दुनिया को एक वैश्विक महामारी में झोंकने वाला चीन कोरोना वायरस को मुद्दा बनाकर अब व्यापार को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। चीन ने समुद्री उत्पादों को निर्यात करने वाली 6 भारतीय कंपनियों पर रोक लगा दी है। चीन का कहना है कि इन कंपनियों की पैकिंग में कोरोना वायरस के निशान पाए गए हैं, जिसके कारण इनके फ्रोजेन उत्पादों के आयात को एक सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया गया है।
कोरोना वायरस के नाम पर चीन पिछले साल की शुरुआत से दुनिया भर से आयातित फ्रोजन खाद्य उत्पादों की जाँच कर रहा है। समय-समय पर पैकेज में कोरोना वायरस के निशान पाए जाने की बात कहकर वह कंपनियों से आयात को निलंबित भी करता रहा है।
चीन के सीमा शुल्क प्रशासन ने कहा है कि इन 6 कंपनियों के समुद्री उत्पादों के पैकेज पर विषाणु के निशान पाए गए, इसीलिए इनका आयात गुरुवार (जून 10, 2021) से एक सप्ताह के लिए निलंबित होगा।
वहीं, चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग ने गुरुवार को ही स्थानीय स्तर पर कोविड-19 के 6 मामले सामने आने की बात कही। ये मामले उसके दक्षिण गुआंगडोंग प्रांत में सामने आए जबकि बुधवार को 15 मामले विदेशों से आने की जानकारी दी गई। गौरतलब है कि सितंबर 2019 में पहली बार कोरोना के मामले चीन के वुहान शहर में सामने आए थे।
दूसरी तरफ, कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है। कुछ वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि इस खतरनाक वायरस के वुहान प्रयोगशाला से ही लीक होने की संभावना बरकरार है। वहीं, कई वैज्ञानिकों ने कहा है कि कोरोना वायरस वायरस को चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (डब्ल्यूआईवी) लैब में बनाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, चीन इससे इंकार करता रहा है।
विदेशी प्रतिबंधों से मुकाबले के लिए चीन ने बनाया नया कानून
वहीं, चीनी संसद ने गुरुवार को विदेशी प्रतिबंध निरोधी कानून पारित कर दिया है। इस कानून के जरिए चीनी अधिकारियों और कंपनियों को विदेशी प्रतिबंधों से कानूनी और सरकारी संरक्षण मिल सकेगा।
नए कानून के प्रविधान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है। हालाँकि, इस कानून को अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा मानवाधिकार, शिनजियांग और हांगकांग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के मामलों में चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध के संदर्भ में देखा जा रहा है।
नया कानून व्यापक है और चीन पर प्रतिबंध से मुकाबला करने का बड़ा हथियार माना जा रहा है। स्थानीय विशेषज्ञों के अनुसार, यह विदेशी प्रतिबंध पर चीन के उपायों को कानूनी वैधता प्रदान करेगा। नए कानून को पास करने वाले सभी 14 उपाध्यक्षों को अमेरिका ने हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पारित करने के संबंध में प्रतिबंधित कर रखा है।
मालूम हो कि हाल ही में अमेरिका ने चीन के आर्थिक प्रभाव और व्यापारिक चालबाजियों का मुकाबला करने के लिए सौ अरब डालर (सात लाख 29 हजार करोड़ रुपए) की योजना का एक विधेयक पारित किया था।
तमिलनाडु के सलेम जिले में एक शादी का कार्ड मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसके मुताबिक पी ममता बनर्जी नाम की दुल्हन 13 जून 2021 को एएम सोशलिज्म (AM Sociallism) नाम के दूल्हे से शादी करेंगी। दूल्हे और दुल्हन के नाम ने सोशल मीडिया पर नेटिज़न्स को हैरान कर रखा है। लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि ये शादी का निमंत्रण असली है या एडिटेड।
हालाँकि, दूल्हा और दुल्हन दोनों परिवार के सदस्यों ने ये कन्फर्म किया है कि शादी का निमंत्रण असली ही है और एएम सोशलिज्म, लेनिन मोहन उर्फ ए मोहन के बेटा हैं, जो सलेम में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सचिव हैं।
कार्ड में दूल्हे के बड़े भाइयों के नाम भी हैं। इसमें से एक एएम कम्युनिज्म (AM Communism) और दूसरा एएम लेनिनिज्म (AM Lelinism) है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, परिवार में इस तरह के नामकरण की असाधारण परंपरा को लेकर ए मोहन ने कहा, “सोवियत संघ के विघटन के बाद, लोगों को लगा कि कम्युनिज्म का दौर समाप्त हो गया है और अब यह विचारधारा दुनिया में दोबारा समृद्ध नहीं होगी। दूरदर्शन पर भी इससे जुड़ी एक क्लिप थी। उसी दौरान मेरी पत्नी ने मेरे बड़े बेटे को जन्म दिया। मैंने तुरंत उसे ‘कम्युनिज्म’ का नाम देने का फैसला किया। क्योंकि मेरा मानना था कि जब तक मानव है, तब तक ‘कम्युनिज्म’ का अंत नहीं होगा।”
मोहन ने कहा कि कट्टूर गाँव में ज्यादातर लोग कम्युनिज्म की विचारधारा को मानते हैं। उन्होंने कहा कि उनके गाँव में रूस, मॉस्को, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया, वियतनाम, वेनमनी आदि क्षेत्रों के नाम पर लोग सामान्य रूप से मिल जाएँगे।
लड़की पैदा हुई तो ‘क्यूबिज्म’ रखेंगे नाम
दूल्हे एएम सोशलिज्म के पिता ने कहा, “लोग अपने बच्चों का नाम नेता, देश या विचारधारा के नाम पर ही रखते हैं। मैं अपने बच्चों का नाम भी विचारधाराओं के नाम पर ही रखना चाहता था। मेरे तीनों बेटों का नाम एक समान है। दुल्हन भी हमारी रिश्तेदार है। उनके दादा एक कॉन्ग्रेसी हैं, जो ममता बनर्जी से बहुत ही अधिक प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने अपनी पोती का नाम ममता बनर्जी के नाम पर रखा। हम सभी चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हमारी विचारधारा को आगे बढ़ाएँ। मैंने अपने पोते का नाम मार्कसिज्म रखा है। भविष्य में, अगर हमारे परिवार में एक लड़की का जन्म होता है , मैं उसका नाम क्यूबिज़्म रखूँगा।”
रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना के चलते परिवार बहुत ज्यादा लोगों को शादी में आमंत्रित नहीं कर सकता है। इसीलिए शादी के कार्ड को सोमवार (7 जून 2021) को सीपीआई के तमिल मुखपत्र ‘जन शक्ति’ में प्रकाशित किया गया।
सीपीआई नेता मोहन ने कहा कि दूल्हा-दुल्हन के नाम को लेकर उत्सुक लोगों के 300 से ज्यादा फोन आ चुके हैं।
