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अब्दुल बैंक में, नासिर चावल व्यापारी; दोनों युवाओं को आतंकी बनने के लिए भेजते थे सीरिया: NIA ने दबोचा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने चेन्नई के अहमद अब्दुल कादिर (40) और बेंगलुरु के इरफ़ान नासिर (33) को गिरफ्तार किया है। दोनों ही इस्लामिक स्टेट (आईएस) मॉड्यूल के संदिग्ध हैं और इन पर युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों में शामिल कराने के लिए फंडिंग उपलब्ध कराने का आरोप है। एनआईए का आरोप है कि इन्होंने साल 2013 से 2014 के बीच युवाओं को सीरिया भेजने के लिए फंडिंग इकट्ठा की थी। 

एनआईए के मुताबिक़ सीरिया में 2 युवाओं की मौत हो गई थी। लेकिन एजेंसी ने मृतकों की पहचान सार्वजनिक नहीं की है। एनआईए ने बताया कि अब्दुल कादिर तमिलनाडु के चेन्नई स्थित एक बैंक में बतौर बिज़नेस एनालिस्ट (विश्लेषक) काम करता था। वहीं नासिर बेंगलुरु में बतौर चावल व्यापारी काम करता था। 

एनआईए की विशेष अदालत ने इस मामले में 19 सितंबर को स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज कर लिया था। एनआईए की तरफ से यह कार्रवाई तब हुई जब जाँच के दौरान बेंगलुरु आधारित अब्दुर रहमान नाम के नेत्र विशेषज्ञ को आईएसआईएस से जुड़ी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अब्दुर से पूछताछ में उन नामों का खुलासा हुआ था जो 2013-2014 के दौरान आईएसआईएस में भर्ती होने के लिए सीरिया गए थे।

एनआईए द्वारा जारी किए गए बयान में इस पूरे घटनाक्रम की विस्तार से जानकारी दी गई है। बयान में उन्होंने कहा, “हमारी जाँच में यह बात सामने आई है कि अहमद अब्दुल कादिर, इरफ़ान नासिर और इनके अन्य सहयोगी हिज्ब-उत-तहरीर नाम के संगठन के सदस्य थे। अब उन्होंने ‘कुरान सर्किल’ नाम का नया संगठन बना लिया था, जिसमें वह भोले नौजवानों को शामिल करके उन्हें कट्टरपंथी बनाते थे और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ने के लिए फंडिंग करके उन्हें सीरिया भेजते थे।”

इन तमाम जानकारियों के आधार पर एनआईए ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120 B, 125 और गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 17, 18 और 18 B के तहत मामला दर्ज किया है। इसके अलावा दोनों आरोपित देश के कई प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हुए थे जिसमें आईएसआईएस/आईएसआईएल/दाएश मुख्य थे। एनआईए ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि आरोपित संगठन के युवाओं को कट्टरपंथी और आतंकवादी गतिविधियों का हिस्सा बनाने में अहम भूमिका निभाते थे। वह हमेशा इस कोशिश में रहते थे कि ज़्यादा से ज़्यादा युवा आईएस के आतंकवादी मॉड्यूल का हिस्सा बनें। 

इसके अलावा एनआईए ने दोनों आरोपितों के ठिकानों पर तलाशी ली, जहाँ से इलेक्ट्रॉनिक और अन्य प्रकार के उपकरण बरामद हुए थे। इसके अलावा अब्दुल कादिर और इरफ़ान नासिर को एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया जा चुका है। फ़िलहाल उन्हें पूछताछ के लिए 10 दिन की हिरासत में रखा जाएगा। एनआईए का इस मुद्दे पर कहना है कि बड़े षड्यंत्रों के खुलासे के लिए मामले की जाँच जारी है, जल्द ही कई अहम बातें सामने आएँगी।       

‘परम बीर सिंह ने प्रताड़ित किया, धमकी दी मेरी पत्नी और बेटी की नग्न परेड करवाएँगे, सभी अधिकारी रेप करेंगे’

मुंबई पुलिस के कमिश्नर परम बीर सिंह फिर विवादों के केंद्र में हैं। उन्होंने एक टीआरपी स्कैम का दावा करते हुए रिपब्लिक टीवी का नाम लिया। लेकिन जो तथ्य सामने आए हैं उससे पता चला है कि इस संबंध में की गई शिकायत में इंडिया टुडे का नाम है।

इससे पहले वे इसी तरह सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की जाँच में मुंबई पुलिस का ढुलमुल रवैए को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर आलोचना का केंद्र बिंदु बने थे।

उस समय भी विवाद मुंबई पुलिस प्रमुख परम बीर सिंह द्वारा किए गए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही शुरू हुआ था। परम बीर सिंह ने उस प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा था कि मुंबई पुलिस के संज्ञान में आया है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित थे और इसका इलाज चल रहा था। मुंबई पुलिस कमिश्नर ने दावा किया था कि सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी मौत से पहले ‘दर्द रहित मौत’, ‘सिज़ोफ्रेनिया’ (schizophrenia) और ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ जैसे शब्द सर्च किए थे।

हालाँकि परम बीर सिंह के दावों को जल्द ही पलट दिया गया। टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि अभिनेता ने अपनी मौत से पहले हिमाचल प्रदेश, केरल और कूर्ग में संपत्ति, फॉर्म आदि सर्च किया था, जो कि परम बीर सिंह के दावों के विपरीत था।

इसके कुछ दिनों बाद परम बीर सिंह फिर से एक बड़े विवाद में फँस गए, जब उन्होंने बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के खिलाफ सोशल मीडिया पर किए गए अपमानजनक ट्वीट को ‘लाइक’ किया था। इसके बाद कंगना रनौत ने दावा किया था कि मुंबई पुलिस कमिश्नर ऐसे अपमानजनक सोशल मीडिया पोस्ट्स को लाइक कर रहे हैं जो सुशांत को न्याय दिलाने की आवाज उठाने वाले लोगों के खिलाफ लिखे गए हैं। उन्होंने लिखा कि सार्वजनिक रूप से परेशान करने वालों और धमकाने वालों की निंदा करने का बजाय इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं।

कंगना के ट्वीट के बाद मुंबई पुलिस ने अपने कमिश्नर का बचाव किया और अपने ट्विटर हैंडल से लिखा, “इस ट्वीट को मुंबई पुलिस कमिश्नर द्वारा कभी लाइक नहीं किया गया है। साइबर पुलिस स्टेशन को स्क्रीनशॉट की जाँच के लिए कहा गया है।”

