बॉलीवुड अभिनेता सुशांत राजपूत की मौत के मामले में लगातार एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। समाचार चैनल रिपब्लिक भारत ने रिया चक्रवर्ती की कॉल डिटेल (CDR) के हवाले से दावा किया है कि वह मुंबई पुलिस के एक टॉप अधिकारी के संपर्क में थी।
समाचार चैनल का दावा है कि कॉल रिकॉर्ड से ये बात सामने आई है कि बांद्रा के डीसीपी अभिषेक त्रिमुखे (Abhishek Trimukhe) और रिया के बीच मोबाइल फोन पर बातचीत हो रही थी और दोनों एक-दूसरे को मैसेज भेजे जा रहे थे। इस खुलासे से अभिनेता सुशांत सिंह की मौत में मुंबई पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है।
Republic accesses call records of Rhea Chakraborty, details reveal conversations with Mumbai cop.
रिया चक्रवर्ती के कॉल डिटेल के विश्लेषण से यह जानकारी सामने आई है। मुंबई में बांद्रा के डीसीपी अभिषेक त्रिमुखे और रिया चक्रवर्ती के बीच 4 बार बातचीत हुई हैं और वो लगातार सम्पर्क में थे।
उल्लेखनीय है कि बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) गुप्तेश्वर पांडे ने इस सप्ताह की शुरुआत में मीडिया को बताया था कि रिया चक्रवर्ती भूमिगत हैं। पांडे ने 5 अगस्त को कहा था, उनके पास मुंबई पुलिस के संपर्क में होने की कोई सूचना नहीं है। जबकि, अब रिया चक्रवर्ती के सीडीआर से पता चलता है कि रिया कथित रूप से डीसीपी जोन 9, मुंबई के अभिषेक त्रिमुखे के संपर्क में थी।
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस मामले की जाँच के लिए जब बिहार पुलिस की टीम मुंबई पहुँची तो वो रिया चक्रवर्ती से नहीं मिल सकी, क्योंकि अभिनेत्री की लोकेशन अज्ञात थी।
रिया चक्रवर्ती मनी-लॉन्ड्रिंग मामले में आज बलार्ड एस्टेट (मुंबई) में एजेंसी के कार्यालय में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सामने पेश हुई। उनके साथ उनके भाई शोविक चक्रवर्ती भी थे। यह मामला दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के पिता द्वारा बिहार पुलिस में उनकी मृत्यु के संबंध में दर्ज शिकायत से सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार कॉल डिटेल से साफ है कि रिया ने सुशांत से कहीं ज्यादा कॉल श्रुति मोदी और सैमुअल मिरांडा को किए। सीबीआई के एफआईआर में भी इन दोनों का नाम है। सुशांत की श्रुति बिजनेस मैनेजर रह चुकी थी, जबकि सैमुअल उनका मैनेजर था। कॉल रिकॉर्ड में महेश भट्ट का भी नाम आया है।
गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत गत 14 जून को बांद्रा में अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे। मुंबई पुलिस ने आकस्मिक मौत की रिपोर्ट (एडीआर) दर्ज की थी। 25 जुलाई को, सुशांत के 74 वर्षीय पिता केके सिंह ने 28 वर्षीय रिया और 5 अन्य पर बिहार के पटना में अपनी प्राथमिकी में आत्महत्या करने के लिए उकसाने का आरोप लगाया था।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने बृहस्पतिवार (अगस्त 06, 2020) को इस FIR को एक नए मामले के रूप में फिर से पंजीकृत किया और रिया सहित 6 को आरोपित बनाया है।
अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन ने एक तरफ इस्लामी कट्टरपंथियों के चेहरे का नकाब हटा दिया है तो दूसरी ओर कॉन्ग्रेस की मुसीबतें बढ़ा दी है। कॉन्ग्रेस नेताओं का राम राम करना न इस्लामिक संगठनों को न भाया है और न पार्टी के सहयोगी दलों को। यहॉं तक कि पार्टी के भीतर भी मतभेद सामने आ चुके हैं।
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भूमिपूजन के मौके पर हनुमान चालीसा का पाठ और दीपोत्सव किया। इसके कारण पार्टी से जुड़े कई मजहबी समूह के लोग नाराज हो गए और उन्हें खुलकर इस पर अपनी आपत्ति जताई।
अब जामिया निजामिया ने इस मामले पर बयान जारी कर कहा है कि समुदाय विशेष ने जो कॉन्ग्रेस और कमलनाथ पर भरोसा किया था, वह बेकार गया। अब उन्हें इस बारे में दोबारा सोचने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि मजहबी समुदायों को शुरुआती समय से ही उन पर यकीन नहीं था। लेकिन फिर भी जब उन्होंने यह आश्वासन दिया कि वह हिंदुओं से निपट लेंगे तो मजहबी कौम ने उन पर भरोसा कर लिया।
मगर, पिछले दिनों जो चेहरा कमलनाथ का देखने को मिला उससे कई चीजें स्पष्ट हो गई। जामिया निजामिया ने कमलनाथ ने अपनी हिंदू परस्ती के बहुत नमूने दिए। कभी हनुमान की पूजा की और कभी राम मंदिर बनने का स्वागत किया। इन सबसे कौम को बहुत तकलीफ हुई और ये पता चला कि उन्हें मजहब के लोगों से कभी कोई हमदर्दी नहीं थी। समुदाय विशेष वाले उनके लिए सियासत करने के लिए प्यादे थे।
जामिया निजामी ने समुदाय के लोगों को कमलनाथ पर यकीन न करने की सलाह दी है। साथ ही कहा कि आपका साथ देने वाले प्रतिनिधि को सोच-समझकर वोट दें। बयान में कहा गया है, “इस देश में समुदाय का व्यक्ति अब अकेला है। इसलिए इस दौर में हमें अपने लिए सोच समझकर नेता का चयन करना होगा।”
इस बयान में जामिया निजामिया की ओर से कहा गया, “हमें विश्वास है कि अकाबिरों की बताए हुए रास्ते से हटना बड़ा नुकसान का कारण बन सकता है।” इसके बाद इसमे यह भी स्पष्ट किया गया कि अब उनका कमलनाथ और कॉन्ग्रेस से कोई ताल्लुक नहीं है। वह दीन पर बयान और फिक्र को लेकर हमेशा अपनी आवाज को बुलंद रखेंगे, क्योंकि उस्मत का नेतृत्व करना वह अपना दीनी कर्तव्य समझते हैं।
इस्लामिक प्रोपेगेंडा वेबसाइट चलाने वाले स्वघोषित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर ने एक ट्विटर यूजर को निशाना बनाते हुए एक नाबालिग लड़की की तस्वीर सार्वजानिक करने का नया घटिया कारनामा कर ऑल्टन्यूज़ की उपलब्धियों में एक और इतिहास रचा है।