उन्होंने कहा कि उनके बेटे इस बात से बहुत खुश हैं, क्योंकि हर कोई इस तरह का नाम रखने को लेकर उनकी तारीफ कर रहा है। हालाँकि जब वे छोटे थे और सरकारी स्कूल में पढ़ते थे तो इस नाम के कारण उन्हें काफी अपमान झेलना पड़ा था। लोग उनके नामों का गलत अर्थ निकालते थे और यह तब तक उन्हें झेलना पड़ा, जब तक कि उन्होंने स्कूली शिक्षा खत्म नहीं कर ली। हालाँकि, कॉलेज में पहुँचने के बाद हालात सामान्य हो गए। मोहन ने कहा कि उनके बड़े बेटे ने चेन्नई कॉलेज से लॉ की पढ़ाई की है, जबकि दो अन्य ने बी कॉम किया है।
सेन्ट्रल रिजर्स पुलिस बल (CRPF) कमांडेंट और कीर्ति चक्र अवॉर्ड से सम्मानित चेतन चीता अस्पताल में ज़िंदगी और मौत की ज़ंग लड़ रहे हैं। उनकी पत्नी ने बताया है कि उनकी स्थिति गंभीर है। पिछले 9 दिनों से उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। एक दिन पहले वेंटिलेटर हटाया गया है। हरियाणा के झज्जर AIIMS में भर्ती चेतन चीता अब कोरोना नेगेटिव हो चुके हैं, लेकिन फिर भी उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है।
जब 9 दिनों के बाद वेंटीलेटर निकाला गया था तो लोगों ने राहत की साँस ली थी क्योंकि उन्हें लगा था कि 45 वर्षीय CRPF अधिकारी की हालत अब स्थिर है, लेकिन गुरुवार (जून 10, 2021) की सुबह फिर से वेंटिलेटर लगाना पड़ा। डॉक्टरों ने बताया था कि उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है और उनके अंग काम कर रहे हैं। उनका ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल भी गिर कर 94 पर आ गया है। उन्हें अन्य बीमारियाँ नहीं हैं।
उनके परिवार ने बताया कि उनका हाथ ही एकमात्र समस्या बना हुआ है, जिसमें आतंकियों से एनकाउंटर के दौरान गोलियाँ लगी थीं। फरवरी 14, 2017 को जम्मू कश्मीर के बांडीपोरा स्थित हाजिन क्षेत्र में एक मुठभेड़ में उन्हें 9 गोलियाँ लगी थीं। चेतन चीता की पत्नी ने ‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए कहा, “मुझे पता है कि वो एक फाइटर हैं। हम इस लड़ाई में हथियार नहीं डाल सकते। ईश्वर ऐसा अन्याय कैसे कर सकता है!”
आँखों में आँसू लेकर चेतन चीता की पत्नी ने कहा कि उनके पति को राष्ट्र की प्रार्थनाओं की ज़रूरत है। उनका बेटा भी कोरोना पॉजिटिव है। चेतन मई 9, 2021 से ही अस्पताल में भर्ती हैं। परिवार उन्हें एम्स दिल्ली या किसी प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट करना चाहता है। CRPF भी इलाज में पूरी मदद कर रहा है और एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलारिया से भी विचार-विमर्श किया गया है। डॉक्टर गुलेरिया ने अधिकारियों और परिवार को आश्वासन दिया कि वो सुरक्षित हाथों में हैं।
उनका मानना है कि अभी चेतन चीता को शिफ्ट करने से उनके इलाज पर असर पड़ सकता है। CRPF के इंस्पेक्टर जनरल राजेश कुमार ने कहा कि उनकी मॉनिटरिंग के लिए CRPF के एक डॉक्टर और एक अधिकारी को भी लगाया गया है। उन्होंने बताया कि चेतन को सर्वश्रेष्ठ मेडिकल केयर दिया जा रहा है। एम्स के ‘नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (NCI)’ की अध्यक्ष डॉक्टर सुषमा भटनागर ने बताया था कि चेतन चीता होश में हैं, बातचीत कर रहे हैं और सेमी-सॉलिड भोजन मुँह से ले रहे हैं।
चेतन चीता के दिमाग, दाईं आँख, पेट, दोनों बाँह, पीठ की तरफ कमर के नीचे और हाथ में गोली लगी थी। इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और लगभग एक साल बाद CRPF के दिल्ली मुख्यालय में बतौर कमांडेंट ड्यूटी शुरू की। अपनी यूनिफॉर्म के बारे में वो कहते हैं कि ये उनकी दूसरी स्किन है। एक सर्च ऑपरेशन के दौरान CRPF की 45वीं बटालियन पर आतंकियों ने गोली चलाई थी।
चेतन ने युवाओं से अपील की थी कि वो देश के लिए अपना शत-प्रतिशत दें। चेतन ने कहा था कि उन्होंने भी यही किया। बकौल चेतन चीता, उनके पास बच कर निकलने का मौका था, लेकिन उन्होंने गोलियों का सामना करना उचित समझा। उन्होंने कहा था कि कुछ समय में जम्मू कश्मीर में स्थिति सुधर जाएगी और इसके लिए सैनिक प्रयास कर ही रहे हैं, राजनीतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है। उनकी फिजियोथेरेपी भी चल रही थी।
पंजाब की कलह अभी सुलझी भी नहीं है कि राजस्थान में कॉन्ग्रेस की कलह एक बार फिर से सतह पर आ गई है। अब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी पार्टी में अपने प्रतद्वंद्वी और पूर्व-उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के खेमे के विधायकों को तोड़ने में लगे गए हैं। वहीं राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी ने पायलट से बात कर के समस्या के समाधान का भरोसा दिलाया। पायलट के घर पहुँचे 6 विधायकों को उन्होंने इंतजार करने की सलाह दी है।
गुरुवार (जून 10, 2021) को सुबह से ही सचिन पायलट के आवास पर नेताओं की हलचल शुरू थी। पूर्व मंत्री और डींग के विधायक विश्वेन्द्र सिंह उसने मिलने पहुँचे, जिसके बाद 5 अन्य विधायक भी उनके आवास पर बैठक के लिए पहुँचे। मुकेश भाकड़, रामनिवास गावड़िया और वेद सोलंकी जैसे विधायकों ने सुलह कमिटी के मुद्दों पर अब तक काम न होने का आरोप लगाया। बताया जा रहा है कि विवाद के निपटारे के लिए गाँधी परिवार भी मुख्यमंत्री के संपर्क में है।
कहा जा रहा है कि गहलोत गुट ने पायलट खेमे के विधायकों को तोड़ने का काम शुरू कर दिया है, जिसमें दो विधायक पूर्वी राजस्थान के हैं। ‘दैनिक भास्कर’ के अनुसार, एक विधायक ने अपनी माइंस के कारण गहलोत खेमे से समझौता किया, वहीं दूसरे के खिलाफ चल रही कार्रवाई के कारण परिवार परेशान हो गया था। वहीं विश्वेन्द्र सिंह द्वारा जैसे ही गहलोत खेमे से समझौते की खबर आई, उनके घर में भी कलह शुरू हो गई।
उनके बेटे ने कहा कि उन्होंने आज एक नया शब्द सीखा है – विश्वासघात। बेटे अनिरुद्ध ने कहा कि वो मर जाएँगे पर साथ नहीं छोड़ेंगे, लेकिन कुछ लोगों की आदत होती है दल बदलने की। उन्होंने इंसान के ‘वैल्यू सिस्टम’ की बात करते हुए कहा कि उन्हें ये संस्कार अपनी माँ से मिले हैं और अब उनकी अलग पहचान है। वहीं विधायक पद से इस्तीफा दे चुके हेमाराम चौधरी भी स्पीकर सीपी जोशी से आज मिलेंगे।
‘दैनिक भास्कर’ में पायलट खेमे के हलचल की खबर (साभार)
20 दिन पहले इस्तीफा दे चुके हेमाराम का इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं हुआ है और उन्हें लॉकडाउन के बाद जयपुर आकर अपनी बात रखने को कहा गया था। पंजाब की सुलह कमिटी में अजय माकन और किसी वेणुगोपाल शामिल हैं। गहलोत खेमे के मंत्री प्रतापसिंघ खाचरियावास का कहना है कि मुख्यमंत्री वरिष्ठ नेता हैं और कब क्या फैसला लेना है, वो समझते हैं। उन्होंने कहा कि गाँधी परिवार के नाम पर कॉन्ग्रेस एक है, बीएस कुछ राजनीतिक मतभेद हैं।
