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BARC की रिपोर्ट के बाद रिपब्लिक ने किया परमबीर सिंह को एक्सपोज़, सोशल मीडिया पर उठी कमिश्नर के इस्तीफे की माँग

रिपब्लिक भारत और मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह मामले में रिपब्लिक भारत के कंसल्टिंग एडिटर प्रदीप भंडारी की तरफ से प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने परमबीर सिंह द्वारा की गई दमनकारी कार्रवाई की जम कर आलोचना की है और मामले से जुड़ी कई अहम बातें कही हैं। प्रदीप भंडारी का कहना है कि परमबीर सिंह अपनी वर्दी के हकदार नहीं हैं क्योंकि BARC द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के बाद रिपब्लिक भारत पर टीआरपी में बदलाव के आरोप निराधार साबित होते हैं। 

इसके अलावा प्रदीप भंडारी ने परमबीर सिंह पर कार्रवाई की माँग भी उठाई है। प्रदीप भंडारी ने राष्ट्रपति से निवेदन किया कि वह परमबीर सिंह पर रिपब्लिक भारत के खिलाफ़ फ़र्ज़ी ख़बर फैलाने के लिए कार्रवाई करें। गैर कानूनी तरीके से खुद को हिरासत में लिए जाने, पूछताछ करने और मोबाइल छीने जाने की बात का ज़िक्र करते हुए प्रदीप भंडारी ने कहा कि परमबीर सिंह ने अदालत के आदेश की अवहेलना की है क्योंकि अदालत ने उन्हें पहले ही अग्रिम जमानत दी थी। 

प्रदीप भंडारी ने इस मुद्दे पर बयान देते हुए कहा, “मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह आप वर्दी के हकदार नहीं हैं। आपने इस वर्दी में रहते हुए झूठ बोला है और रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने पहले ही BARC द्वारा रखे पक्ष का खुलासा कर दिया था। जिसमें रिपब्लिक द्वारा टीआरपी में किए गए किसी भी तरह के बदलाव का ज़िक्र नहीं है। परमबीर सिंह आपने देश के लोगों से झूठ बोला है और उनके साथ धोखा किया है।” 

इसके बाद उन्होंने गैर कानूनी तरीके से हिरासत में लिए जाने के बाद हुई पूछताछ पर भी अपनी बात कही। प्रदीप भंडारी ने कहा, “आपने अपने अधिकारियों से कह कर मुझे पूछताछ के लिए 10 घंटे तक हिरासत में बंद करके रखा। इस दौरान न मुझे कुछ खाने के लिए दिया गया और न ही पानी दिया गया। अदालत द्वारा अग्रिम जमानत का आदेश जारी हो जाने के बावजूद आपने मेरा मोबाइल फोन छीना जो कि क़ानून तोड़ने जैसा है। इससे साबित होता है कि आप षडयंत्रों की मदद से सच को छिपाना चाहते थे लेकिन सच को कैसे छिपाया जा सकता है।”

इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बिजयंत जय पांडा ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “मुझे इस बात से हैरानी हो रही है। कुछ समय पहले तक मुंबई पुलिस की छवि बेहतर हुआ करती थी लेकिन इस तरह की कार्रवाई नियम और क़ानून का पूरी तरह उल्लंघन है। पत्रकारों को सड़क से उठा लेना, इस तरह की घटनाएँ हम पाकिस्तान जैसे देशों में प्रतिदिन पढ़ते हैं जहाँ उन पत्रकारों पर अत्याचार होता है जो प्रशासन की सच्चाई सामने लेकर आते हैं। पुलिस द्वारा की गई इस तरह की कार्रवाई हैरान कर देने वाली है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।” 

जम्मू कश्मीर के पूर्व उप मुख्यमंत्री कविंदर गुप्ता ने भी इस घटना की आलोचना की। उन्होंने कहा, “BARC ने अपनी तरफ से जो रिपोर्ट जारी की थी उसके आधार पर यह साफ़ था कि रिपब्लिक भारत पर लगाए गए आरोप नकली थे। इससे यह साबित होता है कि महाराष्ट्र जानबूझ कर मीडिया समूहों को परेशान कर रही है, जिनका नाम भी नहीं था आरोप में उस पर एफ़आईआर दर्ज करना गलत है, उन्हें हिरासत में रखना भी सरासर गलत है। इस तरह की बातें आपातकाल में देखने के लिए मिलती थीं।”    

इसके आलावा सोशल मीडिया पर भी लोगों ने जोर-शोर से परमबीर सिंह के इस्तीफे की माँग की है।    

बच्चों के झगड़े में बीच-बचाव करने गई 65 वर्षीय दादी की लाठी-डंडे से पीटकर हत्या: गफ्फार, मुस्तफ़ा, आशिक, गोल्डन गिरफ्तार

झारखंड के लखाना गाँव में युवाओं के बीच शुरू हुआ विवाद इतना बड़ा बन गया कि 65 वर्षीय सुनारकालो कुँवर की लाठी और डंडों से पीट पीट कर लिंचिंग कर दी गई। 9 अक्टूबर को गाँव के 4 युवा निरंजन कुमार, ओमप्रकाश कुमार, रिशु कुमार और चुनचुन कुमार शाम के 7 बजे शौच के बाद लौट रहे थे। इसी दौरान रास्ते के दूसरी तरफ से गोल्डन खान, एजाज़ खान, गफ्फार खान, मुस्तफ़ा खान, अंसार खान, असगर खान, दिलखुश खान, आशिक खान और सदरू खान लौट रहे थे। इन्होंने दूसरी तरफ से आ रहे निरंजन और उसके साथियों पर पत्थर चलाना शुरू कर दिया। 

