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मुंबई: पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर इकबाल शेख ने ‘फेक TRP स्कैम’ में रिपब्लिक टीवी की रिपोर्टिंग रोकने के लिए अदालत की ली शरण

मुंबई पुलिस के पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर इकबाल शेख ने मुंबई के एक कोर्ट में याचिका दायर कर रिपब्लिक टीवी, आर भारत और अर्नब गोस्वामी पर कथित TRP घोटाले की रिपोर्टिंग से रोक लगाने की माँग की है।

LiveLaw ने बताया कि मुंबई के पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त इकबाल शेख द्वारा दायर मुकदमे में मुंबई पुलिस के खिलाफ ‘अपमानजनक रिपोर्ट’ के कारण हुई मानसिक पीड़ा के लिए 5 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति की भी माँग की गई है।

इकबाल शेख ने याचिका में कहा, “..जब डिफेंडेंट नंबर 1 (अर्नब गोस्वामी) व्यक्तिगत रूप से इच्छुक पार्टी के तौर पर, मुंबई पुलिस पर बेईमान अधिकारियों का संगठन होने का आरोप लगाते हैं, तो यह मुद्दई के लिए काफी तकलीफदेह होती है, जिनके लिए मुंबई पुलिस उनका दिल और आत्मा है।” 

वकील आभा सिंह के माध्यम से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि रिपब्लिक न्यूज नेटवर्क ने मुंबई पुलिस के खिलाफ एक ‘बदनामी अभियान’ शुरू किया है, जिसके कारण मुद्दई को गंभीर अपमान का सामना करना पड़ा है जो ‘मुंबई की शानदार पुलिस बल में अपनी विरासत पर गर्व करता है।’

इसमें कहा गया है, “मुद्दई ने कहा कि प्रतिवादी नंबर 1 ने दो सबसे लोकप्रिय टीवी चैनलों के मालिक के रूप में अपनी सीमा को स्थानांतरित कर दिया है और एडिटर-इन-चीफ होने के नाते अपने स्वयं के एजेंडे को चलाना शुरू कर दिया है, जो कि फिलहाल एक सांविधिक निकाय के तहत जाँच के अधीन है।”

आगे कहा गया है, “मुद्दई ने कहा कि रिपब्लिक टीवी चैनल इस मामले में एक वैधानिक जाँच के अधीन है और कानूनी रूप से गठित मंचों में उनकी स्थिति को भुनाने के लिए सभी कानूनी उपाय किए गए हैं। हालाँकि, कानून के तहत निर्धारित नियमों का पालन करने के बजाय यह कानून को अपने हाथों में ले रहे हैं और बड़े पैमाने पर मुंबई पुलिस को बदनाम करने की एकतरफा प्रक्रिया को अपनाया है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट, 1965 के तहत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी किए गए नॉर्म्स ऑफ़ जर्नलिस्टिक कंडक्ट के खुले और घोर उल्लंघन कर ये सारी बातें हो रही हैं।” 

गौरतलब है कि रिपब्लिक टीवी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को कहा था कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी TRP मामले में आरोपित नहीं हैं। इसके बाद रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क और अर्नब गोस्वामी की तरफ से इस मुद्दे पर प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। जिसमें उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर 200 करोड़ के मानहानि के मुक़दमे की बात कही।   

सुनवाई के दौरान मुंबई पुलिस ने कोर्ट में परमबीर का सिंह का साथ देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट में मुंबई पुलिस भी पीछे हट गई।  महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस ने अदालत में यह बात स्वीकार ली कि टीआरपी मामले में दर्ज की गई एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम शामिल नहीं है। कोर्ट में उनके वकील ने भी माना कि रिपब्लिक आरोपित नहीं हैं। बता दें कि महाराष्ट्र राज्य और मुंबई पुलिस की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए थे।

फ्रांस में बैन होंगे 51 इस्लामी संगठन, Twitter पर भी कसी जा सकती है नकेल: शरणार्थी बन कर आया था हत्यारे का परिवार

फ्रांस में एक शिक्षक की इस्लामी कट्टरपंथी द्वारा हत्या किए जाने के बाद वहाँ कई इस्लामी संगठनों और इस्लामी कट्टरपंथी विचार रखने वाले लोगों के ठिकानों पर लगातार छापेमारी हो रही है। इस कार्रवाई में दर्जनों कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया है। इतिहास के शिक्षक सैमुअल पैटी की हत्या के बाद हो रही कार्रवाई में 15 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 4 छात्र हैं। इसमें एक व्यक्ति हत्यारे से सम्पर्क में भी था।

ऑनलाइन हेट स्पीच के 80 मामलों में अलग-अलग जाँच चल रही है। साथ ही 51 इस्लामी संगठनों को प्रतिबंधित किए जाने पर विचार किया जा रहा है। इनमें कई बड़े संगठन भी शामिल हैं। इनमें से एक ‘ह्यूमेनिटेरियन एसोसिएशन बराकसिटी’ भी शामिल है, जिसने फ़्रांस के गृह मंत्री को भी पागल करार दिया है और कहा है कि उसके खिलाफ कोई सबूत न मिलने के बाद इस वारदात से उपजे इमोशंस का सहारा लेकर उसे निशाना बनाया जा रहा है।

साथ ही सरकारी वाचलिस्ट में आए 213 विदेशियों को भी देश से बाहर निकला जाएगा। इनमें से 150 पहले से ही जेल में हैं। इन सभी पर इस्लामी कट्टरवादी विचारधारा के अनुसरण का आरोप है। शिक्षक के खिलाफ जिसने भी लिखा या फिर हत्यारों का जिसने भी समर्थन किया, उन सभी को ट्रैक कर के गिरफ्तार किया जा रहा है। हत्यारे के परिवार के 4 लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। हत्यारे का नाम अब्दुल्लाख अँजोरोख है।

उसके मोबाइल फोन से शिक्षक सैमुअल की तस्वीर भी मिली है, जिसके साथ हत्यारे ने अपना जुर्म कबूल करते डाल रखा था। जब वो 6 साल का था, तभी वो शरणार्थी बन कर फ्रांस आ गया था। साथ ही जिस छात्र के पिता ने सोशल मीडिया पर शिक्षक के खिलाफ लिखा था और उसे बरखास्त करने की माँग की थी, उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया है। अब्दुल्ला हमेशा ‘इस्लामोफोबिया’ के खिलाफ लड़ाई का दावा करता था और सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ ‘समुदाय विशेष के साथ उसके रवैये’ को लेकर लिखता रहता था।

