Home Blog Page 4236

राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस पर संकट: इधर एमएलए ने साथ छोड़ा, उधर CM ने कहा- दे दूॅंगा इस्तीफा

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जब से कॉन्ग्रेस की सरकार बनी है तब से ही पार्टी के भीतर संघर्ष चल रहा है। अब एक बार फिर दोनों राज्यों की सरकारों को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है।

राजस्थान में पंचायत चुनावों में हार और गुटबाजी से त्रस्त कॉन्ग्रेस को भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) ने भी झटका दिया है। उसने गहलोत सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान किया है। BTP ने आरोप लगाया है कि जिला परिषद प्रमुख और पंचायत चुनावों में भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों मिले हुए थे।

BTP नेता छोटू भाई वसावा ने ट्वीट कर कहा, “भाजपा और कॉन्ग्रेस एक हैं और वे क्षेत्रीय दलों को सत्ता से दूर रखने के लिए एक-दूसरे का विरोध करते हैं। वे क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर उन्हें ख़त्म कर देते हैं।”

वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अपने मुख्यमंत्री पद के कार्यकाल को लेकर बयान दिया है।

मीडियाकर्मियों से बात करते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कहा, “अगर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आदेश करता है तब मैं अपना पद त्याग दूँगा। मुझे इस पद को लेकर किसी भी तरह का लगाव नहीं है, मैं सिर्फ और सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर रहा हूँ। जितने लोग इस मुद्दे को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं उन्हें समझने की ज़रूरत है यह राज्य के हित में बिलकुल नहीं है। इस तरह के राजनीतिक उतार-चढ़ावों से प्रदेश की जनता को नुकसान होता है।” 

यह पहला मौक़ा नहीं है जब कॉन्ग्रेस की राज्य सरकारों पर इस तरह के सियासी संकट की ख़बरें सामने आई हैं। हाल ही में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा पर उनकी सरकार गिराने के प्रयास का आरोप लगाया था। राजस्थान के मुख्यमंत्री का कहना था, “यह लोग (भाजपा) निर्वाचित सरकारों को गिराने का प्रयास करते हैं। राजस्थान में फिर से वही खेल शुरू कर चुके हैं और यही इनकी मानसिकता है। लोग तो यह भी कह रहे हैं कि ये लोग महाराष्ट्र सरकार को निशाना बना रहे हैं।” ऐसे ही 2020 के ही जुलाई महीने में राजस्थान के भीतर कॉन्ग्रेस के दो शीर्ष नेताओं अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच बड़े पैमाने पर टकराव देखा गया था। इस टकराव के चलते राजस्थान की कॉन्ग्रेस पर संकट गहरा गया था। छत्तीसगढ़ में भी बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच मनमुटाव की खबरें आती रहती है।  

गौरतलब है राजस्थान के जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने ऑपइंडिया से बातचीत में दावा किया था कि यह राज्य में कॉन्ग्रेस की आखिरी सरकार है और इसका लंबा भविष्य नहीं है। उन्होंने कहा था, “हमने कभी अधिकृत तौर पर नहीं कहा कि कॉन्ग्रेस की सरकार को गिराएँगे। ये सरकार अपने कर्मों से गिरेगी। अशोक गहलोत अपना घर खुद सँभाल नहीं पाए हैं।”

वामपंथियों-कट्टरपंथियों के कब्जे में किसान आंदोलन, बड़े पैमाने पर हिंसा की प्लानिंग: खुफिया सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में दावा

किसान आंदोलन के पीछे छिपी मंशा को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे हैं। अब खुफिया सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में हैरान करने वाले दावे किए गए हैं। इसके मुताबिक किसान आंदोलन को अतिवादी वामपंथी संगठनों और कट्टरपंथियों ने अपने नियंत्रण में ले लिया है और वे बड़े पैमाने पर हिंसा की योजना बना रहे हैं।

टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि किसान प्रदर्शनों पर अब वामपंथी अतिवादी अपना कब्जा जमा चुके हैं। इस खबर के आने के बाद कंगना रनौत ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि अतिवादी संगठन किसानों को भड़का कर हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की योजना बना रहे हैं।

इस जानकारी के सामने आने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है, “जो खूफिया सूत्र आज कह रहे हैं मैंने भी वही कहा था, लेकिन मेरे लिए लोगों ने ‘दिलजीत ने कंगना को @#ल दिया’ ट्रेंड कर दिया, जिसका मतलब होता है दिलजीत ने कंगना का रेप किया। ये ट्रेंड सभी लिबरलों ने एक अकेली महिला के लिए चलाया जिसका भावनात्मक और मानसिक रूप से बलात्कार किया गया और ऐसे चेयरलीडर्स भी थे जो तालियाँ बजा रहे थे… मैंने सबको देखा था।”

पिछले दिनों ट्विटर पर अपने बयानों के कारण कंगना को जिस तरह ट्रोल किया गया उसे याद दिलाते हुए उन्होंने कहा, “उन्होंने कहा था कि मुझे माफी माँगनी चाहिए। अब जिसने ये कहा उन सबको मुझसे माफी माँगनी चाहिए, सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हारे पास दूरदर्शिता, स्पष्टता और सबसे जरूरी ईमानदारी नहीं है कि तुम हकीकत देख सको। तुम मुझे ऐसे नामों से नहीं बुला सकते। मेरे लिए अपमानजनक ट्रेंड नहीं चला सकते और न ही मुझ पर भाजपा का ठप्पा लगा सकते। माफी माँगो।”

