पाकिस्तान के सिंध हाई कोर्ट ने 2002 में पत्रकार डेनियल पर्ल की क्रूरतम हत्या में शामिल आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। पर्ल द वॉल स्ट्रीट जर्नल के एशिया ब्यूरो प्रमुख थे। आतंकियों ने अगवा कर उनकी हत्या उस समय की थी जब इस्लामिक चरमपंथ पर शोध कर रहे थे।
सिंध हाईकोर्ट ने ने अहमद उमर शेख, फहद नसीम, शेख आदिल और सलमान साकिब की हिरासत को अमान्य करार दिया। अहमद उमर सईद शेख, फहद नसीम, शेख आदिल और सलमान साकिब को अमान्य (null and void) घोषित कर दिया है। आदेश सुनाते हुए एक जज ने कहा, “ये लोग 18 साल से बिना किसी जुर्म के जेल में सड़ रहे हैं।” साथ ही HC ने कहा कि उनके नाम नो-फ्लाई लिस्ट में डाले जाएँ।
बता दें कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में डेनियल पर्ल की हत्या के मुख्य आरोपित आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख की रिहाई पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी को बरी करने के सिंध हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी।
सिंध सरकार के वकील फारूक नाइक ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि मजिस्ट्रेट के सामने पहचान परेड कानून के मुताबिक 21 अन्य गवाहों के अलावा टैक्सी चालक नासिर अब्बास, रिसेप्शनिस्ट अमीर अफजल द्वारा अभियुक्त की पहचान की गई थी। कथित तौर पर आतंकवादी नाम बदलकर बशीर नाम से अकबर इंटरनेशनल होटल में पत्रकार डेनियल पर्ल से मिला था।
गौरतलब है कि इस साल अप्रैल में, सिंध उच्च न्यायालय ने अहमद उमर सईद शेख की मौत की सजा को पलटते हुए 7 साल जेल की सजा सुनाई थी। आतंकवादी के वकील ने बताया कि अपहरण के आरोप में उसकी सजा को घटाकर सात साल कर दिया गया। वहीं मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे तीन अन्य लोगों को सिंध उच्च न्यायालय ने रिहा कर दिया था। उच्च न्यायालय ने आतंकवाद विरोधी अदालत के फैसले को भी दरकिनार कर दिया था।
बता दें उमर सईद शेख उन आतंकियों में से एक था जिसे भारत द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर और आतंकवादी मुश्ताक अहमद ज़रगर के साथ भारतीय एयरलाइंस IC-814 के यात्रियों के बदले में मुक्त किया गया था। इस फ्लाइट को पाकिस्तानी आतंकवादियों के एक समूह ने दिसंबर 1999 में काठमांडू से कंधार में अपहरण कर लिया था।
नोबल पुरस्कार विजेता और वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ अमर्त्य सेन का नाम ऐसे लोगों की सूची में है, जिन्होंने पश्चिम बंगाल स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय की ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी कब्जा जमा रखा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार को लिखा है कि उनकी कई संपत्ति ऐसी हैं, जिन्हें गलत तरीके से निजी पार्टियों के नाम पर दर्ज किया गया है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई ग़ैरक़ानूनी तरीके से कब्ज़ा ज़माने वालों की सूची में अमर्त्य सेन का नाम भी शामिल है।
जिन सम्पत्तियों पर ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा है, उनमें गर्ल्स हॉस्टल, अकादमिक विभाग, कार्यालय और कुलपति का बंगला शामिल है। विश्वविद्यालय ने आरोप लगाया है कि सरकार के राइट-टू-रिकॉर्ड (right to record) के तहत जिनके नाम पर संपत्ति गलत तरीके से दर्ज की गई है, विश्वविद्यालय की ज़मीन उनके नाम कर दी गई है और उन्होंने उस पर रेस्टोरेंट, स्कूल और अन्य व्यवसाय स्थापित कर लिए हैं।
बंगाल पर बढ़ रहा है केंद्र सरकार का नियंत्रण: अमर्त्य सेन
सेन ने अवैध तरीके से 13 डेसीमल (decimals) ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, जबकि उनके पास 125 डेसीमल ज़मीन पहले से ही मौजूद है जो कि उनके दिवंगत पिता को क़ानूनी रूप से पट्टे (लीज़) पर दी गई थी।
इन आरोपों का जवाब देते हुए अमर्त्य सेन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, “विश्वविद्यालय की जिस ज़मीन पर मेरा घर बना हुआ है, वह काफी लम्बे समय तक के लिए लीज़ पर है। मैंने देखा कि विश्वभारती के कुलपति बिद्युत चक्रवर्ती ने उन लोगों की सूची में मेरा नाम भी दे रखा है जिनका विश्वविद्यालय की ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा है। विश्वभारती की जिस ज़मीन पर मेरा घर है वह काफी समय के लिए लीज़ पर है। कुलपति इस बारे में सिर्फ सपना देख सकते हैं कि वह किसी का अधिकार ख़त्म कर सकते हैं।”
‘प्रख्यात अर्थशास्त्री’ ने केंद्र सरकार को निशाना बनाते हुए आरोप लगाया कि प्रदेश में केंद्र सरकार का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है। इसके बाद उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कुलपति को उन पर कार्रवाई करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से निर्देश मिला है। उन्होंने कहा, “शांति निकेतन में पले-बढ़े होने के नाते मैं शांति निकेतन और संस्कृति के बीच बढ़ते दायरे और केंद्र सरकार समर्थित कुलपति पर टिप्पणी कर सकता हूँ। आखिर प्रदेश में केंद्र सरकार का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।”
बाहरियों को जमीन बेची
विश्वविद्यालय एस्टेट कार्यालय के मुताबिक़ 1980 से 1990 के बीच अनियमित दस्तावेज़ तैयार किए गए थे। ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा विश्वविद्यालय के लिए खरीदा गया था। वह शांतिनिकेतन के पूर्वपल्ली क्षेत्र में स्थित है जो कि आश्रम और विश्व भारती से जुड़े मशहूर लोगों और परिवारों का आवासीय क्षेत्र है। विश्वविद्यालय के पास मौजूद दस्तावेज़ों से स्पष्ट होता है कि 1990 के दौरान वहाँ की ज़मीन पर किस हद तक अतिक्रमण किया गया था। यह दस्तावेज़ शिक्षा मंत्रालय और कैग (Comptroller and Auditor General of India) को भी भेजे गए हैं।
