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केजरीवाल ने फिर तोड़ा अपना वादा: कोरोना के चलते जान गँवाने वाले 17 पुलिसकर्मियों को अभी तक नहीं मिला मुआवजा

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस साल अप्रैल में कोरोना वायरस महामारी से लड़ते हुए अपनी जान गँवाने वाले योद्धाओं को 1 करोड़ रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की थी।

वहीं इस साल मई में दिल्ली पुलिस कॉन्स्टेबल अमित कुमार ने उत्तरी दिल्ली में अपनी ड्यूटी निभाते हुए कोरोनोवायरस से संक्रमित होने के दौरान अपनी जान गँवा दी। उनकी पत्नी उस वक्त अपने दूसरे बच्चे के साथ गर्भवती थी। केजरीवाल ने उन्हें 1 करोड़ रुपए मुआवजे का वादा किया।

लेकिन उन्हें अभी तक दिल्ली सरकार की तरफ से मुआवजा नहीं मिला है। इतना ही नहीं कॉन्स्टेबल अमित की पत्नी ने नॉर्थ एमसीडी स्कूल में एक शिक्षक के रूप में अपनी नौकरी भी खो दी। कॉन्स्टेबल अमित के कोरोनावायरस संक्रमित होने के बाद उन्हें क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती होना पड़ा था जिस दौरान उन्हें अपनी दूसरी गर्भावस्था का पता चला था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कोरोना वायरस से लड़ते हुए दिल्ली पुलिस के 17 कर्मियों ने अपनी जान इस महामारी से संक्रमित होने होने की वजह से गँवाई है। दिल्ली सरकार की तरफ से इनमें से किसी को भी आर्थिक मदद के रूप में मुआवजा नहीं दिया गया है।

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस आयुक्त एस एन श्रीवास्तव ने इस बात की पुष्टि की है कि सभी 17 परिवार अभी भी दिल्ली सरकार से मुआवजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर परिवार पहले ही राजस्व विभाग को दस्तावेज सौंप चुके हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने कुछ प्रस्तावों के लिए कुछ प्रश्न उठाए थे और सभी के जवाब भेजे गए थे।

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सरकार के प्रवक्ता ने दावा किया कि उन्हें अभी तक दिल्ली पुलिस से सभी कागजात नहीं मिले हैं। द हिंदू को सहायक उप-निरीक्षक करमबीर सिंह के पुत्र पवन कुमार ने बताया कि उन्होंने सभी दस्तावेज जमा कर दिए हैं और उन्हें सूचित किया गया कि उनकी फ़ाइल पहले से ही संसाधित है। हालाँकि, उन्हें अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। इसी तरह, सब-इंस्पेक्टर राम लाल बोरघरे के बेटे आकाश बोरघरे को भी दिल्ली सरकार से कोई मुआवजा नहीं मिला है।

कंगना रनौत के ख़िलाफ़ मुंबई में शिकायत दर्ज: CM ठाकरे के लिए ‘आपत्तिजनक’ भाषा इस्तेमाल करने का है आरोप

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के ऊपर ‘आपत्तिजनक’ टिप्पणी करने के आरोप में कंगना के ख़िलाफ मुंबई में शिकायत दर्ज हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह शिकायत मुंबई के विक्रोली पुलिस थाने में की गई है। इसमें बॉलीवुड अभिनेत्री पर आरोप लगा है कि उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का अपमान किया।

बता दें कि 30 सितंबर से पहले किसी भी प्रकार के Demolition कार्य पर सुप्रीम कोर्ट की रोक होने के बावजूद कल कंगना के कार्यालय पर बीएमसी ने कार्रवाई की और उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसके बाद अभिनेत्री ने अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए एक वीडियो जारी करके उद्धव ठाकरे को अपना संदेश दिया।

उन्होंने वीडियो में कहा, “उद्धव ठाकरे, तुझे क्या लगता है, तूने फिल्म माफिया के साथ मिल कर मेरा घर तोड़ कर मुझसे बहुत बड़ा बदला लिया है। आज मेरा घर टूटा है। कल तेरा घमंड टूटेगा। ये वक्त का पहिया है। याद रखना हमेशा एक जैसा नहीं रहता। मुझे लगता है तुमने मुझपर बहुत बड़ा एहसान किया है। क्योंकि मुझे पता तो था कि कश्मीरी पंडितों पे क्या बीती होगी, लेकिन आज मैंने महसूस किया है।”

उन्होंने आगे कहा, “और आज मैं इस देश को वचन देती हूँ कि मैं सिर्फ़ अयोध्या पर ही नहीं कश्मीरी पंडितों पर भी एक फिल्म बनाऊँगी। मैं अपने देशवासियों को जगाऊँगी क्योंकि मुझे पता था हमारे साथ होगा तो होगा। लेकिन ये मेरे साथ हुआ है। इसका कोई मतलब है इसके कोई मायने हैं और उद्धव ठाकरे ये जो क्रूरता और आतंक है। अच्छा हुआ ये मेरे साथ हुआ क्योंकि इसके कुछ मायने हैं। जय हिंद! जय महाराष्ट्र!”

