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कौन थे ‘फादर अमीर’ जिन्होंने कतर को दुनिया की आर्थिक शक्ति बनाया: भारत में उनके निधन पर झुका तिरंगा, जानिए किन परिस्थितियों में होता है ऐसा

भारत ने कतर के ‘फादर अमीर’ हिज हाइनेस शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। 13 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय झंडा आधा झुका रहेगा। तिरंगा उन सभी इमारतों पर एक दिन तक आधा झुका रहेगा, जहाँ राष्ट्रीय झंडा नियमित फहराया जाता है।

इस दिन कोई आधिकारिक मनोरंजन वाले कार्यक्रम भी नहीं आयोजित होंगे। संसदीय मामलों और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू जल्द ही कतर जाएँगे और भारत सरकार की ओर से कतर को शोक संदेश देंगे और संवेदना जताएँगे।

पीएम मोदी ने फादर अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर शोक व्यक्त किया है और कहा है कि वह भारत के सच्चे दोस्त थे। उन्होंने कहा कि वे दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने कतर को विकास और खुशहाली को नई ऊँचाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कतर के फादर अमीर को श्रद्धांजलि दी और कतर के नेतृत्व, शाही परिवार और वहाँ की जनता के प्रति अपनी संवेदना जताई।

अपने पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा, हम उन्हें एक सच्चे दोस्त के रूप में याद करते हैं। पीएम ने फरवरी 2024 की अपनी कतर यात्रा को याद किया और ‘फादर अमीर’ के प्रति संवेदना जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

2024 की प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारत-कतर के आपसी रिश्तों में और मजबूती आई। कतर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाला अहम देश है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अहम समझौते हुए । कतर की जनसंख्या में अप्रवासी भारतीयों का बड़ा भाग है, जो कतर के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं। इससे दोनों देश की नजदीकियाँ भी बढ़ी हैं।

कौन थे शेख हमद बिन खलीफा अल थानी

1995 से 2013 तक कतर के अमीर के रूप में अपनी सेवा देने वाले शेख हमद बिन खरीलाफ अल थानी को आधुनिक कतर का निर्माता कहा जाता है। कतर को आर्थिक राजनयिक और वैश्विक स्तर पर उन्होंने पहचान दिलाई। उनके शासनकाल में कतर ने अपने नेचुरल गैस के व्यापक भंडार के दम पर तेजी से प्रगति की और वैश्विक स्तर पर संपन्न देश के रूप में अपनी पहचान बना। उन्होंने इसके बाद अपनी सत्ता बेटे शेख तमीन बिन हमद अल थानी को सौंप दी। 12 जुलाई 2026 को 74 वर्ष में उनका निधन हो गया।

शेख हमद बिन खलीफा अल थानी को कतर में ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। दरअसल ये कोई पारिवारिक संबोधन नहीं, बल्कि कतर में दिया जाने वाला एक सम्मानजनक आधिकारिक खिताब है। जब कोई शासक या अमीर अपनी सत्ता स्वेच्छा से अपने उत्तराधिकारी को सौंप देता है, तब उसे ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। शेख हमद बिन खलीफा अल थानी ने 2013 में स्वेच्छा से अपने बेटे शेख तमीम बिन हमद अल-थानी को सत्ता सौंप दी थी। इसलिए उन्हें कतर में सम्मान से ‘फादर अमीर’ कहते हैं। खाड़ी देशों में इस तरह का स्वैच्छिक सत्ता हस्तांतरण बहुत कम देखने को मिलता है।

उनका जन्म 1952 में हुआ था। उनके अब्बू का नाम शेख खलीफा बिन हमद अल-थानी था जो कतर के शासक थे। उनकी अम्मी शेखा आयशा बिंत हमद अल अत्तिया था। कतर पर अली थानी राजवंश की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य से है। जब कतर को 1971 में ब्रिटेन से आजादी मिली, तो उसके कुछ ही महीनों बाद 1972 में शेख हमद के पिता शेख खलीफा कतर के अमीर बन गए थे। इसलिए फादर अमीर को बचपन से ही सत्ता का उत्तराधिकारी माना जाता था।

यूके के प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्स्ट से 1971 में ग्रेजुशन करने के बाद वह कतर आकर सेना में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वह सेना के कमांडर इन चीफ के पद तक पहुँचे। 1977 में उन्हें कतर का ‘क्राउन प्रिंस’ आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया। जून 1995 में कतर में उन्होंने रक्तहीन सत्तापलट किया। हुआ यूँ कि उनके पिता शेख खलीफा जब स्विटजरलैंड की यात्रा पर थे तो उन्होंने सेना के समर्थन से तख्तापलट किया और खुद को ‘अमीर’ घोषित कर दिया। इसकी वजह से दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। लंबे समय तक अब्बा फ्रांस में निर्वासित रहे, लेकिन आपसी सुलह के बाद 2004 में वे कतर लौटे, जहाँ 2016 में उनका निधन हुआ।

दरअसल फादर अमीर का मानना था कि उनके पिता प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे और पुराने तरीके से शासन चला रहे हैं।

आधुनिक कतर के निर्माता

उन्होंने कतर को अपने शासनकाल में पूरी तरह बदल दिया।कतर के प्राकृतिक संसाधनों खासकर गैस भंडार का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। उनके नेतृत्व में कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल हो गया। इसका असर ये हुआ कि देश में समृद्धि आई और प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अव्वल श्रेणी में पहुँच गई। उन्होंने कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिए दुनिया भर में बड़े निवेश कराए। इससे कतर की आर्थिक और रणनीतिक पहुँच कई देशों तक बढ़ी। उनके शासन में अल जजीरा न्यूज नेटवर्क की स्थापना हुई, जिसने कतर को वैश्विक मीडिया शक्ति के रूप में पहचान दिलाई।

उनके नेतृत्व में कतर ने 2022 फीफा विश्व कप की मेजबानी का अधिकार हासिल किया। इसके लिए देश में मेट्रो, स्टेडियम, सड़कें और दूसरे बुनियादी ढाँचे का व्यापक विकास हुआ। उन्होंने कतर को मध्य-पूर्व की कूटनीति में महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया। हालाँकि कुछ क्षेत्रीय नीतियों और इस्लामी संगठनों के साथ संबंधों को लेकर उनकी सरकार विवादों में भी रही।

भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, तकनीक के क्षेत्र में मजबूत रिश्ते हैं। प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या यहाँ रहती है जिससे दोनों देशों के संबंध और गहरे हो गए हैं। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और कतर के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। खासकर शेख हमद के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के संबंध बेहद मजबूत हुए थे। यही वजह है कि भारत सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है।

तिरंगा कब आधा झुकाया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को राष्ट्रीय शोक के वक्त आधा झुकाया जाता है। यह शोक के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।

आम तौर पर देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश और दूसरे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के निधन पर झंडा आधा झुकाया जाता है।

भारतीय ध्वज संहिता के अनुसार ऐसा किया जाता है। वैश्विक गणमान्य व्यक्तियों के निधन पर गृह मंत्रालय विशेष निर्देश जारी करता है, तब झंडा झुकाया जाता है।

किसी राज्य के राज्यपाल या मुख्यमंत्री के निधन पर उस राज्य में झंडा आधा झुकाया जाता है। किसी राष्ट्रीय त्रासदी पर या असाधारण घटना पर जब केन्द्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है तो झंडा आधा झुका रहता है।

इसके अलावा किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, सरकार के मुखिया या महत्वपूर्ण वैश्विक नेता के निधन पर यदि भारत सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है, तो उस दिन सभी सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका रहता है। इस दिन सरकारी कामकाज तो सामान्य रूप से होते हैं लेकिन कोई मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होता है। हालाँकि राष्ट्रीय अवकाश भी नहीं होता है।

न्यूक्लियर पॉवर से रोशन होगा बांग्लादेश, भारत-रूस दे रहे तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग: समझें कैसे फुलप्रूफ सिक्योरिटी के साथ ये प्लांट लगातार देगा बिजली

भारत के बिल्कुल बगल में पश्चिम बंगाल से होकर बहने वाली पद्मा नदी के किनारे एक बहुत बड़ा बदलाव आकार ले रहा है। बांग्लादेश अपने पहले न्यूक्लियर पॉवर प्लांट यानी रूपपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना का निर्माण कर रहा है। वहाँ खड़े विशालकाय, हाथीदांत के रंग जैसे कूलिंग टावर्स को देखने के लिए स्थानीय लोग आते हैं और तस्वीरें लेते हैं।

एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और रूस द्वारा उसे दी जा रही मदद को लेकर चिंतित है, वहीं भारत के ठीक पड़ोस में एक और पड़ोसी देश परमाणु शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। हालाँकि बांग्लादेश का यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से शांतिपूर्ण नागरिक ऊर्जा के लिए है। ऐसे में इस प्रोजेक्ट को भारत का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।

रूपपुर प्रोजेक्ट में तकनीकी तौर पर मिल रहा रूस का साथ

ब्लूमबर्ग की ताजी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2028 में पूरी तरह से चलने जा रहा रूपपुर में बांग्लादेश का यह पहला परमाणु बिजली घर रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम की मदद से बनाया जा रहा है। यह कुल 2.4 गीगावाट का प्रोजेक्ट है, जिसमें बारह-बारह सौ मेगावाट के दो आधुनिक रशियन-डिजाइन रिएक्टर लगाए जा रहे हैं।

वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक, रोसाटॉम के साथ हुए मुख्य समझौते के तहत इस प्लांट की शुरुआती लागत करीब 12.65 बिलियन डॉलर आँकी गई थी, जिसमें शुरुआती कुछ सालों का परमाणु ईंधन भी शामिल है।

रूपपुर परमाणु प्लांट की प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

पहले इस प्लांट की पहली यूनिट को साल 2023 तक शुरू होना था, लेकिन कोविड महामारी, यूक्रेन पर रूस के हमले और मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक संकटों के चलते यह प्रोजेक्ट लेट हो गया। अब उम्मीद है कि पहला रिएक्टर साल 2027 की शुरुआत में और दूसरा उसके एक साल बाद यानी 2028 तक पूरी तरह चालू हो पाएगा। इस परियोजना को प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार आगे बढ़ा रही है, जो साल 2024 में शेख हसीना सरकार की तख्तापलट के कुछ समय बाद सत्ता में आई है।

प्रोजेक्ट में देरी से बढ़ गई लागत, परेशान है बांग्लादेश

इस देरी की वजह से बांग्लादेश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बांग्लादेशी मुद्रा ‘टका’ काफी कमजोर हो गई है। स्थानीय मुद्रा के हिसाब से देखें तो पिछले 10 साल में इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग एक-चौथाई बढ़ चुकी है। ब्लूमबर्ग को दिए बयान में ढाका यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद शफीकुल इस्लाम का कहना है कि अगर यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो जाता, तो न केवल लागत बढ़ने से बचती, बल्कि बांग्लादेश को महँगे जीवाश्म ईंधन के आयात से भी राहत मिल जाती।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

इसके बावजूद प्लांट के ऑपरेटरों का दावा है कि लंबे समय की सुरक्षा और बिजली की निश्चित आपूर्ति के लिहाज से यह सौदा देश के लिए पूरी तरह फायदेमंद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी साबित होगा।

दुर्घटना होने पर किसकी होगी जिम्मेदारी?

अब आते हैं सबसे बड़े और सबसे डरावने सवाल पर कि अगर रूपपुर में कोई परमाणु दुर्घटना या तबाही होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा। यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि रूपपुर प्लांट भारतीय सीमा के बेहद करीब है। परमाणु रेडिएशन सीमाओं को नहीं मानता और हवा-पानी के जरिए यह कुछ ही घंटों में भारत के एक बड़े हिस्से विशेषकर पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों को अपनी चपेट में ले सकता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों और न्यूक्लियर लायबिलिटी के सिद्धांतों के तहत इस स्थिति को समझना जरूरी है।

ऑपरेटर की प्राथमिक जिम्मेदारी (The Operator’s Liability): अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और ‘वियना कन्वेंशन ऑन सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज‘ के मुताबिक, किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में सबसे पहली और सीधी जिम्मेदारी उस देश की एजेंसी की होती है जो प्लांट को चला रही है। रूपपुर के मामले में यह जिम्मेदारी ‘न्यूक्लियर पॉवर प्लांट कंपनी बांग्लादेश लिमिटेड’ (NPCBL) और बांग्लादेश सरकार की होगी। फुकुशिमा आपदा के समय भी पूरी जिम्मेदारी जापानी कंपनी टेपको (TEPCO) और जापान सरकार पर आई थी।

सप्लायर (रूस/रोसाटॉम) की भूमिका: सप्लायर देशों की भूमिका की बात करें तो रूस जैसे बड़े परमाणु निर्यातक अपने समझौतों में एक सुरक्षा कवच शामिल करवाते हैं। इसके तहत तकनीकी खराबी साबित होने पर भी वित्तीय मुआवजे का एक बड़ा हिस्सा ऑपरेटर देश को ही भुगतना पड़ता है। हालाँकि आधुनिक रशियन रिएक्टरों में सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम होते हैं जो पिघले हुए परमाणु ईंधन को बाहर फैलने से रोकते हैं, लेकिन किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में रूस पर सीधी कानूनी जिम्मेदारी डालना अंतरराष्ट्रीय अदालतों में बहुत पेचीदा काम होता है।

परमाणु ऊर्जा की तरफ क्यों बढ़ रहा है बांग्लादेश

सुरक्षा के इतने बड़े जोखिमों और भारी-भरकम खर्च के बावजूद बांग्लादेश आखिर परमाणु बिजली के पीछे क्यों भाग रहा है। इसका जवाब उसके मौजूदा बिजली संकट और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में छिपा है। वर्तमान में बांग्लादेश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस, कोयले और फर्नेस ऑयल जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। देश में 42% बिजली प्राकृतिक गैस से, 23% कोयले से और करीब 19% फीसदी फर्नेस ऑयल से आती है। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा भारत से खरीदी जाने वाली बिजली का है।

बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड के आँकड़ों के आधार पर बना चार्ट (फोटो साभार: AI ChatGPT)

बीते कुछ सालों में यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव की वजह से जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें लग गईं, गाँवों में कई-कई घंटों के पावर कट होने लगे और फैक्ट्रियों का उत्पादन ठप हो गया। इस बाहरी झटके ने बांग्लादेश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर देश को तरक्की की राह पर ले जाना है, तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा।

रूपपुर प्लांट जब 2028 में पूरी तरह चालू हो जाएगा, तो यह अकेले देश की 15% बिजली की जरूरत को पूरा करेगा। एनर्जी एनालिस्ट शफीकुल आलम के मुताबिक, इससे बांग्लादेश को अगले 5 से 7 साल तक कोई नया कोयला या गैस प्लांट लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे वह पर्यावरण के अनुकूल रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) पर ध्यान दे सकेगा।

एशिया में तेजी से बढ़ रही परमाणु उर्जा, रूस-चीन और भारत का दबदबा

दुनियाभर में बन रहे लगभग 80 परमाणु रिएक्टरों में से ज्यादातर एशिया में हैं और इन पर रूस व चीन का दबदबा है। ये दोनों देश विकासशील देशों को सस्ती दरों पर या लंबे समय के कर्ज (20 से 25 साल की आसान किश्तों) पर अपनी परमाणु तकनीक बेच रहे हैं। इसके जरिए वे इन देशों को अपने ऊपर दशकों के लिए निर्भर बना लेते हैं। बांग्लादेश को रूस द्वारा दिया गया भारी कर्ज उसे लंबे समय के लिए मॉस्को के रणनीतिक प्रभाव में ले आता है।

दक्षिण एशिया में परमाणु होड़ पहले से ही तेज है। भारत 2047 तक अपनी परमाणु क्षमता को 11 गुना बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की योजना पर काम कर रहा है (जिसमें रूस खुद तमिलनाडु के कुडनकुलम में रिएक्टर बना रहा है)। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में चीन ने 6 परमाणु रिएक्टर सप्लाई किए हैं जिनकी क्षमता 3.3 गीगावाट है।

परमाणु नीति के विशेषज्ञ टोबी डाल्टन (कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस) एक जरूरी चेतावनी देते हैं। उनका कहना है कि किसी भी विकासशील देश को परमाणु ऊर्जा के ‘हाइप’ (चकाचौंध) में आकर जल्दबाजी में फैसले नहीं लेने चाहिए। न्यूक्लियर प्लांट चलाने के लिए केवल रिएक्टर बना लेना काफी नहीं है, इसके लिए एक बेहद कुशल कार्यबल, एक पूरी तरह स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी (नियामक संस्था) और सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल हो चुके परमाणु कचरे (Spent Fuel) को सुरक्षित ठिकाने लगाने की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

ईस्ट-पाकिस्तान के दौर से जुड़ी है परमाणु जिद

वैसे, यहाँ ये जानना भी जरूरी है कि बांग्लादेश की यह परमाणु महत्वाकांक्षा कोई नई या अचानक पैदा हुई कहानी नहीं है। इसकी जड़ें 1960 के दशक से जुड़ी हैं, जब बांग्लादेश जैसी कोई जगह दुनिया के नक्शे पर नहीं थी और यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। साल 1961 में जब अविभाजित पाकिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की, तब पूर्वी पाकिस्तान के पबना जिले के रूपपुर में एक परमाणु संयंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।

उस समय जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई थी, लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने जानबूझकर इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और सारा ध्यान अपने इलाके (पश्चिमी पाकिस्तान) पर केंद्रित रखा। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के मन में यह बात हमेशा एक कसक की तरह चुभती रही कि उनके साथ भेदभाव किया गया।

साल 1971 में एक खूनी संघर्ष के बाद भारत ने जब बांग्लादेश को आजाद कराया, तो देश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान ने इस सपने को फिर से जिंदा करने की कोशिश की, लेकिन देश की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह योजना दशकों तक फाइलों में दबी रही। अब जब भारत और पाकिस्तान दोनों के पास बड़ी परमाणु क्षमताएँ हैं, तो बांग्लादेश के भीतर एक तरह का राष्ट्रीय गौरव जागा है। वहाँ के आम लोगों और वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर भारत और पाकिस्तान ऐसा कर सकते हैं, तो बांग्लादेश को भी यह क्षमता हासिल करनी चाहिए।

भारत दे रहा है तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग, रूस-बांग्लादेश के साथ त्रिपक्षीय समझौता

भारत-बांग्लादेश और रूस के बीच 1 मार्च 2018 को एक बड़ा समझौता हुआ था। इस त्रिपक्षीय समझौते में रूसी कंपनी जहाँ परमाणु संयत्र लगा रही है, तो वहीं भारत की तरफ से इस प्रोजेक्ट को पूरा तकनीकी सहयोग दिया जा रहा है। खास बात ये है कि भारत बांग्लादेशी परमाणु वैज्ञानिकों को बाकायदा ट्रेनिंग भी दे रहा है।

भारत-रूस-बांग्लादेश असैन्य परमाणु समझौते का शुरुआती स्क्रीनग्रैब

ये समझौता इस परमाणु प्रोजेक्ट के पूरी तरह से शुरू होने तक लागू रहेगा। इस पूरे प्रोजेक्ट में भारत सरकार धन से नहीं बल्कि अपने ज्ञान का मदद कर रही है, इसके लिए भारत के वैज्ञानिकों का पूरा खर्च भी बांग्लादेश ही उठा रहा है।

यहाँ ये बताना भी अहम है कि बांग्लादेश में आज परमाणु उर्जा संयत्र काम करने जा रहा है, तो उसमें भारत और रूस का पूरा सहयोग है। ये प्रोजेक्ट भी शेख हसीना सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का नमूना है, जिसे मोदी सरकार का भरपूर सहयोग मिला। आगे भी भारत इस प्रोजेक्ट को सहयोग करता रहेगा, ताकी पड़ोसी देश ऊर्जा के मामले में आँशिक आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ सके।

फीफा विश्व कप 2026 में रोमांचक जीत से सेमी में पहुँचे अर्जेंटीना और इंग्लैंड, अब फाइनल के लिए होगी जंग: पढ़ें कैसे डिफेंडिंग चैंपियन ने आखिरी पलों में स्विस टीम को दी मात

इंग्लिश क्लब आर्सेनल के लीजेंड, मशहूर खिलाड़ी व, डेनिस बर्जकेंप ने कभी कहा था – When you start supporting a football club, you don’t support it because of the trophies, or a player, or history, you support it because you found yourself somewhere there; found a place where you belong.

कहते हैं एकबार आप किसी फुटबॉल टीम से मोहब्बत कर बैठते हैं तो अपनी अंतिम सांसों तक भी उसका मोह, उसका दामन नहीं छोड़ पाते। यही तो है फुटबॉल का जादू।

खैर, बात करते हैं फीफा विश्व कप के बारे में।

बीती, देर रात ढाई बजे, टूर्नामेंट के तीसरे क्वार्टर फाइनल मुकाबले में, नॉर्वे के खिलाड़ी इंग्लैंड की टीम के विरुद्ध मैदान में उतरे। अर्लिंग हालांड के नेतृत्व में नॉर्वे एक बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरी थी। वहीं, कप्तान हैरी केन व साथी खिलाड़ियों के शानदार फॉर्म के दम पर इंग्लैंड इस मैच को जीत कर विश्व कप के सेमीफाइनल की ओर कदम बढ़ाना चाहती थी। नॉर्वे की कोशिश थी कि वह ब्राजील के खिलाफ किए शानदार प्रदर्शन को दुबारा दोहराते हुए एक बड़ा उलटफेर कर दे।

मियामी के स्टेडियम में मैच का आगाज़ होता है। नॉर्वे ने थ्री लाएंस को तब चौंका दिया था जब मैच के छत्तीसवें मिनट में युवा खिलाड़ी आंद्रेस सैल्देरुप एक जबरदस्त गोल दाग कर तीसरे क्वार्टर फाइनल मैच में इंग्लैंड के विरुद्ध अपनी टीम को बढ़त दिला देते हैं। सारा स्टेडियम वाइकिंग क्लैप्स से गूंज उठता है। इंग्लिश टीम थोड़ा परेशानियों में नजर आने लगती है।

मगर पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम में ज्यूड बेलिंघम एक गोल दागते हुए चिंता के बादलों को कहीं दूर भेज देते हैं। मैच के 45+2 मिनट पर बांई फ्लैंक से एंथोनी गोर्डन नॉर्वे के चार खिलाड़ियों के बीच से एक सटीक पास अपने साथी खिलाड़ी के लिए बढ़ाते हैं। ज्यूड बेलिंघम कोई ग़लती नहीं करते और स्कोर को 1-1 कर देते हैं।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने की कोशिशें करती रहती हैं। मगर, ना नॉर्वे कोई गोल कर सकी थी ना ही इंग्लैंड। विरोधी बॉक्स के करीब आकर अक्सर नॉर्वे के खिलाड़ी अपने स्टार स्ट्राइकर अर्लिंग हालांड को नजरअंदाज करते दिखे। कई दफा अर्लिंग हालांड खुद को बेहतरीन पोजीशन में लेकर जा रहे थे पर गेंद उनकी ओर नहीं बढ़ाई जा रही थी। इंग्लिश टीम भी तमाम प्रयासों के बावजूद गोल स्कोर नहीं कर पा रही थी। एक बार फिर ओर्हान नायलांड गोल पर नॉर्वे के लिए बेहतरीन रक्षण करते नजर आए। नब्बे मिनट तक स्कोर बराबरी पर रहने के चलते मैच एक्स्ट्रा टाइम में चला जाता है।

यहाँ 90+3 मिनट में एक बार फिर ज्यूड बेलिंघम ही एक संकटमोचक की भांति इंग्लैंड के लिए एक शानदार गोल स्कोर कर देते हैं। अंतिम समय पर बेलिंघम के इस गोल के चलते इंग्लैंड इस क्वार्टर फाइनल मुकाबले में 2-1 से बेहद अहम बढ़त ले लेता है।

नॉर्वे वापसी के कई प्रयास करता है परन्तु वापसी करने की उसकी तमाम कोशिशें निर्रथक ही रह जाती हैं। मैच समाप्ति पर स्कोर 2-1 ही रहता है। इंग्लैंड सेमीफाइनल में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेती है।

मेक्सिको के ख़िलाफ़ दो गोल मारने के पाँच दिन बाद ही बीती रात ज्यूड बेलिंघम ने फिर दो बेहद अहम गोल दाग आज खेल का रुख इंग्लैंड की ओर मोड़ दिया। तेईस वर्षीय ज्यूड बेलिंघम कप्तान हैरी केन की भांति अबतक इस विश्व कप में कुल छह गोल दाग चुके हैं। इंग्लिश टीम अपने इतिहास में चौथी दफा विश्व कप के सेमीफाइनल में जगह बना चुकी है।

इसके बाद सुबह साढ़े छह बजे, कन्सास सिटी स्टेडियम में कतर विश्व कप के विजेता, अर्जेंटीना, के समक्ष स्विट्जरलैंड की टीम थी। अर्जेंटीना ने पिछले मैच में अंतिम बारह मिनटों में करिश्माई खेल दिखाते हुए, मैच में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद, 3-2 से मिस्र के खिलाफ अपना मैच जीता था। वहीं, स्विट्जरलैंड की टीम अपना पिछला मैच जीतने के बाद से ही इस मुकाबले के लिए जोरदार तैयारी में लगी हुई थी। ग्रानित झ़ाका के नेतृत्व में आज सुबह स्विस खिलाड़ी कुछ बड़ा करना चाहते थे। हालाँकि जब तक उनतालीस वर्षीय लियोनेल मेस्सी एक बीस वर्षीय मेस्सी के जज्बे के साथ खेलते रहेंगे, अर्जेंटीना को हराना कोई आसान काम नहीं होने वाला था।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी जरूर काफी चिंताओं से घिरे हुए हैं। उनकी परेशानी का कारण है कि वह अपने अनुभवी खिलाड़ियों के साथ आगे बढ़ें या फिर बेंच पर मौजूद खुद को साबित करने के लिए भूखे युवा खिलाड़ियों जैसे वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी को मैदान पर उतारें।

दोनों ही टीमें मैदान पर आती हैं। अर्जेंटीना अपनी पारंपरिक अल्बीसेलेस्त ( हल्की नीली व सफेद धारियां) जर्सी पहने मैदान में उतरती है। सामने थी बेहद प्यारी लाल रंग की अपनी जर्सी में स्विट्जरलैंड की टीम, जिसके पास आज खोने को कुछ भी न था। दोनों ही टीमों के समर्थकों का हुजूम स्टेडियम में उमड़ा हुआ था। लोगों में खुशी का माहौल था।

निर्धारित समय पर रेफरी होआओ पेड्रो पिन्हियेरो से इशारा मिलते ही टूर्नामेंट के आखिरी क्वार्टर फाइनल की शुरुआत होती है। स्विट्जरलैंड की टीम बेहद शानदार अंदाज में मैच की शुरुआत करते हैं। लेकिन मैच के दसवें मिनट में वह अर्जेंटीनी टीम को कॉर्नर प्रदान कर देते हैं। लियोनेल मेस्सी कॉर्नर लेने आगे आते हैं। वो एक बेहतरीन गेंद स्विस बॉक्स में भेजते हैं। वहां लीवरपूल के लिए क्लब फुटबॉल खेलने वाले एलिक्सिस मैक एलिस्टर मौका मिलते ही जोरदार हेडर से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीना इस गोल के साथ मैच में बढ़त ले लेती है। दर्शक दीर्घा में बैठे हजारों अर्जेंटीनी समर्थक उन्माद से पगलाए नजर आने लगते हैं।