2011 में उसने बुर्के पर लगे प्रतिबंध के बाद विरोध प्रदर्शन भी किया था। साथ ही उक्त शिक्षक के खिलाफ फतवा जारी करने वाले संगठन को भी जाँच के दायरे में लिया गया है। फ्रांस के शिक्षकों का कहना है कि क्लास में मजहब के आधार पर तनाव का माहौल पहले से ही रहा है। शिक्षकों का कहना है कि वो डरेंगे नहीं और ‘सेकुलरिज्म’ के साथ-साथ ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ की शिक्षा बच्चों को देते रहेंगे।

उधर वहाँ के 4 NGO ने ट्विटर के खिलाफ भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हेट स्पीच पर लगाम लगाने में विफल रहने के कारण उसे कोर्ट में घसीटा गया है। हत्यारे का सन्देश और शिक्षक के मृत शरीर के साथ तस्वीर ट्विटर पर डाली गई थी, जिससे वहाँ के कई संगठन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से खफा हैं। हत्यारे ने अपने ट्विटर अकाउंट से भी आपत्तिजनक चीजें डाली थीं। वहाँ के ये NGO सरकार के साथ खड़े हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्क्रों ने भी इस घटना पर रोष जताया था। उन्होंने कहा था, “यह एक इस्लामी आतंकवादी हमला है। देश के हर नागरिक को इस चरमपंथ के विरोध में एक साथ आगे आना होगा। इसे किसी भी हालत में रोकना ही होगा क्योंकि यह हमारे देश के लिए बड़ा ख़तरा साबित हो सकता है।” उनकी सरकार के खिलाफ इस्लामी संगठन सोशल मीडिया पर आवाज़ उठा रहे हैं और कार्रवाई की निंदा कर रहे हैं।

बिहार का वो गाँव जहाँ कभी पूरे राज्य से आते थे कारोबारी, आज फेरी लगाने और पलायन को मजबूर

क्या बिहार से पलायन करने की मजबूरी को रोकने का इलाज बड़े कल-कारखाने ही हैं? क्या बड़ी इंडस्ट्रियों के बगैर राज्य में रोजगार का सृजन नहीं हो सकता?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बयान से यह बहस शुरू हुई है। नीतीश कुमार ने हाल ही में कहा था कि बड़े उद्योग उन राज्यों में लगते हैं जो समुद्र किनारे होते हैं। रोजगार को मुद्दा बनाने की कोशिश में लगी राजद इस बयान को लेकर नीतीश कुमार पर हमलावर है। लालू यादव ने ट्वीट कर पूछा है कि ‘बिहार में अब हिंद महासागर भेजऽल जाओ का?’

इन बयानबाजियों से इतर जमीनी हकीकत कुछ और है जो बताती है कि बिहार में कभी हर हिस्से के अपने उद्योग-धंधे थे। सरकारी उदासीनता की वजह से समय के साथ इन उद्योगों की अकाल मौत हो गई और जिनके पुरखे कभी कारीगर थे, वे मजदूर हो गए। पेट पालने के लिए पलायन उनकी मजबूरी हो गई। इस सूरत को बदलने के लिए न तो लालू प्रसाद यादव ने कुछ किया और न ही नीतीश कुमार ने इस दिशा में गंभीरता दिखाई। वोट के समीकरण भले अलग हों पर जमीन पर इस मोर्चे पर नीतीश कुमार के खिलाफ नाराजगी साफ दिखती भी है।

गया शहर से करीब 28 किमी दूर एक गाँव है केनार चट्टी। वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाला यह गॉंव कभी कांसा और पीतल के बर्तन निर्माण के लिए जाना जाता था। गाँव के करीब 50 परिवार इस काम से सीधे तौर पर जुड़े थे। लेकिन, आज यह सिमट कर 5 घरों तक पहुँच गया है। जो परिवार इस पुश्तैनी काम से जुड़े हैं, अब उनके घर के भी कुछेक सदस्य मजदूरी वगैरह करने के लिए बाहर जाते हैं।

60 साल के राजमोहन कसेरा ने बताया, “20 साल पहले तक यहाँ करीब 50 परिवार इस काम से जुड़े थे। बाहर से व्यापारी माल लेने आते थे। पुराना माल लेकर वे भी आते थे जिसे हम लोग गलाकर रिपेयरिंग कर देते थे। अब यह काम दो-चार घर में होता है, वो भी लगन के हिसाब से बनता है। कुछ लोग फेरी करता है। कुछ लोग बाहर चले गए।”

उन्होंने बताया, “जब से में होश सँभाला हूँ सरकार से कोई फायदा नहीं हुआ है। बहुत से विधायक आए। यहाँ से फोटो भी ले गए। आश्वासन देकर गए आपका उद्योग बढ़ाएँगे। लेकिन फिर लौटकर नहीं आए। इससे हमलोगों का आशा टूट गया तो हमलोग दूसरा-दूसरा रोजगार करना शुरू कर​ दिए। पेट चलाने के लिए करना पड़ता है न। सरकारी मदद मिल जाए तो पहले 50 परिवार जो ये काम करते थे उनका उत्थान हो जाएगा।”

पूरी बातचीत आप नीचे के लिंक पर क्लिक कर सुन सकते हैं;

करीब 25 साल पहले ब्याह कर इस गाँव में आई माला देवी ने बताया कि पहले पूरा घर इसी काम से जुड़ा रहता था। महिलाएँ भी सहयोग करती थीं। लेकिन अब पूॅंजी नहीं होने के कारण लोगों को दूसरा काम करना पड़ता है। वे कहती हैं, “जो हमलोगों का मदद करेगा उसको ही वोट पड़ेगा। जैसे मोदी सरकार है, ई हमलोगों को कुछ मदद किया है। पहले बिजली नहीं था। 5 साल पहले बिजली आई है… नीतीश कुमार मोदिए सरकार का आदमी है। लालू यादव ने कुछ नहीं दिया है।”

25 साल के पंकज कुमार का कहना है कि पहले से स्थिति सुधरी है। लेकिन रोजगार की त्रुटि है। सरकार यदि छोटे छोटे उद्योग पर ध्यान दे दे तो इसका भी समाधान निकल जाएगा।

