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यूपी की जेल से छूटते ही सपा नेता नदीम फारुखी हुए बेलगाम, कहा- ‘पुलिस को अपने जूते की नोक पर रखता हूँ’

समाजवादी पार्टी के एक नेता ने जेल से छूटने के बाद ही विवादित बयान दे दिया। फ़िलहाल उनका बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा की वजह बना हुआ है। सपा नेता नदीम अहमद फारुखी ने अपने बयान में कहा है कि वह पुलिस को हमेशा अपने जूते की नोक पर रखते हैं। सपा नेता इतने पर ही नहीं रुके, इसके बाद उन्होंने कहा कि यह गर्व की बात है जो मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) ने उन्हें गिरफ्तार कराया। 

विवादित बयान देने वाले नदीम अहमद फारुखी उत्तर प्रदेश स्थित फर्रुखाबाद जिले के सपा, जिलाध्यक्ष हैं। उन पर एक महिला ने छेड़छाड़, जानलेवा हमला और धमकी देने का आरोप लगाया था। जिसके बाद उन पर लगाए गए आरोपों के आधार पर संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज करके उन्हें जेल भेज दिया गया था। यह घटना बीते रविवार (1 नवंबर 2020) की बताई जा रही है।

जेल से बाहर आते ही एक जनसभा को संबोधित करते हुए सपा नेता नदीम अहमद फारुखी ने कहा- 

“हिम्मत नहीं थी किसी की बात करने के लिए। गर्व की बात है कि मुख्यमंत्री ने हमें अरेस्ट कराया। आप लोगों, बुजुर्गों की दुआएँ थीं और नौजवानों हौसला, वकीलों का साथ था। आज पहली बार शुक्रिया करता हूँ कि पुलिस ने भी हमारा बहुत सम्मान रखा 3 दिन तक। ऐसा पहली बार हुआ नहीं तो मैं पुलिस को अपने जूते की नोक पर रखता हूँ। एक ही डर था जेल जाने का अब वह डर भी ख़त्म हो गया।” इस बयान के बाद मौके पर मौजूद भीड़ नारे लगाते हुए सपा नेता का समर्थन भी करती है। 

पुलिस ने सपा जिलाध्यक्ष को रविवार को गिरफ्तार करने के बाद सोमवार को कड़ी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया था। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था और फिर उनकी जमानत के लिए न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। अंततः बुधवार को जिला न्यायाधीश राजेश कुमार राय ने जमानत के लिए दायर की गई उनकी याचिका पर सुनवाई की थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश ने समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष नदीम अहमद फारुखी की जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया था। 

स्थानीय समाचार समूहों की रिपोर्ट्स के अनुसार सितारा बेगम नाम की महिला ने सपा नेता के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस अधीक्षक को लिखे गए पत्र में सितारा बेगम का कहना था कि नदीम अहमद फारुखी उनके घर के ठीक पीछे प्लाटिंग करा रहे हैं। इतना ही नहीं, रास्ता उनके घर से निकालने की योजना बना रहे हैं। महिला ने आरोप में यहाँ तक दावा किया था कि सपा नेता ने अपने साथियों के साथ मिल कर हथियारबंद होकर उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया था।               

अर्णब की गिरफ्तारी के विरोध में बैठे BJP विधायक को मुंबई पुलिस ने लिया हिरासत में, थाने में की भूख हड़ताल

भाजपा विधायक राम कदम शुक्रवार (6 नवंबर, 2020) को रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठे थे। मंत्रालय के आगे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे भाजपा नेता राम कदम को मुंबई पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस दौरान राम कदम ने अपने पद और दायित्व के बारे में बताते हुए पुलिस से कहा, “मैं विधायक हूँ और किसी चीज़ का विरोध करना और उसके खिलाफ अनशन करना मेरा अधिकार है।”

भाजपा विधायक ने पुलिस के इस रवैये को शर्मनाक बताते हुए कहा कि, हिरासत में लिया जाना मेरे अधिकार का हनन है। मुंबई पुलिस ने उन्हें मंत्रालय से उठा कर मरीन ड्राइव थाने ले गई। जिस पर राम कदम ने ट्वीट कर लिखा है कि, “महाराष्ट्र सरकार की ओर से हम पर भूख हड़ताल तोड़ने के दबाव बनाया जा रहा है। मरीन ड्राइव पुलिस थाने में भूख हड़ताल जारी”

उन्होंने एक और ट्वीट करते हुए बताया कि, “महाराष्ट्र सरकार ने मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में हमें डिटेन किया, भूख हड़ताल से रोका पर .. पुलिस स्टेशन में भी भूख हड़ताल जारी।” बता दें कि विरोध प्रदर्शन में उनके साथ सुशांत सिंह राजपूत के कोरियाग्राफर दोस्त गणेश हिवाड़कर भी मौजूद हैं।

मुंबई पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने पर राम कदम ने कहा, “मैं कानून के अनुसार सभी नियमों का पालन कर रहा था, जब मैं यहाँ पर विरोध में बैठा था। मेरे साथ कोई भीड़ नहीं मौजूद थी। हम सिर्फ तीन लोग यहाँ बैठे थे। मैं पुलिस के खिलाफ विरोध नहीं कर रहा हूँ। यह सरकार डरी हुई है। कितनी आवाजें वे (सरकार) दबा सकते हैं?”

