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जिस नक्सली ने की पूर्व CM बाबूलाल मरांडी के बेटे की हत्या, झारखंड में CRPF ने उसे उतारा मौत के घाट: SP समेत 20 लोगों के मर्डर में था अरविंद यादव का हाथ, पुलिस ने रखा था ₹25 लाख का इनाम

बोकारो मुठभेड़ में अरविंद यादव की मौत के झारखंड में अंतिम सांस ले रहे नक्सली संगठन को बड़ा झटका लगा है। झारखंड में 25 लाख रुपए के साथ बिहार सरकार ने भी उस पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था। बिहार और झारखंड के बॉर्डर वाले इलाकों में नक्सली संगठनों को मजबूत करने में पिछले 30 सालों में इसका अहम रोल था। झारखंड के बोकारो से लेकर जमुई, दुमका, डालटेनगंज, लखीसराय, बांका तक उसका राज था।

क्या था चिलखारी नरसंहार?

मुँगेर के एसपी केसी सुरेन्द्र बाबू, बीजेपी नेता बाबू लाल मरांडी के बेटे की हत्या समेत 85 मामले उस पर दर्ज थे। झारखंड के गिरिडीह में चिलखारी नरसंहार में अरविंद यादव शामिल था। बिहार झारखंड सीमा पर देवरी के चिलखरयोडीह में नक्सलियों का एक ग्रुप कार्यक्रम स्थल पर पहुँच कर मंच पर चढ़कर माइक से चेतावनी दी और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस हत्याकांड में बाबू लाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी समेत 20 लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी थी। मंच पर हर तरफ खून ही खून दिख रहा था। इस भयावह दृश्य को देख कर पुलिस वालों की भी रूह काँप गई थी।

झारखंड-बिहार-पश्चिम बंगाल में ठिकाना

बोलने में तेज तर्रार और पढ़ा-लिखा अरविंद यादव नए लोगों को संगठन से जोड़ता था। जमुई के सोनो प्रखंड के भेलवा मोहनपुर में 8 कमरों के घर में उसके माता-पिता और भाई-बहन आज भी रहते हैं। जानकारी के मुताबिक उसकी पत्नी मुँगेर में रहती है और बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

अरविंद यादव का पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भी घर है। इस घर में उसकी पत्नी पहले बच्चों के साथ रहती थी लेकिन अब मुँगेर चली गई है। अलग अलग ब्रांड की घड़ी पहनने का शौकीन अरविंद यादव को नक्सली संगठन का थिंक टैंक माना जाता है।

22 जनवरी को बाल-बाल बचा था अरविंद यादव

बताया जाता है कि अविनाश उर्फ अरविंद यादव की किस्मत ने 22 जनवरी 2025 को बचा लिया था। उस वक्त पुलिस मुठभेड़ बोकारो के ऊपर घाट इलाके में हुई थी। जानकारी के मुताबिक यहाँ से वो भेल्वाघाटी के रास्ते चकाई के बोगी बरमोरिया जंगल में भाग गया था। यहाँ से वह अपने घर मोहनपुर पहुँचा। पुलिस जब तक वहाँ तबिश देती उससे पहले वो बोकारो भाग गया। लेकिन 21 अप्रैल 2025 को सुरक्षाबलों को तब बड़ी सफलता मिली जब बोकारो के ललपनिया में पुलिस ने 8 नक्सलियों को मार गिराया। इसमें अरविंद यादव भी शामिल था।

खुद के मारे जाने की फैलाई थी अफवाह

करीब 4 साल पहले पुलिस मुठभेड़ में अरविंद यादव के मरने की खबर झारखंड से लेकर बंगाल तक फैल गयी थी। यहाँ तक कि उसके घर में श्राद्ध कर्म की तैयारी हो गयी थी। लेकिन पुलिस को इस खबर पर शक था। बाद में पता चला कि उसने जानबूझकर अपनी मौत की खबर उड़ाई थी ताकि पुलिस की नजर उस पर हट जाए।

ना एक दिन की वकालत, ना ही कानून की डिग्री… बन गए भारत के CJI: जानिए कौन थे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू, कॉन्ग्रेस सरकार के पक्ष में भी हुए थे खड़े

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणियों के बाद देश में न्यायिक प्रक्रिया पर चर्चाएँ जोर-शोर से चल रही हैं। निशिकांत दुबे इस बीच पीछे हटाने के मूड में नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व CJI के बारे में जिक्र किया है, जिनके पास कानून की कोई डिग्री नहीं थी।

उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर जस्टिस कैलाशनाथ वांचू के विषय में लिखा है। जस्टिस वांचू देश के 10वें CJI थे और उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान एक बड़ा फैसला भी सरकार के हक़ में दिया था।

कौन थे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू?

सुप्रीम कोर्ट के कामकाज और जजों के विषय में जानकारी देने वाली वेबसाIइट सुप्रीम कोर्ट आब्जर्वर के अनुसार, कैलाशनाथ वांचू का जन्म 1903 में मध्य प्रदेश में हुआ था। वह पढ़ाई में कुशाग्र थे और उन्होंने 1924 में तब नौकरशाही के लिए करवाई जाने वाली परीक्षा इंडियन सिविल सर्विसेज (ICS) पास की थी।

जस्टिस वांचू इसके बाद अपनी ट्रेनिंग के लिए इंग्लैंड गए थे। उन्होंने इंग्लैंड में 1926 तक ट्रेनिंग ली थी। उनकी शुरुआती तैनातियाँ कलेक्टर के तौर पर हुई थीं। उन्हें सबसे पहले उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) में तैनाती दी गई थी। 11 वर्षों तक वह इन्हीं पदों पर काम करते रहे थे। उन्हें 1937 में जिला स्तर के जज के तौर पर पहली तैनाती मिली थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी बने जज

जस्टिस वांचू जिला जज बनने के लगभग 10 वर्ष बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँच गए थे। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट बताती है कि जस्टिस वांचू को फरवरी, 1947 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में तैनाती मिली थी। वह इसके बाद 1951 तक इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम करते रहे थे।

जस्टिस वांचू को राजस्थान हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस भी बनाया गया था। उन्हें 1951 में राजस्थान हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना कर भेजा गया था। यहाँ उन्होंने 1958 तक अपनी सेवाएँ दी थीं। उन्हें इस दौरान और भी कई जगह पर जिम्मेदारियां दी गई थीं।

CJI कैसे बने जस्टिस वांचू?

राजस्थान हाई कोर्ट में 7 वर्ष काम करने के बाद जस्टिस कैलाशनाथ वांचू को सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया। उन्हें यहाँ 12 अप्रैल, 1967 को CJI बनाया गया था। इसके पीछे एक विशेष कारण था। बताया गया कि 1967 में तत्कालीन CJI जस्टिस K सुब्बाराव ने एकाएक इस्तीफ़ा दे दिया।

सुब्बाराव के इस्तीफे के पीछे का कारण उनका राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला था। हालाँकि, जस्टिस K सुब्बाराव यह चुनाव जाकिर हुसैन से हार गए थे। जस्टिस सुब्बाराव के इस्तीफे के चलते ही जस्टिस कैलाशनाथ वांचू को CJI बनाया गया था।

इसी के साथ वह पहले और अकेले ऐसे CJI बन गए थे, जिसके पास ना वकालत की डिग्री थी और ना ही वह वकील रहे थे। उनकी नियुक्ति का आधार उनका पहले का अनुभव था। वह निचली अदालत में भी जज इस आधार बनाए गए थे कि उनका आपराधिक कानूनों को लेकर ज्ञान अच्छा था। उन्होंने या ज्ञान ICS की ट्रेनिंग के दौरान हासिल किया था।