दिलचस्प बात यह है कि यह पहला मौका नहीं है जब परम बीर सिंह का नाम इस तरह के विवादों में शामिल हुआ है। परम बीर सिंह और विवादों का पुराना इतिहास रहा है, ऐसा इसलिए क्योंकि करियर के लगभग तीन-दशक के विभिन्न हाई-प्रोफाइल विवादों में उनका नाम शामिल रहा है।

परम बीर सिंह ने सिंचाई घोटाले में अजित पवार को क्लीनचिट दे दी

1988 बैच के आईपीएस अधिकारी परम बीर सिंह को इस साल फरवरी में मुंबई पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया था। मुंबई पुलिस प्रमुख के तौर पर नियुक्ति से पहले वे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के महानिदेशक (DG) थे।

महाराष्ट्र एसीबी में भी परम बीर सिंह का कार्यकाल विवादास्पद रहा है। सिंह ने पिछले साल दिसंबर में सिंचाई घोटाले में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार को क्लीनचिट दे दी थी। अजित पवार 12 विदर्भ सिंचाई विकास निगम (VIDC) परियोजनाओं से जुड़े एक घोटाले में आरोपित थे।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 2009 में परम बीर सिंह पर ड्रग मामले में प्रोवोग के सह-मालिक सलिल चतुर्वेदी को झूठे केस में फँसाने का आरोप लगाया गया था। एसीपी पश्चिमी क्षेत्र के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान सिंह और उनकी टीम ने ड्रग के मामले में सलिल चतुर्वेदी को गिरफ्तार किया था। हालाँकि, सालों बाद चतुर्वेदी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।

चतुर्वेदी की रिहाई के बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे स्थित राज्य सीआईडी को मामले में पुलिसकर्मियों की भूमिका की जाँच करने का निर्देश दिया था। जाँच के बाद, महाराष्ट्र CID ने पाया कि कुछ पुलिस अधिकारियों ने चतुर्वेदी के आवास में कोकीन प्लांट किया था।

मुंबई मिरर के अनुसार, सलिल चतुर्वेदी पर छापा मारने वाले पुलिसकर्मियों में से एक अशोक भोसले ने कबूल किया था कि उन्हें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर व्यवसायी के घर में ड्रग्स प्लांट करने के लिए कहा गया था। हालाँकि बाद में सीआईडी के सामने वो अपने बयान से पलट गए। तब सीआईडी ने आरोप लगाया था कि भोसले ने ऐसा परम बीर सिंह के दबाव में आकर किया।

परम बीर सिंह के खिलाफ अत्याचार के आरोप

परम बीर सिंह के सबसे विवादास्पद कार्यकालों में से एक एटीएस में उनका कार्यकाल था। परम बीर सिंह पर भोपाल की वर्तमान सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह साध्वी ने गंभीर अत्याचार का आरोप लगाया गया था।

जी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया था कि कथित ‘भगवा आतंक मामले’ में भूमिका जबरदस्ती कबूल करने के लिए मुंबई एटीएस द्वारा उन पर काफी अत्याचार किया गया था। मुंबई एटीएस के सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए साध्वी प्रज्ञा ने खुलासा किया था कि परम बीर सिंह सहित एटीएस अधिकारियों ने उन्हें अवैध हिरासत में रखा था और 13 दिनों तक उन्हें प्रताड़ित किया था।

साध्वी प्रज्ञा ने आरोप लगाया था कि खानविलकर, परम बीर सिंह और (दिवंगत) हेमंत करकरे, सभी ने उन्हें प्रताड़ित किया। साध्वी प्रज्ञा का कहना था कि आजादी से पहले या बाद में कभी भी किसी महिला को इतना प्रताड़ित नहीं किया गया होगा, जितना उन्हें किया गया।

साध्वी ने 2008 में एक न्यायाधीश के समक्ष बताया था, “धमाके में शामिल होने की बात कबूल नहीं करने पर एटीएस के अधिकारियों ने मुझे कपड़ा उतारने और उल्टा लटकाने की धमकी दी।”

एक अन्य आरोपित और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी रमेश उपाध्याय ने भी सिंह के खिलाफ प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (एटीएस) परमबीर सिंह और सुखविंदर सिंह ने हिरासत में उन्हें काफी टॉर्चर किया।

उपाध्याय ने कहा, “परम बीर सिंह और सुखविंदर ने मुझे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया और फिर धमकी दी कि वो मेरी पत्नी और बेटी को थाने में निर्वस्त्र परेड करवाएँगे और सभी अधिकारी उसके साथ बलात्कार करेंगे।”

परम बीर सिंह के खिलाफ याचिका

2009 में 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के तुरंत बाद हमले के दौरान कर्तव्य की लापरवाही के आरोप में परमबीर सिंह और तीन अन्य अतिरिक्त पुलिस कमिश्नरों के खिलाफ याचिका दायर की गई थी।

एक जनहित याचिका (PIL) में इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि परम बीर सिंह जैसे अधिकारी तत्कालीन पुलिस कमिश्नर के आदेशों का पालन करने में विफल रहे थे।

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि अगर वरिष्ठ अधिकारियों ने आदेशों का पालन किया होता तो स्थिति को बहुत पहले ही नियंत्रण में लाया जा सकता था और कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी। याचिकाओं में कहा गया था कि अगर अधिकारी ठीक से काम करते तो 2 और आतंकवादी जिंदा पकड़े जा सकते थे।

याचिका में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर हसन गफूर के हवाले से कहा गया था कि इन अधिकारियों ने उनके आदेशों की अवहेलना की थी और मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी ड्यूटी निभाने में विफल रहे थे। इसके साथ ही याचिका में कहा गया था कि अधिकारियों ने आतंकवादियों से मुकाबला करने से इनकार कर दिया था और परेशानी वाले क्षेत्रों से दूर रहकर कंट्रोल रूम को गलत रिपोर्ट दी।

राहुल गाँधी ‘हवा से पानी’ वाले आइडिया पर PM मोदी को घेरने के चक्कर में खुद ही बने हँसी का पात्र: लोगों ने उड़ाया मजाक

प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाने के चक्कर में राहुल गाँधी अक्सर खुद ही विवादों में घिर जाते है। हाल ही में राहुल गाँधी ने ट्विटर के जरिए पीएम मोदी पर हमला बोलते हुए डेनमार्क के प्रधानमंत्री संग पीएम मोदी की बातचीत का एक अंश शेयर किया। और कहा कि हमारे प्रधानमंत्री कुछ नहीं समझते। वहीं इस ट्वीट पर बीजेपी नेताओं ने राहुल गाँधी को जम कर लताड़ा है।

