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छोटे पर्दे से बुरी खबर: ‘कहानी घर-घर की’ में काम कर चुके समीर शर्मा ने की खुदकुशी, पंखे से लटका मिला शव

कोरोना महामारी के बीच बॉलीवुड और छोटे पर्दे से बुरी खबरें आने का सिलसिला अब भी जारी है। खबर है कि टीवी एक्टर समीर शर्मा ने खुदकुशी कर ली है। समीर ने मुंबई में अपने घर पर आत्महत्या की है। समीर शर्मा ने ‘कहानी घर-घर की’, सास भी कभी बहु थी’, ‘वो रहने वाली महलों की’ जैसे नामी सीरियलों में काम किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 44 वर्षीय समीर शर्मा ने मलाड पश्चिम स्थित नेहा सीएचएस बिल्डिंग में अपने घर पर फाँसी लगाकर जान दी। पुलिस के मुताबिक एक्टर ने खुदकुशी 2-3 दिन पहले की होगी। क्योंकि जब पुलिस फ्लैट के अंदर पहुँची तो बॉडी डिकंपोज होना शुरू हो चुकी थी।

मलाड पुलिस के अनुसार, समीर ने इसी साल फरवरी में ये अपार्टमेंट किराए पर लिया था। वह यहाँ अकेले रहते थे। बुधवार को रात की ड्यूटी के दौरान चौकीदार को समीर शर्मा का शव लटकता हुआ दिखा। इसके बाद ये सूचना आगे सोसायटी मेंबर्स दी गई। फिर जानकारी होते ही पुलिस भी मौके पर पहुँची।

फ्लैट खोल कर देखा गया तो समीर का शव किचन में पंखे से लटक रहा था। पुलिस का कहना है कि फिलहाल उन्हें कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। पूरे घर का सर्च ऑपरेशन किया जा रहा है। पुलिस इस केस में फाइनेंसियल एंगल को भी खंगाल रही है।

खबरों की मानें तो समीर काफी दिनों से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे लेकिन बाद में वे ठीक होकर एक्टिंग करने लगे थे। वह इस समय स्टार प्लस के शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है ‘ का हिस्सा थे। वे शो में कुहू के पिता की भूमिका में नजर आए थे।

इस शो के अलावा समीर ने कई और टीवी शो ‘लेफ्ट राइट लेफ्ट’ ‘इस प्यार को क्या नाम दूँ- एक बार फिर’ ‘गीत हुई सबसे पराई’, 2612, ‘दिल क्या चाहता है’, ‘वो रहने वाली महलों की’ और ‘ज्योति’ में काम किया था।

हरा मस्जिद, बगल में लाल मंदिर: ‘द वायर’ की रोहिणी सिंह ने अपने बच्चे के सहारे फैलाया प्रोपेगेंडा, रोया सहिष्णुता का रोना

हिन्दू धर्म के विरोध के लिए यूँ तो लिबरल गिरोह के पत्रकार तरह-तरह की नौटंकी करते हैं, लेकिन इस बार ‘द वायर’ की पत्रकार रोहिणी सिंह ने अपने बच्चे के माध्यम से राम मंदिर के विरुद्ध प्रोपेगेंडा फैलाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उनके बेटे ने एक मंदिर और एक मस्जिद की ड्राइंग बनाई है। ड्राइंग में दोनों अगल-बगल ही दिख रहे हैं। बकौल रोहिणी सिंह, उनके बेटे ने इसके साथ-साथ सहिष्णुता पर लेख भी लिखा है।

‘द वायर’ की रोहिणी सिंह के अनुसार, बाईं तरफ उनके बेटे ने एक हरे रंग की मस्जिद का चित्र बनाया और उसके बगल में ही एक मंदिर का चित्र बनाया, जो लाल रंग की है। साथ ही उसने सहिष्णुता पर भी लेख लिखा। उसने लिखा,

“सहिष्णुता किसी के बुरे व्यवहार को स्वीकार करना नहीं होता है, इसका अर्थ है जो जैसे हैं उन्हें वैसे ही स्वीकार करना और उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करना जैसा आप अपने साथ होते हुए देखना चाहते हैं। इसका अर्थ ये कतई नहीं है कि आप अपनी विरासत और आस्था को कुर्बान कर दें। हम उस विरासत और आस्था को शत-प्रतिशत बनाए रखते हुए दूसरों की विविधता को सेलिब्रेट कर सकते हैं।”

हालाँकि, ‘द वायर’ की रोहिणी सिंह ने ये नहीं बताया कि उनके बेटे ने ये सारी चीजें ख़ुद की सोच के आधार पर लिखीं या फिर इसमें कुछ शब्द उनके भी हैं और उन्होंने इस लेख को प्रभावित किया। ऐसा इसीलिए, क्योंकि ये चीजें किसी और से ज्यादा उन्हें ख़ुद सीखने की ज़रूरत है।

लेकिन, मुद्दा यहाँ ये नहीं है कि रोहिणी सिंह कितनी सहिष्णु हैं या फिर उनके पास सहिष्णुता नाम की कोई चीज है ही नहीं। मसला ये है कि उन्होंने अपने बेटे की ड्राइंग बताकर जिस चित्र को शेयर किया, उससे मिलता-जुलता चित्र इंटरनेट पर पहले से ही वायरल है। एक ट्विटर यूजर ने इस ओर सबका ध्यान दिलाया।

यहाँ हम ये नहीं कह रहे कि बच्चे ने ये चित्र चुरा लिया है क्योंकि हो सकता है कि उसने इस चित्र को इंटरनेट पर देखा हो और फिर देख कर ड्रा किया हो। लेकिन, जो सहिष्णुता वाला लेख है वो भी बच्चों की ही सेल्फ-हेल्प वेबसाइट पर उपलब्ध है।

यहाँ बच्चे ने ‘अपने बच्चे को इस बारे में बराबर बताते रहें’ वाला भाग हटा दिया है क्योंकि ये यहाँ पर फिट नहीं बैठता है। हो सकता है कि रोहिणी सिंह ने खुद अपने बेटे को ये सब लिखने को कहा हो ताकि वो इसके बहाने ट्विटर पर राजनीति खेल सकें। ये सम्भावना तो कम ही दिखती है कि बच्चे ने खुद सर्च कर उस सेल्फ-हेल्प पैरेंटिंग वेबसाइट की खोज की हो और काफी चालाकी से वहाँ से इन पंक्तियों को कॉपी कर लिया हो।

लिबरल और कट्टर इस्लामी गिरोह का पुराना तरीका है कि वो अपने एजेंडे के लिए बच्चों का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते। इसीलिए हो सकता है कि ‘द वायर’ की पत्रकार ने भी यही टैक्टिक आजमाया हो। हालाँकि, ये पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा किया हो। अक्टूबर 2109 में भी रोहिणी ने दावा किया था कि एक 5 साल की लड़की ज़ोया को एक जन्मदिन पार्टी से भगाया जाने लगा तो बच्ची ने जवाब दिया कि वो पाकिस्तानी नहीं है।