जस्टिस वांचू 10 महीने CJI के पद पर रहे थे। उनका कार्यकाल फरवरी, 1968 में खत्म हुआ था।

सरकार के पक्ष में भी हुए थे खड़े

जस्टिस वांचू ने कई महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई की थी। इनमें कई संवैधानिक मामले भी शामिल थे। इन्हीं में से एक मामला गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का था। इसे भारतीय संविधान और कानूनी इतिहास में महत्वपूर्ण मामला माना जाता था।

1967 में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संसद संविधान में दिए गए मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। यह सुनवाई जस्टिस सुब्बाराव की बेंच ने की थी। इसी बेंच में जस्टिस वांचू भी शामिल थे। उन्होंने इस फैसले से अपना मतभेद प्रकट किया था। जस्टिस वांचू की राय बाकी बेंच से लगा थी।

उनका मानना था कि संसद संविधान में देश के नागरिकों को दिए गए मूल अधिकारों में बदलाव कर सकती है। उनका यह कदम सरकार का पक्ष लेने वाला माना गया था। उनके इस कदम के कुछ ही दिनों बाद उन्हें CJI बनाया गया था।

उर्दू स्कूल के लिए मिली जमीन पर बनाई दुकानें, 20 साल तक वसूला लाखों का किराया: वक्फ संपत्ति घोटाला में सलीम, महमूद समेत 5 गिरफ्तार, गुजरात का मामला

अहमदाबाद में पाँच मुस्लिमों ने वक्फ बोर्ड की जमीन पर अवैध रूप से दुकानें खड़ी कर दीं। इसके बाद उन्होंने खुद को वक्फ का ट्रस्टी घोषित कर 2 दशक से उनका किराया वसूला। यह जमीन अहमदाबाद नगर निगम ने वक्फ बोर्ड को उर्दू स्कूलों के लिए दी थी लेकिन इन पर करोड़ों की दुकाने चल रही थीं। इस मामले में अब FIR दर्ज हुई है।

यह दुकानें अहमदाबाद के जमालपुर में थीं। यह मामला काँच वाली मस्जिद के पास स्थित वक्फ बोर्ड की भूमि से जुड़ा है। दरअसल, 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में यह स्कूल जर्जर हो गए थे और इन्हें तोड़ दिया गया था। इसके बाद यह जमीन खाली पड़ी थी।

इसी का फायदा उठाते हुए सलीम खान पठान नामक एक व्यक्ति ने उस जमीन पर 10 दुकानें बना लीं और उन्हें किराए पर उठा दिया। सलीम खान के साथ ही मोहम्मद यासर शेख, महमूद खान पठान, फैज मोहम्मद पीर मोहम्मद और शाहिद अहमद शेख ने ना केवल इन दुकानों से बल्कि वक्फ बोर्ड की लगभग 150 और संपत्तियों से भी पिछले 20 वर्षों से लगातार किराया वसूला।

यह सारा किराया वक्फ बोर्ड के आधिकारिक खाते में जमा होने के बजाय इन आरोपितों की निजी जेबों में जाता रहा, जिससे बोर्ड को करोड़ों रुपये का नुकसान भी झेलना पड़ा। इस व्यापक धोखाधड़ी की जानकारी वक्फ बोर्ड को तब हुई जब जमालपुर के एक रिक्शा चालक, मोहम्मद रफीक अंसारी ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई।

ऑपइंडिया से बातचीत में अंसारी ने बताया कि उन्होंने खुद गुजरात वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन लोखंडवाला को इस अवैध कब्जे की सूचना दी, लेकिन बोर्ड की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बाद में इस मामले की पुलिस में FIR दर्ज करवाई गई। पाँचों आरोपितों को इस मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। ऑपइंडिया के पास यह FIR कॉपी मौजूद है।

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा वक्फ बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों की देखरेख में आता है। ऐसे में उनकी कार्यशैली पर प्रश्न उठ रहे हैं। इससे जुड़े लोगों ने पूछा है कि वक्फ की इतनी बेशकीमती जमीन पर अवैध निर्माण कैसे हो गया और कुछ बाहरी लोगों ने स्वयं को ट्रस्टी बताकर इतने लंबे समय तक किराया कैसे वसूला।

शिकायतकर्ता अंसारी ने यह भी आशंका जताई है कि इस गोरखधंधे में वक्फ बोर्ड के कुछ अंदरूनी लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिसके कारण उनकी शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं हुई। अंसारी ने इस मामले में अहमदाबाद पुलिस की तत्परता की सराहना की है।

उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारियों, विशेष रूप से गोसाई साहब, ने उनकी शिकायत पर गंभीरता से ध्यान दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी है।

वक्फ कानून के लिए पीएम मोदी का धन्यवाद: अंसारी

ऑपइंडिया से बातचीत में शिकायतकर्ता ने हाल ही में लागू हुए नए वक्फ अधिनियम का पुरजोर समर्थन किया है। उनका मानना है कि इस नए कानून के प्रावधानों के तहत सलीम खान पठान जैसे लोगों के लिए वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जा करना और वक्फ बोर्ड के लिए ऐसी गतिविधियों पर आँख बंद करना अब संभव नहीं होगा। अंसारी ने इस कानून के लिए भाजपा सरकार की प्रशंसा भी की।

उन्होंने कहा, “गांधीनगर जाकर गुजरात वक्फ बोर्ड के चेयरमैन से शिकायत करने के बावजूद उन्होंने कुछ नहीं किया। अब अगर नए कानून आ गए तो कोई भी जबरदस्ती वक्फ की जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएगा। मैं इस कानून के लिए भाजपा सरकार की बहुत सराहना करता हूँ।”

इसके अलावा, शिकायतकर्ता को यह भी संदेह है कि सलीम खान पठान के साथ-साथ वक्फ बोर्ड के कुछ कथित ठेकेदार भी इस घोटाले में शामिल हो सकते हैं। इसीलिए वक्फ बोर्ड से शिकायत करने के बाद भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद पुलिस से संपर्क किया और अहमदाबाद पुलिस की तारीफ करते हुए कहा, “पुलिस अधिकारी गोसाई साहब और अहमदाबाद पुलिस ने मेरी काफी मदद की है और ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी की है।”

पहले कानून बनती तो नहीं होती गड़बड़ी

विडंबना है कि कुछ स्वार्थी तत्व वक्फ अधिनियम को लेकर मुस्लिमों को गुमराह कर रहे हैं और उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए उकसा रहे हैं। अहमदाबाद में सामने आया यह करोड़ों का घोटाला ऐसे ही लोगों के स्वार्थों को उजागर करता है। यदि नया वक्फ (संशोधन) अधिनियम पहले ही लागू हो गया होता, तो इस धोखाधड़ी का पर्दाफाश बहुत पहले हो गया होता।

यदि पहले यह संशोधन लागू कर दिया गया होता तो इन मुस्लिम ठेकेदारों की दुकानें बंद हो जातीं और करोड़ों की अवैध कमाई रुक जाती। यही कारण है कि वे इस नए कानून से नाराज हैं और इसे मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार का एक साधन बता रहे हैं। लेकिन, कानून का असल उद्देश्य यह है कि वक्फ की जमीनों का असल फायदा गरीब मुस्लिमों को मिले।