फैक्ट चेकिंग के नाम पर लोगों की निजी और गोपनीय जानकारियाँ सार्वजानिक करने के लिए कुख्यात समूह ऑल्टन्यूज़ के संस्थापकों में से एक मोहम्मद जुबैर शुक्रवार (अगस्त 07, 2020) को जगदीश सिंह नाम के एक ट्विटर यूजर को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा कर रहा था, जब उसने एक नाबालिग युवती की तस्वीर को ही सार्वजानिक कर दिया। इस युवती को कथित तौर पर उन्हीं ट्विटर यूजर की जगदीश सिंह की पोती बताया जा रहा है।
दरअसल, आईपीएस अधिकारी दीपांशु काबरा ने एक ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें सड़क पर एक बड़े गड्ढे पर वाहन उछल रहे थे। इस पर मोहम्मद जुबैर ने उन्हें जवाब में अपना एक कथित ‘फैक्ट चेक’ लेख के बारे में बताया।
जुबैर ने ‘ऑल्टन्यूज़’ द्वारा किया हुआ एक ‘फैक्ट चेक’ पोस्ट किया, जिसमें कहा गया था कि यह चीन का एक पुराना वीडियो है। हालाँकि, दीपांशु काबरा ने यह दावा कहीं भी नहीं किया था कि यह वीडियो हाल ही का है, या यह किसी विशेष शहर का है।
आईपीएस काबरा ने इस वीडियो में सिर्फ शहर का अनुमान लगाने के लिए कहा था। लेकिन आदत से मजबूर ज़ुबैर ने मान लिया कि वह इसे भारत का होने का दावा कर रहे हैं, और लगे हाथ इस पर ‘फैक्ट चेक’ तैयार करते हुए कहा कि यह वीडियो चीन का है।
इस पर एक ट्विटर यूजर जगदीश सिंह मोहम्मद जुबैर की इस फर्जी के फैक्ट चेकर से सहमत नहीं थे और उन्होंने सोशल मीडिया पर ऑल्टन्यूज़ के लिए प्रचलित जुमले का इस्तेमाल करते हुए जुबैर के ट्वीट के जवाब में ‘ल*डे का फैक्ट चेकर’ कह दिया।
यह जुमला ऑल्टन्यूज़ के कथित ‘फैक्ट चेक्स’ के फर्जीवाड़ों के लिए इन्टरनेट पर युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। ट्विटर यूजर जगदीश सिंह के इस कमेंट पर मोहम्मद जुबैर ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और उन्हें सीधे तौर पर जवाब देने के बजाए, उनकी ट्विटर डीपी (डिस्प्ले इमेज) निकाल ली, जिसमें जगदीश सिंह कथित तौर पर अपनी पोती के साथ नजर आ रहे थे।
जुबैर ने जगदीश सिंह की प्रोफाइल में लगी तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा- “हेलो जगदीश सिंह, क्या आपकी प्यारी पोती सोशल मीडिया पर लोगों को गाली देने की आपकी पार्ट टाइम जॉब के बारे में जानती है?”
ट्विटर यूजर की निजी तस्वीर का गलत इस्तेमाल करते हुए मोहम्मद जुबैर ने उन्हें अपनी प्रोफाइल फोटो बदलने की सलाह भी दी।
जुबैर द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट
यह तथाकथित ‘फैक्ट चेकर’ द्वारा किया गया बेहद घिनौना काम था। सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति अपने सोशल मीडिया अकाउंट में परिवार के सदस्य की तस्वीर का उपयोग कर रहा है, उन्हें सोशल मीडिया के झगड़े में नहीं खींचा जा सकता है, खासकर जब वो नाबालिग बच्चे हों।
हालाँकि, जुबैर ने फोटो में लड़की के चेहरे को धुँधला कर दिया था, लेकिन यह तथ्य अभी भी बना हुआ है कि उसने इन्टरनेट पर एक बहस को जीतेने के लिए एक नाबालिग छोटी लड़की का इस्तेमाल किया।
यदि तस्वीर में मौजूद लड़की ट्विटर यूजर की पोती है तो भी, उस नाबालिग लड़की को सोशल मीडिया पर उसके दादा की हरकतों के लिए जिम्मेदार नहीं बनाया जा सकता है।
वास्तव में, मोहम्मद जुबैर का तर्क पीएम मोदी द्वारा ट्विटर पर फ़ॉलो किए जा रहे अकाउंट द्वारा पोस्ट किए गए हर ट्वीट के लिए मोदी को दोषी ठहराए जाने वाले तर्क से भी अधिक अतार्किक है।
इस्लामिक विचारधारा के समर्थक मोहम्मद जुबैर का सोशल मीडिया पर बड़ा फॉलोवर्स वर्ग है और वह एक ऐसी वेबसाइट के साथ भी जुड़ा हुआ है, जो अक्सर लोगों की निजी जानकारी को सार्वजानिक करने के लिए कुख्यात है।
किसी भी सोशल मीडिया वेबसाइट में कई लोग हैं, विशेष रूप से इस्लामिक विचारधारा के अनुयायी, जो व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग कर उन लोगों को निशाना बना सकते हैं, जो उनके नजरिए और विचारधारा से समर्थन नहीं रखते।
तथ्य यह है कि जुबैर, जो इस्लामिक विचारधारा वालों के बीच बेहद लोकप्रिय है, ने एक बच्ची की तस्वीर का इस्तेमाल किया, ताकि वह अपने समर्थकों को भी इसी रणनीति का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर सके; यानी, जिन लोगों के विचारों से आप सहमत ना हों, उनके परिवार के लोगों को बहस में घसीटें। अक्सर लोग किसी भी बहस में परिवार के लोगों को खींचे जाने पर बहस से दूर हो जाते हैं।
मोहम्मद जुबैर की इस हरकत का परिणाम इस एक ट्वीट में देखा जा सकता है। जुबैर द्वारा सार्वजानिक की गई तस्वीर में जगदीश सिंह के साथ नजर आ रही नाबालिग बच्ची के लिए की गई भाषा का इस्तेमाल एक उदाहरण है कि अपने विरोधी स्वरों के खिलाफ इस्लामिक प्रपंचकारी किस स्तर तक गिर सकते हैं।
मोहम्मद जुबैर के लिए बच्चियों की जानकारी सोशल मीडिया पर डालना आम है। जुबैर इन बच्चियों को मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने बलात्कार और हत्या की धमकियों के लिए खुला छोड़ देता है। इस मामले में भी वो अपने घिनौने कृत्य को सही बता रहा है।
यह एक ऐसी घिनौनी तरकीब है, जिसका उपयोग ऑल्टन्यूज़ के ही सह-संस्थापकों और अन्य प्रोपेगेंडाबाजों द्वारा किया जाता है। इससे पहले भी ऑल्टन्यूज़ और इसके संस्थापक ‘स्क्विंट नियोन’ नाम से ट्विटर अकाउंट चलाने वाले युवकों की निजी जानकारी सार्वजनिक कर इसे अपनी बड़ी कामयाबी साबित करने का प्रयास करते हुए देखे गए हैं।