राहुल गाँधी ने शुक्रवार को वीडियो पोस्ट करते हुए पीएम मोदी पर हमला करते हुए लिखा, “असली खतरा ये नहीं है कि हमारे पीएम कुछ समझते नहीं। खतरा ये है कि उनके पास मौजूद किसी शख्‍स में उन्‍हें यह बताने की हिम्‍मत नहीं है।”

दरअसल वीडियो में मोदी कह रहे हैं, “विंड एनर्जी टरबाइन के जरिए हवा में जहाँ नमी ज्‍यादा है, उसमें से पानी सोख करके अगर साफ पेयजल बना सकें तो वे एनर्जी का भी काम करेंगे और पीछे से पानी भी मिल पाएगा।” मोदी का कहना था कि टरबाइन से गाँव की पेयजल की समस्‍या खत्‍म हो सकती है। उन्‍होंने यह भी कहा कि टरबाइन के जरिए हवा से ऑक्सिजन भी अलग कर सकते हैं। मोदी ने कहा कि इस बारे में थोड़ी साइंटिफिक समझ डेवलप करने की जरूरत है। जवाब में डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने कहा कि वह मोदी के पैशन पर मुस्‍कुरा रहे हैं। उन्‍होंने डेनमार्क आकर इंजिनियर्स को समझाने का न्‍योता भी पीएम मोदी को दिया।

वहीं अब राहुल गाँधी के ट्वीट करने के घंटे भर के भीतर बीजेपी नेताओं ने पलटवार शुरू कर दिया। इसके साथ ही नेताओं ने इसके सबूत भी पेश किए। रेल मंत्री पीयूष गोयल ने लिखा, “राहुल गाँधी के आसपास मौजूद किसी में यह बताने की हिम्‍मत नहीं कि वह नहीं समझते। वह पीएम नरेंद्र मोदी के विचारों का मजाक उड़ाते हैं जबकिे दुनिया की लीडिंग कंपनी के सीईओ उनकी बात से सहमत हैं।”

अमेठी में राहुल गाँधी को लोकसभा चुनाव में हराने वाली केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी ने कहा, “ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस का असली खतरा बढ़ता जा रहा है और किसी में भी युवराज को कुछ और बताने की हिम्‍मत नहीं है।”

वहीं बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा और पार्टी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कुछ खबरों के लिंक साझा किए जिनमें टरबाइन के जरिए हवा से पानी बनाने की बात कही गई है। सबूत पेश करते हुए उन्होंने राहुल गाँधी की खिल्ली भी उड़ाई।

मुंबई पुलिस ने अब रिपब्लिक TV के प्रदीप भंडारी को भेजा समन, सुशांत मामले की रिपोर्टिंग को लेकर रहे थे चर्चा में

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क पर कार्रवाई करते हुए मुंबई पुलिस ने आज (अक्टूबर 9, 2020) मीडिया संस्थान के कंसल्टिंग एडिटर व रिपोर्टर प्रदीप भंडारी को समन भेजा है। सुशांत सिंह मामले पर प्रदीप भंडारी की रिपोर्टिंग पिछले दिनों काफी चर्चा में थी।

मुंबई पुलिस की ओर से यह कदम तब उठाया गया है जब टीआरपी स्कैम में रिपब्लिक पर लगाए गए आरोप झूठे साबित होते साफ दिख रहे हैं। प्रदीप भंडारी का कहना है कि उन्हें खार में मुंबई पुलिस के सामने पेश होने को कहा गया था। हालाँकि वह पूछताछ के लिए पेश होने से पहले आधिकारिक समन का इंतजार कर रहे थे।

बता दें कि गुरुवार (8 अक्टूबर 2020) को मुंबई पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में नाम लिए जाने के बाद रिपब्लिक टीवी ने हंसा रिसर्च ग्रुप प्राइवेट लिमिटेड के डिप्टी जनरल मैनेजर नितिन दियोकर द्वारा फाइल की गई एफआईआर एक्सेस की थी। इससे उन्हें पता चला था कि एफआईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम नहीं है, बल्कि इंडिया टुडे का नाम है।

इसके अलावा उन्हें एफआईआर से यह भी ज्ञात हुआ कि हंसा रिसर्च ग्रुप प्राइवेट लिमिटेड के रिलेशनशिप मैनेजर विशाल भंडारी ने गिरफ्तार होने के बाद खुलासा किया कि इंडिया टुडे व अन्य चैनलों ने उन्हें उकसाया था और उन पैनल हाउसों को पैसे की पेशकश करने को कहा था, जहाँ उन्होंने बार-ओ-मीटर सेट किए।

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी बताया कि विनय नाम के एक शख्स ने साल 2019 में 5 घरों में जाकर हर रोज इंडिया टुडे दो घंटे देखने को कहा। अपनी रिपोर्ट में रिपब्लिक टीवी ने एफआईआर की कॉपी भी लगाई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विनय ने पाँचों घरों के लिए 5000 रुपए कमीशन भी बाँटा। यानी हर घर को एक हजार रुपए। और ये सब सिर्फ़ इसलिए कि वह नवंबर 2019 से मई 2020 तक इंडिया टुडे 2 घंटों के लिए देखें।

अर्नब गोस्वामी ने इस पूरे मामले पर कहा:

टीआरपी मामले में अब FIR सामने आ चुकी है। इसमें इंडिया टुडे का जिक्र है। FIR में इंडिया टुडे का 6 बार उल्लेख किया गया है। इंडिया टुडे के खिलाफ विस्तृत आरोप लगाए गए हैं। वास्तव में देखें तो, पूरी एफआईआर इंडिया टुडे के खिलाफ है। अब, एक मुख्य गवाह ने भी इंडिया टुडे के खिलाफ महत्वपूर्ण आरोप लगाए हैं। परम बीर सिंह को देश को बताना चाहिए कि वह इंडिया टुडे के खिलाफ एफआईआर पर कार्रवाई करने से इनकार क्यों कर रहे हैं। आरोपित सामने आ चुके हैं। अब यह स्पष्ट है कि परम बीर सिंह ने इंडिया टुडे को बचाने और SSR, पालघर और हाथरस कवरेज के लिए रिपब्लिक को निशाना बनाने के लिए जानबूझकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्हें अब मुंबई पुलिस आयुक्त के रूप में बने रखने का कोई नैतिक व कानूनी अधिकार नहीं है। अब जब सच सामने आ गए हैं, तो उन्हें माफी जारी कर देनी चाहिए। रिपब्लिक परम बीर सिंह के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करेगा। तथ्यों के बूते हम हर स्तर की लड़ाई लड़ेंगे।