यहाँ बता दें कि एक तरफ जहाँ मीडिया खबरों में खूफिया सूत्रों के हवाले से किसान आंदोलन पर वामपंथियों के कब्जे की बात सामने आ गई है। वहीं सोशल मीडिया के जरिए किसानों के प्रदर्शन को खालिस्तानियों के समर्थन की बात भी सामने आई है।

दरअसल, Khalsa Aid India  नाम के फेसबुक पेज ने जानकारी दी है कि वह सिंघु बॉर्डर पर स्टॉल खोल चुके हैं और किसानों को सहायता उपलब्ध करवाएँगे। इसके लिए उनको 1000 कंबल और 500 गद्दे भी भी डोनेट किए गए हैं।

अब यह Khalsa Aid India क्या है? दरअसल, इस संगठन पर संदेह है कि यह ब्बर खालसा इंटरनेशनल का ही संगठन है, जिसके ख़िलाफ़ साल 2012 में एनआईए ने केस दर्ज किया था। आरोप था कि पंजाब का बीकेआई, यूके के बीकेआई संचालको (बलबीर सिंह बैंस और जोगा सिंह) और उनके संगठनों,  जैसे- सिख वेलफेयर फॉर प्रिजनर वेलफेयर, अखंड कीर्ति जत्था ( AKJ) और खालसा एड, से पैसे ले रहा है ताकि भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे सकें। 

इन पर पाकिस्तान के बीकेआई नेताओं (वाधवा सिंग और जगतार सिंह तारा) का समर्थन पाने का भी आरोप था। इतना ही नहीं, जाँच में पता चला था कि संगठन ने पैसे लेने के बाद स्लीपर सेल्स और जेल में बंद आतंकियों व उनके परिवारों में बाँटा था।

साल 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे मामले में जाँच अधूरी रह गई थी, क्योंकि यूके ने संबंधित आरोपितों से जुड़े सबूत भारत के साथ साझा करने से मना कर दिए थे। बता दें कि बब्बर खालसा की मंशा भारत में हिंसा के जरिए एक स्वतंत्र सिख राज्य बनाने की है। यह संगठन कई आतंकी हमलों के लिए जिम्मेदार भी है। ट्रंप शासन में बीकेआई को अमेरिकी हितों के लिए खतरा घोषित किया था। 

खाना छूने पर ‘ऊँची जाति’ के युवकों ने की ‘दलित’ की हत्या: देवराज की मौत पर मीडिया गिरोह का झूठ

तीन दोस्त। एक ‘निजी पार्टी’ में शराब के नशे में मारपीट करते हैं। तीसरे की मौत हो जाती है। इस खबर में ‘सत्तर साल से चली आ रही छुआछूत’ की मानसिकता की जगह कहाँ बचती है? लेकिन भारतीय मीडिया, खासकर वामपंथी प्रोपेगेंडा संस्थानों को यह करने में महारत हासिल है और इसे ‘दलित बनाम ऊँची जाति’ का जामा पहनाकर जमकर बेचती है। यही मध्य प्रदेश के मामले में फिर से देखा गया है जब मीडिया गिरोह ने देवराज अनुरागी की हत्या का कारण मृतक की जाति ठहरा दी।

क्या है मामला

स्क्रॉल, एनडीटीवी, वायर आदि वामपंथी प्रोपेगेंडा समाचार वेबसाइट के साथ ही लगभग सभी समाचार पत्रों द्वारा प्रकाशित एक खबर में दावा किया जा रहा है कि मध्य प्रदेश स्थित छतरपुर जिले के गौरिहार थाना क्षेत्र के अंतर्गत किशनपुरा गाँव में गत 7 दिसंबर को में एक मानसिक रूप से अस्थिर ‘दलित युवक’ को उसके ‘ऊँची जाति वाले’ दो दोस्तों ने कथित तौर पर उनके भोजन को छूने के लिए पीट-पीटकर मार डाला।

25 वर्षीय दलित युवक देवराज अनुरागी अपने घर में भोजन कर रहे थे, जब उनके दोस्त संतोष पाल और रोहित सोनी, दोनों ओबीसी श्रेणी के थे, उन्हें उनके खेत में आपस में ‘पार्टी’ करने के लिए ले गए। कुछ घंटों बाद देवराज को घायल अवस्था में दोनों ने घर छोड़ दिया और कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।

इस मामले में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत हत्या सहित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

क्या ये एक ऊँची जाति वालों द्वारा एक ‘दलित की हत्या’ का मामला है?

समाचार पत्र ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, छतरपुर के पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा ने कहा, “तीनों एक-दूसरे के मित्र थे और जिस समय ये घटना घटी वे नशे में थे। इस दौरान खाने को लेकर झगड़ा हुआ और दोनों ने देवराग अनुरागी पर हमला किया।”

ख़ास बात यह है कि ‘दी वायर’ ने ही अपनी रिपोर्ट में भी पुलिस के इस बयान का जिक्र किया है। लेकिन ‘दी वायर’ का ही शीर्षक इसे ऊँची जाति वालों द्वारा एक कथित दलित की हत्या का मामला बताते हुए देखा जा सकता है।

मुख्यधारा की मीडिया की कारस्तानी से परिचित एक उभरते हुए समाचार पोर्टल ने इस घटना की तहकीकात का फैसला किया। इस वेबसाइट के रिपोर्टर ने अपनी रिपोर्ट में मृतक के परिवार से बातचीत का ऑडियो भी शेयर किया है। मृतक अनुरागी के भाई हरिश्चंद्र ने बताया कि उनका भाई, यानी मृतक अनुरागी दिन भर घर में ही रहता था।

