अयोध्या कांड: रथी आडवाणी, सारथी मोदी… और राम मंदिर की वह लहर जिसने खोद दी ‘सेक्युलरों’ की कब्र

आडवाणी की वो रथ यात्रा भले मंजिल तक नहीं पहुँच पाई, लेकिन, इसने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पैंतरेबाजी को बेनकाब कर दिया। मुलायम से लेकर वीपी सिंह, और लालू यादव सब के सब...

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है,

रथ भावे आमी देव, पथ भावे आमी, मूर्ति भावे आमी, देव हॅंसे अंतरयामी।

यानी, रथ, रास्ता और मूर्ति तीनों सोचते हैं कि वही देवता हैं और उनके ही दर्शन को लोग आ रहे हैं। तीनों के अज्ञान को देख भगवान खुद हँसते रहते हैं।

कुछ ऐसी ही थी 29 साल पहले 1990 में निकली वह रथ यात्रा। 25 सितंबर को सोमनाथ से उसकी शुरुआत हुई। 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुॅंच यात्रा खत्म होनी थी। लेकिन, धर्मनिरपेक्षता की राजनीतिक पैंतरेबाजी ने बीच रास्ते में ही उसके पहिए रोक दिए। पर धर्मनिरपेक्षता के कथित झंडाबरदार उस राम लहर को नहीं रोक पाए जो इस रथ ने पूरे देश में पैदा किया। राम मंदिर की ऐसी लौ जगाई कि रथ जिस रास्ते से गुजरता वहाँ की मिट्टी लोग सिर पर लगा लेते।

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इस रथ यात्रा के रथी थे आज की भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी। सारथी थे, वही नरेंद्र मोदी जो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। उस समय वे गुजरात भाजपा के संगठन महामंत्री हुआ करते थे। असल में, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का अवतरण इसी रथ यात्रा के जरिए हुआ था। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में मोदी को इस यात्रा का रणनीतिकार और शिल्पी बताया है। यात्रा के मार्ग और कार्यक्रम को लेकर औपचारिक तौर पर सबसे पहले जानकारी भी मोदी ने ही 13 सितंबर 1990 को दी थी। कहा जाता है कि इस यात्रा की हर सूचना जिस एक शख्स के पास होती थी वे मोदी ही थे। कुछ जानकारियाँ तो आडवाणी को भी बाद में मिलती थी। ‘नरेंद्र मोदी: एक शख्सियत, एक दौर’ में नीलांजन मुखोपाध्याय ने मोदी के हवाले से लिखा है, “इस अनुभव से मुझे मेरी प्रबंधन क्षमता को विकसित करने का अवसर मिला”।

जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में भाजपा का अधिवेशन हुआ था और राम मंदिर पहली बार पार्टी के एजेंडे में आया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव पारित कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया गया। इस दिशा में सोमनाथ से अयोध्या तक की आडवाणी की राम रथ यात्रा पहली बड़ी पहल थी। यात्रा की रणनीति तैयार करने में हर छोटी चीज का ध्यान रखा गया। शुरुआत के लिए उस सोमनाथ को चुना गया, जहाँ के पवित्र शिव मंदिर को मुस्लिम आक्रांताओं ने बार-बार तोड़ा था। शुरुआत 25 सितंबर को हुई, जो एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय का जन्मदिन है।

यह रथ यात्रा बताती है कि सेक्यूलर जमात पर किस कदर मुसलमानों का मसीहा बनने का भूत सवार था। ‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक 19 अक्टूबर 1990 को इंडियन एक्सप्रेस के सुंदरनगर गेस्ट हाउस में एक बैठक हुई। बैठक में शामिल होने के लिए आडवाणी रथ यात्रा धनबाद में छोड़कर आए थे। बैठक प्रधानमंत्री वीपी सिंह की पहल पर हुई थी। आडवाणी ने कहा कि वे सरकार गिराना नहीं चाहते। यदि सरकार अध्यादेश लाकर विवादित ढाँचे के आसपास की जमीन विहिप या उसके प्रतिनिधि को सौंपती है तो हम उसका समर्थन करेंगे। लेकिन, मुस्लिमों के दबाव में वीपी सिंह पहले इससे पीछे हट गए। उन्होंने कहा कि न सिर्फ विवादित ढाँचा, बल्कि उसके आसपास की जमीन भी सरकार के कब्जे में होनी चाहिए। फिर बैठकों का सिलसिला चला और 20 अक्टूबर की रात अध्यादेश लागू हुआ। इसके मुताबिक,