खैर, मैच आगे बढ़ता है। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 ही रहता है। अगर अंत तक यही स्कोर रहे तो आज स्विट्जरलैंड की वापसी तय थी। वह लगातार अटैकिंग मूव्स बनाते रहते हैं। स्विस फॉरवर्ड लाइन बारम्बार अर्जेंटीनी रक्षापंक्ति को भेदने की कोशिशें करती रहती है। लेकिन लिसांद्रो मार्टिनेज़ आज बेहद शानदार रक्षण कर रहे थे। वह कई जरूरी टैकल्स करते जा रहे थे।

मगर सड़सठवें मिनट में दान न्दोऐ बांई छोर से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। वह गेंद साथी खिलाड़ी की ओर सरका कर अपने लिए रिक्त स्थान बनाते हैं और तुरंत गेंद वापस पा कर गोलपोस्ट की दिशा में तीव्र शॉट लगाते हैं। गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ का दुर्ग भेदा जा चुका था। स्कोर बराबर हो चुका था। इस बार खुशियां मनाने की बारी स्विस समर्थकों की थी।

लेकिन पाँच मिनट पश्चात ही खेल में एक मोड़ आता है जब पहले ही एक येलो कार्ड पाए ब्रील एम्बोलो को फाउल करने के चलते रेफरी द्वारा रेड कार्ड दिखा दिया जाता है। इतने बड़े मौके पर यह एक बेहद बचकानी गलती थी, जो आगे चलकर टीम के लिए बहुत महँगी भी साबित हो सकती थी।

स्विट्जरलैंड की टीम अब दस खिलाड़ियों के संग खेलने के लिए अभिशप्त हो गई थी। खेल आगे बढ़ता है। अर्जेंटीना बढ़त लेने की फिराक में कई हमले करती है। मगर उनके यह मंसूबे सफल नहीं रहते। दस खिलाड़ियों के साथ भी स्विस टीम का रक्षण काबिले-तारीफ था। मैच अब धीरे-धीरे एक्स्ट्रा-टाइम की दिशा में सरकता दिख रहा था।

नब्बे मिनट की समाप्ति तक स्विट्जरलैंड विपक्षी टीम को बढ़त लेने से वंचित रखते हैं। मैच अब एक्स्ट्रा-टाइम में जा चुका था। स्विस टीम अब तक काफी थक चुकी थी। दोनों ही टीमें कुछ जरूरी परिवर्तन भी करती हैं। मैच के 112 मिनट में होसे़ मैनुएल लोपेज़ तीन स्विस डिफेंडरों को अपनी ओर खींचते हुए गेंद को साथी खिलाड़ी हूलियन अल्वारेज़ की ओर बढ़ाते हैं। हूलियन अल्वारेज़ बॉक्स के बाहर से ही एक बेहतरीन कर्लिंग शॉट कोबेल के पोस्ट की और लगाते हैं। गोलकीपर कोबेल इस जादुई शॉट के आगे बेबस नजर आते हैं। अल्वारेज़ एक ऐसे समय में, जब मैच पेनाल्टी शूटआउट की ओर बढ़ रहा था, यह गोल दाग कर अर्जेंटीना को मैच में आगे कर देते हैं।

आठ मिनट पश्चात अर्जेंटीना फिर एकबार मौका पाते ही तेज काउंटर अटैक करती है। अल्माडा स्विस गोलपोस्ट पर निशाना साधते हैं। गेंद गोलकीपर से छिटक जाती है। लाउतारो मार्टिनेज तुरंत आगे बढ़ कर गेंद को जाल के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीना 3-1 से यह मैच जीत जाता है।

तीन नॉकआउट मैचों में तीन-तीन गोल दागते हुए तीनों दफा पिछड़ने के बावजूद वापसी करते हुए गत विजेता सेमीफाइनल में पहुंच चुके हैं। अब अपने इतिहास का छठा सेमीफाइनल खेलने जा रही अर्जेंटीना का सामना होगा शानदार फुटबॉल खेल रही थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम से।

सेमीफाइनल मुकाबलों की बिसात सज चुकी है। अब पहले तो पंद्रह जुलाई को जबरदस्त अटैकिंग फुटबॉल खेल रही, इस टूर्नामेंट की सबसे संतुलित टीम फ्रांस का सामना होगा उनके हालिया वर्षों के चिर प्रतिद्वंद्वी स्पेन से। स्पेन की रक्षापंक्ति ने पूरे टूर्नामेंट में अबतक मात्र एक गोल खाया है। लेकिन वो गोल दागने के लिए भी संघर्षरत नजर आए हैं। डलास स्टेडियम में मजबूत अटैकिंग फोर्स एक बेहद मजबूत रक्षापंक्ति की परिक्षा लेती दिखेगी। कई पुराने हिसाब भी चुकता किए जाने हैं। यह बेहद शानदार मैच रहने वाला है।

फिर सोलह जुलाई को अटलांटा स्टेडियम में गत विजेता का सामना होगा शानदार फार्म में चल रही इंग्लिश टीम से। दोनों ही टीमें कैसे भी यह मैच जीत फाइनल में जगह बनाने का प्रयास करेंगी। अर्जेंटीनी टीम अबतक चंद खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन के चलते तीन नॉकआउट मुकाबलों में किसी तरह अपेक्षाकृत छोटी टीमों के खिलाफ जूझते हुए अंतिम क्षणों में बढ़त लेकर यहाँ तक पहुँची है। उनके पास बेंच पर नीको पाज, सिमियोनी व वैलेंटीन बार्को सरीखे तेजतर्रार युवा खिलाड़ी मौजूद हैं।

मगर कोच लियोनेल स्कालोनी ने अभी तक उम्रदराज खिलाड़ियों के अनुभव पर ही दाँव खेला है। अब सेमीफाइनल के बड़े मौके पर वह कुछ अलग करने का जोखिम शायद ही उठाएँ। इंग्लैंड की टीम के पास युवा व अनुभवी खिलाड़ियों की बेहतरीन फौज है जो अंत तक हार नहीं मानती। उनके पास अच्छा अटैक और शानदार डिफेंस है। इंग्लिश टीम के खिलाफ अर्जेंटीना के लिए मुकाबला बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। यह एक और जबरदस्त टक्कर होगी।

फुटबॉल की खबरें जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

वीवा ला फुटबॉल।

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया से दूरी बना रही Gen Z? न्यूयॉर्क में ‘समर ऑफ लड’ फेस्टिवल की धूम: जानिए डिजिटल गुलामी के खिलाफ युवाओं ने क्यों छेड़ी जंग

न्यूयॉर्क की सड़कों पर इन दिनों बड़ी संख्या में Gen Z युवा जुट रहे हैं। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि वे किसी प्रदर्शन या नए ट्रेंड का हिस्सा हैं, लेकिन इसकी वजह चौंकाने वाली है।

यही वह पीढ़ी है, जिसने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपनी दुनिया बना लिया था, लेकिन अब वही युवा कुछ समय के लिए मोबाइल से दूरी बनाने की अपील कर रहे हैं। वे लोगों से कह रहे हैं कि स्क्रीन छोड़िए, सामने बैठे इंसानों से बात कीजिए।

दरअसल न्यूयॉर्क में आयोजित हो रहा ‘समर ऑफ लड’ (Summer of Ludd) फेस्टिवल तकनीक के विरोध का नहीं, बल्कि डिजिटल जिंदगी और वास्तविक दुनिया के बीच खोते संतुलन को फिर से पाने की कोशिश बनकर उभर रहा है।

आखिर क्या है समर ऑफ लड?

न्यूयॉर्क के ईस्ट विलेज और टॉम्पकिन्स स्क्वायर पार्क में आयोजित होने वाला समर ऑफ लड आठ दिन तक चलने वाला ऑफलाइन फेस्टिवल है। इस साल यह फेस्टिवल 28 जून से 5 जुलाई तक चला। इसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ आने वाले लोगों से पूरे कार्यक्रम के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करने की अपील की जाती है। किसी भी कार्यक्रम में फोटो खींचने, वीडियो बनाने या रिकॉर्डिंग करने की अनुमति नहीं होती।

आज जब किसी भी कार्यक्रम का प्रचार सोशल मीडिया पर होता है, तब इस फेस्टिवल ने बिल्कुल अलग रास्ता चुना है। इसके पोस्टर और कार्यक्रम की जानकारी इंटरनेट पर नहीं, बल्कि इलाके में लगाए गए पोस्टरों, पर्चों और छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के जरिए लोगों तक पहुँचाई जाती है।

आयोजकों का मानना है कि अगर उद्देश्य लोगों को स्क्रीन से बाहर निकालना है, तो शुरुआत भी ऑफलाइन तरीके से ही होनी चाहिए। फेस्टिवल में कई तरह की गतिविधियाँ आयोजित होती हैं।

इनमें नाटक, ऑफलाइन डेटिंग सेशन, कपड़ों की मरम्मत सीखने की कार्यशालाएँ, जीन (Zines) बनाना, शॉर्टवेव रेडियो सीखना, सामुदायिक चर्चाएँ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और निगरानी तकनीकों (Surveillance) पर खुली बहस शामिल है।

इन गतिविधियों का मकसद लोगों को यह एहसास कराना है कि मनोरंजन, सीखने और रिश्ते बनाने के लिए सिर्फ इंटरनेट ही एकमात्र रास्ता नहीं है।

Gen Z क्यों बन रही है इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत?

इस फेस्टिवल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें सबसे ज्यादा भागीदारी Gen Z की है। यह वही पीढ़ी है जिसने बचपन से स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच अपनी जिंदगी बिताई है।

कुछ साल पहले तक यही माना जाता था कि युवा पीढ़ी तकनीक के बिना रह ही नहीं सकती। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। कई युवा खुलकर कह रहे हैं कि लगातार मोबाइल पर बने रहने से उनकी एकाग्रता कम हुई है, मानसिक थकान बढ़ी है और वास्तविक रिश्तों पर असर पड़ा है।

अमेरिका में हुए एक सर्वे के अनुसार, लगभग आधे किशोर मानते हैं कि सोशल मीडिया उनकी उम्र के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी बढ़ा है। इससे यह संकेत मिलता है कि युवा अब डिजिटल दुनिया के फायदों के साथ-साथ उसके नुकसान को भी समझने लगे हैं।

यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा अब कुछ समय के लिए डिजिटल दुनिया से दूरी बनाकर वास्तविक दुनिया में लोगों से मिलने, बातचीत करने और नई चीजें सीखने की कोशिश कर रहे हैं।

यह तकनीक विरोध नहीं, संतुलित तकनीक की माँग है

कई लोगों को लग सकता है कि यह आंदोलन तकनीक के खिलाफ है, लेकिन आयोजक इस धारणा को गलत बताते हैं। उनका कहना है कि स्मार्टफोन, इंटरनेट या AI ने लोगों की जिंदगी आसान बनाई है और वे इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका असली सवाल यह है कि क्या इंसान अब अपनी तकनीक का मालिक है या धीरे-धीरे उसका गुलाम बनता जा रहा है।

आज सोशल मीडिया के एल्गोरिदम तय करते हैं कि हम क्या देखें, किस तरह की खबरें पढ़ें और किस तरह के वीडियो हमारे सामने आएँ। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हमारे व्यवहार, पसंद और आदतों का लगातार डेटा इकट्ठा करते हैं। ऐसे में आयोजकों का कहना है कि जरूरत तकनीक को खत्म करने की नहीं, बल्कि उस पर इंसानों का नियंत्रण बनाए रखने की है।

उनके मुताबिक, तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाए, लेकिन हमारे फैसले, समय और रिश्तों पर पूरी तरह हावी न हो।

युवाओं को आखिर किस बात की सबसे ज्यादा चिंता है?

फेस्टिवल में शामिल होने वाले कई लोगों ने अपनी चिंताओं को खुलकर साझा किया। किसी ने कहा कि घंटों तक बिना वजह सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब आदत बन चुका है। किसी ने माना कि हर समय ऑनलाइन रहने की वजह से मानसिक दबाव बढ़ गया है। कुछ लोगों ने अकेलेपन, तनाव और लगातार तुलना करने की संस्कृति को भी बड़ी समस्या बताया।

इसके अलावा AI और निगरानी तकनीकों को लेकर भी युवाओं में चिंता दिखाई देती है। उनका मानना है कि आज इंटरनेट पर की गई लगभग हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। कंपनियाँ लोगों की पसंद और व्यवहार का डेटा इकट्ठा करती हैं और उसी के आधार पर उन्हें विज्ञापन और कंटेंट दिखाया जाता है।

युवाओं का कहना है कि सुविधा के नाम पर निजी जिंदगी धीरे-धीरे सार्वजनिक होती जा रही है। यही वजह है कि वे अब डिजिटल दुनिया और निजी जीवन के बीच संतुलन चाहते हैं।

‘Ludd’ नाम के पीछे क्या है कहानी?

