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‘मैं पूर्व रॉ एजेंट हूँ, रहने के लिए छत चाहिए’: दर-दर की ठोकरें खा रहा है असली ‘टाइगर’

फिल्मी पर्दे पर आपने कई खुफिया एजेंट की जिंदगी देखी होगी। महँगी गाड़ियाँ, दमदार हथियार और जीवन के हर मोड़ पर रोमांच। लेकिन रील लाइफ का रुतबा और एशोआराम, रियल लाइफ के खुफिया एजेंट को नसीब नहीं होता। एक फिल्म आई थी- एक था टाइगर। इसमें सलमान खान खुफ़िया एजेंसी रॉ के एजेंट बने थे। पर्दे के ‘टाइगर’ के उलट असली जिंदगी का ‘टाइगर’ दाने-दाने को मोहताज है।

असल ज़िंदगी के इस टाइगर का नाम है, मनोज रंजन दीक्षित। वे नजीबाबाद के रहने वाले हैं। दैनिक हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने डीएम कार्यालय में जाकर एक अधिकारी से कहा, “मैं पूर्व रॉ एजेंट हूँ और मुझे रहने के लिए छत चाहिए।” ये सुनते ही वहाँ मौजूद सभी लोग हैरान रह गए। उनकी मुलाक़ात डीएम से नहीं हो पाई, जिसकी वजह से उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।

मनोज रंजन दीक्षित को जासूसी करने के लिए पकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था, 2005 के दौरान उन्हें बाघा बॉर्डर पर छोड़ा गया था। पाकिस्तान से छूटने के बाद 2007 में उनकी शादी हुई। कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि पत्नी को कैंसर है। वह अपनी पत्नी का इलाज कराने के लिए लखनऊ आए थे। 2013 में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। इसके बाद से ही वह लखनऊ में रह रहे हैं। गोमतीनगर विस्तार में वे स्टोर कीपर का काम कर रहे थे। लॉकडाउन में काम छूट गया था और उनके जीवन की चुनौतियॉं बढ़ गईं।

अफग़ानिस्तान बॉर्डर पर जासूसी के लिए पकड़े जाने पर उन्हें तमाम तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ा था। फिर भी उन्होंने देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया। पाकिस्तान में जासूसी के दौरान उनका नाम यूनुस, युसूफ और इमरान था। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 80 के दशक में रॉ में प्रशासनिक सेवाओं की तरह आम नागरिकों को उनकी योग्यता के आधार पर भर्ती किया जा रहा था। 1985 में मनोज रंजन दीक्षित को नजीबाबाद से भर्ती किया गया। दो बार सैन्य प्रशिक्षण के बाद उन्हें पाकिस्तान भेजा गया। 

उन्होंने पाकिस्तान से बतौर जासूस कई अहम जानकारियाँ साझा की थीं। कश्मीरियों युवाओं को बहला-फुसलाकर अफ़गानिस्तान बॉर्डर पर ट्रेनिंग दिए जाने जैसी कई अहम जानकारियाँ। 1992 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें कराची जेल में रखा गया था।

मनोज रंजन दीक्षित की उम्र अभी 56 साल है और उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ है। वह सरकारी मदद मिलने की उम्मीद लेकर कलेक्ट्रेट पहुँचे थे, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। ख़ुफ़िया एजेंसी की सबसे पहली शर्त यही होती है कि एजेंट के गिरफ्तार होने पर उनकी पहचान करने से इनकार कर देते हैं। मनोज दीक्षित ने भी इसके अनुबंध पर सहमति जताई थी। भारत वापसी पर कई रॉ अधिकारियों ने उन्हें आर्थिक मदद की थी। उसके बाद किसी ने उनकी सुध नहीं ली।  

चिल्लाती माँ, लगातार फोन कॉल… और बच गई 25 जिंदगियाँ: उत्तराखंड के चमोली में माँ मंगश्री देवी के आगे मौत ने मानी हार

उत्तराखंड के चमोली में आई त्रासदी से जुड़ी कई कहानियाँ धीरे-धीरे सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में एक और कहानी सामने आई है – हेवी ड्यूटी वाहन चालक विपुल कैरेनी (27 साल) तपोवन स्थित एनटीपीसी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट में काम करते थे। उनकी माँ ने रविवार (7 फरवरी 2021) को उन्हें कई कॉल किए थे, ताकि वो बैराज से हट जाएँ लेकिन विपुल ने कॉल पर गौर नहीं किया।

इसके बावजूद विपुल की माँ मंगश्री देवी ने हार नहीं मानी। वो तब तक कॉल करते रहीं, जब तक उन्होंने अपने बेटे को बता नहीं दिया कि धौलीगंगा उफ़ान पर है और बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ विपुल ने बताया, “हमारा गाँव ऊँचाई पर स्थित है। जिस वक्त बाढ़ आई, उस वक्त मेरी माँ बाहर काम कर रही थीं। अगर हमें उनकी चेतावनी नहीं मिली होती तो मैं और मेरे लगभग दो दर्जन साथी अब तक मर चुके होते। जैसे ही हमें जानकारी मिली, हमने पास की एक टूटी सीढ़ियों पर शरण ली।”

दो महीने पहले ही विपुल की शादी हुई थी और वह 7 साल की उम्र से वहाँ काम कर रहे हैं। रविवार की सुबह 9 बजे वह तपोवन स्थित अपने गाँव ढाक से प्रोजेक्ट की जगह के लिए निकले थे, जहाँ अब सिर्फ मलबा बचा हुआ है। विपुल के अनुसार:

“आम दिनों में हमारी कमाई लगभग 600 रुपए होती है लेकिन रविवार के दिन हमारी कमाई लगभग दोगुनी होती है। इसलिए मैं रविवार को काम करने के लिए गया था। सुबह 10:35 बजे मेरी माँ का फोन आया और उन्होंने मुझे वहाँ से भागने के लिए कहा।” 

