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जहीर ने तोड़ी ‘शेर-ए-पंजाब’ महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा, मौलाना रिजवी से प्रभावित होकर दिया अंजामः साल भर में दूसरी बार लाहौर में तोड़ी गई मूर्ति

पाकिस्तान के लाहौर में शुक्रवार (11 दिसंबर 2020) को महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मौलाना खैम हुसैन रिज़वी के कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित लाहौर के ही एक युवक ने इस घटना को अंजाम दिया है। आरोपित युवक को गिरफ्तार कर लिया गया है।  

आरोपित का नाम ज़हीर है और वह लाहौर के हरबंसपुरा का रहने वाला है। पूछताछ के दौरान उसने बताया कि महाराजा रणजीत सिंह के प्रति आक्रोश और नफ़रत की वजह से उसने प्रतिमा का हाथ तोड़ कर रॉयल फोर्ट, लाहौर में लगा दिया। इस दौरान आरोपित युवक ने बताया कि मौलाना खैम हुसैन रिज़वी ने अपने भाषणों में महाराजा रणजीत सिंह पर मुसलमानों की हत्या का आरोप लगाया था। पाकिस्तानी कट्टरपंथी मौलाना खैम हुसैन रिज़वी का नवंबर 2020 में इंतकाल हो गया था।  

यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं है जब पाकिस्तान से महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को तोड़ने की ख़बर सामने आई है। अगस्त 2019 के दौरान जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद भी उनकी प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने का मामला सामने आया था। इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ ईशनिंदा कानून के तहत मामला दर्ज किया था।

बता दें कि, महाराजा रणजीत सिंह की 9 फुट ऊँची प्रतिमा का अनावरण लाहौर किले में इसी साल जून में किया गया था। इस प्रतिमा का अनावरण महाराजा रणजीत सिंह की 180 पुण्यतिथि के मौके पर किया गया था। लगभग 9 फुट ऊँची प्रतिमा का निर्माण फ़कीर खाना संग्रहालय के निर्देशानुसार हुआ था। महाराजा रणजीत सिंह सिख साम्राज्य के नेता थे जिन्होंने 19 वीं शताब्दी में उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर में शासन किया था। उन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ भी कहा जाता है।   

अक्षम सोनिया गाँधी, सांसदों से कटे मनमोहन, मोदी ने कैसे चलाई पहली सरकारः किताब में प्रणब मुखर्जी खोलकर गए हैं सारे राज

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निधन के बाद अब उनके संस्मरण का अंतिम हिस्सा प्रकाशित होने वाला है, जिससे कॉन्ग्रेस आलाकमान को झटका लग सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की बुरी हार हुई और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग की सरकार सत्ता में आई थी। प्रणब मुखर्जी ने पार्टी की इस हार के लिए सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने इस ओर भी इंगित किया है कि पार्टी में ये चर्चा थी कि वो मनमोहन से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते।

प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में लिखा है, “कॉन्ग्रेस के कुछ सदस्यों की सोच थी कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बना होता तो 2014 में पार्टी को जो पराजय देखनी पड़ी, उसे टाला जा सकता था। यद्यपि मैं इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखता। लेकिन, मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि 2012 में मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के आलाकमान ने राजनीतिक फोकस खो दिया।” दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी पुस्तक ‘The Presidential Years’ में ये बातें लिखी हैं।

प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया है कि जहाँ एक तरफ सोनिया गाँधी पार्टी के मामलों को सँभालने में अक्षम रही थीं, वहीं सदन से डॉक्टर मनमोहन सिंह की लगातार अनुपस्थिति ने सांसदों के साथ उनके व्यक्तिगत संपर्कों को ख़त्म कर दिया। ‘भारत रत्न’ प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में बतौर राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के क्रियाकलापों के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में 3 साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ भी काम किया था।

उन्होंने लिखा है कि शासन करने का नैतिक अधिकार प्रधानमंत्री में ही निहित है। बकौल प्रणब मुखर्जी, देश की सम्पूर्ण स्थिति एक तरह से प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन के क्रियाकलापों का ही प्रतिबिम्ब है। उन्होंने पाया कि डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में गठबंधन को बचाने में ही तल्लीन रहे, जिसका दुष्प्रभाव उनकी सरकार पर भी पड़ा। कॉन्ग्रेस के कई अन्य नेता भी मनमोहन सिंह को यूपीए काल में कॉन्ग्रेस के प्रति लोगों की नाराजगी के लिए जिम्मेदार ठहरा चुके हैं।

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने के तरीकों पर प्रकाश डालते हुए प्रणब मुखर्जी ने लिखा है, “ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में एकतंत्रीय शासन व्यवस्था को अपना लिया। सरकार, न्यायपालिका और विधायिका के बीच कटु संबंधों को देखते हुए ऐसा ही प्रतीत होता है। अब समय ही बताएगा कि उनके दूसरे कार्यकाल में ऐसे मामलों पर सरकार बेहतर समझ और सहमति के साथ काम करती है या नहीं।”

