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बियर बार में भगवान कृष्ण और बिकनी में 7 युवतियाँ: अकरम हुसैन की पेंटिंग, असम पुलिस ले चुकी है एक्शन

असम के एक कलाकार द्वारा बनाई गई भगवान श्रीकृष्ण की आपत्तिजनक पेंटिंग का मामला 5 साल बाद फिर से चर्चा में आ गया है। भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करने वाली ये पेंटिंग असम के पेंटर अकरम हुसैन ने बनाई थी, जिसके खिलाफ कार्रवाई करने की माँग तेज हो गई है। इससे पहले जब अप्रैल 2015 में गुवाहाटी स्थित स्टेट आर्ट गैलरी में इसे प्रदर्शित किया गया था, तब भी इसका खासा विरोध हुआ था।

उस समय असम में कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार थी। जब इस पेंटिंग का प्रदर्शन हुआ था, तब हिंदूवादी संगठनों ने इसका विरोध करते हुए FIR दर्ज कराई थी। हिन्दू जागरण मंच ने अकरम हुसैन पर श्रीकृष्ण को आपत्तिजनक व अश्लील अवस्था में दिखाने के लिए मामला दर्ज कराया था। इस FIR के आधार पर केस भी फाइल हुई थी। उस समय गुवाहाटी के डीसीपी रहे अमिताभ सिन्हा ने इसकी पुष्टि की थी।

सोशल मीडिया पर सवा पाँच साल बाद वायरल हो रही इस पेंटिंग में देखा जा सकता है कि भगवान श्रीकृष्ण एक बियर बार में खड़े हैं। उनके पीछे वाली रैक पर शराब की कई बोतलें रखी हुई हैं। साथ ही 7 युवतियों को अश्लील अवस्था में उनके आस-पास और उनसे लिपटे हुए दिखाया गया है। ये सभी युवतियाँ बिकनी पहने हुए हैं। इनमें से एक जहाँ उनका चुम्बन ले रही है, वहीं दूसरी उनका पाँव पकड़ कर बैठी हुई है।

भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों की अंतरराष्ट्रीय संस्था इस्कॉन ने भी इस पेंटिंग पर आपत्ति जताते हुए असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनवाल से अकरम हुसैन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की माँग की है। संस्था ने इस पेंटिंग को ऑफेंसिव करार देते हुए कहा कि सरकार को पेंटर के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। जब 2015 में इसे लेकर विवाद हुआ था तो पेंटर अकरम हुसैन ने माफ़ी माँगते हुए इस पेंटिंग को हटा लिया था।

बता दें कि भगवान श्रीकृष्ण की बचपन में गोपियों के साथ की गई रासलीला, राधा के साथ उनके प्रेम सम्बन्ध और 16 हजार रानियों वाली कथाओं को अक्सर गलत तरीके से पेश किया जाता रहा है। हालाँकि, जब गोपियों के साथ वो शरारत करते थे तब वो बच्चे थे और जिन रानियों को उन्होंने एक क्रूर राजा के चंगुल से आज़ाद किया था, उनके साथ उन्होंने विवाह किया था ताकि उन्हें समाज में स्वीकार्यता दिला सकें। लेकिन, लिबरल गैंग बिना कुछ जाने आलोचना का आदी रहा है।

इस मामले में असम सरकार के मंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने इस्कॉन के ट्वीट पर अपना या यूँ कह लें कि आधिकारिक बयान दिया है।

असम की गुवाहाटी पुलिस ने भी इस संबंध में ट्वीट कर स्थिति स्पष्ट की है।

मस्जिद की ‘पवित्रता’ भंग… क्योंकि हुई गाने की शूटिंग: अभिनेत्री सबा कमर के खिलाफ FIR, चलेगा ईशनिंदा का मुकदमा

पाकिस्तान में एक अभिनेत्री पर सिर्फ इसीलिए ईशनिंदा का मुकदमा दायर कर दिया गया क्योंकि उसने मस्जिद में एक वीडियो की शूटिंग की थी। अभिनेत्री सबा कमर और गायक बिलाल सईद सहित कई लोगों के खिलाफ लाहौर का वज़ीर खान मस्जिद की ‘पवित्रता भंग करने’ का आरोप लगाया गया है। इन दोनों ने मस्जिद के भीतर म्यूजिक वीडियो की शूटिंग की थी। कोर्ट ने पुलिस को क़ानून के हिसाब से कार्रवाई करने का आदेश भी दे दिया है।

उक्त मस्जिद को पाकिस्तान का एक ऐतिहासिक स्थल माना जाता है और वहाँ गाने की शूटिंग के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया। अधिवक्ता सरदार फरहत मंजूर खान ने सबा कमर के खिलाफ मामला दर्ज कराया था, जिस पर एडिशनल डिस्ट्रिक्ट सेशन जज अतिकुर रहमान ने गुरुवार (अगस्त 13, 2020) को सुनवाई की। लाहौर में मस्जिद की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताने के लिए लोगों ने सबा कमर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया।

वकील ने अपनी याचिका में कहा था कि न सिर्फ अभिनेत्री सबा कमर और गायक बिलाल सईद, बल्कि प्रोडक्शन कम्पनी की पूरी टीम के साथ-साथ ‘पंजाब ऑक्फ’ व मजहबी मामलों के विभाग के खिलाफ भी केस दर्ज करने का आदेश दिया जाए। अकबरी गेट पुलिस स्टेशन में पाकिस्तान पैनल कोड के धारा-295 (मजहब सम्बन्धी अपराध) के तहत किसी मजहबी स्थल को नुकसान पहुँचाने और उसे अशुद्ध करने का आरोप लगाया गया।

