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युद्ध के हालात लेकिन चीन का प्रचार, आँकड़ों से खेल और फेक न्यूज… आखिर PTI पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा प्रसार भारती

अभी से लगभग 3 महीने पहले एक ख़बर सामने आई थी कि प्रसार भारती समाचार एजेंसी पीटीआई के साथ संबंध ख़त्म कर सकता है। यह ख़बर ठीक उस घटना के बाद आई, जब पीटीआई ने लद्दाख सीमा विवाद मुद्दे पर चीन के राजदूत को प्रचार-प्रसार करने का मंच दिया था। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए साक्षात्कार में सून वीडाँग ने गलवान घाटी में हुए टकराव के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहरा दिया। 

इस मुद्दे पर विरोध करते हुए प्रसार भारती ने पीटीआई को पत्र लिखा और इस बात पर असहमति जताई। साथ ही यह भी कहा कि प्रसार भारती पीटीआई के साथ संबंधों की समीक्षा करेगा। इस तरह की कोई कार्रवाई होने का एक मतलब यह भी है कि प्रसार भारती पीटीआई को दिया जाने वाला आर्थिक सहयोग भी बंद कर सकता है जो कि करोड़ों में है। 

हालाँकि इस मुद्दे पर अभी तक कोई स्पष्ट नतीजा निकल कर नहीं आया है। बीते कुछ दिनों में भारत सरकार ने भारत चीन सीमा मुद्दे से संबंधित हर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मुद्दे पर कड़े फैसले लिए हैं। चाहे वह चीनी एप्लिकेशन पर पाबंदी लगाना हो या चाहे चीन का समर्थन करने वाले संदिग्ध लोगों जैसे पत्रकार राजीव शर्मा की गिरफ्तारी हो, जो रक्षा क्षेत्र से जुड़े खुफ़िया दस्तावेज़ चीन से साझा कर रहा था। 

सरकारी संस्थाओं से लेकर अर्ध सरकारी संस्थाओं तक, महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले समय लेकर सोच-विचार हर जगह किया जाता है। लेकिन ऐसा मुद्दा जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, उस पर निर्णय लेने में देरी करना तर्क पूर्ण नहीं कहा जा सकता। जिस तरह के हालात बने हैं, ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रसार भारती इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण जारी करे कि आखिर किन कारणों और वजहों से समाचार एजेंसी (पीटीआई) से इस मुद्दे पर सख्ती से बात नहीं कर रहा है। वह भी ऐसी समाचार एजेंसी, जिसका रवैया इतने संवेदनशील मुद्दों पर संदिग्ध है। 

पीटीआई का फ़र्ज़ी और भ्रामक समाचारों से रिश्ता बहुत पुराना है। इस साल अगस्त महीने में पीटीआई ने कोरोना वायरस के आँकड़ों पर प्रधानमंत्री को मिसकोट (गलत उद्धरण) किया था। इस साल हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी पीटीआई ने कई राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड को लेकर गलत रिपोर्ट पेश की थी।

आम आदमी पार्टी के कुल 51 फ़ीसदी उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे थे, जबकि पीटीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सिर्फ 25 फ़ीसदी उम्मीदवारों पर गंभीर मामले दर्ज थे। ऐसे ही पीटीआई ने एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में कई बड़े बदलाव किए थे। ठीक इसी तरह समाचार एजेंसी ने भाजपा और कॉन्ग्रेस के उम्मीदवारों के गलत आँकड़े पेश किए थे। इन दोनों घटनाक्रमों से साफ़ हो जाता है कि इतने संवेदनशील मामलों में पीटीआई का रवैया कैसा रहा है। 

पिछले साल जुलाई महीने में पीटीआई ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट में पीटीआई ने दावा किया था कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा, “विमुद्रीकरण का अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।” इसके बाद कई समाचार समूहों ने इस मुद्दे पर भ्रामक ख़बरें फैलाना शुरू कर दिया, जिसके बाद वित्त मंत्री ने खुद इस मुद्दे पर सफाई दी कि उन्होंने इस तरह का कोई भी बयान नहीं दिया है। 

प्रसार भारती देश की लोक सेवा प्रसारक एजेंसी है, जिसे संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम के अंतर्गत बनाया गया है। दूरदर्शन टेलीविज़न नेटवर्क और आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) भी प्रसार भारती के तहत ही आते हैं।

ऑपइंडिया से बात करते हुए सूत्रों ने बताया कि 1980 से लेकर अभी तक पीटीआई को जनता के प्रति ज़िम्मेदारी के बगैर 200 करोड़ रूपए की पब्लिक फंडिंग (चंदा) मिल चुकी है। आज के समय में उतनी धनराशि की कीमत 400 से 800 करोड़ रुपए (ब्याज दर के हिसाब से) है।

ऑपइंडिया को इस मामले की जाँच के दौरान एक और हैरान करने वाली बात पता चली। पीटीआई को सिर्फ प्रसार भारती से आर्थिक सहयोग नहीं मिलता है बल्कि वह बिना आधिकारिक अनुबंध के भी आर्थिक सहयोग उठा रहा है। पिछला अनुबंध साल 2005 में हुआ था जो कि साल 2006 में ख़त्म हो गया था। तभी से इस मुद्दे पर बातचीत जारी है लेकिन स्थायी अनुबंध पर कोई नतीजा निकल कर नहीं आया है। 

ऑपइंडिया को यह भी पता चला कि साल 2006 के बाद से प्रसार भारती पीटीआई की सारी सेवाएँ एड हॉक आधार पर ही ले रहा है। साल 2011 और साल 2013 के दौरान रेट रिवीज़न भी एड हॉक आधार पर था। साल 2011 के पहले रिवीज़न रेट को लेकर पीटीआई ने माँग की थी कि यह 56 करोड़ होना चाहिए। यानी पीटीआई के मुताबिक़, प्रसार भारती को यह धनराशि बतौर सालाना सब्सक्रिप्शन देनी चाहिए थी। 

साल 2014 में प्रसार भारती बोर्ड ने फैसला किया कि पीटीआई को दी जाने वाली राशि घटा कर 2 करोड़ रुपए कर दी जाए। साल 2019 को लिखे गए एक पत्र में भी यही बात दोहराई गई। पीटीआई से संबंधित तमाम कागज़ी कार्रवाई प्रबंधन निर्णयों के अंतर्गत आती है, जो लोक सेवा प्रसारक द्वारा लिए जाते हैं। वहीं प्रशासनिक विभाग, प्रबंधन द्वारा जारी किए गए दिशा निर्देशों के आधार पर संवाद करता है। कुल मिला कर पीटीआई से संबंध समाप्त करने को लेकर अंतिम निर्णय बोर्ड ही ले सकता है, जब भी वह लेना चाहे (ऑपइंडिया द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी के अनुसार)। 