अबू बकर, मुज़फ्फर, नवाजिश ने मेरी बेटी को घर से उठाया, रेप किया: नाबालिग महादलित की माँ

​बिहार में एक महादलित किशोरी को अगवा कर कथित तौर पर गैंगरेप का मामला सामने आया है। आरोपित पीड़िता के गॉंव के ही हैं। पुलिस ने 15 वर्षीय पीड़िता को मुक्त करा लिया है। साथ ही बलात्कार की बात से इनकार करते हुए कहा है कि उसे सिर्फ अगवा किया गया था।

मुख्य आरोपित ने 2 युवकों के साथ मिल कर उसका अपहरण किया। पीड़िता की माँ ने कसबा थाना क्षेत्र में अपनी बेटी के अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज कराया है। मोहम्मद मुजफ्फर मुख्य आरोपित है। पुलिस ने पीड़िता को मेडिकल जाँच के लिए अस्पताल भेजा है।

पीड़िता की माँ ने अपने बयान में बताया है कि सोमवार (अगस्त 4, 2020) की रात घर के सभी लोग छत पर सो रहे थे। मोहम्मद मुजफ्फर अपने सहयोगियों नवाजिश और अबू बकर के साथ आया और उनकी बेटी का अपहरण कर लिया।

पीड़िता की मॉं का दावा है कि अगवा करने से पहले उनकी बेटी को बेहोश किया गया। आरोपितों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। पीड़िता की माँ ने बताया कि सुबह उसे घर में न पाकर परिजन बेचैन हो गए और तलाश शुरू की। काफी खोजबीन के बाद पता चला कि पीड़िता को मोहम्मद मुजफ्फर ने बंधक बना कर रखा है।

जब परिजन वहाँ पहुँचे तो आरोपितों ने गाली-गलौज कर के उन्हें भगा दिया। पीड़िता को मुजफ्फर के घर से कहीं और शिफ्ट कर दिया। परिजनों के अनुसार जब पुलिस पहुँची, तब तक सारे आरोपित फरार हो चुके थे लेकिन पीड़िता को छुड़ा लिया गया। थानाध्यक्ष पंकज आनंद का कहना है कि पीड़िता की माँ की शिकायत पर पुलिस मौके पर पहुँची थी।

उन्होंने ये भी बताया कि मेडिकल जाँच के लिए महादलित पीड़िता को पूर्णिया सदर अस्पताल भेज दिया गया है। हालाँकि, पुलिस समूहिक बलात्कार की बात से इनकार कर रही है। ‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, राजद जिलाध्यक्ष नवीन यादव ने इस मामले में स्पीडी ट्रायल को माँग की है। पुलिस ने सामूहिक बलात्कार की घटना से इनकार करते हुए कहा है कि नामजद आरोपितों की तलाश में लगातार छापेमारी की जा रही है।

‘टीपू सुल्तान पहनता था राम नाम वाली अँगूठी, PM मोदी नहीं पहनते स्कल कैप’: लंदन में पड़ी उस अँगूठी का क्या है सच

कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी का कहना है कि टीपू सुल्तान ‘राम’ नाम वाली अँगूठी पहनता था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी स्कल कैप (मुस्लिमों द्वारा पहने जाने वाली मजहबी टोपी) नहीं पहनते। जबकि, वास्तव में राम नाम वाली इस अँगूठी और इसके स्वामित्व को लेकर किए गए दावे झूठे हैं।

इतिहास की सबसे विवादित हस्तियों में से एक टीपू सुल्तान एक बार फिर चर्चा का विषय है। इस बार टीपू सुल्तान देवनागिरी में लिखी हुई ‘राम’ नाम वाली ख़ास सोने की अँगूठी की वजह से चर्चा में है। समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने पीएम मोदी से 18वीं शताब्दी की राम नाम वाली इस अँगूठी को टीपू सुल्तान की बताते हुए लंदन से भारत वापस लाने की माँग की है।

हालाँकि, वास्तविकता यह है कि यह अँगूठी टीपू सुल्तान की नहीं, बल्कि उसके द्वारा लुटे गए मंदिरों में से चुराई हुई एक अँगूठी थी। दावा किया जाता है कि टीपू की मौत के बाद एक अंग्रेज अफसर मेजर जनरल लॉर्ड फिट्जरॉय ने टीपू की लाश से इस अँगूठी को चोरी कर लिया था। सोशल मीडिया पर इसी विषय को लेकर जमकर विवाद हो रहा है।

इस अँगूठी की नीलामी साल 2014 में क्रिस्टीज़ नीलामीघर ने की थी। क्रिस्टीज़ की वेबसाइट के अनुसार इस अँगूठी का वज़न 41 ग्राम था। आजम खान का कहना है कि पीएम मोदी को ऐतिहासिक महत्व की इस अँगूठी को भारत लाकर उन लोगों को दिखाना चाहिए, जो टीपू के खिलाफ राजनीति करते हैं।

ट्विटर पर कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी ने इस अँगूठी की तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा है, “मुस्लिम शासक, टीपू सुल्तान ने एक अँगूठी पहन रखी थी, जिस पर ‘राम’ अंकित था, लेकिन मोदी ने सर पर टोपी (स्कल कैप) पहनने से इनकार कर दिया। सांप्रदायिक कौन है?”

सलमान निजामी के इस दावे को फर्जी बताते हुए ‘ट्रू इंडोलोजी’ ने इस अँगूठी के इतिहास पर अब तक चले आ रहे फर्जी तथ्यों से पर्दा उठाया है।

‘ट्रू इंडोलोजी’ ने लिखा है, “टीपू ने कभी इस अँगूठी को नहीं पहना। अँगूठी टीपू के संग्रह का एक हिस्सा थी, जो उसने अपने शासन में की गई लूट के दौरान चुराई थी। ऐसा कोई संदर्भ नहीं है कि टीपू ने कभी यह अँगूठी पहनी हो। यह हाल ही में निर्मित फर्जी तथ्य है कि यह अँगूठी उसके शव से बरामद हुई थी।”

ट्रू इंडोलोजी ने लिखा है, “यह मेजर अलेक्जेंडर एलन का विवरण है, जो इतिहास में टीपू के मृत शरीर का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी है। उसने उस पूरे दृश्य की रिपोर्ट लिखी थी, जो टीपू के शव का वर्णन करता है। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि टीपू के शव से किसी भी प्रकार का आभूषण बरामद नहीं हुआ था।”