जबकि पाकिस्तान स्थित पंजाब प्रान्त के स्थानीय प्रशासन का कहना है कि 30,000 रुपए के पेमेंट के बाद उन्हें मस्जिद में शूटिंग की अनुमति दी गई थी। अब वहाँ के मुख्यमंत्री उस्मान बुज़दार ने भी इस मामले में जाँच का आदेश दिया है। वहीं सबा कमर ने वीडियो जारी करते हुए कहा कि मस्जिद में निकाह का दृश्य शूट किया गया, जिसमें कोई म्यूजिक नहीं दिया गया है। साथ ही उसमें एडिट कर के भी म्यूजिक ट्रैक नहीं डाला गया।

अभिनेत्री ने ‘कबूल’ गाने को लेकर सफाई देते हुए कहा कि अगर अनजाने में ही उन्होंने कोई गलती की है या लोगों की भावनाओं को आहत किया हो तो वो माफ़ी माँगती हैं। उन्होंने कहा कि इस गाने के जो पोस्टर हैं, उसमें दिखाया गया है कि मस्जिद में निकाह के बाद किस तरह से एक जोड़ा ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िंदगी जी रहा है। बता दें कि ये गाना 11 अगस्त को रिलीज हुआ था, जिसके बाद विवाद शुरू हुआ।

वहीं गायक बिलाल सईद को भी माफ़ी माँगनी पड़ी। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में जो भी हुआ, उससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँची है। उन्होंने कहा कि वो लोग इस्लाम को मानने वाले हैं और इसीलिए एक अच्छे नागरिक हैं, जो किसी भी मजहब का अपमान नहीं कर सकते। वहीं उधर मस्जिद के मैनेजर को सस्पेंड कर दिया गया है। पंजाब के मंत्री ने कहा है कि दोषी कितने भी बड़े पद पर बैठे हों, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।

‘शरजील इमाम के बचाव में तवलीन सिंह और AltNews की मीटिंग – NDTV सूत्र’: व्यंग्यात्मक ट्वीट पर केस दर्ज

मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए कुख्यात लेखक तवलीन सिंह ने पटियाला हाउस कोर्ट में ट्विटर यूजर ‘पोकर शाश’ के खिलाफ केस दर्ज करा रखा है। ट्विटर पर ‘बेफिटिंग फैक्ट्स’ नामक यूजर ने इसका खुलासा किया। उसने बताया कि उसे पता चला है कि पटियाला हाउस कोर्ट में तवलीन सिंह ने ‘पोकर शाश’ के खिलाफ सिविल सूट दायर कर रखा है, जिसकी तीन सुनवाई हो भी चुकी है।

यह भी पता चला है कि तीनों सुनवाई में ‘पोकर शाश’ उपस्थित नहीं हो सके क्योंकि उन्हें इस सम्बन्ध में कोई सूचना ही नहीं दी गई थी। सबसे बड़ी बात तो यह कि तवलीन सिंह ने ये मुकदमा ‘पोकर शाश’ के एक ऐसे ट्वीट को लेकर दायर किया है, जो व्यंग्यात्मक है। सटायर को लेकर आहत हुईं तवलीन सिंह ने मुकदमा दर्ज करा दिया लेकिन आरोपित को इस सम्बन्ध में कोई सूचना नहीं मिली, जिससे वो सुनवाई में भाग नहीं ले सका।

ट्विटर पर जो स्क्रीनशॉट शेयर किया गया है, उसके हिसाब से ये मुकदमा जनवरी 29, 2020 को दायर कराया गया था और इसके अगले ही दिन इसे रजिस्टर कर लिया गया था। इस मुक़दमे की पहली सुनवाई 16 मार्च को हुई थी, उसके बाद 1 जून और 22 जुलाई को क्रमशः दूसरी और तीसरी सुनवाई हुई। आगामी 30 सितम्बर को फिर से इस मामले की सुनवाई होनी है, जो इसकी चौथी तारीख होगी।

अब आपको बताते हैं कि वो ट्वीट क्या था, जिसे लेकर तवलीन सिंह ने मुकदमा दर्ज कराया। दरअसल, ‘पोकर शाश’ ने लिखा था कि उन्हें एनडीटीवी के सूत्रों से मालूम हुआ है कि तवलीन सिंह, जफ़र सरेशवाला और ऑल्टन्यूज़ के बीच एक बैठक हुई है, जिसमें शरजील इमाम का बचाव किए जाने पर रणनीति बनी। इसके बाद उन्होंने लिखा था, “इस बैठक में फैसला हुआ कि शरजील इमाम ये नहीं कह रहा था कि असम को इंडिया से काट देंगे, वो कह रहा था कि आज शाम को नदिया के पार चलेंगे।”

इसके बाद ‘पोकर शाश’ ने लाफिंग इमोजी का भी इस्तेमाल किया, जो बताता है कि ये एक सटायर वाला ट्वीट था और उन्होंने इसे हँसी-मजाक में लिखा था। ज्ञात हो कि शाहीन बाग़ में उपद्रव की साजिश रचने वाले शरजील इमाम ने न सिर्फ महात्मा गाँधी को फासिस्ट कहा था, बल्कि चिकेन्स नेक को काट कर उत्तर-पूर्वी भारत को शेष भारत से खंडित कर अलग करने की धमकी दी थी। उसने लोगों को भड़काया था।

पिछले महीने तवलीन सिंह ने वीरगति को प्राप्त एक जवान की माँ के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया था। बता दें कि ये उसी आतिश तासीर की माँ हैं, जिसका पिछले साल नवंबर में ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) स्टेटस रद्द कर दिया गया था। उन्होंने बलिदानी सैनिक की माँ मेघना गिरीश की देशभक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि वह उनसे ज्यादा देशभक्त हैं, क्योंकि वो एक सैनिक की बेटी हैं और आर्मी स्टेशन में पली-बढ़ी हैं।