नतीजा यह निकलता है कि प्रसार भारती और पीटीआई के बीच साल 2006 के बाद से कोई आधिकारिक अनुबंध नहीं हुआ है। यहाँ तक कि पीटीआई द्वारा चीन के समर्थन में किए गए प्रचार प्रसार और फ़र्ज़ी ख़बरें प्रकाशित करने के बावजूद एड हॉक समझौता ख़त्म नहीं किया गया। एक चेतावनी पत्र ज़रूर भेजा गया था, जो अभी तक विचाराधीन है। ऑपइंडिया ने इस दौरान अधिकारियों से भी बात करने का प्रयास किया लेकिन कोई आधिकारिक तौर पर बयान देने को तैयार नहीं हुआ।

यह बात खुद में कितनी चिंताजनक है कि सुदर्शन समाचार संबंधी मामले की सुनवाई देश की सबसे बड़ी अदालत में हो रही है, वहीं पीटीआई पर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि क्या पुरानी लिबरल लॉबी पीटीआई को बचाने के लिए काम कर रही है? साथ ही क्या वो लॉबी प्रसार भारती पर दबाव बना रही है, जिससे पीटीआई को मिलने वाला आर्थिक सहयोग जारी रहे?  

महाराष्ट्र: नागपुर में गृह मंत्री अनिल देशमुख के घर के करीब कुल्हाड़ी से काट डाला, Video वायरल

महाराष्ट्र के नागपुर से एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख के आवास के करीब स्थित व्यस्त सिटी स्क्वायर पर एक शख्स को मारते हुए देखा जा सकता है। मारे गए शख्स की पहचान जुआ अड्डा मालिक किशोर उर्फ बाल्या बेलेकर के रूप में हुई है। घटना एक सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई।

बेलेकर का एक लंबा आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। उसकी हत्या करने वाला 2001 में मारे गए एक शख्स का बेटा बताया जा रहा है।

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि बेलेकर भोले पेट्रोल पंप चौक के ट्रैफिक सिग्नल पर रुकता है। तभी मोटरसाइकल सवार युवकों का समूह उसकी कार के एकदम समीप आ जाता है और फिर आगे आकर कार को रोक देता है। इसके बाद वे बेलेकर को गाड़ी से बाहर निकालते हैं और कुल्हाड़ियों और अन्य धारदार हथियारों से उसकी हत्या कर देते हैं

जहाँ पर यह घटना हुई है, महाराष्ट्र राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख का आवास वहाँ से मुश्किल से 1 किमी दूर है।

पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने कहा कि उन्होंने 2001 में मारे गए बेलेकर के बेटे को गिरफ्तार किया है। उन्होंने बताया कि बेलेकर भी जुए का अड्डा चला रहा था और 1995 से ही उसके खिलाफ कई अपराध में केस दर्ज हैं। उन्होंने आगे बताया कि मामले में अज्ञात हमलावरों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है।

राजस्थान जलने के पीछे आदिवासी-मिशनरी नेक्सस? केंद्र से गहलोत ने लगाई गुहार, 3 दिन से राजमार्ग ठप्प

एसटी आरक्षण की माँग के कारण राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा जल रहा है। क्या उदयपुर और डूंगरपुर में आगजनी के पीछे वही आदिवासी-ईसाई नेक्सस है, जो झारखण्ड में पत्थलगड़ी को अंजाम देता है और पालघर में साधुओं की हत्या करता है? राजस्थान में चल रहे दंगे व आगजनी को रोकने में विफल गहलोत सरकार अब आदिवासी क्षेत्रों के लोगों को बातचीत के टेबल पर लाना चाहती है, लेकिन क्या मिशनरियों का आदिवासी-ईसाई गठजोड़ ऐसा होने देगा?

राजस्थान में अध्यापक पात्रता परीक्षा को लेकर चल रहा विरोध-प्रदर्शन इतना उग्र हो गया है कि अब अशोक गहलोत की सरकार केंद्र से ‘रैपिड एक्शन फोर्स (RAF)’ की माँग कर रही है। इस विरोध-प्रदर्शन से राजस्थान का उदयपुर और डूंगरपुर सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। राज्य के पूरे दक्षिणी हिस्से की क़ानून-व्यवस्था एक तरह से राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है।

डूंगरपुर में गोली लगने के कारण शनिवार (सितम्बर 26, 2020) की शाम एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। साथ ही कई घायल भी हुए। इस प्रदर्शन में न सिर्फ सम्पत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, बल्कि कई वाहनों को भी फूँक दिया गया। पुलिस ने कहा है कि उसे रबर की गोलियाँ दागनी पड़ीं। राज्य के पुलिस महानिरीक्षक एमएल लाठड़ को सीएम ने डूंगरपुर भेजा है। सीएम लगातार लोगों से शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।

राज्यपाल कालराज मिश्र की भी पूरे घटनाक्रम पर नजर है और उन्होंने मुख्यमंत्री से फोन पर बात कर स्थिति के बारे में जाना। गुरुवार की शाम को ये प्रदर्शन तब उग्र हो गया, जब युवाओं ने पुलिस के साथ संघर्ष किया। पुलिस दल पर पथराव के साथ-साथ पुलिस के वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया था। जनप्रतिनिधियों ने भी आंदोलनकारी युवाओं के साथ बैठकें की, लेकिन इसका कोई परिणाम निकल नहीं पाया।

दरअसल, प्रदर्शनकारियों की माँग है कि तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा-2018 में जनजाति बहुल (एसटी) क्षेत्र में रिक्त रहे सामान्य वर्ग के 1167 पदों को जनजाति वर्ग (एसटी) के अभ्यर्थियों से ही भरा जाए और इस पर एससी, ओबीसी या सामन्य वर्ग के अभ्यर्थियों की भर्ती न होने पाए। सोशल मीडिया से भी भड़काऊ वीडियो जारी कर राजस्थान सरकार को चुनौती दी जा रही है। जंगलों और पहाड़ियों के कारण पुलिस प्रदर्शनकारियों से निपटने में असफल रही है।

हालत इतने बेकाबू हो गए कि शनिवार की रात राज्य सरकार को कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को हेलीकॉप्टर से डूंगरपुर भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालाँकि, सीएम कह रहे हैं कि उनकी सरकार प्रदेश के हर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध है तथा समाज के किसी भी वर्ग की कानून-सम्मत व न्यायोचित माँगों पर विचार करने या संवाद के लिए हर समय तैयार है। उन्होंने टीएसपी क्षेत्र के विद्यार्थियों एवं युवाओं से अपील की है कि वे हिंसा को छोड़े और सरकार के समक्ष अपनी बात रखने के लिए आगे आएँ।

जनजाति क्षेत्र विकास मंत्री अर्जुन बामणिया और उदयपुर से पूर्व सांसद रघुवीर मीणा को सीएम गहलोत ने कई अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ उदयपुर भेजा, जहाँ उनकी विरोध-प्रदर्शन कर रहे युवाओं के साथ लगभग 3 घंटे तक बैठक हुई। पूर्व-सांसदों और वर्तमान विधायकों के अलावा कॉन्ग्रेसी जनप्रतिनिधियों के साथ कुछ वकील भी मौजूद थे। भारतीय ट्राइबल पार्टी के विधायक राजकुमार रोत ने पुलिस-प्रशासन को ही कोसा है।