भाजपा विधायक ने आगे कहा, उच्च न्यायालय से अर्णब गोस्वामी को जमानत मिलने के बाद, मैं विधानसभा में वापस जाऊँगा और उन सभी मंत्रियों को मिठाई बाटूँगा, जो अर्णब की गिरफ्तारी पर हँस रहे थे।”

मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन करते वक्त राम कदम ने रिपब्लिक भारत से बात करते हुए कहा कि अर्णब की गिरफ्तारी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता पर हमला है। यह पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है। उन्होंने कहा कि वो अर्णब गोस्वामी को तुरंत रिहा करने और बदले की भावना से उन पर लगाए गए आरोपों को खत्म करने, और उनके साथ बदसलूकी करने वाले 9 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने की माँग करते हैं। इसके बाद पुलिस द्वारा उन्हें हिरासत में लिया गया था।

गौरतलब है कि अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में बृहस्पतिवार को भाजपा के विधायक राम कदम ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। जिसके बाद कदम ने बताया कि, “महाराष्ट्र में ये तानाशाही ज्यादा नहीं चलेगी। अर्नब गोस्वामी कौन से आतंकवादी है, उनको गिरफ्तार करने के लिए एनकाउंटर स्पेशलिस्ट क्यों भेजा गया। महाराष्ट्र सरकार अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट रही है।”

SC ने अर्णब को दी गिरफ्तारी से राहत, महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार, पूछा- आप किसी को कैसे धमका सकते हैं?

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी मामले पर आज (नवंबर 6, 2020) सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूरे मामले पर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके उनके पत्र पर उनसे दो हफ्तों में जवाब माँगा है।

इसके साथ ही कोर्ट ने अर्णब को राहत प्रदान करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि उन्हें वर्तमान कार्यवाही के बाद गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

लाइव लॉ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीजेआई ने महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को शीर्ष न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का नोटिस जारी किया और इसमें उनसे कारण बताने को कहा गया कि आखिर क्यों उनके द्वारा लिखे पत्र के विरुद्ध कार्यवाही नहीं शुरू की जानी चाहिए।

बता दें कि आज सुप्रीम कोर्ट में अर्णब की गिरफ्तारी का पूरा मामला वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने उठाया और अर्णब को किसी भी प्रकार की कार्रवाई से बचाने की अपील की। उन्होंने अर्णब की ओर से बताया कि उन्हें धमकी दी जा चुकी थी, “तुमने हमें गाली दी है। ये दीवाली तुम जेल में बिताओगे।”

कोर्ट ने सारा पक्ष सुनकर पूरे मामले पर हैरानी जताई कि आखिर किसी नागरिक को कोर्ट जाने से कैसे रोका सकता है। उसे कैसे धमकाया जा सकता है। सीजेआई ने नाराजगी महाराष्ट्र विधानसभा सचिव पर जाहिर करते हुए कि आखिर अनुच्छेद 32 किसलिए है?

सीजेआई ने कहा, “हमारे पास पत्र लिखने वाले के लिए गंभीर सवाल है और हमारे लिए इसे अनदेखा करना बेहद मुश्किल है।” सीजेआई विधानसभा सचिव के पत्र पर बोले, “ये न्याय की प्रक्रिया में व्यवधान है, पत्र लिखने वाले की भाषा अर्णब को धमकाने वाली है। ऐसा लगता है जैसे पत्र लिखने वाली की मंशा याचिकाकर्ता को डराने वाली थी क्योंकि उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।”

बता दें कि अर्णब गोस्वामी को बुधवार को बिना समन जारी किए जबरदस्ती घर से उठाया गया था। कुछ पुलिस अधिकारी उनके घर पहुँचे थे और उनके साथ मारपीट करते हुए उन्हें एक पुराने केस में गिरफ्तार किया था।

इसके बाद अर्णब की कई वीडियोज सामने आई थी। वीडियो में उनके शरीर पर मारपीट के निशान साफ नजर आए थे, जिसे देख जगह-जगह मुंबई पुलिस के रवैये की आलोचना हुई थी।

देर रात तक अदालत की सुनवाई चलने के बाद अर्णब को कल 18 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया जबकि मुंबई पुलिस लगातार 14 दिन की हिरासत का अनुरोध कर रही थी। अदालत ने पुलिस से कहा कि हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत नहीं है।

CAA-NRC विरोधी हिंसक प्रदर्शन: मौलाना सहित 14 आरोपितों के लखनऊ में फिर लगे पोस्टर, इनाम घोषित

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एक बार फिर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ सख्त नजर आई है। मौलाना सैफ अब्बास सहित 14 अन्य आरोपितों के पोस्टर सड़कों पर लगाए गए हैं। सरकार ने प्रदर्शन करने वाले 8 लोगों को भगोड़ा घोषित किया है। इसके साथ ही इनकी गिरफ्तारी पर 5000 नकद इनाम की घोषणा की है।

