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JNU का ठग: खुद को PMO का सलाहकार बता फर्जीवाड़ा करने वाला छात्र गिरफ्तार, अरब भेज रहा था ₹2.23 करोड़ का माल

जेएनयू (JNU) के एक छात्र अनिकेत डे को धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। अनिकेत डे नामक ये छात्र न सिर्फ खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का एडवाइजर (सलाहकार) बताता था, बल्कि इसने इस तरह का फर्जीवाड़ा कर के लाखों रुपए की हेराफेरी की है। 22 वर्षीय आरोपित जेएनयू (JNU) में एमए का छात्र है। अनिकेत पहले भी धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार हो चुका है। इस बार वो एक्सपोर्ट के नाम पर जालसाजी कर रहा था।

उक्त जेएनयू (JNU) छात्र ने सऊदी अरब में फेस मास्क की खेप का निर्यात करने के लिए जाली नोटिफिकेशन जमा कराया था। साथ ही दिल्ली स्थित इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से कस्टल क्लीयरेंस के लिए इसने कम्पनी से 7 लाख रुपए ठग लिए थे। जब अधिकारियों ने अनिकेत डे से पूछा कि वो कौन है, तो उसने खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में सलाहकार बताया। लेकिन, जाँच के बाद उसकी पोल खुल गई।

अधिकारियों ने तुरंत इसकी सूचना IGI एयरपोर्ट थाने को दी, जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उसके पास से PMO की नकली आईडी और विजिटिंग कार्ड भी बरामद किया गया है। पुलिस अब इस मामले की जाँच में जुटी है कि इससे पहले ये कितनों से इसी तरह एयरपोर्ट के नाम पर रुपए ऐंठ चुका है। एक कारोबारी को उसने 2.23 करोड़ रुपए का फेस मास्क सऊदी अरब भिजवाने का झाँसा दिया था।

‘अमर उजाला’ की खबर के अनुसार, पूर्वी दिल्ली में अनुज जैन नामक कारोबारी की कपड़ों की फैक्ट्री है, जिन्होंने लॉकडाउन में काम बंद होने के बाद फेस मास्क की सप्लाई शुरू की। उसकी मुलाकात जेएनयू (JNU) छात्र अनिकेत से हुई, जिसने उन्हें फेस मास्क की सप्लाई सऊदी अरब भिजवाने का झाँसा दिया। उसने 5 लाख रुपए एडवांस में ले लिए।  डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) की अनुमति वाला लेटर भी बनवा लिया गया।

जाँच में ये पत्र फर्जी निकला। इस मामले में सितम्बर 11, 2020 को ही एफआईआर दर्ज कराई गई थी। अनुज जैन ने भी ठगी का मामला गाजीपुर थाने में दर्ज कराया था। अब अनिकेत को असम से गिरफ्तार किया गया है। उसने अनुज जैन से कार भी ले रखी थी।  नोएडा की एमिटी यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाले अनिकेत ने ‘दी थ्री टेल्स’ नामक पुस्तक भी लिख रखी है। उसने कस्टम अधिकारियों को धमकाया भी था। वो साइबर एक्सपर्ट भी है।

वो सोशल मीडिया पर भी खुद को PMO का यूथ सलाहकार बता कर धौंस जताता था। सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लग पाई थी। उसने लॉकडाउन में अपना वीआईपी पास भी बनवा लिया था। साथ ही उसने कारोबारी अनुज का भी पास बनवाया था। 1 महीने पहले इन्हीं फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उसने बेंगलुरु के एक होटल में कमरा बुक कराया था, जहाँ झगड़ा होने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया था।

उत्पादों के मूल निर्माता देश व अन्य जानकारी का जिक्र ना करने पर फ्लिपकार्ट, अमेजन को सरकार का नोटिस, 15 दिन में माँगा जवाब

भारत सरकार ने फ्लिपकार्ट व अमेजन जैसे ई-कॉमर्स समूहों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए उन्हें नोटिस भेजा है। केंद्र सरकार ने देश और विदेश के कई ई-कॉमर्स समूहों के प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले सामानों पर उनके मूल उत्पत्ति वाले देश की जानकारी तथा अन्य जरूरी सूचनाएँ नहीं दिए जाने को लेकर यह नोटिस जारी किया है, जिसमें अमेरिका की ऑनलाइन रिटेल कंपनी अमेज़न (Amazon) और भारत में वालमार्ट (WalMart) की सहयोगी कंपनी फ्लिपकार्ट (Flipkart) भी शामिल है। 

इनके अलावा भी सरकार ने देश की लगभग सभी ई-कॉमर्स कंपनियों को नोटिस भेजा है। नोटिस में सरकार ने पूछा है कि वह जितने भी उत्पाद अपने प्लेटफॉर्म से बेचते हैं उन पर ‘कंट्री ऑफ़ ओरिजिन’ (उत्पाद की बिक्री किस देश में हो रही है) यानी, उनके मूल उत्पत्ति वाले देश की जानकारी समेत कई अहम जानकारी का उल्लेख क्यों नहीं होता है? यह जानकारी पूरी तरह से क़ानूनी हैं और इनकी उत्पाद पर मौजूदगी अनिवार्य है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह सूचना खाद्य मंत्रालय के उपभोक्ता मामलों वाले विभाग की तरफ से जारी की गई है। साथ ही साथ यह भी आदेश दिया है कि ई कॉमर्स कंपनी 15 दिन के भीतर इस मुद्दे पर जवाब दें। केंद्र सरकार की तरफ से जारी किए गए नोटिस के अनुसार देश की कई बड़ी ई कॉमर्स कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर बेचे जाने वाले उत्पादों से जुड़ी वैधानिक जानकारियाँ उपलब्ध नहीं करा रही हैं। 

