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कृषि सुधारों का UPA से NDA तक का सफर: जहाँ बीजेपी लगातार कर रही पहल वहीं कॉन्ग्रेस ने पूरे 10 साल बयानबाजी में बिताए

भारत में कृषि सुधारों पर केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदम राजनैतिक गतिरोध एवं विवाद का मुद्दा बन गए है। संसद द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध जताने के लिए कॉन्ग्रेस शासित पंजाब राज्य के किसान दिल्ली में डेरा जमाए हुए हैं। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस सहित वामपंथी एवं अन्य विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार पर इन कानूनों को वापस लेने का दवाब बना रहे हैं।

केंद्र में चाहे किसी की भी सरकार हो– जब कोई विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो पहले उसे एक लम्बी संवैधानिक प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है। कृषि में सुधार के लिए लागू कानून कोई एक ही रात के ‘तुगलकी फरमान’ नहीं थे। बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत संसद द्वारा पारित किए गए थे। दरअसल, किसानों की आय में बढ़ोत्तरी, बिचौलियों से राहत, और अनावश्यक लालफीताशाही से उन्हें निकालने की माँग वर्षों पुरानी है। बस जरुरत एक ठोस निर्णय पर पहुँचने की थी, जिसे वर्तमान केंद्र सरकार ने साकार कर दिया।

भारतीय कृषि में बड़े पैमानें पर सुधारों की चर्चा को गति जुलाई 2004 में यूपीए (I) सरकार के दौरान मिलनी शुरू हुई। हालाँकि, मनमोहन सिंह सरकार को राष्ट्रहित के मामलों पर टालमटोल करने और उन्हें लंबित करने में महारत हासिल थी। धीरे-धीरे सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया और हर मुद्दे पर अलोकप्रिय होने का डर हावी होने लगा था। अतः इस सरकार ने कृषि सुधारों सहित रक्षा सौदे, आतंकवाद पर रोकथाम, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और विदेश नीति सम्बन्धी अनेक मामलों को लटकाए रखा। यूपीए (I) सरकार के गठन के एक महीने के अन्दर यानि 19 जुलाई, 2004 को लोकसभा में कृषि सुधारों पर एक सवाल कृषि मंत्री से पूछा गया था। इसपर तत्कालीन कृषि राज्य मंत्री कांतिलाल भूरिया ने मंडी शुल्क खत्म करने, निजी क्षेत्र द्वारा उच्च तकनीक प्रदान करना, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए यूनिफाइड फूड लॉ, विदेशी खरीददारों को चिन्हित करना, और निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने वाला पॉंच स्तर वाला कृषि सुधारों का एक खाका पेश कर दिया।

एक साल बीत गया लेकिन जमीन पर कोई हालत में बदलाव नहीं आया। अतः कांतिलाल भूरिया ने लोकसभा के समक्ष 22 अगस्त, 2005 को एक प्रश्न का जवाब देते हुए कहा, “मौजूदा कृषि उपज विपणन समिति कानून किसान को सीधे उत्पादक से संपर्क करने में बाधा उत्पन्न करता है। उसे अपना माल लाइसेंसधारी व्यापारियों एवं मंडियों के माध्यम से ही बेचना पड़ता है। ऐसा ही फलों एवं सब्जियों के मामले में भी होता है। इस दौरान किसान से लेकर फुटकर विक्रेता के बीच इतने बिचौलिए होते है कि किसान को अंतिम उपभोक्ता मूल्य तक 30 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ता है।” इन दो उदाहरणों से स्पष्ट है कि यूपीए (I) सरकार को किसानों की समस्याएँ और उनके उनके माल की उचित कीमत नहीं मिलने का अंदाजा था। इस संदर्भ में वे लोकसभा में लगातार बयान भी दे रहे थे। सरकार समस्या और उसका समाधान दोनों बता रही थी, लेकिन उसे किसानों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता एवं दृष्टिकोण उसके पास नहीं था।


साल 2005-06 में कृषि पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने भी कृषि सुधार के दर्जनों सुझाव पेश किए। जैसे सरकार के पास फसल का उचित भंडारण एवं गोदाम नहीं थे इसलिए किसानों को अपनी फसल सस्ते दामों में बाहर बेचनी पड़ रही थी। अतः भंडारण की आधुनिक और वृहद व्यवस्था के लिए निजी निवेश को लाने की बात कही गई। साथ ही कमेटी ने स्वीकार किया कि कई बार किसानों को फसल का दाम एमएसपी (MSP) से अच्छा निजी खरीददारों से मिल जाता है। उसी साल गेहूँ का एमएसपी 650 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया और उसपर 50 रुपए का अतिरिक्त बोनस भी दिया गया था। हालाँकि, किसानों ने अपनी फसल निजी व्यापारियों को बेचीं क्योंकि वहाँ उन्हें 800 रुपए प्रति क्विंटल का दाम मिल रहा था।

