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भारत में बनेगा परमाणु ईंधन का अकूत भंडार, थोरियम से बनेगी बिजली: जानें- क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर? जिसकी सफलता पर PM मोदी ने दी बधाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूक्लियर प्रोग्राम के दूसरे चरण लगभग पूरे होने की जानकारी दी। उन्होंने भारत को प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने पर वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी। उन्नत रिएक्टर की विशेषताओं पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत के लिए इसे गौरवपूर्ण पल बताया।

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात 9.40 बजे एक पोस्ट में लिखा, “आज भारत ने अपने सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम में एक अहम और ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश ने अपने परमाणु ऊर्जा मिशन के दूसरे चरण में बड़ी प्रगति हासिल की है। कलपक्कम में स्वेदशी तकनीक से तैयार किया गया प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब सफलतापूर्वक क्रिटिकल हो गया है।”

रिएक्टर की विशेषता बताते हुए पीएम ने कहा, “यह एक उन्नत प्रकार का रिएक्टर है, जो जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा ईंधन पैदा करने की क्षमता रखता है। यह उपलब्धि भारत के वैज्ञानिकों की गहरी समझ और हमारे इंजानियरों की मजबूत तकनीकी क्षमता को दिखाती है।”

इसी के साथ प्रधानमंत्री ने न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण की ओर बढ़ने की भी बात कही। उन्होंने कहा, “साथ ही, यह हमारे न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम है, जहाँ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का बेहतर उपयोग कर सकेगा। यह देश के लिए गर्व का क्षण है। हमारे सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को इस बड़ी सफलता के लिए हार्दिक बधाई।”

आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ किस रिएक्टर की बात कर रहे हैं, जिसमें कई साइंस के शब्द हैं। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर है क्या ये प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर? इस रिएक्टर का काम क्या है? इसके ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का क्या मतलब है? और क्या वाकई भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण में पहुँच गया है?

क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर?

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) एक बेहद उन्नत किस्म का न्यूक्लियर रिएक्टर है, जिसे भारत ने अपनी खास जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। ‘फास्ट’ का मतलब है कि इसमें तेज गति वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल होता है और ‘ब्रीडर’ का मतलब है कि यह रिएक्टर जितना परमाणु ईंधन खर्च करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन खुद बना लेता है।

आम न्यूक्लियर रिएक्टर जहाँ यूरेनियम का उपयोग करके ऊर्जा पैदा करते हैं, वहीं PFBR यूरेनियम और प्लूटोनियम के साथ-साथ भविष्य के लिए नया ईंधन भी तैयार करता है, जिससे ईंधन की कमी का खतरा कम हो जाता है। भारत के लिए यह बहुत अहम है, क्योंकि हमारे पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भंडार काफी ज्यादा है।

यह रिएक्टर उसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जिससे आगे चलकर थोरियम आधारित ऊर्जा को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। तमिलनाडु के कलपक्कम में बना यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है, जो भारत की वैज्ञानिक ताकत और इंजनीयरिंग क्षमता को दिखाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह सिर्फ बिजली बनाने वाली मशीन नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए ‘ईंधन बनाने वाली फैक्ट्री’ भी है, जो भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

रिएक्टर के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने से क्या मतलब है?

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का मतलब यह है कि अब रिएक्टर के भीतर परमाणु प्रतिक्रिया (न्यूक्लियर फिशन) अपने आप लगातार और नियंत्रिति तरीके से चलने लगी है। आसान भाषा में कहें तो जब एक परमाणु टूटता है और उससे निकलने वाले न्यूट्रॉन ठीक उतनी ही संख्या में दूसरे परमाणुओं को तोड़ते रहते हैं, जिससे यह प्रक्रिया बिना रुके चलती रहे, उसी स्थिति को ‘क्रिटिकल’ कहा जाता है।

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार, क्रिटिकलिटी वह स्थिति है जब परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) स्थिर रूप से खुद चलती रहती है, यानी हर फिशन से उतने ही न्यूट्रॉन पैदा होते हैं जितने अगले फिशन को जारी रखने के लिए जरूरी होते हैं।

यह किसी खतरे का संकेत नहीं होता, बल्कि यह दिखाता है कि रिएक्टर सही तरीके से शुरू हो चुका है और अब वह स्थिर रूप से ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार है। इस चरण के बाद वैज्ञानिक धीरे-धीरे इसकी क्षमता बढ़ाते हैं और इसे बिजली उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार करते हैं।

क्या वाकई भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण में पहुँच गया

भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में बनाया गया है, जिसे होमी जे भाभा ने तैयार किया था। अभी जो प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल की है, वह दूसरे चरण की एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह तीसरे चरण में पहुँच गया है। असल में, भारत अभी दूसरे और तीसरे चरण के बीच के संक्रमण (Transition) दौर में है।

दूसरे चरण का मकसद फास्ट ब्रडर रिएक्टर के जरिए प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके ज्यादा ईंधन तैयार करना और आगे के लिए जरूरी सामग्री जुटाना है। PFBR का सफल होना दिखाता है कि यह तकनीक अब काम कर रही है, लेकिन पूरे देश में इस तरह के और रिएक्टर लगने औऱ स्थिर रूप से चलने के बाद ही कहा जा सकता है कि दूसरा चरण पूरी तरह सफल हुआ है।

तीसरे चरण में भारत का फोकस थोरियम पर आधारित रिएक्टरों पर होगा, क्योंकि भारत के पास थोरियम का बहुत बड़ा भंडार है। इसके लिए पहले पर्याप्त मात्रा में यू-233 जैसे ईंधन का उत्पादन जरूरी है, जो दूसरे चरण से ही मिलेगा। डिपार्टमेंट ऑप एटॉमिक एनर्जी के अनुसार, यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें हर स्टेज अगले स्टेज के लिए आधार तैयार करता है।

चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने कब्रिस्तानों को लेकर बनाए नए नियम, यहाँ ‘दफनाना’ बहुत महँगा: जानें- क्या हैं ‘बोन एश अपार्टमेंट’, जिन पर लगा बैन

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश चीन इनदिनों एक अलग तरह की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ अंतिम संस्कार के लिए कब्रिस्तान की भारी कमी हो गई है। हालात यह है कि घर सस्ते हैं, लेकिन कब्रिस्तान में जगह मिलना कई गुणा महँगा।

नतीजा यह है कि चीनी छोटे-छोटे फ्लैट खरीद कर उन्हें मुर्दे रखने की जगह में तब्दील कर रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने के लिए चीन ने 30 मार्च को नया कानून लागू किया है। इसके तहत रिहायशी इलाकों के घरों में मुर्दों को या उनकी अस्थियों को रखना गैरकानूनी करार दिया गया है।

रिहायशी इलाकों में बना ‘बोन एश अपार्टमेंट’

चीन के कई रिहायशी इलाकों में छोटे छोटे फ्लैट्स मिले हैं, जहाँ अंतिम संस्कार के लिए रखी गई अस्थियाँ और कब्र मिले हैं। इन घरों की खिड़कियाँ और दरवाजे बंद हैं। खिड़कियों में पर्दे लगे मिले, ताकि कोई अंदर का दृश्य नहीं दिख सके। फिर भी पड़ोसियों ने जब मेहनत कर अंदर झाँका तो नजारा काफी डरावना लगा। कमरे में मोमबत्तियाँ जल रही थी। काली फोटो के सामने एक ताबूत रखा हुआ था। इसमें हड्डियाँ थी। कब्रिस्तान के खर्च से बचने के लिए खाली फ्लैट्स को ‘हड्डियों वाला घर’ बना दिया गया था।

चीन में मुर्दों पर महँगाई की मार

शंघाई जैसे बड़े शहर में भी रियल स्टेट की कीमत गिरी है, लेकिन कब्रिस्तान में जगह कई गुणा ज्यादा महँगा हो गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक,2020 में एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार का खर्च औसत सैलरी वाले व्यक्ति के 6 महीने की कमाई के बराबर थी। आखिर आम आदमी इसे कैसे वहन करे। इसलिए शहर से बाहर बने सस्ते फ्लैट्स को मुर्दों के ताबूत को रखने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या है नया नियम

चीन के अंतिम संस्कार से जुड़े नए नियम में साफ किया गया है कि इंसानी अवशेषों या मुर्दों को सिर्फ तय सरकारी कब्रिस्तानों पर ही दफनाया जा सकता है। अब फ्लैट या किसी भी दूसरे घरों को ताबूत रखने या अस्थियों को रखने के लिए बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अंतिम संस्कार के नए नियम के मुताबिक, अंतिम संस्कार को एक सामाजिक कार्य के तौर पर परिभाषित किया गया है। बेसिक और सप्लीमेंट्री, दोनों सर्विसेज के लिए एक ‘टू-टियर कैटलॉग’ सिस्टम शुरू करने की बात कही गई है। नए नियमों के कैटलॉग में जरूरी चीजों की फीस लिखी गई है। इसके अलावा किसी भी एक्स्ट्रा आइटम या फीस लेने पर रोक है। इसमें किसी भी कमर्शियल कब्रिस्तान की मनाही है। नए नियम में जिंदगी का आखिरी सफर इज्जतदार और सही तरीके से हो, इस पर ध्यान दिया गया है।

दरअसल चीन में जन्मदर काफी घट गया है और यह बुजुर्गों का देश बन गया है। इसलिए मौतों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में कब्रिस्तान में जगह कम पड़ गए हैं। इसलिए डिमांड ज्यादा है। कीमतों पर कंट्रोल करने के लिए सरकार ने नए नियम बनाए हैं। चीनी अधिकारियों ने रेजिडेंशियल फ्लैट के अंदर दाह संस्कार की राख रखने पर बैन लगा दिया है, क्योंकि दफ़नाने के बढ़ते खर्च की वजह से कुछ परिवारों को दूसरे इंतज़ाम करने पड़े हैं।

चीनी समाज में सही तरीके से दफनाना एक जरूरी जिम्मेदारी मानी जाती है। यह पुरखों के प्रति सम्मान दिखाता है और कल्चरल वैल्यू से भी जुड़ा है। हालाँकि तेजी से हो रहे शहरी विकास और बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी की वजह से मौजूद जमीन पर दबाव बढ़ गया है, जिससे चीनी समाज जूझ रहा है।

अब जमीन पर पेड़ों के नीचे और समुद्र में दफनाने को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 6 फीसदी से ज्यादा अंतिम संस्कार इस तरीके से हो रहा है।

हिंदू घृणा से ‘गाजी’ बना सैयद सालार, महाराजा सुहेलदेव ने भेजा जहन्नुम: सत्य यही है ओवैसी के ‘गुलाम’, बिलबिलाने से योगी राज में नहीं होगा इतिहास का ‘तुष्टिकरण’

मुस्लिम आक्रांता सैयद सालार ने हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराया। जिसने भी इनकार किया उनके सिर काट दिए। हिंदू घृणा उसमें इतने भरी थी कि इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए वह ‘गाजी’ बन गया। 1034 ईस्वी में महाराजा सुहेलदेव ने उसे पराजित कर भारत और हिंदुओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

5 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान महाराजा सुहेलदेव की इसी वीरगाथा का जिक्र किया। यह सुनते ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के यूपी प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली का मजहब बिलबिलाने लगा।

इस बिलबिलाहट में एक्स पर एक पोस्ट करते हुए उसने सैयद सालार को ‘अमन पसंद’ बताते हुए महाराजा सुहेलदेव को अपमानित करने की कोशिश की। पूर्व में वह महाराजा सुहेलदेव को ‘लुटेरा’ भी कह चुका है।

शौकत अली ने एक्स पर लिखा, “सालार मसूद गाजी A.R के बारे में गलत इतिहास बता रहे हैं हमारे मुख्यमन्त्री जी, अगर सालार मसूद ग़ाज़ी, लुटेरे होते अक्रान्ता होते, तो भारत के मुसलमानों के साथ साथ बड़ी तादाद में हमारे हिन्दू भाईयों की उनके प्रति आस्था ना होती, राजा सुहैल देव का भारत की आज़ादी, या भारत के निर्माण में कोई योगदान नहीं था यही सच्चाई है।”

इससे पहले वो सितंबर 2025 में महाराजा सुहैल देव को लुटेरा और सालार मसूद को ‘अमन पसंद‘ बता चुका है। तब शौकत अली के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में FIR दर्ज हुई थी।  

शौकत अली ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन बयानों के पलटवार में ये विवादित टिप्पणी की, जिनमें सीएम ने सालार मसूद गाजी को विदेशी आक्रांता और माफिया बताते हुए कहा था कि महाराजा सुहेलदेव ने उसे मौत के घाट उतार दिया था।