नोटिस में कहा गया है, “विज्ञापनों की जाँच में पाया गया कि जो जरूरी घोषणाएँ हैं, वे नहीं की जा रही हैं।” नियम के तहत ई-कॉमर्स कंपनियों को अनिवार्य रूप से वस्तु की ‘ऑरिजिन कंट्री’ समेत अन्य जरूरी जानकारी देनी होती है। उन्हें इसके बारे में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क पर सूचना देनी है, जिसके जरिए वे लेन-देन करते हैं।

सरकार ने अमेज़न डेवलपमेंट सेंटर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और फ्लिपकार्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को जारी किए गए नोटिस में कहा कि वह ई कॉमर्स इकाइयाँ हैं, ऐसे में उन्हें अनिवार्य रूप से उत्पादों की क़ानूनी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। नोटिस में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख है कि क्योंकि अमेज़न और फ्लिपकार्ट ने इस तरह की क़ानूनन बाध्यकारी जानकारी मुहैया नहीं कराई, इसका सीधा मतलब है कि इन्होंने संबंधित नियमों का उल्लंघन किया है। 

मामले में सबसे अहम बात यह है कि केंद्र सरकार ने जितनी ई कॉमर्स कंपनी को सूचना जारी की है उन सभी को 15 दिन के भीतर इस मुद्दे पर अपनी तरफ से स्पष्टीकरण देना होगा।  

जंगलराज का डर ऐसा कि लालू से अपने भी काट रहे कन्नी, ‘मोदी के हनुमान’ कहीं चुस्त तो कहीं सुस्त

बिहार का इस बार का विधानसभा चुनाव कई मामलों में अलग दिख रहा है। मसलन, 90 के बाद यह पहला चुनाव है जिसकी चर्चा के केंद्र में लालू प्रसाद यादव नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो 23 अक्टूबर को राज्य में पहली चुनावी रैली करने वाले हैं, उन पर विपक्ष सीधे हमले से बच रहा है।

राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन के उम्मीदवार भी सार्वजनिक रूप से बेरोजगारी, पलायन और विकास की बात कर रहे हैं। वे उस कथित सांप्रदायिकता का डर भी वोटरों को नहीं दिखा रहे हैं, जिसे लालू पहले आडवाणी और बाद में मोदी का ‘डर’ दिखाकर बेचा करते थे। न ही लालू के कथित सामाजिक न्याय की कोई चर्चा हो रही है।

विपक्ष के निशाने पर नीतीश कुमार हैं और एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ रही चिराग पासवान की लोजपा के निशाने पर भी। पर चीजें इतनी भी सुलझी नहीं हुई है। एक सीट पर जो किसी उम्मीदवार की ताकत दिखती है, दूसरी सीट पर उसका लाभ नहीं दिख रहा। मसलन –

  • चकाई से सुमित सिंह बतौर निर्दलीय मैदान में हैं। चकाई ही नहीं आसपास की सीटों पर भी आप उनका नाम सुनेंगे। लोगबाग बताते हैं कि पिछला चुनाव हारने के बाद भी वे लगातार सक्रिय रहे। उनकी चुनावी संभावनाएँ बेहतर बताई जाती है। पर जमुई से रालोसपा के टिकट पर मैदान में उतरे अजय प्रकाश को पिछले चुनाव में हार के बाद भी इलाके में लगातार सक्रिय होते रहने का लाभ नहीं दिखता है। इस सीट पर यह चर्चा है कि उनको वोट देने से बीजेपी को नुकसान हो जाएगा। दिलचस्प यह है कि सुमित और अजय भाई हैं। लेकिन, चकाई के जदयू के खाते में होने की वजह से सुमित के पक्ष में यह काम करता दिख रहा है।
  • लखीसराय से मंत्री विजय कुमार सिन्हा को लेकर बीजेपी के भीतर भी नाराजगी थी। लेकिन उनकी उम्मीदवारी के ऐलान के बाद यह चर्चा आम है कि उनको वोट नहीं देने का नुकसान बीजेपी को हो सकता है।
  • झाझा की सीट पर पिछला चुनाव हार चुके दामोदर रावत को बढ़त दिखती है। चुनाव हारने से पहले रावत नीतीश सरकार में मंत्री हुआ करते थे। उस समय इलाके में कुछ काम हुए थे। उसकी चर्चा लोग करते हैं। हारने के बावजूद जदयू के सरकार में होने का लाभ भी रावत को मिला। यहाँ माई समीकरण प्रभावी है, लेकिन कई मजबूत यादव उम्मीदवारों के कारण उनका वोट बँटने से रावत को फायदा मिलने की बात कही जा रही है।
  • उम्मीदवारों का चेहरा कितना महत्वपूर्ण है यह जमुई में श्रेयसी सिंह का होना बताता है। अरसे से यहाँ की राजनीति जय प्रकाश यादव और नरेंद्र सिंह के बीच बँटी रही है। इस राजनीति से निकलने के लिए मतदाता श्रेयसी को अवसर के तौर पर देख रहे हैं। खासकर, महिलाओं और युवाओं के बीच उनका होना काफी असर डाल रहा है।
  • इसी तरह बीजेपी से लोजपा में आए रवींद्र यादव को वैसा लाभ झाझा में नहीं है, जैसा दिनारा में राजेंद्र सिंह के लिए दिखता है। यादव को दबंग छवि का नुकसान दिख रहा है। बीजेपी और संघ के कैडर भी खुलकर उनके साथ नहीं हैं। लेकिन, राजेंद्र सिंह को जमीन पर बीजेपी और संघ के कार्यकर्ताओं का खुलकर सम​र्थन मिल रहा है।

भले चिराग पासवान खुद को ‘मोदी का हनुमान’ बताए और बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व उनके दावों को खारिज कर रहा है, पर जमीन पर बीजेपी के उम्मीदवार भी मानते हैं कि लोजपा के उम्मीदवार नहीं उतारने का लाभ उन्हें है। लेकिन यह भी सच है कि हर सीट पर जदयू को लोजपा के उम्मीदवार का होना नुकसान भी नहीं पहुँचा रहा।

