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कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने फाजिल के परिवार को दिए ₹25 लाख, इसी पैसे से हिंदुवादी सुहास शेट्टी की हत्या के लिए अब्दुल सफवान गैंग को दी ‘सुपारी’: पुलिस जाँच के हवाले से रिपोर्ट में बताया

कर्नाटक के मंगलुरु में हिन्दू कार्यकर्ता सुहास शेट्टी की हत्या के लिए ₹3 लाख दिए गए थे। यह रकम आदिल ने अब्दुल सफवान गैंग को दी थी। फिरौती का यह पैसा कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार से मिले मुआवजे से दिया गया था। यह सारी बातें पुलिस की जाँच में सामने आई हैं। आदिल अपने भाई की मौत का बदला सुहास शेट्टी की हत्या से लेना चाहता था।

न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में मोहम्मद फाजिल नाम के एक शख्स की मौत के बाद ₹25 लाख का मुआवजा दिया था। उसकी हत्या का आरोप सुहास शेट्टी पर था। फाजिल का भाई आदिल इसका बदला सुहास शेट्टी की हत्या करवा के लेना चाहता था।

रिपोर्ट बताती है कि इसके लिए आदिल ने अब्दुल सफवान नाम के गुंडे से सम्पर्क किया था। अब्दुल सफवान भी किसी बात को लेकर सुहास शेट्टी से बदला लेना चाहता था। आदिल ने इसके बाद सुहास शेट्टी की हत्या के लिए ₹5 लाख में अब्दुल सफवान से डील की। अब्दुल सफवान को आदिल ने ₹3 लाख इस काम के लिए पहले ही दिए।

सुपारी का यह पैसा कॉन्ग्रेस सरकार के मुआवजे के ₹25 लाख में से दिया गया था। यह भी पता चला है कि इस हत्या की साजिश एक महीने पहले से रची जा रही थी। इसके लिए अब्दुल सफवान ने कई और लड़कों को भी अपने गैंग में शामिल कर लिया था।

पुलिस ने स्पष्ट किया है कि यह बदला लेने के लिए किया गया मर्डर है। पुलिस कमिश्वर अनुपम अग्रवाल ने बताया है कि हत्या की साजिश को 8 लोगों के ग्रुप ने मिलकर अंजाम दिया था। पुलिस ने इस हत्या के मामले में अब्दुल सफ़वान, मोहम्मद मुजामिल, मोहम्मद रिजवान, कलंधर शफी, आदिल महरूफ, नियाज, रंजीत और नागराज को गिरफ्तार किया है।

पुलिस कमिश्नर ने यह भी बताया है कि अब्दुल पर साल 2023 में हमला किया गया था। इसी के बाद से उसने बदला लेने की ठान ली थी। गौरतलब है कि 1 मई 2025 को हिंदू कार्यकर्ता सुहास शेट्टी की हत्या कर दी गई थी। सुहास शेट्टी की हत्या 1 मई, 2025 को मंगलुरु के बाजपे इलाके में कर दी गई थी।

अब्दुल सफवान के गैंग ने घेर कर तलवारों से काट कर सुहास शेट्टी की हत्या की थी। अस्पताल ले जाते वक्त सुहास शेट्टी की मौत हो गई थी। भाजपा ने ₹25 लाख का मुआवजा सुहास शेट्टी के परिवार को दिया था।

बांग्लादेश से पहले खुद घुसा चाँद मियाँ, फिर भारत में घुसपैठियों को बसाने के लिए चलाने लगा गैंग: ₹25 हजार में एंट्री-रोजगार भी, दिल्ली पुलिस ने 44 को पकड़ा

दिल्ली पुलिस ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के एक गैंग का भंडाफोड़ किया है। इस बांग्लादेशी गैंग के दिल्ली से लेकर चेन्नई तक कनेक्शन सामने आए हैं। ये गैंग फर्जी दस्तावेजों के जरिए घुसपैठियों को भारत में रोजगार मुहैया कराता था। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने अब तक कुल 44 लोगों को गिरफ्तार किया है। गैंग का सरगना चाँद मियाँ है।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार किए गए लोगों में से 33 बांग्लादेशी नागरिक हैं और 5 भारतीय एजेंट हैं। इनमें 33 बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। यह गैंग फर्जी दस्तावेज बनवाने और रहने की व्यवस्था कराने और ट्रांसपोर्टेशन में मदद करता था।

गिरफ्तार लोगों के पास से 11 फर्जी आधार कार्ड, आईडी प्रूफ के साथ दो बांग्लादेशी दस्तावेज,एक कंप्यूटर और 4 हार्ड डिस्क, एक कलर प्रिंटर और फिंगरप्रिंट स्कैनर, 8 मोबाइल फोन और सिम कार्ड बरामद हुए हैं। इसके अलावा इनके पास से लगभग ₹20 हज़ार बरामद किए गए हैं।

दिल्ली पुलिस की जाँच में सामने आया कि गैंग के सदस्य बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध रूप से सीमा पार कराकर भारत में लाते थे। फिर यहाँ उनके लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करवाते थे। इसके बाद उन्हें किराए का मकान दिलवा कर दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में रोजगार भी मुहैया कराते थे।

पुलिस ने बताया है कि इनके चलते घुसपैठियों को पुलिस या सरकारी एजेंसी की नजर से बचने में आसानी होती थी। यह गैंग दिल्ली के सीमापुरी, संगम विहार, शाहीन बाग, महिपालपुर जैसे इलाकों में सक्रिय था। इन इलाकों में बांग्लादेशी नागरिक रहते हैं।

पुलिस के मुताबिक, गैंग का सरगना चाँद मियाँ दिल्ली के संगम विहार इलाके में रह रहा था। पुलिस की जाँच में सामने आया कि वह खुद भी बांग्लादेशी नागरिक है। जो पिछले 5 साल से पहले अवैध रूप से भारत आया था।

इसके बाद उसने एक पूरा नेटवर्क तैयार किया जो 3 साल से बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसा रहा है। चाँद मियाँ पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा के बेनापोल सीमा के ज़रिए बांग्लादेशियों को अवैध तरीके से भारत में घुसपैठ करवाता था। वह इस काम के ₹25 हजार लेता था।

दिल्ली पुलिस के DCP रवि कुमार सिंह ने बताया कि 12 मार्च 2025 को पुलिस को सूचना मिली कि एक बांग्लादेशी नागरिक असलम उर्फ मसूम मोहम्मद तैमूर नगर में अवैध रूप से रह रहा है। पूछताछ में उसने बताया कि वह बांग्लादेश के नोआखाली का रहने वाला है और हाल ही में भारत में आया है।

असलम से पूछताछ के चलते ही सरगना चाँद मियाँ तक पहुँचा जा सका। पुलिस ने सभी सबूतों के आधार पर खोजबीन शुरु की। कनेक्शन जोड़ते हुए मुख्य सरगना चाँद मियां को विजयवाड़ा से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो गया। बाकी साथियों को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ सकती है।

  • दिल्ली पुलिस की जाँच में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। यह भी बताया गया कि कुछ बांग्लादेशी घुसपैठिए ट्रांसजेंडर का वेश धारण कर दिल्ली की सड़कों, रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में जबरन पैसे वसूलते थे। कई ने तो कानून और समाज धोखा देने को सर्जरी और हार्मोनल इलाज से पहचान तक छिपा ली थी।

ये लोग विशेष रूप से भीड़भाड़ वाले इलाकों में काम करते थे और खुद को पहचान छिपाने के लिए नकली पहचान पत्रों का इस्तेमाल करते थे। पुलिस का मानना है कि यह गैंग केवल दिल्ली तक सीमित नहीं था बल्कि इसकी पहुँच देश के दक्षिणी राज्यों तक थी।

शिमला की संजौली मस्जिद को पूरी तरह ‘समतल’ करने का कोर्ट ने दिया आदेश, वक्फ बोर्ड नहीं दिखा पाया ‘कागज’: 3 मंजिले पहले ही गिराने को कहा था, मुस्लिम बोले- ऊपरी अदालत में जाएँगे