उन्होंने कहा कि भले ही आंदोलन की शुरुआत युवाओं ने की हों, लेकिन उनके पास सूचनाएँ हैं कि पुलिस ने स्थानीय ग्रामीणों को निशाना बनाया और उन्हें गिरफ्तार किया, जिससे ये विरोध-प्रदर्शन और ज्यादा उग्र हो गया। उन्होंने कहा कि अब ये मामला ग्रामीण बनाम पुलिस-प्रशासन का हो गया है। एनएच 7-8 पर वाहनों को जलाया गया। एक युवक की मौत पर पुलिस का कहना है कि गोली कहाँ से चली, उसे कुछ नहीं पता।

कहा जा रहा है कि पिछले 2 दिनों में ही 20 से ज्यादा गाड़ियों को आग के हवाले किया गया है। पेट्रोल पंप और एक होटल में लूटपाट की भी खबर आई है। पुलिस का कहना है कि डूंगरपुर के एसपी का भी वाहन नहीं बख्शा गया। 35 पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है, जिसके बाद क़रीब 30 लोगों को वहाँ गिरफ्तार किया गया। क़रीब 25 किलोमीटर तक राजमार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप्प हो चुका है।

उदयपुर रेंज की आईजी विनीता ठाकुर ने कहा है कि क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है, ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। इंटरनेट बंद कर दिया गया है। खेरवाड़ा और ऋषभदेव में भी विरोध-प्रदर्शन जारी है। टोल प्लाजा को भी जलाने का प्रयास किया गया। क़रीब 20 किलोमीटर तक प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थर बिछाए जाने के बाद उदयपुर-अहमदाबाद हाइवे 3 दिनों से जाम है।

वहीं राजस्थान पुलिस का कहना है कि झारखण्ड से आए विशेष विचारधारा के गुट ने हिंसा भड़काई है। पुलिस का कहना है कि जहाँ कुछ लोग हिंसा भड़का कर चले गए हैं, वहीं कुछ अभी भी आसपास के गाँवों में छिपे हुए हैं। झारखण्ड में फ़िलहाल हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जो सकरार चल रही है, उसमें कॉन्ग्रेस भी भागीदार है। राज्य में कॉन्ग्रेस के 4 मंत्री हैं, जो वित्त, कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय सँभाल रहे हैं। फिर भी कॉन्ग्रेस अपने में भी ब्लेम-गेम खेल रही है।

ध्यान देने वाली बात ये है कि प्रदेश भाजपा ने भी पुलिस के बयान का समर्थन किया है। प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियाँ ने कहा कि आशंका पहले लग रही थी, अब प्रशासन ने भी पुष्टि कर दी है कि ये बाहरी तत्व कौन हैं? उन्होंने कहा कि ये लोग झारखंड से आए, कुछ चले गए, कुछ अभी भी छुपे हैं, जो हमेशा से हमारे आदिवासी क्षेत्रों में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने आशा जताई कि ये लोग सफल नहीं होंगे, लेकिन साथ ही चेताया कि उनको जल्द बेनकाब किया जाना चाहिए।

हमने इस संबंध में कुछ स्थानीय लोगों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि मेवाड़ क्षेत्र को नक्सलियों का अड्डा बनाने की साजिश चल रही है और इस कार्य में झारखण्ड के पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों की भागीदारी है। पत्थलगड़ी ईसाई-आदिवासी नेक्सस का एक ऐसा उदाहरण है, जो देश का क़ानून नहीं मानता। लोगों ने दबे जुबान से बताया कि राजस्थान के कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि भी इस खेल में शामिल हैं, भले ही वो किसी भी पार्टी के हों।

एक प्राध्यापक अभ्यर्थी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राज्य लोक सेवा आयोग ने प्राध्यापक भर्ती में सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ अन्याय किया है, और ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्हें छिपाने के लिए ये सब किया जा रहा है। उसने कहा कि राज्य में 5000 पदों के लिए 2018 में विज्ञप्ति निकाली निकली थी और EWS आरक्षण की घोषणा के बाद प्रक्रियाधीन नियुक्तियों में 14% अतिरिक्त पद सृजित करने की घोषणा हुई थी, लेकिन बिना 700 पद बढ़ाए ही दोगुने अभ्यर्थियों को बुला लिया गया।

जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ढिंढोरा पीट रहे हैं कि उनकी सरकार ने पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में 501 घोषणाओं में से 252 को पूरा कर दिया है और राहुल गाँधी सोशल मीडिया पर ‘प्रदर्शनकारी किसानों’ के समर्थन में लगे हुए हैं, कॉन्ग्रेस को इस सवाल का जवाब देना होगा कि दक्षिणी राजस्थान में चल रहे उग्र हिंसक प्रदर्शन को रोकने में, युवाओं को समझाने में एवं बाहरी तत्वों को चिह्नित कर उन पर कार्रवाई करने में उसकी सरकार नाकाम क्यों रही है?

गुरुवार को राजस्थान में हिंसा भड़कने के बावजूद इसके अगले ही दिन अशोक गहलोत किसानों के मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। वो राजग सरकार द्वारा ‘बनाए गए हालत’ को पूरे देश के किसानों के ‘सड़कों पर आने’ के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे। राजस्थान प्रदेश कॉन्ग्रेस के सभी प्रमुख पदाधिकारी वहाँ मौजूद थे। जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस चलती रही, उधर उदयपुर और डूंगरपुर जलता रहा।

राजस्थान ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से भी लोगों के आकर स्थानीय युवाओं को भड़काने की बातें पुलिस-प्रशासन ने कही है। सड़क पर शराब की बोतलों से भरे एक ट्रक तक को लूट लिया गया। हालाँकि, कई एसटी अभ्यर्थी कह रहे हैं कि ये उनका काम नहीं है, वो हिंसा नहीं कर सकते। कहा गया है कि बगल के गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों से भी कुछ भड़काऊ लोग आए हैं। सरकार अब अपनी अक्षमता का पूरा ठीकरा बाहरी राज्यों पर फोड़ने के लिए तैयार है।

ऐसी कोई घटना हो और उस पर राजनीति न हो, ये तो हो ही नहीं सकता। नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने जब इसके लिए कॉन्ग्रेस सरकार को पूरी तरह फेल करार दिया तो कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य एवं पूर्व सांसद रघुवीर मीणा ने हिंसक प्रदर्शनों के लिए भाजपा तथा भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) के नेताओं को जिम्मेदार ठहरा डाला। जैसा कि हमने बताया, BTP इसके लिए पुलिस को दोषी ठहरा रही है।