यदि नया कानून लागू हो जाता तो संपत्तियों के सर्वेक्षण और रजिस्ट्रार में बदलाव होता, राज्य और केंद्र में वक्फ बोर्ड की संरचना में बदलाव होता, पिछड़े वर्ग के मुसलमानों और महिलाओं को भी बोर्ड में सदस्यता दी जाती और वक्फ और भूमि नियंत्रण की प्रक्रिया से लेकर उसकी देखरेख और वक्फ ट्रिब्यूनल में बदलाव किए जाते।

अगर ऐसा होता तो इस तरह के घोटाले बंद हो जाते और वक्फ बोर्ड के नाम पर गरीब मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होता। केवल 5-7 अधिकारी ही वक्फ संपत्तियों का उपयोग बंद कर देते और बड़ी मुस्लिम आबादी को इसका सीधा लाभ मिलता।

कानून लागू होने के बाद जो लोग अवैध संपत्ति अर्जित कर रहे थे, वे रुक जाएँगे। इसीलिए आज वक्फ एक्ट का विरोध हो रहा है। ताकि वे दोनों हाथों से वक्फ संपत्तियों को लूट सकें और घोटाले करके अपनी जेबें भर सकें।

हकीकत यह है कि ऐसे लोग नए वक्फ कानून पर इसलिए आपत्ति जता रहे हैं क्योंकि यह उन्हें ऐसी सम्पत्तियाँ हड़पने से रोकेगा। उन्हें ना तो गरीब मुसलमानों की परवाह है और न ही उनके मजहब की संपत्तियों की। उनकी एकमात्र चिंता यह है कि यदि कानून लागू हुआ तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी।

अहमदाबाद की इस घटना का निष्कर्ष यह है कि जहाँ बहुत अधिक संपत्ति होगी, वहाँ केवल 5-7 लोग ही वक्फ की जमीनों पर शासन करेंगे और संपत्ति को अपने पास रख लेंगे। गरीब मुस्लिमों पर हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए सरकार ने वक्फ अधिनियम में संशोधन किया है।

‘PM मोदी एक महान नेता… उनसे सम्मान पाना बड़ी बात’ : प्रधानमंत्री से मिल खुश हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस; टैरिफ पर की बात, साझेदारी मजबूत करने के लिए ‘कॉम्पैक्ट’ लॉन्च

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहली बार भारत आए हैं। चार दिवसीय दौरे में उनके साथ पत्नी उषा चिलुकुरी और उनके तीनों बच्चे शामिल हैं। सोमवार को जेडी वेंस ने पीएम मोदी से मुलाकात की।

उन्होने एक्स पर लिखा, “पीएम मोदी से मिलना सम्मान की बात है। वो एक महान नेता हैं और मेरे परिवार से काफी विनम्रता से मिले। हमारी दोस्ती और सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए भारत और अमेरिका काम करते रहेंगे। भारत और अमेरिका व्यापार समझौते पर अच्छी प्रगति कर रहे हैं। भारत अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश कर रहा है और साथ ही ट्रम्प प्रशासन के साथ मजबूत संबंध बनाने की भी कोशिश कर रहा है।”

पीएमओ के मुताबिक दोनों नेताओं ने ऊर्जा, रक्षा और दूसरे एडवांस टेक्नॉलोजी के साथ साथ विश्वस्तरीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी बातचीत की। दोनों नेता इस बात पर सहमत थे कि हर मुद्दे का समाधान शांति और बातचीत के जरिए हो सकता है।

दोनों नेताओं ने टैरिफ पर की बात

ट्रम्प प्रशासन ने कहा है कि भारत और अमेरिका व्यापार वार्ता जारी रखने की योजना पर सहमत हो गए हैं। इससे आर्थिक प्राथमिकताओं पर चर्चा के लिए ढांचा तैयार हो जाएगा। दोनों नेताओं ने टैरिफ को लेकर जल्द बातचीत पूरा करने पर भी सहमति व्यक्त की ताकि ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गये टैरिफ शुल्क से भारत को बचने में मदद मिले।

उपराष्ट्रपति वेंस ने भारत के साथ संतुलित व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अमेरिकी प्राथमिकताओं पर भी जोर दिया। वेंस के ऑफिस के मुताबिक वार्ता का मकसद एक आधुनिक व्यापार समझौता बनाना है जो रोजगार बढ़ाने में मदद करता है और दोनों देशों के लोगों के जीवन को बेहतर बनाता है।

पीएम मोदी- उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने लॉन्च किया कॉम्पैक्ट

प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भारत- अमेरिका कॉम्पैक्ट लॉन्च किया। ये एक नई पहल है। इसका मकसद सैन्य व्यापार और टेक्नोलॉजी में दोनों देशों को संबंध और मजबूत करने की ओर बढ़ना है। दोनों नेताओं ने इस कॉम्पैक्ट को “21वीं सदी की एक महत्वपूर्ण साझेदारी की दिशा में कदम” बताया।

जयपुर की सैर पर वेंस परिवार

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपनी पत्नी उषा और तीन बच्चों इवान, विवेक और मीराबेल के साथ दिल्ली से जयपुर पहुंचे जहाँ रामबाग पैलेस में सोमवार (21 अप्रैल 2025) को रात्रि विश्राम किया। वो मंगलवार यानी 22 अप्रैल 2025 को आमेर किला देखने पहुंचे। उनके दौरे को देखते हुए सुरक्षा कारणों से मंगलवार को आमेर किला आम जनता के लिए बंद कर दिया गया। यहां पारंपरिक तरीके से हाथियों ने उनका स्वागत किया। बुधवार को उपराष्ट्रपित वेंस और उनका परिवार आगरा जा रहा है जहाँ वे लोग ताजमहल का दीदार करेंगे। इसके बाद फिर सिटी पैलेस घूमने के लिए वो वापस जयपुर आ जाएँगे

प्रयागराज के थानों में ‘PDA’ सिर्फ 25% नहीं, अखिलेश यादव ने साफ झूठ बोला: UP पुलिस ने किया फैक्ट चेक, DGP बोले- यहाँ पोस्टिंग जाति देखकर नहीं होती

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव के एक दावे की हवा उत्तर प्रदेश पुलिस ने निकाल दी है। अखिलेश यादव ने थानेदारों की तैनाती में प्रयागराज जिले में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज (PDA) को सही प्रतिनिधित्व ना दिए जाने की बात कही थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इसका आँकड़ों के साथ जवाब दिया।

यह पूरा मामला पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट के बाद चालू हुआ। अखिलेश यादव ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, “90% PDA को प्रयागराज पुलिस में केवल 25% प्रतिनिधित्व। ये है पीडीए के साथ किया जा रहा ‘आनुपातिक अन्याय’ है।”

इसी के साथ उन्होंने एक ग्राफ भी पोस्ट किया। इसमें प्रयागराज जिले के पुलिस थानों में तैनात थाना प्रभारी (SHO/SO) के विषय में दावे किए गए थे। इस ग्राफ के अनुसार, प्रयागराज जिले के 44 थानों में 19 में सामान्य वर्ग (गैर सिंह उपनाम वाले) और 14 ‘सिंह’ उपनाम वाले थाना प्रभारी तैनात हैं।

अखिलेश यादव ने दावा किया कि प्रयागराज में मात्र 11 थानों में ही PDA समाज के थाना प्रभारी हैं जो कि उनकी आबादी के हिसाब से कम है। इस पोस्ट के माध्यम से अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस की तैनातियों में सरकार ‘सिंह’ उपनाम वाले लोगों को वरीयता दे रही है। यह अखिलेश यादव का योगी सरकार पर ‘ठाकुरवाद’ का आरोप था।

अखिलेश यादव की पोस्ट के बाद उत्तर प्रदेश ने इसका फैक्ट चेक कर दिया और सही स्थिति बयान कर दी। प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट ने इस मामले में अखिलेश यादव को जवाब दिया और बताया कि थाना प्रभारियों की नियुक्तियाँ कैसे होती हैं।