उन्होंने बताया है कि सोनिया गाँधी ने जून 2, 2012 को उन्हें बताया था कि वो राष्ट्रपति के पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार हैं। लेकिन, उन्होंने ये भी याद दिलाया था कि यूपीए सरकार में उनका जो किरदार रहा है, उसे भी नहीं भूला जाना चाहिए। यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में मुखर्जी से एक वैकल्पिक नाम भी माँगा गया था। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि इस बैठक के बाद अस्पष्ट तौर पर उन्हें ये ही लगा था कि शायद सोनिया गाँधी इस पद के लिए मनमोहन सिंह के नाम पर विचार करें।

उन्होंने सोचा कि अगर ऐसा होता है तो शायद उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में प्रोन्नत किया जा सकता है। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि उन्हें ऐसी चर्चा सुनने को मिली थी कि कौशाम्बी की पहाड़ियों पर छुट्टियाँ मनाते समय सोनिया गाँधी ने इस पर विचार-विमर्श भी किया था। मनमोहन सिंह भी मान चुके हैं कि मुखर्जी उनसे बेहतर प्रधानमंत्री होते, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वो जानते थे कि उनके पास कोई च्वाइस नहीं है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सोमवार अगस्त 31, 2020 को देहांत हो गया था। भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने 2018 में संघ के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। ‘संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय’ नामक यह कार्यक्रम 7 जून 2018 को नागपुर के संघ मुख्यालय में हुआ था। प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को भी असहज कर दिया था। उन्होंने RSS के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को भारत माँ का महान बेटा भी बताया था।

कभी वामपंथी गुंडों की पिटाई के बाद व्हीलचेयर पर संसद लाई गईं ममता बनर्जी काँप रहीं थी, आज कर रहीं- चड्डा, नड्डा, फड्डा…

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। हिंसा के लिए कुख्यात वामपंथी दलों ने इस ‘संस्कृति’ को पाला-पोसा और अब राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) इसे बढ़ावा दे रही है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले TMC के गुंडों पर लगातार बीजेपी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के आरोप लग रहे हैं। गुरुवार (10 दिसंबर 2020) को बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ। इसके अगले दिन ABVP के जुलूस को निशाना बनाया गया।  

हाल ही में नड्डा ने बताया था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस की राजनीतिक हिंसा के कारण भाजपा के 130 कार्यकर्ता अपनी जान गँवा चुके हैं, जिनमें से 100 कार्यकर्ताओं का तर्पण उन्होंने स्वयं किया है।

बावजूद इन सबके, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीतिक हिंसा को लेकर गंभीर नहीं दिखतीं। उलटा उन्होंने राज्य के डीजीपी और मुख्य सचिव को नहीं भेजने की बात कह केंद्र से टकराव का रास्ता अख्तियार कर लिया है। नड्डा के काफिले पर हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दोनों शीर्ष अधिकारियों को तलब किया था

वैसे केंद्र से टकराव लेना, संघीय ढॉंचे को चुनौती देना ममता के लिए नई बात नहीं है। सत्ता में आने के बाद से ही वह लगातार ऐसा करती रही हैं। लेकिन राजनीतिक हिंसा की तो वह किसी दौर में खुद पीड़ित रह चुकी हैं। लोकसभा में एक भाषण के दौरान दिवंगत सुषमा स्वराज ने भी उनके साथ वामपंथी गुंडों के द्वारा की गई हिंसा का जिक्र किया था।

ममता बनर्जी पर दिया गया बयान वीडियो के 17 मिनट से लेकर 18 मिनट 30 सेकंड के स्लॉट पर सुना जा सकता है।

सुषमा स्वराज ने 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार की विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान कहा था:

“मुझे वो दृश्य जस का तस याद है। मेरी आखों में वो दृश्य बसा हुआ है। मैं राज्यसभा की दीर्घा में बैठी हुई थी। इसी सदन में नरसिंह राव की सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास पर मतदान हो रहा था। एक व्हीलचेयर के ऊपर ममता बनर्जी को लाया गया। यहीं बैठी हुई थीं वो। चोटों से आए बुखार के कारण काँप रहीं थीं। बराबर में बैठी दो सांसद महिलाओं ने उन्हें लाल कंबल ओढ़ाया था। वहाँ बैठी हुई मैं कम्युनिस्टों की हिंसक प्रवृत्ति को कोस रही थी। मुझे मालूम है कि ममता बनर्जी के विरोध के स्वर मुखर होते हैं। लेकिन हम उनके विरोध के अधिकार को मान्यता देते हैं। हम उनके विरोध के अधिकार को स्वीकृति देते हैं। आप उनकी आवाज को कैद करने के लिए उन पर हमला नहीं करते, इसलिए पूछना चाहती हूँ आज कि इस सदन में बैठ कर सीपीएम के साथ बैठकर मतदान करेंगी और पश्चिम बंगाल में उनकी विरोध की राजनीति करेंगी। यह कैसी साँझ है, यह कैसा गठबंधन है।”

राजनीतिक हिंसा की शिकार हो चुकी ममता आज उसी सीपीएम के स्थान पर जब खुद बंगाल पर विराजमान हैं तो उनसे इस घटना पर दो शब्द नहीं निकल रहे। वह हमले की निंदा करने की बजाय उसी पार्टी पर इल्जाम मढ़ रही हैं जिसके नेताओं पर पत्थरबाजी हुई। उनकी असंवेदनशीलता देख भाजपा नेता समेत सब हैरान हैं कि वो एक हमले को नेताओं की नौटंकी बता रही हैं। उनके शब्द पढ़िए:

“उनके (बीजेपी) पास कोई और काम नहीं है। अकसर गृह मंत्री यहाँ होते हैं, बाकी समय उनके चड्डा, नड्डा, फड्डा, भड्डा यहाँ होते हैं। जब उनके पास कोई दर्शक नहीं होता है, तो वे अपने कार्यकर्ताओं को नौटंकी करने के लिए कहते हैं।”

याद दिला दें कि ये पहली दफा नहीं है जब ममता बनर्जी हिंसा का या किसी आरोपित का बचाव कर रही हैं। इससे पहले शारदा चिट फंड घोटाले में फँसे पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के लिए ममता बनर्जी ने सड़क पर उतर कर रेल रोको प्रदर्शन कर दिया था।

इसके अलावा CAA/NRC के खिलाफ़ भी ममता ने केंद्र के ख़िलाफ़ अपना जहर उगला था। हाल में जब बंगाल में तूफान आया तब भी केंद्र को नेगेटिव दिखाने के लिए उन्होंने मीडिया में झूठ कह दिया था। कोरोना महामारी के बीच भी उनका रवैया केंद्र सरकार की ओर आक्रमक था। 

कुल मिलाकर हर स्थिति में ममता बनर्जी की राजनीति फिलहाल इसी जमीन पर टिकी है कि वह राज्य के हित में काम करने की बजाय केंद्र सरकार का विरोध करें और प्रदेश में बढ़ रही राजनीतिक हिंसा को नदरअंदाज करती रहें।

आज उनके इसी बर्ताव पर प्रदेश राज्यपाल ने साफ तौर पर कह दिया है कि ममता बनर्जी को संविधान का पालन करना होगा। वह अपने रास्ते से नहीं भटक सकती हैं। राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति लंबे समय से लगातार बिगड़ रही है। राज्यपाल ने कहा,

“भारत के संविधान की रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है। यदि मुख्यमंत्री अपने रास्ते से भटकेंगी तो मेरा रोल शुरू हो जाएगा। ”

बर्थडे पर बोले युवराज सिंह- पिता की सोच से सहमत नहीं हूँ, किसान राष्ट्र की जीवनरेखा; बातचीत से निकले हल

शनिवार (दिसंबर 12, 2020) को पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह का 39वाँ जन्मदिन है। भारत के ऑलराउंडर खिलाड़ी रहे युवराज सिंह ने ऐलान किया है कि वो इस बार अपना जन्मदिन नहीं मनाएँगे। साथ ही अपने पिता योगराज सिंह द्वारा ‘किसान आंदोलन’ में की गई भड़काऊ टिप्पणियों से भी खुद को अलग कर लिया है। युवराज ने जून 2019 में क्रिकेट के सारे फार्मेट से रिटायरमेंट की घोषणा कर दी थी।

युवराज सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस साल वो अपना जन्मदिन मनाने की बजाए सरकार और किसान संगठनों के बीच जो वार्ता चल रही है, उसमें जल्द समाधान निकलने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। उन्होंने किसानों को राष्ट्र की जीवन रेखा बताते हुए कहा कि ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसे शांतिपूर्ण बातचीत से हल नहीं किया जा सकता है। उन्होंने खुद को महान देश का बेटा बताते हुए कहा कि इससे ज्यादा गर्व की बात उनके लिए कुछ भी नहीं।

युवराज सिंह ने लिखा, “मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरे पिता योगराज सिंह द्वारा की गई टिप्पणी एक व्यक्तिगत क्षमता में की गई है। मेरी विचारधारा किसी भी तरीके से उनकी सोच से सहमत नहीं है।” युवराज ने लोगों को याद दिलाया कि महामारी अभी ख़त्म नहीं हुई है और वायरस को हराने के लिए हमें पूरी तरह से सतर्क और सावधान रहना पड़ेगा।

उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान, जय हिंद’ से अपनी बात ख़त्म की। युवराज सिंह ने लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी – तीनों ही भाषाओं में अपना बयान जारी किया। ट्विटर पर उन्होंने अपनी इस ट्वीट में सार्वजनिक रिप्लाई को ऑफ कर दिया है। इस पर केवल वही लोग रिप्लाई कर सकते हैं, जिन्हें उन्होंने मेंशन किया हो।

हाल ही में हिंदू महिलाओं पर आपत्तिजनक बयान देने के युवराज के पिता योगराज सिंह को फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने अपनी फिल्म ‘द कश्मीरी फाइल्स’ से ड्रॉप कर दिया। फिल्म में योगराज सिंह की जगह अब पुनीत इस्सर किरदार निभाएँगे। विवेक अग्निहोत्री ने अपने बयान में कहा, “मुझे उनकी हिस्ट्री पता थी। लेकिन मैंने उसे इग्नोर किया, क्योंकि मैं कला और कलाकार को मिक्स नहीं करता। मैंने हमेशा कला और राजनीति को अलग रखा। जब उन्होंने भाषण दिया तो वो हैरान करने वाला था।” योगराज सिंह ने किसान आंदोलन को संबोधित करते हुए हिंदू महिलाओं के लिए आपत्तिजनक बातें कही थी। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ओछी टिप्पणी की थी।