इस वीडियो के बाद कई कलाकार, कई पत्रकार, कई राजनेता कंगना रनौत के समर्थन में आए और सबने महाराष्ट्र सरकार के इस कदम की आलोचना की। सोशल मीडिया पर सवाल उठा कि क्या यह फाँसीवाद नही है? इसके अलावा कई लोगों ने हिमाचल सरकार से प्रिंयका गाँधी के अवैध घर को तोड़ने की भी माँग की।

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र सरकार और बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के बीच विवाद अब बढ़ता ही जा रहा है। बीते दिनों कंगना ने मुंबई पुलिस पर कई गंभीर आरोप लगाए जिसके बाद शिवसेना नेता उन पर हमलवार हो गए। संजय राउत ने न उन्हें मुंबई वापस लौटने की धमकी दी। वहीं उन पर बात करते हुए उन्हें ‘हरामखोर’ तक कह डाला। हालाँकि जब मामले ने तूल पकड़ा, तो सफाई में उन्होंने ये कहा कि हरामखोर का मतलब महाराष्ट्र में नॉटी या बेईमान होता है।

दूसरी ओर महाराष्ट्र गृहमंत्री अनिल देशमुख ने भी उन पर इस बीच ड्रग्स मामले में जाँच के आदेश दे दिए। देशमुख ने कहा कि कुछ समय पहले कंगना रनौत की दोस्ती शेखर सुमन के बेटे अध्ययन सुमन के साथ थी और अध्ययन ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि कंगना ड्रग लेती थी और उन पर भी ड्रग लेने के लिए दबाव बनाती थी। अनिल देशमुख ने कहा, “इस बात की पड़ताल हमारी मुंबई पुलिस करेगी। इस बात का निवेदन मैंने विधानसभा में किया है।”

कॉन्ग्रेस और आप समर्थकों ने कंगना को लेकर फैलाई फेक न्यूज़, बताया आगामी बिहार चुनाव का स्टार प्रचारक

बीएमसी द्वारा दफ्तर पर बुलडोजर चलवाने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत और शिवसेना की अगुवाई में महाराष्ट्र सरकार आमने-सामने है। वहीं इस मुद्दे का फायदा उठाते हुए कॉन्ग्रेस समर्थक और आम आदमी पार्टी समर्थकों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह कहते हुए फर्जी खबरों का तांता लगा दिया कि कंगना आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए प्रचार करेंगी।

एक सोशल मीडिया यूजर नीतू त्रिवेदी ने ऐसा ही एक ट्वीट शेयर करते हुए लिखा है, “झाँसी की रानी अब झाँसे की रानी बन चुकी है।”

वायरल हो रहा स्क्रीनशॉट

कई अन्य कॉन्ग्रेस समर्थक और भाजपा-विरोधी सोशल मीडिया एकाउंट ने भी इसी स्क्रीनशॉट को साझा करते हुए अपनी-अपनी टिप्पणियाँ दी।

इन ट्वीट्स को कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले बॉलीवुड अभिनेता मोना अम्बेगांवकर और वकील दुष्यंत अरोड़ा जैसे लोगों द्वारा भी फैलाया किया गया।

जैसा कि स्क्रीनशॉट में आप देख सकते है कि इसमें एबीपी न्यूज़ का लोगो और टेक्स्ट साथ में दिखाई दे रहा है। इस स्क्रीनशॉट से ऐसा साफ प्रतीत होता है कि कंगना रनौत को टारगेट करने के लिए यह प्रपंच रचा गया कि वह बिहार चुनाव में भाजपा के लिए प्रचार करेगी। इस स्क्रीनशॉट में भी कई विसंगतियाँ हैं।

गौरतलब है कि पिछले 24 घंटो में ऐसा कोई भी स्क्रीनशॉट या न्यूज़ क्लिप एबीपी न्यूज़ चैनल द्वारा नहीं चलाया गया है। वहीं इसमें टाइपो की छोटी-छोटी गलतियाँ भी देखी जा सकती हैं। साथ ही वायरल स्क्रीनशॉट के सिवाय कोई अन्य रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करते हुए नहीं देखें गए हैं। इसके अलावा यह वायरल स्क्रीनशॉट सिर्फ फेक न्यूज़ पेडलर्स, कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं, समर्थकों और ट्रोल्स द्वारा ही साझा किया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह कंगना ने खुद ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी थी कि वह कभी बीजेपी की करीबी नहीं रही हैं।

उन्होंने कई बार यह भी स्पष्ट किया है कि वह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ी नहीं है और पीएम मोदी को उनका समर्थन उनकी अपनी पसंद है।

बता दें, वायरल हो रहे फर्जी खबरों के बीच ऑपइंडिया ने कंगना रनौत से इस मुद्दे पर उनके आधिकारिक बयान जानने की कोशिश की है। जैसे ही हमें इस मामले में उनकी तरफ से कोई बात साझा की जाएगी हम इस रिपोर्ट को आगे अपडेट करेंगे।