यह केवल इकलौते केनार चट्टी का ही दर्द नहीं है। बिहार के हर इलाके इसी उपेक्षा की वजह से उजड़ गए। फिर भी बगैर रोडमैप के प्रचार के दौरान राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवार जिस तरह रोजगार और इंडस्ट्री को लेकर बड़े-बड़े दावे और वादे कर रहे हैं, उससे तो नहीं लगता कि वे इस संकट के स्थायी समाधान को लेकर गंभीर हैं।

गरीबों का राशन तो खाया, गाय भैंस का चारा भी खा गए: बिहार में गरजे ‘स्टार प्रचारक’ योगी आदित्यनाथ

बिहार चुनावों के मद्देनजर आज (अक्टूबर 20, 2020) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बिहार में अलग-अलग इलाकों में आधा दर्जन से ज्यादा रैलियों को संबोधित करेंगे। उनकी रैली की शुरूआत 12 बजे कैमूर के रामगढ़ विधानसभा से हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिहार के कैमूर में जनसभा को संबोधित किया। उनकी लोकप्रियता और माँग को देखते हुए योगी आदित्‍यनाथ को भाजपा ने बिहार चुनाव में स्‍टार प्रचारक बनाया है।

उन्होंने संबोधन भारत माता के उद्घोष और वंदे मातरम के नारे के साथ किया। उन्होंने कहा, “भगवान राम की जन्मभूमि से राम के गढ़ रामगढ़ में आया हूँ। त्रेत्तायुग में इसी रामगढ़ को तपोस्थली के रुप में भगवान ने चुना था।”

योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन के दौरान जनता को बताया कि कैसे एनडीए सरकार बिहार के हित में लगी हुई है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी बिहार की सरकार का लाभ कैसे प्रदेश को मिल रहा है। उन्होंने उन चुनावी वादों को गिनवाया जिसके बूते भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था और सरकार में रहते हुए उन्हें पूरा भी किया। फिर चाहे कश्मीर को आतंकवाद से मुक्त कराना हो या फिर राम मंदिर बनवाना हो।

उन्होंने बताया कि कैसे पीएम मोदी व नीतिश सरकार ने बिहार के गरीबों को मुफ्त राशन और गैस दिए। गरीबों को रोजगार दिए। बिन भेदभाव किए गरीबों को मकान भी मुहैया करवाया। योगी आदित्यनाथ बोले कि हमलोग देश की बात करते हैं, वे लोग मजहब की बात करते हैं। जिनके कारण आतंकवाद व नक्‍सलवाद फैला था, अब उन्‍हें मिटाना है।

अप्रत्यक्ष रूप से लालू यादव पर निशाना साधते हुए यूपी सीएम ने कहा कि राजद की सरकार ने गरीबों का राशन तो खाया साथ ही गाय और भैंस का चारा भी खा लिया। यूपी सीएम ने इस दौरान बताया कि कैसे उनकी सरकार ने पाकिस्तान के घर में घुसकर भी मारा और भगवान राम का मंदिर भी बनवा दिया। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान राजद और कॉन्ग्रेस पर खूब तंज कसे और कहा कि उन्होंने शासन लंबे समय तक किया लेकिन उनका एजेंडा कुछ नहीं था।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना संकट के बीच केंद्र और राज्य सरकार ने जनता को मुफ्त में राशन दिया, अगर राजद सरकार होती तो ऐसा नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि वह (भाजपा नेतृत्व वाली सरकार) लोग विकास की बात की करते हैं और दूसरा पक्ष केवल परिवार और जाति की बात करते हैं। योगी आदित्यनाथ ने कहा, “हम एक भारत-श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, लेकिन विरोधी कहते हैं कि देश के संसाधन पर एक ही विशेष मजहब का अधिकार है।”

सीएम योगी ने कहा, बिहार के सामने एक तरफ विकास का गठबंधन है, दूसरी तरफ भेदभाव वाला गठबंधन है। अब उसे सही गठबंधन का साथ चुनना है। कॉन्ग्रेस के एजेंडे में विकास कभी नहीं रहा है। मगर भाजपा सबका साथ सबका विकास की बात करते हैं। उन्होंने याद दिलाया नीतीश सरकार आने से पहले बिहार की क्या स्थिति थी, वह किसी से छिपी नहीं है। इस बार भी एनडीए बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक मजबूत सरकार बनाने जा रही है।

गौरतलब है कि बिहार में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ करीब 18 चुनावी सभाएँ करेंगे। यूपी सीएम की बिहार चुनावों के दौरान हर दिन तीन रैलियाँ होनी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य बड़े नेताओं के बाद योगी आदित्यनाथ की रैलियों की सबसे अधिक माँग है।

बिहार में ई बा: कुछ लोगों के निजी स्वार्थ और धंधे पर चोट है मैथिली ठाकुर का गाना

दहेज़ के बारे में सोचा है? एक तो इसमें ‘ज’ के नीचे जो बिंदी होती है, वो देवनागरी लिपी में होती ही नहीं। यानि ये देशज नहीं, विदेशज शब्द है। दहेज़ जैसा कोई सिद्धांत भारत में नहीं होता था, इसलिए संस्कृत-शुद्ध हिंदी आदि में इसका कोई पर्यायवाची ढूँढना भी वैसा ही होगा जैसे कुर्सी-टेबल, या फिर रेल जैसी चीज़ों का हिंदी पर्यायवाची नहीं मिलता। भाषा चूँकि लोक से वैयाकरणों की ओर बहने वाली नदी है, इसलिए अगर किन्हीं वैयाकरणों ने इसके लिए शब्द गढ़े भी तो उन्हें लोक ने कभी स्वीकार नहीं किया।

इस शब्द के बारे में फ़िलहाल इसलिए सोचना है क्योंकि भारत के लिए ये एक बहुत बड़ी समस्या है। कितनी बड़ी? इतनी बड़ी है कि एक तरफ जहाँ इसे रोकने के लिए भारत में 1961 से कानून हैं, वहीं, दूसरी तरफ दहेज़ का रिवाज़ रोकने के लिए बनाए कानूनों का दुरूपयोग रोकने की बात सर्वोच्च न्यायलय भी कर चुका है। जो पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए समस्या हो, उसके बारे में सामान्य जन में चर्चा ना हो ऐसा कैसे हो सकता है? फ़िलहाल स्थिति ये है कि इसके विरुद्ध बिहार के राजनेता तो बात करते सुनाई देते हैं, मगर जनता की इसपर चर्चा करने में कोई रूचि नजर नहीं आती।

