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फैजल फारुख के स्कूल की छत पर हाजी रहीम इलाही ने सेट किया था घातक गुलेल: आरोपित बनाए जाने के बाद से फरार

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में भड़की हिंसा के दौरान गोली-बम से ज्यादा घातक गुलेल साबित हुई। यह कोई आम गुलेल नहीं थीं। ये गुलेल सैकड़ों की संख्या में मिली थी। हिंसा की जाँच कर रही दिल्ली पुलिस अपराध शाखा की एसआईटी को 10-15 घरों के बाद किसी न किसी एक घर की ऊँची छत पर गुलेल मिली थी।

दैनिक जागरण के मुताबिक दंगे से तीन दिन पहले फैजल फारुख ने अपने राजधानी पब्लिक स्कूल की छत पर राम इलाही नाम के वेल्डर के जरिए बड़ी गुलेल लगवाई थी। उसी गुलेल से 24 फरवरी को शिव विहार तिराहे पर एसिड भरी बोतलें व पेट्रोल बम फेंककर बड़ी तबाही मचाई गई थी। राम इलाही उर्फ हाजी रहीम इलाही उर्फ राम रहीम शिव विहार का ही रहने वाला है और पेशे से वेल्डर है। उससे फैजल फारुख का पुराना संबंध बताया जा रहा है। 

दिल्ली दंगा मामले में राम इलाही को भी आरोपित बनाया गया है। दंगे में आरोपित बनाए जाने का पता चलने के बाद से ही वह फरार है। इतना ही नहीं, गिरफ्तारी के डर से उसने कड़कड़डूमा कोर्ट में अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई थी, हालाँकि पुलिस के विरोध के बाद कोर्ट ने गुरुवार (सितंबर 17, 2020) को उसे खारिज कर दिया। अब दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच राम इलाही की खोज में जुटी हुई है।

गौरतलब है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में 25 फरवरी को हुए दंगे के दौरान शिव विहार स्थित राजधानी पब्लिक स्कूल के मालिक फैजल फारुख को दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। हालाँकि फैजल के खिलाफ कोई ठोस सबूत न पेश कर पाने पर निचली अदालत ने उसे जमानत दे दी थी, लेकिन पुलिस ने दंगे से जुड़े दूसरे मामले में उसे गिरफ्तार कर लिया था।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिल्ली पुलिस ने अदालत में दायर चार्जशीट में फैजल फारुख को एक मुख्य साजिशकर्ता के रूप चिन्हित करते हुए कहा था कि जब पूर्वोत्तर दिल्ली में दंगे हो रहे थे, उस समय वो तबलीगी जमात के प्रमुख मौलाना साद के करीबी अब्दुल अलीम के संपर्क में था।

दंगे के दौरान फैजल फारुख के स्कूल की छत पर एक बड़ा गुलेल लगाया गया था। इसकी मदद से हिंदुओं और उनकी संपत्तियों और पेट्रोल बम से निशाना बनाया गया था। दंगों में इस स्कूल को कोई नुकसान नहीं पहुॅंचा था। लेकिन इसके ठीक बगल में स्थित डीआरपी पब्लिक स्कूल तबाह हो गया था। पुलिस को राजधानी स्कूल की छत की चारदीवारी पर लगाई गई गुलेल और अन्य ज्वलनशील पदार्थ बरामद हुए थे।

जाँच के दौरान यह पाया गया था कि हिंसा बड़ी साजिश के तहत हुई और राजधानी स्कूल का मालिक फैजल फारुख हिंसा के ठीक पहले पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के कई नेताओं, पिंजरा तोड़ ग्रुप, निज़ामुद्दीन मरकज़, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी और देवबंद के कई मौलवियों-आलिमों के संपर्क में था। उसके मोबाइल से इस बात के सबूत मिले हैं।

दिल्ली में बीते दिनों हिंदुओं के ख़िलाफ़ हुई हिंसा पूर्व नियोजित होने के कई सबूत सामने आए। हिंसाग्रस्त इलाकों से लगातार ऐसी तस्वीरें और विडियो सामने आए, जिसने इस बात को प्रमाणित किया कि ये हिंसा दो समुदायों के आमने-सामने आने से नहीं भड़की, बल्कि ये सब एक प्लान के तहत हुआ। मुस्लिम दंगाइयों ने हिंदुओं के घरों, उनकी गाड़ियों और उनके शैक्षणिक संस्थानों पर हमला करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रखी थी।

रेपिस्ट अब्दुल या असलम को तांत्रिक या बाबा बताने वाले मीडिया गिरोहों के लिए जस्टिस चंद्रचूड़ का जरूरी सन्देश

सुदर्शन न्यूज़ के मुस्लिम अभ्यर्थियों के यूपीएससी में चुने जाने को लेकर दिखाए जा रहे कार्यक्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने एतराज़ जताते हुए बचे हुए एपिसोड दिखाने पर रोक लगा दी थी। शुक्रवार (सितम्बर 18, 2020) को इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने मीडिया को सख्त संदेश दिया है कि किसी एक समुदाय को निशाना नहीं बनाया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “एक संदेश मीडिया में जाने देना चाहिए कि किसी विशेष समुदाय को लक्षित नहीं किया जा सकता है। हमें एक ऐसे राष्ट्र के भविष्य के बारे में देखना चाहिए, जो सामंजस्यपूर्ण और विविधतापूर्ण हो। हम राष्ट्रीय सुरक्षा को मान्यता देते हैं, लेकिन हमें व्यक्तिगत सम्मान भी करना चाहिए।”

लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ जिस ‘समुदाय’ को निशाना ना बनाए जाने को लेकर संदेश देना चाह रहे थे उन्होंने उसका नाम तक नहीं लिया। यानी इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि मीडिया में बैठे हुए प्रोपेगेंडा प्रतिनिधि बीबीसी, शेखर गुप्ता का ‘दी प्रिंट’, दी वायर, एनडीटीवी और ऐसे ही न जाने कितने ही हिन्दूफोबिया से ग्रसित पत्रकारिता के समुदाय विशेषों को हिन्दुओं और उनकी आस्था को निशाना बनाने के बारे में सोचना चाहिए।

जिस तरह का बर्ताव मीडिया का यह गिरोह हिन्दू समुदाय से करता आया है, यह कहा जा सकता है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने हिन्दूफोबिक चैनलों को इशारा किया है कि उनके द्वारा हिन्दुओं की आस्था पर आक्रमण भविष्य के भारत के लिए खतरा है और न्यायपालिका उसे बचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

वास्तव में, हमने ऐसे अनगिनत उदाहरण देखे, जब किसी दूसरे समुदाय विशेष द्वारा किए गए अपराधों को भ्रामक तरीके से हिन्दुओं द्वारा किए जाने वाले अपराध साबित करने के प्रयास किए गए। हिन्दुओं की आस्था को लगातार खास तरह के चैनलों और पोर्टलों द्वारा नीचा दिखाया जाता रहा है। जस्टिस चंद्रचूड द्वारा दिए गए इस संदेश के बाद तो अब यही लगता है कि अब किसी रेपिस्ट ‘असलम’ को ‘बाबा’ लिख कर, कार्टून में भगवा पहनाने वालों की खैर नहीं।

शेखर गुप्ता के दी प्रिंट ने पिछले साल ही एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें दावा किया गया था कि दिल्ली में मौजूद हनुमान जी की विशाल प्रतिमा से समुदाय विशेष के लोगों में दहशत का माहौल है।

इससे पहले सभी लोगों ने सिर्फ यही सुना था कि हनुमान जी का नाम सिर्फ भूत-पिशाचों में ही दहशत पैदा करता है, लेकिन दी प्रिंट के इस लेख में खुलासा किया गया था कि यह भूत-पिशाच कोई और नहीं बल्कि समुदाय विशेष के लोग थे।

यह एक ऐसा ही प्रमुख उदाहरण था जब पत्रकारिता के समुदाय विशेष द्वारा हिन्दू प्रतीकों को अपमानित करने का नैरेटिव खुलकर चलाया गया। तब शायद ही किसी हिन्दू ने शेखर गुप्ता के खिलाफ कोर्ट जाने का फैसला लिया होगा। यही हिन्दू धर्म की सहिष्णुता भी है।

इंडिया टुडे ने एक ऐसी ही खबर प्रकाशित करते हुए समुदाय विशेष के लोगों में बाल विवाह को लेकर सवाल उठाए गए थे। लेकिन शातिर तरीके से इंडिया टुडे ने अज्ञात कारणों से इस लेख में किसी समुदाय विशेष की बच्ची की तस्वीर के बजाए एक हिन्दू बच्ची की तस्वीर इस्तेमाल की थी। शायद इंडिया टुडे जानता था कि उसे किन लोगों से खतरा मोल नहीं लेना है। इंडिया टुडे यह तक कह चुका है कि श्रीराम नाम के नारों से माहौल दूषित हुआ है।

ऐसे ही कई उदाहरण हैं जब मीडिया में हिन्दू धर्म को निशाना बनाते हुए इसे अपमानित और इसके दुष्प्रचार का एजेंडा चलाया जाता है। इन्हीं में से सबसे प्रचलित एजेंडा क्राइम रिपोर्ट्स में अपनाया जाता है। जब पत्रकारिता के समुदाय विशेष द्वारा किसी ढोंगी को, जो कि अक्सर कोई अब्दुल या असलम होता है, भूत-प्रेत या फिर जिन-जिन्नात भगाने के लिए महिलाओं का शोषण या उन पर अत्याचार करते हुए पकड़ा जाता है लेकिन मीडिया का यह गिरोह इसे ‘तांत्रिक’ ‘ओझा‘ या फिर NDTV जैसे समूह ‘बाबा’ लिखकर हिन्दू धर्म को अपमानित करता है और कोई ‘आह’ तक नहीं करता।

खैर, जस्टिस चंद्रचूड़ का यह सन्देश वास्तव में व्यापक है। मीडिया यदि वास्तव में किसी एक समुदाय के खिलाफ एजेंडा चलाने से बाज आए, तो हिन्दू धर्म मीडिया के इस गिरोह का बहुत आभारी रहेगा।

NCB ने करण जौहर द्वारा होस्ट की गई पार्टी की शुरू की जाँच- दीपिका, मलाइका, वरुण समेत कई बड़े चेहरे शक के घेरे में: रिपोर्ट

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) सोशल मीडिया पर वायरल फिल्म निर्माता करण जौहर द्वारा होस्ट की गई पार्टी की एक वीडियो की जाँच कर रहा है। मीडिया आउटलेट ने कहा कि एनसीबी के सूत्रों द्वारा इसकी जानकारी दी गई है। DNA की रिपोर्ट के अनुसार, ब्यूरो द्वारा इस बात की जाँच की जाएगी कि वीडियो असली है या फिर इसे डॉक्टरेड किया गया है। यदि वीडियो वास्तविक पाया जाता है, तो जाँच आगे बढ़ने की संभावना है।