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में बनी अवैध संजौली मस्जिद को पूरी तरह से गिराया जाएगा। यह आदेश शिमला नगर निगम आयुक्त कोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने यह आदेश मस्जिद की जमीन का मालिकाना हक़ साबित ना होने पर दिया है। पूरी मस्जिद अवैध पाई गई है। इससे पहले अक्टूबर, 2024 में मस्जिद की तीन मंजिलें गिराने का आदेश दिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शनिवार (3 मई, 2025) को शिमला नगर निगम आयुक्त कोर्ट ने संजौली मस्जिद मामले में सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने मामले में वक्फ बोर्ड से मस्जिद के कागज दिखाने को कहा। वक्फ बोर्ड सुनवाई के दौरान मस्जिद के मालिकाना हक के कोई भी कागज नहीं दिखा पाया।

वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि मस्जिद 70 वर्षों से अधिक पुरानी है। लेकिन वक्फ बोर्ड इस पाँच मंजिला अवैध मस्जिद का नक्शा, NOC और बाक़ी कागज भी नहीं दिखा पाया। वक्फ बोर्ड कोर्ट में दावा कर रहा था कि संजौली मस्जिद का ढाँचा पुरानी मस्जिद को तोड़ कर बनाया गया है।

नई मस्जिद के निर्माण के लिए ली गई कोई भी अनुमति वक्फ बोर्ड के पास नहीं थी। कोर्ट ने वक्फ बोर्ड से पूछा कि अगर आपने पुरानी मस्जिद तोड़ी तो नई बनाने को अनुमति क्यों नहीं ली। वहीं सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पुरानी मस्जिद गिराने के बाद यह जमीन सरकार के पास चली गई, जिस पर नया निर्माण अवैध कब्जा है।

वक्फ बोर्ड बीते लगभग 15 वर्षों से इस मस्जिद को लेकर मुकदमा लड़ रहा था। मस्जिद के अवैध कब्जे के खिलाफ केस लड़ रहे वकील ने बताया कि वक्फ बोर्ड ने इस जमीन पर लैंड माफिया की तरह कब्ज़ा कर लिया था और पाँच मंजिला मस्जिद शहर के बीच खड़ी कर दी थी।

इन सब दावों के बाद ही कोर्ट ने आदेश दिया कि संजौली मस्जिद को पूरी तरह से गिरा दिया जाए। कोर्ट ने इसके लिए क्या समयसीमा तय की है, यह स्पष्ट नहीं हुआ है। वहीं वक्फ बोर्ड ने कहा है कि वह इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में जाएँगे। उनका दावा है कि रिकॉर्ड में मस्जिद दर्ज है लेकिन वह अपडेट नहीं हुआ है।

इससे पहले अक्टूबर, 2024 में शिमला के इसी आयुक्त कोर्ट ने मस्जिद की तीन ऊपरी मंजिले अवैध पाई थीं। इन्हें तोड़ने का आदेश कोर्ट ने दिया था। इनको तोड़ने की प्रक्रिया तब से चल रही है। मस्जिद की सच्चाई एक विवाद के बाद सामने आई थी।

शिमला में एक झगड़े के बाद मुस्लिम युवक एक स्थानीय युवक को पीट कर इस मस्जिद में छुप गए थे। इसके बाद कई दिनों तक हिमाचल प्रदेश में हिंदूवादी संगठनों ने प्रदर्शन किया था। इस मस्जिद को लेकर भी इसके बाद ही याचिकाएँ डाली गई थीं। स्थानीय लोगों ने कहा था कि यह मस्जिद पूरी तरह अवैध है।

राम मंदिर में घुस गई मुस्लिम महिला, सिर और चेहरे को नीले कपड़े से ढँक रखा था: बहस करने पर पुलिस ने हिरासत में लिया, परिवार ने बताया ‘मानसिक विक्षिप्त’

यूपी पुलिस ने राम मंदिर से एक मुस्लिम महिला को हिरासत में लिया है। उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध लग रही थीं। उक्त महिला का नाम इरिम है, जो श्रद्धालुओं के साथ दर्शन के बहाने भीतर जा रही थी। जाँच एजेंसियाँ उसके बारे में खँगाल रही हैं।

उक्त महिला मंदिर के भीतर भी चली गई थी, लेकिन लौटते समय एग्जिट पर पुलिस ने उसे रोक लिया। उसने सिर और चेहरे पर नीले रंग का कपड़ा बाँध रखा था, वो पुलिस को भी पलट कर जवाब दे रही थी। महाराष्ट्र के वर्धा की रहने वाली उस महिला के परिजनों का कहना है कि वो मानसिक बीमार है और इधर-उधर घूमती रहती है। उसे महिला थाने में रखकर परिजनों को सूचित किया गया।

बता दें कि इससे पहले 6 जनवरी को कैमरे वाले चश्मे से तस्वीर खींचकर जासूसी करते हुए एक शख्स को गिरफ्तार किया गया था। गुजरात का व्यापारी जयकुमार ऐसा करते हुए सभी चेकपॉइंट्स को पार कर चुका था। इसी तरह 3 मार्च को अब्दुल नामक एक आतंकी धराया था, जो हैण्ड ग्रेनेड से राम मंदिर पर हमले की साजिश रच रहा था।

वहीं ताज़ा मामले में फ़िलहाल महिला के बारे में कुछ आपत्तिजनक पता नहीं चला है। बता दें कि अयोध्या का राम मंदिर आतंकियों के निशाने पर रहा है, पाकिस्तान तक से इसे लेकर कई बयान आ चुके हैं। जब सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी ढाँचे वाली जगह पर राम मंदिर बनाए जाने का फ़ैसला बनाया था, क्योंकि ये साबित हो गया था कि वहाँ बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राम मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनवाई थी।

‘गोधरा ट्रेन को जलने से रोक सकते थे’: गुजरात HC ने 9 पुलिसकर्मियों की बर्खास्ती को बरकरार रखा, कहा – काम में लापरवाही और अनदेखी की

गोधरा ट्रेन अग्निकांड में लापरवाही के कारण 9 पुलिस अधिकारियों की बर्खास्तगी को 24 अप्रैल की सुनवाई में भी गुजरात उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा।

गौरतलब है कि 27 फरवरी 2002 की सुबह साबरमती एक्सप्रेस के S6 कोच में यात्रा कर रहे 58 हिंदू तीर्थयात्रियों को मुस्लिम भीड़ ने जलाकर मार दिया था। मरने वालों में 27 महिलाएँ और 10 बच्चे भी शामिल थे। यह नरसंहार गुजरात के गोधरा स्टेशन के पास हुआ था।

कोर्ट ने कहा कि बर्खास्त हुए पुलिसकर्मी अगर अनदेखी और लापरवाही न दिखाते तो इस घटना को रोका जा सकता था।

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा, “अगर याचिकाकर्ता अहमदाबाद पहुँचने के लिए साबरमती एक्सप्रेस से ही सफर करते तो शायद गोधरा कांड को रोका जा सकता था। याचिकाकर्ताओं ने अपने काम में लापरवाही और अनदेखी की। ये सभी आरोप सिद्ध हो चुके हैं।”

साबरमती एक्सप्रेस को जलाने के लिए मुस्लिम जिम्मेदार

गोधरा में साबरमती ट्रेन अग्निकांड में 31 इस्लामी दंगाई दोषी पाए गए थे। 11 आरोपितों को 1 मार्च, 2011 को विशेष फास्टट्रैक कोर्ट ने मृत्युदंड दिया।

इनके नाम अब्दुल रज्जाक कुरकुर, इस्माइल सुलेजा, जब्बीर बिनयामीन बेहरा, रमजानी बिनयामीन बेहरा, महबूब हसन, सिराज बाला, इरफान कलंदर, इरफान पटाडिया, हसन लालू, महबूब चंदा और सलीम जर्दा हैं।