जानकारी के मुताबिक, प्रदेश सरकार ने सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शन में शामिल 8 प्रदर्शनकारियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए उनको भगोड़ा और मोस्ट वांटेड घोषित कर दिया गया है। इन प्रदर्शनकारियों घरों के बाहर नोटिस लगाए गए हैं। इसके अलावा, कई जगह पोस्‍टर चस्‍पा किए गए हैं। पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों की सूचना देने वाले को 5 हजार रुपए का इनाम की भी घोषणा की है।

जारी किए गए पोस्टर पर पुलिस अधिकारियों के नंबर भी हैं, जिनपर इसकी जानकारी दी जा सकती है। पुलिस द्वारा दो अलग-अलग पोस्टर जारी किए गए हैं। एक में वह प्रदर्शनकारी हैं, जिन पर गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है, दूसरे में वह प्रदर्शनकारी हैं, जो फरार तो हैं, लेकिन उन पर गैंगस्टर एक्ट नहीं लगा है।

वहीं इस मामले में ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस नवीन अरोड़ा ने पहले बताया था कि सीएए और एनआरसी की आड़ में उपद्रव मचाने वालों के खिलाफ ठाकुरगंज थाने में 27 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इनमें 11 लोगों को अरेस्ट किया जा चुका है और एक आरोपित ने सरेंडर कर दिया था। हालाँकि, 7 आरोपितों ने कोर्ट से गिरफ्तारी का स्टे ले लिया था जिसके बाद बचे हुए 8 आरोपितों के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई करते हुए धारा 82 की कार्रवाई की गई है जिसमें उनके घर के बाहर डुगडुगी बजाकर नोटिस चस्पा किया गया।

इन आरोपितों पर लखनऊ में सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान आगजनी करने, सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाने और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने का आरोप है। जिनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट लगा है उन में मोहम्मद अलाम, मोहम्मद तहिर, रिजवान, नायब उर्फ रफत अली, अहसन, हसन और इरशाद शामिल है।

पुलिस के अनुसार, पोस्टर में शामिल हसन, इरशाद और आलम ने गुरुवार को कोर्ट में सरेंडर कर दिया। वहीं दूसरे पोस्टर में चौक निवासी मौलाना सैफ अब्बास, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मौलाना क़ल्बे सादिक के बेटे कल्बे सिब्तैन “नूरी”, ठाकुरगंज के सलीम चौधरी, कासिफ, हलीम, नीलू, मानू, इस्लाम, आसिफ, तौकीर, जमाल और शकील अभी फरार हैं। इन सभी आरोपितों की धर पकड़ के लिए इनाम घोषित किया गया है। साथ ही इनको पकड़ने के लिए पुलिस की एक टीम का भी गठन हुआ है।

गौरतलब है कि लखनऊ में पिछले साल 19 दिसंबर को सीएए-एनआरसी की आड़ में उग्र और बेहद हिंसक प्रदर्शन किया गया था। इस मामले में यूपी पुलिस ने 287 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। तोड़फोड़, आगजनी, मारपीट, लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम व सरकारी कार्य में बाधा समेत अन्य धाराओं में कुल 63 मुकदमे दर्ज किए गए थे।

वहीं योगी सरकार ने राजधानी लखनऊ में सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों के चेहरे सार्वजनिक करते हुए उनके पोस्टर चौराहों पर लगवा दिए थे। हिंसा के बाद ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि नुकसान की भरपाई दंगाइयों से की जाएगी।

जमानत चाहिए तो 2 साल तक सोशल मीडिया से दूर रहना होगा: जानिए इलाहबाद HC ने क्यों दिया ऐसा फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार (नवंबर 02, 2020) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोपित एक शख्स को इस शर्त पर जमानत दी कि वह दो साल तक सोशल मीडिया इस्तेमाल नहीं करेगा। आरोप है कि देवरिया के अखिलानंद राव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य जनप्रतिनिधियों के बारे में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट किया। साथ ही अपने बारे में गलत जानकारियाँ देकर भी अनुचित लाभ उठाने का प्रयास किया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य सार्वजनिक हस्तियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए अखिलानंद राव नामक एक व्यक्ति को जमानत देने का आदेश पारित किया था। अखिलानंद के खिलाफ देवरिया में मामला दर्ज किया गया था।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने आरोपितों को जमानत देते हुए कहा, “आवेदक सोशल मीडिया का उपयोग दो साल की अवधि के लिए या ट्रायल कोर्ट के समक्ष, जो भी पहले हो, मुकदमे के समापन तक नहीं करेगा।”

आरोपित अखिलानंद राव पर अनुचित लाभ हासिल करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने का प्रयास करने का भी आरोप है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 419, 420, 120 बी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 डी के तहत मामला दर्ज किया था।

हालाँकि, आरोपित का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता विमल कुमार पांडे ने आरोप लगाया कि आवेदक अखिलानंद पर लगाए गए आरोप पुलिस द्वारा झूठे निहितार्थ का मामला थे। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आवेदक 12 मई से जेल में था। जमानत याचिका में दायर हलफनामे के अनुसार, आरोपित का 11 मामलों का आपराधिक इतिहास रहा है।

