महाराष्ट्र के मुंबई से रिपोर्टिंग करते हुए रिपब्लिक टीवी के पत्रकार और चुनाव विश्लेषक प्रदीप भंडारी को एबीपी के पत्रकार मनोज वर्मा ने थप्पड़ जड़ दिया।
ऑपइंडिया से बात करते हुए भंडारी ने कहा कि ABP के रिपोर्टर मनोज वर्मा ने उनके चश्मे और फोन को भी तोड़ दिया। उन्होंने कहा, “वे गुंडे की तरह हैं।”
भंडारी ने कहा, “मुझे ड्रग्स से संबंधित प्रश्न पूछने के लिए मुक्का मारा गया था। हो सकता है कि उनकी गिरती हुई टीआरपी के कारण यह गुस्सा मुझ पर फूटा है, जो कि मात्र 14 है। ये सभी दलाल है, जोकि सवाल नहीं पूछते हैं। इतना ही नहीं मुंबई पुलिस ने भी मुझसे धीरे बोलने को कहा।”
जानते है महाराष्ट्र में सच बोलने की क़ीमत क्या है? कार्टेल के नामी-गिरामी चेहरे जैसे-जैसे एक्सपोज़ हो रहे है, उनका ग़ुस्सा और बढ़ता जा रहा है।जब पुलिस से भी काम नहीं बना तो आज NDTV और ABP के गुंडे पत्रकारों को मेरे पास हाथपाई करने भेज दिया। लेकिन मैं टूटने वालों में से नहीं हूँ। pic.twitter.com/z2fvH2KkUK
प्रदीप भंडारी ने घटना के बारे में ट्वीटर पर भी बताते हुए कहा, “जानते है महाराष्ट्र में सच बोलने की क़ीमत क्या है? कार्टेल के नामी-गिरामी चेहरे जैसे-जैसे एक्सपोज़ हो रहे है, उनका ग़ुस्सा और बढ़ता जा रहा है। जब पुलिस से भी काम नहीं बना तो आज NDTV और ABP के गुंडे पत्रकारों को मेरे पास हाथपाई करने भेज दिया। लेकिन मैं टूटने वालों में से नहीं हूँ।”
भंडारी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के पास मुंबई में बॉलीवुड ड्रग एब्यूज स्कैण्डल को कवर कर रहे थे, उसी दौरान एबीपी न्यूज के पत्रकार ने उनसे हाथापाई की।
दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के मामले में एक हैरान करने वाले ख़बर सामने आई है। दिल्ली दंगों के संबंध में कुछ ऐसे सबूत मिले हैं, जिनमें बेहद साफ़ तौर पर कहा जा रहा है – “सड़कों पर उतरेंगे।” यानी एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में दंगे और हिंसा भड़काई गई।
इन दंगों को अंजाम देने के लिए मीटिंग भी हुई थी और उस मीटिंग में शामिल हुए एक चश्मदीद ने कई हैरान कर देने वाली बातें कही हैं। चश्मदीद की बात इस ओर इशारा करते हैं कि दिल्ली दंगे पूरी तरह सुनियोजित थे।
दिल्ली दंगों के मामले में एक चश्मदीद ने मजिस्ट्रेट के सामने गवाही दी है। उसने गवाही में कहा, “वो कहते थे कि हमें सड़कों पर उतरना पड़ेगा और खून बहाना पड़ेगा, प्रदर्शन से काम नहीं चलेगा। पूरे प्रदर्शन के दौरान भाईचारे, सहिष्णुता और मजहब विशेष पर होने वाले अत्याचार की बात करते हुए वो इसकी आड़ में जनजीवन ठप्प करना चाहते थे। हर योजना की तैयारी कर ली गई थी, जिसके परिणामस्वरूप भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी। ऐसी भीड़ जो पूरी तरह तैयार थी, और उनके पास हिंसा भड़काने के लिए हथियार तक मौजूद थे।”
2-4 पुलिस वालों को भी मारना है, गजब के शांतिप्रिय लोग हैं! फोटो साभार: टाइम्स नाउ
मतलब लिबरल मीडिया ने दिल्ली दंगों को जो स्वतःस्फूर्त बताया, वो एक छलावा मात्र था। इस हिंसा की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली गई थी। हर एक दिन, हर एक कदम की प्लानिंग की गई थी। किसे मारना है, यह तक तय था। पुलिस वालों की हत्या तक करनी है, यह भी तय था और इसे अंजाम भी दिया गया।
दंगा में कुछ भी नहीं करना है, काफिरों का खून बहाना है (फोटो साभार: टाइम्स नाउ)
सड़क जाम करना है। सरकार को झुकाना है। प्रशासन को उसकी औकात बतानी है। – यह सब ऊपरी बातें थीं, जहाँ भीड़ होती थी, वहाँ की बातें थीं, जहाँ मीडिया या वीडियो लिए जाते थे, वहाँ की बातें थीं। असली बात तो इनकी कोर मीटिंग में होती थी – काफिरों को मारने वाली बात। दिल्ली पुलिस को यह बात भी उस गवाह ने ही बताई है।
इसके अलावा चश्मदीद ने कहा, “दंगे भड़काने की योजना बनाने के दौरान यहाँ तक बात हुई कि हथियार जमा करने होंगे। सिर्फ बैठे रहने से और इंतज़ार करने से कुछ हासिल नहीं होगा। इस क़ानून (सीएए और एनआरसी) को रोकने के लिए सड़कों पर खून भी बहाना पड़ा, तो वह भी करेंगे।”
दिल्ली दंगों की साजिश के पीछे जिनका हाथ था, वो हिंसा का आरोप भी किसी और पर मढ़ने का प्लान बना चुके थे। गवाह ने मीटिंग में हुई बात को बताया, “अब बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम इस हिंसा का आरोप किसी और पर डाल दें। सबसे अच्छा यह होगा कि हम दिल्ली के मुख्यमंत्री पर दबाव डालें कि वह पूरी हिंसा का आरोप दिल्ली पुलिस पर लगा दें। जब तक हम चुप होकर बैठे रहेंगे, तब तक हमें कुछ नहीं मिलने वाला है, हमें अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना होगा।”
‘मैं मुन्ना हूँ’ (Main Munna Hun) मनीष श्रीवास्तव द्वारा लिखे गए दूसरे उपन्यास का नाम है, जो कि नायक के मानसिक विदलन और सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों भरी यात्राओं की कथा है। इस कथा में नायक मुन्ना द्वारा भोगे गए यथार्थ का मनोविज्ञान है। इस उपन्यास में सबसे ज्वलंत मुद्दा जो उठाया गया है वह है ‘बाल यौन शोषण’।
उपन्यास का नायक मुन्ना इस हादसे का दंश अपनी बचपन में अनेक बार, कभी अपनो के द्वारा तो कभी गैरों के मार्फ़त, झेलता है। उपन्यास के नायक मुन्ना की कहानी शुरू होती है बचपन में, जहाँ वो यौन शोषण की त्रासदी झेलता है।
शुरू में उसका अबोध मन समझ नहीं पाता और कई बार विरोध करना चाहते हुए भी कर नहीं पाता। अंतत: उसका विरोध फूट पड़ता है। वह अपना दुःख सिर्फ किन्नू से साझा करता है जो उसका काल्पनिक साथी है।