इस फेस्टिवल का नाम 19वीं सदी के Luddites आंदोलन से लिया गया है। औद्योगिक क्रांति के दौरान इंग्लैंड में जब नई मशीनें फैक्ट्रियों में आने लगीं, तब कई कारीगरों और मजदूरों को डर था कि मशीनें उनके रोजगार छीन लेंगी। इसी वजह से उन्होंने उन मशीनों का विरोध किया। इतिहास में उन्हें Luddites के नाम से जाना गया।

हालाँकि आज का समर ऑफ लड आंदोलन उस दौर से काफी अलग है। यहाँ कोई मशीन तोड़ने या तकनीक खत्म करने की बात नहीं हो रही है। आयोजकों का कहना है कि वे सिर्फ लोगों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि तकनीक का उद्देश्य इंसानों की मदद करना है, उन पर हावी होना नहीं। यानी पुराने आंदोलन में सवाल रोजगार का था, जबकि आज का सवाल इंसानी समय, ध्यान और स्वतंत्रता का है।

विशेषज्ञ इस आंदोलन को कैसे देखते हैं?

तकनीक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की पहल लोगों को अपनी डिजिटल आदतों पर दोबारा सोचने का मौका देती है। हालाँकि वे यह भी कहते हैं कि आज की दुनिया में स्मार्टफोन और इंटरनेट से पूरी तरह दूरी बनाना लगभग असंभव है। बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, नौकरी, यात्रा, सरकारी सुविधाएँ और रोजमर्रा के कई जरूरी काम अब डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौती तकनीक छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके संतुलित इस्तेमाल की है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अधिकांश लोग मोबाइल और सोशल मीडिया के नुकसान को समझते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उनका सामाजिक और पेशेवर जीवन इन्हीं प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो चुका है।

यानी बदलाव आसान नहीं होगा, लेकिन इस तरह के आंदोलन कम से कम लोगों को सोचने पर मजबूर जरूर करते हैं।

क्या यह डिजिटल डिटॉक्स का नया ट्रेंड बन सकता है?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों में डिजिटल डिटॉक्स यानी कुछ समय के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है।

कई लोग अब छुट्टियों में मोबाइल बंद रखते हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया से कुछ दिनों का ब्रेक लेते हैं। कुछ लोग स्मार्टफोन की जगह साधारण फीचर फोन का इस्तेमाल शुरू कर रहे हैं। ऑफलाइन बुक क्लब, रनिंग क्लब, सामुदायिक कार्यक्रम और बिना मोबाइल वाले मिलन समारोह भी लोकप्रिय हो रहे हैं।

ऐसे में समर ऑफ लड को केवल एक स्थानीय फेस्टिवल नहीं, बल्कि इसी बदलती सोच का हिस्सा माना जा रहा है। यह बताता है कि अब लोग तकनीक को पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि उसके साथ एक स्वस्थ रिश्ता बनाना चाहते हैं।

क्या यह आंदोलन सफल होगा?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि न्यूयॉर्क का यह छोटा-सा फेस्टिवल आगे चलकर दुनिया भर में बड़ा सामाजिक आंदोलन बनेगा या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिससे आज लगभग हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता जुड़ा हुआ है।

क्या लगातार स्क्रीन पर बिताया गया समय हमारी मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है? क्या सोशल मीडिया हमारे रिश्तों को बदल रहा है? क्या AI और एल्गोरिदम हमारे फैसलों पर असर डाल रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इंसान अब भी अपनी डिजिटल जिंदगी का मालिक है?

इन सवालों के जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं, लेकिन यह फेस्टिवल लोगों को कम से कम इतना सोचने पर मजबूर जरूर करता है कि तकनीक हमारी जिंदगी का हिस्सा रहे, लेकिन हमारी पूरी जिंदगी न बन जाए।

ब्रह्मपुत्र पर दुनिया का सबसे बड़ा बाँध नहीं Time Bomb प्लांट कर रहा China? चीनी सरकारी रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता: जानें- एक्टिव फॉल्ट लाइन पर बन रहा ये डैम क्यों है बेहद खतरनाक

चीन तिब्बत के पठार पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना (Hydropower Project) का निर्माण कर रहा है। यह महा-बाँध तिब्बत में यारलुंग सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी पर बनाया जा रहा है। इस परियोजना को लेकर भारत और बांग्लादेश जैसे निचले तटीय देश लंबे समय से पर्यावरण और सुरक्षा कारणों से चिंता जताते रहे हैं। लेकिन दिन पहले आई एक नई जियोलॉजिकल रिपोर्ट में हुए खुलासे ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।

इस बार चेतावनी किसी बाहरी देश या स्वतंत्र संस्था ने नहीं, बल्कि खुद चीन के सरकारी वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों (Geologists) ने दी है। चीनी वैज्ञानिकों की एक आधिकारिक रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि जहाँ यह बाँध बनाया जा रहा है, उसके ठीक नीचे एक बेहद खतरनाक और ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ (Active Fault Line) मौजूद है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप आता है, तो यह बाँध एक बहुत बड़े ‘टाइम बम’ की तरह फट सकता है, जिससे न केवल चीन बल्कि भारत और बांग्लादेश में अभूतपूर्व तबाही मच सकती है।

क्या है एक्टिव फॉल्ट लाइन और यह ‘पैझेन फॉल्ट’ कितनी खतरनाक है?

इस पूरे विवाद और खतरे को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ यानी सक्रिय भ्रंश रेखा क्या होती है। हमारी धरती के भीतर कई विशाल टेक्टोनिक प्लेट्स होती हैं, जो लगातार बहुत धीमी गति से हिलती-डुलती रहती हैं। जब ये प्लेट्स आपस में टकराती हैं या एक-दूसरे से रगड़ खाती हैं, तो चट्टानों में दरारें पड़ जाती हैं।

इन्हीं दरारों को भूविज्ञान (Geology) की भाषा में फॉल्ट (Fault) या भ्रंश कहा जाता है। ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ उस दरार को कहते हैं जहाँ हाल के भूगर्भीय इतिहास में हलचल हुई हो और भविष्य में भी कभी भी बड़ा भूकंप आने की पूरी संभावना हो। चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में जिस दरार का जिक्र किया है, उसका नाम ‘पैझेन फॉल्ट’ (Paizhen Fault) है।

यह फॉल्ट लाइन उस पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहाँ भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेट के बीच भीषण और निरंतर टकराव हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पैझेन फॉल्ट प्लीस्टोसिन युग (Pleistocene Epoch यानी हिमयुग) से ही अत्यधिक सक्रिय रही है।

आधुनिक वैज्ञानिक जाँच और प्राचीन झील के तलछटों (Lake Sediments) की डेटिंग से पता चला है कि यह फॉल्ट लाइन लगभग 9,500 साल पहले भी सक्रिय थी और वर्तमान होलोसिन (Holocene) युग में भी इसमें लगातार मजबूत हलचल देखी जा रही है।

साल 2017 में तिब्बत के मिलिन क्षेत्र में आया 6.9 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप इसी पैझेन फॉल्ट लाइन के उत्तरी छोर पर आया था, जो इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यह क्षेत्र कभी भी बड़े भूकंप से दहल सकता है।

चीनी सरकारी शोधकर्ताओं ने रिपोर्ट में क्या-क्या खुलासे किए हैं?

चीन के इस महा-बाँध को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है, वह किसी साधारण संस्था की नहीं है। इसे चीन के सरकारी महकमे ‘चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण’ (China Geological Survey) की देखरेख में तैयार किया गया है और पिछले महीने ही इसे चीनी भाषा के प्रतिष्ठित जर्नल ‘सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है।

इस अध्ययन को चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के नागरिक-सैन्य एकीकरण केंद्र और मध्य यारलुंग जांगबो नदी प्राकृतिक संसाधन अवलोकन और अनुसंधान स्टेशन के भूवैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से अंजाम दिया है।

इस सरकारी रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बेहद कड़े शब्दों में चेताया है कि एक्टिव पैझेन फॉल्ट सीधे तौर पर इस मेगा-डैम के बुनियादी ढाँचे की अखंडता को खतरे में डाल रही है। वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में बताया है कि इस एक्टिव फॉल्ट लाइन के कारण आसपास की चट्टानें पूरी तरह टूट चुकी हैं और उनके आंतरिक यांत्रिक गुण (Mechanical Properties) बदल चुके हैं।

इसके कारण जमीन के भीतर की संरचना बेहद कमजोर हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की जमीनी बनावट बेहद ढीली है और चट्टानों के बीच का आपसी जुड़ाव या सामंजस्य (Cohesion) बहुत कमजोर है। चीनी शोधकर्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि जब इस बाँध के विशाल जलाशय (Reservoir) को पानी से भरा जाएगा, तो लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण यहाँ की मिट्टी और चट्टानें पानी सोखकर और कमजोर हो जाएँगी।

ऐसी स्थिति में फॉल्ट लाइन की मामूली हलचल या किसी भी भूकंप के झटके से बाँध के दोनों तरफ की पहाड़ियों पर बेहद आसानी से भयंकर भूस्खलन (Landslides) और चट्टानें खिसकने की घटनाएँ शुरू हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति निर्माण कार्य में लगे कर्मियों और भविष्य में बाँध के पूरे ढाँचे के लिए एक बड़ा सुरक्षा संकट खड़ी कर सकती है।

कहाँ बन रहा है यह दुनिया का सबसे बड़ा बाँध और क्या है इसका पैमाना?

चीन इस विशालकाय परियोजना को तिब्बत के मेडोग (Metog) काउंटी में बना रहा है, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘मेडोग हाइड्रोपावर स्टेशन’ (Medog Hydropower Station) नाम दिया गया है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह यारलुंग सांगपो नदी के ‘ग्रेट बेंड’ (Great Bend) के पास स्थित है।

यहाँ नदी अचानक एक बेहद तीखा मोड़ लेती है और करीब 2,000 मीटर गहरी खाई में गिरती है। चीन इसी प्राकृतिक ढलान और पानी के प्रचंड वेग का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए करना चाहता है। यह बाँध स्थल भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश की सीमा से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

इस बाँध के आकार और क्षमता की बात करें तो यह वास्तव में एक विशाल ढाँचा है। यह एक 60,000 मेगावाट की ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ पनबिजली परियोजना है। चीन के सरकारी दावों के अनुसार, इस बाँध से हर साल लगभग 300 बिलियन (30,000 करोड़) किलोवाट-घंटा बिजली पैदा होगी।

यह क्षमता चीन में ही पहले से मौजूद दुनिया के सबसे बड़े बाँध ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ (Three Gorges Dam) की कुल वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता से तीन गुना अधिक है। इस महा-परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1.2 ट्रिलियन युआन (यानी लगभग 137 से 167 बिलियन अमेरिकी डॉलर) आँकी गई है।

चीनी सरकार ने दिसंबर 2024 में इस परियोजना को मंजूरी दी थी, जुलाई 2025 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और इसे साल 2033 तक पूरी तरह से चालू करने का एक बेहद कड़ा और तेज समयबद्ध लक्ष्य तय किया गया है।

इतने बड़े खतरों के बावजूद इस प्रोजेक्ट को पूरा करने पर क्यों अड़ा है चीन?

अब यहाँ एक बड़ा और स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि जब चीन के अपने ही सरकारी वैज्ञानिकों ने इस जगह को एक ‘जियोलॉजिकल टाइम बम’ बता दिया है, तो फिर चीन की सरकार इतने बड़े खतरों को नजरअंदाज करके इस प्रोजेक्ट को पूरा करने पर क्यों अड़ी है? आखिर चीन के लिए इस परियोजना का क्या मतलब है और उसके पीछे उसकी क्या मंशा है? इसके पीछे चीन के कई गहरे रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण छिपे हैं।

सबसे पहला कारण चीन की विशाल ऊर्जा भूख और उसकी वैश्विक कार्बन-तटस्थता (Carbon Neutrality) की घोषणा है। चीन ने दुनिया के सामने वादा किया है कि वह आने वाले दशकों में अपनी कार्बन निर्भरता को कम करेगा और इसके लिए उसे भारी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत है।

यह अकेला बाँध चीन को इतनी बिजली दे सकता है जो उसके कई बड़े शहरों को रोशन कर सके और कोयले पर उसकी निर्भरता को बेहद कम कर दे। दूसरा बड़ा कारण चीन का अति-राष्ट्रवादी इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया के सामने अपनी तकनीकी और इंजीनियरिंग ताकत का लोहा मनवाना चाहती है।

‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से तीन गुना बड़ा बाँध बनाना चीन के वैश्विक दबदबे और उसकी आंतरिक राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा प्रतीक है। तीसरा और सबसे खतरनाक कारण है भू-राजनीतिक हथियार (Geo-political Weapon)। तिब्बत का यह इलाका भारत की सीमा के बेहद करीब है।

इस नदी पर इतना बड़ा बाँध बनाकर चीन पानी के नियंत्रण की चाबी अपने हाथ में लेना चाहता है। भविष्य में भारत या अन्य पश्चिमी देशों के साथ किसी भी टकराव या युद्ध की स्थिति में, चीन इसके जरिए पानी को रोककर या अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़कर निचले इलाकों में कृत्रिम बाढ़ ला सकता है। हालाँकि ऐसा मुश्किल ही है, क्योंकि इससे उसे भी खतरा है।

यही वजह है कि चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रोजेक्ट को बंद करने या रद्द करने की सिफारिश नहीं की है क्योंकि वे जानते हैं कि बीजिंग के राजनीतिक आकाओं के सामने ऐसी बात कहना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। वैज्ञानिकों ने केवल इसके ढलानों को मजबूत करने और कंक्रीट की सुरक्षा दीवारें बनाने जैसी तकनीकी सलाह दी है, ताकि परियोजना को किसी भी तरह जारी रखा जा सके।

भारत और बांग्लादेश के लिए इस बाँध से किस तरह का सीधा खतरा है?