‘1064 पर करें करप्शन का कंप्लेन’: 1 घंटे बाद 80 हजार रुपए घूस लेते खुद पकड़े गए राजस्थान के डीसीपी

राजस्थान में सवाई माधोपुर में एक बेहद ही हैरान करने वाला मामला सामने आया है। भ्रष्‍टाचार न करने की सीख देने वाले एंटी करप्‍शन ब्‍यूरो (ACB) के डीएसपी खुद ही रिश्वत लेते धरे गए। दरअसल, अंतर्राष्‍ट्रीय भ्रष्‍टाचार दिवस के मौके पर डीसीपी पद पर तैनात भैरूलाल मीणा ने भाषण देते हुए भ्रष्‍टाचार करने वालों की शिकायत टोल फ्री नंबर 1064 पर देने की सलाह दी। इसके एक घंटे बाद ही एसीबी के इस डीएसपी को 80 हजार रुपए की घूस लेते गिरफ्तार कर लिया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार दिवस के मौके पर आयोजित एक समारोह में डीसीपी मीणा बतौर मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल थे। जहाँ उन्होंने भाषण देते हुए कहा, “हमें पूरी ईमानदारी के साथ भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना है। केंद्र और राज्य सरकार का कोई भी कर्मचारी घूस माँगे तो टोल फ्री 1064 या हेल्पलाइन नंबर 9413502834 पर किसी भी समय पर कॉल या व्हाट्सएप कर सकते हैं।” जिसके एक घंटे बाद वह खुद ही भ्रष्टाचारी निकल गए।

बीते 9 दिसंबर को राजस्थान राज्य एंटी करप्शन महकमे ने अपने जिला भ्रष्टाचार निरोधक शाखा प्रभारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ दबोचा। टीम ने रिश्वत देने वाले को भी नहीं बख्शा। आरोपित के साथ गिरफ्तार जिला परिवहन अधिकारी (रिश्वत देने वाले, डीटीओ) का नाम महेश चंद मीणा है। महेश चंद मीणा रिश्वत देने पहुँचा था। जिस दौरान वह और डीसीपी दोनों ही एसीबी अधिकारियों द्वारा बिछाए गए जाल में फँस गए।

वहीं मामले की जानकारी देते हुए ब्यूरो के महानिदेशक बीएल सोनी ने बताया कि सवाई माधोपुर के डीएसपी भैरूलाल द्वारा मंथली रिश्वत राशि लेने की कई शिकायतें मिली थी। ब्यूरो ने उसका सत्यापन करवाया तो सूचना सही निकली। इस पर बुधवार को ब्यूरो की जयपुर टीम ने जाल बिछाकर कार्रवाई को अंजाम दिया।

अधिकारी ने आगे बताया कि योजना के मुताबिक भैरूलाल अपने कार्यालय में जिला परिवहन अधिकारी महेशचंद से जब 80 हजार रुपए ले रहे थे, तो उसी समय ब्यूरो की टीम ने दोनों अधिकारियों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया, क्योंकि कानून के मुताबिक रिश्वत देना और लेना दोनों ही अपराध है।

बताया जा रहा है कि एसीबी डीएसपी पिछले काफी समय से विभिन्न विभागों के अधिकारियों से रिश्वत ले रहे थे। वहीं टीम ने डीएसपी मीणा के घर पर भी छापा मारा। जिस दौरान उन्हें जमीनों के कागजात और 1.61 लाख रुपए नगद मिले हैं। अब एसीबी की टीम उनके अन्य ठिकानों की तलाश कर रही है।

4 आरोपितों को मिली बेल तो HC ने मोहम्मद इकबाल को भी दी जमानत: दिल्ली दंगों में दर्ज हुआ था हत्या का मामला

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में हत्या व दंगे करने के आरोपित मोहम्मद इकबाल को दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (दिसंबर 9, 2020) को बेल दे दी। बता दें, इसी साल फरवरी में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में हिंदू विरोधी दंगे हुए थे। दंगों के दौरान हिंसक भीड़ ने हिंदुओं के घरों और उनके व्यवसायों पर हमला किया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, न्यायमूर्ति सुरेश कुमार की एकल पीठ ने इकबाल को ₹15,000 के पर्सनल बांड पर जमानत दी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले में शामिल अन्य चार आरोपितों को पहले रिहा कर दिया गया था।

कोर्ट ने फैसला दिया, “इस बात में मतभेद नहीं है कि इस अदालत द्वारा पारित आदेश के बाद 4 आरोपित पहले से ही जमानत पर हैं। हालाँकि ये भी पाया गया कि एएसजी ये बताने में विफल रहे कि वर्तमान याचिकाकर्ता अन्य 4 सह-अभियुक्तों के साथ समान रूप से नहीं जुड़ा है। इसलिए सभी तथ्यों को देखते हुए और समता के दृष्टि से याचिकाकर्ता बेल का अधिकारी है।”

गौरतलब है कि मोहम्मद इकबाल को दिल्ली पुलिस ने हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के सिलसिले में हिरासत में लिया था। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149 , 302 और 395 के तहत मामला दर्ज किया गया था। वहीं मामले को लेकर इकबाल का प्रतिनिधित्व वकील संजय हेगड़े, अनस तन्वी, ईशान पांडे, चंदन गोस्वामी और मुदित माखीजान ने किया था।