इनकी मौत की सज़ा को अक्टूबर 2017 में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। अन्य दोषियों में से 20 को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

उनके नाम सुलेमान अहमद हुसैन, अब्दुल रहमान अब्दुल माजिद धनतिया, कासिम अब्दुल सत्तार, इरफान सिराज पदो घांची, अनवर मोहम्मद मेहदा, सिद्दीक, मेहबूब याकूब मीठा, सोहेब यूसुफ अहमद कलंदर, सौकत, सिद्दीक मोहम्मद मोरा, अब्दुल सत्तार इब्राहिम गद्दी असला, अब्दुल रऊफ अब्दुल माजिद ईसा, यूनुस अब्दुलहक समोल, इब्राहिम अब्दुल रजाक अब्दुल सत्तार समोल, सौकत यूसुफ इस्माइल मोहन, बिलाल अब्दुल्ला इस्माइल बादाम घांची, फारूक, अयूब अब्दुल गनी इस्माइल पटालिया, सौकत अब्दुलाह मौलवी इस्माइल बादाम, एमडी हनीफ हैं।

इन 31 कट्टरपंथियों की सज़ा उन सभी षड्यंत्रकारियों को आईना दिखाती रहेगी जो हिंदू तीर्थयात्रियों की योजनाबद्ध हत्या को महत्वहीन बनाने की कोशिश करते हैं।

अब्दुल सफवान, मुजामिल, रिजवान, सफी समेत 8 ने की सुहास शेट्टी की हत्या… ₹5 लाख में मर्डर की डील: 2 बुर्का वाली पर भी हो रही जाँच

कर्नाटक के मंगलुरु में हिंदू कार्यकर्ता सुहास शेट्टी की हत्या मामले में पुलिस ने 8 लोगों को गिरफ्तार किया है। सुहास शेट्टी की हत्या अब्दुल सफवान गैंग ने की थी। हत्या की पहले से पूरीसाजिश रची गई थी और इसके ;लिए ₹5 लाख की फिरौती भी ली गई थी।

कर्नाटक के मंगलुरु में 3 मई 2025 को राज्य के गृह मंत्री डॉ जी परमेश्वरा ने प्रेस वार्ता करते हुए इस पूरे मामले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सभी आरोपितों को मंगलुरु जिले के विभिन्न क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया है। इनसे अभी पूछताछ की जा रही है।

पुलिस कमिश्वर अनुपम अग्रवाल ने बताया है कि हत्या की साजिश को 8 लोगों के ग्रुप ने मिलकर अंजाम दिया था। इनमें मुख्य आरोपित शांतिगुड्डे निवासी अब्दुल सफ़वान है, जो कि पेशे से ड्राइवर है। इसके साथ मोहम्मद मुजामिल जो कि सऊदी अरब में सेल्समैन की नौकरी करती है। इसकी चार महीने पहले ही शादी हुई थी।

हत्या में शामिल इसी का साथी जोकाटे निवासी मोहम्मद रिजवान भी सऊदी अरब में नौकरी करता है। इनके अलावा कुरसुगुड्डे निवासी कलंधर शफी, रंजीत नागराज और मृतक फासिल के भाई आदिल महरूफ भी हत्या में शामिल हैं।

पुलिस कमिश्नर ने आगे बताया कि सुहास की मौत की साजिश अब्दुल सफ़वान ने रची थी। उन्होंने बताया है कि अब्दुल पर साल 2023 में हमला किया गया था। इसी के बाद से उसने बदला लेने की ठान ली थी। इसकी प्लानिंग करते हुए उसने अपने साथी आदिल महरूफ को भी जोड़ लिया, जो कि मृतक फाज़िल का भाई था।

सुहास को मारने के लिए ₹5 लाख रुपये में डील की गई थी। इसके लिए ₹3 लाख रुपये पहले ही दे दिए गए थे। इसके अलावा सुहास की हत्या हत्या फाजिल की मौत का बदला लेने के मंसूबे से की गई थी। पुलिस कमिश्वर ने बताया कि सफवान और आदिल महरूफ के इरादे मिलते-जुलते थे। दोनों को बदला लेना था। इसलिए उन्होंने साथ मिलकर काम किया और हत्या की।

हत्या का वायरल वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस संबंध में पुलिस कमिश्वर ने कहा है कि वीडियो में दिख रही दो बुर्का पहनी महिलाएँ एक आरोपित की रिश्तेदार हैं। उन्हें भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जाएगी।

गौरतलब है कि 1 मई 2025 को हिंदू कार्यकर्ता सुहास शेट्टी की हत्या कर दी गई थी। यह हत्यारे स्विफ्ट गाड़ी और पिकअप में बैठकर आए थे। उन्होंने सुहास शेट्टी के ऊपर तलवारों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया था। इसके बाद भी बदमाश उन पर जानलेवा हमला करते रहे। इस हत्या के बाद हिन्दू संगठनों ने मंगलुरु में प्रदर्शन किया था।

भाजपा ने सुहास शेट्टी के परिवार को ₹25 लाख की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस सरकार पर आरोप लगाया है कि वह हिन्दुओं के साथ हत्या के बाद खड़ी नहीं होती।

पाकिस्तानियों से निकाह क्यों कर रहीं भारत की मुस्लिम महिलाएँ? जानिए कैसे इससे देश की सुरक्षा को है खतरा, लाड़ली बहना जैसी योजनाओं का भी उठा रहीं लाभ

जम्मू-कश्मीर में 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में पाकिस्तान समर्थित इस्लामी आतंकवादियों ने धर्म पूछ-पूछकर 28 पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी, जिससे पूरे देश में शोक की लहर फैल गई। इस जघन्य हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाए।

इनमें द्विपक्षीय राजनयिक संबंधों में कटौती, पाकिस्तान से जुड़े यूट्यूब चैनलों पर प्रतिबंध, और सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित करने का फैसला शामिल है। इन कार्रवाइयों के जवाब में पाकिस्तान ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप 1972 के शिमला समझौते पर पुनर्विचार करने की घोषणा की।

भारत सरकार ने देश में रह रहे पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भारत छोड़ने का नोटिस जारी किया है। इस आदेश के तहत SAARC वीजा धारक पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भारत छोड़ने की अंतिम तिथि शनिवार (26 अप्रैल, 2025) तय की गई, जबकि मेडिकल वीजा पर आए लोगों को मंगलवार  (29 अप्रैल, 2025) तक प्रस्थान करना अनिवार्य किया गया।

नोटिस में प्रस्थान के लिए कुल 12 वीज़ा श्रेणियों को शामिल किया गया है, जिनमें आगमन पर वीज़ा, व्यवसाय, फिल्म, पत्रकार, पारगमन, सम्मेलन, पर्वतारोहण, छात्र, आगंतुक, समूह पर्यटक, तीर्थयात्री और समूह तीर्थयात्री वीज़ा शामिल हैं।

4 अप्रैल से लागू हुए नए आव्रजन और विदेशी अधिनियम 2025 के तहत, भारत में निर्धारित समय से अधिक ठहरने, वीजा शर्तों का उल्लंघन करने या प्रतिबंधित क्षेत्रों में अवैध रूप से प्रवेश करने पर तीन साल तक की जेल और 3 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

ये प्रावधान सभी पाकिस्तानी नागरिकों के विषय में लागू होंगे। इस कदम का खास विरोध उन मुस्लिम महिलाओं की ओर से सामने आया है, जो खुद को ‘आधी पाकिस्तानी’ बताती हैं—वे महिलाएँ जो पाकिस्तानी पुरुषों से विवाहित हैं। सीमा सील किए जाने और निष्कासन आदेशों के बीच कई ऐसी महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया है।