बता दें कि सीएम योगी ने 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ भारतेंदु नाट्य अकादमी के 50 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में कहा था, “जो माफिया अभी मिट्टी में मिले हैं, उन्हीं का एक रूप था सालार मसूद। उसने सोमनाथ मंदिर तोड़ा, अयोध्या की राम जन्मभूमि को भी क्षति पहुँचाई। महाराजा सुहेलदेव ने उसे न सिर्फ हराया, बल्कि ऐसी मौत दी जिसे इस्लाम में सबसे बुरी, जहन्नुम‑गारंटी वाली मौत माना जाता है।”

शौकत अली के बयान पर भड़का राजभर समाज

शौकत अली के इस बयान पर खास तौर पर राजभर समाज और हिंदू संगठनों में रोष देखने को मिल रहा है। राजभर कार्यकर्ता इसे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि एक समग्र जातीय‑सांस्कृतिक संवेदना को चोट पहुँचाने की कोशिश मानते हैं।

इसी वजह से उन्होंने न सिर्फ आक्रोश जताया बल्कि शौकत के खिलाफ कानूनी और आंदोलनात्मक प्रतिक्रिया की धमकी भी दी है।

उत्तर प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने महाराज सुहेलदेव पर एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के विवादित बयान पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि अगर शौकत ने माफी नहीं माँगी तो प्रदेश भर में आंदोलन होगा।

मंत्री राजभर ने कहा कि शौकत अली को इतिहास की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओवैसी से कहूँगा कि अपने प्रदेश अध्यक्ष को माफी माँगने के लिए कहें, नहीं तो प्रदेशव्यापी आंदोलन होगा। आपका निकलना दूभर हो जाएगा।

मंत्री राजभर ने कहा कि यह सोची समझी रणनीति के तहत है क्योंकि आने वाले 10 जून को बहराइच में मेला लगने जा रहा है जो 10 दिन चलेगा। पहले लुटेरे गाजी का मेला लगता था।

मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि अब देश के वीरों का मेला, जिन्होंने देश को गुलाम होने से बचाया, देश को लुटने से बचाया, जिन्होंने देश की संपत्ति को बचाया, ऐसे देश के राष्ट्रीय वीर राजभर महाराज सुहेलदेव जी का मेला लगने लगने जा रहा है।

गौरतलब है कि संभल में सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर हर साल नेजा मेला लगाया जाता था। योगी सरकार ने 2025 में यह कहते हुए इसे रोक दिया कि विदेशी आक्रांताओं के नाम पर कोई मेला नहीं लगने दिया जाएगा। गाजी के नाम पर हर साल बहराइच शहर के दरगाह शरीफ में कई दशकों से मेला लगता आ रहा था।

राजभर समाज के लिए राजा सुहेलदेव की अहमियत

महाराजा सुहेलदेव को राजभर समाज का ‘कुलपुरुष’ माना जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र ने भी उन्हें राष्ट्रीय वीरता‑परंपरा का हिस्सा मानकर उनके नाम पर स्मारक, मेडिकल कॉलेज, ट्रेन और डाक टिकट आदि जैसे ठोस सम्मान दिए हैं।

सुहेलदेव को मुस्लिम आक्रमणकारी सालार मसूद पर विजय प्राप्त करने वाले योद्धा के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोलना राजभर समाज की ऐतिहासिक स्मृति और गौरव को ठेस पहुँचाना माना गया।

उत्तर प्रदेश में सुहेल देव को मानने वाले राजभर समुदाय की संख्या लाखों में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 18 फीसद राजभर हैं और बहराइच से लेकर वाराणसी तक के 15 जिलों में 60 विधानसभा सीटों पर राजभर समुदाय प्रभुत्व काफी अधिक है।

ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक चर्चाओं के अनुसार, सुहेलदेव 11वीं शताब्दी के एक क्षेत्रीय राजा और शासक माने जाते हैं, जिनका राज्य श्रावस्ती‑बहराइच के इलाके में बताया जाता है।

कहा जाता है कि उन्होंने बहराइच के पास सालार मसूद गाजी के खिलाफ स्थानीय राजाओं का गठबंधन तैयार किया और सालार मसूद की सेना को 1034 ईस्वी में पराजित कर दिया। इसके बाद मसूद की मौत हुई और उसे बहराइच में दफन किया गया।

राजभर समाज के दृष्टिकोण से यह लड़ाई छोटे और आम लोगों के खिलाफ विदेशी आक्रांता की पराजय का प्रतीक है, जिसमें राजभर आधार‑समूह के रूप में दिखते हैं।

चुनावी राजनीति में सुहेलदेव का नाम बार-बार उभरता है, क्योंकि राजभर समाज उन्हें अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व की लड़ाई से जोड़ता है। वर्तमान में सुभासपा जैसी राजभर केंद्रित पार्टियाँ महाराजा सुहेलदेव को अपना आधार मानती हैं। राजभर नेता उन्हें दलित‑शोषित‑किसान वर्ग का राष्ट्रीय वीर कहते हैं।

शौकत अली की टिप्पणी राजभर समाज के लिए केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि उनके पूरे इतिहास और गौरव पर चोट है। महाराजा सुहेलदेव राजभर समाज के लिए सम्मान, संघर्ष और आत्मगौरव का प्रतीक हैं।

सालार मसूद गाजी: ‘वॉरियर संत’ या आक्रांता?

सालार मसूद गाजी के बारे में जो प्रमुख विवरण मिलता है, वह 17वीं सदी की किताब मिरात‑ए‑मसूदी से आता है, जो घटनाओं के करीब 600 साल बाद लिखी गई। वह गजनी के सुल्तान महमूद का भतीजा माना जाता है। खुद इतिहासकार मानते हैं कि यह ग्रंथ सूफी परंपरा और लोककथाओं से प्रभावित है, न कि ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों से।

मिरात‑ए‑मसूदी के अनुसार, सालार मसूद गाजी को गाजी मियाँ भी कहा जाता था। गजनी के साथ मिलकर उसने भारत में इस्लाम फैलाने और गजनवी प्रभाव बढ़ाने के लिए अभियान चलाया। लेकिन महाराजा सुहेलदेव के सामने ये अभियान टिक न सका और मसूद को करारी हार मिली।

इस लिहाज से कहा जा सकता है कि मसूद की छवि एक ‘वॉरियर संत’ या योद्धा के तौर पर जबरन गढ़ी गई। इसमें इतिहास से ज्यादा आस्था और परंपरा को शामिल करने की कोशिश की गई।

असल में मिरात‑ए‑मसूदी किताब सालार मसूद को एक मजहबी योद्धा और संत के रूप में महिमामंडित करती है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से वह गजनवी आक्रमण का हिस्सा था।

कुल मिलाकर शौकत अली का बयान सिर्फ उनके ‘अपने’ लोगों को बरगलाने के काम आ सकता है लेकिन दुनिया के सामने कुछ भी कह देने से इतिहास को वह नहीं बदल पाएँगे।

महिला आरक्षण बिल पर अब ‘जल्दीबाजी’ का रोना रो रहा विपक्ष, पहले तुरंत लागू करने के लिए बना रहा था दबाव: सामने आया कॉन्ग्रेस का ‘दोगलापन’

महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष का रुख विरोधाभाषी है। कॉन्ग्रेस पहले तुरंत लागू करने की माँग कर रही थी, लेकिन अब प्रोसेस से जुड़ी आपत्तियाँ उठा रही है। वहीं कई विपक्षी पार्टियाँ ‘लागू करने के समय’ पर सवाल उठा रही हैं। इसके विपरीत सरकार का कहना है कि वह सही सलाह-मशविरा करके आगे बढ़ रही है और बड़े पैमाने पर आम सहमति बनाना चाहती है।

केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने 3 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण बिल पर 16 से 18 अप्रैल तक संसद के विशेष सेशन में चर्चा होगी। उन्होंने कहा, “हम 16 अप्रैल को संसद बुला रहे हैं। हम तब महिला आरक्षण बिल पर चर्चा करेंगे। महिलाओं को मजबूत बनाना हमारा वादा है। हमें महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए एक साथ आना चाहिए, राजनीति नहीं करनी चाहिए।” इस घोषणा पर विपक्षी पार्टियों की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई।

विपक्ष ने चुनौती दी और सरकार ने जवाब दिया

इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने आदर्श आचार संहिता के संभावित उल्लंघन की शिकायत की और केंद्र पर विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि उन्होंने 29 अप्रैल के बाद दो बार ऑल-पार्टी मीटिंग की माँग की।

उन्होंने आरोप लगाया, “हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हम इसे लाने वाले लोग हैं। यह हमारे समर्थन से ही सर्वसम्मति से बना है। ये लोग जब चाहें क्रेडिट ले लेते हैं। सब सहमत हैं, लेकिन किस समय, कैसे लाना है और कैसे करना है। इस पर राजनीति मत करो। अगर आपको यह करना ही था, तो आप इसे इस सत्र की शुरुआत में क्यों नहीं लाए? हमने तीन दिन तक ग्रामीण विकास पर चर्चा की। क्या हम इस पर चर्चा नहीं कर सकते थे? आप राज्यों में चुनाव के बाद सत्र बुलाएँ। हम सहयोग करेंगे। चुनाव से पहले क्रेडिट मत लो।”

खड़गे के सवाल का जवाब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने दिया। उन्होंने कहा, “आप इसे 30 साल में पास नहीं कर पाए। हम पहले ही इसका क्रेडिट ले चुके हैं। आप हमेशा हर चीज को राजनीति के नजरिए से देखते हैं, इंसानियत के नजरिए से नहीं।”

राज्यसभा MP जयराम रमेश ने भी जोर देकर कहा, “खड़गे ने तब माँग की थी कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। उस वक्त आपको जनगणना और परिसीमन की याद आ रही थी। लेकिन अब बगैर जनगणना के भी लागू करने में दिक्कत नहीं है। 30 महीने तक सोते रहे। इस स्पेशल सेशन का एकमात्र मकसद पॉलिटिकल फायदा उठाना और तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर असर डालना है। क्या इसे 15 दिन बाद नहीं बुलाया जा सकता था?”

हालाँकि रिजिजू ने बताया कि इस जरूरी मुद्दे पर 80% से ज्यादा पार्टियों के साथ पहले ही चर्चा हो चुकी है। इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने सरकार को लिखकर विधानसभा चुनावों के बाद पार्लियामेंट सेशन बुलाने के लिए कहा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार सभी पार्टियों और सांसदों से सलाह-मशविरा कर रही है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि उन्होंने मनमाने तरीके से इसे लागू करने के लिए कदम नहीं बढ़ाया है, बल्कि आरक्षण को सर्वसम्मति से संसद की मंजूरी मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “हमारे लिए, इसका किसी खास राज्य के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। हमें प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा, क्योंकि वक्त बीता जा रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने हमें लिखकर आग्रह किया है कि 29 अप्रैल के बाद मीटिंग बुलाएँ, हमें दिक्कत नहीं है।”

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार के महिला आरक्षण को लेकर की जा रही कवायद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेपन्स ऑफ मास डायवर्जन’ का एक और हिस्सा बताया। उनका कहना है कि मोदी सरकार की विदेश नीति की नाकामियों की वजह से देश को LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) और एनर्जी संकट का देश को सामना करना पड़ रहा है।”

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अप्रैल को कहा कि प्रस्तावित बिल का आधार ही ‘निराधार’ है, क्योंकि यह 15 साल पहले इकट्ठा किए गए डेटा पर आधारित है। उन्होंने आगे कहा कि सही प्रतिनिधित्व पाने के लिए सही आबादी का पता चलना चाहिए, जो जनगणना के आधार पर ही पता चलेगा। जब महिलाओं की जनसंख्या के लिए 2011 के पुराने आँकड़ों को आधार बनाएँगे, तो महिला आरक्षण की आधार भूमि ही गलत होगी।

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “जब गिनती ही गलत है, तो आरक्षण सही कैसे हो सकता है? जब नेक इरादों की बात हो तो शक नहीं होना चाहिए।”

यादव ने कहा, “इसीलिए हमारी सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि पहले जनगणना कराई जाए फिर महिला आरक्षण की बात उठाई जाए। जो सरकार महिलाओं को गिनना नहीं चाहती है, वो भला उन्हें आरक्षण क्या देगी। महिलाओं के साथ भाजपा और उनके संगी-साथी जो धोखा करना चाहते हैं, महिलाओं के साथ वो छलावा हम नहीं होने देंगे। कुल मिलाकर सरकार से हमारा ये कहना है कि जब तक जनगणना नहीं, तब तक महिला आरक्षण पर बहस करना नहीं!”