बता दें कि तवलीन सिंह उसी गैंग का हिस्सा हैं, जो आज सुप्रीम कोर्ट की इसीलिए आलोचना कर रहा है क्योंकि प्रशांत भूषण पर अवमानना की कार्रवाई की जा रही है। एक ट्वीट से आहत होकर सीधा मुकदमा दर्ज कराने वाले ये लोग पूछते हैं कि अगर प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर के CJI का अपमान कर ही दिया तो क्या हो गया? वो पूछते हैं कि क्या एक ट्वीट से सुप्रीम कोर्ट को ख़तरा पैदा हो गया? जबकि खुद आहत होकर कोर्ट भागते हैं।

फैजी बनीं प्रीति, अपनी मर्जी से की हिंदू लड़के से शादी: बहन ने पूर्व BJP मेयर पर लगाया धर्म परिवर्तन का आरोप

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में करीब एक हफ्ता पहले संप्रदाय विशेष की एक लड़की ने भागकर अपने हिंदू प्रेमी से विवाह कर लिया। इस घटना के बाद लड़की के जीजा ने हिंदू लड़के पर केस दर्ज करवाया और फिर बाद में लड़की की बहन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा की पूर्व मेयर शकुंतला भारती पर गंभीर आरोप मढ़े।

रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में लड़की की बहन ने भाजपा की पूर्व मेयर शकुंतला भारती पर इल्जाम लगाया कि वह संप्रदाय विशेष की लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवा कर उनकी शादी हिंदू लड़कों से करवाती हैं।

वहीं, शकुंतला भारती ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों का खंडन किया और कहा कि अगर कोई उनके ऊपर लगे आरोपों को सिद्ध कर दे तो वह राज्य को हमेशा के लिए छोड़ देंगी।

शकुंतला भारती ने इन आरोपों को खारिज करने के साथ ही ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की हैं। वे कहती हैं, “अगर जाँच में ये निकल आया कि मुझे इस धर्म परिवर्तन के बारे में जानकारी थी, तो मैं उत्तर प्रदेश छोड़ दूँगी और दोबारा नहीं लौटूँगी। साबित करो अगर कर सकते हो तो और अगर नहीं कर सकते तो ऐसी बातें मत करो। ये लोग केवल मेरी छवि बिगाड़ना चाहते हैं।”

यहाँ बता दें कि जिस लड़की की हिंदू लड़के से शादी पर उसकी बहन और जीजा ने इतना बवाल किया, उसने खुद ये बात कही है कि उसने अपनी मर्जी से विवाह किया। उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं है।

उल्लेखनीय है कि फैजी नाम की लड़की अपने घर से 7 अगस्त को गायब हुई थी। इसके बाद उसके जीजा परवेज ने हिंदू युवक के ख़िलाफ़ केस दर्ज करवाया। उसने आरोप लगाया कि उसकी साली एक हिंदू लड़के के साथ भाग गई है और घर से जेवरात व कैश भी ले गई है। इसके अलावा शिकायत में यह भी कहा गया कि लड़की ने हिंदू लड़के से शादी करने के लिए अपना धर्म-परिवर्तन कर लिया है।

दूसरी ओर लड़की की बहन आशिया सैफी ने शकुंतला भारती पर अपनी बहन के अपहरण के बाद धर्म-परिवर्तन के आरोप मढ़ दिए। आशिया ने पुलिस पर भी आरोप लगाया कि पुलिस इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं कर रही। लेकिन जब मीडिया की धमकी दी तो पुलिस ने फौरन शिकायत लिखकर उसकी बहन को ढूँढ निकाला।

परवेज की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 363, 366 के तहत मामला दर्ज करके लड़की को ढूँढा और उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। लड़की ने अपने बयान में कहा कि वह बालिग है और उसने अपनी मर्जी से ऋषभ के साथ शादी की है।

ऋषभ ने भी अपने ऊपर लगे इल्जामों पर बताया कि वह शकुंतला भारती के पास अपनी सुरक्षा के लिए खुद गए थे क्योंकि उन्हें जान से मारने की धमकी दी जा रही थी। बस इसलिए शकुंतला भारती ने शादी होने के बाद प्रशासनिक रूप से उनकी मदद की थी।

ऋषभ कहते हैं, “शादी होने से पहले तो मेरे परिवार तक को नहीं पता था कि मैं कहाँ हूँ। जब मैं शादी होने के बाद उनके पास गया तो शकुंतला भारती मुझे अफसरों के पास ले गईं। उनका शादी में कोई रोल नहीं है।”

यहाँ बता दें कि हिंदू लड़के के मुताबिक, उसका फैजी के घर पहले से आना-जाना था। इसी बीच दोनों की लव स्टोरी शुरू हुई और 2 साल के प्रेम प्रसंग के बाद 10 अगस्त को उन्होंने आर्य समाज मंदिर में शादी भी कर ली।

फैजी से अब प्रीति बन चुकी लड़की भी भाजपा की पूर्व मेयर पर लगे इल्जामों का खंडन करते हुए यह स्पष्ट बताती हैं, “शकुंतला भारती पर लग रहे इल्जाम गलत हैं। इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है। वास्तविकता में मेरी बहन नहीं चाहती कि मैं इन लोगों के साथ रहूँ। वो इनके साथ दुर्व्यवहार भी करती है।”

घर में बम बनाते समय मारा गया TMC ‘कार्यकर्ता’ हुमायूँ कबीर, 10 साल का बेटा भी घायल: पार्टी ने किया इनकार

पश्चिम बंगाल की एक घटना ससमने आई है, जहाँ एक व्यक्ति अपने घर में ही बम बनाते हुए मारा गया। ये घटना मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज की है, जहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस का कार्यकर्ता हुमायूँ कबीर शनिवार (अगस्त 15, 2020) की रात अपने घर की छत पर बैठ कर बम बना रहा था। इसी दौरान बम विस्फोट कर गया और वो मौके पर ही मारा गया। उसका 10 साल का बेटा भी विस्फोट की जद में आकार घायल हो गया।