ऐसा नहीं है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा जो माँगें उठाई जा रही हैं, उन्हें लेकर वो कोर्ट नहीं गए थे। हाईकोर्ट पहले ही उनकी याचिका रद्द कर चुका है। इसके बाद कांकरी डूंगरी में एसटी अभ्यर्थी धरने पर बैठे थे, जो अब खुद के इस आगजनी का हिस्सा न होने की बातें कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये काम ‘उत्पाती आदिवासियों’ का है। शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने शांति की अपील करते हुए कहा कि बहकावे में आकर ऐसी हरकतें की जा रही हैं।

राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया का बयान

भाजपा प्रदर्शनकारियों के समर्थन में नहीं है। नेता प्रतिपक्ष कटारिया का कहना है कि चूँकि इन माँगों को माने जाने में ही क़ानूनी अड़चनें हैं, गहलोत सरकार को अभ्यर्थियों को इसके बारे में अच्छी तरह समझाना चाहिए, जिसमें वो विफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि निर्दोष पिसे जा रहे हैं, परेशान हो रहे हैं। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि सारे वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ही 200 आंदोलनकारियों ने इतना नुकसान कर दिया।

उन्होंने क़ानून-व्यवस्था के लिए सख्ती की ज़रूरत पड़ने पर वो भी करने की अपील की है और छात्रों को समझाया है कि आगजनी करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। उन्होंने भी गुजरात, झारखण्ड और मध्य प्रदेश के भड़काऊ लोगों को यहाँ आकर स्थिति बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि इनमें अधिकतर ‘कन्वर्टेड आदिवासी’ शामिल हैं, जो ईसाई मिशनरियों के चक्कर में आकर धर्मान्तरण कर चुके हैं।

भाजपा ये समझाने में लगी हुई है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के क्षेत्रों में इसी वर्ग को नौकरी के लिए ज्यादा आरक्षण देने का फैसला भैरों सिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल में ही हुआ था और वसुंधरा राजे ने इसे आगे बढ़ाया। इससे कई युवाओं की नौकरी लगी। भाजपा ने इस बात से निराशा जताई है कि आज ये नौकरीपेशा लोग भी अपने समुदाय के इन युवाओं को समझा नहीं पा रहे। भाजपा इस मामले में फ़िलहाल फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है।

15 साल की लड़की से 28 घंटे तक गैंगरेप: सिर्फ इस्माइल गिरफ्तार, इरशाद और साहिर खुलेआम गाँव में घूम कर दे रहे धमकी

हरियाणा के नूँह जिले में 4 सितंबर को इस्माइल, साहिर और इरशाद नाम के तीन युवकों द्वारा 15 वर्षीय एक लड़की से 28 घंटे तक गैंगरेप किए जाने का मामला सामने आया। 23 दिनों के बाद इस घटना को लेकर पीड़िता ने राष्ट्रीय पुलिस संरक्षण आयोग को एक चिट्ठी लिख कर मामले में पुलिस की कथित निष्क्रियता की रिपोर्ट दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नाबालिग ने अपने पत्र में पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा, “मामले में तीनों आरोपितों में से सिर्फ 1 की गिरफ्तारी हुई है, बाकी बचे दो आरोपित खुलेआम गाँव में घूम रहे और मेरे परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं।”

बता दें कि 4 सितंबर को इस्माइल, साहिर और इरशाद ने बाजरे के खेत में 15 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप किया। जिसके बाद 7 सितंबर को ग्रामीणों और परिजनों ने पुलिस स्टेशन में इकट्ठा होकर गाँव के ही रहने वाले इस्माइल, साहिर और इरशाद के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई।

गाँव वालों ने आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग भी पुलिस प्रशासन से की। शुरुआत में पुलिस ने पूरी घटना को लड़की के सिर पर मढ़ते हुए कहा था कि लड़की अपनी मर्जी से कथित युवकों के साथ गई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पिता ने बताया कि बाद में ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने तीनों आरोपितों में से इस्माइल को गिरफ्तार कर लिया लेकिन अभी भी बाकी के दो आरोपित सरेआम गाँव मे घूम रहे और उन्हें धमकी दे रहे हैं।

गैंगरेप पीड़िता के पिता ने बताया, “आरोपित (साहिर और इरशाद) ने धमकी दी है कि अगर उनका नाम शिकायत से वापस नहीं लिया गया तो वे हमारी बेटी का अपहरण कर लेंगे और हमारी बेटी को जान से मार देंगे।”

नूँह पुलिस ने परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इस घटना में उन्हें बाकी दो आरोपितों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हैं। इसीलिए उनकी गिरफ्तारी नहीं की गई। पुलिस के प्रवक्ता ने कहा कि लड़की के परिजनों ने लड़की के नाबालिग होने का फर्जी दावा किया है।

गौरतलब है कि पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया था कि 4 सितंबर को किसी काम से सुबह 5 बजे घर से बाहर निकलने के बाद आरोपित इस्माइल उसे बहला-फुसला कर बाजरे के खेत में ले गया था। वहाँ साहिर, इरशाद और इस्माइल ने उसके साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं, आरोपितों ने पीड़िता को नशीली दवा पिला कर पूरे दिन उसके साथ बलात्कार किया था।

पाकिस्तान से आए सिखों के 70 साल पुराने आशियाने पर बुलडोजर चलाने की तैयारी में BMC

अभिनेत्री कंगना रनौत के दफ्तर में तोड़फोड़ को लेकर विवादों में आई बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) अब गुरु तेग बहादुर नगर (GTB) स्थित पंजाबी कॉलोनी को ध्वस्त करने वाली है। बता दें कि यह कॉलोनी 70 साल से अधिक पुरानी और जर्जर है। देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए सिख और पंजाबियों की यह शरणस्थली है।

मिड डे की खबर के अनुसार गोवंडी बिल्डिंग ढहने की घटना के बाद, बीएमसी ने शहर की सभी जर्जर इमारतों को खाली कराने की कठोर कार्रवाई शुरू कर दी है। इसका क्रियान्वयन अक्टूबर में शुरू होगा। इस बीच यहाँ के बाशिंदे मामले में सरकार से हस्तक्षेप करने की अनुरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनके लिए किसी तरह के वैकल्पिक आवास या पुनर्निर्माण की व्यवस्था नहीं की गई है।

पंजाबी कॉलोनी की सभी 25 इमारतें जर्जर हालत में हैं और बीएमसी ने लगभग दो दशक पहले 1999 में इन इमारतों को खाली करने के नोटिस भेजने शुरू कर दिए थे। लेकिन आंदोलन और अदालत में मामला जाने के कारण इसे तोड़ा नहीं जा सका। इस बीच बीएमसी ने इमारतों के पानी और बिजली कनेक्शन काटने शुरू कर दिए थे।

जिन इमारतों पर कार्रवाई होनी है उनमें से 14 के कनेक्शन पहले ही काटे जा चुके हैं। शेष के कनेक्शन काटने शुरू कर दिए गए हैं। बता दें कि इससे पहले जब कनेक्शन काटने की कार्रवाई हुई थी तो जमकर विरोध-प्रदर्शन हुआ था।