इससे पहले हमने रिपोर्ट किया था कि NCB मामले की जाँच शुरू कर सकता है और करण जौहर को इस मामले में बुलाया जा सकता है। वहीं डीएनए द्वारा यह पुष्टि की गई है कि इस मामले की जाँच शुरू हो गई है। इस वीडियो में दीपिका पादुकोण, विक्की कौशल, मलाइका अरोड़ा, वरुण धवन, अयान मुखर्जी, अर्जुन कपूर और शाहिद कपूर जैसे बड़े एक्टर दिखाई दे रहे है।

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद लोगों ने आरोप लगाया था कि वीडियो में सभी अभिनेता ड्रग्स के प्रभाव में थे। वहीं अकाली दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी पार्टी में मौजूद लोगों पर ड्रग्स के सेवन का आरोप लगाया था। हालाँकि, विक्की कौशल और करण जौहर सहित अधिकांश कलाकारों ने इन दावों को बकवास बताया था।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही बॉलीवुड ड्रग्स माफियों पर खुलासा करते हुए कंगना रनौत ने अपने एक ट्वीट में रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, अयान मुखर्जी और विकी कौशल से अनुरोध किया था कि वह ड्रग टेस्ट के लिए अपने ब्लड सैंपल दें, क्योंकि ऐसी अफवाहें है कि वह लोग कोकिन के आदी हैं। रिपोर्ट्स में यह भी बात सामने आई थी कि एनसीबी के अधिकारी ड्रग जाँच में कम से कम 25 प्रमुख बॉलीवुड सितारों को जल्द ही बुला सकते है। मशहूर हस्तियों में कुछ-बी-ग्रेड कलाकार भी शामिल हैं, जिन पर ड्रग्स लेने और खरीदने का आरोप लगाया गया है।

बुर्के के भीतर छिपा रखे थे चाकू, तलवार: जानें दिल्ली दंगों के दौरान कैसे हुआ डीसीपी अमित शर्मा और एसीपी अनुज कुमार पर हमला

फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान पुलिस कॉन्स्टेबल रतनलाल की मौत हो गई थी। डीसीपी अमित शर्मा और एसीपी अनुज कुमार जख्मी हो गए थे। इन पर मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने हमला किया था।

‘दिल्ली राइट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी (Delhi Riots 2020: The Untold Story)’ नामक पुस्तक में इस घटना का विस्तार से ब्यौरा दिया गया है। इसके कुछ पन्ने मोनिका अरोड़ा ने ट्विटर पर शेयर कर बताया है कि महिलाओं ने बुर्के के भीतर चाकू और तलवार तक छिपा रखे थे। शीघ्र प्रकाशित होने वाली इस पुस्तक को मोनिका अरोड़ा ने सोनाली चितालकर और प्रेरणा मल्होत्रा के साथ मिलकर लिखा है।

मोनिका ने ट्वीट कर कहा है कि रोड ब्लॉक करने वाली महिलाओं के बुलाने पर डीसीपी अमित शर्मा बातचीत के लिए मौके पर पहुॅंचे थे। इन महिलाओं ने बुर्के में छिपाकर रखे गए चाकू और तलवार से उन पर हमला कर दिया। दूसरे पुलिसकर्मियों ने उन्हें बचाया और नजदीकी नर्सिंग होम में ले गए। लेकिन जेहादियों ने इस नर्सिंग होम को भी जला दिया था।

किताब में लिखा गया है कि डीसीपी अमित शर्मा को मोहन नर्सिंग होम ले जाया गया। कॉन्स्टेबल रतनलाल पहले ही वहॉं पहुॅंचाए जा चुके थे। प्राथमिक उपचार के बाद दोनों को गुरु तेग बहादुर अस्पताल (जीटीबी) ले जाने का फैसला किया गया। दंगाइयों ने हॉस्पिटल तक पुलिस का पीछा किया। पथराव और तोड़फोड़ की। मोहन नर्सिंग होम और डीसीपी के आधिकारिक वाहन को आग के हवाले कर दिया। अमित शर्मा और रतनलाल को निजी वाहन से जीटीबी ले जाना पड़ा, लेकिन रतनलाल की जान नहीं बचाई जा सकी।

Delhi Riots 2020: The Untold Story का अंश (साभार: @advmonikaarora)

किताब के जो अंश मोनिका ने साझा किए हैं, उसमें बताया गया है कि शहादरा के डीसीपी अमित शर्मा विशेष रूप से चॉंदबाग में तैनात थे। यह इलाका उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दयालपुर थाना क्षेत्र के तहत आता है। उनके साथ गोकुलपुरी के एसीपी अनुज कुमार, हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल और बृजेश तथा अन्य पुलिसकर्मी थे। उस दिन सीएए प्रदर्शनकारियों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ने लगी थी। वजीराबाद रोड के आगे पीछे चूँकि मुस्लिम बहुल इलाके हैं- बृजपुरी, चाँदबाग, मुस्तफाबाद आदि। समुदाय विशेष के हजारों लोग उन गलियों से निकल कर सड़कों पर आ गए। भजनपुरा रोड की ओर आगे बढ़ते हुए इन दंगाइयों की भीड़ ने पुलिस को वहाँ से निकाल दिया। इन गलियों से निकलने वाले लोगों में ‘मुस्लिम’ महिलाएँ भी अच्छी खासी संख्या में थी।