इस विवरण के अनुसार, “जब टीपू को प्रवेश द्वार के नीचे से लाया गया था, तो उसकी आँखें खुली थी, और शरीर इतना गर्म था कि कुछ क्षणों के लिए कर्नल वेलेजली और खुद मुझे संदेह था कि क्या वह मर गया है; उसकी नाड़ी और धड़कन को देखने पर हमारा संदेह दूर हुआ। उसके शरीर पर चार घाव थे, शरीर में तीन और सर में एक; गोली दाहिने कान से थोड़ा ऊपर, और गाल में देखी गई। उसकी पोशाक में महीन सफ़ेद लिनेन की जैकेट, फूलदार चिंट्ज़ के ढीले-ढाले कपड़े, रेशम और सूती क्रिमसन कपड़े, उसकी कमर पर गोल, लाल और हरे रंग की सिल्क बेल्ट के साथ एक सुंदर थैली उसके कंधे पर लटकी हुई थी; उसके सिर को खुला रखा गया था। उसकी पगड़ी उसके गिरने पर गिर गई थी, उसके हाथ पर एक ताबीज था, लेकिन कोई आभूषण नहीं था।”

टीपू की इस कथित अँगूठी के साथ ही समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने प्रधानमंत्री मोदी से कोहिनूर हीरे को घर वापस लाने के लिए भी कहा है। आजम खान ने कहा,- “पीएम रानी एलिजाबेथ द्वितीय के साथ भोजन करने जा रहे हैं, जो कोहिनूर को अपने मुकुट पर पहनती हैं। क्या मोदीजी उनसे भारत का कीमती हीरा लौटाने के लिए कहेंगे?”

वह मस्जिद मंदिर तोड़ कर नहीं बनाई गई लेकिन अब ऐसा हो सकता है कि मंदिर तोड़ कर उस जगह मस्जिद बनाई जाए: मौलाना साजिद रशिदी

ऑल इंडिया इमाम एसोसियेशन के मौलाना साजिद रशिदी ने राम मंदिर पर ज़हर उगला है। मौलाना ने कहा “एक मस्जिद हमेशा एक मस्जिद ही रहती है। यह कुछ और बनाने के लिए तोड़ी नहीं जा सकती है। हम ऐसा मानते हैं और भरोसा करते हैं कि वहाँ मस्जिद थी और मस्जिद ही रहेगी। वह मस्जिद एक मंदिर को तोड़ कर नहीं बनाई गई थी लेकिन अब ऐसा हो सकता है कि कभी मंदिर तोड़ कर उस जगह पर मस्जिद बनाई जाए।” 

इसके बाद मौलाना ने कहा “प्रधानमंत्री ने अयोध्या के मंदिर निर्माण कार्यक्रम में शामिल होकर संविधान की अवहेलना की है। उस ज़मीन पर बाबरी मस्जिद थी जिसे हिटलर की फ़ौज से मिलते जुलते लोगों ने तोड़ा था। जो लोग इंसाफ में भरोसा रखते हैं वह किसी न किसी दिन उस मंदिर को मस्जिद में तब्दील कर देंगे।” 

गौरतलब है कि 5 अगस्त 2020 भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन, अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर की नींव पड़ी। लेकिन मंदिर की नींव पड़ते ही देश के चुनिंदा लोग और समुदाय विशेष के लोग विरोध में उतर आए। विरोध कर रहे लोगों में न तो देश के संविधान की फ़िक्र नज़र आई। और न ही देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के प्रति सम्मान और भरोसा। इस कड़ी में देश की राजनीति के तमाम नेता भी शामिल हैं। 

लोकसभा सांसद और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लीमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मामले पर अपने हिस्से का जहर उगला। तमाम विवादित नेताओं से कहीं आगे बढ़ कर ओवैसी ने यहाँ तक कह दिया कि बाबरी मस्जिद थी और वही रहेगी। बुधवार की सुबह अपने ट्विटर एकाउंट से ट्वीट करते हुए ओवैसी ने कहा “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी इंशाअल्लाह #BabriZindaHai। 

इसके बाद ओवैसी ने यह भी कहा प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान की शपथ का उल्लंघन किया है। हिंदुत्व की कामयाबी धर्म निरपेक्षता की हार है। यह सिर्फ और सिर्फ हिंदू राष्ट्र की नींव रखी गई है। जहाँ लोगों ने नमाज़ पढ़ी उसे सर्वोच्च न्यायालय में झूठ बोल कर तबाह किया गया। ओवैसी के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भूमि पूजन को सिम्बल ऑफ़ इंडिया था। जबकि देश का सिम्बल कोई भी धार्मिक जगह नहीं हो सकती है। 

मामला राम मंदिर का हो और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी तरफ से बयान जारी करने में पीछे रह जाता। ऐसा कैसे संभव होता, नतीजतन उनकी तरफ से भी 4 अगस्त के दिन राम मंदिर मुद्दे पर बयान जारी किया गया था। बोर्ड द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, “बाबरी हमेशा एक मस्जिद ही रहेगी। हागिया सोफ़िया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी और शर्मनाक तरीके से ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया। बहुसंख्यक समाज के तुष्टिकरण वाले इस निर्णय से मस्जिद का दर्जा नहीं बदल सकता। दिल तोड़ने की ज़रूरत नहीं है, हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते हैं।”

जबकि हगिया सोफ़िया से तुलना करने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने बोर्ड की जम कर आलोचना की थी। इसके अलावा नेटिजन्स ने भी इस बयान को जम कर ट्रोल किया था। यहाँ तक कि तमाम समुदाय के लोगों ने इस बयान को शर्मिंदगी भरा बताया था।       

कुल मिला कर इस्लाम को मानने वाले नेताओं और मौलानाओं के लिए न तो संविधान का महत्व है और न ही न्याय प्रणाली में विश्वास। देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले पर अपना निर्णय सुना चुकी है। ऐसे में इस इंसाफ़ और मंदिर को मस्जिद में बदलने की बात का क्या मतलब। आखिर एक तरफ़ यह समुदाय हमेशा संविधान में भरोसे की दुहाई देता है लेकिन राम मंदिर के फैसले पर धमकी दे रहा है। 

कुछ नेताओं ने तो यहाँ तक कह दिया कि वहाँ बाबरी मस्जिद थी और हमेशा वही रहेगी। जब वह सत्ता में आएँगे तब इसका हिसाब बराबर होगा। यानी यह खुद को देश के लोगों की आस्था और देश की क़ानून व्यवस्था से बढ़ कर मान रहे हैं। वाकई इस देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किस हद तक किया जाता है वह 5 अगस्त के बाद स्पष्ट तौर पर नज़र आया। इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय ने वक्फ़ वोर्ड को अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ की जमीन दी थी। 

अस्पताल बनवाने के मुद्दे पर संत समाज ने कहा था कि जो मंदिर की ज़मीन पर अस्पताल बनवाना चाहते थे वह अब मस्जिद की ज़मीन पर बनवा सकते हैं। इस पुण्य कार्य में संत समाज आर्थिक मदद तक करने को तैयार है। देश का संवैधानिक ढाँचा ही ऐसा है कि अक्सर लोगों की सच्चाई सामने आ ही जाती है। 

इस निर्णय के बाद ही यह पूरी तरह साफ़ हो गया कि संविधान में भरोसे की बात करने वाले लोग खुद में कितना बड़ा अपवाद हैं। यही नेता हैं जो सर्वोच्च न्यायालय की निर्णय की दुहाई देते थे लेकिन फैसला आने के बाद इस्लाम का हवाला दे रहे हैं। यानी इस्लामी कानून शरिया देश के संविधान और सर्वोच्च अदालत से भी बड़ा है। 

दुनिया का कोई भी इतिहासकार इस बात से असहमति नहीं जता सकता कि भारत में कितने मंदिर तोड़े और लूटे गए इसका कोई हिसाब नहीं। लेकिन भारत का हिंदू केवल एक मंदिर के लिए लड़ा, सिर्फ एक “श्रीराम” मंदिर के लिए लड़ा। अभी अगर बाकी मंदिरों के लड़े तो सोचिए क्या होगा?

