मामले को सिर्फ एक स्थानीय अपराध नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की रची गई एक साजिश के रूप में पेश किया है।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

अहमद शाह ने कर्णावती में भद्रकाली के मंदिर को ध्वस्त कर बनवाई जामा मस्जिद, आज भी दिखते हैं हिंदू संस्कृति के सबूत: पढ़ें- अहमदाबाद की वो गाथा जो छिपाई गई

गुजरात की आर्थिक राजधानी माने जाने वाला अहमदाबाद आज सिर्फ अपने विकास के लिए ही नहीं बल्कि अपने इतिहास को लेकर भी चर्चा में है। विश्व हिंदू परिषद द्वारा शहर का पुराना नाम ‘कर्णावती’ वापस करने की माँग के बाद अब इसकी प्राचीन पहचान, संस्कृति और इतिहास को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

खास तौर पर सुल्तान अहमद शाह के समय हुए बदलावों और शहर की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में आए परिवर्तन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी संदर्भ में कर्णावती की नगरदेवी माता भद्रकाली से जुड़ा इतिहास एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कई ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि अहमदाबाद में कभी नगरदेवी माता भद्रकाली का एक भव्य मंदिर हुआ करता था लेकिन अब इसे मस्जिद में बदल दिया गया है।

बताया जाता है कि अहमद शाह ने इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद का निर्माण करवाया और इसे अपनी इस्लामी जीत का प्रतीक बनाया। इसे केवल एक मंदिर का टूटना नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान, संस्कृति और नगरदेवी के सम्मान पर हमला माना जाता है। आज भी जामा मस्जिद के 100 से ज्यादा खंभों पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ देखी जा सकती है। वहीं, भद्र किला का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर रखा गया बताया जाता है। यह इतिहास केवल अहमदाबाद का ही नहीं बल्कि हिंदू विरासत पर हुए हमलों का इतिहास है।

भद्रकाली: अहमदाबाद की नगरदेवी और हिंदू विरासत का जीवंत प्रतीक

प्राचीन समय से हर गाँव और नगर में उस स्थान की रक्षा करने वाली देवी-देवता का मंदिर बनाने की परंपरा रही है। यह वैदिक काल से चली आ रही है। वैदिक संस्कृति में कई तरह के देवता बताए गए हैं जैसे इष्टदेवता, देवता, फिर नगरदेवता-नगरदेवी, ग्रामदेवता और लोकदेवता। यह परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि समाज की संस्कृति और सामूहिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी थी।

जैसे आज भी काशी में कालभैरव को रक्षक देवता माना जाता है, वैसे ही कर्णावती में माता भद्रकाली को नगरदेवी का विशेष स्थान प्राप्त रहा है। आज के आधुनिक अहमदाबाद में भी माता भद्रकाली को नगरदेवी के रूप में माना जाता है।

सोलंकी-परमार काल में कर्णावती का माता भद्रकाली मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था बल्कि पूरे नगर की पहचान और आस्था का केंद्र था। माना जाता है कि यह भव्य मंदिर 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच परमार वंश के समय बना था।

माता भद्रकाली को शक्ति स्वरूप में पूजा जाता था और स्थानीय हिंदुओं के लिए यह मंदिर आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक बन गया था। यहाँ सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन के कई सांस्कृतिक पहलू भी फले-फूले। माता भद्रकाली का मंदिर कर्णावती की हिंदू पहचान और परंपरा का एक जीवंत प्रतीक था।

अहमद शाह का आक्रमण और मंदिर का विध्वंस

1411 में अहमद शाह ने कर्णावती पर हमला किया और उस पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने शहर का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद’ कर दिया। इसी के साथ उसने पूरे शहर का इस्लामीकरण करने पर जोर दिया। कई मंदिरों और हिंदू इमारतों को या तो तोड़ा गया या उन्हें इस्लामी ढाँचे में बदल दिया गया।

इसी दौरान अहमद शाह ने माता भद्रकाली के मंदिर को भी निशाना बनाया। माना जाता है कि उसने हिंदू नगरदेवी के इस मंदिर को गिराकर अपनी जीत का प्रतीक स्थापित करने के लिए उसकी जगह नया इस्लामी ढाँचा खड़ा किया। इस कदम को इस रूप में देखा जाता है कि शहर की पहचान बदलने का स्पष्ट संदेश दिया गया।

कहा जाता है कि 1411 से 1442 के अपने शासनकाल में अहमद शाह ने 1424 के आसपास भद्रकाली माता के मंदिर को तुड़वाकर उसी स्थान पर जामा मस्जिद का निर्माण कराया और मंदिर के अवशेषों पत्थरों और खंभों का इस्तेमाल किया। ‘मीरात-ए-अहमदी’ में अहमदाबाद और भद्र किले के निर्माण के वर्णन में आसपास के हिंदू स्थलों का भी उल्लेख मिलता है।

यह भी कहा जाता है कि भद्र किले का नाम इसी मंदिर से पड़ा और आज भी यह इलाका ‘भद्र’ के नाम से जाना जाता है जो उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है। इस घटना को केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान को खत्म करने की एक सुनियोजित कोशिश के रूप में देखा जाता है।

वास्तुकला और साफ नजर आती हिंदू छाप

जामा मस्जिद की बनावट को ध्यान से देखने पर सबसे पहले उसके खंभे और उनकी संरचना ध्यान खींचती है। इन खंभों पर बनी नक्काशी, कमल की आकृतियाँ और अन्य चिह्न हिंदू और जैन मंदिरों की शैली से मिलते-जुलते हैं। यह समानता इतनी गहरी है कि इनके मूल स्रोत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मस्जिद के हॉल में 100 से ज्यादा खंभे हैं जिन पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ दिखाई देती है। इनमें कमल, बेल-बूटे, मंडल, हाथी, कुंडलिनी सर्प, नृत्य करती अप्सराएँ, घंटियाँ और फूल जैसे कई पारंपरिक चिह्न बने हुए हैं। इस्लामी वास्तुकला में इन नक्काशियों को हराम माना जाता है और ये स्पष्ट रूप से यह साबित करती हैं कि यह मस्जिद कोई नई इमारत नहीं है बल्कि इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों और खंभों से बनाया गया है।

ये खंभे मस्जिद के हॉल के बीच में स्थित हैं जो नमाज के लिहाज से भी सामान्य नहीं माने जाते। इसे पुराने ढाँचे के पुन: उपयोग का एक अहम संकेत माना जाता है। इन खंभों की तस्वीरें और दस्तावेज ‘Reclaim Temples’ और ‘Booksfact’ जैसे स्रोतों पर भी हैं जो इस दावे को और मजबूती देते हैं।

ब्रिटिश गैजेटियर और अन्य ऐतिहासिक संदर्भ

19वीं सदी के ब्रिटिश सर्वे में भी इस स्थान के हिंदू मूल का उल्लेख मिलता है। ‘गैजेटियर ऑफ बॉम्बे प्रेसिडेंसी: अहमदाबाद (1879)’ में साफ लिखा है कि यहाँ पहले माता भद्रकाली का मंदिर था जिसे अहमद शाह ने तुड़वाकर जामा मस्जिद बनवाई। ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने जाँच के दौरान हिंदू प्रतीकों को देखा और उन्हें दर्ज भी किया। ये विवरण बॉम्बे गैजेटियर के वॉल्यूम IV में दिए गए हैं।

ऐसा कहा जाता है कि यह देवी भद्रकाली का मंदिर था। अहमद शाह ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इसके अलावा, ‘मिरात-ए-अहमदी’ में भी जामा मस्जिद का जिक्र मिलता है जिसमें कहा गया है कि यह मस्जिद अहमद शाह और इस्लाम की विजय का प्रतीक है यानी इसे हिंदुओं की रक्षक देवी, माता भद्रकाली के मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। ये सभी स्रोत इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यह विध्वंस कोई आकस्मिक घटना नहीं थी बल्कि एक सुनियोजित हमला था।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अहमदाबाद के बीचों-बीच आज भी भद्र किला मौजूद है, जिसका नाम सीधे भद्रकाली मंदिर से जुड़ा माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में यह भी लिखा है कि इस किले का नाम पाटन (अन्हिलवाड़) के प्राचीन भद्र किला और भद्रकाली मंदिर से प्रेरित है। कहा जाता है कि अहमद शाह ने इस किले का नाम नहीं बदला जबकि कई जगह यह भी उल्लेख मिलता है कि इस किले का निर्माण भी उसी के समय हुआ।