जानकारी के लिए बता दें, इकबाल को पहले भी स्थानीय अदालत ने जून में 20,000 रुपए की जमानत बांड पर जमानत दिया था। हालाँकि, एक अन्य हत्या के मामले में शामिल होने के कारण उसे रिहा नहीं किया गया था। उसके परिवार ने आरोप लगाया कि वह निर्दोष था और अपने तीन दोस्तों के साथ मीट खरीदने के लिए बाजार गया था, जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।

साथ ही परिवार वालों ने यह दावा किया कि उन्हें अगले दिन तक उसकी नजरबंदी के बारे में सूचित नहीं किया गया था। मोहम्मद इकबाल के परिवार के सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि मंडोली जेल अधिकारियों ने स्थानीय दिल्ली की अदालत के जमानत आदेश के बाद भी दूसरे मामले में एफआईआर की एक कॉपी नहीं दी थी।

किसान आंदोलन के समर्थन और विरोध के बीच मूल मुद्दे गौण

किसान बिल के खिलाफ जो प्रदर्शन है, वह सिर्फ बड़े किसानों का प्रदर्शन है। उनका प्रदर्शन जायज भी है। नाजायज है, लोगों का एक्सट्रीम हो जाना और समर्थन व विरोध को एक सिरे से खारिज करना। किसानों का समर्थन और विरोध व्यक्तिगत इच्छा है। किसान अन्नदाता हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं उस अन्नदाता कि उस बात पर ताली मारूँ जो ये कहता है कि इंदिरा ठोक दी, मोदी क्या चीज है। ख़ैर, छोड़िए!

सरकार जो कुल मिलाकर 80-85 फीसद धान-गेहूँ पंजाब हरियाणा से खरीदती है, MSP की दर से वो सरकार को भारी कर्ज की तरफ धकेल चुकी है। सरकार की ओर से FCI किसानों से MSP पर खरीदता है और फिर देश के अन्य राज्यों को MSP से नीचे के दामों पर बेचता है। बीच का गैप सरकार फूड सब्सिडी के रूप में FCI को देती है।

पिछले 6 साल में इस सरकार ने फूड सब्सिडी को दोगुना किया है। 2018-19 में करीबन ₹1.7 लाख करोड़ (GDP का 0.9%) का बिल सिर्फ फूड सब्सिडी के नाम पर फटा है। FCI का कर्ज मार्च 2019 में ₹2.65 लाख करोड़ तक पहुँच गया था। 5 साल पहले कर्ज बस ₹91,409 करोड़ था।

दरअसल, ये किसान विरोधी सरकार हर साल MSP बढ़ाती रही और FCI भी इन बड़े किसानों से धान-गेहूँ खरीदती रही और कम दाम पर राज्यों को सप्लाई करती रही। FCI के पास अभी भी अनाज का जो स्टॉक है वो तय सीमा से ज्यादा है, जबकि इन 7 महीनो में इस फासीवादी सरकार ने मुफ़्त का अनाज बहुत बाँटा है।

सितंबर 2020 तक FCI के पास 700.27 लाख टन चावल और गेहूँ था। खाद्यान्न के लिए स्टॉकिंग मानदंडों के अनुसार, FCI को जुलाई तक 411.2 लाख टन और अक्टूबर के अनुसार 307.70 लाख टन का भंडार होना चाहिए था।

चूँकि बड़े किसानों को MSP के कारण धान और गेंहू का अच्छा पैसा मिलता है और उनकी लागत भी कम आती है तो बहुत से किसान सिर्फ गेहूँ और धान उपजाने लगे। इससे दाल और अन्य अनाजों की खेती पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। प्रतिव्यक्ति दाल का उत्पादन 25 किलो से 13.6 किलो हो चुका है, करीबन आधा।

अब आप सोच रहे होंगे कि जब इतना धान-गेहूँ उपजाया जा रहा है तो सरकार इसको एक्सपोर्ट क्यों नही कर रही है? करती, लेकिन MSP के कारण अनाजों का दाम इतना बढ़ जाता है कि इंटरनेशनल मार्केट के प्रतिस्पर्धात्मक (competitive) प्राइज से बहुत ज़्यादा दिखने लगता है और यहाँ पर अफ़्रीकन देश सस्ते अनाज एक्सपोर्ट करके लहरिया लूट लेते हैं।

MSP के हट जाने से एक तो अनाजों की क़ीमत नीचे भी आएगी और इसको एक्सपोर्ट करने में ज़्यादा आसानी होगी (ये मेरा व्यक्तिगत आँकलन है), बड़े किसानों को इसका भी डर है कि अनाज के दाम गिरे तो उनकी आय भी कम होगी।

इस देश में जितना अनाज चाहिए उससे ज़्यादा उपजाया जाता है और FCI को ना चाहते हुए भी उन अनाजों को ख़रीदना पड़ता है। जिस मंडी से सरकार खरीदती है, राज्य सरकार को उस मंडी से अच्छी-खासी टैक्स की कमाई भी होती है। अकेले पंजाब सरकार को ₹9000 करोड़ की कमाई होती है इन मंडियो के कारण।