व्यंग्य: बकैत रवीश कुमार भूमिपूजन पर बोले- बर्नोल न भेजें, घर में बर्फ की सिल्ली रखता हूँ

चलिए… जो होना था वो तो हो ही गया। संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाई गई और मेरे चैनल तक पर बूँद-बूँद टेलीकास्ट हुआ। क्या कीजिएगा, मैं एक अदद पत्रकार, छलकत हमरो जबनिया ऐ राजा बकैत कुमार, कर ही क्या लेता। मैं तो चैनल नहीं चलाता लेकिन एक पत्रकार के तौर पर चुप भी तो नहीं रह सकता।

बताइए कि जिनके ऊपर मस्जिद गिराने का आरोप है, वो भूमिपूजन में शामिल थे! आज के दौर में जबकि न्यायपालिका न्याय नहीं करती, फैसले सुना देती है, वैसे समय में हम वामपंथियों के पास क्या चारा बचा है! हम तो आरोप को ही निर्णय मानते हैं। आप कहेंगे कि मेरे चैनल और उसके मालिक पर सीबीआई ने केस दर्ज किए हुए हैं। तो भाई, हमारे मालिक कौन सा भूमिपूजन जैसा पवित्र कार्य कर रहे थे? वो तो यहीं चैनल के दफ्तर में बैठे रहते हैं।

चौबीस घंटे एक ही बात चल रही है कि कैसा होगा मंदिर, मोदी किधर जाएँगे, किस गाड़ी से आएँगे, कौन से रंग का कुर्ता पहनेंगे… क्या यही है विकास? कब तक मंदिर-मस्जिद होता रहेगा इस देश में? सॉरी, मंदिर तो हो गया, मस्जिद की कोई बात नहीं की गई, जबकि दोनों ‘म’ अक्षर से ही शुरू होते हैं। अक्षर का मतलब होता है जो नष्ट न किया जा सके, जबकि मस्जिद का भाग्य देखिए कि उसे नष्ट कर दिया गया।

नष्ट तो खैर मंदिर को भी किया गया, ऐसा हिन्दू मानते हैं। लेकिन क्या एक समाज के तौर पर ये हमारी सामूहिक हार नहीं है कि हम 492 साल पहले हुए अन्याय को याद किए बैठे हैं? और राम को अयोध्या में आप मान रहे हैं, जबकि कहा जाता कि ‘राम तो रोम-रोम में हैं’। तो फिर हिन्दुओं को तो रोम जाना चाहिए और वहाँ मंदिर निर्माण का कार्य करना चाहिए। लेकिन नहीं, वो तो दूर पड़ जाएगा, वहाँ भाजपा की रैलियों के लिए लाखों की भीड़ कैसे जुटाएँगे, इसलिए अयोध्या का नाम लिया गया, जो कि वास्तव में फैजाबाद था।

फैज से याद आया कि उसे मिट्टी नहीं ले जाने दी गई! बताइए, ये किस तरह का समाज अपने बच्चों के लिए छोड़े जा रहे हैं हम? कल टीवी का एक स्क्रीनशॉट किसी ने व्हाट्सएप्प पर भेजा जिसमें आजतक चैनल पर भूमिपूजन लाइव चल रहा था और साइड में ‘जलन हो तो बर्नोल लगाएँ’ जैसा कुछ लिखा हुआ था। क्या मीडिया पैसों के लिए हम वामपंथियों को खुलेआम ट्रोल करेगा? क्या हमें एक दिन का सुकून नहीं है? हमारे गिरोह के सदस्यों ने लाल रंग का डीपी लगाया तो ट्रोलर अजीत भारती ने लिखा कि वो हनुमान जी का रंग है!

आप ही बताइए कि अब रंग भी हनुमान जी के होने लगे! तब तो कह दीजिएगा कि वामपंथियों का झंडा भी हनुमान जी का है और ‘लाल सलाम’ वास्तव में ‘जय श्री राम’ का अपभ्रंश है जो कि बाली और सुग्रीव ने मुँह में सेव का टुकड़ा खाते हुए बोला था, तो वो ‘लाल सलाम’ जैसा लगा। अब यही सब होगा इतिहास की किताब में कि कौन सा रंग किस भगवान का है।

हमने इतिहासकार दिए आपको, जो तथ्य नहीं कल्पना लिखता हो, आपने कहा कि गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। अरे भाई, सही इतिहास तो इंटरनेट पर है ही, लेकिन देश में कभी रचनात्मकता की कक्षा लगी है? कभी बच्चों को बोला गया है सरकारी स्कूलों में कि कहानी लिखो, अपने मन से? उसी क्रिएटिविटी को बढ़ावा देने के लिए रोमिला ने, इरफान हबीब, विपिन चंद्रा, गुहा आदि ने तथ्य को परे रख कर काल्पनिक बातों को इतिहास के रूप में लिखा ताकि अगली पीढ़ी कहानी बनाने में माहिर हो, नैरेटिव गढ़ सके।

आपको यह क्या कम लगता है कि इन्हीं में से कई इतिहासकार अयोध्या मामले में कोर्ट में लड़े थे ये साबित करने में कि रामजन्मभूमि अयोध्या नहीं है, ये बात और है कि जजों ने उनकी रिपोर्ट को मोड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया। फासीवाद तो तभी से मुझे दिखने लगा था।

ख़ैर, मंदिर का भूमिपूजन हो गया और एक घेराबंदी की गई कि हम वामपंथी लोग ठीक से अभिव्यक्ति भी न कर पाएँ। हमारे एक ट्वीट पर तीन हजार लोग गरियाने आ जाते हैं। ट्रोलर अजीत भारती ने कल यहाँ तक लिख दिया कि मंदिर तो बन जाएगा, लेकिन बड़े दिल वाले मजहबी भाइयों को मस्जिद की पाँच एकड़ जमीन पर अस्पताल या स्कूल खोलने की पहल करनी चाहिए, समाज आशीर्वाद देगा।