विधायक वेद प्रकाश सोलंकी ने राज्य में अटकी राजनीतिक नियुक्तियों और मंत्रिमंडल विस्तार में अपने खेमे को प्राथमिकता दिए जाने की माँग करते हुए कहा कि अगर पंजाब में 10 दिन सिद्धू की बात सुनी जा सकती है तो राजस्थान में क्यों नहीं? मुकेश भाकर ने पार्टी के लिए योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं को सम्मान की बात की। गावड़िया ने पायलट के साथ मजबूती से खड़े होने की बात करते हुए कहा कि वो कॉन्ग्रेस में रह कर ही अपनी आवाज़ उठाते रहेंगे।
आज शुक्रवार को दौसा से लगातार 4 बार सांसद रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट की पुण्यतिथि भी मनाई जा रही है। कभी राज्य के सबसे बड़े गुर्जर नेता माने जाने वाले राजेश पायलट की पुण्यतिथि को उनके बेटे सचिन पायलट का खेमा शक्ति-प्रदर्शन के मौके के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है। सचिन पायलट जिला प्रमुख, प्रधान, स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों और जिला स्तर के कॉन्ग्रेस नेताओं से संपर्क में हैं।
वहीं भाजपा विधायक गुरदीप शाहपीणी ने भी 11 सिविल लाइंस स्थित बंगले पर जाकर सचिन पायलट से मुलाकात की। हनुमानगढ़ के संगरिया से भाजपा विधायक गुरदीप सिंह शाहपीनी किसान नेता माने जाते हैं और संगरिया विधानसभा में भारी संख्या में किसान वोट बैंक हैं। उन्होंने इसे व्यक्तिगत मुलाकात करार दिया। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जितेंद्र सिंह ने सचिन पायलट से पार्टी द्वारा किए गए वादों को पूरी करने की माँग उठाई थी, लेकिन फिर बाद में कहा कि उन्हें उन वादों की जानकारी नहीं है।
विश्वेन्द्र सिंह ने बेटे के लगातार हमले के बाद पायलट से मुलाकात कर कहा कि कॉन्ग्रेस को बचाने के लिए वो सेतु का काम कर रहे हैं। अब अजय माकन कह रहे हैं कि सभी अटके मुद्दों को सुलझाया जाएगा और मंत्रिमंडल विस्तार भी होगा। पायलट ने आधा दर्जन विधायकों के साथ दौसा पहुँच कर पिता को श्रद्धांजलि भी दी। प्रियंका गाँधी ने देर रात उन्हें फोन किया था। कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि उन्हें दिल्ली बुलाया जा सकता है।
केरल में 11 साल पहले गायब हुई लड़की अब जाकर मिली है। वो कहीं और नहीं, बल्कि अपने घर से मात्र आधे किलोमीटर की ही दूरी पर रहमान नाम के एक व्यक्ति के साथ रह रही थी। पिछले एक दशक में इसका अंदाज़ा पड़ोसियों से लेकर घर-परिवार तक को नहीं लगा। ये घटना पलक्कड़ जिले के अयालूर कस्बे की है। सजीथा फरवरी 2010 में ही गायब हो गई थी, लेकिन मिसिंग कंप्लेंट दायर किए जाने के बावजूद पुलिस उसे नहीं खोज पाई थी।
रहमान के पास इतने रुपए नहीं थे कि वो रेंट पर घर ले पाता, इसीलिए उसने कुछ ऐसा तिकड़म आजमाया कि लड़की को घर में भी रख लिया और परिवार तक में भी किसी को भनक तक न लगी। घर में रहमान और उसकी प्रेमिका के अलावा उसके पिता, माँ, बहन और भतीजा भी था। जब भी उस छोटे से कमरे के कोई नजदीक भी आता रहा, रहमान गुस्सा हो जाता था और अजीबोगरीब व्यवहार करता था, ताकि लोग ऐसा समझें जैसे वो अवसाद में है। धीरे-धीरे परिवार ने रहमान और उस कमरे को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया।
रहमान काफी बार काम पर भी नहीं जाता था, अपना भोजन कमरे में ही करता था और अंदर ही बैठा रहता था। सजीथा भी सिर्फ रात को निकल कर स्नान वगैरह करती थी, जब बाकी लोग सो रहे होते थे। रात को ही वो बाहर निकल कर बैठती भी थी। लुकाछिपी का ये खेल एक दशक से भी अधिक समय से चल रहा था। कम आय के कारण मजबूर होकर भी रहमान और उसकी प्रेमिका उस छोटे से कमरे से बाहर नहीं निकलते थे।
जब रहमान को काम पर जाना होता था तो वो वो लंच बनवाता था और उसे उसी कमरे में सजीथा के लिए रख कर चला जाता था। घर में बाकी लोग भी काम पर जाते थे, इसीलिए सजीथा भी निश्चिंत रहती थी। लेकिन, मार्च 2021 में रहमान ही गायब हो गया और उसके परिवार ने मिसिंग कंप्लेंट दायर की। जून 7, 2021 को रहमान के भाई ने उसे एक पुलिस चेकपॉइंट पर देखा, जिसे कोविड-19 के कारण बनाया गया था।
Sajitha left home in February 2010, walked into Rahman’s house and was not found all these years.https://t.co/lCkBBTU1mV
तब रहमान ने उसे बताया कि वो एक किराए के घर में सजीथा के साथ रहता है। इसके बाद जब परिवार और पुलिस ने पूछताछ की तो दोनों ने अपनी कारस्तानियों के बारे में खुलासा किया। सजीथा ने पुलिस को बताया कि वो कैसे खिड़की से उस कमरे से बाहर निकलती थी। साथ ही पिछले 11 वर्षों में घर में क्या-क्या हुआ, कौन-कौन आया और क्या-क्या बातें हुईं, उसने ये सब कुछ हूबहू बता दिया। घर में हुए कार्यक्रमों तक की गतिविधियाँ उसे पता थीं।
हालाँकि, दंपति को कोर्ट में पेश किए जाने के आबाद सजीथा को रहमान के साथ जाने दिया गया। 34 वर्षीय रहमान और 28 वर्षीय सजीथा की कहानी सुन कर इलाके के लोग भी स्तब्ध हैं। छोटे से कमरे में अंदर और बाहर, दोनों तरफ से ताला मारा जाता था। नेमारा थाने की पुलिस ने बताया कि रहमान करात्पराम्बु में रहने वाले मोहम्मद गनी का बेटा है, जबकि सजीथा के पिता वेलायुधन आस-पड़ोस में ही रहते हैं।
मॉनसून की पहली बारिश ने मुंबई को पानी-पानी कर दिया है। इसका असर यह हो रहा है कि जगह-जगह मकानों के गिरने की खबरें सामने आने लगी हैं। मुबंई के पश्चिमी उपनगर दहिसर में स्थित एक चॉल में गुरुवार (10 जून 2021) की शाम तीन मकान गिरने से 26 वर्षीय प्रद्युम्न सरोज नाम के व्यक्ति की मौत हो गई।
नगर अधिकारियों ने बताया कि घटना दहिसर पूर्व के शिवाजी नगर इलाके के लोखंडी चॉल में शाम करीब 6.36 बजे हुई। बीएमसी के अधिकारियों ने बताया कि मामले की जानकारी मिलते ही दमकल विभाग समेत दूसरी एजेंसियों के कर्मी मौके पर पहुँचे और राहत व बचाव कार्य शुरू कर दिया।
दमकल विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, घर गिरने से घायल व्यक्ति को रेस्क्यू करके कांदिवली के शताब्दी अस्पताल ले जाया गया लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
मुंबई में बीते 24 घंटे में मकान गिरने की दूसरी घटना
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार (9 जून 2021) को ही भारी बारिश के कारण पश्चिमी मलाड इलाके में एक चार मंजिला इमारत गिर गई थी, जिसमें दबकर 11 लोगों को मौत हो गई थी। मरने वालों में 8 बच्चे शामिल थे।