ऑल्टन्यूज़ द्वारा हर उस ट्विटर अकाउंट की निजी जानकारी को सार्वजानिक किया गया था, जो उनकी विचारधारा के समर्थन में नहीं रहते हैं या फिर भाजपा का समर्थन करते हैं।
मोहम्मद जुबैर ने यही कारनामा आज जगदीश सिंह के साथ फिर दोहराया है और वो इसके लिए बिलकुल भी शर्मिंदा नजर नहीं आता है। ट्विटर पर जुबैर की इस हरकत के लिए उसे लताड़ भी पड़ रही हैं।
हालाँकि, जगदीश सिंह ने अब अपनी प्रोफाइल फोटो जरुर बदल दी है, ताकि जुबैर जैसे ही अन्य इस्लामिक विचारधारा के समर्थक उनकी तस्वीर का दुरुपयोग ना करें।
एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि मोहम्मद जुबैर आज भी 14वीं सदी की विचारधारा का ही अनुसरण करता नजर आ रहा है।
So brave of you to dig out a private pic of the man with his grand-daughter to harass him in open. Shows a sick mentality running from 14th century till date.@JSINGH2252, please file a complaint against this lumd fakeer in the nearest police station. https://t.co/7uXoagTczD
कुछ ट्विटर यूजर्स ने जुबैर की इस हरकत पर जगदीश सिंह को FIR दर्ज करने की भी सलाह दी है।
Old prophetic technique to use opponent’s women as shield .This is a crime in India, requesting Shri @JSINGH2252 to report the tweet and file an FIR against Md. Zubair and his media portal @AltNews . Tagging @NCWIndia as it violates the modesty of an underage girl. https://t.co/98zYqSDgLM
प्रोपेगैंडा वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ को बड़े पैमाने पर पूरे वामपंथी संगठन द्वारा फैक्ट चेकर कहा जाता है। हालाँकि, तथ्यों से ऑल्टन्यूज़ का कभी भी कोई वास्ता नहीं रहा है और उसका एकमात्र मकसद दक्षिणपंथी सरकार के विरोध के साथ हिन्दू-घृणा को फैलाते हुए इस्लामिक विचारधारा को बढ़ावा देना ही है।
चेक के नाम पर यह ऑल्टन्यूज़ हिन्दुओं के बारे में गलत, फर्जी, बेबुनियाद और झूठे आरोप विकसित करते हुए मुस्लिम अपराधों को क्लीन चिट देने का कारनामा कई बार कर चुका है। यहाँ तक कि वे उन आतंकियों को बचाते हुए पकड़े गए, जिन्होंने श्रीलंका में बड़े आतंकी हमले को अंजाम दिया था। वास्तव में, ऐसे किसी मजहबी अपराध को ढूँढना मुश्किल होगा, जिसमें ऑल्टन्यूज़ ने अपना प्रोपेगेंडा नहीं इस्तेमाल किया है।
ऑल्टन्यूज़ को अरुंधति रॉय जैसे संरक्षकों का साथ प्राप्त है, जो नियमित रूप से एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे कहा जा सकता है कि जो नक्सली आतंकियों की भाषा से मेल खाती है, और किसी भी तरह से भारत के टुकड़े करना चाहती है।
5 अगस्त 2020 का दिन दुनियाभर के हिंदुओं के लिए ऐतिहासिक रहा। अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों भव्य राम मंदिर का भूमिपूजन सम्पन्न हुआ। संतगणों और धर्माचार्यों की उपस्थिति में राम मंदिर निर्माण के लिए पहली ईंट रखी गई।
इस कार्यक्रम की यूँ तो कई खास बातें रहीं। लेकिन जिसने सबका दिल जीता वो यह कि भूमिपूजन के बाद इसका सबसे पहला प्रसाद एक दलित परिवार को भेजा गया।
भूमि पूजन के बाद दलित परिवार को मिला प्रसाद (साभार: टीवी9 भारतवर्ष)
हुई न हैरानी? लेकिन यह सच है कि इतने महंतों, संतों, पुजारियों, ब्राह्म्णों व दिग्गज नेताओं की उपस्थिति के बावजूद पहला प्रसाद एक दलित परिवार को भेजा गया। ये परिवार महावीर का है। इन्हें भूमिपूजन के प्रसाद के साथ श्री रामचरितमानस की एक प्रति और तुलसी माला भी भेंट दी गई। इन्हें प्रसाद पहुँचाने के बाद ही अयोध्या में अन्य लोगों को प्रसाद वितरण का कार्य शुरू हुआ।
दलित परिवार के घर भोजन करते सीएम योगी आदित्यनाथ (साभार: जी न्यूज)
महावीर के बारे में थोड़ा याद दिला दें कि यह वहीं शख्स हैं जिन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत छत मिली और लोकसभा चुनावों के दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ ने उनके घर बैठकर भोजन किया था।
अब सवाल है कि मोदी सरकार द्वारा एक दलित को इतनी महत्ता दी जा रही है, जबकि वामपंथी मीडिया और विपक्ष तो आज तक हमें यही समझाता आया है कि नरेंद्र मोदी सरकार ब्राह्मणवाद का चेहरा है। इस सरकार ने दलितों के लिए कभी कुछ नहीं किया और तो और 6 साल के कार्यकाल में भी वह केवल दलितों की अनदेखी करते रहे, उन पर अत्याचार करते रहे।
जिग्नेश मेवानी जैसे तथाकथित दलित नेता ने हमें बताया कि जितना अत्याचार दलितों पर मोदी सरकार ने किया है उतना अत्याचार तो कभी भी किसी सरकार ने दलितों पर नहीं किया।
राहुल गाँधी जंतर मंतर पर आयोजित एक रैली में कहा था कि प्रधानमंत्री के मन में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है। क्योंकि अगर जगह होती तो उनके लिए बनाई गई नीतियाँ बिलकुल अलग होतीं।
दलित नेता मायावती दावा करती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने जो दलित छात्र की आत्महत्या पर आँसू बहाए वे घड़ियाली आँसू थे। मोदी और उनकी सरकार दलित विरोधी है। उनके आँसू दलित प्रेम नहीं ,बल्कि एक नाटक हैं।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी कहते हैं भाजपा सरकार ने जनहित के लिए एक भी योजना लागू नहीं की। बल्कि सरकार ने तो समाज के दलित, वंचित और पिछड़ों के ख़िलाफ़ अभियान शुरू कर दिया है।
बावजूद इतने आरोपों के मोदी सरकार अपना काम करती रही। यदि याद हो आपको तो पिछले साल कुंभ के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने सफाई कर्मचारियों के पैर स्वयं धोए थे। उस समय विपक्ष ने पीएम मोदी का यह चेहरा देखकर उन पर नौटंकी की राजनीति करने के आरोप लगा दिए थे। मोदी विरोधियों ने इस छवि को खारिज करने के लिए सोशल मीडिया पर अस्थायी और स्थायी नौकरी का मुद्दा उठा दिया था।