अब फिर से लौटकर उस सवाल पर आते हैं कि लालू चर्चा से क्यों गायब हैं? रिटायर्ड डॉक्टर और जमुई जिले में महादलितों तथा आदिवासियों के बीच काम करने वाले एसएन झा ने आपइंडिया को बताया, “इसका बड़ा कारण यह है कि लालू यादव की चर्चा होते ही बहस सिमट कर 1990 से 2005 के समय पर आ जाती है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि उनके आने के बाद ओबीसी वर्ग का उभर हुआ था। लेकिन तब विकास का कोई काम नहीं हुआ और गुंडई बहुत बढ़ गई थी। कोई लौटकर फिर से उसी समय में नहीं जाना चाहता है। पर लालू यादव का नाम आते ही जंगलराज की चर्चा होने लगती है। इसलिए इस बार विपक्ष चुनाव नीतीश कुमार के खिलाफ केंद्रित करने की कोशिश में है। नीतीश कुमार के टाइम में काम हुआ है। लेकिन अब लोग विकल्प भी खोजने लगे हैं, क्योंकि उनका ये टर्म बहुत अच्छा नहीं रहा है।”

झाझा के 45 साल के अशोक यादव ने बताया, “नीतीश कुमार ने काम तो किया है। सड़क सब बढ़िया कर दिए हैं। बिजली भी 18-20 घंटे रहता है। पहले रोड चलने लायक नहीं था। शाम होने के बाद झाझा बाजार से कोई अपने गाँव तरफ जाने का हिम्मत नहीं कर पाता था। अब 12 बजे, 1 बजे रात तक आराम से लोग चला जाता है। कोई डर नहीं होता। नल जल वाला पानी भी आना शुरू हो गया है। बहुत काम हुआ है।”

वैसे तो कई चुनावों से यह लग रहा है कि लालू के माई (मुस्लिम+यादव) समीकरण में दरार पड़ चुकी है। तो क्या यह दरार और गहरी हुई है? लखीसराय के सुधांशु श्रीवास्तव कहते हैं, “देखिए मुस्लिम लोग तो आज भी उसी को वोट देगा जो बीजेपी के खिलाफ मजबूत है। लेकिन, यादव भी बाइ एंड लार्ज अभी राजद के साथ ही है। ये लोग भले नीतीश कुमार का प्रशंसा कर दे पर अंत में वोट लालटेन को ही देगा।”

जमुई के ​निवर्तमान विधायक और राजद के उम्मीदवार विजय प्रकाश कहते हैं, “देखिए लालू जी हमेशा हमारे नेता रहेंगे। लेकिन, अभी तेजस्वी जी सब देख रहे हैं। वे भी युवा हैं और युवा लोगों का जमाना है। नीतीश कुमार 15 साल से हैं। लेकिन कोई फैक्ट्री नहीं खुला। नौकरी नहीं है। सबको कमाने के लिए बाहर जाना पड़ता है। युवा लोग ये सब देख रहा। रोड का इतना बात हो रहा आप देहात में जाकर देखिए क्या हाल है। खाली बाहर-बाहर सब चमक रहा है।”

एक चीज तो स्पष्ट है कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता और असर पर इस बार काफी सवाल हैं। लेकिन मोदी की स्वीकार्यता और प्रभाव अब भी बनी हुई है। इसलिए विपक्ष भी इस लड़ाई को नीतीश कुमार के आसपास ही समेट कर रखना चाहता है।

वैसे जमीन के उपर फिलहाल लहर जैसी कोई चीज नहीं दिख रही। विकास की बातें भले हो रही हैं पर निर्णायक उम्मीदवार का चेहरा और जातिगत समीकरण ही हैं। यह चर्चा जमीन पर जोर-शोर से है कि लोजपा के कुछ कैंडिडेट जीतने में सफल रहे और सुमित जैसे कुछ निर्दलीय भी जीत गए तो बीजेपी नीतीश कुमार को छोड़ देगी। मतदाताओं के बीच गहरे तक पैठ कर चुकी इस चर्चा का ही असर है कि सरकार से नाराजगी का सीधा फायदा विपक्ष को मिलता नहीं दिख रहा।

हैदराबाद: केक में नींद की दवा मिलाकर जोसेफ ने दोस्तों के साथ मिल कर किया गैंगरेप, 3 महीने पहले ही हुई थी दोस्ती

हैदराबाद में एक छात्रा को ड्रग देकर उसके साथ गैंगरेप करने की घटना सामने आई है। आरोप है कि तीन युवकों ने मिल कर उसके साथ गैंगरेप किया। ये घटना कुकटपल्ली इलाके में कुछ दिन पहले हुई, जिसका खुलासा अब हुआ है। पीड़िता हैदराबाद के जुबली हिल क्षेत्र की रहने वाली है। सोमवार (अक्टूबर 5, 2020) को 20 वर्षीय एम जोसेफ ने उसे अपने जन्मदिन की पार्टी में बुलाया था, जहाँ उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।

सिकंदराबाद स्थित डिग्री कॉलेज में पढ़ने वाली पीड़िता की जोसेफ से 3 महीने पहले मुलाकात हुई थी और वो दोनों दोस्त बन गए थे। पीड़िता पहले टैंक बंड इलाके में गई थी, जहाँ उसकी मुलाकात जोसेफ के दो अन्य दोस्तों से हुई। वहाँ 22 वर्षीय बी नवीन रेड्डी और 23 वर्षीय आर रामू से उसकी मुलाकात हुई। इसके बाद वो सभी वहाँ से KPHB कॉलोनी मेट्रो स्टेशन स्थित एक होटल में गए, जहाँ जन्मदिन की पार्टी होनी थी।

जन्मदिन की पार्टी के दौरान ही तीनों आरोपितों ने पीड़िता को केक ऑफर किया, जिसमें सेडेटिव सामग्रियाँ (नींद की दवा) मिला दी गई थीं। उसके बेसुध होने के बाद तीनों ने उसके साथ गैंगरेप किया। जब वह होश में आई तो तीनों ने उसे धमकाया कि अगर उसने किसी से भी इस घटना का खुलासा किया तो इसका ‘बुरा परिणाम’ होगा। इस डर के कारण पीड़िता ने किसी को कुछ नहीं बताया।

