Home Blog Page 4501

2 हिंदू बहनों का अपहरण और धर्मांतरण: जब पिता ने खुद पर पेट्रोल डाल कर माँगा था इंसाफ, Video फिर से हुई वायरल

पाकिस्तान के सिंध के घोटकी इलाके में पिछले साल दो हिंदू बहनों के अपहरण की खबर मीडिया में सामने आई थी। बताया गया था कि इन दोनों बहनों का धर्म परिवर्तन करवा कर इनका निकाह उम्र में बड़े दूसरे समुदाय के युवकों से करवा दिया गया और अर्जी में लिखवाया गया कि इन्होंने खुद इस्लाम से प्रभावित होकर अपना धर्म बदला है। मामला जब इस्लामाबाद हाईकोर्ट में पहुँचा तो अदालत ने भी लड़कियों को उनके शौहरों के साथ रहने का निर्देश दिया।

अब इस मामले के करीब डेढ़ साल बीत जाने के बाद वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने इसे दोबारा उठाया है। उन्होंने उस मजलूम पिता की वीडियो साझा की है, जिसे पिछले साल प्रशासन से उसकी बेटियों के लिए इंसाफ की जगह सिर्फ़ निराशा हाथ लगी। वीडियो में वह पुलिस थाने के बाहर अपने लिए इंसाफ माँग रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, यह वीडियो पिछले साल की है।

वीडियो को लेकर ट्विटर अकॉउंट से दावा किया जा रहा है कि अपने साथ हुई नाइंसाफी से नाराज रीना-रवीना के पिता ने पुलिस स्टेशन के बाहर खुद पर पेट्रोल डालने की कोशिश की। मगर, प्रशासन ने उनकी सुनवाई करने की बजाय लड़कियों को उनके नए पतियों के साथ रहने के निर्देश दे दिए।

गौरतलब है कि 20 मार्च को, होली की पूर्व संध्या पर दो नाबालिग हिंदू लड़कियों, 13 वर्षीय रवीना और 15 वर्षीय रीना का अपहरण करके उन्हें पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अपने उम्र से बहुत बड़े पुरुषों से जबरन निकाह करने के लिए मजबूर किया गया था। इसके बाद खबर आई थी कि मेघवार समुदाय की एक अन्य हिंदू नाबालिग लड़की को भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बाडिन ज़िले के टांडो बाघो से कथित तौर पर अगवा कर लिया गया था।

इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग से रिपोर्ट माँगी थी। पाकिस्तान के सिंध में होली की शाम हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लेकर गंभीर सुषमा स्वराज ने ट्वीट करते हुए भारतीय उच्चायोग को टैग किया था और इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। इसके बाद इस मामले में 7 लोगों की गिरफ़्तारी भी हुई थी।

हालाँकि, बाद में पता चला कि इस्लामाबाद हाईकोर्ट में दोनों बहनों को अपने मुस्लिम पतियों सफ़दर अली और बरक़त अली के साथ रहने का आदेश दिया है। इस्लामाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अथर मिनल्लाह की अगुवाई वाली एक उच्च न्यायालय की पीठ ने पाँच सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट पेश करने के बाद यह निर्णय लिया था, जिसमें यह जाँच करने का काम सौंपा गया था कि क्या हिंदू बहनों का इस्लाम में धर्मांतरण मजबूर किया गया था।

कंगना के रुख से उद्धव सरकार की नींद उड़ी, आवाज दबाने के लिए उसके खिलाफ की गई कार्रवाई: अखाड़ा परिषद

महाराष्ट्र सरकार के साथ चल रही रस्साकशी के बीच बॉलीवुड की ‘क्वीन’ कंगना रनौत को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने अपना समर्थन दिया है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने ठाकरे सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने सच की आवाज को दबाने के लिए कंगना के कार्यालय पर बुलडोजर चलवाया है और बदले की कार्रवाई की है।

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने अपने जारी बयान में कहा कि कंगना रनौत बहादुर और हिम्मत वाली बेटी हैं, जिन्होंने खुलकर बॉलीवुड के माफियाओं और ड्रग माफियाओं के रैकेट का भंडाफोड़ किया है। कंगना ने निडर होकर बॉलीवुड में एक विशेष समुदाय के वर्चस्व के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई है। इससे न केवल बॉलीवुड के माफिया डर गए हैं, बल्कि सरकार भी घबरा गई है। इसी कारण बदले की भावना से उनके ऊपर कार्रवाई की गई है।

परिषद ने कंगना के कार्यालय पर हुई कार्यवाई पर अपने विरोध जताया। उन्होंने आगे कहा कि हालाँकि महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने कंगना को बड़ी राहत देते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाई है, लेकिन सुशांत सिंह मर्डर केस में जिस बहादुरी से कंगना रनौत ने ड्रग और बॉलीवुड माफियाओं का सामना किया, उससे लोगों में बौखलाहट है। बता दें कि कंगना की याचिका पर हाई कोर्ट ने आज की सुनवाई टाल दी और अब अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने कहा है कि महाराष्ट्र में कानून व्यवस्था की हालत बेहद खराब है। पालघर में 2 साधुओं की हुई हत्या के मामले में भी महाराष्ट्र सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा है क्या अखाड़ा परिषद ने पालघर मामले में भी सीबीआई जाँच की माँग की है।

महंत नरेंद्र गिरि ने कहा कि कंगना की इस लड़ाई में साधु-संत और पूरा देश उनके साथ है। साथ ही उन्होंने हिमाचल प्रदेश सरकार को कंगना रनौत को सुरक्षा देने के लिए धन्यवाद दिया है। बता दें कि बुधवार को बीएमसी ने कंगना रनौत के दफ्तर के कुछ हिस्सों को अवैध निर्माण कहते हुए तोड़ दिया था।

सुदर्शन न्यूज के ‘बिंदास बोल’ को मिले ब्रॉडकास्ट करने के निर्देश, जामिया के छात्रों की याचिका पर दिल्ली HC ने लगाई थी रोक