साल 2006 में सेन ने तत्कालीन कुलपति से निवेदन किया था कि 99 साल पुरानी लीज़ की ज़मीन उनके नाम कर दी जाए। जिसे एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा स्वीकृति दे दी गई थी और अतिरिक्त ज़मीन विश्वविद्यालय को कभी वापस नहीं लौटाई गई। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ विश्वविद्यालय के एस्टेट कार्यालय द्वारा जुलाई 2020 में कई विभागों को एक रिपोर्ट भेजी गई थी, जिसके अंतर्गत कुल 77 प्लॉट के आधिपत्य का निस्तारण होना था।
उस रिपोर्ट के मुताबिक़ हाई प्रोफाइल लोगों ने पूर्वपल्ली, दक्षिणपल्ली और श्रीपल्ली क्षेत्र की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था। एक एस्टेट अधिकारी का यहाँ तक कहना था कि अमर्त्य सेन को इस बात की पूरी जानकारी थी और उनके परिवार को परिसर के नज़दीक स्थित ज़मीन बेचे जाने की वजह से फ़ायदा हुआ था। दिसंबर 2016 में एक अस्थायी सूची जारी की गई थी जिनका ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा था जिसमें कहा गया था कि लोगों ने अपनी लीज़ वाली ज़मीन बाहरियों को बेच दी है।
भारत में रूस के राजदूत निकोलाय कुदशेव (Nikolay Kudashev) ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और शेखर गुप्ता की प्रोपेगेंडा मशीनरी ‘दी प्रिंट’ को भारत और रूस के संबंधों के बारे में अफवाह फैलाने पर फटकार लगाते हुए इसे वास्तविकता से एकदम हटकर बताया है।
दरअसल, करीब दो दशकों में यह पहला अवसर होगा, जब भारत और रूस के बीच होने वाली वार्षिक शिखर बैठक का आयोजन नहीं किया जाएगा। भारत और रूस दोनों ने बुधवार (दिसंबर 23, 2020) को एक बयान जारी करके कहा कि ऐसा कोरोना वायरस महामारी की वजह से हो रहा है और अन्य किसी भी प्रकार की अटकलें गलत और गुमराह करने वाली हैं।
वहीं, अक्सर केंद्र सरकार के खिलाफ फर्जी तथ्यों से हमलावर रहने की कोशिश करने वाले राहुल गाँधी ने ‘दी प्रिंट’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि रूस भारत का एक महत्वपूर्ण मित्र है और पारंपरिक संबंधों को नुकसान पहुँचाना अदूरदर्शी और देश के भविष्य के लिए खतरनाक है।
Russia is a very important friend of India.
Damaging our traditional relationships is short-sighted and dangerous for our future. pic.twitter.com/U5VyFWeS6L
वास्तव में, राहुल गाँधी ने ट्वीट करते हुए दोनों देशों के बीच सम्मेलन को रद्द करने पर केंद्र की आलोचना करने की बेकार कोशिश की थी। शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ ने अपनी खबर में इसका कारण कोरोना महामारी नहीं, बल्कि ‘पुतिन सरकार द्वारा अमेरिकी अगुवाई वाले चार देशों के गठबंधन क्वॉड (Quad) में भारत के शामिल होने पर ऐतराज’ जताने को बताया था और राहुल गाँधी ने भी इसी खबर को केंद्र सरकार की आलोचना का आधार भी बनाया।
ज्ञात हो कि ‘क्वाड’ यानी, क्वाड्रीलैटरल सिक्टोरिटी डायलॉग। इसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका शामिल हैं। क्वाड का उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शांति की स्थापना और शक्ति का संतुलन है।
शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ की फर्जी खबर
रूसी राजदूत निकोलाय कुदशेव ने राहुल गाँधी के इस ट्वीट और दी प्रिंट की रिपोर्ट का खंडन करते हुए ट्वीट में लिखा, “एक न्यूज पोर्टल में वार्षिक रूसी-भारतीय शिखर सम्मेलन में हुई देरी को लेकर किया गया दावा ‘वास्तविकता से दूर’ है।
कुदशेव ने लिखा, “रूस और भारत के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी कोविड-19 के बावजूद अच्छी प्रगति कर रही है। हम महामारी के कारण स्थगित किए गए शिखर सम्मेलन के लिए नई तारीखें तय करने के लिए अपने भारतीय दोस्तों के साथ संपर्क में बने हुए हैं। हमें विश्वास है कि यह जल्दी आयोजित किया जाएगा, जबकि रूसी भारतीय संबंध अपने आगे के विकास को जारी रखेंगे।”
इससे पहले केंद्र सरकार ने भी भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन रद्द होने पर स्पष्ट करते हुए कहा था कि ये कोविड-19 महामारी के संकट के कारण रद्द किया गया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव का यह बयान भी कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के उस ट्वीट के बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पारंपरिक रिश्तों में कमज़ोरी भारत के भविष्य के लिए खतरा है।
श्रीवास्तव ने बुधवार को कहा, “भारत और रूस के बीच सालाना शिखर सम्मेलन कोविड-19 महामारी के कारण आयोजित नहीं किया गया है। इसमें दोनों देशों की सरकारों की सहमति है। इसके लिए कोई अन्य वजह बताने की खबरें पूरी तरह से भ्रामक और झूठ हैं।”
Please see our response to a media report regarding the India-Russia Annual Summit. pic.twitter.com/BShPqq8NTR
भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी राहुल गाँधी को फर्जी खबर फ़ैलाने को लेकर फटकार लगाते हुए राजदूत का बयान शेयर करते हुए लिखा, “ये पढ़ लीजिए राहुल गाँधी। वैसे आप टोटल शर्मप्रूफ़ हैं, पर फिर भी अगर शर्म आ जाए तो माफी माँग लेना। आप केवल कॉन्ग्रेस का नुकसान कर सकते हैं, देश का नुकसान नहीं कर पाएँगे।”