साल 2019 में कुंभ के दौरान स्वच्छता अभियान में जुटे सफाईकर्मियों के पाँव धोते पीएम नरेंद्र मोदी (साभार: जनसत्ता)
हालाँकि, ऐसा ही कुछ इस बार भी हुआ। भूमिपूजन में कुछ लोगों की अनुपस्थिति को उनके दलित होने से जोड़कर दर्शाया गया। लेकिन प्रथम प्रसाद की खबरें आते ही इन लोगों को करारा जवाब मिला। स्वयं दलित परिवार के मुखिया महावीर ने कहा,
“मैं दलित हूँ। मुख्यमंत्री ने पहले मुझे और मेरे परिवार को भेजा। मैं उनका धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मुझे याद रखा।” उन्होंने कहा, “यह हमारे लिए दोहरी खुशी की तरह है। पहला यह कि राम मंदिर का हमारा सपना पूरा हुआ और दूसरा ये कि हमें पहला प्रसाद मिला। हमें उम्मीद है कि अब राज्य में जातीय भेदभाव समाप्त हो जाएगा और हर कोई विकास और सबके कल्याण के बारे में सोचेगा।”
जिस सरकार की छवि बिगाड़ने के लिए विपक्ष ने उसे अन्य धर्म के लोगों के आगे कट्टर हिंदुत्ववादी बताया और दलितों के आगे ब्राह्मणवादी करार दे दिया, उसी सरकार ने कभी इन आरोपों का मौखिक रूप से खंडन नहीं किया, बल्कि अपनी कार्यनीतियों से विपक्ष को झुठलाते रहे।
6 साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने चुनाव नजदीक देखकर कभी दलितों के प्रति प्रेम नहीं दिखाया, बल्कि उन्होंने तो सत्ता सँभालने के साथ ही समाज के पिछड़े वर्ग के लिए कार्य करना शुरू कर दिया था।
आज शायद उसी प्रतिबद्धता का नतीजा है कि अगर हम आँकड़ों से मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल को निकाल भी दें तो भी इतनी योजनाएँ हमारे पास बचती हैं- जो यह बताती हैं कि दलित उत्थान के लिए मोदी सरकार के प्रयास कैसे 70 सालों की दिखावटी कोशिशों पर भारी हैं।
मोदी ने सरकार ने दलितों के लिए क्या किया?
सबका साथ सबका विकास के मूलमंत्र के साथ अपने दूसरे कार्यकाल के दूसरे साल में मोदी सरकार कुछ दिन पहले प्रवेश कर चुकी है। लेकिन मोदी सरकार ने दलितों के लिए योजनाएँ हाल फिलहाल में शुरू नहीं की है। उन्होंने साल 2014 में चुनाव जीतने के साथ ही इस पर काम करना शुरू किया और सुनिश्चित किया कि ये योजनाएँ केवल दस्तावेजों में लागू न हों, बल्कि जमीनी स्तर पर इनका फायदा समाज के पिछड़े समुदाय को मिले।
याद करिए साल 2017-18 को। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दलितों के उत्थान के लिए अपने बजट में क्रांतिकारी बदलाव किया था। एक समय तक जहाँ पुरानी सरकारी दलितों की आबादी के प्रतिशत के अनुपात में बजट से धन नहीं देती थी, वहीं मोदी सरकार ने जाधव समिति की सिफारिशों को लागू कर दिया।
इसके बाद दलितों की 2001 की जनगणना की जनसंख्या के अनुपातिक प्रतिशत के अनुसार बजट में धन की व्यवस्था की गई। ऐसे ही 2018-19 में दलित योजनाओं के लिए मोदी सरकार ने बजट में 8,63,944 करोड़ रुपए दिए, जो दलितों के लिए अब तक का सबसे अधिक आवंटन रहा।
पिछड़े वर्ग के प्री मैट्रिक-पोस्ट मैट्रिक विद्यार्थियों के लिए भी मोदी सरकार ने किया आर्थिक मदद का इंतजाम: साल 2017 में ही 19 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने दलित परिवारों के बच्चों को मिलने वाली आर्थिक मदद का दायरा बढ़ाया।
पहलेहले यह मदद उन्हीं परिवारों के बच्चों को मिलती थी, जिनकी आमदनी सालाना 2 लाख रुपए थी। लेकिन मोदी सरकार ने इसे बढ़ाकर 2.5 लाख रुपए कर दिया। इसके साथ हॉस्टल में रहने वाले बच्चों को मिलने वाले 350 रुपए को बढ़ाकर 525 रुपए कर दिया और घर पर रहकर पढ़ने वाले बच्चों को 150 रुपए बढ़ाकर 250 रुपए कर दिया।
इसी तरह मैट्रिक से आगे पढाई पूरे करने वाले छात्रों को केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजना के तहत 100 प्रतिशत का धन दिया जाता है। इस योजना के तहत स्कॉलरशिप वाले छात्रों के लिए पुस्तक से लेकर पढ़ाई तक का खर्चा केंद्र सरकार वहन करती हैं।
सरकार ने दलित छात्रों की उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया: रिपोर्ट्स के अनुसार दलित छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए 2000 जूनियर फेलोशिप और सीनियर फेलोशिप प्रतिवर्ष यूजीसी से दिया जाता है। इसमें जूनियर के लिए 25 हजार रुपए और सीनियर के लिए 28 हजार रुपए का फेलोशिप निर्धारित है।
दलितों के अन्तरजातीय विवाह करने पर आर्थिक सहायता: मोदी सरकार ने दलितों के अन्तरजातीय विवाह के लिए पूरे देश में एक समान आर्थिक सहायता 2.5 लाख रुपयों की कर दी। इससे पहले राज्यों द्वारा दलितों को अन्तरजातीय विवाह के लिए अलग-अलग राशि दी जाती थी।
दलितों के लिए प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना ने सराहनीय काम किया: इस योजना के तहत उन गाँवों को आदर्शों गाँवों में विकसित किया गया, जहाँ आबादी में 50 प्रतिशत जनसंख्या दलितों की है। इन दलित बाहुल्य गाँवों में दलित परिवारों के लिए आवास, सड़कें, बिजली, रोजगार और सुरक्षा के लिए मोदी सरकार ने पूरा धन दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2018 तक 25,000 गाँवों में इस केंद्रीय योजना से दलितों का कल्याण कार्य चला।
दलित युवाओं के उद्यम और रोजगार की व्यवस्था की गई: दलित युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से कई योजनाएँ प्रथम कार्यकाल के प्रथम वर्ष से ही चलाई जा रही हैं। इनमे केंद्र सरकार State Scheduled Castes Development Corporations (SCDCs) को धन देती है जो दलित परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए कई योजनाओं के तहत लोन देती है।