सुदर्शन न्यूज के प्रोग्राम ‘बिंदास बोल’ को आज (सितंबर 10, 2020) ब्रॉडक्रॉस्ट करने के निर्देश सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से दे दिए गए। मंत्रालय ने मीडिया संस्थान को यह प्रोग्राम ब्रॉडकास्ट करने से पहले सुनिश्चित करने को कहा कि उसमें किसी संहिता का उल्लंघन न हो।

इससे पहले 28 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट ने सुदर्शन न्यूज चैनल के प्रोग्राम को प्रसारित करने पर रोक लगाई थी। कोर्ट ने यह फैसला जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों की याचिका पर लिया था। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि शो में खुलेआम जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों और मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ हेट स्पीच दी जा रही है।

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद आया था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रोग्राम पर रोक लगाने से मना किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विचारों के प्रकाशन या प्रसारण के सम्बन्ध में रोक लगाने वाला निर्णय देने से पहले कोर्ट को सतर्कता बरतनी चाहिए। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और ‘सुदर्शन न्यूज़’ को नोटिस भी भेजा था। 

गौरतलब है कि पिछले दिनों सुदर्शन न्यूज के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके ने ‘ब्यूरोक्रेसी जिहाद’ के खिलाफ अभियान शुरू किया था, जिसमें कई सबूतों के आधार पर सच दिखाने का दावा किया गया था। इस प्रोग्राम के बारे में बताने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी पोस्ट की थी। जिसके बाद यह पूरा मामला गर्माया।

उन्होंने इस वीडियो में बताया था कि उनका चैनल इस बात का विश्लेषण कर रहा है कि कि दूसरों की तुलना में प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं में विभिन्न पदों पर चयनित संप्रदाय विशेष के लोगों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है। उन्होंने अपने वीडियो में चेतावनी दी थी कि, सोचिए, जामिया के जिहादी अगर आपके जिलाधिकारी और हर मंत्रालय में सचिव होंगे तो क्या होगा?

आगरा में लापता बच्चे का शव भूसे में मिला: हत्यारोपित छोटू, अइया, वाहिद गिरफ्तार, थाना प्रभारी सलीम खान लाइन हाजिर

यूपी के आगरा जिले के एक गाँव में गुरुवार (10 सितंबर, 2020) सुबह बाड़े में रखे भूसे के ढेर से एक नाबालिक बच्चे का शव मिलने से इलाके में हड़कंप मच गया। बच्चा मंगलवार से लापता था। परिजनों ने समुदाय विशेष के छोटू, अइया और वाहिद पर बेटे को गायब करने और बेरहमी से हत्या करने का आरोप लगाया है।

घटना एत्मादपुर कस्बा के गाँव धोर्रा की है। रघुनाथ सिंह पुत्र मोजीराम ने थाने में शिकायत दी थी कि मंगलवार दोपहर को उनका 9 वर्षीय बेटा उपदेश उर्फ भुल्ला गाँव में स्थित एक दुकान से कुछ सामान लेने गया था। जिसके बाद वह वापस नहीं लौटा। परिजनों ने बच्चे की काफी खोजबीन की, लेकिन उसका पता नहीं चला।

परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू की, लेकिन गुरुवार सुबह गाँव में एक व्यक्ति के भूसे की कोठरी में उसका शव मिलने की सूचना दी तो परिवार में कोहराम मच गया।

परिजनों ने पुलिस शिकायत में गाँव के ही समुदाय विशेष के दो युवकों पर अपहरण और हत्या की आशंका जताई थी। ग्रामीणों और परिजनों ने थाना प्रभारी की कार्यशैली को लेकर घटना के बाद हंगामा भी किया। परिजनों का कहना था कि थाना प्रभारी सलीम खान ने मामला समुदाय विशेष से जुड़े होने के कारण हत्यारोपित का पक्ष लिया और कोई कार्रवाई नहीं की। जिस पर कार्रवाई करते हुए एसएसपी बबलू कुमार ने उन्हें लाइन हाजिर कर दिया। साथ ही छोटू, अइया और वाहिद को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है और मामले की जाँच पड़ताल में जुट गई है।

विधायक की अगवाई पर दर्ज हुआ मामला

परिजनों ने बताया कि पुलिस ने इस मामले में उनकी बातों को अनसुना कर दिया था। क्योंकि आरोपित और पुलिस दोनों एक ही समुदाय से थे। जिसके बाद परिजनों ने क्षेत्रीय बीजेपी विधायक रामप्रताप सिंह चौहान को घटना की जानकारी दी। बुधवार को विधायक के हस्तक्षेप के बाद किडनैपिंग का मुकदमा दर्ज हो पाया। इसके बाद गुरुवार सुबह रघुनाथ की पत्नी की नजर घर के पास रखे पड़ोसी के भूसे के ढेर पर गई। उन्हें लगा जैसे अंदर कुछ छिपाया गया है।

जब भूसा हटाया तो अंदर बच्चे का शव दिखा। अपने बच्चे का शव देखते ही पूरे घर में चीत्कार मच गई। माता-पिता का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। घटना की सूचना पाकर पुलिस के भी होश उड़ गए। गाँव वाले लापरवाही का आरोप लगाते हुए पुलिस के खिलाफ ही लामबंद हो गए। तनाव देख गाँव में कई थानों की फोर्स तैनात कर दी गई है।

पिता ने रोते हुए बताया कि समुदाय विशेष के लोगों ने ही उसके बच्चें को घर मे छिपा रखा था। आरोपित छोटू ने उनसे 2 लाख की फिरौती भी माँगी थी। अगर थाना प्रभारी सलीम खान ने अपना समुदाय न देखते हुए मामले में जाँच पड़ताल की होती तो आज शायद उनका बच्चा जिंदा होता। परिवार वालों ने बताया इसी तरह 8 साल पहले उपदेश का चचेरा भाई भी लापता हुआ था और उसका भी आज तक कोई सुराग नहीं मिला है।

शौविक चक्रवर्ती ने कहा- बहन के कहने पर ख़रीदे थे ड्रग्स, आमने-सामने की पूछताछ में रो पड़ी रिया चक्रवर्ती

