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PM Cares मामले में CM योगी ने राहुल पर साधा निशाना, कहा- अपरिपक्व, ओछी राजनीति के लिए दें जवाब

प्राइम मिनिस्टर्स सिटिजन असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमर्जेंसी सिचुएशंस (PM CARES) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका खारिज कर दी गई। याचिका खारिज होने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि पीएम केयर्स पर सवाल उठाना राहुल गाँधी की अपरिपक्वता का उदाहरण था। सुप्रीम कोर्ट ने बुद्धिजीवियों को आइना दिखा दिया।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद योगी आदित्यनाथ ने एक के बाद एक दो ट्वीट किए। पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा, “कोरोना महामारी में जनहित की सुरक्षा के दृष्टिगत पीएम नरेंद्र मोदी के नूतन प्रयास PM CARES का विशिष्ट योगदान रहा है। इस पर सवाल उठाना राहुल गाँधी की अपरिपक्वता का उदाहरण था। आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने PM CARES की महत्ता को वैधानिकता प्रदान कर दी। सत्यमेव जयते!”

इस ट्वीट के बाद योगी ने दूसरा ट्वीट किया और कहा कि राहुल गाँधी को अब जवाब देना होगा। योगी ने लिखा, “कोरोना काल में आमजन का सहारा बने PM CARES के संबंध में कुप्रचार कर रहे ‘स्वयंभू’ बुद्धिजीवियों को आज सुप्रीम कोर्ट ने आईना दिखा दिया। PM CARES जन संपत्ति है। जनहित में ही इसका उपयोग हो रहा है। ओछी राजनीति के लिए राहुल गाँधी और स्वयंभू बुद्धिजीवियों को जनता को जवाब देना होगा।”

इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि शीर्ष कोर्ट के फैसले से पीएम केयर्स फंड को लेकर राहुल गाँधी के नापाक मंसूबों पर पानी फिर गया। जेपी नड्डा ने ट्वीट किया, “पीएम केयर्स पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राहुल गाँधी और उनके भाड़े के आदमियों (रेंट-ए-कॉज बैंड) के कुटिल मंसूबों पर पानी फेर दिया है। यह दर्शाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके सहयोगियों के गलत इरादे और दुर्भावनापूर्ण प्रयासों के बावजूद सच्चाई सामने आती है।”

उन्होंने आरोप लगाया, “राहुल गाँधी के इस बारे में हल्ला मचाने को आम आदमी ने बार-बार खारिज किया है, जिन्होंने पीएम-केयर्स में भारी योगदान दिया है। शीर्ष कोर्ट ने भी अपना फैसला सुना दिया है, क्या राहुल और उनके रेंट-ए-कॉज कार्यकर्ता खुद में सुधार लाएँगे या आगे भी शर्मिदा होते रहेंगे।”

बीजेपी अध्यक्ष ने कहा, “गाँधी परिवार ने पीएमएनआरएफ को दशकों से व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में संचालित किया। पीएमएनआरएफ से नागरिकों की मेहनत से अर्जित धन को अपने परिवार के ट्रस्टों को ट्रांसफर कर दिया है। देश बहुत अच्छी तरह से जानता है कि पीएम केयर्स फंड के खिलाफ अभियान कॉन्ग्रेस द्वारा अपने पापों को धोने का एक प्रयास है।”

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट किया, “सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अभियान चलाए जाने की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि शीर्ष अदालत ने NDRF को पीएम केयर्स फंड के ट्रांसफर का आदेश देने से इनकार कर दिया है।” अमित मालवीय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि पीएम केयर्स फंड पब्लिक चैरिटेबल फंड की तरह ही है। इसे एनडीआरएफ को ट्रांसफर किए जाने की जरूरत नहीं है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (अगस्त 18, 2020) को पीएम केयर्स फंड में जमा पैसों को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में ट्रांसफर करने की माँग ठुकरा दी। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये दोनों फंड अलग हैं। नवंबर 2019 में बनी योजना ही पर्याप्त है। अलग से योजना बनाने की जरूरत नहीं है।

नेताजी की पुण्यतिथि: अफवाह या सच? PM मोदी द्वारा कोई संदेश न दिया जाना क्या संदेश देता है?

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु को ‘मनाने’ की जितनी दिलचस्पी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू में थी उतनी ही आज की कॉन्ग्रेस में भी मौजूद नजर आती है। इस वर्ष भी 18 अगस्त की तारीख आई लेकिन इस बात पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तथाकथित पुण्यतिथि पर किसी भी प्रकार का कोई संदेश जारी नहीं किया।

यह भी सम्भव है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कॉन्ग्रेस द्वारा घोषित पुण्यतिथि 18 अगस्त पर पीएम नरेंद्र मोदी का मौन कुछ संदेश देना चाहता हो। नेताजी की देहांत को लेकर अभी तक यही प्रचलित मत रहा है कि अगस्त 18, 1945 को विमान हादसे के शिकार हो गए थे।

नेताजी की पुण्यतिथि: अफवाह या सच?

आज जब केजरीवाल व कुछ अन्य नेता, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी की पुण्यतिथि बता रहे हैं। कॉन्ग्रेस, जो एक दौर में INA के अस्तित्व तक को समर्थन नहीं दे सकी थी, वह अब नेताजी की पुण्यतिथि को लेकर हमेशा से ही कौतुहल में नजर आती है। लेकिन क्या नेताजी सच में आज की तारीख को दिवंगत हुए थे?