प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट ने बताया, “उक्त पोस्ट में दी गई सूचना सही नहीं है। जनपद प्रयागराज में थाना प्रभारी की नियुक्ति हेतु कर्तव्यनिष्ठा, सत्य निष्ठा, सामाजिक सद्भाव व जन शिकायतों के प्रति संवेदनशीलता के आधार पर योग्य कर्मचारियों का चयन किया जाता है।

कमिश्नरेट ने आगे संख्या सम्बन्धी दावों पर कहा, “जनपद में तैनात लगभग 40 प्रतिशत थाना प्रभारी OBC और SC/ ST वर्ग से हैं। थाना प्रभारी की नियुक्ति एक निष्पक्ष प्रक्रिया के द्वारा की जाती है।” इसी के साथ पुलिस ने साफ़ किया कि थाना प्रभारियों की नियुक्ति में योग्यता आधार बनाई जाती है।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब समाजवादी पार्टी और उसके समर्थकों द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस में तैनातियों में राजपूतों को वरीयता देने के आरोप योगी सरकार पर लगाए गए हों। इससे पहले आगरा पुलिस ने भी ऐसी खबरों पर एक स्पष्टीकरण जारी किया।

आगरा पुलिस ने बताया था, “आगरा जनपद में कतिपय सोशल मीडिया साइट्स/हैण्डलर्स/माइक्रो ब्लॉगिंग साइट्स के द्वारा एसएचओ की नियुक्ति के बारे में भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे है। इसके सम्बन्ध में अवगत कराना है कि शासन के निर्देशो के अनुसार एसएचओ की नियुक्ति के नियमों का अक्षरशः पालन किया जा रहा है।”

पुलिस ने आगे बताया, “कमिश्नरेट आगरा में 39% ओबीसी संवर्ग, 19% एससी संवर्ग तथा सामान्य संवर्ग के 42% थाना प्रभारी नियुक्त है, जबकि शासनादेश के अनुसार ओबीसी संवर्ग के 27% नियुक्त होने चाहिए।” पुलिस ने भ्रामक सूचना ना फ़ैलाने और तथ्यों पर बात करने की अपील की थी।

उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी प्रशांत कुमार ने भी इस संबंध में बात की है। उन्होंने कहा कि थानों में जाति के आधार पर पोस्टिंग नहीं होती। मीडिया से उन्होंने कहा कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को नियुक्तियों के विषय में ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। उन्होंने इन बातों को ‘भ्रामक’ और ‘अफवाह’ बताया। उन्होंने वर्तमान में प्रसारित हो रही जानकारी को गलत बताया।

रैली में खाली रहीं कुर्सियाँ तो खड़गे ने जिलाध्यक्ष को हटाया, बिहार के बक्सर में हुई थी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की बेइज्जती

कॉन्ग्रेस पार्टी ने बिहार के बक्सर में अपने जिलाध्यक्ष को हटा दिया है। कारण – पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली में भीड़ नहीं जुटी और वो खाली कुर्सियों के सामने भाषण देते रहे। जिलाध्यक्ष डॉ मनोज पांडेय पर अब गाज गिर गई है। पार्टी का कहना है कि उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ ठीक से समन्वय नहीं बिठाया, इसीलिए खड़गे की रैली फ्लॉप हुई। उनपर कार्यक्रम को लेकर लापरवाही बरतने और ठीक से काम न करने का भी आरोप लगाया गया है। खड़गे की रैली में लोगों के न पहुँचने के कारण पार्टी में असंतोष था

वीडियो में देखा जा सकता है कि लाल रंग की कुर्सियाँ खली पड़ी थीं और इधर मल्लिकार्जुन खड़गे ‘नेशनल हेराल्ड’ भ्रष्टाचार के मामले में फँसीं सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का बचाव करते रहे। शनिवार (19 अप्रैल, 2025) को हुई इस रैली में मल्लिकार्जुन खड़गे राज्य की सत्ताधारी पार्टियों जदयू और भाजपा और तो ख़ूब बरसे, लेकिन उन्हें सुनने के लिए लोग ही नहीं आए। उन्होंने कहा कि राहुल-प्रियंका डरने वालों में से नहीं हैं। साथ ही उन्होंने नीतीश कुमार पर कुर्सी के लिए पाला बदलने का आरोप लगाया। बता दें कि कॉन्ग्रेस भी 2 बार नीतीश सरकार का हिस्सा रह चुकी है।

पार्टी द्वारा जारी की गई प्रेस रिलीज के अनुसार, दलसागर खेल मैदान में आयोजित मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली में तैयारियों की घोर कमी रही, साथ ही समन्वय का भी अभाव रहा। इसमें लिखा है कि जिला कॉन्ग्रेस कमिटी ने अपने दायित्वों का ठीक से निर्वहन नहीं किया। कार्यालय सचिव उमेश प्रसाद सिंह के हस्ताक्षर के साथ ये पत्र जारी हुआ है, जिसकी प्रतियाँ पार्टी के संगठन महासचिव KC वेणुगोपाल और राज्य में पार्टी के प्रभारी कृष्णा अल्लावारु को भी भेजी गई है। हाल ही में कॉन्ग्रेस ने सभी जिलों में नए अध्यक्षों की नियुक्ति की थी।

मीडिया चेयरमैन राजेश राठौड़ ने बताया कि आगे और कई लोगों पर कोताही बरतने के कारण कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम की समाप्ति के बाद ख़ुद अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पाया कि अगर जिलाध्यक्ष ठीक से काम करते तो ये और अच्छा हो सकता था। राजेश राठौड़ ने बताया कि उनके ही कहने पर जिलाध्यक्ष को प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम द्वारा निलंबित किया गया है।

कॉन्ग्रेस के बड़े नेता मंच पर फोटो खिंचवाने में व्यस्त रहे थे। हालाँकि, एक सत्य ये भी है कि मल्लिकार्जुन खड़गे देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष होने के बावजूद बिहार में क्राउड पुलर नहीं हैं। शायद ही उन्हें अधिकतर लोग जानते हों, या जो जानते हों वो उन्हें सुनने के लिए दिलचस्पी रखें। दूसरा एक बड़ा कारण ये रहा कि बिहार में कॉन्ग्रेस पार्टी का कैडर मृतप्राय है। कन्हैया कुमार की यात्रा के जरिए इसे जीवित करने की कोशिश की गई जो विफल रही। राहुल गाँधी भी बेगूसराय में इस यात्रा में शामिल होने के लिए पहुँचे थे।

ओडिशा से धराए मुर्शिदाबाद में हिन्दू पिता-पुत्र के हत्यारे के 2 बेटे, इसराइल और सेफाउल को पकड़ने के लिए पुलिस को चलानी पड़ी गोली: हिंसा करके ईद के बाद भाग गए थे

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में 2 हिन्दुओं की हत्या के मुख्य आरोपित जियाउल शेख के 2 बेटों को गिरफ्तार किया गया है। उन्हें ओडिशा पुलिस ने गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले के बांधबहाल इलाके में हुई है। इन दोनों ने पुलिस कस्टडी से भागने का भी प्रयास किया, जिसके चलते उनका एनकाउंटर हुआ।

यह कार्रवाई सोमवार (21 अप्रैल, 2025) की सुबह हुई। ओडिशा पुलिस ने विभिन्न स्थानों पर छापा मारा। ओडिशा पुलिस टीम ने यहाँ दो व्यक्तियों सफाउल हक और बानी इसराइल को हिरासत में लिया।