ये क्या जान-बूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश नहीं हो रही है? एक तो मस्जिद के लिए वहाँ जमीन दे दी गई जहाँ कोई मंदिर है ही नहीं, जबकि भारत में कई बड़े मस्जिद मंदिरों के ही ऊपर बनाए गए हैं। आप ही बताइए कि जिस देश में परंपरा यही रही हो कि मंदिर तोड़ो, मस्जिद बनाओ, या मंदिर न टूट रहा हो तो सीमेंट से उसकी दीवार सफेद रंग से पोत कर गुंबद लगा दो, हो गई मस्जिद, वहाँ आपने कहा कि खाली जमीन पर मस्जिद बना लो।

और तब इन मीडिया वालों को देखिए कि वो वक्फ बोर्ड से पूछते हैं कि मस्जिद कब बनेगा? जबकि वो लोग इस चक्कर में हैं कि जहाँ जमीन दी, वहाँ भी खोद कर देख लें कि नीचे कोई मंदिर तो नहीं क्योंकि मस्जिद बनते ही कुछ लोग ये याचिका न लगा दें कि रामलला घुड़कते हुए एक दिन वहाँ भी गए थे, अब मंदिर यहीं बनेगा। ये सब अच्छा लगता है क्या? एक समाज के तौर पर, एक जो तहजीब का दायरा है, एक जो बिरयानी के मसालों वाली बात है, एक जो रायता होता है, हमें वो सब भी देख कर चलना चाहिए।

आप ये बताइए कि कुछ लोग यह भी कहते पाए जाते हैं कि मुगलों ने कुछ नहीं दिया है, बस हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ कर गुंबद जोड़ देते थे। ये कितना गलत है अपने आप में! ठीक है कि ज्ञानवापी है, मथुरा है, भारत के 40,000 मंदिर हैं जिन्हें तोड़ दिया गया या गुंबद रख कर इस्लामी आक्रमणकारियों ने मस्जिद बना दी उसके ऊपर, लेकिन आप ये कैसे कह रहे हैं कि कुछ नहीं दिया? गुंबद किसने लगाई? सीमेंट-बालू, पत्थर, रंग आदि तो मुगलों या उसकी संतानों ने लगाया होगा न अपना? फिर आप ये कैसे कह देते हैं कि उन्होंने कुछ नहीं दिया? ये क्या समाज में वैमनस्य फैलाने वाली बात नहीं है?

राफेल आया तो उसके लैंडिंग की फोटो दिखाते रहे, मंदिर बन रहा है तो संस्कृत में चैनलों पर मंत्र पढ़ा जा रहा है… एक सेकुलर समाज में संस्कृत में मंत्र पढ़ना क्या हिन्दू तुष्टीकरण नहीं है? क्या दूसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी जी को बड़ा हृदय करते हुए ‘सब बुत उठवाए जाएँगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का’ वाली नज्म फैज के फैजाबाद में बन रहे मंदिर में नहीं पढ़ना चाहिए था? अयोध्या में क्या सिर्फ ब्राह्मण ही रहते हैं कि कार्यक्रम संस्कृत में कराया गया? क्या ये दलितों को अलग-थलग करने की कोशिश नहीं है?

एक प्रधानमंत्री यजमान बन कर बैठे थे, क्या यह शोभा देता है? क्या यह प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप है? जो प्रधानमंत्री संविधान को प्रणाम करता है, वो राम को कैसे प्रणाम कर सकता है? उसे तो हमने इफ्तार पार्टी में जालीदार टोपी पहन कर केले खाते नहीं देखा, फिर रामलला को साष्टांग दंडवत् किया जा रहा है! एक राष्ट्र के नाम पर हम विश्व में क्या मुँह दिखाएँगे कि देखो यहाँ का प्रधानमंत्री एक मूर्ति के आगे लेट गया है?

मैं कल पूरे दिन इतना परेशान रहा कि क्या बताऊँ। कोई कह रहा था कि बाजार में मिट्टी का दीया नहीं मिल रहा है, कोई पटाखे ढूँढ रहा था, कोई कह रहा था चायनीज झालर मत खरीदना… सरयू किनारे योगी आदित्यनाथ ने फिर से दीपोत्सव करा दिया। इस आदमी को दीपों से इतना प्रेम है कि अगले साल से पाँच अगस्त को राजकीय दीवाली ही न मनाने लगे!

आप सोचिए कि दीपकों में तो घी या तेल पड़ा है, उससे कितने घरों में पूड़ियाँ छानी जा सकती थी! या फिर ठेले पर जो चाऊमीन बिकता है, एक दीपक के तेल से हाफ प्लेट तो बन ही जाता है अजीनोमोटो डाल कर। किसी गरीब को चाऊमीन खिला देते योगी जी, तो याद रखता। हो सकता है उनकी रैली में भी आता, उनका परमानेंट वोटर बन जाता। ऐसे ही तो परमानेन्ट वोटर बनते हैं कि कलावती के घर खाना खा लो, उसी के खर्चे का खाना, और वही कृतज्ञता में कॉन्ग्रेसी भी बन गई।

कोई कहता है कि कुम्हार ने दीये बनाए होंगे, तेल बेचने वाले ने तेल निकाला होगा, इन सबसे उनके घरों में भोजन बना होगा। ठीक है, बना होगा, लेकिन हाफ प्लेट चाऊमीन का जो आनंद मिलता है किसी गरीब को, जिसने कभी चाऊमीन खाई न हो, उसकी भरपाई क्या किसी गरीब कुम्हार के घर में भोजन बनने से हो सकेगी?

आप देखिए कि इस कार्यक्रम का हर भाग ऐसा था मानो हिन्दुओं का ही कार्यक्रम हो। देश सेकुलर है तो यहाँ मंदिर कैसे बन रहा है? संविधान में जब सेकुलर लिखा हुआ है तो यहाँ मंदिर कैसे बन रहा है? क्या हम बचपन से यह सीखते नहीं आए कि सेकुलर का मतलब ही होता है हिन्दुओं की हर चीज, हर प्रतीक, हर कर्मकांड, हर बात से घृणा करना। ऐसे में, मंदिर बना देना क्या संविधान की इस अवधारणा के खिलाफ नहीं?

क्या नेहरू जी ने राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू को सोमनाथ जाने से नहीं रोका था? क्या आपको लगता है कि नेहरू जी ने कुछ गलत किया होगा? आपको लगता है कि नेहरू जी कभी कुछ गलत कर सकते थे? उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया की थी। वो असली सेकुलर थे, उन्होंने अपने समय में राम मंदिर नहीं बनने दिया क्योंकि यही तो भारत की पहचान है कि प्रधानमंत्री स्वयं को दुर्घटनावश हिन्दू मानता रहा। ये बात और है कि उनकी संततियों की संततियों के संततियों ने बार-बार योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू बनने की कोशिश कर के बैलेंस करने की कोशिश की है। मुझे इसका दुख था, लेकिन क्या कर सकते हैं, घर जहाँ से चले, वहाँ ज्यादा सवाल नहीं करना चाहिए… हें हें हें!