हालाँकि, तृणमूल कॉन्ग्रेस ने इस बात से इनकार किया है कि उसके किसी कार्यकर्ता ने इस तरह की हरकत की है। पार्टी ने इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। जंगीपुर के सब-डिवीजनल अधिकारी प्रसेनजीत बनर्जी ने बताया कि शुरुआती जाँच में साफ़ हो गया है क़ी हुमायूँ कबीर अपने घर की छत पर बैठ कर क्रूड बम बना रहा था। अचानक से बम फट गया और वो मारा गया। उसका नाबालिग बेटा भी घायल हुआ।

उन्होंने बताया कि इस मामले में जाँच हो रही है लेकिन अभी तक किसी की भी गिरफ़्तारी नहीं की गई है। स्थानीय लोगों ने पुलिस को बताया है कि हुमायूँ कबीर वहाँ की एक बीड़ी फैक्ट्री में काम किया करता था। शनिवार की रात लोगों ने रात 9 बजे धमाके की आवाज़ सुनी। जब स्थानीय लोग उसके घर की ओर भागे तो वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि तृणमूल कॉन्ग्रेस का कार्यकर्त्ता हुमायूँ कबीर खून से लथपथ था।

मृतक की माँ कंचिनूर बेवा ने दावा किया कि उनका बेटा किसी भी प्रकार की आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि कबीर रात का भोजन करने के बाद छत पर गया था, उसके कुछ ही मिनटों बाद धमाके की आवाज़ सुनाई दी। वहीं पुलिस का कहना है कि कबीर इससे पहले भी आपराधिक गतिविधितयों में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का कहना है कि परिवार ने बम और बम बनाने के सारे समान को हटा दिया, ताकि कोई सबूत न रहने पाए।

हालाँकि, मृतक की माँ ने इन आरोपों को नकार दिया। उन्होंने शक जताया कि किसी और ने उनके घर की तरफ बम फेंका, जिसमें उनका बेटा मारा गया। मुर्शिदाबाद में तृणमूल कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता गौतम घोष ने कहा कि उनकी पार्टी का कोई भी व्यक्ति इस घटना में शामिल नहीं है और उन्होंने पुलिस से कहा है कि वो इस घटना की बिना पक्षपात के जाँच करे। इसे पहले शमशेरगंज के पास सूती में ऐसी ही घटना में 2 लोग मारे गए थे।

पुलिस को शक है कि आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने बम और हथियारों का निर्माण शुरू कर दिया है। वैसे भी पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। पहले वामपंथी और अब तृणमूल कॉन्ग्रेस के लोग इसमें शामिल रहे हैं। रविवार को भाजपा ने हुगली में अपने कार्यकर्ता के मारे जाने के विरोध में राज्यव्यापी बंद बुलाया था। उस मामले में अब तक 6 की गिरफ़्तारी हुई है।

ज्ञात हो कि हुगली के आरामबाग स्थित खनकुल में झंडा फहराते समय एक भाजपा कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी। सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडों पर हमला करने का आरोप है। मृतक भाजपा कार्यकर्ता का नाम सुदर्शन प्रमाणिक है। बताया जा रहा है कि उन पर झंडोत्तोलन के दौरान गुंडों ने धारदार हथियारों से हमला किया। उन्हें स्थानीय हेल्थ सेंटर ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

चप्पल उतारीं, सिर झुकाया… फिर तिरंगे को किया सलाम: बुजुर्ग महिला का जज्बा CCTV में कैद, वीडियो वायरल

भारत के आम जनमानस के मन में भारतीय प्रतीक चिह्नों, खासकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा झंडा के लिए जो सम्मान है, वो वामपंथी कभी नहीं समझ सकते। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक महिला किस तरह से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा झंडा के साथ पेश आती हैं, वो देखने लायक है। गौर करने वाली बात है कि उस समय उस महिला को नहीं पता होता है कि उनका वीडियो बनाया जा रहा है।

वीडियो मे देखा जा सकता है कि सड़क से गुजर रही वो महिला जैसे ही तिरंगा झंडा को देखती हैं, वो वहाँ रुक जाती हैं। इसके हाथ में थैला है, जिसे वो जमीन पर ही रख देती हैं और चप्पल खोल कर झंडे की ओर बढ़ती हैं। बता दें कि भारतीय परंपरा में पूजा स्थलों और पवित्र जगहों पर जूते-चप्पल उतार कर ही जाने का रिवाज रहा है। ऐसे में उक्त महिला के मन में तिरंगा झंडा के लिए भी वही सम्मान है, जो देवी-देवताओं के लिए।

इसके बाद वीडियो में महिला को झंडे के पास आकार उस पर मत्था टेकते हुए देखा जा सकता है। साथ ही वो दोनों हाथों से झंडे को प्रणाम करती हैं। महिला तिरंगा झंडा के पास की मिट्टी को छू कर आशीर्वाद लेती हैं। वीडियो में ये सारा दृश्य कैद हो गया, जिसका उस माहिला को पता भी नहीं चला। ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर करते हुए लोगों ने लिखा कि जमात ए लिबरल और जेहादियों के मुँह से भारत माता की जय नहीं बोला जाता लेकिन करोड़ों भारतीय देश को माँ से कम नहीं मानते।

एक तरह से ये बात सही भी है क्योंकि रामायण में ही भगवान श्रीराम ने जन्मभूमि की तुलना माता से कर के ये बता दिया है कि व्यक्ति के लिए राष्ट्र का वही स्थान है, जो उसके घर मे उसकी माँ का। हिन्दू धर्म में बच्चों को शुरू से ही देश और राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों का वैसे ही सम्मान करना सिखाया जाता है, जैसे कि हिन्दू देवी-देवताओं का। दोनों को अलग कर के नहीं देखा जाता। तभी अपने देश को हम भारत माँ कहते हैं।