किताब में लिखा है, डीसीपी अमित शर्मा और एसीपी अनुज शर्मा अन्य दो कॉन्सटेबल के साथ बातचीत करने गए और रोड को ब्लॉक होने से रोकने का प्रयास किया। इस बीच भीड़ आक्रामक हो गई और उनकी संख्या हजारों में पहुँच गई। थोड़ी देर में वहाँ हिंसा शुरू हो गई। प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने अपने बुर्के में छिपाए पत्थर, चाकू और तलवार से पुलिस अधिकारियों पर हमला कर दिया।

इस दंगाई भीड़ में शामिल महिलाओं तक ने पुलिस अधिकारियों का पत्थर, डंडे और रॉड लेकर पीछा किया। वह लगातार पुलिस पर पत्थरबाजी और रॉड से हमला करते रहे। कुछ हिंदुओं ने पुलिस को समुदाय विशेष की दंगाई भीड़ से बचाया। इसके बाद सोशल मीडिया पर पुलिस पर हमले की दर्दनाक वीडियो सोशल मीडिया पर हर जगह देखी गई।

फिर जलील हुई ‘पत्रकार’ रोहिणी सिंह: UP पुलिस द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न के दावे को खुद पीड़िता ने नकारा

‘पत्रकार’ रोहिणी सिंह ने शुक्रवार (सितंबर 18, 2020) को ट्वीट करते हुए उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस कर्मियों के हाथों महिला प्रदर्शनकारियों के यौन उत्पीड़न का दावा किया।

एक महिला प्रदर्शनकारी की एक तस्वीर शेयर करते हुए रोहिणी सिंह ने ट्वीट किया, “अगर आप एक माँ हैं तो इस तस्वीर को देखकर आपको गुस्सा आना चाहिए। एक पिता हैं तो चिंतित होना चाहिए। एक भाई हैं तो खून खौलना चाहिए। बेटियाँ घर से निकले तो बलात्कार, छेड़खानी जैसी घटनाएँ तो अब उत्तर प्रदेश में आम बात थी। पर अब पुलिस द्वारा उनके साथ ऐसा बर्ताव? ये ‘रामराज्य’ है?”

हालाँकि, रोहिणी सिंह ने जिस महिला प्रदर्शनकारी का फोटो शेयर करते हुए उत्पीड़न का दावा किया था, उसने खुद ही इसका खंडन करते हुए कहा कि यह सब गलतफहमी की वजह से हुआ।

Screengrab of the tweet by Rohini Singh

महिला प्रदर्शनकारी जानबूझकर उत्पीड़न के दावों का खंडन करती है

पॉपुलर सोशल मीडिया यूजर अंकुर सिंह द्वारा शेयर किए गए वीडियो में महिला प्रदर्शनकारी कहती है, मेरा नाम कांची सिंह है। आज लखनऊ विश्वविद्यालय के गेट नंबर एक पर हम सभी लोगों के साथ मिलकर प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान जैसे बाकी सभी लोगों को उठाकर पुलिस की गाड़ी में बैठा दिया, उसी तरह से मुझे भी बैठा दिया।

गलत पहचान का हवाला देते हुए, कांची सिंह ने स्पष्ट किया, “मेरे पहनावे के कारण पुलिस को थोड़ा सा भ्रम हो गया। उन्होंने मुझे लड़का समझ लिया और उठाकर गाड़ी में बैठा दिया।” रोहिणी सिंह द्वारा कथित रूप से पुलिस कर्मियों के हाथों यौन उत्पीड़न के दावों का खंडन करते हुए, उन्होंने जोर देकर कहा, “उन्होंने मेरे साथ कुछ भी नहीं किया। कुछ भी जानबूझकर नहीं किया गया था। उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं थी। जो भी हुआ है, भ्रमवश हुआ है।”

UP पुलिस ने यौन उत्पीड़न के आरोपों से इनकार किया

पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ ने एक बयान में स्पष्ट किया, “हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि कानून व्यवस्था की स्थिति को बनाए रखने के लिए प्रदर्शनकारियों को हटाना अत्यंत आवश्यक था। चूँकि भीड़ बहुत बड़ी थी, इसलिए उनके पहनावे व वेशभूषा के आधार पर महिला एवं पुरुष बीच भेद करना मुश्किल था। अत: भूलवश, पुलिस कर्मी द्वारा महिला प्रदर्शनकारी को धरना स्थल से पुरुष प्रदर्शनकारी समझकर हटाया गया। यहाँ तक कि खुद महिला प्रदर्शनकारी ने भी बताया कि कि ऐसा वेशभूषा के चलते भ्रमवश हुआ। पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ महिलाओं का सदैव सम्मान करती है और इस घटना पर खेद व्यक्त करती है।”

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है कि पत्रकार ने भ्रामक समाचारों के साथ भाजपा की राज्य सरकारों को निशाना बनाने की कोशिश की है। इससे पहले मई में, रोहिणी सिंह ने, ‘द वायर’ के लिए एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक “Behind Ahmedabad’s Ventilator Controversy” था। इसमें आरोप लगाया गया था कि नरेंद्र मोदी सरकार राजकोट स्थित एक फर्म से 5000 वेंटिलेटर खरीद रही है, जिस पर पहले ही अहमदाबाद के सबसे बड़े COVID-19 अस्पताल में घटिया साँस लेने वाली मशीनों की आपूर्ति का आरोप है।

