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बिहार को ₹14000+ करोड़ की सौगात: 9 राजमार्ग, PM पैकेज के तहत गंगा नदी पर बनाए जाएँगे 17 पुल

बिहार को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज कई बड़े ऐलान किए। प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से ‘हर गाँव में ऑप्टिकल फाइबर’ योजना, कई पुल और 9 राजमार्गों का शिलान्यास किया। इसके अलावा उन्होंने संबोधन के दौरान कई अहम बातें भी कही।

PM मोदी ने कहा कि कनेक्टिविटी एक ऐसा विषय है, जिसे टुकड़ों में सोचने की बजाय एक साथ सोचना होगा। टुकड़ों में सोचने की प्रवृत्ति से देश का नुकसान होता है। हमारा देश अपने गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बड़ा कदम उठा रहा है और इसकी शुरुआत बिहार से हो रही है। 

प्रधानमंत्री मोदी ने परियोजनाओं के संबंध में घोषणा करते हुए कहा कि जिन 9 राजमार्ग प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ है, उसके ज़रिए 350 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण होगा। इस पूरी योजना में लगभग 14258 करोड़ रुपए का खर्च आएगा और इन रास्तों के निर्माण में बिहार के विकास में तेज़ी आएगी।

इन राजमार्गों के निर्माण से आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोतरी होगी। आस-पास के राज्यों (उत्तर प्रदेश और झारखंड) से आवागमन की सुविधा बेहतर हो जाएगी। उनका कहना था कि कुछ साल पहले तक इस बात की कल्पना करना तक मुश्किल था कि गाँवों में इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या ज़्यादा हो जाएगी। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के 45945 गाँवों को ऑप्टिकल फाइबर इंटरनेट सेवाओं से जोड़ने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि गाँव के किसान, युवा और महिलाएँ इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि इंटरनेट का उपयोग बढ़ने के साथ यह भी ज़रूरी है कि अच्छी इंटरनेट स्पीड भी मिले।

पीएम मोदी ने बताया कि यह सरकार के प्रयासों का नतीजा है कि देश की लगभग 1.5 लाख पंचायतों तक ऑप्टिकल फाइबर सेवा पहले ही पहुँच चुकी है। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पहले लोग इसके इस्तेमाल पर सवाल उठाते थे लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक़ पिछले 6 साल के दौरान देश भर में लगभग 3 लाख से ज़्यादा कॉमन सर्विस सेंटर भी ऑनलाइन किए गए हैं। Telemedicine के माध्यम से दूर-दराज के गाँवों में मौजूद वंचित वर्ग को भी सस्ता और प्रभावी इलाज उपलब्ध कराना संभव होगा और इससे सबसे ज्यादा लाभ किसानों का होगा।

उन्होंने कहा कि जिस रफ़्तार से देश के इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम हो रहा है, वह सराहनीय है। उनके अनुसार, बिहार में कनेक्टिविटी में बाधा का कारण बस एक ही है ‘नदियाँ’। इस कारण को मद्देनज़र रखते हुए राज्य में पुलों के निर्माण पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया गया है।

पीएम पैकेज के तहत गंगा नदी पर 17 पुल बनाए जाएँगे और आगामी 4-5 सालों में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 110 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी है। इसमें लगभग 19 लाख करोड़ रुपए राजमार्ग प्रोजेक्ट पर खर्च किए जाएँगे। 

इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि सुधार बिल पर भी अपना नज़रिया रखा। उन्होंने इस बिल का विरोध करने वालों को भरोसा दिलाया कि मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य कभी ख़त्म नहीं किए जाएँगे। यह क़ानून देश के किसानों को नए अधिकार देगा, यह सुधार 21वीं सदी के लिए बहुत ज़रूरी है।

पीएम मोदी ने बताया कि हमारे देश में उपज बिक्री की व्यवस्था किसानों के हित में नहीं थी, उससे जुड़े क़ानून किसानों के अधिकारों को सीमित करते थे। किसानों की मजबूरी का फायदा उठाया जाता था, इसे हर हालात में रोकना ही था। 

इस बिल के माध्यम से एक किसान को आज़ादी मिलेगी कि वह अपनी फसल कहीं भी, किसी को भी और अपनी तय शर्तों के आधार पर बेच सकता है। अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बड़े गिरोह और व्यवसायी न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।

उन्होंने देश के हर किसान को विश्वास दिलाया कि एमएसपी की सुविधा पहले की तरह जारी रहेगी। ठीक ऐसे ही सीज़न के दौरान सरकार खरीद का अभियान भी पहले की तरह ही चलता रहेगा।

‘गलत साबित हुई तो माफी माँग छोड़ दूँगी ट्विटर’: कंगना ने ट्रोल करने वालों को कहा पप्पू की चंपू सेना

कृषि विधेयक पर कंगना रनौत ने 20 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्वीट शेयर करते हुए एक पोस्ट किया। अपने पोस्ट में उन्होंने उन लोगों पर निशाना साधा जो कृषि बिल के फायदे जानने के बावजूद इस पर सवाल उठा रहे थे। अपनी इस प्रतिक्रिया में उन्होंने उन लोगों का जिक्र भी किया जिन्होंने सीएए के समय भी ऐसे ही बवाल मचाया था।

हालाँकि, उनकी इस हालिया टिप्पणी को सोशल मीडिया पर गलत तरह से पेश करके दावा किया जाने लगा कि उन्होंने ‘किसानों’ को ‘आतंकी’ कहा है। अब इन्हीं आरोपों का जवाब देते हुए कंगना ने अपने विरोधियों पर करारा पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि अगर उन पर लगे आरोप साबित हो गए तो वह ट्विटर छोड़ देंगीं।

कंगना ने अपना ट्वीट शेयर करते हुए लिखा, “जैसे श्री कृष्ण की नारायणी सेना थी, वैसे ही पप्पू की भी अपनी एक चंपू सेना है जो सिर्फ़ अफ़वाहों के दम पे लड़ना जानती है। यह है मेरा ओरिजिनल ट्वीट है। अगर कोई यह सिद्ध कर दे कि मैंने किसानों को आतंकी कहा है, तो मैं माफ़ी माँगकर हमेशा के लिए ट्विटर छोड़ दूँगी।”

बता दें, कंगना रनौत के जिस ट्वीट को गलत तरीके से पेश किया गया उसमें उन्होंने कहा था, “अगर कोई सो रहा हो उसे जगाया जा सकता है। जिसे ग़लतफ़हमी हो उसे समझाया जा सकता है। मगर जो सोने की एक्टिंग करे, ना समझने की एक्टिंग करे उसे आपके समझाने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा? ये वही आतंकी हैं, CAA से एक भी इंसान की सिटीजनशिप नहीं गई मगर इन्होंने ख़ून की नदियाँ बहा दीं।”

अपने ट्वीट में उन्होंने बताया कि सीएए में एक भी भारतीय नागरिक ने नागरिकता नहीं खोई, मगर प्रोपगेंडाबाजों ने झूठी जानकारी फैलाकर हिंसा भड़का दी। अब इसी ट्वीट को तोड़-मरोड़ कर टाइम्स ऑफ इंडिया ने हेडलाइन बनाई और लिखा कि कंगना ने किसानों को ‘आतंकी’ कहा है, जबकि पूरा ट्वीट पढ़ने पर साफ पता चलता है कि अभिनेत्री का कथन उन लोगों के संदर्भ है, जिन्होंने दंगों के लिए लोगों को उकसाया।

‘कंगना रनौत ने किसानों को आतंकी कहा’: कितना सही है TOI का ये दावा

टाइम्स की खबर के बाद कई नेटिजन्स ने भी कंगना पर आरोप लगाया कि उन्होंने किसानों को आतंकी कहा। हैरानी की बात है कि भारत के नामी इंस्टीट्यूट में पढ़ने वालों ने भी इसे गलत समझा और तो और बुद्धिजीवियों ने इसे जम कर शेयर किया। किसी ने उन्हें बिन दिमाग की लड़की बताया और किसी ने उनका नाम ‘दंगाई’ रनौत कर दिया। पत्रकार विनोद कापड़ी ने भी इसे शर्मनाक करार दिया और पूछा कि लाखो किसान आतंकी हैं? क्या राज्यसभा में विरोध करने वाले सांसद आतंकी हैं? या मोदी मंत्रिमंडल में इस्तीफा देने वाली हरसिमरत बादल आतंकी हैं?