क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस का विमान फोरमोसा (अब ताइवान) में दुर्घटना का शिकार हो गया था और इसमें नेताजी मारे गए थे? या फिर वह बच गए थे और सर्बिया चले गए थे? या फिर ‘विमान हादसा’ महज एक जरिया था, उन्हें सुरक्षित निकल जाने देने के लिए? आइए जानते हैं इस कथित पुण्यतिथि के आसपास घूमती कहानियाँ, वे कहानियाँ, जो दंतकथा न होकर सम्बन्धित विषय पर इतिहासकारों एवं शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शोध व साक्ष्य पर आधारित हैं।

प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते कुछ मोर्चों पर असफल होने के कारण चालीस हज़ार से भी अधिक पराक्रमी सैनिकों वाली आज़ाद हिन्द फ़ौज को नेताजी विखंडित कर ही चुके थे और कुछ समय बाद हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमरीका ने ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाली आज़ाद हिन्द फौज के सहयोगी मित्र जापान के दो शहरों में सन 1945 दिनांक 6 व 9 को परमाणु बम गिरा दिए।

हफ्ते भर के भीतर जापान आत्मसर्पण कर चुका था, इसलिए नेताजी के सामने दुविधा आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों का ध्यान रखते हुए आत्मसमर्पण कराने को लेकर थी कि उनका समर्पण जापान के साथ सामूहिक होगा या व्यक्तिगत!

इसी से संबंधित वार्ता करने हेतु सुभाष सिंगापुर से बैंकाक और वहाँ से टोक्यो में जापान के उच्च अधिकारीयों से भेंट कार्यक्रम निर्धारित कर 15 अगस्त को निकल पड़े। 16 को बैंकाक, फिर 17 अगस्त को आज़ाद हिन्द फ़ौज के अपने कुछ साथियों समेत वियतनाम के शहर साइगोन पहुँचे।

17 अगस्त की शाम को फिर उनके जहाज ने उड़ान भरी और अगले दिन तायपेई पहुँचकर रुके, जिसके बाद ये माना जाता है कि उड़ान भरते ही उनका जहाज क्रैश कर गया और उनके थर्ड डिग्री तक जल जाने के कारण उनकी मौत हो गयी।

उनके साथ मौजूद उनके करीबी हबीब उर रहमान ने कथित तौर पर उनका क्रियाकर्म करवाया और अस्थियाँ जापानी प्रशासन को सौंप दी, जिन्हें आज भी जापान के रैंकोजी मंदिर में रखा गया है और अस्थियों पर भी विवाद जारी है, शाह नवाज जाँच कमिटी के अनुसार यह भी जिक्र आता है कि वह अस्थियाँ जापानी सिपाही इचिरो ओकरा के नाम से रखी गईं।

इसके अलावा, मुखर्जी आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में भी स्पष्ट रूप से इस बात को नकार दिया गया था कि नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में हुई थी। हालाँकि, तब सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट स्वीकार नहीं की थी।

मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट का हिस्सा

अगर प्लेन क्रैश नहीं हुआ तो नेताजी गए कहाँ ?

स्वभाविक सा प्रश्न है कि यदि प्लेन क्रैश में नेताजी कि मृत्यु नहीं हुई तो वे गए कहाँ? नेताजी की प्लेन क्रैश घटना के ग्यारह दिन बाद 29 अगस्त को नेताजी पर कॉंग्रेस द्वारा जारी प्रेस ब्रीफिंग के दौरान अमरीकी सेना को कवर करने वाले शिकागो ट्रिब्यून के पत्रकार अल्फ्रेड वैग ने जवाहर लाल नेहरू को प्रेस ब्रीफिंग के बीच में टोका और बताया कि उनके साथियों ने चार दिन पहले अर्थात 25 अगस्त को नेताजी को सागौन शहर में देखा (अख़बार कि कतरन संलग्न है)।

इस क्षण से आगे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोस की मृत्यु को लेकर संदेह उभरने शुरू हो गए और स्वंत्रता के बाद भी भारत की सत्ता पर आसीन सत्ताधारियों व अंग्रेज़ों के बीच यह तय हुआ कि बोस के पाए जाने पर उन्हें जीवित या मृत, अलाइड शक्तियों के हवाले कर दिया जाना चाहिए क्योंकि जापानियों के सहयोग से अंग्रेज़ों के खिलाफ भारत की स्वतन्त्रता के लिए लड़ने वाले बोस ‘वॉर क्रिमिनल’ (युद्ध के अपराधी) थे।

इस तथ्य को पत्थर को वालेट साबित करने की क्षमता रखने वाले ऑल्टन्यूज़ जैसे ही तमाम कॉन्ग्रेस पोषित संस्थान सदियों से प्रयास करते आए हैं और इसे विवादित साबित करने के अनेकों प्रयास भी किए और इस तथ्य को विवादित या फिर संदेहास्पद बनाने का कारनामा किया है।

हारकर भी अपने संघर्ष का लोहा मनवाने वाली आज़ाद हिन्द फौज और नैवेल म्यूटिनी के बारे में इस श्रृंखला की अगली कड़ी में।

शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ ने फैलाया झूठ, स्वास्थ्य मंत्रालय ने सही करते हुए कहा: सत्य से बहुत दूर है यह खबर

स्वास्थ्य मंत्रालय ने शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘दी प्रिंट’ द्वारा प्रकाशित एक फर्जी, मनगढ़ंत रिपोर्ट को फेक और खुराफात से भरा हुआ बताते हुए कहा है कि यह रिपोर्ट सत्य से बहुत दूर है।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (15 अगस्त) को कहा कि लड़कियों की शादी की उपयुक्त उम्र क्या होनी चाहिए, इस बारे में सरकार विचार कर रही है और इस सिलसिले में एक समिति भी गठित की गई है। जिसने शेखर गुप्ता के दी प्रिंट को फेक और मनगढ़ंत खबर प्रकाशित करने का मौका दे दिया।