सुशांत सिंह राजपूत केस में ड्रग एंगल की जाँच कर रही नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को एक बड़ी सफलता मिली है। खबर है कि रिया चक्रवर्ती के भाई शौविक चक्रवर्ती ने कथिततौर पर स्वीकार कर लिया है कि उसने अपनी बहन के कहने पर ड्रग्स की खरीद की।

टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीबी ने NDPS एक्ट की धार 67 के तहत शौविक का बयान दर्ज किया। इसमें कथिततौर पर शौविक ने कहा कि उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत के लिए ड्रग लिए थे और उनकी बहन रिया चक्रवर्ती ने उन्हें उसके लिए पैसे दिए।

रिपोर्ट के अनुसार, शौविक ने बताया कि वह सुशांत ही थे जिन्होंने उनसे बड्स और मारिजुआना की माँग की। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन से पहले जैद विलात्रा के संपर्क में होने के साथ उन्होंने बासित परिहार से ड्रग्स हासिल किए थे। बाद में सैमुअल मिरांडा ने मुंबई के बांद्रा स्थित रेस्ट्रां के बाहर से बड का बैग लिया।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों शौविक और सैमुअल की गिरफ्तारी के बाद रिया चक्रवर्ती को भी एनसीबी ने गिरफ्तार किया था। एक्ट्रेस को इसके बाद 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। साथ ही उनकी जमानत याचिका भी कोर्ट द्वारा खारिज कर दी गई।

यहाँ बता दें कि इस केस में इन सभी खुलासों से पहले प्रवर्तन निदेशालय ने रिया चक्रवर्ती के फोन से कुछ पुरानी चैट्स को खंगाला था जिनसे इस ड्रग एंगल का खुलासा हुआ और जाँच में एनसीबी की एंट्री हुई। अपनी ताबड़तोड़ पड़ताल के बीच एनसीबी ने कई महत्तवपूर्ण खुलासे किए और आरोपितों की गिरफ्तारी भी हुई।

एनसीबी के अनुसार, पूछताछ के दौरान रिया ने भाई शोविक और सुशांत के साथ ड्रग्‍स लेने की बात स्‍वीकार की है। इसके अलावा मीडिया खबरों में सूत्रों का हवाला देकर बताया जा रहा है कि जब रिया और उसके भाई शौविक को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ की गई तो रिया रोने लगी। रिया के घर से जो इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स मिले उनसे भी ड्रग्स से जुड़े कुछ सबूत मिले हैं।

एनसीबी का कहना है कि पूछताछ के दौरान रिया ने इस बात को तो माना था कि कुछ मौकों पर उन्होंने भी ड्रग्स लिए, लेकिन साथ ही किसी ड्रग पैडलर के सीधे संपर्क में होने की बात से रिया ने इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि लॉकडाउन के बाद जब ड्रग्स मिलना बंद हो गया तब उन्होंने शौविक से कहकर ड्रग्‍स मँगवाया था। रिया ने बताया कि सुशांत बहुत पहले से ड्रग्स लेता आ रहा था और उन्होंने सुशांत के कहने पर उसी के लिए ड्रग्स मँगाया था।

BMC का दोहरा चरित्र: अवैध निर्माण के लिए कंगना को 24 घंटे और मनीष मल्होत्रा को दिया गया 7 दिन का समय

एक ही प्रकार के मामले में BMC का दोहरा चरित्र सामने आया है। बुधवार को बीएमसी ने कंगना रनौत के पाली स्थित ऑफिस को अवैध निर्माण का हवाला देते हुए ध्वस्त कर दिया। वहीं बीएमसी ने अब फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ​​को उनकी इमारत में अवैध बदलाव के लिए नोटिस जारी किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीएमसी ने फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा को अपने रडार पर लेते हुए आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने रेजिडेंशियल स्पेस को अवैध तरीके से कमर्शियल प्रॉपर्टी में बदलने के लिए अपेक्षित अनुमति नहीं ली थी।

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के दफ्तर के ठीक बगल में मुंबई के बांद्रा में पाली हिल पर नरगिस दत्त रोड पर स्थित मनीष के बंगले पर बीएमसी ने अवैध निर्माण को लेकर एक नोटिस जारी किया है। बीएमसी ने परिसर में एक स्टॉप-वर्क नोटिस भी चिपकाया है। साथ ही अवैध निर्माण का स्पष्टीकरण देने के लिए 7 दिन का समय दिया है।

7 सितंबर को जारी अपने नोटिस में, बीएमसी ने आरोप लगाया कि ग्राउंड फ्लोर पर केबिन बनाया गया जो अवैध तरीके से बनाया गया। दफ्तर में अनधिकृत परिवर्तन (unauthorised alterations) और निर्माण को भी इंगित किया गया है। फैशन डिजाइनर पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अधिकृत अनुमति के बिना यह बदलाव किया है।

मनीष को नोटिस MMC एक्ट की धारा 342 और 345 के तहत भेजा गया है। नोटिस के मुताबिक इस मामले में मल्होत्रा को संतोषजनक जवाब देने के लिए बीएमसी द्वारा 7 दिन का समय दिया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि मल्होत्रा के दफ्तर से ठीक बगल कंगना रनौत के दफ्तर पर अवैध निर्माण के आरोपों का जवाब देने के लिए बीएमसी अधिकारियों ने मात्र 24 घंटे का समय दिया था। जिस पर तुरंत कार्रवाई करते हुए बीएमसी ने उसे ध्वस्त कर दिया। बीएमसी ने MMC अधिनियम की धारा 354 (ए) के तहत रानौत को एक नोटिस जारी किया था, जो बीएमसी को 24 घंटे के भीतर कार्रवाई करने की अनुमति देता है।

गौरतलब है कि बीएमसी अधिकारियों ने मंगलवार को कंगना के कार्यालय (मणिकर्णिका फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड) का निरीक्षण किया था। जिसके बाद उन्होंने दफ्तर में स्टॉप वर्क नोटिस ’चिपकाया था। अभिनेत्री को 24 घंटे के भीतर इस मामले में जवाब देने के लिए कहा गया था।