हरिश्चंद्र के मुताबिक उनका पच्चीस वर्षीय भाई देवराज अनुरागी मानसिक रूप से अस्थिर था। घटना 7 दिसंबर की है। देवराज घर में खाना खा रहा था। तभी गाँव के ही संतोष पाल व दोस्त भूरा सोनी, पुत्र छोटेलाल सोनी उसके घर पहुँचे और देवराज को मारते-मारते उसे थोड़ी दूर स्थित एक नाले के पास ले गए।

इस ऑडियो में मृतक के भाई हरिश्चंद्र ने बताया है कि मृतक की दोनों ने पिटाई की, जिसके बाद उन्होंने इसकी सूचना हरिश्चंद्र को फ़ोन करके दी। फ़ोन पर सूचना देने के बाद दोनों उसे वापस उसके घर गए जहाँ दो घंटे बाद ही मृतक देवराज ने दम तोड़ दिया।

देवराज अनुरागी के परिजनों ने इसकी शिकायत गौरिहार पुलिस से की और FIR दर्ज कराई। जिसमें उन्होंने कहीं भी शादी का खाना छूने या खाने के कारण मारने की बाते नहीं कही है। ऑडियो में मृतक के घरवाले यह कहते सुने जा सकते हैं कि उन्हें मारपीट का कारण नहीं मालूम।

यही नहीं, जिस शादी में मृतक देवराज को खाना छूने के कारण मारने की बात कही गई है, देवराज के ही घरवालों ने यह कहा है कि वो उस शादी में भी नहीं गया था, और जैसा कि मुख्यधारा की मीडिया द्वारा दावा किया गया है, देवराज सफाई करने भी किसी के घर नहीं गया था।

मध्य प्रदेश पुलिस ने इस हत्या के आरोप में बृहस्पतिवार (दिसंबर 10, 2020) को दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपितों में 25 वर्षीय संतोष पाल और 30 वर्षीय लवकुश सोनी उर्फ ​​भूरा शामिल है, जो भोपाल से 344 किलोमीटर दूर छतरपुर जिले के किसुनपुर गाँव के ही निवासी हैं।

‘ऊँची जाति द्वारा दलित की हत्या’ करवाने का शौक़ीन रहा है मीडिया

यह पहली बार नहीं है जब मुख्यधारा की मीडिया ने किसी सामाजिक अपराध की खबर को जातिगत भेदभाव की शक्ल देने की कोशिश की हो। वर्ष 2019 में ही उत्तराखंड के एक टिहरी जिले के एक गाँव में हुई हत्या को मीडिया ने प्रमुखता से ये कहते हुए प्रकाशित किया कि सवर्णों ने एक दलित को सोफे पर बैठने के कारण मार डाला। जबकि उत्तराखंड के टिहरी जिले के जिस इलाके में जितेन्द्र की मौत हुई थी, वह एक जनजातीय क्षेत्र है, जहाँ पर जातिगत भेदभाव कभी रहे ही नहीं।

‘बीबीसी’ ने भी इसे दलित जितेंद्र की हत्या साबित करने का प्रयास किया था

मृतक की जाति और सामाजिक अपराध को जातिगत अपराध साबित करने की हड़बड़ी में इसी मीडिया ने पिछले कुछ महीनों उत्तर प्रदेश के हाथरस में भयानक खेल खेला। बाद में यह मामला राजनीतिक दलों और मीडिया गिरोह के षड्यंत्र से अधिक कुछ साबित नहीं हो सका।

अब ठीक इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश की इस घटना, जिसमें तीन दोस्तों की मारपीट में एक की मौत होने को भी दलित बनाम सवर्ण कर के उछाला जा रहा है। मीडिया, खासकर वामपंथी मीडिया अक्सर मीडिया की जिम्मेदारी का प्रलाप करती है, लेकिन जब यही मीडिया दोस्तों की हाथापाई को ‘ऊँची जाति वालों द्वारा दलित की पिटाई’ बता कर बेचती है, तब उसे यह जिम्मेदारी ध्यान नहीं आती।

26/11 के मास्टरमाइंड लखवी को हर महीने मिलेंगे 1.5 लाख रुपए, पाकिस्तान की अपील UNSC को भी कबूल

26/11 आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तयैबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी को पाकिस्तान की इमरान खान सरकार हर महीने 1.5 लाख रुपए खर्चे के तौर पर देगी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 1267 प्रतिबंध कमेटी ने भी इसकी इजाजत दे दी है। बता दें इमरान सरकार ने खुद लखवी को यह मदद पहुँचाने के लिए UNSC से अपील की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार लखवी को भोजन के लिए 50 हजार, दवाओं के लिए 45 हजार, अन्य सुविधाओं के लिए 20 हजार, वकील की फीस के लिए 20 हजार और ट्रैवल अलाउंस के तौर पर 15 हजार रुपए हर महीने देगी। पाकिस्तान ने हमेशा से भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने वाले आतंकियों को खुले तौर पर समर्थन किया है, जिसका यह ताजा नमूना है।

आतंकवादी घोषित होने के बाद लखवी की संपत्ति और बैंक खाते सीज कर दिए गए थे। इसके बाद पाकिस्तान सरकार ने UNSC से लखवी को मानवीय आधार पर खर्च देने की अपील की थी। लखवी के अलावा पूर्व न्यूक्लियर इंजीनियर महमूद सुल्तान बशीरुद्दीन को भी यह रकम दी जाएगी। लखवी और महमूद सुल्तान बशीरुद्दीन संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल हैं।

लखवी 2015 से ही ज़मानत पर है। वहीं आतंकी बशीरुद्दीन अभी पाकिस्तान में स्वतंत्र रूप से रहता है। मीडिया रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई थी कि जेल में बंद रहने के बावजूद आतंकी सरगना को हर प्रकार की छूट दी गई थी। यहीं नहीं वह आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए जेल के अंदर बैठकें भी किया करता था।

गौरतलब है कि पाकिस्तान सरकार ने पिछले साल मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को लेकर भी ऐसी ही अपील की थी। UNSC ने तब भी इमरान सरकार की यह अपील मँजूर कर ली थी।

नोबेल विजेता अर्थशास्त्री की बकलोली: कृषि कानून तो ठीक हैं लेकिन लागू करने वाले नहीं?