दी प्रिंट ने आज मंगलवार (अगस्त 18, 2020) को एक रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए दावा किया कि महिलाओं की विवाह की उम्र को लेकर मंत्रालय और अधिकारियों के बीच विवाद है और इसके साथ ही कुछ बेहद काल्पनिक तथ्यों को मंत्रालय के हवाले से रख दिया है।

लेकिन मंत्रालय ने शेखर गुप्ता की वेबसाइट दी प्रिंट के इस काल्पनिक दावे का खंडन किया है और स्पष्ट किया है कि वे वास्तव में इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं, जिसे लेकर शेखर गुप्ता के पोर्टल ने फर्जी खबर प्रकाशित की है। मंत्रालय ने लड़कियों के लिए शादी की उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन करने का अपना कारण भी बताया।

हालाँकि, ‘दी प्रिंट’ ने बेहद चालाकी से इसी रिपोर्ट में दावा किया है कि उन्होंने इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रवक्ता मनीषा वर्मा से बात करने की कोशिश की लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक उनसे बात नहीं हो पाई। लेकिन, शायद इसका मतलब यह नहीं था कि यदि किसी मंत्रालय से आधिकारिक बयान मिलने में देरी हो जाए तो काल्पनिक खबर को बेबुनियाद आधारों पर ‘सूत्रों के हवाले से’ प्रकाशित कर दिया जाए।

‘दी प्रिंट’ ने काल्पनिक सूत्रों के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा है कि पिछले साल तक सरकार पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता लाने के लिए पुरुषों की शादी की उम्र को 21 की वर्तमान सीमा से 18 तक कम करने की ओर जोर दे रही थी। इसके साथ ही दी प्रिंट के ‘दूसरे सूत्रों’ ने उन्हें बताया कि अधिकारियों ने सरकार को यही करने की सलाह देते हुए कहा कि महिलाओं की उम्र बढाने की जगह पुरुषों की उम्रसीमा बढ़ने पर विचार करना चाहिए।

दी प्रिंट ने इस रिपोर्ट में कहा है कि अधिकारियों ने तर्क देते हुए उन्हें बताया कि लड़कियाँ 21 से पहले यौन रूप से सक्रिय हो जाती हैं और यदि सरकार शादी की उम्र बढ़ाती है, तो उनमें से कई अपने प्रजनन या यौन अधिकारों के लिए औपचारिक स्वास्थ्य प्रणाली का लाभ नहीं उठा सकेंगी।

‘सूत्रों’ द्वारा दी प्रिंट के पत्रकारों को दिए गए एक अन्य बयान में अधिकारियों ने कहा कि यदि लड़कियों के विवाह की उम्र 18 से 21 कर दी जाती है तो इससे बाल विवाह के भी केस सामने आएँगे।

प्रिंट ने कहा है कि अधिकारियों ने बताया है कि ‘अभी बाल विवाह मान्य नहीं हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में कहा था कि नाबालिग पत्नी के साथ सेक्स करना बलात्कार है – इसलिए, हम ऐसी स्थिति में हैं, जहाँ 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शादी अवैध नहीं है, लेकिन उसके साथ सेक्स करना अपराध है।

मंत्रालय ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए और दी प्रिंट की इस रिपोर्ट को फेक बताते हुए कमेटी को भेजा गए अपने नजरिए को रखा है, जिसमें मंत्रालय ने कहा है कि लड़कियों की विवाह की उम्र बढ़ाने के पीछे का मकसद उन्हें आर्थिक, वैचारिक और मानसिक रूप से परिपक्व होने देना है। मंत्रालय ने कहा है कि लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाना उन्हें अपने हर प्रकार के फैसले लेने का अधिकार भी देगा।

ख़ास बात यह है कि दी प्रिंट ने इस स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा फेक ठहराई गई इस रिपोर्ट के बीचों-बीच ‘गुड जर्नलिज्म मैटर्स’ का हवाला देते हुए अच्छी पत्रकारिता को जिन्दा रखने के लिए लोगों से उन्हें दान देने की भी अपील की है –

हर रात अपनी माँ को जगत जननी के नाम से खत लिखते थे पीएम मोदी: ‘Letters to Mother’ के रूप में प्रकाशित हुए वो पत्र

अपने परिवार से सामाजिक नाता तोड़ने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के एक पुत्र बन कर रहे हैं। इसलिए अपने युवावस्था में, जब वे पत्र लिखने के लिए बैठते थे, तो वो इसे ‘जगत जननी’ या ‘देवी माँ’ को संबोधित करते थे।

वह शख्स, जिसे आज देश का सबसे ताकतवर पद हासिल है, उनका बचपन काफी दुष्कर रहा है। 17 साल की उम्र में पीएम मोदी घर संसार के बंधनों से मुक्त होकर हिमालय पर साधना के लिए चले गए थे। मोदी ने एक बार इसको लेकर कहा था, “मैं अनिर्दिष्ट और अस्पष्ट था। मुझे नहीं पता था कि मैं कहाँ जाना चाहता था, मैं क्या करना चाहता था और क्यों करना चाहता था। लेकिन मुझे इतना पता था कि मैं कुछ करना चाहता था।”