‘मनमाना फैसला न आने पर कॉन्ग्रेसी गिरोह ने हमेशा न्यायपालिका के खिलाफ अभियान चलाकर उसे कमजोर किया’

भारतीय संविधान के मूल ढाँचे की संरचना का सिद्धांत देने वाले केशवानंद भारती को श्रद्धांजलि देते हुए केंद्रीय कानून और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने समाचार पत्र ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ पर एक लेख के जरिए बताया है कि कॉन्ग्रेस ने कई वर्षों तक किस प्रकार से एक इकोसिस्टम के जरिए न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को निशाने पर रखा।

केंद्रीय मंत्री ने इस लेख में बताया है कि किस प्रकार से ‘केशवानंद बनाम केरल राज्य’ मामले के बाद इस फैसले से जुड़े लोगों को कॉन्ग्रेस के दमनकारी शासन परिणाम देखने को मिले। यह सभी फैसले न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर स्पष्ट हमला थे।

केशवानंद भारती के फैसले की पीठ का नेतृत्व करने वाले मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी को अगले ही दिन बिना उत्तराधिकारी की घोषणा के ही सेवानिवृत्त कर दिया गया। इसका नतीजा कुछ इस तरह से रहा –

  • तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने अपने गेम प्लान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों – जस्टिस जेएम शेलत, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर को हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने ‘मूल संरचना सिद्धांत’ का समर्थन किया था।
  • संविधान के मूल संरचना के सिद्धांत का विरोध करने वाले कनिष्ठ न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एएन रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया।
  • एएन रे द्वारा फौरन एक बड़ी बेंच का गठन कर ‘मूल संरचना सिद्धांत’ के निर्णय को पूर्ववत करने का एक असफल प्रयास किया।

केंद्रीय मंत्री ने अपने इस लेख में कहा है कि एक बात, जिसे याद रखे जाने की जरूरत है, वो यह कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों के इस निष्कासन को सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस और वाम दलों ने पूरी तरह से सही ठहराया था।

इसके बाद, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आपातकाल के उस भयावह दौर का भी जिक्र किया है, जब इंदिरा गाँधी द्वारा निरंकुश तरीके से अपने निर्वाचन को रद्द करने के खिलाफ संविधान से तमाम तरह के छेड़खानी की गई।

रविशंकर प्रसाद इस लेख में लिखते हैं,

“मुझे भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन में एक युवा कार्यकर्ता होने का सौभाग्य मिला। इस बीच, इंदिरा गाँधी के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लोकसभा के लिए उनका चुनाव रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने बड़ी हिम्मत दिखाई, हालाँकि कार्यवाही के नतीजों को प्रभावित करने के प्रयासों के बारे में मीडिया में व्यापक अटकलें थीं। इसके बाद, कुख्यात आपातकाल लगाया गया और जेपी सहित सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इंदिरा गाँधी के चुनाव को वैध बनाने के लिए कानून को पूर्वव्यापी रूप से संशोधित किया गया था और सर्वोच्च न्यायालय ने इस संशोधन को सही ठहराया।”

उल्लेखनीय है कि इंदिरा गाँधी द्वारा तब इस फैसले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा पर विभिन्न तरीके अपनाए गए। यहाँ तक कि न्यायमूर्ति सिन्हा को अपने गायब होने तक की भी झूठी खबर फैलानी पड़ी थी।

रविशंकर प्रसाद ने लिखा है कि किस तरह से आपतकाल के दौरान बड़े स्तर पर अत्याचार और गिरफ्तारियाँ की गईं। कई उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं की गई क्योंकि उन्होंने कैद किए गए लोगों की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय लिया था।

इस लेख के अनुसार, “प्रसिद्ध ‘एडीएम जबलपुर केस’ में, जो भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर धब्बा है, एक मजबूत आवाज थी – न्यायमूर्ति एचआर खन्ना! जिन्होंने फैसला सुनाया कि आपातकाल के दौरान भी, भारतीयों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर मनमाने ढंग से अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। उन्होंने परिणामों को जानने के बावजूद साहस दिखाया और तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें हटाते हुए वरिष्ठतम न्यायाधीश होने के बावजूद कुछ महीनों के लिए भी भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने के अधिकार से वंचित कर दिया। उनकी जगह जस्टिस एमएच बेग को CJI नियुक्त किया गया था।”

रविशंकर प्रसाद ने लिखा है कि किस प्रकार वर्तमान सरकार ने न्यायपालिका के फैसलों और उसके सम्मान को सर्वोपरि रखा है। केंद्रीय मंत्री ने लिखते हैं, “हम सभी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो हमारी संवैधानिक राजनीति के लिए अभिन्न है। हमें सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की असाधारण विरासत में स्वतंत्रता, सशक्तीकरण, इक्विटी और भ्रष्टाचार की रोकथाम की स्थापना पर गर्व है।”