इसके बाद उस दिन के हालातों के बारे में बताते हुए विपुल ने कहा, “शुरुआत में मैंने उन्हें चिल्लाते हुए सुना लेकिन मैंने उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया। मैंने उनसे कहा मज़ाक मत करिए, पहाड़ कैसे फट सकते हैं। उन्होंने मुझे फिर से फोन किया और भागने के लिए कहा। मेरी माँ और पत्नी ने पानी को उसकी औसत ऊँचाई से 15 मीटर ऊपर देखा था, उसके रास्ते में जो कुछ भी आया, वह तबाह हो गया। हम सभी सीढ़ियों की तरफ दौड़े और उसकी वजह से ही हमारी जान बची।” 

मंगश्री देवी की कॉल के चलते बचने वाले लोगों में एक और नाम था संदीप लाल। ढाक के ही रहने वाले संदीप लाल ने बताया, “मैं अंदर था और पावर लाइन की गड़बड़ी ठीक कर रहा था। जैसे ही मेरे पास विपुल का कॉल आया, मैं वहाँ से बाहर भागा। मैं आज ज़िंदा हूँ तो सिर्फ और सिर्फ विपुल की माँ द्वारा दी गई चेतावनी की वजह से। इस घटना से पता चलता है कि हमें अपने माता-पिता की चेतावनी को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।”

विपुल और संदीप के लगभग 100 दोस्त अभी भी लापता हैं।

‘मुझे, मेरी बहन, बच्चों और अब्बा को फिर किया नजरबंद’ – उमर अब्दुल्ला ने लगाई गुहार, पुलिस ने खोली पोल

रविवार (फरवरी 14, 2021) को पुलवामा में हुए हमले का 2 वर्ष पूरा हो रहा है और कृतज्ञ राष्ट्र उन 40 CRPF के जवानों को श्रद्धांजलि दे रहा है, जो इस आत्मघाती हमले में बलिदान हो गए। आतंकी अक्सर ऐसी घटनाओं के बरसी पर खून बहाने की फिराक में रहते हैं, इसीलिए पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे मौकों पर सतर्क रखा जाता है। इसी बीच जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर नजरबंद किए जाने बड़ा दावा किया है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के नेता ने कहा कि उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर के रखा गया है। उन्होंने ट्विटर के माध्यम से अगस्त 2019 के बाद के ‘नया जम्मू कश्मीर’ की बात की। इसी तारीख को जम्मू कश्मीर को मिले विशेष राज्य का दर्जा वापस लेकर अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया था। उससे पहले भी कई अलगाववादियों और कश्मीरी नेताओं को जेल में या नजरबंद कर के रखा गया था।

उमर अब्दुल्लाह ने दावा किया है कि बिना किसी जानकारी और वजह के उन्हें उनके घर में नजरबंद कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि उनके पिता को भी घर में नजरबंद कर दिया गया है, जो एक सांसद हैं। उन्होंने अपनी बहन और बच्चों तक की नजरबंदी की बात की। साथ ही बाहर खड़ी सशस्त्र बलों की वैन की तस्वीरें भी पोस्ट की। उन्होंने एक दस्तावेज शेयर कर के दावा किया कि इसमें उनके नाम हैं, जिन्हें नजरबंद किया गया है।

अब आपको बताते हैं कि सच्चाई क्या है। श्रीनगर पुलिस ने साफ़ किया है कि पुलवामा के लेथपोरा में हुए खूँखार आतंकी हमले की आज दूसरी बरसी है, ऐसे में पुलिस ये प्रयास कर रही है कि कोई हिंसा की वारदात न हो। पुलिस ने कहा कि कुछ प्रतिकूल ख़ुफ़िया सूचनाओं के कारण VIPs और सुरक्षा घेरे में रहने वाले लोगों को आवाजाही न करने की सलाह दी गई है। साथ ही ऐसे सभी व्यक्तियों को आज प्लान की गई यात्राओं को भी रोकने के लिए पहले ही सूचित कर दिया गया था।

हालाँकि, उमर अब्दुल्लाह इससे भी संतुष्ट नजर नहीं आए और उन्होंने शक जताया कि ये श्रीनगर पुलिस का ही ट्विटर हैंडल है, क्योंकि उस पर वेरिफाइड वाला ब्लू टिक नहीं था। उन्होंने पूछा कि उन्हें किस कानून के तहत नजरबंद किया गया है? उन्होंने पुलिस को लिखित में ये दिखाने को कहा कि उनके या उनके दफ्तर ने ऐसा कोई आदेश प्राप्त किया है। उनकी पार्टी JKNC ने भी नजरबंदी का आरोप लगाते हुए झूठ फैलाया।

PM मोदी ने सेना को सौंपे 118 अर्जुन टैंक: ₹8400 करोड़ की लागत से तैयार किए गए हैं स्वदेशी MK-1A

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (फरवरी 14, 2021) दो राज्यों- तमिलनाडु और केरल के दौरे पर हैं। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में उन्होंने 118 हाइटेक अर्जुन टैंक (MK-1A) सेना को सौंप दिया। प्रधानमंत्री ने सलामी भी दी। इस दौरान आर्मी चीफ एमएम नरवणे भी मौजूद रहे। इन टैंकों को DRDO ने 8400 करोड़ की लागत से तैयार किया है।

पीएम मोदी ने पुलवामा हमले में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा, “कोई भी भारतीय आज का दिन नहीं भूल सकता है। दो साल पहले आज ही के दिन पुलवामा में हमला हुआ था। हम उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं, जिन्होंने उस हमले में अपनी जान गँवा दी थी। हमें अपने सुरक्षा बलों पर गर्व है। उनका साहस आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।”

अर्जुन टैंक पर पीएम मोदी ने कहा, “मुझे स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए और बनाए गए अर्जुन मेन बैटल टैंक (एमके-1ए) को सौंपते हुए गर्व है। ये स्वदेशी गोला-बारूद का भी इस्तेमाल करता है। तमिलनाडु पहले ही भारत के ऑटोमोबाइल निर्माण का हब है। अब मैं तमिलनाडु को भारत के टैंक निर्माण के हब के रूप में विकसित होते देखता हूँ।”