दिल्ली के सरिता विहार इलाके से सामने आए ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) का आरोपित साहिब अली गिरफ्तार कर लिया गया है। समाचार एजेंसी एएनआई ने यह जानकारी दी है। उसके खिलाफ पीड़ित हिंदू महिला ने 21 दिसंबर 2020 को शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता का आरोप था कि शादी के बाद उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया गया। उसकी इच्छा के विरुद्ध साहिब अली ने शारीरिक संबंध बनाए। बुर्के में रहने और नमाज पढ़ने का दबाव डालने लगा।
महिला ने साहिब अली पर पीटने का भी आरोप लगाया था। अपने ससुर यानी साहिब अली के अब्बा हाजीसुन्नला (Hazisunnala) पर भी अनुचित तरीके से छुने और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। साथ ही बताया था कि साहिब ने राहुल बनकर उसे प्रेमजाल में फँसाया। पहले शारीरिक संबंध स्थापित किए और फिर शादी की।
Delhi: Man arrested for allegedly forcing woman to convert after marriage https://t.co/4o8fjMG1b8
यह मामला बुधवार (दिसंबर 23, 2020) को प्रकाश में आया था। पुलिस ने मीडिया को जानकारी दी थी कि शिकायत में पीड़िता ने बताया है कि साहिब अली उसके घर में किराएदार था। उसने अपनी पहचान राहुल के तौर पर बताई थी। दोनों में नजदीकियाँ इसी बीच बढ़ी थीं।
पीड़िता के अनुसार नवंबर 2019 में किराएदार के तौर पर रहने के लिए साहिब अली आया था। बाद में दोनों ने कालका मंदिर में शादी कर ली। जब साहिब अली की पहचान उजागर हो गई तो उसने वादा किया कि वह महिला पर धर्म बदलने के लिए दबाव नहीं डालेगा। लेकिन, कुछ समय बाद उसने धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालना और उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
Delhi: Woman alleges she was forced to convert after getting married to a Muslim man; Complaint registered at Sarita Vihar PS
“His family forced me to change my religion to Islam. I was forced to wear burqa, offer namaz. His father tried to sexually harass me,” she said pic.twitter.com/J17vr1FQoq
आरोपितों के ख़िलाफ़ पुलिस ने महिलामहिला की शिकायत के आधार पर आईपीसी की धारा 376,366, 354,406 और 34 के तहत मुकदमा दर्ज किया था। महिला के अनुसार जब राहुल बने साहिब ने शादी का प्रस्ताव दिया तो उसने उसके परिवार के बारे में पूछा था। उस वक्त उसने खुद का अनाथ बताया था। बाद में साहिब ने उसे अपने परिवार और रिश्तेदारों से मिलाया। उसी दिन महिला को पता चला कि जिसे वह राहुल समझ रही थी वह असल में साहिब अली है।
गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहने वाले अख्तर ने शिवा बनकर हिंदू युवती को प्रेमजाल में फँसाया। जागरण में उससे मुलाकात की और मंदिर में शादी रचाई। उसके बाद लड़की को डिमांड के नाम पर परेशान करने लगा। जब एक दिन अख्तर की झूठी पहचान उजागर हो गई तो उसने अपने भाइयों अफजल, अरशद और पिता मोहम्मद इदरीश के साथ मिलकर युवती को पीटा।
कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने नए कृषि कानूनों के खिलाफ आज राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ज्ञापन देते हुए मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की। वहीं मीडिया को संबोधित करते हुए दावा किया कि भारत में ‘कोई लोकतंत्र नहीं’ है।
#WATCH | You have an incompetent man who does not understand anything & running a system on the behalf of 3 or 4 other people who understand everything: Congress leader Rahul Gandhi pic.twitter.com/Ct3f7zTtjc
राहुल गाँधी ने कहा कि आपके पास एक असमर्थ शख्स है, जो कुछ भी नहीं समझता और सिस्टम को उन तीन-चार लोगों के पक्ष में चला रहा है, जो सब समझते हैं।
फिर क्या था, राहुल गाँधी हमेशा की तरह खुद ही अपने बयान के चलते लोगों के उपहास का कारण बन गए। राहुल गाँधी द्वारा दिए गए इस बयान पर सोशल मीडिया यूज़र्स ने उनका जमकर मजा लिया। क्योंकि कॉन्ग्रेस आलाकमान के बेटे की टिप्पणी को लोगों ने उन्हीं पर थोप दिया।
सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लोगों ने तरह-तरह के मीम्स शेयर करके राहुल गाँधी को खुद का इतनी अच्छी तरह से वर्णन करने के लिए काफी सराहा।
There’s an “INCOMPETENT MAN” who doesn’t understand anything!! How very true From Rafale to Abrogation of Article 370 to Triple Talaq & Now Farm Laws ..indeed this MAN knows NOTHING!! https://t.co/AokvsZtKji
another self goal moment for @RahulGandhi .. this man doesn’t understand targeting Modiji personally, even though losing election by election… Wait a min….i guess he is describing his own way of working????????
वहीं कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने यह भी बताया कि असल मे राहुल गाँधी क्या कहना चाहते थे। जैसे कि जिन तीन- चार लोगों का उन्होंने उल्लेख किया उसमें: पहला-सोनिया गाँधी, दूसरा- प्रियंका गाँधी, तीसरा- वो खुद यानी राहुल गाँधी, बाकी चौथा कौन है यह नहीं पता?
Incompetent man means Rahul Gandhi 3 or 4 means Sonia jee, Priyanka jee and Rahul Gandhi, चौथा कौन है समझ नहीं आया किसीको पता है तो बता दो
बता दें इन दिनों कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी काफी परेशान हैं। उनकी खुद की पार्टी थी ने 2019 के चुनाव में जारी अपने घोषणापत्र में किसानों के लिए इन्हीं सुधारों का वादा किया था जिसे मोदी सरकार द्वारा पूरा किया गया है। इसके बावजूद राहुल गाँधी लगातार किसानों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। यहीं नहीं पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने भी राज्यों को एपीएमसी अधिनियम में संशोधन करने और किसान को अधिक स्वतंत्रता देने की वकालत की थी।