साथ ही, कॉन्ग्रेस की द्वेषपूर्ण नीतियों पर हमला करते हुए रविशंकर प्रसाद लिखते हैं कि जो लोग भारत के लोगों द्वारा एक लोकप्रिय जनादेश के माध्यम से बार-बार पराजित हुए हैं, वे सर्वोच्च न्यायालय और अन्य अदालतों के गलियारों से कपटपूर्ण तरीकों से राजनीति और शासन को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, यह अस्वीकार्य है।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का पूरा लेख आप ‘इंडियन एक्सप्रेस’ पर पढ़ सकते हैं।

ऑपइंडिया का असर: बिहार से अपहृत लड़की अहमदाबाद से बरामद, साबिर ने धर्म परिवर्तन के लिए किया था अपहरण

बिहार के मधुबनी जिले हरलाखी थानांतर्गत नहरनियाँ गाँव से एक महीने पहले गायब नाबालिग लड़की अब मिल गई है। स्वयं राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने इसकी जानकारी अपने ट्विटर पर दी है। लड़की को उसके ही गाँव में रहने वाले साबिर ने 20 अगस्त को घर के बाहर से अगवा किया था।

NCPCR अध्यक्ष ने बताया, “बिहार के मधुबनी ज़िले से अपहृत हुई बच्ची के मामले में ऑपइंडिया की खबर पर राष्ट्रीय बाल आयोग ने संज्ञान लिया था, आज समन सुनवाई के दौरान पुलिस ने अवगत करवाया है कि बच्चे का बचाव कर लिया गया है। आरोपित को भी गिरफ़्तार किया गया है।”

लड़की के भाई ने भी ऑपइंडिया को इस बात की जानकारी दी कि उनकी बहन को बिहार प्रशासन ने ढूँढ लिया है। उसकी बरामदगी अहमदाबाद से हुई है। आरोपित गिरफ्तार हो चुका है। जल्द ही उन्हें वापस लेकर आया जाएगा।

लड़की के भाई के अनुसार, लड़की हाल ही में बरामद हुई है। इसकी जानकारी उन्हें उनके जीजा से मिली, जो बिहार पुलिस के साथ बच्ची को ढूँढने गए थे। ऑपइंडिया ने इस मामले में हरलाखी थाना व क्षेत्र डीएसपी से भी बात करने की कोशिश की। लेकिन फिलहाल उनसे हमारा संपर्क नहीं हो पाया है। मामले में आगे जानकारी होते ही हम रिपोर्ट अपडेट करेंगे।

बता दें कि 20 अगस्त को नाबालिग अपने घर से शौच के लिए बाहर निकली थी। इसके बाद वह लापता हो गई। घरवालों ने उसके अपहरण का आरोप गाँव में ही रहने वाले दूसरे समुदाय के साबिर पर लगाया। पीड़ित पक्ष का ये भी कहना था कि जब वह साबिर के घर पर अपनी बेटी का पता पूछने गए तो उन्हें लड़की के बारे में बताने की बजाय ये कहा गया कि तुम्हारे बेटी का धर्म परिवर्तन करवाने के लिए ले गए हैं।

इस संबंध में 23 अगस्त को लड़की के घरवालों ने शिकायत दर्ज करवाई थी और 26 अगस्त को इस मामले पर एफआईआर हुई थी। लड़की के पिता ने अपनी शिकायत में कहा था कि जब वह लोग अपनी लड़की के बारे में पूछने साबिर के घर गए तो उन्हें कहा गया, “तुमको जो ताकत लगाना है लगाओ। हमने तैयारी कर ली है। तुम्हारी लड़की का धर्मांतरण कर देंगे। तुम्हारी औकात नहीं है कि तुम हम सबका कुछ कर सको। मेरे घर से चले जाओ नहीं तो मारकर फेंक देंगे।

28 अगस्त को जब ऑपइंडिया ने इस मामले पर अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। तो, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पूरे मामले पर संज्ञान लिया। NCPCR के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने जानकारी दी थी कि इस मामले में आयोग ने संज्ञान लिया है और कार्रवाई की जा रही है। प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया पर ऑपइंडिया की खबर का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा था कि उन्होंने मधुबनी के पुलिस अधीक्षक से बात कर के इस मामले में आवश्यक निर्देश दिए हैं। साथ ही आश्वासन दिया कि NCPCR इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए रखते हुए इसकी निगरानी करेगा।

JEE की परीक्षा में छात्रों की संख्या को लेकर सुब्रमण्यम स्वामी के दावे का शिक्षा मंत्री ने कर दिया फैक्ट चेक

केन्द्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ने बुधवार (9 सितंबर 2020) को अपने ही राजनीतिक दल के नेता सुब्रमण्यम स्वामी का फैक्ट चेक कर दिया। दरअसल, सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने हाल ही में हुई JEE की परीक्षाओं में शामिल होने वाले छात्रों की संख्या को लेकर दावा किया था। इसका जवाब देते हुए केन्द्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ने ट्वीट करते हुए उन्हें सही जानकारी दी। 