इसी दौरान, सरकार ने निश्चय कर लिया कि भंडारण के अतिरिक्त अगर किसान को उसकी फसल का दाम निजी व्यापारियों से अच्छा मिलता है तो वह वहाँ बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने 24 अप्रैल, 2012 को लोकसभा में यह सूचना दे दी थी। किसानों मिलने वाली नयी राहतों और सुधारों की जमीन पर हकीकत बिलकुल नगण्य थी। दरअसल, केंद्र सरकार एकतरह से खानापूर्ति के लिए बयानबाजी कर रही थी। खेतों में फसल के उत्पादन से लेकर उसे मंडियों में उचित दामों में बेचना इतना भी आसान नहीं था। केंद्र-राज्य सरकारों के कानून, अध्यादेश अथवा मंडी समितियों के स्थानीय व्यवस्थाओं में ही किसान फंस कर रह जाता था। सिर्फ लोकसभा अथवा राज्यसभा में कहने भर से काम नहीं चल सकता था। इसलिए व्यवस्थित तौर पर कानूनों की आवश्यकता थी।


इस क्रम में साल 2017 में फिर से प्रयास शुरू हुए। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ‘मॉडल एपीएमसी एंड कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट’ लेकर आई जिसके अंतर्गत किसानों की उपज का मुक्त व्यापार, विपणन चैनलों के माध्यम से प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, और पूर्व-सहमत अनुबंध के तहत खेती को बढ़ावा देना शामिल था। साल 2018-19 में 31 लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों वाली कृषि पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने बताया कि ‘मॉडल एपीएमसी एंड कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट’ को लेकर राज्यों में अधिक रूचि देखने को नहीं मिल रही है।


कमेटी के सुझाव पर जुलाई 2019 में सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक उच्चस्तरीय सीमिति बनाई गई। इसके संयोजक देवेन्द्र फडणवीस (महाराष्ट्र) और सदस्यों में एच.डी. कुमारस्वामी (कर्नाटक), मनोहरलाल खट्टर (हरियाणा), पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश), विजय रूपानी (गुजरात), योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश), कमल नाथ (मध्य प्रदेश), और नरेन्द्र सिंह तोमर (केंद्रीय कृषि मंत्री) और नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद को सदस्य-सचिव बनाया गया। इस प्रक्रिया के तहत, सबके सुझावों को समाहित करते हुए  5 जून, 2020 को कृषि सुधार से सम्बंधित तीन अध्यादेश जारी कर दिए गए। जिन्हें संसद द्वारा इसी साल सितम्बर में पारित कर दिया गया। आखिरकार भारत के राष्ट्रपति ने भी उनपर अपनी मुहर लगा दी।

अब विडम्बना देखिए, लगभग 15 सालों के बाद कृषि सुधार के लिए कोई कानून बनाये गए, तो आम जन-जीवन को प्रभावित करने के लिए सड़कों को बाधित किया जाने लगा। विपक्षी दलों द्वारा अराजक तरीके से कानूनों की प्रतियाँ विधानसभाओं में फाड़ दी गई। सामाजिक वैमनस्य फैलाने के लिए उत्तेजक एवं भड़काऊ भाषण दिए गए। सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रमित और झूठी खबरों को फैलाया गया। कॉन्ग्रेस शासित राज्य सरकारों ने विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर कानूनों के बहिष्कार का निर्णय लिया।


जब कृषि सम्बन्धी तीन विधेयक संसद के समक्ष रखे गए तो सभापति के समक्ष नारेबाजी की गई, माइक तोड़े गए, और सदन का बहिष्कार भी किया गया। संसदीय समितियों की बैठकों में अनुपस्थित रहना एक सामान्य सी बात हो गयी है। जिसपर शायद ही किसी का ध्यान जाता होगा। इस तरह देश एक हित में नीतिगत फैसलों का विरोध एक सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए किया गया।
जब कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (I) और (II) के पास सत्ता थी तो उसके पास किसानों को मजबूत और स्थाई तौर पर राहत देने के लिए पूरे 10 साल का समय था। जोकि उन्होंने एक के बाद एक बयानबाजी कर गँवा दिया। ऐसा नही था कि कॉन्ग्रेस के एजेंडे में किसान हित शामिल नही थे।

बस कृषि सुधार उनके प्राथमिक कार्यों में शामिल नही थे। अब वर्तमान केंद्र सरकार को मौका मिला तो उन्होंने किसान के हितों की रक्षा के लिए ठोस पहल कर दी। अब थोड़ा सब्र रखने की आवश्यकता है। इन कानूनों का धरातल पर उतरने के बाद ही उनका विश्लेषण किया जा सकता है। उससे पहले, केंद्र और राज्यों के संबंधों को कमजोर करना अथवा संसद द्वारा पारित कानूनों को फाड़ना कोई लोकतांत्रिक अधिकार नही बल्कि अराजकता है।