पुलिस को चलानी पड़ी गोली

गिरफ्तारी के दौरान, आरोपितों के कब्जे से एक पिस्टल भी मिली। उन्होंने इसी दौरान पुलिस हिरासत से भागने का प्रयास किया। पुलिस टीम ने उन्हें रोकने के लिए हवा में चेतावनी के तौर पर 4 राउंड गोलियाँ चलाईं। ओडिशा पुलिस के एक्शन के चलते उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया है।

दो आरोपित बानी इसराइल और सेफाउल हक, जियाउल शेख के पुत्र हैं और पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के समसेरगंज थाना क्षेत्र के सुलिताला गाँव के निवासी हैं। इनके पास से एक देसी पिस्तौल और 7.62 एमएम की दो जिंदा गोलियाँ बरामद की गईं।

इन दोनों के अलावा, मुर्शिदाबाद के छह अन्य लोगों को भी ओडिशा पुलिस ने हिरासत में लिया है। उनके नाम बाबुल एसके, अब्दुल खालिक, सबा करीम, रोनी एसके, मनारुल एसके और अजफरुल एसके शामिल हैं। ये सभी समशेरगंज थाना क्षेत्र के निवासी हैं और यह 11 अप्रैल, 2025 को मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा में शामिल थे।

इसी हिंसा के दौरान हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास की इस्लामी कट्टरपंथियों ने हत्या कर दी थी। जिन आरोपितों की गिरफ्तारी हुई है वह आरोपित ईद के दौरान मुर्शिदाबाद गए थे और फिर झारसुगुड़ा लौटकर मजदूरी करने लगे थे। CCTV फुटेज और मोबाइल टावर रिकॉर्ड से जियाउल शेख की घटनास्थल पर मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी है।

बाहर से अपराध करके आने वालों पर सख्त कार्रवाई: IG हिमांशु लाल

ओडिशा पुलिस के IG हिमांशु कुमार लाल ने इस मामले में बताया, “ओडिशा पुलिस ने जब उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास किया तो उन्हें भागने की कोशिश की। इसके बाद हमने फायरिंग की और उन्हें गिरफ्तार किया। इस मामले में अभी जाँच चल रही है। बाहर से अपराध करके ओडिशा आने वालों पर सख्त कार्रवाई चल रही है, हमने सभी अधिकारियों से सतर्क रहने को कहा है।”

उसपर भीड़ को उकसाने और साजिश रचने का आरोप है। जियाउल शेख को पहले ही उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा से गिरफ्तार किया जा चुका है। इस हत्याकांड से जुड़ी अब तक कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं।

वहीं, वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की इस्लामी हिंसा को लेकर कुल 153 एफआईआर दर्ज की गई हैं और इसमें 292 लोग गिरफ्तार किए गए हैं।

क्लोजर रिपोर्ट में खुलासा – दलित नहीं था रोहित वेमुला… अब उसके नाम पर क़ानून बना रहे राहुल गाँधी-सिद्धारमैया, जाति की राजनीति छोड़ नहीं रहे कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखा है। इस पत्र में राहुल ने कर्नाटक में ‘रोहित वेमुला एक्ट’ नाम से एक कानून बनाने की अपील की है। राहुल का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में जातिगत भेदभाव को खत्म करना है। अपने पत्र में राहुल ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ हुए भेदभाव के बारे में भी लिखा है। इस पत्र को राहुल ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘X’ पर पोस्ट किया है।

राहुल गाँधी ने डॉ. BR अंबेडकर को उद्धृत करते हुए लिखा, “हमारे पास बहुत सारा भोजन था। हमारे भीतर भूख की आज जल रही थी – फिर भी हमें बिना भोजन के सोना पड़ा, ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि हमें पानी नहीं मिल सकता था और हमें पानी इसलिए नहीं मिल सकता था क्योंकि हम अछूत थे।”

राहुल ने लिखा कि सिद्दारमैया इस बात से सहमत होंगे कि अंबेडकर ने जो झेला वह भारत के किसी बच्चे को नहीं झेलना चाहिए। बकौल राहुल गाँधी, यह शर्म की बात है कि आज भी जनजातीय, दलित और OBC समुदायों के लाखों छात्रों को हमारी शिक्षा प्रणाली में इस तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है।

रोहित की बात पर आते हुए राहुल ने लिखा, “रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे प्रतिभाशाली युवाओं की हत्या क़तई स्वीकार्य नहीं है। इसे पूरी तरह से खत्म किए जाने का वक्त आ गया है। मैं कर्नाटक सरकार से ‘रोहित वेमुला अधिनियम’ लागू करने की अपील करता हूँ ताकि भारत का कोई भी बच्चा वह न सहे जो डॉ. BR अंबेडकर, रोहित वेमुला और लाखों अन्य लोगों ने सहा।”

रोहित वेमुला की आत्महत्या

कई लोगों का मानना है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में 17 जनवरी, 2016 को जातिगत भेदभाव के कारण PhD छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। हालाँकि, बीते साल तीन मई को तेलंगाना पुलिस ने तेलंगाना हाइकोर्ट को एक क्लोजर रिपोर्ट सौंपी जिसमें यह साफ तौर पर लिखा था कि रोहित दलित नहीं था बल्कि उसने अपनी असली जाति के उजागर होने के डर से आत्महत्या की थी।

19 अप्रैल 2025 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने राहुल गाँधी को ‘X’ पर लिखकर बताया कि उन्होंने रोहित वेमुला एक्ट के लिए ड्राफ्ट बनाने के निर्देश दे दिए हैं। राहुल गाँधी के लिए उन्होंने अपने पत्र में दावा किया, “मैं भी आपकी भावनाओं से पूरी तरह सहमत हूँ। हमें दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए कदम बढ़ाना चाहिए। हमारी शिक्षा प्रणाली में वंचित वर्गों को अब किसी भी तरह का भेदभाव नहीं सहना पड़ेगा। मैं और मेरी सरकार समाज में सभी के प्रति समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

रोहित की मौत के बाद राहुल गाँधी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने उसे दलित विद्यार्थी का चेहरा देकर उसकी आत्महत्या को हत्या का रूप देने की कोशिश की। सच्चाई को उजागर करने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी। इसके बजाय इसे एक अवसर के रूप में देखा। रोहित वेमुला की मौत को वोटों की ख़ातिर दलितों और गैर-दलितों को बाँटने वाले राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया गया। प्रशासन की रिपोर्ट ने विपक्ष का झूठ उजागर कर दिया।

सादे लिबास में आते हैं, उठाकर ले जाते हैं, फिर मिलता है क्षत-विक्षत शव… बलूचिस्तान में पाकिस्तान की ‘Kill & Dump’ नीति, बच्चों से लेकर पत्रकार तक निशाना

पिछले कुछ महीनों के दौरान बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ क्रांति का नए सिरे से उभार देखने को मिला है। बलूच महिलाओं और युवाओं ने पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ इस विद्रोह की मशाल थाम रखी है। आइए, जानते हैं कि इसका कारण क्या है। इसके मूल में पाकिस्तानी एजेंसियों की उस कुख्यात ‘किल एंड डंप’ यानी ‘हत्या करके ठिकाने लगाने’ वाली नीति की वापसी है। पाकिस्तान ने पहली बार यह नीति 2009 में अपनाई थी, जिसका मकसद बलूचिस्तान के लोगों की आवाज का दमन करना था।