कुछ वामपंथी इतिहासकार सीधे यह नहीं कहते कि जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई बल्कि यह कहते हैं कि अहमद शाह ने किसी पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल किया। लेकिन सवाल वही रहता है कि ये अवशेष आए कहाँ से? इसका सीधा जवाब यही माना जाता है कि मंदिर को तोड़कर ही ये सामग्री ली गई होगी।

आज भी भद्र इलाके में माता भद्रकाली का मंदिर मौजूद है और ‘भद्र’ नाम लगातार चला आ रहा है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि इस जगह की पुरानी पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। स्थानीय मान्यताएँ और सांस्कृतिक यादें बताती हैं कि भले ही इमारतें बदल गई हों लेकिन पहचान पूरी तरह मिटती नहीं है।

इतिहास में यह एक आम प्रक्रिया मानी जाती है कि नई इस्लामी सत्ता पुराने हिंदू प्रतीकों की जगह ले लेती थी लेकिन वे किसी न किसी रूप में समाज की यादों में बने रहते हैं। भद्रकाली का संदर्भ भी ऐसी ही एक स्मृति का हिस्सा माना जाता है जो समय के साथ बदली जरूर है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

ईरान-US के बीच सीजफायर: समझें- क्यों खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’

ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

तो आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

डेडलाइन से पहले थमा ईरान-US का ‘महायुद्ध’, ट्रंप बोले- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलेगा तो तेहरान ने भी रखीं 10 शर्तें: जानें- अब तक क्या हुआ और सीजफायर का क्या होगा असर?

ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन से जारी युद्ध के बाद अब दोनों देशों ने सीजफायर की घोषणा कर दी है। ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए राजी हो गया है। इससे सहमत होते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों तक हमला रोकने का ऐलान किया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहाँ के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने अनुरोध किया कि आज रात ईरान पर होने वाले हमले को रोक दिया जाए। इस शर्त कि ईऱान तुरंत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने के लिए तैयार हो गया है, इसीलिए मैं दो हफ्तों के लिए हमले और बमबारी को रोकने के लिए सहमत हूँ। यह दोनों तरफ से युद्धविराम (सीजफायर) होगा।”

बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खुलवाने की डेडलाइन मंगलवार (07 अप्रैल 2026) को खत्म हो गई, जिसके बाद उम्मीद थी कि अमेरिका कोई बड़ा हमला करेगा। लेकिन डेडलाइन खत्म होने से कुछ घंटों पहले ही दोनों देशों के बीच सीजफायर पर बात बन गई। लेकिन इस सीजफायर की भी कुछ शर्ते हैं। ईरान ने 10 प्रस्ताव दिए, जिसे अमेरिका मानने को तैयार हुआ। तब जाकर यह युद्ध खत्म हुआ।

क्या हैं ईरान के वो 10 प्रस्ताव?

ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, अमेरिका ने इन 10 प्रस्तावों को स्वीकार किया है:

  • अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता होगा कि दोनों एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे
  • स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान का नियंत्रण बना रहेगा
  • ईरान को परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को मान्यता
  • अमेरिका द्वारा लगाए गए सभी मुख्य प्रतिबंध हटा दिए जाएँगे
  • दूसरे देशों पर असर डालने वाले सभी प्रतिबंध भी खत्म किए जाएँगे
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के ईरान के खिलाफ सभी फैसले खत्म किए जाएँगे
  • ईरान को हुए नुकसान के लिए उसे मुआवजा दिया जाएगा
  • अमेरिका अपने सैनिकों को इस क्षेत्र से वापस बुलाएगा
  • हर जगह चल रही लड़ाई बंद होगी, जिसमें ईरान से जुड़े समूह जैसे लेबनान का हिज्बुल्लाह भी शामिल है
  • सीजफायर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खोलने से जुड़ा होगा

इन प्रस्तावों को मानते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते तक अस्थायी तनाव कम करने के लिए समझौता किया है। इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, क्योंकि दुनिया का 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। इसीलिए इस रास्ते को खोलना दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद जरूरी रहा। ईरान ने माना कि वह दो हफ्ते तक जहाजों को सीमित और नियंत्रित तरीके से गुजरने देगा।

जंग अभी खत्म नहीं हुई

अमेरिका के साथ सीजफायर पर बनी सहमति के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने अपनी मिलिट्री को गोलीबारी रोकने का आदेश दिया है। मोजतबा खामेनेई का यह निर्देश ईरान के सरकारी चैनल IRIB पर सीजफायर के ऐलान के दो घंटे बाद पढ़ा गया।

मोजतबा खामेनेई के बयान में कहा गया, “यह युद्ध का अंत नहीं है, लेकिन सभी सेना के हिस्सों को सुप्रीम लीडर के आदेश का पालन करते हुए गोलीबारी रोकनी चाहिए।” बयान में यह भी कहा गया कि लड़ाई रोकना पूरी तरह स्थायी नहीं है, बल्कि यह शर्तों पर आधारित है और आगे चल रही बातचीत से जुड़ा हुआ है।

जंग में जीत का ईरान-अमेरिका का दावा

बेशक युद्ध सिर्फ दो हफ्तों के लिए ही टाला गया हो, लेकिन ईरान और अमेरिका दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ईरान ने कहा कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। वहीं अमेरिका ने कहा कि यह उनकी जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी सेना ने संभव बनाया है।

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के बयान के अनुसार, तेहरान इस मौजूदा संघर्ष को एक बड़ी रणनीतिक सफलता मान रहा है और उनका कहना है कि युद्ध के लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि यह संघर्ष करीब 40 दिनों तक चला, जिसका मकसद जरूरी राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को पूरा करना था, जिनमें उनके बड़े क्षेत्रीय माँगों को मनवाना भी शामिल था।

इतना ही नहीं ईरान ने युद्ध आगे जारी रखने के भी संकेत दिए। काउंसिल ने यह भी कहा कि ईरान ने पहले अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा तय की गई समय-सीमा को मानने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वह दुश्मनों द्वारा तय किए गए समय के अनुसार चलने को तैयार नहीं था। उनका कहना था कि जब तक सभी लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते, तब तक सैन्य कार्रवाई जारी रखी जाएगी।

वहीं दूसरी तरफ व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह अमेरिका की जीत है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और हमारी अविश्वसनीय सेना ने संभव बनाया है।” उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति ने हॉर्मुज को फिर से खुलवा दिया है। लीविट ने बताया कि राष्ट्रपति ने शुरू से ही कहा था कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 4 से 6 हफ्ते का अभियान होगा और अमेरिका ने 38 दिनों में अपने प्रमुख सैन्य उद्देश्यों को हासिल कर लिया और उनसे कहीं आगे निकल गया।

सीजफायर के बाद तेल की कीमतों में राहत, शेयर बाजार में उछाल

ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर की घोषणा का सीधा असर तेल और शेयर बाजार दोनों पर देखने को मिला है। युद्ध के दौरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई प्रभावित हुई थी, जिससे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं और वैश्विक बाजारों में डर और अस्थिरता फैल गई थी। लेकिन जैसे ही सीजफायर की घोषणा हुई और हॉर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमित बनी, कच्चे तेल की कीमतों में अचानक गिरावट आई। रिपोर्ट्स के अनुसार, कीमतें 13 प्रतिशथ से 16 प्रतिशत तक नीचे आ गईं।

तेल सस्ता होने और तनाव कम होने की वजह से शेयर बाजार में तेजी देखने को मिली। भारत में सेंसेक्स 2600 प्वाइंट के ऊपर रहा और 23,800 के साथ निफ्टी में भी जोरदार उछाल आया, जबकि अमेरिका और अन्य देशों के बाजार भी सकारात्मक संकेत दिखाने लगे। खासकर तेल पर निर्भर कंपनियों और रिफाइनरी सेक्टर को इससे फायदा होने की उम्मीद है, क्योंकि उनका खर्च कम होगा।

हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अभी अस्थायी है, क्योंकि जमीन पर तेल सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और जहाजों की आवाजाही अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही। इसलिए आने वाले समय में बाजार का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि यह सीजफायर स्थायी शांति में बदलता है या नहीं।

ईरान-अमेरिका युद्ध में अब तक क्या-क्या हुआ?