वहीं इंदिरा गाँधी के पोते राहुल गाँधी अब लोकतंत्र की बात कर रहे है।
यूरोपियन कोर्ट ऑफ़ जस्टिस ने एक अहम फैसला सुनाया है जिसके तहत प्रशासन/अधिकारी आदेश दे सकते हैं कि जानवरों का वध करने से पहले उनकी स्टनिंग (Stunning) की जाए। दरअसल, बेल्जियम के फ्लेमिश (Flemish) क्षेत्र में एक नियम लागू किया गया था, जिसके अंतर्गत पशुओं की हत्या करने के लिए उनकी स्टनिंग (बेहोश/बेसुध) अनिवार्य होगी। पशु अधिकारों के आधार पर स्टनिंग के बिना पशुओं की हत्या पर पाबंदी होगी। गुरुवार (17 दिसंबर 2020) को यूरोपियन यूनियन की सबसे बड़ी अदालत ने इस नियम का समर्थन किया।
इस आदेश में न्यायालय ने कहा, “अदालत इस नतीजे पर आई है कि फैसले में निहित उपायों से पशु कल्याण के महत्व और यहूदी-मुस्लिम समुदाय की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने में सहजता होती है।” बेल्जियम स्थित फ्लैंडर की संसद ने 2017 में यह आदेश जारी किया था, जिसे पिछले साल 2019 जनवरी में लागू किया गया था। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि बूचड़खानों को पशुओं का क़त्ल करने से पहले उन्हें बेसुध करना चाहिए। आदेश के समर्थन में यह दलील दी गई थी कि इसकी मदद से जानवरों की पीड़ा कम की जा सकती है।
इस आदेश पर नेशनलिस्ट एनिमल वेलफेयर मिनिस्टर बेन वेट्स (Ben Weyts) ने कहा, “हम इतिहास बनाने जा रहे हैं।” इसके अलावा पशु मानवाधिकार संगठन ‘गाइया’ (Gaia) के मुताबिक़, “यह एक ऐतिहासिक दिन है। पूरे 25 साल के संघर्ष के बाद हमें इतनी बड़ी जीत हासिल हुई है।” इसके पहले तक यूरोपियन यूनियन और यूके के नियमों के अनुसार पशुओं की हत्या के पहले उनकी स्टनिंग अनिवार्य थी बशर्ते वह मुस्लिम या यहूदी समुदाय के लिए नहीं हों। यह एक बड़ा कारण था कि तमाम मुस्लिम संगठनों ने भी इस आदेश का जम कर विरोध किया था।
इस आदेश से दो प्रक्रियाएँ सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं, मुस्लिमों की हलाल और यहूदियों की कोशर (Kosher)। पशु मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस प्रतिबंध को बढ़ावा दिया था जिससे इन दो प्रक्रियाओं को रोका जा सके, जिनमें पशुओं का गला काटने के दौरान वह होश में रहते हैं। यहूदी और मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना है कि यह आदेश उनके रीति रिवाजों पर हमला है।
उनका कहना था कि यह उनके धर्म से जुड़ा हुआ है और अदालत को उनकी धार्मिक प्राथमिकता का पूरा ध्यान रखना चाहिए। इस मुद्दे पर बेल्जियम स्थित यहूदियों के संगठन (बेल्जियम फेडरेशन ऑफ़ ज्यूस आर्गेनाईजेशन) ने कहा कि यह लोकतंत्र को अस्वीकार करने के बराबर है। इस तरह के फैसलों से यह पता चलता है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बिलकुल महत्व नहीं दिया जाता है।
बिहार में एक हिंदू महिला के घर में घुसकर मोहम्मद छोटू ने दुष्कर्म करने की कोशिश की। विरोध करने पर 30 वर्षीय महिला पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए। घटना बेगूसराय जिले के गढहारा थाना क्षेत्र के बारो रामपुर टोला गाँव की है।
मोहम्मद छोटू मस्जिद की दीवार फाँद महिला के घर में घुसा था। महिला ने हिम्मत जुटाकर किसी तरह ग्रामीणों को इकट्ठा किया और आरोपित को पकड़वाया। इसके बाद पुलिस पीड़िता को इलाज के लिए अस्पताल ले गई। बाद में आरोपित को रिहा कर दिया गया। अब महिला अपने लिए इंसाफ माँग रही है।
21 दिसंबर 2020 को हुई इस घटना में पीड़ित महिला गुंजन देवी को चाकू लगने से काफी चोट आई है। गुंजन ने बताया कि उस रात वह अपने 3 बच्चों के साथ अपने घर में सो रही थी। तभी, मस्जिद की तरफ से मोहम्मद छोटू उनके घर में घुसा और सोते में उन्हें दबोच लिया।
इसके बाद वह उनकी साड़ी खोलने का प्रयास करने लगा, जिसके चलते वह अर्धनग्न हो गईं। उन्होंने चिल्ला कर छोटू का विरोध किया और ग्रामीणों को आवाज़ देने लगी। इतने में बच्चे भी उठे और घर का दरवाजा जाकर खोल दिया। जब छोटू ने मनसूबों में खुद को नाकामयाब पाया तो वह घर से भागने का प्रयास करने लगा। लेकिन तब तक महिला ने उसका पाँव कसके पकड़ लिया था। खुद को छुड़ाने के लिए छोटू ने चाकू निकाल कर गुंजन देवी पर कई वार किए लेकिन ये उनकी हिम्मत थी कि जब तक ग्रामीण इकट्ठा नहीं हुए तब तक उन्होंने उसका पाँव नहीं छोड़ा।
ग्रामीणों के इकट्ठा होने के बाद घटना की सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस आई और घटनास्थल से मोहम्मद छोटू को अपने साथ ले गई। इसके बाद महिला ने थाने में आधिकारिक रूप से अपनी शिकायत लगाई और वहाँ से उसे अस्पताल भेजा गया।
3 दिन पुरानी घटना की बाबत गुंजन देवी का कहना है कि पहले पुलिस ने उन्हें मुकदमा दर्ज करने का आश्वासन दिया। हालाँकि, जब अगले दिन वो दोबारा थाने पहुँची तो पुलिस का ढुलमुल रवैया देखने को मिला। वह कहती हैं कि उन्होंने आरोपित को दो दिन तो अपने पास रखा मगर बाद में उसे छोड़ दिया और जब उन्होंने इस रिहाई पर सवाल खड़े किए तो उन्हें भी डाँट-डपटकर थाने से भगा दिया गया।
अब गुंजन देवी की चिंता उनकी सुरक्षा को लेकर अधिक बढ़ गई है। वह कहती हैं कि अपने घर में वह तीन बच्चों के साथ अकेले रहती है। सारे बच्चे छोटे हैं। उनका पति यूपी में नौकरी करता है। वे लोग अभी एक साल पहले ही गाँव में आए हैं।
शिकायत की कॉपी
बीजेपी कार्यकर्ता ने पूछा- इनकी हिम्मत ऐसे बढ़ेगी तो हिंदू कैसे रहेंगे?