भाजपा राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट में लिखा कि JEE की परीक्षाओं का एडमिट कार्ड डाउनलोड करने वाले कुल 18 लाख छात्रों में से सिर्फ 8 लाख ही परीक्षाओं में शामिल हुए थे। सुब्रमण्यम स्वामी पिछले हफ्ते से माँग कर रहे थे कि NEET – JEE की परीक्षाओं की तिथि आगे बढ़ा दी जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसे समय में इतनी अहम परीक्षाओं का आयोजन कराना देश का अपमान है। साथ ही ‘विद्या और ज्ञान’ जैसे शब्दों की अहमियत कम करने जैसा है। 

भाजपा के दिग्गज नेता की बात पर प्रतिक्रिया देते हुए शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने JEE परीक्षाओं से संबंधित कुछ आँकड़े पेश किए। उन्होंने सबसे पहले कहा कि परीक्षाओं में आवेदन करने वालों की संख्या 18 लाख नहीं सिर्फ 8.5 लाख थी। 

अपने ट्वीट में आगे जवाब देते हुए शिक्षा मंत्री ने लिखा लगभग 8.58 छात्रों ने परीक्षाओं में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। जिसमें लगभग 6.35 लाख छात्र परीक्षाओं में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं केंद्र सहित तमाम राज्य सरकारों ने छात्रों की मदद के लिए हर संभव कदम भी उठाए थे जिससे छात्रों को परीक्षा के दौरान किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। यह पूरा प्रयास सहकारी संघवाद (cooperative federalism) का बेहतरीन उदाहरण था। 

परीक्षा में छात्रों की कम उपस्थिति के दावे को खारिज करते हुए रमेश पोखरियाल ने बताया कि JEE की परीक्षाएँ एक साल में दो बार होती हैं। इसलिए जो छात्र सितंबर के दौरान हुई परीक्षाओं में शामिल नहीं हुए हो सकता है वह जनवरी के दौरान हुई परीक्षाओं में शामिल हुए हों। ऐसे में यह हो भी सकता है कि इस वजह से छात्र इन परीक्षाओं में शामिल न हुए हों। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि हम छात्रों की संख्या की सही जानकारी रख रहे हैं। फ़िलहाल परीक्षाओं में देरी करने का मतलब है छात्रों के भविष्य को खतरे में डालना क्योंकि परीक्षाएँ नहीं हुई तो छात्रों का दाख़िला कैसे होगा। 

महामारी के दौरान परीक्षाओं का आयोजन कराने के मुद्दे पर शिक्षा मंत्री ने कहा, “छात्रों ने कॉलेज में दाख़िला लेने के लिए पढ़ाई की है। अगर इन परीक्षाओं की तिथि आगे बढ़ाई जाती है तो यह छात्रों की मेहनत को अहमियत न देने जैसा होगा। हमारी सरकार छात्रों और समाज की सुरक्षा और विकास के मुद्दे पर हमेशा से सुदृढ़ रही है। हम हमेशा छात्रों के लिए हित में ही काम करेंगे। 

सुब्रमण्यम स्वामी का ट्वीट

खुद पर किए गए फैक्ट चेक के बाद सुब्रमण्यम स्वामी ने मुद्दे के दूसरे पहलू पर ज़ोर देने लगे। उन्होंने कहा मंत्रालय ने अदालत में छात्रों की संख्या को लेकर जो दावा किया था और जवाब देते समय जिस संख्या का दावा किया था दोनों पूरी तरह अलग था। सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा कि उन्होंने छात्रों की संख्या 18 लाख क्यों बताई। इसके विपरीत अपने ट्वीट में कहा ‘शिक्षा मंत्री के मुताबिक़ परीक्षा में शामिल होने छात्रों की संख्या 8.5 लाख थी। जबकि सर्वोच्च न्यायालय में इस संख्या को लेकर उनका दावा कुछ और ही था। 

JEE मेन्स की परीक्षाएँ 1 से 6 सितंबर के बीच देश अलग-अलग केन्द्रों में एनटीए द्वारा आयोजित कराई गई थीं। इन परीक्षाओं का परिणाम 11 सितंबर तक आने की संभावना है। 

अनुराग कश्यप चरस फूँकते हैं क्या? आखिर सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड किया #HappyBirthdayCharsiAnurag

बुधवार (9 सितंबर 2020) की शाम से लेकर गुरूवार (10  सितंबर 2020) के बीच ट्विटर पर एक हैशटैग खूब चर्चा में रहा। हैशटैग था #HappyBirthdayCharsiAnurag। दरअसल 10 सितंबर को फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप का जन्मदिन है। जिसके बाद ट्वीटर पर मौजूद नेटीजन्स ने उन्हें कुछ अलग तरीके से जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी। 

ट्विटर यूज़र्स ने अनुराग कश्यप का एक वीडियो साझा किया। इसमें वह जॉइंट रोल करते हुए नज़र आ रहे हैं। मज़े की बात यह है कि ऐसा वह एक साक्षात्कार के दौरान करते हुए नज़र आ रहे हैं। अनुराग कश्यप ने एक अमेरिकी यूट्यूब चैनल Our stupid reactions से बातचीत की थी, जिसका वीडियो 8 अप्रैल 2020 को साझा किया गया था। इस बातचीत के दौरान अनुराग कश्यप जॉइंट रोल करते हुए नज़र आते हैं। 