वहीं हादसे में घायल हुए 7 अन्य लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 18 से अधिक लोगों को रेस्क्यू कर लिया गया था। बीते 24 घंटों में मुबंई में मानसूनी बारिश के कारण घर गिरने की दूसरी घटना है।
मौसम विभाग ने जारी किया था ऑरेंज अलर्ट
मॉनसून के कारण मुंबई में भारी बारिश हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम विभाग ने बुधवार से अगले चार दिन के लिए मुंबई, पालघर और थाने जिले के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया था।
एनडीआरएफ के महानिदेशक सत्य प्रधान ने गुरुवार (10 जून 2021) को कहा कि भारी बारिश के पूर्वानुमान के बीच राज्य सरकार के अनुरोध पर महाराष्ट्र में एनडीआरएफ की 15 टीमों को भेजा गया है। इसमें से 2 मुंबई, एक कुर्ला, 4 रत्नागिरि, 2 सिन्धुदुर्ग, 2 पालघर, 2 रायगढ़ और 2 टीमों को थाने जिले में लगाया गया है।
तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली से 12 किमी की दूरी पर स्थित है श्रीरंगम, जहाँ स्थित है एक विशाल मंदिर परिसर, जो लगभग 150 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। श्रीरंगम के इस विशाल मंदिर परिसर में विराजमान हैं भगवान विष्णु, जिन्हें श्रीरंगनाथस्वामी के रूप में पूजा जाता है। कावेरी और उसकी सहायक नदी कोल्लिदम के द्वारा बनाए गए द्वीप पर बसा श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर विश्व का सबसे विशाल संचालित मंदिर क्षेत्र है और हिन्दू ग्रंथों एवं पुराणों में ऐसी मान्यता है कि यह क्षेत्र सृष्टि के आरंभ से ही अस्तित्व में है।
दिव्यदेशों में प्रथम और भगवान विष्णु के स्वयं व्यक्त क्षेत्रों में एक है श्रीरंगम
श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर 108 दिव्य देशम कहे जाने वाले क्षेत्रों में प्रथम माना जाता है। श्रीरंगम भगवान विष्णु के 8 स्वयं व्यक्त क्षेत्रों में से एक है। श्रीरंगम के अलावा सात अन्य स्वयं व्यक्त क्षेत्र हैं, श्रीमुष्णम, वेंकटाद्रि, शालिग्राम, नैमिषारण्य, पुष्कर, तोताद्रि और बद्री। इसके अलावा यह क्षेत्र कावेरी नदी के किनारे बसे पंच रंग क्षेत्रों में से भी एक है।
ब्रह्मा जी और कावेरी की तपस्या
गंगा, यमुना, कावेरी और सरस्वती के मध्य इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि उनमें से कौन श्रेष्ठ है? यमुना और सरस्वती तो बहस से हट गईं लेकिन गंगा और कावेरी में निर्णय नहीं हो पाया। दोनों ने भगवान विष्णु से इसका जवाब माँगा। गंगा ने कह दिया कि वह भगवान के चरणों से निकली है इसलिए श्रेष्ठ है। भगवान विष्णु ने भी गंगा की हाँ में हाँ मिलाई तब कावेरी ने गंगा से श्रेष्ठ बनने के लिए भगवान विष्णु की तपस्या की। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर कावेरी को वरदान दिया कि वो एक ऐसी जगह स्थापित होंगे, जहाँ कावेरी उनके गले के हार की तरह बहेगी।
ब्रह्मा जी ने भी सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु के वास्तविक स्वरूप ‘महा विष्णु’ के दर्शन करने के लिए तपस्या की। इसके बाद भगवान विष्णु क्षीरसागर से रंगविमान में प्रकट हुए। यह विमान भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के द्वारा गतिमान हुआ। आदिशेष ने भगवान के ऊपर छाया कर रखी थी और उनके साथ उनकी विश्वक सेना भी थी। नारद जैसे महान ऋषि उनकी स्तुति कर रहे थे और सभी देवी-देवता उनकी जयकार कर रहे थे। भगवान विष्णु के आदेशानुसार ब्रह्मा जी ने विराज नदी के किनारे उनके इस रूप की स्थापना की और दैनिक पूजा करने लगे।
ब्रह्मा जी के बाद सूर्यदेव, फिर मनु और अयोध्या के राजा इक्ष्वाकु ने भगवान विष्णु के महारूप की पूजा की। बाद में जब भगवान राम लंका विजय के पश्चात अयोध्या आए तो उन्होंने रावण के भाई विभीषण को रंगनाथस्वामी को लंका में ले जाकर स्थापित करने की अनुमति दी। जब विभीषण उन्हें लेकर कावेरी नदी के किनारे पहुँचे तो वहाँ उनकी दैनिक पूजा के लिए नीचे रखा लेकिन पूजा के पश्चात जब वापस उठाना चाहा तो असफल रहे। इस पर विभीषण दुखी हो गए और भगवान से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने उन्हें कावेरी के वरदान की कथा बताई। इसके बाद से ही मान्यताएँ हैं कि विभीषण रोज श्रीरंगनाथस्वामी की पूजा करने आज भी आते हैं। कई मान्यताएँ है कि विभीषण प्रत्येक 12 वर्ष में श्रीरंगम आते हैं।
आधुनिक मंदिर का निर्माण
सबसे पहले चोल साम्राज्य के शासकों ने रंगनाथस्वामी मंदिर का निर्माण कराया था। हालाँकि मंदिर का निर्माण लगातार चलता रहा और चोल साम्राज्य के अंतिम शासकों ने भी इसके कई हिस्सों का जीर्णोद्धार कराया। चोल शासकों के अलावा पांड्य शासकों ने भी मंदिर के निर्माण में अपना योगदान दिया। मंदिर में चोल, पांड्य, होयसाला और विजयनगर राजवंशों के शिलालेख मिलते हैं।
हालाँकि 14वीं शताब्दी के दौरान मंदिर इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर भी आया। दिल्ली सल्तनत की क्रूर सेना मोहम्मद बिन तुगलक के नेतृत्व में मंदिर पर हमला करने आई लेकिन तब तक हिंदुओं ने मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा को मंदिर से दूर हटा दिया। हिन्दू इन प्रतिमाओं को लेकर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के कई गाँवों में भटकते रहे। 1371 में अंततः विजयनगर साम्राज्य के शासन में पुनः मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की प्रतिमाएँ मंदिर में स्थापित की गईं।
रंगनाथस्वामी मंदिर चारों ओर से 7 परत में दीवारों से घिरा हुआ है। इन दीवारों की कुल लंबाई लगभग 10 किमी है। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा 50 अन्य मंदिर हैं। इस परिसर में 17 विशाल गोपुरम सहित कुल 21 गोपुरम हैं। परिसर में कुल 39 मंडप और 9 पवित्र सरोवर हैं। मंदिर का मुख्य मंडप अयिरम काल मंडपम है, जो 1000 स्तंभों वाला एक विशाल हॉल है।
श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर का पूरा खाका (फोटो साभार : Tirthayatra.org)
भगवान रंगनाथस्वामी (फोटो साभार : Tirthayatra.org)
मंदिर के गर्भगृह में आदिशेष पर विराजमान भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है। इन्हें ही रंगनाथस्वामी या रंगनाथर कहा जाता है। इसके अलावा गर्भगृह में देवी लक्ष्मी की मूर्ति भी स्थापित है, जिन्हें रंगनायकी थायर कहा जाता है।
कैसे पहुँचे?