मुन्ना का कृष्ण प्रेम व उसकी आस्था उसे अपने भैया व केशव से मिलवाती है जिससे वो अपना दुःख तकलीफ साझा करता है वे उसके मार्गदर्शक बनते हैं। इस कहानी में यौन शोषण की त्रासदी है, बचपन के किस्से हैं, प्रेम है, जवानी की शरारते हैं, गिरना है उठना है और फिर गिर के उठ कर संभल कर खड़े होने की कहानी है।
सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘मैं मुन्ना हूँ’ की चर्चा जोरों पर है।
बाल यौन शोषण जैसे मुद्दे पर, जिस पर लोग आम तौर पर बोलना पसंद नहीं करते, बहुत लोग खुल कर सामने आ रहे हैं। आम पाठक तो इस किताब को सराह भी रहे हैं और साथ में हिम्मत के साथ स्वीकार भी कर रहे हैं कि उनके साथ भी बचपन में ये हादसा हुआ था।
मसान और आँखों देखी फिल्मों के प्रोड्यूसर मनीष मुंद्रा, जो राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त निर्माता निर्देशक हैं, ने ‘मैं मुन्ना हूँ’ उपन्यास को लेकर एक स्केच बना कर ट्विटर किया है। इस स्कैच को ट्वीट करते हुए उन्होंने स्वीकार करते हुए लिखा है, “श्रीमान जी! ये लीजिए मेरी तस्वीर जब मैं कभी मुन्ना बना था…या यूँ कह लें जब मेरा शोषण हुआ था… @Shrimaan मैं भी मुन्ना था।”
केरल सरकार की अलग ही दुनिया है। इसका खुलासा RTI से हुआ है। केरल की राज्य सरकार ने क्यूबा के क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की याद में लाखों रुपए खर्च कर दिए। हैरानी की बात यह थी कि सरकारी विभाग ने इतना भव्य आयोजन आम जनता के रुपयों से कराया।
आम जनता के पैसों की बर्बादी का खुलासा कोच्ची के रहने वाले के गोविंदन नम्पूथिरी द्वारा दायर की गई आरटीआई के जवाब में हुआ। आरटीआई में मिले जवाब के अनुसार राज्य सरकार ने क्यूबा के नेता की याद में 1,37,745 रुपए खर्च कर एक विशालकाय आयोजन तिरुअनंतपुरम स्थित विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में कराया था।
एक लाख 37 हजार कोई बड़ी रकम नहीं है। लेकिन इस आयोजन को आवश्यकता से ज्यादा बड़ा बनाने के लिए राज्य सरकार ने जो किया, उसका जनहित से कोई सरोकार नहीं था। इस आयोजन के विज्ञापन में लगभग 26.7 लाख रुपए भी खर्च किए गए थे।
ख़बरों की मानें तो यह पहला ऐसा मौक़ा था, जब केरल की राज्य सरकार ने किसी समारोह में इतने बड़े पैमाने पर खर्च किया। पूरे राज्य के लगभग 70 समाचार पत्रों में इस कार्यक्रम का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। विज्ञापन में फिदेल कास्त्रो की तस्वीर अगले पन्ने पर छपी हुई थी।
फिदेल कास्त्रो की याद में यह आयोजन 29 नवंबर 2016 को कराया गया था। कारण – फिदेल कास्त्रो की मृत्यु 25 नवंबर 2016 को हुई थी। मतलब यह आयोजन एलडीएफ के केरल में सत्ता हासिल करने के ठीक कुछ महीने बाद हुआ।
गोविंदन नम्पूथिरी द्वारा दायर की गई आरटीआई को जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट ने जवाब 22 फरवरी साल 2017 को दिया था। जवाब में एक और हैरानी वाली बात यह थी कि इस आयोजन की देख-रेख खुद केरल के मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा की गई थी। आरटीआई लगाने वाले गोविंदन ने इस पर एक बड़ा सवाल यह भी उठाया था कि इस कार्यक्रम के संबंध में कोई सरकारी सूचना तक जारी क्यों नहीं की गई थी।
उन्होंने लिखा, “केरल सरकार ने एक ऐसे नेता की सालगिरह इतने धूमधाम से क्यों मनाई, जिसने हमारे देश और केरल के लिए कुछ नहीं किया है। जबकि ऐसा कोई नियम या परंपरा भी नहीं है कि विदेशी नेताओं के लिए इतना बड़ा आयोजन किया जाएगा। इस मामले की जाँच अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, यह पूरी तरह सत्ता का दुरुपयोग है। ऐसे किसी भी कार्यक्रम से आम जनता का क्या भला हो सकता है?”
आरटीआई का जवाब (संख्या: 4384/C2/2017/IP&PR) सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा 9 मई 2017 को जारी किया गया था। उसमें यह बताया गया है कि 2,32,560 रुपए मीडिया को दिए गए थे, जिन्होंने इसका बिल जमा किया था। इसके अलावा उन 70 मीडिया संस्थानों की सूची भी जारी की गई थी, जिन्हें विज्ञापन दिया गया था।
रिपब्लिक टीवी ने इस मामले में की जाँच करते हुए उन मीडिया संस्थानों की सूची तैयार की थी, जिनके पास भुगतान की रसीद मौजूद थी। इन रसीदों से साफ़ हो गया था कि यह सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशालय ने जारी किया था।
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए राजनीतिक विश्लेषक श्रीजीथ पैनिकर ने कहा, “एक तरफ सरकार ऐसा कह रही है कि वह आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर है। दूसरी तरफ वह ऐसे कार्यक्रम पर खर्च कर रही है, जिसका न तो कोई मतलब है और न ही कोई वजह। इसका मतलब साफ़ है कि सरकार खुद को कितना मज़बूत दिखाती है, असल में उतनी मज़बूत है नहीं। क्या लोगों को ऐसा मान लेना चाहिए कि सच्चाई कहीं बीच में दबी हुई है?”
(साभार – रिपब्लिक टीवी)
(साभार – रिपब्लिक टीवी)
गोविंदन ने इस मुद्दे पर कहा, “साल 2016 में इस सरकार ने कहा था कि उन्हें वेलफेयर पेंशन देने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 70 समाचार पत्र ऐसे हैं, जिनके बारे में हम जानते हैं, मुझे इस बात पर शक है कि ऐसे न जाने कितने और समाचार पत्र होंगे, जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं। सरकार एक विदेशी नेता को याद करने के लिए एक दिन के भीतर इतने सारे रुपए कैसे खर्च कर सकती है?”