परमबीर सिंह ने माना ‘फेक TRP स्कैम’ FIR में इंडिया टुडे का नाम: रिपब्लिक टीवी को निशाना बनाने पर दी बेबुनियाद सफाई

‘फेक टीआरपी स्कैम’ मामले में 24 घंटे के भीतर ही उल्लेखनीय मोड़ आया है। 8 अक्टूवर को आयोजित की गई प्रेस वार्ता में मुंबई पुलिस कमीश्नर ने रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी पर कई गम्भीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि चैनल ने टीआरपी से जुड़ी जानकारी में बदलाव करने के लिए आम लोगों को रुपए दिए थे और उनसे कहा गया था कि वह चैनल लगा कर अपना टीवी चालू रखें। रात तक यह बात भी सामने आ गई कि एफ़आईआर में कहीं भी रिपब्लिक टीवी का ज़िक्र नहीं है बल्कि उसमें इंडिया टुडे का नाम शामिल था। 

परमबीर सिंह की प्रेस वार्ता के बाद इंडिया टुडे ने ख़ुशी मनाते हुए रिपब्लिक टीवी पर तंज कसना शुरू कर दिया था। जैसे ही इस बात का खुलासा हुआ कि असल एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम है उसके बाद इंडिया टुडे के तेवर पूरी तरह बदल गए हैं। 

इस शुरूआती झटके से उबरने के बाद राजदीप सरदेसाई स्थिति को सामान्य करने की कोशिश में लग गए। राजदीप सरदेसाई ने अपने समाचार चैनल पर पुलिस कमीश्नर से सवाल किए। उन्होंने कहा, “ऐसा बताने के प्रयास किए जा रहे हैं कि असल एफ़आईआर में इंडिया टुडे का नाम शामिल है।” इसके बाद राजदीप ने रिपब्लिक टीवी पर आरोप लगाने की माँग करते हुए उन्हें दोष मुक्त करने की बात कही। 

मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने खुद यह बात स्वीकारी थी कि असल एफ़आईआर में इंडिया टुडे का ज़िक्र है। इस खुलासे के बाद मुंबई पुलिस खुद की बनाई गाँठो में उलझती हुई नज़र आ रही है क्योंकि यह बात सार्वजनिक रूप से कही गई है और दूसरी तरफ इससे तमाम सवाल खड़े होते हैं। 

इंडिया टुडे खुद को निर्दोष और रिपब्लिक टीवी को आरोपित साबित करने की पूरी कोशिश कर रहा है। इसके लिए उसने परमबीर सिंह के बयान का हवाला दिया है जिसमें उन्होंने कहा था, “एफ़आईआर एक ही है। 6 अक्टूबर को दायर की गई इस एफ़आईआर में एक चश्मदीद ने इंडिया टुडे का भी नाम लिया है। जाँच आगे बढ़ने पर पता चला कि न तो BARC और न ही किसी अन्य चश्मदीद ने इंडिया टुडे का ज़िक्र किया। सभी ने रिपब्लिक टीवी और दो अन्य मराठी चैनल्स का नाम लिया है। फ़िलहाल इंडिया टुडे के विरुद्ध कोई सबूत नहीं है, हम अपनी कार्रवाई रिपब्लिक टीवी और मराठी चैनल्स पर जारी रखेंगे।” 

मुंबई पुलिस कमीश्नर परमबीर सिंह द्वारा जारी किया गया बयान

बीते रात से इंडिया टुडे ने इस बयान के आधार पर खुद को निर्दोष और रिपब्लिक टीवी को अपराधी साबित करने का लगातार प्रयास किया। 

इंडिया टुडे की हताशा को नज़रअंदाज़ करते हुए मुंबई पुलिस के बयान को देखा जाए तो इस मामले पर कई नए सवाल खड़े होते हैं जिनके जवाब अभी तक नहीं दिए गए हैं। गौर करने वाली बात है कि एफ़आईआर 6 अक्टूबर 2020 को दायर की गई थी। इस एफ़आईआर के एक दिन के भीतर, 7 अक्टूबर को मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी की व्यूअरशिप से जुड़ी जानकारी के लिए BARC को नोटिस जारी कर दिया। 

BARC को जारी किया गया नोटिस

अब समझते हैं कि इसका क्या मतलब है। 6 अक्टूबर को दायर की गई मूल एफ़आईआर में इंडिया टुडे का नाम है और इस बात को मुंबई पुलिस कमिश्नर ने खुद स्वीकार किया है। फिर 24 घंटे के भीतर ही मुंबई पुलिस ने BARC को नोटिस भेजा कि वह रिपब्लिक टीवी से व्यूअरशिप सम्बंधी जानकारी इकट्ठा करे। फिर अगले ही दिन मुंबई पुलिस कमिश्नर ने अपनी जाँच को अंतिम पड़ाव देकर राष्ट्रीय टेलीविज़न पर प्रेस वार्ता कर दी। इतना ही नहीं प्रेस वार्ता में रिपब्लिक टीवी को टीआरपी मामले में आरोपित भी बता दिया। 

यानी हम इस बात पर भरोसा करें कि मुंबई पुलिस ने 6 अक्टूबर को एफ़आईआर दर्ज की और इंडिया टुडे के विरुद्ध जाँच न करते हुए उन्होंने BARC को नोटिस भेज दिया। इसके बाद 8 अक्टूबर को प्रेस वार्ता करके रिपब्लिक टीवी को आरोपित भी घोषित कर दिया। 3 दिन की इस पूरी जाँच के दौरान, प्रेस वार्ता करने के पहले ऐसा कोई सबूत नहीं उपलब्ध है जिसके मुताबिक़ मुंबई पुलिस ने इंडिया टुडे को व्यूअरशिप से जुड़ी जानकारी के लिए तलब किया हो। 

इस तरह का एक और तथ्य है जो इंडिया टुडे मुंबई पुलिस और उसकी जाँच को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। इस मामले की मुख्य आरोपित तेजल सोलंकी ने 8 अक्टूबर को रिपब्लिक टीवी के रिपोर्टर से बात करते हुए इंडिया टुडे का नाम लिया था। बातचीत को यहाँ सुना जा सकता है।  