14 इमारतों के बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिए जाने पर निवासियों ने हाइकोर्ट का रुख किया था। जहाँ हाइकोर्ट ने बीएमसी को निर्देश देते हुए कहा था कि वे अगली सुनवाई तक उन्हें बेदखल करने की कोई भी कठोर कार्रवाई न करें। सोसायटी ने अपनी याचिका में दावा किया था कि BMC ने HC द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया था।

जानकारी के मुताबिक अब एफ नॉर्थ वार्ड के असिसटेंट कमिश्नर गजानन बेल्लाले ने कहा है, “हम अगले हफ़्ते शेष सभी इमारतों के कनेक्शन को काटने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि वे जीर्ण-शीर्ण हैं और हम कोई भी जोखिम नहीं उठा सकते हैं। इमारतों की विध्वंस प्रक्रिया अक्टूबर में शुरू होगी।”

हालाँकि यहाँ के निवासी भी इन इमारतों में रहना सुरक्षित नहीं समझते हैं, कई लोग तो वहाँ से कहीं और शिफ्ट हो गए हैं, लेकिन अभी भी वहाँ पर रहने वाले लोगों के पास आवास की समस्या है। उनका कहना है कि वे खुद यहाँ से हटना चाहते हैं, लेकिन पहले उन्हें पर्याप्त जगह तो मिले, जहाँ वे अपने परिवार के साथ रह सकें।

पंजाबी कॉलोनी को सन 1950 के आसपास भारत सरकार ने करीब 12 एकड़ भूखंड पर बसाया था। कुल 25 बिल्डिंगें बनाई गई थीं और करीब 1200 परिवार थे। धीरे-धीरे बिल्डिंगें जर्जर होती गईं, लेकिन डेवलपमेंट नहीं हुआ। इसका कारण बताया जाता है कि इस जमीन का मालिकाना हक राष्ट्रपति के नाम पर था।

बीएमसी के अधिकारियों में से एक ने कहा, “कलेक्टर ने उन्हें स्वामित्व का पत्र दिया है। अब, यह उन पर निर्भर करता है कि किसी संपत्ति का पुनर्मिाण कैसे किया जाए। वैकल्पिक आवास के लिए न तो बीएमसी और न ही कलेक्टर कार्यालय जिम्मेदार है।”

बिल्डिंग नंबर 5 के एक निवासी ने बताया, “पुनर्निर्माण के लिए बातचीत चल रही है, लेकिन अभी तक किसी को भी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। लोगों को वैकल्पिक आवास नहीं मिल रहा है, यहाँ तक कि उन्हें किराए पर भी रहने की जगह नहीं मिल रही है।”

BJP की नई टीम में भी अमित मालवीय को देख उखड़े सुब्रमण्यम स्वामी, प्रियंका गाँधी की तारीफ वाली रिपोर्ट रीट्वीट की

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सीनियर नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय की फिर से नियुक्ति पर नाराजगी व्यक्त करने के कुछ ही घंटों बाद रविवार (सितंबर 27, 2020) को एक रिपोर्ट को रीट्वीट किया। इस रिपोर्ट में कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी की तारीफ की गई है।

बता दें कि बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने शनिवार (सितंबर 26, 2020) को नई टीम की घोषणा की। इसमें पार्टी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को बरकरार रखा गया है। स्वामी ने मालवीय को हटाने की माँग की थी। उन्हें एक्सटेंशन मिलने पर नाराजगी व्यक्त की थी। हालाँकि, बाद में उन्होंने यू-टर्न लेते हुए दावा किया कि उनका पहला ट्वीट यह पता करने के लिए था कि मालवीय ने फर्जी आईडी से ट्वीट खुद करवाए थे या इसके पीछे कोई और था।

अब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े अधिकारी पर हमला बोला है। सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट कर आरोप लगाया है कि फर्जी अकाउंट्स से उन पर हो रहे निजी हमलों के पीछे पीएमओ के हरेन जोशी का भी हाथ है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने ट्वीट में लिखा, “अब जब अमित मालवीय को फिर से चुन लिया गया है तो मुझे यह कहना पड़ रहा है कि मेरे पहले के ट्वीट यह पता करने के लिए थे कि मालवीय ने फर्जी आईडी से ट्वीट खुद करवाए या इसके पीछे कोई और था। अब यह साफ हो गया है। इसके पीछे पीएमओ के हरेन जोशी थे। मैंने दो हफ्ते पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके बारे में लिखा है। मैंने उन्हें सबूत भी दिए हैं।”

अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहने वाले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने पार्टी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। बुधवार (सितंबर 9, 2020) सुबह स्वामी ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर कहा था कि अगर कल (सितंबर 10, 2020) तक अमित मालवीय को नहीं हटाया गया, तो इसका मतलब ये होगा कि पार्टी मुझे नहीं बचाना चाहती है।

उन्होंने ट्वीट में कहा था, “अगर कल तक अमित मालवीय को भाजपा आईटी सेल से नहीं हटाया गया, तो इसका मतलब पार्टी मुझे डिफेंड नहीं करना चाहती है। अगर पार्टी में ऐसा कोई फोरम नहीं है जहाँ मैं कार्यकर्ताओं की बात रख सकूँ तो ऐसे में मुझे अपना बचाव खुद ही करना होगा।” इसके लिए उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से पांडवों के कौरवों से सिर्फ पाँच ग्राम का राज्य माँगने की ‘न्यूनतम माँग’ की तर्ज पर अपनी न्यूनतम माँग में अमित मालवीय का निष्कासन का प्रपोजल रखा था।

वरिष्ठ नेता स्वामी की धमकियों के बावजूद, भाजपा ने उन्हें अनदेखा कर एक बार फिर से युवा भाजपा नेता अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख बनाने का फैसला किया है।

बीजेपी की अनदेखी के बाद स्वामी ने दिया जवाब

अब मुखर भाजपा नेता ने खुद की अनदेखी पर प्रतिक्रिया एक न्यूज रिपोर्ट को रीट्वीट करके दिया है। इस न्यूज रिपोर्ट में प्रियंका गाँधी वाड्रा की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस में बदलाव का साइलेंट एजेंट’ बताया गया है।

Image Source: Subramanian Swamy

रविवार को, सुब्रमण्यम स्वामी ने CNN News18 की एक रिपोर्ट को रीट्वीट किया, जिसमें दावा किया गया है कि प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर बदलाव के दौर से गुजर रही है। रिपोर्ट में प्रियंका गाँधी को ’दीदी’ के रूप में संबोधित किया गया है। इसके साथ ही प्रियंका गाँधी कि तुलना उनकी दादी पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और उनकी राजनीतिक और संगठनात्मक कार्यशैली की समानता से किया गया है।