पीएम मोदी ने तमिलनाडु में कई विकास परियोजनाओं को भी हरी झंडी दिखाई। चेन्नई मेट्रो प्रोजेक्ट फेज-1 एक्सटेंशन का उद्घाटन भी किया।

पीएम मोदी ने तमिलनाडु में योजनाओं की शुरुआत के बाद कहा, “आज चेन्नई से हम ई-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं। ये प्रोजेक्ट इनोवेशन और स्वदेशी विकास के प्रतीक हैं। इनसे तमिलनाडु का और विकास होगा।” उन्होंने बताया कि चेन्नई मेट्रो का तेज़ी से विकास हो रहा है, इस साल के बजट में इस प्रोजेक्ट के दूसरे चरण के लिए 63,000 करोड़ से ज़्यादा रुपए आवंटित किए गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईआईटी मद्रास के डिस्कवरी कैंपस की आधारशिला रखी। यह कैंपस चेन्नई के पास थय्युर में बनाया जाएगा। पहले चरण में 2 लाख वर्ग मीटर से अधिक एरिया में बनने वाले इस कैंपस के निर्माण में 1000 करोड़ रुपए की लागत आएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्रैंड एनीकट नहर प्रणाली के विस्तार, नवीनीकरण और आधुनिकीकरण की आधारशिला रखी। इस नहर का आधुनिकीकरण 2,640 करोड़ रुपए की लागत से होगा, जिससे नहरों में जल वहन करने की क्षमता बढ़ेगी।

अर्जुन टैंक की खासियत क्या है?

इस टैंक को पूरी तरह भारत में बनाया गया है। ये 118 टैंक सेना के पहले बैच में शामिल होंगे। अर्जुन श्रेणी के काफी टैंक पहले ही पश्चिम रेगिस्तान में पाकिस्तान बॉर्डर पर तैनात हैं। इन 118 अर्जुन टैंक से सेना में बख्तरबंद कोर में दो रेजिमेंट बनाई जाएगी।

जिस ‘भारत भवन’ के लिए ढोया था ईंट-पत्थर… अब उसी के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि: जानिए कौन हैं पद्मश्री भूरीबाई

मध्य प्रदेश की आदिवासी चित्रकार भूरी देवी को ‘भारत भवन’ के स्थापना दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। दिलचस्प बात ये है कि जब इस भवन का निर्माण शुरू हुआ था, तब वो 6 रुपए प्रतिदिन की दिहाड़ी पर बतौर मजदूर यहाँ काम करती थीं। उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि इसी ‘भारत भवन’ में वो मुख्य अतिथि बनेंगी। पद्मश्री से सम्मानित भूरीबाई देवी पिथोरा पेंटिंग कला में सिद्धहस्त हैं।

भूरी बाई को गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की गई। कला के क्षेत्र में उत्कृष्ठ कार्य करने के लिए भूरी बाई को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। पिथोरा पेंटिंग के जरिए भूरी बाई ने बरिया जनजातीय परंपराओं को जीवित रखा। उन्हें इसके लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा।

इससे पहले उन्हें 1986-87 में मध्‍य प्रदेश सरकार के सर्वोच्‍च पुरस्‍कार शिखर सम्‍मान से सम्मानित किया गया था। 1998 में मध्‍य प्रदेश सरकार ने उन्‍हें अहिल्‍या सम्‍मान से भी सम्मानित किया था।

भोपाल के ‘भारत भवन’ को बहुकला केंद्र के रूप में जाना जाता है। इसके निर्माण के समय वो ईंट-पत्थर ढोने का काम किया करती थीं। ‘भारत भवन’ के पहले प्रमुख रहे जे स्वामीनाथन ने उनकी कला को पहचाना था और उन्हें आगे बढ़ाया। फ़रवरी 13, 2021 को 39वाँ स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। भूरीबाई बताती हैं कि 40 वर्ष पहले वो मजदूर के रूप में यहाँ काम करती थीं, जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

जब वो यहाँ काम करती थीं, तब उन्हें पता भी नहीं था कि वो जिस भवन के निर्माण में योगदान दे रही हैं, वो कला केंद्र बनने वाला है। वो इसे सिर्फ एक इमारत समझ कर काम करने आई थीं। वो अपना घर चलाने के लिए ईंट-पत्थर ढो रही थीं, लेकिन फिर यहीं से जुड़ गईं। उन्होंने मुख्य अतिथि बनने को भावुक क्षण बताते हुए कहा कि यहीं उन्हें अपनी कला को निखारने का मंच मिला और उन्हें नए मौके मिले।

आदिवासी भील समुदाय की भूरीबाई ने बताया कि जब वो मजदूरी करती थीं तो एक दिन वो अन्य महिला मजदूरों के साथ भोजन करने जा रही थीं। तभी जे स्वामीनाथन आए और पूछा कि क्या वो अपनी संस्कृति की शादी की चित्रण बना सकती हैं? उन्होंने हामी भर दी लेकिन साथ ही पूछा कि मजदूरी का क्या होगा और रुपए नहीं मिलेंगे तो घर कैसे चलेगा? इस पर उन्हें बताया गया कि इसके लिए 150 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से धनराशि मिलेगी। भूरीबाई ने 10 दिन काम किया और 1500 रुपए लेकर घर गईं।

‘दैनिक जागरण’ में सुशील पांडेय की खबर के अनुसार, झाबुआ के एक गाँव में चित्रकारी सीखने वाली भूरीबाई के पास जब इतने रुपए उनके पति ने देखा तो पूछा कि कहीं उन्होंने कुछ गलत कार्य तो नहीं किया? उन्हें समाज में लांछन का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने परिवार, पति और खेती-बारी सबका ख्याल रखते हुए चित्रकारी जारी रखी। श्यामला पहाड़ी पर बने ‘भारत भवन’ की स्थापना 1982 में हुई थी।