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के व्हिप और तमिलनाडु के विरुधुनगर से सांसद मणिकम टैगोर ने जोर देकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी का इरादा महिला कोटे में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को आरक्षण देने से मना करना है। उन्होंने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आरोप लगाया, “क्योंकि जाति-आधारित जनगणना से OBC आबादी पर साफ डेटा मिलेगा, इससे महिला कोटे में OBC के सही प्रतिनिधित्व की माँग उठेगी। BJP का छिपा हुआ एजेंडा OBC महिलाओं को आरक्षण देने से रोकना है, इसलिए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है।”

उन्होंने आगे कहा कि निचले सदन की सीटों में अनुमानित 50% की बढ़ोतरी से प्रतिनिधित्व में असमानता आ सकती है। इसके पीछे उनका तर्क है कि हालाँकि दक्षिणी राज्यों को ज्यादा सदस्य मिल सकते हैं, लेकिन संसद में उनकी तुलनात्मक ताकत उत्तरी राज्यों की तुलना में कम हो सकती है। खास बात यह है कि PM मोदी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि आने वाले परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों को कोई सीट नहीं गँवानी पड़ेगी।

जल्दी लागू करने की चाह से लेकर विरोध करने तक: विपक्ष के कई यू-टर्न

देश की सबसे पुरानी पार्टी की अगुवाई वाले विपक्ष ने लोगों में भय फैलाना शुरू कर दिया है कि कई राज्यों, खासकर दक्षिण, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम के राज्यों के परिसीमन और आरक्षण के लिए संविधान में बदलाव की कोशिश काफी ‘जल्दबाजी’ में की जा रही है। इसके ‘खतरनाक नतीजे’ सामने आ सकते हैं।

बिल का क्रेडिट लेने के लिए सत्ताधारी पार्टी पर हमला करने वाली कॉन्ग्रेस ने इसे अपना आइडिया करार दिया। पार्टी ने 2023 में इसे पास होने के तुरंत बाद लागू न करने के लिए सरकार की भी आलोचना की। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी फिलहाल सरकार पर हमला करने के लिए रणनीति बनाने में बिजी है। पार्टी कह रही है कि परिसीमन और जनगणना से पहले आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। हालाँकि कॉन्ग्रेस पहले परिसीमन, जनगणना की बात न कर, तुरंत महिला आरक्षण लागू करने की बात कही थी।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने कहा कि बिल अगली सुबह पास हो सकता है, क्योंकि सभी पार्टियों में आम सहमति है।” आपको बस इतना बताना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित होंगी। यह बहुत सीधा है। इसके अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर BJP सच में इसके लिए कमिटेड होती, तो वे इसे लागू करते। महिलाओं को रिज़र्वेशन देने और जनगणना या डिलिमिटेशन के बीच कोई रिश्ता नहीं है। तीनों जुड़े हुए नहीं हैं।

उन्होंने परिसीमना और जनगणना के नाम पर महिला आरक्षण कानून को बेवजह 10 साल तक बढ़ाने के लिए सरकार पर आरोप लगाए। दूसरे नेताओं ने भी यही बात कही।

ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा ने कहा, “हम माँग करते हैं कि हाल ही में पास हुआ महिला आरक्षण बिल 2024 के चुनाव से लागू हो। BJP सरकार ने जो भी रुकावटें डाली हैं, पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा और फिर आरक्षण लागू होगा। हम चाहते हैं कि ये शर्तें हटाई जाएँ। हम चाहते हैं कि बिल तुरंत लागू हो।” उन्होंने उस समय कहा, “हम चाहते हैं कि जनगणना हो, लेकिन जनगणना को महिला रिजर्वेशन से जोड़ना अन्याय है।”

पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और सांसद सोनिया गाँधी ने कहा कि देश की महिलाएँ पिछले 13 सालों से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का इंतजार कर रही हैं, और सरकार उन्हें सालों इंतजार करने के लिए कह रही है। उन्होंने कहा, “वे और कितने साल यह सब सहेंगी? क्या भारतीय महिलाओं के साथ ऐसा बर्ताव सही है? कॉन्ग्रेस बिल को तुरंत लागू करने की माँग करती है।”

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी इसी तरह जोर देते हुए कहा कि सरकार बिल का क्रेडिट ले रही है, लेकिन कम से कम दस साल तक इसे लागू करने का उसका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा था, “हम, भारत की महिलाओं के पास अब और समय बर्बाद करने के लिए नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना हमारा अधिकार है। मैं माँग करती हूँ कि हमारे काम की तारीफ और सम्मान किया जाए।”

पार्टी ने कहा, “हम अपनी माँग से पीछे नहीं हटेंगे। बिल को तुरंत लागू किया जाए, जिसमें OBC महिलाओं के लिए रिज़र्वेशन का प्रावधान हो।” इस मामले में ‘मोदी सरकार को एक्सपोज करने के लिए 15 शहरों में 15 प्रेस कॉन्फ्रेंस’ करने का दावा किया।

कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की वजह से यह बिल 2029 तक लागू नहीं होगा और यह “जुमला” 2024 के आम चुनाव में हारने के डर से दिया गया है।

दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ भी सरकार पर ऐसे ही आरोप लगा रही थीं, उनका कहना था कि वह महिलाओं को उनका हक नहीं दे रही है। AAP के राज्यसभा सांसद और दिल्ली एक्साइज पॉलिसी स्कैम में आरोपी संजय सिंह के मुताबिक, रिज़र्वेशन एक दिखावा है, क्योंकि सरकार हमेशा अपने वादों से पीछे रही है।

उन्होंने कहा, “इस बार महिलाओं को उन्होंने गुमराह किया है। यह उनका नया जुमला है। हमें यह भी नहीं पता कि बिल पास होने में कितना समय लगेगा, या यह कभी अप्रूव होगा भी या नहीं।” AAP की एक और नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री, आतिशी मार्लेना ने इस बिल को महिलाओं को बेवकूफ बनाने का एक तरीका बताया, क्योंकि यह आरक्षण 2024 के आम चुनाव के लिए नहीं था, बल्कि यह जनगणना और डिलिमिटेशन पर निर्भर करेगा। इसलिए, यह कम से कम अगले कुछ सालों तक लागू नहीं होगा।

ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने भी बिल को ‘जुमला’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की तारीखें तय नहीं थीं। इसलिए बिल 2029 तक भी लागू नहीं हो सका। उन्होंने मजाक उड़ाया कि यह ‘महिला रिज़र्वेशन रीशेड्यूलिंग बिल’ है और इसका नाम उसी के अनुसार होना चाहिए।

विपक्ष हर मुद्दे पर सरकार का विरोध करती है। इस ट्रैक रिकॉर्ड के साथ विपक्ष अपनी हरकतें फिर से शुरू कर दी हैं। उन्होंने सरकार पर आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़कर महिलाओं को गुमराह करने का आरोप लगाया है। अब सरकार ने वह घोषणा कर दी है, जिसकी माँग की जा रही थी। लेकिन, अब विपक्ष को दिक्कत महसूस हो रही है। पहले तुरंत लागू करने की जिद करने वाली विपक्षी पार्टियाँ अब असेंबली इलेक्शन का रोना रो रही है।

भारत एक बहुत बड़ा देश है और हर साल अलग-अलग राज्यों में इलेक्शन होते हैं। इसलिए जरूरी फैसलों को देश के किसी हिस्से में हो रहे विधानसभा चुनाव का बंधक नहीं बनाया जा सकता। विपक्षी पार्टियाँ एक तरह ‘एक देश, एक इलेक्शन’ का विरोध करती हैं। इनका मानना है कि इससे बीजेपी को फायदा होगा। इसलिए सच में विपक्ष के पास महिला आरक्षण बिल को टालने का कोई तर्क नहीं है। सिर्फ राजनीतिक चालों के लिए विरोध हो रहा है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भारत को इस्लामी मुल्क बनाने के लिए महिलाओं का दस्ता तैयार कर रही थी हैदराबाद की सईदा बेगम, ISIS-अलकायदा से मिले अल-मलिक के लिंक: सीरिया तक फैला है नेटवर्क

आंध्र प्रदेश में देशभर में फैले एक संगठित कट्टरपंथी और आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ है। विजयवाड़ा पुलिस और आंध्र प्रदेश काउंटर-इंटेलिजेंस की अगुवाई में चले इस ऑपरेशन में अब तक 6 राज्यों से 12 संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके तार ISIS और अलकायदा जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से जुड़े होने की आशंका है। इस गिरोह का नाम अल मलिक इस्लामिक यूथ बताया जा रहा है।

यह गिरोह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ओसामा बिन लादेन, जाकिर नाइक, इसरार अहमद शेख और अनवर अल-अवलाकी जैसे व्यक्तियों के वीडियो शेयर करता था, ताकि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और उग्र विचारधारा की ओर आकर्षित किया जा सके। नेटवर्क के मास्टरमाइंड मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ को 24 मार्च 2026 को विजयवाड़ा से अरेस्ट किया गया था।

उसके साथ मोहम्मद दानिश और मिर्जा सोहेल बेग को भी पकड़ा गया। जाँच में सामने आया है कि यह नेटवर्क भारत में युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, विदेशी हैंडलर्स से संपर्क रखने, साइबर आतंकवाद को बढ़ावा देने और भविष्य में आतंकी हमलों की साजिश रचने में सक्रिय था।

इन शुरुआती गिरफ्तारियों के बाद जाँच का दायरा तेजी से बढ़ा और आंध्र प्रदेश पुलिस ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और राजस्थान में टीमें भेजीं। इसके बाद विभिन्न राज्यों से अन्य संदिग्धों की पहचान की गई और कुल 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

इनमें अल-हकीम शुकूर, मोहम्मद हुजैफा, निंजा, हेमरॉक्सी, अबू मुहरिब, अबू बलुशी और सईदा बेगम जैसे नाम सामने आए हैं।

‘खवातीन’ महिला विंग: हैदराबाद की सईदा बेगम हेड

इस जाँच का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘खवातीन’ नाम की महिला विंग का खुलासा है। यह एक अलग यूनिट थी, जिसे खास तौर पर महिलाओं की भर्ती और नेटवर्क विस्तार के लिए तैयार किया गया था। हैदराबाद की सईदा बेगम को इस महिला विंग की प्रमुख बताई गई है।

जाँच में सामने आया है कि सईदा बेगम पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में सक्रिय लोगों के संपर्क में थी और जिहादी गतिविधियों के समन्वय की योजना बना रही थी। एजेंसियों का मानना है कि इस महिला विंग के जरिए नेटवर्क समाज के एक नए वर्ग तक पहुँच बनाने की कोशिश कर रहा था।

विंग में शामिल महिलाओं को प्रचार, कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और नए सदस्यों को जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई थी।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से कट्टरपंथ: 40+ अकाउंट से इस्लामिक राष्ट्र बनाने की तैयारी

जाँच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क ने सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया हुआ था। 40 से अधिक इंस्टाग्राम अकाउंट और कई एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए यह समूह सक्रिय रूप से कट्टरपंथी सामग्री फैला रहा था।

इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए ओसामा बिन लादेन, जाकिर नाइक, इसरार अहमद शेख और अनवर अल-अवलाकी जैसे व्यक्तियों के वीडियो शेयर किए जाते थे, ताकि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और उग्र विचारधारा की ओर आकर्षित किया जा सके।

सदस्य मास्क पहनकर ISIS के झंडे के साथ तस्वीरें पोस्ट करते थे और ‘वन उम्माह’ जैसे नारे लगाते थे, जिससे एक वैश्विक इस्लामिक राज्य यानी ‘खिलाफत’ की मंशा जाहिर होती थी। समूह ने आपत्तिजनक और भड़काऊ सामग्री भी शेयर की थी, जिसमें राष्ट्रगान का अपमान करते हुए गाली-गलौज के साथ गाने और राष्ट्रीय ध्वज को जलाने जैसे वीडियो शामिल थे।

विदेशी हैंडलर्स, ‘हिजरत’ और आतंक प्रशिक्षण का प्लान

जाँच एजेंसियों के मुताबिक इस नेटवर्क के सीधे संपर्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, बांग्लादेश और UAE में बैठे विदेशी हैंडलर्स से थे। इन हैंडलर्स के नाम अल-हकीम शुकूर, अबू बलुशी और अन्य उपनामों से सामने आए हैं। इन विदेशी संपर्कों के जरिए युवाओं को ‘हिजरत’ यानी भारत छोड़कर बाहर जाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।