ऑपइंडिया ने इस संबंध में इलाके के वार्ड पार्षद और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता कृष्णानंद से बात की। उन्होंने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि उनके गाँव के मस्जिद से सटे एक घर की यह घटना है। महिला का पति रेलवे में काम करता है और वह अकेले अपने बच्चों के साथ रहती है। उसी के साथ इस घटना को अंजाम देने का प्रयास किया गया। कृष्णानंद बताते हैं कि घटना वाले दिन महिला की हिम्मत के कारण आरोपित घटनास्थल से पकड़ लिया गया था, मगर दो दिन के अंदर ही उसे पीआर बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया।
वह कहते हैं कि आरोपित ने महिला को इतना पीटा था कि उसके मुँह, हाथ, पैर सब सूज गए थे। ये बहुत दुर्भाग्य की बात है। ये मुस्लिम बहुल इलाका है। उस महिला पर कुछ समय पहले भी ऐसा हमला हुआ था। तब भी मस्जिद से ही कोई युवक घर में आया था। वह कहते हैं कि उस घटना के बाद उन्होंने मस्जिद में शिकायत की थी, लेकिन तब छत का घेराव करके मामला शांत हो गया था। अब यह घटना दोबारा घटी है। वह पूछते हैं कि ऐसे ही दूसरे समुदाय के लोगों की हिम्मत बढ़ती रहेगी तो हिंदू इलाके में कैसे रह पाएँगे। पुलिस के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कृष्णानंद भी कहते हैं कि अगर आरोपित रिहा होना था तो कोर्ट से होता पुलिस को उसे छोड़ने का क्या मतलब था।
घटना से संबंधित प्रकाशित खबर
बता दें कि ऑपइंडिया ने इस मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क करने का प्रयास किया था। लेकिन खबर लिखने तक पुलिस से बात नहीं हो पाई है। दूसरी ओर महिला की प्रार्थना है कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो और आरोपित के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में 3 मनचलों के घर में घुसने की बात लिखी जा रही है। हालाँकि, ऑपइंडिया से बात करते हुए महिला ने ऐसा कोई जिक्र नहीं किया और सिर्फ मोहम्मद छोटू पर इल्जाम लगाए।
मोबाइल फ़ोन पर मिलने वाले रैंडम व्हाट्सऐप संदेशों को ‘पूज्य बाबू जी की कविता’ बताने वाले बॉलीवुड के कलाकार और इंडस्ट्री के कथित महानायक अमिताभ बच्चन एक बार फिर विवाद में फँसते नजर आ रहे हैं। दरअसल, इस बार अमिताभ बच्चन ने जो कविता अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर बिना इसकी कवयित्री को श्रेय दिए शेयर की है। उसकी वास्तविक रचनाकार ने अमिताभ बच्चन से इसे लेकर आपत्ति दर्ज की है।
बृहस्पतिवार (दिसंबर 24, 2020) की रात, करीब एक बजे अमिताभ बच्चन ने एक कविता अपने फेसबुक पेज और ट्विटर अकाउंट पर शेयर की। यह कविता अभी भी उनके ट्विटर अकॉउंट पर देखी जा रही है। आदतन अपने ट्वीट्स की गिनती को जारी रखते हुए अमिताभ बच्चन ने कविता को अपनी एक तस्वीर के साथ शेयर किया है।
‘सदी के महानायक’ द्वारा किया गया ट्वीट
लेकिन कुछ देर बाद खुलासा हुआ कि यह कविता तो वास्तव में टीशा अग्रवाल द्वारा लिखी गई है। टीशा अग्रवाल ने अमिताभ बच्चन के ट्विटर और फेसबुक पेज पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा, “सर यह पंक्तियाँ मेरी हैं। कम से कम क्रेडिट तो दीजिए।”
अमिताभ के पोस्ट पर टीशा अग्रवाल का कमेंट
टीशा ने अमिताभ बच्चन की यह पोस्ट अपनी वॉल पर शेयर करते हुए लिखा, “जब Amitabh Bachchan आपकी पोस्ट की कॉपी करें और क्रेडिट भी न दें, खुश होएँ की रोएँ!”
इस सम्बन्ध में जब ऑपइंडिया ने टीशा अग्रवाल से सम्पर्क किया तो उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर यह एक चलन बनता जा रहा है कि कोई भी व्यक्ति किसी की भी रचना को उठाकर शेयर कर देता है, लेकिन जब अमिताभ बच्चन जैसी हस्तियाँ भी यही काम करती हैं तो उनसे रचनाकार के बारे में जानकारी रखने और उसका नाम सामने रखने के बारे में भी आवश्यक सावधानी बरतने की उम्मीद की जाती है।
टीशा ने कहा, “कल रात मुझे अमिताभ जी की पोस्ट दिखी और मुझे पढ़कर लगा कि ये पंक्तियाँ तो मेरी हैं। फिर मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर भी चेक किया जिससे मैं आश्वस्त हो गई कि यह तो मेरी ही कविता है। मैंने इसे गूगल सर्च भी किया जहाँ मुझे पता चला कि यह कविता और भी कई ब्लॉग्स ने पब्लिश की है, और यूट्यूब पर भी कुछ लोगों ने इसे अपनी आवाज के साथ पब्लिश किया है।”
“मैंने अपनी पोस्ट देखी जो कि अप्रैल 24, 2020 की है, जबकि ब्लॉग्स में ये जून, 2020 में प्रकाशित हुई है। जो वीडियो भी लोगों ने इस कविता पर बनाए हैं वो भी जून के बाद के ही हैं और यह सब मुझसे पूछे बिना ही प्रकाशित किए गए हैं। मैंने अमिताभ जी की वॉल पर एक कमेंट किया कि मुझे कम से कम इसका क्रेडिट तो दिया जाना चाहिए। मुझे लगा कि उनकी पीआर वाले इसका संज्ञान लेंगे लेकिन मुझे नहीं लगता है कि इस बारे में कोई ध्यान दिया गया है।”
टीशा अग्रवाल द्वारा यह कविता 24 अप्रैल को शेयर की गई थी
टीशा ने कहा कि जब उन्होंने यह पोस्ट अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर की तो उन्हें कुछ लोगों ने बताया कि अमिताभ बच्चन ने कुमार विश्वास को अपने पिताजी हरिवंश राय बच्चन की एक कविता का पाठ करने के लिए लीगल नोटिस भेजा था। उन्होंने बताया कि उन्हें लोगों द्वारा अमिताभ बच्चन को इस सम्बन्ध में लीगल नोटिस भेजने की सलाह दी जा रही है। हालाँकि, उन्होंने इस बारे में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है और अपने परिवार से बात करने के बाद ही वो इस सम्बन्ध में कोई फैसला लेंगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2017 में युवाओं के बीच लोकप्रिय कवि और आम आदमी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के पूर्व सहयोगी कुमार विश्वास द्वारा हरिवंश राय बच्चन की एक कविता ‘नीड़ का निर्माण फिर’ गाने और उसका वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करने के चलते अमिताभ बच्चन ने उन्हें लीगल नोटिस भेज दिया था। अमिताभ बच्चन ने आरोप लगाया कि कुमार विश्वास ने उनके पिता की कविता का इस्तेमाल कर कॉपीराइट कानून का उल्लंघन किया है।
फेसबुक पर अमूमन कॉपी-पेस्ट चलता रहता है, सेलिब्रिटी भी चुराते रहते हैं, लेकिन लोग क्रेडिट दे देते हैं, या ‘वाया व्हाट्सएप/ट्विटर’ आदि लिख देते हैं, लेकिन ऐसे में उस व्यक्ति के द्वारा चोरी करना या क्रेडिट न देना जो पहले अपने पिता की कविता को क्रेडिट के साथ प्रयोग करने पर भी लीगल नोटिस भेजता है, उनकी हायपोक्रिसी के बारे में बहुत कुछ कहता है।
यही नहीं, अमिताभ बच्चन के इस ट्वीट को मुख्यधारा की मीडिया द्वारा भी यह कहते हुए प्रकाशित किया जा रहा है कि ‘अमिताभ बच्चन की चाय में है जिंदगी की रेसिपी, बताया-हर घूँट का लें मजा।’
अमिताभ बच्चन द्वारा टीशा अग्रवाल की कविता को बिना उन्हें इसका श्रेय देते हुए साझा करने पर सोशल मीडिया पर लोग तरह-तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
एक फेसबुक यूजर प्रदीप शुक्ला लिखते हैं, “यूट्यूब पर एक बन्दा है ज्ञान प्रकाश मिश्र। यह सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए मुफ्त में ऑनलाइन वीडियोज बनाता है, और 40-40 घंटों के ‘पापा विडियो’ भी बनाकर सबको मुफ्त में पढ़ाता है।”
अपना अनुभव साझा करते हुए प्रदीप शुक्ला आगे लिखते हैं, “इन्हीं वीडियो को देखने के दौरान मुझे एक घटना पता चली। उस मिश्रा ने अपने विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन करने के लिए हरिवंशराय बच्चन जी की कोई कविता अपने वीडियो में सुना दिया था, वो भी बाकायदा ‘हरिवंशराय बच्चन’ का नाम लेकर उन्हें सम्मान देते हुए। आप लोग यकीन नहीं मानेंगे कि इतनी सी बात के लिए श्री अमिताभ बच्चन ने उस मिश्रा के खिलाफ लीगल नोटिस भेज कर उसको महीनों अवसाद में धकेल दिया था। जबकि, वो मेल कर के, इनबॉक्स कर के या उस लीगल बन्दे को फोन कर-कर के हजारों बार माफ़ी माँग रहा था, उस वीडियो से हुई सारी कमाई भी उनको देने के लिए तैयार था, लेकिन सदी के ये महानायक(?) पसीजे नहीं।”
वहीं, समर प्रताप लिखते हैं, “अमिताभ बच्चन जी आप टीशा अग्रवाल जी की कविताएँ चुरा के चाय के साथ पोस्ट कर रहे हैं। जबकि आप हरिवंश राय बच्चन जी की कविता चुराने पर केस कर देते हैं। ऐसे कैसे चलेगा सर? बॉलीवुड, अब हॉलीवुड के गाने और स्टोरी की बजाए कविताएँ भी चुराएगा?”