ईरान और अमेरिका के बीच 38 दिन का संघर्ष चला। यह संघर्ष अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान रहा। इसकी शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका के हमले से हुई, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने का दावा किया गया, हालाँकि ईरान ने भी इसकी पुष्टि की, तभी ईरान का नया सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह के बड़े बेटे मोजतबा खामेनेई को चुना गया।

अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान युद्ध के रण में उतरा और सबसे पहले खाड़ी देशों को निशाना बनाना शुरू किया। ईरान ने कुवैत, बहराइन से लेकर UAE को निशाना बनाया। इन खाड़ी देशों को अमेरिका का साथ देने की सजा दी गई। इस बीच ईरान के क्षेत्र में तेल का सबसे बड़ा मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने की कगार पर आ गया, जिसके चलते दुनिया में तेल का संकट आ गया। इस दौरान भारत की रणनीतिक साझेदारी दुनियाभर में तारीफ के काबिल रही, हॉर्मुज बंद होने के बावजूद भारत के कई जहाजों की आवाजाही चालू रही।

इसके बाद अमेरिका और इजरायल ने एक के बाद एक ईरान के टॉप सैन्य कमांडर को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 38 दिन के युद्ध में ईरान के सभी टॉप कमांडर को ढेर कर दिया गया। इसके बावजूद ईरान सीजफायर समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ, जिससे दुनियाभर के देशों का तेल संकट बढ़ता गया। तब जाकर ट्रंप ने ईरान को 07 अप्रैल 2026 तक की डेडलाइन दी कि अगर ईरान हॉर्मुज नहीं खोलता, तो इसका बहुत बुरा अंजाम खोलना होगा।

हालाँकि, डेडलाइन से दो घंटे पहले दोनों देशों के बीच सीजफायर समझौते पर सहमति बनी और युद्ध विराम की घोषण की गई। लेकिन यह सीजफायर केवल 2 हफ्तों के लिए ही है। ईरान का दावा है कि इन दो हफ्तों में दोनों देशों के बीच बातचीत होगी और युद्ध को स्थायी तौर पर रोकने पर भी सहमित बनेगी।

126 सीटों पर थमा प्रचार, 9 अप्रैल को मतदान, 4 मई को नतीजे: जानिए असम चुनाव के कौन से रहे मुद्दे, क्यों जीत की हैट्रिक की तरफ बढ़ती दिख रही BJP

असम में 9 अप्रैल 2026 को चुनाव को देखते हुए 7 अप्रैल की शाम 5 बजे चुनाव प्रचार थम गया। राज्य की सभी 126 सीटों पर गुरुवार को एक ही चरण में मतदान होगा। इस चुनाव में असमिया पहचान से लेकर मियाँ तक का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में रहा।

राज्य में 2023 में हुए परिसीमन के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहा है। परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है। इसका असर भी चुनाव में दिखेगा।

2021 विधानसभा चुनाव में एनडीए को 75 और कॉन्ग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी। उस वक्त बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट कॉन्ग्रेस गठबंधन में शामिल थी, लेकिन इस बार अलग चुनाव लड़ रही है।

असम चुनाव में ‘मियाँ’ बना मुद्दा

असम चुनाव में मियाँ शब्द को लेकर जबरदस्त घमासान मचा। इस शब्द की गूँज कोर्ट में भी सुनाई दी। मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगा कर सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को कोर्ट में घसीटा गया। दिल्ली से लेकर असम तक एफआईआर दर्ज करवाई गई।

असम में मियाँ बंगाली मुस्लिम को कहते हैं, जो 150-200 साल पहले अंग्रेजों द्वारा लाकर यहाँ बसाए गए। ये लोग हिन्दू बहुल क्षेत्रों में बस गए और वहाँ की डेमोग्राफी बदल दी। सीएम हिमंता ने चुनाव में मियाँ को बाहर निकालने की अपील की। उन्होंने साफ कहा कि मियाँ लोगों को राज्य से बाहर करना उनका मकसद है। इस पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया।

घुसपैठ और पहचान का मुद्दा

असम में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठियों का मुद्दा भी अहम रहा है। यह राज्य में सबसे अधिक भावनात्मक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दों में से एक है। पीएम मोदी, गृहमंत्री शाह, सीएम हिमंता के साथ-साथ बीजेपी के दूसरे नेताओं ने चुनाव में घुसपैठियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। बांग्लादेश से सीमा पार कर आने वाले लोगों की पहचान करना और उन्हें वापस भेजना बहुत बड़ा मुद्दा है। इसके कारण ही 1985 में असम समझौता हुआ था।

डेमोग्राफी में बदलाव के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहे असम के मूलनिवासियों को इस मुद्दे ने आकर्षित किया है। जमीन पर इसका असर दिख रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी असम में ये मुद्दा बना था।

एनआरसी और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा

असम के मूल निवासियों का सबसे बड़ा डर भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाना है। इसके लिए एनआरसी को अंतिम रूप देना और अवैध प्रवासियों को बाहर निकालना जरूरी है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 2025 में विधानसभा में बताया था कि राज्य में 2017 के बाद से 40 हजार से अधिक विदेशी नागरिकों की पहचान हुई है।

इसी पहचान के सवाल को सुलझाने के लिए असम में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई जो अभी तक पूरी नहीं हुई है।नागरिकता का सवाल भी सिर्फ कानूनी नहीं रह गया है, यह असम की राजनीति की धुरी बन गया।

भौगोलिक रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण में बँटा असम राजनीतिक रूप से अपर असम, मिडिल असम, लोअर असम और बराक घाटी में विभाजित है।

बराक घाटी के मुसलमान, असमिया मुसलमान और लोअर असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों की सामाजिक और राजनीतिक पहचान अलग-अलग है। बीजेपी ने मियाँ शब्द का इस्तेमाल कर बांग्लाभाषी मुसलमानों पर जमकर हमला किया है।

असम में सरकारी जमीनों से मुस्लिम प्रवासियों को बड़े पैमाने पर बेदखल किया गया है। इनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी मुस्लिम बताए जाते हैं। इसका असर भी चुनाव में दिखेगा।

विकास का मुद्दा

असम चुनाव में विकास अहम मुद्दा है। केन्द्र की सहायता से राज्य में डबल इंजन सरकार काम कर रही है। विकसित असम के विजन को सरकार ने पेश किया है। राज्य की अर्थव्यवस्था काफी तेजी से आगे बढ़ी है। राज्य में सड़कों, पूलों, बुनियादी परियोजनाओं पर काफी खर्च किया गया है। जागीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा लगभग ₹27,000 करोड़ के निवेश से सेमीकंडक्टर परियोजना शुरू की गई है यानी राज्य में सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह की परियोजनाएँ वोटरों को आकर्षित करेंगी।

असम की पारंपरिक ‘गमोचा’ को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलवाई। अहोम सेनापति लचित बोरफुकन की विरासत का सम्मान किया। राज्य में शिक्षा सुधार के तहत 402 मदरसों को प्राथमिक स्कूल में बदला गया और राज्य में बहुविवाह पर रोक लगाया गया

सीएम हिमंता और सीएम चेहरा गौरव गोगोई और उनकी पत्नियों से जुड़ा मुद्दा

कॉन्ग्रेस के सीएम पद का चेहरा और सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर बीजेपी ने पाकिस्तान से कनेक्शन के आरोप लगाए। गौरव गोगोई के पाकिस्तान यात्रा पर बीजेपी ने सवाल पूछे और उनकी पत्नी के पाकिस्तानी फर्म में काम करने और आईएसआई से कनेक्शन का आरोप भी लगाया।

इसके जवाब में चुनाव की तारीख नजदीक आते-आते कॉन्ग्रेस के नेता सीएम हिमंता सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयाँ सरमा पर तीन पासपोर्ट रखने का आरोप लगा दिया। कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तीन देशों का पासपोर्ट रखने की बात कही। इसको लेकर हिमंता दंपति ने शिकायत दर्ज कराई। इसपर पवन खेड़ा के दिल्ली स्थित आवास पर असम पुलिस पूछताछ के लिए पहुँची। लेकिन पवन खेड़ा घर पर मौजूद नहीं थे।

चुनाव प्रचार थमने तक निजी आरोपों की झड़ी लग गई और कॉन्ग्रेस-बीजेपी के नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते दिखे। पिछले साल सिंगापुर में राज्य के मशहूर गायक जुबीन गर्ग की रहस्यमय हालात में मौत भी इस बार प्रमुख मुद्दा है।

ऑपिनियन पोल में बीजेपी को प्रचंड जीत

असम चुनाव को लेकर दो सर्वे की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। इसमें मैट्रिज और चाणक्य स्ट्रैटजी शामिल हैं। मैट्रिज सर्वे के अनुसार, बीजेपी गठबंधन को वोट शेयर और सीटों दोनों बढ़त मिल रही है। वहीं कॉन्ग्रेस गठबंधन पीछे है, जबकि छोटे दलों का वोट कम है।