झगड़ा PM मोदी और BJP से… लेकिन भुगत रहे बंगाल के 72 लाख किसान: ममता कर रहीं ओछी राजनीति

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (दिसंबर 25, 2020) पीएम किसान सम्मान निधि (PM Kisan Samman Nidhi) के तहत देश भर के किसानों को वित्तीय लाभ की किस्त जारी कर दी। एक बटन दबाकर आज पीएम ने 9 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में 18 हजार करोड़ रुपए की मदद ट्रांसफर की। 

ऐसे में भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि बंगाल में 72 लाख से ज्यादा किसान हैं, जिन्हें इस स्कीम का फायदा मिलना था, लेकिन ममता सरकार के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका। पीएम मोदी ने भी अपनी बात रखते हुए बंगाल सीएम की नीयत का पर्दाफाश किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से बातचीत के दौरान ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा, “अगर बंगाल आपकी धरती है तो आपने बंगाल में किसानों को केंद्र सरकार की योजना से होने वाले लाभ से क्यों वंचित रखा? अब आप उठ कर पंजाब पहुँच गए? आपको क्या लगता है लोग इसे भूल जाएँगे।”

उन्होंने कहा कि बंगाल के किसानों को केंद्र की योजनाओं के लाभ से वंचित रखा गया। बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है, जो योजनाओं का लाभ किसानों तक नहीं पहुँचने दे रहा। ममता बनर्जी की विचारधारा ने बंगाल को बर्बाद कर दिया है। अपनी बात रखते हुए पीएम ने उस विचारधारा को भी कोसा, जिसके कारण आज बंगाल का विकास रुका हुआ है।

बता दें कि बंगाल में किसान सम्मान निधि न लागू करने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजय वर्गीय ने भी ममता बनर्जी को आड़े हाथों लिया। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल की सीएम द्वारा सूची न देने के कारण बंगाल के 72 लाख किसान आज पीएम किसान सम्मान निधि मिलने से वंचित हुए हैं। उन्होंने पूछा, “ममता बनर्जी, आपका झगड़ा पीएम मोदी और भाजपा से है, पर उसका बदला बंगाल के किसानों से क्यों? आखिर पश्चिम बंगाल के किसानों ने आपका क्या बिगाड़ा है”

अपने अगले ट्वीट में उन्होंने ममता बनर्जी को ओछी राजनीति के लिए दुत्कारते हुए कहा, “पश्चिम बंगाल के 72 लाख किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि से ममता बनर्जी की ओछी राजनीति ने वंचित रखा हैं, 23 लाख किसानों ने केंद्र सरकार के PMKISAN पोर्टल पर पंजीकृत करवा कर दिखा दिया कि उन्हें इस मदद की कितनी ज़रूरत हैं। बंगाल के किसानो को 9800 करोड़ से वंचित रख रखा हैं। शर्म करो ममता बनर्जी”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में किसानों को मदद न पहुँचा पाने के लिए सीएम ममता को जिम्मेदार बताया था। उन्होंने कहा था कि देश कहा था कि देश 10 करोड़ किसानों को डेढ़ सालों में 95 हजार करोड़ की सहायता दी गई है। लेकिन बंगाल के किसानों को इसका लाभ नहीं मिला, क्योंकि उनकी सूची ही ममता सरकार द्वारा केंद्र को नहीं दी गई। उन्होंने पूछा था कि आखिर ममता बनर्जी क्यों नहीं चाहती कि बंगाल के किसानों को 6 हजार रुपए नहीं मिलना चाहिए।

पंजाब में किसान कुल्हाड़ी से काट रहे हैं Jio टॉवर का बिजली कनेक्शन, देखें वीडियो

नए कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने हाल ही में रिलायंस के पेट्रोल पंप और जियो (Jio) सिम का बहिष्कार करने का ऐलान किया था। इसके अलावा, पिछले दिनों किसानों ने रिलायंस मॉल के बाहर भी नारेबाजी और प्रदर्शन किए। पंजाब में किसानों ने अपने आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए अब Jio मोबाइल टावरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।

पंजाब के किसान रिलायंस जियो की दूरसंचार आपूर्ति सेवाओं को बाधित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, जिनमें लोगों को कियो टॉवर की बिजली सप्लाई को बंद करते देखा जा सकता है।

‘एशियानेट’ न्यूज़ के अनुसार, “रिलायंस के पेट्रोल पम्प और रिटेल स्टोर के बाहर विरोध प्रदर्शन के बाद, पंजाब में किसानों ने अब राज्य के कई हिस्सों में दूरसंचार कंपनी की सेवाओं को बाधित करने के लिए रिलायंस Jio मोबाइल टावरों की बिजली आपूर्ति बंद कर दी है।”

वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ लोग टेलीकॉम टॉवर्स को जाने वाली बिजली की तारें कुल्हाड़ी से काट रहे हैं।

समाचार पत्र ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न किसान संगठनों के किसानों ने पिछले तीन दिनों में पंजाब के नवांशहर, फिरोजपुर, मानसा, बरनाला, फाजिल्का, पटियाला और मोगा जिलों में कई Jio टॉवर्स की बिजली आपूर्ति बंद कर दी है। बरनाला और बठिंडा के अधिकांश गाँवों में किसानों ने बिजली आपूर्ति बंद करने के बाद टॉवर्स को बंद कर दिया।

फ़िरोज़पुर में, बीकेयू (उग्राहन) और बीकेयू (दकौंडा) के बैनर तले किसानों द्वारा सेलुलर ट्रांसमिशन टावरों को बिजली की आपूर्ति काट दी गई है। बीकेयू (दकौंडा) के नेता दर्शन सिंह करमा ने कहा, “हमने फिरोजपुर में पाँच Jio मोबाइल टावरों को बिजली आपूर्ति बंद कर दी। हमने अपना विरोध जताने के लिए ऐसा किया। हमारी लड़ाई कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ है।”

BKU (उग्राहन) के गोरा सिंह भैणीबाग ने कहा कि उन्होंने बुधवार (दिसंबर 23, 2020) को मानसा में चार मोबाइल टावरों का बिजली कनेक्शन काट दिया और बृहस्पतिवार को Jio कार्यालयों के बाहर धरना दिया।

वहीं, नवांशहर में, कीर्ति किसान यूनियन (KKU) के बैनर तले किसानों ने 11 Jio मोबाइल टावरों को बिजली आपूर्ति ठप कर डाली। KKU नेता मास्टर भूपिंदर सिंह वारियाच ने कहा, “ये काले कानून कॉरपोरेट्स को फायदा पहुँचाने के लिए बनाए गए हैं, इसलिए हम अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं क्योंकि सरकार हमारी बात सुनने के लिए तैयार नहीं है।”

गुलशन बानो अपनी रिश्तेदार नाबालिग बच्ची को देह व्यापार में धकेलना चाहती थी, UP पुलिस ने किया गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के बलिया से एक घटना सामने आई है। इसमें एक नाबालिग लड़की को गुलशन बानो नाम की उसकी ही रिश्तेदार देह व्यापार में धकेलने का प्रयास कर रही थी। हालाँकि ऐसा होने के पहले ही सिटी मजिस्ट्रेट, बलिया पुलिस और बाल कल्याण समिति (CWC) के अधिकारियों ने उसे सुरक्षित बरामद कर लिया। नाबालिग पीड़िता का परिवार मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। 

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ बुधवार (23 दिसंबर 2020) को पीड़िता के परिजनों ने CWC अधिकारियों को इस घटना की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गुलशन बानो नाम की उनकी रिश्तेदार उनकी बेटी को अपने साथ उत्तर प्रदेश के बलिया लेकर गई है और उस पर देह व्यापार में शामिल होने का दबाव बना रही है।

इस घटना की जानकारी देने वालों ने बलिया की उस जगह के बारे में भी बताया, जहाँ गुलशन बानो ने नाबालिग पीड़िता को कैद करके रखा था। CWC के अधिकारियों ने तत्काल प्रभाव से पुलिस को इस घटना के बारे में सूचित किया। 

सूचना मिलते ही पुलिस ने नाबालिग पीड़िता को सुरक्षित वापस लेकर आने के लिए एक संयुक्त टीम का गठन किया। बलिया पुलिस और CWC के अधिकारियों की संयुक्त टीम ने कोतवाली पुलिस थाने के अंतर्गत आरोपित गुलशन बानो के ठिकाने पर छापा मार कर नाबालिग पीड़िता को उसके चंगुल से छुड़ाया।

फ़िलहाल पुलिस ने गुलशन बानो पर भारतीय दंड संहिता की धारा 366 ए (नाबालिग लड़की को कैद में रखना) और 323 (जानबूझ कर चोट पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया है।

प्राइवेट कम्पनी ने सिर्फ उपज खरीदी या जमीन भी ले गया? PM मोदी को किसान से मिला जवाब ‘किसान’ आंदोलन पर तमाचा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (दिसंबर 25, 2020) को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ (PM Kisan Samman Nidhi) योजना के तहत किसानों को वित्तीय लाभ की नवीनतम किस्त जारी की। यह राशि 18,000 करोड़ रुपए से अधिक है और इसे प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से 90 मिलियन से अधिक लाभार्थियों तक पहुँचाया जाएगा।