ऑडियो में तेजल सोलंकी ने बताया कि इंडिया टुडे के लोगों ने टीआरपी बढ़ाने के लिए उनके बेटे से संपर्क किया था। इसका मतलब यह है कि कमिश्नर परमबीर सिंह द्वारा किए गए दावे में ज़रा भी सच्चाई नहीं है कि किसी भी चश्मदीद ने इंडिया टुडे का नाम नहीं लिया। अगर एफ़आईआर इंडिया टुडे के विरुद्ध होती जिसमें ऐसा दावा किया गया था कि किसी भी चश्मदीद ने इंडिया टुडे का नाम नहीं लिया, खुद इस बात का कोई मतलब ही नहीं निकलता है। अंततः एफ़आईआर में इंडिया टुडे का नाम केवल उस सूरत में शामिल किया गया होगा जब किसी ने सीधे तौर पर उसका नाम लिया होगा। 

यह अपने आप साबित हो जाता है कि परमबीर सिंह द्वारा जारी किया गया बयान जिसका हवाला इंडिया टुडे ने भी दिया था, उसके आधार पर ऐसे तमाम सवाल बचते हैं जिनका कोई जवाब नहीं मिल पाया है। 

मुंबई पुलिस इसके पहले कई सनसनीखेज़ आरोप लगा चुकी है कि कई समाचार चैनल टीआरपी रेटिंग से छेड़छाड़ करते हैं। प्रेस वार्ता के दौरान मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने बताया कि रिपब्लिक समेत ऐसे 3 समाचार चैनल हैं जो इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से शामिल हैं। इसमें ऐसे घरों को रुपए का लालच दिया जाता है जहाँ BARC द्वारा बार-ओ मीटर इनस्टॉल किए जाते हैं। नतीजतन BARC द्वारा जारी किया जाने वाला टीआरपी से जुड़ा डाटा प्रभावित होता है। 

परमबीर सिंह ने कहा कि इस मामले में दो लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है, जिसमें एक आरोपित BARC के साथ काम करने वाली संस्था में कार्यरत था। इसके बाद उन्होंने बताया कि यह सभी उन घरों से डाटा उठाते थे जहाँ बार-ओ मीटर लागाया गया है और उसे समाचार चैनलों को बेच देते थे। समाचार चैनल उस जानकारी का इस्तेमाल व्यूअरशिप (टीआरपी) को प्रभावित करने के लिए करते थे। 

मुंबई पुलिस कमीश्नर के मुताबिक़ गिरफ्तार किए गए आरोपितों ने इस बात का खुलासा किया कि रिपब्लिक टीवी और 2 मराठी चैनल इस घपले में शामिल थे। फ़िलहाल मराठी चैनल्स फ़क्त मराठी और बॉक्स सिनेमा के मालिकों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके बाद प्राथिमिकी (एफ़आईआर) की कॉपी रिपब्लिक टीवी और ऑपइंडिया दोनों ने देखी और समझी, उसमें रिपब्लिक टीवी का नाम कहीं नहीं लिखा था। इसके उलट उसमें इंडिया टुडे का नाम मौजूद था और कुछ अन्य चैनल्स का भी नाम शामिल था। 

इस तरह के तमाम आरोपों के बाद रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने अपना पक्ष रखा। उनका पूरा बयान कुछ इस प्रकार है- 

अपने बयान में अर्नब गोस्वामी ने कहा, “मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने रिपब्लिक टीवी पर झूठे आरोप लगाए हैं क्योंकि हमने उनसे सुशांत सिंह राजपूत मामले की जाँच से जुड़े कई सवाल किए थे। रिपब्लिक टीवी मुंबई पुलिस कमिश्नर पर आपराधिक मानहानि का दावा करेगी। BARC ने ऐसी एक भी रिपोर्ट जारी नहीं की है जिसमें रिपब्लिक टीवी का नाम शामिल हो। सुशांत सिंह राजपूत मामले में परमबीर सिंह द्वारा की जाँच पर खुद शक के बादल मंडरा रहे हैं।” 

इसके बाद अर्नब ने कहा, “यह सिर्फ और सिर्फ निराशा में उठाया गया एक कदम है क्योंकि रिपब्लिक टीवी ने पालघर मुद्दे, सुशांत सिंह के मुद्दे या इस तरह के किसी भी अन्य मुद्दे पर रिपोर्ट तैयार की। इस तरह निशाना बनाने से हमारा संकल्प और मज़बूत होता है और सच की ज़मीन ठोस होती है। आज परमबीर सिंह की असलियत सामने आ गई है क्योंकि BARC की रिपोर्ट में रिपब्लिक टीवी का नाम कहीं नहीं है। उन्हें आधिकारिक तौर पर माफ़ीनामा लिखना चाहिए और अदालत में हमारा सामना करने की तैयारी कर लेनी चाहिए।”   

‘इस्लाम’ के नाम पर जायरा वसीम हुई सना खान, फिल्म इंडस्ट्री से तौबा; अब ‘अल्लाह के कायदों’ पर चलेंगी

बिग बॉस फेम अभिनेत्री सना खान (Sana Khan) ने बॉलीवुड छोड़ने की घोषणा कर दी है। अपने इन्स्टाग्राम अकाउंट पर सना खान ने इसकी जानकारी देते हुए इस फैसले के लिए अपने मजहब का हवाला दिया है। ज्ञात हो कि सना से पहले भी मजहब को आधार बता कर कुछ कलाकारों ने फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया था।

बॉलीवुड अभिनेत्री और बिग बॉस- सीजन 6 की कंटेस्टेंट रहीं सना खान ने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने की वजह इस्लाम को बताया है। सना ने कहा है कि वह मानवता की सेवा करना चाहती हैं और अब से वह अल्लाह के आदेशों का पालन करेंगी।

सना खान ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर लिखा है –

“भाइयों और बहनों। आज मैं अपनी जिंदगी के एक अहम मोड़ पर आपसे बात कर रही हूँ। मैं सालों से शो-बिज (फिल्म उद्योग) की जिंदगी गुजार रही हूँ और इस अरसे में मुझे हर तरह की शोहरत, इज्जत और दौलत अपने चाहने वालों की तरफ से नसीब हुई। जिसके लिए मैं उनकी शुक्रगुजार हूँ। लेकिन अब कुछ दिन से मुझ पर ये एहसास कब्जा जमाए हुए है कि इंसान के दुनिया में आने का मकसद क्या सिर्फ यह है कि वो दौलत और शोहरत कमाए? क्या उस पर ये फर्ज आयद नहीं होता कि वो अपनी जिंदगी उन लोगों की खिदमत में गुजारे जो बे-आसरा और बेसहारा हैं?”