बता दें कि मोदी सरकार में सांस्कृतिक स्तर के काम करने वाले ऐसे कई लोगों को पद्म पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इस वर्ष भी कुल 119 नामों की इस सूची में कई ऐसे नाम हैं, जिनके संघर्ष की कहानी लंबी है। इनमें लौंडा नाच के नाम पर समाज में एक गायब होती परंपरा को जीवनदान देने वाले रामचंद्र माँझी और डायन जैसी कुरीति की भुक्तभोगी होने के बाद उसके ख़िलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाली छूटनी देवी जैसे नाम शामिल हैं। 

गायिका इब्तिसाम ने इस्लाम धर्म छोड़ दिया, कहा – ‘ये आतंक का मजहब, महिलाओं के साथ हिंसा का मजहब’

कुवैत की गायिका इब्तिसाम हामिद (Ibtisam Hamid) ने इस्लाम छोड़ कर यहूदी मजहब (Judaism) अपना लिया है, जिसके बाद कई मुस्लिम उनके विरोध में उतर आए हैं। उन्हें अरब में बस्मा-अल-कुवैती के नाम से जाना जाता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर के इस्लाम का त्याग करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि यहूदी मजहब महिलाओं के प्रति ज्यादा सहिष्णु है, इसीलिए वो इसे अपना रही हैं।

उन्होंने ऐलान किया कि वो स्वेच्छा से इस्लाम का त्याग कर रही हैं। उन्होंने कहा, “इस्लाम आतंक और पाखंड का मजहब है। ये महिलाओं से घृणा करता है, उन्हें दबाता है और उनके साथ हिंसा को अंजाम देता है। इस्लाम कभी महिलाओं को उनका संपूर्ण अधिकार नहीं देता। इसीलिए, गर्व से कहती हूँ कि मैं यहूदी हूँ।” साथ ही उन्होंने कुवैत की सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी अल-सबह पर इजरायल के साथ सम्बन्ध बिगाड़ने के आरोप लगाए।

उन्होंने कहा कि पार्टी ने इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने कहा कि अल-सबह धार्मिक और वैचारिक स्वतंत्रता को नकारता है। गायिका इब्तिसाम हामिद ने कहा कि उनका न तो इस पार्टी से कोई सम्बन्ध है और न ही इसका समर्थन करती हैं। गायिका ने 2018 में कहा था कि इस्लाम में संगीत हराम है और वो इस मामले में ईश्वर से दिशा-निर्देश चाहती हैं। उनका दावा है कि बचपन में उन्हें पूरी कुरान याद थी।

कुवैत की गायिका ने इस्लाम को कहा अलविदा

वहीं अरब की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि इब्तिसाम हामिद कुवैती नहीं हैं। कहा जा रहा है कि उनकी माँ कुवैती हैं लेकिन कुवैत में एक महिला की नागरिकता उसके बच्चों को नहीं दी जा सकती है। वो कुवैत में रहती भी नहीं हैं और कुवैती नागरिकता के लिए उनके आवेदन को नकार दिया गया था। पिछले दिनों कुवैती ब्रॉडकास्टर मुहम्मद अल मुमिन्स ने खुद के इस्लाम छोड़ कर ईसाई बनने की बात कही थी।

इब्तिसाम के बारे में बताया गया है कि वो फ़िलहाल इराकी नागरिक हैं। गायिका ने कहा कि उन्होंने अमेरिका की नागरिकता के लिए ऐसा नहीं किया है, बल्कि यहूदी मजहब में उनका विश्वास है। पिछले वर्ष UAE, बहरीन, सूडान और मोरक्को जैसे देशों ने इजरायल के साथ शांति समझौता किया था, लेकिन कुवैत ने इससे इनकार कर दिया था। कुवैत ने फ़िलिस्तीन को पूर्ण अधिकार मिलने से पहले ऐसा न करने की बात कही थी।

ToolKit में पहली गिरफ्तारी: 21 साल की दिशा बेंगलुरु में धराई, दिल्ली पुलिस की साइबर सेल कर रही पूछताछ

किसान आंदोलन की आड़ में भारत के खिलाफ़ रचे गए षड्यंत्र को साबित करने वाले दस्तावेज़ ‘टूलकिट’ मामले में बड़ी कार्रवाई हुई है। दिल्ली पुलिस की साइबरक्राइम स्पेशल सेल ने शनिवार (13 फरवरी 2021) को युवा ‘स्टूडेंट क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट’ दिशा रवि को बेंगलुरु से हिरासत में लिया।

‘फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर’ (FFF) की संस्थापक छात्रा दिशा रवि पर आरोप है कि उसने तमाम सोशल मीडिया माध्यमों पर ‘टूलकिट’ का प्रसार किया था। फ़िलहाल दिल्ली पुलिस दिशा से इस मुद्दे पर पूछताछ करेगी।  

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 21 वर्षीय दिशा को सोलादेवानहाली स्थित उसके घर से हिरासत में लिया गया। वह FFF की संस्थापक सदस्यों में से एक है। FFF जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर काम करने वाला वैश्विक अभियान (global climate strike movement) है, जिसकी शुरुआत अगस्त 2018 में हुई थी। स्वीडन की अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने बेंगलुरु में इस अभियान के लिए एक स्ट्राइक स्कूल की शुरुआत की थी।

दिशा ने माउंट कार्मेल कॉलेज (mount carmel college) से बीबीए (bachelor of business administration) की पढ़ाई की है। फ़िलहाल वह गुड मिल्क कंपनी (good mylk company) में बतौर कल्नरी एक्सपीरियंस मैनेजर (culinary experience manager) काम कर रही हैं। जब पुलिस ने उसे हिरासत में लिया, उस वक्त वो वर्क फ्रॉम होम कर रही थी। दिशा के पिता मैसूर में एथलेटिक्स कोच हैं और माँ गृहिणी हैं।

दिल्ली पुलिस की साइबरक्राइम स्पेशल सेल ने 4 फरवरी को इस मामले में आईपीसी की धारा 124ए, 120ए और 153ए के तहत एफ़आईआर दर्ज की थी। देशद्रोह, आपराधिक षड्यंत्र और समूहों के बीच नफ़रत फैलाने संबंधी यह एफ़आईआर ‘टूलकिट’ के निर्माताओं के खिलाफ़ दर्ज की गई थी।