अभिषेक मिश्रा लिखते हैं, “इनके बाबू जी का नाम लेकर भी कोई बंदा बाबू जी की कोई कविता पढ़ दे तो बाबू जी के बेटे उसको लीगल नोटिस थमा देते हैं, और यहाँ बाबू जी के बेटे खुद किसी दूसरे की लिखी कविता अपनी वाल पर चेंप कर वाह वाही लूट रहे हैं।”
वहीं, संकर्षण शुक्ला इस विषय पर अमिताभ को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं, “कुमार विश्वास से अपने बाप की कविता के गायन पर कॉपीराइट वसूलने वाले सदी के महानायक ने आज अपनी ट्विटर वॉल पर स्वयं ही चोरी की कविता लगा दी। फेसबुक पर एक लेखिका है टीशा अग्रवाल… बेहद शानदार लिखती हैं। डाबर का तेल बेचकर झाबर बनने वाले बुढ़उ चोरी की कविताएँ तो न लगाओ कम से कम! और अगर लगा भी दिए तो क्रेडिट तो दे दिया करो यार!”
उल्लेखनीय है कि गत वर्ष ही अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर एक ऐसी कविता पोस्ट कर डाली थी, जो सोशल मीडिया और ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ पर खूब चलाई जाती हैं। लेकिन दुखद बात ये थी कि खुद अमिताभ बच्चन ये बात नहीं समझ पाए कि ये कविता के नाम पर एक धब्बा है और उनके पिता हरिवंशराय बच्चन जी ने ये नहीं लिखी। इसी झाँसे में आकर इसे ‘पूज्य बाबू जी का लेखन’ बताकर अमिताभ ने दो हाथ जोड़ती इमोजी बनाई और इसे एक ‘ट्वीट नम्बर’ देते हुए ट्वीट भी कर दिया था।
यह पहली बार नहीं है जब अमिताभ बच्चन ने किसी लेखक की रचना को बिना लेखक को श्रेय दिए साहित्य के क्षेत्र में अपने लिए ‘नाम कमाया’ हो। इससे पहले लेखक प्रबुद्ध सौरभ की भी एक रचना को वो बिना लेखक के नाम का जिक्र किए शेयर कर समाचार पत्रों में अपने लिए जगह बना चुके हैं।
हालाँकि, प्रबुद्ध ने मजाकिया लहजे में ही कुमार विस्वास को टैग करते हुए लिखा कि 32 रूपए तो उनके भी बनते हैं।
भारत में सेकुलरिज्म के नाम पर दशकों से एक पूरा नैरेटिव तैयार हुआ है। इसी कारण लोग इको-फ्रेंडली क्रिसमस की बात कर रहे हैं। इसी नैरेटिव का नतीजा है कि आज हिंदुओं के पर्व आते ही सोशल मीडिया पर नैतिकता की दुहाई दी जाने लगती है। सही-गलत की परिभाषाएँ तय होने लगती हैं और वहीं दूसरे धर्मों से संबंधित त्योहार पर पोस्टर जारी करके बधाई देने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
25 दिसंबर आने से एक दिन पहले आपको ये सब खूब देखने को मिल रहा होगा। दिखे भी क्यों न? क्रिसमस कोई छोटा-मोटा फेस्टिवल थोड़ी है। ईसाईयों का सबसे बड़ा त्योहार है। पश्चिमी सभ्यता की सबसे बड़ी छाप है। हम दीवाली से ठीक पहले प्रदूषण का हवाला देकर पटाखों को कोसते हैं। देश के कई राज्यों में सूखा बताकर होली पर फेंके जाने पानी पर ज्ञान देते हैं। शिवरात्रि पर शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले दूध से हमें गरीबों की याद आ जाती है।
मगर, क्रिसमस इतना बड़ा त्योहार है कि इस दिन के कारण होने वाले सभी दुष्परिणामों को हम नजरअंदाज कर देते हैं। हमारे भीतर का बुद्धिजीवी उसी समय सोता रहता है जब वैश्विक स्तर पर दुनिया के अधिकाँश लोग एक ट्रेंड के कारण अपना सबसे ज्यादा पैसा खर्च करते हैं और बिना गरीबों का ख्याल किए अपने अपने घर पर आम दिनों से अधिक और वैराइटी वाले व्यंजनों का आनंद लेते हैं।
हिंदुओं के त्योहारों को मनाने वाला वर्ग सीमित है, मगर क्रिसमस का जिस प्रकार बाजारीकरण करके उसे हर घर के भीतर प्रवेश करवाया गया, उस वजह से इसे लगभग सभी जगहों पर धूमधाम से मनाया जाता है। अब जब ये फेस्टिवल हर जगह धूमधाम से सेलीब्रेट हो रहा है तो मतलब साफ है कि इस दिन होने वाले नुकसान भी व्यापक हैं। यही कारण है कि हमें इको-फ्रेंडली क्रिसमस को ले कर लोगों में जागरूकता फैलानी चाहिए।
क्या मानवीय आधार पर हमारा फर्ज नहीं है कि हम दिवाली, होली जैसे त्योहारों पर ‘कल्याणकारी’ मुहीम छेड़ने के बाद अब मोर्चा क्रिसमस के लिए खोले और लोगों में जागरूकता फैलाएँ। आखिर पता होना चाहिए कि प्रकृति को इस एक दिन से कितना नुकसान होता है। क्रिसमस के बाद के दिन, दिल्ली के प्रदूषण का स्तर वैसा ही था जैसा कि दीवाली के अगले दिन, फिर भी दीवाली पर ज्ञान देने वाले बहुतायत होते हैं, क्रिसमस की आतिशबाजी पर कोई कुछ नहीं कहता।
मौजूदा जानकारी के मुताबिक क्रिसमस के इस पर्व पर अकेले यूके में पूरे साल के मुकाबले लोग 80% ज्यादा खाना खाते हैं। 370 मिलियन मिंस पाइस (कीमे से तैयार डिश) चबा जाते हैं। 250 मिलियन पिंट बियर और 35 मिलियन वाइन गटक ली जाती है और 10 मिलियन टर्की को शुभ मानकर काटकर ओवन में पका दिया जाता है। पेटा की एक रिपोर्ट के अनुसार यूएस में पूरे साल में 245 मिलियन टर्की मारे जाते हैं, जिसमें सिर्फ क्रिसमस पर 22 मिलियन की हत्या की जाती है।
एक अनुमान के मुताबिक 170 पाउंड (भारतीय पैसे के अनुसार 17 हजार रुपए) एक घर सिर्फ खाने पर खर्च करता है, दिलचस्प बात यह है कि वहाँ 35 प्रतिशत लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि वह आम दिनों से ज्यादा इस दिन पर खाना फेंकते हैं।