हालाँकि, इस घटना के 2 दिनों बाद ही पीड़िता ने पेट में दर्द और अन्य तकलीफों की शिकायत की, जिसके बाद उसे अस्पताल में दाखिल कराया गया। वहीं पर पीड़िता ने अपनी माँ को बताया कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। इसके बाद उसके माता-पिता ने जुबली हिल्स पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई। एफआईआर दर्ज करने के बाद इस मामले को कुकटपल्ली पुलिस थाने में ट्रांसफर कर दिया गया है।

इससे पहले दिसंबर 2019 में हैदराबाद के ही शादनगर में पशु चिकित्सक प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। उनका जला हुआ शव बरामद होने के बाद पूरा देश उबल पड़ा था। इस मामले में चार लोग गिरफ्तार किए गए थे। बाद में पुलिस ने एनकाउंटर में चारों आरोपितों को मार गिराया था। प्रीति रेड्डी के साथ वारदात को अंजाम देने से पहले आरोपित इस तरह की कई और जघन्य घटनाओं में शामिल थे। चार आरोपितों में दो ने इस तरह की 9 और वारदातों में संलिप्तता कबूली थी।

पेरिस: क्लास में दिखाया पैगम्बर का कार्टून तो 18 साल के छात्र ने काट दिया शिक्षक का सर, ‘FoE’ की हो रही थी पढ़ाई

पेरिस में एक शिक्षक ने क्लास के दौरान ‘शार्ली एब्दो’ अख़बार में प्रकाशित पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून दिखाया, जिसके बाद सिर कलम कर के उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस ने हत्यारे को मार गिराया है। उसने एक किचेन नाइफ का प्रयोग करते हुए शिक्षक का सिर कलम किया। पुलिस ने जानकारी दी है कि इस घटना की जाँच एंटी-टेरर जज द्वारा की जा रही थी। पुलिस ने बताया है कि हत्यारा मॉस्को चेचन्या मूल का मुस्लिम था।

हत्यारे ‘छात्र’ की उम्र महज 18 साल थी। बताया गया है कि 47 वर्षीय इतिहास-भूगोल के प्रोफेसर स्कूल में क्लास ले रहे थे। फ्रांस में ये दोनों ही विषय साथ में ही पढ़ाए जाते हैं। इसके अलावा उन्हें ‘नैतिक और व्यवहार विषयक शिक्षा’ का भी दायित्व सौंपा गया था। क्लास में सारे विद्यार्थी लगभग 12-14 वर्ष के थे। क्लास के दौरान ही शिक्षक ने ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ (FoE) के बारे में समझाते हुए ‘शार्ली एब्दो’ में प्रकाशित पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून दिखाया।

इसके बाद कई छात्रों के परिवार इससे नाराज हो गए और उन्होंने पुलिस में औपचारिक शिकायत दायर की। ‘नाराज’ आरोपित ने उक्त शिक्षक पर हमला बोल दिया और उन्हें मार डाला। उसने हमले की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर भी अपलोड किया। स्थानीय पुलिस ने राष्ट्रीय स्तर के अधिकारियों को सूचित किया कि पेरिस सबअर्ब स्थित य्वेलिनेस कंफ्लॉस-सेंट-हॉरोनिन में एक लाश मिली है। ये इलाका पेरिस के नार्थ-वेस्ट में स्थित है।

पुलिस ने तत्काल हत्यारे का पीछा करना शुरू किया और उस पर कई गोलियाँ दागी गईं। पुलिस द्वारा कई बार चेतावनी देने के बावजूद उसने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और उल्टा पुलिस को धमकी भी दी। उसने सुसाइड वेस्ट भी पहन रखा था, जिस कारण पुलिस को उस पूरे एरिया को सील करना पड़ा। शिक्षक का हत्यारा ‘अल्लाहु अकबर’ भी चिल्ला रहा था। शुक्रवार (अक्टूबर 16, 2020) की रात फ़्रांस के राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रॉन ने हत्यारे के मारे जाने की सूचना दी।

उन्होंने कहा कि इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ फ़्रांस का अभियान चल रहा है, और आतंकियों के प्रति नरमी नहीं बरती जाएगी। दरअसल, हुआ यूँ था कि एक अभिभावक ने ही उक्त शिक्षक के वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड कर दिया था। हालाँकि, एक दूसरे अभिभावक के अनुसार, वो एक अच्छे शिक्षक थे और उन्होंने कार्टून दिखाने से पहले कह दिया था कि अगर मुस्लिम बच्चे बाहर जाना चाहते हैं तो वो जा सकते हैं।

अभिभावक ने कहा कि आज वो न सिर्फ अपनी बेटी बल्कि ऐसे कई छात्रों और शिक्षकों के लिए उदास हैं। साथ ही सवाल दागा कि क्या हम हत्या के भय के बिना पठन-पाठन का कार्य नहीं कर सकते? राष्ट्रपति मैक्रॉन ने इसे ‘गणतंत्र और इसकी मर्यादाओं पर हमला’ करार दिया और कहा कि आतंकी कभी फ़्रांस की जनता को विभाजित करने में सफल नहीं हो पाएँगे। 3 सप्ताह पहले ही ‘शार्ली एब्दो‘ के दो पत्रकारों की हत्या हो गई थी, इसीलिए पेरिस पहले से ही हाई अलर्ट पर है।

इस मामले में एक पाकिस्तानी युवक को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह जनवरी 2015 में ‘शार्ली एब्दो’ के दफ्तर के बाहर आतंकियों ने 12 लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। पुलिस ने बताया कि उक्त शिक्षक को भी 10 दिनों से मौत की धमकी मिल रही थी। पुलिस ने बताया है कि हत्यारे के बारे में वहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन उसका आपराधिक इतिहास रहा है।

कोलकाता: इमारत में आग लगने से 12 साल के बच्चे सहित 2 की मौत, तीसरी मंजिल से लगा दी थी छलाँग