यह क्रूर रणनीति निशाना बना कर हत्या और अपहरण के जरिए असहमति एवं विरोध के स्वरों को दबाने पर केंद्रित रही। इस नीति के अमल में आने के बाद से हजारों लोग मारे गए और तमाम गायब हो गए। ‘बलूच वुमन फोरम’ (BWF) ने हाल में इस कुख्यात ‘Kill & Dump’ पॉलिसी की कड़ी निंदा की है। संगठन ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों को लेकर पाकिस्तानी सरकार की प्रतिबद्धता को लेकर गहरा संदेह भी जताया है।

BWF की प्रवक्ता ने एक बयान जारी करके कहा कि ये घटनाक्रम बलूच लोगों को व्यवस्था से अलग-थलग करने की सोच को प्रदर्शित कर रहा है। प्रवक्ता ने आगे कहा कि विगत 3 दिनों में अवैध रूप से कब्जे में लिए गए तीन बलूच युवाओं के शव माकुरण और नाल (खुजदार) के अलग-अलग स्थानों पर मिले हैं।

नाल के रहने वाले फारूक अहमद को 14 अप्रैल को जबरन हिरासत में लिया गया था। यह बलूचिस्तान में गुमशुदगी के तमाम अन्य मामलों के ढर्रे को दर्शाता है। इसके एक दिन बाद 15 अप्रैल को उसका शव नाल के समद चेक पोस्ट क्षेत्र से मिला। ‘द बलूचिस्तान पोस्ट’ के अनुसार, शव पर प्रताड़ना के निशान मिले थे।

ग्वादर जिले में पासनी के निवासी निजाम बलूच को 12 अप्रैल को उसके घर से अवैध तरीके से उठाकर एक अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया। यह सामने आया है कि उसे 4 घंटों तक प्रताड़ित किया गया। गत 16 अप्रैल को उसका शव पासनी में फेंक दिया गया। ‘द बलूचिस्तान पोस्ट’ का दावा है कि उसे भयंकर शारीरिक प्रताड़ना दी गई।

ऐसे ही एक अन्य मामले में पासनी निवासी शेर खान निजार को 15 अप्रैल को तुरबत के जुस्साक इलाके से हिरासत में ले लिया गया और वह भी बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी वॉरंट के। निजार पढ़ाई करने के साथ-साथ एक डीजल डिपो पर पार्ट टाइम काम भी करता था। 16 अप्रैल की रात को उसका शव तुरबत विश्वविद्यालय के पीछे मिला। अन्य मामलों की तरह उसके शव पर घावों के निशान थे।

उल्लेखनीय है कि बलूच क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों के गायब होने के मामले सामने आए हैं। गुमशुदा लोग भिन्न-भिन्न आयु वर्ग और अलग-अलग कार्यक्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। इन मामलों के चश्मदीदों का आरोप है कि ये काम पाकिस्तान की ही अलग-अलग सरकारी एजेंसियों का है। हिरासत में लिए गए चुनिंदा लोग कुछ समय बाद रिहा कर दिए गए, लेकिन उनमें से अधिकांश की हत्या हो गई और तमाम अन्य अभी भी अवैध हिरासत में कैद हैं।

सरकार को संबोधित एक बयान में BWF ने कहा है, “जबरन गायब किए गए बलूच लोगों की हम तत्काल और बिना शर्त रिहाई की माँग करते हैं। ऐसे मामलों ने बलूच समाज की शांति एवं स्थिरता को गहरी चोट पहुँचाई है। इसके अतिरिक्त, हम प्राधिकारी संस्थाओं से अनुरोध करते हैं कि इन मामलों के पीछे जो लोग हैं, उनकी जवाबदेही तय की जाए।”

‘किल एंड डंप’ पॉलिसी को समझना

‘किल एंड डंप’ यानी हत्या करके ठिकाने लगा देना जैसी बात कोई कल्पना मात्र नहीं है। यह बलूचिस्तान में आज़ादी की लड़ाई से निपटने की पाकिस्तानी रणनीति की कड़वी हकीकत है। पाकिस्तान मुल्क़ द्वारा प्रवर्तित यह नीति लोगों को जबरन गायब करने, तंत्रीय उत्पीड़न और गैर-कानूनी हत्याओं पर केंद्रित है। पीड़ितों के शव अक्सर क्षत-विक्षत हालत में मिलते हैं जो बयान करते हैं कि मौत से पहले उन्हें कितना कष्ट पहुँचाया गया होगा।

उनका शव भी खुले में या दूरदराज के सड़कों के इर्दगिर्द फेंक दिया जाता है। इन शवों की पहचान भी जनता या परिवार के सदस्यों द्वारा की जाती है। इन शवों के साथ एक अंतर्निहित या छिपा हुआ संदेश भी होता कि पाकिस्तान के खिलाफ आवाज न उठाएँ।

कैसे काम करती है यह नीति

जब लोगों की गुमशुदगी, प्रताड़ना और हत्याओं का गहनता से आकलन करते हैं तो इसमें एक रुझान सामने आता है। पीड़ितों को अक्सर सादे लिबास वाले लोगों द्वारा उठाया जाता है जो ऐसे वाहनों से ऐसे आते हैं जिनकी कोई पुख्ता पहचान नहीं होती। इन लोगों के बारे में अमूमन यही माना जाता है कि उनका संबंध ISI (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस) जैसी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी या फ्रंटियर कॉर्प्स जैसे अर्धसैनिक बल से होता है।

इस क़वायद में न कोई वॉरंट होता है, न सार्वजनिक रिकॉर्ड और न ही किसी कानूनी आश्रय का कोई विकल्प। लोगों को उनके घरों, सार्वजनिक स्थलों या शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कहीं से भी उठा लिया जाता है। कई मामलों में लोग महीनों या सालों तक गुमशुदा रहे। जबकि अन्य मामलों में कुछ दिनों के भीतर ही उनका शव मिला जिस पर भयावह प्रताड़ना के चिह्न होते।

वॉइस फोर बलूच मिसिंग पर्संस जैसे स्थानीय अधिकार समूहों ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसे हजारों मामले उजागर किए हैं। वर्ष 2011 में ह्युमन राइट्स वॉच ने ‘वी कैन टॉर्चर, किल ओर कीप यू फोर ईयर्स‘ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर इन जबरन अपहरणों और हत्याओं का आरोप लगाया था।

राज्य की संलिप्तता के पुख्ता संकेत

ये हत्याएँ केवल क्रूरता की श्रेणी में नहीं आतीं। इनमें खास तौर-तरीके जाहिर होते हैं जो स्पष्ट रूप से राज्य प्रायोजित हिंसक गतिविधियों की श्रेणी में आते हैं। ‘किल एंड डंप’ नीति के पीड़ित अक्सर बलूच युवा होते हैं। इनमें छात्र, पत्रकार, कवि और पाकिस्तान की नजर में ऐसे संदिग्ध राष्ट्रवादी होते हैं जो बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ आवाज उठाते हैं। उनके शरीर पर क्रूर यातना के निशान होते हैं। इसमें क्षत-विक्षत अंग, उखड़े हुए नाखून, सिगरेट से जलाने के निशान, तेजाब के चिह्न और गोलियों के घाव होते हैं। कइयों के शरीर पर फाँसी दिए जाने के संकेत भी नजर आते हैं।

पीड़ितों का शव सार्वजनिक या अर्ध-सार्वजनिक स्थलों पर फेंक दिया जाता है। इसके पीछे का कारण है, लोगों को आतंकित करना। विरोध-प्रदर्शन करने वाले परिवार खतरा महसूस करें। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहाँ परिवार के सदस्यों द्वारा गैर-कानूनी हत्याओं का विरोध करने के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें अगवा कर लिया गया या फिर उनकी हत्या हो गई। सरकार ऐसी गतिविधियों को ‘आतंकवाद विरोधी’ कदम बताती है।