देश में दलित युवाओं के लिए पहली बार वेंचर कैपिटल फंड की शुरुआत हुई: प्रधानमंत्री मोदी ने दलित युवाओं को स्टार्टअप शुरू करने के लिए प्रेरित करते हुए देश में पहली बार वेंचर कैपिटल फंड की शुरुआत 16 जनवरी 2015 को की।
इस योजना को IFCI Venture Capital Fund Ltd. नियंत्रित करता है। यह कोष दलित युवाओं में उद्यमिता को बढ़ावा देता है। यह उन दलित उद्यमियों की सहायता करता है जो कुछ नया करके समाज में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।
दलितों को मुद्रा योजना का फायदा: समाज के पिछले वर्ग को आगे लेकर आने के लिए प्रधानमंभी ने मुद्रा योजना की भी शुरूआत की। केवल 31 मार्च 2017 तक दलितों के लिए 2,2500,194 मुद्रा खाते खुले, जो कुल मुद्रा खातों का 57 प्रतिशत है।
इसके बाद समुदाय के लोगों को 67,943.39 करोड़ का लोन आवंटित हुआ। साथ में ही नए उद्यमियों को हर संभव मदद देने के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति हब की स्थापना की गई।
देश के सभी दलित गाँवों में बिजली पहुँची: प्रधानमंत्री के नेतृत्व में शुरू दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत आज देश के लगभग सभी गाँवों में बिजली पहुँचाई जा चुकी है। रिपोर्ट बताती है कि देश में 5,97,464 गाँवों में से 597,265 गाँवों में बिजली रिकॉर्ड समय में पहुँचाई गई।
दलित उत्पीड़न कानून को संशोधित कर सख्त बनाया: देश में दलितों को उत्पीड़न काफी समय से चला आ रहा है। ऐसे में मोदी सरकार ने दलित उत्पीड़न 1989 कानून को संशोधित करके अधिक सख्त बनाया और इसे 26 जनवरी 2016 को लागू भी कर दिया गया। इस संशोधन से दलितों को त्वरित न्याय दिलाने की मोदी सरकार की मुहिम को बल मिला।
इस कानून में सुनिश्चित किया गया कि दलित उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई करने के लिए विशेष अदालतों के गठन और सरकारी वकीलों की उपलब्धता हो। नए कानून में यह भी सुनिश्चचित किया गया कि आरोप-पत्र दाखिल होने के 2 महीने के अंदर न्याय दे दिया जाए। नए कानून के तहत दलितों को मिलने वाली सहायता राशि को स्थिति के अनुसार 85,000 रुपए से 8,25,000 रुपए तक कर दिया गया।
गौरतलब है कि यह केवल कुछ चुनिंदा योजनाएँ है। जिन्हें मुख्यत: दलितों के नाम पर उन्हें आगे बढ़ाने के लिहाज से शुरू किया गया। लेकिन ध्यान रहे कि वे योजनाएँ जिनका फायदा समस्त भारतीयों को है उसके अंतर्गत भी दलित आते हैं और वह उसका फायदा भी उठाते हैं।
मोदी सरकार लगातार समाज में समरसता को बढ़ावा देने में प्रयासरत है। मगर, विपक्षी लगातार सरकार की आलोचना के नाम पर जनता को बरगलाकर और गिनी-चुनी घटनाओं का उल्लेख करके वर्तमान सरकार की छवि बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
हाँ, ये बात और है कि मोदी सरकार के बारे में बोलते हुए ये पार्टियाँ ये भी नहीं बताती कि उनकी पार्टी ने आखिर सत्ता में रहते हुए ऐसा क्या-क्या किया, जिसके आधार पर वो इतनी आलोचनाएँ कर रहे हैं। वे केवल जनता को कमियाँ गिनवाते हैं, जबकि आँकड़े बिलकुल उलट स्थिति बयान करते हैं।
जैसे NCRB 2016 की एक रिपोर्ट बताती है कि प्रधानमंत्री मोदी ने दलितों को सुरक्षा देने में पूर्ववर्ती सरकारों से काफी अच्छा काम किया है। दलितों के विरुद्ध अपराध करने वालों को सजा दिलाने में भाजपा शासित राज्य, कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से कहीं आगे है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच से रामजन्मभूमि पूजन के दौरान सोशल मीडिया पर लोगों को बरगलाने और उन्माद फैलाने के आरोप में पुलिस ने शुक्रवार (7 अगस्त, 2020) को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) से जुड़े एक डॉक्टर सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार यह लोग अयोध्या राम मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम के दिन सोशल मीडिया पोस्ट जरिए समुदाय विशेष के लोगों में आक्रोश फैलाना चाह रहे थे। जिससे सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठे।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कुँवर ज्ञानंजय ने कहा कि उन्हें बुधवार को जानकारी मिली थी कि कुछ लोग डॉ.अलीम के क्लिनिक में बैठ कर समुदाय विशेष के लोगों को व्हाट्सएप और ट्वीट के जरिए ऐसे मैसेज कर रहे हैं, जो सांप्रदायिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता के खिलाफ थे।
गौरतलब है कि अयोध्या में रामजन्म मंदिर भूमि पूजन के शुभारंभ कार्यक्रम को लेकर पहले से ही अलर्ट जारी कर दिया गया था। इसी के आधार पर पुलिस व खुफिया तंत्र सरहद के साथ ही सोशल मीडिया पर चौकस थे। बुधवार को ट्विटर पर भूमि पूजन को बाधित करने के लिए सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उन्माद फैलाने की कोशिश शुरू की गई, तभी खुफिया एजेंसियाँ सतर्क हो गईं और जरवल में छापेमारी कर डॉ. अलीम अहमद की क्लीनिक से उन्हें दो अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस ने डॉ. अलीम और उसके क्लीनिक में मौजूद कमरुद्दीन और साहिबे आलम को गिरफ्तार किया था। 24 घंटे पूछताछ के बाद गुरुवार को पुलिस ने तीनों पर मुकदमा दर्ज कर जेल रवाना कर दिया।
पुलिस अधिकारी ने बताया कि इनमें साहिबे आलम पीएफआई के पूर्व पदाधिकारी और एसडीपीआई के मीडिया प्रभारी के रूप में काम कर रहा था। डॉ. अलीम और कमरुद्दीन दोनों एसडीपीआई व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्य थे। उन्होंने कहा, एसडीपीआई और पीएफआई संगठनों के गिरफ्तार तीन सदस्यों से उनके नेटवर्क खंगाले जा रहे है और विस्तृत जाँच की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इनके तार सऊदी अरब, दिल्ली, लखनऊ समेत कई जगहों से जुड़े बताए गए हैं।