बता दें कि विपक्षी सांसदों के जोरदार हंगामे के बीच राज्‍यसभा ने रविवार (सितंबर 20, 2020) को कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 को ध्वनिमत से पास कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि सुधार संबंधी विधेयकों को ‘ऐतिहासिक’ करार दिया है। 

कॉलेज-किताबें सब झूठे, असल में जिहादियों की ‘वंडर वुमन’ बनना चाहती थी कोलकाता की तानिया परवीन

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के मलयपुर गाँव में नूरनेहर खातून और अलामिन मोंडल के यहाँ जन्मी 22 वर्षीय तानिया परवीन का बचपन काफी मुश्किलों भरा था। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, कठिनाइयों के बावजूद, उसकी माँ ने सुनिश्चित किया था कि वह उसे अच्छी शिक्षा दिलवाएगी। परवीन ने अपने छोटे भाई के साथ एक प्राइवेट स्कूल, लंदन मिशनरी सोसायटी में पढ़ाई की, जहाँ उसने परीक्षा में 90% अंक हासिल किए। 2019 में उसने कोलकाता के मौलाना आज़ाद कॉलेज से अरबी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार, 2017 की सांप्रदायिक हिंसा की घटना ने उसके दिमाग में हिंसक जिहाद का बीज बो दिया। 2 जुलाई 2017 को एक किशोर लड़के ने फेसबुक पर काबा और पैगंबर मुहम्मद की एक तस्वीर पोस्ट की। इससे अफरातफरी मच गई और एक मजहबी भीड़ उग्र हो गई। उग्र भीड़ ने हिंदू घरों पर हमला कर दिया। हिंदुओं के दर्जनों घरों और दुकानों को तोड़ दिया गया। एक व्यक्ति मारा गया और लगभग दो दर्जन घायल हो गए।

NIA के अनुसार 2018 में सवालों का ‘जवाब’ खोजने के लिए तानिया परवीन ने बांग्लादेशी इस्लामिक उपदेशक और जमात-ए-इसलामी पार्टी के उप प्रमुख दिलवर हुसैन सईदी का रुख किया। सईदी के मजहबी प्रचार से परवीन को उसके चचेरे भाई हबीबुल्लाह ने परिचित कराया था, जो एक स्थानीय मस्जिद चलाता था। बता दें कि सईदी को बांग्लादेश के स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के विचार का समर्थन करने वाले पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर किए गए युद्ध अपराधों के संबंध में अभियुक्त और दोषी ठहराया गया है।

जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष नेता हुसैन सईदी ने 1971 के युद्ध के दौरान हिंदुओं और बांग्लादेशी समर्थकों के नरसंहार की अगुवाई की थी। 2013 में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने उस पर सामूहिक हत्या, यातना, जबरदस्ती हिंदुओं को इस्लाम में शामिल करने और महिलाओं के साथ क्रूर बलात्कार सहित कुल 20 मामलों का आरोप लगाया। सईदी के खिलाफ 20 आरोपों में से दो के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। ये दो अपराध थे- इब्राहिम कुट्टी और बिसबाली की हत्या और 1971 में फीरोजाबाद में हिंदू घरों में आग लगाना।

सईदी के संदेशों से प्रेरित होकर, तानिया परवीन विभिन्न इस्लामिक-झुकाव वाले व्हाट्सएप समूहों में शामिल हो गईं, जिनका नाम वॉयस ऑफ इस्लाम, इस्लामिक उम्मा और ह्यूमन ब्रदरहुड था। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, इन सभी व्हाट्सएप समूहों ने एक ही संदेश के बारे में बात की कि भारत उन देशों का हिस्सा है जो समुदाय विशेष के खिलाफ नरसंहार करने जा रहे हैं और इसका मुकाबला करने का एकमात्र तरीका सशस्त्र जिहाद है।

रिपोर्ट के अनुसार, परवीन के व्हाट्सएप चैट के विश्लेषण से पता चला था कि उसे जिहाद में रोमांच मिला। वह भारतीय जिहाद का ‘वंडर वुमन’ बनना चाहती थी। बाद में वह कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के साथ रिलेशनशिप में आई। राथर के व्हाट्सएप ग्रुप ने उसे पाकिस्तान में काम कर रहे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी बिलाल दुर्रानी के साथ संपर्क करवाया। इसके बाद उसने परवीन को एक व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल होने के लिए एक वर्चुअल पाकिस्तानी नंबर दिया, क्योंकि भारतीय नंबर सर्विलांस के डर से बैन हैं।

2019 के अंत में परवीन ‘अबू जुंदाल’ नामक फर्जी नाम से लश्कर से जुड़े पाँच व्हाट्सएप ग्रुपों का संचालन करने लगी थी। जाँचकर्ताओं का दावा है कि वह पाकिस्तान में कई लश्कर कमांडरों के साथ नियमित संपर्क में थी। इन नए संपर्कों में से एक के माध्यम से वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के एक अधिकारी के संपर्क में आई।

तानिया परवीन लश्कर के पाकिस्तान स्थित कई कमांडरों के संपर्क में थी। जल्द ही, वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई के अधिकारी ‘राणा’ के संपर्क में आ गई। ‘राणा’ ने स्थानीय जिहादियों की भर्ती के लिए उसे पैसे की पेशकश की। हालाँकि, परवीन को यहाँ बहुत कम सफलता मिली। उसने अपने दो महिला मित्रों को अपने व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ा। पहली दोस्त घुम्मन टाइगर्स ने जुड़ने के तुरंत बाद ही ग्रुप को छोड़ दिया, जबकि उसके कॉलेज के परिचितों ने भी जिहादी गतिविधियों में कम रुचि दिखाई। जिहादी व्हाट्सएप ग्रुप में केवल उसकी एक दोस्त सक्रिय थी।

इधर, ‘राणा’ इस बात से नाखुश था कि परवीन अधिक लोगों की भर्ती नहीं कर पा रही थी। इसलिए उसने उसे प्रिया शर्मा के नाम से फर्जी फेसबुक आईडी दिया, ताकि वो इसके जरिए भारतीय वायु सेना और भारतीय सेना के जवानों के साथ दोस्ती कर सके। एक जूनियर अधिकारी ने उससे संपर्क भी किया, लेकिन जब अधिकारी ने उससे वीडियो चैट के लिए कहा तो वह घबरा गई।

राणा ने उसे वीडियो चैट पर बात करने के लिए कहा, लेकिन तानिया परवीन ने उसे बताया कि कैसे इस्लाम ने उसे घूँघट हटाने से मना किया। इस बात पर दोनों के बीच काफी बहस हुई और फिर परवीन ने ‘राणा’ से सभी संपर्क तोड़ दिए। चार्जशीट के अनुसार, मार्च, 2019 में, जब एनआईए ने ऑनलाइन जिहादी गतिविधि से जुड़े एक दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया परवीन कम से कम छ: फर्जी नामों- ‘मुस्तफा’, ‘हमाज ताहिर’, ‘मुताहिजाब’, ‘अबरार फहद’, ‘इबनू अधम’ और ‘अबू थूराब’ से अकाउंट चला रही थी। 