उच्च न्यायालय ने पूर्व की शर्तों को निर्धारित करते हुए अदालत द्वारा उल्लिखित राशि और कुछ अन्य शर्तों के अनुसार व्यक्तिगत बांड और प्रत्येक के लिए दो जमानतें प्रस्तुत करने पर जमानत पर आवेदक को रिहा करने का आदेश दिया।

आदेश में यह भी कहा कि किसी भी शर्त का उल्लंघन जमानत रद्द करने का आधार होगा और आवेदक, जाँच या मुकदमे के दौरान गवाहों को डराकर अभियोजन पक्ष के सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा।

महाराष्ट्र के गृह मंत्रालय ने बनाई थी अर्णब की गिरफ्तारी के लिए 40 पुलिसकर्मियों की टीम, नाम दिया- ऑपरेशन अर्णब

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के मामले में एक हैरान करने वाली बात सामने आई है। महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री और एनसीपी नेता अनिल देशमुख की अगुवाई में 2018 के एक आत्महत्या के लिए उकसाने वाले मामले में अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के लिए 40 सदस्यों की उच्च स्तरीय टीम का गठन किया था और इस टीम की अगुवाई कोकण रेंज के इंस्पेक्टर जनरल संजय मोहिते को सौंपी गई। 

रायगढ़ पुलिस ने साल 2018 में आर्किटेक्ट अन्वय नाइक की आत्महत्या के मामले की फ़ाइल को दोबारा खोलने की अनुमति दी। इसके कुछ ही दिन बाद ‘ऑपरेशन अर्णब’ की शुरुआत हुई। इस ऑपरेशन के लिए रायगढ़ और मुंबई पुलिस के लगभग 40 पुलिसकर्मी शामिल किए गए थे। संजय मोहिते ने इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम देने की योजना बनाई और वहीं इसे क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी एनकाउंटर विशेषज्ञ सचिन वाज़ को सौंपी गई थी। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया‘ से बात करते हुए महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री ने इस प्रकरण में विस्तार से जानकारी दी। 

उन्होंने कहा, “संजय मोहिते की अगुवाई वाली टीम के लिए अर्णब जैसे ताकतवर व्यक्ति को गिरफ्तार करना चुनौतीपूर्ण था। फिर भी हमने पूरी सावधानी के साथ एक एक कदम उठाया, टीम के हर सदस्य ने तमाम प्रकार की विपरीत प्रतिक्रिया झेलने के बावजूद धैर्य और संयम से काम लिया। इन बातों की वजह से ही हम इस पूरे ऑपरेशन को सही से अंजाम देने में सफल हो पाए।” 

खुफ़िया ऑपरेशन, गिरफ्तारी के पहले पुलिसकर्मियों ने लगाए घर के चक्कर

महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट सदस्य ने यह भी कहा कि प्राथमिक जाँच के बाद एक बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अर्णब पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप तय है। उन्होंने कहा, “टीम के लोगों ने उस इमारत के कई चक्कर लगाए जहाँ अर्णब का घर है, यह एक खुफ़िया ऑपरेशन था। हमें शुरुआत से ही इस बात का डर था कि कहीं कोई जानकारी बाहर न आ जाए। वह पूरे मामले में एक बड़ी चूक साबित होती।” 

महाराष्ट्र कैबिनेट के एक वरिष्ठ सदस्य ने इस ऑपरेशन की जानकारी ऐसे दी जैसे यह किसी बड़े अपराधी को पकड़ने की योजना हो। उन्होंने कहा कि अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी बुधवार (4 नवंबर 2020) को सुबह हुई थी, पुलिसकर्मियों ने यह समय इसलिए चुना जिससे अर्णब घर पर मौजूद हो। इसकी जानकारी देते हुए मंत्री ने बताया कि यह एक सुनियोजित ऑपरेशन था, हर कदम पूरी सावधानी के साथ उठाया गया था। यह तक पहले से तय किया गया था कि कौन दरवाजे पर आहट करेगा और कौन अर्नब और उनके परिवार वालों से बात करेगा। 

इसके अलावा, अगर कार्रवाई के दौरान विपरीत हालात पैदा होते हैं तो मौके पर क्या कदम उठाया जाएगा यह भी तय किया गया। ऐसा हुआ भी, अर्णब ने मौके पर प्रतिक्रिया दी जिसके बाद सचिन वाज़ ने उन्हें जाँच में सहयोग ना करने के हालात में न्यायिक प्रक्रिया से अवगत कराया। गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कहा, “देवेंद्र फडणवीस की सरकार में इस मामले को पूरी तरह दबाने का प्रयास किया गया था। जैसे ही मैंने मृतक की पत्नी और उनकी बेटी का पक्ष सुना मुझे बहुत ज़्यादा हैरानी हुई। मुझे भरोसा नहीं हुआ कि महाराष्ट्र में ऐसा भी हो सकता है, हम इस मामले को इसके सुचारू अंत तक लेकर जाएँगे।”