मुझे तो मोदी के यजमान बनने से ज्यादा समस्या उस बेगूसराय के पंडित से है! बताइए बेगूसराय की धरती से कन्हैया जैसे महान विचारक और शोधार्थी हुए हैं, वहीं के एक पंडित ने अपने काम से काम नहीं रखा। एक तो पूरा कार्यक्रम संस्कृत का था, एक भी गालिब का शेर या फराज की गजल का कोई मिसरा नहीं कहा… बाबर ने जो गंगा-जमुनी तहजीब शाब्दिक तरीके से मिला दी थी कि मंदिर के ऊपर ही मस्जिद बनवा दिया, तो क्या पंडित जी से यह आशा नहीं की जा सकती कि वो उर्दू में ‘एक बिरहमन ने कहा है ये साल अच्छा है’ ही पढ़ देते? हिन्दुओं को लिए तो अच्छा ही है साल!

लेकिन नहीं, उर्दू का एक शब्द नहीं बोला गया उनसे! संस्कृत तक तो फिर भी बर्दाश्त हुआ क्योंकि हिन्दुओं ने खुद ही उसे त्याग दिया है तो उन्हें समझ में कहाँ से आता। लेकिन पंडित जी ने, यह जानते हुए कि सारे चैनल उसी डीडी न्यूज का फीड चला रहे हैं, हिन्दी में भी बताना शुरू किया। और जो वो हिन्दी में कह रहे थे, वो हिन्दुओं के लिए तो बड़ी अच्छी बात कही जा सकती है लेकिन, हम जैसे वामपंथियों की कितनी सुलग रही थी, वो हमें ही पता है। मुझे निजी तौर पर कहाँ-कहाँ कष्ट हुआ, और पूरे घर में कितना धुआँ भर गया, वो मैं ही जानता हूँ। इसकी क्या जरूरत थी?

पूरे दिन बर्फ की सिल्ली पर बैठा रहा और जलन ऐसी कि ‘जिया जले, जाँ जले, सिल्ली पर धुआँ चले’ हो गया। जैसे ऊर्ध्वपाती पदार्थ होते हैं न जो ठोस से सीधा गैसीय अवस्था को प्राप्त कर जाते हैं, वैसे ही आप यकीन मानिए कि बर्फ की सिल्ली ठोस बर्फ से सीधे वाष्पीकृत हो रही थी और रत्ती भर भी पानी नहीं बन पा रहा था। यूँ तो सिल्ली का लाभ मैंने पहले कई बार लिया है, क्यूब्स का भी सहारा लेता हूँ, लेकिन मंदिर वाला मसला इतना परीशाँ कर देगा, ये मैंने सोचा नहीं थ। वो तो अच्छा हो व्हाट्सएप के मित्रों का जिन्होंने बिना पैसे लिए सुबह ही कुछ सिल्लियाँ भिजवा दी थीं, जिसे मैंने सूती बोरे में लपेट कर रखा हुआ था। उन मित्रों को आभार जो मेरे स्वास्थ्य का इतना ध्यान रखते हैं, वरना कोरोना काल में तो घर से भी निकलना मुश्किल ही है। हें हें हें!

ख़ैर, ज्यादा समय नहीं लूँगा आपका क्योंकि अहमदाबाद के कोरोना अस्पताल में एक दुर्घटना हो गई है और मुझे उन लाशों पर राजनीति करनी है, मुझे ये दिखाना है कि ऐसी दुर्घटना दुनिया में पहली बार हुई। मुझे ये लिखना है कि ‘ये है गुजरात मॉडल’, और पीछे के कई पोस्ट के बारे में बताऊँगा कि कैसे मैंने अहमदाबाद पर काफी कुछ लिखा लेकिन कोई मेरी बात सुन नहीं रहा था।

अंत में, हिन्दुओं से अपील है कि रामजन्मभूमि पर उल्लास मनाइए, गाइए, नाचिए लेकिन यह भी याद रखिए कि आपकी खुशी के कारण बीस करोड़ लोगों को भयानक दर्द हो रहा है। आप हमेशा कहते हैं कि आप सहिष्णु हैं, मैं हमेशा कहता हूँ भारत इन्टोलरेंट हो गया है, तो आप ही की बात मान लेते हैं। आप बड़ा दिल दिखाइए, अभी भी कुछ बना नहीं है वहाँ, दे दीजिए मस्जिद वालों को जमीन, उन्हें अच्छा लगेगा।

अरे क्या हुआ कि नीचे मंदिर के अवशेष निकल आए? क्या हुआ कि लाखों हिन्दू पाँच सौ सालों में मुगलों द्वारा भी काटे गए, और मौलाना मुलायम द्वारा भी गोलियों के शिकार बने? क्या होता है इससे कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में आपके पक्ष में निर्णय दे दिया? सत्य तो यही है न कि जो लोग कहते थे कि वो कोर्ट का फैसला मानेंगे, आज नहीं मान रहे… अब आप ही कहिए कि किसी को कोर्ट का फैसला ही स्वीकार्य नहीं तो क्या हम इसे न्याय मानेंगे? क्या गाँधी जी होते तो यह न कहते कि ‘अब्दुल तो अपना भाई है’?

क्या आप गाँधी जी से भी बड़े हैं? उन्होंने तो मंदिर में कुरान पढ़वाया था, मजहबी हत्यारों को वो माफ कर देते थे। आप एक मंदिर तक न दे सके? ये हिन्दू समाज की न्यायिक जीत जरूर है, लेकिन एक समाज के तौर पर हम हार गए हैं।

लेख का वीडियो

‘मंदिर वहीं बनाएँगे, पर तारीख़ नहीं बताएँगे’: देखिए आज ‘भक्त’ बने कॉन्ग्रेस-केजरी-ठाकरे-लिबरल जमात ने कैसे उड़ाया था मजाक

अयोध्या में श्रीराम मंदिर भूमिपूजन के सम्पन होने के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और दिल्ली में उन्हीं के समकक्ष अरविंद केजरीवाल ने बुधवार (04 अगस्त, 2020) को राम मंदिर भूमिपूजन का अनिच्छा से स्वागत किया है।

हालाँकि, ऐसा करने वालों की लिस्ट बेहद लम्बी है, और इसमें कई इस्लामी विचारधारा के समर्थक और कॉन्ग्रेसी नेता भी मौजूद हैं, जिन्होंने कानूनी अड़चनों के कारण विलम्ब होने पर अतीत में राम मंदिर निर्माण का मखौल उड़ाया था, और अब हिन्दुओं क बीच अपनी छवि सुधारने के प्रयास में राम मंदिर निर्माण की बधाई देते देखे जा रहे हैं।

वर्ष 2015 में, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक रैली को संबोधित करते हुए राम मंदिर के निर्माण में देरी पर कटाक्ष किया था। लगभग 30 सेकंड के वीडियो में कोई भी ठाकरे को यह कहते हुए सुन सकता है कि ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, लेकिन तारीख नहीं बताएँगे।’

इसी तरह, 2019 के आम चुनावों के दौरान, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भी राम मंदिर के निर्माण का मजाक उड़ाया था।