शनिवार (अगस्त 15, 2020) को पूरे देश में 74वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किला पर झंडा फहराया। इस दौरान दरभंगा और गोपालगंज के स्कूलों में बाढ़ मे डूबे लोग भी अपनी छाती तक पानी में पैठ कर ध्वजारोहण करते नजर आए। तिरंगा के लिए हमारे देश के आम लोगों के मन में जो सम्मान है, वो देश के हर कोने से आई इन घटनाओं से झलक जाता है।

‘भारतीय रास्ते में आने वाले कुत्ते’ और PM मोदी को अपशब्द: जर्मनी में पाकिस्तानियों ने खालिस्तान के लिए किया प्रदर्शन

जर्मनी के प्रान्त हेसेन के सबसे बड़े शहर फ्रैंकफर्ट में भारत विरोधी नारे लगाए गए। साथ ही भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अपशब्द भी कहे गए। ट्विटर पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि वहाँ जमे पाकिस्तानी कट्टरपंथी ‘खालिस्तान ज़िंदाबाद’ और भारत-विरोधी नारा लगा रहे हैं और भारत को खंडित कर के सिखों के लिए अलग मुल्क की माँग कर रहे हैं। फ्रैंकफुर्ट के इस वीडियो की लोग आलोचना कर रहे हैं।

जर्मनी में भारतीय मूल के सिविल इंजीनियर प्रशांत वंगुरलेरकर ने ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर किया। इसमें एक व्यक्ति हाथ में तिरंगा झंडा लिए हुए है और उधर खालिस्तानी गिरोह विरोध प्रदर्शन कर रहा है। उनका भारत विरोधी रवैया देख कर ये शख्स कहता है, “बाप, बाप होता है। बेटा, बेटा होता है।” गौर करने लायक बात ये है कि खालिस्तान के लिए हो रहे इस प्रदर्शन में पाकिस्तानी झंडे लहरा रहे थे।

वीडियो में पाकिस्तानी झंडा लिए लोगों को देखा जा सकता है और सिखों की संख्या न के बराबर है। इससे साफ़ पता चलता है कि खालिस्तान सिख कट्टरवादियों की माँग कम है और पाकिस्तान इसे ज्यादा हवा दे रहा है। साथ ही इस विरोध प्रदर्शन में ‘बन के रहेगा पाकिस्तान’ नारा भी लगाया जा रहा है। साथ ही इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ‘हाय-हाय’ के नारे लगाए जा रहे हैं। अपशब्द भी कहे गए।

फ्रैंकफर्ट के इस वीडियो में देखा जा सकता है कि जैसे ही ये पाकिस्तानी एक भारतीय को वहाँ तिरंगा लिए देखते हैं, वो उग्र हो जाते हैं और भला-बुरा कहने लगते हैं। साथ ही नारेबाजी भी तेज हो जाती है। एक पाकिस्तानी बुजुर्ग उग्र होकर रेलिंग पर चढ़ने का प्रयास करता है, जिसे पुलिस द्वारा हटाया जाता है। उन्होंने दावा किया कि वो सच्चाई पर चलते हैं और साथ ही भारतीयों के लिए ‘रास्ते में आने वाले कुत्ते’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।

इससे पहले पंजाब के मोगा में स्वतंत्रता दिवस समारोह से पहले खालिस्तानी तत्वों ने मुख्य प्रशासनिक भवन के ऊपर ही खालिस्तान का झंडा फहरा दिया था। इतना ही नहीं, खालिस्तान समर्थकों ने वहाँ लगे तिरंगे झंडे को भी हटा दिया था। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस घटना को सख्ती से लिया और जिला प्रशासन को ऐसा करने वाले असामाजिक तत्वों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

एक मस्जिद को ढाह कर शौचालय, 2 को ढाह कर शराब-सिगरेट की दुकान, जो इस्लाम में हराम: चीन में उइगर की हालत

चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर पर अत्याचार करके उनका अस्तित्व मिटाने का सिलसिला कोरोना महामारी में भी जारी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चीन के इस प्रांत में उइगर के एक मस्जिद को ढहाने के बाद अब उस जगह पर सार्वजनिक शौचालय बना दिया गया है।

रेडियो फ्री एशिया की रिपोर्ट बताती है कि सरकारी प्रशासन की तरफ से आतुश के सुंगाग गाँव में 2016 के दौरान दो मस्जिदों को गिरा दिया गया था और अब इनकी जगह सार्वजनिक शौचालय बना दिया गया है। जिसे चीन द्वारा “मस्जिद सुधार (Mosque Rectification)” का नाम दिया गया।

सुंगाग से Uyghur Neighborhood Committee के चीफ ने आरएफए को बताया कि टोकूल मस्जिद को ध्वस्त किया गया था। इसके बाद इस जगह पर चीनियों ने शौचालय बनवा दिया। वे कहते हैं, “ये सार्वजनिक शौचालय है… उन्होंने अभी इसे खोला नहीं है, लेकिन यह निर्मित हो चुका है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या वहाँ लोगों को सार्वजनिक शौचालय की आवश्यकता थी। तो उन्होंने बताया, “लोगों के घरों में शौचालय बने हुए हैं। तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है।”

उनका कहना है कि उस जगह कोई पर्यटक भी नहीं जाते। चीन ने केवल ध्वस्त किए गए टोकूल मस्जिद के खंडहर को छिपाने के लिए और वहाँ निरीक्षण के लिए जाने वाले समूहों के लिए टॉयलेट बनवाया है।