भारतीय पासपोर्ट धारक महिलाओं को पाकिस्तान प्रशासन द्वारा देश में प्रवेश से रोका जा रहा है, विशेषकर वे महिलाएँ जो पाकिस्तानी पुरुषों से विवाहित हैं। ऐसे मामलों में विवाह के तुरंत बाद महिलाएँ पाकिस्तानी पासपोर्ट के लिए पात्र नहीं होतीं, आमतौर पर उन्हें नागरिकता के लिए नौ साल तक इंतजार करना पड़ता है।

हालांकि, कई महिलाओं ने दावा किया है कि उनके नागरिकता आवेदन पिछले दस वर्षों से लंबित हैं। अटारी-वाघा सीमा पर जारी तनाव और विरोध के बीच अधिकांश महिलाओं ने अपने बच्चों, जो पाकिस्तानी पासपोर्ट रखते हैं, उन्हें अपनी ग़ैर-मौजूदगी में पाकिस्तान भेजने से इनकार कर दिया है।

24 अप्रैल से शुरू हुए चार दिनों के भीतर कम से कम 537 पाकिस्तानी नागरिक जिनमें नौ राजनयिक अधिकारी शामिल है, भारत से अटारी-वाघा सीमा के ज़रिए रवाना हुए। इसी अवधि में 850 भारतीय नागरिक पाकिस्तान से भारत लौटे, जिनमें 14 राजनयिक अधिकारी शामिल थे।

अधिकारियों ने बताया कि कुछ पाकिस्तानी नागरिक भारत से हवाई मार्ग से भी निकले होंगे, हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच सीधा हवाई संपर्क नहीं है, इसलिए वे संभवतः किसी तीसरे देश से होते हुए गए।

हैरान नेटिज़न्स ने अपना गुस्सा निकाला

सोशल मीडिया पर हैरान और नाराज़ नेटिज़न्स ने पाकिस्तानी नागरिकों से भारतीय महिलाओं की शादियों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भारतीय कानून भले ही ऐसी अंतरराष्ट्रीय शादियों पर रोक नहीं लगाता, लेकिन इनकी बढ़ती संख्या ने लोगों को चिंतित कर दिया है। कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने उन मामलों को उजागर किया है।

जिनमें भारतीय महिलाओं ने पाकिस्तानी पुरुषों से विवाह के बाद भारत में बच्चों को जन्म दिया। इस पर आशंका जताई गई है कि ऐसे संबंधों से न केवल करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग हो सकता है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा बन सकता है।

लेखिका और स्तंभकार नीना राय ने 1990 के दशक के उग्रवाद के दौरान कश्मीरी महिलाओं द्वारा पाकिस्तानी बच्चों को गर्व से स्वीकारने की प्रवृत्ति को उजागर किया है। उन्होंने सरकार से ऐसी गतिविधियों का कड़ा विरोध करने और इससे जुड़ी महिलाओं की भारतीय नागरिकता रद्द करने की मांग की। नीना राय ने कहा कि “किसी भी दुश्मन देश के बच्चे को तुरंत पाकिस्तान भेजा जाना चाहिए,” और शरिया कानून का हवाला देते हुए कहा कि “बच्चे पिता के होते हैं, माँ के नहीं।”

एक सोशल मीडिया यूज़र ने दावा किया कि “पाकिस्तान में विवाहित एक विशेष समुदाय की महिलाओं की लंबी कतार है, और इस पर सवाल उठाया कि क्या ये महिलाएं वास्तव में भारत में अपने पतियों को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं, या फिर वे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों द्वारा किसी बड़े मकसद के तहत हेरफेर की जा रही हैं।

एक व्यक्ति ने “लिबरल इंडियन स्टेट” की आलोचना करते हुए तंज कसा कि यह न केवल इन महिलाओं को भारतीय राशन और अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का लाभ उठाने की अनुमति देता है, बल्कि उन्हें प्रजनन उद्देश्यों के लिए पाकिस्तान की यात्रा की सुविधा भी देता है।

TEDx वक्ता अनुराधा तिवारी ने पाकिस्तान में विवाहित भारतीय महिलाओं की बड़ी संख्या पर हैरानी जताई और इसे गहराई से चिंताजनक बताया। उन्होंने इस पर खासतौर से नाराज़गी जताई कि ये महिलाएँ भारत की अल्पसंख्यक योजनाओं और ‘लाडली बहना योजना’ जैसे सामाजिक लाभों की पात्र हैं। अनुराधा ने इसे ‘भारतीय करदाताओं के साथ शर्मनाक विश्वासघात’ करार दिया।

सुनंदा रॉय ने बताया कि कई पूर्व भारतीय महिलाएँ अब पाकिस्तानी पुरुषों से विवाहित हैं और भारत सरकार द्वारा उनके वीज़ा रद्द किए जाने पर दुख व्यक्त कर रही हैं। उन्होंने इन महिलाओं को देशद्रोही करार दिया, यह कहते हुए कि ये महिलाएं पाकिस्तान से प्रेम तो करती हैं, लेकिन भारत छोड़ने को तैयार नहीं हैं। सुनंदा रॉय ने इस निर्णय के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सराहना की।

एक अन्य नेटिजन ने तीन बच्चों की मां एक भारतीय महिला का मामला उठाया, जो पिछले एक दशक से एक पाकिस्तानी पुरुष से विवाहित है। उसने बताया कि महिला का पति अब उसकी कॉल्स का जवाब नहीं दे रहा है और उसके ससुराल वाले भी सीमा पार से बच्चों को लेने के लिए तैयार नहीं हैं। नेटिजन ने यह भी दावा किया कि इस दौरान महिला ने भारतीय पासपोर्ट का उपयोग कर मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं, राशन और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उठाया है।

पाकिस्तानी महिलाओं द्वारा भारतीय पुरुषों से विवाह करने को लेकर भी गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे ने बताया कि अब तक पाकिस्तान की 5 लाख से अधिक महिलाओं ने भारतीय पुरुषों से विवाह किया है, लेकिन इनमें से अधिकांश के पास भारतीय नागरिकता नहीं है। उन्होंने इन विवाहों के पीछे संभावित छिपे हुए उद्देश्यों की जांच की मांग की है।

23 अप्रैल को नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग के तीन सलाहकारों—जो रक्षा, सैन्य और विमानन से जुड़े थे—को भारत सरकार ने ‘अवांछित व्यक्ति’ घोषित कर एक सप्ताह के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया। उनके साथ, सहायक स्टाफ के पाँच अन्य सदस्यों को भी भारत छोड़ने के लिए कहा गया। जवाबी कार्रवाई में भारत के रक्षा अताशे ने भी इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग छोड़ दिया। हालांकि, यह “भारत छोड़ो” आदेश राजनयिक, आधिकारिक या दीर्घकालिक वीजा धारकों पर लागू नहीं था।

इस बीच, सुरक्षा पर कैबिनेट समिति (CCS) ने 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले—जिसमें 26 नागरिकों की जान गई—को लेकर यात्रा प्रतिबंधों का बचाव किया। समिति ने खुफिया रिपोर्टों का हवाला दिया, जिनमें हमले को पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क से जोड़ा गया है।

मजहबी और पारिवारिक संबंधों के चलते भारत-पाकिस्तान विवाहों का सिलसिला जारी

एक समय था जब पाकिस्तान और भारत एक ही राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में थे, जिसमें साझा संस्कृति और भाषा की विशेषता थी, भले ही इसके भीतर कई मुद्दे थे। हालाँकि, इस्लामवादियों और उनके ब्रिटिश सहायकों द्वारा किए गए विश्वासघात के कारण राष्ट्र का विभाजन हुआ।

इसके परिणामस्वरूप, कई मुसलमान पाकिस्तान चले गए जबकि हिंदू भारत आ गए। फिर भी, कई मुस्लिमों ने भारत में रहना चुना, जबकि उनके परिवार के सदस्य, दादा-दादी और करीबी दोस्त इस्लामी मुल्क पाकिस्तान में चले गए।