“…क्या इंसान को ये नहीं सोचना चाहिए कि उसे किसी भी वक्त मौत आ सकती है? और मरने के बाद उसका क्या बनने वाला है? इन दो सवालों का जवाब, मैं मुद्दत से तलाश कर रही हूँ। खासतौर पर इस दूसरे सवाल का जवाब कि मरने के बाद मेरा क्या बनेगा।”

सना खान आगे लिखती हैं –

“इस सवाल का जवाब जब मैंने अपने मजहब में तलाश किया तो मुझे पता चला कि दुनिया की ये जिंदगी असल में मरने के बाद की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए है। और वो इससे सूरत में बेहतर होगी। इसलिए मैं आज ये एलान करती हूँ कि आज से मैं अपने शो-बिज की जिंदगी छोड़कर इंसानियत की खिदमत और अपने पैदा करने वाले के हुकुम पर चलने का पक्का इरादा करती हूँ। तमाम बहनों और भाइयों से दरख्वास्त है कि आप मेरे लिए दुआ फरमाएँ के अल्लाताला मेरी तौबा को कबूल फरमाए। आखिर में मेरे भाइयों और बहनों से दरख्वास्त है कि वो अब मुझे शो-बिज के किसी काम के लिए दावत न दें। बहुत-बहुत शुक्रिया।”

सना खान का इंस्टाग्राम पोस्ट –

ज़ायरा वसीम ने भी छोड़ दी थी इस्लाम के लिए फिल्म इंडस्ट्री

यह पहली बार नहीं है कि किसी मुस्लिम अभिनेत्री ने फ़िल्मी दुनिया को ‘इस्लाम’ की सेवा करने के लिए छोड़ा हो। इससे पहले ‘दंगल ’और, ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ की अभिनेत्री जायरा वसीम ने भी इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए ही घोषणा की थी कि यह उद्योग उन्हें उनके ईमान से दूर कर रहा है। जायरा ने कहा था कि एक्ट्रेस बनने की वजह से इस्लाम से दूर होती जा रही हूँ इसलिए मैं इस फील्ड से रिश्ता तोड़ रही हूँ।

नन बनकर रह रही हैं सोफिया हयात

बिग बॉस फेम सोफिया हयात भी फिलहाल फिल्मों और रियलिटी शोज से दूर एक नन के तौर पर अपनी जिंदगी जी रही हैं।

‘एक्टिविस्ट पादरी’ फादर स्टेन स्वामी को भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में NIA ने किया गिरफ्तार

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने बृहस्पतिवार (अक्टूबर 08, 2020) को 83 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी (Father Stan Swamy) को 2018 भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। फादर स्टेन स्वामी पर दो साल पहले महाराष्ट्र के भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने में संलिप्तता का आरोप है। बताया जा रहा है कि स्टेन स्वामी पर भीमा कोरेगाँव मामले में एनआईए ने उन पर आतंकवाद निरोधक क़ानून (यूएपीए) की धाराएँ भी लगाई हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, केरल के मूल निवासी और कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता 83 साल के स्टेन स्वामी (Father Stan Swamy) ने पिछले दिनों इस मामले में संलिप्तता से इनकार किया था। कोरेगाँव भीमा मामले की जाँच कर रही एनआईए की एक टीम ने नामकुम स्टेशन परिसर में फादर स्टेन स्वामी को गिरफ्तार किया।

हालाँकि, एक रिपोर्ट के अनुसार, एनआईए के दो अधिकारियों ने पुष्टि की है कि उन्होंने स्वामी को राँची में भीमा-कोरेगाँव मामले की जाँच के सिलसिले में हिरासत में लिया है। उन्होंने कहा कि इस बात की अधिक संभावना है कि स्वामी को शुक्रवार (अक्टूबर 09, 2020) तक गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

उन्होंने कहा, “हाँ हमने स्टेन स्वामी को आज पूछताछ के लिए बुलाया था और वह राँची के एनआईए कार्यालय में हैं। उनकी भूमिका के बारे में पूछताछ की जा रही है। उसे अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है, सुबह तक प्रतीक्षा करते हैं।” अधिकारियों में से एक ने कहा कि मामला दिसंबर 31, 2017 के यलगार परिषद की घटना से संबंधित है।

इस घटना में पुणे पुलिस ने गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवर राव, अरुण फरेरा और वरनॉन गोंजाल्विस को गिरफ्तार किया था। पुणे पुलिस ने अदालत में कहा था कि गिरफ्तार किए गए पाँचों लोग प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के सदस्य हैं और यलगार परिषद देश को अस्थिर करने की उनकी कोशिशों का एक हिस्सा था।

स्वामी से राँची में 7 अगस्त को दो घंटे पूछताछ की गई थी और बाद में उन्हें आगे की पूछताछ के लिए मुंबई के एनआईए कार्यालय में बुलाया गया। एक बयान में, स्टेन स्वामी ने कहा कि 6 सप्ताह की चुप्पी के बाद उन्हें मुंबई में पेश होने के लिए बुलाया गया और उन्होंने एजेंसी को सूचित किया था कि वह अपने बुढ़ापे और महामारी के कारण यात्रा नहीं कर पाएँगे।

जनवरी 01, 2018 को पुणे के कोरेगाँव भीमा में दलित और मराठा समुदायों के बीच हिंसा भड़की। खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता बताने वाले फादर स्टेन स्वामी पर आरोप है कि उनके और उनके साथियों के भड़काऊ भाषण के बाद ही 2018 में भीमा कोरेगाँव में हिसा भड़की थी। उसी मामले में स्टेन स्वामी को गिरफ्तार किया गया है। कई लोगों द्वारा स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी का विरोध किया जा रहा है।

वामपंथी इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक ट्वीट में कहा है कि फादर स्टेन स्वामी ने अपना पूरा जीवन आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए बिताया है, इसलिए मोदी सरकार ऐसे लोगों को चुप कराना चाहती है।

गुहा का आरोप है कि इस सरकार के लिए, कोयला खनन कंपनियों को लाभ पहुँचाना, आदिवासियों के जीवन और रोजगार से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

रामविलास पासवान: जातिबोध था लेकिन लोक व्यवहार की लक्ष्मण रेखा का कभी उल्लंघन नहीं किया

“हमारी प्रेस रिलीज नहीं छापिएगा संपादक जी?” मैंने अपने डेस्क से ऊपर नज़र उठाई तो देखा सफ़ेद कुर्ते पजामे में आत्मविश्वास से भरपूर एक नौजवान नेता हमारे संपादक स्वर्गीय श्री शरद द्विवेदी से मुखातिब था। ये कोई 1985-86 की बात है। मैंने पीटीआई भाषा में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार काम करना शुरू ही किया था। शरद जी ने इस नेता का परिचय करवाया। ये नौजवान सांसद थे रामविलास पासवान।