‘टूलकिट’ को ग्रेटा थनबर्ग ने भी साझा किया था। 18 वर्षीय ग्रेटा ने इसके बाद अपना मूल ट्वीट डिलीट कर दिया था, जिसमें टूलकिट मौजूद थी। इसके बाद दूसरा ट्वीट किया था, जिसमें दूसरी ‘टूलकिट’ शामिल की गई थी।       

हाल ही में ‘दी स्ट्रिंग’ ने ‘टूलकिट’ का वामपंथी मीडिया और ऑल्ट न्यूज़ जैसे कुछ स्वघोषित फैक्ट चेकर्स से संबंधों को उजागर करने का दावा किया था। ट्विटर पर ‘द स्ट्रिंग’ (The String) ने इस बात की जानकारी देते हुए बताया था कि यूट्यूब द्वारा उनका वीडियो डिलीट कर दिया गया है।

ग्रेटा थनबर्ग द्वारा किसान आन्दोलनों को लेकर ‘गलती से’ सार्वजानिक की गई एक ‘टूलकिट’ पर जारी विवाद को लेकर ‘दी स्ट्रिंग’ नाम के इस चैनल ने दावा किया था कि वो इस टूलकिट को लेकर खुलासे करेगा, जिनसे स्पष्ट होगा कि किस तरह से मजहबी फैक्ट चेकर वेबसाइट ‘ऑल्ट न्यूज़’ का भी इस टूलकिट से सम्बन्ध है।

इसके पहले दिल्ली पुलिस ने टूलकिट बनाने वालों को लेकर में शुक्रवार (फरवरी 05, 2021) को गूगल और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों से ईमेल आईडी, डोमेन यूआरएल और कुछ सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देने को कहा था।

बताया जा रहा है कि गूगल ने इस टूलकिट को बनाने वालों की जानकारी साझा करने के लिए अपनी सहमती दे दी थी। उल्लेखनीय है कि किसान आन्दोलन को लेकर पॉप सिंगर रिहाना के ट्वीट के बाद जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग (Greta Thunberg) ने ‘गलती से’ एक ‘टूलकिट’ ट्विटर पर शेयर कर डाली थी।

‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसा फ़ैलाने की स्वतंत्रता नहीं’ – ट्विटर के दोहरे रवैये पर लगाम जरूरी

6 जनवरी 2021 को अमेरिका में वहाँ की संसद के प्रांगण ‘कैपिटल हिल’ में हिंसा की घटनाएँ हुईं। उस समय हिंसा फैलाने के आरोप में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक कर दिया।

माना गया कि ट्रंप ने एक वीडियो के जरिए अपने समर्थकों को हिंसा के लिए उकसाया। यही नहीं, बाकी कई टि्वटर अकाउंट भी इस आधार पर ब्लॉक या स्थगित कर दिए गए। यूट्यूब, फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया कंपनियों ने भी ऐसा ही किया।

उस समय ट्विटर ने डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक करते हुए कहा, “ट्रंप का अकाउंट 12 घंटे तक ब्लॉक रहेगा और यदि उन्होंने चुनाव परिणामों को अस्वीकार करने वाली और उन ट्वविट्स को डिलीट नहीं किया, जो हिंसा फ़ैलाने जैसी लगती हैं, तो ये रोक आगे बढ़ा दी जाएगी।” साथ ही इस बयान में ट्विटर ने ये भी कहा, “यदि ट्रंप ट्विटर की हिंसात्मक धमकियों और चुनाव संबंधित झूठे प्रचार की नीति का उल्लंघन जारी रखते हैं तो उनका अकाउंट स्थाई रूप से बंद कर दिया जाएगा।”

बात बिलकुल तर्कसंगत लगती है कि ट्विटर के अकाउंट का उपयोग हिंसा फैलाने के लिए नहीं किया जा सकता। यानी किसी भी मीडिया संस्थान के प्लेटफॉर्म का उपयोग किसी देश में उसकी सांवैधानिक व्यवस्था, मान्य संस्थाओं और कानून द्वारा स्थापित ढाँचों और परंपराओं को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं किया जा सकता।

लेकिन क्या ट्विटर अपने इन सिद्धांतों का पालन दुनिया में हर जगह करता है? भारत में क्या हुआ? लाल किले पर जो कि भारत की अस्मिता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, 26 जनवरी के दिन दंगाइयों ने राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया।

क्या ट्विटर ने लालकिले में 26 जनवरी को हुई हिंसा को लेकर ऐसा किया? क्या ट्विटर ने हिंसा और विद्वेष फैलाने वाले ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने की चेष्टा तक की? यहाँ तक कि कुछ पत्रकारों ने जब दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने एक किसान की ट्रैक्टर पलटने से हुई मृत्यु को पुलिस की गोली से होने वाली मृत्यु बताकर ट्वीट किया, तो भी ट्विटर ने ना तो इनको कोई चेतावनी दी और ना इनके खिलाफ कोई और कार्यवाही की।

और तो और भारत में तो #ModiPlanningFarmerGenocide जैसा हैशटैग चलाया गया। इस हैशटैग का हिंदी अर्थ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों के नरसंहार की योजना बना रहे हैं। अब इससे विद्वेषपूर्ण, हिंसा भड़काने और उकसाने वाला और नितांत झूठा प्रचार क्या हो सकता है? भारत में नए कृषि कानूनों को लेकर एक वर्ग आंदोलन कर रहा है।

कुछ दिन पहले 26 जनवरी को हिंसा हो चुकी है। लाल किले और तिरंगे के अपमान पर समाज उद्वेलित है। ऐसे में इस तरह के हैशटैग के पीछे की मंशा समझने के लिए आपको कोई बड़ा विद्वान होने की आवश्यकता नहीं हैं। होना तो ये चाहिए था कि ट्विटर की सम्पादकीय टीम स्वयं संज्ञान लेकर इस पर कार्रवाई करती। ऐसा तो नहीं हुआ, बल्कि ट्विटर ने अमेरिका से उलट बाँसी करते हुए इसे ‘खबरीला कंटेंट’ बताया।   