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहाँ एक इमारत में आग लगने से 12 वर्षीय बच्चे सहित दो लोगों की मौत हो गई। ये घटना शुक्रवार (अक्टूबर 17, 2020) को कोलकाता के गणेश चंद्र एवेन्यू स्थित पाँच मंजिला आवासीय इमारत में हुई। फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने लोगों को घर से बाहर निकालने के लिए काफी मशक्कत की लेकिन दो लोगों की मौत हो गई।

पश्चिम बंगाल के अग्निशमन मंत्री सुजीत बोस ने जानकारी दी है कि इमारत ने सभी लोग सुरक्षित बाहर निकाले जा चुके हैं और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। अचानक से आग लगने की सूचना के बाद लोग बदहवाशी में इधर-उधर भागने लगे थे। मृतकों में 12 वर्षीय लड़के के अलावा एक बुजुर्ग महिला भी शामिल हैं। एक अधिकारी ने बताया कि लड़का काफी डर गया था और इसी कारण उसने तीसरी मंजिल से छलाँग लगा दी और उसकी मौत हो गई

उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ कुछ देर उपचार के बाद उसे मृत घोषित कर दिया गया। वहीं, महिला का शव इमारत में ही स्थित एक बाथरूम से मिला। इमारत में आग लगने से घायल हुए दो और लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कोलकाता अग्निशमन विभाग का कहना है कि आग पहले इमारत की पहली मंजिल पर लगी थी, जो धीरे-धीरे फ़ैल गई और 2 लोगों की मौत हो गई। कुछ लोग सीढ़ियों की ओर भागने लगे। हालाँकि, अधिकारियों का दावा है कि समय रहते आग को फैलने से रोक लिया गया।

आग पर काबू पाने के बाद अब उसे ठंडा करने का काम चल रहा है। इमारत में लगी आग को बुझाने और वहाँ फँसे लोगों को बचाने के लिए कुछ 25 दमकल गाड़ियों के साथ-साथ एक हाइड्रोलिक सीढ़ी का प्रयोग किया गया। कोलकाता का ये इमारत काफी सघन इलाके में स्थित है, जहाँ इमारतें एक-दूसरे से काफी सटी हुई हैं। अग्निशमन मंत्री भी रात पर मौके पर मौजूद रहे। इमारत में एक ही एंट्री और एग्जिट पॉइंट था, और वो काफी संकरा भी था।

कोलकाता की इस इमारत में 50 परिवारें फँसी हुई थीं, जिन्हें अब निकाल लिया गया है। इस 8 मंजिला इमारत में आग लगने की सूचना के बाद ‘फायर एंड इमरजेंसी’ विभाग को लगाया गया था, जिस कारण समय रहते इस कर काबू पाया जा सका। शनिवार की सुबह आग बुझाए जाने के बावजूद इमारत से धुआँ निकलता रहा। सबसे पहले ग्राउंड फ्लोर में स्थित एक बिजली मीटर बॉक्स में आग लगी, जो चरों तरफ फ़ैल गई।

बिहार: माओवाद के बाद ‘जिन्नावाद’.. कॉन्ग्रेस ने जाले सीट पर उतारा जिन्ना समर्थक प्रत्याशी, उस्मानी पर राजद्रोह का भी है आरोप

बिहार विधानसभा चुनावों में माओवाद के बाद अब ‘जिन्नावाद’ की भी एंट्री हो चुकी है, जिसका पूरा क्रेडिट कॉन्ग्रेस को जाता है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव में जाले सीट से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष डॉ मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट दिया है। उस्मानी पर 2019 में कथित तौर पर कथित देश विरोधी नारा लगाने के लिए राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ था और उसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय परिसर में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगाने के समर्थन में विरोध प्रदर्शन किया था। 

कॉन्ग्रेस पार्टी का यह कदम राजनीतिक विवाद और चर्चा का कारण बन गया है। कॉन्ग्रेस ने उस्मानी को जाले विधानसभा सीट से टिकट देने के लिए पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा के पौत्र ऋषि मिश्रा का टिकट काटा गया, जो हाल ही में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) छोड़ कर कॉन्ग्रेस में शामिल हुए थे। टिकट न मिलने की बात से क्षुब्ध होकर ऋषि मिश्रा ने उस्मानी को जिन्ना का समर्थक बताया जो अपने कार्यालय में जिन्ना की तस्वीर लगाता है। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कोई परेशानी नहीं होती अगर यह टिकट उस्मानी की जगह किसी और को मिल गया होता। 

बिहार कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा की आलोचना करते हुए ऋषि मिश्रा ने कहा, “झा और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को इस बात पर स्पष्टीकरण देना चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर उस्मानी को टिकट दिया।” इसके बाद उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस गाँधी की विचारधारा को मानने वाला राजनीतिक दल था जो अब जिन्ना को मानने वाला दल बन गया है। गाँधी के देश में जिन्ना की तस्वीर किसी भी सूरत में नहीं लग सकती है। 

इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता और सांसद गिरिराज सिंह ने भी उस्मानी को टिकट देने के फैसले पर कॉन्ग्रेस को घेरा। उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी और महागठबंधन से पूछा कि उन्हें इस बात का जवाब देना चाहिए कि जाले विधानसभा सीट से उनका उम्मीदवार जिन्ना का समर्थन करता है या नहीं?

पशुपालन, दुग्ध और मछली पालन मंत्री सिंह ने कॉन्ग्रेस और महागठबंधन से सवाल किया कि क्या वह भी जिन्ना का समर्थन करते हैं। अंत में उनका सवाल था कि क्या उनका दल दिल्ली दंगों के आरोपित शरजील इमाम को अपना स्टार प्रचारक बनाएगा? 