परिणामस्वरूप, परिवार अपने बच्चों के लिए मजहबी और सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखने के लिए विवाह की व्यवस्था करते हैं। यह विशेष रूप से हिंदू समुदाय में भी सच है, हालाँकि, इनके आँकड़े बहुत कम हैं, क्योंकि पाकिस्तान में उनकी घटती हुई आबादी लगातार पाकिस्तानी सरकार और देश की चरमपंथी आबादी के भयानक व्यवहार के कारण और भी सिकुड़ रही है। इसके अलावा, यह भी आम बात है कि एक-दूसरे से परिचित व्यक्तियों के बीच विवाह होते हैं।

मौलाना तहज़ीब के अनुसार, भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन के बावजूद पारिवारिक संबंध अब भी कायम हैं। कई परिवारों के कुछ सदस्य, जैसे मामा-मामी, पाकिस्तान चले गए, जबकि अन्य भारत में ही रह गए। पारिवारिक समारोहों के दौरान जब ये रिश्तेदार एकत्र होते हैं, तो नए संबंध बनते हैं और कई बार ये मेल-जोल शादियों में परिवर्तित होते हैं। दोनों देशों के मुस्लिमों के बीच साझा सांस्कृतिक, भाषाई और खाद्य परंपराएँ इन संबंधों को और भी सुगम बनाती हैं।

मौलाना तहज़ीब ने बताया कि कई लोग शादी समारोह में भाग लेने के लिए वीजा पर भारत आते हैं और फिर पाकिस्तान लौट जाते हैं। कभी-कभी बारात नहीं आ पाती, तो ऐसे मामलों में ऑनलाइन निकाह (इस्लामिक विवाह समारोह) आयोजित किया जाता है। निकाह के बाद दुल्हन को उसके ससुराल भेज दिया जाता है, चाहे वह पाकिस्तान में हो या भारत में।

रांची के एक मुस्लिम बुद्धिजीवी ने टिप्पणी की कि भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाली शादियों की प्रेरणा ऐतिहासिक पहचान और पारिवारिक संबंधों में निहित होती है। ये विवाह अक्सर उन परिवारों के बीच होते हैं जो भारत के विभाजन के बाद अलग हो गए थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हैदराबाद में होने वाली कुछ शेख शादियों, जिनमें बेटियों के बदले धन का आदान-प्रदान होता है, के विपरीत भारत-पाकिस्तान के बीच ये शादियाँ मूलतः पारिवारिक और भावनात्मक जुड़ाव पर आधारित होती हैं।

उन्होंने कहा, “अगर मैं अपने बारे में बात करूँ तो मैं राँची में रहता हूँ और कराची से मेरा कोई संबंध नहीं है, इसलिए मैं यह नहीं समझ पाता कि कोई अपने परिवार की बेटी को वहाँ क्यों भेजे या उस इलाके से लड़की क्यों लाए। इस तरह के रिश्ते आमतौर पर सीमावर्ती इलाकों में अधिक देखे जाते हैं।”

पाकिस्तान की महिलाएँ, विशेष रूप से अमरकोट और चाचरो क्षेत्रों से, राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में विवाह बंधन में बँधी हैं। राजपूत, चारण और मेघवाल मुस्लिम समुदायों की बड़ी संख्या में पाकिस्तानी महिलाएँ विवाह के बाद भारत में आकर बस गई हैं। राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर जिलों में भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से पारिवारिक विवाह संबंध बने हुए हैं। कई पाकिस्तानी परिवार अपनी बेटियों की शादी तय करने भारत आते हैं, जबकि कुछ भारतीय परिवार बारात लेकर पाकिस्तान जाते हैं।

सरकारी नियमों के अनुसार, भारत और पाकिस्तान के नागरिकों के बीच विवाह के लिए अलग से अनुमति लेना आवश्यक नहीं है। हालाँकि, वीज़ा प्राप्त करने, भारत में निवास स्थापित करने और नागरिकता में परिवर्तन के लिए सरकारी स्वीकृति अनिवार्य है। साथ ही, सुरक्षा जांच के लिए भी संबंधित सरकारी एजेंसियों की अनुमति आवश्यक होती है।

क्या पाकिस्तानी नागरिक भारत की स्वास्थ्य सेवाओं का अनुचित लाभ उठा रहे हैं?

यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि सीमावर्ती देश पाकिस्तान के नागरिक चिकित्सा समस्याओं के समाधान के लिए नियमित रूप से भारत आते हैं। भारत ने दशकों से मानवीय आधार पर पाकिस्तानी नागरिकों को आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्रदान की है। गंभीर और आवश्यक उपचारों के मामलों में भारत सरकार ने वीज़ा प्रक्रिया को तेज़ किया है। अब तक हज़ारों पाकिस्तानी नागरिकों को केवल मानवीय कारणों से भारत में प्रवेश की अनुमति दी गई है, जिनमें ओपन हार्ट सर्जरी, कैंसर का इलाज और अंग प्रत्यारोपण जैसी जटिल चिकित्सा सेवाएँ शामिल हैं।

भारत ने अक्सर वीज़ा नियमों को ढीला किया और दस्तावेज़ी आवश्यकताओं को सरल बनाया, यहाँ तक कि भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के दौरान भी कई मुद्दों को नजरअंदाज़ करते हुए मानवीय आधार पर निर्णय लिए। भारतीय अस्पतालों ने पाकिस्तानी मरीजों को कई बार नि:शुल्क चिकित्सा सेवाएँ प्रदान कीं। व्यापक सुरक्षा उपायों के बावजूद, भारत ने बार-बार मानवीय कारणों से उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है। तत्काल मामलों—जैसे वीज़ा विस्तार, अनुवर्ती सर्जरी, या दूसरी चिकित्सकीय राय के लिए अनुमति—को विशेष प्राथमिकता दी जाती रही है।

चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में भारत की बढ़ती अपील इस तथ्य से स्पष्ट होती है कि हर साल अधिक से अधिक लोग देश की यात्रा करते हैं। दुनिया भर के मरीज भारत में उपलब्ध अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, उच्च योग्य चिकित्सा पेशेवरों और किफायती उपचार के अनूठे संयोजन को पहचानते हैं और इसकी सराहना करते हैं। भारत के चिकित्सा पर्यटन क्षेत्र ने पिछले वर्ष लगभग 7.3 मिलियन अंतरराष्ट्रीय रोगियों को आकर्षित किया, जिससे इस क्षेत्र का बाज़ार मूल्य 7.69 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया।

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मान्यता दोनों ने भारत में स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता के बारे में चिकित्सा पर्यटकों के बीच विश्वास बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के पड़ोसी देश इस स्थिति से भली-भांति परिचित हैं, और इसके कारण कई लोग अपने देशों में स्वास्थ्य सेवा की खराब स्थिति को देखते हुए चिकित्सा सहायता लेने के लिए भारत आते हैं। इस अवसर का लाभ कई पाकिस्तानी मरीजों ने भी उठाया है।

2022 में, सिंध की 13 वर्षीय लड़की अफशीन गुल को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में रीढ़ की सर्जरी के लिए भर्ती कराया गया था। इस उपचार के बाद, वह अपने जीवन में पहली बार खुद चलने, बोलने और खाने में सक्षम हो गई। इसी तरह, 2015 में, जफर अहमद लाली (57) को मुंबई के एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट में एक उच्च जोखिम वाले हृदय ऑपरेशन के लिए भारत लाया गया था। सर्जनों ने कई जटिलताओं और खराब वाल्व के बावजूद सफलतापूर्वक सर्जरी पूरी की, और उसे जीवन की नई राह दी।

2003 में, नूर फातिमा नामक एक पाकिस्तानी बच्ची को भारत में निःशुल्क हृदय शल्य चिकित्सा के बाद नया जीवन मिला। इसके अलावा, 2017 में, तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक पाकिस्तानी व्यक्ति और उसके 3 वर्षीय बच्चे के लिए ओपन हार्ट सर्जरी और लिवर ट्रांसप्लांट के लिए तत्काल वीजा प्रदान किया था।

यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान में शादी करने वाली भारतीय महिलाएँ अक्सर अपने बच्चों को जन्म देने या चिकित्सा देखभाल प्राप्त करने के लिए अंततः भारत लौटती हैं, क्योंकि पाकिस्तान का स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचा और अन्य कई पहलू भारत से पीछे हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय वीज़ा, उनके परिवार और देश के भीतर रिश्तेदारों के समर्थन से प्रक्रिया उनके लिए सरल और सुलभ बन जाती है।

1990 का कश्मीर, जिसने घाटी को बदल दिया

बिजनेस वर्ल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद के दौरान कट्टरपंथियों ने इस्लामी आतंकवादियों को अपनी बेटियों और पत्नियों तक पहुँचा दी, और आतंकियों को नायक की तरह देखा गया। समाज के बड़े वर्ग ने, यहाँ तक कि पिता भी, अपनी बेटियों को आतंकवादियों के यौन उपयोग के लिए सौंपने में आपत्ति नहीं की। कई महिलाएँ इस बात पर गर्व करती थीं कि उनके पहले बच्चे के पिता कोई जिहादी थे। “पाकिस्तान जाएँगे, बच्चा लेके आएँगे” जैसे नारे आम थे।

बुरहान वानी को कश्मीरी घरों में खुला प्रवेश और महिलाओं के साथ मनचाहा व्यवहार करने की छूट थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके फोन से सैकड़ों महिलाओं की अश्लील तस्वीरें और संपर्क मिले।

नेटिज़न्स ने भारत-पाक विवाह की बढ़ती प्रवृत्ति और इसके पीछे की चिंताजनक सच्चाइयों को उजागर किया। 1990 के दशक में पाकिस्तान में हथियार प्रशिक्षण लेने गए कश्मीरी आतंकियों ने वहाँ की महिलाओं से विवाह किया। कई महिलाएँ 2010 के पुनर्वास कार्यक्रम के तहत नेपाल के रास्ते भारत लौटीं।

यासीन मलिक जैसे कुख्यात आतंकवादियों की पाकिस्तानी पत्नियाँ हैं। उनकी पत्नी मुशाल हुसैन मलिक पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की मानवाधिकार और महिला सशक्तिकरण की सलाहकार हैं। अदालतों ने इन विवाहों को देश के भीतर आंदोलन बताकर निर्वासन से छूट दी है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर गहरे सवाल उठते हैं।

निष्कर्ष

भारतीय महिलाएँ पाकिस्तान में विवाह के बाद भी भारत लौट सकती हैं और सभी सरकारी लाभों का उपयोग कर सकती हैं, क्योंकि वे कानूनी रूप से भारतीय नागरिक रहती हैं। वे अपने पाकिस्तानी बच्चों को भी साथ लाकर चिकित्सा सुविधाओं और अन्य लाभों का लाभ उठा सकती हैं। भारत में जन्म और चिकित्सा के लिए उनकी नियमित वापसी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, जब तक कि विशेष नीति नहीं बनाई जाती।

इन यात्राओं की निगरानी कठिन है। 2007 में क्रिकेट मैच देखने आए 32 पाकिस्तानी नागरिकों में से 28 अब भी लापता हैं, जिन्होंने ईपीआर वीजा का दुरुपयोग किया। केवल चार को ही वापस भेजा जा सका। इसी तरह, खुफिया ब्यूरो ने दिल्ली पुलिस को 5,000 पाकिस्तानी नागरिकों की सूची दी है जिन्हें भारत छोड़ने का आदेश मिला है।

भारत-पाक विवाहों का इस्तेमाल पाकिस्तान द्वारा रणनीतिक रूप से भारत-विरोधी एजेंडे, जैसे कि मुशाल हुसैन मलिक के भारत-विरोधी प्रचार, के लिए किया जा सकता है। यह मुद्दा भविष्य में गंभीर सुरक्षा चुनौती बन सकता है।

मूलतः ये रेपोर्ट हमारे यह ऑपइंडिया की इंग्लिश टीम की रुक्मा राठौर जी ने बनाया है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पे क्लिक करे।

हिन्दू कार्यकर्ता सुहास शेट्टी की हत्या के पीछे कर्नाटक का सफ़वान गैंग: रिपोर्ट; मुख्य आरोपित समेत 8 गिरफ्तार, तलवार से काटकर मार डाला था

कर्नाटक के मंगलुरु में हिन्दू कार्यकर्ता सुहास शेट्टी की हत्या मामले में पुलिस ने 8 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने मुख्य आरोपित को भी गिरफ्तार कर लिया है। सभी की पहचान अभी सामने नहीं आई है। पुलिस इनसे हत्या के विषय में पूछताछ कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने यह गिरफ्तारियाँ शुक्रवार (2 मई, 2025) को की हैं। उनके विषय में पुलिस शनिवार (3 मई, 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी और बताएगी कि हत्यारों के नाम क्या हैं और उनका सुहास की हत्या के पीछे क्या उद्देश्य था। घटना के बाद कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वरा भी मंगलुरु पहुँचे हैं।

एशियानेट की एक खबर के अनुसार, सुहास शेट्टी पर हमला करने वाले गैंग का सरगना सफवान है। यह भी बताया गया है कि सफवान का सुहास शेट्टी के एक दोस्त से पहले से विवाद था। इसी को लेकर हमला किया गया। हालाँकि, अभी कोई ऐसी जानकारी आधिकारिक तौर पर बाहर नहीं आई है।

सुहास की हत्या गुरुवार (1 मई, 2025) को मंगलुरु के बाजपे थाना क्षेत्र में हुई थी। पुलिस ने बताया है कि सुहास शेट्टी गुरुवार रात एक गाड़ी से रात को कुछ दोस्तों के साथ निकले हुए थे। रात करीब 8:30 बजे उन्हें किनिपाडावु पेट्रोल पम्प के पास एक दूसरी स्विफ्ट गाड़ी और एक पिकअप में भर कर आए गुंडों ने घेर लिया।

इसके बाद उन्होंने सुहास शेट्टी के ऊपर तलवारों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया। सुहास शेट्टी इस दौरान सड़क पर गिर गए। उन पर लगातार जानलेवा हमले यह हत्यारे करते रहे। इसके कथित वीडियो भी सामने आए हैं, इसमें दिखता है कि एक को सड़क पर गिरा कर उस पर हमले हो रहे हैं और आसपास बड़ी भीड़ जमा है।

यह घटना गुरुवार (1 मई, 2025) को मंगलुरु के बाजपे थाना क्षेत्र में हुई। पुलिस ने बताया है कि सुहास शेट्टी गुरुवार रात एक गाड़ी से रात को कुछ दोस्तों के साथ निकले हुए थे। रात करीब 8:30 बजे उन्हें किनिपाडावु पेट्रोल पम्प के पास एक दूसरी स्विफ्ट गाड़ी और एक पिकअप में भर कर आए गुंडों ने घेर लिया। बताया गया कि उनकी गाड़ी इसी बीच एक जगह टकरा गई।

सुहास शेट्टी के परिवार से कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेन्द्र और नेता प्रतिपक्ष R अशोक ने भी मुलाक़ात की। भाजपा ने सुहास शेट्टी के परिवार को ₹25 लाख की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस सरकार पर आरोप लगाया है कि वह हिन्दुओं के साथ हत्या के बाद खड़ी नहीं होती।

सुहास शेट्टी की हत्या ने 2022 में हुई प्रवीण नेट्टारु की हत्या की दुखद यादें ताजा कर दी हैं। गौरतलब है कि 26 जुलाई 2022 को दक्षिण कन्नड़ जिले में इस्लामी आतंकियों ने भाजपा नेता प्रवीण नेट्टारू को कुल्हाड़ी से उस वक़्त काट दिया था, जब वे दुकान बंद कर अपने घर जा रहे थे। 