भारत सरकार ने ट्विटर को लिखित आदेश देते हुए किसानों के नरसंहार वाले इस हैशटैग #ModiPlanningFarmerGenocide को चलाने वाले 257 ट्विटर अकाउंट पर कार्रवाई करने के लिए कहा। कुछ घंटे के लिए तो ट्विटर ने इनमें से कुछ अकाउंट को ब्लॉक किया।

फिर पलटी मारते हुए ट्विटर के अधिकारियों ने कहा कि इसे वह ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का मुद्दा मानते हैं और इस हैशटैग को चलाने वाले अकाउंट को पुनः बहाल कर दिया। ट्विटर ने ये भी कहा कि ये हैशटैग ‘न्यूज़वर्दी’ यानी खबरीला है। ट्विटर यहाँ शिकायतकर्ता, अभियुक्त, वकील और न्यायाधीश – चारों भूमिकाएँ खुद निभाने लगा। अर्थात हर नियम कायदे से परे।

यह बात अलग है कि भारत के कड़े रुख के बाद ट्विटर ने पहले 297 और बाद के 1178 ट्विटर अकाउंट में से 97% फीसदी को ब्लॉक कर दिया है। लेकिन इनको भी जियो टैगिंग के जरिए भारत में ही ब्लॉक किया गया है। इनमें से कई अकाउंट्स अभी भी विदेशों में बकायदा चल रहे  हैं। 

इस घटना से कई सवाल पैदा होते हैं।

पहला सवाल यह है कि क्या ट्विटर जैसी सोशल मीडिया कंपनियाँ, जो लाभ के लिए काम करती हैं, उनको यह अधिकार है कि वह यह तय करें कि कोई देश कैसे चलेगा?

दूसरा प्रश्न है कि क्या ये कंपनियाँ भारत के कानून, भारतीय संसद, जनता द्वारा चुनी हुई सरकार और भारत की व्यवस्था से ऊपर हैं?

तीसरा सवाल कि क्या ये कंपनियाँ मुद्दई, वकील, मुजरिम और मुंसिफ – सारी भूमिका खुद ही अदा करेंगी ?

चौथा और सबसे बड़ा सवाल क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र की सार्वभौम सत्ता से ऊपर इन मीडिया संस्थानों को कोई अधिकार है?

कथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम से इन कंपनियों को अपने राजनीतिक विचार और खास सोच इस तरह किसी देश पर लादने का अधिकार किसने दिया? ट्विटर के भारत में कोई 01 करोड़ 80 लाख अकाउंट हैं। इनमें से भी माना जाता है कि 20% अकाउंट्स स्वचालित बॉट्स यानी मशीनों द्वारा चलाए जाते हैं। यानी ये फेक अकाउंट है।

ऐसे झूठे फरेबी अकाउंट के सहारे चलने वाले सोशल मीडिया संस्थानों को या उनके एक खास नजरिए को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा नियामक मान लिया जाने से बड़ी त्रासदी कोई नहीं हो सकती। अगर संख्या बल को ही मापदंड बनाया जाए तो 30 लाख से ज़्यादा अकाउंट तो भारत में कुछ महीने पहले चालू हुए ‘KOO’ (कू) नामक ऐप के भी हो चुके हैं।

वैसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्विटर व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस भेजा है कि वह झूठ और फरेब से चलाए जाने वाली फेक न्यूज़ आदि पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। किसी भी सोशल मीडिया या मीडिया संस्थान को, खासकर जो लाभ के आधार पर चलाया जा रहा है, यह हक नहीं दिया जा सकता कि वह विधि द्वारा स्थापित भारतीय सरकार की अवमानना करें।

वैसे भी भारत के संविधान में दिया गया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अंतिम नहीं है। वह भी कुछ शर्तों के साथ ही लागू होता है। उसमें भी कई वर्जनाएँ हैं। इस कारण ट्विटर तथा अन्य सोशल मीडिया संस्थानों को भी उसी तराजू पर तौला जाना चाहिए, जो तराजू भारत के संविधान ने बनाई है।

इस नाते इन्हें भारत के लोगों के द्वारा चुनी हुई सरकार तथा उसके द्वारा स्थापित नियमों और कायदों के अनुसार चलना आवश्यक है। अन्यथा भारत सरकार को यह पूरा हक है कि वह ट्विटर जैसे संस्थानों के दोगलेपन के खिलाफ कानून के अनुसार कार्यवाही करें और उन्हें उनके द्वारा चलाई जा रही एक खास सोच को देश पर थोपने से रोके।

आखिर में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सही संदर्भ में देखना आवश्यक है। अमेरिका में जब 6 जनवरी को कोहराम हुआ, तो वहाँ चारों ओर से सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की आवाज़ उठाई गई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ‘लिबरल’ यानी उदारवादी पैरोकारों ने जोर-शोर से कहा कि बोलने की आज़ादी के नाम पर समाज में विद्वेष फ़ैलाने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।

इन मुद्दों पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के विशेष सहायक रहे जोनाथन ग्रीनब्लेट ने स्पष्ट कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसा फ़ैलाने की स्वतंत्रता नहीं है।” उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति (ट्रंप) ने सोशल मीडिया के ज़रिए ज़हर फैलाया है।” ग्रीनब्लेट, जो इस समय अमेरिका की एंटी डिफेमेशन लीग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं, ने कहा, “सोशल मीडिया कंपनियों पर ये लाजिमी है कि वे सख्त कार्रवाई करते हुए इसे रोकें।” 

ऐसा नहीं है कि ट्विटर भारत में हो रही घटनाओं से अनजान था। स्वीडन की रहने वाली  ग्रेटा थनबर्ग गलती से एक टूलकिट को अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा कर चुकीं थी। इसमें विस्तार से बताया गया है कि कृषि कानून विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में किस तरह भारत में विद्वेष और असंतोष फैलाया जाना चाहिए।