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने दहेज़ के विरोध में पिछले वर्षों में चर्चा की है। बिहार से दहेज़ का रिवाज मिटाने की राजनैतिक कोशिशें कितना रंग लाईं, ये कहना मुश्किल है। कुछेक लोगों ने मुख्यमंत्री के इस पहल पर कदम भी उठाए। मुख्यमंत्री नीतीश ने भी कहा कि मुझे विवाह में आमंत्रित करना हो तो बताएँ कि इस विवाह में दहेज़ नहीं लिया गया। इस कदम के बाद कई लोगों ने दहेज़ ना लेकर शादियाँ की और नीतीश कुमार को आमंत्रित भी किया। मगर इतनी देर तक दहेज़ की बात करने के पीछे हमारा मकसद इस एक सामाजिक बुराई को देखना ही नहीं था, बल्कि कुछ और भी था।

अब जब दहेज़ का आमतौर पर देखा जाने वाला पक्ष हम देख चुके तो आइये सोचते हैं कि ये मिलता किसे है? कोई बेरोजगार हो, कम सुन्दर हो, दिव्यांग हो, तो उसे अधिक दहेज़ मिलेगा या कोई आईएएस हो, डॉक्टर हो, किसी नामी-गिरामी खानदान से हो, तब उसे अधिक दहेज़ मिलेगा? जवाब आपको पता है। कोई बेरोजगार अपना कोई व्यवसाय शुरू कर सके इसके लिए उसे लाखों करोड़ों का दहेज़ नहीं मिलने वाला, लेकिन डॉक्टर को अपना नर्सिंग होम शुरू करने के लिए मिल जाएगा। आपकी जरूरत कितनी बड़ी है, इसके आधार पर दहेज़ नहीं मिलता, आपकी क्षमता कितनी है, दहेज़ इस आधार पर मिलता है।

किसी भी व्यापारिक कर्ज, आर्थिक सहयोग जैसे मामलों में हमेशा यही होता है। ये मुद्रा आपको आपकी क्षमता के आधार पर मिलती है। जरूरत देखकर भीख मिलती है जिससे जैसे-तैसे गुजारा हो सकता है, आगे कोई उन्नति हो, इसकी संभावना भीख से नहीं बनती। जब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग जैसी चीज़ें देखें, तो भी ऐसा ही नजर आएगा। विशेष राज्य का दर्जा या स्पेशल पैकेज की माँग, भीख माँगने जैसा ही है। ये अधिकार की तरह हक़ से नहीं माँगा जाता। इसकी तुलना में अगर गुजरात या महाराष्ट्र जैसे राज्य माँगें, उत्तराखंड माँगे, तो धन सहज ही उपलब्ध हो जाता है।

बिहार को भी अगर आर्थिक सहयोग, निवेश या उद्योगों की स्थापना चाहिए तो उसे बताना होगा कि उसके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। सड़कें हैं, सुरक्षा व्यवस्था है, कुशल श्रमिक उपलब्ध हैं, व्यापार के लिए सरकारी मदद का माहौल है, तब तो कोई आकर निवेश करना चाहेगा। जब तक ऐसा निवेश नहीं आएगा ‘विकास’ नहीं होगा। इसकी तुलना में तथाकथित प्रगतिशील पक्षकार जो चंदे-मदद के नाम पर अपने एनजीओ के लिए कुछ फंड माँगना कहते हैं, वो क्या करते हैं? वो कहेंगे गरीबी है, बाढ़ है, बीमारी है, आओ हमें भीख दे दो! ऐसे में जब कोई लड़की कह देगी कि ये अच्छी चीज़ें भी हैं हमारे पास तब क्या होगा?

मैथिली ठाकुर का ‘बिहार में ई बा’ गा देना तो सीधे सीधे उनके धंधे पर ही चोट है! पेट पर कोई लात मार दे और वो बिलबिलाएँ भी नहीं, ऐसा कैसे हो सकता था? मैथिली का गाना उनके ‘विकास’ की राह में रोड़ा है। उन्हें राज्य के विकास से कोई लेना देना नहीं, उनके निजी स्वार्थों से इस गीत के बोल टकराते हैं। ये विवाद गीत पर नहीं हो रहा, ये निजी स्वार्थ के सामाजिक हितों से टकराव का शोर है।

TOI ने पीवी सिंधु को ले कर फिर फैलाई फेक न्यूज, बैडमिंटन स्टार ने लगाई क्लास

फेक न्यूज फैलाने के कारण बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की ट्विटर पर जमकर क्लास लगाई है। पीवी सिंधु ने कहा है कि टाइम्स के पत्रकार को खबर लिखने से पहले तथ्य जान लेने चाहिए वरना उन्हें पत्रकार के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

बता दें कि समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने पीवी सिंधु को लेकर आज (अक्टूबर 20, 2020) एक खबर पब्लिश की। इस खबर में उन्होंने बताया कि ‘निजी कारणों’ से पीवी सिंधु ने ओलिंपिक को लेकर लगे नेशनल कैंप को छोड़ दिया और वह लंदन चली गईं।

इस रिपोर्ट में लिखा गया कि पीवी सिंधु और उनके परिवार के बीच तनाव चल रहा है। साथ ही वह हैदराबाद छोड़ने से पहले अपने कोच को बता कर गई हैं कि वह भारत 8-10 हफ्तों से पहले नहीं आएँगी। इसके अलावा, ‘सूत्रों का हवाला’ देकर TOI की रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि जीवन के इस पड़ाव पर सिंधु को किसी और द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाना चाहिए।

अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया पर मंगलवार सुबह 9:35 पर प्रकाशित हुई इसी खबर को शेयर करते हुए पीवी सिंधु ने 11 बजे के आस पास लिखा कि वह जीएसएसआई के साथ अपने पोषण और रिकवरी की जरूरतों पर काम करने के लिए कुछ दिन पहले लंदन आई थीं। सिंधु ने स्पष्ट किया किउनके लंदन जाने के बारे में उनके माता-पिता को भी पता है और इसमें फैमिली टेंशन जैसी कोई बात नहीं है।

पीवी सिंधु कहती हैं, “मुझे मेरे माता-पिता से क्यों दिक्कत होगी जिन्होंने अपनी जिंदगी में मेरे लिए कुर्बान की। मेरा परिवार मुझसे बहुत जुड़ा हुआ है और वह मुझे हमेशा समर्थन करते हैं। मैं अपने परिवार से लगातार संपर्क में हूँ।” वह बताती हैं कि उन्हें उनके कोच गोपीचंद के साथ या उनकी अकादमी में प्रशिक्षण की भी कोई समस्या नहीं है।