वहाँ पहले मजहबी तालीम और फिर आतंकी प्रशिक्षण देने का वादा किया गया था। प्रशिक्षण में स्नाइपर राइफल का इस्तेमाल, हथियार चलाना और IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाना शामिल था। जाँच में ऐसे डिजिटल दस्तावेज और वीडियो बरामद हुए हैं, जिनमें ‘ब्लैक पाउडर’ और बम बनाने की विस्तृत जानकारी दी गई थी।

हैंडलर्स ने यह भी आश्वासन दिया था कि भारत में संभावित हमलों के लिए हथियार पाकिस्तान और अफगानिस्तान से उपलब्ध कराए जाएँगे। एजेंसियों को शक है कि इस नेटवर्क से जुड़े कुछ लोग पहले से ही विदेशों के मदरसों में कथित प्रशिक्षण ले रहे थे।

साइबर आतंकवाद, हैकिंग और तकनीकी साजिश, आतंकी साजिश का बड़ा मकसद: ‘खिलाफत’ की स्थापना

यह नेटवर्क केवल वैचारिक प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि साइबर आतंकवाद की दिशा में भी सक्रिय था। जाँच में सामने आया कि समूह के सदस्य सरकारी वेबसाइटों को हैक करने और साइबर हमले करने की योजना बना रहे थे। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ऐसे कंटेंट भी साझा किए गए, जिनमें साइबर अटैक को अंजाम देने के तरीके बताए गए थे।

इससे साफ होता है कि यह नेटवर्क तकनीकी रूप से भी सक्षम बनने की कोशिश कर रहा था और केवल भौतिक हमलों तक सीमित नहीं था। जाँच एजेंसियों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क का अंतिम उद्देश्य भारत में एक इस्लामिक राज्य या ‘खिलाफत’ स्थापित करना था।

‘वन उम्माह’ जैसे नारों और ISIS के प्रतीकों के इस्तेमाल से यह इरादा स्पष्ट होता है कि यह समूह एक वैश्विक कट्टरपंथी विचारधारा से प्रेरित था। एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जो विचारधारा, प्रशिक्षण और संसाधनों के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

फंडिंग, जाँच और आगे की कार्रवाई

सुरक्षा एजेंसियाँ अब इस नेटवर्क की फंडिंग के स्रोतों का पता लगाने में जुटी हैं। यह भी जाँच की जा रही है कि विदेशी हैंडलर्स से पैसे किस माध्यम से भारत में भेजे जा रहे थे और किन-किन लोगों तक यह फंडिंग पहुँची। इसके अलावा एजेंसियाँ उन युवाओं की पहचान करने की कोशिश कर रही हैं, जिन्हें इस नेटवर्क ने निशाना बनाया था या जो इसके संपर्क में आए थे।

संभावना है कि आने वाले समय में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं। फिलहाल जाँच एजेंसियाँ इस नेटवर्क की हर कड़ी को जोड़ने, इसके पूरे तंत्र को समझने और इसे पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए देशभर में व्यापक स्तर पर कार्रवाई कर रही हैं।

अहमदाबाद का नाम कर्णावती करने की माँग फिर हुई तेज: आशावल से कर्णदेव सोलंकी की कर्णावती फिर अहमद शाह पर नामकरण, जानें- इस शहर का पूरा इतिहास

गुजरात की आर्थिक राजधानी और सबसे बड़ा शहर अहमदाबाद का नाम बदलकर उसके पुराने नाम ‘कर्णावती’ रखने की माँग एक बार फिर तेज हो गई है। पहले भी कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है और अलग-अलग समय पर इसके लिए अभियान भी चलाए गए हैं। कई हिंदू संगठन लगातार इस माँग को उठाते रहे हैं कि शहर का नाम कर्णावती किया जाए। अब फिर से यह मुद्दा सामने आया है।

गुजरात विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से अहमदाबाद का नाम जल्द से जल्द कर्णावती करने की अपील की है। गुजरात इकाई के नेता अशोक रावल ने शनिवार (4 अप्रैल 2026) को एक वीडियो बयान जारी करके यह माँग रखी।

VHP के कर्णावती महानगर के फेसबुक पेज पर शेयर किए गए इस वीडियो में उन्होंने कहा कि “कर्णावती नाम हमारे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यह सिर्फ एक नाम नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों की पहचान और परंपरा का प्रतीक है। आज का अहमदाबाद शहर सदियों से कर्णावती के नाम से जाना जाता रहा है। हम भारत सरकार और गुजरात सरकार से निवेदन करते हैं कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए शहर का नाम तुरंत बदलकर ‘कर्णावती’ किया जाए।”

स्थानीय चुनावों की घोषणा होते ही यह बयान सामने आया है और इसके साथ ही हिंदू संगठनों की माँग भी तेज हो गई है। ऐसे में इस शहर के नाम का इतिहास जानना जरूरी हो जाता है। क्योंकि इस शहर को अलग-अलग समय में आशावल, कर्णावती और राजनगर के नाम से जाना जाता रहा है। इनमें इसका आखिरी नाम कर्णावती था, जबकि कई जैन ग्रंथों में इसे ‘राजनगर’ के नाम से भी बताया गया है।

लेकिन 14वीं शताब्दी के बाद धीरे-धीरे यह हिंदुओं का गौरवशाली शहर इस्लामी प्रभाव में आने लगा और आखिरकार कर्णावती का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद‘ हो गया। अब आइए इसके इतिहास पर एक नजर डालते हैं।

आशावल से कर्णावती नगरी तक

भारत के किसी भी इलाके या शहर का इतिहास आमतौर पर वैदिक काल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन वैदिक काल में उस जगह का कोई खास उल्लेख नहीं मिलता, जहाँ आज अहमदाबाद बसा हुआ है।

इसका मतलब यह है कि उस समय वहाँ किसी बड़े शहर या बस्ती के होने के प्रमाण नहीं मिलते। हालाँकि, उस पूरे क्षेत्र को ‘अनर्त क्षेत्र’ कहा जाता था, जिसमें कच्छ और उत्तर गुजरात के कई हिस्से शामिल थे।

साबरमती नदी का जिक्र भी पुराणों में बाद में मिलता है और वहाँ इसका नाम ‘श्वभ्रवती’ बताया गया है। यानि पुराणों के समय तक भी इस इलाके में किसी विकसित शहर या कस्बे के होने के ठोस सबूत नहीं मिलते।

आधुनिक समय से पहले इसी क्षेत्र में ‘आशावल’ नाम का एक नगर बसाया गया। आज का अहमदाबाद, जिसे एक बड़े औद्योगिक और सांस्कृतिक शहर के रूप में जाना जाता है, उसकी जड़ें उसी समय से जुड़ी हैं जब इसे ‘आशावल’ या ‘आशापल्ली’ कहा जाता था।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था, स्थानीय शासन और भौगोलिक स्थिति को भी दर्शाता था। साबरमती नदी के किनारे बसी यह जगह व्यापारिक रास्तों और पानी की उपलब्धता के कारण धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण बस्ती बन गई।

इतिहासकारों के मुताबिक, आशावल क्षेत्र में भील समुदाय का दबदबा था और यहाँ राजा आशा का शासन बताया जाता है। यह जानकारी सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई ऐतिहासिक स्रोतों और क्षेत्रीय इतिहास में भी इसका जिक्र मिलता है। कई किताबों में बताया गया है कि आशावल, साबरमती नदी के किनारे बसी एक शुरुआती बस्ती थी, जो आगे चलकर बड़े राजनीतिक बदलावों का आधार बनी।

11वीं शताब्दी में अल-बिरूनी ने अपने ग्रंथ ‘अल-हिंद’ में आशावल का उल्लेख किया है। उस समय यह पाटन (अन्हिलवाड़) से खंभात तक जाने वाले व्यापार मार्ग पर एक अहम केंद्र था।

यह इलाका उस दौर में भील राजाओं के अधीन था और गुजरात के शुरुआती शहरों में गिना जाता था। वहीं, 14वीं शताब्दी के जैन विद्वान आचार्य मेरुतुंगा ने अपनी रचना ‘प्रबंधचिंतामणि’ में आशावल को एक गाँव के रूप में बताया है, जो सोलंकी राजाओं के आने से पहले का है।

इस बस्ती का नाम ‘आशापल्ली’ से पड़ा, जो आशा भील के नाम पर रखा गया था। उस समय यह कोई बड़ा शहर नहीं था, लेकिन व्यापार और स्थानीय आदिवासी हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र जरूर था।

यह समझना जरूरी है कि आशावल को सिर्फ एक छोटी बस्ती मानना ठीक नहीं होगा। यह वह समय था जब गुजरात के इस हिस्से में स्थानीय लोगों ने अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को मजबूत किया।

नदी के किनारे होने के कारण यहाँ खेती, पशुपालन और छोटे स्तर का व्यापार अच्छे से विकसित हुआ, जिससे इस क्षेत्र में स्थिरता आई। यही स्थिरता आगे चलकर इसे आने वाले शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक केंद्र बनाने में मददगार बनी।

सत्ता परिवर्तन और कर्णदेव का आगमन

गुजरात के इतिहास में एक बड़ा बदलाव 11वीं शताब्दी के आखिरी दौर में आया, जब चालुक्य यानी सोलंकी वंश के राजा कर्णदेव सोलंकी ने इस क्षेत्र में कदम रखा। उस समय तक सोलंकी वंश गुजरात की राजनीति में एक मजबूत ताकत बन चुका था और उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ (पाटन) थी। कर्णदेव का शासन सिर्फ विस्तार तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने प्रशासन को मजबूत करने और संस्कृति को आगे बढ़ाने पर भी ध्यान दिया।

इतिहास के अनुसार, कर्णदेव ने आशावल क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और यहाँ एक नए और व्यवस्थित शहर की स्थापना की, जिसका नाम ‘कर्णावती’ रखा गया। यह सिर्फ नाम बदलने भर की बात नहीं थी, बल्कि एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत था। उस समय के सोलंकी काल के साहित्य से भी यह पता चलता है कि कर्णदेव ने अपने शासन में नए इलाकों को विकसित किया और उन्हें बेहतर तरीके से संगठित किया।

कर्णावती की स्थापना एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसमें उस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों में राजवंश अपने क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए नए शहर बसाते थे। इसमें सिर्फ किले या सरकारी इमारतें बनाना ही शामिल नहीं था, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया जाता था। कर्णावती भी ऐसा ही एक शहर था, जहाँ शासन, धर्म, व्यापार और संस्कृति सभी का एक साथ विकास हुआ।

सोलंकी युग का उदय और कर्णावती की भूमिका

सोलंकी काल को गुजरात के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है और कर्णावती इस दौर का एक अहम हिस्सा था। इस समय गुजरात में वास्तुकला अपने चरम पर थी। मंदिरों का निर्माण, बावड़ियों (सीढ़ीदार कुओं) का विकास और शहरों की बेहतर योजना, इन सबमें काफी प्रगति हुई। उस समय राज्य सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र बन चुका था।

चालुक्य काल के ग्रंथों से पता चलता है कि सोलंकी शासन के दौरान गुजरात में व्यापक सांस्कृतिक विकास हुआ। कर्णावती ऐसा स्थान था, जहाँ यह विकास साफ दिखाई देता है। ‘प्रबंधचिंतामणि’ में मेरुतुंगा ने लिखा है कि कर्णदेव ने आशावल में कर्ण सागर झील बनवाई और कर्णेश्वर देव (शिव मंदिर) का निर्माण कराया।

इसके अलावा जयंती माता मंदिर और अन्य संरचनाएँ भी बनवाई गईं। धीरे-धीरे कर्णावती गुजरात का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और पाटन (अन्हिलवाड़ पाटन) के बाद राजधानी के रूप में उभरकर सामने आया।

कर्णावती के विकास में सोलंकी शासकों ने मंदिरों, झीलों और व्यापार मार्गों को विकसित किया। उस समय यह शहर गुजरात की संस्कृति और अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र था। प्रसिद्ध इतिहासकार रत्नमणि राव भीमराव जोते, हरिप्रसाद शास्त्री और केशवराम काशीराम शास्त्री जैसे विद्वानों ने भी इन तथ्यों का समर्थन किया है।

आज कर्णावती के भौतिक प्रमाण पाटन या मोढेरा की तरह साफ तौर पर नहीं दिखते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसका महत्व कम था। इतिहास में कई ऐसे शहर रहे हैं, जिनका रूप समय के साथ बदल गया, लेकिन उनका जिक्र और उनकी पहचान इतिहास में बनी रही।