नेट्टारू की हत्या PFI के आतंकियों ने की थी। इस मामले में अब तक 19 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। PFI ने अपना डर बनाने के लिए यह हत्या करवाई थी। प्रवीण नेट्टारू को भी सुहास शेट्टी की तरह घेर कर मारा गया था। सुहास शेट्टी मामले में भी शक की सुई कट्टरपंथियों की तरफ ही है।

उस्मान ने किया रेप तो सहम गई नैनीताल की हिन्दू पीड़िता, स्कूल छोड़ा-TC तक कटवाई: धामी सरकार उठाएगी काउंसलिंग और पढ़ाई की जिम्मेदारी

नैनीताल रेप केस के मामले में हिन्दू नाबालिग पीड़िता को आरोपित उस्मान ने डराया-धमकाया था। पीड़िता इस कदर सहम गई थी कि उसने स्कूल तक से अपना नाम कटवा लिया। वह स्कूल वापस जाने से भी डर रही थी। यह सारे खुलासे पुलिस की जाँच में हुए हैं।

अमर उजाला की एक रिपोर्ट के अनुसार, घटना के बाद जब बच्ची घर आई तो वह लड़खड़ा रही थी। जब उसकी बहन ने कारण पूछा तो पीड़ित बच्ची ने कुछ नहीं बाताया। उसके बाद से ही वह गुमसुम रहने लगी थी। पीड़ित बच्ची की हालत देखकर उसकी बहन भी परेशान हो गई थी।

बताया गया है कि इसके बाद बच्ची ने अपनी नानी को घर पर बुलाया और कभी भी स्कूल न जाने की बात कही। जब उसकी नानी ने कारण पूछा तो बच्ची ने कुछ नहीं बताया। पीड़ित बच्ची दुष्कर्म की घटना से वह इतना डर गई थी कि घर पर ही चुपचाप रहने लगी थी। यहाँ तक कि इसके बाद उसने नानी से कह कर स्कूल से भी नाम कटा लिया और टीसी भी मँगवा ली।

अब पीड़िता के परिवार को पुलिस सुरक्षा में रखा गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ित के परिजनों से बात की है। उनकी हर संभव मदद करने की बात भी कही है। सीएम ने दोनों बच्चियों की शिक्षा का खर्च सरकार की ओर से उठाए जाने का भी आश्वासन दिया है।

वहीं पीड़ित बच्ची को सामान्य करने के लिए उसकी काउंसलिंग भी की जा रही है। उसके परिवार को भी सामान्य करने के लिए दो काउंसलर्स से लागातार बात करवाई जा रही है। दुष्कर्म पीड़िता को राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से आर्थिक मदद दी जाएगी।

धामी सरकार ने यह भी फैसला लिया है कि स्पॉन्सरशिप योजना के तहत पीड़ित बच्ची को हर माह चार हजार रुपये मिलेंगे। इसके अलावा समाज कल्याण विभाग की योजना से भी परिवार को भी आर्थिक सहायता देने की प्रक्रिया शुरू की गई है। 

गौरलतब है कि नैनीताल के मल्लीताल इलाके में बुधवार (30 अप्रैल 2025) को एक रेप की घटना सामने आई थी। ठेकेदारी करने वाले बुजुर्ग उस्मान ने 12 वर्षीय हिन्दू बच्ची के साथ कार में रेप किया था। उसने बच्ची को डराया धमकाया था।

पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था और इसके बाद उसके घर पर बुल्डोजर चलाने का नोटिस नगर पालिका ने दिया था। हालाँकि, इस मामले में हाई कोर्ट ने उस्मान का घर गिराए जाने पर रोक लगा दी थी। उस्मान के वकील डॉ. कार्तिकेय हरि गुप्ता ने हाई कोर्ट में इस नोटिस को चुनौती दी थी। इस पर नगर पालिका ने अपनी गलती मानते हुए नोटिस वापस ले लिया।

एक चौथाई जातियाँ ही ले रहीं 97% आरक्षण का मजा… क्या है रोहिणी आयोग, जाति जनगणना के बाद जिसकी सिफारिशें लागू होने के चर्चे: ये होगा असर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी है। राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने शुक्रवार (30 अप्रैल, 2025) को इसकी मंज़ूरी दी है। इसके बाद जनगणना को लेकर नई नई अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। साथ ही एक बार फिर रोहिणी आयोग की चर्चा सुर्खियों में है। इसके सुझावों और सिफारिशों पर चर्चा चल रही है, जिन्हें जनगणना के बाद लागू किया जा सकता है।

रोहिणी आयोग पर हम विस्तार से बात करेंगे पर उससे पहले आपको ये बताते हैं कि भारत में जातिगत जनगणना कितनी बार और कब-कब हुई। आपको जानकर हैरत होगी कि असल में जातिगत जनगणना सबसे पहले ब्रिटिश जमाने में हुई और आखिरी बार भी। स्वतंत्रता के बाद से अब तक में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना सर्वेक्षण किया जाएगा।

पहली बार कब हुई जाति जनगणना

भारत में पहली बार जनगणना ब्रिटिश शासन काल में सन 1881 में हुई थी। उस समय भारत की कुल जनसंख्या 25.38 करोड़ थी। तब से प्रति 10 वर्षों पर भारत में जनगणना हो रही है। सन 1901 में पहली बार जनगणना को पेशे और वर्ण के आधार पर जातियों को बाँटा गया। इस में कुल 1642 जातियाँ दर्ज हुईं। स्वतंत्रता से पहले अंतिम बार 1931 में जातिगत जनसंख्या सर्वेक्षण हुआ जिसमें 4147 जातियाँ दर्ज हुईं।

इसके बाद 1941 में जातिगत जनगणना तो हुई मगर उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। इस वजह से जनगणना के जुटाए गए आँकड़े पूरे नहीं हो पाए और अंततः सार्वजनिक नहीं किए गए।

स्वतंत्रता के बाद भारत में 1951 में पहली बार जनगणना हुई। सरकार ने तय किया कि जाति के हिसाब से सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आँकड़े जुटाए जाएँगे। यह फैसला राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रख कर लिया गया था।

1991 में सभी राज्यों को आदर बैकवर्ड कास्ट (OBC) की सूची तैयार करने के लिए सर्वेक्षण करने की अनुमति दी गई। ऐसा जातियों को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए किया गया था, लेकिन तब भी राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना नहीं हुई।

भारत में आखिरी बार जनगणना 2011 में हुई थी। उसके बाद 2021 में जनगणना की जानी थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते वह नहीं हुई। तब भी विपक्ष में जातिगत जनगणना की बात उठ रही थी। उस समय सत्ता पक्ष में रहे भाजपा और RSS जातिगत जनगणना के विरोध में थे।

यहाँ तक कि 2011 में जब राष्ट्रीय जनगणना हुई तो जातिगत जनगणना करवाने के वादे से कॉन्ग्रेस सरकार साफ-साफ मुकर गई। उस समय कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ मंत्रियों प्रणब मुखर्जी और P चिदंबरम ने डॉ मनमोहन सिंह की सरकार को जातिगत जनगणना करने से रोक दिया। हालाँकि, बाद में OBC और दलित नेताओं का दबाव बढ़ा तो दिखाने भर के लिए मनमोहन सरकार ने 2012-13 के बीच एक जातिवाद सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण करवाया था। यह राष्ट्रीय जनगणना का हिस्सा नहीं था और इसकी रिपोर्ट भी आज तक सार्वजनिक नहीं हुई।

ये बात और है कि 2 अक्तूबर, 2023 को बिहार की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट सामने आई तो कॉन्ग्रेस के सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी की तरफ से एक बार फिर ऐलान कर दिया था कि सरकार में आते ही राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की जाएगी।