आखिर में वह टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर लिखने वाले पत्रकार एम रत्नाकर को आड़े हाथों लेते हुए कहती हैं, “श्रीमान एम रत्नाकर, टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्टर, जो झूठी खबर फैला रहे हैं, उन्हें ये सब लिखने से पहले तथ्य पता करने चाहिए। अगर वह नहीं रुकते तो मुझे उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करनी होगी।”

बता दें कि पीवी सिंधु ने सोमवार को अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर जानकारी दी थी कि वह यूके आई हैं अपनी रिकवरी और न्यूट्रिशन पर काम करने। टाइम्स की रिपोर्ट में यह जानकारी देते हुए लिखा गया कि उनके सूत्रों के मुताबिक सिंधू यूके में 10 दिन ठहरने वाली हैं।

TOI पीवी सिंधु के बारे में पहले भी फैला चुका है फेक न्यूज़

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्ष भारतीय शटलर पीवी सिंधु के बारे में फर्जी खबरें फैलाई हो। जुलाई 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में, TOI ने जोर देकर कहा था कि पीवी सिंधु ने भारतीय ओलंपिक संघ से आग्रह किया था वे CWG खेलों में शूटिंग को हटाने पर इसका बहिष्कार करेंगे। दरअसल, बर्मिंघम में होने वाले कॉमनवेल्थ खेल 2022 में शूटिंग शामिल नहीं होगा। इससे नाराज भारत इन खेलों पर बहिष्कार का विचार कर रहा है। इसी TOI ने पीवी सिंधु के हवाले से फेक न्यूज़ प्रकाशित कर डाली थी।

TOI को लताड़ लगते हुए पीवी सिंधु ने कहा था, “उन्होंने मुझे गलत तरीके से समझा जहाँ मैंने बतौर खिलाड़ी स्पष्ट तौर पर कहा था कि हम सभी किसी भी खेल स्पर्धा में भाग लेना चाहते हैं, लेकिन भारतीय ओलंपिक संघ और हमारी सरकार जो भी निर्णय लेती है मैं उसका हमेशा समर्थन करुँगी।”

बेंगलुरु: HC ने दुनिया की सबसे ऊँची जीसस प्रतिमा के निर्माण पर लगाई रोक, कॉन्ग्रेस नेता ने अवैध रूप से दिलाई थी 15 एकड़ सरकारी भूमि

कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को बेंगलुरु से 80 किलोमीटर दूर कपालबेट्टा में जीसस क्राइस्ट की दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा पर चल रहे कार्य को रोकने का आदेश दिया, जिसका शिलान्यास कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने किया था। रामनगर जिले में चल रहे इस काम को रोकते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि उसकी अनुमति के बिना इस पर कोई काम नहीं होना चाहिए। एक PIL पर सुनवाई करते हुए उच्च-न्यायालय ने ये आदेश सुनाया।

उक्त PIL में कहा गया था कि जीसस क्राइस्ट की प्रतिमा बनाने के लिए अवैध रूप से भूमि का आवंटन किया गया था। साथ ही आरोप लगाया गया था कि दो बड़े नेताओं और उनके अनुयायियों के निजी हितों की पूर्ति करने के लिए सरकारी संपत्ति पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया गया। याचिका में आरोप लगाया गया कि ईसाई समुदाय के तथाकथित ‘अभिभावकों’ ने ऐसा किया। अब ‘हरोबेले कपालबेट्टा अभिरुद्धि ट्रस्ट’ को कंस्ट्रक्शन का कार्य आगे बढ़ाने से रोक दिया गया।

एंथोनी स्वामी और 7 अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश अभय श्रीनिवास ओका और जस्टिस अशोक एस किनगी की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और ट्रस्ट को अंतरिम आदेश जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि कनकपुरा में ईसाईयों की संख्या 2000 ही है, जो काफी कम है। इनमें से 1500 होरोबेले और नल्लाहल्ली गाँवों में रह रहे हैं। फिर यहाँ जीसस क्राइस्ट की इतनी बड़ी प्रतिमा बनाने का क्या औचित्य है?

आरोप है कि तत्कालीन ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार और उनके भाई व बेंगलुरु रुरल के सांसद डीके सुरेश ने फ़रवरी 2017 में रामनगर के डिप्टी कमिश्नर से कह कर इस कार्य को शुरू करवाया था। ईसाई समुदाय द्वारा किसी भी प्रकार की माँग के बिना ही इन दोनों भाइयों ने इस काम के लिए 15 एकड़ की सरकारी जमीन उपलब्ध करा दी। कहा गया है कि गाँव में एक चर्च पहले से ही है, ऐसे में 15 एकड़ में फिर से चर्च और ईसाई संरचनाएँ बनाना सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है।

कर्नाटक लैंड ग्रांट रूल्स की धारा-17 के तहत पब्लिक नोटिस जारी किए बिना ही भूमि उपलब्ध करा दी गई। तहसीलदार ने डिप्टी कमिश्नर को रिपोर्ट भेज दी कि ग्रामीणों को इससे कोई दिक्कत नहीं है। स्थानीय ग्राम पंचायत से जल्दी-जल्दी में ही अनुमति ले ली गई। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति का इस्तेमाल निजी कार्यों के लिए नहीं हो सकता। जमीन उपलब्ध कराने को फॉरेस्ट एक्ट का भी उल्लंघन बताया गया है।

दिसंबर 2019 में क्रिसमस के मौके पर बताया गया था कि कथित तौर पर, प्रतिमा की कुल ऊँचाई 114 फीट होगी और शिलान्यास की प्रक्रिया ईसा मसीह के दाहिने पैर की पूजा करके की गई थी। क्राइस्ट द रिडीमर प्रतिमा रियो डी जनेरियो की ऊँचाई 98 फीट है और ब्राजील में 26 फीट है। क्रिसमस के अवसर पर, डीके शिवकुमार ने ट्रस्ट को ज़मीन से संबंधित दस्तावेज़ सौंपे थे। साथ ही शिलान्यास भी किया था।

हिन्दुओं की हत्या पर मौन रहने वाले हिन्दू ‘फ़्रांस की जनता’ होना कब सीखेंगे?