हालाँकि, अगले दिन ही कंगना के दफ्तर पर बीएमसी अधिकारियों ने पहुँचकर उसकी संपत्ति के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया। उस वक्त बॉलीवुड क्वीन मनाली से मुंबई के लिए निकल चुकी थी और रास्ते में थी। बीएमसी अधिकारियों ने दावा किया था कि बीएमसी की अनुमति के बिना परिसर में कई बदलाव किए गए थे। बाद में बीएमसी की इस कार्रवाई पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी।

फ़िल्मी दुनिया के लोग जानते थे संजय दत्त 1993 मुंबई बम धमाकों के आरोपित हैं फिर भी समर्थन में उतरे थे स्टार कलाकार

बॉलीवुड में ऐसा अक्सर हुआ है कि जब तमाम कलाकार और अपने साथी कलाकार के समर्थन में उतरते हैं। जिस दौर में सोशल मीडिया नहीं था उस दौर में भी ऐसा हुआ है और दिग्गज कलाकारों द्वारा बड़े पैमाने पर हुआ है। इस मामले की सबसे बेहतर मिसाल है जब साल 1993 में मुंबई बम धमाकों के मामले में संजय दत्त को टाडा की अदालत ने दोषी करार दिया था। बॉलीवुड के तमाम दिग्गज कलाकार शाहरुख खान, सलमान खान, अक्षय कुमार, अनुपम खेर, अजय देवगन, अमरीश पुरी, जैकी श्रॉफ संजय दत्त के समर्थन में आए थे। बीते दिन कंगना रनौत मुंबई स्थित दफ्तर पर बीएमसी ने बुलडोजर चलाया। दफ्तर का एक हिस्सा तोड़ दिया लेकिन शायद ही किसी कलाकार ने कंगना का समर्थन किया। 

लगभग 26 साल पहले बॉलीवुड का अमूमन हर दिग्गज कलाकार संजय दत्त के समर्थन में पोस्टर और तख्तियां लेकर निकला था। दरअसल, 12 मार्च साल 1993 के दौरान मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इस मामले में बॉलीवुड से जुड़े कई लोगों का नाम सामने आया। इसमें सबसे ज़्यादा चर्चित रहा संजय दत्त का नाम जिन पर अबू सलेम और रियाज़ सिद्दीकी से अवैध हथियार लेकर रखने और नष्ट करने का दोषी पाया गया था। अबू सलेम मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का आरोपित भी था। वहीं टाडा अदालत में पेश किए गए सबूतों के मुताबिक़ इन हथियारों का इस्तेमाल मुंबई बम धमाकों में किया जाना था।  

हालाँकि, सुनवाई के दौरान अदालत में संजय दत्त ने कहा कि वह अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे इसलिए उन्होंने यह हथियार अपने पास रखे थे। संजय दत्त ने कहा वह घबरा गए थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें क्या करना चाहिए। कई लोगों के दबाव में आकर उन्होंने यह कदम उठाया था। इसके बाद एक प्रेस वार्ता के दौरान भी संजय दत्त ने इस मुद्दे पर भावुक होकर कई बातें कही थीं। उन्होंने कहा मैं माफ़ी के लिए निवेदन नहीं करूँगा। मैं आत्मसमर्पण करूँगा और मैं सज़ा भुगतने के लिए तैयार हूँ। 

संजय दत्त के समर्थन में उतरे बॉलीवुड के तमाम कलाकार

आखिरकार मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में शामिल होने के आरोप में 4 जुलाई साल 1994 को उन्हें न्यायिक हिरासत में लिया गया था। संजय दत्त को आतंकवाद और विघटनकारी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (TADA Act) के तहत आरोपित पाया गया था। न्यायालय की तरफ से यह कार्रवाई होते ही पूरा बॉलीवुड सक्रिय हो गया और संजय दत्त के पक्ष में उतर आया। शाम का वक्त था, शाहरुख खान एक टीवी कमर्शियल की शूटिंग कर रहे थे। वह सब कुछ छोड़ कर चले आए, शाहरुख की तरह निर्देशक राम गोपाल वर्मा, जैकी श्रॉफ और गुलशन ग्रोवर भी अपना काम छोड़ कर समर्थन करने के लिए आगे आए। 

इसके अगले दिन आशा पारेख के घर पर बैठक हुई जिसमें लगभग हर दिग्गज कलाकार शामिल हुआ था। रातों-रात तमाम शूटिंग बंद हो गई और सारे अहम काम रोक दिए गए। सभी कलाकार मुंबई के सबर्बन होटल पर इकट्ठा हुए और और वहाँ से ठाणे जेल की और गए जहाँ संजय दत्त को रखा गया था। इसके बाद सभी कलाकारों ने जेलर को एक पत्र लिखा। यह पहला ऐसा मौक़ा था जब इतने कलाकार किसी के समर्थन में उतरे थे, यह उस दौर की बात है जब सोशल मीडिया नहीं हुआ करता था। इसके बावजूद इस पूरे घटना की तमाम तस्वीरें मौजूद हैं जिसमें कई कलाकार साफ़ तौर पर देखे जा सकते हैं। 

संजय दत्त के समर्थन में खड़े बॉलीवुड के दिग्गज कलाकार
साभार – desimartini.com

इसमें दिलीप कुमार से लेकर यश चोपड़ा तक और सायरा बानो से लेकर अमरीश पुरी तक मौजूद थे। इसके अलावा शाहरुख खान, सलमान खान, सैफ अली खान, अनुपम खेर, महेश भट्ट, करिश्मा कपूर, अजय देवगन, अक्षय कुमार, रवीना टंडन, जैकी श्रॉफ और उस ज़माने की मशहूर अदाकारा आशा पारेख भी मौजूद थीं। यह सभी कलाकार संजय दत्त के समर्थन में हाथ में तख्तियां और पोस्टर लेकर खड़े थे। 