कर्णावती भी ऐसा ही एक शहर है, जो अपने समय में महत्वपूर्ण था और जिसने आगे आने वाले शहरों की नींव रखी। कर्णावती को लेकर इतिहासकारों के बीच एक दिलचस्प बहस भी है। कुछ इसे एक पूरी तरह विकसित शहर मानते हैं, तो कुछ इसे एक प्रशासनिक या क्षेत्रीय केंद्र के रूप में देखते हैं।

लेकिन इस मतभेद के बावजूद एक बात साफ है कि ‘कर्णावती’ नाम सोलंकी काल से जुड़ा हुआ है और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रहा है। स्थानीय परंपराओं और साहित्य में इस नाम का लगातार जिक्र मिलता है, जिससे यह समझ आता है कि यह सिर्फ शासक का दिया हुआ नाम नहीं था, बल्कि समाज में भी इसे स्वीकार किया गया था।

यह निरंतरता इस बात को मजबूत करती है कि कर्णावती कोई अस्थायी नाम नहीं था, बल्कि एक स्थायी ऐतिहासिक पहचान थी, जिसे समय के साथ दबा दिया गया, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।

आशावल एक ऐसी बस्ती थी जो स्थानीय लोगों, जनजातीय समाज और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित थी, जबकि कर्णावती एक संगठित, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित शहर के रूप में सामने आया।

यह बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं था, बल्कि इसने क्षेत्र की सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक रूप को भी बदल दिया। हालाँकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कर्णदेव का उद्देश्य पुराने नाम को पूरी तरह खत्म करना नहीं था, क्योंकि सोलंकी काल के साहित्य में आशावल और कर्णावती दोनों नाम साथ-साथ मिलते हैं।

आशावल और कर्णावती का इतिहास यह दिखाता है कि अहमदाबाद की पहचान 15वीं शताब्दी से शुरू नहीं होती, बल्कि उससे कई सदियों पहले से बन रही थी। कर्णावती उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का अहम चरण था, जब यह क्षेत्र अपने चरम पर था और आगे आने वाले समय की नींव रख रहा था।

यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं है, बल्कि इतिहास में बनी रहने वाली निरंतरता की है। नाम बदलते हैं, सत्ता बदलती है, लेकिन पहचान पूरी तरह खत्म नहीं होती। कर्णावती उसी निरंतरता का प्रतीक है, जो आज भी इतिहास के पन्नों में जीवित है और समय-समय पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रहती है।

कर्णावती से अहमदाबाद

14वीं और 15वीं शताब्दी का समय भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े राजनीतिक बदलावों का दौर था। दिल्ली सल्तनत के कमजोर पड़ने के बाद अलग-अलग क्षेत्रों में नई सल्तनतें उभरने लगीं, जिनमें गुजरात सल्तनत एक मजबूत शक्ति के रूप में सामने आई। इस बदलाव का असर सिर्फ शासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहरों की बनावट, प्रशासनिक ढाँचे और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ा।

15वीं शताब्दी की शुरुआत में मुजफ्फर वंश ने गुजरात में सत्ता संभाली। इस वंश के संस्थापक मुजफ्फर शाह प्रथम के बाद उनके पोते अहमद शाह प्रथम ने राजधानी को पाटन से कहीं और ले जाने का फैसला किया।

26 फरवरी 1411 को साबरमती नदी के किनारे मानेक बुर्ज पर अहमदाबाद की नींव रखने की बात कही जाती है। यह वही इलाका था, जिसे पहले कर्णावती या आशावल के नाम से जाना जाता था, लेकिन इतिहास में यह दर्ज है कि अहमद शाह ने यहीं अपना नया केंद्र बनाया।

इसी पृष्ठभूमि में अहमद शाह प्रथम का उदय हुआ, जिन्होंने 1411 ईस्वी में गुजरात सल्तनत की राजधानी को कर्णावती में स्थानांतरित किया। यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि सत्ता को मजबूत करने और एक नई पहचान बनाने की कोशिश भी थी।

‘अहमदाबाद स्थापना इतिहास 1411’ के अनुसार, अहमद शाह ने साबरमती नदी के किनारे एक नए शहर की नींव रखी, जिसे आगे चलकर ‘अहमदाबाद’ कहा गया। हालाँकि, इस कहानी में कुछ बातें अधूरी भी मानी जाती हैं, क्योंकि यह जगह पहले से ही ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थी।

यहाँ आशावल और कर्णावती जैसे पुराने केंद्र पहले से मौजूद थे। सरल शब्दों में कहें तो अहमद शाह ने पूरी तरह नया शहर नहीं बसाया, बल्कि पहले से विकसित इलाके को अपने नाम से जोड़ दिया। बाद में इस शहर में ऐसी इमारतें भी बनाई गईं, जो इस्लामी शासन की पहचान को दर्शाती हैं।

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि अहमदाबाद बिल्कुल नए स्थान पर बसाया गया था। असल में यह उसी जमीन पर विकसित हुआ, जहाँ पहले से आशावल और कर्णावती जैसी बस्तियाँ थीं। यानी अहमद शाह ने नया क्षेत्र नहीं बनाया, बल्कि पहले से बसे और विकसित इलाके को नई पहचान देने का काम किया।

इस प्रक्रिया में पुराने नाम और पहचान धीरे-धीरे पीछे छूटते गए और एक नई पहचान सामने आई। भारतीय इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है, जब नए शासकों ने अपनी सत्ता को मजबूत दिखाने के लिए शहरों के नाम बदले और वहाँ अपनी शैली की इमारतें बनवाईं। प्रयागराज का इलाहाबाद नाम भी इसी तरह पड़ा था।

‘मिरात-ए-अहमदी’ जैसे फारसी ग्रंथों में भी यह बताया गया है कि अहमदाबाद का निर्माण एक योजनाबद्ध शाही परियोजना के रूप में हुआ था, जिसमें किले, प्रशासनिक इमारतें और धार्मिक ढाँचे शामिल थे।

नामकरण की कहानियों का प्रसार

‘अहमदाबाद’ नाम के पीछे एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक मतलब भी बताया जाता है। समय-समय पर यह बात कही जाती रही है कि इस शहर का नाम सुल्तान अहमद शाह के नाम पर रखा गया।

वहीं कुछ कहानियों में यह भी कहा जाता है कि इस नाम का संबंध चार ‘अहमद’ नाम के सूफी फकीरों या व्यक्तियों से था। कई किताबों में इस विषय पर जानकारी मिलती है और बताया गया है कि शहर का नया नामकरण सत्ता और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के मेल का नतीजा था।

यह नामकरण सिर्फ एक औपचारिक बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक साफ राजनीतिक संदेश भी था कि अब यह शहर एक नई सत्ता के अधीन है और उसकी पहचान भी उसी के अनुसार बदली जाएगी।

इसी प्रक्रिया में ‘कर्णावती’ नाम को धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से सरकारी कामकाज और आम इस्तेमाल से हटाया गया, ताकि ‘अहमदाबाद’ नाम पूरी तरह स्थापित हो जाए। समय के साथ यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि लोगों की बोलचाल और साहित्य में भी गहराई से बस गया, और नाम बदलने के बाद भी यह लंबे समय तक बना रहा।

कर्णावती का इस्लामीकरण

इस्लामी शासक यह समझता था कि सिर्फ कर्णावती का नाम बदल देना ही काफी नहीं होगा। इसलिए उसने पूरे शहर के स्वरूप को बदलने पर जोर दिया। बड़े-बड़े इस्लामी स्मारक बनवाए गए, जिससे समय के साथ पुराने नाम और पहचान को पीछे छोड़ना आसान हो जाए और नई पहचान मजबूत बन सके।

अहमद शाह की धार्मिक सोच उसकी बनवाई गई इमारतों में साफ नजर आती है। कहा जाता है कि उसने पुराने मंदिरों को तोड़कर उनके पत्थरों का इस्तेमाल नई इमारतों में किया। भद्रकाली मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनने का जिक्र भी कई स्रोतों में मिलता है।

उस मस्जिद के स्तंभों पर आज भी कुछ पारंपरिक नक्काशी जैसे कमल, आकृतियाँ और अन्य डिजाइन दिखाई देते हैं, जिन्हें पुराने स्थापत्य से जोड़ा जाता है। भद्रा किले का नाम भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है।

फारसी ग्रंथ ‘मिरात-ए-अहमदी‘ जैसे स्रोतों में इन घटनाओं का उल्लेख मिलता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि अहमद शाह ने 1413-14 के आसपास आशा भील के वंशजों को हराकर पुराने क्षेत्र पर अपना नियंत्रण मजबूत किया।

यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उस समय की सत्ता और संस्कृति को स्थापित करने की एक प्रक्रिया भी था। पुराने ढाँचे में बदलाव करके एक नई पहचान बनाई गई। आज भी अहमदाबाद के पुराने हिस्सों में इस इतिहास के निशान देखे जाते हैं।

2017 में यूनेस्को द्वारा शहर को विश्व धरोहर का दर्जा भी दिया गया, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दिखाता है, हालाँकि इसके अलग-अलग पहलुओं पर आज भी चर्चा होती रहती है।

अहमद शाह के समय में शहर में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए। किले, मस्जिदें और अन्य इमारतें बनाई गईं, जिससे शहर एक प्रशासनिक के साथ-साथ धार्मिक केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ।

भद्रा किला, जामा मस्जिद और अन्य संरचनाएँ इसी दौर की पहचान हैं। इससे शहर का स्वरूप काफी बदल गया जहाँ पहले स्थानीय शैली की बस्तियाँ थीं, वहीं अब नई स्थापत्य शैली सामने आई, जो उस समय की सल्तनत के प्रभाव को दिखाती थी।

यह बदलाव सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके साथ एक नई प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्था भी आई। शहर का नया नाम, नई इमारतें और नई व्यवस्था इन सबने मिलकर एक नई पहचान बनाई, जिससे पुरानी पहचान धीरे-धीरे कम होती चली गई। अहमदाबाद के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।

गुजरात सल्तनत के बाद मुगल सम्राट अकबर ने 1573 में अहमदाबाद पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यह शहर मुगल साम्राज्य के गुजरात सूबे का एक अहम केंद्र बन गया। अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के समय में यहाँ व्यापार, कला और वास्तुकला का काफी विकास हुआ।

इसी दौर में अहमदाबाद को कपास और वस्त्र व्यापार का बड़ा केंद्र बनने की दिशा मिली, जिससे इसे आगे चलकर ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहा जाने लगा। इस दौरान बनी इमारतों में भी अलग-अलग स्थापत्य शैलियों का मेल देखने को मिलता है, जैसे जामा मस्जिद में कुछ पारंपरिक नक्काशी के तत्व आज भी दिखाई देते हैं।

अली मुहम्मद खान ने अपनी किताब ‘मिरात-ए-अहमदी’ में मुगल काल के अहमदाबाद को एक समृद्ध व्यापारिक शहर बताया है। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा, जिससे अहमदाबाद में भी अस्थिरता बढ़ी।

इसके बावजूद शहर का नाम अहमदाबाद ही बना रहा, क्योंकि बाद के शासकों ने उसी पहचान को जारी रखा। इस दौरान कर्णावती से जुड़े कुछ पुराने स्थल, जैसे कर्णसागर झील और कर्णेश्वर मंदिर, इतिहास के पन्नों में सीमित होकर रह गए।

क्या कर्णावती पूरी तरह खत्म हो चुका है?