कॉन्ग्रेस पार्टी, विशेष रूप से गाँधी परिवार को लेकर अपने विरोध के लिए जाने जाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने अचानक से उनकी तारीफ की है। प्रियंका गाँधी के लिए उनकी सकारात्मक स्वीकार्यता पार्टी नेतृत्व द्वारा अपनी अनदेखी किए जाने के ठीक एक दिन बाद आई है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने इससे पहले ट्वीट करते हुए लिखा था, “बीजेपी की आईटी सेल बेकार हो चुकी है। कुछ मेंबर फर्जी आईडी बनाकर मुझपर हमला कर रहे हैं, अगर मेरे प्रशंसक ऐसा करने पर उतरे तो उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं रहूँगा। जैसे मुझ पर हमला करने के लिए बीजेपी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।”

बंगाल में 1 अक्टूबर से खुलेंगे सिनेमा हॉल, थिएटर; CM ममता बनर्जी ने दी इजाजत

कोरोना संकट के बीच पश्चिम बंगाल सरकार ने अगले महीने से सिनेमा हॉल, संगीत और नृत्य शो के संचालन को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। ममता सरकार द्वारा यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब राज्य में कोरोना वायरस का प्रसार अपने चरम पर है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य में कुल संक्रमितों का आँकड़ा 2 लाख पार गया, जिसमें 27 सितंबर तक के आँकड़ों के हिसाब से 25,374 एक्टिव केस है। वहीं, मरने वालों की संख्या बढ़कर 4,665 हो गई है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को कहा कि यह कदम राज्य की स्थिति को वापस बहाल करने के लिए है। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा, “सामान्य परिस्थितियों की ओर लौटते हुए जटरास, प्ले, ओएटी, सिनेमा, म्यूजिकल और डांस कार्यक्रम तथा मैजिक शो को 1 अक्टूबर से 50 या इससे कम लोगों के साथ खोलने की अनुमति होगी। इस दौरान लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करना होगा, मास्क लगाना होगा व अन्य प्रोटोकॉल को फॉलो करना होगा।”

बता दें कि कोरोना संकट की तेज होती दस्तक के साथ ही केंद्र सरकार ने मार्च में सिनेमाघरों को बंद करने का आदेश दिया था। लेकिन पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने 1 जून से ही फिल्म, वेब सीरीज और टीवी सीरियल शूटिंग शुरू करने की अनुमति दे दी थी। सरकार ने फिल्म सेट पर 35 से लोगों से ज्यादा की उपस्थिति की अनुमति नहीं दी थी। संक्रमण के बढ़ाते मृत्यु दर के बीच पश्चिम बंगाल फिल्म थिएटरों को फिर से शुरू करने वाला भारत का पहला राज्य बना गया है।

मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MAI) और ईस्टर्न इंडिया मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन (EIMPA) ने पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार से जून में सिनेमा घरों को फिर से खोलने का अनुरोध किया था। बंगाल फिल्म इंडस्ट्री में कई अभिनेताओं द्वारा इसी तरह की माँग की गई थी, जिसमें टीएमसी सांसद मिमी चक्रवर्ती और नुसरत जहाँ भी शामिल हैं। उन्होंने दावा किया था कि सिनेमाघरों व अन्य मनोरंजन क्षेत्रों के बंद होने से कारोबारियों व कर्मचारियों को आर्थिक तंगी से जूझना पड़ रहा है।

ट्रायल पूरा हुए बिना ही हजारों को कोरोना वैक्सीन दे रहा है चीन, चुप रहने की चेतावनी भी दी

कोरोना वायरस के पैदा होने से लेकर फैलने तक चीन की भूमिका हमेशा से संदिग्ध रही है। इस मुद्दे पर चीन हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। ताज़ा मामले में इस महामारी पर चीन की हरकतों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। ख़बरों के मुताबिक़ चीन अपने देश के लोगों को कोविड 19 की वैक्सीन शॉट्स दे रहा है जबकि इस वैक्सीन का परीक्षण पूरा नहीं हुआ है। यानी, वैक्सीन कितनी असरदार है या उसके दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं, इस बात की पुष्टि भी नहीं हुई है। 

जिन लोगों को इस वैक्सीन की डोज दी जा रही है उनसे एक समझौते पर हस्ताक्षर भी कराया जा रहा है कि वह किसी से भी इस बात की चर्चा नहीं कर सकते हैं। जो लोग खतरे के दायरे में आते हैं उनमें सरकारी समूहों के कर्मचारी, सरकारी अधिकारी, वैक्सीन कंपनी के कर्मचारी और शिक्षक शामिल हैं। इन लोगों को यह वैक्सीन सबसे पहले दी जा रही है। इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य जानकार सवाल खड़े कर रहे हैं कि ऐसा करने के पहले उन लोगों से सहमति दर्ज कराई जा रही है या नहीं। 

चीन ने अपनी इस हरकत का बचाव भी किया है। उसका कहना है कि सब कुछ शोध कार्य पूरा होने के बाद ही किया गया है। चीन ने दावा किया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने उसके प्रायोगिक वैक्सीन कार्यक्रम का समर्थन किया है। यह कार्यक्रम जुलाई में शुरू किया गया था और चीन ने इस इस संबंध में जून के दौरान डब्ल्यूएचओ को सूचित कर दिया था। इस बात की जानकारी नेशनल हेल्थ मिशन की अधिकारी ज्हेंग जोंगवी ने रायटर्स को दी थी। 

डब्ल्यूएचओ की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात कही है। उन्होंने कहा, “कोई भी देश किसी मेडिकल उत्पाद को सिर्फ अपनी सीमा के भीतर की मान्यता दे सकता है। ऐसा सिर्फ आपातकाल जैसे हालातों में अस्थायी समाधान के तौर पर ही किया जा सकता है।” 

फिलहाल चीन में कुल 11 वैक्सीन क्लिनिकल ट्रायल फेज़ में हैं और लगभग 4 वैक्सीन तीसरे चरण के ट्रायल में हैं। इसमें से दो वैक्सीन ऐसी हैं जो चीन सरकार द्वारा समर्थित कंपनी ने तैयार की हैं, पहली कंपनी है चाइना नेशनल बॉयोटेक ग्रुप और दूसरी सिनोवाक बॉयोटेक। अन्य प्रायोगिक वैक्सीन कैनसिनो बॉयोलॉजिक्स द्वारा तैयार की जा रही हैं। इसे जून में सेना के इस्तेमाल के लिए स्वीकृति दी गई थी।    

इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि अभी तक दुनिया के किसी भी देश ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है। किसी भी देश ने अपने लोगों को इतने बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल की वैक्सीन नहीं दी है। चीन ऐसा कुछ करने वाला पहला देश है। इस तरह की वैक्सीन से बड़े पैमाने पर संक्रमण या दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। लिहाज़ा दुनिया के तमाम जानकार चीन की इस हरकत से चिंतित हैं। 

चीन की निजी स्वास्थ्य कंपनी सिनोवाक ने सिर्फ बीजिंग में ही लगभग 10 हज़ार लोगों को इस वैक्सीन के शॉट्स दिए हैं। इसी तरह सिनोफ़ार्म नाम की एक कंपनी ने भी हज़ारों लोगों को ट्रायल वैक्सीन के शॉट्स दिए हैं। इसके अलावा चीन की सरकार के तहत काम करने वाली कंपनी से संबंधित स्पष्ट जानकारी तक नहीं उपलब्ध है।    

‘संयुक्त राष्ट्र का काम प्रोपेगेन्डा फैलाना, ‘फ्रीडम फाइटर्स’ कहता है आतंकियों को’ – आखिर UN अब कितना विश्वसनीय?