अपने ही पुलिसकर्मी को गिरफ्तार किया मुंबई पुलिस ने

सबसे ज़्यादा हैरानी की बात है कि मुंबई पुलिस ने 2018 आत्महत्या मामले की फाइल बंद करने के लिए अपने ही विभाग के एक अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तार के ठीक एक दिन बाद उस पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया जिसने कोई सबूत नहीं उपलब्ध होने की सूरत में मामले की फाइल बंद कर दी थी। यह पुलिस अधिकारी 2018 में हुई अन्वय नाइक आत्महत्या मामले की जाँच कर रहा था। 

मई, 2018 में अर्णब गोस्वामी पर इंटीरियर डिज़ाइनर अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया था। अन्वय नाइक द्वारा अलीबाग स्थित बंगले में आत्महत्या करने के बाद अर्नब के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज की गई थी। अपने सुसाइड नोट में अन्वय नाइक ने अर्णब और 2 अन्य लोगों पर आरोप लगाया था कि अर्णब ने स्टूडियो का काम कराने के बाद उन्हें 83 लाख रुपए का भुगतान नहीं किया था। 

इस मामले में जाँच हुई थी, जाँच के बाद पुलिस ने अंतरिम रिपोर्ट भी दायर की थी जिसके बाद अदालत ने इसे बंद करने का आदेश दिया था। इस मुद्दे पर रिपब्लिक टीवी ने पहले ही सफाई पेश की थी कि 90 फ़ीसदी भुगतान पहले ही किया जा चुका था जितना बचा था वह बचा हुआ काम पूरा होने के बाद होना था जो कि कभी पूरा हुआ ही नहीं।

चखना लाने से मना करने पर शराबी शादाब (पल्सर) ने की 14 साल के किशोर की चाकू गोदकर हत्या

दक्षिण पूर्वी दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में एक 14 साल के किशोर को कुछ शराबियों ने नमकीन (चखना) लेकर आने के लिए कहा और उसने मना कर दिया। इस बात से नाराज़ होकर शराबियों ने उस किशोर की चाक़ू से हत्या कर दी। मृतक किशोर की पहचान अल्काश मलिक (14) के रूप में हुई है और पुलिस ने भी घटना को अंजाम देने वाले मुख्य आरोपित शादाब उर्फ़ पल्सर को गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा मृतक किशोर के परिजनों का कहना है कि घटना में कुल 5 आरोपित शामिल थे। 

दक्षिण पूर्वी दिल्ली के डीसीपी आरपी मीणा ने घटना के विषय में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अल्काश मलिक अपने परिवार के साथ मदनपुर खादर में रहता था। लॉकडाउन के दौरान स्कूल बंद हो जाने की वजह से वह अपने पिता के साथ बिरयानी की दुकान में मदद करता था। बुधवार (4 नवंबर 2020) की शाम को अल्काश के परिवार वालों ने उसे रोटी लाने के लिए भेजा था। घर से कुछ दूर पहुँचने पर 4 से 5 लोग शराब पी रहे थे, उनमें से शादाब उर्फ़ पल्सर नाम के शराबी ने अल्काश को नज़दीक की दुकान से नमकीन और गिलास लेकर आने के लिए कहा। 

अल्काश ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया और इस बात से शादाब समेत अन्य लोग काफी गुस्से में आ गए। शादाब ने अल्काश को बुरी तरह पीटा और इसके बाद उस पर चाकू से कई वार किए जिसकी वजह से वह बुरी तरह घायल हो गया। इस वारदात को अंजाम देने के बाद सभी आरोपित मौके से फरार हो गए। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और अल्काश को गंभीर अवस्था में अपोलो अपस्ताल में भर्ती कराया।

अस्पताल में अल्काश को मृत घोषित कर दिया। फ़िलहाल पुलिस ने घटना के मुख्य आरोपित शादाब उर्फ़ पल्सर को गिरफ्तार कर लिया है। परिवार वालों की माँग है कि सभी आरोपितों की गिरफ्तारी होनी चाहिए। इसके आधार पर पुलिस ने मामले के अन्य पहलुओं पर जाँच शुरू कर दी है। 

जो बिहार में सब जानते हैं वह नीतीश कुमार ने खुद क्यों कहा, PM मोदी ने उन्हें ‘जरूरत’ क्यों बताया?

“आज चुनाव का आखिरी दिन है और परसों चुनाव है। ये मेरा अंतिम चुनाव है। अंत भला तो सब भला। अब आप बताइए कि वोट दीजिएगा न इनको? हाथ उठाकर बताइए। हम इनको (उम्मीदवार को) जीत की माला समर्पित कर दें?”