नए किसान बिल में सरकार ने ये प्रस्ताव दिया है कि किसान अब मंडी में ना जाकर डायरेक्ट किसी को भी बेच सकते हैं ताकि उनको एक्स्ट्रा टैक्स ना देना पड़े और बिचौलियों की कमीशनबाज़ी ख़त्म की जा सके। पंजाब सरकार को इससे 9000 करोड़ रुपए का सीधा नुक़सान हो रहा है इसलिए वो ब्रेक डांस कर रही है।

बड़े किसानों को ये डर है कि आने वाले समय में सरकार रिफॉर्म के नाम पर MSP भी ख़त्म कर देगी और फिर खाद और बिजली की सब्सिडी पर भी बात आ सकती है। बड़े किसानों की आय पर टैक्स लगाने की बात तो चल रही है, इसलिए संशोधन के बजाय बड़े किसान इस बिल को रद्द करने पर अड़े हुए हैं।

दूसरा, कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग में जो बातें लिखी हुई है वो भी एक तरह से कॉर्पोरेट को ध्यान में रख कर बनाई गई है। इसके अंतर्गत अगर किसान की फसल की गुणवत्ता में कमी होगी तो कंपनियाँ पेमेंट देने से मना कर सकती है।

बिल में ये साफ़ लिखा हुआ है कि प्राइवेट कंपनी कभी भी किसान के ज़मीन पर मालिकाना हक़ नही माँग सकती है, लेकिन उसमें भी एक ट्विस्ट है। ट्विस्ट ये है कि अगर किसान के ऊपर कम्पनी का कुछ बकाया है तो वो बकाया वसूली करने के लिए लैंड रेवेन्यू एक्ट का रुख़ कर सकती है।

जो लोग ये कह रहे हैं कि इस बिल से किसान हेलिकॉप्टर पर चढ़ने लगेंगे, वो ग़लत कह रहे हैं। बिल में ख़ामियाँ है लेकिन मैं ये भी नहीं मानता कि ये बिल किसान विरोधी है। रिफॉर्म के लिए ऐसे बिल लाने होंगे, सरकार कब तक इन सब चीज़ों में उलझी रहेगी?

इस सरकार के पास बहुमत है, इसलिए उसके लिए रिफार्म तुलनात्मक रूप से आसान है। आने वाले समय में बैंकिंग का पूर्ण निजीकरण और PSU में डिसइन्वेस्टमेंट सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। बिना निजीकरण के सरकार विकसित देश का सपना पूरा नहीं कर सकती। लोग विरोध करेंगे ही, बदलाव का वो बेसिक रीएक्शन है। जब कंप्यूटर आया तो ऐसा ही हुआ था। जब कंप्यूटर जाएगा तब भी ऐसा ही होगा। अब वर्चुअल दखलअंदाजी की बात चल रही है। मॉनिटर अप्रासंगिक होने वाला है, लेफ़्ट की विचारधारा की तरह।

आख़िर में इस क़ानून की सबसे ख़राब बात ये है कि अगर कोई लिटिगेशन होता है तो किसानों के पास ज़्यादा कुछ करने को नहीं है। इसका कारण है- कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020 (The Farmers’ Produce Trade and Commerce Act, 2020) का सेक्शन 13, जो सबको इम्यूनिटी देता दिखाई दे रहा है और कहता है कि धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहाँ मुकदमा करना होगा। एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहाँ होगी और जीतने पर ही किसान को भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा।


“No suit, prosecution or other legal proceedings shall lie against the Central Government or the State Government, or any officer of the Central Government or the State Government or any other person in respect of anything which is in good faith done or intended to be done under this Act or of any rules or orders made thereunder.”


इसी ऐक्ट का सेक्शन 15 कहता है कि किसी भी तरह का विवाद होने पर किसान को अदालत जाने की अनुमति नहीं होगी।

“No civil court shall have jurisdiction to entertain any suit or proceedings in respect of any matter, the cognizance of which can be taken and disposed of by any authority empowered by or under this Act or the rules made thereunder.”


ये बहुत अजीब है। इस आंदोलन को लेकर तथ्यों पर बहस होनी चाहिए। एक्सट्रीम ओपिनियन से बच के रहा जाए तो बेहतर है।

युवराज सिंह के पिता योगराज को फिल्म ‘द कश्मीरी फाइल्स’ से निकाला, हिंदू महिलाओं के लिए कहा था- टके-टके में बिकती थी

हिंदू महिलाओं पर आपत्तिजनक बयान देने के कारण पूर्व क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह को फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने अपनी फिल्म ‘द कश्मीरी फाइल्स’ से ड्रॉप कर दिया है। फिल्म में योगराज सिंह की जगह अब पुनीत इस्सर किरदार निभाएँगे।

विवेक अग्निहोत्री ने अपने बयान में कहा है, “मैंने अपनी फिल्म ‘द कश्मीरी फाइल्स’ में योगराज सिंह को एक बहुत महत्तवपूर्ण रोल के लिए कास्ट किया था और उनसे लंबी बात भी की थी। मुझे उनकी हिस्ट्री पता थी। लेकिन मैंने उसे इग्नोर किया, क्योंकि मैं कला और कलाकार को मिक्स नहीं करता। मैंने हमेशा कला और राजनीति को अलग रखा। जब उन्होंने भाषण दिया तो वो हैरान करने वाला था।”