फिल्म निर्देशक मुकुल आनंद ने “Sanju, we’re with u” के लगभग हज़ार पोस्टर छपवाए थे वहीं महेश भट्ट ने तो यहाँ तक कह दिया था, “जो क़ानून दाउद इब्राहिम पर लागू होता है वह संजय दत्त पर कैसे लागू हो सकता है?” इसके अलावा संजय दत्त के समर्थन में पोस्टर छपवाने के लिए रातों-रात 7 लाख रूपए इकट्ठा कर लिए गए थे। संजय दत्त की छवि को बेहतर दिखाने के लिए एक अच्छे भले अभियान की योजना बन गई थी। जिसमें बॉलीवुड का हर दिग्गज अभिनेता और कलाकार शामिल था।          

इसके अलावा संजय दत्त के पिता सुनील दत्त ने इस संबंध में बहुत प्रयास किए थे। सुनील दत्त कॉन्ग्रेस पार्टी से सांसद थे, इसके बावजूद उन्होंने इस मामले में 1995 के दौरान शिवसेना मुखिया बाल ठाकरे से मदद माँगी थी। उस दौरान केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार थी लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की गठबंधन सरकार थी। उस दौर में सुनील दत्त ने अपने बेटे की रिहाई के लिए बाल ठाकरे से मदद की माँग की थी। एक समाचार समूह के साक्षात्कार में बात करते हुए सुनील दत्त ने इस बात का खुलासा भी किया था। 

उन्होंने कहा था, “जिस समय महाराष्ट्र में शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी थी उस दौरान बाल ठाकरे अक्सर दावा करते थे कि उनके पास सरकार की चाभी थी। ऐसे में यह बेहद स्वाभाविक है कि कोई भी उनके पास मदद के लिए जाता।” इसके बाद बाल ठाकरे ने मामले में दखल दिया जिसके बाद 3 साल जेल में बिताने के बाद 1995 में संजय दत्त जेल से बाहर आए। हालाँकि, संजय दत्त जमानत पर बाहर आए थे और और इसके दो महीने बाद दिसंबर 1995 में उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया था।   

अंत में साल 1997 के दौरान एक लंबी क़ानूनी जद्दोजहद के बाद उन्हें जमानत मिली थी। लेकिन दो साल का वक्त संजय दत्त के लिए बहुत लंबा था। इस दौरान उनके पिता सुनील दत्त ने अपने राजनीतिक जीवन में बहुत कुछ खो दिया था। इतना ही नहीं संजय दत्त ने अपने फ़िल्मी करियर में भी बहुत कुछ खोया दिया था। यह भी देखा गया था कि जेल से छूटते ही संजय दत्त सबसे पहले बाल ठाकरे से मिलने गए और उनका आशीर्वाद लिया। इसके अलावा नवंबर 2012 में जब बाल ठाकरे का स्वास्थ्य अच्छी स्थिति में नहीं था तब संजय दत्त ने कहा था, “बाल ठाकरे मेरे लिए पिता जैसे हैं, वह मेरे लिए ऐसे वक्त में खड़े थे जब कोई मेरा साथ देने नहीं आया।” 

बाल ठाकरे और संजय दत्त

अंततः 31 जुलाई साल 2007 को टाडा अदालत ने मुंबई बम धमाकों के मामले में संजय दत्त को 6 साल की सज़ा सुनाई थी। इस आदेश के बाद संजय दत्त ने अदालत में कहा कि उन्होंने हथियार अपने सुरक्षा के लिए रखे थे फिर भी अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया था। साल 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें इस मामले में अंतरिम जमानत दी थी। लेकिन 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने टाडा अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए संजय दत्त को 5 साल की सज़ा सुनाई थी। 

1993 के दौरान मुंबई में हुए इन सिलसिलेवार बम धमाकों में 257 निर्दोष लोगों ने अपनी जान गँवाई थी। संजय दत्त हमेशा विवादों से घिरे हुए थे और इतने गंभीर मामलों में दोषी पाए गए थे। फिर भी बॉलीवुड के आधे से ज्यादा लोगों ने उनका समर्थन किया। हाल ही में उनकी जिंदगी पर आधारित एक फिल्म भी आई थी ‘संजू’ जिसमें उनकी छवि को बेहतर दिखाने की कोशिश हुई थी। ख़ासकर संजय दत्त के जीवन का वह हिस्सा जिस दौरान वह मुंबई बम धमाकों में दोषी पाए गए थे।   

तेजप्रताप के लिए रघुवंश ‘एक लोटा पानी’… फिर उनके इस्तीफे से लालू इतने बेचैन क्यों?

बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं हुआ है। लेकिन हर बदलते दिन के साथ राजनीति नई करवट लेती जा रही है। इसी क्रम में दिल्ली के एम्स में बिस्तर पर लेटे-लेटे ही पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से इस्तीफा दे दिया है।

सादे कागज पर लालू प्रसाद यादव को संबोधित इस्तीफे में उन्होंने लिखा है, “जननायक कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद 32 वर्षों तक आपके पीछे-पीछे खड़ा रहा। लेकिन अब नहीं। पार्टी नेता कार्यकर्ता और आमजनों ने बड़ा स्नेह दिया। मुझे क्षमा करें।” जून में उन्होंने पार्टी उपाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया था। लेकिन उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया था और लालू ने खुद तेजस्वी यादव को रॉंची तलब कर उन्हें मनाने को कहा था। इस बार भी लालू ने जेल से पत्र लिखकर रघुवंश प्रसाद से कहा है, “बैठ कर बात करेंगे। आप कहीं नहीं जा रहे हैं।”

घुवंश प्रसाद सिंह का इस्तीफा

रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबियों ने ऑपइंडिया को बताया कि अब राजद से उनका रिश्ता टूट चुका है। पार्टी में बने रहने की कोई गुंजाइश नहीं है। केंद्रीय मंत्री रहे राजद नेता जयप्रकाश नारायण यादव से जब हमने इस संबंध में सवाल किया तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

रघुवंश प्रसाद सिंह RJD में पूर्व सांसद रामा सिंह को शामिल करने के प्रयासों को लेकर नाराज चल रहे थे। बाहुबली छवि के रामा सिंह लोकसभा चुनाव में वैशाली से रघुवंश प्रसाद सिंह को हरा भी चुके हैं। इसके अलावा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे जगदानंद सिंह से भी वे नाराज चल रहे थे। जून में लालू को लिखे पत्र में उन्होंने पार्टी की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल भी उठाए थे।

बिहार में हर दल के अपने सामाजिक समीकरण हैं और चुनाव में मतदान उन्हीं समीकरणों के इर्द-गिर्द होता रहा है। ऐसे में सवाल है कि 74 साल के रघुवंश प्रसाद का जाना राजद के जमीनी समीकरणों को कितना प्रभावित करेगा?