प्रधानमंत्री 1971 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए। माँ के प्रति पीएम मोदी की श्रद्धा, प्रेम और आस्था के बारे में पूरी दुनिया जानती है। जून माह में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की रिलीज हुई किताब ‘Letters to Mother’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देवी माँ के प्रति आस्था से रूबरू करवाती है। फिल्म समीक्षक भावना सोमाया मे इस किताब का ट्रांसलेशन किया है। यह 2014 में मूल गुजराती पुस्तक ‘Saakshi Bhaav’ का अंग्रेजी अनुवाद है। हार्परकॉलिंस इंडिया ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। 

प्रधानमंत्री मोदी युवा काल में रोज अपनी माँ को जगत जननी के नाम से पत्र लिखकर सोते थे। प्रधानमंत्री मोदी रोज अपनी सोच और भावनाओं को डायरी के पत्रों में उकेरते थे। उन्हें प्रतिदिन पत्र लिखने की आदत हो गई थी। वे इन पत्रों को गुजराती भाषा में लिखते थे। 

युवा नरेंद्र मोदी जो डायरी लिखते थे, हर 6-8 महीनों में उन पन्नों को जला देते थे। एक दिन एक प्रचारक ने उसे ऐसा करते हुए देखा और उन्हें ऐसा करने से मना किया, बाद में इन पत्रों ने एक पुस्तक का रूप ले लिया। यह 1986 की उनकी लिखी डायरी के बचे हुए पन्ने हैं। 

मोदी ने किताब के बारे में कहा है, “यह साहित्यिक लेखन में एक प्रयास नहीं है, इस पुस्तक में पेश किए गए अंश मेरे अवलोकन और कभी-कभी अपरिवर्तित विचारों के प्रतिबिंब हैं, जो बिना किसी परिवर्तन के व्यक्त किए गए हैं। मैं लेखक नहीं हूँ, हम में से अधिकांश नहीं हैं, लेकिन हर कोई अभिव्यक्ति चाहता है, और जब इसे जाहिर करने का आग्रह प्रबल हो जाता है, तो कलम और कागज के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, जरूरी नहीं कि लिखना हो लेकिन आत्मचिंतन करने और दिल व दिमाग में क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, इसके लिए करना होता है।”

2017 में पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त करने वाली और सिनेमा पर कई किताबें लिख चुकीं भावना सोमाया ने कहा कि मेरे विचार से, एक लेखक के रूप में नरेंद्र मोदी की ताकत उनका भावनात्मक हिस्सा है।

पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं, 

“माँ मुझे शंकाओं से मुक्त कर दो,

निराशाओं

भय और चिंताओं से

विजय और पराजयों से

नुकसान से, संपत्ति से

मुझे सदा के लिए मुक्त कर दो।”

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि जब मैं 36 साल का था तब जगत जननी माँ के साथ मेरे संवाद का एक संकलन है साक्षी भाव। यह पाठक को मेरे साथ जोड़ता है और पाठक को न केवल समाचार पत्रों के द्वारा, बल्कि मेरे शब्दों के द्वारा मुझे जानने में सक्षम करता है।

अक्षय कुमार ने असम बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए दिए ₹1 करोड़: CM सोनोवाल ने दिया धन्यवाद

बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार एक बार फिर अपनी दरियादिली के कारण चर्चा में है। इस बार उन्होंने असम में आई बाढ़ से पीड़ित लोगों की मदद के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया है। यह जानकारी स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने अपने ट्विटर पर ट्वीट करके दी है।

असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने अपने ट्वीट में अक्षय कुमार का धन्यवाद करते हुए लिखा, “असम बाढ़ में राहत की दिशा में 1 करोड़ के अपने योगदान के लिए अक्षय कुमार जी का आभार। आपने हमेशा संकट के समय सहानुभूति और समर्थन दिया है। असम के एक सच्चे दोस्त के रूप में, भगवान आपको वैश्विक क्षेत्र पर अपना प्रताप ले जाने के लिए आशीर्वाद दें।”

बता दें इससे पहले अक्षय कुमार ने बिहार में आई बाढ़ के दौरान भी राहत कोष में 1 करोड़ रुपए दिए थे। उन्होंने इस मदद को पहुँचाने से पहले दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से बात की थी और मदद का आश्वासन दिया था। इस बातचीत के बाद उन्होंने बिहार और असम को 1-1 करोड़ रुपए दान दिए।

उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड कलाकार अक्षय कुमार अक्सर मुश्किल घड़ी में प्रभावित क्षेत्रों की मदद के लिए आगे बढ़कर आते हैं। उन्होंने कोरोना महामारी के समय में भी आगे बढ़कर 25 करोड़ रुपए के दान का ऐलान किया था।

वहीं मुंबई पुलिस फाउंडेशन के लिए उन्होंने 2 करोड़ रुपए और बीएमसी के कोरोना प्रयासों के लिए 3 करोड़ रुपए की मदद का भी ऐलान किया था। अम्फान चक्रवात के समय भी उन्होंने 1 करोड़ रुपए दिए थे और आज जब देश के कई राज्य बाढ़ से प्रभावित हैं। हर जगह पानी घुस गया है तब भी अक्षय कुमार आगे आए हैं।

एक जानकारी के अनुसार, बिहार में बाढ़ से प्रभावित होने वाली कुल संख्या 75 लाख लोगों की है। वहीं असम में 14 हजार लोग इससे जूझ रहे हैं।

नसीरुद्दीन शाह के ‘हाफ एजुकेटेड’ बयान पर कंगना ने कहा- इतने ‘महान’ कलाकार की गालियाँ भी भगवान का प्रसाद