बड़े शालीन तरीके से उन्होंने खुद बताया कि ‘जो है सो है कि हम रिकार्ड बहुमत से सांसद बने हैं। इसलिए हमारे बयान की अनदेखी मत कीजिएगा।’

पासवान जी थोड़ा जल्दी-जल्दी बोलते थे। ‘जो है सो है कि’ एक तरह से उनका तकिया कलाम था जिसे वो हर एक-दो वाक्य में इस्तेमाल कर ही लेते थे। जिस समय मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई तो वे कोई नौसिखिया नेता नहीं थे। वे उस समय भी दो बार के सांसद थे और उससे पहले बिहार में विधायक रह चुके थे। लेकिन उन्होंने मीडिया की ताकत को तभी पहचान लिया था। अपनी बात पहुँचाने के लिए उसका सटीक इस्तेमाल करना वे जानते थे। इसलिए अपनी प्रेस विज्ञप्ति अक्सर वे खुद लेकर पीटीआई के दफ्तर आ जाया करते थे। इसमें उन्हें कोई झिझक या हिचक नहीं थी।

उस दौर के हमारे सम्पादकों श्री वेदप्रताप वैदिक और श्री शरद द्विवेदी के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे। भाषा में हमारे वरिष्ठ पत्रकार सहयोगियों जैसे गुरु जी, योगेश माथुर, आदि से भी उनके मधुर सम्बन्ध थे। सम्बन्ध बनाना और उन्हें निभाना वैसे तो उनकी पीढ़ी की खासियत थी। पर पासवान जी तो मानो इसके महारथी थे।

मैं उन दिनों प्रशिक्षु पत्रकार ही था लेकिन ये पासवान का बड़प्पन ही था कि उन्होंने मेरे वरिष्ठ सहयोगियों के साथ-साथ मेरे जैसे नवोदित पत्रकार की भी अनदेखी नहीं की। बाद में जब मैं टीवी की दुनिया में आया तो पासवान जी टीवी, होम टीवी और बाद में जनमत टीवी में लगातार आते रहे। इस दौरान पासवान का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। लेकिन मेरे किसी भी टीवी शो में आने के लिए उन्होंने कभी भी आनाकानी नहीं की।

कई बार उन्हें आखिरी समय पर भी बुलाया गया तो उन्होंने कभी मना नहीं किया। याद रखने की बात है कि 80 और 90 के दशक में ओबी वैन का चलन इतना नहीं था और किसी भी शो में भाग लेने के लिए नेताओं को दिल्ली से नोएडा जाना पड़ता था। एक शो में भाग लेने के लिए काफी समय देना पड़ता था। इस नाते पासवान का सहज स्वभाव और उपलब्धता हमारे जैसे जैसे पत्रकार के लिए मानो एक वरदान ही था।

एक बात यहाँ कहना ज़रूरी है। पासवान आजकल के कई नेताओं की तरह सिर्फ टीवी शो के जरिए अपना करियर खड़ा करने वाले सिर्फ एक हवाई नेता नहीं थे। वे खाँटी जमीनी नेता थे। लेकिन जमीन पर अपनी पक्की पकड़ होने के साथ ही अपनी बात कहने के लिए संचार माध्यमों के उपयोग के महत्व को वे अच्छी तरह जानते थे।

जनसंवाद के तौर तरीकों को समझना और उनका इस्तेमाल उन्हें बखूबी आता था। इसलिए पहले प्रिंट माध्यम और उसके बाद अपने राजनीतिक संवाद के लिए टीवी का प्रभावी उपयोग उन्होंने किया। 

पासवान ने दुनिया में सबसे ज़्यादा मतों से जीतने का रिकार्ड बनाया था। उन्होंने 1977 में बिहार की हाजीपुर लोकसभा सीट 4,24,545 वोटों के रिकॉर्ड अंतर से जीती थी। यह एक विश्व कीर्तिमान था और गिनीज़ बुक में इसका जिक्र आया था। बाद में 1989 में उन्होंने यही सीट 5,04,448 के अंतर से जीती। 

वैसे पासवान खगड़िया के रहने वाले थे। परन्तु उनका नाम हाजीपुर के साथ अभिन्न रूप से जुड़ गया। वे आठ बार हाजीपुर से चुनाव जीते। असल में हाजीपुर पासवान के नाम से उसी तरह प्रसिद्द हुआ जैसा वह वहाँ पैदा होने वाले केलों के लिए जाना जाता है।

पासवान को जातिबोध था। यूँ भी उत्तर भारत और खासकर बिहार में जो भी जमीनी राजनीति करता है वह जाति के अंकगणित के बिना राजनीतिक तौर पर ज़िंदा नहीं रह सकता। लेकिन उन्होंने भाषा, संबंधों और लोक मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया।

आज कतिपय जातिगत नेता जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, पासवान उससे दूर रहे। वे समाजवादी परिपाटी के नेता थे। उनकी शुरुआती राजनीति संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से ही आरम्भ हुई थी।

राजनीतिक हवा का रुख पहले से ही भाँप जाने में माहिर पासवान एक चतुर राजनीतिक खिलाड़ी थे। हवा का रुख देखकर राजनीतिक प्रतिबद्धता तय करने से उन्हें कभी गुरेज नहीं रहा। लेकिन फिर भी शालीनता, लोक व्यवहार और सामाजिकता की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन उन्होंने नहीं किया। इस मायने में वे अनुसूचित जाति की राजनीति में बाबू जगजीवन राम की विरासत का प्रतिनिधित्व करते थे।

उन्होंने अनुसूचित जातियों की राजनीति की, परन्तु ‘तिलक, तराज़ू और तलवार’ जैसी उपमाओं का प्रयोग नहीं किया। वे शायद जानते थे कि विद्वेषात्मक भाषा में दूसरों का अपमान करना जातिजनित तिरस्कार, भेदभाव और इतिहासगत अपमान दूर करने का सही साधन नहीं है। आज जिस तरह की भाषा का प्रयोग जाति आधारित पार्टियों के कुछ नेता करते है उससे सामाजिक विद्वेष कम होने के स्थान पर और अधिक फैलता ही है। 

इस मायने में रामविलास पासवान का जाना एक तरह से भारतीय राजनीति में एक परम्परा का अंत है। उनका जाना एक ऐसे नेता का भी जाना है जिसने अपने राजनीतिक कौशल, चातुर्य, सरल व्यवहार और प्रशासनिक क्षमता से देश में अपने लिए एक नया स्थान बनाया।