रघुवंश प्रसाद सिंह के स्वजतीय राजपूत वोटर बिहार में 5 फीसदी के करीब हैं और पूरे राज्य में बिखरे हुए हैं। जब लालू ने ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा दिया था, उस दौर में भी राजपूत का बड़ा तबका उनके ही साथ रहा। इसकी वजह यकीनन रघुवंश प्रसाद और जगदानंद सिंह जैसे राजपूत नेता थे, जिनका सीमित क्षेत्रों में प्रभाव था। लेकिन, रघुवंश प्रसाद कभी भी बिहार के राजपूतों के एकमात्र नेता नहीं रहे।

बीजेपी के पास भी राधा मोहन सिंह और राजीव प्रताप रूडी जैसे चेहरे रहे हैं, जिनका अपने इलाके में और अपने स्वजातीय वोटरों के एक तबके पर प्रभाव है। इसके अलावा सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत को जिस तरह इस बार ‘बिहारी प्राइड’ से जोड़ा गया है, उससे भी इस वर्ग का झुकाव एनडीए की तरफ बढ़ा है।

फिर यह इस्तीफा राजद की चुनावी संभावनाओं को कैसे प्रभावित करेगा? इसका जवाब हाल ही में पटना विश्वविद्यालय के कुछ पूर्व प्राध्यापकों के बीच हुई चर्चा में छिपा है। यह चर्चा इसी विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र और प्राध्यापक, जो कभी बीजेपी के बड़े नेता हुआ करते थे तथा चंद्रशेखर से लेकर वाजपेयी कैबिनेट तक में मंत्री रहे, की पहल पर हुई थी।

असल में राजनीति में अप्रसांगिक हो चुका यह नेता एक विजन डॉक्यूमेंट तैयार कर बिहार चुनाव के जरिए खुद के लिए संभावनाओं की पड़ताल कर रहा था। इसी क्रम में हुई चर्चा के दौरान बात 1955 में बिहार में हुए छात्र आंदोलन, जो स्वतंत्र भारत का पहला छात्र आंदोलन माना जाता है, जिसमें उस समय के प्रधानमंत्री रहे जवाहर लाल नेहरू तक को दखल देना पड़ा था, से शुरू हुई। फिर हर दौर पर बात हुई। आखिर में ये निष्कर्ष निकला कि बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरणों का प्रभाव है।

एक वर्ग जो इससे अप्रभावित है, उसके लिए तमाम नाराजगी के बावजूद आज भी नीतीश कुमार ही विश्वसनीय चेहरा हैं। तेजस्वी यादव में उनकी जगह लेने की क्षमता नहीं है। सामाजिक समीकरणों को भी कमजोर करने के लिए चेहरे की जरूरत है और 15 साल बाद भी नीतीश का विकल्प नहीं है। विकल्प के बिना एनडीए की संभावनाओं को प्रभावित करना मुश्किल है। विपक्ष के पास तेजस्वी की जगह कोई ऐसा विश्वसनीय चेहरा होना चाहिए जो छवि के मामले में नीतीश कुमार पर बीस पड़े।

फिर उस नेता ने तेजस्वी से संपर्क किया। तेजस्वी ने टका सा जवाब दिया- हमको पता है कि हम हार रहे हैं, फिर भी विपक्ष का नेता तो मैं ही रहूॅंगा न।

रघुवंश प्रसाद सिंह के इस्तीफे ने विधानसभा में विपक्ष के नेता बने रहने के तेजस्वी के इस गणित को फॅंसा दिया है। तेजस्वी फिलहाल राघोपुर से विधायक हैं। यह वो सीट है, जहॉं रघुवंश प्रसाद का प्रभाव है।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया को बताया:

“राजद का अपना वोट बैंक है। उस पर इस इस्तीफे का कोई असर नहीं होगा। हॉं, वैशाली में इसका जरूर कुछ प्रभाव दिखेगा। रघुवंश प्रसाद को तेजस्वी के तौर-तरीकों से दिक्कत नहीं थी। उन्हें रामा सिंह के पार्टी में आने से खतरा ​था। रामा सिंह के आने से वैशाली पर उनकी दावेदारी खत्म हो जाती। खुद की राजनीति को बचाए रखने के लिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता हमेशा से राजद में गेस्ट आर्टिस्ट रहे हैं। गेस्ट आर्टिस्ट का जितना महत्व होता है, उनके पार्टी छोड़ने पर राजद को नुकसान भी उतना ही होगा।”

समाजशास्त्री नवल किशोर चौधरी का भी मानना है कि इस इस्तीफे का राजद के जमीनी समीकरणों पर कोई असर नहीं होगा। उनका कहना है कि संप्रदाय विशेष वर्ग का मतदाता बीजेपी के विरोध में जो सशक्त होगा, उसे ही वोट करेंगे और बिहार के विपक्ष में राजद से मजबूत कोई और नहीं है।

यादव वर्ग का भले अब एकमुश्त वोट राजद को नहीं मिलता है, लेकिन आज भी इस वर्ग का बड़ा तबका उसके ही साथ है। इस समीकरण में रघुवंश प्रसाद की भूमिका वैशाली और आसपास तक ही सीमित थी। इसलिए राजद पर उनके इस्तीफे का असर सीमित होगा।