गौरतलब है कि गुरुवार (सितंबर 10, 2020) को NIA ने पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक विशेष एनआईए अदालत में गुरुवार को आरोप-पत्र दायर किया था। आरोप पत्र में कहा गया था कि वह सोशल मीडिया पर 70 जिहादी समूहों की सदस्य बन गई थी, जिसने आतंकवादी विचारधारा को ‘इस्लामिक जिहाद’ की आड़ में प्रचारित किया था। परवीन पर सख्त गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं।

दिल्ली में एनआईए के एक प्रवक्ता ने कहा था, “जाँच के दौरान यह पता चला कि परवीन को लश्कर के पाकिस्तान स्थित कैडर द्वारा साइबर स्पेस में कट्टरपंथी बना दिया गया था। वह धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर लगभग 70 जिहादी समूहों का हिस्सा बन गई, जिसने मजहबी युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और भर्ती करने के मकसद से इस्लामिक जिहाद की आड़ में आतंकवादी विचारधारा का प्रचार किया।” अधिकारी ने कहा था कि परवीन विभिन्न ‘फिलिस्तीनी और सीरियाई जिहादी’ सोशल मीडिया समूहों में भी सक्रिय थी।

जानकारी के मुताबिक तानिया मूल रूप से बांग्लादेशी नागरिक है। 10 साल पहले बांग्लादेश से घुसपैठ कर वह भारत आई थी। वह लश्कर के लिए युवाओं की भर्तियाँ करती थी। सरकारी सूचनाओं को पाने के लिए वो हनी-ट्रैपिंग का सहारा लेती थी।

तानिया के पास से कई पाकिस्तानी सिम कार्ड्स मिले थे। उसके पास से जब्त की गई डायरी और दस्तावेजों से पता चला था कि उसने काफ़ी संवेदनशील सूचनाएँ जुटा ली थी। वह मुंबई के 26/11 हमलों के मास्टरमाइंड और आतंकी सरगना हाफ़िज़ सईद से भी 2 बार बातचीत कर चुकी है। वो पिछले 2 साल से लश्कर के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही थी और उस क्षेत्र में कई बार भड़काऊ भाषण भी दे चुकी है।

उसका उद्देश्य युवाओं, ख़ासकर छात्र-छात्राओं को कट्टरपंथी बना कर उन्हें आतंकी संगठनों से जोड़ना था। तानिया ने मुर्शिदाबाद में कई आतंकी शिविर भी बना रखे थे, जहाँ वो अपने लोगों को भड़काऊ भाषण देने के लिए प्रशिक्षण देती थी। वहाँ वो लोगों को ‘जिहाद’ सिखाती थी और आतंकी गतिविधियों के संचालन के गुर भी सिखाती थी। अत्याधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने के लिए वह पाकिस्तान जाने वाली थी, लेकिन उससे पहले ही पकड़ी गई।

सपा-बसपा ने 10 साल में दी जितनी नौकरी, उससे ज्यादा योगी सरकार ने 3 साल में दिए

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस विभाग में सबसे ज़्यादा नौकरियाँ दी हैं। योगी सरकार ने अपने शासनकाल में लगभग 3.6 लाख रोज़गार दिए हैं। 18 सितंबर को हुई एक बैठक में योगी आदित्यनाथ ने इस संबंध में एक अहम घोषणा की। उन्होंने राज्य के सभी विभागों को आदेश दिया कि जितने भी पद खाली पड़े हैं उन पर 3 महीने के भीतर प्रक्रिया शुरू की जाए और आगामी 6 महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी की जाए। 

मार्च 2017 यानी जब से योगी सरकार सत्ता में आई है, तब से प्रदेश के पुलिस विभाग में सबसे ज़्यादा भर्तियाँ हुई हैं। इन भर्तियों की संख्या 1,37,253 है। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार बेसिक शिक्षा विभाग में 54,706, सेकेंड्री शिक्षा विभाग में 14,000 और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में लगभग 28,622 भर्तियाँ हुई हैं। 

इसके अलावा लोक सेवा आयोग में 26,103, उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (SSC) में 16,708, स्वास्थ्य शिक्षा विभाग के तहत 1112, नगर विकास विभाग के तहत 700, वित्त विभाग के तहत 614, व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास विभाग के तहत 365, ऊर्जा विभाग के तहत 6446 पदों पर भर्तियाँ हुई हैं। यानी योगी सरकार में सभी भर्तियों की कुल संख्या 3,00,526 है। 

सरकार द्वारा जारी किए गए अन्य आँकड़ों की मानें तो कई विभागों में भर्ती प्रक्रिया जारी भी है। बेसिक शिक्षा विभाग में 69,000 पदों पर, पुलिस विभाग में 16,629 पदों पर और ऊर्जा विभाग में 853 पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी है। यानी कुल मिला कर 86,482 पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी है। 

18 सितंबर को हुई बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आदेश दिया था कि आगामी 6 महीनों में सभी खाली पद भरे जाएँ। इसके अलावा संबंधित विभागों को 3 महीने के भीतर चयन प्रक्रिया शुरू करने का भी आदेश दिया गया है। साथ ही मुख्यमंत्री ने उन विभागों को 1 हफ्ते के भीतर जानकारी देने के लिए कहा है, जिन विभागों में पद खाली हैं। 

हिंदुस्तान की एक रिपोर्ट के अनुसार योगी सरकार ने जितनी नौकरियाँ दी है, वह पिछली सपा-बसपा सरकारों में हुई भर्तियों से कहीं अधिक है। साल 2012 से लेकर 2017 के बीच अपने कार्यकाल में समाजवादी पार्टी सिर्फ 2.05 लाख रोज़गार ही दे पाई थी। वहीं बहुजन समाज पार्टी ने 2007 से 2012 के बीच सिर्फ 91 हज़ार नौकरियाँ दी थी।

सुदर्शन ‘UPSC जिहाद’ मामला: ऑपइंडिया, इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट और UpWord ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की ‘हस्तक्षेप याचिका’

‘सुदर्शन न्यूज़’ के शो ‘यूपीएससी जिहाद’ के प्रसारण का मसला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। चैनल ने इसके प्रसारण पर लगी रोक हटाने की माँग की है। अब इस मामले में ऑपइंडिया, इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट और अपवर्ड ने ‘इंटरवेंशन एप्लीकेशन’ (हस्तक्षेप याचिका) दायर की है। ‘फ़िरोज़ इक़बाल खान बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में अनुमति-योग्य फ्री स्पीच को लेकर रिट पेटिशन दायर की गई है।

‘हस्तक्षेप याचिका’ में कहा गया है, “सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार के लिए जो मुद्दे आए हैं, जाहिर है कि उसके परिणामस्वरूप फ्री स्पीच की पैरवी करने वालों पर प्रकट प्रभाव पड़ेगा। साथ ही ऐसी संस्थाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा, जो जनता के लिए सार्वजनिक कंटेंट्स का प्रसारण करते हैं। इसलिए याचिकाकर्ता की ओर से ये निवेदन है कि इन्हें भी इस मामले में एक पक्ष बनाया जाए। इस प्रक्रिया में एक पक्ष बना कर भाग लेने की अनुमति दी जाए।”

रिट याचिका में अब तक दिए गए आदेशों की बात करते हुए बड़े ही विस्तृत रूप से कई मुद्दों को रखा गया है। अब तक उठाए गए मुद्दों, आए फैसलों और राहत प्रदान करने वाले निर्णयों को ध्यान में रखते हुए इसमें बातें रखी गई हैं। साथ ही इसमें न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार की बात करते हुए सवाल उठाए गए हैं कि क्या प्रशासन की जाँच के दौरान ही कंटेंट्स को प्रसारण के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है या नहीं।

साथ ही एक और महत्वपूर्ण मुद्दा ये उठाया गया है कि आगे स्थानीय प्रशासन या फिर सम्बद्ध अथॉरिटी को इस कंटेंट में कुछ गलत नहीं मिलता है और वो प्रसारण की अनुमति दे देते हैं, तो क्या कोर्ट स्वयं ही प्रशासन का किरदार निभाते हुए इसे प्रतिबंधित कर सकता है? साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि कंटेंट्स को देखने-सुनने का अधिकार जनता को है, क्या इस पर विचार किए बिना ही निर्णय लिया जा सकता है?