इसके बाद मशकूर अहमद उस्मानी ने इन बातों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “मेरी उम्मीदवारी ने मेरा विरोध करने वालों को नैतिक रूप से हरा दिया है।”

उस्मानी ने कहा कि तेजस्वी यादव महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं वह उनके नेतृत्व का समर्थन करते हैं। अंत में उस्मानी ने सोनिया गाँधी का आभार जताया कि पार्टी ने उन पर भरोसा जताया है। 

मशकूर अहमद उस्मानी ने साल 2016 में छात्र राजनीति में कदम रखा था और साल 2017 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष बने। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने के समर्थन में प्रदर्शन किया था। इतना ही नहीं, साल 2018 के दौरान उन्होंने इस मामले में दखल देने के लिए राष्ट्रपति को पत्र भी लिखा था। इसके अलावा, उस्मानी ने सीएए और एनआरसी का भी जम कर विरोध किया था।           

‘लक्ष्मी बम’ की जगह ‘सकीना बम’ क्यों नहीं: ट्विटर पर ट्रेंड हुआ #BoycottLaxmmiBomb, लव-जिहाद के प्रचार का भी आरोप

‘लव जिहाद’ का अजेंडा तनिष्क के एक विवादित विज्ञापन के बाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस्लाम का महिमामंडन और लव जिहाद की असलियत को नजरअंदाज करते टाटा समूह के इस विज्ञापन में हिंदुओं की भावनाओं का सरेआम मजाक बनाया गया था। हालाँकि, बढ़ते विरोध को देखते हुए कंपनी ने बाद में इसे हटा लिया।

वहीं, अब इसके बाद सोशल मीडिया पर #BoycottLaxmmiBomb ट्रेंड कर रहा है। बता दें कि इसके पीछे की वजह भी लव जिहाद ही है। साथ ही हिन्दुओं का कहना है कि इस फिल्म को सिर्फ ‘लक्ष्मी बम’ ही क्यों नाम दिया गया ‘सकीना बम’ क्यों नहीं? फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार मुख्य भूमिका में हैं।

अक्षय कुमार की 9 नवंबर को डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज होने वाली फिल्म ‘लक्ष्मी बम’ को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बवाल मचा हुआ है। दरअसल ‘लक्ष्मी बम’ तमिल फिल्म ‘कंचना’ का हिंदी रीमेक है। फिल्म में अक्षय कुमार आसिफ की भूमिका निभा रहे हैंl वहीं कियारा आडवाणी प्रिया की भूमिका निभा रही है।

सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि ऑरिजनल फिल्म में हीरो के किरदार का नाम ‘राघव’ था तो इस फिल्म में वह ‘आसिफ’ कैसे हो गया जबकि हिरोइन के किरदार का नाम प्रिया ही रखा गया है। इसके साथ ही लोगों ने फिल्म का बायकॉट करने की अपील करते हुए इस पर बैन लगाने की माँग की है।

यूजर्स ने अक्षय कुमार पर पर अपने गुस्से को जाहिर करते हुए सोशल मीडिया पर बढ़ ला दी है। किसी ने फ़िल्म में लव जिहाद का एंगल दिखाने पर फिल्म की कश्मीर अलगावादी प्रोड्यूसर को वजह बताया है तो किसी ने कहा कि फ़िल्म का नाम ‘लक्ष्मी’ की जगह ‘सलमा या फातिमा’ भी तो रखा जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे एडवोकेट प्रशांत पटेल उमराव ने अपने ट्वीट में लिखा है, “शबीना खान ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ की प्रोड्यूसर हैं, जो कश्मीरी अलगाववादी हैं। आसिफ (अक्षय) को ट्रांसजेंडर लक्ष्मी का भूत लग जाता है, जो लाल साड़ी पहनता है और त्रिशूल रखता है। ऑफिशियल टीजर के बैकड्रॉप में मां लक्ष्मी को दिखाया गया। जब भूत नहीं लगता, जब आसिफ की गर्लफ्रेंड प्रिया है। लानत है अक्षय कुमार पर।”

एक यूजर ने लिखा है, “क्या यह सही है? फिल्म का नाम क्या होगा ‘लक्ष्मी बम’ और यह दिवाली के अवसर पर रिलीज होगी। किरदार का नाम होगा आसिफ, अभिनेत्री का नाम होगा प्रिया, यह लोग लव जिहाद को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं? किस प्रकार के कल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं? ‘लक्ष्मी बम’ का विरोध करेंl”

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा है, “मुझे यह भरोसा नहीं होता कि अक्षय कुमार भी बॉलीवुड के जोकरों में शामिल हैं। मैं सोचता था कि वे दूसरों से अलग हैं। अब लव जिहाद को बढ़ावा दे रहे हैं। प्लीज #BoycottLaxmiBomb, #ShaneOnAkshayKumar को री-ट्वीट करें।”

एक यूजर का कमेंट है, “मुझे नहीं पता कि लोग उन्हें देशभक्त क्यों कहते हैं?”

एक ट्विटर यूजर ने लिखा है, “क्या आप ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ का नाम ‘सकीना बॉम्ब’ रख सकते हैं? नकली देशभक्त अक्षय कुमार।”

एक यूजर का कमेंट है, “लक्ष्मी बॉम्ब का बहिष्कार क्यों? फिल्म का नाम : लक्ष्मी बॉम्ब (देवी लक्ष्मी का अपमान और मानहानि), एक्टर का नाम : आसिफ, एक्ट्रेस: प्रिया (चुपचाप लव जिहाद का प्रमोशन), अर्नब के खिलाफ केस, कैनेडियन (अक्षय कुमार के पास कनाडा की नागरिकता है) कुमार की पत्नी रिया चक्रवर्ती को सपोर्ट कर रही है।”

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब फिल्मों के जरिए हिंदुओं की आस्था को निशाना बनाया गया है। इससे पहले भी कई ऐसी फिल्मी आ चुकी हैं जिनमें इस्लाम का महिमामंडन और किसी न किसी तरह से हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला कंटेंट प्रसारित किया गया है। हाल ही में ‘ज़ी 5 पर’ रिलीज होने वाली फिल्म ‘कॉमेडी कपल’ में भी हिंदू मान्यताओं की खिल्ली उड़ाने के लिए मजाक की आड़ में मुख्य किरदार साकिब सलीम ने गौमूत्र उपहास किया है।