यारलुंग सांगपो नदी कोई स्थानीय नदी नहीं है।  यह एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। यह तिब्बत के पश्चिमी हिस्से में आंग्सी ग्लेशियर से निकलती है और तिब्बत में 1,625 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहाँ इसे ‘सियांग’ और बाद में असम में ‘ब्रह्मपुत्र’ कहा जाता है।

इसके बाद यह नदी बांग्लादेश में ‘जमुना’ के नाम से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसलिए सीमा से महज 50 किलोमीटर दूर चीन का यह निर्माण सीधे तौर पर भारत और बांग्लादेश की सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। भारत के लिए सबसे बड़ा तात्कालिक खतरा भूगर्भीय विफलता (Geological Failure) का है।

यदि चीनी वैज्ञानिकों की आशंका सच साबित होती है और पैझेन फॉल्ट पर आए किसी भूकंप के कारण यह विशाल बाँध टूट जाता है, तो इसके जलाशय में जमा अरबों क्यूसेक पानी एक साथ किसी महाप्रलय की तरह नीचे की ओर बहेगा।

यह पानी अरुणाचल प्रदेश और असम के पूरे मैदानी इलाकों को कुछ ही घंटों में जलमग्न कर देगा, जिससे लाखों लोगों की जान जा सकती है और अभूतपूर्व तबाही मच सकती है।

हालाँकि कुछ जलविज्ञानी और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन पूरी तरह से ब्रह्मपुत्र का पानी नहीं मोड़ सकता, क्योंकि ब्रह्मपुत्र नदी को अपना 85 से 90 प्रतिशत पानी भारत में प्रवेश करने के बाद उसकी सहायक नदियों और मानसूनी बारिश से मिलता है।

भारत सरकार का इस पूरे मामले पर क्या रुख रहा है?

भारत सरकार चीन की इस खतरनाक गतिविधि पर बहुत बारीक नजर रख रही है। सीमा के इतने करीब दुनिया के सबसे बड़े बाँध का निर्माण भारत के लिए एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। भारत सरकार ने इस विषय को कई बार चीन के सामने राजनयिक स्तर पर उठाया है।

साल 2025 की शुरुआत में जनवरी के महीने में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी अधिकारियों के समक्ष इस बाँध के निचले तटीय इलाकों (Downstream) पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर भारत की गंभीर चिंताओं से अवगत कराया था।

इसके बाद फरवरी 2025 में भी भारत ने चीनी प्रशासन को अपनी आपत्तियाँ भेजी थीं। अगस्त 2025 में भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने देश को आश्वस्त किया था कि भारत सरकार तिब्बत में हो रहे इन सभी घटनाक्रमों और निर्माण कार्यों को लेकर पूरी तरह सतर्क है।

उन्होंने बताया था कि सरकार विभिन्न स्थापित तंत्रों और सैटेलाइट मॉनिटरिंग (Satellite Monitoring) के माध्यम से इस बाँध स्थल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है।

भारत लगातार चीन पर इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि वह एक जिम्मेदार ऊपरी तटीय देश (Upper Riparian State) की तरह व्यवहार करे और नदी के जल स्तर तथा भूगर्भीय अध्ययनों से जुड़े आँकड़ों को भारत के साथ साझा करे, ताकि किसी भी संभावित प्राकृतिक आपदा या बाँध टूटने जैसी आपातकालीन स्थिति से समय रहते निपटा जा सके। लेकिन चीनी वैज्ञानिकों की इस नई रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि यह मुद्दा अब सिर्फ कूटनीति का नहीं, बल्कि पूरी मानवता और पर्यावरण की रक्षा का बन चुका है।

धोलावीरा: हजारों साल से खुद को पढ़े जाने का इंतजार करते वो 10 चिह्न, कहानी दुनिया के ‘सबसे प्राचीन’ साइनबोर्ड की

हममें से अधिकतर लोगों से अगर पूछा जाए कि पढ़ाई में सबसे ज्यादा बोरियत किस विषय से होती है तो जवाब अक्सर इतिहास ही होगा। उसकी उबाऊ तारीखें, नाम और घटनाएँ हमें थका देती हैं। लेकिन इसी इतिहास का एक दूसरा चेहरा भी है। वही इतिहास जब किसी कहानी की तरह सामने आता है तो लगता है कि हम भी उस वक्त में, उस दौर में वहाँ जी रहे होते।

कहीं वह किसी घने जंगल में छिपा मिलता है, कहीं पहाड़ों के बीच, कहीं किसी मंदिर की दीवार पर और कहीं जमीन की कई परतों के नीचे दबा हुआ। मिट्टी हटती है, कोई पुरानी चीज सामने आती है और अचानक ऐसा लगता है कि हजारों साल पुरानी दुनिया हमारे सामने फिर साँस ले रही है।

इतिहास के ऐसे किस्से हमें केवल यह नहीं बताते कि हमारे पूर्वज कैसे रहते थे। वे हमें यह भी दिखाते हैं कि प्राचीन सभ्याएँ कैसे बनीं, कैसे बड़ी हुईं, कितनी समझदार और व्यवस्थित थीं और फिर एक दिन समय की धूल में खो गईं। इन कहानियों में शहर हैं, लोग हैं, रहस्य है और ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आज भी पूरी तरह नहीं मिला।

आज हम ऐसे ही एक किस्से की बात करेंगे। यह कहानी गुजरात के कच्छ के रण में बसे धोलावीरा की है। यहाँ करीब 4500 साल पहले एक समृद्ध शहर खड़ा था। इसी शहर के भव्य उत्तरी दरवाजे पर लगा था दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात साइनबोर्ड… सफेद जिप्सम से बने दस बड़े चिन्हों वाला एक ऐसा बोर्ड, जो वो सभ्यता खत्म होने के हजारों साल बाद तक मिट्टी में दबा रहा और फिर एक दिन इतिहास बनकर हमारे सामने आया। हालाँकि, इस पर क्या लिखा है यह अभी तक कोई नहीं पढ़ पाया है।

उत्तरी दरवाजे के कमरे में मिली असाधारण खोज

धोलावीरा का यह प्रसिद्ध साइनबोर्ड शहर के किले जैसे ऊँचे हिस्से के उत्तरी प्रवेश द्वार से मिला था। धोलावीरा की खुदाई का नेतृत्व करने वाले पुरातत्वविद् आरएस बिष्ट की रिपोर्ट के अनुसार, दस बड़े चिह्न उत्तरी दरवाजे के पश्चिमी कक्ष में गिरे हुए मिले थे। जिस स्थिति में वे पाए गए, उससे पुरातत्वविदों ने अनुमान लगाया कि वे पहले एक लकड़ी के बोर्ड में जड़े हुए थे।

यह बोर्ड संभवतः उत्तरी दरवाजे के बीच से गुजरने वाले मुख्य रास्ते के ऊपर लगाया गया था। यानी यह किसी बंद कमरे में रखा गया धार्मिक या निजी लेख नहीं था। इसकी जगह ऐसी थी जहाँ से शहर में आने-जाने वाले लोग इसे देख सकते थे। इसी सार्वजनिक स्थिति और चिन्हों के विशाल आकार के कारण इसे ‘धोलावीरा साइनबोर्ड’ कहा जाता है।

उत्तरी दरवाजे का मुख्य रास्ता करीब 3.5 मीटर चौड़ा था। खुदाई में मिले चिह्नों और लकड़ी के फ्रेम की छाप की लंबाई भी लगभग इतनी ही थी। इससे इस संभावना को बल मिला कि बोर्ड उसी दरवाजे के ऊपर उसकी चौड़ाई के अनुरूप लगाया गया था। बिष्ट ने लिखा कि यह बोर्ड दरवाजे के सामने वाले हिस्से पर इतनी ऊँचाई पर रहा होगा कि उसके सफेद चमकीले अक्षर दूर से दिखाई देते हों।

पत्थर के नहीं, जिप्सम के टुकड़ों से बनाए गए थे चिह्न

इस खोज को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि चिह्न किसी सपाट पत्थर पर लिखे या खोदे नहीं गए थे। उन्हें सफेद जिप्सम के अलग-अलग आकार वाले टुकड़ों को जोड़कर तैयार किया गया था। इन छोटे टुकड़ों को मोजेक की तरह सजाकर दस विशाल चिह्न बनाए गए और फिर लकड़ी के एक लंबे तख्ते में जड़ा गया था।

जिप्सम का सफेद रंग गहरे रंग की लकड़ी के ऊपर बहुत स्पष्ट दिखाई देता होगा। धोलावीरा का उत्तरी दरवाजा शहर की सबसे प्रभावशाली संरचनाओं में से एक था और ऊँची जगह पर बना हुआ था। इसलिए यहाँ लगाया गया चमकीला बोर्ड केवल सजावट नहीं बल्कि जानबूझकर दूर से पढ़े या पहचाने जाने के लिए बनाया गया सार्वजनिक प्रदर्शन हो सकता है।

बोर्ड पर हड़प्पा लिपि के दस चिन्ह थे। अलग-अलग अध्ययनों और पुरातात्विक विवरणों में प्रत्येक चिह्न की ऊँचाई लगभग 36 से 37 सेंटीमीटर बताई गई है। पूरा बोर्ड लगभग तीन से साढ़े तीन मीटर तक लंबा रहा होगा। इसके एक चिह्न को चार बार दोहराया गया है। इतने बड़े आकार में मिले हड़प्पाई अक्षरों का यह सबसे असाधारण उदाहरण माना जाता है।

धोलावीरा में मिले चिह्नों की ड्राइंग

लकड़ी गायब हुई, लेकिन चिह्न बचे रहे

संभवतः किसी समय यह बोर्ड दरवाजे से टूटकर नीचे गिरा और उसका सामने वाला हिस्सा जमीन की ओर हो गया। लकड़ी धीरे-धीरे नष्ट हो गई, लेकिन जिप्सम के भारी टुकड़े उसी क्रम में मिट्टी में दबे रह गए। इसलिए पुरातत्वविदों को लकड़ी का पूरा बोर्ड नहीं मिला, बल्कि उसके चिन्ह, उनका क्रम और फ्रेम की छाप मिली।

यही कारण है कि आज दिखाई देने वाला ‘साइनबोर्ड’ वास्तव में हजारों साल पुरानी वस्तु का पुरातात्विक पुनर्निर्माण है। पुरातत्वविदों ने चिन्हों की स्थिति, फ्रेम के निशान, दरवाजे की चौड़ाई और उस स्थान की वास्तुकला को देखकर यह समझने की कोशिश की कि मूल बोर्ड कैसा रहा होगा और कहाँ लगा था।

यूनेस्को के लिए तैयार धोलावीरा के नामांकन दस्तावेज में भी दस बड़े जिप्सम चिन्हों वाले साइनबोर्ड को स्थल की महत्वपूर्ण पुरावस्तुओं में शामिल किया गया है। धोलावीरा से इसके अतिरिक्त सैकड़ों मुहरें और मुहरों की छाप, हजारों मनके, पत्थर के वास्तुशिल्प भाग, धातु की वस्तुएँ और बड़ी संख्या में मानकीकृत बाट भी मिले हैं।

सिंधु लिपि: जिसे आज तक कोई पढ़ नहीं सका

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि धोलावीरा के इस साइनबोर्ड पर आखिर लिखा क्या था। इसका साफ जवाब है कि आज तक किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चल सका। जिस लिपि में ये चिह्न लिखे गए हैं, उसे सिंधु लिपि कहा जाता है और इसे अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है।

इस लिपि में करीब 400 मूल चिह्न माने जाते हैं। इनके कई अलग-अलग रूप भी मिले हैं। आम तौर पर इसे दाएँ से बाएँ लिखा जाता था। सिंधु लिपि के चिह्न सैकड़ों मुहरों, मिट्टी के बर्तनों और तांबे की पट्टिकाओं पर मिले हैं। लेकिन धोलावीरा का साइनबोर्ड इसलिए खास है क्योंकि इसके चिह्न बहुत बड़े हैं और यह इस लिपि के सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक लेखों में गिना जाता है।

दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने इसे समझने की कई कोशिशें की हैं। कुछ का मानना है कि इस पर किसी शासक, संस्था या शहर का नाम लिखा होगा, जैसे आज किसी इमारत या शहर के प्रवेश द्वार पर नाम लिखा होता है। कुछ विद्वान इसे धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञ से जुड़ा सूचना-पट्ट मानते हैं जबकि कुछ इसे कारीगरों, धातु के काम या व्यापार से जुड़ी घोषणा बताते हैं।

लेकिन इनमें से कोई भी बात पूरी तरह साबित नहीं हो सकी है। इसलिए धोलावीरा का यह साइनबोर्ड आज भी उतना ही रहस्यमय है, जितना खुदाई के समय था। हम उसके चिह्न देख सकते हैं लेकिन उनका असली मतलब अब भी इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक बना हुआ है।

आज कहाँ है यह ऐतिहासिक धरोहर?

आज धोलावीरा साइनबोर्ड नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) के संग्रह में सुरक्षित रखा गया है। हालांकि संरक्षण संबंधी चिंताओं के चलते इसे फिलहाल सार्वजनिक प्रदर्शनी में नहीं रखा गया है। यह अब भी शोध का विषय बना हुआ है क्योंकि सिंधु या हड़प्पा लिपि में मिले अब तक के सबसे लंबे चिह्न-समूहों में से एक होने के कारण यह भाषाविदों और पुरातत्वविदों के लिए बेहद कीमती है।

हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस सिंधु-सरस्वती अभिलेख से जुड़ी तस्वीरें साझा करते हुए धोलावीरा साइनबोर्ड को हड़प्पा सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय खोजों में गिनाया और इसे दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात सार्वजनिक साइनबोर्ड बताया है।

धोलावीरा सिर्फ साइनबोर्ड तक सीमित नहीं

यह जानना भी जरूरी है कि धोलावीरा की पहचान सिर्फ इस साइनबोर्ड तक सीमित नहीं है। गुजरात पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह शहर अपनी अत्यंत उन्नत जल-प्रबंधन प्रणाली के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ पत्थर काटकर बनाए गए बड़े जलाशय, वर्षा जल संचयन प्रणाली और चट्टान काटकर बनाए गए कुएं मिले हैं, जो उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाते हैं।

शहर तीन हिस्सों में बंँटा था- किला (citadel), मध्य नगर और निचला नगर और यहाँ छह अलग-अलग प्रकार की समाधियाँ भी मिली हैं, जो हड़प्पा सभ्यता में मृत्यु को लेकर एक अनोखी सोच दर्शाती हैं।

धोलावीरा है कहाँ और क्यों है खास?