साथ ही न्यायिक रूप से ऐसे कंटेंट्स को लेकर भी बात की गई है, जिन्हें ‘हेट स्पीच’ के दायरे में रखा जाए। साथ ही पूछा गया है कि हाल की वस्तुस्थिति को विस्तृत रूप से देखे बिना ‘हेट स्पीच’ के अंदर आने वाली सामग्रियों को लेकर क़ानून बनाया जा सकता है या नहीं। हाल के दिनों में मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा ‘फ्री स्पीच’ के माध्यम से काफी बार बहुत कुछ किया गया है। साथ ही ऑपइंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट भी पेश करने की अनुमति माँगी है।

इस रिपोर्ट का टाइटल है- ‘A Study on Contemporary Standards in Religious Reporting by Mass Media’, जिसमें 100 ऐसी घटनाओं का जिक्र है, जब मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने विभिन्न घटनाओं को लेकर गलत रिपोर्टिंग की जो उनके पहुँच को देखते हुए पाठकों के मन में संशय पैदा करता है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे हिन्दुओं के खिलाफ नैरेटिव बनाया जाता है।

साथ ही कैसे मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा एक मजहब विशेष के दोषियों को बचाने के लिए उनके अपराध को कम कर के दिखाया जाता है या फिर ह्वाइटवॉश कर दिया जाता है। इसलिए, नैतिकता का मापदंड सिर्फ एक किसी घटना को लेकर लागू नहीं की जा सकती, सेलेक्टिव रूप से कार्रवाई नहीं हो सकती। इस रिपोर्ट में हिन्दूफोबिया की कई घटनाओं को उद्धृत किया गया है।

फैक्ट्स के साथ छेड़छाड़ करना, विवरणों को सेलेक्टिव रूप से साझा करना, चित्रों के जरिए नैरेटिव बनाना, फेक न्यूज़ और ओपिनियन बनाना- इन सबके जरिए ये बताने की कोशिश की गई है कि कैसे मुख्यधारा की मीडिया ने ही एक ट्रेंड सेट किया है, जो अब तक चला आ रहा है। इससे कोर्ट को इस मामले में निर्णय लेने में आसानी होगी। दिल्ली दंगे, मुस्लिमों से जबरन ‘जय श्री राम’ कहलवाना और ‘सैफ्रॉन टेरर’ से जुड़े ऐसे लेखों को उद्धृत किया गया है।

रविवार (सितंबर 20, 2020) को ही सुप्रीम कोर्ट में दिए एक हलफनामे में सुदर्शन न्यूज ने कहा था कि चैनल अपने “बिंदास बोल” शो के “यूपीएससी जिहाद” कार्यक्रम के शेष एपिसोड प्रसारित करते हुए कानूनों का कड़ाई से पालन करेगा। चैनल की तरफ से यह भी कहा गया था कि वह सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्धारित प्रोग्राम कोड का पालन करेगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चैनल की तरफ से हलफनामा प्रस्तुत किया गया था।

प्रेगनेंसी टेस्ट की तरह कोरोना जाँच: भारत का ₹500 वाला ‘फेलूदा’ 30 मिनट में बताएगा संक्रमण है या नहीं

दिल्ली की टाटा CSIR लैब ने भारत की सबसे सस्ती कोरोना टेस्ट किट विकसित की है। इसका नाम ‘फेलूदा’ रखा गया है। इससे मात्र 30 मिनट के भीतर संक्रमण का पता चल सकेगा। 

CSIR और टाटा ग्रुप ने यह किट डॉ. देबोज्योति चक्रवर्ती और सौविक मैत्री के नेतृत्व में तैयार की है। इस टेस्ट की कीमत मात्र 500 रुपए बताई गई है। इतने कम दाम वाले इस टेस्ट किट के कर्मिशयल इस्तेमाल की अनुमति ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने दे दी है।

कंपनी ने कहा कि यह जाँच सटीक परिणाम देने में पारंपरिक RT-PCR टेस्ट के बराबर है। इसके अलावा यह सस्ता और कम समय में परिणाम देता है। इस प्रणाली का प्रयोग भविष्य में अन्य महामारियों के परीक्षण में भी किया जा सकेगा।

कंपनी ने बताया कि TATA CRISPR (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats ) टेस्ट CAS9 प्रोटीन का इस्तेमाल करने वाला विश्व का पहला ऐसा टेस्ट है, जो सफलतापूर्वक कोरोना महामारी फैलाने वाले वायरस की पहचान कर लेता है। 

बता दें, इस किट के बारे में जानकारी CSIR के डीजी एस मांडे ने रविवार को दी। उन्होंने बताया कि दिल्ली स्थित CSIR लैब में CRISPR-Cas इम्युनिटी पर शोध किया जा रहा है। मांडे ने बताया कि रिसर्चर्स की टीम इस खास क्षेत्र में पहले से शोध कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि CSIR लैब ने ‘फेलूदा’ नाम से पेपर आधारित टेस्टिंग किट विकसित किया है। उन्हें इसके लिए डीजीसीए से औपचारिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मांडे ने बताया कि यह RT-PCR से काफी अलग है और सस्ता भी है।

उनके अलावा स्वास्थ्य मंत्रालय के दावे में इस किट के लिए कहा गया है कि टाटा समूह ने CSIR-IGIB और ICMR के साथ मिलकर ‘मेड इन इंडिया’ उत्पाद विकसित किया है, जो सुरक्षित, विश्वसनीय, सस्ती और सुलभ है।

टाटा मेडिकल एंड डायग्नॉस्टिक लिमिटिड के सीईओ गिरीश कृष्णमूर्ति, ने इस संबंध में कहा, “COVID-19 के लिए Tata CRISPR टेस्ट के लिए स्वीकृति वैश्विक महामारी से लड़ने में देश के प्रयासों को बढ़ावा देगी। Tata CRISPR टेस्ट का व्यावसायीकरण देश में जबरदस्त R&D प्रतिभा को दर्शाता है, जो वैश्विक स्वास्थ्य सेवा और वैज्ञानिक अनुसंधान जगत में भारत के योगदान को बदलने में सहयोग कर सकता है।”

टेस्ट का नाम फेलूदा कहाँ से पड़ा है?