रिपोर्ट का लब्बोलुआब ये था कि खराब वेंटिलेटर बनाने वाली कंपनी के प्रमोटर भाजपा नेताओं के करीबी हैं। हालाँकि, भारतीय प्रेस सूचना ब्यूरो ने द वायर की रोहिणी सिंह द्वारा लगाए गए झूठ और का संज्ञान लिया। रिपोर्ट के संज्ञान में आने के बाद पीआईबी ने फैक्ट चेक किया है। पीआईबी ने पत्रकार रोहिणी सिंह के इस दावे को खारिज कर दिया था कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में खराब पाए गए वेंटिलेटर घटिया और खरीदे गए थे।

पीआईबी ने बताया था कि गुजरात सरकार के अनुसार, जिन वेंटिलेटर्स को खराब बताया गया, वो खरीदे नहीं गए थे। असल में ये दान में दिए गए थे, जो आवश्यक चिकित्सा मानकों पर खरे उतरते थे।

‘प्रशासन ने हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया है’: कोरोना संक्रमण का नया हॉटस्पॉट बना जोधपुर

देश भर में कोरोना महामारी का प्रकोप किसी से छिपा नहीं है। हर रोज संक्रमितों की संख्या आने के साथ एक नया रिकॉर्ड कायम हो रहा है। हर प्रदेश की कोशिश है कि इस महामारी से अपने राज्य को जल्द से जल्द मुक्त कराया जाए, मगर राजस्थान के आँकड़े और प्रशासन का रवैया कुछ और ही दर्शा रहा है। जयपुर और टोंक के बाद अब राजस्थान का एक और शहर संक्रमण का हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है। यह शहर है, जोधपुर।

जोधपुर में कोरोना संक्रमण के मामले न केवल रोज दोगुनी गति से बढ़ रहे हैं, बल्कि इसके कारण रोज बड़ी संख्या में लोगों की मौत भी हो रही है। शुक्रवार को जोधपुर में 100 नए मामले सामने आए। यह आँकड़ा प्रदेश में जयपुर के बाद सभी जिलों से सबसे ज्यादा है। 

प्रशासन की तरफ से दिखाई जा रही लापरवाहियों के कारण अब वहाँ की जनता ने इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि जोधपुर में हर दिन कोरोना से होने वाली मौत के आँकड़े बढ़ रहे हैं और प्रशासन की ओर से तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। मानो कुछ हो ही न रहा हो। लोग सोशल मीडिया पर लिखते हैं, “प्रशासन ने हमें हमारे हालात पर छोड़ दिया है। हम अब भगवान भरोसे हैं। आगे से वोट देने से पहले ध्यान जरूर दें।”

गौरतलब है कि जोधपुर की हालात एक ओर जहाँ दिन पर दिन दयनीय हो रही है, वहीं इस बीच दैनिक भास्कर की स्थानीय रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रशासन केवल प्रदेश में कोरोना से होने वाली मौतें ही नहीं छिपा रहा, बल्कि कोरोना से संक्रमित लोगों का आँकड़ा भी छिपा रहा है।

खबर में दावा किया गया है कि विभाग द्वारा जारी की गई स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक जोधपुर में कोरोना के 19,535 मामले आए हैं, जबकि स्टेट में केवल 16,098 ही दर्ज हैं। सितंबर के मात्र 17 दिनों की बात की जाए तो 6,640 पॉजिटिव केस मिले हैं, जबकि 109 ने इस महामारी से दम तोड़ा है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट

हैरानी की बात यह है कि पूरे अगस्त भर में शहर से उतने मामले सामने नहीं सामने आए थे, जितने सितंबर के पहले पखवाड़े में देखने को मिले हैं। 31 अगस्त तक शहर में कोरोना संक्रमितों का आँकड़ा 6,045 था, जो सितंबर के अभी तक के आँकड़ों से भी कम है। 1-17 अगस्त तक के बीच में केवल 26 मौतें हुईं थी और सितंबर आते-आते ये दर 4 गुना बढ़ गई और जान गॅंवाने वालों का आँकड़ा सितंबर में 109 तक पहुँच गया।

पूरे देश में कोरोना की बढ़ती रफ्तार देखते हुए परेशानी की बात यह नहीं है कि राजस्थान के इस शहर पर क्यों महामारी का प्रसार बढ़ रहा है, बल्कि असली चिंता इस बात की है कि इतने गंभीर हालात होने के बाद प्रशासन की नींद नहीं टूट रही। एक दिन में जिले से 600-800 मरीज मिलने के बावजूद भी सड़कों पर भीड़भाड़ को और छोटे- मोटे आयोजनों को होने से नहीं रोका जा रहा। गुरुवार को इन्हीं लापरवाहियों के कारण एक 8 माह का नवजात भी संक्रमित पाया गया था।

पूरे प्रदेश की यदि बात करें तो भास्कर की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में एक ही विभाग दो-दो तरह की रिपोर्ट जारी कर रहा है। स्थानीय स्तर पर जारी हेल्थ विभाग की रिपोर्ट के आँकड़े कहते हैं कि प्रदेश में कोरोना से कुल 1820 मौतें हो चुकी हैं। वहीं राज्य स्तर पर जयपुर से हेल्थ विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक अब तक कुल 1293 लोगों ने ही कोरोना से दम तोड़ा है।