ऐसा होने के ठीक बाद निरंजन कुमार ने इसका विरोध किया, फिर सभी युवकों ने गालियाँ देते हुए उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। इस घटना की जानकारी मिलते ही निरंजन की दादी सुनारकालो कुँवर मौके पर पहुँची और उन्होंने मामले में दखल देने का प्रयास किया। उनके पहुँचने के बाद उन पर भी लाठी और डंडों से हमला कर दिया गया, नतीजतन उन्हें कई गहरी चोटें आई। इसके बाद लोग उन्हें नज़दीक के सदर अस्पताल लेकर गए जहाँ उनकी गम्भीर चोटों की वजह से मृत्यु हो गई। 

आरोपित छेड़ते थे महिलाएँ 

निरंजन कुमार ने इस घटनाक्रम पर बयान देते हुए कहा कि जब भी कोई महिला सुबह या शाम के वक्त शौच के लिए जाती थी। तब समुदाय विशेष के लोग वहाँ खड़े हो जाते हैं और महिलाओं से छेड़खानी करते हैं। महिलाओं ने इस तरह की घटनाओं के संबंध में पहले भी शिकायत की है, जिसकी वजह से पहले भी इस मुद्दे पर कई तरह के विवाद हो चुके हैं। 

पुलिस की जाँच और आरोपितों की गिरफ्तारी 

इस मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और जाँच शुरू की। क्षेत्र के हालात प्रतिकूल होने के बाद पुलिस ने कानून व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए वहाँ तैनाती और निगरानी बढ़ाई। वहाँ के एसडीपीओ वाहमान टूटी ने कहा कि पुलिस इस मामले में जाँच शुरू कर चुकी है। 

अपनी दादी की लिंचिंग के मामले में निरंजन द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर गरवा पुलिस ने 4 आरोपितों को गिरफ्तार किया। वहीं 5 के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज की गई थी, पुलिस ने इस कार्रवाई के लिए कई इलाकों में छापे मारे थे। जिसके बाद गोल्डन खान (पुत्र सज्जाद खान), मुस्तफ़ा खान (पुत्र मंटू खान), आशिक खान (पुत्र समीमुल खान), गफ्फार खान (पुत्र मक़सूद खान) को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का यह भी कहना है कि विवाद दो परिवारों के बीच का है, इसमें कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं है।          

2012 में ‘शहर से बाहर’ होने के बहाने परमबीर सिंह के साथ पार्टी कर रहे थे सलमान खान: हिट एंड रन मामले में भेजा जा सका था समन

साल 2012 के दिसंबर महीने में मशहूर अभिनेता सलमान खान को 2002 हिट एंड रन मामले में समन भेजा गया था क्योंकि वह 30 नवंबर के बाद शहर के बाहर थे। नए खुलासे में यह बात सामने आई है कि वह मुंबई में ही मौजूद थे और किसी अन्य व्यक्ति के साथ नहीं बल्कि मुंबई के स्पेशल आईजी परमबीर सिंह के साथ पार्टी कर रहे थे

दिसंबर 2012 में मिड डे द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बांद्रा पुलिस सलमान खान को अदालत द्वारा समन नहीं भेज पाई थी क्योंकि स्थानीय इंस्पेक्टर के मुताबिक़ वह शहर के बाहर थे। जबकि इस मामले की सच्चाई यह थी कि जब पुलिस ने दावा किया कि सलमान खान शहर से बाहर हैं, उस दौरान वह मुंबई स्थित महबूब स्टूडियो में पार्टी और शूटिंग करने में व्यस्त थे।

पार्टी से बाहर आते परमबीर सिंह (रिपोर्ट – मिड डे)

दिसंबर 2012 के दौरान मिड डे में प्रकाशित ख़बर के अनुसार सलमान खान और परमबीर सिंह सनी दीवान और उनकी पत्नी अनू दीवान की क्रिसमस पार्टी में शामिल होने के लिए गए थे। यह ठीक वही समय था जब बांद्रा पुलिस ने दावा किया था कि सलमान खान शहर से बाहर हैं। 

मिड डे की ख़बर के अनुसार पार्टी अगले दिन सुबह 7 बजे तक चली। ख़बर के मुताबिक़, “स्पेशल आईजी पुलिस परमबीर सिंह अपनी पत्नी सविता के साथ सुबह 3:15 बजे यूनियन पार्क एवेन्यू से बाहर निकलते हुए नज़र आए थे। इसके बाद वह टाटा इंडिगो मांज़ा में बैठ कर वहाँ से चले गए। इतना होने के दौरान यह भी देखा गया था कि परमबीर सिंह पत्रकारों को तस्वीरें लेने से मना कर रहे थे।” 

इस पार्टी में महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रीती और परिणिति भी शामिल हुई थी जो कि खुद विधायक थीं। मिड डे की रिपोर्ट के अनुसार बांद्रा पुलिस थाने के एक अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर मिड डे को यह जानकारी दी थी। उसका कहना था कि पार्टी में प्रदेश के गृह मंत्री की बेटी समेत कई दिग्गज लोग मौजूद थे इसलिए वह इस मामले में कोई कदम उठाने के पहले असहाय महसूस कर रहे थे। 