सुशांत सिंह राजपूत के मामले में बॉलीवुड नेक्सस और नेपोटिज्म की बहस को मुख्यधारा में लेकर आने वाली कंगना रनौत के ख़िलाफ़ नसीरुद्दीन ने टिप्पणी करते हुए उन्हें आधा पढ़ा लिखा बताया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के मन में इंडस्ट्री के ख़िलाफ़ गंद भरा हुआ है वो अब मीडिया के सामने जाकर उलटी कर रहे हैं। उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में यह भी दावा किया कि मीडिया में मूवी माफिया जैसा कुछ नहीं है। ये केवल कुछ गिने-चुने लोगों के दिमाग की काल्पनिक कहानी है।

नसीरुद्दीन शाह की मानें तो, “सुशांत सिंह राजपूत केस में कुछ मीडिया हाउस के द्वारा की जा रही असंवेदनशील मीडिया कवरेज शामिल है और वो लोग शामिल हैं जिन्हें लगता है कि वो सुशांत को न्याय दिलाने की जंग लड़ रहे हैं। ये पागलपन है। ये पूरी तरह पागलपन है। मैंने इस फॉलो नहीं किया है।”

उन्होंने कंगना रनौत पर निशाना साधते हुए कहा, “किसी को भी हाफ एजुकेटेड सितारों के बयानों में दिलचस्पी नहीं है जो ये हर चीज खुद पर ले लेती हैं कि सुशांत को न्याय दिलाना है। अगर हमें लगता है कि न्याय मिलना चाहिए तो हमें न्याय की प्रक्रिया में भरोसा रखने की जरूरत है। और यदि हमारा इससे कोई लेना देना नहीं है तो मुझे लगता है कि हमें अपना काम करना चाहिए।”

इसी बयान के सामने आने के बाद कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह पर तंज कसा। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि इतने महान कलाकार की गालियाँ भी प्रसाद की तरह है। वे लिखती हैं- “नसीर जी एक महान कलाकार हैं, इतने महान कलाकार की तो गालियाँ भी भगवान के प्रसाद की तरह हैं, इससे अच्छा तो मैं आपके साथ सिनेमा और क्राफ्ट पर हुई शानदार कन्वर्सेशन को देखूँगी जब आपने मुझे कहा था कि आप मेरी कितनी सराहना करते हैं।”

अपने एक अन्य में ट्वीट में उन्होंने नसीरुद्दीन से पूछा, “धन्यवाद नसीर जी, आपने मेरे सारे अवॉर्ड और उपलब्ध‍ियों को तोल दिया, जो कि नेपोटिज्म के स्केल पर मेरे किसी भी समकालीन प्रतिद्वंदियों के पास नहीं है। मैं इसकी आद‍ि हो चुकी हूँ पर अगर मैं प्रकाश पादुकोण या अन‍िल कपूर की बेटी होती तो भी क्या आप मुझे यही कहते?”

गौरतलब है कि हालिया इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह से जब पूछा गया था कि क्या उन्हें लगता है कि नेपोटिज्म की बहस से कुछ बदलाव आएँगे? तो उन्होंने कहा, इसकी सिर्फ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन इस बहस का स्तर बहुत बचकाना हो रहा है। हम अपने गंदे लंगोट सबके सामने क्यों धो रहे हैं। उन्होंने कंगना रनौत को लेकर भी अपनी बात रखी और कहा कि वह कुछ फिल्ममेकर्स और स्टारकिड्स को निशाना बना रही हैं, यहाँ तक की तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर जैसे एक्टर्स को वह बी ग्रेड बता रही हैं।

महिलाएँ टाइट कपड़े न पहनें, गैर-इस्लामी को जकात न दें, जन्म लेने वाला हर बच्चा इस्लाम धर्म का: जाकिर नाइक का भी ‘बाप’ है उसका बेटा

मलेशिया में छिपे इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक के बारे में तो आपको पता है ही और साथ में उसके अजीबो-गरीब बयान भी सामने आते रहते हैं, जिन्हें जायज ठहराने के लिए वो इस्लामी किताबों का हवाला देता है। अब हम आपको उसके बेटे फरीक जाकिर नाइक के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अपने अब्बा के यूट्यूब पेज पर ही ज्ञान बाँचता है। कट्टरवाद के मामले में वो अपने अब्बा से भी दो कदम आगे है।

फरीक जाकिर नाइक का एक वीडियो है, जिसमें उससे पूछा जाता है कि महिलाओं को घर से बाहर निकल कर जॉब करने का अधिकार है या नहीं, जिसके जवाब में वो कहता है कि इस्लाम में पुरुष को ही घर में रोटी कमाने वाला माना गया है। उसने कहा कि निकाह के पहले पिता व भाई और निकाह के बाद शौहर व बच्चों का काम है कि महिलाओं का ध्यान रखे। उसने यहाँ तक दावा कर दिया कि महिलाओं को काम करने की जरूरत ही नहीं है।

उसने कहा कि महिलाओं को इस्लाम का कोई भी नियम तोड़े बिना ही जॉब करना चाहिए और हिजाब हमेशा पहनना चाहिए। उसने कहा कि महिलाओं की पूरी बॉडी कवर में होनी चाहिए और हाथों व आँखों के अलावा कुछ नहीं दिखना चाहिए, साथ ही टाइट कपड़े नहीं होने चाहिए और ऐसे भी नहीं होने चाहिए जिससे पुरुषों में आकर्षण की फीलिंग आए। साथ ही उसने कहा कि महिलाओं को पुरुषों के साथ काम नहीं करना चाहिए।