तमाम ट्विटर यूज़र्स ने अनुराग कश्यप के इस वीडियो को साझा किया और उन्हें जन्मदिन की बधाई दी। एक ट्विटर यूज़र ने लिखा – “अनुराग कश्यप चरसी क्यों है? यह रही असल वजह।”

वहीं कुछ ट्विटर यूज़र्स ने इस वीडियो का स्क्रीनशॉट साझा किया था। जिससे यह साफ़ तौर पर नज़र आए कि अनुराग कश्यप क्या कर रहे हैं। ऐसा करते हुए एक और ट्विटर यूज़र ने लिखा ‘अनुराग कश्यप को ड्रग्स दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। जो लोग अनुराग के लिए चरसी, आतंकवादी और असफल निर्देशक जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं… देखो और आराम से गाली दो।’    

इसके एक दिन पहले अनुराग कश्यप ने बताया था कि उन्होंने सुशांत सिंह के साथ काम करने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उन्हें लगा सुशांत सिंह के साथ कोई परेशानी है। सुशांत सिंह की मौत के बाद जुलाई में उनकी फिल्म ‘दिल बेचारा’ रिलीज़ हुई थी। इस पर अनुराग कश्यप ने कहा था कि सुशांत एक ‘गैर पेशेवर’ कलाकार हैं।

सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को बांद्रा स्थित अपने आवास पर मृत पाए गए थे। सीबीआई समेत अन्य जाँच एजेंसी मामले की पड़ताल कर रही है।  

उखाड़ दिया: लोकतंत्र का खुला उपहास है शिवसेना के ‘सामना’ का शीर्षक

कंगना रनौत के ऑफिस में की गई तोड़फोड़ के ठीक अगली सुबह शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ अखबार की बड़ी खबर का शीर्षक है- ‘उखाड़ दिया।’ शिवसेना ने इस शीर्षक के साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि कंगना रनौत के टि्वर पर शिवसेना को दी गई चुनौती का ही नतीजा था कि उसकी सरकार ने अभिनेत्री का ऑफिस तोड़ डाला।

शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ का फ्रंट पेज

अभिनेत्री कंगना रनौत के दफ्तर पर बीएमसी द्वारा बुलडोजर चलाने बाद बृहस्पतिवार (सितम्बर 10, 2020) को शिवसेना के मुखपत्र सामना ने ‘उखाड़ दिया’ के शीर्षक को अपने अखबार के पहले पन्ने पर छापा है।

कल ही बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने कंगना रनौत के बांद्रा स्थित बंगले में कथित ‘अवैध हिस्से’ को नष्ट कर दिया था। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को गलत इरादे से की गई कार्रवाई बताते हुए इस पर रोक लगाने का भी आदेश दिया लेकिन तब तक बीएमसी के जेसीबी अभिनेत्री के बंगले के अधिकांश भाग को ध्वस्त कर कीमती सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा चुकी थी।

दरअसल, सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में एक के बाद एक खुलासे करने पर कंगना रनौत महाराष्ट्र की शिवसेना के निशाने पर आ गई थी। यहाँ तक कि शिवसेना नेता संजय राउत ने उन्हें ‘हरामखोर’ तक कह दिया और शिवसेना द्वारा कंगना को धमकियाँ भी दी गईं।

शिवसेना की ओर से दी गई धमकियों के बीच कंगना रनौत ने टि्वटर पर चुनौती दी थी कि वो 9 सितम्बर को मुंबई जाएँगी और कहा कि ‘उखाड़ सको तो उखाड़ लो’। अब कंगना रनौत का बंगला तोड़ने के बाद शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के शीर्षक में ‘उखाड़ लिया’ लिखकर अपनी द्वेषपूर्ण फासीवादी विचारधारा का परिचय दिया है ।

शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ का यह शीर्षक इस बात का संकेत है कि महाराष्ट्र में कोई भी व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति खुलकर नहीं रख सकता और यदि वह ऐसा करेगा तो उसके खिलाफ शिवसेना पूरी बेशर्मी के साथ किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है।

दिलचस्प तो यह देखना है कि कंगना के खिलाफ इस खुली गुंडागर्दी के दौरान भी देश के वाम-उदारवादी वर्ग एकदम मौन हैं। सोचिए, महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार होती और JCB कंगना रनौत के बजाए बेफिटिंग रिप्लाय वाली तापसी पन्नू, सोनम कपूर या दीपिका पादुकोण के पास से गुजर भी गई होती तो अब तक कितने लोग भाजपा के कथित फासीवादी शासन के खिलाफ मैदान में उतर गए होते?