फ़्रांस में एक शिक्षक की इस्लामी आतंकवादी ने हत्या कर दी। घटना श्वेत पश्चिमी विकसित राष्ट्र में हुई थी तो निंदा वैश्विक थी एवं क्षोभ सार्वजानिक। भारत में ऐसी घटनाओं का इतना सामान्यीकरण हो चुका है कि अब न जनता से प्रतिक्रिया होती है न सरकार से। यदि प्रतिक्रिया हो भी तो शाब्दिक निंदा पर ही इस्लामविरोधी इत्यादि आरोप लगा कर लोगों को चुप करा दिया जाता है। श्वेतवर्णी समाज के एक व्यक्ति के जीवन का मूल्य चार अश्वेतों के समान अमेरिकी संविधान में 1964 तक माना जाता था।

वैचारिक दासता के दौर में आज भी उसमें अधिक परिवर्तन नहीं है जब यूरोप के राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के प्रताड़ित को शरण दें तो उसे मानवता कहा जाता है परन्तु यही जब भारत नागरिकता संशोधन के द्वारा करना चाहे तो वही पश्चिमी देश झुण्ड बना कर भारत की सम्प्रभुता पर टूट पड़ता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत में सरकार भी एक रामलिंगम, ध्रुव त्यागी, कमलेश तिवारी या राहुल राजपूत की हत्या पर सार्वजानिक वक्तव्य देने से बचती है। ऐसी मानव जीवन की क्षति पर सरकार की ओर से हर्जाना भी भिन्न-भिन्न मिलता है। सत्ता की सौतेली संतान होने का कष्ट उभर आता है, और लोग सरकार से नाराज़ हो लेते हैं।  

भारतीय जनता पार्टी दूसरी बार सरकार में है परन्तु ऐसे समय रोष भाजपा के समर्थकों में अधिक दिखता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इस जघन्य घटना की निंदा बिना लाग लपेट के इस्लामिक कट्टरवाद को जिम्मेदार ठहराते हुए कर सकते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? इस प्रश्न पर मेरा एक ही उत्तर है कि हमें वे तस्वीरें देखनी चाहिए जो फ्रांस की घटना के पश्चात विभिन्न शहरों में दिखती हैं। सैकड़ों की सँख्या में फ्रांसीसी नागरिक सड़कों पर उतरे यह कहते हुए – “हम भयभीत नहीं हैं।” दिल्ली में राहुल राजपूत की हत्या हुई, कैराली में पुजारी की हत्या हुई, उन्नाव में दो पुजारियों की हत्या हुई, पालघर में साधुओं की पुलिस के सामने हत्या हुई। हम पूछते हैं कि सरकार कुछ क्यों नहीं बोली, प्रधानमंत्री कुछ क्यों नहीं बोले?

सरकार बनने के बाद राजनीतिक दलों का काम समाप्त होता है परंतु समर्थकों का काम आरंभ होता है। नेता रोडवेज़ के ड्राइवर की तरह होते हैं, और सवारी भरने पर ही बस में बैठते हैं। हज़ार लोगों का जुलूस कई शहरों में  निकाल दीजिए, नेता पहुँच जाएँगे और चौड़े मे समर्थन में भाषण भी देंगे। समर्थन में उतरी संख्या ही उनके राजनीतिक सरोकार तय करती है, उन्हें स्पष्ट बोलने का साहस देती है। झारखंड में एक हत्या हुई, केरल से लेकर दिल्ली तक लोग सड़क कर उतर गए। दिल्ली में पिछले दो महीने में दो हत्याएँ हुईं। तबरेज तो मार पीट के पाँच दिन बाद मरा, ये दोनों हत्याएँ तो तथ्यात्मक रूप से पिटाई से ही हुई। कितने लोग सड़क पर उतरे? पालघर में साधुओं की हत्या पर कितनी रैली निकली?

जब आप अपनी बात नहीं उठा सकते हैं तो सरकार क्यों उठाएगी? यदि लोग सड़क पर 2014 में नहीं उतरते तो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में नहीं होती। बस का ड्राइवर बस यात्रियों को पहुँचाने के लिए चलाता है, लाँग ड्राइव के लिए नहीं। कोई भी बस का ड्राइवर बिना सवारी ख़ाली बस लेकर कोई नहीं जाएगा।

राजनीतिक बस पर चढ़िये, राजनीति भी बदलेगी, राजनैतिक संवाद भी। दस बड़े शहरों में दो-दो हज़ार की संख्या में लोग सड़क पर उतर कर पालघर पर न्याय माँगते तो मोदी क्या राष्ट्रपति भी राष्ट्र को संबोधित कर के निंदा करते। पालघर में कैमरे पर साधुओं की हुई हत्या पर तो सुशांत सिंह राजपूत के लिए न्याय माँगने वाले भी चुप है।

राजनीति एक बस स्टैंड है। हम एक नागरिक के नाते उस बस पर चढ़ना चाहते हैं जो भरी हुई है क्योंकि हमें लगता है वो बस पहले निकलेगी। सरकार भरी हुई बस को पहले स्टैंड से निकालती है। दोनों बातों में विरोधाभास है। हम टहल रहे हैं कि ड्राइवरआए तो बस में चढ़ेंगे, ड्राइवर चाय की प्याली पर प्याली पीते हुए दूर से दृष्टि रखे है की सवारियाँ भरें तो बस में जा के बैठे। क्या कारसेवा के बिना राम जन्मभूमि का निर्णय होता? क्यों न्यायपालिका उसे कश्मीरी पंडितों के केस की तरह प्राचीन मान कर न्यायपालिका से बाहर क्यों नहीं भेज देती। क्योंकि उस प्रश्न की बस तो अयोध्या गंतव्य के लिए निकली वह सवारियों से भरी हुई है। 

सरकार आपके सोशल मीडिया के उत्कर्ष प्रलाप को पढ़कर काम नहीं करेगी। यह न तो सरकार के स्वभाव में है, न ही यह सरकार के लिए उचित ही है। सोशल मीडिया पर तो लोग मिनी स्कर्ट पर भी क्षोभ प्रकट करने लगते हैं, उस विलाप और प्रलाप पर सरकार कोई रूचि क्यों ले। उस पर कोई दल अपनी राजनीतिक पूँजी क्यों लगाएगा? भारत मे 13 मिलियन या 1.3 करोड़ लोग ट्विटर पर हैं। मान लीजिए भाजपा के वोट शेयर के बराबर, लगभग 40% भाजपा समर्थक हैं। ये बने कोई पचास लाख। 130 करोड़ के देश में क्या राजनीति पचास लाख लोगों के विचारों पर होगी? मैं तो यह मानता हूँ कि ऐसा भ्रम पैदा कर के सत्ता पक्ष विपक्षियों को व्यस्त रखा जाता है। कॉन्ग्रेस की सम्पूर्ण राजनीति सोशल मीडिया पर सिमट गई है और यह मान कर चल रही है की सरकारें वहीं से बनती हैं। राहुल गाँधी ट्विटर पर ज्ञान देते हैं, चुनाव हार जाते हैं।