यह रिपोर्ट सवाल उठाती है कि आखिर 527 मौतों का सच क्यों छिपाया जा रहा है? जबकि कोरोना छिपाने की नहीं, बताने की बीमारी है। यही नहीं, मरीजों की संख्या के आँकड़ों में भी स्थानीय रिपोर्ट और स्टेट रिपोर्ट में बड़ा अंतर है। स्थानीय प्रशासन की रिपोर्टों के हिसाब से प्रदेश में अब तक 1,30,715 लोग संक्रमित हो चुके हैं, लेकिन स्टेट रिपोर्ट में यह संख्या 1,09,473 ही है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों जब दैनिक भास्कर ने कोटा में संक्रमित आँकड़ों को लेकर स्थानीय व स्टेट रिपोर्ट में अंतर को लेकर सवाल उठाया तो कोटा, जयपुर, अजमेर और भरतपुर में स्थानीय स्तर पर रिपोर्ट जारी करने पर ही बैन लगा दिया गया था।

धर्मांतरण की आड़ में महिला उत्पीड़न और लव जिहाद पर योगी सरकार का शिकंजा: सख्त अध्यादेश लाने की तैयारी

धर्मांतरण की आड़ में महिला उत्पीड़न और लव जिहाद के मामलों योगी सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। योगी सरकार लव जिहाद के बढ़ते मामलों पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश ला सकती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया, “अन्य राज्यों के धर्मांतरण के खिलाफ बने कानूनों और अधिनियमों की स्टडी की जा रही है। इसके बाद धर्मांतरण को लेकर उत्तर प्रदेश का अपना कानून बनाया जाएगा।”

धर्म परिवर्तन पर अंकुश लगाने की कार्रवाई का श्रेय राज्य भर में विशेष रूप से कानपुर से आए लव जिहाद के हालिया मामलों को दिया जा सकता है, जहाँ लड़कियों को शादी के बहाने इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया जा रहा है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपने लखनऊ प्रवास के दौरान इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। अपने दो दिन की लखनऊ यात्रा के दौरान उन्होंने लव जिहाद के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई थी।

गौरतलब है कि वर्तमान में 8 राज्यों में धर्मांतरण के खिलाफ कानून मौजूद हैं। इनमें अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड और उत्तराखंड शामिल हैं। सबसे पहले 1967 में ओडिशा द्वारा कानून बनाया गया था। इसके बाद 1968 में मध्य प्रदेश में धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाया गया। कानून विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश धर्मांतरण विरोधी कानून वाले राज्यों की सूची में नौवें स्थान पर हो सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐंटी-कन्वर्जन लॉज़ किसी भी व्यक्ति को सीधे या जबरन या धोखाधड़ी या खरीद और प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण करने से रोकते हैं। यूपी का कानून अन्य राज्यों द्वारा लागू किए गए कानूनों के समान होगा, जो धर्मांतरण के प्रकिया को सख्त और जटिल बनाएगा।

कानपुर पुलिस ने इस हफ्ते की शुरुआत में शादी के बहाने की गई जबरन धर्मांतरण की बढ़ती संख्या की जाँच के लिए आठ सदस्यीय विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया था। पिछले एक महीने में एक ही जिले से ‘लव जिहाद’ के 11 मामले प्रकाश में आए थे।

एक तरफ जहाँ पूरे राज्य में लव जिहाद के मामले सामने आए हैं, वहीं उत्तर प्रदेश का कानपुर संगठित लव जिहाद मामलों का केंद्र बन गया है। शादी के बहाने शहर में रिपोर्ट की गई कई महिलाओं के जबरन धर्म परिवर्तन के कई मामले सामने आए हैं। जिससे शहर में हिंदू महिलाओं को फँसाने के लिए इसके पीछे किसी गिरोह की सोची समझी चाल पर संदेह उत्पन्न हो गया है।

बहुप्रचारित शालिनी यादव मामले के बाद ‘लव जिहाद’ के कानपुर से कई मामले आए है। जिसमें महज पिछले 2 महीने में कानपुर इलाके में घर से 5 लड़कियाँ मुस्लिम युवकों के साथ भागी है। कानपुर के जूही कॉलनी में चल रहे लव जिहाद का संगठित नेक्सस या ट्रेनिंग इन्हीं भागी लड़कियों के आधार पर आप समझ सकते हैं।

घर से भागी शालिनी यादव – आरोपित मोहम्मद फैसल – रहने वाला जूही कॉलनी का, कल्याणपुर के आवास विकास निवासी दो सगी बहनें भागीं – आरोपित शाहरुख (पिता का नाम कमाल) और शाहरुख (पिता का नाम खलील) – रहने वाला दोनों जूही कॉलनी का, पनकी रतनपुर कॉलनी निवासी युवती व उसकी छोटी बहन – आरोपित मो. मोसीन, छोटी बहन सतर्क हुई तो मामला खुल गया – रहने वाला जूही कॉलनी का।

मरने से पहले दिशा सालियान को टॉर्चर किया गया था? दो तरह के निशान मिलने का दावा, मंगेतर का भी पता चला

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत और उनकी पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत का रहस्य दिनोंदिन गहराता ही जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों में फोरेंसिक एक्सपर्ट के हवाले से दिशा के शरीर पर दो तरह के निशान मिलने की बात कही गई है। साथ ही उनके मंगेतर रोहन राय का पता चलने और सीबीआई द्वारा जल्द समन भेजे जाने की बात भी कही जा रही है।