इसके अलावा विभिन्न किस्म के मीटों का सेवन क्रिसमस के दिन मानो अनिवार्य होता है। हर डिश में मीट यूज होता है। जिसका बड़ा नुकसान अपना पर्यावरण झेलता है। जी हाँ, लगभग 15-20000 लीटर पानी 1 किलो मीट प्रोटीन के उत्पादन में खर्च होते हैं। अगर लोग इको-फ्रेंडली क्रिसमस अपना लें, और भोजन की खपत कम करें, मीट कम खाएँ तो पर्यावरण के लिए यह मददगार साबित हो सकता है।
इसके बाद इतनी अधिक मात्रा में जब खाना घरों में लाया जाता है तो उनकी सामग्री को पैक करने में जो कागज इस्तेमाल होता है उसकी भी बर्बादी होती है। साल 2016 की रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ यूके में अंदाजन 227,000 मील ऐसे कागज वेस्ट हुए जिनसे खाना, गिफ्ट आदि हर साल रैप किया जाता है। इस आँकड़े का मतलब समझते हैं? एक आइलैंड इसमें पूरा लपेटा जा सकता है। साथ ही लगभग एक अरब क्रिसमस कार्ड्स भी इस दिन भेजे जाते हैं जिसके लिफाफे का वजन लगभग 3 लाख टन होता है।
क्रिसमस के मौके पर कार्ड दिए जाते हैं? उनका बाद में क्या होता है। सोचा है क्या किसी ने? गिफ्ट में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक उसकी बर्बादी भी इस मौके पर धड़ल्ले से होती है जबकि ये बात सबको पता है कि प्लास्टिक से हमारी प्रकृति को कितना नुकसान होता है और रैपिंग पेपर से किस तरह किलो के हिसाब से कार्बन डायक्साइड निकलती है। इसे बनाने में कोयले जैसे संसाधन जो इस्तेमाल होते हैं उनकी बर्बादी का आँकड़ा वो अलग है। कहते हैं कि 1 किलो रैपिंग पेपर बनाने में साढ़े 3 किलो कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।
क्रिसमस ट्री इस मौके पर घर की सजावट में चार चाँद लगाता है। कुछ लोग असली क्रिसमस ट्री को प्राथमिकता देते हैं, मगर बड़ी मात्रा में लोग आर्टिफिशियल पेड़ को घर में सजा देते हैं। अब दिक्कत ये है कि ऐसे लोगों के कारण क्रिसमस ट्री के नाम पर इतने पर बड़ी मात्रा में आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री का उत्पाद किया जाता है कि क्रिसमस जाने के बाद इसमें इस्तेमाल प्लास्टिक का सारा दुष्प्रभाव हमारे पर्यावरण को हजार सालों तक झेलना पड़ता है। इस कारण भी इको-फ्रेंडली क्रिसमस समय की माँग है।
इनमें से 80 % क्रिसमस ट्री चीन में बनते हैं। बाकी का निर्माण भी साउथ कोरिया आदि शहरों में होता है। चिंता की बात यह है कि इन ट्री में नॉन-बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक और संभवत: मेटल टॉक्सिन, जैसे लेड आदि का, इस्तेमाल होता है। सैंकड़ों लोग ऐसे सामान में अपनी आमदनी खुले आम खर्च करते हैं कि बड़े स्तर पर पैसों की बर्बादी होती है।
द नेशनल क्रिसमस ट्री एसोसिएशन नाम के एक व्यापार समूह, का अनुमान है कि अमेरिकियों ने साल 2016 में 27.4 मिलियन असली क्रिसमस पेड़ खरीदे, जिसमें $2.04 बिलियन खर्च हुए। वहीं अनुमानित 18.6 मिलियन आर्टिफिशियल पेड़ 1.86 बिलियन डॉलर में खरीदे गए थे। एक तरफ जहाँ विश्व पेड़ों को लगाने के लिए प्रयासरत है, जंगल जल रहे हैं, आबादी बढ़ रही है, वैसे में एक दिन के लिए करोड़ों पेड़ों का हर साल कटना बताता है कि हम सँभलने की जगह और नुकसान पहुँचा रहे हैं।
हम देखते हैं कि क्रिसमस पर लोग मोमबत्ती जलाकर घरों की साज सज्जा करते है। लाइटों का इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि ये ध्यान कोई नहीं देता कि इन मोमबत्तियों को पैराफिन से निर्मित किया जाता है जो पेट्रोलियम का ही बायप्रोडक्ट है। यानी जीवाश्म ईंधन को जलाने से जो प्रदूषण फैलता है उसकी परवाह भी क्रिसमस के खुमार में कोई नहीं करता। क्रिसमस लाइट से जो घरों को सजाया जाता है उस समय भी इलेक्ट्रिसिटी का दुरुपयोग करना अधिकार समझ लिया जाता है।
अब बात करते हैं भारत की। केवल पश्चिमी शहरों में ही क्रिसमस पर ऐसे कार्य नहीं किए जाते जिनसे नेचर को नुकसान पहुँचे। बल्कि भारत में भी इस त्योहार का क्रेज बहुत ज्यादा है। दिवाली पर प्रदूषण को कोसने वाले अक्सर क्रिसमस तक पटाखों पर लगे बैन को हटा देते है जबकि क्रिसमस पर आई 2018 की इस खबर पे नजर मारें तो पता लगता है कि क्रिसमस पर दिवाली जितना ही पॉल्यूशन होता है।
कुल मिलाकर सच्चाई यही है कि जितने तर्क हिंदुओं के त्योहारों की आलोचना करने में दिए जाते हैं, अगर वैसी ही तर्क 25 दिसंबर के मौके पर उठाए जाएँ तो स्पष्ट होता है कि क्रिसमस का बाजारीकरण, इस त्योहार का महिमामंडन केवल संस्तृतियों को ध्वस्त नहीं कर रहा है बल्कि देश, सीमा, धर्म की परवाह किए बिना जेबों को खाली करवा रहा और हमारे पर्यावरण को भी खोखला कर रहा है। आज हालात ये हैं कि भारत के स्कूलों में भी क्रिसमस के नाम पर बच्चों से प्रोजेक्ट बनवाए जाते हैं। अच्छा खासा पैसा खर्च करवाकर इस त्योहार के प्रति उनके मन में रूचि पैदा की जाती है। नतीजा यह होता है कि पर्यावरण विरोधी पश्चिमी ट्रेंड से हम खुद को अपने घरों में ढालना शुरू कर देते हैं।