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 1945 में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के तौर पर हुई थी। जिसके प्रमुख उद्देश्यों में उसके सदस्य देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग, शांति और मित्रतापूर्ण व्यवहार को शामिल किया गया था।

इस साल यह संस्था 75 साल पूरे कर चुकी है और अगर इस उपलब्धि पर समीक्षा करें कि क्या यह अपने उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने तो सफल रही है, तो इसका जवाब नकारात्मक ज्यादा मिलेगा। कोई भी जागरूक व्यक्ति जो प्रतिदिन देश-दुनिया के घटनाक्रमों पर नजर रखता होगा, वह इस बात की गवाही दे सकता है कि पिछले सात दशकों में दुनिया भर में युद्ध, तनाव, और आतंकवाद अपने चरम पर पहुँच गया है।  

इसी दौरान, हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सयुंक्त राष्ट्र की स्थापना से लेकर 90 के दशक तक दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर बैठी थी, जिसे कोल्ड वॉर यानी शीत युद्ध का नाम दिया गया था। इस दौर में वैश्विक अशांति और आपसी दुश्मनी इतनी बढ़ चुकी थी कि इसका फायदा अमेरिका (यूएस) और सोवियत यूनियन (यूएसएसआर) ने हथियारों की होड़ को बढ़ावा देकर उठाना शुरू कर दिया।

आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि दुनिया के तानाशाह, आतंकवाद और कट्टरपंथ से ग्रषित देश अपने नागरिकों की भलाई के स्थान पर हथियारों की खरीद एवं विस्तार पर अधिक जोर दे रहे हैं। इसमें चीन, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान और ईरान जैसे संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश शामिल हैं।

इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ के पहले लगभग 40 साल तो उसके उद्देश्यों के विरुद्ध ही निकल गए। इस सम्बन्ध में कहा जाता है, “शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र का काम सिर्फ दोनों महाशक्तियों – अमेरिका (यूएस) और सोवियत यूनियन (यूएसएसआर) के लिए प्रचार (प्रोपेगेन्डा) फैलाना था।”

इस कथन को कहने वाला कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत, डोर गोल्ड थे। उन्होंने “Tower of Babble: How the United Nations Has Fueled Global Chaos” नाम से एक पुस्तक लिखी है, जिसमें वे संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करते हुए लिखते हैं, “इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि संयुक्त राष्ट्र पर किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद के समाधान के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता।” 

दूसरी ओर, शीत युद्ध समाप्ति के बाद वर्तमान परिदृश्य में भी संयुक्त राष्ट्र की शैली में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इसकी पुष्टि इतिहास विषय पर केन्द्रित एक प्रतिष्ठित टीवी चैनल ‘हिस्ट्री’ ने की है। दरअसल, चैनल ने अपनी वेबसाइट पर संयुक्त राष्ट्र संघ को उत्तेजक नीतियों का समर्थक, विवादास्पद स्वास्थ्य विकल्प प्रदान करने, और नौकरशाह होने जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए संबोधित किया है।

वास्तव में, यह कोई नाममात्र की आलोचना नहीं बल्कि एक वास्तविकता है। जिसका प्रमाण “The Case for Peace: How the Arab-Israeli Conflict can be Resolved” नाम से प्रकाशित एक पुस्तक में मिलता है। इसके लेखक, एलन देरशोवित्ज़ के मुताबिक, “कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र संघ आतंकवाद को प्रमुखता से बढ़ावा देता रहा है और मासूम लोगों की हत्या करने वालों को वहाँ ‘फ्रीडम फाइटर्स’ तक कहकर परिभाषित किया जाता है।” वे आगे लिखते है,

“विश्व में आज संयुक्त राष्ट्र को छोड़कर ऐसी कोई संस्था नहीं है, जोकि आतंकवाद को इस हद तक मान्यता देती हो!”

संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक तनाव और आतंकवाद को लेकर जो लचीला रवैया है, वैसा ही उसके वैचारिक स्तर पर भी देखने को मिलता है। जब साल 2011 में उत्तर कोरिया के क्रूर तानाशाह किम जोंग-इल का निधन हुआ तो जनरल असेम्बली में कुछ क्षणों के लिए मौन रखा गया था। जबकि खुद संयुक्त राष्ट्र सहित मानवाधिकारों की लगभग अन्य सभी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने किम के शासन को दुनिया का सबसे ज्यादा निर्दयी, दमनकारी और मानवता के खिलाफ अपराधी बताया था।

इसी तरह पिछले कुछ सालों से कट्टरपंथी देशों विशेषकर पाकिस्तान और टर्की के प्रभाव में आकर संयुक्त राष्ट्र ‘इस्लामोफोबिया’ नाम से एक काल्पनिक शब्दावली को स्थापित करने में लगा हुआ है। जिसके अनुसार समुदाय विशेष का गैर-मुस्लिम देशों में धर्म के आधार पर कथित उत्पीड़न किया जाता है। हालाँकि, यह अपने गुनाहों को छुपाने की साजिश के साथ-साथ एक भ्रमजाल है।

इसके विपरीत, बांग्लादेश के गठन के समय हिन्दुओं के नरसंहार और पाकिस्तान में आज गैर-मुसलमानों पर हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यह एक विडम्बना है कि हिन्दुफोबिया की सच्चाई को यह अंतरराष्ट्रीय संस्था जानबूझकर नजरअंदाज कर देती है।  

इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ का दोहरा चरित्र भी सामने आता है। दरअसल, जब इस्लामी शरणार्थियों – ईराक, ईरान, दक्षिण सूडान, सीरिया, यमन, यूक्रेन और रोहिंग्या की बात होती है, तो संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विशेष सहायता और उनके मानवाधिकारों की चिंता की जाती है। जबकि यूरोप और एशिया में गैर-मुस्लिम देशों में यह शरणार्थी अराजकता फ़ैलाने और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने के चलते बदनाम हैं।

इस तथ्य के सैकड़ों उदाहरणों में से एक – सितम्बर 2020 में स्वीडन के दंगों को लिया जा सकता है, क्योंकि उन उपद्रवों में मुख्य भूमिका वहाँ के मजहबी शरणार्थियों की थी। वहीं म्यांमार ने तो रोहिंगियाओं के एक संगठन को आतंकवाद की श्रेणी में रखा हुआ है। जबकि कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का विस्थापन और पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान में गैर-मुसलमानों पर हमले होते है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया तक भी नहीं होती है।