पीएम मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक बटन दबाकर 09 करोड़ से अधिक किसान लाभार्थियों के खातों में 18 हजार करोड़ रुपए ट्रांसफर किए। फिलहाल वह 06 राज्यों के किसानों के साथ संवाद कर रहे हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर पीएम मोदी ने प्रत्येक किसान को 2,000 रुपए की किस्त जारी की। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के जन्मदिवस को हर साल ‘सुशासन दिवस’​ ​के रूप में भीमनाया जाता है।

पीएम-किसान योजना के तहत, छोटे और सीमांत किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपए का वित्तीय लाभ प्रदान किया जाता है, जो 2,000 रुपए की तीन समान किश्तों में दिया जाता है। यह रुपया सीधा लाभार्थियों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाता है।

‘प्राइवेट कम्पनी वाले उपज के साथ जमीन भी ले गए?’

इसी क्रम में अरुणाचल प्रदेश के किसान गगन पेरिंग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत की शुरुआत की। गगन पेरिंग ने पीएम मोदी से कहा कि उन्हें किसान निधि के तहत 6000 रुपए मिले जिसका इस्तेमाल उन्होंने ऑर्गेनिक खाद और दवा खरीदने में किया।

उन्होंने बताया कि उनके साथ 446 किसान जैविक अदरक उगाते हैं। संवाद के दौरान पीएम मोदी ने पेरिंग से पूछा कि ‘आप छोटे किसानों को प्राइवेट कंपनी के साथ जोड़ते हैं, क्या उन्होंने सिर्फ प्रोडक्ट खरीदे या अपकी जमीन भी ले ली?’

पीएम मोदी के इस सवाल पर गगन पेरिंग ने कहा कि हाल ही में एक कंपनी से उनका एग्रीमेंट हुआ, जितनी उपज है, उसे ही ले जाने की बात हुई, जमीन की नहीं। उन्होंने पीएम मोदी को बताया कि उनकी जमीन सुरक्षित है।

इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोग ऐसा भ्रम फैला रहे हैं कि किसानों की फसल का कोई कांट्रैक्ट करेगा तो जमीन भी चली जाएगी।

जब अटल बिहारी वाजपेयी की कविता के लिए शाहरुख से लेकर अमिताभ और जगजीत सिंह एक मंच पर आए

देश आज 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती मना रहा है। भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता को उनके उल्लेखनीय लेखन और काव्य कौशल के लिए भी जाना जाता है। लेकिन कम ही लोग उनकी एक ऐसी रचना के बारे में जानते हैं जिसे ग़जल गायक जगजीत सिंह ने अपनी आवाज दी थी और बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ खान ने इस गीत में अभिनय किया था। इस गीत की शुरुआत में बॉलीवुड कलाकार अमिताभ बच्चन ने भी अपनी आवाज दी थी।

यह वीडियो वर्ष 2002 में जारी किया गया था और इस एल्बम का नाम था ‘संवेदना’। अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संवेदना नाम से ही एक पुस्तक भी लिखी गई थी, जो कि वर्ष 1999 में प्रकाशित हुई थी। यह म्यूज़िक वीडियो मशहूर फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित किया गया था।

‘संवेदना’ एल्बम का कवर

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी की इस कविता का शीर्षक है – “क्या खोया, क्या पाया जग में”

“अपने ही मन से कुछ बोलें
क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें।
पृथिवी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें।
जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहाँ, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें।
अपने ही मन से कुछ बोलें!”

यूट्यूब पर इस कविता का वीडियो मौजूद है –

https://youtu.be/1sTeazC0x98

एल्बम के कवर के अनुसार, वीडियो की शुरुआत में अमिताभ बच्चन द्वारा जो विवरण दिया गया है, वह जावेद अख्तर ने लिखा था।

दिसंबर 25, 1924 को ग्वालियर में जन्मे वाजपेयी को अपनी मूल भाषा, हिंदी के लिए अपार स्नेह था, और वह भारत के विदेश मंत्री के रूप में वर्ष 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में हिंदी भाषा में भाषण देने वाले पहले व्यक्ति भी बने।

कविता और साहित्य में योगदान के कारण ही देहांत के बाद इतना समय बीत जाने के बावजूद, पूर्व प्रधानमंत्री की कविताएँ हमेशा की तरह आज भी लोकप्रिय हैं। इनमें से कुछ ने वास्तव में एक प्रतिष्ठित दर्जा हासिल किया है। अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं की ख़ास बात यह है कि वह युवाओं सहित हर उम्र वर्ग द्वारा गाई और सराही जाती हैं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताएँ गीत नया गाता हूँ, कदम मिलकर चलना होगा, दूध में दरार पड़ गई आदि हैं।

मुस्लिम लड़की ने हिन्दू प्रेमी के साथ मंदिर में लिए 7 फेरे, बरेली पुलिस से लगाई सुरक्षा की गुहार