सलमान हिट एंड रन मामला

28 सितंबर 2002 को सलमान खान ने फुटपाथ पर सो रहे कई लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी थी। इस घटना में एक व्यक्ति की मृत्यु हुई थी और कुल 4 लोग घायल हुए थे। 24 जुलाई साल 2013 को सलमान खान पर गैर इतादतन हत्या का मामला दर्ज हुआ था, जिसके बदले में उन्होंने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए याचिका दायर की थी। 6 मई साल 2015 को सलमान खान पर आरोप सिद्ध हुए थे लेकिन दिसंबर 2015 में सबूतों की कमी के चलते उन्हें इन सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था। 2016 में देश की सबसे बड़ी अदालत ने स्वीकार किया था कि महाराष्ट्र सरकार की याचिका ने रिहाई को चुनौती दी थी।

जब हत्या और अपहरण थे ‘उद्योग’, चलती थी तो सिर्फ शहाबुद्दीन और ‘सालों’ की: बिहार का ‘जंगलराज’ और अपराध का साम्राज्य

‘जंगलराज’ – ये शब्द सुनते ही आपके दिमाग में क्या आता है? बिहार में लालू यादव का कार्यकाल, यानी 15 वर्ष। तकनीकी रूप से तो इसमें से 8 साल तक उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री रहीं लेकिन इस दौरान सत्ता लालू ही चलाते रहे। ये वो दौर था, जब बिहार में हत्या और अपहरण एक ‘उद्योग’ बन चुका था, एक कारोबार था, पैसे कमाने का एक जरिया था। राजनेताओं, अधिकारियों और माफियाओं का ऐसा गठजोड़ इसके पहले कहीं देखा ही नहीं गया।

सबसे पहले बात आँकड़ों की कर लेते हैं। अगर सिर्फ लालू राज के अंतिम वर्ष 2005 की ही बात करें तो उस साल 3471 हत्याएँ हुईं। साथ ही 251 अपहरण की वारदातें हुईं और बलात्कार की 1147 घटनाएँ हुईं। इसके एक साल और पीछे जाएँ तो 2004 में बिहार में हत्या के 3948 मामले आए थे। इसी तरह रंगदारी के लिए अपहरण 411 घटनाएँ और बलात्कार की 1390 घटनाएँ दर्ज की गई थीं।

एक और समस्या जो लालू यादव और राजद के काल में सबसे ज्यादा बढ़ रही रही, वो थी नक्सली हमलों की घटनाएँ। लालू यादव की पार्टी के कई नेताओं के नक्सलियों के साथ साँठ-गाँठ थे और वोट बैंक की राजनीति के कारण उन्हें अपने पाले में रखा करते थे। परिणाम ये हुआ कि हर महीने बड़ी नक्सली घटनाएँ होती थीं। अगर लालू-राबड़ी के अंतिम वर्ष 2005 की बात करें तो अकेले उस साल नक्सली हिंसा की 203 वारदातें हुई थीं।

2005 के अंत में नीतीश कुमार के सत्ता संभालते ही इन वारदातों में कमी आ गई। हालाँकि, 2005 में काफी दिनों तक राष्ट्रपति शासन भी लगा हुआ था लेकिन बिहार में एक तरह से लालू-राबड़ी की ही चल रही थी क्योंकि लालू यादव तब केंद्र की यूपीए-1 की सरकार में रेल मंत्री थे और लोकसभा में 22 सांसदों के साथ सरकार में उनका अच्छा-खासा दबदबा था। अपराधियों में 2006 से भय का माहौल व्याप्त होता चला गया।

जब नीतीश कुमार ने 2010 में अपना पहला कार्यकाल पूरा किया, तब तक 50,000 अपराधियों को सजा दिलवाई जा चुकी थी। ये वो प्रक्रिया थी, जो लालू यादव के जंगलराज वाले काल में एकदम से रुकी हुई थी। कई हत्याओं का मामला कोर्ट तो दूर, पुलिस स्टेशन भी नहीं पहुँच पाता था क्योंकि लोगों को सीधा गायब ही करा दिया जाता था। उन्हें कहाँ ठिकाने लगाया जाता था, इसका पता पुलिस तक को नहीं चल पाता था।

सीवान में सांसद शहाबुद्दीन का आतंक सबसे ज्यादा था। उसके खिलाफ खड़े होने वाले उम्मीदवारों पर गोलीबारी होती थी। उसके खिलाफ कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारियों पर गोलीबारी होती थी। सीवान के वर्तमान जदयू सांसद ओम प्रकाश यादव और बिहार के वर्तमान डीजीपी एसके सिंघल इसके भुक्तभोगी हैं। जो विपक्षी उम्मीदवारों के पोस्टर लगाते थे, उन्हें गायब कर दिया जाता था। विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्या करा दी जाती थी।

बिहार में इस तरह के कई गुंडे-बदमाश थे, जिनमें से अधिकांश नेता और ठेकेदार थे। उनका पूरा का पूरा सिस्टम था। माफिया टेंडर लेते थे, विकास कार्यों का। अब आप समझ सकते हैं कि सड़कें कैसी बनती होंगी और कंस्ट्रक्शन कैसे होता होगा। नेता ही अपहरण-हत्या उद्योग के अभिभावक हुआ करते थे। एक अपराधी जब नेता बन जाता था तो वो सौ नए अपराधियों को पालता था। इस तरह से ये ‘उद्योग’ बढ़ता ही चला गया।