वोट शेयर

BJP: 46%
कॉन्ग्रेस: 36%
अन्य: 18%

सीट

BJP: 92-102
कॉन्ग्रेस: 22-32
अन्य: 4-7

चाणक्य के सर्वे के अनुसार, BJP गठबंधन बढ़त बनाता दिख रहा है। वहीं BJP गठबंधन के मुकाबले कॉन्ग्रेस आधी सीटें भी नहीं जीत पा रही है, जबकि छोटे दलों की सीटें इस सर्वे में भी कम ही हैं।

BJP: 83-90 सीटें
कॉन्ग्रेस: 30-36 सीटें
अन्य: 3-6 सीटें

इसके आधार पर कहा जा सकता है कि असम में सीएम हिमंता के नेतृत्व में तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी गठबंधन सरकार बनाने जा रही है, लेकिन इसका पता 5 मई 2026 को चलेगा, जब नतीजे आएँगे।

ब्राह्मण मुक्त तमिलनाडु: DMK-कॉन्ग्रेस-AIADMK-बीजेपी… किसी बड़ी पार्टी ने नहीं दिया टिकट, जानिए मद्रास प्रेसीडेंसी को पहला CM देने वाला समाज कैसे हाशिए पर पहुँचा

तमिलनाडु की राजनीति में आज एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। यहाँ के चुनाव में एक पूरा समुदाय यानी ब्राह्मण समाज पूरी तरह किनारे कर दिया गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव (23 अप्रैल) के लिए जब पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, तो एक हैरान करने वाली बात सामने आई। राज्य की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK और AIADMK, कॉन्ग्रेस तो छोड़िए, खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताने वाली भाजपा ने भी एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है।

यह सिर्फ चुनाव जीतने की कोई चाल नहीं है, बल्कि उस ‘द्रविड़ विचारधारा’ का असर है जो पिछले 100 सालों से तमिलनाडु में चल रही है। इस सोच ने वहाँ के समाज और राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है, जिससे अब ब्राह्मणों के लिए चुनाव लड़ना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।

खत्म होती भागीदारी: राजनीति से क्यों गायब हुए ब्राह्मण?

तमिलनाडु की कुल आबादी में ब्राह्मणों का हिस्सा मात्र 3% के करीब है। भले ही इनकी संख्या कम रही हो, लेकिन आजादी के बाद के शुरुआती सालों में सरकारी दफ्तरों, अदालतों और राजनीति में इनका काफी दबदबा हुआ करता था। साल 1952 में मद्रास प्रेसीडेंसी के पहले मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी (राजाजी) खुद एक ब्राह्मण थे। लेकिन धीरे-धीरे कामराज जैसे पिछड़े वर्गों के बड़े नेताओं के आने से राजनीति का रुख बदल गया और ब्राह्मणों का असर कम होने लगा।

एआईएडीएमके (AIADMK) की कमान जब तक जयललिता के हाथों में थी, तब तक ब्राह्मण समाज को राजनीति में अपनी जगह की उम्मीद रहती थी। जयललिता खुद एक तमिल ब्राह्मण परिवार से थीं। हालाँकि, उन्होंने अपनी पार्टी को पिछड़ी जातियों (OBC) के सहारे खड़ा किया, लेकिन वे समय-समय पर अपनी टीम में ब्राह्मण चेहरों को भी जगह देती थीं। वे कभी उन्हें चुनाव लड़ाती थीं तो कभी राज्यसभा भेजती थीं, जिससे इस समाज का प्रतिनिधित्व बना रहता था।

जयललिता के निधन के बाद अब समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पिछले 35 सालों में यह पहली बार हुआ है कि AIADMK ने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि भाजपा, जिसे आमतौर पर ब्राह्मणों की समर्थक पार्टी माना जाता है, उसने भी अपने हिस्से की 27 सीटों में से किसी पर भी इस समुदाय के व्यक्ति को मौका नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि तमिलनाडु की मुख्य राजनीति में ब्राह्मण समाज का दखल लगभग खत्म हो गया है।

टिकट कटने की बड़ी वजह: पेरियार की ‘द्रविड़’ राजनीति का असर

तमिलनाडु की राजनीति से ब्राह्मणों के बाहर होने के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक सोच का नतीजा है। इसकी शुरुआत ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से हुई थी। पेरियार ने ब्राह्मणवाद और उत्तर भारत के प्रभाव को तमिल पहचान का दुश्मन बताया। उनकी इस सोच ने पिछड़ी जातियों (OBC) और दलित समाज में एक नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी, जिससे धीरे-धीरे सत्ता की चाबी इन वर्गों के हाथ में चली गई।

तमिलनाडु में आज 69% आरक्षण लागू है, जो देश में सबसे ज्यादा है। यहाँ की बड़ी पार्टियों (DMK और AIADMK) ने अपनी पूरी राजनीति पिछड़ी जातियों (जैसे वन्नियार, थेवर और गौंडर) को मजबूत करने पर टिका दी है। आज हालत यह है कि कोई भी पार्टी किसी ब्राह्मण को टिकट देने का रिस्क नहीं लेना चाहती। उन्हें डर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उनका मुख्य वोट बैंक (OBC और SC) नाराज हो जाएगा और संदेश जाएगा कि वे फिर से ‘ऊँची जाति’ को बढ़ावा दे रहे हैं।

जब राजनीति में जगह मिलना बंद हो गई, तो पिछले 30 सालों में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों ने तमिलनाडु छोड़ दिया। इस समाज के लोग अब राजनीति के बजाय आईटी (IT), बैंकिंग और बड़े बिजनेस की ओर मुड़ गए हैं। बहुत से लोग बेंगलुरु, मुंबई या सीधे अमेरिका और यूरोप चले गए। उनके पुराने घर और इलाके (जिन्हें अग्रहारम कहा जाता था) अब बदल चुके हैं। आबादी कम होने और लोगों के बाहर चले जाने से अब वे एक बड़े ‘वोट बैंक’ के रूप में भी नहीं देखे जाते, जिससे पार्टियों के लिए उन्हें नजरअंदाज करना और आसान हो गया है।

‘सनातन’ पर छिड़ा संग्राम: ब्राह्मणों को ‘बाहरी’ बताने का खेल

तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणों को अक्सर ‘आर्य’ या ‘बाहरी’ बताकर पेश किया जाता है, जबकि बाकी समुदायों को ‘असली द्रविड़’ (वहाँ का मूल निवासी) कहा जाता है। यह सोच वहाँ इतनी गहरी हो चुकी है कि ‘सनातन धर्म’ के खिलाफ बोलना अब राजनीति में एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। पिछले कुछ सालों में डीएमके (DMK) के बड़े नेताओं ने सनातन धर्म को लेकर जो तीखे बयान दिए, उसने समाज के बीच की दूरी को और ज्यादा बढ़ा दिया है। द्रविड़ पार्टियाँ चाहती हैं कि लोग खुद को ‘हिंदू’ से ज्यादा अपनी ‘जाति’ (जैसे वन्नियार या थेवर) से जोड़कर देखें, ताकि भाजपा की हिंदुत्व वाली राजनीति वहाँ काम न कर सके।

तमिलनाडु में भाजपा ने भी एक कड़वी हकीकत को स्वीकार कर लिया है। उन्हें समझ आ गया है कि अगर वे केवल ‘ब्राह्मणों की पार्टी’ बनकर रहे, तो वहाँ कभी चुनाव नहीं जीत पाएँगे। इसीलिए भाजपा ने अब अन्नामलाई (जो पिछड़ी जाति गौंडर से आते हैं) जैसे नेताओं को आगे कर दिया है। पार्टी अब ब्राह्मणों को टिकट देने से परहेज कर रही है ताकि वह खुद को ‘द्रविड़ पहचान’ और पिछड़ों के करीब दिखा सके।

आज के दौर में तमिलनाडु का ब्राह्मण समाज एक अजीब और मुश्किल स्थिति में फँस गया है। उनके लिए यह ‘दोहरी मार’ जैसा है। एक तरफ DMK जैसी द्रविड़ पार्टियाँ उन्हें अपना पुराना ‘वैचारिक दुश्मन’ मानती हैं और उन्हें मुख्यधारा से बाहर रखना चाहती हैं। दूसरी तरफ BJP, जो कभी उनकी सबसे बड़ी समर्थक मानी जाती थी, अब उन्हें ‘चुनावी बोझ’ समझने लगी है। BJP को लगता है कि ब्राह्मणों को ज्यादा तवज्जो देने से उनका पिछड़ी जातियों का वोट बैंक खिसक सकता है। नतीजा यह है कि आज कोई भी बड़ी पार्टी उनके साथ खड़ी होने को तैयार नहीं है।