सितंबर 24, 1932 में आज ही के दिन महात्मा गाँधी और बीआर अंबेडकर (BR Ambedkar) के बीच भारी मतभेद और लम्बे विवाद के बाद ऐतिहासिक पूना पैक्ट (Poona Pact) का समझौता हुआ था। सितंबर 19, 1932 की सुबह बॉम्बे (जिसे अब मुंबई के रूप में जाना जाता है) में लोग भारी मात्रा में पहले से ही इंडियन मर्चेंट्स चैंबर हॉल के सामने बरामदे में मौजूद थे। उनकी प्राथमिकता आज के दिन सिर्फ और सिर्फ एक थी: महात्मा गाँधी का जीवन बचाना, जो लम्बी अवधि से अनशन पर हैं और उनके पास 24 घंटे से भी कम समय है।
हफ़्ते भर से गाँधी जी, जो कि राजद्रोह के आरोपों में पुणे की जेल में बंद रहे, और बीआर अंबेडकर (BR Ambedkar) के बीच तनाव जारी है। तमाम समाचार पत्र महात्मा गाँधी के घटते-बढ़ते रक्तचाप की खबरों से भरे पड़े हैं। वहीं, बीआर अंबेडकर, जो भारत की ‘बड़ी आबादी’ यानी, तथाकथित ‘अछूत’ वर्ग, जिन्हें आज अनुसूचित जाति (SC) कहा जाता है, के लिए संविधान में पृथक निर्वाचन अधिकार की माँग पर डटे थे। मगर गाँधी जी का तर्क था कि ऐसा कोई कानून तथाकथित अछूतों को न्याय दिलाने की मुहिम को कमजोर ही करेगा।
ब्रिटिश सरकार का साम्प्रदायिक पंचाट था विवाद का कारण
इस पूरे घटनाक्रम की नींव में था औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार का ‘साम्प्रदायिक पंचाट’! अगस्त 16, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पंचाट या ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ (Communal Award or Macdonald Award) की घोषणा की थी।
यह अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का ही एक दूसरा उदाहरण था। इस निर्णय में मुस्लिम, सिख आदि की तरह ब्रिटिश सरकार ने तथाकथित अछूत वर्ग को भी हिंदुओं से अलग समुदाय की मान्यता दी।
लेकिन महात्मा गाँधी ने अछूतों को हिंदुओं से पृथक समुदाय की मान्यता का कड़ा विरोध किया था लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैकडोनल्ड ने गोलमेज सम्मेलन में डॉ बीआर अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गये तथ्यों और तर्कों को उचित मानते हुए अछूतों को पृथक निर्वाचक मण्डल सहित दो मतों का अधिकार प्रदान किया।
महात्मा गाँधी द्वारा इस सिद्धांत का विरोध किया गया था। लेकिन उन्होंने मुस्लिमों या सिखों के लिए समान प्रावधानों पर कोई आपत्ति नहीं जताई। उन्होंने 18 अगस्त को तत्कालीन ब्रिटिश पीएम, रेम्जे मैकडोनाल्ड को लिखा, “मुझे अपनी जिंदगी को दाँव पर लगाकर इस निर्णय का विरोध करना है। मैं उनके जरा से भी वैधानिक अलगाव के खिलाफ हूँ….।”
महात्मा गाँधी ने इस बात को 09 सितंबर तक भी दोहराया, लेकिन अंग्रेजों ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। दलितों के हितैषी बीआर अंबेडकर (BR Ambedkar) ने कहा कि वह गाँधी की खातिर एक ‘जायज माँग’ का बलिदान नहीं करेंगे, खासकर जब कोई वैकल्पिक प्रस्ताव पेश नहीं किया गया था।
दरअसल, अंबेडकर ने महात्मा गाँधी पर आरोप लगाया कि वो हिन्दुओं और डालतिओं के बीच की खाई को और चौड़ी कर रहे हैं। जबकि, महात्मा गाँधी का मानना था कि दलितों को पृथक समुदाय और निर्वाचन देना भारतीय समाज को और अधिक टुकड़ों में बाँट देगा। उनका मानना था कि छुआछूत हिन्दू धर्म का अंग नहीं है और हिन्दुओं में अस्पृश्यता कलंक है लेकिन निकट भविष्य में यह ख़त्म हो जाएगी, जबकि पृथक निर्वाचन इस घाव को हमेशा हरा रखेगा और अछूतों के अस्तित्व को खतरे में ही डालेगा।
गोलमेज सम्मेलन और पूना पैक्ट
महात्मा गाँधी का अनशन
आखिर में गाँधी ने अगले दिन, सितम्बर 20, 1932 को पूना की यरवदा जेल में अछूतों को मिले ‘पृथक निर्वाचन मण्डल’ तथा दो मतों के अधिकार के विरोध में आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया।
अचानक सभी समाचार पत्र महात्मा गाँधी के गिरते स्वास्थ्य की दैनिक बुलेटिन से भर गए। कॉन्ग्रेस नेताओं ने अंबेडकर को समझौता करने के लिए उकसाया। अंबेडकर ने कॉन्ग्रेस से कहा, ”अगर मुझे फाँसी पर भी चढ़ा दिया जाए तब भी मैं लोगों के साथ विश्वासघात कर अपने पवित्र कर्तव्य से नहीं डिग सकता।”
अंबेडकर को कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक द्विस्तरीय प्रणाली का प्रस्ताव दिया: एक प्राथमिक चुनाव, जहाँ केवल दलित वोट देंगे और एक माध्यमिक चुनाव, जहाँ हर कोई पात्र होगा। 22 सितंबर की सुबह, अंबेडकर ने पुणे की यात्रा की और दोपहर में गाँधी से मिले।
महात्मा गाँधी के सचिव महादेव देसाई के नोट्स के अनुसार, अंबेडकर ने गाँधी जी से कहा, “मैं अपने समुदाय के लिए राजनीतिक शक्ति चाहता हूँ। हमारे जीवित रहने के लिए यह बेहद आवश्यक है।”
लेकिन इसमें एक अड़चन थी। अंबेडकर चाहते थे कि प्राथमिक चुनाव प्रणाली एक दशक के बाद स्वत: समाप्त हो जाए, और 15 साल बाद तथाकथित दबे-कुचले वर्ग के बीच जनमत संग्रह पर सशर्त सीटें आरक्षित कर दी जाएँ। कई हिंदू नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया था और गाँधी खुद पाँच साल बाद जनमत संग्रह चाहते थे।
23 सितंबर को फिर बातचीत हुई। अपनी किताब ‘डॉ अंबेडकर और अस्पृश्यता’ में, लेखक क्रिस्टोफ जाफरलॉट ने लिखा कि अगली सुबह, देवदास गाँधी (महात्मा गाँधी के चौथे और सबसे छोटे पुत्र) ने तिलमिलाकर कहा, “पिता मर रहे हैं।” उन्होंने अपनी किताब में जिक्र किया कि अंबेडकर के समक्ष उनकी आँखों में आँसू थे।
महाराष्ट्र के लगभग सभी प्रमुख अखबार गाँधी का समर्थन और अंबेडकर का विरोध कर रहे थे। गाँधी जी के घटते बढ़ते ब्लड प्रेशर से लेकर उनकी गिरती हालत समाचार की बड़ी खबर होती।