अगर कुल अपराध की बात करें तो 2004 में हत्या की 3861, डकैती की 1297, दंगे के 9199, और अपहरण के 2566 मामले दर्ज किए गए थे। इसी तरह 2003 में हत्या की 3652 और अपहरण की 1956 वारदातें दर्ज की गईं। वहीं 8189 दंगे हुए। आप देख सकते हैं कि ये वो काल था, जब बिहार में 10,000 के आसपास दंगे हर साल हुआ करते थे। 2005-10 में ये आँकड़े काफी ज्यादा सुधरे।

ये वो समय था, जब जनप्रतिनिधि तक सुरक्षित नहीं थे। विधायक अजीत सरकार हों, विधायक देवेंद्र दुबे हों, विधायक का चुनाव लड़ रहे छोटन शुक्ला हों या फिर मंत्री बृजबिहारी प्रसाद – ये लोग रंजिशों में ही मारे गए। यहाँ तक कि अधिकारी भी सुरक्षित नहीं थे। IAS अधिकारी बीबी विश्वास की पत्नी चम्पा विश्वास, उनकी माँ, भतीजी और 2 मेड्स के साथ बलात्कार की घटना हुई। डीएम जी कृष्णैया की मॉब लिंचिंग हो गई।

और सरकार क्या कर रही थी? सत्ताधीश लालू यादव खुद घोटालों में व्यस्त थे। आज भी वो चारा घोटाला मामले में जेल में बंद हैं। इस मामले में उनके साथ-साथ कई अधिकारी और नेता भी नपे हैं। यानी, सब मिल-जुल कर जनता का पैसा खाने में लगे हुए थे और जहाँ जानवरों का चारा तक सत्ता में बैठे नेता खा जाते थे, वहाँ बाकी विकास परियोजनाओं का क्या हाल होता होगा। ऐसे कई घोटाले हुए, जिसने बिहार के खजाने को ही बर्बाद कर के रख दिया।

बची-खुची कसर लालू यादव के दोनों साले पूरा कर दिया करते थे। सुभाष यादव और साधु यादव का दबदबा ऐसा था कि लालू यादव की बेटियों की शादी होती थी तो गाड़ियों के शोरूम ही खाली कर लिए जाते थे और इस तरह बिहार में कोई कारोबार करना ही नहीं चाहता था। उन शादियों पर सरकारी खजानों से 100 करोड़ खर्च होते थे और 25,000 अतिथियों को खिलाया जाता था। अधिकारीगण जनता की सेवा नहीं, नेता की चापलूसी में लगा दिए जाते थे।

ऊपर से जंगलराज के दौरान लालू यादव विकास पर पूछे गए सवालों को और जनता की समस्याओं को हवा में उड़ा दिया करते थे। हेमा मालिनी और ममता कुलकर्णी के बारे में उनके बयान सुर्खियाँ बना करते थे। जब बिहार में बाढ़ आता था तो वो कहते थे कि इससे लोगों के घरों में मछलियाँ आएँगी और वो पका कर खा सकेंगे। जब अच्छी सड़कें बनवाने की बातें आती थी तो वो कहते थे कि इससे जानवरों के खुर (पाँव का निचला हिस्सा) उखड़ जाएँगे।

तब बिहार राज्य की स्थिति ऐसी थी कि जिनके पास रुपए और संपत्ति थी, वो भी अच्छी लाइफस्टाइल में नहीं जी सकते थे। अगर किसी ने कार तक खरीद लिया तो वो अपहरण उद्योग के रडार पर आ जाता था। डॉक्टरों के क्लिनिक चल गए, इंजीनियरों को बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया, वकीलों की वकालत चल पड़ी या फिर किसी कारोबारी की दुकान पर भीड़ जुटने लगी – उसे तुरंत अपराधियों का समन आता था और उसे जेब ढीले करने पड़ते थे।

तब स्थिति ऐसी थी कि अगर घर का कोई व्यक्ति ज़रूरी काम से भी बाहर गया हो और वो शाम के 6 बजे से पहले घर नहीं लौटे तो परिवार और रिश्तेदारों में कोहराम मच जाता था। कब, किसे, कौन और कहाँ मार कर फेंक दे – कुछ पता नहीं था। लाशें बरामद होती थीं और लोगों की धड़कनें बढ़ती थीं कि कहीं ये उनका कोई अपना तो नहीं। रोजगार और शिक्षा की बात तो छोड़ ही दीजिए। इन दोनों मामलों में न काम हुआ, न इसकी ज़रूरत समझी गई।

केरल के जमात-ए-इस्लामी के मुखपत्र ने दलित युवती की आत्महत्या को ‘बलात्कार और हत्या’ का रूप दिया: दिल्ली पुलिस ने किया भंडाफोड़

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस इलाके में गुरुमंडी में 17 साल की एक लड़की की मौत को गलत तरीके से पेश करने को लेकर दिल्ली पुलिस ने शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) को केरल के इस्लामी संगठन जमात-ए-इस्लामी के मुखपत्र ‘Madhyamam’ को प्रतिउत्तर जारी किया।

शनिवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में, E-Madhyamam ने दावा किया था कि 17 वर्षीय दलित लड़की के साथ उसके मकान मालिक के घर में 4 अक्टूबर को कथित रूप से ‘बलात्कार’ किया गया और फिर मार डाला गया। वहाँ वह 26 सितंबर से काम कर रही थी। केरल की मीडिया ने इस घटना की तुलना हाथरस हत्या मामले से की, जहाँ 19 वर्षीय एक लड़की को चार युवाओं ने कथित तौर पर मार डाला। इसके साथ ही मीडिया हाउस ने दिल्ली की घटना को ‘हाथरस मॉडल का फिर से दोहराना’ करार दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, कथित तौर पर बिहार की रहने वाली लड़की के साथ काफी अत्याचार किया गया था और मकान मालिक ने लड़की को अपने रिश्तेदारों को भी इस बारे में सूचित नहीं करने दिया। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि पीड़ित के परिवार ने कथित तौर पर कहा था कि मृत लड़की को ड्राइवर के कमरे में सोने के लिए मजबूर किया गया था। लड़की ने मानसिक और शारीरिक शोषण के बारे में अपने माता-पिता को सूचित करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया है कि मृतक लड़की को देखने के लिए परिवार के सदस्यों को अनुमति नहीं दी गई थी और घटनास्थल के पास इकट्ठे हुए लड़की के करीब 12 रिश्तेदारों को हिरासत में ले लिया गया।

Madhyamam के अनुसार, पुलिस ने अगली सुबह शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और बाद में शव को दाह संस्कार के लिए ले जाया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस द्वारा अभी तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। साथ ही कहा गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बलात्कार का उल्लेख नहीं किया गया है।

दिल्ली पुलिस ने जारी किया प्रतिउत्तर

दिल्ली में 17 साल की दलित लड़की की मौत पर दिल्ली पुलिस ने E-Madhyamam की रिपोर्ट पर प्रतिउत्तर जारी किया और उन रिपोर्टों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया है कि लड़की की मौत से पहले उसके साथ बलात्कार किया गया था।

दिल्ली पुलिस ने ट्विटर पर लिखा कि 4 अक्टूबर को उन्हें रिपोर्ट मिली कि गुरुमंडी इलाके के पास एक लड़की को अपने घर में फाँसी पर लटका हुआ पाया गया। इसके बाग मॉडल टाउन पुलिस, पीसीआर और फायर सर्विसेज मौके पर पहुँची और पाया कि उसका कमरा अंदर से बंद था।

पुलिस ने कहा कि फायर सर्विस के कर्मचारियों ने कमरे का दरवाजा खोला और पाया कि एक लड़की छत से लटक रही थी। मृतक की पहचान दिल्ली के राजपुरा गुट मंडी के निवासी के रूप में की गई और डॉक्टरों के बोर्ड द्वारा उसकी उम्र 16-17 साल बताई जा रही है।

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया, “क्राइम टीम द्वारा अपराध स्थल का निरीक्षण किया गया और शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में रखवाया गया। शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं थे और जाँच की कार्यवाही u / s 174 Cr.P.C. के तहत शुरू की गई।”

मामले की संवेदनशीलता के कारण, 8 अक्टूबर को सफदरजंग अस्पताल में डॉक्टरों के एक बोर्ड द्वारा पोस्टमार्टम किया गया, जिन्होंने कहा कि मौत का कारण आत्महत्या है। दिल्ली पुलिस ने कहा कि इस घटना में कोई भी घालमेल नहीं पाया गया है।

हाथरस का मामला

14 सितंबर को, एक 19 वर्षीय महिला का गला घोंटा गया था, और बाद में उसने 29 सितंबर को चोटों के कारण अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। हाथरस मामला पॉलिटिकल ड्रामा और मीडिया प्रोपेगेंडा का आधार बन गया है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल और प्रियंका गाँधी, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद, टीएमसी नेता डेरेक ओ ब्रायन और कई अन्य लोग परिवार से मिलने के लिए हाथरस गए। पीड़िता ने दावा किया था कि आरोपितों द्वारा उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था, हालाँकि, अभी तक मेडिकल रिपोर्ट में न तो इसकी पुष्टि हुई है और न ही इनकार किया गया है।

तौकीर महमूद और जुहैब हमीद ने बेंगलुरु से 7 युवाओं की ISIS में कराई भर्ती: NIA ने UAPA के तहत किया बुक

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए बताया कि 2013-2014 में इस्लामी आतंकवादी संगठन – इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए समुदाय विशेष के छ: से सात युवाओं के समूह को बेंगलुरु से सीरिया भेजने में एक डेंटिस्ट और एक कंप्यूटर एप्लीकेशन स्पेशलिस्ट मुख्य रूप से शामिल थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनआईए ने 29 वर्षीय मुहम्मद तौकीर महमूद और 28 वर्षीय जुहैब हमीद उर्फ शकील मन्ना को कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत बुक किया है। एनआईए द्वारा इन दोनों युवाओं के खिलाफ 29 सितंबर को भी एक मामला दर्ज किया गया था, जो पहले बेंगलुरु में रहते थे लेकिन बाद में सऊदी अरब भाग गए।

दो युवकों ने कथित तौर पर सऊदी अरब के एक सहपाठी के माध्यम से इस्लामिक आतंकी संगठन आईएसआईएस के साथ संपर्क बनाए थे। तौकीर और एक अन्य एनआईए संदिग्ध शिहाब ने अपने स्कूल के वर्षों के दौरान सऊदी अरब में पढ़ाई की थी।

आतंकवादी भर्तीकर्ताओं का नाम बेंगलुरू के 28 वर्षीय नेत्र चिकित्सक अब्दुर रहमान की गिरफ्तारी के बाद सामने आया था, जिन्होंने कश्मीरी दंपति – जहाँजानीब सामी और हिना बशीर के साथ मिलकर साजिश रची थी, उन्हें मार्च में भारत में खुरासान प्रांत (ISKP) इकाई के इस्लामिक स्टेट से संबंध के लिए  दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। आईएसआईएस से जुड़े आतंकवादी दंपति पर मुसलमानों को सीएए के खिलाफ एकजुट होने और देश के अंदर आतंकवादी हमले करने के लिए प्रेरित करने का आरोप है।