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक मुस्लिम युवती ने हिन्दू युवक से मंदिर के भीतर शादी कर ली। एबीपी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ मुस्लिम युवती ने अपनी मर्ज़ी से हिन्दू रीति-रिवाज़ों से सात फेरे लिए। युवती ने शादी का एक वीडियो भी साझा किया है, जिसमें उसने पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाई है।  

जारी किए गए वीडियो में युवती कहती है, “मैंने अपनी मर्ज़ी से पंकज शर्मा को अपना जीवन साथी बना लिया है।” इसके बाद युवती निवेदन करते हुए कहती है कि उसने अपनी मर्ज़ी से हिन्दू युवक के साथ शादी की है, इसलिए उसके परिजन किसी को परेशान नहीं करें। 

युवती ने यह भी कहा कि शादी के बाद उसके पति, पति के दोस्तों, परिजनों को परेशान नहीं किया जाए। अंत में युवती ने खुद को और अपने पति को अपने परिजनों से ख़तरा बताते हुए बरेली एसएसपी से सुरक्षा की गुहार लगाई है। वीडियो के चर्चा में आने के बाद से पुलिस इस मामले की जाँच में जुट गई है। इसके अलावा पुलिस वीडियो की पड़ताल भी कर रही है।  

हाल ही में इस तरह की एक और घटना बरेली में ही सामने आई थी, जहाँ अलीशा नाम की मुस्लिम युवती ने अमन नाम के हिन्दू युवक से शादी कर ली थी। युवती के पिता ने बरेली के प्रेमनगर थाने में हिन्दू युवक पर अपहरण का मामला दर्ज कराया था।

पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने के कुछ ही समय बाद युवती को बरामद कर लिया था। इसके बाद पुलिस ने युवती का मेडिकल कराया। अदालत में बयान भी दर्ज कराया। इस दौरान पुलिस ने बताया कि युवक और युवती दोनों बालिग़ हैं और युवती ने युवक के पक्ष में बयान दिया था। फिर पुलिस ने युवती को युवक के घर भेज दिया था और घटना में धर्म-परिवर्तन का कोई पहलू भी सामने नहीं आया था। 

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के ही औरैया जिले में एक मामला सामने आया था, जिसमें दो अलग धर्म के प्रेमी-प्रेमिका ने आपसी सहमति से शादी की थी। दिल्ली की रहने वाली रेशमा और औरैया के निवासी अमन ने बिधूना कस्बे स्थित भगवान शिव के मंदिर में हिन्दू रीति रिवाज़ों से शादी की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दोनों के बीच पिछले काफी समय से बातचीत हो रही थी। इस शादी में युवक और युवती के परिजन भी शामिल हुए थे और दोनों ने नवदंपत्ति को आशीर्वाद भी दिया था। परिजनों का कहना था कि जिस बात में उनके बच्चे खुश हैं, उस बात में ही उनकी ख़ुशी है। 

हिन्दू धर्म त्यागने वालों को पुनः हिन्दू बनाना: वो पंडित मदन मोहन मालवीय, जो अपने परिचय को लेकर थे स्पष्ट

इतिहास के पन्ने पलटने पर ऐसे नाम कम ही नज़र आते हैं, जिन्होंने अनेक किरदार निभाए और लगभग हर सामाजिक कसौटी पर खरे उतरे। एक शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी भी थे पंडित मदन मोहन मालवीय।

‘सत्यमेव जयते’ को आम जन मानस का ध्येय बनाने से लेकर ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ की स्थापना तक पंडित मदन मोहन ने कई प्रतिमान स्थापित किए। उन्होंने एक ऐसे राष्ट्रवादी व्यक्ति की भूमिका निभाई, जिन्होंने सनातन धर्म और हिन्दी भाषा की उन्नति के लिए अनवरत संघर्ष किया। 

ऐसे अनेक उत्कृष्ट कार्यों के परिणामस्वरूप 24 दिसंबर 2014 को उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था। पंडित मदन मोहन मालवीय को उनके कार्यों की वजह से ही ‘महामना’ की उपाधि दी गई थी।

25 दिसंबर 1861 को प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में जन्मे पंडित मदन मोहन मूल रूप से मालवा के निवासी थे, इसलिए उन्हें ‘मालवीय’ कहा जाता था। उनकी प्राथमिक शिक्षा प्रयागराज के श्री धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई थी, इस पाठशाला में सनातन धर्म की शिक्षा प्रदान की जाती थी। 

पंडित मदन मोहन अपने परिचय को लेकर स्पष्ट थे। अस्पृश्यता निवारण और शुद्धि (हिन्दू धर्म त्यागने वालों को पुनः हिन्दू बनाना) के वो घोर समर्थक थे। वह 3 बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गए थे।