23 दिसंबर को दुनिया भर के जागरूक लोगों ने ट्विटर पर #EcoFriendlyChristmas ट्रेंड करवाया जो कि पूरे दिन बातचीत का हिस्सा बना रहा। कुल 82,731 ट्वीट्स के साथ, 27.8 मिलियन लोगों तक की पहुँच के साथ इको-फ्रेंडली क्रिसमस का हैशटैग नंबर एक पर ट्रेंड करता रहा। यह बताता है कि लोगों में अब पर्यावरण को ले कर एक घबराहट है कि बाजारवाद के नाम पर कितनी बरबादी फैलाई जाती रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (24 दिसंबर, 2020) को विश्वभारती यूनिवर्सिटी के शताब्दी समारोह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संबोधित किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के विजन और आत्मनिर्भर भारत का सार बताया। उन्होंने इसे गुरुदेव के चिंतन, दर्शन और परिश्रम का साकार अवतार बताया।
1921 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्वभारती देश की सबसे पुरानी सेंट्रल यूनिवर्सिटी है। मई 1951 में इसे एक केंद्रीय विश्वविद्यालय और इंस्टीट्यूशन ऑफ नेशनल इंपॉर्टेंस घोषित किया गया था। प्रधानमंत्री इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं। पीएम मोदी ने कहा कि भारत के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए बंगाल की पीढ़ियों ने खुद को खपा दिया।
Today we must remember the circumstances which led to the establishment of this university. It wasn’t just British rule but in the background, were our rich ideas & history of hundreds of years of movement: PM Modi at centenary celebrations of Visva-Bharati University https://t.co/C428q8qot8
पीएम मोदी ने कहा, “विश्वभारती विश्वविद्यालय का 100 साल होना हर भारतवासी के लिए बहुत ही गर्व की बात है। मेरी लिए भी ये सुखद है कि आज के दिन इस तपोभूमि का पुण्य स्मरण करने का अवसर मिल रहा है। भारत के लिए गुरुदेव ने जो स्वप्न देखा था, उस स्वप्न को मूर्त रूप देने के लिए देश को निरंतर ऊर्जा देने वाला ये एक तरह से आराध्य स्थल है।”
उन्होंने बताया, “भारत आज इंटरनेशनल सोलर अलायंस के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत पूरी दुनिया मे इकलौता देश है जो पेरिस एकॉर्ड के तहत पर्यावरण के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सही मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।”
आत्मनिर्भर भारत को मजबूती देने की बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “पौष मेले के साथ वोकल फॉर लोकल का मंत्र हमेशा से जुड़ा रहा है। जब हम आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं तो विश्वभारती के छात्र-छात्राएँ पौष मेले में आने वाले कलाकारों की कलाकृतियाँ ऑनलाइन बेचने की व्यवस्था करें।
जब हम आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं तो विश्वभारती के छात्र-छात्राएं पौष मेले में आने वाले कलाकारों की कलाकृतियां ऑनलाइन बेचने की व्यवस्था करें: पीएम मोदी https://t.co/44YRdy6ahcpic.twitter.com/3RE62Lb9Mz
विश्वविद्यालय के नाम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “विश्व-भारती। माँ भारती और विश्व के साथ समन्वय। विश्व भारती के लिए गुरुदेव का विजन आत्मनिर्भर भारत का भी सार है। आत्मनिर्भर भारत अभियान भी विश्व कल्याण के लिए भारत के कल्याण का मार्ग है। ये अभियान, भारत को सशक्त करने का अभियान है, भारत की समृद्धि से विश्व में समृद्धि लाने का अभियान है।”
प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर को याद करते हुए कहा, “जब हम स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं तो हमारे मन में सीधे 19-20वीं सदी का विचार आता है। लेकिन इन आंदोलनों की नींव बहुत पहले ही रखी जा चुकी थी। भारत की आजादी के आंदोलन को सदियों पहले से चले आ रहे अनेक आंदोलनों से ऊर्जा मिली थी। भक्ति युग में भारत के हर क्षेत्र में संतों, महंतों ने देश की चेतना के लिए अविराम प्रयास किया।”
PM मोदी ने बताया कि किस तरह भक्ति आंदोलन से हम एकजुट हुए, ज्ञान आंदोलन बौद्धिक मजबूती दी और कर्म आंदोलन ने हमें अपनी लड़ाई का हौसला और साहस दिया। इन्हीं सब वजह से सैकड़ों सालों के कालखंड में चले ये आंदोलन त्याग, तपस्या और तर्पण की अनूठी मिसाल बन गए थे।
गुरुदेव के विज़न को याद करते हुए मोदी ने कहा, “वेद से विवेकानंद तक भारत के चिंतन की धारा गुरुदेव के राष्ट्रवाद के चिंतन में भी मुखर थी और ये धारा अंतर्मुखी नहीं थी। वो भारत को विश्व के अन्य देशों से अलग रखने वाली नहीं थी। उनका विजन था कि जो भारत में सर्वश्रेष्ठ है, उससे विश्व को लाभ हो और जो दुनिया में अच्छा है, भारत उससे भी सीखे।”