कानूनी लचरता और जवाबदेही का अभाव

पाकिस्तान में न्यायपालिका इस प्रकार के उत्पीड़न के लिए किसी को भी जवाबदेह ठहराने में पूरी तरह से नाकाम रही है। जब परिवार के लोग साक्ष्यों या गवाहों के साथ अदालत का रुख करते हैं तो कोई कार्रवाई नहीं होती है और यदि होती भी है तो बहुत मामूली। सैन्य एजेंसियाँ न किसी तरह की जाँच के दायरे में आती हैं और न ही उन्हें कोई नतीजा भुगतना पड़ता है, क्योंकि वे ‘राष्ट्रीय हितों’ के अंतर्गत काम करती हैं। देश में ‘एड ऑफ सिविल पॉवर रेगुलेशन’ जैसा कुख्यात कानून लागू है जो सुरक्षा बलों को बिना किसी उचित प्रक्रिया के नज़रबंदी केंद्रों में रखने की अनुमति देता है। जब इस प्रकार की नज़रबंदी होती है तो फिर परिणाम प्रताड़ना और कैद में मौत के रूप में सामने आता है, जिसमें किसी की कोई जवाबदेही नहीं होती।

उल्लेखनीय है कि बलूच मानवाधिकार परिषद के अनुसार 2000 के दशक की शुरुआत से बलूचिस्तान में 6000 से अधिक क्षत-विक्षत शव मिल चुके हैं। यह आकलन भी बहुत न्यूनतम आधार पर लगाया गया है। अभी भी एक बड़ी तादाद में लोग अभी भी गायब बताए जा रहे हैं, जिसमें किसी जाँच की भी कोई आस नहीं।

‘किल एंड डंप’ पॉलिसी असल में बलूच पहचान को मिटाने का एक हथियार है। इसके पीड़ितों में अधिकांश बलूच भाषी लोग होते हैं जो सांस्कृतिक अधिकारों की वकालत करते हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPAC) परियोजना के अंतर्गत बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध करने वालों को भी इसमें निशाना बनाया जाता है।

बलूच आबादी के प्रति भयावह उत्पीड़न के पर्याप्त साक्ष्यों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस मामले में बहुत कम आवाज बुलंद की है। यदाकदा कुछ रिपोर्ट और शोध पत्रों में ही बलूच लोगों पर किए जा रहे जुल्मों और उनकी हत्या की बातें सामने आती हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान निरंतर सैन्य मदद, कूटनीतिक सहयोग और वित्तीय सहायता प्राप्त करता जा रहा है। मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी बलूचिस्तान के लोगों पर हो रहे अत्याचारों की ओर से आँखें फेर रखी हैं।

‘विदेशी हाथ’ का जुमला और जन-विरोधी नीतियाँ

पाकिस्तान में मीडिया संस्थानों पर मुख्य रूप से सेना का नियंत्रण है या फिर वे फौज से प्रभावित हैं। मिसाल के तौर पर ARY न्यूज, जियो टीवी और द नेशन अपनी कवरेज से ऐसा विमर्श गढ़ते हैं कि बलूचिस्तान के लोग विदेश प्रायोजित क़वायदों और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का हिस्सा हैं। इन मीडिया संस्थानों का मकसद गैर-कानूनी हत्याओं, सैन्य कब्जे, नस्लीय सफाये और संसाधनों के दोहन जैसी घरेलू शिकायतों से ध्यान भटकाना है।

ये संस्थान इस कदर प्रलाप करते हैं कि अपने प्रियजनों की तलाश करने वाले परिवारों को देश-विरोध करार देने लगते हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ सरकारी मशीनरी लाठी चार्ज, टीयर गैस, गोलीबारी और गिरफ्तारी जैसे कदम उठाती है जो दंगाइयों से निपटने के लिए उठाए जाते हैं। उन पर सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने या राष्ट्रविरोधी भावनाएँ भड़काने का अभियोग झेलना पड़ता है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सख़्ती को बढ़ाने में चीन की भूमिका

बलूच विद्रोहियों पर पाकिस्तानी एजेंसियों की क्रूर सख्ती से जुड़ा मसला इस पहलू को देखते हुए और जटिल बन जाता है कि इसे एक अदृश्य ताकत से सहारा मिलता है। इसकी जड़ें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपैक) जैसे अभियान से जुड़ी हैं जो चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पहल के तहत आकार ले रही अरबों डॉलर की अहम परियोजना है। इस परियोजना ने बलूचिस्तान को एक उपेक्षित प्रांत से सैन्यीकृत आर्थिक क्षेत्र में तब्दील कर दिया है।

जहाँ सीपैक में हाईवे, बिजली संयंत्र और बंदरगाह जैसी परियोजनाओं का सब्जबाग दिखाया जा रहा है, वहीं बलूचिस्तान के लोगों को इसके जरिये उन पर बढ़ती निगरानी, हड़पी जा रही जमीन और उनकी गर्दनों को रौंदते फौजी बूट महसूस हो रहे हैं।

ग्वादर-विकास, लेकिन किसके लिए

ग्वादर बंदरगाह सीपैक परियोजना की मुकुट-मणि है। यह बलूचिस्तान के दक्षिणी तट पर स्थित है। वैसे तो इसे स्थानीय लोगों की कायापलट करने वाली परियोजना के रूप में पेश किया गया, लेकिन असल में यह बंदरगाह किसी अभेद्य किले से कम नहीं। उच्च सुरक्षा वाली एक दीवार ने बलूच समुदायों को मछली पकड़ने की उनका पारंपरिक जगह से ही परे धकेलने का काम किया है। जबकि चीनी नागरिक यहाँ पाकिस्तानी सेना की सुरक्षा में खुलेआम घूमते हैं। वहीं, स्थानीय बच्चों के लिए अभी भी स्वच्छ पेयजल और बिजली का अभाव बना हुआ है। इस बंदरगाह के फायदे अभी तक स्थानीय लोगों तक पहुँचने की राह नहीं बना पाए हैं, लेकिन इस्लामाबाद और बीजिंग तक ये लाभ बेधड़क पहुँच रहे हैं।

बलूचों ने इस अधिग्रहण का व्यापक रूप से विरोध किया, जिसका परिणाम उनके हिंसक दमन के रूप में निकला। ‘किल एंड डंप’ नीति प्रतिरोध की आवाज को दबाने की राज्य की रणनीति का हिस्सा है। इसका सीधा संदेश है-विरोध करने वाली आवाज दब जाए।

सीपीईसी मार्गों और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा के लिए बलूचिस्तान में हजारों की तादाद में सैन्यकर्मी तैनात हैं। हाईवे और चीनी साइटों के आसपास प्रतिबंधित क्षेत्र बन गए हैं खासतौर से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए। यह सैन्यकरण चीनी हितों को देखते हुए उसके संग समन्वय के साथ हुआ है, जिसका परिणाम अक्सर घरों पर छापेमारियों, गिरफ्तारियों और कर्फ्यू के रूप में निकला है।

चीन ने हमेशा की तरह चुप्पी साधी हुई है। उसका सरकारी मीडिया अक्सर पाकिस्तानी नैरेटिव के सुर में सुर मिलाते हुए बलूच आंदोलन को आतंकी विद्रोह की संज्ञा देता है। यहाँ तक कि 2021 में दासु में अपने इंजीनियरों पर आत्मघाती हमले के बाद चीन ने पाकिस्तान से व्यापक सुरक्षा की गारंटी भी माँगी थी।  