धोलावीरा गुजरात के कच्छ जिले में, कच्छ के महान रण (Great Rann of Kutch) के भीतर स्थित खादिर द्वीप पर बसा एक हड़प्पाकालीन नगर है। यूनेस्को के अनुसार, यह हड़प्पा सभ्यता का दक्षिणी केंद्र था और करीब 3000 से 1500 ईसा पूर्व के बीच बसा हुआ था। यह दक्षिण एशिया के सबसे बेहतर तरीके से संरक्षित शहरी बसावटों में से एक है, जिसमें एक किलेबंद नगर और एक कब्रिस्तान दोनों शामिल हैं।

27 जुलाई 2021 को यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया था। यह भारत का 40वाँ और गुजरात का चौथा यूनेस्को स्थल बना, साथ ही यह सिंधु घाटी सभ्यता का भारत में स्थित पहला यूनेस्को स्थल भी है।

यहाँ 2 मौसमी नदियों मानसर और मनहर से पानी मिलता था, जो इस सूखे इलाके में बेहद दुर्लभ संसाधन था। धोलावीरा की खोज का श्रेय ASI के पुरातत्वविद् जे.पी. जोशी को जाता है, जिन्होंने 1967-68 में इस स्थल का पता लगाया था। हालाँकि, व्यवस्थित खुदाई 1990 के बाद ही शुरू हो सकी।

यूक्रेन में आए दिन मर रहे लोग, रूस में खड़ा हो गया तेल का संकट और खूब बरस रहीं मिसाइलें-बम: मिडिल ईस्ट संकट के बीच यूरोप में 5 साल से जारी इस युद्ध में अब क्या चल रहा?

रूस-यूक्रेन युद्ध को 1600 दिनों से अधिक हो चुके हैं और हाल के दिनों में रूस ने मिसाइलों और ड्रोन से हमले तेज कर दिए हैं। शनिवार (11 जुलाई 2026) को रूस ने यूक्रेन के कई शहरों को निशाना बनाया, जिसमें कम से कम 10 लोगों की मौत और 80 से अधिक लोग घायल हुए।

यूक्रेन का कहना है कि रूस लगातार रिहायशी इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर हमले कर रहा है, जबकि रूस का दावा है कि उसने सैन्य ठिकानों और रक्षा क्षेत्रों को टारगेट किया है। नाटो देशों से मदद माँग रहे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने यह कह कर सबको चौंका दिया है कि रूस ने चीन की चेतावनी की वजह से अब तक परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं किया है। इससे पहले उन्होंने रूस को समझाने की चीन से अपील की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सीजफायर के लिए जेलेंस्की और पुतिन से अलग-अलग बातचीत की, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।

24 फरवरी 2022 में पहली बार रूस ने यूक्रेन के नाटो गुट में शामिल होने की जिद के बाद हमला किया था। इन 5 से ज्यादा बीते सालों में लाखों लोगों के मौत का अनुमान है, जबकि 10 लाख से अधिक रूसी सैनिक और 2.5 से 3 लाख से ज्यादा यूक्रेनी सैनिकों के मारे जाने या घायल होने का अनुमान जताया गया है।

युद्ध की शुरुआत से लेकर अब तक 60 लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिकों को अपना देश छोड़कर पोलैंड, जर्मनी, रोमानिया और दूसरे यूरोपीय देशों में शरण लेनी पड़ी है। यूक्रेन के भीतर ही करीब 35 लाख से अधिक लोग अपने घरों को छोड़कर देश के सुरक्षित हिस्सों (जैसे पश्चिमी यूक्रेन) में रहने को मजबूर हैं।ऊर्जा संकट से विस्थापन: रूसी हमलों में यूक्रेन की लगभग दो-तिहाई बिजली उत्पादन क्षमता नष्ट हो जाने के कारण, कड़ाके की ठंड और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लाखों लोग पलायन करने को मजबूर हुए हैं।

चीन ने रूस को चेताया- जेलेंस्की

अब तक चीन को रूस को समझाने की सलाह देने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा है कि चीन ने राष्ट्रपति पुतिन को चेतावनी दी है कि वे यूक्रेन में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल न करें।

जेलेंस्की ने गुरुवार (9 जुलाई 2026) को पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि आपने रूसी मीडिया की ऐसी बातें सुनी होंगी, जिसमें कहा गया है कि यूक्रेन के हमलों का जवाब देने के लिए रूस ने चीन से पूछा कि क्या हम परमाणु हमला करें, तो चीन ने अल्टीमेटम देने के अंदाज में जवाब दिया कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। जेलेंस्की ने कहा कि ये पहला मौका है जब चीन ने रूस को सख्त हिदायत दी।

इससे पहले जेलेंस्की कहते रहे हैं कि चीन वास्तव में शांति चाहता है तो उसे रूस पर अपने असर का इस्तेमाल करना चाहिए। चीन रूस के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के कारण दबाव डाल सकता है, लेकिन अब तक उसने ऐसा नहीं किया है। यूक्रेन लगातार यह भी कहता रहा है कि रूस को तकनीकी और औद्योगिक आपूर्ति मिलने से उसकी युद्ध क्षमता बनी हुई है।

जेलेंस्की के मुताबिक, यूक्रेन की सेना ने 9 जुलाई 2026 को अजोव सागर में रूस के एक दर्जन और टैंकरों पर हमला किया। उसने रूसी सेना को ईंधन की सप्लाई रोकने और रूसी क्रीमिया को अलग-थलग करने की कोशिशें तेज कर दी है।

यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि 5 जुलाई से 9 जुलाई तक यूक्रेन ने अजोव सागर और काला सागर में रूस के कम से कम 36 जहाजों पर हमला किया और उनमें आग लगा दी।

इनमें रूस के तथाकथित गुप्त बेडे के 32 टैंकर और दो ड्राई कार्गो जहाज शामिल थे। वे सभी क्रीमिया तक ईंधन पहुँचाने की कोशिश कर रहे थे।

रूस ने यूक्रेन पर तेज किए हमले

जुलाई 2026 में ही यूक्रेन के एक रिहायशी इलाके में रूसी हमले में छोटे से शहर विशनेवे के हथियारों के गोदाम में धमाका हुआ। इसके बाद एक के बाद एक कई धमाके हुए। सैकड़ों घर क्षतिग्रस्त हो गए। इसको लेकर यूक्रेन के राष्ट्रपति ने हथियारों के जखीरा रखने की इजाजत देने को लेकर जिम्मेदार अधिकारी पर एक्शन लेने की बात कही। दरअसल एक के बाद एक धमाके उन हथियारो की वजह से हुए थे।

जेलेंस्की ने दावा किया कि शनिवार (11 जुलाई 2026) को यूक्रेन में रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों में एक बच्चे समेत 8 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए। उत्तरी शहर सुमी के भीड़-भाड़ वाले इलाके में दो ग्लाइड बम गिरे, जिससे 5 लोगों की मौत हो गई और 30 लोग घायल हो गए। सुमी क्षेत्र रूस से सटा इलाका है, जिसे रूस बफर जोन बनाना चाहता है। इस इलाके में एक व्यक्ति की मौत विस्फोटक उपकरण पर पैर पड़ने से हो गई। दक्षिण-पूर्वी शहर जापोरिज्जिया में भी ग्लाइड बमों से 10 लोग घायल हो गए। दिन में इससे पहले दक्षिणी बंदरगाह शहर ओडेसा पर मिसाइल हमले में 2 लोगों की मौत हो गई और एक अन्य घायल हो गया।

जेलेंस्की ने कहा कि रूस ने शनिवार देर रात 120 से ज्यादा ड्रोन और 12 मिसाइलें दागीं, जिनमें से आधी बैलिस्टिक मिसाइलें थीं। उन्होंने कहा, “एयर रेड अलर्ट जारी होने से पहले ही नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया।” उन्होंने इमारतों के मलबे और धुएँ के बीच काम कर रही इमरजेंसी टीमों के वीडियो पोस्ट किए।

जेलेंस्की ने कहा कि एयर डिफेंस सिस्टम ‘ज्यादातर टारगेट को गिराने में कामयाब रहे’, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलों को नहीं रोक पाए। उन्होंने अपने सहयोगी देशों से ज्यादा सैन्य सहायता देने की माँग की ताकि रूसी हमले का सामने कर सकें। हालाँकि ये युद्ध पिछले 5 सालों में चल रहा है। लेकिन रूस ने एक बार फिर यूक्रेन पर हमले तेज कर दिए हैं। जुलाई 2026 में अब तक राजधानी कीव और उसके आस-पास के इलाकों में हुए हमलों में 60 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।

शनिवार को कीव पर हुआ हमला एक हफ़्ते से भी कम समय में दूसरी बार था जब एयर अलर्ट जारी होने से पहले ही मिसाइलें गिरीं। यूक्रेन के रक्षा मंत्री के सलाहकार सर्गी स्टर्नेंको ने कहा कि यह हमला तब हुआ जब सायरन से रूस की S-400 एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों के आने का संकेत भी नहीं मिल पाया था।

यूक्रेन के हमले से रूस में ईधन संकट का दावा

यूक्रेन ने दावा किया है कि उसके लगातार और लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन हमलों की वजह से पूरे रूस में ईंधन की भारी कमी हो गई है। इसके चलते कई इलाकों में कीमतें बढ़ने और पेट्रोल स्टेशनों पर लंबी लाइनें लगने की बात कही जा रही है। रूस में पेट्रोल और डीजल का भारी संकट पैदा हो गया है। यूक्रेन के मुताबिक, उसने रणनीति बदलते हुए रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों को निशाना बनाना शुरू किया। उसके हमलों से कई प्रमुख रूसी तेल रिफाइनरियाँ क्षतिग्रस्त हो गई और रूस का ईंधन उत्पादन क्षमता करीब 20% तक गिर गया है।

रॉयटर्स ने दावा किया है कि रूस ने अस्थायी रूप से डॉन-अजोव चैनल से आवाजाही रोक दी है। यह चैनल डॉन नदी को अजोव सागर से जोड़ने वाला एक जलमार्ग है।

यह कदम अजोव सागर में 10 टैंकरों सहित रूस के 13 जहाजों पर यूक्रेन के हमले के बाद उठाया गया। जानकारों का मानना है कि दुनिया में अनाज के सबसे बड़े निर्यातक रूस से होने वाले गेहूँ के एक्सपोर्ट का एक-चौथाई हिस्सा अजोव सागर से होकर जाता है। इसमें दावा किया गया है कि शिपिंग कंपनियों को रूस ने इसकी जानकारी दे दी है और शुक्रवार 10 जुलाई 2026 की शाम 6.10 बजे से किसी भी जहाज को यहाँ से गुजरने की अनुमति नहीं दी गई।

रूसी अधिकारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद इन हमलों के कारण उत्पन्न हुई ईंधन की कमी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है। इस किल्लत से निपटने के लिए रूस को मजबूरन भारत जैसे मित्र देशों से गैसोलीन (पेट्रोल) का आयात करना पड़ रहा है। यहाँ तक कि ईंधन की गुणवत्ता के मानकों Euro-5 को घटाकर Euro-3 कर दिया गया है। साइबेरिया जैसे बड़े औद्योगिक हब में लोगों से वर्क फ्रॉम होम करने और गाड़ियों का इस्तेमाल कम करने की अपील की गई है। राजधानी मॉस्को सहित कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।

यूक्रेन को NATO का सदस्य देश बनाने की माँग दोहराई

हाल में रूसी हमलों के बाद नाटो की 7-8 जुलाई 2026 को तुर्किए की राजधानी अंकारा में हुई बैठक में यूक्रेन को करीब €70 अरब यानी करीब 7.6 लाख करोड़ रुपए की सैन्य सहायता देने का वादा किया। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने नाटो देशों से कहा कि केवल बयान देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि तत्काल एयर डिफेंस सिस्टम और हथियारों की जरूरत है।

जेलेंस्की ने अमेरिका से पेट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलों की तत्काल आपूर्ति करने को कहा। साथ ही ये भी कहा कि अगर मिसाइलें नहीं दे पा रहे, तो यूक्रेन को इनके निर्माण के लिए लाइसेंस दी जाए।

जेलेंस्की ने ये भी माँग की है कि NATO यूक्रेन को अपना सदस्यता बनाए और स्पष्ट रोडमैप दे। इससे पूरे यूरोप की सुरक्षा मजबूत होगी।

सैन्य अभियान को हासिल किए बिना पीछे नहीं हटेगा रूस- पुतिन

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने एक बार फिर दोहराया है कि रूस अपने टारगेट पूरा किए बगैर यूक्रेन पर सैन्य कार्रवाई को नहीं रोकेगा। रूस का कहना है कि उसके हमले यूक्रेन के सैन्य और रक्षा क्षेत्रों पर किए जा रहे हैं। वही रूस ने यह भी आरोप लगाया है कि यूक्रेन लगातार रूस के अंदर ड्रोन हमले कर रहा है, इसलिए जवाबी कार्रवाई की जा रही है। साथ ही रूस ने अपनी शर्तों पर कुछ मौकों पर बातचीत की इच्छा जताई है।