लोकसभा चुनावों के दौरान कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी के सलाहकार रह चुके नोबेल विजेता व अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने किसानों के आंदोलन पर अपनी राय रखी है। गुरुवार (दिसंबर 10, 2020) को अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा कि किसानों का मुद्दा कानून की विषयवस्तु के बारे में कम है, विश्वास के बारे में अधिक है। 

हरियाणा दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसानों के प्रदर्शन पर अभिजीत बनर्जी ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि सरकार द्वारा पारित तीनों कानूनों के प्रावधानों का कोई विरोध नहीं हो रहा बल्कि किसानों और सरकार के बीच अविश्वास के कारण ऐसा हो रहा है।

बनर्जी के बयान के मायने यदि समझें तो मालूम चलता है कि वो निजी तौर पर मानते हैं कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए कानूनों में परेशानी नहीं है, लेकिन उन्हें मोदी सरकार के खिलाफ़ किसान के प्रदर्शनों को सही साबित करना है तो वह उसे सरकार के प्रति किसानों के मन में पैदा अविश्वास से जोड़ रहे हैं।

वह कहते हैं कि किसान वास्तव में सरकार की मंशा पर संदेह कर रहे हैं। सारी दिक्कत भरोसे की है। यह सब (प्रदर्शन) कानून में निहित सामग्री से संबंधित नहीं है। ये भी देखना दिलचस्प है कि हरियाणा कब तक किसानों के इस प्रदर्शन को झेलता है।

अभिजीत बनर्जी कहते हैं, “ऐसा नहीं है कृषि क्षेत्र में मौजूद पुराने जमाने के संस्थानों से छुटकारा दिलाने के लिए आप कोई परिस्थिति (case) नहीं बना सकते। हम कर सकते हैं, लेकिन विश्वास की कमी यहाँ बहुत ज्यादा है।”

अभिजीत बनर्जी का कहना है, “किसानों के साथ हर तरह के निगोशीएशन को आखिरकार कुछ राज्य सरकारों को माध्यम बनाते हुए तय करना होगा। चूँकि, यह (कृषि कानून) ऐसे समय उठाया गया कदम है जब राज्य आर्थिक रूप से बेहद डरे हुए हैं क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था अब पहले जैसी हालत में नहीं रह गई है।”

NYAY योजना के लिए कॉन्ग्रेस ने ली थी अभिजीत बनर्जी की मदद

साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस ने अपने प्रमुख चुनावी वादे ‘न्याय योजना’ के लिए दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों से राय ली थी। इन अर्थशास्त्रियों में एक नाम अभिजीत बनर्जी का भी था। इसी योजना के तहत तब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गाँधी ने वादा किया था कि हर ग़रीब के खाते में साल में 72 हज़ार रुपए डाले जाएँगे, यानि 6 हजार रुपए/ महीना।

यह योजना गरीबों को मिनिमम इनकम की गारंटी देने वाली थी। हालाँकि, वादा की गई धनराशि राहुल गाँधी की हर रैली के साथ बदलती रही। कभी-कभी यह ₹72,000 वार्षिक हो जाता था, कभी-कभी यह 12000 मासिक हो जाता था।

13 से 16 साल की 8 बच्ची, आसिफ, आमिर सहित 32 ने किया यौन शोषण: 150 केस दर्ज, ग्रूमिंग जिहाद ब्रिटेन में भी भयंकर

ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) के मामले सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों से सामने आ रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम के वेस्ट यॉर्कशायर (West Yorkshire) पुलिस ने 32 लोगों पर 8 नाबालिग लड़कियों के साथ यौन अपराधों के 150 मामले दर्ज किए हैं। ग्रूमिंग जिहाद यूके के भीतर सबसे बड़ा आपराधिक प्रकरण बनकर उभरा है, जिसमें मुस्लिम युवक श्वेत लड़कियों का यौन उत्पीड़न और उनकी ग्रूमिंग करते हैं। इस घटना से एक बात स्पष्ट होती है कि ग्रूमिंग जिहाद एक वैश्विक समस्या का रूप ले रहा है। 

इन आपराधिक वारदातों को किरक्लीस (Kirklees), ब्रैडफोर्ड (Bradford) और वेकफील्ड (Wakefield) में 1999 से 2012 के दौरान 13 से लेकर 16 साल की पीड़िताओं के साथ अंजाम दिया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ तमाम पीड़िताओं को वयस्क होने के बाद भी जघन्य अपराधों का शिकार होना पड़ा था। इन वारदातों के ज़्यादातर आरोपित बैटले और ड्यूसबेरी (Batley and Dewsbury) क्षेत्र के निवासी हैं। इन पर तमाम गंभीर यौन अपराधों का आरोप है जिसमें बलात्कार, बच्चों का यौन शोषण, तस्करी, बलात्कार का षड्यंत्र, बच्चों की अश्लील तस्वीरें तैयार करना शामिल है। 