‘फेलूदा’ नाम मशहूर लेखक और फिल्‍म डायरेक्‍टर सत्‍यजीत रे के काल्‍पनिक बंगाली जासूसी उपन्‍यास के एक कैरेक्‍टर फेलू ‘दा’ से प्रेरित है। मगर, तकनीकी रूप से बात करें तो फेलूदा FNCAS9 Editor Linked Uniform Detection Assay का शॉर्टफॉर्म है। यह स्वदेशी सीआरआईएसपीआर जीन-एडिटिंग टेक्नोलॉजी पर आधारित है। यह कोरोनावायरस SARS-CoV2 के जेनेटिक मटेरियल को पहचानता है और उसे ही टारगेट करता है।

कोरोना के पारंपरिक टेस्ट RT-PCR और फेलूदा में अंतर

वैसे तो फेलूदा आरटी-पीसीआर जितना ही सटीक है। मगर आरटी-पीसीआर टेस्ट को ही कोविड-19 के डायग्नोसिस में गोल्ड स्टैंडर्ड समझा जा रहा है। इनमें अंतर यह है कि फेलूदा के नतीजे जल्दी आते हैं। इसमें इस्तेमाल होने वाला डिवाइस सस्ता भी है। CSIR की मानें तो फेलूदा टेस्ट नोवल कोरोनावायरस की पहचान करने में 96% सेंसिटिव और 98% स्पेसिफिक रहा है।

फेलूदा टेस्ट प्रेग्नेंसी स्ट्रिप टेस्ट की तरह है यानी यदि संक्रमण होगा तो स्ट्रिप का कलर बदल जाएगा। इसका इस्तेमाल पैथ लैब में भी किया जा सकता है। डॉ. देबोज्योति चक्रवर्ती के मुताबिक Cas9 प्रोटीन को बारकोड किया गया है ताकि वह मरीज के जेनेटिक मटेरियल में कोरोनावायरस सीक्वेंस का पता लगा सकें।

इसके बाद Cas9-SARS-CoV2 कॉम्प्लेक्स को पेपर स्ट्रिप पर रखा जाता है, जहाँ दो लाइन (एक कंट्रोल, एक टेस्ट) बताती है कि मरीज को कोरोना है या नहीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इसे करवाने में मात्र 500 रुपए का खर्चा आता है। वहीं पारंपरिक परीक्षण में व्यक्ति को 1,500 से 2,000 खर्च करने पड़ते हैं।

बिहार में कुछ अच्छा हो, कोई अच्छा काम करे… और वो मोदी से जुड़ा हो तो ‘चुड़ैल मीडिया’ भला क्यों दिखाए?

जब बड़ी-बड़ी घोषणाएँ हो रही हों तो लोगों का ध्यान किस पर जाता है? पक्षकार लिखने-कहने लगेंगे कि ये तो चुनावों की तैयारी है जी! इस नीति से तो नुकसान ही होता दिखता है जी! जनता को धोखा दिया जा रहा है जी!

मोटे तौर पर ये “प्रतिक्रियावादी” लोग होते हैं। इनका काम होता है किसी भी किस्म के बदलाव का विरोध करना। आसान शब्दों में प्रतिक्रियावादी को आप मिथकों वाली चुड़ैल से समझ सकते हैं। मिथकों की ये चुड़ैल देखने में आकर्षक होती है ताकि अपने शिकार को लुभा सके, लेकिन इसकी एक विशेषता और भी होती है।

कहते हैं कि चुड़ैल के पैर उल्टे होते हैं। यानी ये देखेगी तो आगे की तरफ लेकिन चलेगी उल्टा, पीछे की तरफ। अतीत को पकड़े बैठे रहने की ये जिद, मिथकों की चुड़ैल को तो मुक्ति से दूर रखती ही है, साथ ही उसके चंगुल में फँसे लोगों को भी पीछे ले जाती है।

इसका एक अच्छा नमूना पर्यावरण सम्बन्धी चर्चाओं में दिखेगा। हाल में जब लॉकडाउन हुआ और गाड़ियाँ, फैक्ट्री सभी बंद हो गए तो धुएँ के कम होते ही लोगों को एक अनोखा मंजर दिखा। उनके घर से जो दो सौ किलोमीटर दूर का हिमालय था, वो अचानक नजर आने लगा था। चकित हुए लोगों ने इस पर बात की मगर “प्रतिक्रियावादी”?

वो इस मुद्दे पर कैसे बोलते? अगर वो स्वीकारते कि लॉकडाउन से प्रकृति को, पर्यावरण को कोई फायदा हुआ है, तो फिर तो वो सरकार का समर्थन हो जाता और ऐसा करने वाले गिरोह से लतिया कर निकाल दिए जाते। एक तथ्य ये भी था कि जैसे भीख माँगने वाले गिरोह बच्चों को भूखा रखकर दयनीय दिखाते हैं, ताकि ज्यादा भीख ली जा सके, वैसे ही चंदा तो बुरा हाल दिखाने पर आता! ऐसे में अच्छा हो रहा है, ये दिखाना कहीं से भी फायदे का सौदा नहीं था।

इस लॉकडाउन का असर नदियों पर भी पड़ा होगा। गंगा, जिसे फिर से स्वच्छ करने के लिए लम्बी कवायद चल रही है, उस पर भी कुछ ना कुछ असर तो हुआ ही होगा। फ़िलहाल स्थिति ये है कि 34 स्थलों से संग्रहित गंगा जल की जाँच में उसे जलीय जीवन के अनुरूप पाया गया है लेकिन मल-जल व सीवेज के पानी के कारण गंगा जल पीने या नहाने लायक नहीं है।

पर्यावरण की दृष्टि से गंगा का महत्व एक और कारण से भी बढ़ जाता है। नदी में रहने वाली डॉलफिन, जिसे अक्सर गंगेटिक डॉलफिन, और स्थानीय भाषा में सोइंस आदि नामों से भी जानते हैं, वो बिहार के क्षेत्र में गंगा और उसकी सहायक नदियों (कोसी आदि) में पाई जाती है। पिछले वर्ष (2018-19 में) जब सर्वेक्षण हुआ था तो पूरे देश में 3031 डॉलफिन थीं, जिसमें से करीब आधी (1455) केवल बिहार में हैं।

थोड़े समय पहले सुल्तानगंज-कहलगाँव के 60 किलोमीटर के क्षेत्र को “विक्रमशिला गांगेय डॉलफिन सैंक्चुअरी” घोषित किया जा चुका है। इस काम को और एक कदम आगे ले जाते हुए गंगा के किनारे 57 ऐसे उद्योगों की पहचान की गई है, जो सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहे हैं। इन जगहों पर लिक्विड डिस्चार्ज ट्रीटमेंट और इफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना का काम चल रहा है। जल्दी ही औद्योगिक कचरा इन जगहों से भी सीधा गंगा में जाना बंद हो जाएगा।

सुधार के तौर पर इसे और आगे बढ़ाकर पटना जैसे शहरों से निकलने वाले शहरी कचरे को भी परिशोधित करने का काम किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के बिहार से जुड़ी घोषणाओं में शुरुआत में ही पटना विश्वविद्यालय के 2 एकड़ परिसर में 30.52 करोड़ रुपए की लागत से एशिया का पहला डॉलफिन रिसर्च सेंटर की स्थापना किए जाने की घोषणा आ गई थी।

इस खबर पर सोशल मीडिया में बहसें ना दिखने के दो प्रमुख कारण हो सकते हैं। एक संभावित कारण तो ये है कि डॉलफिन ना तो खुद वोट देती है, ना ही उसके नाम पर वोटों की फसल काटी जा सकती है। ऐसे में आयातित विचारधारा के टुकड़ाखोर गिरोहों को डॉलफिन पर चर्चा करना जरूरी नहीं लगता। फिर इसमें सरकार कुछ कर रही है, ये पर्यावरण में रूचि रखने वाले लोगों को पता चल जाता, जो कि उनके “चंदे” के लिए नुकसानदायक हो सकता था।

दूसरा संभावित कारण उनका क्षेत्रवाद और बिहार से द्वेष हो सकता है। बिहार में कुछ अच्छा हो और तथाकथित बुद्धिपिशाच अनदेखी या विरोध ना करें, ऐसा कैसे होगा? फेंकी गई बोटियों के बदले उन्हें बिहार के बारे में नकारात्मकता फ़ैलाने की आदत है और भारत के डॉलफिन मैन कहलाने वाले पद्मश्री प्रोफेसर रविन्द्र कुमार सिन्हा, बिहार के हैं! बिहार के किसी का नाम, किसी अच्छे काम के लिए ना लेना पड़े, इसलिए भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधना जरूरी था।

बाकी चुनावों के बीच पर्यावरण और जीव-जंतुओं सम्बन्धी इस फैसले का स्वागत डॉलफिन भले ना कर पाएँ लेकिन कुछ लोग तो कर ही लेंगे। क्या है कि गरमा-गर्म बहसें हों ना हों, लोग अपने काम की ख़बरें तो ढूँढ ही लेते हैं ना?