छोटी पार्टियों की ‘ब्राह्मण’ रणनीति

जहाँ तमिलनाडु की बड़ी पार्टियाँ जैसे DMK, AIADMK और यहाँ तक कि BJP ने भी ब्राह्मणों से दूरी बना ली है, वहीं कुछ नई और छोटी पार्टियाँ एक अलग रास्ता चुन रही हैं। इन पार्टियों को लगता है कि अगर बड़े दल ब्राह्मणों को टिकट नहीं दे रहे, तो वे इस समाज को अपने पाले में लाकर एक नया समीकरण बना सकते हैं। इसी सोच के साथ अभिनेता विजय और नेता सीमन ने अपनी-अपनी पार्टियों से ब्राह्मणों को चुनावी मैदान में उतारा है।

राजनीति में आए सुपरस्टार विजय की पार्टी ‘TVK’ ने दो ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया है। विजय का मकसद यह संदेश देना है कि उनकी पार्टी किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं है, भले ही वे पेरियार की विचारधारा को मानते हों। दूसरी तरफ, तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी ‘NTK’ ने सबको चौंकाते हुए 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। सीमन ने श्रीरंगम और मायलापुर जैसी जगहों को चुना है जहाँ ब्राह्मण वोट काफी मायने रखते हैं।

सीमन की राजनीति पेरियार की ‘द्रविड़’ सोच के खिलाफ है। उनका कहना है कि वे ‘द्रविड़ दीवार’ को गिराने के लिए ‘ब्राह्मण कडाप्परई’ (यानी लोहे की एक मजबूत छड़ या सब्बल) का इस्तेमाल करेंगे। सीमन का मानना है कि तमिलनाडु में रहने वाला हर व्यक्ति पहले ‘तमिल’ है, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो। यह राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि जिस ब्राह्मण समुदाय को द्रविड़ आंदोलन ने दशकों पहले किनारे कर दिया था, आज एक तमिल राष्ट्रवादी नेता उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बताकर गले लगा रहा है।

क्या ब्राह्मण केवल ‘वोटर’ बनकर रह जाएँगे?

तमिलनाडु की आज की राजनीति को देखकर साफ लगता है कि 3% आबादी वाला ब्राह्मण समाज अब ‘सत्ता चलाने’ के बजाय केवल एक ‘खामोश वोटर’ बनकर रह गया है। जहाँ कभी इस समाज के बड़े नेता राज्य की किस्मत तय करते थे, वहीं आज 160 से ज्यादा बड़े उम्मीदवारों में से केवल 3-4 ब्राह्मणों का होना यह बताता है कि उन्हें चुनावी रेस से लगभग बाहर कर दिया गया है। यह एक तरह का ‘राजनीतिक वनवास’ है, जहाँ उनकी आवाज अब विधानसभा में सुनाई देना बहुत मुश्किल हो गया है।

राज्य की बड़ी पार्टियों का यह रवैया साफ कर देता है कि अब तमिलनाडु में चुनाव जीतने के लिए योग्यता से ज्यादा ‘जाति की संख्या’ और ‘द्रविड़ पहचान’ मायने रखती है। वन्नियार, थेवर और गौंडर जैसी बड़ी जातियों के भारी वोट बैंक के सामने ब्राह्मणों की कम संख्या उन्हें राजनीतिक रूप से ‘कमजोर’ बना देती है। पार्टियों को लगता है कि इन्हें टिकट देने से कोई बड़ा फायदा नहीं होगा, बल्कि दूसरी बड़ी और प्रभावशाली जातियाँ नाराज हो सकती हैं।

तमिलनाडु का यह ‘ब्राह्मण मुक्त’ चुनावी मॉडल भारत के बाकी राज्यों के लिए भी एक बहुत बड़ा उदाहरण या चेतावनी है। यह दिखाता है कि कैसे जातियों को एकजुट करके किसी एक वर्ग को पूरी तरह किनारे लगाया जा सकता है। अगर यही तरीका देश के दूसरे राज्यों में भी फैल गया, तो भविष्य में चुनाव विकास या काम पर नहीं, बल्कि केवल जातियों के सिर गिनने और एक-दूसरे के विरोध पर टिक जाएँगे।

घर में लोगों को जमा कर नहीं पढ़ सकते नमाज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूँ हीं नहीं दिया फैसला, जानिए- इसके खतरे कितने बड़े?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में निजी संपत्ति में भीड़ जुटाकर नमाज अदा करने पर रोक लगा दी है। जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की बेंच ने 25 मार्च 2026 को यह फैसला दिया। यह मामला बरेली में एक मुस्लिम शख्स द्वारा अपने घर में नमाज के लिए भीड़ जुटाने से जुड़ा था और याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि वह निजी संपत्ति में नमाज के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा।

हाईकोर्ट के इस फैसले को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि खाली जगह पर नमाज पढ़ने या प्रेयर करने की आड़ में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने का एक पैटर्न रहा है। हाईकोर्ट का यह फैसला अगर नजीर की तरह लिया जाता है और देशभर में इस पर अमल किया जाता है तो यह डेमोग्राफी में बदलाव और धर्मांतरण से जुड़ी कई समस्याओं पर लगाम लग सकती है।

‘शांति-व्यवस्था को खतरा’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आरोपित अपने घर में दर्जनों लोगों को बुलाकर नमाज पढ़वा रहा था और इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई थी। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई हुई और यह मामला कोर्ट में पहुँच गया। इस मामले के याचिकाकर्ता का कहना था कि पुलिस की कार्रवाई सही नहीं है। वहीं पुलिस ने इस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी बताया।

25 मार्च को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने वचन दिया कि वह इस मामले से जुड़ी संपत्ति पर नमाज पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा। वहीं, इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वचन का उल्लंघन करने पर पुलिस को कार्रवाई करने की छूट दी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “अगर याचिकाकर्ता इस वचन का उल्लंघन करता है और बड़ी संख्या में लोगों को वहाँ नमाज के लिए इकट्ठा करता है, जिससे इलाके में शांति और व्यवस्था बिगड़ने का खतरा होता है तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।”

वहीं, कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के खिलाफ जारी चालान वापस लिया जाए। साथ ही, अवमानना (कंटेम्प्ट) के जो नोटिस जारी किए गए थे उन्हें भी कोर्ट ने समाप्त कर दिया है। याचिकाकर्ता की सुरक्षा को वापस लेते हुए कोर्ट ने यह याचिका निस्तारित कर दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

क्या है यह पूरा मामला?

इस मामले की शुरुआत 16 जनवरी 2026 को बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गाँव से हुई। वहाँ एक निजी खाली घर में सामूहिक नमाज पढ़े जाने से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और पुलिस ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई करनी शुरू की। पुलिस ने इसे बाद 18 जनवरी 2026 को नमाज अदा करने के आरोप में 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लिया।

इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरु हो गई। लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने सोशल मीडिया पर यह दावा करना शुरू कर दिया कि इन लोगों को नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया है। दावा किया जाने लगा कि पुलिस अब घरों के अंदर इबादत करने वाले नागरिकों को परेशान कर रही है। मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए ‘विक्टिमहुड’ का एजेंडा सोशल मीडिया पर चलाया जाने लगा। हालाँकि, अधूरा सच और प्रोपेगेंडा था।

पुलिस ने बताया कि इन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि एहतियाती तौर पर हिरासत में लिया गया है। एसपी अंशिका वर्मा ने स्पष्ट किया कि संदिग्ध मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लेना केवल एहतियातन उठाया गया कदम था। यह कार्रवाई उस समय की गई जब पुलिस को मोहम्मदगंज गाँव के निवासियों से जानकारी मिली कि पिछले कुछ हफ्तों से एक खाली पड़े घर का उपयोग मदरसे के रूप में किया जा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी शिकायत की थी कि बिना प्रशासनिक अनुमति के वहाँ नियमित रूप से सामूहिक नमाज अदा की जा रही थी।

‘अवैध मदरसे’ से परेशान थे ग्रामीण

पुलिस ने यह कार्रवाई ऐसे ही नहीं कर दी थी। पुलिस ने ग्रामीणों की लगातार चिंता पर यह कदम उठाया था। ग्रामीणों ने इस मामले में पुलिस-प्रशासन को 29 दिसंबर 2025 को ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को दी शिकायत में बताया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अवैध रूप से मदरसा का निर्माण करा लिया है जो गलता है क्योंकि इसके लिए किसी से कोई अनुमित नहीं ली गई है। ग्रामीणों ने शिकायत में कहा कि उन्हें धमकाया भी जा रहा है और उन्होंने इसकी जाँच कराए जाने की माँग की।