सुशांत की मौत से करीब एक हफ्ते पहले 8 जून को एक बिल्डिंग की 14वीं मंजिल से गिरने से दिशा की मौत हो गई थी। मुंबई पुलिस ने इसे सुसाइड बताया था। लेकिन अब एक फोरेंसिक विशेषज्ञ ने दावा किया है कि दिशा के शव पर दो तरह के चोट के निशान थे। एक गिरने से पहले और दूसरा गिरने के बाद के।

रिपब्लिक टीवी पर एक बहस के दौरान फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. दिनेश राव ने कहा, “दिशा के शव पर चोट के पैटर्न को देखकर मैं इसमें एक अहम जानकारी जोड़ना चाहता हूँ। मैंने निश्चित तौर पर दो तरह की चोट के निशान देखे थे। एक चोट ऊँचाई से गिरने की वजह से आई थी और दूसरी गिरने से पहले की है, जिसकी जाँच होनी चाहिए।”

विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि या तो दिशा के साथ मारपीट की गई या उन्हें प्रताड़ित किया गया था। या यह भी ही सकता है कि उन्होंने हमले से बचने की कोशिश की हो जो उनकी मौत की वजह बन गई हो।

डॉ. दिनेश राव प्रोफेसर और ऑक्सफोर्ड मेडिकल कॉलेज, अस्पताल और अनुसंधान केंद्र, बेंगलुरु में फोरेंसिक चिकित्सा विभाग के प्रमुख रहे हैं। वह किंग्स्टन, जमैका में निदेशक और मुख्य फोरेंसिक पैथोलोजिस्ट रहे हैं।

गौरतलब है कि 8 और 9 जून की मध्यरात्रि को मलाड की 14 वीं मंजिल से गिरने की वजह से दिशा की मौत हो गई थी और मुंबई पुलिस ने इसे आत्महत्या करार दिया था। वहीं सुशांत 14 जून को अपने बांद्रा स्थित आवास पर रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए थे। वर्तमान में तीन एजेंसियाँ- सीबीआई, ईडी और एनसीबी दिवंगत अभिनेता की मौत के मामले से संबंधित विभिन्न एंगल की जाँच कर रही हैं।

गौरतलब है कुछ दिन पहले, भाजपा नेता नितेश राणे ने दिशा सालियान की मौत पर संदेह जताया था। राणे ने कहा था कि दिशा की मौत आत्महत्या नहीं थी और उनके मंगेतर रोहन राय को सामने आकर पूरा सच बताना चाहिए। रिपब्लिक टीवी के अनुसार शीर्ष जॉंच एजेंसियॉं रोहन पर नजर रख रही हैं और वे जॉंच के दायरे में हैं। राणे ने दावा किया था कि उन्होंने दिशा की मौत के 15 दिन बाद रोहन से बात की थी और उन्हें सब पता है कि 8 जून को दिशा की मौत कैसे हुई।

कर्नाटक: हिंदू महिला को अश्लील मेसेज भेजने वाले मोहम्मद मुनासिर को युवती के परिजनों ने पीटा, सभी गिरफ्तार

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें एक महिला सड़क के किनारे स्कूटी खड़ी करके किसी का इंतजार करती नजर आती है। जल्द ही एक युवक उसके पास आता है। तभी अचानक से महिला की जान-पहचान वाले कुछ वहाँ पर आते हैं और उसकी पिटाई करते लगते हैं। महिला भी अपनी चप्पल निकाल कर उसकी पिटाई करती नजर आती है।

जानकारी के मुताबिक यह घटना कथित तौर पर गुरुवार (17 सितंबर, 2020) को कर्नाटक के कोडागु जिले के मदिकेरी में हुई थी, जहाँ एक हिंदू महिला ने सोशल मीडिया पर उसे अश्लील संदेश भेजने के लिए एक मुस्लिम युवक की कथित तौर पर पिटाई की थी।

एक स्थानीय समाचार पत्र, कन्नड़ प्रभा के अनुसार, पुलिस ने मोहम्मद मुनासिर को उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया है। मुनासिर पर हिंदू महिला ने उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसके अलावा, एक जवाबी शिकायत के आधार पर, युवक के साथ मारपीट करने के लिए महिला और उसके 4 रिश्तेदारों को भी गिरफ्तार किया गया है।

दरअसल, मोहम्मद मुनासिर नाम का एक मुस्लिम युवक कर्नाटक के मदिकेरी में एक हिंदू महिला का उत्पीड़न कर रहा था, उसे अश्लील संदेश भेज रहा था। लगातार हो रही बदतमीजी से तंग आकर महिला ने युवक को सबक सिखाने की सोची।

महिला ने उससे प्यारी-प्यारी बातें करके गुरुवार को आरटीओ कार्यालय के पास मिलने की बात कही, जिसके लिए वह तुरंत राजी हो गया। जब युवक उससे मिलने गया, तो महिला वहाँ पर पहले से अपने रिश्तेदारों के साथ इंतजार कर रही थी। मोहम्मद मुनासिर के आते ही उसे पीटना शुरू कर दिया। वीडियो में गुस्साई महिला चप्पलों से युवक की पिटाई करती नजर आ रही है।