तीन सदस्यों के पकड़े जाने के बाद पीएफआइ व एसडीपीआइ के बहराइच में सक्रिय होने के सबूत ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। इन लोगों ने अयोध्या में हो रहे भूमिपूजन के कार्यक्रम को बाधित करने के लिए सोशल मीडिया पर गलत मैसेज प्रसारित कर मुस्लिमों में आक्रोश पैदा करने की योजना बनाई थी। लेकिन समय रहते पुलिस अधिकारियों को इसकी जानकारी हो गई, जिससे इनका मंसूबा नाकाम हो गया।
गौरतलब है कि भारतीय खुफिया एजेंसी को 5 अगस्त को अयोध्या और जम्मू-कश्मीर में बड़े आतंकी हमलों की सूचना मिली थी। एजेंसी के अनुसार यह साजिश पाकिस्तान द्वारा रची गई थी। इसके लिए उसने अफगानिस्तान में 20 तालिबानी आतंकियों को प्रशिक्षण दिया है, ऐसी भी खबर थी। खुफिया एजेंसियों ने इस खतरे को लेकर पुलिस और आर्मी को पहले से आगाह कर दिया था।
बता दें खुफिया एजेंसी को पिछले कुछ हफ़्तो से आतंकी हमलों को लेकर सूचना मिल रही थी। कहा गया था कि आतंकी 15 अगस्त तक किसी भी बड़े हमले को अंजाम दे सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा दी गई चेतावनी के बाद अयोध्या, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से हर दिन इस मामले में कोई न कोई नई और चौंकाने वाली बात सामने आ रही है। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार सुशांत की पर्सनल डायरी के कुछ पन्ने गायब हैं। इससे सबूतों से छेड़छाड़ का शक और गहरा गया है।
रिपोर्ट के अनुसार सुशांत की डायरी के आखिरी चार पन्ने फटे हैं। पत्रकार नविका कुमार के अनुसार, सुशांत की एक्स गर्लफ्रेंड अंकिता ने 31 जुलाई को एक इंटरव्यू में इस बात को स्वीकारा था कि खुद से जुड़ी हर बात सुशांत अपनी डायरी में लिखते थे।
नविका ने अपने शो के दौरान कहा, डायरी के पन्नों का गायब होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कोई इस मामले के तथ्यों को छुपाना चाहता था। पत्रकार एस शिवशंकर ने कहा कि सुशांत की डायरी में कुछ लोगों के नामों का भी उल्लेख है। लेकिन इस समय मीडिया संस्थान उसका खुलासा नहीं कर सकती है।
MEGA #EXCLUSIVE | Never before seen personal diary of Sushant Singh is out. Some pages in the diary have been allegedly ripped off. Crucial pages missing.
सिद्धार्थ पीठानी ने चाभी बनाने वाले को नहीं जाने दिया कमरे के अंदर
सुशांत सिंह राजपूत के क्रिएटिव मैनेजर सिद्धार्थ पिठानी, ने सबसे पहले दिवंगत अभिनेता की लाश को देखा था। पत्रकार नविका कुमार के अनुसार, पिठानी ने डुप्लीकेट चाबी खोजने की कोशिश करने के बजाय एक चाभी बनाने वाले को बुलाया।
सिद्धार्थ ने चाभी बनानेवाले को सुशांत के कमरे में प्रवेश करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। बाद में, पिठानी और एक अन्य व्यक्ति दीपेश ने दरवाजा खोला। कमरे के अंदर जाकर कथित तौर पर मृतक अभिनेता के ‘लटकते हुए शरीर’ को पंखे से नीचे उतारा। कुमार ने मुंबई पुलिस पर निष्क्रियता और उन लोगों से पूछताछ नहीं करने का आरोप लगाया, जिन्होंने सुशांत की लाश को पहली बार देखा था।
सीबीआई को सौंपा गया का मामला
गौरतलब है कि सुशांत सिंह की मृत्यु का मामला धीरे धीरे कई राज से पर्दा उठा रहा है। रिया चक्रवर्ती, जिन्हें लेकर सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत दर्ज करवाई है। उन पर शिकंजा कसता जा रहा है। सीबीआई ने भी इस मामले की जाँच मिलने के बाद अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है।
सीबीआई ने इसके लिए स्पेशल टीम का गठन भी किया है। इस टीम में आईपीएस मनोज शशिधर, डीआईजी गगनदीप गंभीर और एसपी नुपूर प्रसाद शामिल हैं। जाँच एजेंसी 6 आरोपितों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर चुकी है। उनका कहना है कि वह लगातार इस केस को लेकर बिहार पुलिस के संपर्क में हैं।
जॉंच एजेंसी ने जिनके खिलाफ मामला दर्ज किया है उनमें रिया चकवर्ती, इंद्रजीत चकवर्ती, संध्या चकवर्ती, सौविक चकवर्ती, सैम्युल मिरांडा, श्रुति मोदी शामिल हैं। बता दें, कि सीबीआई के अलावा इस मामले में अब ईडी भी सुंशांत के पैसों को लेकर हुई हेर-फेर की जाँच करने में जुटी है। सुशांत के पिता का आरोप है कि उनके बेटे के अकाउंट से ऐसे अकाउंट में पैसे ट्रांसफर हुए जो उसका था ही नहीं।
पाकिस्तानी टीम के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर एक बार फिर अपने बड़बोलेपन को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने कहा है कि वह सेना का बजट बढ़ाने के लिए घास खाने को भी तैयार हैं। साथ ही दावा किया है कि कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना की सेवा करने के लिए काउंटी क्रिकेट का कॉन्ट्रैक्ट भी ठुकरा दिया था।
ARY News से बातचीत में शोएब अख्तर ने कहा कि अगर अल्लाह की मर्ज़ी रही तो मैं खुद घास भी खा लूँगा। लेकिन अपने देश की सेना का बजट बढ़ाने के लिए हर कोशिश करूॅंगा। इसके बाद अख्तर ने कहा उन्हें समझ नहीं आता है देश का नागरिक आखिर सेना के साथ मिल कर साझा तौर पर काम क्यों नहीं कर सकता है।
रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम मशहूर शोएब ने कहा कि वे पाकिस्तानी सेना के मुखिया के साथ बैठकर उनसे फैसले लेने की गुज़ारिश करेंगे। उनसे कहेंगे कि अगर सेना का बजट 20 फ़ीसदी है तो इसे 60 फ़ीसदी तक बढ़ा दिया जाए।