29 दिसंबर 2025 को दिया गया पत्र

ग्रामीणों ने 8 जनवरी 2026 को बरेली के SSP को भी पत्र लिखा था। ग्रामीणों ने अवैध मदरसे का निर्माण कराए जाने पर कार्रवाई करने की माँग की थी। इसमें कहा गया कि मुस्लिम लोगों ने गाँव में मकान का बहाना बनाकर मदरसा का निर्माण करा दिया है।

8 जनवरी 2026 को SSP को लिखा गया पत्र

16 जनवरी को नमाज पढ़े जाने के बाद भी उसके अगले दिन यानी 17 जनवरी 2026 को ग्रामीणों ने पत्र लिखकर कार्रवाई की माँग की। ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को लिखे पत्र में कहा, “मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव में मदरसा का निर्माण करा लिया है जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करते हैं और किसी से कोई अनुमति नहीं ली गई है।”

उन्होंने आगे लिखा, “विरोध करने पर हनीफ के मकान में अवैध रूप से नमाज अदा करते हुए पकड़े गए हैं। 15 लोगों को पुलिस ने पकड़ा है और कई भाग गए हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अवैध रूप से नमाज अदा की जा रही है, उसे रुकवाया जाए और अवैध रूप से बने मदरसे को ध्वस्त किया जाए।”

17 जनवरी को उप-जिलाधिकारी को दिया गया पत्र

तारिक खान नामक शख्स ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका डाली थी। जिसेक बाद अदालत ने बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह और SSP अनुराग आर्य के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। कोर्ट ने इस मामले में यूपी सरकार को फटकार भी लगाई और अब जुर्माना भी लगाया है। हालाँकि, यूपी सरकार ने कोर्ट में दावा किया है कि उस जगह पर नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगाई गई है।

घरों में नमाज-प्रेयर: मस्जिद-चर्च की नींव

इस विषय पर तर्क रखें उससे पहले जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश उदाहरणों के जरिए करते हैं। दिल्ली के ब्रह्मपुरी में एक मस्जिद है ना है अल-मतीन। यह मस्जिद बनने की प्रक्रिया इस साजिश को दिखाने के लिए काफी है। 2013 में यहाँ मुस्लिमों ने एक फ्लैट खरीदा, धीरे-धीरे वहाँ लोग नमाज पढ़ने आने लगे जैसा बरेली में हो रहा है। बाद में यह मस्जिद बन गई और कुछ समय बाद यह मस्जिद 4 मंजिला बना दी गई। कुछ वर्षों बाद बगल के प्लाट को खरीदकर इसे विस्तार देने और मंदिर के ठीक सामने इसका गेट बनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। ये कहानी राष्ट्रीय राजधानी की है लेकिन देशभर में हालात यहीं है।

गुजरात के सूरत में 2022 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था। वहाँ ‘शिव शक्ति सोसाइटी’ में कुछ प्लॉट्स मुस्लिमों ने खरीदे और वहाँ भी यही सिलसिला शुरू हुआ। लोग आते, नमाज पढ़ते और बात आगे बढ़ती रही। बाद में जब स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताई तो मुस्लिमों ने दावा किया गया कि यह जमीन वक्फ बोर्ड की है और यहाँ अब मस्जिद-मदरसा है। यह प्लॉट की जमीन मुस्लिमों के लिए पवित्र हो गई। इस जमीन को वक्फ को मिली असीम ताकत के जरिए मस्जिद बना दिया गया और शिकायत करने वालों के लिए मुँह ताकते के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

ऐसा ही मामला हिमाचल प्रदेश के शिमला से भी सामने आया। मोहम्मद सलीम नाम का एक व्यक्ति 1990 में संजौली आया। उसने उस सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया, जहाँ पहले एक स्कूल था जिसे बाद में कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया था। उसने वहाँ एक मंजिला ढाँचा बनाया, जो धीरे-धीरे कई मंजिलों की इमारत में बदल गया। बाद में उसने इसे मस्जिद का रूप दे दिया और वक्फ बोर्ड से NOC भी हासिल कर ली। यह एक मंजिला ढाँचा बढ़कर 5 मंजिला मस्जिद बन गया और नमाज पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी। इसके साथ ही टकराव भी शुरू हो गया।

ईसाइयों में भी यह ट्रेंड देखने को मिलता है। वहाँ भी घरों में प्रार्थना सभाओं और उनकी आड़ में धर्मांतरण के खूब मामले सामने आते हैं। शुरुआत अक्सर बहुत साधारण तरीके से होती है।

किसी व्यक्ति के घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं। यह आयोजन छोटा होता है और स्थानीय स्तर पर ज्यादा ध्यान नहीं खींचता। धीरे-धीरे इसमें शामिल होने वालों की संख्या बढ़ने लगती है। नियमित तौर पर लोग जुटने लगते हैं और वहाँ लाउडस्पीकर, कुर्सियां, बैनर और अन्य व्यवस्थाएँ होने लगती हैं, जिससे वह स्थान एक चर्च का रूप ले लेता है। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और छत्तीसगढ़ तक ऐसे हजारों मामले सामने आए हैं।

क्यों खतरनाक है घरों में नमाज-प्रेयर का ट्रेंड?

आपने उदाहरण देखे हैं कि किस तरह घर से शुरू होने वाली ये मजहबी गतिविधियाँ धीरे-धीरे स्थायी मजहबी ढाँचों में बदल जाती हैं। यह बहस आस्था से आगे बढ़कर कानून से लेकर डेमोग्राफी के संतुलन और धर्मांतरण की भी है।

शुरुआत अक्सर बेहद सामान्य दिखती है। किसी घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हैं या प्रार्थना सभा करते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है तो इन सभाओं का स्वरूप बदलने लगता है। लोगों की संख्या बढ़ती है और यह नियमित होने लगता है। धीरे-धीरे घर मजहबी स्थल बन जाता है। इसके बाद अगला चरण आता है और फिर बाहर से मौलवियों-उलेमाओं या पादरियों का आना शुरू हो जाता है। फिर तकरीरों और प्रवचनों का दौर शुरू होता है।

जैसे जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो डेमोग्राफी असंतुलन की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। पहले मस्जिद या चर्च के आस-पास मुस्लिमों और ईसाइयों को बसाया जाता है और फिर वहाँ रहने वालें हिंदुओं के साथ टकराव होने लगता है। धीरे-धीरे वहाँ पर अल्पसंख्यक हो गए हिंदू समुदाय को परेशान किया जाता है और फिर मजबूर कर दिया जाता है कि वो वहाँ से चले जाएँ। या अपना मजहब बदल लें। लालच देकर और ताकत के जरिए मतांतरण की खूब कोशिशें होती हैं। मकानों के बाहर बिक्री के पोस्टर लगाए जाने से जुड़ी खूब खबरें आपने पढ़ी होंगी।

हिंदुओं के हितों को देखना भी अदालत की जिम्मेदारी

अदालत के सामने यह सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है बल्कि भारत के सामाजिक संतुलन और हिंदुओं के अधिकारों से जुड़ा सवाल भी था। इस फैसले से लगता है कि कोर्ट को जमीनी वास्तविकताओं का शायद अंदाजा रहा होगा। कोर्ट सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करती बल्कि उस फैसले का सीधा असर आम लोगों के जीवन, उनकी सुरक्षा, उनकी आस्था और उनके अधिकारों पर पड़ता है।

दिल्ली, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के उदाहरण बताते हैं कि समस्या वास्तविक है। इस समस्या की शुरुआत में ही अगर हिंदू समाज प्रशासन के पास जाता है तो उसे कह दिया जाता है कि अभी कोई जमीनी परिवर्तन नहीं दिख रहा है तो अभी खतरा भी नहीं है।

वहीं, जब वही गतिविधियाँ आगे चलकर स्थायी हो जाती हैं और तब अगर कोई शिकायत करने जाता है तो कहा जाता है कि एक स्थापित चर्च, मस्जिद है या वक्फ संपत्ति है तो इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। यह एक तरह का ‘कानूनी चक्रव्यूह’ बन जाता है जिसमें आम हिंदू समाज फँस जाता है। यदि किसी विशेष इलाके में हिंदू समुदाय खुद के लिए खतरा देखता है, खुद को असुरक्षित नजर पाता है तो यह भी अदालत का ही काम है कि उसे सुरक्षित महसूस हो। उसके साथ न्याय हो।

क्या विपक्ष की कठपुतली है मेटा इंडिया? फेसबुक पर मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा की बाढ़ में विश्वसनीयता बही, शीर्ष नेतृत्व के कॉन्ग्रेसी झुकाव पर उठे सवाल