युद्ध शुरू होने के बाद रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और युद्ध को रोकने के लिए अमेरिका, यूरोपीय संघ और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस पर इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाए। रूस के प्रमुख बैंकों को वैश्विक वित्तीय मैसेजिंग सिस्टम SWIFT से बाहर कर दिया गया। रूस के केंद्रीय बैंक की विदेशों में जमा करीब 300 अरब डॉलर की संपत्तियों को फ्रीज कर दिया गया साथ ही रूसी कच्चे तेल और गैस के आयात पर प्रतिबंध या ‘प्राइस कैप’ लगाई गई।

रूस को अत्याधुनिक तकनीक, सैन्य उपकरण, और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा कर अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की कोशिश की गई। इसके बावजूद रूस टस से मस नहीं हुआ और यूक्रेन को टारगेट करता रहा।

ट्रंप ने युद्ध रोकने का वादा किया था

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध को जल्द समाप्त कराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि दोनों पक्षों से बातचीत कर युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जा सकता है। अमेरिका ने रूस और यूक्रेन दोनों से कई दौर की बातचीत की। इस दौरान ट्रंप और जेलेंस्की के संबंध तनावपूर्ण भी हुए और धीरे धीरे अब बेहतर हुए हैं।

यही वजह है कि नाटो के तुर्किए में हुई बैठक में यूक्रेन की एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने के लिए अमेरिका तैयार है। यूक्रेन को पेट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों के उत्पादन के लिए लाइसेंस देने की दिशा में पहल की गई। ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उसका उद्देश्य युद्ध को बातचीत के जरिए समाप्त करना है, लेकिन जमीन पर लड़ाई अभी भी जारी है।

दरअसल रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध खत्म करने के लिए कूटनीतिक कोशिशें अभी भी जारी हैं। लेकिन सीजफायर और शांति समझौते को लेकर कोई खास सफलता नहीं मिली है। रूस अभी भी अपने सैन्य टारगेट से पीछे हटने को तैयार नहीं है। वह कभी नहीं चाहेगा कि यूक्रेन को नाटो का सदस्य देश बनाया जाए। युद्ध की बड़ी वजह भी यही था। वहीं जेलेंस्की नाटो की सदस्यता की माँग कई बार कर चुके हैं। दूसरी बात यह है कि यूक्रेन अपने कब्जे वाले क्षेत्रों को छोड़े बिना समझौता नहीं करना चाहता। इसलिए दोनों देशों के बीच सीजफायर को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। यही वजह है कि रूस और यूक्रेन एक दूसरे पर ड्रोन और मिसाइल से हमले किए जा रहे हैं और ये युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।

‘हिन्दू एक गाली, इसका मतलब चोर, डाकू, गुलाम’ बोलने वाले ईसाई संगठन के 11 लोगों को राहत नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने केस रद्द करने की अर्जी खारिज की, कहा- अभिव्यक्ति की आजादी का दावा ट्रायल में देखेंगे

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सार्वजनिक तौर पर ‘हिन्दू एक गाली, इसका मतलब चोर, डाकू, लुटेरा और गुलाम’ कहने वाले ईसाई संगठन से जुड़े 11 सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसे सवाल शामिल हैं, जिनका फैसला केवल पूरे ट्रायल के दौरान सबूतों की जाँच के बाद ही किया जा सकता है। शुरुआती चरण में इन्हें तय नहीं किया जा सकता, इसलिए FIR को खारिज नहीं किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 11 आरोपितों, सुनील कुमार जाल्क्सो, संजय सक्सेना, रेमिश टोप्पो, श्याम सुंदर मरावी, अरविंद कच्छप, पॉलुस कुजूर, हर्ष कुजूर, धर्मू एक्का, दिनेश भगत, मीरा तिर्की और ब्लैसियस टिग्गा की याचिका खारिज कर दी।

इन सभी ने अपने खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की माँग की थी। यह मामला फरवरी 2024 का है, जब छत्तीसगढ़ के जेशपुर की एक सार्वजनिक सभा में हिन्दू धर्म के खिलाफ विवादास्पद और आपत्तिजनक बयान दिए गए थे। इसका आयोजन भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा ने किया था।

क्या है मामला?

यह मामला 28 फरवरी 2024 को शुरू हुआ, जब विश्व हिंदू परिषद, जशपुर के जिला अध्यक्ष कर्नैल सिंह ने कुनकुरी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में उन्होंने कहा, “वक्ताओं ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया है, इसलिए उन्हें सजा मिलनी चाहिए। पूरे हिंदू और ब्राह्मण समाज का भी अपमान किया गया। इससे समुदाय में भारी आक्रोश है और लोग आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।”

अभियोजन के अनुसार, 27 फरवरी 2024 को कुनकुरी के सलियाटोली मिनी स्टेडियम में भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा की ओर से आयोजित एक सार्वजनिक सभा में ये सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए थे।

इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि ‘हिंदू’ शब्द का मतलब ‘चोर, डकैत, लुटेरा और गुलाम’ होता है और हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि एक गाली है। इसके अलावा धार्मिक कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के खिलाफ भी टिप्पणियाँ की गईं।

सभा में लोगों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) तोड़ने और ईवीएम के जरिए होने वाले चुनावों का विरोध करने की भी अपील की गई। शिकायत में कहा गया कि ये भाषण अलग-अलग समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने, राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं।

शिकायत के बाद पुलिस ने 4 मार्च 2024 को 12 लोगों के खिलाफ हेट क्राइम का मामला दर्ज किया। जाँच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 153B, 295A, 505(2), 294 और 34 के तहत आरोप तय किए।

बाद में सेशन कोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद आरोपित सामाजिक कार्यकर्ता हाई कोर्ट पहुँचे। अभियोजन पक्ष ने कहा कि ऐसे बयानों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि ये बातें किस तरह के लोगों के सामने कही गईं और उनका सांप्रदायिक सौहार्द तथा कानून-व्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता था।

गौरतलब है कि FIR में कुल 12 लोगों के नाम थे, लेकिन उनमें से रूपनारायण एक्का ने कार्यवाही रद्द कराने वाली इस याचिका में हिस्सा नहीं लिया।

कार्यकर्ताओं ने अभिव्यक्ति की आजादी का दिया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए काम करते हैं और उनके बयान सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा का हिस्सा थे।

उन्होंने कहा कि उनके बयान संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से संरक्षित हैं और वैज्ञानिक सोच तथा सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के अनुरूप हैं।

उनका यह भी कहना था कि उनका किसी की धार्मिक भावनाएं आहत करने या समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने का कोई जानबूझकर इरादा नहीं था।

कोर्ट ने कहा- ट्रायल जरूरी है

हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के तर्कों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका में विचार नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के बराबर था।

खंडपीठ ने कहा, “जाँच के दौरान जुटाई गई सामग्री से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी वाली एक सार्वजनिक सभा में, जिसमें अलग-अलग समुदायों के लोग भी शामिल थे, हिंदू धर्म, धार्मिक व्यक्तित्वों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ कथित बयान दिए गए थे।”

कोर्ट ने आगे कहा, “यह तय करना कि संबंधित बयान वैध आलोचना की सीमा में आते हैं या फिर अभियोजन द्वारा लगाई गई दंडात्मक धाराओं के तहत दंडनीय अपराध की सीमा पार करते हैं, शुरुआती चरण में कार्यवाही रद्द करने वाली याचिका में उचित तरीके से नहीं किया जा सकता।”

बचाव पक्ष की इस दलील पर कि याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता, तर्कवादी या वैज्ञानिक सोच के समर्थक हैं और उनके बयान केवल सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिए गए थे, कोर्ट ने कहा कि केवल इसी आधार पर इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि इन बयानों के बाद कोई वास्तविक सांप्रदायिक हिंसा या कानून-व्यवस्था की समस्या सामने नहीं आई, यह मुकदमा खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि जाँच में गवाहों के बयान, कार्यक्रम के पर्चे, कार्यक्रम की वीडियोग्राफी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र भी शामिल हैं।

इससे स्पष्ट है कि मामला केवल अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि उसके समर्थन में पर्याप्त सामग्री मौजूद है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर फैसला देने तक सीमित हैं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा।

फैसले में कहा गया, “FIR, चार्जशीट, 19 सितंबर 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कुनकुरी द्वारा आरोप तय करने के आदेश, 24 जनवरी 2026 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कुनकुरी द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश तथा उनसे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए यह याचिका निराधार है और इसे खारिज किया जाता है।”

हाईकोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की याचिका तक सीमित हैं और मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं हैं। कोर्ट ने कहा, “ट्रायल कोर्ट इस मामले की सुनवाई स्वतंत्र रूप से करेगा और कानून के अनुसार तथा ट्रायल के दौरान पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला सुनाएगा।”

बेटा UP पुलिस में SI, बाप लोगों को बनाता है ईसाई: मीडिया रिपोर्ट, शिकायत के बाद प्रेमपाल गिरफ्तार, जानिए- बरेली SP ने क्या बताया, कौन-सी मजहबी किताबें हुई बरामद

उत्तर प्रदेश के बरेली में ईसाई धर्मांतरण का मामला सामने आया है। पुलिस ने ईसाई मिशनरी के एक आरोपित को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, 09 जुलाई 2026 को गाँव में एक प्रार्थना सभा के दौरान लोगों को ईसाई बनने के लिए लालच दिया जा रहा था। इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज में मुकदमा दर्ज किया गया और अगले ही दिन आरोपित प्रेमपाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव का रहने वाला है। उसके पास से बाइबल समेत 6 ईसाइयत की किताबें, एक हाथ से लिखी नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ है। यह भी सामने आया कि प्रेमपाल यादव वर्षों पहले खुद धर्मांतरण कर चुका है और अब हिंदुओं को धर्मांतरण करवाने वाले नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।

सैजना गाँव में प्रार्थना सभा से FIR तक, जानिए कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

बरेली के मीरगंज थाना क्षेत्र के सैजना गाँव में धर्मांतरण का मामला 09 जुलाई 2026 को सामने आया। थाना मीरगंज में दर्ज FIR के मुताबिक, गाँव के रहने वाले अंकित पुत्र खूबकरन ने पुलिस को शिकायत देकर आरोप लगाया कि शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव निवासी 51 वर्षीय प्रेमपाल ने गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर एक प्रार्थना सभा आयोजित की थी।

शिकायत में कहा गया कि इस प्रार्थना सभा के दौरान हिंदुओं को ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। बताया गया कि वहाँ मौजूद लोगों को ईसाइयत से जुड़ी प्रचार सामग्री दी गई, नौकरी और पैसों का लालच दिया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि सभा के दौरान हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी की गईं।

इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज पुलिस ने प्रेमपाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 62 और 299 के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध संपरिवर्तन अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी।

भागने की फिराक में प्रेमपाल को पुलिस ने धरा, ईसाइयत की किताबें बरामद

प्रेमपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना मीरगंज पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। पुलिस के मुताबिक, 10 जुलाई 2026 को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपित प्रेमपाल इलाके से निकलने की फिराक में है। इसके बाद पुलिस टीम ने नगरिया सादात फाटक के सामने अंडरपास के नीचे घेराबंदी कर उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित की पहचान प्रेमपाल पुत्र पातीराम, निवासी ग्राम भुडासी, थाना शीशगढ़, जनपद बरेली के रूप में हुई। तलाशी के दौरान उसके पास से एक बाइबल, ‘शास्त्र भजनसंहिता और नीतिवचन’, ‘नया नियम’, ‘मुक्तिदाता कौन’, ‘बेदारी के गीत’ नाम से 6 ईसाइयत की किताबें, एक हस्तलिखित नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया। पुलिस ने इन सभी सामानों को कब्जे में लेकर उन्हें जाँच का हिस्सा बनाया है।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, गिरफ्तारी की कार्रवाई उपनिरीक्षक नितिन शिरीष, उपनिरीक्षक राजवीर सिंह, हेड कांस्टेबल मोहम्मद उमर और कॉन्स्टेबल अमित कुमार की टीम ने की। पुलिस का कहना है कि आरोपित के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई पूरी करते हुए उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।

पुलिस हिरासत में माफी माँगने लगा आरोपित प्रेमपाल

मामले में पुलिस की ओर से जारी किए गए प्रेस नोट के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल ने खुद को ईसाई धर्म का प्रचारक बताया है। पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि 09 जुलाई 2026 को सैजना गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर ईसाइयत के प्रचार और धर्म परिवर्तन के संबंध में एक सभा आयोजित की गई थी।

पुलिस के मुताबिक, आरोपित ने पूछताछ में बताया कि उस सभा में अमित, रोहित, धर्मेंद्र और तीरथराम समेत कई लोग मौजूद थे। उसका यह भी कहना था कि काफी प्रयास करने के बावजूद वहाँ मौजूद ये लोग ईसाई नहीं बने। पुलिस को आरोपित ने यह भी बताया कि उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिलने के बाद वह वहाँ से भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताते हुए कहा कि उससे गलती हो गई।

ईसाई धर्मांतरण करवाने वाले प्रेमपाल का बेटा सब-इंस्पेक्टर: रिपोर्ट्स

धर्मांतरण का मामले सामने आने के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में कई दावे भी किए गए हैं, जिनका उल्लेख पुलिस की FIR या आधिकारिक प्रेस नोट में नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गिरफ्तार प्रेमपाल वर्षों पहले ईसाई में परिवर्तित हुआ था। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि उसका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात है।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि प्रेमपाल लंबे समय से ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ था और गाँवों में प्रार्थना सभाएँ आयोजित करता था। कुछ रिपोर्ट्स में इसे धर्म परिवर्तन के नेटवर्क पर प्रशासन की बड़ी कार्रवाई बताया गया है। हालाँकि, पुलिस ने इसको लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिलहाल पुलिस केवल आरोपों और जाँच के आधार पर आगे बढ़ रही है।