नवल किशोर चौधरी ने बताया कि इससे राजद को लेकर यह धारणा और मजबूत होगी कि पार्टी में अच्छे लोगों के लिए जगह नहीं है, क्योंकि रघुवंश प्रसाद की छवि साफ-सुथरी और भ्रष्टाचार मुक्त रही है। इससे जो वर्ग सामाजिक समीकरणों से अप्रभावित रहता है, वहॉं राजद और तेजस्वी दोनों की छवि को नुकसान पहुॅंचेगा और नीतीश को फायदा होगा। चौधरी ने बताया कि यही वजह है कि रघुवंश प्रसाद यदि एनडीए में आए तो आप पाएँगे कि उनको काफी सम्मान मिल रहा है।

यानी, राजद से ज्यादा यह लालू के परिवार के लिए झटका है। नीतीश की मदद से पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने दोनों बेटों को सियासत में फिट किया था। इस बार उनके लिए मुश्किलें बढ़ रही हैं।

उनके बड़े बेटे तेजप्रताप को लेकर पहले से ही खबरें आ रही हैं कि ऐश्वर्या के चुनाव लड़ने की संभावनाओं को देख वे अपने लिए कोई नई और सुरक्षित सीट तलाश रहे हैं। अब रघुवंश प्रसाद के इस्तीफे ने उनके छोटे बेटे तेजस्वी के लिए भी राघोपुर को सुरक्षित सीट नहीं रहने दिया है।

तेजप्रताप ने रघुवंश प्रसाद की नाराजगी को लेकर पूछे गए सवाल पर कुछ समय पहले कहा था, “पार्टी समुद्र होता है, उससे एक लोटा पानी निकलने से कुछ नहीं होता है।” कहीं यह ‘एक लोटा पानी’ चुनावी राजनीति में उनके छोटे भाई का बोरिया-बिस्तर ही न बॉंध दे।

इस खतरे को चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू बखूबी समझते हैं। लिहाजा उन्होंने भी रॉंची के जेल से हाथ से ही पत्र लिख रघुवंश प्रसाद को मनाने की कोशिश की। उन्होंने लिखा है, “प्रिय रघुवंश बाबू आपके द्वारा कथित तौर पर लिखी एक चिट्ठी मीडिया में चलाई जा रही है, मुझे तो विश्वास ही नहीं होता। अभी मेरा परिवार और पूरा राजद परिवार आपको शीघ्र स्वस्थ होकर अपने बीच देखना चाहता है। चार दशकों में हमने हर राजनीतिक सामाजिक और यहॉं तक कि यदा-कदा पारिवारिक मामलों में मिल बैठकर विचार किया है। आप जल्दी स्वस्थ हों, फिर बैठ कर बात करेंगे। आप कहीं नहीं जा रहे हैं, समझ लीजिए।”

लालू प्रसाद यादव की चिट्ठी साभार: ANI

अब देखना दिलचस्प होगा कि बेटे की नजर में ‘एक लोटा पानी’ को लालू बहने से रोक पाते हैं या नहीं?

खालिस्तान चरमपंथ अब भारत के साथ कनाडा की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा: कनाडा के थ‍िंक टैंक की रिपोर्ट

ओटावा के एक प्रमुख कनाडाई थिंक टैंक ‘मैकडोनाल्ड-लॉयर इंस्टीट्यूट’ ने खालिस्तानी चरमपंथ के उभरने में पाकिस्तान की भूमिका पर एक अध्ययन जारी किया है। इंस्‍टीट्यूट ने कहा कि खालिस्‍तान पाकिस्‍तान का प्रॉजेक्‍ट है और इसे कनाडा में ठग और राजनीतिक चालबाजों ने जिंदा रखा है। इस थ‍िंक टैंक ने सरकार को आगाह क‍िया है क‍ि खालिस्‍तानी आतंकवादी भारत ही नहीं बल्कि कनाडा के ल‍िए भी बड़ा खतरा बन गए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार टेरी मिलेवस्की (Terry Milewski), [पीडीएफ], द्वारा लिखित, यह शोध पत्र खालिस्तान आंदोलन को कवर करता है और पाकिस्तान द्वारा विकसित और पोषित एक भू-राजनीतिक परियोजना के रूप में इसकी वास्तविकता को बताता है। यह पेपर कनाडा और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर लगाए गए खालिस्तान आंदोलन के खतरे पर शोध करता है।

कनाडा में खालिस्तानी चरमपंथ का प्रभाव

भारत के पंजाब प्रांत में सक्रिय खालिस्‍तानी आतंकियों को पाकिस्‍तान ने पैदा किया था और ये आतंकी अब न केवल भारत बल्कि कनाडा के राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार टेरी मिलेवस्की ने अपनी रिपोर्ट ‘खालिस्‍तान: ए प्रॉजेक्‍ट ऑफ पाकिस्‍तान’ में कहा कि खालिस्‍तान आंदोलन कनाडा और भारत दोनों की ही सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया है। पिछले कुछ दशकों में, विशेष रूप से 1985 में खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा एयर इंडिया फ्लाइट 182 ‘कनिष्क’ पर बमबारी की भयानक घटना के बाद, कनाडा में खालिस्तानियों का प्रभाव तेज गति से बढ़ रहा है।

खालिस्तानी समर्थक सिख नेता, जो कनाडा में व्यापक राजनीतिक संरक्षण में हैं, गुरुद्वारा कैश फ्लो और सामुदायिक वोटों पर अपने नियंत्रण के लिए, कथित तौर पर ट्रूडो सरकार पर दबाव डालकर खालिस्तान आतंकवाद के खतरों की वार्षिक रिपोर्ट से हटाने का दबाव बनाया था।

एमएल इंस्टीट्यूट के अध्ययन में कहा गया है कि यह नतीजा एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग अभियान के बाद सामने आया था।

खालिस्तान आंदोलन में पाकिस्तान की भूमिका

टेरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस आंदोलन के बाद भी सच्‍चाई यह है कि कनाडा के सिख इस आंदोलन के जरिए अपने गृह राज्‍य पंजाब नहीं जा रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि कनाडा के लोगों के लिए पाकिस्‍तान का यह कदम बड़ा राष्‍ट्रीय खतरा बन गया है। चूँकि पंजाब में खालिस्‍तान के कुछ ही समर्थक बचे हैं, इ‍सलिए कनाडा में खालिस्‍तान के समर्थकों को पाकिस्‍तानी मदद बढ़ गई है।