नीतीश कुमार ने 5 नवंबर को पूर्णिया के धमदाहा की रैली में उपरोक्त बातें कही। ऐसा नहीं है कि बिहार के लोगों को यह पता नहीं है कि 69 साल के नीतीश कुमार अगले विधानसभा चुनावों तक 74 साल के होंगे और नेतृत्व की भूमिका में नहीं रहेंगे। बहुत सारे लोगों को यह भी लगता है कि वे शायद 10 नवंबर को चुनाव के नतीजे आने के बाद भी राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका में न हों।

बावजूद अब तक ‘लालू-राबड़ी के 15 साल बनाम अपने 15 साल’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे नीतीश कुमार की इस ‘भावुक अपील’ के गहरे मायने हैं। अपने तरकश का यह आखिरी तीर उन्होंने बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल किया है।

इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बिहार विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में 7 नवंबर को किन इलाकों में वोट डलने हैं। आखिरी चरण में सीमांचल, कोसी के अलावा तिरहुत और मिथिलांचल की बची हुई सीटों पर वोट डलेंगे। कुल 78 सीटों पर इस चरण में मतदान होना है।

आखिरी चरण की 37 सीटों पर जदयू के उम्मीदवार हैं। मधेपुरा, सुपौल, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज की 20 सीटों पर जदयू लड़ रही है। इनमें से करीब एक दर्जन सीटों पर पिछली बार भी उसे जीत मिली थी। 9 सीटें ऐसी हैं जहाँ लगातार दो बार से वह जीत रही है।

इन सीटों पर अल्पसंख्यक, अतिपिछड़े, महिलाएँ और प्रवासी वोटर निर्णायक हैं। 35 सीटों पर अति पिछड़ी जातियाँ असरदार हैं। 30 सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाता प्रभावशाली स्थिति में हैं। सीमांचल की कई सीटों पर 50 से 60 फीसदी तक अल्पसंख्यक वोटर हैं।

महिलाएँ, अति पिछड़े और अल्पसंख्यकों के एक हिस्से को जदयू अपना वोट बेस मानता है। महिलाओं को छोड़ दे तो नीतीश कुमार का आधार इस चुनाव में खिसकता नजर आया है। ऐसे में उनकी ‘अंतिम चुनाव’ वाली अपील काम कर गई तो न केवल यह बिखराव रुकेगा, बल्कि एनडीए का बहुमत भी मजबूत होगा। यह भी संभव है कि इस अपील की बदौलत जदयू खुद उस आँकड़े तक पहुँच जाए, जहाँ फिलहाल उसके पहुँचने की कोई सूरत नहीं दिखती है।

नीतीश कुमार की इस भावुक अपील के बीच जिस बात की कम चर्चा हुई, वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बिहार के लोगों के नाम लिखी चिट्ठी। इसमें प्रधानमंत्री ने बिहार के विकास के लिए नीतीश सरकार को अपनी जरूरत बताया है। लिखा है, “मैं बिहार के विकास को लेकर बहुत आश्वस्त हूँ। बिहार के विकास में कोई कमी न आए, विकास की योजनाएँ अटके नहीं, भटके नहीं, इसलिए मुझे बिहार में नीतीश जी की सरकार की जरूरत है।”

आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने भी पत्र लिखने के लिए वही दिन क्यों चुना जिस दिन नीतीश कुमार ने भावुक अपील की?

जैसा कि हमने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया है कि बिहार चुनाव के पहले चरण के बाद बीजेपी को जो फीडबैक मिले थे, वे बेहद निराशाजनक थे। हालाँकि दूसरे चरण में एनडीए ने इसकी भरपाई की है और वह सरकार बनाने की स्थिति में दिख रही है। ऐसे में तीसरे चरण में वोटों का बिखराव रोकने के लिए और जमीन पर चल रही उन तमाम चर्चा को विराम देने के लिए इस रणनीति पर अमल किया गया है, जो चुनाव बाद बीजेपी और जदयू में अलगाव की बात करते हैं।

असल में यही चरण तय करेगा कि एनडीए बस बहुमत के पास आकर ठहर जाएगी या फिर वह मजबूत स्थिति में होगी। इस चरण में अकेले जदयू की प्रतिष्ठा ही दॉंव पर नहीं लगी है। बीजेपी का भी काफी कुछ दॉंव पर लगा हुआ है। यही चरण तय करेगा कि बीजेपी अकेले राजद से कितना आगे होगी।

2015 के विधानसभा चुनावों में आखिरी चरण की 78 सीटों में से 54 महागठबंधन ने जीती थी। इन 54 में से 23 सीटें अकेले जदयू की थी। राजद को 20 और कॉन्ग्रेस 11 सीटें मिली थी। पिछले चुनाव में जदयू के बिना लड़ी बीजेपी ने भी इन सीटों में से 20 पर जीत हासिल की थी। निर्दलीय को दो और भाकपा-माले तथा रालोसपा को एक-एक सीटें मिली थी।

यानी, 43 सीटें ऐसी हैं जो पिछली बार जदयू और भाजपा को मिली थी। इन सीटों को कायम रखना दो कारणों से मुश्किल लग रहा था। पहला, नीतीश कुमार को लेकर नाराजगी और अति पिछड़े और महादलितों के बीच उनका खिसकता आधार। दूसरा, हमने इस पूरे चुनाव के दौरान पाया है कि जो उम्मीदवार पिछले 10-15 साल से लगातार विधायक हैं, उनके खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें जगह-जगह विरोध भी झेलना पड़ा था। इसके अलावा बीजेपी के कोर वोटरों में नीतीश को समर्थन को लेकर भ्रम की स्थिति भी दिख रही थी।