अफरोज, मो. राज समेत 5 ने 18 साल के राहुल को पीट कर मार डाला, बहन से रिश्ते को लेकर नाराज था

दिल्ली के आदर्श नगर इलाके में ऑनर किलिंग का मामला सामने आया है। मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने साथियों के साथ मिलकर 18 साल के राहुल की पीट-पीटकर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि आरोपित अफरोज को अपनी 16 साल की नाबालिग बहन के एक हिन्दू युवक राहुल के साथ प्रेम प्रसंग से आपत्ति थी।

पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लड़की के भाई मोहम्मदअफरोज समेत पाँच आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है, जिनमें से मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज के अलावा बाकी तीन नाबालिग हैं। अधिकारियों का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज और परिवार के बयान के आधार पर कुछ और आरोपितों की तलाश की जा रही है।

जाँच में पता चला है कि बहन से मिलने से नाराज लड़की के भाई ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर राहुल की बेरहमी से पिटाई की। राहुल घायल अवस्था में ही अस्पताल पहुँचा जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

मोहम्मद अफ़रोज़ और उसके साथियों द्वारा राहुल को पीटने का वीडियो CCTV में सामने आया है। उन्होंने पूरी तैयारी के साथ राहुल के चचेरे भाई के फोन पर कहा कि उन्हें अपने बच्चे को ट्यूशन दिलाना है, इसलिए राहुल को बाहर भेज दें।

फोन सुनकर राहुल बिना किसी को बताए बाहर गली में आ गया। घर के बाहर मौजूद 4-5 लोग उसे अपने साथ ले गए और गली नंदा रोड पर लात- घूंसों से उसको मारना शुरू कर दिया। CCTV में देखा गया कि मारपीट के बाद घायल हालत में ही राहुल किसी तरह से अपने घर पहुँचा।

18 वर्षीय राहुल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में अंदरूनी चोटों को मौत का कारण बताया गया है। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लड़की के भाई समेत 5 आरोपितों को पकड़ लिया। इनमें से 3 नाबालिग हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हिंसक घटना के बाद से इलाके में भय और तनाव का माहौल है। किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक तनाव की आशंका के चलते इलाके में भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात किया गया है।

आरोपितों ने भी लड़की को लेकर झगड़े की बात कबूल की है। उन्होंने बताया कि उन्हें लड़की के भाई को उनका मिलना-जुलना और बात करना पसंद नहीं था और इस बारे में कई बार राहुल को चेतवानी भी दी थी।

बृहस्पतिवार (अक्टूबर 08, 2020) रात करीब 12 बजे पुलिस को बाबू जगजीवन राम अस्पताल से एक युवक के अचेत अवस्था में अस्पताल में भर्ती होने की सूचना मिली। युवक की पहचान मूलचंद कॉलोनी निवासी राहुल राजपूत (18) के रूप में हुई। इलाज के दौरान ही राहुल की देर रात मौत हो गई।

मृतक राहुल के पिता संजय संजय दिल्ली के ही रोहिणी सेक्टर-18 में टैक्सी स्टैंड चलाते हैं। उन्होंने बताया कि राहुल प्राइवेट माध्यम से जर्नलिज्म द्वितीय वर्ष की पढ़ाई करने के साथ-साथ बच्चों को अंग्रेजी का ट्यूशन भी देता था।

पैरा जंप की दुर्घटना में हवलदार प्रदीप थापा हुए थे लकवाग्रस्त: जिंदगी की जंग लड़ रहे परिवार की मदद को आगे आ रहे लोग

हमारे आस-पास इस तरह की अनेक कहानियाँ जिन्हें सुना और समझा जाना चाहिए। ऐसी ही एक कहानी 9 पैरा एसएफ (स्पेशल फोर्सेज) के एसएम (गैलेंट्री) सेवानिवृत्त, हवलदार प्रदीप थापा की है। जिनके साथ देश की सेवा करने के दौरान एक दुर्घटना हुई जिससे उनका पूरा जीवन प्रभावित हो गया। वह अपने परिवार के घर चलाने वाले इकलौते सदस्य थे इसलिए फ़िलहाल उनके लिए हालात इतने सामान्य नहीं हैं। 

सोबर मैन नाम के ट्विटर एकाउंट से इस पूरे मामले की जानकारी साझा की गई। ट्वीट में हवलदार प्रदीप थापा का परिचय दिया गया है। इसके बाद उनके बारे में बताया गया है कि हवलदार प्रदीप थापा 9 पैरा एसएफ का हिस्सा थे और सेना मैडल (गैलेंट्री) रिटायर्ड, एक पैरा जंप के दौरान वह लकवाग्रस्त हो गए थे, पैराशूट से कूद कर अलग होने के दौरान उनकी रीढ़ टूट गई थी। नतीजतन उनके शरीर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया और 17 जुलाई 2015 को उन्हें दिल्ली कैंट स्थित बेस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 

रीढ़ पर हुई उस चोट का असर इतना ज़्यादा पड़ा कि वह अपने हाथों का इस्तेमाल भी सीमित रूप से ही कर पाते हैं। अंततः 2 मई 2018 को उन्हें उनकी सेवाओं से मुक्त कर दिया गया। हवलदार प्रदीप थापा के पर उनके घर की पूरी ज़िम्मेदारी थी, वह घर में कमाने वाले इकलौते व्यक्ति थे। लिहाज़ा उनसे ज़्यादा परेशानियाँ और चुनौतियाँ उनके परिवार वालों के सामने थीं। यानी उनका परिवार मदद की उम्मीद में था।  

हवलदार प्रदीप थापा की जानकारी देते हुए कई ट्वीट किये गए थे जिसमें एक ट्वीट सर्वाधिक उल्लेखनीय था। उस ट्वीट में इस बात का ज़िक्र था कि देश की सेवा के दौरान इस तरह की दुर्घटना का शिकार होकर मुश्किल हालातों के सामना कर रहे वीरों के लिए एक मुहिम (हीरोज़ इन नीड) चलाई जा रही है। इस मुहिम के तहत देश की सेवा करने वालों के परिवार वालों की मदद की जाएगी। यानी मुहिम के ज़रिए हवलदार प्रदीप थापा के परिवार की भी मदद की जाएगी। इस मुहिम के अंत में लिखा भी है कि किसी भी व्यक्ति की छोटी से छोटी मदद भी बड़े बदलाव की सूरत ले सकती है।