शोएब अख्तर ने यह भी कहा कि वह कारगिल युद्ध में अपनी तरफ से मदद करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने नॉटिंघमशायर के साथ 175,000 पाउंड (लगभग 1,20,75,000 रुपए, एक पाउंड 1999 के करेंसी रेट के हिसाब से लगभग 69 रुपए के बराबर था) का कॉन्ट्रैक्ट ठुकरा दिया था। साल 1999 के मई में करगिल युद्ध हुआ था।
साक्षात्कार के दौरान शोएब ने कहा, “लोग इस कहानी के बारे में बहुत कम ही जानते हैं। नॉटिंघम के साथ मेरा 175,000 पाउंड का करार था। फिर 2002 में मेरे पास एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट था। कारगिल युद्ध के होने पर मैंने दोनों को छोड़ दिया।”
उन्होंने कहा, “मैं लाहौर के बाहरी इलाके में खड़ा था। मुझे वहाँ देख कर एक जनरल ने पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ? मैंने कहा लड़ाई शुरू होने वाली है, हम साथ मरेंगे। मैंने इस तरह दो बार क्रिकेट छोड़ा था, जिस पर सब के सब हैरान हुए थे। मुझे इस बात की बिलकुल चिंता नहीं थी। मैंने कश्मीर में मौजूद अपने दोस्तों को फोन किया और उनसे कहा कि मैं लड़ने के लिए तैयार हूँ।”
शोएब अख्तर सेना का बजट बढ़ाने की पैरोकारी ऐसे समय में कर रहे हैं जब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल है। जुलाई में आई एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 2 सालों के भीतर, इमरान खान की सरकार में पाकिस्तान पर 22 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ लद चुका है। यह पूरी दुनिया के क़र्ज़ का 35 फ़ीसदी है।
कोरोना वायरस महामारी के चलते हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान को 1.39 बिलियन डॉलर दिए थे। शोएब यह सुझाव भी दे चुके हैं कि कोरोना वायरस का सामना करने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच एक क्रिकेट मैच होना चाहिए। इस मैच से इकट्ठा होने राशि का इस्तेमाल कोरोना महामारी से लड़ने में उपयोग होना चाहिए।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आधिकारिक आवास का एक हिस्सा पिछले हफ्ते शहर में भारी बारिश के बाद ढह गया। यह घर सिविल लाइंस स्थित फ्लैग स्टाफ रोड पर स्थित है। हालाँकि, इस घटना में किसी को कोई चोट नहीं आई है और मुख्यमंत्री केजरीवाल सुरक्षित हैं।
इस घटना के बाद 80 साल पुरानी इस इमारत का एमसीडी (MCD) ने सर्वेक्षण शुरू कर दिया है। इस छत की मरम्मत हुई थी।
“The room is used by the CM himself and several meetings have been held there over the past months.” https://t.co/G77DbzHapA
एक अधिकारी के अनुसार, “कमरे का इस्तेमाल खुद सीएम द्वारा किया जाता है और पिछले महीनों में कई बैठकें आयोजित की गई हैं, खासकर महामारी के दौरान। शुक्र है कि घटना के समय कोई भी कमरे में नहीं था।”
रिपोर्ट्स के अनुसार, केजरीवाल के घर का यह सबसे अहम हिस्सा है। उन्होंने घर के एक हिस्से को अपना कार्यालय बना रखा था, जहाँ पर कई महत्वपूर्ण बैठकें भी आयोजित की जाती रही हैं।
केजरीवाल के घर में जब छत पर मरम्मत की जा रही थी, तो बगल के शौचालय की छत भी ढह गई। इसके बाद शौचालय की दीवार में दरारें और ईंटें ढीली होने लगीं। अधिकारियों ने कहा कि पीडब्ल्यूडी के अधिकारी अब नुकसान और घर की संरचनात्मक सुरक्षा का आकलन कर रहे हैं, और एक रिपोर्ट तैयार कर जल्द ही प्रस्तुत की जाएगी।
बताया जा रहा है कि जिस घर में अभी मुख्यमंत्री केजरीवाल रह रहे हैं, उसे 1942 मे बनवाया गया था और इसके किसी ना किसी हिस्से में मरम्मत का कार्य चलता ही रहता है। इससे पहले, पूर्व डिप्टी स्पीकर अमरीश सिंह गौतम को यह घर आवंटित किया गया था। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपने कार्यकाल के दौरान मोतीलाल नेहरू मार्ग पर रहीं। केजरीवाल 1942 में बने इस घर में 2015 में अपने दूसरे कार्यकाल में चले गए थे।
5 अगस्त 2020 को अयोध्या में भव्य राम मंदिर की नींव पड़ी। कई नाम ऐसे हैं जिनके कारण 500 साल चली यह लड़ाई कभी कमजोर नहीं पड़ी। इन नामों के बिना यह संघर्ष यात्रा अधूरी है। ऐसा ही एक नाम हैं 93 वर्षीय अधिवक्ता के पराशरण। उन्होंने राम जन्मभूमि की क़ानूनी लड़ाई लड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट में रामलला विराजमान की पैरवी की थी।
राम मंदिर भूमि पूजन की तारीख आते ही सोशल मीडिया उन नामों की चर्चा बड़े पैमाने पर हुई जिन्होंने रामजन्मभूमि पाने की लड़ाई में अहम योगदान दिया। पराशरण की भी काफी चर्चा हुई। उनकी एक तस्वीर खूब वायरल हुई जिसमें दावा किया गया था कि वह अपने घर में बैठ कर भूमि पूजन देख रहे हैं। लेकिन उनके नाम की चर्चा केवल इतने तक सीमित नहीं थी। पिछले कुछ दिनों से उनके नाम का (@KPrasaran) एक सक्रिय ट्विटर अकाउंट सामने आया है।
इस ट्विटर अकाउंट पर पराशरण की तस्वीर लगी थी। इसकी वजह से कुछ नेटिजन्स को लगा कि यह उनका वास्तविक अकाउंट है। कुछ ही देर में उस एकाउंट के फॉलोवर्स बढ़ गए। इस एकाउंट से पहला ट्वीट राम मंदिर भूमि पूजन से ठीक एक दिन पहले 4 अगस्त को किया गया था।
जो लोग प्रभु श्री राम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहूंचे,,जो लोग कभी भी राममंदिर नही बनने देना चाहते थे,, आज वही लोग रामभक्त बने बैठे है और अपने को रामभक्त प्रमाणित करने के लिए होड लगाए बैठे है.
ये सब प्रभु श्री राम की लीला है,,जो क्या से क्या करा देते है.
इस अकाउंट से किए गए सबसे ताज़ा ट्वीट में कपिल सिब्बल का ज़िक्र है। ट्वीट में लिखा है, “कपिल सिब्बल कह रहे थे कि वह राम मंदिर बनने पर आत्महत्या कर लेंगे। राम मंदिर बन गया, कब करेंगे आत्महत्या?”