लिहाजा, नीतीश और मोदी दोनों ने आखिरी दिन यह पासा फेंका है। यदि जमीन पर इसका असर होता है और नतीजे पिछले चुनाव के तरह ही दोनों दल दोहराने में कामयाब रहे तो एनडीए उस स्थिति में पहुँच सकती है, जिसका अनुमान फिलहाल कोई राजनीतिक विश्लेषक लगाने को तैयार नहीं हैं।

2015 के चुनाव में आखिरी चरण में 18 सीटें ऐसी थी जहाँ बीजेपी और जदयू के बीच पिछली बार सीधी टक्कर हुई थी। इनमें से 7 पर जदयू, 10 पर बीजेपी को सफलता मिली थी। एक सीट भाकपा-माले ने दोनों दलों को पछाड़कर हासिल की थी। इसके अलावा 10 सीटें ऐसी थी, जहाँ जदयू और लोजपा की टक्कर हुई थी। सारी सीटें जदयू के खाते में गई थी। इस बार समीकरण बदले हुए हैं और जदयू को लोजपा नुकसान पहुँचाती दिख रही है। लिहाजा मोदी ने भी मतदाताओं में भ्रम दूर करने की कोशिश की है। इसका मकसद लोजपा को अपने कोर वोटरों तक ही सीमित रखना है जो एक खास वर्ग में ही सीमित है। यदि ऐसा होता है तो पिछले दो चरणों में लोजपा ने जिस तरह से जदयू को नुकसान पहुँचाया है, वह अब नहीं दिखेगा। इसी तरह दो सीटों पर जदयू और हम के बीच टक्कर थी। दोनों सीटों पर जदयू भारी पड़ी थी और इस बार हम एनडीए में ही है।

दिलचस्प यह है कि आखिरी चरण की 78 सीटों में 58 ऐसी हैं, जिस पर पिछली बार पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने ज्यादा वोट डाले थे। नीतीश कुमार के लिए सुकून की बात यह है कि महिलाओं के बीच कमोबेश उनकी लोकप्रियता पहले जैसी ही बनी हुई है। लिहाजा उनका इमोशनल कार्ड चला तो इस आखिरी चरण में चमत्कार भी संभव है और 10 नवंबर को आने वाले नतीजे बेहद चौंकाने वाले हो सकते हैं।

यही कारण है कि नीतीश कुमार के अंतिम चुनाव वाले बयान पर पलटवार करने में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान ने देरी नहीं की। तेजस्वी ने कहा कि हम पहले ही कहे थे नीतीश जी थक गए हैं। उन्होंने अब इसे मान भी लिया है। वहीं, चिराग पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार ने जेल जाने के डर से संन्यास की घोषणा की है।

एक सच यह भी है कि नीतीश कुमार (113 सभा) से दोगुने से भी ज्यादा इन चुनावों में सभा करने वाले 30 साल के तेजस्वी यादव (251 सभा) और करीब-करीब नीतीश के बराबर सभा करने वाले 38 साल के चिराग पासवान (110 सभा) उस राज्य में नीतीश कुमार का विकल्प बनने में नाकामायब रहे हैं, जहाँ 50.27 फीसदी वोटर 20 से 39 वर्ष के हैं।

हर अपमान SC/ST अधिनियम का उल्लंघन नहीं, जब तक वह ‘सार्वजनिक रूप से’ जातिगत न हो: सर्वोच्च न्यायालय

देश की सबसे बड़ी अदालत ने गुरुवार (5 नवंबर 2020) को एक अहम टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के तहत दर्ज की जाने वाली शिकायतें सिर्फ इस आधार पर पंजीकृत नहीं की जा सकती हैं क्योंकि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय से आता है। कृत्य के तहत उठाए गए सवाल व्यक्ति की जाति के लिए निर्देशित होने चाहिए। 

यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब पिछड़े वर्ग/समुदाय से आने वाले कई लोग अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम का दुरुपयोग करते हैं। यहाँ तक कि अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति के साथ होने वाले ‘गैर जातीय’ अपमान के मामले में भी कठोर कार्रवाई होती है।   

जातिगत अपमान होने पर ही कर सकेंगे शिकायत 

सर्वोच्च न्यायालय के 3 न्यायाधीशों की पीठ (एल नागेस्वरा राव, हेमंत गुप्ता और और अजय रस्तोगी) ने इस मुद्दे पर टिप्पणी की। पीठ ने टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने कहा, “किसी व्यक्ति का अपमान या धमकी अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति कानून के तहत अपराध नहीं होगा जब तक कि इस तरह का अपमान या धमकी पीड़ित के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के कारण नहीं है।”

अपमान का सार्वजनिक होना ज़रूरी

न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी शिकायत को सिर्फ इसलिए अनुसूचित जाति अनुसूचित जाति अधिनियम का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है क्योंकि उस समुदाय का सदस्य है। पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी मामले में सबसे ज़रूरी आधार यही है कि पीड़ित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया गया हो, सिर्फ तभी उस शिकायत को अनसूचित जाति अनुसूचित जनजाति का उल्लंघन माना जाएगा। इसके अलावा इस तरह के मामलों में एक और ज़रूरी बात यह है कि मामला सार्वजनिक या कई लोगों के बीच में होना चाहिए, इसके बाद ही अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3 (1)(r) के तहत मामला दर्ज किया जाएगा। 