साथ ही उसने कहा कि महिलाओं को ‘हराम’ जॉब्स नहीं करने चाहिए, जैसे शराब सर्व करना, या फिर डांसिंग, सिंगिंग या अभिनय करना, क्योंकि इन जॉब्स में वो हिजाब नहीं पहन पाएँगी। उसने कहा कि महिलाओं का मेन फोकस ये रहना चाहिए कि एक अच्छी पत्नी के रूप में वो क्या कर सकती हैं, या बच्चों को लेकर। उसने महिलाओं के लिए शिक्षक, काउंसलिंग व इस्लामी शिक्षा देने को अच्छा जॉब बताया।

एक अन्य वीडियो में वो बताता है कि भाषा के मामले में काफिर का अर्थ होता है छिपने वाला, जबकि इस्लाम में काफिर वो है जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता। उसने कहा कि इस तरह से सारे गैर-इस्लामी काफिर हुए। फरीक के मुताबिक, गैर-इस्लामी को काफिर कहने की पूरी अनुमति है क्योंकि काफिर का इस्लाम के हिसाब से अँग्रेजी अनुवाद ही होगा गैर-इस्लामी। उसने कहा कि अगर किसी काफिर को गैर-इस्लामी कहा जाना पसंद नहीं है तो वो इस्लाम स्वीकार कर ले।

फरीक जाकिर नाइक एक अन्य वीडियो में जकात के बारे में भी समझाता है। एक वीडियो में उसने कहा कि गैर-इस्लामी को जकात नहीं दिया जा सकता, चाहे वो कितना भी जरूरतमंद क्यों न हो। उसने इस्लामी किताबों के हवाले से कहा कि जकात (चैरिटी) केवल इस्लाम मानने वाले को दी जा सकती है या फिर उन्हें, जिनका दिल इस्लाम की तरफ झुका हुआ हो। इसका मतलब समझाते हुए उसने कहा कि जिनसे उम्मीद है कि वो इस्लाम अपना लेंगे, उन्हें जकात दिया जा सकता है।

इसके अलावा एक अन्य वीडियो में फरीक जाकिर नाइक इस सवाल का जवाब देता है कि इस्लाम में ऑनलाइन बिजनेस करने का अधिकार है या नहीं। उसने बताया कि ये किया जा सकता है लेकिन इस्लाम और शरिया के नियमों के अंदर रह कर ही। उसने कहा कि किसी भी हराम प्रोडक्टस को नहीं बेचना चाहिए। साथ ही उसने गैम्ब्लिंग या लक से जुड़े गेम्स को भी हराम बताया। उसने एडवर्टाइजमेंट में बिना हिजाब की महिला को डालना या उसमें म्यूजिक डालना भी हराम बताया।

एक सवाल के जवाब में उसने कहा कि अल्लाह गैर-इस्लामी पर भी दया करते हैं क्योंकि उन्होंने उन लोगों को भोजन और घर दिया है। उसने कहा कि पानी या हवा, ये सब गैर-इस्लामी को भी दिया गया है क्योंकि इसके बिना वो मर जाएँगे – ये दिखाता है कि अल्लाह उस पर भी दया करते हैं। उसने कहा कि अल्लाह लोगों तक खुद ये संदेश पहुँचाते हैं कि हर एक बच्चा इस्लाम मानने वाला ही जन्म लेता है, उसे बाद में हिन्दू या ईसाई बना दिया जाता है।

उसने दावा किया कि अगर कोई इस्लाम अपना रहा है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कन्वर्ट हो रहा है बल्कि इसका अर्थ हुआ कि वो अपने मजहब में लौट रहा है क्योंकि वो जन्मा तो इस्लाम धर्म में ही था। उसने दावा किया कि अल्लाह लोगों को समझाने के लिए किसी न किसी रूप में संदेश भेजते रहते हैं कि वो इस्लाम अपना लें क्योंकि काफिर अगर इस्लाम अपना ले तो उसे अल्लाह क्षमा कर देते हैं।

किसी ने उससे पूछ दिया था कि अल्लाह बार-बार क़ुरान में खुद को ‘We’ कह कर क्यों सम्बोधित करते हैं, जिसके जवाब में उसने कहा कि Plural दो प्रकार के होते हैं। उसने समझाया कि संख्याओं का प्लुरल अलग होता है और अल्लाह वाला जो प्लुरल है, वो ‘रॉयल प्लुरल’ या ‘प्लुरल ऑफ रेस्पेक्ट’ है, जो इंग्लैंड की महारानी भी प्रयोग करती हैं। उसने कहा कि भारत के पीएम भी ‘हम’ कहते हैं, जो प्लुरल है लेकिन रेस्पेक्ट और रॉयल वाला।

इसी तरह फरीक के अब्बा जाकिर नाइक ने कहा था कि रवीश कुमार हों या ‘संप्रदाय विशेष का पक्ष लेने वाले’ अन्य गैर-इस्लामी, उन सभी के लिए समान सज़ा की ही व्यवस्था है। ज़ाकिर नाइक ने अपने अनुयायियों को समझाया था कि जन्नाह अलग-अलग तरह के होते हैं, जैसे फिरदौस और फिरदौस आला। ज़ाकिर नाइक ने स्पष्ट कहा कि गैर-इस्लामी का नरक में जाना तय है। बकौल नाइक, अगर कोई मरते समय इस्लाम धर्म में नहीं है तो उसके लिए नरक की ही व्यवस्था है।