कोरोना काल से भी बहुत पहले से बेरोजगार चल रहे कितने ही कलाकार अब तक अपने अप्सरा पेन्सिल अवार्ड लौटाने के लिए आगे आ गए होते, वामपंथियों के स्केच बन रहे होते, कॉमरेड ढपलियाँ बजाते नजर आते और साहित्य का ‘काँजीवरम उद्योग’ अब तक किलोमीटर की लम्बाई से असहिष्णुता और फासिज्म पर निबंध लिख रहा होता।

अगर अभी भी किसी को लगता है कि कोई कथित वाम-उदारवादी वर्ग फासीवाद, पितृसत्ता, निजीकरण या ऐसे ही किसी नव-आधुनिक प्रगतिशील नजर आने वाले ‘लाहौर-लहसुन’ मसलों के खिलाफ लड़ रहा है तो वह वास्तव में ‘हरामखोर’ कहे जाने योग्य है।

और तो और, जब यह तोड़फोड़ की जा रही थी, तब वहाँ कंगना के समर्थन में और शिवसेना के खिलाफ नारेबाजी कर रहे लोगों के साथ भी मुंबई पुलिस द्वारा धक्का-मुक्की और लाठीचार्ज किया गया। यहाँ तक कि समाचार चैनल रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर्स को गिरफ्तार कर लिया गया।

इस तोड़फोड़ पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे गलत इरादे से की गई कार्रवाई बताया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि इस तरह के काम किए गए तो यह शहर रहने लायक नहीं रह जाएगा। इसके बावजूद शिवसेना द्वारा द्वेषपूर्ण तरीके से संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया जाना और उस पर गर्व महसूस करना किसी भी तरह की गुंडागर्दी से कम नहीं कहा जा सकता है।

शायद यही वजह भी है कि कंगना रनौत ने बृहस्पतिवार की सुबह ही एक ट्वीट में शिवसेना को याद दिलाया है कि यह शिवसेना बाल ठाकरे की विचारधारा वाली शिवसेना से अब राजनीति के लिए सोनिया सेना में तब्दील हो चुकी है।

कंगना ने आज सुबह ही अपने एक ट्वीट में लिखा, “जिस विचारधारा पे श्री बाला साहेब ठाकरे ने शिव सेना का निर्माण किया था आज वो सत्ता के लिए उसी विचारधारा को बेच कर शिव सेना से सोनिया सेना बन चुके हैं। जिन गुंडों ने मेरे पीछे से मेरा घर तोड़ा उनको सिविक बॉडी मत बोलो, संविधान का इतना बड़ा अपमान मत करो।”

‘चीन से विवाद के चलते गाँव-घर छोड़ रहे बॉर्डर के लोग’ – मीडिया ने चलाई खबर, भारतीय सेना ने कहा – ‘फेक न्यूज’

भारत और चीन के बीच लद्दाख में जारी सीमा विवाद को लेकर दो समाचार समूहों ने एक ख़बर प्रकाशित की। दोनों ख़बरों के अनुसार अरुणाचल प्रदेश के तवांग स्थित मैकमोहन रेखा के आस-पास रहने वाले कई ग्रामीण वह क्षेत्र छोड़ कर जा रहे हैं। लेकिन ख़बर सामने आने के कुछ ही समय बाद भारतीय सेना ने इसका खंडन किया। इसके अलावा इस मुद्दे पर ट्वीट करते हुए सही जानकारी दी। 

EastMojo में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ लद्दाख स्थित सीमा पर भारतीय और चीनी सेना के बीच विवाद बढ़ा। जिसके बाद अरुणाचल प्रदेश के तवांग स्थित मैकमोहन रेखा के आस-पास रहने वाले गाँव के लोग अपना घर छोड़ कर जाने लगे।

ख़बर में यह भी बताया गया कि ज़मीथांग क्षेत्र से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तवांग जिले में तकसंग गाँव है। हाल ही में इस गाँव के लोगों ने भारत और चीन की सेना के बीच तनाव की ख़बरें सामने आने के बाद अपने घर छोड़े थे। 

ईस्ट मोजो में प्रकाशित ख़बर का स्क्रीनशॉट

इसके बाद HWnews ने भी यही ख़बर प्रकाशित की, जिसमें लोगों के अपने घरों को छोड़ने का दावा किया गया था। ख़बर में यह भी लिखा हुआ है कि साल 1986 में भारत चीनी सेना के सामने तवांग जिले की ज़मीथांग स्थित सुमदोरोंग चू वैली हार गया था। उस दौरान कृष्ण स्वामी सुंदरजी भारतीय सेना के मुखिया थे। 

एचडब्ल्यू न्यूज़ में प्रकाशित ख़बर का स्क्रीन शॉट

ख़बर के अगले हिस्से में बताया गया कि 26 जून साल 1986 में भारत ने इस घटना का आधिकारिक तौर पर विरोध किया था। साथ ही 16 जून को चीनी सेना द्वारा की गई घुसपैठ पर आक्रोश जताया था। तब चीन ने भारत के इस दावे को पूरी तरह से नकार दिया था और कहा था चीनी सेना की तरफ से ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। 

इस मुद्दे पर ट्वीट करते हुए भारतीय सेना के तेजपुर रक्षा जनसंपर्क विभाग (असम – अरुणाचल प्रदेश) ने खंडन किया। अपने खंडन में उन्होंने लिखा कि एलएसी के आस-पास स्थानीय लोगों के पलायन की ख़बरें पूरी तरह फ़र्ज़ी हैं।