ना से हाँ तक

कुछ समय पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि वह सिर्फ चार जातियों को मानते हैं और वह हैं- गरीब, युवा, महिला और किसान। RSS के संचालक भी हमेशा से कहते रहे हैं कि वह सभी को हिंदू मानते हैं। जातिगत जनगणना का विचार गलत है। संसद में भी सरकार ने कहा था कि जातिगत जनगणना करने से समाज में जातिवाद फैलेगा। इसके बाद 30 अप्रैल, 2025 को मोदी सरकार ने अचानक जातिगत जनगणना करने की घोषणा कर दी। 1931 के बाद अब पहली बार राष्ट्रीय जनगणना के साथ लोगों की जातिगत जनगणना भी होगी।

जातिगत जनगणना की इस घोषणा के बाद से राजनीतिक बहस तो तेज हो ही रही है, क्योंकि इससे आगामी चुनाव के समीकरणों और रणनीतियों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही यह सर्वेक्षण आरक्षण, संसाधनों के वितरण और सामाजिक नीतियों की दिशा भी बदल सकता है।

क्यों हो रही ‘रोहिणी आयोग’ की चर्चा

अब आते हैं रोहिणी आयोग पर। 2023 में बिहार में जातिगत जनगणना की गई। उसके आँकड़े सार्वजनिक होने से पहले मोदी सरकार ने कालेलकर आयोग और मंडल आयोग की तर्ज पर रोहिणी आयोग का गठन किया था।

2 अक्तूबर, 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट की रिटायर्ड चीफ जज जस्टिस G रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था। भारत के संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत इस आयोग का गठन हुआ जिसका काम अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का उप-वर्गीकरण करना था। इसे ही रोहिणी आयोग के रूप में जाना जाता है। आइए, पहले जानते हैं कि ये आयोग कैसे और क्यों बनता है।

भारत के संविधान में अनुच्छेद 340 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों में सुधार की ज़रूरत पर जाँच के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान है। इसके तहत राष्ट्रपति भारत के पिछड़े वर्गों की स्थितियों और पृष्ठभूमि की जाँच के लिए एक आयोग नियुक्त करने का आदेश दे सकते हैं। इस अनुच्छेद के तहत 3 बार आयोग का गठन हो चुका है।

रोहिणी आयोग से पहले 1979 में मंडल कमीशन बनाया था। इस आयोग ने OBC वर्ग को आरक्षण देने की सिफारिश की थी। उनकी सिफारिश को 1980 से 1989 तक इंदिरा और राजीव गाँधी की सरकारों ने इसे अधर में रखा। 1990 में VP सिंह की सरकार ने इसे लागू किया।

और सबसे पहली बार अनुच्छेद 340 के तहत 1953 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा आयोग बनाया था। इस आयोग ने भी पिछड़ी जातियों पर अपनी रिपोर्ट सरकार को दी थी लेकिन नेहरू सरकार ने इस आयोग के सुझाव नहीं माने थे।

रोहिणी आयोग की सिफारिशें

2017 में रोहिणी आयोग बनने के बाद आयोग का कार्यकाल 13 बार बढ़ाया गया। आखिरकार 31 जुलाई, 2023 को आयोग ने अपनी 1100 पन्नों की रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष पेश की।

रोहिणी आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में OBC की 2633 जातियाँ हैं। 983 जातियों यानी लगभग 37% को अब तक आरक्षण का लाभ नहीं मिला है।

2018 में आयोग ने पाँच साल में केंद्र सरकार की ओर से OBC कोटे में दी गई 1.30 लाख सरकारी नौकरियों और तीन साल में IIT और IIM जैसे संस्थानों के प्रवेश के आँकड़ों का अध्ययन किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आयोग की रिपोर्ट में ये आँकड़ा सामने आया कि नौकरियों और शिक्षा में 97% ओबीसी आरक्षण का लाभ सिर्फ 25% ओबीसी जातियाँ ही उठा रही हैं। शेष 75 प्रतिशत जातियों की भागीदारी सिर्फ 3% ही है। 983 ओबीसी जातियों की हिस्सेदारी शून्य है।

कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि रोहिणी आयोग ने ओबीसी की 3000 जातियों को 4 वर्गों में विभाजित करने का सुझाव दिया है। इन वर्गों में आरक्षण का पूरा लाभ, अधूरा लाभ, बिल्कुल लाभ न ले पाने वाली और बिल्कुल अक्षम जातियों का वर्ग तैयार हो सकता है। इन्हें 10%, 5%, 8% और जो भी डाटा इस आयोग की सिफारिश के साथ होगा, उन्हें मिल जाएगा।

रोहिणी आयोग की सिफारिशों को अगर लागू किया जाए तो कई ताकतवर OBC जातियों का कोटा कम हो जाएगा। इसके अलावा जिन जातियों को आरक्षण का लाभ अभी तक नहीं मिला या बहुत कम मिला है, उनका कोटा बढ़ जाएगा।

लागू होने का क्या होगा असर

रोहिणी आयोग की सिफारिशें और जातिगत जनगणना के फायदा कई वंचित समूहों को मिल सकता है। आयोग कि रिपोर्ट से यह पता लगाया जा सकता है कि कौन सी जातियाँ शिक्षा, रोजगार, और स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे ज्यादा वंचित हैं। इससे कल्याणकारी योजनाओं को और प्रभावी बनाया जा सकता है।

आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने पर नए तरीके से आरक्षण नीतियों को लागू करना और संसाधनों का उचित तरह से वितरण करना आसान हो जाएगा।

इसके अलावा उन समुदायों की पहचान सामने आ सकेगी जो हमेशा से असमानता और हाशिए पर हैं। इससे सरकार को उनके मुद्दों पर काम करने का मौका मिलेगा। अगर किसी विशेष जाति में शिक्षा और आय का स्तर राष्ट्रीय औसत से भी कम है, तो उसमें सुधार लाया जा सकता है और नई नीतियां बनाई जा सकती हैं।

‘आरक्षण में आरक्षण’ को सुप्रीम कोर्ट ने भी माना सही

एक अगस्त 2024 को CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में 7 सदस्यों की बेंच ने 6-1 से निर्णय दिया कि राज्य SC-ST को मिलने वाले आरक्षण में भी ऐसी जातियों को ऊपर रख सकते हैं जो सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक पिछड़ गई हैं। SC-ST में भी क्रीमी लेयर पहचानी जाए और जिन जातियों को लाभ मिल चुका है उन्हें इससे बाहर किया जाए।

इस फैसले के बाद तेलंगाना सरकार ने 14 अप्रैल 2025 को राज्य में अनुसूचित जाति आरक्षण व्यवस्था में वर्गीकरण लागू कर दिया है। आरक्षण का लाभ ज़रूरतमंदों तक सही तरीके से पहुँचाने के लिए SC वर्ग के लिए पहले से मौजूद 15% आरक्षण को अब इन तीन समूहों में बाँट दिया गया है।

इसके तहत सबसे पिछड़े 15 समुदायों को 1% आरक्षण, मध्यम रूप से लाभान्वित 18 समुदायों को 9% आरक्षण और अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले 26 समुदाय को 5% आरक्षण दिया है।

राजनीति में क्या होंगी मुश्किलें?

रोहिणी आयोग की सिफारिशें राजनीतिक उठापटक लेकर आ सकती हैं। इसकी सिफारिशों को अगर मान लिया जाता है तो एक बड़ा OBC वोटर समूह कई वर्गों में बँट जाएगा।

आरक्षण को लेकर दशकों से ही कॉन्ग्रेस समेत देश भर की क्षेत्रीय पार्टियाँ OBC आरक्षण के नाम पर अपनी अपनी राजनीति कर रही हैं। फिर चाहे वो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (BSP), रालोद, अपना दल, सुभासपा हों या फिर बिहार में JDU, RJD, या फिर विकासशील इंसान पार्टी (VIP) और या फिर हरियाणा की इनेलो समेत अन्य जाट, पटेल इत्यादि।

सभी पार्टियाँ आरक्षण और उपजातियों के बँटवारे पर बिलबिलाती नजर आएंगी क्योंकि अब तक जनगणना में अलग कॉलम न होने का फायदा ये सभी आराम से उठाती आ रही हैं।