11 से 14 दिसंबर के बीच होगी अदालत में पेशी

इन घटनाओं के सभी आरोपित जमानत पर बाहर हैं। 11 से 14 दिसंबर के बीच इन्हें किरक्लीस मजिस्ट्रेट अदालत (Kirklees Magistrate Court) में पेश किया जाना है। इन आरोपितों में आसिफ़ अली (50), आमिर अली हुसैन (42), सरफ़राज़ मिराफ़ (45), नज़म हुसैन (43), मोहसिन नदत (35), मोहम्मद नज़म नसर (35), जब्बर कयूम (39), मोहम्मद तौसीफ़ हनीफ़ (36), ज़फर कयूम (41) शामिल हैं। इसके अलावा अपराधियों की सूची में सरकौत यासीन (35), मोहम्मद इमरान ज़दा (41), शकील दाजी (41), इब्राहिम पंडोर (41), अमरान मेहरबान (37), सलीम मोहम्मद नासिर (44), अली हुसैन शाह (35) और माइकल बर्केन शॉ (34) भी शामिल हैं। 

2018 से 2019 के बीच इंग्लैंड में 19 हज़ार बच्चों के साथ हुआ यौन उत्पीड़न 

डेली मेल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ आधिकारिक आँकड़ों में अनुमान लगाया था कि पिछले साल इंग्लैंड में लगभग 19,000 नाबालिगों के साथ यौन ग्रूमिंग (sexual grooming) की वारदात अंजाम दी गई थी। इंग्लैंड में स्थानीय प्रशासन ने 2018-19 में कुल 18,700 पीड़ितों की पहचान की थी, जिनकी संख्या पाँच साल पहले 3300 थी। इन आँकड़ों से साफ़ है कि पिछले पाँच सालों में चाइल्ड ग्रूमिंग (child grooming) के मामलों में कितनी बढ़ोतरी आई है।

ब्रिटेन में चाइल्ड ग्रूमिंग के सबसे ज़्यादा पीड़ित बर्मिंघम (Birmingham), लैंकशायर (Lancashire) और ब्रैडफोर्ड (Bradford) में पाए गए थे। होम ऑफिस के प्रवक्ता ने कहा था, “विभाग बच्चों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह के घिनौने व्यवहार को रोकने के लिए विभाग कोई कसर नहीं छोड़ेगा।” मीडिया वालों से बात करते हुए लेबर सांसद (Labour MP) सराह चैम्पियन (Sarah Champion) ने इस मुद्दे पर कहा था कि आँकड़े देखने पर पता चलता है कि इस तरह का शोषण हमारे देश में बच्चों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न का सबसे बड़ा स्वरूप है।

यूके में ग्रूमिंग जिहाद 

इस तरह के ग्रूमिंग गैंग में ज़्यादातर मुस्लिम व्यक्ति ही शामिल होते हैं जो कम उम्र की लड़कियों और महिलाओं पर घात लगाते हैं, उनकी कमज़ोरी पहचानते हैं और गैर मुस्लिम होने की सज़ा के तौर पर उनके साथ बलात्कार करते हैं। देश के तमाम लोगों ने इसे रेप जिहाद’ का नाम दिया है, लेकिन प्रशासन नस्लभेद के आरोप की वजह से इन गैंग्स पर विशेष रूप से कार्रवाई नहीं कर पाता है।

अपनी किताब इजी मीट (easy meat) में पीटर मैकलॉगइन (Peter McLoughlin) ने उल्लेख किया था कि सिख समूह इस प्रक्रिया के बारे में जानते थे और वह इसके बारे में सभी को जागरूक करने का प्रयास भी कर रहे थे। इतना ही नहीं पिछले वर्ष लेबर सांसद सराह चैम्पियन को बलात्कारियों की पहचान का ज़िक्र करने पर ‘शैडो कैबिनेट’ से बाहर निकाल दिया गया था। तमाम हिन्दू और सिख संगठनों ने इस बात पर सांसद की तारीफ़ भी की थी और कहा था कि पिछले कई दशकों में हिन्दू और सिख समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्कार और ग्रूमिंग को अंजाम दिया गया है। 

एक सिख समूह द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक़, पिछले कई दशकों में पाकिस्तानी लोगों ने ब्रिटेन में सिख समुदाय की युवतियों के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के लिए ग्रूमिंग की है। अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि राजनीतिक दृष्टिकोण से सही बने रहने की वजहों के चलते पुलिस ने इस तरह की तमाम शिकायतों को नज़रअंदाज़ ही किया है। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, “शोध में यह बात सामने आई है कि पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स ने पिछले 50 सालों में तमाम सिख महिलाओं को निशाना बनाया है।

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि स्थानीय प्रशासन की लापरवाही के चलते इस तरह के नेटवर्क को पनपने का मौक़ा मिला है। इसके अनुसार, “सिख नेताओं का कहना है कि पिछले 3 दशकों में वेस्ट मिडलैंड्स के भीतर सिख परिवार के मुखियाओं ने अपने बच्चों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाओं के संबंध में कई बार शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया है, लेकिन उन्हें निराशा के अलावा कुछ और हासिल नहीं हुआ।” 

ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहम द्वारा अधिकृत रिपोर्ट में बताया गया था कि लगभग 100 सदिग्धों के पीडोफाइल नेटवर्क पर वर्ष 2000 के दौरान दक्षिण मैनचेस्टर में 57 नौजवान लड़कियों के शोषण का आरोप है। इसमें ज़्यादातर एशियाई व्यक्ति शामिल थे जो लड़कियों को ड्रग्स का लालच देकर अपने जाल में फँसाते थे और उनका उत्पीड़न करते थे। 50 साल के व्यक्ति ने 15 साल की लड़की को मादक पदार्थ (हेरोइन) का इंजेक्शन दिया था जिसकी वजह से उसकी मृत्यु हो गई थी। इस रिपोर्ट ने ग्रेटर मैनचेस्टर पुलिस के रवैए को भी उजागर किया था जो ऐसे मामलों के आरोपित एशियाई मुस्लिमों के गिरोहों से निपटने में पक्षपाती थे।     

राजपथ पर भी राम मंदिर: 26 जनवरी की परेड में दुनिया देखेगी अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत

दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में बन रहे भव्य और दिव्य मंदिर के वैभव की झाँकी भी दिखाई जाएगी। यह प्रस्ताव यूपी की योगी सरकार ने केन्द्र सरकार को बीते दिनों भेजा था। जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। परेड के दौरान भगवान राम से जुड़ी कई कथाएँ भी दुनियाभर के सामने दिखाई जाएगी।

दिल्ली में 26 जनवरी, 2021 को होने वाली गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार अयोध्या की झाँकी विशेष तौर पर तैयार की जा रही है। ऐसा पहली बार होगा जब यूपी की झाँकी में श्रीराम मंदिर का मॉडल प्रदर्शित किया जाएगा। इस बार उत्तर प्रदेश की झाँकी का थीम होगा ‘अयोध्या: सांस्कृतिक विरासत उत्तर प्रदेश’

रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में अगले महीने 26 जनवरी को होने वाली गणतंत्र दिवस परेड की झाँकियों को लेकर दिल्ली में एक बैठक हुई थी। इस बैठक में यूपी की तरफ़ से राम मंदिर का प्रस्ताव दिया गया था। जिसकी अनुमति केंद्र द्वारा दे दी गई। राज्य के सूचना निदेशक शिशिर ने इस फ़ैसले की जानकारी दी है।

इतना ही नहीं योगी सरकार ने गणतंत्र दिवस की झाँकी में अयोध्या में भव्य दीपोत्सव की झलक दिखाने का भी फैसला किया है। प्रदर्शित की जाने वाली कथाओं में उन प्रसंगों का चयन किया गया है, जिनसे समाजिक सद्भाव का संदेश लोगों तक पहुँचाया जा सके। जैसे राम केवट संवाद। जब भगवान वनवास के लिए निकले थे तब प्रयागराज के पास मल्लाह ने उन्हें गंगा पार कराया था। लेकिन नाव में बैठाने से पहले निषादराज ने राम के पाँव पखारे थे।

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मृदंगाचार्य रामशंकरदास की मूर्ति को भी योगी सरकार ने झाँकी में शामिल करने का फैसला किया है।

गौरतलब है कि 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राम मंदिर आंदोलन के नेताओं और संतों के बीच राम मंदिर भूमि पूजन हुआ था। नवंबर 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में विवादित भूमि पर दशकों से चली आ रही लड़ाई को समाप्त करते हुए राम मंदिर निर्माण की अनुमति दी थी।

कोटा के अस्पताल में 8 घंटे में 9 बच्चों की मौत, पिछले साल 110 ने तोड़ा था दम: CM गहलोत ने कहा था- यह नई बात नहीं

राजस्थान के कोटा के जेके लोन अस्पताल (JK Lone Hospita) में एक बार फिर नवजातों के दम तोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है। 8 घंटे में वहाँ 9 मासूमों की जान गई है। परिजन आरोप लगा रहे हैं कि बच्चों की हालत बिगड़ने पर वह लगातार अस्पताल प्रशासन से गिड़गिड़ा कर मदद माँग रहे थे, लेकिन ड्यूटी स्टॉफ ने नहीं सुनी।

राज्य के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा का दावा है कि मृतक बच्चों में से 3 मृत लाए गए थे। 3 को जन्मजात बीमारी थी और 3 की मौत फेफड़ों में दूध जाने के कारण हुई। उन्होंने इस मामले पर पूरी रिपोर्ट माँगी है। संभागीय आयुक्त केसी मीणा और जिलाधिकारी उज्जवल राठौड़ ने भी अस्पताल पहुँचकर निरीक्षण किया है और संबंधित अधिकारियों से बात की। 

बच्चों की मौत पर राजस्थान सरकार से विपक्षी पार्टियों का सवाल

लोकसभा स्पीकर ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार की नाकामयाबी की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करवाया है। उन्होंने कहा है कि चिकित्सा व्यवस्था सुधारने के लिए सरकार कोशिश नहीं कर रही है। केंद्र सरकार की कोशिश है कि देश से शिशु मृत्यु दर एकदम खत्म हो जाए।

उन्होंने अपने ट्विटर पर जानकारी दी कि उन्होंने संसदीय क्षेत्र कोटा-बूंदी के प्रवास के दौरान जेके लोन अस्पताल में नवजात शिशुओं की मृत्यु को लेकर जिला कलक्टर और अस्पताल के अधिकारियों के साथ हालात की समीक्षा की। उन्होंने लिखा, “हर जिंदगी कीमती है इसलिए अधिकारियों को मॉनीटरिंग बढ़ाने और व्यवस्थाओं में सुधार के लिए हर संभव कदम उठाने को कहा है।”

वहीं राजस्थान की आम आदमी पार्टी ने भी गहलोत सरकार पर सवाल उठाए हैं। AAP राजस्थान ने ट्वीट कर कहा है, “साल बदला, हालात नहीं।  2019 में नवंबर दिसंबर में 35 दिनों में 110 बच्चों की मौत हुई थी। 8 दिसंबर 2020 को 8 घंटे में 9 मासूमों ने दम तोड़ दिया। मुख्यमंत्री गहलोत, कोटा का जेके लोन: हॉस्पिटल या कब्रगाह?”