पूना पैक्ट
अंबेडकर ने अंत में कहा कि अगर वे गाँधी के जीवन के लिए समझौता नहीं करते तो दलितों को पूर्वग्रह से जूझना पड़ेगा। आखिरकार, पूना समझौते पर 24 सितंबर को शाम 5 बजे 23 लोगों ने हस्ताक्षर किए। मदन मोहन मालवीय ने इसे हिंदुओं और गाँधी की ओर से और अंबेडकर ने अछूत वर्गों की ओर से हस्ताक्षर किए। इस समझौते में दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया। अंग्रेजों द्वारा दी गई 80 सीटों के बजाय अछूत वर्गों को 148 सीटें मिलीं।
पूना पैक्ट के समय की तस्वीर (चित्र साभार: भारत ज्ञान)
कहा जाता है कि अंबेडकर ने गाँधी जी की इस हठ को बेमन से स्वीकार किया था और इस समझौते पर राजी हुए थे। बीआर अंबेडकर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करते समय गाँधी जी से कहा था, “यदि आप अछूत वर्गों के कल्याण के लिए पूरी तरह से खुद को समर्पित करते हैं, तो आप हमारे नायक बन जाएँगे।”
हालाँकि, अंबेडकर के हृदय में गाँधी जी को लेकर नफरत उनकी मृत्यु के बाद भी जीवित रही। अंबेडकर ने पूना पैक्ट वार्ता के दौरान गाँधी के रुख को एक राजनेता का रुख कहा। बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में अंबेडकर ने कहा था, “एक राजनीतिज्ञ के रूप में, वह कभी महात्मा नहीं थे। मैं उन्हें महात्मा कहने से इंकार करता हूँ।”
काँशीराम ने कहा था ‘चमचा युग’ की शुरुआत
पूना पैक्ट का अछूत समाज के बड़े नेताओं ने विरोध किया था। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काँशीराम ने पूना पैक्ट के बाद के युग को चमचा युग कहा और समझौते के 50 साल पूरे होने पर सितंबर 23, 1982 को अपनी एक किताब प्रकाशित की। इस किताब का नाम था – ‘एन एरा ऑफ स्टूजेज’ यानी ‘चमचा युग।’ काँशीराम ने लिखा था कि पूना पैक्ट की वजह से ही दलित अपने वास्तविक प्रतिनिधि चुनने से वंचित कर दिए गए।
पूना पैक्ट को लेकर महात्मा गाँधी की हठ कितनी सही या गलत थी, इस बात का विश्लेषण करने के लिए शायद मेरा कद बहुत छोटा है लेकिन यह कई समकालीन नेताओं ने माना था कि यह निश्चित ही औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य की भारत और इसकी अखंडता में सेंध लगाने का ही एक उपक्रम था। और यदि तथाकथित अछूत वर्ग को पृथक निर्वाचन देने की बात बनी रहती तो पाकिस्तान की ही तरह भारत का शायद एक और हिस्सा टूट चूका होता।
महात्मा गाँधी ने कहा था कि आज नहीं तो कल हिन्दू अपने विषयों से उबार आएँगे और समय के साथ यह एक बड़े स्तर तक साकार भी हो रहा है। आज भारत के राष्ट्रपति के पद पर एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति है। राजनीति से लेकर कई प्रमुख संस्थाओं में, बिना किसी पृथक निर्वाचन के ही, अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व है।
यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यता भारत के समाज से पूर्ण रूप से गायब हो गई हो, लेकिन यह जन चेतना लोगों के बीच जरुर पैदा हुई है कि हिन्दुओं के बीच अस्पृश्यता एक कलंक है और इससे आज नहीं तो कल, लेकिन हिन्दू ही मिलजुलकर उबरेंगे।
पूना पैक्ट का नतीजा
पूना पैक्ट के अंबेडकर के लिए भी व्यक्तिगत तौर पर कई सकारात्मक परिणाम हुए। इसने पूरे भारत में वंचित वर्गों के नेतृत्व को सशक्त रूप से उनके नाम कर दिया। उन्होंने न केवल कॉन्ग्रेस, बल्कि पूरे देश को ही नैतिक रूप से दबे हुए वर्गों के उत्थान के लिए जिम्मेदार ठहराया। इतिहास में पहली बार वंचित वर्गों को एक राजनीतिक ताकत बनाने में भी अंबेडकर सफल रहे।
अंबेडकर ने खुद स्वीकार किया था कि वह एक पूर्ण समाधान नहीं बल्कि अल्पकालीन और त्वरित कोई फैसला चाहते थे। उनका कहना था कि वह इन्तजार नहीं करना चाहते थे लेकिन उन्हें गाँधी और कॉन्ग्रेस की जिंदगी के लिए यह फैसला लेना पड़ा।
83 साल का एक नेता है। लेखक अभी अपने 36वें साल में है। जो नेता है, वो मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र में मंत्री तक रह चुका है। नेता का बाप भी नेता था, बेटा भी नेता है… मतलब ‘जेनेटिकली मोडिफाइड’ नेता है। शब्दों के लिए क्षमा करें लेकिन इस पूरे लेख में आपको 83 साल के इस नेता के लिए हिंदी के ‘आप/इन्होंने/उन्होंने’ की जगह ‘तुम/इसने/उसने’ का प्रयोग ही मिलेगा।
फारूक अब्दुल्ला (Farooq Abdullah) – यह लेख इसी नेता के लिए लिखा गया है। क्यों लिखा गया है? क्योंकि फारूक अब्दुल्ला नाम के इस नेता ने करण थापर को एक इंटरव्यू दिया है। इस इंटरव्यू में फारूक ने जो बोला (जहर उगला) है, उसकी मुख्य-मुख्य बातों पर जरा गौर कीजिए:
इस समय कश्मीरी लोग अपने आप को न तो भारतीय समझते हैं, ना ही वे भारतीय बने रहना चाहते हैं।
पिछले साल 5 अगस्त को उन्होंने (मोदी सरकार ने) जो किया, वह भारत के ताबूत में आखिरी कील था।
आज जब चीन हमारी तरफ बढ़ रहा है, कश्मीरी लोग चाहते हैं कि वो भारत में घुस जाएँ जबकि उन्हें पता है कि चीन ने मुस्लिमों के साथ क्या किया है।
हम मुस्लिम बहुमत वाले राज्य थे, फिर भी हम पाकिस्तान नहीं गए। हम गाँधी के भारत में रहे, हमें मोदी का भारत नहीं चाहिए।
44 मिनट 28 सेकंड के वीडियो इंटरव्यू में से 4 मिनट 28 सेकंड तक का जहर ऊपर लिखा गया है। इससे ज्यादा सुनने की औकात मेरी नहीं है। कम से कम किसी निर्वाचित सांसद से तो नहीं। सब्जी बेचने वाले गोनू महतो या शकील अंसारी से फिर भी मैं 4 घंटे बातचीत कर सकता हूँ।
सांसद फारूक अब्दुल्ला की बकैती से समस्या क्या?