80+ देशों में Make In India हथियार, ब्रह्मोस के साथ अस्त्र, तेजस और पिनाका की तेजी से बढ़ी माँग: समझें मोदी सरकार के किन कदमों से भारत बना हथियारों का प्रमुख निर्यातक

आज की दुनिया में कोई भी देश कितना शक्तिशाली है, यह इस बात से तय होता है कि वह हथियारों के मामले में दूसरों पर कितना निर्भर है। कुछ साल पहले तक भारत को दुनिया के उन देशों में गिना जाता था जो बाहर से सबसे ज्यादा हथियार खरीदते थे। लेकिन अब समय पूरी तरह बदल चुका है।

‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के कारण आज भारत खुद अपने देश में आधुनिक हथियार बना रहा है। यही वजह है कि आज भारत दुनिया के करीब 80 से ज्यादा देशों को अपने सैन्य उत्पाद, हथियारों के कलपुर्जे और मिसाइलें बेच रहा है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 के आँकड़े बताते हैं कि भारत का रक्षा निर्यात (Defence Export) 38,424 करोड़ रुपए (लगभग 4 बिलियन डॉलर) को पार कर चुका है, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इस कामयाबी के बीच इंडोनेशिया के साथ हुआ ‘ब्रह्मोस’ और ‘अस्त्र’ मिसाइल का नया सौदा भारत के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक जीत है।

इस ऐतिहासिक डील के बाद अब पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि भारत बहुत जल्द डिफेंस सेक्टर में दुनिया का नया ‘सम्राट’ बनने की राह पर है।

वैश्विक रक्षा बाजार में भारतीय हथियारों की बढ़ती माँग और इसकी बड़ी वजहें

आज के समय में दुनिया के तमाम देश अपनी सुरक्षा के लिए भारतीय हथियारों और मिसाइलों पर भरोसा जता रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत की मिसाइल तकनीक अत्यधिक आधुनिक होने के साथ-साथ दुनिया के अन्य बड़े देशों के मुकाबले कई गुना ज्यादा किफायती है।

कम रक्षा बजट वाले छोटे देशों के लिए पश्चिमी देशों या अमेरिका से इस स्तर की मारक क्षमता वाले हथियार खरीदना उनके बजट से बाहर होता है। दूसरा सबसे बड़ा कारण भारत की रणनीतिक छवि है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक ऐसे व्यावहारिक प्रदाता के रूप में देखा जाता है जो किसी भी महाशक्ति के गुट का हिस्सा नहीं है और न ही वह इन देशों की संप्रभुता के लिए कोई राजनीतिक दबाव या सुरक्षा खतरा पैदा करता है।

यही वजह है कि ये देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह अमेरिका या पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, क्योंकि उनके हथियारों के साथ कई तरह के कड़े राजनीतिक प्रतिबंध और शर्तें जुड़ी होती हैं। रणनीतिक स्वायत्तता की इसी चाहत ने आज भारतीय हथियारों को दुनिया की एक बड़ी जरूरत बना दिया है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक: कहाँ-कहाँ सफल रही स्वदेशी मिसाइलें

किसी भी हथियार प्रणाली की साख तब तक पूरी तरह स्थापित नहीं होती जब तक कि वह वास्तविक युद्ध या किसी बड़े और जटिल सैन्य ऑपरेशन में अपनी उपयोगिता और अचूकता साबित न कर दे। भारतीय मिसाइल तकनीक के संदर्भ में यह अटूट साख ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पूरी तरह सिद्ध हुई थी।

इस बड़े और संवेदनशील सैन्य अभियान के दौरान भारत की इन दोनों स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों ने पाकिस्तान के बारह सैन्य एयरबेस को पूरी तरह से तबाह करने और दुश्मन की हवाई तथा जवाबी ताकत को पंगु बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसी वास्तविक युद्ध-परीक्षित सफलता के कारण आज वैश्विक स्तर पर इन दोनों मिसाइलों को लेकर कौतूहल और अंतरराष्ट्रीय माँग दोनों में भारी इजाफा हुआ है। भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा रूस के संयुक्त उपक्रम द्वारा तैयार की गई ब्रह्मोस मिसाइल 300 किलोमीटर की दूरी तक अत्यंत सटीक मार करने में पूरी तरह सक्षम है।

इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी सुपरसोनिक गति, अत्यधिक संहारक क्षमता और बहुमुखी प्रतिभा है, जिसके कारण इसे थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के द्वारा भूमि, युद्धपोत, पनडुब्बी और लड़ाकू विमानों से समान रूप से संचालित किया जा सकता है।

दूसरी तरफ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO द्वारा पूरी तरह स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित की गई अस्त्र मिसाइल हवा से हवा में मार करने वाली एक बेहद घातक प्रणाली है, जो सौ किलोमीटर की दूरी तक दुश्मन के विमानों को आसानी से निशाना बना सकती है।

यह मिसाइल हवा की सामान्य गति से साढ़े चार गुना तेज रफ्तार से चलती है और 20 किलोमीटर की अत्यधिक ऊँचाई तक जाकर दुश्मन के आधुनिक लड़ाकू विमानों को ध्वस्त करने की क्षमता रखती है।

इंडोनेशिया के साथ हुआ दोहरा समझौता: भारतीय रक्षा निर्यात का एक नया मील का पत्थर

भारत की इसी बढ़ती साख का ताजा उदाहरण इंडोनेशिया के साथ हुआ हालिया रक्षा समझौता है, जिसे इस दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र मिसाइल की खरीद को लेकर दो अलग-अलग समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

यह भारत के रक्षा इतिहास में पहला मौका है जब किसी देश के साथ एक ही समय में एक साथ दो बड़े रक्षा सौदे किए गए हैं। हालाँकि रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इंडोनेशिया को कुल कितनी संख्या में ये मिसाइलें दी जाएँगी और इसकी अंतिम व्यावसायिक कीमत क्या होगी, यह तय होना बाकी है, जिस पर आने वाले दिनों में दोनों देशों की टीमें बैठकर चर्चा करेंगी।

इंडोनेशिया के पास भी वही रूसी सुखोई लड़ाकू विमान हैं जिनका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना करती है। चूँकि भारत अपनी वायुसेना के सुखोई विमानों में अस्त्र मिसाइल को पहले ही सफलतापूर्वक फिट और संचालित कर चुका है, इसलिए इंडोनेशियाई वायुसेना के लिए भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए यह मिसाइल तकनीकी रूप से आसान विकल्प बनकर उभरी है।

फिलीपींस से लेकर वियतनाम तक: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ बनता नया समीकरण

इंडोनेशिया से पहले हिंद-प्रशांत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई अन्य देश भी भारत की मिसाइल तकनीक को अपना चुके हैं। फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया तीसरा ऐसा देश है जिसने भारत से ब्रह्मोस मिसाइलों की खरीद की है। फिलीपींस ने साल 2022 में लगभग 375 मिलियन डॉलर का बड़ा अनुबंध करके भारतीय मिसाइल को अपनी नौसेना का हिस्सा बनाया था, जबकि इस साल वियतनाम ने भी इसके लिए समझौता किया है।

इन समझौतों के पीछे सबसे बड़ी वजह दक्षिण चीन सागर में चीन का बढ़ता आक्रामक व्यवहार और सैन्य विस्तारवाद है, जिसने इस क्षेत्र के छोटे देशों को अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित कर दिया है। हालाँकि इंडोनेशिया सीधे तौर पर चीन को अपना प्राथमिक सुरक्षा खतरा नहीं मानता, लेकिन उत्तरी नटूना सागर में समुद्री दावों को लेकर बीजिंग के साथ उसके मतभेद साफ हैं।

हाल ही में चीन द्वारा प्रशांत महासागर में किए गए बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण ने इन देशों को अपनी रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने के लिए और प्रेरित किया है। ऐसे में भारत इन देशों के लिए एक गैर-आक्रामक और भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में सामने आया है, जो इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर रहा है।

खाड़ी देशों से लेकर लैटिन अमेरिका तक: ब्रह्मोस को खरीदने की कतार में लगे 11 अन्य देश

भारतीय मिसाइलों का जादू सिर्फ दक्षिण-पूर्वी एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों में भी इसकी भारी माँग देखी जा रही है। वर्तमान में दुनिया के 11 अन्य प्रमुख देश जिनमें थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, चिली, अर्जेंटीना तथा वेनेजुएला शामिल हैं, ब्रह्मोस मिसाइल को खरीदने में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा चुके हैं।

भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से बनाई जा रही ब्रह्मोस की तटीय और तटीय सुरक्षा क्षमताओं, विशेष रूप से इसके एंटी-शिप वर्जन ने इन देशों को बहुत प्रभावित किया है। संयुक्त अरब अमीरात जैसी खाड़ी शक्तियों के साथ भी ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर एयर-डिफेंस कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम को लेकर बातचीत चल रही है, जो भारत के रक्षा निर्यात को पश्चिम एशिया के बाजारों में एक बहुत बड़ा विस्तार दे सकती है।

इसके अलावा एक बेहद दिलचस्प बात यह भी सामने आ रही है कि खुद रूस, जो इस मिसाइल के सह-विकास में भारत का साझेदार रहा है, वह भी अपनी सशस्त्र सेनाओं में ब्रह्मोस प्रणाली को शामिल करने पर विचार कर रहा है, जो इस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय साख को और ज्यादा मजबूत बनाता है।

पिनाका और तेजस: मिसाइलों से आगे बढ़कर दुनिया में धूम मचाते अन्य स्वदेशी हथियार

भारत की यह रक्षा सफलता केवल ब्रह्मोस या अस्त्र मिसाइल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के कई अन्य अत्याधुनिक और स्वदेशी सैन्य उत्पाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहे हैं। इसमें सबसे पहला नाम रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित की गई पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर प्रणाली का है।

यह घातक लॉन्चर बेहद खराब मौसम में भी महज 44 सेकेंड के भीतर 72 रॉकेट दागकर सत्तर किलोमीटर की दूरी पर स्थित दुश्मन के ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर सकता है। आर्मेनिया ने भारत के साथ इस स्वदेशी प्रणाली और गोला-बारूद को खरीदने के लिए एक बड़ा समझौता किया है।

इसी तरह भारत का स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान ‘तेजस’ भी कई देशों की पहली पसंद बना हुआ है। मलेशिया के साथ तेजस का रक्षा सौदा इस समय बिल्कुल अंतिम चरण में है।

इसके अलावा अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, अमेरिका, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे छह बड़े देशों ने भी तेजस फाइटर जेट को अपने बेड़े में शामिल करने के लिए उन्नत स्तर की रुचि दिखाई है, जो दिखाता है कि भारत अब विमानन क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर अपना लोहा मनवा रहा है।

सम्राट बनने की राह में मौजूद बड़ी चुनौतियाँ और भविष्य का रोडमैप

भले ही भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा है और भारत की साख एक निर्यातक के रूप में मजबूत हुई है, लेकिन वैश्विक स्तर पर रक्षा उद्योग का असली और ‘सम्राट’ बनने की राह में भारत के सामने अभी कई बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं और एक लंबा सफर तय करना बाकी है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SPRI की वैश्विक रिपोर्टों और रक्षा आँकड़ों के अनुसार, भारत अभी भी दुनिया के शीर्ष 25 हथियार निर्यातक देशों की मुख्य सूची में अपनी स्थायी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है। वैश्विक रक्षा बाजार के कुल हथियार कारोबार में भारत की हिस्सेदारी वर्तमान में एक प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है।

इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका 331 बिलियन डॉलर के भारी-भरकम कारोबार के साथ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

इसके साथ ही भारतीय रक्षा परिदृश्य की एक बड़ी हकीकत यह भी है कि वह आज भी दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक यानी खरीदार देश बना हुआ है, जो अपनी कुल आधुनिक रक्षा जरूरतों का आठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाहर से मंगाता है।

रक्षा विश्लेषकों और सामरिक विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारत की दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वह कितनी मिसाइलें या लड़ाकू विमान बेचता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि वह खरीदार देशों को कितनी बेहतर ट्रेनिंग, निरंतर स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति, समय पर तकनीकी मरम्मत और पूरे जीवनकाल के लिए तकनीकी सहायता यानी लाइफसाइकिल सपोर्ट प्रदान कर पाता है, जैसा कि दुनिया के स्थापित और पुराने रक्षा आपूर्तिकर्ता देश करते आए हैं।

भारत सरकार ने आने वाले समय में रक्षा उत्पादन को 1 लाख 75 हजार करोड़ रुपए तक पहुँचाने और दुनिया के शीर्ष पाँच रक्षा निर्यातक देशों में गरिमापूर्ण स्थान हासिल करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इंडोनेशिया के साथ हुआ दोहरा समझौता निश्चित रूप से भारत को इस लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने का काम करेगा।

हालाँकि वैश्विक बाजार पर पूरी तरह हावी होने और अपनी बादशाहत कायम करने के लिए भारत को अपने घरेलू निजी क्षेत्र और सरकारी रक्षा विनिर्माण उद्यमों को और अधिक व्यापक, आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत तथा त्वरित निर्णय लेने में सक्षम बनाना होगा।

भविष्य की ओर बढ़ता भारत: आत्मनिर्भरता का नया अध्याय

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का 80 से अधिक देशों में हथियार बेचना और ब्रह्मोस तथा अस्त्र जैसी मिसाइलों का सफल अंतरराष्ट्रीय सौदा करना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल दूसरों की तकनीक पर निर्भर रहने वाला देश नहीं रहा। भारत ने रक्षा के क्षेत्र में अपनी स्वदेशी अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है।