कॉन्ग्रेसी नेताओं ने भी समय-समय पर इस कटाक्ष के रूप में इस्तेमाल किया है।

दिलचस्प बात यह है कि नई-नई रामभक्त प्रियंका गाँधी वाड्रा को भी श्रीराम मंदिर भूमिपूजन पर सॉफ्ट हिंदुत्व वाले कारनामों के लिए लोगों द्वारा निशाना बनाया गया।

JNU की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद भी इस जुमले को कई बार इस्तेमाल कर चुकी हैं।

स्वघोषित फैक्ट चेकर और इस्लामिक प्रोपेगेंडाबाज मोहम्मद जुबैर भी ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, तारीख नहीं बताएँगे’ को ट्विटर पर कटाक्ष की तरह लिखते देखा गया है।

गालीबाज ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी का भी यह पसंदीदा वाक्यांश रहा है।

स्वाति चतुर्वेदी की सहयोगी और ‘द वायर’ की पत्रकार रोहिणी सिंह भी कई मौकों पर श्रीराम मंदिर निर्माण का मजाक बना चुकी हैं।

दागी पूर्व पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट, जो इन्टरनेट लिब्रल्स के बीच बेहद पसंदीदा थे, ने भी श्रीराम मंदिर का मजाक उड़ाया था।

आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया हेड अंकित लाल भी श्रीराम मंदिर निर्माण का मज़ाक बना चुके हैं।

तमाम इन्टरनेट लिबरल और प्रोपेगेंडाबाजों के दावों के विपरीत कल, अगस्त 05, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या श्रीराम मंदिर का शिलान्यास किया। भाजपा ने 2019 के आम चुनावों से पहले अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा शामिल किया था और मंदिर निर्माण को लेकर संकल्प जाहिर किया था।

ट्रंप के वीडियो पर कोरोना वायरस से जुड़ी अफ़वाह फैलाने का आरोप: ट्विटर-फेसबुक ने बंद किया कैम्पेन एकाउंट

बुधवार के दिन दो बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स फेसबुक और ट्विटर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कैम्पेन एकाउंट प्रतिबंधित कर दिया। दरअसल, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट से एक वीडियो साझा किया था। फेसबुक और ट्विटर के दिशा निर्देशों के मुताबिक़ ट्रंप द्वारा साझा किया गया वीडियो कोरोना महामारी को लेकर लोगों में भ्रम फैला रहा था। जिसके बाद ट्रंप का एकाउंट बंद करने का फैसला लिया गया। 

इन दिशा निर्देशों को मूल रूप से लागू करने की वजह कोरोना महामारी है। जिससे डिजिटल दुनिया में कोरोना से संबंधित कोई अफ़वाह न फैलाई जा सके। साथ ही आम लोग इससे प्रभावित न होने पाएँ। बुधवार के दिन ट्रंप ने फॉक्स न्यूज़ को दिए गए एक साक्षात्कार का वीडियो साझा किया। उन्होंने कहा बच्चे कोरोना वायरस से “वर्चुअली इम्यून” हैं। इसके अलावा ट्रंप ने कहा “उन्हें (बच्चों को) कोई परेशानी नहीं है, उन्हें कोई भी परेशानी नहीं है।” 

अमेरिका में स्कूल खोलने की बात पर ट्रंप ने कहा बच्चों पर कोरोना वायरस का असर नहीं होता है। ट्रंप के मुताबिक़ उन्होंने कई चिकित्सकों को ऐसा दावा करते हुए सुना था कि बच्चों पर इस वायरस का असर नहीं पड़ता है। इसके बाद ट्विटर के प्रवक्ता निक पसीलियो ने इस बारे में रीट्वीट करते हुए ट्विटर का पक्ष रखा। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप का उल्लेख करते हुए कहा—

“TeamTrump की तरफ से किया गया असल ट्वीट ट्विटर के दिशा निर्देशों का उल्लंघन करता है। यह कोरोना वायरस महामारी के संबंध में अफ़वाह भी फैला रहा है। नतीजतन उन्हें इस ट्वीट को हटाने की सिफ़ारिश करनी पड़ी। ट्विटर ने ट्रंप के निजी ट्विटर एकाउंट पर कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उस एकाउंट से उन्होंने रीट्वीट किया था।”  

इसके बाद ट्रंप के चुनावी अभियान के प्रवक्ता Tim Murtaugh ने इस कार्रवाई पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा ट्विटर डोनाल्ड ट्रंप के मामलों में एकतरफ़ा कार्रवाई करता है। ट्विटर के सारे दिशा निर्देश और नियम क़ायदे बस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ही लागू होते हैं। इसके अलावा निक ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि वह कमला हैरिस के प्रेस सेक्रेटरी थे। हैरिस साल 2017 से अमेरिका जूनियर सेनेटर हैं, वह डेमोक्रेटिक पार्टी से इस पद पर मौजूद हैं। 

इसके पहले भी ट्विटर डोनाल्ड ट्रंप पर बड़ी कार्रवाई कर चुका है। हाल ही के मई महीने में ट्विटर ने ट्रम्प के mail in ballots पर किए गए दो ट्वीट पर कार्रवाई की थी। इस मामले में ट्विटर का आरोप था कि दोनों ट्वीट मतदान के मुद्दे पर जनता में भ्रम फैला रहे थे। इसके अलावा ट्विटर ने यह भी आरोप लगाया कि ट्वीट हिंसा को भी बढ़ावा दे रहे थे। ट्वीट में ट्रंप ने कहा था जैसे ही लूट शुरू होगी वैसे ही गोलीबारी भी शुरू होगी। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ बच्चों और वयस्कों में इस बीमारी की संभावनाएं सबसे कम होती हैं। लेकिन गंभीर मामलों में उनकी जान जाने का ख़तरा बना रहता है। Centres for Disease Control and Prevention (CDC) के मुताबिक़ इस बात के पूरे सबूत मिले हैं।

बच्चों पर कोरोना वायरस का ख़तरा कम रहता है। बच्चे इस वायरस से कम संख्या में प्रभावित होते हैं जबकि युवाओं में प्रभावित मामलों का प्रतिशत काफी ज़्यादा है। भले बड़ी संख्या में युवा इस बीमारी से प्रभावित हुए हैं लेकिन बच्चे पूरी तरह इम्यून नहीं कहे जा सकते हैं। उन्हें भी बाकियों की तरह ही तय नियमों का पालन करना चाहिए।     

टाइम्स स्क्वायर पर श्रीराम मंदिर की तस्वीर वाला ट्वीट डिलीट करने पर पाक क्रिकेटर दानिश कनेरिया को लोगों ने दी सुरक्षित रहने की सलाह

अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन की खुशियाँ सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्वभर में मनाई गई। इस ख़ुशी में शामिल होने वालों में से एक नाम पाकिस्तान के पूर्व स्पिनर दानिश कनेरिया का भी है।