इतना ही नहीं, भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश और असम के आम नागरिकों से निवेदन भी किया कि वह इस तरह की झूठी और बेबुनियाद ख़बरों पर भरोसा न करें। ऐसी किसी भी ख़बर को संज्ञान में लेने या रीट्वीट करने से पहले अधिकारियों से पुष्टि करा लें।   

सोनिया सेना बन चुकी है बाल ठाकरे की शिवसेना, घर तोड़ने वाले गुंडे थे… सिविक बॉडी मत बोलो उन्हें: कंगना रनौत

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने बीएमसी द्वारा की गई इस ‘गुंडागर्दी’ को ट्वीट में ‘शिवसेना’ को ‘सोनिया सेना’ बताया है। कंगना रनौत ने कहा कि शिवसेना ने राजनीति के लिए बाल ठाकरे की विचारधारा को त्याग दिया।

बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) ने बुधवार (सितम्बर 09, 2020) को बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के पाली हिल स्थित कार्यालय को ध्वस्त कर दिया। बीएमसी की इस कार्रवाई को कंगना ने लोकतंत्र की हत्या करार दिया।

कंगना रनौत ने बीएमसी द्वारा की गई तोड़फोड़ की अगली सुबह बृहस्पतिवार (सितम्बर 10, 2020) अपने ट्वीट में लिखा, “जिस विचारधारा पर श्री बाला साहेब ठाकरे ने शिव सेना का निर्माण किया था आज वो सत्ता के लिए उसी विचारधारा को बेच कर शिव सेना से सोनिया सेना बन चुकी है, जिन गुंडों ने मेरे पीछे मेरा घर तोड़ा उनको सिविक बॉडी मत बोलो, संविधान का इतना बड़ा अपमान मत करो।”

बीएमसी टीम ने कल सुबह 11 बजे कंगना के ऑफिस में तोड़फोड़ शुरू की और दो घंटे के भीतर कीमती संपत्ति को बर्बाद कर दिया। कंगना के वकील, रिजवान सिद्दीकी ने सुबह एक याचिका दायर कर अदालत से 11:30 बजे तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध किया। अदालत ने याचिका का नोटिस लिया और सुनवाई दोपहर 12:30 बजे के लिए निर्धारित की।

‘मुंबई मिरर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, जब अदालत की सुनवाई शुरू हुई, तो यह पता चला कि बीएमसी ने अदालत से अनुरोध करते हुए एक कैविएट दायर की थी कि वह केस के पक्ष को सुने बिना कंगना को कोई राहत न दे।

सुनवाई के दौरान बीएमसी की वकील ने कहा कि उन्हें तोड़फोड़ की कोई जानकारी नहीं

कैविएट एक दिन पहले ही मंगलवार को दायर किया गया था। इसके अलावा, अदालत में पेश हुए बीएमसी वकील ने कहा कि उनके पास इस मामले के बारे में कुछ भी पता नहीं और इससे एक दिन पहले कंगना को भेजे गए नोटिस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। यह बयान तब दिया गया, जब कंगना रनौत के ऑफिस में BMC की तोड़फोड़ जारी थी।

जब अदालत ने वकील से बीएमसी कमिश्नर इकबाल चहल को फोन करके उन्हें तोड़फोड़ को रोकने के लिए कहा, तो वकील ने कहा कि उनका संदेश चहल तक पहुँच गया है या नहीं, वह स्पष्ट रूप से नहीं बता सकतीं। जब अदालत के एक सहयोगी ने उसे फोन करने की कोशिश की, तो उसका फोन बंद मिला। उसके दस मिनट के भीतर, बीएमसी वकील ने अदालत को बताया कि तोड़फोड़ को रोकने का उनका संदेश पहुँच चुका है।

अंत में, न्यायमूर्ति एसजे कथावाला और आरआई छागला की खंडपीठ ने बीएमसी के खिलाफ अभिनेत्री कंगना रनौत की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि नागरिक निकाय ने सुनवाई में जानबूझकर देरी की, ताकि यह संपत्ति को ध्वस्त कर सके।

अपने बचाव में, बीएमसी ने इस तोड़फोड़ को अंजाम देने में शिवसेना या किसी अन्य राजनीतिक दल के प्रभाव में होने से इनकार किया। इसमें कहा गया है कि बीएमसी ने वही किया है, जो विभाग को शहर में अवैध निर्माणों पर करना है। यह भी कहा कि उन्होंने पूरी संपत्ति को नहीं गिराया है, लेकिन सिर्फ ‘बढ़ाई गई दीवारें, पार्टीशन और शौचालय स्लैब’ तोड़े गए हैं।

इस तोड़फोड़ पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे गलत इरादे से की गई कार्रवाई बताया है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि इस तरह के काम किए गए तो यह शहर रहने लायक नहीं रह जाएगा। यहाँ तक कि एनसीपी नेता शरद पवार ने भी इस कार्रवाई को गैरजरूरी बताया है।