फारूक अब्दुल्ला सांसद है। सासंद भारतीय लोकतंत्र का है। मतलब वोट भारत के नागरिकों ने दिया होगा। मतलब यह भी कि भारत की ही राजधानी दिल्ली में बने सांसदों के आवास में फारूक अब्दुल्ला नाम का यह आदमी रह भी रहा होगा।
लेकिन इसमें समस्या क्या है? समस्या है, बहुत गंभीर है। वोट लेते समय फारूक अब्दुल्ला भारतीय था, वोटर भी भारतीय थे। अब फारूक अब्दुल्ला खुद बोल रहा है कि वोटर भारतीय नहीं रहे (तन-मन से नहीं रहे) तो फिर उनके द्वारा चुन कर भेजा गया सांसद फारूक अब्दुल्ला किस हक से भारतीय सांसद बना बैठा है?
शायद सांसद की कोठी के हक से? शायद बेटे को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के हक से? बेटे की बीवी को तलाक के बाद भी दिल्ली वाली कोठी मिलती रहे… इसके हक से? या गाँधी वाली पार्टी में दामाद की जगह बची रहे, इसके हक से?
उत्तर मुझे नहीं पता है। उत्तर तो सिर्फ और सिर्फ फारूक अब्दुल्ला को पता होगा। वही बता सकता है कि आखिर कौन सी वजह है, जो वह अब तक सांसद की कुर्सी थामे बैठा हुआ है? क्या भारतीय लोकतंत्र में आज तक ऐसा नहीं हुआ है कि सांसदों ने अपना इस्तीफा सौंपा हो? हुआ है।
शायद फारूक अब्दुल्ला स्वाभिमानी नहीं है। शायद वह निर्लज्ज भी है। जिसे कोस रहा (सरकार को) है, उसके विरोध में अपना पद नहीं छोड़ रहा। जिसकी आवाज (कश्मीरी लोगों की) उठा रहा, उसके लिए आंदोलन का बिगुल नहीं फूँक रहा। तो फारूक अब्दुल्ला आखिर है क्या?
नेता तो नहीं हो सकता! क्योंकि नेता तो जन-आंदोलन के लिए ही जाने जाते हैं। इतना बड़ा मौका हाथ से जाने दे, वह नेता कैसा? लालची (पद का) हो सकता है। धूर्त (शब्दों के साथ खेल रहा) हो सकता है। मक्कार (झूठ बोल कर मीडिया के माध्यम से माहौल बना रहा) हो सकता है।
PS: इस लेख को पढ़ कर फारूक अब्दुल्ला अपनी सांसदी छोड़ देगा। लेखक ने ऐसा सोच कर लिखा है, यह सपने में भी लेखक नहीं सोच सकता।
बॉलीवुड में व्याप्त ड्रग्स के नेक्सस के बारे में सामने आ रह खुलासों के बाद मुंबई में ड्रग्स से संबंधों के चलते बड़ी मात्रा में छापेमारी की जा रही हैं। समाचार चैनल ‘टाइम्स नाउ’ की एक खबर के मुताबिक़, 2 टीवी कलाकारों से बातचीत के बाद मुंबई के कई जगहों पर यह छापेमारी की गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कल बुधवार (सितम्बर 23, 2020) के दिन समीर वानखेड़े और उनकी टीम ने दो टीवी कलाकारों को समन जारी किया था और उनसे 6 से 7 घंटे तक पूछताछ की गई थी। बताया जा रहा है कि आज बृहस्पतिवार सुबह की जा रही इन छापेमारी इसी सूचना के आधार पर की जा रही हैं। उम्मीद लगाई जा रही हैं कि इस छापेमारी में पुलिस के हाथ कई अहम सुराग आ सकते हैं।
समीर वानखेड़े को नशे और ड्रग्स से जुड़े मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। उनके नेतृत्व में ही पिछले दो सालों के अंदर करीब 17 हजार करोड़ रुपए के नशे और ड्रग्स रैकेट का पर्दाफाश किया गया। हाल ही में समीर वानखेड़े को केंद्र सरकार द्वारा मामले की जाँच के लिए डीआरआई से नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो में ट्रांसफर किया गया है।
वहीं, दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जुड़े ड्रग्स केस में फंसीं फैशन डिजाइनर सिमोन खंबाटा से आज (सितम्बर 24, 2020) पूछताछ होनी है। आज सुबह ही सिमोन NCB दफ्तर पहुँची हैं। सिमोन के कई बॉलीवुड सेलेब्स के साथ अच्छे रिलेशन हैं जो कि सिमोन के शो में भी जाते थे। एनसीबी आज ड्रग्स मामले में एक्ट्रेस रकुल प्रीत सिंह के साथ ही सुशांत सिंह राजपूत की टैलेंट मैनेजर श्रुति मोदी और डिजाइनर सिमोन खंबाटा से भी पूछताछ करेगी। इन सभी कलाकारों को समन भेजा जा चुका है।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जुड़े बॉलीवुड के ड्रग्स मामले की जाँच नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) कर रहा है। एनसीबी ने दीपिका पादुकोण को अपना बयान दर्ज कराने के लिए 25 सितंबर को बुलाया गया है, सारा अली खान और श्रद्धा कपूर को 26 सितंबर को बुलाया है। ड्रग्स मामले में सामने आए नामों में से दीपिका पादुकोण सबसे बड़ी शख्सियत हैं। वह इस दिनों अपनी फिल्म की शूटिंग को लेकर गोवा में हैं, लेकिन एनसीबी का नोटिस मिलने के बाद अब वह आज गोवा से मुंबई वापस लौटने वाली हैं।
केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी का बुधवार 23 सितंबर 2020 को नई दिल्ली में निधन हो गया। उनकी उम्र 65 साल थी। 11 सितंबर को कोविड-19 की जाँच कराने के बाद यह बात सामने आई थी कि वह कोरोना पॉजिटिव हैं।
सुरेश अंगड़ी ने खुद इस बात की जानकारी अपने ट्विटर हैंडल पर साझा की थी और तब तक उनकी हालत बेहतर थी। इसके बाद उनकी स्थिति बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली स्थित एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था। अंत में बुधवार की रात 8 बजे एम्स में उनका निधन हो गया।
वह पहले ऐसे केन्द्रीय मंत्री हैं, जिनकी मृत्यु कोरोना वायरस की वजह से हुई है। इसके अलावा वो कर्नाटक के ऐसे दूसरे सांसद हैं, जिनकी मृत्यु का कारण कोरोना वायरस है। उनके पहले भारतीय जनता पार्टी के सांसद अशोक गस्ती की पिछले हफ्ते कोरोना वायरस की वजह से मौत हो चुकी थी। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन बीते 31 अगस्त को हुआ था और वह भी कोरोना वायरस से संक्रमित थे।
केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी कर्नाटक की बेलागावी सीट से 4 बार सांसद रह चुके थे। उन्होंने साल 2004, 2009, 2014 और 2019 में लोकसभा चुनाव जीता था। उनका जन्म 1 जून साल 1955 को बेलागावी स्थित कोप्पा गाँव के लिंगायत परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता का नाम सोमाव्वा और छन्नाबसप्पा अंगड़ी था। उन्होंने बेलागावी के एसएसएस समिति कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से स्नातक किया था। इसके अलावा उन्होंने बेलगावी के ही लखमगौड़ा विधि कॉलेज से वकालत की पढ़ाई पूरी की।
Karnataka: People gathered outside the residence of late Suresh Angadi, Minister of State for Railways in Belgavi, late last night.