फिल्म निर्देशक विवेक कहते हैं, “मैं किसी ऐसे को बर्दाश्त नहीं कर सकता जो महिलाओं के ख़िलाफ़ बुरी तरह बोले। ये बात सिर्फ़ हिंदू महिलाओं या मुस्लिम महिलाओं के लिए नहीं है, उन्होंने महिलाओं के लिए इतना बुरा कहा। उससे भी बड़ी बात उन्होंने नफरत से भरा विभाजनकारी नैरेटिव बनाने की कोशिश की।”

अग्निहोत्री ने कहा, “मैंने आधिकारिक तौर से उन्हें टर्मिनेशन लेटर भेज दिया है। मुझे जवाब की परवाह नहीं है। मैं कोई कमर्शियल फिल्ममेकर नहीं हूँ। मैं उद्देश्य के साथ फिल्म बनाता हूँ। मैंने सच्चाई उजागर करने के लिए फिल्म बनाई है और मैं नहीं चाहता ये आदमी उस सच का हिस्सा बने। उन्होंने जो भी कहा, वह नफरत भरा था और ऐसे लोग सिर्फ़ हिंसा भड़काना जानते हैं।”

योगराज सिंह के हिंदू घृणा से भरे बयान

योगराज सिंह ने पिछले दिनों किसान आंदोलन में अपना समर्थन देते हुए पंजाबी में एक भाषण दिया था। उन्होंने कहा था,

“मैं इन्हें आप लोगों से ज्यादा जानता हूँ। ये माँ-बेटियों की कसमें खा कर भी पलट जाते हैं। मैं आपको बधाई देता हूँ कि जब अमित शाह ने कहा कि निरंकारी ग्राउंड आ जाओ तो आपलोग नहीं गए। इनकी किसी बात का विश्वास नहीं करना। एक बात और कहना चाहता हूँ जब इनकी औरतों को अहमद शाह दुर्रानी ले जाता और वहाँ टके-टके की बिकती थी, तो पंजाबियों ने बचाया।”

इसके बाद योगराज सिंह ने नेताओं को लेकर बयान देते हुए कहा,

“मैंने अपने नेताओं को दिल्ली दरबार में बिकते हुए देखा है। बोली लगती है। 5 करोड़ से लेकर 10-20 करोड़ तक। ये वो कौम है, जिन्होंने हजारों साल गुलामी की है, वो गुलाम जब सत्ता में आते हैं तो ऐसा ही करते हैं। मैं हाथ जोड़ कर कहता हूँ कि अपने में लीडर ढूँढो, बहुत मिलेंगे। पंजाब बचाना है तो अपने हाथ में सत्ता रखो। हम एक जरनैल नहीं पैदा कर सकते? ये जो खड़े हैं, सब जरनैल हैं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर सवाल उठाते हुए योगराज ने गुजरातियों पर हमला बोला था। उन्होंने कहा था,

“मैंने मुंबई में 15 साल इन गुजरातियों के साथ बिताए हैं। ये लोग अपनी माँ बहन और बेटियों की कसमें खाकर भी पलट जाते हैं।”

इसके अलावा योगराज सिंह ने इंदिरा गाँधी का हवाला देकर पीएम मोदी को दी गई धमकियों पर अपना स्पष्टीकरण दिया था और साथ ही कहा था कि सरकार के अत्याचार बाबर, औरंगजेब और ब्रिटिश जैसे आक्रांताओं से भी बहुत ज्यादा हैं।

कल नड्डा के काफिले पर पथराव, आज ABVP के जुलूस पर हमला: बीजेपी नेता ने TMC से कहा- सूद समेत लौटाएँगे

पश्चिम बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले के बाद बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष ने तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) को कड़ी चेतावनी दी है। फेसबुक पर गुरुवार (10 दिसंबर, 2020) को एक पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा, “मैं बोल रहा हूँ मारिए (हमारी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं), उतना ही मारिए जितना बाद में आप हजम कर सकें। मैं लाल डायरी में सब कुछ लिखकर रख रहा हूँ, हम सूद समेत वापस देंगे।”

दिलीप घोष का फेसबुक पोस्ट

दिलीप घोष के अलावा बीजेपी नेता सायंतन बसु ने भी व्यवहार में परिवर्तन नहीं करने पर तृणमूल कॉन्ग्रेस को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। टीएमसी पर निशाना साधते हुए उन्होंने फिल्म शोले के डायलॉग का सहारा लिया और कहा कि “अगर एक मारोगे, तो हम चार मारेंगे।” उन्होंने कहा, “अगर बीजेपी चाहे, तो यह सुनिश्चित कर सकती है कि टीएमसी के नेता पश्चिम बंगाल के बाहर कदम नहीं रख सकते। कोई भी एक इंच नहीं हिल सकता। वे चूहों की तरह एक जगह छिपने के लिए मजबूर हो जाएँगे।”