कपिल सिब्बल जी कहे थे की अगर राममंदिर बना तो #आत्महत्या कर लुंगा…
राम मंदिर का भूमि पूजन होने की खुशी में तमाम लोगों ने इस अकाउंट को फॉलो कर लिया। उन्हें ऐसा लगा कि यह के पराशरण का असली ट्विटर अकाउंट है। यह रिपोर्ट तैयार करने के दौरान इस ट्विटर अकाउंट के 3737 फॉलोवर्स थे।
ऑपइंडिया ने अधिवक्ताओं के उस समूह से संपर्क किया जो राम मंदिर की सुनवाई के दौरान के पराशरण के साथ थे। पराशरण के सहयोगी योगेश्वरन ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि यह ट्विटर एकाउंट फ़र्ज़ी हैं, क्योंकि वे अभी तक ट्विटर पर नहीं आए हैं।
इसके अलावा के पराशरण के दो और सहयोगियों ने इस बात की पुष्टि की। सबसे पहले ट्वीट में जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की गई थी उससे ही साफ़ था कि यह उनका आधिकारिक ट्विटर अकाउंट नहीं हो सकता है। इतना ही नहीं अकाउंट द्वारा कपिल सिब्बल पर किया गया ट्वीट भी फ़र्ज़ी निकला, क्योंकि कपिल सिब्बल ने कभी इस तरह का दावा ही नहीं किया था कि मंदिर निर्माण होने पर आत्महत्या कर लेंगे। कपिल सिब्बल के इस बयान का कोई आधिकारिक स्रोत तक नहीं मौजूद है।
के पराशरण सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। इसके अलावा उनका पूरा न्यायिक करियर 6 दशक तक जारी रहा। वह साल 1983 से लेकर साल 1986 तक भारत के अटॉर्नी जनरल पद थे। वह 1976 में तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल भी रहे। उन्हें साल 2003 में पद्म भूषण और साल 2011 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। साल 2012 में राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा के लिए निर्वाचित किया था।
40 दिनों तक चली राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई के दौरान पराशरण ने अद्भुत ऊर्जा और इच्छा शक्ति का प्रदर्शन किया था। पराशरण सुबह 10:30 बजे से शुरू होने वाली सुनवाई में ठीक समय पर उपस्थित हो जाते थे। शाम 4 से 5 बजे तक चलने वाली सुनवाई में मौजूद रहते थे। पराशरण ने मामले से संबंधित हर ऐतिहासिक दलील का उल्लेख किया। उन्होंने सुनवाई के दौरान कहा कि 433 साल पहले बाबर ने रामलला के जन्मस्थान पर मस्जिद बना कर गलती की थीऔर इतनी बड़ी गलती को सुधारने की ज़रूरत है।
इसके अलावा पराशरण ने यह भी कहा कि मुस्लिम अयोध्या में किसी दूसरी जगह नमाज़ पढ़ सकते हैं। पूरी अयोध्या में 50 से 60 मस्जिद मौजूद हैं। लेकिन हिंदुओं के लिए श्रीराम का जन्मस्थान एक ही है, वह किसी भी सूरत में नहीं बदला जा सकता है। साल 2016 के बाद पराशरण ने सिर्फ 2 मामलों की पैरवी की। पहला सबरीमाला और दूसरा राम मंदिर। वह अक्सर इस बात का ज़िक्र करते थे कि यह उनकी अंतिम इच्छा है कि उनके जीते हुए इन मामलों की सुनवाई पूरी हो।
सुशांत सिंह के मामले की जाँच में कई बड़े कदम उठाए जाने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। सीबीआई और ईडी दोनों ने अपनी तरफ़ से मामले की जाँच शुरू कर दी है। ईडी ने रिया चक्रवर्ती से पूछताछ के लिए उन्हें समन भेजा था। लेकिन रिया ने सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई का हवाला देते हुए टालने की बात कही थी। जिसे ईडी ने अस्वीकार कर दिया है नतीजतन रिया चक्रवर्ती ईडी के सामने पूछताछ के लिए पेश हो रही हैं। रिया के पिता और भाई को भी तलब किया गया है।
#SushantSinghRajput death case: Rhea Chakraborty arrives at Enforcement Directorate (ED) office in Mumbai.
ED rejected her earlier request that the recording of her statement be postponed till Supreme Court hearing. pic.twitter.com/MIWYlYMXhT
वहीं इस बीच ईडी ने सुशांत की पूर्व बिजनस मैनेजर श्रुति मोदी को भी शुक्रवार को हाजिर होने के लिए कहा है। इसके अलावा सुशांत के फ्लैटमेट सिद्धार्थ पिठानी को भी 8 अगस्त को बुलाया गया है।
इस मामले में सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की है, जिसमें रिया चक्रवर्ती समेत उनके परिवार के 6 लोगों का नाम शामिल किया गया। इसके अलावा सीबीआई ने जाँच के लिए एक एसआईटी का गठन कर दिया है। एसआईटी की इस टीम के मुखिया गुजरात कैडर के आईपीएस मनोज शशिधर होंगे। वहीं ईडी ने इस मामले में रिया चक्रवर्ती को 7 अगस्त के दिन यानी आज पूछताछ के लिए बुलाया था। लेकिन रिया ने सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई का हवाला दिया था। इसके आधार पर रिया ने अपील की थी, उनका बयान आज नहीं दर्ज किया जाए। ईडी ने इस अपील को ठुकरा दिया था, जिसके चलते आज रिया पूछताछ में शामिल हो रही हैं। रिया चक्रवर्ती ईडी के दफ्तर पहुँच चुकी हैं। और उनसे पूछताछ जारी है।
Rhea has requested that the recording of her statement be postponed till Supreme Court hearing: Satish Maneshinde, Rhea Chakraborty’s lawyer on her being summoned by Enforcement Directorate (ED). #SushantSinghRajput
ईडी ने रिया को व्हाट्सएप के ज़रिए समन भेजा था। उन्होंने इसका जवाब मेल करके दिया था। लेकिन ईडी ने रिया चक्रवर्ती की इस माँग को सिरे से खारिज कर दिया है। ईडी इस मामले की आर्थिक दृष्टिकोण से जाँच कर रहा है। सुशांत सिंह मामले में रिया पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया गया था।
सुशांत सिंह के पिता ने पटना में रिया चक्रवर्ती के खिलाफ़ मामला दर्ज कराया था। मामले के स्थानान्तरण के लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। ख़बरों के मुताबिक़ रिया पिछली बार 1 अगस्त के दिन अपने से परिवार के साथ कुछ सामान लेकर बाहर जाती हुई थी नज़र आई थीं। इसकी जानकारी उनके इमारत के प्रबंधक ने दी थी। इसके पहले बुधवार के दिन रिया के सीए को भी समन भेजा जा चुका है लेकिन वह भारी बारिश का हवाला देते हुए पेश नहीं हुआ था। इसके अलावा ईडी पिछले कुछ समय में रिया से जुड़े कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है।
इस मामले पर बिहार पुलिस ने भी अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। जिसके बाद बिहार सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा दायर किया था। बिहार पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि रिया चक्रवर्ती सुशांत सिंह के रूपए हड़पने के लिए उनके संपर्क में आई थीं। इसके अलावा इन लोगों ने सुशांत सिंह को मानसिक रूप से बीमार बताना शुरू कर दिया।
इतना ही नहीं बिहार पुलिस ने रिया चक्रवर्ती पर सुशांत सिंह को दवाओं का ओवरडोज़ देने का आरोप भी लगाया। बिहार सरकार की सिफ़ारिश के बाद सुशांत सिंह का मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था। जिसके बाद सीबीआई ने 6 अगस्त के दिन रिया चक्रवर्ती समेत कुल 6 लोगों के खिलाफ़ मामला दर्ज किया था।