घरों में बैठ कर समाज या सरकार दोनों नहीं बदली जाती। विपरीत विचारधारा सड़क पर उतरती है, अदालत में जाती है, माहौल बनाती है और सरकार को उस पर जुड़ना ही पड़ता है। महाराष्ट्र में यदि जनता धरने पर उतरती, अदालत में अर्ज़ी दाखिल होती तो पालघर के लिए जाँच के लिए केंद्रीय ब्यूरो क्यों न उतरता या किसी न्यायाधीश के निरीक्षण में जाँच क्यों नहीं होती। साधुओं के परिवारों को, राहुल राजपूत के परिवार को शासन से वही मदद क्यों नहीं मिलती जो जुनैद और तबरेज़ को मिली। मोदी जी भी सार्वजनिक मंचों से घटना की निंदा करते। 130 करोड़ के देश में एक हत्या अन्य हत्याओं के मुक़ाबले प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के ध्यान या समय के योग्य क्यों है, इसका निर्णय इस पर है कि मूक रहने पर और बोलने पर कितना समर्थन मिलता है। 

अपेक्षाएँ होती हैं तो ऐसे प्रश्न उठते हैं। ऐसे ही प्रश्न योगी आदित्यनाथ से भी पूछे जाते हैं। उनसे यही कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री बनाए हो प्रभु, लठैत नहीं रखे हो। सड़क बन रही है, कोरोना नियंत्रण में है, दंगे दिल्ली से उत्तरप्रदेश नहीं फैले, माफिया के घर टूट रहे हैं, उद्योग आ रहे हैं। गोरखपुर में बालकों की जापान इनसेमफिलिटिस से मृत्यु लगभग बंद हो गई है। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री का पद संवैधानिक पद है। अब कॉलोनी में ‘जागते रहो, जागते रहो’ कर के भी महाराज जी लाठी पीटते तो नहीं घूमेंगे। 

एक ओर वह वर्ग या समाज है जो राजनीतिक एवं वैधकीय अतिसक्रियता का लाभ शासन से और न्यायपालिका से अपनी पसंद के निर्णय एवं वक्तव्य निकाल रहा है। आपको सत्ता का वही स्नेह चाहिए तो आपको भी सड़क पर आना होगा, एक संख्या बल सड़क पर दिखाना होगा जिसकी विदेशी मीडिया भी उपेक्षा न कर सके। यदि दिल्ली की या मुंबई की सड़कें भर जाएँ पालघर पर तो उन्हें रिपोर्ट करना होगा, उन्हें इसका कारण भी अपनी रिपोर्ट में लिखना हो गए।

आप न्यायपालिका का ध्यानाकर्षण इन विषयों पर करते रहे तो उन पर निर्णय भी होंगे और समाचार पत्रों को छापने भी होंगे। आप बीस करोड़ पोस्ट कार्ड लिख के प्रधानमंत्री कार्यालय भेजेंगे तो प्रधानमंत्री भी उस पर ध्यान देंगे, कानून भी संसद में लाएँगे। मंदिर भी सरकारी प्रतिबन्ध से बाहर निकालेंगे, संभवतः संविधान के आपातकाल में कए गए संशोधन भी हटेंगे यदि जैसा वामपंथी करते हैं दक्षिणपंथी कानून, मीडिया और सड़क पर प्रदर्शन को साथ में जोड़ कर मुहिम चलाते हैं।  

भारत पर गौरी या ख़िलजी की जीत का बड़ा कारण जनता का जातियों में कटा रहना था, जिसके कारण बड़ा वर्ग न युद्ध के लिए प्रशिक्षित था ना ही उसमें रुचि रखता था। जैसे आज लोग पालघर या दिल्ली लिंचिंग पर मोदी को कोसते हैं, तब पृथ्वीराज चौहान को कोसते होंगे। सोचिए। पसंद की सरकार को सत्ता पर बैठा कर जनता के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती है। सत्ता वर्षों से बने समीकरणों को, लोकतंत्र ही सामाजिक सिद्धांतों में परिवर्तन ला सकता। एक राष्ट्र की जनता जब अपने शासकों को सामाजिक परिवर्तनों का उत्तरदायित्व सौंप कर उदासीन एवं निष्क्रिय हो जाती है, उसका क्षेत्र जावा से, वियतनाम से, ईरान से, बर्मा से पाकिस्तान और बांग्लादेश से संकुचित होता होता वहाँ पहुँच जाता है जहाँ एक संस्कृति के लिए अपने पँजों पर खड़े होने की भूमि भी नहीं होती है।

संस्कृति की रक्षा निष्क्रिय प्रेम से नहीं होती है, सक्रिय कर्म से होती है। यदि भ्रष्ट्राचार के विरोध में जनता2014 में सड़क पर नहीं उतरी होती, तो आज प्रधानमंत्री मोदी भी सत्ताधीश नहीं हुए होते। संख्या बल वही सक्षम होता है जो साक्ष्य होता है, स्पष्ट होता है। सरकार को चुनकर हमने कोई ठेका नहीं दिया है, और दिया भी हो तो उपभोक्ता की उपेक्षा की स्थिति में तो ठेकेदार उतना ही और उसी गुणवत्ता का कार्य करता है जितना न्यूनतम आवश्यक हो। सरकार से उस न्यूनतम सीमा से अधिक कार्य कराना हो तो बोलना होगा, लिखना होगा, पहुँचना होगा, सबसे बढ़कर – एक हो कर दिखना होगा।

एक फ़िल्म कुछ वर्षों पहले आई थी- गुलाल! उसके एक वाक्य को शिष्टता का आवरण पहना कर यह लेख समाप्त करता हूँ- “अपने पृष्ठपटल पर बैठे रहने से स्वराज्य नहीं आएगा, धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं होगी।” राष्ट्रीय राजनीति उतनी ही नैतिक होगी जितना नागरिक जागृत होगा। एक बार फिर फ्रांस में सड़कों पर उमड़ी, श्रद्धांजलि देती जनता का चित्र देखें और विचार करें।