ABVP के जुलूस के दौरान तृणमूल छात्र परिषद ने किया झड़प

आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में सियासी टकराव हिंसक होते जा रहे हैं। ज्यादातर मामलों में हमले का आरोप सत्ताधारी टीएमसी के गुंडों पर लगा है। जहाँ कल बीजेपी के नेताओं पर हमला हुआ, वहीं आज गोबरडांगा हिंदू कॉलेज में आरएसएस की छात्र इकाई एबीवीपी के जुलूस पर तृणमूल छात्र परिषद (टीएमसीपी) के सदस्यों ने कथित तौर पर हमला किया।

गौरतलब है कि बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर में गुरुवार दोपहर को भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला किया गया था। काफिले में शामिल सभी पार्टी नेताओं की गाड़ियों पर जमकर पथराव हुआ। इस हमले में बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय की गाड़ी पर ईंट फेंकी गई थी। उन्होंने वीडियो साझा करते हुए पूरी घटना की सूचना दी थी।

कैलाश विजयविर्गीय ने लिखा था, “बंगाल पुलिस को पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के कार्यक्रम की जानकारी दी गई थी। लेकिन एक बार फिर बंगाल पुलिस नाकाम रही। सिराकोल बस स्टैंड के पास पुलिस के सामने ही TMC के गुंडों ने हमारे कार्यकर्ताओं को मारा और मेरी गाड़ी पर पथराव किया।”

शेयर वीडियो में आप देख सकते हैं कि काफिले गुजरते वक्त उसके आसपास तमाम लोग टीएमसी का झंडा लेकर खड़े थे और भाजपा के ख़िलाफ़ नारेबाजी कर रहे थे। पुलिस भी वहाँ मौजूद थी। लेकिन उसके बाद भी भीड़नड्डा के काफिले पर पत्थर फेंकने लगी। थोड़ी देर में कैलाश विजयवर्गीय की गाड़ी के शीशे चकनाचूर हो गए और ईंट-पत्थर गाड़ी के अंदर आ गए। उनके ड्राइवर ने किसी तरह भीड़ के बीच से गाड़ी निकाली।

‘हम आ रहे हैं’: रिपब्लिक ने बंगाली में टीवी चैनल लाने का किया ऐलान, बहाली भी शुरू

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले रिपब्लिक टीवी ने बड़ी घोषणा करते हुए बताया है कि अब वह अपना एक चैनल बांग्ला भाषा में भी लेकर आ रहे हैं। हिंदी और अंग्रेजी भाषा में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने के बाद रिपब्लिक टीवी ने बांग्ला चैनल को लेकर घोषणा शुक्रवार (दिसंबर 11, 2020) को की।

एक ट्वीट में न्यूज चैनल ने “हम आ रहे हैं!”  लिखते हुए बताया कि वह नए चैनल के लिए स्टाफ हायर कर रहे हैं। चैनल ने लिखा, “रिपब्लिक टीवी सक्षम समाचार संपादकों की तलाश में है। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क युवा और स्मार्ट पत्रकारों की भी तलाश कर रहा है, जो बांग्ला भाषा जानते हों और उन्हें पश्चिम बंगाल राज्य के किसी भी बंगाली समाचार चैनल में काम करने का अनुभव हो।”

बता दें कि वर्तमान में रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क दो न्यूज चैनल चलाता है। एक अंग्रेजी में- रिपब्लिक टीवी और दूसरा हिंदी में- रिपब्लिक भारत। मीडिया समूह के दोनों चैनलों ने व्यूअरशिप के मामले में पिछले दिनों कई चैनलों को पछाड़ा है। अब बंगाली न्यूज चैनल इस संस्थान का पहला स्थानीय भाषी चैनल होगा।

दिलचस्प बात यह है कि अर्णब गोस्वामी ने अपने करियर की शुरुआत कोलकाता से ही की थी। वह बंगाल में ‘द टेलीग्राफ’ के लिए काम किया करते थे। वे बंगाली बोलना भली-भाँति जानते हैं, इसलिए हो सकता है बांग्ला चैनल पर भी वह एंकरिंग करते दिखें। उन्होंने जब रिपब्लिक भारत पर आना शुरू किया था तो वो भी अंग्रेजी की तरह बहुत पॉपुलर हुआ था।

याद दिला दें कि इससे पहले रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी ने इस बात की ओर इशारा किया था कि वह रिपब्लिक चैनल को हर भाषा में खोलने का प्लान कर रहे हैं और यह भी घोषणा की थी कि वह जल्द ही एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया परियोजना शुरू करेंगे।

तलोजा जेल से रिहा होने के बाद रिपब्लिक टीवी पर बोलते हुए, अर्नब गोस्वामी ने कहा था, “अगले 11 से 12 महीनों में, हम भारत के हर राज्य में रिपब्लिक नेटवर्क लॉन्च करेंगे। रिपब्लिक आने वाले 16 से 17 महीनों में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया परियोजना भी शुरू करेगा।”

इसके अलावा उन्होंने यह ऐलान भी किया था:

“अगर तुम मुझे जेल में डालते हैं, तो मैं वहाँ से एक चैनल लॉन्च करूँगा। तुम कुछ नहीं कर सकते। मैं अकेला नहीं हूँ, देश मेरे साथ है। यदि मैं अगले 16 महीनों में वैश्विक मीडिया नेटवर्क लॉन्च नहीं करता हूँ, तो अपना नाम बदलूँगा।”