जाँच में पता चला था कि रहमान ने हमीद और महमूद की सहायता से 2013-14 में सीरिया की यात्रा की थी। दो अन्य युवक- फ़ैज़ मसूद और अब्दुल सुभा सीरिया में रहने के दौरान मारे गए थे। वो सीरिया जाकर आईएस में शामिल हो गए थे।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 7 अक्टूबर को चेन्नई के अहमद अब्दुल कादिर (40) और बेंगलुरु के इरफ़ान नासिर (33) को गिरफ्तार किया था। दोनों ही इस्लामिक स्टेट (आईएस) मॉड्यूल के संदिग्ध हैं और इन पर युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों में शामिल कराने के लिए फंडिंग उपलब्ध कराने का आरोप है। 

एनआईए अधिकारियों ने बताया था कि रहमान 2014 में सीरिया में आईएसआईएस के आतंकवादियों के साथ लगभग 10 दिनों तक रहा था और आतंकवादियों की मदद के लिए एक एप्लीकेशन डेवलप कर रहा था। उसने कादिर और नासिर के नामों का खुलासा एनआईए से किया था।

अलीगढ़: 6 साल के लड़के ने 4 साल की बच्ची से किया दुष्कर्म, शौहर को घटना के बारे में बता कर माँ ने थाने में दर्ज करवाई शिकायत

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 6 साल के नाबालिग लड़के द्वारा पाँच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म का बेहद ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है। 6 साल के बच्चे की इस घिनौनी हरकत ने लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए हैं। आरोपित और पीड़िता दोनों मुस्लिम समुदाय से ही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार घटना एक हफ्ते पहले की है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ में क्वार्सी क्षेत्र के नगला पटवारी इलाके में 12 अक्टूबर को पड़ोस में रहने वाले 6 साल के बच्चे ने चॉकलेट के बहाने बच्ची को अपने घर ले गया। आरोपित नाबालिग के घर पर उस समय कोई नहीं था। जिसका फायदा उठाते हुए उसने 4 साल की बच्ची का दुष्कर्म कर डाला।

जिसके बाद दर्द से चीखती हुई बच्ची घर लौट आई। मासूम को रोता देख माँ को लगा बच्चों का आपस में खेलते हुए झगड़ा हो गया होगा। इसलिए माँ ने उस वक्त उसे गंभीरता से नहीं लिया। बच्ची भी माँ से घटना के बारे में कुछ बता ना सकी क्योंकि उसे भी नहीं पता था आखिर उसके साथ हुआ क्या।

लेकिन धीरे- धीरे बच्ची के प्राइवेट पार्ट में दर्द बढ़ने लगा और जब उसके बर्दाश्त के बाहर हो गया तब उसने माँ को प्राइवेट पार्ट में दर्द होने की बात बताई। जिसको सुनकर माँ चौंक गई। दर्द के बारे में पूछने पर 4 साल की बच्ची ने 6 साल के आरोपित बालक की सारी हरकतों के बारे में माँ को बताया। जिसे सुन माँ के होश उड़ गए। माँ ने तुरंत अपने शौहर को बेटी के साथ हुई घटना के बारे में जानकारी दी।

परिजन देर रात बच्ची को लेकर थाने पहुँचे और तत्काल इसकी शिकायत इलाके के थाने में की। पुलिस ने मासूम का डॉक्टरी परीक्षण कराकर जाँच शुरू कर दी है। मामले में इंस्पेक्टर क्वार्सी छोटेलाल ने बताया कि पीड़ित व आरोपित एक ही संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। अभियोग पंजीकृत कर मासूम का डॉक्टरी परीक्षण कराकर जाँच की जा रही है। आरोपित की आयु का भी निर्धारण कराकर अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।

NSUI के राज्य समन्वयक ने भेजी आपत्तिजनक तस्वीरें, लड़की के मना करने पर कहा- ‘चिल, कई लोगों को एक साथ भेजता हूँ’

दिव्यांशी शेओरान (legendivi_) नाम की युवती ने कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया (एनएसयूआई) के राज्य समन्वयक (State Co-ordinator, Rti cell), नई दिल्ली आर्यमान प्रताप कुशवाहा (AryamanPratap) पर आपत्तिजनक और अमर्यादित तस्वीरें भेजने का आरोप लगाया है। एनएसयूआई के पदाधिकारी ने इस तरह की तस्वीरें इन्स्टाग्राम पर निजी संदेश में भेजी थी।  

 iLLuminadii नाम के ट्विटर यूज़र ने इस पूरे घटनाक्रम के स्क्रीनशॉट ट्विटर पर साझा किए। साझा किए गए ट्वीट में देखा जा सकता है कि दिव्यांशी शेओरान ने अपनी इन्स्टाग्राम स्टोरी पर उन तस्वीरों के स्क्रीनशॉट साझा किए जिसमें आर्यमान ने आपत्तिजनक तस्वीरें साझा की थीं।  

आर्यमान द्वारा साझा की आपत्तिजनक तस्वीर

उपरोक्त स्क्रीनशॉट में देखा जा सकता है कि आर्यमान ने दिव्यांशी को आपत्तिजनक तस्वीरें भेजी हैं। 

दिव्यांशी द्वारा साझा किया गया स्क्रीनशॉट

इसके बाद जब दिव्यांशी ने इस बात पर आपत्ति जताई, तब आर्यमान ने जवाब में उसे चिल करने (ठंड रखने) के लिए कहा। ऐसा करने पर उसका जवाब यह था कि वह अपनी कसरत (वर्क आउट) के बाद कई लोगों को ऐसी तस्वीरें भेजता है। 