इससे पहले वर्ष 2011 में एक फ़िल्म आई थी ‘बॉडीगार्ड’ जिसमें कि मुख्य अभिनेता के रूप में सलमान खान थे और तैमूर की अम्मी करीना कपूर खान भी थी। फ़िल्म का वो सीन तो आपको याद ही होगा जहाँ अपने सलमान भाई करीना की सिक्युरिटी के लिए उसके क्लासरूम में भी चले जाते हैं और बाद में प्रोफेसर से बद्दतमीजी कर बैठते हैं, जिसकी वजह से प्रोफेसर सल्लू भाई को क्लास से बाहर भगा देता है। आप सोचेंगे इसमें कौन सी खास बात है, खास बात यह है कि ये फ़िल्म एक ‘मलयालम’ फ़िल्म की रीमेक थी जिसमें इस सेम सीन को थोड़ा अलग तरीके से दिखाया गया है।

ओरिजनल मलयालम फ़िल्म में प्रोफेसर हीरो से पूछता है ‘गुरुत्वाकर्षण की खोज किसने की?’ हीरो कहता है- ‘वैसे तो गुरुत्वाकर्षण की खोज, सबसे पहले भारत के भाष्कराचार्य ने की थी, लेकिन लोग न्यूटन का नाम लेते हैं।’

हीरो का यह जवाब सुनकर प्रोफेसर चिढ़ जाता है और उसे क्लास से बाहर निकाल देता है। वहीं सलमान की इस फ़िल्म में इस सीन को हटा दिया गया था। अब सवाल यह है कि ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई थी कि, बॉलीवुड वालों को हिंदी रीमेक में ये सीन गायब ही करना पड़ गया। जबकि दोनों फ़िल्म का डायरेक्टर/राइटर एक ही शख्स था।

वैसे तो उसने अपनी पूरी फिल्म फ्रेम बाय फ्रेम छाप दी थी बस इस एक डायलॉग से क्या फर्क पड़ जाता। बता दें ऐसा कोई भी मोमेंट जहाँ इंडियन ऑडियंस,अपने इतिहास या महापुरुषों पर गर्व करे। उन्हें आसानी से बॉलीवुड फिल्मों से हटा दिया जाता है। उन्हें पता है कि हिंदुओं को टारगेट करना आसान है उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा और वह आगे भी यहीं कारनामा करते रहेंगे। ऐसी फिल्मों के उदाहरण कई है जहाँ किसी न किसी तरीके से हिंदुओं को ठेस पहुँचाने का काम किया गया। चाहे वह हिंदू मान्यता हो, हिंदू देवी देवता या कोई रीति- रिवाज।

जहरीली जिहादनों-वामपंथनों का ‘हिन्दू प्रेम’ | Roasting Jihadi-Leftists on Tanishq issue

इंटरनेट के दौर में तनिष्क विज्ञापन पर हुए बवाल ने यह साबित कर दिया कि जिहादी-वामपंथियों का प्रोपगेंडा अब और ज्यादा नहीं चल पाएगा। ‘सेकुलर’ विज्ञापन को देखने के बाद जो प्रतिक्रिया आई उसके कारण तनिष्क को माफीनामा तक जारी करना पड़ा।

ये बात और है कि इस माफीनामे की आखिरी पंक्तियों में भी तनिष्क ने अपनी असली ‘मंशा’ को जाहिर कर दिया। ये माफीनामा बिलकुल ऐसा है जैसे हिंदुओं ने उनके ब्रांड का बहिष्कार न किया हो, बल्कि उन पर हमले का ऐलान कर दिया हो।

एनडीटीवी तो इस कल्पना को वास्तविकता बताने पर ही आतुर हो गया और फेक खबर चला दी कि गाँधीधाम में तनिष्क स्टोर पर हमला हुआ है। खास बात देखिए खुद तनिष्क स्टोर के मैनेजर को ही नहीं मालूम था कि वहाँ हमला बोला गया है। बाद में सेकुलर पत्रकार एनडीटीवी के इस कारनामे की सफाई अपने ‘शब्दकोष’ के जरिए देते रहे।

इस बीच जहरीली जिहादनों-वामपंथनों ने भी ‘हिंदूप्रेम’ पर ज्ञान दिया और तनिष्क का बहिष्कार करने वालों के औकात की बात उठाई।

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वामपंथी दौर में हिंदुओं की आवाज बुलंद करने वाले सीता राम गोयल, जिनकी किताबें आज भी हैं प्रामाणिक

हाल का दौर नित नए खुलासों का भी दौर रहा। अगर आप एक आयातित विचारधारा के प्रति झुकाव नहीं रखते हों, तो कैसे आपको हाशिए पर धकेल दिया जाता है, ये विश्वसनीय नहीं लगता था। जब ब्लूम्सबरी और “दिल्ली दंगे 2020” का विवाद सामने आया तब प्रकाशन जगत में वाम विचारधारा की पैठ नजर आई।

विदेशियों के हुक्म पर भारतीय लेखकों की किताबों को कैसे सीधे प्रकाशन से ही बाहर किया जा सकता है, ये तो दिखा ही मगर साथ ही दूसरे कई क्षेत्रों में भी नजर आने लगा। ये प्रक्रिया 1950 में पी सी जोशी के दौर में ही शुरू हो गई थी। शिक्षा और उससे जुड़े आस-पास की जगहों पर वामपंथी विचारधारा ने चुपके-चुपके कब्ज़ा ज़माना शुरू कर दिया था।