अब सवाल यह उठता है कि क्या ‘कर्णावती’ नाम पूरी तरह खत्म हो गया था या किसी न किसी रूप में बना रहा था। इतिहास के अनुसार, सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर ‘अहमदाबाद’ नाम पूरी तरह स्थापित हो गया था, लेकिन स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक संदर्भों में ‘कर्णावती’ का नाम पूरी तरह गायब नहीं हुआ।

भारत के कई शहरों में ऐसा देखने को मिलता है, जहाँ आधिकारिक नाम बदल जाने के बाद भी पुराना नाम लोगों की यादों और परंपराओं में बना रहता है। कर्णावती का नाम भी इसी तरह इतिहास और संस्कृति में जीवित रहा, भले ही इसका सरकारी इस्तेमाल बंद हो गया।

समय के साथ अहमदाबाद एक बड़ा शहर बन गया, जिसने मुगल काल, मराठा काल और फिर ब्रिटिश शासन के दौरान भी अपनी पहचान बनाए रखी। इन सभी दौर में ‘अहमदाबाद’ नाम लगातार इस्तेमाल होता रहा, जिससे यह नाम स्थायी हो गया।

हालाँकि, ‘कर्णावती’ का ऐतिहासिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आज के समय में जब इतिहास, पहचान और सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा होती है, तो यह नाम फिर से सामने आता है।

कर्णावती नाम को वापस लाने की माँग भी कोई नई बात नहीं है। 1990 में भाजपा के नियंत्रण वाली अहमदाबाद नगर निगम ने इस संबंध में एक प्रस्ताव पास किया था। 2018 में उस समय के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने इस विषय पर कानूनी और अन्य पहलुओं की जाँच की बात कही थी।

2023 में ABVP और बजरंग दल ने इसके लिए अभियान चलाया और अप्रैल 2026 में विश्व हिंदू परिषद के अशोक रावल ने एक वीडियो बयान के जरिए AMC चुनाव से पहले भाजपा के घोषणापत्र में इस माँग को शामिल करने की अपील की।

इस माँग को कुछ लोग सभ्यतागत सुधार के रूप में देखते हैं, जैसे इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर किया गया। एक दृष्टिकोण के अनुसार, ‘अहमदाबाद’ नाम सुल्तान अहमद शाह के दौर की याद दिलाता है, जबकि ‘कर्णावती’ नाम सोलंकी राजा कर्णदेव से जुड़ी ऐतिहासिक पहचान को सामने लाता है। ‘प्रबंध चिंतामणि‘ और अन्य जैन-हिंदू ग्रंथों में भी इस विरासत का जिक्र मिलता है।

कुछ लोग यूनेस्को या अन्य पक्षों की चिंताओं से सहमत नहीं होते और मानते हैं कि इतिहास को सही रूप में सामने लाना जरूरी है। आज जब भारत आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर आगे बढ़ रहा है, तब अहमदाबाद का नाम कर्णावती करने की माँग को कुछ लोग गौरव से जोड़कर देखते हैं।

उनका मानना है कि नाम सिर्फ शब्द नहीं होता, बल्कि पहचान का प्रतीक होता है। आशावल और कर्णावती का इतिहास एक पुराने दौर की कहानी बताता है, जबकि अहमदाबाद एक अलग ऐतिहासिक चरण को दिखाता है।

यह विवाद सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह सवाल भी जुड़ा है कि किसी शहर की पहचान उसके मूल इतिहास से कितनी जुड़ी होनी चाहिए और उसे किस हद तक वापस लाया जा सकता है।

अहमद शाह के नाम पर बना अहमदाबाद आज एक आधुनिक शहर है, लेकिन इसके भीतर आशावल और कर्णावती की ऐतिहासिक परतें आज भी मौजूद हैं। ये परतें हमें यह समझाती हैं कि इतिहास कभी खत्म नहीं होता, बल्कि समय के साथ अपना रूप बदलता रहता है और जरूरत पड़ने पर फिर सामने आ जाता है।

संदर्भ :

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)






‘हिस्ट्री रिपीट इटसेल्फ’: डोनाल्ड ट्रंप के पोस्ट के जवाब में ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ की ईरान ने दिलाई याद, अमेरिकियों को 1980 में लौटना पड़ा था खाली हाथ

ईरान को तबाह करने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विवादित ट्वीट के बाद ईरान ने अमेरिकी की दुखती रग दबा दी है। भारत में मौजूद ईरानी दूतावास ने एक वीडियो शेयर किया है, जो 1980 में अमेरिका के असफल ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ की याद दिलाता है।

दरअसल दुनिया भर के देशों में मौजूद ईरानी दूतावास ने एक्स पर यह वीडियो शेयर कर अमेरिका का मजाक उड़ाया है। हालाँकि ईरान और अमेरिका में 45 दिनों के लिए सीजफायर को लेकर बातचीत चलने की बात सामने आई है। इसके बावजूद एक्स पर एक-दूसरे के खिलाफ माहौल बनाने में दोनों देश लगे हुए हैं।

ईरान ने ऑपरेशन ईगल क्लॉ की दिलाई याद

1980 में ऑपरेशन ईगल क्लॉ में अमेरिका अपने नागरिकों को ईरान से छुड़वाने के लिए ऑपरेशन चलाया था। यह एक गुप्त ऑपरेशन था, जिसमें खराब मौसम और तकनीकी खराबी की वजह से विफल रहा। इस दौरान हेलीकॉप्टर और परिवहन विमान की टक्कर में 8 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी।

भारत स्थित ईरानी दूतावास ने एक्स पर वीडियो पोस्ट किया है। इसमें 24 अप्रैल 1980 को ईरान के तबास रेगिस्तान में हुए अमेरिकी ऑपरेशन के मलबे और तबाही का मंजर दिख रहा है। इसमें लिखा गया है ‘History repeats itself'(इतिहास खुद को दोहराता है। ) ऑपरेशन ईगल क्लॉ ईरान की धरती पर एक यूएस सैनिकों की ऐतिहासिक हार।

वहीं थाइलैंड की ईरानी दूतावास ने एक्स पर लिखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जिस तरह से बच्चों की तरह गालियाँ देते हैं, उससे ऐसा लगता है कि अमेरिका उम्मीद से पहले ही पाषाण युग में पहुँच गया है।

अमेरिका राष्ट्रपति ने क्या कहा था

राष्ट्र्पति ट्रंप ने ईरान को पूरी तरह तबाह करने की धमकी दी है। उनका कहना है कि अगर ईरान मंगलवार (6 अप्रैल 2026) तक होर्मुज नहीं खोला तो पावर प्लांट और पुलों पर हमला किया जाएगा। उन्होने सोशल मीडिया ट्रूथ पर गालियाँ देते हुए अपनी बातें कहीं हैं। उन्होंने कहा है कि मंगलवार को ईरान में पावर प्लांट डे और ब्रिज डे, दोनों एक साथ मनाए जाएँगे। उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट खोल दो, वरना तुम नरक में पहुँच जाओगे – बस देखते रहो!

क्या था ऑपरेशन ईगल क्लॉ

ये ऑपरेशन अमेरिका के लिए काले अध्याय से कम नहीं है, क्योंकि अमेरिकी सेना वहाँ अपने बंधकों को छुड़ाने गई थी और खुद ही फँस गई।

4 नवंबर 1979 को करीब 3000 चरमपंथी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया था और 63 अमेरिकियों को बंधक बना लिया। इतना ही नहीं अमेरिकी दूतावास के 3 स्टाफ को भी पकड़ लिया गया था। यह घटना ईरान में हटाए गए शासक मोहम्मद रजा शाह पहलवी को अमेरिका द्वारा पनाह देने के फैसले के दो हफ्ते के अंदर हुई थी। अमेरिका ने शाह पहलवी को इलाज के लिए आने की अनुमति दी थी।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने यूनाइटेड स्टेट्स से शाह को वापस करने और ईरान में पश्चिमी असर खत्म करने के लिए अभियान चलाया था। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक वार्ता के दौरान 13 बंधकों को मुक्त कर दिया गया। बाकी 53 बंधक अभी भी ईरान के पास थे। अप्रैल 1980 तक पाँच महीने तक नाकाम बातचीत के बाद अमेरिका गुप्त ऑपरेशन करने में योजना बनाया।

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 16 अप्रैल 1980 को एक मिलिट्री रेस्क्यू ऑपरेशन को मंजूरी दी। इस प्लान में अमेरिकी आर्म्ड सर्विसेज की चारों ब्रांच को शामिल किया गया। दो दिन के ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर और C-130 एयरक्राफ्ट को तेहरान से लगभग 200 मील दक्षिण-पूर्व में एक सॉल्ट फ्लैट (कोड-नेम डेज़र्ट वन) पर ले जाया गया। योजना बनाई गई कि वहाँ से हेलीकॉप्टर C-130 से फ्यूल भरेंगे और अमेरिकी सैनिकों को उस पहाड़ी पर ले जाएँगे, जहाँ से रेस्क्यू मिशन शुरू किया जाएगा। 19 अप्रैल 1980 को पूरे ओमान और अरब सागर में सेना तैनात कर दी गई।

24 अप्रैल 1980 को ऑपरेशन ईगल क्लॉ शुरू हुआ। 8 यूनाइटेड स्टेट्स नेवी RH-53D सी स्टैलियन हेलीकॉप्टर अरब सागर में अमेरिकन एयरक्राफ्ट कैरियर, USS निमित्ज़ के उड़े। वहीं 6 C-130 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ओमान के मसिराह द्वीप से उड़ान भरी।

एयरक्राफ्ट का सामना ईरान के रेगिस्तान में उठा भयंकर रेतीला तूफान ‘हबूब’ से हुआ। इससे विजिबिलिटी काफी कम हो गई। एयरक्राफ्ट को काफी नुकसान हुआ और क्रू के लोग बीमार पड़ गए।

ऑपरेशन शुरू होने से पहले ही विजिबिलिटी कम होने के बीच एक RH-53D हेलीकॉप्टर C-130 एयरक्राफ्ट से टकरा गया, जिसमें रीफ्यूलिंग के लिए एक्स्ट्रा फ्यूल था। ससे आग लग गई और 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए, जबकि कई घायल हुए।

ऑपरेशन को लेकर आ रही दिक्कतों की जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति कॉर्टर को दी गई और उन्होंने मिशन को बंद करने का फैसला लिया। इस तरह से अमेरिकी सेना खाली हाथ वापस लौटी। अमेरिकी लोगों को करीब 270 दिनों तक बंधक बना कर रखा गया था।

ईरान इसलिए अमेरिका को 1980 की याद दिला रहा है और ऑपरेशन ईगल क्लॉ के वीडियो शेयर कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी का जवाब ईरान इस रूप में दे रहा है। वहीं ईरानी उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने राष्ट्रपति ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका अपने लोगों को बुनियादी सुविधाएँ नहीं दे पा रहा और ईरान से लड़ रहा है।

मौका कोई भी हो, उँगली भारत की तरफ ही उठती है: आरफा छोड़ दो ये ‘स्ट्रैटेजी’, हमारी सेना तुम्हारे प्रोपेगेंडा का हथियार नहीं

मौका कोई भी हो लेकिन एंगल एक ही होना चाहिए- भारत पर उंगली उठाओ। यही पैटर्न बार-बार दिखता है और इस बार भी वही हुआ। इस्लामी पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने ईरान-अमेरिका-इजरायल के अंतरराष्ट्रीय टकराव के बीच अचानक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र छेड़ दिया… जैसे हर वैश्विक घटना का निष्कर्ष भारत की आलोचना ही होना चाहिए।

सोचिए, हजारों किलोमीटर दूर चल रहे संघर्ष में अमेरिका के एयरक्राफ्ट गिरने की खबर है, दुनिया उस पर चर्चा कर रही है और यहाँ से आवाज आती है, “लेकिन तुम्हें ये कभी नहीं पता चलेगा कि ऑपरेशन सिंदूर के वक्त क्या हुआ था।” सवाल यह है कि ये तुलना है या जबरदस्ती खींचा गया नैरेटिव? क्या यह तथ्य है या सिर्फ संदेह का बीज बोने की कोशिश? आरफा टाइम्स नाऊ की एक रिपोर्ट को कोट कर रही थीं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं कि सवाल पूछा गया है, लोकतंत्र में सवाल जरूरी हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे देश की पत्रकारिता और जनता को एक झटके में खारिज कर दिया गया, “भारतीय पत्रकार या आम लोग कभी सवाल नहीं कर सकते थे।” लेफ्ट-लिबरल की चहेती आरफा बीबी का ये बयान सिर्फ एक सरकार पर नहीं बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र पर आरोप है, उसका अपमान है।

आपको एक बार को ट्वीट पढ़कर लग सकता है कि आखिर अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच में ऑपरेशन सिंदूर की बात कैसे आ गई, ये तो हजारों किलोमीटर दूर युद्ध से जुड़ी खबर थी। लेकिन हैरान होने की जरूरत नहीं।

अगर आप पत्रकारिता के नाम पर आरफा के किए पुराने कुकर्म को देखेंगे तो तो पता चलेगा कि ये महिला भारत घृणा से लंबे समय से ग्रसित है। इसने आज क्या…उस समय भी अपना रोना रोया था जब पाकिस्तान की फौज और आतंक के गठजोड़ को हमारे सैनिक जवाब दे रहे थे।

एक साल पहले जब पहलगाम हमले का बदला लेने के लिए भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया था उस समय भी आरफा का ऐसा ही रोना छूटा था। उस समय आरफा ने ट्वीट किया था कि शांति ही राष्ट्रवाद है, युद्ध केवल विध्वंस है। आरफा उस समय पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ हो रही कार्रवाई को रोकने के लिए जो कर सकती थीं उन्होंने किया।

उन्होंने एक बार भी ये नहीं बताया कि कैसे भारतीय सेना के साहस ने सैंकड़ों आतंकियों को ढेर किया, पाकिस्तान के ईरादों को पस्त किया, वहाँ के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक बंकर में छिपने को मजबूर हो गए, दहशतगर्दों के चेहरे पर दहशत देखने को मिली, वो एयरबेस खंडहर हो गए जहाँ से भारतीयों को निशाना बनाया जा रहा था।

इसके उलट आरफा उस समय पाकिस्तान-भारत युद्ध पर रिपोर्टिंग करते हुए पड़ोसी मुल्क के आर्मी चीफ को आसिम मुनीर ‘साहब’ कहकर रिपोर्टिंग कर रही थीं। अब दोबारा जब सेना के शौर्य को याद करने का दिन नजदीक आ रहा है तो आरफा ने दोबारा ये ओछापन दिखाया है। क्यों? सिर्फ इसलिए ताकि उन्हें फॉलो करने वाले लोग दोबारा से इसी काम में जुट जाएँ और आर्मी पर, ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठने लगे।

आरफा की इन्हीं हरकतों को परिणाम था कि एक बार उन्हें विदेशी क्रिकेटर दानिश कनेरिया ने लताड़ा था। कनेरिया ने उन्हें यहाँ तक कहा था कि अगर वो भारत में खुश नहीं हैं तो पाकिस्तान आ जाएँ। इस पर जब आरफा ने कम्युनल कहने लगीं और विवाद बढ़ा तो कनेरिया ने उन्हें ये सवाल करके चुप करा दिया था- कि क्या उन्होंने कभी भारत या उसकी संस्कृति की तारीफ की है, एक बार भी?