श्रीरंगम का निकटतम हवाईअड्डा तिरुचिरापल्ली का अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है। यहाँ से मंदिर की दूरी लगभग 12 किमी है। इसके अलावा श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से 7.5 किमी की दूरी पर है, जो भारत के कई बड़े शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा श्रीरंगम की चेन्नई से दूरी लगभग 325 किमी है। सड़क मार्ग से भी श्रीरंगम पहुँचा जा सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग 38 पर स्थित यह तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु और दूसरे राज्यों के बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।
लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के लिए कथित एक्टिविस्ट आयशा सुल्ताना के खिलाफ राजद्रोह (Sedition) का मामला दर्ज किया गया है। गुरुवार (जून 10, 2021) को लक्षद्वीप पुलिस ने स्थानीय नागरिक और फिल्म एक्टिविस्ट व फिल्ममेकर आयशा सुल्ताना के खिलाफ FIR दर्ज की। उन्होंने केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक प्रफुल पटेल को ‘केंद्र द्वारा लक्षद्वीप के खिलाफ उपयोग किया जाने वाले बायो-वेपन’ बताया था।
आयशा सुल्ताना के खिलाफ लक्षद्वीप की राजधानी कवरत्ती के पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया। लक्षद्वीप भाजपा के अध्यक्ष सी अब्दुल खादर हाजी ने उनके खिलाफ तहरीर दी थी। उनके खिलाफ IPC की धारा-124 (राजद्रोह) का मामला दर्ज किया गया। इसके तहत उन लोगों पर कार्रवाई की जाती है, जिनके बयानों या कृत्यों से देश की एकता व अखंडता को नुकसान पहुँचता हो। खादर ने अपनी शिकायत के पीछे मलयालम चैनल ‘MediaOne TV’ की एक चर्चा में आयशा द्वारा दिए गए बयान का जिक्र किया।
बता दें कि प्रफुल खोड़ा पटेल गुजरात के बड़े भाजपा नेता रहे हैं, जो नरेंद्र मोदी की राज्य सरकार में वहाँ के गृह मंत्री हुआ करते थे। अगस्त 2016 से जनवरी 2020 तक वो दमन एवं दीव के प्रशासक थे, जिसके बाद उन्हें दादर व नगर हवेली और फिर लक्षद्वीप का प्रशासक नियुक्त किया गया। उनके पिता खोड़ाभाई रणछोड़भाई पटेल RSS नेता थे, जिनकी पीएम मोदी से खासी नजदीकी थी। सोहराबुद्दीन केस में जब अमित शाह जेल गए थे तो उनके 10 में से 8 विभाग प्रफुल पटेल को मंत्री बना कर ही सौंपा गया था।
आयशा सुल्ताना द्वारा प्रफुल पटेल के खिलाफ दिए गए आपत्तिजनक बयान के बाद स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन भी किया था। केरल में भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने इस बयान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। लक्षद्वीप और केरल में सुधारवादी फैसलों के खिलाफ आयशा सुल्ताना खासी मुखर हैं। बाद में एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने अपने बयान का बचाव करते हुए इसे दोहराया भी था।
#Lakshadweep filmmaker Aisha Sultana booked for sedition. .FIR was registered under IPC 124A (Sedition) , 153B (Imputations, assertions prejudicial to national integration) on the basis of complaint by C Abdul Khader Haji, #BJP unit in Lakshadweep. https://t.co/2LDG25n9dQ
उन्होंने लिखा था कि पटेल और उनकी नीतियाँ ‘बायो-वेपन’ के रूप में कार्य कर रही हैं। साथ ही उन्होंने लक्षद्वीप में कोरोना फैलने को लेकर भी पटेल व उनके मातहत अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया था। आयशा सुल्ताना ने पूछा था कि वो उन्हें और क्या कहतीं? ‘लक्षद्वीप साहित्य प्रवर्तन संगम’ ने आयशा का समर्थन करते हुए कहा है कि उन्हें देशद्रोही बताना ठीक नहीं है, क्योंकि उन्होंने प्रशासक के ‘अमानवीय’ फैसलों के खिलाफ आवाज़ उठाई है।
संगम ने भी इस आरोप को दोहराया कि पटेल के कारण ही लक्षद्वीप कोरोना प्रभावित क्षेत्र बना। साथ ही दावा किया कि लक्षद्वीप का ‘सांस्कृतिक समुदाय’ आयशा सुल्ताना के साथ खड़ा है। बता दें कि प्रफुल पटेल लक्षद्वीप को एक सुरक्षित और सुविधाजनक स्थान बनाने के लिए कुछ सुधार कानून लेकर आए हैं, जिससे वहाँ पर्यटन को पुनः स्थापित करने में मदद मिलेगी। लक्षद्वीप को मालदीव्स की तर्ज पर लोगों का टूरिज्म डेस्टिनेशन बनाने का लक्ष्य लेकर वहाँ का प्रशासन चल रहा है।
ये ड्राफ्ट रेगुलेशन, भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अंतर्गत प्रशासक को विकास के उद्देश्य से द्वीपों पर “किसी भी क्षेत्र को एक प्लॉनिंग एरिया घोषित करने” का अधिकार देता है, और प्रशासक को अधिकार के तहत सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आवश्यक किसी भी भूमि का अधिग्रहण करने की भी अनुमति देता है। जब से ये योजनाएँ प्रस्तावित की गई हैं तभी से कुछ राजनेता व कट्टरपंथी इनके विरोध में लगे हुए हैं।
सवाल कई हैं और जवाब शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही पता हो! क्योंकि वे 7 साल से देश के सबसे बड़े नेता हैं। यह सिर्फ हम ही नहीं कहते या मानते हैं। हाल के समय में मोदी सरकार से पंगा लेने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले शिवसेना के सांसद संजय राउत का भी यही मानना है। वही संजय राउत जिनकी बड़ी भूमिका महाराष्ट्र में बीजेपी शिवसेना के साथ छूटने और पर्दे के पीछे उद्धव ठाकरे और शरद पवार के बीच गोटी फिट कराने में मानी जाती है।
राउत के इस बयान को लेकर फिर से महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार के भविष्य को अटकलें लग रही है। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने जिस तरह से शिवसेना और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को अचानक से बाल ठाकरे की याद दिलाई है उसने इन कयासों को और भी बल दे दिया है।