दिव्यांशी के संदेश

इसके बाद दिव्यांशी ने अपनी स्टोरी में लिखा, “मैं किसी व्यक्ति को किसी भी तरह की सफाई देने की ज़िम्मेदारी नहीं रखती हूँ। यह बात सामने लाने के लिए मैं बताना चाहती हूँ कि मैं इससे बात नहीं करती हूँ। हम दोस्त भी नहीं हैं, मैं इस व्यक्ति को सिर्फ इसलिए जानती हूँ क्योंकि हम एक ही महाविद्यालय (कॉलेज) में थे लेकिन हमारा वर्ग (सेक्शन) अलग था। आज पता नहीं कहाँ से उसने मुझे इस तरह की तस्वीरें भेजी और ऐसी हरकत के लिए माफ़ी माँगने के बदले इसे सही साबित कर रहा है।” 

एनएसयूआई ने किया निलंबित

पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर चर्चा में आने के बाद दिव्यांशी ने एक स्क्रीनशॉट साझा किया। यह संदेश कथित तौर पर एनएसयूआई से जुड़े दीपांशु बंसल द्वारा भेजा गया था, जिसमें ऐसा कहा गया था कि आर्यमान को अगले आदेश तक पद से मुक्त और संगठन से निलंबित कर दिया गया है। दीपांशु नाम के व्यक्ति ने अपने संदेश में यह भी कहा कि इस प्रकरण की जाँच के लिए एक समिति भी बनाई गई थी जिसने आर्यमान को दोषी पाया है। इस कार्रवाई के बाद आर्यमान ने अभी अपने सोशल मीडिया हैंडल से एनएसयूआई के पद का उल्लेख हटा दिया। 

घटनाक्रम से जुड़े स्क्रीनशॉट साझा करने के दौरान दिव्यांशी शेओरान ने लिखा कि उसने इस बात की जानकारी आर्यमान के कॉलेज डीन को भी उपलब्ध कराई है। मामले में अभी तक हुई गतिविधि के आधार पर अनुमानित है कि दिव्यांशी आर्यमान पर कानूनी कार्रवाई करेंगी। तमाम अधिवक्ता इस मामले में पहले ही मदद के लिए आगे आ चुके हैं।   

शशि थरूर ने पाकिस्तान में भारत को किया बदनाम, बीजेपी नेता ने कहा- लगता है कि राहुल गाँधी पाकिस्तान में चुनाव लड़ रहे हैं

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तानी पत्रकार के साथ बातचीत करते हुए भारत को बदनाम करने वाला बयान दिया है। साथ ही पाकिस्तान का महिमामंडन करते हुए कोरोना वायरस महामारी का मुकाबला करने में उनके प्रयासों की प्रशंसा की। बता दें कि पूरी चर्चा इस विषय के इर्द-गिर्द घूमती रही कि कोरोना वायरस ने दुनिया को कैसे बदल दिया।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा, ”हम सीमा पार ईर्ष्या से देखते हैं क्योंकि आपको लगता है कि सामान्य स्थिति में लौटने में सक्षम होने के लिहाज से यह सुखद समय है। अभी भी कई स्थानों पर कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे है। कई जगह तो यह अपने चरम सीमा पर भी पहुँच चुका है, जिसमें दोनों राजधानी भी शामिल हैं जहाँ मैं अभी हूँ और मेरे दक्षिण में तिरुवनंतपुरम के निर्वाचन क्षेत्र में संख्या पहले की तुलना में और बदतर हैं।”

शशि थरूर ने आगे कहा, “भारत सरकार अच्छा काम नहीं कर रही है और लोगों को इसका एहसास है। राहुल गाँधी ने फरवरी की शुरुआत में ही कहा था कि COVID-19 को गंभीरता से लिया जाना चाहिए अन्यथा भारत को आर्थिक तबाही का सामना करना पड़ेगा, इसलिए उन्हें इसका श्रेय मिलना चाहिए।” फिर उन्होंने हावडी मोदी कार्यक्रम के आयोजन के लिए भारत सरकार की निंदा की।

कॉन्ग्रेस नेता ने इस तथ्य पर शोक व्यक्त किया कि लोग नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास बना रहे हैं और ऐसा कहते समय उन्होंने हैरानी जताई। शशि थरूर ने कहा, “तबलीगी जमात सुपर-स्प्रेडर घटना का इस्तेमाल समुदाय विशेष के खिलाफ खुले तौर पर कट्टरता और भेदभाव को सही ठहराने के लिए किया गया था।”

शशि थरूर की टिप्पणियों की भाजपा ने निंदा की और कहा कि खुद को बुद्धिजीवी बताने वाले शशि थरूर की यह हरकत मूर्खतापूर्ण और बचकानी है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने थरूर के बयानों को लेकर कहा कि जिस तरह से कॉन्ग्रेस के नेता अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश को नीचा दिखा रहे हैं, खासकर पाकिस्तान में, ऐसा लगता है कि राहुल गाँधी पाकिस्तान में चुनाव लड़ रहे हैं। पात्रा ने कहा भारत से शशि थरूर इमरान खान की रैली को संबोधित कर रहे हैं।