बलूचिस्तान के संसाधनों का दोहन

सीपैक और अन्य द्विपक्षीय समझौतों के अंतर्गत चीनी कंपनियों को बलूचिस्तान में खनन अधिकारों से लाभ पहुँचा है। खासतौर से सोने, तांबा और रेयर अर्थ मिनरल्स के मामले में बलूचिस्तान काफी समृद्ध है। सैनडाक और रेको डिग जैसी परियोजनाएँ इसकी उदाहरण हैं, जहाँ मुनाफा हड़प लिया जाता है और स्थानीय लोग जमीन से बेदखल और बेरोजगार होकर रह जा रहे हैं। इन परियोजनाओं का विरोध करने वाले भी या तो जबरन अगवा कर लिए गए या ग्रामीण इलाकों में ‘अज्ञात शव’ पाए गए।

चीन वैसे तो प्रत्यक्ष रूप से दमन नहीं कर रहा है। हालाँकि, वह बड़ी खामोशी, लेकिन प्रभावी तरीके से बलूच विद्रोह को कुचलने में लगा है।

सांख्यिकीय सिंहावलोकन

सरकार प्रायोजित हिंसा के विरुद्ध बलूचिस्तान में आवाज़ ज़रूर उठी है, लेकिन पाकिस्तान इसकी भी हवा निकालने की पूरी कोशिश में लगा हुआ है। हालाँकि, स्वतंत्र संगठनों, लीक हुई रिपोर्ट और अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं से बहुत खराब स्थितियों के संकेत मिलते हैं।

वॉइस फोर बलूच पर्संस‘ (VBMP) के अनुसार, 2000 के दशक की शुरुआत के बाद 20,000 से अधिक बलूच लोग जबरन गायब कर दिए गए हैं। इनमें छात्र, डॉक्टर, पत्रकार, कवि और यहाँ तक कि बच्चे भी शामिल हैं। अधिकांश परिवारों को गिरफ्तारी का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं मिला है और न ही संबंधित व्यक्ति के बारे में जानकारी या कोई अन्य ब्यौरा।

पाकिस्तान की ‘कमीशन ऑफ इनक्वायरी ऑन एनफोर्स्ड डिसअपिरियंस’ (COIED) ने स्वीकार किया है कि उसके समक्ष हजारों अनसुलझे मामले हैं, जिनमें से अधिकांश बलूचिस्तान से हैं। जबकि स्थानीय लोगों की दलील है कि ऐसे मामलों की पूरी जानकारी सामने नहीं रखी जा सकी है।

बलूच मानवाधिकार परिषद के अनुसार, जनवरी 2022 से दिसंबर 2022 के बीच 367 लोग गायब हो गए और गुमशुदा लोगों में से 79 के शव मिले, जिनकी गैर-क़ानूनी ढंग से हत्या कर दी गई। इनमें से 58 शवों की शिनाख्त नहीं हो पाई।

‘द ट्रिब्यून इंडिया’ के अनुसार, दिसंबर 2024 में केवल एक महीने के दौरान ही 22 लोगों को जबरन अगवा कर लिया गया जबकि पाँच लोगों की गैर-कानूनी ढंग से हत्या कर दी गई। इलाके में महीनों तक विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहा।

बलूच लोग गंभीर संकट से जूझ रहे हैं, लेकिन दुनिया अभी तक खामोश है। पाकिस्तान की ‘किल एंड डंप’ नीति तमाम लोगों का जीवन ले चुकी है। इन लोगों की बात सुनने के बजाय सरकार उनका हरसंभव तरीके से दमन करने में लगी है। चीनी समर्थन और मीडिया की चुप्पी एवं सहयोग से क्रूरता का यह क्रम अनवरत जारी है। इससे पहले कि बलूचिस्तान में और जिंदगियाँ खत्म हो जाएँ, दुनिया को आगे आकर उसके पक्ष में आवाज बुलंद करनी चाहिए।

(इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक के जरिए इसे पढ़ सकते हैं।)

स्कॉटलैंड की संसद में पेश हुआ हिंदूफोबिया के खिलाफ कानून, सांसद बोलीं- हिन्दुओं से लगातार हो रहा भेदभाव: अमेरिका में भी लाया गया था प्रस्ताव

स्कॉटलैंड की संसद में हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया गया है। यहाँ पहली बार हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर आधिकारिक रूप से निंदा की गई है। इस प्रस्ताव का नाम Motion S6M-17089 है।

इसे एडिनरबरा ईस्टर्न क्षेत्र की संसदीय सदस्य और अल्बा पार्टी की नेता ऐश रीगन ने पेश किया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य स्कॉटलैंड में रहने वाले हिंदू समुदाय के साथ हो रहे भेदभाव, नफरत और समाज में उनकी अनदेखी के खिलाफ आवाज़ उठाना है।

संसद में पेश किए गए इस प्रस्ताव को कॉलिन बीट्टी, स्टेफनी कैलाघन और केविन स्टीवर्ट समेत कई सांसदों से समर्थन मिला है। इस प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया है कि स्कॉटलैंड के हिंदू समुदाय को भेदभाव, बहिष्कार और नफरत का सामना करना पड़ रहा है।

ऐश रीगन ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा, “स्कॉटलैंड की विविधता इसकी ताकत है। लेकिन हम पूर्वाग्रह से पीड़ित लोगों की आवाज़ों को अनदेखा करते हुए उस विविधता का जश्न नहीं मना सकते। यह प्रस्ताव सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि यह एक ठोस बदलाव की माँग है।”

हिंदूफोबिया पर रिपोर्ट का असर

दरअसल, इस प्रस्ताव को एक अहम रिपोर्ट के आधार पर पेश किया गया है। गांधिवादी शांति समाज (GPS) की रिपोर्ट Hinduphobia in Scotland: Understanding, Addressing, and Overcoming Prejudice यानी ‘हिंदूफोबिया को समझना, उसका समाधान खोजना और उसे खत्म करना’ के आधार पर यह बात हो रही है।

रिपोर्ट को GPS के महासचिव ध्रुव कुमार, GPS के अध्यक्ष अनुरंजन झा, सुखी बैंस, अजित त्रिवेदी और इंडियन काउंसिल ऑफ स्कॉटलैंड एंड यूके के अध्यक्ष नील झाल ने लिखा है। रिपोर्ट में आँकड़े, पीड़ितों की गवाही और सच्ची घटनाएँ शामिल हैं।

स्कॉटलैंड के 30 हज़ार हिंदुओं की आपबीती

रिपोर्ट में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं, जिसमें मंदिरों पर हमले और तोड़फोड़, कार्यस्थल पर हिंदू कर्मचारियों के साथ भेदभाव, हिंदू त्योहारों और परंपराओं को लेकर मजाक, स्कूलों और सार्वजनिक जीवन में सांस्कृतिक अनदेखी और कई बार शारीरिक या मानसिक हमले शामिल भी शामिल की गई हैं। ये सारी घटनाएँ स्कॉटलैंड में रह रहे 30 हज़ार हिंदू आबादी से ली गई हैं।

अमेरिका के जॉर्जिया में भी आया है प्रस्ताव

स्कॉटलैंड हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पेश करने वाला पहला देश नहीं है। हाल ही में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में हिंदूफोबिया के खिलाफ विधेयक लाया गया था। इस कानून को सीनेट में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन सदस्यों ने समर्थन दिया है। हालाँकि अभी यह विधेयक सीनेट से पास नहीं हुआ है। अगर यह पारित होता है तो हिंदूफोबिया को घृणा आधारित अपराधों में रखा जाएगा और इसके लिए हिंदू हितों की रक्षा संबंधित नियम बनाए जाएँगे।