राउत जलगाँव के दौरे पर थे। पत्रकारों ने पूछा कि क्या उन्हें यह लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी आई है? जवाब में शिवसेना सांसद ने कहा वे न तो किसी मीडिया रिपोर्ट पर विश्वास करते हैं और न ही इस मामले में कोई कमेंट करना चाहते हैं। आगे कहा कि भाजपा ने अपनी सर्वोच्च सफलता पिछले 7 सालों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही हासिल की है और वे (नरेंद्र मोदी) न केवल भाजपा के बल्कि पूरे देश के सबसे बड़े नेता हैं और इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है।
I believe that Narendra Modi is the top leader of the country and Bharatiya Janata Party. No one can deny the fact that the success which the Bharatiya Janata Party has got in the last 7 years is only because of Narendra Modi: Shiv Sena leader Sanjay Raut pic.twitter.com/lYAqcmEtdS
राउत के इस बयान से पहले उद्धव ठाकरे ने दिल्ली आकर 8 जून को पीएम मोदी के साथ मुलाकात की थी। साथ में उपमुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार और कॉन्ग्रेस कोटे से महाराष्ट्र सरकार में मंत्री अशोक चव्हाण भी थे। लेकिन, अटकलों का दौर तब शुरू हुआ जब उद्धव ठाकरे ने इस मीटिंग से इतर पीएम मोदी से व्यक्तिगत मुलाकात की।
उससे भी चौंकाने वाला था इस संबंध में ठाकरे का बयान। उनसे व्यक्तिगत मुलाकात के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे नवाज शरीफ से मिलने तो गए नहीं थे। अगर पीएम मोदी से व्यक्तिगत तौर पर मिले तो इसमें गलत क्या है? ठाकरे ने यह भी कहा था कि वो राजनैतिक तौर पर साथ नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनका आपसी संबंध टूट गया है।
We may not be politically together but that doesn’t mean our relationship has broken. ‘Main koi Nawaz Sharif se nahi milne gaya tha’ (I didn’t go to meet Nawaz Sharif). So if I meet him (PM) separately in person, there is nothing wrong with it: Maharashtra CM Thackeray in Delhi pic.twitter.com/zQQir5t5ZD
उद्धव ठाकरे के इस बयान ने राजनैतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को हवा दे दी। उस पर राउत का बयान। फिर 10 जून को एनसीपी के 22वें स्थापना दिवस पर शरद पवार का यह कहना उन्हें शिवसेना पर पूरा भरोसा है। राजनीति में अटकलों को हवा मिलने के लिए इतने संयोग काफी हैं।
पवार ने कहा कि उन्हें शिवसेना पर पूरा भरोसा है और वो जानते हैं कि महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। महाराष्ट्र सरकार पर उठ रहे संशय के बीच बाला साहब ठाकरे को याद किया। कहा कि बाला साहब ने इंदिरा गाँधी को दिए गए अपने वादे के अनुसार उनकी सहायता करने के लिए अपने प्रत्याशी तक नहीं उतारे थे। शरद पवार ने कहा कि शिवसेना विश्वास के योग्य है और उनकी सरकार भी अपने 5 साल पूरे करेगी।
इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता देवेंद्र फड़णवीस की हाल ही में मुलाकात हुई थी। फड़णवीस उन एकनाथ खडसे से भी मिलने गए थे जिनके साथ उनके संबंध बेहद तल्ख हैं। इतना ही नहीं मराठी दैनिक तरुण भारत ने बीते महीने एक रिपोर्ट छापी थी। इसमें बताया गया था कि पवार को अब पछतावा हो रहा है। उन्हें लगता है कि उद्धव ठाकरे को सीएम बनाना ‘भारी भूल’ थी।
रिपोर्ट में कहा गया था कि उद्धव ठाकरे द्वारा शरद पवार के फोन कॉल का जवाब नहीं देने के बाद, एनसीपी प्रमुख ने संजय राउत के सामने इस बात को स्वीकारा कि उन्होंने ठाकरे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाकर बहुत बड़ी गलती कर दी। पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर चर्चा के लिए आयोजित ‘पश्चिम बंगाल से पंढरपुर’ नामक कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार अनिल थाटे ने इसका खुलासा किया था। उन्होंने कहा कि शरद पवार ने राउत से कहा कि वह खुद या एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए एक बेहतर विकल्प होंगे।
जाहिर है महाराष्ट्र की राजनीति में जितना कुछ पर्दे के आगे दिख रहा है उससे ज्यादा चालें पर्दे के पीछे चली जा रही है। ऐसे में कब कौन किस करवट बैठेगा अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है। वैसे भी यह वही प्रदेश हैं जहाँ अजीत पवार रातोंरात फड़णवीस का उपमुख्यमंत्री बन शपथ ले लेते हैं और फिर उद्धव की कैबिनेट में भी जगह पा लेते हैं।
यूँ तो मंदिरों के सरंक्षण को लेकर मद्रास हाई कोर्ट का हालिया फैसला 224 पन्नों का है। 75 निर्देशों का एक सेट तमिलनाडु सरकार को जारी किया गया है। मकसद यह सुनिश्चित करना है कि राज्य में प्राचीन मंदिरों और स्मारकों का रखरखाव उचित तरीके से हो। इस फैसले का लब्बोलुबाब यह है कि हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मंदिरों की जो जमीन है, उनका जो पैसा है, वह उन पर ही खर्च किया जाना चाहिए।
इस फैसले से मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए चलाए जा रहे अभियान को नई उर्जा मिलेगी। तमिलनाडु में तो इस अभियान को अच्छा-खासा समर्थन हासिल है। राज्य में हजारों की संख्या में मंदिर हैं और सरकारी नियंत्रण में इन मंदिरों की लगातार उपेक्षा हो रही है जो हाई कोर्ट के फैसले से भी स्पष्ट होती है।
सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने प्रमुख रूप से तमिलनाडु में हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की मुहिम शुरू की। #FreeTNTemples नाम की इस जन सहयोग आधारित मुहिम से देश के लाखों लोग जुड़े। इस मुहिम में वीरेंद्र सहवाग, कंगना रनौत, रवीना टंडन, मोहनदास पाई और मौनी रॉय जैसे कई सेलिब्रिटीज भी शामिल हुए। हालाँकि सद्गुरु की यह मुहिम तमिलनाडु के लिए ही थी लेकिन इसके बाद पूरे देश में हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की माँग ने जोर पकड़ रखा है।
ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि हिन्दू मंदिरों और संस्थाओं के प्रबंधन एवं नियंत्रण से संबंधित वो कौन से मुद्दे हैं जिनका समाधान किया जाना जरूरी है? भारत का संविधान किस तरीके से हिंदुओं को अपने मंदिरों और उनकी संपत्तियों के संचालन का अधिकार देता है?