ISIS का आतंकी निकला बेंगलुरु का नेत्र चिकित्सक अब्दुर रहमान, NIA ने दबोचा: आतंकियों के लिए बना रहा था मेडिकल एप्लीकेशन

बेंगलुरु में NIA को बड़ी कामयाबी मिली है, जहाँ खूँखार आतंकी संगठन ISIS के लिए काम करने वाले एक Ophthalmologist (नेत्र चिकित्सक) को गिरफ्तार किया गया है। उसे इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रोविंस से जुड़ाव के लिए गिरफ्तार किया गया गया। गिरफ्तार किए गए डॉक्टर का नाम अब्दुर रहमान (Abdur Rahman है, जो सफेद कॉलर में आतंकी बन कर बैठा हुआ था। वो बेंगलुरु के बसवनगुण्डी का रहने वाला है।

वो एमएस रमैया मेडिकल कॉलेज में बतौर नेत्र चिकित्सक कार्यरत है। NIA ने आतंकी अब्दुर रहमान की गिरफ़्तारी की पुष्टि की है। ये मार्च 2020 में रजिस्टर किए गए केस का ही मामला है, जिसे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा कश्मीरी जोड़े जहाँजेब सामी वानी और उसकी पत्नी हीना बशीर बेग की गिरफ़्तारी के बाद दर्ज किया गया था। ये मामला दिल्ली के जामिया नगर का है। इस कपल का सम्बन्ध ISIS से जुड़े ISKP से था।

अब्दुर रहमान ने NIA की पूछताछ के दौरान कबूल किया है कि वो सीरिया के ISIS के लिए भारत में नेटवर्क बनाने के लिए एक ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिए जहाँजेब से संपर्क में था। वो एक ऐसे मेडिकल एप्लीकेशन पर काम कर रहा था, जिसकी मदद से ISIS के बीमार आतंकियों का इलाज किया जाता। युद्धस्थलों में आतंकी उसका बनाया एप्लिकेशन इस्तेमाल करते। साथ ही वो आतंकी संगठन को कई अन्य मेडिकल फायदे देने पर भी काम कर रहा था।

इन दोनों को देशविरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद पुणे के रहने वाले सादिया अनवर शेख और नबील सिद्दीकी खत्री को गिरफ्तार किया गया था, जो ISIS से जुड़े थे और भारत में सीएए विरोधी हिंसा को माध्यम बना कर आतंकी हमले करने वाले थे। ये सभी अब्दुल्ला बसीत से संपर्क में थे, जो एक अन्य मामले में पहले ही तिहाड़ जेल की हवा खा रहा है।

‘अपनो को भड़काया, बसें-घर जलाए… इस्लामी देश बनाना चाहता था भारत को’ – जामिया के छात्र आसिफ का कबूलनामा

UAPA के तहत गिरफ्तार जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस पूछताछ के दौरान कुछ बड़े खुलासे करते हुए बताया है कि किस तरह से नागरिकता कानून (CAA) और NRC के विरोध के नाम पर उन्होंने लोगों को भड़काने के साथ बसों और घरों को जलाया था। आसिफ इकबाल तन्हा ने कहा कि वो देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहता था और इसीलिए हिंदुओं को तंग कर धार्मिक भावनाएँ आहत करने की साज़िश रची।

जी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (SIO) के सदस्य और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस को दिए बयान में बताया की जब CAA/NRC बिल आया, तो उसे ये बिल संप्रदाय विशेष के लोगों के खिलाफ लगा, जिसके बाद आसिफ इस बिल का विरोध करने के लिए जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ जुड़ गया। आरोपित आसिफ जामिया यूनिवर्सिटी का छात्र है और 2014 से स्टूडेंट इस्लामिस्क ऑर्गेनाइजेशन (SIO) का सदस्य भी है।

दिल्ली पुलिस के हवाले से जी न्यूज़ की इस रिपोर्ट में बताया गया है- “आरोपित आसिफ इकबाल ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि ’12 दिसंबर को हम 2500-3000 लोग जामिया यूनिवर्सिटी के गेट नम्बर 7 पर मार्च कर रहे थे, उसके बाद 13 दिसंबर को शरजील इमाम भड़काऊ भाषण देते हुए चक्का जाम करने की बात कहता है। मैंने खुद लोगों को उकसाया। जामिया मेट्रो से पार्लियामेंट तक मार्च की कॉल दी, जिसमें कई संगठन हमें समर्थन देते हैं। जब हम मार्च कर रहे थे, तो पुलिस ने हमें बैरिकेड लगाकर रोक लिया। तभी मैंने कहा कि तुम आगे बढ़ो, पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं, जो हमें रोक ले। फिर इसी दौरान जब हम जबरदस्ती आगे बढ़े, तो पुलिस ने हमें रोक लिया और लाठीचार्ज हुआ, जिसमें पुलिस और छात्रों को चोट भी आई।”

जी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने कबूलनामे में बताया, “हमने प्लानिंग के तहत 15 दिसंबर को पार्लियामेंट तक मार्च का ऐलान किया, जिसका नाम हमने गाँधी पीस मार्च दिया, ताकि दिखने में ठीक लगे। फिर उसके बाद हम मार्च को जामिया से लेकर जाकिर नगर, बटला हाउस से होते हुए जामिया ले आए। फिर सूर्या होटल के पास पुलिस बैरिकेड लगे थे। हम जबरन बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ गए, पुलिस हमें रोकने की कोशिश की। भीड़ बेकाबू हो गई और पथराव शुरू हो गया। बसों में आग लगा दी जाती है, बहुत दंगा फसाद हो जाता है। इस दौरान JMI के कई छात्र समेत पुलिस वाले घायल हो जाते हैं।”