एक अन्य निवासी ने आरएफए को बताया कि वहाँ दो अन्य मस्जिदें थी, जिन्हें 2019 में गिरा दिया गया और उनकी जगह पर अब एक दुकान खोली गई है, जिसमें शराब और सिगरेट मिलती है, जिनका सेवन करना इस्लाम में हराम माना जाता है।

RFA के मुताबिक राष्ट्रपति शी जिनपिंग के Mosque Rectification अभियान के तहत प्रांत की 70 प्रतिशत मस्जिदें ढहा दी गई हैं। इसके पीछे सामाजिक सुरक्षा को कारण बताया गया है।

गौरतलब है कि चीन में इस्लाम मानने वालों पर अत्याचार का सिलसिला काफी समय से चल रहा है। उनके ख़िलाफ़, उनकी संस्कृति के ख़िलाफ़, चीनी अधिकारी उनको आए दिन यातनाएँ देते हैं। कभी खबर आती है कि वहाँ पर उइगर महिलाओं का रेप और गर्भपात धड़ल्ले से हो रहा है। तो कभी ये पता चलता है कि वहाँ घरों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बदला जा रहा है। अभी पिछले दिनों रोजे के बीच ये खबर आई थी कि चीन ने रमजान में रोजा रखने को भी अतिवाद का चेहरा बता दिया है।

यदि धार्मिक स्थलों पर हमले की बात करें, तो चीन में मुख्यत: ये सिलसिला 17वीं शताब्दी से शुरू हुआ था। करीब एक हजार वर्ष पहले चीन में तंग वंश ने मस्जिदों पर हमला बोला था। इसके बाद से यह सिलसिला अब तक जारी है। चीन की 1966-76 की सांस्कृतिक क्रांति की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान इस प्रांत की कई मस्जिदें और अन्य धार्मिक स्थल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे।

यहाँ बता दें कि इससे पहले पिछले साल वाशिंगटन स्थित उइगर ह्यूमन राइट्स प्रोजेक्ट (UHRP) ने चीनी सरकार के इस अभियान का विवरण देते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि कैसे उइगर के धार्मिक स्थलों और कब्रिस्तानों को तोड़ा जा रह है। जियोलोकेशन और अन्य तकनीकों का उपयोग करते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 2016 से लेकर 2019 के बीच वहाँ 10 से 15 हजार इस्लामी धर्मस्थलों, मस्जिदों को तोड़ा गया था।

अल्पसंख्यक युवाओं की पुलिस में ज्यादा से ज्यादा भर्ती के लिए पहले से ट्रेनिंग: उद्धव सरकार का ऐलान, मिलेंगे रुपए भी

महाराष्ट्र में मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप उद्धव ठाकरे की सरकार पर लग रहा है। राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि वहाँ अल्पसंख्यक युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में पुलिस में उनकी भर्ती हो। महाराष्ट्र की उद्धव सरकार में अल्पसंख्यक विकास और स्किल डेवलपमेंट मामलों के मंत्री नवाब मलिक ने इसकी घोषणा करते हुए इससे जुड़ी जानकारी साझा की।

शरद पवार की एनसीपी के नेता व मंत्री नवाब मलिक ने ट्विटर पर साझा की गई सूचना में बताया है कि पुलिस में भर्ती से पहले अल्पसंख्यक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में अल्पसंख्यक पुलिस में भर्ती हों, इसीलिए उन्हें पहले ही प्रशिक्षित किया जाएगा। बताया गया है कि अभी प्रशिक्षण के लिए उत्सुक अभ्यर्थियों के चयन के लिए 14 जिलों में अभियान शुरू भी कर दिया गया है।

कुछ दिनों बाद डायरेक्ट ट्रेनिंग की शुरुआत कर दी जाएगी। बाकी जिलों में भी ट्रेनिंग जल्द ही शुरू होगी। इस साल के अंत तक राज्य में 12,500 पुलिस कर्मियों की भर्ती करने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा कि इस भर्ती में राज्य में मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी, जैन और यहूदी अल्पसंख्यक समुदायों के अधिक से अधिक उम्मीदवारों को भर्ती के लिए तैयारी करने का अवसर दिया जाएगा।

उम्मीदवारों को सामान्य ज्ञान और शारीरिक परीक्षण का प्रशिक्षण दिया जाएगा। वर्तमान में, इच्छुक उम्मीदवारों से वर्धा, गढ़चिरोली, अमरावती, नांदेड़, जालना, पुणे, यवतमाल, परभणी, सोलापुर, औरंगाबाद, बुलदाना, नासिक, बीड और अकोला जिलों में आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं। कहा गया है कि इच्छुक उम्मीदवार उस जिले में प्रशिक्षण के लिए जिला कलेक्टर या चयनित एनजीओ के पास आवेदन करें।

मंत्री नवाब मलिक ने कहा कि शेष जिलों में प्रशिक्षण के लिए गैर सरकारी संगठनों की चयन प्रक्रिया चल रही है और उसके बाद इच्छुक उम्मीदवारों से इन जिलों में भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए जाएँगे। इसके अलावा, प्रत्येक छात्र को ट्रैक-सूट और जूते खरीदने के लिए 1000 रुपए, किताबों की खरीद के लिए 300 रुपए, प्रशिक्षण अवधि के दौरान 300 रुपए प्रति माह और दैनिक भोजन के लिए 1500 रुपए दिए जाएँगे।

बताया गया है कि अल्पसंख्यक युवाओं का प्रशिक्षण दो महीने के लिए होगा। प्रत्येक जिले में अधिकतम 100 छात्रों का चयन और प्रशिक्षण किया जाएगा। प्रत्येक जिले को प्रशिक्षण के लिए लगभग 5.60 लाख रुपए खर्च करने होंगे और इसके लिए प्रावधान किया गया है। कई लोगों का कहना है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए सरकार ऐसा कर रही है क्योंकि अल्पसंख्यकों में उनकी संख्या ही सबसे ज्यादा है।