सुरेश अंगड़ी मूल रूप से व्यवसायी थे। उनका राजनीतिक यात्रा तब शुरू हुई, जब उन्हें पहली बार बेलागावी का जिलाध्यक्ष घोषित किया गया। इसके कुछ ही समय बाद साल 2004 में उन्हें बेलागावी संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया। संगठन ने जिस तरह उन पर भरोसा जता कर बड़ी ज़िम्मेदारी दी थी, ठीक वैसे ही उन्होंने संगठन को निराश नहीं किया। वह 2009, 2014 और 2019 में लगातार बेलागावी संसदीय क्षेत्र से सांसद चुन कर आए।
सुरेश अंगड़ी शिक्षाविद भी थे। बेलागावी स्थित ‘सुरेश अंगड़ी एजुकेशन फ़ाउंडेशन’ की देख-रेख भी करते थे। उन्होंने कर्नाटक और बेंगलुरु के लिए भी कई बड़ी योजनाएँ सोच रखी थीं। उन्होंने बेंगलुरु में उपनगरीय रेलवे प्रोजेक्ट तैयार कराने में भी अहम भूमिका निभाई थी। ख़बरों के मुताबिक़ यह रेलवे प्रोजेक्ट पिछले काफी समय से लंबित पड़ा हुआ था।
जैसे ही सुरेश अंगड़ी के निधन की ख़बर सामने आई, वैसे ही संगठन के तमाम मंत्रियों ने संवेदना और श्रद्धांजलि व्यक्त की। उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस समाचार पर दुःख जाहिर किया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी के निधन का समाचार दुखद है। एक ऐसे कुशल नेता, जिन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र बेलागावी और कर्नाटक के लिए बहुत परिश्रम और संघर्ष किया था।”
Shocked to know the passing away of Shri Suresh Angadi, Union Minister of State of Railways. An amiable leader Shri Angadi worked tirelessly for the people of his constituency, Belagavi and Karnataka.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें एक अप्रत्याशित कार्यकर्ता बताया। प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में लिखा, “सुरेश अंगड़ी एक अप्रत्याशित कार्यकर्ता थे, जिन्होंने संगठन को कर्नाटक में मज़बूत बनाने के लिए बहुत प्रयास किए थे। वह एक समर्पित सांसद और प्रभावशाली मंत्री थे, जिन्हें हर जगह पसंद किया जाता था। उनका ऐसे जाना निराशाजनक है। इस दुःख की घड़ी में मेरी संवेदनाएँ उनके परिवार के साथ हैं। ॐ शान्ति।” इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सुरेश अंगड़ी के साथ एक चित्र भी साझा किया।
Shri Suresh Angadi was an exceptional Karyakarta, who worked hard to make the Party strong in Karnataka. He was a dedicated MP and effective Minister, admired across the spectrum. His demise is saddening. My thoughts are with his family and friends in this sad hour. Om Shanti. pic.twitter.com/2QDHQe0Pmj
गृहमंत्री अमित शाह ने भी इस ख़बर पर शोक व्यक्त करते हुए बताया कि सुरेश अंगड़ी कितने समर्पित और कर्मठ नेता थे।
Deeply pained to learn about the passing away of MoS Railways and senior BJP leader from Karnataka, Shri Suresh Angadi ji. He will always be remembered for his selfless service to the nation and party. My deepest condolences are with his family. Om Shanti Shanti Shanti
पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री और 4 बार सांसद रह चुके सुरेश अंगड़ी के इस तरह जाने से बहुत दुखी हूँ। वह मेरे छोटे भाई जैसे थे, मेरे लिए यह ख़बर मन तोड़ने जैसी है। देश की इस पीड़ा को सहन कर पाना नामुमकिन है।”
I am shocked and deeply saddened by the demise of Union Minister of State for Railways and four-term MP from Belagavi Shri. Suresh Angadi @SureshAngadi_ . He was like a younger brother to me. I feel terrible losing him. This is an unbearable loss to our nation. 1/2
इसके बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने लिखा, “केन्द्रीय मंत्री सुरेश अंगड़ी जी के निधन की जानकारी से बहुत दुखी हूँ। वह एक उल्लेखनीय नेता थे और उन्होंने संगठन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। वह ऐसे नेताओं में से थे, जो समाज के लिए भी हमेशा खड़े रहते थे। कष्ट के इस दौर में मेरी संवेदनाएँ उनके परिवार के साथ हैं।”
भाजपा की वरिष्ठ नेता शोभा करंदलजे ने ट्वीट करते हुए लिखा यह उनके लिए निजी क्षति जैसा था। उन्होंने लिखा, “इस दुःख को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है कि हमारे नेता, अच्छे मित्र और मेहनत करने वाले विनम्र मंत्री हमारे बीच नहीं रहे। यह मेरे लिए निजी क्षति है, मैं प्रार्थना करती हूँ कि उनकी आत्मा को सद्गति प्राप्त हो।”
Such a heart-breaking news, terrible loss for all of us!
Shocked beyond words that our leader, good friend, very hardworking & humble Union Minister for Railways Sri @SureshAngadi_ Ji is no more!