भाजपा नेता गजेंद्र सिंह शेखावत लिखते हैं, “कोटा के जेके लोन अस्पताल में 8 घंटे में 9 नवजातों की मृत्यु हृदय विदारक है। अक्षमता की पर्याय बन चुकी राजस्थान सरकार और अस्पताल प्रशासन दोनो इस दुर्घटना के लिए पूर्णतः ज़िम्मेदार है। आशा है, राज्य सरकार पिछली बार से विपरीत इस बार संज्ञान लेगी, कार्यवाही करेगी और सुधार भी!”

कोटा के अस्पताल में उपकरणों की कमी

हिंदुस्तान की खबर के मुताबिक, कोटा में रात का तापमान 12 डिग्री तक पहुँच गया है। लेकिन अस्पताल में वार्मर सिर्फ 71 हैं, जबकि कुल नवजात 98 भर्ती हैं।  मौजूद वार्मर में भी 11 खराब हैं। इसके अलावा अस्पताल में नेबुलाइजर की सुविधा भी खराब है। कहा जा रहा है कि अस्पताल में नेबुलाइजर 56 की संख्या में आए थे, मगर इनमें से 20 खराब हैं। इंफ्यूजन पंप भी 89 हैं, लेकिन 25 इसमें से बेकार हैं। इसी तरह सोशल मीडिया पर लोग दावा कर रहे हैं कि अस्पताल में 100 से ज्यादा स्वास्थ्य उपकरण काम नहीं कर रहे हैं।

पिछले साल भी प्रशासन की नाकामयाबियों के कारण मरे थे कई नवजात

उल्लेखनीय है कि पिछले साल भी इसी दिसंबर महीने में कोटा के जेकेलॉन अस्पताल में करीबन 110 बच्चों की मृत्यु हुई थी। NCPCR ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को बरती जा रही लापरवाही बच्चों की मौत का एक अहम कारण है।

अपनी रिपोर्ट में NCPCR ने कहा था कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं, दरवाजे टूटे हुए हैं, जिस कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। इसके अलावा अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते पाए गए।

उस समय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने असंवेदनशील बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हर अस्पताल में रोजाना 3-4 मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। लगे हाथ उन्होंने यह भी दावा किया कि इस साल केवल 900 मौतें हुई हैं जो बीते 6 साल में सबसे कम है।

मीडिया के सामने उन्होंने कहा था,

“6 साल में सबसे कम मौतें हुई हैं। एक भी बच्चे की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन 1500, 1300 मौतें भी बीते सालों के दौरान हुई है। इस साल यह आँकड़ा 900 है। देश और राज्य के हरेक अस्पताल में रोज कुछ मौतें होती ही हैं। कदम उठाए जाएँगे।”

जिनकी राजनीति अफवाहों पर आधारित, वे किसानों को गुमराह कर रहे: CM योगी ने विपक्षी नेताओं को लगाई फटकार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रिपब्लिक भारत के अर्नब गोस्वामी को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने देश को गुमराह करने का काम किया है। उन्होंने कहा, “पीएम मोदी ने किसानों के हित में बड़े कदम उठाए थे, लेकिन दुर्भाग्य से इसमें राजनीति शुरू हो गई।”

CM योगी ने कहा, “जो लोग किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं। ये लोग भूतपूर्व में किसानों ने जो काम किया है उसे अच्छा नहीं मानते हैं। यह लोग उन कॉरपोरेट क्षेत्र के मोहरे हैं जो कृषि क्षेत्र में सुधार नहीं चाहते।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर विपक्ष को लगता है कि एक झूठ को बार-बार बोलने से वो सत्य हो जाएगा, तो उन्हें बता दूँ कि देश की जनता सब जान चुकी है, विपक्ष अब किसान को गुमराह नहीं कर पाएगा। मुझे आश्चर्य है कि कॉन्ग्रेस ने अपने 2019 के घोषणापत्र में इन्हीं कृषि सुधारों का उल्लेख किया था और मुख्यमंत्रियों ने भी वही माँग की क्योंकि ये किसानों के हित में थे।”

मुख्यमंत्री योगी ने कहा, “दिल्ली की AAP पार्टी की सरकार ने APMC में संशोधन किया। इसके बावजूद उन्होंने भारत बंद का समर्थन किया। योगेंद्र यादव एक्ट में संशोधन के लिए बोल चुके हैं। इसके बाद भी ये जगह-जगह पर बोलते हुए नजर आ रहे है। इसलिए आम नागरिक में इनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है।” CM योगी ने इस मामले को लेकर इच्छाधारी प्रोटेस्टर योगेंद्र यादव को उनके झूठ और दोहरे मानदंड के लिए फटकार भी लगाई।

उन्होंने यह भी कहा, “उत्तर प्रदेश के अंदर हर व्यक्ति जानता है कि किसानों के बेहतरी के लिए मोदी जी के नेतृत्व में जो काम किया है उसे किसान भी महसूस करता है।”