फेसबुक इंडिया को ‘बीजेपी का वफादार’ बता WSJ ने पूरा किया लिबरल मीडिया का इंतकाम

स्वतंत्रता दिवस की शाम मैंने देखा कि कुछ स्वघोषित लिबरल पत्रकार ट्वीट कर हुए बता रहे थे कि उन्होंने अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया है। मैंने यह सोचकर नजरअंदाज कर दिया कि वे लोग अपनी प्रासंगिकता को बरकरार रखने के लिए इस तरह की फालतू हरकत करते रहते हैं।

मगर आज मैंने फिर से कॉन्ग्रेस पार्टी के ट्रोल को फेसबुक पर हमला करते हुए देखा। वे लोग विशेष रूप से अंखी दास नामक एक वरिष्ठ कर्मचारी को गाली दे रहे थे, जो भारत में कंपनी की शीर्ष सार्वजनिक नीति कार्यकारी हैं। कॉन्ग्रेस ने उन पर ‘भाजपा एजेंट’ होने का आरोप लगाया। वहीं अन्य विपक्षी दलों ने भी उनके लिए गंदी भाषा का प्रयोग किया। उन्हें ‘दलाल’ तक करार दे दिया।

अंखी दास के नाम पर मैं अलर्ट हुआ, इसलिए नहीं कि मैं बड़े कॉरपोरेट घरानों के सभी शीर्ष अधिकारियों पर नज़र रखता हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं फेसबुक की पक्षपाती नीतियों की शिकायतों को लेकर कई बार उन्हें ईमेल कर चुका हूँ। जिसकी वजह से ऑपइंडिया की पहुँच और कमाई पर असर पड़ने की संभावना होती थी।

अच्छा तो क्या अंखी भाजपा का एजेंट थी, इसलिए उन्होंने हमें अपनी नीतियों के कार्यान्वयन से निराश किया। इसका मतलब है कि ऑपइंडिया कॉन्ग्रेस समर्थक है?

खैर, क्या इससे आपको कोई फर्क पड़ता है? मुझे तो नहीं पड़ता।

एक प्रकाशक के तौर पर फेसबुक की अनुचित व्यवहार की वजह से हो रही दिक्कतों को लेकर मैंने 2019 में अंखी दास और फेसबुक के एक अन्य अधिकारी शिवनाथ ठुकराल को ईमेल किया था। मैंने उनके सामने समाधान भी प्रस्तुत किए थे, जैसे नीतिगत मुद्दों के बारे में अधिक पारदर्शिता लाना, प्रकाशकों और प्लेटफॉर्म के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक टीम बनाना और ऐसे ही कई और उपाय। हालाँकि उसे लगभग नजरअंदाज ही किया गया।

2019 में उनको भेजे अपने आखिरी ईमेल में मैंने कहा, “व्यक्तिगत रूप से, यह व्यवहार मेरे लिए बिल्कुल भी आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि मुझे कुछ बेहतर होने की उम्मीद नहीं है। मैं ईमानदारी के अभाव से सबसे अधिक नफरत करता हूँ। आप मुझे केवल यह बताएँ कि आपकी तरफ से कुछ मुद्दों पर जवाब इसलिए नहीं दिया जाता, क्योंकि आपकी नजर में महत्वपूर्ण या वैलिड नहीं होते। आपका इतना बता देना ही मेरे लिए काफी होगा। यह राजनेताओं की तरह लगातार नजरअंदाज करते हुए मुद्दे को खत्म करना प्रोफेशनल्स को शोभा नहीं देता।” इसके बाद मैंने कोई और ईमेल नहीं भेजा।

इन ईमेलों को भेजने से पहले, मैंने कुछ अन्य प्रकाशकों के साथ अंखी दास और शिवनाथ ठुकराल से उनकी नीतियों को समझने के लिए थोड़ी देर की मुलाकात की थी। 15 मिनट के भीतर, मुझे जगह छोड़ने का मन हुआ, क्योंकि वहाँ पर भी लिबरलों के ‘हेट स्पीच’ जैसे बकवास किए गए थे।

इस दौरान अंखी दास ने विशेष रूप से एक व्यक्ति के तर्क का विरोध किया था, जिसने कहा था कि अभद्र भाषा व्यक्तिपरक थी। उन्होंने आपत्ति जताई और कहा कि यह केस नहीं है। हेट स्पीच की पहचान करने के लिए उचित दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

एक सेकेंड के लिए, मैं बस यही तर्क देना चाहता था कि ‘यदि जाति-व्यवस्था के कारण हिंदू धर्म आंतरिक रूप से शोषक हैं’, यह हेट स्पीच नहीं है, तो फिर ‘जिहाद की हिंसक अवधारणा के कारण इस्लाम’ को हेट स्पीच क्यों होना चाहिए?

ऐसा कौन सा सिद्धांत है, जो इस्लाम की सभी आलोचनाओं को हेट स्पीच के रूप में प्रदर्शित करता है और हिंदू धर्म को दी जाने वाली गालियों को भी विद्वानों की टिप्पणी के रूप में स्वीकार करता है।

बता दें कि, लेखक और जेएनयू के प्रोफेसर आनंद रंगनाथन को ट्विटर ने कुरान की एक कविता पोस्ट करने पर उसे “घृणित आचरण” करार देते हुए ब्लॉक कर दिया। इस तरह के कई मुद्दों को मैं सामने ला सकता हूँ, मगर मैंने 2016 में ही लिबरलों के साथ बहस करना छोड़ दिया है।

इसलिए मुझे बहुत हँसी आई, जब मुझे पता चला कि वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) ने अंखी दास के बारे में एक लेख प्रकाशित किया। इसके बाद इन्हें भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थक करार दिया गया। उन्हें ‘इस्लामोफोबिया’ का प्रशंसक भी बताया गया।