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि मेटा (Meta) इंडिया की कंटेंट मॉडरेशन और पॉलिसी से जुड़े फैसले अब तक एरह से मोदी सरकार के खिलाफ नजर आने लगे हैं। यह बहस तब और आग की तरह फैल गई जब लोगों ने अपने अनुभव साझा करते हुए पोस्ट डालने शुरू किए।

नेटिजन्स का कहना था कि उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम फीड पर ज्यादातर ऐसे पोस्ट दिखाई दे रहे हैं, जिनमें सरकार की आलोचना की जा रही है। इन दावों के बाद इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई, जहाँ कुछ लोग इसे एल्गोरिदम (Algorithm) का असर बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं।

सबसे वायरल ‘हिंदुत्व नाइट’ नाम की सोशल मीडिया यूजर की एक पोस्ट में कहा गया, “पिछले 6 से 8 महीनों में पूरा फेसबुक एंटी-मोदी हो गया है… जब भी मैं फेसबुक खोलती हूँ, मुझे 50 हजार लाइक्स वाले एंटी-मोदी पोस्ट ही दिखाई देते हैं।”

यूजर ने यह भी दावा किया कि यह सिर्फ उनके साथ नहीं बल्कि उनके मोदी सरकार का समर्थन करने वाले दोस्तों ने भी अनुभव किया है। यूजर ने लिखा, यहाँ तक की मेरे पुराने मोदी समर्थक दोस्त भी मोदी-विरोधी पोस्ट शेयर कर रहे हैं। मैं यह नहीं पूछ रही कि क्या बदल गया, क्योंकि सबके अपने-अपने कारण होते हैं। BJP नेतृत्व इस भ्रम में जी रहा है कि सब कुछ ठीक है क्योंकि BJP कल्याणकारी योजनाओं के दम पर चुनाव जीतती है।।”

इस पोस्ट पर एक यूजर ने जवाब देते हुए मेटा इंडिया पब्लिक पॉलिसी एग्जिक्यूटिव प्रियंका राव खान के नाम का जिक्र किया गया था। इस जवाब के बाद पोस्ट को लेकर चर्चा तेज हो गई और मेटा इंडिया में पॉलिसी से जुड़े पदों पर काम करने वाले लोगों को लेकर एक लंबा थ्रेड शुरू हो गया। धीरे-धीरे प्रियंका खान की सोशल मीडिया गतिविधि, प्रोफाइलट डिटेल्स से लेकर उनकी प्रोफेशनल जानकारी के स्क्रीनशॉट भी वायरल हो गए, जिससे नेटिजन्स ने मामले में वैचारिक निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश की।

खास बात यह भी सामने आई कि प्रियंका राव खान के सोशल मीडिया अकाउंट्स लॉक या प्राइवेट हैं। पहले प्रियंका के ‘एक्स’ प्रोफाइल पर एक बैनर लगा था, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘नाजी’ कहने वाले पोस्टर छपे थे। इसी साल फरवरी में उनके प्रोफाइल के स्क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिसके बाद उन्होंने वह बैनर हटा दिया।

विवाद शुरू करने वाला सोशल मीडिया थ्रेड

झुनझुनवाला नाम के ‘एक्स’ हैंडल का यूजर अनुराग पोस्ट करता है, उसने फरवरी में एक थ्रेड साझा किया था और फिर ‘हिंदुत्व नाइट’ की पोस्ट पर कमेंट के रूप में भी वही बातें दोहराईं, जिसमें उसने प्रियंका राव खान के बैकग्राउंड, उनके ऑक्सफॉर्ड ब्लावात्निक स्कूल एसोसिएशन से जुड़े होने और उनके प्रोफाइल हेडर पर पहले मौजूद और अब हटाए जा चुके बैनर का उल्लेख किया था।

उनकी इस पोस्ट को वरिष्ठ पत्रकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने भी क्वोट किया, जिससे इस चर्चा को और अधिक महत्व मिला। फरवरी में एक पोस्ट में कंचन गुप्ता ने लिखा था कि प्रियंका राव खान ने “ऑक्सफोर्ड में अपना समय नेतृत्व की ट्रेनिंग लेने में नहीं, बल्कि हिंदू विरोधी और भारत विरोधी विचार फैलाने वाले एक एक्टिविस्ट के रूप में बिताया” और आगे उन्होंने यह भी जोड़ा कि बाद में मेटा प्लेटफ़ॉर्म ने उन्हें भारत में पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के रूप में नियुक्त किया।

कंचन गुप्ता ने यह भी सुझाव दिया कि जो यूजर्स मॉडरेशन के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें और कहीं देखने की जरूरत नहीं है जिससे यह धारणा और मजबूत हुई कि राजनीतिक झुकाव रखने वाले व्यक्ति पॉलिसी के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।

यह चर्चा तब और बढ़ गई जब यह सामने आया कि प्रियंका राव खान के पति मोहम्मद खान हैं, जो INC की मीडिया टीम से जुड़े बताए जाते हैं। अनुराग की पोस्ट के जवाब में मोहम्मद खान जो खुद को एक वकील बताते हैं, उन्होंने अनुराग को कानूनी कार्रवाई की धमकी दी और लिखा, “अरे डरपोक कमीने। यह मेरी बीवी है। देखते हैं कि हैरेसमेंट के लिए क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन का सामना करने पर तुम कितने बहादुर होते हो। तुम्हारी प्रोफाइल पर कुछ दूसरे क्रिमिनल कंटेंट के भी स्क्रीनशॉट लिए हैं। तुम्हें खुद जाकर इसे सही साबित करते हुए देखने का इंतजार रहेगा।”

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गुजरात के मुख्यमंत्री की मेटा प्रतिनिधियों के साथ बैठक ने चर्चा का मोड़ा रुख

यह विवाद केवल प्रियंका राव खान और मोहम्मद खान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मेटा प्लेटफ़ॉर्म के अन्य कर्मचारियों को भी शामिल करता है। ऐसे ही एक कर्मचारी अमन जैन हैं, जो वर्तमान में मेटा में सीनियर डायरेक्टर और हेड पब्लिक पॉलिसी के पद पर कार्यरत हैं। हाल ही में एक पोस्ट में उन्होंने बताया कि उनकी मुलाकात गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से हुई थी।

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इस बैठक में मेटा प्लेटफ़ॉर्म के प्रतिनिधियों ने AI, वेयरेबल्स, स्किलिंग और ई-गवर्नेंस से जुड़ी पहलों पर चर्चा की। इसके बाद सोशल मीडिया पर पुराने पोस्ट और पॉलिसी इकोसिस्टम से जुड़े लिंक सामने आने लगे। नेटिजन्स ने मेटा प्लेटफ़ॉर्म के डिलीट किए गए पोस्ट का स्क्रीनशॉट भी साझा किया, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी को ‘आत्ममुग्ध’ बताने वाले आर्टिकल को ‘रोचक रचना’ कहा था।

उस आर्टिकल का टाइटल ‘टू नाइटमेयर फोरटोल्ड‘ था, जिसे जेम्स मनोर ने लिखा था और अमन जैन ने उस आर्टिकल से एक खास कोट शेयर किया था, जिसमें लिखा था, “मोदी पक्के नार्सिसिस्ट लोगों के बीच एक पक्के नार्सिसिस्ट होंगे। यह सत्ता में बने रहने का कोई नुस्खा नहीं है।” यह पोस्ट और आर्टिकल दिसंबर 2013 के थे, यानी नरेंद्र मोदी के मई 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद संभालने से पहले के।

सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पोस्ट का इस्तेमाल यह तर्क देने के लिए किया कि प्लेटफॉर्म की पॉलिसी को आकार देने वाले व्यक्ति पूरी तरह राजनीतिक रूप से निष्पक्ष नहीं हो सकते।

प्रियंका राव ने छोड़ दिया मेटा?