योगी आदित्यनाथ ने कहा, “जिन लोगों की राजनीति अफवाहों पर आधारित है, वे किसानों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी कोशिशों से केंद्र-किसान वार्ता बाधित हो रही है और देश का माहौल बिगड़ रहा है। आपने देखा होगा फरवरी 2019 में किसान निधि योजना लागू की गई थी। तब से अबतक किसानों के खाते में पैसा जा रहा है। लोग इसके लिए भी अफवाह फैलाए थे कि ये योजना बंद हो जाएगी।”

यूपी के मुख्यमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि वर्षों से लंबित जो सिंचाई की परियोजनाएँ रही हैं, उसे हमने पूरा किया। वर्तमान में सरयू नहर परियोजना, मध्य गंगा सिचांई परियोजना, इसके साथ ही अन्य योजनाएँ ला रहे हैं। CM ने कहा कि सरकार के बातचीत के रास्ते बंद नहीं है। सरकार ने संवाद का रास्ता खोला है, लेकिन हमारे किसान प्रतिनिधियों को भी अपने मुद्दे स्पष्ट करने होंगे। ये अधिनियम पूरे देश के किसानों के लिए बना है।

PM मोदी की हत्या की साजिश रचने वाले अर्बन नक्सल को जेल में नहीं दिया चश्मा तो महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने दिए जाँच के आदेश

बदले की भावना से समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ़ अर्णब गोस्वामी को एक बंद मामले को फिर से खोलकर उन्हें फँसाने वाले महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने बृहस्पतिवार (दिसंबर 10, 2020) को कथित शहरी नक्सल गौतम नवलखा के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाई है। बता दें कि अर्बन नक्सल ‘गौतम नवलखा’ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने, भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़काने और वामपंथी आतंकवाद का समर्थन करने के लिए गिरफ्तार किया गया है।

महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने बृहस्पतिवार को मामला सामने आने के बाद तुरंत इसकी जाँच के आदेश दिए। उन्होंने ट्वीट कर इसकी जानकारी देते हुए कहा, “भीमा-कोरेगाँव मामले में आरोपित गौतम नवलखा का चश्मा चोरी हो जाने के बाद जेल प्रशासन ने उनके परिवार द्वारा दिया भेजा गया चश्मा उन्हें नहीं दिया।”

उन्होंने लिखा है, “मैंने इस मामले की जाँच का आदेश दिया है। मुझे लगता है कि इसमें संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी, भविष्य में ऐसी घटनाओं के दोहराव से बचना होगा।”

महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने यह भी कहा कि अगर परिवार ने उनका चश्मा भेजा है, तो उन्हें दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें इन चीजों को अधिक संवेदनशील तरीके से संभालने की जरूरत है।”

उल्लेखनीय है कि गृह मंत्री अनिल देशमुख ने यह बयान तब दिया जब नवलखा के साथी साहबा हुसैन ने आरोप लगाया था कि नवलखा का चश्मा जेल के अंदर चोरी हो गया है और जेल प्रशासन ने उनके परिवार द्वारा भेजे गए नए चश्में को अस्वीकार कर दिया और वापस भेज दिया। वहीं, परिवार ने दावा किया है कि चश्में के बिना नवलखा लगभग ‘दृष्टिहीन’ हैं।

परिजनों के आरोपों के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने जेल के अंदर नवलखा के चश्मे की कथित चोरी के मामले की सुनवाई की और जेल अधिकारियों की कैदियों की जरूरतों पर उन्हें संवेदनशील बनाने के लिए एक वर्कशॉप आयोजित करने की बात कही।

एक तरफ पत्रकारों के खिलाफ हिंसा तो दूसरी तरफ नक्सल-आतंक के आरोपितों के लिए आँसू बहाना

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने नक्सल-आतंक के आरोपित के ’मानवाधिकारों’ को लेकर अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन किया तो वहीं कुछ दिनों पहले ही उनकी सरकार ने बदले की भावना दिखाते हुए रिपब्लिक टीवी के प्रमुख अर्णब गोस्वामी के साथ काफी दुर्व्यवहार किया था।

बता दें कि अर्णब गोस्वामी ने पालघर साधु लिंचिंग मामले में निष्पक्ष जाँच और बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के कथित आत्महत्या को लेकर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार से तीखे सवाल किए थे। जिसके परिणामस्वरूप राज्य सरकार ने उनके खिलाफ अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल किया।

महाराष्ट्र सरकार के इशारे पर रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को चार नवंबर की सुबह उनके घर से पुलिस ने बिना किसी सूचना के गिरफ्तार कर लिया था। अर्णब को दो साल पुराने केस में गिरफ्तार किया गया था, जिसको अदालत द्वारा पहले ही बंद कर दिया गया था। गिरफ्तारी के दौरान मुंबई पुलिस ने अर्णब के अलावा उसके परिजनों के साथ बदसलूकी की थी। हिरासत और कठोर यातनाएँ देने के बाद आखिरकार अर्णब गोस्वामी की जीत हुई और सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत दे दी।

सुनवाई के दौरान SC ने कहा था कि राज्य सरकार द्वारा अर्णब के मामले में गिरफ्तारी और हिरासत में पूछताछ के लिए कोई आधार नहीं था, क्योंकि आत्महत्या के लिए उकसाने की बात स्थापित नहीं थी। रिपब्लिक टीवी की मूल कंपनी एआरजी मीडिया आउटलेर्स ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि राशि का बड़ा हिस्सा पहले से ही भुगतान किया गया था और मृतक का अर्णब गोस्वामी के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं था।