यानी ट्विटर के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सीधे-सीधे भारत के अंदरूनी मामलों को उलझाने के लिए हो रहा है, ये जानकारी सावर्जनिक थी ही। इस सबके बावजूद ट्विटर के अमेरिका और भारत में अलग-अलग मानदंड अपनाने को एक अंग्रेजी प्रतीक में शायद ऐसे कहा जा सकता है – ‘मेरा कुत्ता तो कुत्ता, लेकिन तुम्हारा कुत्ता तो टॉमी।

CPI मेंबर थे अयोध्या पर झूठ फैलाने वाले ‘इतिहासकार’ DN झा: मरने के बाद पार्टी ने खोली पोल, याद में बुलाई बैठक

भारत में पाठ्य पुस्तकों के कंटेंट्स से लेकर इतिहास से जुड़े नैरेटिव तैयार करने तक, इन सबमें वामपंथियों का ही रोल रहा है। इतिहासकारों ने वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ किया और हिन्दू धर्म व हिन्दू राजाओं को नीचा दिखा कर मुगलों को महान बताया। उन्हीं में से एक थे द्विजेन्द्र नारायण (DN) झा, जिन्होंने राम मंदिर को लेकर झूठ फैलाया था। अब पता चला है कि वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के सदस्य थे।

CPI की दिल्ली यूनिट के एक ईमेल से भी इसकी पुष्टि होती है। इसका दफ्तर नई दिल्ली स्थित असफ अली रोड में स्थित है। CPI ने कहा है कि DN झा का निधन न सिर्फ इतिहास की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है, बल्कि इतिहास के ‘वैज्ञानिक लेखन’ के लिए भी बड़ा नुकसान है। पार्टी ने उन्हें अपने-आप में एक संस्था बताते हुए याद दिलाया कि उन्होंने कैसे प्राचीन और मध्ययुगीन भारत पर ढेर सारी पुस्तकें लिखीं।

CPI की बैठक में DN झा को किया गया याद

बकौल CPI, उनके इतिहास लेखन पर कई बार दक्षिणपंथियों ने अपना क्रोध दर्शाया, लेकिन वो अपनी बातों पर अड़े रहे और अपने दिमाग की आवाज़ को बोलने में कभी पीछे नहीं हटे। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के HOD रहे द्विजेन्द्र नारायण झा के बारे में वामपंथी पार्टी ने दावा किया है कि उन्होंने अनुभववाद के आधार पर इतिहास लिखा। साथ ही उन्हें ‘सांप्रदायिक इतिहास के खिलाफ युद्ध लड़ने वाला’ करार दिया।

लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण है कि CPI ने स्वीकार किया है कि उनका जाना पार्टी के लिए भी बड़ी क्षति है क्योंकि बतौर प्रोफेसर रिटायरमेंट से पहले तक वो CPI के सदस्य हुआ करते थे। पार्टी ने लिखा कि CPI दिल्ली उनके परिजनों के साथ खड़ी है। DN झा को श्रद्धांजलि देते हुए CPI ने खुलासा किया कि उनके निधन के बाद पार्टी नेताओं ने उनके मृत शरीर पर पार्टी का झंडा भी डाला। फरवरी 4, 2021 को उनके निधन के बाद कई नेता उनके घर पहुँचे थे।

DN झा के निधन के बाद CPI ने मेमोरियल मीटिंग बुलाई

साथ ही CPI ने डीएन झा के निधन के बाद उन्हें याद करने के लिए ‘मेमोरियल मीटिंग’ भी बुलाई। इस बैठक में कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। इसमें DN झा समेत दो अन्य दिवंगत ‘इतिहासकारों’ को श्रद्धांजलि दी गई। इसमें उन्हें ‘बहुवाद और असहमति’ का चैंपियन बताया गया, जिनका जाना जाति और पंथ विहीन समाज की अवधारणा की लड़ाई में एक शून्य पैदा कर दिया। साथ ही उनके रास्ते पर चलने की बातें भी की गईं।

इतिहासकार डॉ. मीनाक्षी जैन ने भी ऑपइंडिया को बताया था कि 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” – रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और डीएन झा ही थे और साथ ही उन्होंने इन सब के प्रपंच की पोल-पट्टी भी खोली थी। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़ कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

अयोध्या पर डीएन झा व उनके साथी इतिहासकारों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ द्वारा लिखी गई चीजों को सिर्फ़ उनका विचार माना जा सकता है, कोई सबूत नहीं। ‘Historians’ Report To The Indian Nation’ नामक इस रिपोर्ट को अयोध्या में हुए पुरातात्विक उत्खनन से निकले निष्कर्ष का अध्ययन किए बिना ही तैयार किया गया था। इनमें से एकाध को तो बाबर के बारे में भी कुछ नहीं पता था।

अब आप समझ सकते हैं कि किस तरह खास एजेंडा वाले राजनीतिक दलों के नेता इतिहासकार का चोला पहन कर इस देश का इतिहास लिखते रहे हैं। क्या इनसे उम्मीद की जा सकती है कि ये रामायण और महाभारत पर निष्पक्ष रिसर्च करेंगे? तभी हमें आज तक प्राचीन मंदिरों की आश्चर्यजनक संरचनाओं से दूर रख कर ताजमहल के बारे में पढ़ाया जाता रहा और अशोक व मौर्य जैसे सम्राटों की जगह मुगलों के गुणगान से पाठ्य पुस्तकों को भर दिया गया।

नेहरू के गुस्से के बावजूद जिस मेजर ने बिना खून बहाए तवांग को भारत में मिलाया, PM मोदी के समय मिला उन्हें सम्मान

भारत के एक महान सैन्य अधिकारी को उनके योगदान के लिए 70 साल बाद वो सम्मान मिला, जिसके वो हकदार थे। तवांग का भारत में विलय कराने वाले मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग के सम्मान में रविवार (फरवरी 14, 2021) को CDS जनरल विपिन रावत, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा, केंद्रीय खेल मंत्री किरण रिजिजू और अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बीडी मिश्रा की उपस्थिति में खातिंग के स्मारक का अनावरण हुआ।