महामना का ऐसा मानना था कि शिक्षा का एक ऐसा केंद्र होना चाहिए, जहाँ धर्म और शिक्षा एक विषय के दो पहलुओं की तरह नज़र आने चाहिए। इसलिए उन्होंने 1915 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसके लिए पंडित मदन मोहन ने पूरे देश का दौरा किया और अनेक राजाओं से आर्थिक सहयोग एकत्रित किया। 

सनातन पद्धति का प्रचारक होने के साथ-साथ पंडित मदन मोहन प्राचीन भारतीय संस्कृति के घोर समर्थक भी थे। इस तर्क का विवरण उनसे संबंधित एक घटना में विशेष रूप से मिलता है। अंग्रेज़ों के शासनकाल में अंग्रेज़ी भारतीय समाज से परिचित हुई थी। अंग्रेज़ी और उसके साथ-साथ उर्दू का दायरा बढ़ना शुरू हुआ था। उस बढ़ते दायरे से हिन्दी भाषा को क्षति न हो, इसलिए उन्होंने जनमत संग्रह कराया।

पंडित मदन मोहन आर्य समाज से भी अनेक सन्दर्भों पर असहमति रखते थे। वह आर्य समाज द्वारा की गई भाषा की सेवा संबंधी कार्यों का सम्मान करते थे लेकिन समस्त कर्मकाण्ड, परम्पराओं और रीति-रिवाज़ों को सनातन पद्धति का मौलिक हिस्सा मानते थे। 

यह पंडित मदन मोहन मालवीय के अटूट प्रयासों का परिणाम था कि हिन्दी भाषा को उत्तर प्रदेश के न्यायालयों और दफ्तरों की व्यावहारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया। भाषा को लेकर उनका मत शुरू से स्पष्ट था। इस संदर्भ में उनका एक भाषण बेहद प्रचलित है। वह कहते हैं:

“भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली समसामयिक कठिनाइयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरूह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।”

पंडित मदन मोहन ही थे, जिन्होंने ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान’ के ध्येय का पुरजोर प्रचार किया। स्वतंत्रता संग्राम में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय थी। उन्होंने देश के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिल कर साइमन कमीशन का व्यापक स्तर पर विरोध किया था।

उन्होंने तुष्टिकरण को लेकर भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट रखा, वह सदा सर्वदा इसके विरोध में रहे। पंडित मदन मोहन ने देश के विभाजन का प्रतिकार किया, उन्होंने महात्मा गाँधी के समक्ष इस मुद्दे पर खरी दलीलें रखी थीं। उनका कहना था कि विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।

सनातन धर्मी छात्रों को शाकाहारी भोजन और समुचित जीवन शैली की व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने प्रयागराज में ‘हिन्दू छात्रावास’ (हिन्दू हॉस्टल) की स्थापना की थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिन्दू छात्रावास आज भी परिसर का सबसे बड़ा छात्रावास माना जाता है।        

SEBI ने NDTV के प्रोमोटर्स पर ठोका ₹27 करोड़ का जुर्माना, शेयरहोल्डर्स से छुपाई थी जानकारी

बाजार नियामक संस्था सेबी (SEBI) ने बृहस्पतिवार (दिसंबर 24, 2020) को प्रोपेगेंडा समाचार चैनल NDTV के प्रोमोटर्स, प्रणय रॉय और राधिका रॉय के साथ ही ‘आरआरपीआर होल्डिंग’ (RRPR) पर 27 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया। SEBI ने आदेश दिया है कि यह रकम 45 दिनों के अंदर जमा करानी होगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह जुर्माना कुछ कर्ज समझौतों के बारे में शेयरधारकों से जानकारी छिपाकर विभिन्न प्रतिभूति नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में लगाया गया है। आरआरपीआर होल्डिंग नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) की प्रमोटर संस्था है।

SEBI के अनुसार, रॉय दंपती और आरआरपीआर होल्डिंग पर 25 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है, जिसे ये तीनों संयुक्त रूप से जमा कराएँगे। इसके साथ ही, प्रणय और राधिका रॉय से 1-1 करोड़ रुपए का अतिरिक्त जुर्माना भी वसूलने के निर्देश दी गए हैं। SEBI के 52 पन्नों के आदेश के अनुसार, ‘कई कर्ज समझौतों में ऐसी शर्तें शामिल की गई हैं, जो NDTV शेयरधारकों के व्यक्तिगत हितों पर बुरा प्रभाव डालती हैं।’

बाजार नियामक संस्था ने कहा कि उसने अपनी जाँच 2017 में ‘क्वांटम सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड’ (Quantum Securities Pvt Ltd) की तरफ से की गई शिकायतों के आधार पर शुरू की थी। ‘क्वांटम सिक्योरिटीज’ भी समाचार चैनल NDTV का शेयरधारक है और उसने आरोप लगाया था कि विश्वप्रधान कॉमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड (VCPL) के साथ कर्ज समझौते के बारे में शेयरधारकों से आँकड़े छिपाकर नियमों का उल्लंघन किया गया है।