8.5% कमीशन आढ़तिया और राज्य सरकार का…ऐसे लूटा जाता है किसान की उपज को, फिर भी घड़ियाली आँसू बहा रहा विपक्ष

संसद में पारित हुए किसानों से सम्बंधित 3 विधेयकों ने कोरोना काल में घरों में सिमटी-सिकुड़ी राजनीति को सड़कों पर ला खड़ा किया है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक, कृषक (सशक्तिकरण और सरंक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं हेतु अनुबंध विधेयक और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक नामक तीनों विधेयकों का जन्म 5 जून, 2020 को अधिनियमों के रूप में हुआ था। तब से लेकर पिछले सप्ताह संसद में लाए जाने तक किसी भी राजनीतिक दल, किसान संगठन अथवा राज्य सरकार द्वारा कहीं कोई विरोध नहीं जताया गया।

तमाम विपक्षी दलों की सरकारों से लेकर पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल अकाली दल (बादल) और जननायक जनता पार्टी जैसे सहयोगी दलों तक; सब-के-सब इन अध्यादेशों/विधेयकों के पक्ष में थे।

निहित स्वार्थ-प्रेरित आढ़तिया लॉबी द्वारा भरमाए और भड़काए गए किसानों के सड़क पर उतर आने के बाद अब अलग-अलग राजनेताओं और राजनीतिक दलों में इन विधेयकों का विरोध करते हुए किसान हितैषी दिखने की होड़ मच गई है।

अकेले पंजाब में 28000 आढ़तिया हैं। उनकी पहुँच और प्रभाव न सिर्फ़ किसानों तक सीमित है, बल्कि राजनीतिक दलों में भी उनकी अच्छी पैठ है। यह आढ़तिया लॉबी द्वारा प्रायोजित और ‘वोट बैंक की राजनीति’ से प्रेरित विरोध है।

इसीलिए महाराष्ट्र के दो बड़े किसान नेताओं राजू शेट्टी (स्वाभिमान पक्ष) और अनिल घनावत (शेतकारी संगठना) ने इन विधेयकों का स्वागत किया है। यहाँ तक कि दो बार लोकसभा सदस्य रहे राजू शेट्टी ने तो इन विधेयकों को ‘किसानों की वित्तीय स्वतंत्रता के लिए उठाया गया पहला कदम’ करार दिया है।

वास्तव में, इन तीनों विधेयकों की सही और पूरी जानकारी किसानों तक पहुँच नहीं पाई है।

यह सरकार की विफलता ही मानी जाएगी कि किसानों की कल्याण-कामना से प्रेरित होकर इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले बदलाव करते हुए भी केंद्र सरकार ‘वास्तविक लाभार्थियों’ को सही समय पर जरूरी जानकारी देकर जागरूकता पैदा नहीं कर पाई। यदि केंद्र सरकार ने ऐसा किया होता तो आज विपक्षी दलों को अन्नदाता के भविष्य को दाँव पर लगाकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का अवसर न मिलता।

ग्रामीण समाज ख़ासकर किसानों की अशिक्षा और पराश्रितता का लाभ उठाकर यह आग भड़काई गई है। देर-सबेर जब किसानों को वास्तविकता का ज्ञान होगा तो इन दलों का ‘वोट बैंक का गुणा-गणित’ गड़बड़ा जाएगा। वास्तव में, ये विधेयक कृषि-उपज की विक्रय-व्यवस्था को व्यापारियों/आढ़तियों से मुक्त कराने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। साथ ही, बाजार के उतार-चढ़ावों से भी किसानों को सुरक्षा-कवच प्रदान करेंगे। 

इन विधेयकों में सबसे ज्यादा और तीखा विरोध कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक को लेकर किया जा रहा है। इस विधेयक के सम्बन्ध में सबसे बड़ी अफ़वाह यह फैलाई जा रही है कि यह किसान की उपज के लिए सरकार द्वारा साल-दर-साल घोषित होने वाली ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था’ की समाप्ति करने वाला है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक के माध्यम से केंद्र सरकार किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराना चाहती है।

उल्लेखनीय है कि कृषि उपज विपणन समिति (सरकार द्वारा अभी तक कृषि उत्पादों के क्रय-विक्रय हेतु अधिकृत मंडी) के नीति-नियंता आढ़तियों को पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि जगहों पर सामान्य बोलचाल में दलाल कहा जाता है। ये आढ़तिया कमीशन-एजेंट होते हैं।

मंडी में अपनी मोनोपॉली का फायदा उठाकर न सिर्फ़ कृषि उपज की बिक्री पर मोटा कमीशन खाते हैं, बल्कि माप-तोल में भी कटौती, घटतौली आदि गड़बड़ घोटाला करते हैं। किसानों को मोटी ब्याज पर पैसा देते हैं। किसान की बाध्यता होती है कि वह अपनी उपज को उसी आढ़तिया के पास लेकर जाएगा, जिससे ब्याज पर पैसा ले रखा है। दरअसल, यह विधेयक इन बिचौलियों के शिकंजे से अन्नदाता की मुक्ति का मार्ग है।  

यह विधेयक किसानों को उनकी खून-पसीने से कमाई गई फसल का न्यायसंगत और प्रतिस्पर्धी मूल्य दिलाएगा। इससे मंडियों में व्याप्त लाइसेंस-परमिट राज समाप्त होगा और वहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार से भी किसान को निजात मिलेगी।

किसान और छोटे-मोटे व्यापारी अपनी उपज को कहीं भी, किसी को भी अच्छे दाम पर बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे। बाहर या खुले बाजार में अच्छा मूल्य न मिलने की स्थिति में वे अपनी उपज को पहले की तरह कृषि उपज विपणन समिति में बेचने के लिए भी स्वतंत्र होंगे।

इस विधेयक में पुराने विक्रय प्लेटफ़ॉर्म की समाप्ति की बात न करके एक कमीशनमुक्त और सर्वसुलभ प्लेटफ़ॉर्म मुहैया कराने का प्रस्ताव है। यह ‘एक देश,एक बाज़ार’ की अबाध व्यवस्था है। इस वैकल्पिक व्यवस्था के अस्तित्व में आने से पुरानी शोषणकारी व्यवस्था में भी सुधार की शुरुआत हो जाएगी। 

कुछ राज्य सरकारें परेशान होकर इन विधेयकों का विरोध कर रही हैं, क्योंकि इससे उन्हें राजस्व की हानि होगी। दरअसल, किसान जब अपनी उपज बेचने राज्य सरकार द्वारा संचालित/अधिकृत  कृषि उपज विपणन समिति (सरकारी मंडी) में जाता है तो उसकी उपज की बिक्री में से न सिर्फ आढ़तिया कमीशन खाता है, बल्कि राज्य सरकारें भी कमीशन खाती है। यह उसकी कमाई का बड़ा जरिया है।

उदाहरणस्वरूप, पंजाब जैसे कृषक प्रधान राज्य में किसान से उसके उपज-मूल्य का लगभग 8.5 प्रतिशत कमीशन वसूला जाता है, जिसमें से 3 प्रतिशत बाजार शुल्क, 3 प्रतिशत ग्रामीण विकास शुल्क और 2.5 प्रतिशत ‘आढ़तिया विकास शुल्क’ होता है।

नई व्यवस्था लागू होने से इस 8.5 प्रतिशत कमीशन/शुल्क की सीधी बचत किसान को होगी, जोकि काफी बड़ी रकम होगी। इसके अलावा उपज की मंडी तक ढुलाई में होने वाले खर्च की भी बचत होगी।

सोचने और पूछने की बात यह है कि जब राज्य सरकारों को होने वाली तथाकथित राजस्व की हानि अंततः उत्पादक किसान के हाथ में जा रही है; फिर किसानों की हमदर्द और हितैषी होने का स्वांग भरने वाली सरकारों द्वारा इस विधेयक का विरोध क्यों किया जा रहा है?

विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम से किसान का आशंकित होना अस्वाभाविक या अकारण नहीं है। आखिर उन्हें पिछले दशकों में अनेक बार छला गया है। इसीलिए आज उनकी ऐसी दुर्दशा है। इसलिए सरकार को आगे आकर 3-4 बिंदुओं पर पूरी स्पष्टता के साथ युद्ध स्तर पर अपनी बात किसानों के बीच रखनी चाहिए।

एक तो, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद व्यवस्था के यथावत जारी रखने के बारे में आश्वस्त करना अनिवार्य है। दूसरे, उन्हें यह भी समझाने की आवश्यकता है कि यह विधेयक पुरानी विक्रय व्यवस्था की समाप्ति न करके उसके बरक्स एक और अधिक सुविधाजनक, किसान हितैषी और बंधनमुक्त व्यवस्था का विकल्प प्रदान करेगा।

उन्हें इन दोनों व्यवस्थाओं में से जब जिसे चाहें, अपनी सुविधानुसार चुनने की स्वतंत्रता होगी। इसके अलावा किसानों की एक बड़ी चिंता किसी विवाद की स्थिति में न्यायालय जाने के विकल्प का प्रावधान न होने को लेकर भी है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक में किसान और व्यापारी के पारस्परिक विवाद की स्थिति में एक ‘समझौता मंडल’ के माध्यम से विवाद के निपटान का प्रावधान है। इस प्रकार के समझौता मंडल की शक्ति, वैधता और निष्पक्षता न्यायालय जैसी नहीं हो सकती। अतः समझौता मंडल के निर्णय से असंतुष्ट होने की स्थिति में न्यायालय जाने का विकल्प भी खुला रखना चाहिए।

निश्चय ही, सरकार ने समझौता मंडल का प्रावधान इस विधेयक में इसलिए किया है, क्योंकि न्यायालय की प्रक्रिया बहुत लंबी, जटिल और खर्चीली होती है। किसान का मुकदमेबाजी में फँसना उसके लिए आत्मघाती हो सकता है। 

जो गाँव से और किसानी पृष्ठभूमि से हैं, वे तो जानते ही हैं, उनके अलावा अन्य सचेत और पढ़े-लिखे नागरिक जानते हैं कि भारत में अनेक बार किसानों को फसल विशेष का ज्यादा उत्पादन होने की स्थिति में उसे लगभग मुफ्त में (दो-चार रुपए किलो तक) बेचना पड़ता है या कभी-कभी तो फेंकना तक पड़ता है। आलू, प्याज आदि की फसलों के साथ तो अक्सर ऐसा होता है। इसकी बड़ी वजह उत्पादन और खपत का संतुलन न होना है।

आपूर्ति और माँग का असंतुलन इस प्रकार की पीड़ादायक स्थितियाँ पैदा करता है, जब बच्चे की तरह पाल-पोसकर तैयार की गई फसल किसान को खेत में ही जलानी, गलानी या फेंकनी पड़ती है। किसान के लिए ख़ासकर छोटे किसान के लिए उत्पादन और खपत, आपूर्ति और माँग का आकलन और अनुमान मुश्किल काम है। पेशेवर लोगों के आगे आने से ऐसा करना संभव हो सकेगा।

कृषक (सशक्तिकरण और सरंक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं हेतु अनुबंध विधेयक इसी चिंता से प्रेरित है। इसके माध्यम से किसान बाज़ार के गुणा-गणित से पैदा होने वाली असुरक्षा और अस्थिरता से मुक्ति पा सकेगा। फसल विशेष के ज्यादा उत्पादन की स्थिति में भी अपनी उपज को नगण्य मूल्य पर बेचने या फेंकने की विवशता से वह बच सकेगा।

यह विधेयक किसान को बाजार के उतार-चढ़ाव की असुरक्षा के प्रति कवच प्रदान करेगा। इस विधेयक में प्रावधान है कि व्यापारी, निर्यातक अथवा खाद्य-प्रसंस्करणकर्ता फसल की बुआई के समय ही फसल का मूल्य-निर्धारण करके किसान के साथ अनुबंध कर सकेगा।

‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ कृषि क्षेत्र की ओर युवा उद्यमियों और निजी निवेश को भी आकर्षित करेगी। अनुबंध के समय किसान को जुताई, बुआई, सिंचाई, मढ़ाई, नई तकनीक और उन्नत बीज आदि जरूरतों के लिए अग्रिम राशि भी मिल सकेगी।

इससे न सिर्फ वह आढ़तियों, साहूकारों आदि से मोटी सूद पर कर्ज लेने से बच सकेगा बल्कि बाज़ार पर उसकी प्रत्यक्ष निर्भरता भी कम हो जाएगी। हालाँकि, इस तरह का अनुबंध न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर न करने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए। ऐसा प्रावधान करके ही किसान के हितों का समुचित संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा और किसान ‘मत्स्य-न्याय’ का शिकार नहीं होगा।  

इन विधेयकों को किसान-विरोधी बताने वाले लोग सबसे बड़े किसान विरोधी और बिचौलियों के हमदर्द हैं। वे किसानों के जीवन में खुशहाली और सम्पदा लाने वाले इन विधेयकों को किसानों के लिए ‘आपदा’ बता रहे हैं। उनका दावा है कि इससे पूरा कृषि उद्योग निजीकरण का शिकार हो जाएगा। विपक्ष के ये दावे भावनात्मक और भ्रमात्मक हैं, और सत्य से कोसों दूर हैं।

उल्लेखनीय है कि किसानों और कृषि क्षेत्र की चिंताजनक दशा को सुधारने के लिए सन् 2006 में स्वामीनाथन समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट में भी ऐसे प्रावधानों का उल्लेख है। उस समय और उसके बाद सन् 2014 तक केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की गठबंधन सरकार थी। पर उसे न तो तब किसानों की सुधि आई, न स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करना उसकी प्राथमिकता थी।

किसानों की कर्जमाफी जैसी लोक-लुभावन और वोट खरीदू योजना तो उसने लागू की, पर हर साल आत्महत्या करने वाले किसानों की दशा सुधारने हेतु स्थायी बंदोबस्त करने की दिशा में कोई पहलकदमी नहीं की। परिणामस्वरूप, किसान और कृषि-व्यवसाय क्रमशः उजड़ते चले गए।

वर्तमान सरकार द्वारा पारित किए गए तीनों विधेयक किसानों की दशा सुधारने की दिशा में उठाए गए दूरगामी और सुचिंतित कदम हैं। गौरतलब यह भी है कि कॉन्ग्रेस के चुनावी घोषणा-पत्र में भी इस प्रकार के विधेयक बनाने की बात की गई थी।

सन् 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने भारतीय अर्थ-व्यवस्था का उदारीकरण किया था। उसका लाभ समाज के अधिकांश तबकों को न्यूनाधिक हुआ था और हो रहा है। ये तीन विधेयक किसान और कृषि-व्यवस्था की पहुँच उदारीकृत और मुक्त अर्थव्यवस्था तक सुनिश्चित करके उसे भी उसके फल चखने का अवसर प्रदान करेंगे।

हालाँकि, किसी भी कानून का घोषित उद्देश्य कितना भी पवित्र और लोकमंगलकारी क्यों न हो, उसका वास्तविक परीक्षण उसके जमीनी कार्यान्वयन के समय ही होता है।