इसके बाद राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने भी इस घटना को पीड़ादायक और निराशाजनक बताया।
गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने भी ट्वीट किया और लिखा, “केन्द्रीय मंत्री सुरेश अंगड़ी के निधन का समाचार मिलने से हैरान और दुखी हूँ। सरकार, कर्नाटक की जनता और संगठन के लिए इस हानि की भरपाई असम्भव है। महामारी के दौरान उनकी सेवा अभी तक हमारे ज़हन में ज़िंदा है, मेरी पूरी संवेदनाएँ उनके परिवार के साथ हैं।”
अंतरराष्ट्रीय मैगजीन ‘Time’ ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व की 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियों की सूची में तो रखा है लेकिन इसके साथ ही उन पर ऐसी टिप्पणी की है, जिससे भारत के खिलाफ नैरेटिव बनाने वाले खासे खुश हैं। ‘Time’ ने भारत के पीएम नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी की शुरुआत में ही लिख दिया है कि लोकतंत्र की चाभी स्वतंत्र चुनावों के पास नहीं होती। चूँकि उसके पास भारत के चुनावी सिस्टम पर टिप्पणी करने को कुछ नहीं था, इसीलिए उसने ऐसा लिखा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारी बहुमत से दो-दो बार जीत कर सत्ता में आए हैं, ऐसे में भारतीय चुनाव आयोग द्वारा केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में कराए जाने वाले बहुचरणीय चुनावों को लेकर ‘Time’ के पास कुछ गलत लिखने को कहीं था क्योंकि यहाँ हर चुनाव बाद विपक्षी दल भी ईवीएम हैक होने का आरोप लगा कर चुप हो जाते हैं। वहीं जब जीत उनकी होती है तो ईवीएम का मुद्दा न होकर ये ‘मोदी की घटती लोकप्रियता’ का मुद्दा बना दिया जाता है।
‘Time’ ने लिखा है कि लोकतंत्र में उनका अधिकार सबसे ज्यादा मायने रखता है, जिन्होंने सत्ताधारी पार्टी को वोट नहीं दिया है। लेकिन, भारत का संविधान ऐसा कुछ भी नहीं कहता क्योंकि इसमें नागरिकों का वर्गीकरण किसी पार्टी को वोट देने और नहीं देने को लेकर नहीं बल्कि समानता के आधार पर किया गया है, जिसमें गरीबों के लिए अधिकार सुरक्षित करने की बात है। फिर भी ‘Time’ ने मोदी को लेकर जो लिखा, वो गलत है।
पीएम मोदी ने एक इंटरव्यू के दौरान अपना संस्मरण बताया था कि जब वो 2002 में हुए चुनावों को जीतने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में लौटे थे, तब उन्होंने सबसे पहले यही बयान दिया था कि वो उनके भी सीएम हैं, जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया है और साथ ही उनके भी सीएम हैं, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है। जो नेता खुद यही बातें कह रहा है, उस पर इसी के आधार पर निशाना साधना अजीब है, हड़बड़ी भरा है।
इसके बाद ‘Time’ ने भारतीय लोकतंत्र को लेकर लिखना शुरू किया कि ये विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, 70 वर्षों से यहाँ लोकतंत्र है और यहाँ की 130 करोड़ की जनसंख्या में ईसाई, मुस्लिम, सिख, बौद्ध और जैन सहित कई धर्मों के लोग रहते हैं। साथ ही तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की चर्चा की गई है, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के 5 दशक से भी अधिक भारत में गुजार दिए। दलाई लामा ने कहा था कि भारत स्थिरता और समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
अब ‘Time’ अपने असली प्रोपेगेंडा पर आता है और लिखता है कि ये सारा कुछ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद से संशय में आ गया है। बताया गया है कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री बने, उनमें से सभी हिन्दू ही हुए, लेकिन पीएम मोदी ने इस तरह से शासन किया है – जैसे हिन्दुओं के अलावा कोई और उनके लिए मायने ही नहीं रखता है। कहा गया है कि बाकी किसी भी पीएम ने ऐसा नहीं किया।
जब बात 70 सालों में पहली बार लोकतंत्र के खात्मे वाले नैरेटिव की आती है, तो इंदिरा गाँधी और आपातकाल को एकदम से भुला दिया जाता है, जबकि वो भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एकमात्र ऐसा मौका है, जब लोकतंत्र की सरेआम हत्या हुई। साथ ही जब ‘एक वर्ग के लिए शासन’ की बात आती है तो राजीव गाँधी ने कैसे शाहबानो केस में एक समुदाय को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा था, ये याद नहीं किया जाता।
यहाँ ये समझने वाली बात है कि डॉक्टर मनमोहन सिंह अपने प्रधानमंत्रित्व काल में कहते हैं कि देश की संपत्ति पर पहला हक़ मुस्लिमों का है और पीएम मोदी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में इसे सुधारते हुए कहते हैं कि मनमोहन को ये कहना चाहिए था कि देश की संपत्ति पर पहला हक़ गरीबों का है। तो फिर मनमोहन सिंह पर इसके लिए उँगली क्यों नहीं उठती और पीएम मोदी गरीबों की बात करते हैं तो फिर उन पर निशाना क्यों साधा जाता है?
आप भारत सरकार के विभिन्न पोर्टलों पर जाकर देख सकते हैं कि रिकॉर्ड संख्या में शौचालय बने हैं, घर बने हैं, बिजली पहुँची है, सड़कें बनी हैं, आयुष्मान भारत के द्वारा इलाज हुआ है, लोगों को अनाज मिले हैं, किसानों को सम्मान राशि मिली है, जल सुविधा पहुँची है और तकनीक के जरिए सीधे खाते में रुपए पहुँचे हैं। लेकिन नहीं, मोदी ने तो ये सब देख-देख कर सिर्फ हिन्दुओं को ही दिया है न?
‘Time’ कहता है कि नरेंद्र मोदी सशक्तिकरण के जनवादी वादे कर-कर के पहली बार विजयी होकर आए। लिखा है कि इसके बाद उनकी ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ भारतीय जनता पार्टी ने न सिर्फ ‘Elitism’, बल्कि ‘Pluralism’ को भी ख़त्म कर दिया। यहाँ ‘Elitism’ किस सेन्स में कहा गया है, ये समझ से परे है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि भारत में इलीट क्लास वही है, जिनका लुटियंस में दबदबा है और जो ग्रामीण भारत को अपने से नीचा मानते हैं।
यहाँ का एलिटिज्म वो है, जिसके तहत लिबरल गिरोह के कुछ लोग ट्विटर पर चंद शब्द लिख कर चाहते हैं कि जनता ऐसा ही करे। यहाँ का एलिटिज्म वो है, जिसके तहत मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए सारी हदें पार की जाती हैं और हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जाता है। यहाँ का एलिटिज्म वो है, जिसके तहत हिन्दुओं के साथ हुए अत्याचार को मुस्लिमों के साथ हुए अन्याय का नाम दे दिया जाता है और हिन्दुओं को ही इसका दोषी माना जाता है।
समझने वाली बात ये है कि जब भारत के बारे में विवरण देने के लिए ‘Time’ दलाई लामा के बयान का सहारा लेता है तो फिर पीएम मोदी के बारे में उनके क्या विचार हैं, इससे लोगों को क्यों नहीं अवगत कराता है? हाल ही में पीएम मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर तिब्बती धर्मगुरु ने अपने पत्र में लिखा था कि भारत में कोरोना आपदा से निपटने के लिए केंद्र व राज्यों की सरकारें हरसंभव कोशिशें कर रही हैं।
वो भारत को हर तिब्बती की तरह आर्यभूमि मानते हैं। उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व के सभी देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने की दिशा में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि जहाँ पाक पीएम इमरान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी मतभेदों की बात करते हैं, पीएम मोदी हर जगह शांति का सन्देश देते हैं। दलाई लामा कहते हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्षता है और जातिवाद का धीरे-धीरे खात्मा हो रहा है।
ऐसे में दलाई लामा ने भारत के बारे में क्या कहा, ये तो बताया लेकिन पीएम मोदी के प्रति उनकी क्या भावना है इसे छिपा लिया। इसे ही सलेक्टिव एप्रोच कहा जाता है। हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए भाजपा को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ ऐसे लिखा जाता है, जैसे ये कोई गुनाह हो। भारत का इतिहास ही हिंदुत्व का रहा है और यहाँ की पहचान ही सनातन है, तो इसे अगर कोई अंगीकार करता है तो ‘Time’ उसे हेय दृष्टि से क्यों देख रहा है?