आरोपित आसिफ इकबाल ने कहा कि जामिया में हुई हिंसा के बाद जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी (JCC) का गठन किया गया था, जिसमें AISA, JSF, SIO, MSF, CYSS, CFI, NSUI जैसे संगठन से जुड़े लड़के शामिल थे। आसिफ ने कहा कि SIO (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाईजेशन) के कहने पर उसने दिल्ली से बाहर के अन्य कई राज्यों में भारत सरकार के खिलाफ संप्रदाय विशेष के लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया था और जरूरत पड़ने पर हिंसक प्रदर्शन के लिए भी कहा था।

आसिफ इकबाल ने दंगों को लेकर होने वाली फंडिंग पर खुलासा किया कि एलुमिनाई एसोसिएशन ऑफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया (AAJMI) भी इस मूवमेंट में जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी के साथ थी और AAJMI और PFI से ही इस योजना की फंडिंग होती थी।

योगी सरकार में 6200 एनकाउंटर: मारे गए 124 अपराधी, ढेर होने वालों में 47 अल्पसंख्यक, 11 ब्राह्मण, 8 यादव

सीएम योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में शपथ लेने के एक महीने बाद कानून व्यवस्था दुरुस्त करने को लेकर कहा था कि अगर अपराध करेंगे तो ठोक दिए जाएँगे। तीन साल गुजर जाने के बाद भी सीएम योगी का मन नहीं बदला है, वह अपने फैसले पर अडिग हैं। बताया जा रहा है कि अब तक अपराधि‍यों और पुलिस के बीच 6,200 से अधि‍क मुठभेड़ हो चुकी है जिनमें 14 हजार से अधि‍क अपराधी गिरफ्तार हुए हैं।

प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद से अपराधियों का सफाया लगातार जारी है। बीते साढ़े तीन साल में पुलिस मुठभेड़ में 124 अपराधी मारे गए। इनमें 47 अल्पसंख्यक, 11 ब्राह्मण और 8 यादव थे। अल्पसंख्यक समुदाय के ज्यादातर अपराधी पश्चिमी यूपी के थे। वहीं, शेष 58 अपराधियों में ठाकुर, वैश्य, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बदमाश शामिल थे।

एनकाउंटर को लेकर विपक्ष के हंगामे के आसार के बीच सरकार ने सवाल के जवाब भी तैयार कर लिए हैं। दरअसल, ब्राह्मणों की हत्या और एनकाउंटर पर हमलावर विपक्ष को जवाब देने के लिए सरकार ने अपने साढ़े तीन साल के कार्यकाल में हुए कुल एनकाउंटर और उसमें मारे गए अपराधियों की जातिवार लिस्ट तैयार की है, ताकि विपक्ष के हमलों का जवाब दिया जा सके। इस लिस्ट के मुताबिक 9 अगस्त 2020 तक प्रदेश में हुए एनकाउंटर में 124 अपराधी ढेर हुए। इनमें सर्वाधिक 45 अपराधी अल्पसंख्यक हैं, जबकि 11 ब्राह्मण हैं।

31 मार्च 2017 से 9 अगस्त 2020 तक यूपी में 124 अपराधी मारे गए। पिछले 8 महीनों में 8 ब्राह्मण अपराधी ढेर हुए। इनमें से 6 अपराधी कानपुर के बिकरू कांड में शामिल विकास दुबे और उसके गुर्गे थे। सबसे ज्यादा एनकाउंटर मेरठ में हुए। मेरठ में 14 अपराधी मारे गए, मुजफ्फरनगर में 11 ,सहारनपुर में 9, आजमगढ़ में 7 और शामली में 5 अपराधी मारे गए।

डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी ने पुलिस पर विशेष वर्ग के लोगों के एनकाउंटर किए जाने के आरोप पर कहा कि इस तरह के आरोप बेबुनियाद हैं। अपराधियों की कोई जाति और धर्म नहीं होता है। पुलिस एनकाउंटर में मारे गए सभी का आपराधिक इतिहास रहा है। कई तो पुलिस कर्मियों की हत्या में शामिल थे। 

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “योगी आदित्यनाथ सरकार ने कभी भी जाति या सांप्रदायिक आधार पर अपराधियों के साथ भेदभाव नहीं किया है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।”

गौरतलब है कि विकास दुबे और राकेश पांडे के एनकाउंटर के बाद एक जाति के अपराधियों के एनकाउंटर पर विपक्ष ने सवाल उठाया था। अब सरकार इन आँकड़ों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अपराधी किसी भी जाति और मजहब का हो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है। माना जा रहा है कि ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर हमलावर विपक्ष की गणित की काट के तौर पर यह लिस्ट बनाई गई है।

बता दें कि एक इंटरव्यू में बेहद बेबाकी के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था, “मैं एनकाउंटर मैन नहीं, सामान्य योगी हूँ, पर जो कानून से खिलवाड़ करेगा उसके लिए संकट आएगा। उत्तर प्रदेश में सुरक्षा हर शख्स को मिलेगी, लेकिन कानून से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं देंगे, कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने का दुस्साहस करेगा उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी।”

सीएम योगी के इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार में हो रहे एनकाउंटर्स को फर्जी बताते हुए कहा कि ठोको नीति की वजह से उन्हीं का एनकाउंटर हो रहा है, जिनका भाजपा सरकार कराना चाहती है।