संविधान मे वर्णित प्रमुख प्रावधान
भारतीय संविधान का ‘अनुच्छेद 14’ ‘विधि के समक्ष समता एवं विधियों के समान संरक्षण’ से संबंधित है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि ‘भारत के राज्य क्षेत्र’ में किसी भी व्यक्ति को ‘विधि के समक्ष समता एवं विधियों के समान संरक्षण’ से वंचित नहीं किया जाएगा। व्यक्ति का तात्पर्य एक विधिक व्यक्ति से है। इसमें संस्थाएँ, कंपनियाँ, निगम इत्यादि सम्मिलित हैं। व्यक्ति की इस संवैधानिक परिभाषा के आधार पर भगवान (अयोध्या मामले में रामलला भी एक पक्षकार के रूप में थे) को भी एक विधिक व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।
‘अनुच्छेद 25’ ‘धर्म की स्वतंत्रता’ की व्याख्या करता है। इस प्रावधान में अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को निर्बाध रूप में मानने, उसके आचरण और प्रसार का अधिकार (धर्मांतरण का नहीं) सम्मिलित है। अंतःकरण की स्वतंत्रता के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को भगवान तथा उसके रूपों के साथ अपने ढंग से अपने संबंध बनाए रखने की स्वतंत्रता प्राप्त है। आचरण के अधिकार के अंतर्गत धार्मिक पूजा, परंपरा इत्यादि शामिल है।
इसी श्रृंखला में संविधान का ‘अनुच्छेद 26’ महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह धर्म से जुड़े कार्यों के प्रबंधन और धार्मिक संस्थाओं के पोषण से संबंधित है। ‘अनुच्छेद 26’ के अंतर्गत ‘प्रत्येक धर्म’ और उसके ‘किसी नागरिक अनुभाग’ को निम्न अधिकार प्राप्त हैं,
धार्मिक कार्यों के लिए संस्थाओं की स्थापना एवं पोषण का अधिकार
अपने धर्म से संबंधित कार्यों के प्रबंधन का अधिकार
संपत्तियों के अर्जन और स्वामित्व का अधिकार
संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार
‘अनुच्छेद 29’ अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच के अंतर को नकारता है। इस अनुच्छेद में व्यवस्था की गई है कि भारत के किसी भी भाग में रहने वाले ‘नागरिकों के किसी भी अनुभाग’ को अपनी बोली, भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है। ‘नागरिकों के अनुभाग’ की व्याख्या करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि इसमें केवल अल्पसंख्यक नहीं, अपितु बहुसंख्यक भी शामिल हैं। यह अनुच्छेद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में हिंदुओं के अलावा अन्य सभी समुदायों को उनके पंथ और मजहब से संबंधित निर्णय लेने की स्वतंत्रता है।
हालाँकि ‘अनुच्छेद 30’ अल्पसंख्यकों से संबंधित है, किन्तु इस अनुच्छेद में यह विशेष रूप से कहा गया है कि ‘अनुच्छेद 30’ के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को मिले अधिकार केवल बहुसंख्यकों के साथ समानता स्थापित करने के लिए हैं न कि इसलिए कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के मुकाबले अधिक लाभ की स्थिति में रख दिया जाए।
किस प्रकार मंदिर दुर्दशा के शिकार हुए
महाराष्ट्र में लगभग 4000 से अधिक ऐसे मंदिर हैं जो सरकार के नियंत्रण में है। इनमें पंढ़रपुर के विट्ठल महाराज का मंदिर, सिद्धिविनायक, कोल्हापुर का महालक्ष्मी जैसे बड़े मंदिर शामिल हैं। महाराष्ट्र में कई हिन्दू संगठन मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और मंदिरों की भूमि के घोटालों का मुद्दा उठाते रहते हैं। इन संगठनों के अनुसार ‘पश्चिम महाराष्ट्र देवस्थान समिति’, जो कि सरकार द्वारा प्रशासित है, सिंधुदुर्ग, कोल्हापुर और सांगली में लगभग 3067 मंदिरों को नियंत्रित करती है। इस समिति के रहते हुए लगभग 8000 एकड़ मंदिरों की भूमि माफियाओं के अवैध कब्जे में जा चुकी है। संगठनों द्वारा यह आरोप भी लगाया गया कि पंढ़रपुर में विट्ठल महाराज के मंदिर को लगभग 1200 एकड़ जमीन भक्तों से दान में मिली थी, किन्तु जब अपने स्तर पर जाँच की गई तब मंदिर ट्रस्ट के स्वामित्व में एक इंच भी भूमि नहीं थी।
विट्ठल मंदिर, पंढ़रपुर (फोटो : दैनिक भास्कर )
कर्नाटक में 2002 में कॉन्ग्रेस सरकार थी। लगभग 2,07,000 मंदिरों से कर्नाटक की सरकार को राजस्व के रूप में 72 करोड़ रुपए प्राप्त हुए, जिसमें से पुनः 10 करोड़ मंदिरों को मेंटेनेंस इत्यादि के लिए वापस किए गए। रिपोर्ट्स के अनुसार शेष बचे हिस्से में से 50 करोड़ रुपए मदरसों और 10 करोड़ रुपए चर्चों को ग्रांट के रूप में दे दिए गए। हिन्दू जन जागृति समिति की उसी रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक में संसाधनों की कमी के चलते लगभग 50,000 मंदिर बंद हो गए।
गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर, कर्नाटक (फोटो : karnataka.com)
तमिलनाडु में मंदिरों की दुर्दशा के विषय में सद्गुरु अपनी एक फेसबुक पोस्ट में बताते हैं। उनके अनुसार तमिलनाडु में 10,000 से अधिक मंदिर विलुप्त होने के कगार पर हैं, क्योंकि वहाँ कोई भी पूजा करने वाला नहीं है। 34,000 ऐसे मंदिर हैं जिन्हें सालाना 10,000 रुपए (833 रुपए प्रतिमाह और 28 रुपए दैनिक) का बजट दिया जाता है। 37,000 मंदिरों की पूजा, सुरक्षा और प्रबंधन की जिम्मेदारी मात्र एक ही व्यक्ति के हाथ में है। एक सर्वे के अनुसार मंदिरों की स्वामित्व वाली 5.25 लाख एकड़ भूमि में से अब 4.78 लाख एकड़ भूमि ही शेष है। मद्रास उच्च न्यायालय ने हिन्दू धार्मिक एवं चैरिटेबल एंडोमेन्ट विभाग को कम से कम 50,000 एकड़ भूमि पुनः प्राप्त कर मंदिरों को लौटने का आदेश दिया था।
पलनि के ‘दण्डायुधपाणि स्वामी मंदिर’ का एक उदाहरण देखते हैं। मुरूगन स्वामी के इस मंदिर की हुंडी में दान स्वरूप प्राप्त धन एक बैंक अकाउंट में जमा किया जाता है। इस राशि का 14% प्रशासनिक फीस और 4% भाग ऑडिट फीस के रूप में लिया जाता है। इसके पश्चात 25%-40% हिस्सा वेतन में एवं दैनिक पूजा तथा त्योहारों के लिए मात्र 1-2 फीसदी राशि खर्च की जाती है। हुंडी मे इकट्ठा हुई राशि में से 4%-10% भाग ‘कमिश्नर कॉमन गुड फंड’ में चला जाता है जिसका उपयोग सरकार द्वारा चलाई गई कुछ मुफ्त की योजनाओं में होता है।