प्रियंका राव खान के ‘लिंक्डइन’ प्रोफाइल के स्क्रीनशॉट्स ने इस चर्चा में एक और पहलू जोड़ दिया। प्रोफाइल के अनुसार, उन्होंने जून 2022 से मार्च 2026 तक मेटा प्लेटफ़ॉर्म में पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के रूप में काम किया है। यह संभावना भी जताई जा रही है कि अब वह कंपनी में न हों, हालाँकि उनके लिंक्डइन प्रोफाइल पर इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

स्रोत: लिंक्डइन

पॉलिसी रोल्स में निष्पक्षता पर सवाल

यह विवाद किसी पक्की नीति या नियम को लेकर नहीं है, बल्कि लोगों की सोच और धारणा से जुड़ा है। लेकिन इस बहस ने एक बार फिर यह चिंता सामने ला दी है कि बड़ी टेक कंपनियों में काम करने वाले लोग, जो पब्लिक पॉलिसी जैसे अहम पदों पर होते हैं, क्या पूरी तरह राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहते हैं या नहीं? खासकर तब, जब ये प्लैटफॉर्म्स चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दो पर लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं।

जब ऐसे पदों पर बैठे लोग अपने राजनीतिक विचार खुलकर जाहिर करते हैं, तो लोगों के मन में सवाल उठने लगेत हैं कि क्या कंटेंट मॉडरेशन और प्लेटफॉर्म के फैसले निष्पक्ष हैं या फिर उनके निजी विचार उन पर असर डालते हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों की चिंता यह है कि अगर किसी तरह का पक्षपात दिखता भी है, तो इससे प्लैटफॉर्म पर भरोसा कम हो सकता है। खासकर उन प्लैटफॉर्म्स पर, जिनका इस्तेमाल करोड़ों लोग करते हैं।

चाहे ये चिंता सच हो या सिर्फ लोगों की सोच, लेकिन इस विवाद ने यह जरूर दिखा दिया है कि अगर नेतृत्व से जुड़े लोगों पर राजनीतिक झुकाव का शक भी होता है, तो प्लैटफॉर्म की निष्पक्षता पर सवाल जल्दी उठने लगते हैं।


(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

UP के Gen-Z का ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’, अखिलेश यादव को ‘रहमान डकैत’ दिखाया: पूछा- ‘ल्यारी राज’ चाहिए या ‘धुरंधर CM’, जानिए संगठन के बारे में सबकुछ

‘धुरंधर-2’ जहाँ बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक रिकॉर्ड ध्वस्त करती जा रही है तो वहीं उसके किरदार देश की राजनीति में भी तहलका मचाए हुए हैं। कुछ दिनों पहले माफिया अतीक अहमद से मिलते जुलते किरदार को लेकर उत्तर प्रदेश में खूब सियासी बवाल हुआ तो अब अखिलेश यादव की ‘धुरंधर तस्वीरों’ को लेकर हंगामा मचा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, सीतापुर, नोएडा और अमेठी समेत 10 जिलों में अखिलेश यादव के खिलाफ होर्डिंग्स लगाए गए हैं।

होर्डिंग्स में लिखा ‘अखिलेश यादव का ल्यारी राज’

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ (YAM) नाम की संस्था द्वारा लगाए गए इन होर्डिंग में एक तरफ अखिलेश यादव तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तस्वीरें हैं। अखिलेश यादव की तस्वीर को धुरंधर के विलेन रहमान डकैत की तरह बनाया गया है और उनकी तस्वीर के नीचे लिखा है- ‘अखिलेश का ल्यारी राज’। वहीं, होर्डिंग में दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी की तस्वीर लगी है जिसमें वह कन्या पूजन करते नजर आ रहे हैं और उनकी तस्वीर पर लिखा है- धुरंधर CM। इस होर्डिंग के बीच में बड़े अक्षरों में पूछा गया है-‘आपको क्या चाहिए?’।

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ द्वारा लगाए गए होर्डिंग

इन होर्डिंग में कुछ अखबारों की खबरों की कटिंग भी लगाई गई हैं। इनमें अखिलेश यादव की तस्वीरों के नीचे ‘हिंसा जारी, अब तक 38 मरे’, ‘हिंसा जारी, 17 और मरे’, ‘मरेठ पहुँची दंगों की आग’ और ‘शामली में खूनी संघर्ष: राज्य में बढ़ रहा सांप्रदायिक तनाव’ जैसी खबरें हैं। तो दूसरी तरफ CM योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के नीचे ‘अपराधियों को पालती है सपा, माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’, ‘मुख्तार की मौत’ और ‘अतीक और अशरफ भी मारे गए’ जैसी खबरों की कटिंग लगी हैं।

साथ ही, होर्डिंग पर ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ के पदाधिकारियों की तस्वीरें भी लगी हैं। कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष सिंह, महामंत्री अभिनव तिवारी, उपाध्यक्ष शिवानी पांडेय जैसे कई पदाधिकारियों की फोटो लगी हैं।

सपा की करतूतों से युवाओं को अवगत कराना मकसद: यूथ अगेंस्ट माफिया

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ के पदाधिकारियों ने ये होर्डिंग लगाए जाने की वजहों पर भी बात की है। संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष सिंह ने कहा, “हमें जेन-जी को संदेश देना है, उन्हें साथ जोड़ना है और उनको यह बताना है कि जब वो व्यस्क नहीं हुए थे तब प्रदेश में क्या चल रहा था, वो उन्हें नहीं भूलनी चाहिए। हम नई पीढ़ी को समझाएँगे और यह बताएँगे कि AI के दौर में जाति-बिरादरी में फँसे रहना कितनी दिक्कत दे सकती है।”

वहीं, संगठन के महामंत्री अभिनव तिवारी ने कहा, “इसका मकसद यही था कि हम जेन-जी में जागरूकता फैलाना चाहते थे। ताकि वो जान सकें कि पहले UP ने एक दौर देखा था और एक दौर अब है, एक समय यहाँ मुजफ्फरनगर-शामली जैसे दंगे होते थे और एक आज का समय है।” साथ ही, अभिनव का कहना है कि यह संस्था छात्रों द्वारा चलाई जा रही है और इसका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।

क्या है होर्डिंग्स लगाने वाला ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’?

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ की वेबसाइट पर संगठन को ‘उत्तर प्रदेश को डर और माफिया के दौर में वापस जाने से रोकने के लिए नागरिकों द्वारा शुरू किया गया एक मंच’ बताया गया है।

वेबसाइट पर कहा गया है, “‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ एक सामाजिक संगठन है, जिसका उद्देश्य है लोगों को जागरूक करना, खासकर युवाओं को शिक्षित करना, अपराध के नुकसान को समझाना और उत्तर प्रदेश को सुरक्षित और विकास की राह पर आगे बढ़ाने के लिए लोगों का समर्थन जुटाना।”

यह संगठन पुराने रिकॉर्ड, अपराध से जुड़ी घटनाओं की टाइमलाइन, निवेश पर पड़े असर, अलग-अलग जिलों के ट्रेंड और लोगों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करता है। साथ ही, कॉलेजों में ग्रुप बनाने, वॉलंटियर अभियान चलाने और युवाओं से संकल्प लेने जैसे कार्यों से युवाओं को संगठन से जोड़ा जाता है।

यह संगठन सिर्फ जानकारी ही नहीं देता बल्कि एक ऐसी सोच बनाना चाहता है जो अपराध के खिलाफ हो। इसके लिए म्यूजिक, रैप, ग्राफिक्स, प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता है।

यूथ अगेंस्ट माफिया द्वारा बनाया गया कंटेंट

ऊपर तस्वीर में दिखाया गया कंटेंट ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ द्वारा बनाए जाने वाले कंटेंट का उदाहरण है। इन इन्फोग्राफिक के जरिए दिखाया गया है कि कैसे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले सपा के शासन में 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में अराजकता का दौर था। इस अवधि में 1 लाख से अधिक नौकरियाँ खत्म हुईं और करीब 27000 करोड़ रुपए के निवेश का नुकसान हुआ जिसके चलते युवाओं के भविष्य और राज्य के विकास पर नकारात्मक असर पड़ा।

वहीं, 2017 के बाद योगी आदित्यनाथ के राज में कैसे प्रदेश की तस्वीर बदली उसकी कहानी भी इसके जरिए दिखाई गई है। इसमें बताया गया है कि 2017 के बाद कानून-व्यवस्था का दौर लौटने से प्रदेश में 7 लाख से अधिक नौकरियाँ पैदा हुईं और 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश आया है।

YAM का कहना है कि उत्तर प्रदेश एक समृद्ध भविष्य नहीं बना सकता अगर लोग अपने अतीत को भूल जाएँ। वेबसाइट पर लिखा गया है, “संगठित अपराध, डर, हिंसा और कमजोर कानून-व्यवस्था का दौर सिर्फ उस समय के पीड़ितों को ही नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि यह निवेश के भरोसे को भी कम करता है, लोगों को व्यापार शुरू करने से रोकता है, स्थानीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है, रोजगार के अवसर घटाता है और पूरी एक पीढ़ी के सपनों को नुकसान पहुँचाता है।”

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ का मकसद इसी याद को एक जिम्मेदार नागरिक पहल में बदलना है। यह संस्था अतीत को बुरे दौर को दर्ज करेगी, वर्तमान को जागरूक करेगी और एक ऐसा भविष्य बनाने में मदद करेगी जहाँ युवा खुद आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश को सुरक्षित और अवसरों से भरा राज्य बनाए रखें।