रिपोर्ट में खालिस्तानी आंदोलन के विकास और पोषण में पाकिस्तान की भूमिका की जाँच की गई है, जो खालिस्तान नाम के सिखों के लिए एक अलग देश के विचार का समर्थन करता है।

टेरी मिलेवस्की लिखते हैं कि भारत में सिखों के गृह राज्य पंजाब में खालिस्तान आंदोलन को ज्यादा तूल नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खालिस्‍तानी आतंकी नवंबर, 2020 में स्‍वतंत्र खालिस्‍तान के लिए जनमत संग्रह कराना चाहते हैं और जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आ रहां है, वैसे-वैसे दुनियाभर में सिख समुदाय में संशय बढ़ता जा रहा है। उन्होंने रिपोर्ट में चेतावनी दी कि जनमत संग्रह चरमपंथी विचारधारा को हवा देगा और युवा कनाडाई लोगों को कट्टरपंथी बनाएगा।

हालाँकि, कनाडा सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह खालिस्तान पर नवंबर में होने वाले तथाकथित जनमत संग्रह को ‘सिख फॉर जस्टिस’ जैसे समूहों द्वारा मान्यता नहीं देगी, जिसे 2019 में भारत द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा के पूर्व कैबिनेट मंत्री उज्जल दोसांझ और थिंक टैंक के एक प्रोग्राम डायरेक्टर शुवालॉय मजूमदार ने कहा, “खालिस्तान प्रस्ताव का मार्गदर्शन करने में पाकिस्तान के प्रभाव को समझने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को मिल्वेस्की की यह रिपोर्ट जरूर पढ़नी चाहिए।”

जस्टिन ट्रूडो सरकार ने 2015-19 के दौरान अपने पहले कार्यकाल में खालिस्तान समर्थक समूहों के प्रति कथित नरमी को भारत-कनाडा संबंधों में गिरावट का एक प्रमुख कारण बताया। कनाडा में लिबरल पार्टी की सरकार ने खालिस्तान समर्थक समूहों की गतिविधियों को अनुमति देने के पीछे अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया था।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि खालिस्तान का समर्थन भारत में कितना कम है, और यह वास्तव में बहुत कम हो गया है, लेकिन यह पाकिस्तान में अभी भी जीवित है, जहाँ जिहादी समूहों ने अपने साझा दुश्मन, भारत के खिलाफ सिख अलगाववादियों के साथ आम मुद्दा बना दिया है।

कौन हैं टेरी मिलेवस्की

टेरी मिलेवस्की एक अनुभवी पत्रकार हैं। 1967 में एक छात्र के रूप में वह पहली बार भारत आए थे। उस समय उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का साक्षात्कार लिया था। अपने करियर के दौरान कई बार सीबीसी टीवी न्यूज़ के संवाददाता के रूप में मिल्वेस्की ने भारत का दौरा किया। उन्होंने 1986 में एयर इंडिया में बमबारी सहित कई प्रमुख घटनाओं को कवर किया है। वह सीबीसी के लिए वरिष्ठ संवाददाता के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं।

केजरीवाल ने फिर तोड़ा अपना वादा: कोरोना के चलते जान गँवाने वाले 17 पुलिसकर्मियों को अभी तक नहीं मिला मुआवजा

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस साल अप्रैल में कोरोना वायरस महामारी से लड़ते हुए अपनी जान गँवाने वाले योद्धाओं को 1 करोड़ रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की थी।

वहीं इस साल मई में दिल्ली पुलिस कॉन्स्टेबल अमित कुमार ने उत्तरी दिल्ली में अपनी ड्यूटी निभाते हुए कोरोनोवायरस से संक्रमित होने के दौरान अपनी जान गँवा दी। उनकी पत्नी उस वक्त अपने दूसरे बच्चे के साथ गर्भवती थी। केजरीवाल ने उन्हें 1 करोड़ रुपए मुआवजे का वादा किया।

लेकिन उन्हें अभी तक दिल्ली सरकार की तरफ से मुआवजा नहीं मिला है। इतना ही नहीं कॉन्स्टेबल अमित की पत्नी ने नॉर्थ एमसीडी स्कूल में एक शिक्षक के रूप में अपनी नौकरी भी खो दी। कॉन्स्टेबल अमित के कोरोनावायरस संक्रमित होने के बाद उन्हें क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती होना पड़ा था जिस दौरान उन्हें अपनी दूसरी गर्भावस्था का पता चला था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कोरोना वायरस से लड़ते हुए दिल्ली पुलिस के 17 कर्मियों ने अपनी जान इस महामारी से संक्रमित होने होने की वजह से गँवाई है। दिल्ली सरकार की तरफ से इनमें से किसी को भी आर्थिक मदद के रूप में मुआवजा नहीं दिया गया है।

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस आयुक्त एस एन श्रीवास्तव ने इस बात की पुष्टि की है कि सभी 17 परिवार अभी भी दिल्ली सरकार से मुआवजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर परिवार पहले ही राजस्व विभाग को दस्तावेज सौंप चुके हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने कुछ प्रस्तावों के लिए कुछ प्रश्न उठाए थे और सभी के जवाब भेजे गए थे।

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सरकार के प्रवक्ता ने दावा किया कि उन्हें अभी तक दिल्ली पुलिस से सभी कागजात नहीं मिले हैं। द हिंदू को सहायक उप-निरीक्षक करमबीर सिंह के पुत्र पवन कुमार ने बताया कि उन्होंने सभी दस्तावेज जमा कर दिए हैं और उन्हें सूचित किया गया कि उनकी फ़ाइल पहले से ही संसाधित है। हालाँकि, उन्हें अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। इसी तरह, सब-इंस्पेक्टर राम लाल बोरघरे के बेटे आकाश बोरघरे को भी दिल्ली सरकार से कोई मुआवजा नहीं मिला है।