Today, on the occasion of his 70th birthday, His Holiness the Dalai Lama has written to PM Narendra Modi wishing him many happy returns of the day, praying for his continued good health and praising the age-old Indian practices of ahimsa and karuna. https://t.co/IX87HgXNih
‘भाजपा भारत के मुस्लिमों को लगातार निशाना बना रही है’ – ये स्पष्ट लिख कर अंत में ‘Time’ ने जता दिया है कि उसका उद्देश्य क्या था। ‘तीन तलाक’ ख़त्म कर के मुस्लिम महिलाओं को अधिकार देने का काम इसी सरकार ने किया है, लेकिन इसको नहीं गिना गया। अल्पसंख्यकों के लिए तमाम योजनाएँ हैं, मंत्रालय है – ये लेख लिखने से पहले क्या देखा गया कि इस दिशा में कितने काम हुए हैं?
‘Time’ का कहना है कि सरकार विरोधी आन्दोलनों को दबाने के लिए कोरोना आपदा का सहारा लिया गया और भारत का ऊर्जावान लोकतंत्र एक गहरी छाया में चला गया। शायद मैगनीज को तब ख़ुशी होती जब शाहीन बाग़ में कोरोना के बीच सैकड़ों महिलाओं-बच्चों को जमे रहने दिया जाता और वो आपदा की चपेट में आते। तब यही मैगनीज लिख रहा होता कि सरकार ने आंदोलनकारियों को कोरोना से बचाने के लिए इंतजाम क्यों नहीं किए?
मैगजीन ने इस दौरान शाहीन बाग़ में बिना बात विरोध प्रदर्शन करने वाले कथित ‘दादी’ बिल्किस को भी इस सूची में शामिल कर लिया है, जिन्हें टीवी पर बुला-बुला कर एनडीटीवी जैसे मीडिया संस्थान मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बना रहे थे। भारत की कुख्यात प्रोपेगेंडा पत्रकार राना अयूब ने इस विषय पर अपने लेख में लिखा है कि छात्रों और युवाओं को भारत में जेल भेजा जा रहा है और उन्हें बिल्किस से प्रेरणा मिलती है।
इसी तरह 2019 लोकसभा चुनाव से पहले ‘Time’ ने पीएम मोदी को ‘Divider In Chief’ कहा था। इसका अर्थ हुआ- विभाजित करने वालों या बाँटने वालों का मुखिया। पूर्वग्रह से भरे उस लेख में नरेन्द्र मोदी पर समाज को बाँटने के आरोप लगाए गए थे। चुनाव के दौरान इस लेख की ख़ूब चर्चा हुई थी और कई विपक्षी नेताओं ने मोदी पर भारत की छवि बिगाड़ने का आरोप भी लगाया था। बाद में एक अन्य लेख में मैगजीन ने पलटी मारी और मोदी की बड़ाई करते हुए दिखाया कि कैसे उनके कार्यकाल में बदलाव हो रहे हैं।
हालाँकि, अब जैसा कि अपेक्षित था – लिबरल गिरोह ने ‘Time’ मैगनीज में पीएम मोदी के बारे में लिखे प्रोपेगेंडा लेख का स्क्रीनशॉट शेयर करना शुरू कर दिया है। यही लोग तब चुप्पी साध लेते हैं जब उन्हें बिल गेट्स के फाउंडेशन द्वारा अवॉर्ड दिया जाता है या फिर कई इस्लामिक मुल्क उन्हें अपना सर्वोच्च सम्मान देते हैं। जब अमेरिकी राष्ट्रपति या इजरायल के पीएम उनकी तारीफ करते हैं, तब इन्हीं लोगों की घिग्घी बँध जाती है।
योगी सरकार ने मऊ सदर से बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी गिरोह आईएस 191 के नजदीकी व मन्ना सिंह हत्याकांड में नामजद हिस्ट्रीशीटर एवं पूर्व सभासद रजनीश सिंह की 39 लाख रुपए की सम्पत्ति गैंगेस्टर एक्ट के तहत जब्त की है।
पुलिस क्षेत्राधिकारी (नगर) नरेश कुमार ने बताया कि जिलाधिकारी के आदेश पर शहर कोतवाली के रहजनिया गाँव में अंसारी गिरोह के करीबी रजनीश सिंह की 39 लाख 21 हजार रुपए की संपत्ति गैंगस्टर एक्ट की धारा 14 (1) के तहत जब्त की गई है। पुलिस टीम द्वारा की गई कार्रवाई मुख्तार अंसारी के पूरे कुनबे में खलबली मची हुई है।
उन्होंने बताया कि मुख्तार गिरोह आइएस-191 के पिछले दो दशकों के दौरान रजनीश कुमार सिंह की मुख्तार अंसारी गिरोह के मुख्य शरणदाता व आर्थिक मददगार के रूप में अतिसक्रिय व अग्रणी भूमिका रही है। इतना ही नहीं राजनीति की आड़ में और अपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहकर रजनीश ने अवैध तरीके से धन कमाया और लंबे समय तक मुख्तार अंसारी गिरोह की फंडिंग की। रजनीश के खिलाफ तीन मामले दर्ज हैं।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज (23 सितंबर, 2020) सरकारी जमीनों से अवैध कब्जों को हटाने व निर्माण गिराने के साथ-साथ भूमाफियों व अपराधियों को सबक सिखाने के लिए एक नया निर्देश जारी किया है। इसमें उन्होंने कहा कि अब आरोपितों से सरकारी संपत्ति पर कब्जे की अवधि के हिसाब से किराया भी लिया जाएगा। इसके लिए उन्होंने अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
अगस्त से लेकर सितंबर तक में माफिया मुख्तार अंसारी के ख़िलाफ़ 4-5 कार्रवाई हो चुकी हैं। कुछ दिन पहले मुख्तार अंसारी के दो बेटों को अपराधी घोषित किया गया था। वहीं अंसारी के अवैध निर्माण को लखनऊ नगर निगम ने गिरा दिया था। इससे पहले भी गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर सहित वाराणसी में मुख्तार गैंग के करीबियों और अवैध निर्माण, कारोबारों पर कार्रवाई हो चुकी है।