‘Shroud of Turin’ पर भारत के कनेक्शन का दावा: DNA से छिड़ी नई बहस, आस्था बनाम विज्ञान में उलझी सच्चाई; जानें- फिर से क्यों छिड़ा विवाद

ट्यूरिन का कफन (Shroud of Turin) एक बार फिर दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बन गया है, जब एक नए वैज्ञानिक दावे ने ऑनलाइन व्यापक बहस छेड़ दी। यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब NDTV के एक ट्वीट के बाद यह मुद्दा वायरल हो गया और इसके बाद आई रिपोर्ट्स में एक बड़े वैज्ञानिक विकास को उजागर किया गया।

शोधकर्ताओं ने इस प्रसिद्ध लिनन कपड़े पर भारत से जुड़े DNA के निशान पाए हैं, जिसे कई लोग यीशु मसीह का कफन मानते हैं। उन्नत जेनेटिक परीक्षण की मदद से वैज्ञानिकों ने कपड़े के रेशों के भीतर गहराई में मौजूद मानव और पौधों दोनों के डीएनए को भारत से जुड़ा हुआ पाया है।

यह अध्ययन 31 मार्च को bioRxiv पर प्री-पीयर-रिव्यू पेपर के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसमें यह संकेत दिया गया है कि यह कफन भारत में बुना गया हो सकता है या मध्यकालीन यूरोप में सामने आने से कई सदियों पहले तक यह भारत में रहा हो।

इस दावे ने इतिहास के सबसे चर्चित रहस्यों में से एक को फिर से जीवित कर दिया है, जहाँ आस्था, जेनेटिक्स और वैश्विक व्यापार का इतिहास एक साथ आकर चर्चा का विषय बन गए हैं।

श्राउड ऑफ ट्यूरिन क्या है?

श्राउड ऑफ ट्यूरिन एक लंबा प्राचीन लिनन कपड़ा है, जिस पर एक आदमी की हल्की, लगभग भूत जैसी छवि दिखाई देती है, जिसे सूली पर चढ़ाया गया प्रतीत होता है। सदियों से कई ईसाई इस कपड़े को यीशु मसीह का कफन मानते रहे हैं।

यह कपड़ा पहली बार 14वीं सदी में यूरोप में सामने आया था और तब से इटली के ट्यूरिन शहर के कैथेड्रल ऑफ सेंट जॉन द बैपटिस्ट में सुरक्षित रखा गया है। समय के साथ यह दुनिया के सबसे अधिक अध्ययन किए गए और विवादित धार्मिक अवशेषों में से एक बन गया है। इसे पहली बार 1354 में फ्रांस में पाया गया था और 16वीं सदी से यह लगभग आधी सहस्राब्दी से ट्यूरिन के इसी कैथेड्रल में रखा हुआ है।

इस कफन की सबसे खास बात उस पर बनी छवि है। इसमें एक व्यक्ति के शरीर का आगे और पीछे का हिस्सा दिखाई देता है, जिस पर ऐसे निशान हैं जो बाइबिल में वर्णित सूली पर चढ़ाने की घटनाओं से मिलते-जुलते लगते हैं। इनमें हाथ, पैर और बगल में घाव के निशान शामिल हैं, साथ ही ऐसे चिन्ह भी हैं जो कोड़े मारने जैसे प्रतीत होते हैं।

दागों के पीछे का विज्ञान: लेटेस्ट स्टडी हमें क्या बताती है

मौजूदा समय में इस कफन को लेकर बढ़ी दिलचस्पी एक ऐसे अध्ययन की वजह से है, जिसमें वैज्ञानिकों ने नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) तकनीक का इस्तेमाल कर कफन से मिले बेहद छोटे धूल कणों और रेशों की जाँच की।

मानव और पौधों के अवशेषों से माइटोकॉन्ड्रियल DNA निकालकर, जियानी बार्कासिया के नेतृत्व वाली टीम ने कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने रखे। परिणामों में भारतीय उपमहाद्वीप से स्पष्ट जेनेटिक संबंध मिले।

खास तौर पर, वैज्ञानिकों को ऐसे मानव DNA वंश मिले जो आमतौर पर दक्षिण एशिया में पाए जाते हैं और पौधों का DNA भी मिला, जैसे लोबिया (काउपी), जो भारत में पाया जाता है।

अध्ययन के अनुसार, शोधकर्ताओं ने 1978 में किए गए एक वैज्ञानिक परीक्षण के दौरान इकट्ठा किए गए बेहद छोटे जैविक नमूनों का विश्लेषण किया। आधुनिक जीनोमिक सीक्वेंसिंग की मदद से उन्होंने इंसान, पौधे, जानवर और यहाँ तक कि कीड़ों से जुड़े DNA के अंशों की पहचान की। इससे यह संकेत मिलता है कि सदियों के दौरान इस कपड़े को कई लोगों ने छुआ और यह अलग-अलग तरह के वातावरण के संपर्क में आया।

सबसे खास बात यह रही कि पाए गए मानव माइटोकॉन्ड्रियल DNA का लगभग 38% से 40% हिस्सा भारत से जुड़े वंशों से संबंधित पाया गया। बाकी DNA मुख्य रूप से मध्य-पूर्व (जैसे आज के इजरायल और सीरिया) की आबादी से जुड़ा था, जबकि बहुत कम हिस्सा पश्चिमी यूरोप से संबंधित था।

इन निष्कर्षों से दो संभावनाएँ सामने आती हैं या तो इस कपड़े को दक्षिण एशिया के लोगों ने बड़े पैमाने पर छुआ, या फिर यह लिनन धागा भारत में तैयार किया गया था, जो ऐतिहासिक रूप से हाई क्वालिटी वाले वस्त्र निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा है।

यह कपड़ा यीशु से क्यों जुड़ा है?

कहानी के अनुसार, सूली पर चढ़ाए जाने के बाद अरिमथिया के यूसुफ ने यीशु के शरीर को एक साफ लिनन कपड़े में लपेटकर उसे कब्र में रखा था। श्राउड ऑफ ट्यूरिन बाइबिल में बताए गए बेहतरीन लिनन कपड़े के विवरण से मेल खाता है।

इसमें एक मध्यम आयु के व्यक्ति का पूरा शरीर दिखाई देता है, जिसमें मूंछ, दाढ़ी और लंबे बाल हैं। कपड़े का एक हिस्सा शरीर के आगे का भाग दिखाता है और दूसरा हिस्सा पीछे का, जैसे एक लंबा कपड़ा सिर के ऊपर से मोड़कर पैरों के नीचे तक लपेटा गया हो।

यह कफन 1898 में दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया, जब एक इतालवी वकील और फोटोग्राफर सेकोणदो पिया (Secondo Pia) ने इसकी पहली आधिकारिक तस्वीरें लीं। जब उन्होंने नेगेटिव फिल्म को डेवलप किया, तो यह देखकर हैरान रह गए कि कपड़े पर बनी छवि असल में पॉजिटिव इमेज थी, यानी यह कपड़ा खुद एक फोटोग्राफिक नेगेटिव की तरह काम कर रहा था।

इन तस्वीरों में उस व्यक्ति के चेहरे के भाव, घाव, सूजन और खून के निशान नंगी आंखों से देखने की तुलना में कहीं ज्यादा साफ दिखाई दिए। श्रद्धालु और शोधकर्ता उन लाल धब्बों की ओर इशारा करते हैं जो खून और घाव जैसे लगते हैं, खासकर कलाई, पैरों और शरीर के किनारे पर।

इसके अलावा, सिर पर कांटों के ताज जैसे निशान और कंधों पर चोट के चिन्ह भी दिखते हैं, जिन्हें कई लोग भारी क्रॉस उठाने की वजह से हुआ मानते हैं।

कई ईसाइयों के लिए धार्मिक महत्व

कई ईसाइयों के लिए श्राउड ऑफ ट्यूरिन सिर्फ एक वस्तु नहीं है, बल्कि उनकी आस्था की सबसे महत्वपूर्ण घटना का खामोश गवाह माना जाता है। बाइबिल के मार्क, मैथ्यू और ल्यूक के सुसमाचारों में भी उल्लेख मिलता है कि यीशु को साफ लिनन में लपेटा गया था। लगभग 4.36 मीटर लंबा और 1.1 मीटर चौड़ा यह कपड़ा कुछ लोगों के अनुसार वही कफन हो सकता है।

समय के साथ यह कपड़ा कई घटनाओं से गुजरा, जिनमें 16वीं सदी के मध्य में फ्रांस में लगी आग भी शामिल है। उस आग के कारण कपड़े पर काले धब्बे और हीरे के आकार के जले हुए निशान पड़ गए थे, जिन्हें कुछ लोग चमत्कारिक रूप से बच जाना मानते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि भारत से इसका संबंध उन लोगों के लिए नया नहीं है, जो इसे ऐतिहासिक या वैकल्पिक इतिहास के नजरिए से देखते हैं। होल्गर केर्स्टन ने अपनी विवादित किताब यीशु भारत में रहते थे। इस में दावा किया था कि इस कपड़े की बुनाई पूर्वी मूल की ओर इशारा करती है। इस कपड़े के रेशे 3:1 के अनुपात में बुने गए हैं, जिससे फिशबोन पैटर्न बनता है।

इस तरह की जटिल बुनाई उस समय यहूदिया में बहुत दुर्लभ थी, लेकिन रोमन प्रांत सीरिया में पाई जाती थी और खासतौर पर भारत से आने वाले हाई क्वालिटी वाले वस्त्र व्यापार से जुड़ी हुई थी।

पहली सदी में ही भारत कपास और बेहतरीन कपड़ों का बड़ा केंद्र था। रोमन इतिहासकार प्लिनी द एल्डर ने भी लिखा था कि भारतीय कपड़ों के लिए रोम से बड़ी मात्रा में सोना बाहर जाता था।

ऐसे में यह संभव माना जा सकता है कि येरुशलम में इस्तेमाल किया गया कोई हाई क्वालिटी वाला कफन भारत से आया हो, हालाँकि यह अब भी वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हुआ है कि यही वास्तव में यीशु का कफन है।

शक और इसे पुराने समय की नकली चीज बताने का दावा

कफन के प्रति गहरी आस्था के बावजूद इसके बारे में काफी संदेह भी मौजूद है। कई वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए यह 2000 साल पुराना चमत्कार नहीं, बल्कि मध्यकाल का एक बेहद चतुर निर्माण हो सकता है।

इसकी प्रामाणिकता को सबसे बड़ा झटका 1988 में लगा, जब तीन अलग-अलग प्रयोगशालाओं ने कार्बन-14 डेटिंग की। उनके अनुसार, जिस फ्लैक्स से यह लिनन बना है, वह 1260 से 1390 ईस्वी के बीच उगा था। यह समय वही है, जब यह कफन पहली बार 1354 में फ्रांस में ऐतिहासिक रिकॉर्ड में सामने आया था।