भारत की आजादी के शुरूआती दौर में (कम से कम 1977 तक) जिनके हाथों में शिक्षा का मंत्रालय रहा, उन्होंने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया होगा ये एक अलग बहस का विषय हो सकता है। जो भी हो पी सी जोशी के पार्टी से निकाले जाने के बाद भी उन्हें पता रहा कि विश्वविद्यालय, नाटक-सिनेमा, साहित्य जैसे क्षेत्रों पर कब्ज़ा जमाने से ना केवल सतत आय के साधन बनते हैं, बल्कि युवाओं को लगातार भर्ती करते रहने के मौके भी बनते रहते हैं। इसका उन्होंने फायदा तो उठाया ही, लेकिन इसके साथ ही साथ दूसरी सभी विचारधाराओं को इन क्षेत्रों से बाहर निकाल देने का हर संभव प्रयास किया।

ये वो दौर था जब सोशल मीडिया जैसे साधन नहीं थे। अगर अख़बारों और स्थापित प्रकाशनों में आपको छपने से रोक दिया जाए, तो आपके विचारों को भी दबाया जा सकता था। ऐसे दौर में सीताराम गोयल नाम के एक लेखक “हिन्दू समाज: संकटों के घेरे में” जैसी किताबें लिख रहे थे।

कांचा इल्लैया जैसे मिशनरी फंड पर पलने वाले या शशि थरूर जैसे लोग जो कि घृणित अपराधों के आरोपित रहे हैं, वो आज तक जिसके विरोध में लिखते आ रहे हैं, उसके समर्थन में सीताराम गोयल “मैं हिन्दू कैसे बना” लिख रहे थे। जाहिर है ऐसे काम का नतीजा यही हुआ होगा कि उनके बारे में चुप्पी साधकर उन्हें उनके विचारों के साथ मिटा देने की भरपूर कोशिश हुई।

अक्टूबर 1921 में जन्मे सीताराम गोयल हमेशा से वामपंथियों के विरुद्ध थे, ऐसा नहीं था, क्योंकि ये माना जाता है कि 1940 के दशक के आसपास वो भी वामपंथी झुकाव रखते थे। उनके लेखन को प्रकाशक मिलना नामुमकिन बना दिया गया और अंततः उन्हें अपना खुद का प्रकाशन शुरू करना पड़ा।

उनके लिखे का प्रभाव कैसा था, इसे देखने के लिए उनके प्रकाशन की प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची देख लेना काफी होगा। उन्होंने राम स्वरुप की लिखी “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम थ्रू हदीस” को 1983 पुनः प्रकाशित कर दिया।

इस किताब के लिए 1987 में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। उनके खिलाफ मुकदमा बाद में हटा लिया गया लेकिन इस किताब की मूल अंग्रेजी प्रतियों को मार्च 1991 में प्रतिबंधित कर दिया गया। हिंदी अनुवाद को पहले ही 1990 में प्रतिबंधित किया जा चुका था।

प्रतिबंधित होने वाली दूसरी किताब का नाम “हिन्दू व्यू ऑफ़ क्रिश्चियनिटी एंड इस्लाम” था जिसे फिर से राम स्वरुप ने ही लिखा था। इसे प्रतिबंधित करने के लिए 1993 में सांसद सैयद शहाबुद्धीन (जो गया, बिहार से सांसद थे) ने प्रस्ताव दिया था।

सैयद शहाबुद्दीन इससे पहले “सैटानिक वर्सेज” पर भी 1988 में प्रतिबन्ध लगवा चुके थे। बाद में “द कोलकाता कुरान पिटिशन” और कोलिन माइने की “द डेड हैण्ड ऑफ़ इस्लाम” पर भी मुक़दमे हुए।

सीताराम गोयल की सबसे प्रसिद्ध किताब शायद “हिन्दू टेम्पल्स – व्हाट हेप्पेनड टू देम” को कहा जा सकता है। 1990 में इसे उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित करने का प्रयास हुआ था।

अगर “हिन्दू टेम्पल्स – व्हाट हेप्पेनड टू देम” को देखा जाए, तो इसका विषय वो हजारों मंदिर हैं, जो इस्लामिक जिहाद के दौरान भारत में तोड़ डाले गए। एक साथ इतने मंदिरों का प्रमाणिक दस्तावेज प्रस्तुत कर देना शायद सीताराम गोयल के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

ये पुस्तक आज भी प्रमाणों के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। सेकुलरिज्म और नरसंहारों को नकारने की तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की आदत को वो अपने दौर में आड़े हाथों लेते रहे। उनका जन्म 16 अक्टूबर 1921 को हुआ था और आज उनकी जन्मतिथि भी है। किस्मत से काफी कम लोग आज उन्हें याद करते नजर आए।

जो आज के दौर में भी हिन्दुओं के पक्ष से लिखते हैं, उन्हें अच्छी तरह अंदाजा होगा कि ये काम कितना मुश्किल है। प्रकाशकों का ना मिलना, सोशल मीडिया पर विरोध, ये सब मामूली बाते हैं। अक्सर संगठित गिरोहों के खिलाफ जाने पर मुक़दमे और मनगढ़ंत यौन शोषण जैसे आरोप भी झेलने पड़ सकते हैं। चरित्र हनन और आर्थिक नुकसान पहुँचाने की कोशिशें सबने देखी हैं।

हाल ही में सच बोलने के कारण ‘इस्लामोफोबिया’ का आरोप लगा कर एक शेफ को नौकरी से निकलवाने के लिए गिरोहों का पूरा आंदोलन चलाना भी याद होगा। इसके अलावा भी कई बार मध्य-पूर्वी देशों में ऐसी बातों के लिए गिरफ़्तारी-नौकरी से निकाले जाने जैसी घटनाएँ होती रही हैं।

ऐसे में 1990-2000 के दौर में आज से करीब दो दशक पहले जब ख़बरें इतनी तेजी से सफ़र नहीं करती थीं, तब कितनी मुश्किल से सीताराम गोयल टिके रहे होंगे, ये अनुमान लगाना मुश्किल नहीं।

बाकी जिन्हें आज के कोइनार्ड एल्स्ट और राजीव मल्होत्रा जैसे लेखक भी शुरूआती दौर का “बौद्धिक क्षत्रिय” मानते हैं, उन्हें उनकी आगे की पीढ़ी, यानी हम जैसे लोगों को भी एक बार नमन तो करना ही चाहिए!