तत्कालीन नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) के सहायक राजनीतिक अधिकारी रहे खातिंग का जन्म मणिपुर के तंगखुल नगा समुदाय में हुआ था। उन्होंने बिना किसी खून-खराबे के जनवरी 17, 1951 को तवांग को भारत में मिलाने का कार्य किया था। इस काम में असम राइफल्स के 200 जवानों ने उनका साथ दिया था। तब असम के राज्यपाल रहे जयरामदास दौलतराम के आदेश पर ये हुआ था। उससे पहले तवांग स्वतंत्र तिब्बत प्रशासन का हिस्सा हुआ करता था।

तवांग का भारत में विलय कराने वाले मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग ने इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAFS) के पहले अधिकारी, नगालैंड के मुख्य सचिव और विदेश में आदिवासी समुदाय के पहले भारतीय राजदूत के रूप में अपनी सेवाएँ दीं लेकिन उन्हें तवांग उपलब्धि के लिए कभी सम्मानित नहीं किया गया। उन्हें पद्मश्री और ब्रिटिश सरकार की तरफ से मेंबर ऑफ ब्रिटिश एंपायर सम्मान मिला था। उनके बेटे जॉन भी IRS की सेवा से रिटायर हो चुके हैं।

जॉन और उनके अन्य परिजनों की उपस्थिति में कालावांगपू ऑडिटोरियम में मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग मेमोरियल की नींव रखने का कार्य संपन्न हुआ। मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग के जीवन की बात करें तो उनकी 5वीं तक की शिक्षा-दीक्षा एक स्थानीय मिशनरी स्कूल में हुई थी। उनकी बौद्धिक क्षमता के कारण असम की तत्कालीन राजधानी शिलॉन्ग के सरकारी हाई स्कूल में पढ़ने के लिए उन्हें स्कॉलरशिप मिला।

गुवाहाटी के बिशप कॉटन कॉलेज से स्नातक की डिग्री पाने वाले वो मणिपुर के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जो जनजातीय समुदाय से आते थे। इसके बाद वो असम के दर्राम स्थित बारासिंघा में एक स्कूल खोल कर पढ़ाने लगे। तब एक ब्रिटिश अधिकारी ने उन्हें उखरुल हाई स्कूल में प्रधानाध्यापक बना दिया। 1939 में दूसरे विश्व युद्ध के समय उन्होंने सेना में शामिल होने का फैसला लिया। 5 फ़ीट 3 इंच के बॉब ‘किंग्स कमीशन’ पाने वाले पहले मणिपुरी थे।

सेना में भर्ती के दौरान उनकी क्षमताओं के कारण उनकी हाइट आड़े नहीं आई, लेकिन उन्हें इसके लिए दिक्कतों का सामना ज़रूर करना पड़ा। उन्होंने मेजर केएस थिमैय्या (आज़ादी के बाद भारतीय सेना के प्रमुख) के नेतृत्व में प्रशिक्षण लिया और फिर 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट (बाद में 7वाँ कुमाऊँ रेजिमेंट) में शामिल हुए। जोरहाट में लॉजिस्टिक्स अधिकारी के रूप में काम करते हुए उन्होंने यूएस आर्मी एयर फोर्सेज (USAAF) की जापान की सेना के खिलाफ सहायता की।

बर्मा रोड में मणिपुरी जनजातीय समूहों के लोगों ने इस युद्ध में ब्रिटिश सेना के लिए गाइड का काम किया था। मणिपुर के महाराजा ने बर्मा के आक्रमण को ध्यान में रखते हुए भारत के साथ विलय का फैसला लिया और 1949 में ये एक भारतीय राज्य बना। 1950 में उन्होंने असम के तत्कालीन राज्यपाल अकबर हैदरी के निवेदन पर असम राइफल्स में सेवाएँ दी। तब असम-तिब्बत भूकंप के कारण इलाके में काफी बुरी स्थिति थी।

उन्होंने राहत कार्यों में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बाद वो अरुणाचल प्रदेश में असिस्टेंट पॉलिटिकल अधिकारी बने और उनकी कूटनीति के सब कायल हो गए। जनवरी 17, 1951 को उन्होंने तवांग की तरफ मार्च किया। उन्होंने वहाँ के गाँवों के बुजुर्गों से बात की, तिब्बत के अधिकारियों से मिले और तिब्बती प्रशासन द्वारा मोनपा जनजातीय समुदाय पर लगाए कड़े टैक्सों की समीक्षा की। उनके तवांग दौरे के दौरान ही पीएम नेहरू ने अपने विदेश सचिव को एक पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में लिखा था,

“मैं लगातार रक्षा समिति द्वारा उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर हो रही गतिविधियों के बारे में सुन रहा हूँ। इससे तिब्बत और नेपाल की सीमा पर हलचल है। इन मामलों को कभी मेरी राय के लिए मेरे सामने नहीं लाया गया। असम के राज्यपाल और अन्य लोग निर्णय ले रहे हैं। हमारे तवांग में जाकर वहाँ का नियंत्रण लेने से अंतरराष्ट्रीय समस्याएँ आ सकती हैं, मैं पहले भी कह चुका हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि बिना मेरी जानकारी के ये सब कैसे हो रहा है।”

लेकिन ये सब उस दूरदर्शी नेता कहने पर हो रहा था, जिनका असामयिक निधन हो गया लेकिन उनकी नीतियाँ अब भी देश का भला कर रही थीं। सरदार पटेल ने अपने जीवनकाल में ही जयरामदास दौलतराम और मेजर बॉब को कह दिया था कि नेहरू से राय-मशविरा किए बिना ही ये ऑपरेशन चलाया जाए, क्योंकि वो दूसरी कश्मीर समस्या नहीं चाहते थे। उन्होंने 800 किलोमीटर की म्यांमार सीमा की समस्याएँ भी सुलझाईं।