भाजपा नेता ने कहा कि अब वो राहुल गाँधी को ‘राहुल लाहौरी’ के नाम से संबोधित करेंगे। थरूर पाकिस्तान में उनके लिए पहले भी रैली कर चुके हैं। पात्रा ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस जल्द ही पाकिस्तान राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस बन जाएगी। उन्होंने कहा कि वे जिन्ना के समर्थक को टिकट देते हैं। वो कहते हैं, “मैं पूछना चाहता हूँ कि यह क्यों जरूरी है? आप लाहौर में भारत के मुद्दे को लेक रोएँगे। हमें कोई यग कहने में संदेह नहीं है कि राहुल गाँधी भारत से नफरत करते हैं।”

बता दें यह पहली बार नहीं है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने भारत को बदनाम किया है और पाकिस्तानी मंच पर राजनीति की है। शशि थरूर से पहले मणिशंकर अय्यर ने नवंबर 2015 भारत के दुश्मन देश पाकिस्तान में प्रधानमंत्री के खिलाफ बोल कर विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने एक पाकिस्तानी मीडिया चैनल को बताया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को बहाल करने के लिए मोदी को हटाया जाना था। पीएम मोदी को बदनाम करने के लिए पाकिस्तान से मदद की गुहार लगाई गई।

लॉकडाउन नहीं होता तो अब तक होती 26 लाख मौतें: 10 वैज्ञानिकों की कमिटी के अध्ययन में खुलासा

दुनिया भर में चल रही कोरोना महामारी और लॉकडाउन के धीरे-धीरे ख़त्म होने के बीच ‘कोविड-19 इंडिया नेशनल सुपरमॉडल कमिटी’ के 5 रिसर्च पेपर आए हैं, जिन्हें 10 भारतीय वैज्ञानिकों ने मिल कर तैयार किया है। आईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर एम विद्यासागर इस कमिटी के अध्यक्ष थे। उन्हें 1997 में ‘मिसाइल मैन’ एपीजे अब्दुल कलाम की उपस्थिति में ‘DRDO साइंटिस्ट ऑफ द ईयर’ का अवॉर्ड मिल चुका है। कमिटी ने गणितीय रूप से कोरोना के प्रसार व रोकथाम का अधययन किया है।

उन्होंने जो मॉडल बनाया है, उसके हिसाब से अगस्त 2020 तक भारत के 14% लोगों के शरीर में कोरोना की एंटीबॉडी थी। जबकि फ़िलहाल 30% जनसंख्या के पास एंटीबॉडीज हैं। साथ ही मृत्यु दर कुल संक्रमित लोगों का 0.04% है। साथ ही इसमें प्रोजेक्ट किए गए एक ग्राफ के अनुसार, अगर लॉकडाउन नहीं होता तो कोरोना के मामलों की संख्या जून में ही 1.4 करोड़ तक पहुँच गई होती। साथ ही अगस्त ख़त्म होने तक 26 लाख लोगों की जानें गई होती।

वहीं जब भारत में कोरोना का प्रसार शुरू हुआ था, तब 18-31 मार्च के बीच मात्र 14 दिनों में इसके मामलों की संख्या 10 गुनी हो गई थी। रिसर्च पेपर के अनुसार, इसके बाद अप्रैल 1 से लेकर जून 12 तक 73 दिनों में कोरोना के मरीजों की संख्या 100 गुना बढ़ गई। अगर लॉकडाउन नहीं होता तो इन 73 दिनों में यही संख्या 10,000 गुना बढ़ जाती। साथ ही प्रवासी मजदूरों के पलायन को लेकर भी कहा गया कि अगर लॉकडाउन से पहले इसकी अनुमति दी जाती तो इसका खासा उलटा प्रभाव पड़ता।

अगर लॉकडाउन नहीं होता तो क्या होता? (रिसर्च पेपर का ग्राफ)

साथ ही इस रिसर्च पेपर में बताया गया है कि ठंडी के मौसम में ये वायरस कमजोर हो जाता है, अब तक किसी भी अध्ययन से ये साबित नहीं हो सका है। हालाँकि, बड़े जुटानों से संक्रमितों की संख्या ज़रूर बढ़ती है क्योंकि केरल में ओणम के दौरान इसमें वृद्धि देखी गई। इससे वहाँ संक्रमण की संख्या 32% बढ़ गई थी। इसमें कहा गया है कि अब सुरक्षा उपायों के साथ सारी गतिविधियाँ चालू की जा सकती हैं।

अगर एकदम ही सतर्कता नहीं बरती गई तो एक महीने के भीतर ही कोरोना संक्रमण के 26 लाख नए मामले आ सकते हैं। साथ ही पाया गया है कि अगर लोग सावधान रहे तो फ़रवरी 2021 तक इस पर काबू पाया जा सकता है। इस ओर ध्यान दिलाया गया है कि कोरोना संक्रमितों में से जहाँ कुछ ऐसे हैं जिन्हें सिम्पटम्स हैं, वहीं इसका एक बड़ा हिस्सा संक्रमित होने के बावजूद इसका कोई लक्षण कैरी नहीं कर रहा है।

अध्ययन का निष्कर्ष है कि अगर स्वास्थ्य सुविधाओं में बहुत बड़ी समस्या न हो तो फिर लॉकडाउन को जिला स्तर पर भी लगाने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही पाया गया है कि मृत्यु दर जो आज की तारीख में यूरोप या अमेरिका में है, भारत में उसका 10वाँ हिस्सा ही है, जो सकारात्मक है। साथ ही मेडिकल उपकरणों और तैयारियों के मामले में भी हम आज इस आपदा से निपटने में कहीं ज्यादा कुशल हैं।