महाराष्ट्र में रोज गायब होती हैं 105 महिलाएँ, इनमें से 95.6% का होता है यौन शोषण- NCRB

महाराष्ट्र में महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं और राज्य की तीनों सत्ताधारी पार्टियाँ दूसरे राज्यों में हो रही घटनाओं पर बयान देते नहीं तक रही। NCRB के आँकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र में रोज 105 महिलाएँ रोज गायब होती हैं और हर सप्ताह 17 महिलाओं की तस्करी की जाती है, उनका यौन शोषण होता है। अगर अन्य राज्यों के साथ तुलना करें तो महाराष्ट्र में महिलाओं के गायब होने और उनके तस्करी होने की घटनाएँ सबसे ज्यादा हैं।

इसके बाद मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। महाराष्ट्र में तस्करी के जो 989 मामले दर्ज किए गए, उनमें से 88% महिलाएँ हैं और 6% बच्चे हैं। बंधुआ मजदूर बनाने के लिए, शरीर के अंगों को निकाल कर बेचने के लिए, ड्रग्स तस्करी के लिए, यौन शोषण के लिए और जबरदस्ती शादी के लिए महिलाओं की तस्करी की जाती है। अगर महाराष्ट्र की बात करें तो वहाँ गायब महिलाओं में से 95.6% महिलाओं को जबरन वेश्यावृत्ति में धकेल कर उनका यौन शोषण करने के लिए तस्करी की जाती है।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि साल दर साल ये आँकड़े बढ़ते ही दिख रहे हैं क्योंकि 2019 में 2018 के मुकाबले ऐसे मामलों में 13% की वृद्धि देखी गई। 2018 में तो बच्चों की तस्करी के मामले में राज्य भारत के शीर्ष 10 राज्यों में था भी नहीं। लेकिन, अब ये चौथे नंबर पर आ गया है। एक साल में कुल 4562 बच्चे गायब कर दिए गए। इनमें से आधी से ज्यादा, 55% लड़कियाँ थीं। बावजूद इसके इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

मुंबई, पुणे और नागपुर में महाराष्ट्र के 3 बड़े शहर हैं और इन तीनों में कई बड़े रेड लाइट क्षेत्र हैं। आशंका जताई जा रही है कि ये क्षेत्र अब लड़कियों को गायब कर के उन्हें वेश्यावृत्ति की ओर धकेलने के लिए एक माध्यम बन गए हैं। राज्य में इन मेट्रो सिटीज के अलावा कई अन्य शहरों में भी छोटे और माध्यम रेड लाइट एरियाज की भरमार है। और राज्य में ऐसे क्षेत्रों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।

‘मुंबई मिरर’ की खबर के अनुसार, अपहरण और उठाईगिरी के मामले में पूरे देश के मामलों में 0.7% की मामूली गिरावट देखी गई है, लेकिन महाराष्ट्र में ये मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। 2019 में अपहरण के मामलों में महाराष्ट्र काफी ऊपर रहा और पिछले साल के मुकाबले ये संख्या 1.3% बढ़ ही गई। जहाँ मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं या विकास के मौके नहीं हैं, उन क्षेत्रों में तस्कर सबसे ज्यादा निशाना बना रहे हैं।

बता दें कि हाल ही में संजय राउत ने कंगना रनौत को ‘हरामखोर’ कह कर संबोधित किया था। एक महिला पर ऐसी अभद्र टिप्पणी के चलते संजय राउत की जम कर आलोचना हुई थी। लोगों का कहना था कि जब राज्य के सत्ताधीश ही महिलाओं को लेकर ये नजरिया रखते हैं तो फिर महिलाओं के साथ अपराध के मामलों में वो कैसे एक्शन लेंगे? वहीं हाथरस पर महाराष्ट्र की तीनों सत्ताधारी पार्टियाँ शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस – सभी भाजपा पर हमलावर थीं।

सैयद मुस्तफा ने हिन्दू प्रेमिका को भाई जमील के साथ मिलकर उतारा मौत के घाट

हैदराबाद में एक हिंदू लड़की को उसके प्रेमी सैयद मुस्तफा ने अपने भाई जमील के साथ मिलकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। घटना रेन बाजार में शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) की रात घटी। पुलिस के संज्ञान में मामला अगले दिन सुबह आया।

‘द हंस इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को लड़की का शव रेन बाजार में एक होटल के नजदीक मिला। लड़की मूल रूप से संगारेड्डी जिले के नारायणखेड़ा इलाके में नागलगिंडा मंडल के करंगुट्टी इलाके से थी। वह कुछ समय पहले ही हैदराबाद आई थी और दत्तानगर में रह रही थी।

इसके अलावा, वह महात्मा गाँधी लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई कर रही थी और पीपल्स फॉर एनिमल सोसायटी की सक्रिय वॉलिंटियर थी। यहीं वह सैयद मुस्तफा से मिली। वह भी उसी सोसायटी से जुड़ा था और वॉलिंटियर का काम करता था। दोनों के बीच की दोस्ती धीरे धीरे प्रेम में बदल गई और दोनों ने शादी करने की सोची।

हालाँकि, कुछ दिन बाद मुस्तफा लड़की को नजरअंदाज करने लगा। उसने उसकी कॉल उठानी बंद कर दी। समय बीतने पर युवती ने मुस्तफा के घर जाने की ठानी और पूछना चाहा कि आखिर वह उससे क्यों दूरी बना रहा है। मगर, जब वह वहाँ पहुँची तो मुस्तफा के भाई और उसमें झगड़ा हो गया।

मुस्तफा का भाई जमील भी उससे लड़ाई करने लगा। यह सब करीब सुबह 4 बजे तक चलता रहा। इसके बाद मुस्तफा ने युवती को दिलासा दिया और उसे घर छोड़कर आने की बाद कही। लेकिन यह सब सिर्फ़ एक नाटक था। बाद में सैयद ने अपने भाई जमील के साथ मिलकर लड़की को चाकू से घोंपकर मौत के घाट उतारा और फिर दोनों उसे रेन बाजार में छोड़कर फरार हो गया।

पुलिस ने हत्या के केस में दोनों के ख़िलाफ़ उपयुक्त धाराओं में व एसएसी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। शव को ओसमानिया अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। अब आगे पुलिस हर संभव नजरिए से इस केस की जाँच कर रही है।