संयुक्त राष्ट्र की असवेंदनशीलता और वैचारिक भ्रष्टाचार का स्तर सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक क्षेत्रों में फैला हुआ है। आज जब पूरा विश्व कोरोना वैश्विक महामारी से जूझ रहा है तो भी संयुक्त राष्ट्र आलोचनाओं से घिरा हुआ है। दरअसल, जब कोरोना महामारी चीन से निकल कर दूसरे देशों में फैलने लगी तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जानबूझकर इसकी जानकारी को कई दिनों तक छुपाए रखा था।

अगर समय रहते महामारी पर नियंत्रण के उपाय किए जाते तो शायद इतनी भयावह स्थिति न होती। अब इस फ़ैल चुकी अव्यवस्था के लिए भी संयुक्त राष्ट्र को ही जिम्मेदार माना जाता है। इस सन्दर्भ में, अप्रैल 2020 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक खबर “U.N. Security Council ‘Missing In Action’ in Coronavirus Fight” हेडलाइन के साथ प्रकाशित भी की थी।

समाचारपत्र ने संयुक्त राष्ट्र के सबसे शक्तिशाली सह-संगठन सिक्यॉरिटी काउंसिल के बारे में लिखा, “जब विश्व की बहुत बड़ी आबादी लॉकडाउन में है और हमारे सामने वैश्विक सुरक्षा का सबसे बड़ा मुद्दा सामने है, ऐसे में सिक्यॉरिटी काउंसिल कुछ भी करने में असमर्थ है।” पहले की तरह इस बार भी आलोचना किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं की बल्कि संयुक्त राष्ट्र में ह्यूमन राइट्स वॉच के निदेशक लुई कारबोन्यू ने की थी।   

इन हालातों को देखते हुए, भारत सहित अन्य देशों द्वारा संयुक्‍त राष्‍ट्र की व्‍यवस्‍था में बदलाव की वकालत होने लगी है। कुछ दिनों पहले जनरल असेम्बली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इसके प्रति कम होते भरोसे को भी दुनिया के सामने रखा था। उन्‍होंने स्पष्ट किया कि अगर बड़े पैमाने पर सुधार नहीं किए गए तो दुनिया का संयुक्त राष्ट्र पर से भरोसा उठने लगेगा।

अतः प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल समय की माँग है। उन्होंने जोर देते हुए कहा भी है:

“ऐसे में विश्व कल्याण की भावना के साथ जिस संस्था का गठन हुआ, वो भी उस समय के हिसाब से ही थी। आज हम बिल्कुल अलग दौर में हैं। 21वीं सदी में हमारे वर्तमान की, भविष्य की आवश्यकताएँ और चुनौतियाँ अलग हैं। आज पूरे विश्व समुदाय के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि जिस संस्था का गठन तबकी परिस्थतियों में हुआ था, वह आज भी प्रासंगिक है। सब बदल जाए और हम ना बदलें तो बदलाव लाने की ताकत भी कमजोर हो जाती है”।

इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि आज इस अंतरराष्ट्रीय संगठन में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की जरूरत है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ सहित उसके सभी सह-संगठनों को गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है।

BJP नेता ने ‘मथुरा मुक्ति’ का किया समर्थन तो भड़का इकबाल अंसारी, कहा- ये हिंदुस्तान की तरक्की रोक रहे

अयोध्या में राम मंदिर का भूमिपूजन होने के बाद मथुरा कोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के लिए दायर हुई याचिका को लेकर सियासत गरमा रही है। भारतीय जनता पार्टी के नेता विनय कटियार और अयोध्या मामले में बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इकबाल अंसार ने इसे लेकर अपनी-अपनी बात रखी है। पूर्व सांसद विनय कटियार ने ‘श्रीकृष्ण विराजमान’ की तरफ से दायर की गई याचिका का स्वागत किया है।

विनय कटियार ने ये भी कहा कि इस विषय में क़ानूनी रास्ता अख्तियार करना है या फिर आंदोलन चला कर मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराना है, इस पर निर्णय लेने की आवश्यकता है। वहीं इक़बाल अंसारी ने इस याचिका से निराशा जताते हुए कहा कि अगर हिंदुस्तान को विकास करना है तो मंदिर-मस्जिद की राजनीति से ऊपर उठना पड़ेगा।

‘बजरंग दल’ के संस्थापक विनय कटियार ने स्पष्ट किया कि जहाँ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, मथुरा में उसी जगह पर आज मस्जिद खड़ी है। उन्होंने कहा कि उस मस्जिद का रास्ता श्रीकृष्ण जन्मभूमि से होकर जाता है। उन्होंने दावा किया कि इस पर दूसरे संप्रदाय के लोगों ने बलपूर्वक कब्ज़ा कर रखा है। उन्होंने कहा कि बिना किसी बड़े आंदोलन के प्रशासन की नींद नहीं खुलेगी, इसीलिए इसकी रूपरेखा बनानी पड़ेगी।

‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, विनय कटियार ने कहा कि इस कार्य के लिए व्यापक जनांदोलन खड़ा किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल होने के नाते भाजपा भी इस आंदोलन में अपना काम करेगी और बाकी संगठन भी अपना काम करेंगे। उन्होंने कहा कि अयोध्या, काशी और मथुरा को मुक्त कराने का भाजपा का वादा काफी पुराना है, जिसमें से अयोध्या में विजय प्राप्त हो चुकी है और अब काशी व मथुरा में से पहले किसके लिए आंदोलन चलाया जाए, इसके लिए विचार-विमर्श होगा।

बौखलाए इकबाल अंसारी ने कहा कि हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति करने वाले इस मामले को तूल दे रहे हैं। उसने कहा कि चंद लोग मंदिर-मस्जिद विवाद को अपनी रोजी-रोटी के लिए चलते रहने देना चाहते हैं। उसने कहा कि हिन्दू-मुस्लिम न किया जाए तो हिंदुस्तान दुनिया में शिखर पर होगा। इसके लिए उसने बाबरी मस्जिद मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि ये कोर्ट में 50 वर्ष चला। उसने मथुरा की मुक्ति की बात करने वालों को हिंदुस्तान की तरक्की रोकने वाला करार दिया।

बता दें कि अब यूपी के मथुरा की अदालत में 13.37 एकड़ की श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर सिविल सूट याचिका दायर की गई है। इसमें शाही ईदगाह मस्जिद को हटा कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मथुरा में स्थित पूरी भूमि को खाली कराने की माँग की गई है। इस याचिका को ‘श्रीकृष्ण विराजमान’ की तरफ से विनीत जैन ने दायर किया है। याचिका में कहा गया है कि कटरा केशव देव की पूरी भूमि के प्रति हिन्दुओं की आस्था है।