पीड़िता द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद मडिकेरी पुलिस ने मोहम्मद मुनासिर को गिरफ्तार किया। इस बीच, आरोपियों द्वारा एक काउंटर-शिकायत भी दर्ज की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि महिला के परिवार वालों ने उसकी पिटाई की थी। उसकी शिकायत के आधार पर, मदिकेरी पुलिस ने मामले में महिला और चार अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया।

राहुल ‘पलटू’ गॉंधी: घोषणा पत्र में जो किया वादा, कृषि बिल में उसका ही कर रहे विरोध

गुरुवार (सितंबर 17, 2020) को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने संसद में देश में कृषि क्षेत्रों में सुधार से संबंधित तीन बिल पेश किए जाने को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ तीखा हमला किया। फिलहाल छुट्टियों पर चल रहे कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने ट्विटर पर कहा कि मोदी सरकार के इन ‘काले कानूनों’ को किसानों और खेतिहर मजदूरों आर्थिक रूप से शोषित करने के लिए पेश किया जा रहा है।

राहुल गाँधी ने ट्वीट करते हुए लिखा, “मोदी जी ने किसानों की आय दुगनी करने का वादा किया था। लेकिन मोदी सरकार के ‘काले’ क़ानून किसान-खेतिहर मज़दूर का आर्थिक शोषण करने के लिए बनाए जा रहे हैं। ये ‘ज़मींदारी’ का नया रूप है और मोदी जी के कुछ ‘मित्र’ नए भारत के ‘जमींदार’ होंगे। कृषि मंडी हटी, देश की खाद्य सुरक्षा मिटी।”

दिलचस्प बात यह है कि इस हफ्ते की शुरुआत में, राहुल गाँधी ने मोदी सरकार के खिलाफ इसी तरह का हमला करते हुए दावा किया था कि केंद्र सरकार के तीन बिल किसान और खेतिहर मजदूरों पर एक ‘घातक प्रहार’ है।

फार्म सेक्टर और APMC सुधार कॉन्ग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा थे

हालाँकि, संसद में पेश किए गए तीन कृषि सुधारों के मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ कॉन्ग्रेस पार्टी के विरोध ने फिर से उनके पाखंड को उजागर कर दिया है। जारी संसद सत्र में मोदी सरकार ने तीन बिल पेश किए हैं – किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल, मूल्य आश्वासन तथा कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल और आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल। ये तीनों बिल कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार लाने के लिए लाया गया है।

बता दें कि जो कॉन्ग्रेस पार्टी इन दिनों बिल का विरोध कर रही है, वह खुद भी कभी इसी तरह के सुधार की प्रस्तावक थी, जो वर्तमान में मोदी सरकार द्वारा पेश किए जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि 2019 में राहुल गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में इन सुधारों की घोषणा की थी।

2019 के लोकसभा चुनावों में, कॉन्ग्रेस पार्टी ने एक चुनावी घोषणा पत्र जारी किया था, जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी यदि कभी सत्ता में आती है तो वह कृषि उपज मंडी समितियों के अधिनियम में संशोधन करेगी, जिससे कि कृषि उपज के निर्यात और अंतर्राज्यीय व्यापार पर लगे सभी प्रतिबन्ध समाप्त हो जाएँगे।

Image Source: Congress Manifesto 2019/ DAAM – AGRICULTURE, FARMERS, AND FARM LABOUR

मोदी सरकार ने जिन तीन बिल को आगे बढ़ाया है उसमें से पहले दो बिल- किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल एवं मूल्य आश्वासन तथा कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल में APMC एक्ट में सुधार की बात कही गई है। फिलहाल मौजूदा व्यवस्था के तहत APMC एक्ट के जरिए किसानों को अपनी फसल मंडी में बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है लेकिन सरकार ने जो सुधार किया है उसके तहत किसान कहीं भी अपनी फसल बेच सकेंगे। APMC में इस तरह के सुधार से किसानों को कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा किए गए वादे के अनुसार खेत की उपज को बेचना आसान हो गया है।

PRS इंडिया के अनुसार पहला विधेयक विभिन्न राज्य कृषि उपज बाजार कानूनों के तहत अधिसूचित बाजारों के बाहर किसानों की उपज के अवरोध मुक्त व्यापार के लिए प्रदान करना चाहता है। वहीं दूसरा बिल APMC बाजारों के भौतिक परिसर से परे किसानों की उपज के अंत:-राज्य और अंतर-राज्य व्यापार की अनुमति देता है।

इसी तरह, अपने चुनावी घोषणापत्र में, कॉन्ग्रेस पार्टी ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को बदलने का भी वादा किया था। कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को बदलकर आज की जरूरतों और संदर्भों के हिसाब से नए कानून बनाए जाएँगे, जो विशेष आर्थिक परिस्थितियों में ही लागू किए जा सकेंगे।

Image Source: Congress Manifesto 2019/ DAAM – AGRICULTURE, FARMERS, AND FARM LABOUR

हालाँकि, कॉन्ग्रेस पार्टी को लगता है कि मोदी सरकार एक ऐसा कानून ला रही है जो आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की जगह लेगा। मोदी सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन के लिए आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक को शामिल किया है। नया विधेयक केंद्र सरकार को कुछ वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण, व्यापार और वाणिज्य को नियंत्रित करने का अधिकार देता है।

हालाँकि यह समझ से परे है कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी क्यों उन्हीं सुधारों का विरोध कर रहे हैं, जिनका वादा बहुत पहले उनकी ही पार्टी ने किया था।