क्या है मामला

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी हितेश वर्मा नाम के युवक द्वारा दायर की गई याचिका पर  सुनवाई करते हुए की। हितेश वर्मा ने अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम की सीआरपीसी (CrPC) धारा 482 और 3 (1)(r) के तहत खुद पर दायर की गई चार्जशीट को नष्ट करने के लिए यह याचिका दायर की थी। हितेश की याचिका इसके पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने खारिज कर दी थी। सर्वोच्च नायालय ने इस बात का उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता द्वारा किया गया अपमान की घटना पीड़ित के आवास पर हुई थी, यानी आम लोगों की गैरमौजूदगी में। 

क्योंकि जाँच में यह बात भी सामने आई कि मामला संपत्ति से संबंधित विवाद से जुड़ा हुआ था इसलिए इस पर अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति की धारा 3 (1)(r) लागू नहीं की जा सकती है। न्यायालय ने कहा, “इस मामले में दोनों पक्ष संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर पैरवी कर रहे हैं। अपशब्द कहने और अपमान करने का आरोप उस व्यक्ति पर लगाया गया है जो संपत्ति पर अपना दावा कर रहा है। अगर वह व्यक्ति अनुसूचित जाति से आता है तब भी इस मामले में अधिनियम की धारा 3 (1) (r) लागू नहीं की जा सकती है।          

प्राइवेट जॉब्स में स्थानीय लोगों को 75% आरक्षण देगा हरियाणा, विधेयक पारित

आरक्षण की नीति के संबंध में हरियाणा की राज्य सरकार ने एक अहम निर्णय लिया है। हरियाणा में निजी क्षेत्र की नौकरियों (प्राइवेट सेक्टर) में स्थानीय उम्मीदवारों को 75% तक आरक्षण का लाभ मिलेगा। बृहस्पतिवार (5 नवंबर 2020) को हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने इसके संबंध में विधानसभा में विधेयक पारित किया गया। चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल जजपा ने अपने घोषणापत्र में इस बात का वादा किया था। 

यह आदेश उन कंपनी, सोसाइटी, ट्रस्ट, फर्म या समूहों पर लागू होगा जिनमें 10 या अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और जो हरियाणा में पहले से मौजूद हैं या नई स्थापित हुई हैं। यह आदेश विशेष रूप से नई भर्तियों पर लागू होगा। इस आदेश से जुड़ी एक और अहम बात यह है कि 50 हज़ार या इससे कम वेतन के दायरे में आने वाली नौकरियों पर ही यह आदेश लागू होगा।

इस बिल को लेकर हरियाणा मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया है, “मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने विधानसभा में कहा कि ‘हरियाणा राज्य के स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक-2020’ लाने का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध करवाना है। इससे निजी क्षेत्र में हरियाणा के युवाओं की 75% हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी।”

इसके अलावा, आगामी 3 माह के भीतर कम्पनियों को सरकारी पोर्टल पर पंजीयन कराते हुए इस बात की जानकारी देनी होगी कि 50 हज़ार से कम वेतन वाले कितने कर्मचारी काम कर रहे हैं और उनमें से कितने हरियाणा के हैं। आदेश के संबंध में यह भी कहा गया है कि इस डाटा को साझा करने या अपलोड करने के लिए कंपनी नए कर्मचारी नहीं रख सकती है।

कंपनी मालिक के पास यह अधिकार होगा कि वह एक जिले से 10 फ़ीसदी से अधिक कर्मचारी न रखे। साथ ही, किसी भी उच्च दर्जे के पद के लिए कुशल उम्मीदवार नहीं मिलने की सूरत में आरक्षण में छूट दी जा सकती है। इस संबंध में डीसी या उससे वरिष्ठ अधिकारी का निर्णय मान्य होगा। हर फर्म, कंपनी या समूह को औसतन 3 महीने की अवधि में इस नीति को लेकर स्टेटस रिपोर्ट देनी होगी।

एसडीएम या इससे वरिष्ठ अधिकारियों के पास अधिकार होगा कि वह आदेश लागू करने के संबंध में जाँच के लिए जानकारी ले सकें। इस कानून का पालन नहीं करने वालों पर इस कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई होगी। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने हरियाणा के स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक 2020 विधानसभा में पेश किया। इस विधेयक को काफी चर्चा के बाद सर्वसम्मति से  पार्टी कर लिया गया। विपक्ष ने इस विधेयक के ढाँचे पर कई तरह के सवाल भी खड़े किए, उनका कहना था कि देश के सभी युवाओं को नौकरी का समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

हरियाणा के उपमुख्यमंत्री ने भी ट्वीट करके इस विधेयक के पारित होने पर बधाई दी। उन्होंने इसे भावुक क्षण बताया और कहा सरकार का हिस्सा बनने के ठीक एक महीने बाद उनके सामने यह भावुक पल आया है।