लोन से संबंधित जानकारी छुपाई गई

ऐसा एक कर्ज समझौता आईसीआईसीआई बैंक के साथ था, जबकि दो अन्य समझौते वीसीपीएल से किए गए थे। SEBI के अनुसार, वर्ष 2009 में वीसीपीएल के साथ 350 करोड़ रुपए का ऋण समझौता किया गया था। यह ऋण आईसीआईसीआई बैंक का कर्ज चुकाने के लिए लिया गया। इसके एक साल बाद वीसीपीएल से 53.85 करोड़ रुपए का एक अन्य समझौता किया गया।

समझौते की कुछ शर्तों के हिसाब से वीसीपीएल वारंट को इक्विटी शेयर में बदलकर आरआरपीआर होल्डिंग्स के जरिए NDTV की 30% हिस्सेदारी अधिग्रहित करने की इजाजत दी गई है। इससे NDTV की कार्य पद्धति प्रभावित हो सकती है। प्रणव रॉय और उनकी पत्नी ने इस मामले में NDTV के पार्टी नहीं होने का मुद्दा उठाया, लेकिन SEBI के सहायक अधिकारी ने उनके इस तर्क को खारिज कर दिया।

कई शर्तों का नहीं हुआ पालन

SEBI ने कहा कि ऐसी कई शर्तें थीं, जिनका पालन नहीं किया गया। इसमें ढेर सारी सूचनाएँ ऐसी थीं जो बहुत ही ज्यादा संवेदनशील थीं। इससे पहले, पिछले माह ही प्रणय रॉय और राधिका रॉय पर दो साल के लिए सिक्योरिटीज बाजार में कारोबार पर SEBI ने रोक लगा दी थी। यह कार्यवाही भेदिया कारोबार में संलिप्तता के चलते की गई। इसके साथ ही SEBI ने रॉय दंपति को 12 साल पहले की भेदिया कारोबार गतिविधियों से अवैध तरीके से कमाए गए 16.97 करोड़ रुपए लौटाने को भी कहा था।

SEBI के अनुसार, इस तरह के कृत्यों के जरिए दो प्रोमोटर्स और आरआरपीआर होल्डिंग ने पीएफयूटीपी (प्रिवेंशन ऑफ फ्रॉडुलेंट एंड अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) मानदंडों के प्रावधानों का उल्लंघन किया है।

हत्या-दंगा-ठगी करने वाला हारून मियाँ के लिए TOI ने तांत्रिक लिख फैलाया भ्रम, बेटा आरिफ भी देता था अब्बा का साथ

दिल्ली पुलिस ने ठगी करने वाले जालसाज हारून मियाँ उर्फ शाहजी बंगाली को अरेस्ट किया है। हारून लोगों को अंधविश्वास में फँसाता और उनसे पैसे हड़पता था। मेरठ के ज़ाकिर नगर के रहने वाले हारून ने गूगल व ट्रू कॉलर एप पर भी मियाँ शाहजी बंगाली के नाम से खुद को पंजीकृत कर रखा था।

अमर उजाला ने इस खबर प्रकाशित किया। खबर की शीर्षक में ही हारून लिख कर स्पष्ट किया गया कि आरोपित कौन है, उसके अपराध का तरीका क्या है।

‘हिंदू पोस्ट’ नाम के एक छोटे (TOI की तुलना में) से मीडिया पोर्टल ने भी इस खबर की रिपोर्टिंग की। शीर्षक में Muslim Occult practitioner लिख कर यहाँ भी भ्रम फैलाने की कोशिश नहीं की गई।

लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) अपने आदत से बाज नहीं आया। मुस्लिम आरोपितों के नाम छिपाने या उसकी जगह हिंदू शब्दों और प्रतीक चित्रों को खबर में जगह देकर वो पाठकों को पहले भी बरगलाता रहा है। इस बार भी उसने यही किया।

हारून के खिलाफ हत्या और दंगों के कई मामले दर्ज हैं। सिर्फ हारून ही नहीं बल्कि उसका बेटा आरिफ भी धोखाधड़ी के धंधे में शामिल था। इतने सारे आरोपों के बावजूद TOI को अपने शीर्षक के लिए तांत्रिक शब्द ही सबसे पर्याप्त सूझा, यह उनकी पत्रकारिता की पहचान है।

आपको बता दें कि हारून ने एक महिला से घर में शांति कराने के नाम पर 85,000 रुपए उसके खाते में ट्रांसफर करने के लिए कहा। पीड़ित महिला को शक तब हुआ जब आरोपित ने उससे से 55 हजार रुपए और जमा कराने को कहा। इसके बाद पुलिस से शिकायत की और हारून गिरफ्तार हुआ।