दानिश कनेरिया ने बुधवार (अगस्त 05, 2020) को अमेरिका के न्यूयॉर्क, टाइम्स स्क्वायर में श्रीराम मंदिर भूमिपूजन के शो की तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा – “जय श्री राम।”

दानिश ने अयोध्या में हुए भूमि पूजन को लेकर इस तस्वीर को रीट्वीट करते हुए कहा है कि भगवान राम हमारे आदर्श हैं और ये दुनियाभर हिंदुओं के लिए एक ऐतिहासिक दिन है।

पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देश में रहकर श्रीराम की जय-जयकार करने पर जब ऑपइंडिया सीईओ राहुल रौशन ने दानिश कनेरिया को सुरक्षित रहने की सलाह दी, तो इस पर दानिश ने जवाब दिया, ‘”हम सुरक्षित हैं, हमारे धार्मिक विश्वास से किसी को कोई दिक्कत नहीं है। प्रभु श्रीराम का जीवन हमें एकता और भाईचारा सिखाता है।”

लेकिन दानिश कनेरिया ने यह ट्वीट कुछ देर बाद डिलीट कर दिया। दानिश के इस ट्वीट को डिलीट करने पर लोगों के बीच कई प्रकार की आशंकाएँ चर्चा का विषय बन गई।

दानिश कनेरिया द्वारा डिलीट किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट

हालाँकि, माना जा रहा है कि दानिश ने टाइम्स स्क्वायर में श्रीराम के भव्य मंदिर के भूमि पूजन के मौके पर न्यूयॉर्क शहर के टाइम्स स्क्वायर में हो रहे ब्रॉडवे पर भगवान राम के हाई-डेफिनिशन डिजिटल डिस्प्ले की तस्वीर वाले ट्वीट को इस वजह से डिलीट कर दिया क्योंकि कई इस्लामिक संगठन टाइम्स स्क्वायर में इसके प्रदर्शन को लेकर विरोध कर रहे थे। यह कयास लगाए जा रहे हैं कि शायद इसी विरोध और दबाव के चलते दानिश कनेरिया ने वह तस्वीरें डिलीट की होंगी।

हालाँकि, दानिश कनेरिया ने वो ट्वीट तो डिलीट कर दिया, जिसमें उन्होंने टाइम्स स्क्वायर के डिस्प्ले वाली भगवान श्रीराम की तस्वीरें शेयर की थीं, लेकिन इसके बाद एक और ट्वीट में श्रीराम का चित्र ट्वीट करते हुए लिखा – “भगवान राम की सुंदरता उनके चरित्र में है, न कि उनके नाम में, और वो बुराई के खिलाफ अच्छाई के जीत के प्रतीक हैं। आज दुनियाभर में खुशी की लहर है, ये बड़ी संतुष्टि का क्षण है।”

उल्लेखनीय है कि हिन्दू आस्था के चलते आखिरी बार दानिश कनेरिया पिछले साल ही तब चर्चा में आए थे जब पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख़्तर ने खुलासा किया था कि कुछ पाकिस्तानी क्रिकेटर दानिश कनेरिया के साथ खाना खाने से भी परहेज करते थे क्योंकि दानिश कनेरिया एक हिंदू थे।

शोएब अख्तर के इस दावे को दानिश कनेरिया ने सही बताते हुए कहा था कि शोएब अख्तर बिल्कुल सही कह रहे हैं। कनेरिया ने कहा, “हिंदू होने के कारण साथी क्रिकेटर मेरे खाना खाने को लेकर समस्या पैदा करते थे। अब मैं उन खिलाड़ियों के नामों का खुलासा करूँगा जो हिंदू होने के कारण मुझसे बात करना पसंद नहीं करते थे। उस समय मेरे पास यह कहने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन अब मैं करूँगा।”

अहमदाबाद के कोरोना अस्पताल में लगी आग: 8 की मौत, राज्य सरकार ने दिए जाँच के आदेश, PM मोदी ने किया मुआवज़े का ऐलान

गुजरात के अहमदाबाद स्थित एक अस्पताल में आग लग गई जिसमें कोरोना वायरस से प्रभावित मरीज़ों का इलाज चल रहा था। इस दुर्घटना में अब तक कुल 8 लोगों ने अपनी जान गँवा दी है जिसमें 3 औरतें और 5 आदमी शामिल हैं। इस दौरान 35 अन्य मरीज़ जिनका इलाज जारी था उन्हें दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। 

अहमदाबाद के नवरंग इलाके में स्थित श्रेय अस्पताल में बीती रात भीषण आग लगी। अस्पताल के आईसीयू वार्ड में लगी आग इतनी भीषण थी कि दो शवों की पहचान तक मुश्किल से हुई। एक और मरीज़ की हालत नाज़ुक बनी हुई है। राज्य के स्वास्थ्य सचिव डॉ. जयंती रवि ने इस मामले में जाँच के आदेश दिए हैं। 

अहमदाबाद शहर के मंडलायुक्त एलबी जाला ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए इस घटना की जानकारी दी। उन्होंने बताया रात के लगभग 3:30 बजे अस्पताल के आईसीयू वार्ड में आग लगी थी। हालाँकि, फिलहाल इस आग पर फिलहाल काबू किया जा चुका है। इस आग की वजह से अब तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है।     

जानकारी के मुताबिक़ इस अस्पताल में कोरोना वायरस से प्रभावित लगभग 50 लोगों का इलाज चल रहा था। अस्पताल प्रशासन पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने आग लगने के काफी समय बाद दमकल विभाग को सूचित करने में देरी की। क्योंकि अस्पताल में कोरोना प्रभावित मरीज़ मौजूद थे इसलिए उन्हें निकालने में भी बहुत समय खर्च हुआ। लोगों का कहना है कि अस्पताल प्रशासन थोड़ी सक्रियता दिखाता तो दुर्घटना इतने बड़े पैमाने पर नहीं होती। 

दुर्घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुःख जताया है। इसके अलावा उन्होंने ट्वीट में यह भी बताया कि वह दुर्घटना के बारे में मुख्यमंत्री विजय रुपानी और मेयर से बात कर चुके हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने दुर्घटना में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए 2 लाख रूपए के मुआवज़े का ऐलान किया है। घायल होने वाले लोगों के लिए 50 हज़ार रूपए का ऐलान किया है। यह राशि प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड (PMNRF) से दी जाएगी।

वहीं दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने श्रेय अस्पताल में लगी आग की जाँच के आदेश दे दिए हैं। राज्य के गृह विभाग की अतिरिक्त सचिव संगीता सिंह इस जाँच की अगुवाई करेंगी। साथ ही मुख्यमंत्री ने 3 दिन के भीतर इस दुर्घटना की जाँच रिपोर्ट माँगी है। दुर्घटना में अब तक 8 लोगों की जान जा चुकी है। मरने वालों में 5 आदमी और 3 महिलाएँ शामिल हैं। साथ ही घायल होने वाले लगभग 35 अन्य लोगों को नज़दीक के एसवीपी अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका है।