दंडायुधपाणि स्वामी मंदिर, पलनि तमिलनाडु (फोटो : palani.org)
केरल में सबसे बड़ा मुद्दा देवस्वोम बोर्ड में सदस्यों की नियुक्ति का है। केरल में मंदिरों के प्रबंधन, प्रशासन एवं अन्य संबंधित क्रियाकलापों के लिए चार प्रमुख देवस्वोम बोर्ड हैं। इन बोर्ड्स के अधिकार क्षेत्र में गुरुवायूर, सबरीमाला, एत्तुमन्नूर शिव मंदिर जैसे कई बड़े मंदिर आते हैं। त्रावणकोर और मालाबार देवस्वोम बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में ही लगभग 2577 मंदिर हैं। इन बोर्ड्स में सदस्यों की नियुक्ति के मामले में केरल की अब तक की सरकारों की भूमिका संदिग्ध रही है।
जब वामपंथी सरकार में रहे तो उन्होंने अपनी ही पार्टी के सदस्यों की नियुक्ति बोर्ड में की और जब कॉन्ग्रेस शासन में रही तो उसने अपने वोट बैंक को साधने के लिए इन देवस्वोम बोर्ड्स का सहारा लिया। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड में अध्यक्ष और दो अन्य सदस्यों का चयन केरल सरकार द्वारा किया जाता है, जो केरल सरकार के मंत्री समूह और विधानसभा सदस्यों से संबंधित होते हैं।
गुरुवायूर देवस्वोम बोर्ड में प्रशासन की देखरेख के लिए प्रशासक की नियुक्ति भी केरल सरकार द्वारा की जाती है। इन मंदिरों की ‘हुंडी’ से प्राप्त दान की राशि धर्म के कार्यों को छोड़कर ‘विकास और निर्माण’ कार्यों के लिए खर्च की जाती है। ऐसे ही मामलों में मद्रास हाई कोर्ट का निर्णय महत्वपूर्ण है जो यह कहता है कि मंदिर की संपत्ति के मामले में सार्वजनिक उद्देश्यों के सिद्धांत का कोई उपयोग नहीं है।
सबरीमाला मंदिर, केरल (फोटो : मातृभूमि)
आंध्रप्रदेश में भी पिछले वर्ष सरकार ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के माध्यम से भगवान वेंकटेश्वर की 50 संपत्तियों की नीलामी का निर्णय लिया। ये संपत्तियाँ आंध्रप्रदेश के अतिरिक्त तमिलनाडु और ऋषिकेश में स्थित है। इन संपत्तियों की नीलामी के माध्यम से 24 करोड़ रुपए अर्जित किए जाने की संभावना थी, किन्तु भाजपा नेताओं और हिन्दू संगठनों के विरोध के कारण सरकार को यह निर्णय वापस लेना पड़ा।
तिरुपति बालाजी मंदिर, आंध्रप्रदेश (फोटो : टीटीडी)
भारत में मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लाने की एक निरंतर प्रक्रिया रही। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सबसे पहले मंदिरों पर अधिकार स्थापित करने के लिए ‘मद्रास रेगुलेशन-1817’ पारित किया जिसका विरोध होने पर 1840 में इसे वापस ले लिया गया। 1863 में एंडोवमेंट ऐक्ट लाया गया जिसके माध्यम से मंदिरों के अधिकार ट्रस्टी को सौंप दिए गए जो ब्रिटिश ही थे।
इसके पश्चात अंग्रेजी सरकार भारत में धार्मिक संस्थानों पर अपना कब्जा स्थापित करने के लिए ‘द मद्रास रिलीजियस एण्ड चैरिटेबल एंडोवमेंट ऐक्ट-1925’ लेकर आई जिसे मुस्लिमों और ईसाइयों के विरोध के कारण पुनः वापस लेना पड़ा। अंततः ‘मद्रास हिन्दू रिलीजियस एण्ड एंडोवमेंट ऐक्ट-1927’ अस्तित्व में आया, जिसमें 1935 में कई बड़े बदलाव हुए।
स्वतंत्रता के बाद 1951 में तमिलनाडु सरकार के द्वारा ‘हिन्दू रिलीजियस एण्ड एंडोवमेंट ऐक्ट’ पास किया गया। 1959 में इसी कानून में संशोधन करते हुए तत्कालीन कॉन्ग्रेस राज्य सरकार ने ‘हिन्दू रिलीजियस एण्ड चैरिटेबल एंडोवमेंट ऐक्ट’ बनाया जिसके अंतर्गत राज्य में एक ‘हिन्दू रिलीजियस एण्ड चैरिटेबल एंडोवमेंट विभाग’ होने लगा जिसका प्रमुख कमिश्नर को नियुक्त किया जाता है।
भारत में मंदिरों पर तो सरकारी नियंत्रण है किन्तु मस्जिद और चर्च पूर्ण रूप से स्वशासी हैं। सरकार, गैर-हिन्दू धार्मिक संस्थानों पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं रख सकती है। हिन्दू मंदिरों के अतिरिक्त सभी धार्मिक संस्थाओं को प्रबंधन, प्रशासन एवं नियुक्ति का अधिकार प्राप्त है। उदाहरण के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ एवं हिमाचल प्रदेश में गुरुद्वारों के प्रबंधन एवं प्रशासन के लिए सिखों की समितियाँ बनी हुई हैं, जिनमें सदस्य भी सिख होंगे और उन्हें चुनने वाले भी।
दिल्ली में गुरुद्वारों के प्रबंधन एवं प्रशासन के लिए ‘दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (DSGMC)’ है जो एक स्वशासी संस्था है। इस कमेटी की नियुक्ति चुनाव से होती है जिसमें मतदाता मात्र सिख होते हैं। चुनाव भले ही सरकार की निगरानी में होते हैं किन्तु सरकार का कमेटी की कार्यप्रणाली में कोई दखल नहीं है। इसी प्रकार पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश में गुरुद्वारों और सिख धार्मिक संस्थाओं के लिए ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ है जो ‘सिख गुरुद्वारा ऐक्ट, 1925’ के तहत स्थापित की गई।
मद्रास हाई कोर्ट के अलावा मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के मामले में 2014 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया एक निर्णय भी अहम है। मामला तमिलनाडु के चिदंबरम में स्थित 1500 वर्ष पुराने नटराज मंदिर का था। मद्रास हाई कोर्ट के 2009 के निर्णय को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि ‘नटराज मंदिर’ को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। इस निर्णय के बाद यह माना गया कि भविष्य में तमिलनाडु के 45,000 मंदिर सरकारी नियंत्रण से मुक्त होकर भक्तों के पास जा सकते हैं और मंदिरों की जो संपत्तियाँ अवैध रूप से हथिया ली गई हैं, उन्हें भी मुक्त कराने का प्रयास किया जा सकता है।
भारत का धर्मनिरपेक्ष संविधान किसी भी धर्म को भारत के राज्य धर्म के रूप में मान्यता नहीं देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त हैं। किन्तु मंदिरों को सरकारी दया पर छोड़ने वाला ‘हिन्दू रिलीजियस एण्ड चैरिटेबल एंडोवमेंट ऐक्ट’ पूर्ण रूप से भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वभाव के विपरीत है और हिंदुओं को अपनी धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और प्रशासन से रोकता है।