जब मुझे पता चला था कि अंखी दास जेएनयू से हैं, और संभवत: शीर्ष फेसबुक की नौकरी के पोस्ट पर रहने के दौरान वो एक करोड़ रुपए से अधिक कमा रहे हैं, मैं अलर्ट हो गया। एक सीरियस नोट पर, डब्ल्यूएसजे लेख से केवल यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उदारवादियों ने व्यापक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए और अपना नैरेटिव बनाए रखने के लिए अपने एक हितैषी को कुर्बान करना बेहतर समझा।

हो सकता है कि अंखी दास उनके लिए ‘पर्याप्त लिबरल’ नहीं थे। इन दिनों भी नोम चोम्स्की और जेके राउलिंग को मजाक उड़ाकर ‘निरस्त’ किया जा रहा है। वह निश्चित रूप से उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं था।

लेकिन यह एक व्यक्ति के बारे में नहीं है। यह लगभग 3 वर्षों से हो रहा है। पुराना लिबरल प्रतिष्ठान हताश है। वे अच्छे के लिए वर्ल्ड ऑर्डर इनवर्ट्स पर नियंत्रण हासिल करने की जल्दी में हैं।

वास्तविक प्रतिष्ठान होने के बारे में एकमात्र तरीका सेंसरशिप और सूचना एवं विचार के गेट-कीपिंग के माध्यम से हो सकता है। जिस तरह से माफिया ने मीडिया और शिक्षाविदों पर नियंत्रण किया है, वो भी उसी तरह जनता के सोचने और बोलने पर नियंत्रण रखना चाहते हैं। और यह भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए सच है।

हालाँकि शिक्षाविदों पर उनका नियंत्रण थोड़ा सा भी कमजोर नहीं हुआ है। पारंपरिक मीडिया पर उनका नियंत्रण इंटरनेट प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ फिसलने लगा है। प्रारंभ में उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। अमेरिका में, इंटरनेट अपनाने का चलन काफी पहले से था और उनका डॉट-कॉम बूम पिछली सदी के आखिरी दशक में ही हुआ था। पारंपरिक मीडिया इसके साथ सहज था।

तब इंटरनेट सिर्फ एक तकनीक थी। एक ऐसी तकनीक, जिसने सूचना तक पहुँचना आसान बना दी, और वेबसाइटों और अन्य कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से प्रकाशन को आसान बना दिया। डिजिटल प्रकाशन प्रिंट या प्रसारण जैसे अन्य प्लेटफार्मों पर प्रकाशन की तुलना में कहीं अधिक किफायती और आसान था। हालाँकि, पारंपरिक मीडिया ने शॉट्स को जारी रखा, क्योंकि प्रकाशित सामग्री का वितरण नए या व्यक्तिगत प्रकाशकों के लिए एक चुनौती बना रहा। “ब्लॉगर्स” इतने बड़े खतरे नहीं थे।

उसके बाद फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और व्हाट्सएप आया। फिर सस्ता स्मार्टफोन और तेज मोबाइल डेटा भी आया। इसने लोगों की कंटेंट के इस्तेमाल करने के तरीके को बदल दिया। भारत में, 2009 और 2013 के बीच इंटरनेट को अपनाना विशेष रूप से बहुत तेजी से बढ़ा है, और यह Jio के बाजार में तेजी के साथ तेजी से बढ़ रहा है।

कम से कम भारत में यह वह युग था, जब नैरेटिव वास्तव में लोकतांत्रिक थी। मुख्यधारा की मीडिया की सेंसरशिप और गेट-कीपिंग चली गई थी। वैकल्पिक आवाज और राय को एक दर्शक मिला। उन्हें न केवल दर्शक मिला, बल्कि अपने कंटेट के प्रसार के लिए एक बहुत ही शानदार साधन मिला।

पारंपरिक मीडिया ने पहले इन घटनाओं को अनदेखा करने की कोशिश की, फिर वे “ट्रोल्स” पर हँसे, और अब वो लड़ रहे हैं। पारंपरिक मीडिया पर हावी लेफ्ट-लिबरल (an oxymoron) भीड़ ने चीजों को फिर से वापस अपनी तरफ खींच लिया है। उन्होंने इंटरनेट का उपयोग करना सीख लिया है, और उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में इसका प्रभावी उपयोग किया है। लेकिन उनकी प्रकृति यह है कि वे सेंसरशिप और गेट-कीपिंग के बिना नहीं रह सकते। वे वास्तव में इन प्रक्रियाओं में विश्वास करते हैं और वे उन्हें वापस पाने के लिए कुछ भी करेंगे।

यह पिछले 3 वर्षों से हो रहा है। ‘हेट स्पीच’ के खिलाफ लड़ने और ‘सुरक्षित स्थान बनाने’ के नाम पर पारंपरिक मीडिया पर शासन करने वाली विचारधारा, बड़ी टेक कंपनियों के प्लेटफ़र्म पर सेंसरशिप और गेट-कीपिंग का पावर पाने के लिए काफी हाथ-पाँव मार रही है।

इस विचारधारा का समर्थन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति- चाहे वह पत्रकार हो, या फेसबुक कर्मचारी, या राजनीतिक कार्यकर्ता- इस सामान्य उद्देश्य में एकजुट है- नैरेटिव पर नियंत्रण वापस पाने के लिए।

और इसके लिए, अगर उन्हें किसी को निशाने पर लेने की आवश्यकता होगी, तो यह जायज है। दरअसल, यह दूसरों के लिए भी एक चेतावनी की तरह है कि यदि आप आत्मसमर्पण नहीं करते हैं और हमसे जुड़ते हैं, तो हम आपकी प्रतिष्ठा और करियर को नष्ट कर देंगे।

(अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित इस लेख को यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)