वर्षों से पढ़ा और सुना है कि भारत के किसान और कृषि-व्यवस्था की बदहाली की सबसे बड़ी वजह बिचौलिए हैं। वे किसान की उपज का सही और समुचित मूल्य उस तक नहीं पहुँचने देते। कृषि उपज के वास्तविक मूल्य का बड़ा हिस्सा वे हड़प जाते हैं। इसलिए समय-समय पर इन बिचौलियों को रास्ते से हटाकर किसान को बाज़ार या उपभोक्ता से जोड़ने की माँग उठती रही है।

इन विधेयकों के माध्यम से कृषि-व्यवस्था की सबसे आधारभूत किन्तु सबसे कमजोर कड़ी किसान को मजबूत बनाने और उसकी खून-पसीने की कमाई बिचौलियों के जबड़े से निकाल कर उसकी मुट्ठी तक पहुँचाने की चिंता की गई है। अब तक बनिया/व्यापारियों की पार्टी मानी जाने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा किसानों के हित में उठाया गया यह कदम निश्चय ही साहसिक और सराहनीय है।

ड्रग्स मामले में श्रद्धा कपूर पर भी NCB की नजर, सारा अली के साथ इसी हफ्ते भेज सकती है समन

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ड्रग्स एंगल की जाँच कर रही है। एनसीबी अब अभिनेत्री सारा अली खान और श्रद्धा कपूर को समन भेजने की तैयारी कर रही है। दोनों सुशांत के साथ फिल्में कर चुकी हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सारा और श्रद्धा को एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत इसी हफ्ते समन भेजा जाएगा। इनके साथ सिमोन खंबाटा और रकुलप्रीत का नाम भी आ रहा है। एनसीबी ने श्रुति मोदी और जया शाह को आज नोटिस भेज दिया है।

इससे पहले बोटमैन जगदीश दास ने एनसीबी को बताया था कि सुशांत अपने लोनावला फार्म हाउस में आकर पार्टी किया करते थे। उनका दावा था कि एक्टर के लिए वह पार्टी डेस्टिनेशन था। उनकी टीम और बॉलीवुड के दोस्त रिया चक्रवर्ती, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर और ड्रग तस्कर जैद विलात्रा भी वहाँ उनके साथ आते थे। बोटमैन का कहना था कि गांजा और शराब ऐसी पार्टियों में दिखना बेहद आम बात थी।

इससे पहले रिया चक्रवर्ती ने भी कथित तौर पर पूछताछ में स्वीकार किया था कि उन्होंने सारा अली खान, श्रद्धा कपूर और रकुलप्रीत सिंह और सुशांत के साथ लोनावला में पार्टी की थी। फिलहाल, रिया चक्रवर्ती भायखला जेल में बंद हैं। इस मामले में एनसीबी रिया और उनके भाई शौविक समेत करीब 10 लोगों को अब तक गिरफ्तार कर चुकी है।

सुशांत मामले की सीबीआई भी जाँच कर रही है। इसके अलावा ईडी भी मनी लॉन्ड्रिंग एंगल की जाँच कर रही है। अभी तक एनसीबी इस केस में मुंबई और गोवा समेत कई जगहों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई कर कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है।

एनसीबी ने गिरफ्तार करने के बाद रिया चक्रवर्ती से 3 दिनों तक पूछताछ की थी। इसमें उन्होंने कथित तौर पर ड्रग्स की खरीद के सिलसिले में सुशांत की सह-कलाकार सारा अली खान और श्रद्धा कपूर का नाम लिया था। उन्होंने ड्रग्स खरीदने और उसका सेवन करने की भी बात कबूली थी।

बता दें कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को अपने मुंबई स्थित घर में मृत पाए गए थे। आत्महत्या की जाँच शुरू होने के बाद अभिनेता के परिवार ने सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती पर पैसे के लिए उनका शोषण करने का आरोप लगाया था। परिवार द्वारा रिया पर ड्रग्स देने का भी आरोप लगाया गया था। इसके बाद रिया की चैट में कई ऐसे सबूत सामने आए थे, जिससे ड्रग्स मामले का खुलासा हुआ और कई नाम सामने आए।

क्या कंगना रनौत ने प्रदर्शनकारी किसानों को आतंकी कहा? TOI की खबर में किए गए दावे का सच

संसद में पारित हुए कृषि बिलों को लेकर कॉन्ग्रेस सहित उसके पूरे इकोसिस्टम द्वारा भ्रम फैलाने की कोशिश जारी है। किसानों को लगातार भड़काया जा रहा है। सोशल मीडिया के जरिए भी अफवाहों का बाजार गर्म है। इसी बीच कंगना रनौत ने इस बिल को लेकर भ्रम फैला रहे लोगों का विरोध किया, जिसके बाद ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने दावा किया कि उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों को ‘आतंकी’ कहा है।

देश के सबसे बड़े न्यूज़ नेटवर्क में से एक TOI ने कंगना रनौत के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। उसने लिखा कि अभिनेत्री कंगना रनौत ने राज्यसभा में पास हुए एग्री-मार्केटिंग बिल्स को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘आतंकी’ कहा। TOI ने कंगना रनौत के उस ट्वीट का जिक्र करते हुए ये ख़बर प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी की ट्वीट को रिप्लाई दिया था।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया कि वो पहले भी कह चुके हैं और अब भी कह रहे हैं कि किसानों के लिए ‘मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP)’ की व्यवस्था जारी रहेगी और सरकारी खरीद होती रहेगी। उन्होंने लिखा, “हम यहाँ अपने किसानों की सेवा के लिए हैं। हम अन्नदाताओं की सहायता के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे।”

कंगना रनौत ने इस ट्वीट को कोट करते हुए लिखा कि अगर कोई सो रहा हो उसे जगाया जा सकता है। जिसे ग़लतफ़हमी हो उसे समझाया जा सकता है। मगर जो सोने की एक्टिंग करे, ना समझने की एक्टिंग करे उसे आपके समझाने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा? उन्होंने लिखा, “ये वही आतंकी हैं, CAA से एक भी इंसान की सिटीजनशिप नहीं गई मगर इन्होंने ख़ून की नदियाँ बहा दीं।” TOI ने इस बयान को गलत संदर्भ में पेश किया।

यहाँ कंगना रनौत ने सीएए के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के दौरान लोगों की जान लेने वाले और दंगा करने वालों को ‘आतंकी’ कहा है। न तो उनकी ट्वीट में कहीं किसानों की चर्चा है और यहाँ तक कि प्रदर्शनकारियों को लेकर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा है। कंगना रनौत ने सीएए विरोधी दंगाइयों के लिए ‘आतंकी’ शब्द का प्रयोग किया है। स्पष्ट है कि जिन्होंने ‘खून की नदियाँ’ बहाईं, कंगना ने इस ट्वीट में उनकी आलोचना की है, किसानों की नहीं।

‘कंगना रनौत ने किसानों को आतंकी कहा’: कितना सही है TOI का ये दावा?

बावजूद इसके TOI ने अंग्रेजी में इसे भ्रामक तरीके से ऐसे प्रकाशित किया और साथ ही ये दावा कर दिया कि कंगना रनौत ने किसानों के लिए ‘आतंकी’ शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट के जवाब में बस पूछा भर था कि नासमझ होने की एक्टिंग करने वालों को कैसे समझाया जा सकता है? इसके बाद उन्होंने सीएए विरोधी दंगों में गई जानों को याद करते हुए दंगाइयों के लिए इस शब्द का प्रयोग किया।

ज्ञात हो कि विपक्षी सांसदों के जोरदार हंगामे के बीच राज्‍यसभा ने विवार (सितंबर 20, 2020) को कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 को ध्वनिमत से पास कर दिया।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि सुधार संबंधी विधेयकों को ‘ऐतिहासिक’ करार दिया है।