हाल के अध्ययनों ने कलाकार द्वारा बनाए गए सिद्धांत को और मजबूत किया है। 2025 में ब्राजील के विशेषज्ञ सिसरो मोरेस के 3D डिजिटल विश्लेषण से पता चलता है कि यह छवि किसी मानव शरीर से बनी हुई नहीं लगती। जब उन्होंने एक 3D मानव मॉडल पर कपड़ा वर्चुअली डाला, तो जो छवि बनी वह टेढ़ी-मेढ़ी और विकृत थी, जिसे ‘अगामेमनॉन मास्क प्रभाव’ कहा जाता है।

लेकिन जब उन्होंने कपड़े को एक उथली मूर्ति (हल्की नक्काशी) पर डाला, तो बनी हुई छवि लगभग कफन की छवि से पूरी तरह मेल खाती थी। इससे यह संकेत मिलता है कि कफन को किसी कलाकार ने लकड़ी या पत्थर के उथले सांचे का इस्तेमाल कर बनाया हो सकता है, जिसमें हल्की गर्मी या रंग का उपयोग कर यह धुंधली छवि तैयार की गई हो।

धोखाधड़ी का जल्दी पता चलना

यह विचार कि यह कफन नकली हो सकता है, सिर्फ आधुनिक नास्तिक सोच नहीं है, 14वीं सदी में भी यह एक आम मान्यता थी। हाल के शोध में 14वीं सदी के प्रसिद्ध विद्वान और बिशपनिकोल ओरेस्मे की लिखाइयों का अध्ययन किया गया, जिसमें उन्होंने 1370 के दशक में ही इस कफन को चर्च द्वारा लोगों को भ्रमित करने का एक साफ उदाहरण बताया था।

ओरेस्मे ने चेतावनी दी थी कि कई पादरी लोगों से चढ़ावा लेने के लिए उन्हें धोखा देते हैं। उन्होंने फ्रांस के लिरे में रखे इस कफन का जिक्र करते हुए इसे एक गढ़ा हुआ चमत्कार बताया था।

उस समय चर्च भी इसे लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। 1389 में ट्रॉयस के बिशप पियरे डी’आर्किस ने पोप को पत्र लिखकर दावा किया था कि यह कफन एक पेंटिंग के जरिए बनाया गया नकली है और इसे बनाने वाले कलाकार का पता भी लगा लिया गया है। बाद में पोप ने इसे दिखाने की अनुमति तो दी, लेकिन इस शर्त के साथ कि इसे असली अवशेष नहीं, बल्कि कफन का प्रतीक या चित्र कहा जाएगा।

इतिहास की एक बड़ी विडंबना यह है कि जिसे मध्यकालीन विचारकों ने साफ तौर पर नकली बताया था, वही वस्तु आज के समय में सबसे प्रसिद्ध पवित्र अवशेषों में से एक बन गई है।

यीशु को स्थानीयकृत करने का प्रयास

आलोचकों का कहना है कि इन वैज्ञानिक निष्कर्षों को एक खास तरह की कहानी गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत से जुड़े डीएनए के निशान मिलने के बाद कुछ लोग इसे यीशु को स्थानीय बनाने की कोशिश के रूप में देखते हैं, यानी उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप से गहराई से जुड़ा हुआ दिखाना।

यह सिर्फ इतिहास का मामला नहीं है, आलोचकों के अनुसार यह एक तरह की धर्म-प्रचार रणनीति भी हो सकती है। अगर यीशु को एक स्थानीय व्यक्तित्व या भारत से जुड़ा हुआ बताया जाए, तो धर्म कम विदेशी लगता है और इससे इस क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

यहीं से सूचना के युद्ध की बात सामने आती है। सोशल मीडिया के दौर में ऐसी कहानियाँ बहुत तेजी से फैलती हैं। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए पर आधारित एक वैज्ञानिक अध्ययन को सरल बनाकर यीशु का कफन भारत में बना था जैसी हेडलाइन में बदल दिया जाता है, जिसे फिर हजारों बार शेयर किया जाता है।

X और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर ये दावे अपनी अलग ही दिशा में फैलने लगते हैं। कई बार समर्थन करने वाले लोग भी बिना पूरी वैज्ञानिक जानकारी समझे इन्हें आगे बढ़ा देते हैं।

भारत से कनेक्शन उन लोगों के लिए एक मजबूत माध्यम बन जाता है, जो पश्चिमी ईसाई धर्म और भारतीय संस्कृति के बीच दूरी कम करना चाहते हैं। लेकिन वहीं, यह उन लोगों के लिए विवाद का कारण भी बनता है, जो मानते हैं कि आधुनिक समय में फायदे के लिए धार्मिक इतिहास को धीरे-धीरे बदला जा रहा है।

क्रिटिकल थिंकिंग की जरूरत

आखिरकार श्राउड ऑफ ट्यूरिन इतिहास का एक ऐसा रहस्य बना हुआ है, जिसे हर कोई अपने नजरिए से समझ सकता है। यह याद रखना जरूरी है कि दुनिया भर के बड़े विद्वानों और शोधकर्ताओं के बीच अलग-अलग मत मौजूद हैं, और अब तक कोई भी एक अध्ययन इस बहस को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया है।

हाल ही में भारत कनेक्शन को लेकर जो चर्चा वायरल हुई है, वह यह भी दिखाती है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ विज्ञान और आस्था का इस्तेमाल अक्सर सांस्कृतिक और धार्मिक कहानियों को मजबूत करने के लिए किया जाता है। कपड़े पर दक्षिण एशियाई डीएनए मिलना एक दिलचस्प वैज्ञानिक तथ्य जरूर है, लेकिन इसका मतलब क्या निकाला जाए, इस पर अब भी बहस जारी है।

जैसे-जैसे ऐसी कहानियाँ हमारी सोशल मीडिया फीड पर सामने आती रहती हैं, वैसे-वैसे सावधानी और गहराई से सोचने की जरूरत भी बढ़ जाती है। हमें इस रहस्य का आनंद लेना चाहिए, लेकिन बिना पूरी सच्चाई और जटिल इतिहास, विज्ञान और इसके पीछे के उद्देश्यों को समझे किसी भी वायरल दावे को आंख बंद करके साझा करने से बचना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

हिमंता की पत्नी पर 3 पासपोर्ट का आरोप लगाने का दाँव पड़ेगा पवन खेड़ा पर भारी, 48 घंटों में होगा केस: रिनिकी बोलीं- ये तस्वीरें AI और फोटोशॉप से बनी

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी पर तीन देशों के पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया है। इसे एआई का कमाल बताते हुए हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयाँ सरमा ने जमकर लताड़ लगाई है। वहीं सीएम हिमंता ने कोर्ट में जाने की धमकी दी है।

AI और फोटोशॉप का कमाल- रिनिकी

सोशल मीडिया एक्स पर रिनिकी भुइयाँ सरमा ने कहा, “आपकी सिर्फ तपस्या में ही नहीं, AI जेनरेशन और फोटोशॉपिंग में भी कमी रह गई।”

उन्होंने आगे कहा कि मुझे उम्मीद थी कि एक नेशनल पार्टी का स्पोक्सपर्सन बेसिक ड्यू डिलिजेंस करेगा, न कि मनगढ़ंत पासपोर्ट और डॉक्यूमेंट्स की खराब इमेज सर्कुलेट करेगा। अब मैं कानून को अपना काम करने दूँगी। क्रिमिनल चार्ज लगाए जा रहे हैं। हम इसे कोर्ट में ले जाएँगे।

कथित पासपोर्ट की गड़बड़ियों को सीएम सरमा ने बतलाया

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने एक्स पर पवन खेड़ा द्वारा किए गए दावों पर सवाल उठाते हुए सिलसिलेवार तरीके से कई गड़बड़ियों का जिक्र किया है।

उन्होंने लिखा है कि कॉन्ग्रेस का प्रोपेगैंडा का भंडाफोड़ हो गया है। जो डॉक्यूमेंट्स शेयर हो रहे हैं, उनमें कई गड़बड़ियाँ साफ दिख रही हैं। ये डिजिटल मैनिपुलेशन की एक घटिया कोशिश है।

उन्होंने कहा कि सबसे पहले सरनेम में गड़बड़ी है। ऑफिशियल ‘SHARMA’ की जगह ‘SARMA’ इस्तेमाल किया गया है।

फोटोग्राफ में गड़बड़ी है। यह एक पब्लिक इमेज लगती है, स्टैंडर्ड बायोमेट्रिक कैप्चर नहीं लग रहा है।

पवन खेड़ा ने एक पासपोर्ट UAE का बताया था। उसकी आईडी में गड़बड़ियाँ हैं। ID सीक्वेंस जन्म के साल के पैटर्न से अलग है। इसके अलावा नेशनैलिटी में गड़बड़ी है। इजिप्ट के तौर पर लिस्टेड है, जबकि MRZ एक अलग कंट्री कोड दिखाता है।

पवन खेडा ने दूसरा पासपोर्ट एंटीगुआ और बारबुडा का बताया था। इस पर सीएम हिमंता का कहना है कि प्रिंटेड फील्ड और MRZ के बीच एक्सपायरी डेट में गड़बड़ी है।

तीसरा पासपोर्ट इजिप्ट का बताया गया था। इसमें भी कई गड़बड़ियाँ हैं। प्रिंटेड फील्ड और MRZ के बीच पासपोर्ट नंबर में गड़बड़ी है। इसके अलावा स्पेलिंग में गलतियाँ हैं जैसे ‘इजिप्टियन’ लिखा गया है और गलत अरबी रेफरेंस दिया गया है।

इसके अलावा टाइटल डीड QR कोड इनवैलिड लगता है और किसी भी ऑथेंटिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता है। इन गड़बड़ियों को बताते हुए सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि ये मनगढ़ंत या डिजिटल मैनिपुलेशन हो सकता है।आखिरकार पवन खेड़ा जेल जाएँगे। सच की जीत होगी। गलत जानकारी फैलाने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

सीएम ने कहा कि वह और उनकी पत्नी अगले 48 घंटों में पवन खेड़ा के खिलाफ क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह के मानहानि के केस करेंगे। उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई है।

न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए असम सीएम ने कहा कि जब अदालत में सच्चाई सामने आ जाएगी, तो पवन खेड़ा को अपने कामों का नतीजा भुगतना होगा।

असम के लोग ऐसे प्रोपेगैंडा से गुमराह नहीं होंगे। हम लोगों से 100 से ज्यादा सीटों का निर्णायक जनादेश हासिल करने को लेकर पूरी तरह फोकस हैं।

क्या कहा था पवन खेड़ा ने

कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने असम सीएम सरमा की पत्नी पर आरोप लगाया था कि उनके पास तीन लिविंग पासपोर्ट हैं। एक ही वक्त में तीनों एक्टिव है। गोल्डन कार्ड यूएई का है जो 2027 तक एक्टिव है। दूसरा पासपोर्ट एंटीगुआ बारबोडा का है, जो 2031 को खत्म होगा। तीसरा इजिप्ट का है। उन्होंने कहा कि कोई और राजनेता नहीं होगा, जिसके पास तीन-तीन देशों के पासपोर्ट हों। क्या आप क्रिमिनल हैं, जो आपको तीन-तीन पासपोर्ट की जरूरत पड़ रही है।

उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सीएम सरमा की पत्नी भारत की नागरिक नहीं हैं और वह अवैध हैं। अगर वह भारत की नागरिक हैं, तो वह गैरकानूनी है क्योंकि अगर यह पासपोर्ट सही नहीं है, तो गृहमंत्री अमित शाह को बताया चाहिए और जाँच बिठानी चाहिए। कॉन्ग्रेस नेता ने यहाँ तक आरोप लगाया कि सरमा परिवार चुनाव हारने के बाद देश छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि ये तीनों पासपोर्ट सही है या इसे फर्जी तरीके से बना कर जनता को बरगलाने का प्रयास है। सीएम हिमंता एक के बाद एक ट्वीट कर साफ कर चुके हैं कि सरमा दंपति कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं। क्या ये कॉन्ग्रेस की चुनाव से पहले की घबराहट है, जो एआई और फोटोशॉप का इस्तेमाल कर जनता को कुछ दिनों के लिए बरगला कर येन केन प्रकारेण चुनाव में जीत हासिल करने की कोशिश में है या कॉन्ग्रेस इतनी हताश हो गई है कि हिमंता सरमा के खिलाफ साजिश रच रही है।