  • विवादित ढाँचे और उसके आसपास की जमीन का सरकार अधिग्रहण करेगी।
  • विवादित ढाँचे और उसके चारों तरफ 30 फीट जमीन छोड़कर अधिग्रहित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को सौंपी जाएगी।
  • वहाँ कभी मंदिर था या नहीं, इसे सुलझाने का काम संविधान की धारा 143(ए) के तहत सुप्रीम कोर्ट को सौंपा जाएगा।

ज्यादातर तबकों ने इसका स्वागत किया। बाबरी कमिटी इसके विरोध में थी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी। उन्होंने धमकी दी कि वे इस अध्यादेश को यूपी में लागू नहीं होने देंगे। अचानक 22 अक्टूबर को अध्यादेश वापस ले लिया गया और 23 अक्टूबर की सुबह बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी की रथ यात्रा रोक दी गई। उन्हें समस्तीपुर के सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर सरकारी जहाज से दुमका ले जाया गया। फिर सड़क रास्ते से मंसानझोर, जहाँ डाकबंगले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उन्हें कैद कर लिया गया।

कहा जाता है कि वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम अकेले मुसलमानों के मसीहा बने, इसलिए उनके निर्देश पर लालू यादव ने बिहार में ही आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। हेमंत शर्मा ने ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है- वीपी सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए। आडवाणी को गिरफ्तार करवा मुलायम को पटखनी दी। वीपी सिंह के अयोध्या भूमि अधिग्रहण आदेश का विरोध कर मुलायम सिंह यादव धर्मनिरपेक्षता के इकलौते झंडाबरदार बने थे। वीपी सिंह ने इसकी हवा निकालने की तरकीब ढूँढ़ी। पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना जाना था। मुलायम सिंह रथ रोकने वाले नेता बनते। वीपी सिंह को यह मंजूर नहीं था। अरुण नेहरू ने बताया कि प्रधानमंत्री ने लालू यादव को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पास ही न रहे।

आडवाणी की वो रथ यात्रा भले मंजिल तक नहीं पहुँच पाई, लेकिन, इसने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पैंतरेबाजी को बेनकाब कर दिया। इसी सनक में मुलायम ने 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाई और ‘मुल्ला मुलायम’ का खिताब हासिल किया। इसके तीन दिन बाद दो नवंबर को कोठारी बंधु को अयोध्या में छलनी कर दिया गया। यह सब केवल उस होड़ के कारण हुआ ​जो वीपी सिंह, मुलायम और लालू यादव के बीच मची थी। खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा खलीफा साबित करने की होड़।

राम मंदिर को राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और संकल्प का हिस्सा बता फूँकी गई उस रथ यात्रा के बिगुल को याद करने के लिए 8 नवंबर से बेहतर दिन नहीं हो सकता। आज आडवाणी 92 साल के हो गए हैं। जैसा हेमंत शर्मा ने अपनी किताब में लिखा है, ‘उनकी यात्रा ने राम मंदिर आंदोलन की दिशा ही बदल दी। इस यात्रा ने न केवल केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिरा दी, बल्कि यूपी में कॉन्ग्रेस की जड़ें हमेशा के लिए खोद दी।’ इस यात्रा ने बता दिया कि बहुसंख्यक हिंदुओं को गाली देकर, मुसलमानों का तुष्टिकरण कर सत्ता हथियाने के दिन लद गए हैं। इस यात्रा ने सत्ता में भाजपा को स्थापित करने के बीज बोए। आज उसकी जड़ें इतनी फैल गई हैं कि जो नेहरू कभी राम को बेदखल करने पर अमादा थे, आज उनकी ही राजनीति के वारिस मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा को मजबूर हैं। बाकायदा मुनादी की जाती है उनके जनेऊधारी हिन्दू होने की।

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"हिन्दू धर्मशास्त्र कौन पढ़ाएगा? उस धर्म का व्यक्ति जो बुतपरस्ती कहकर मूर्ति और मन्दिर के प्रति उपहासात्मक दृष्टि रखता हो और वो ये सिखाएगा कि पूजन का विधान क्या होगा? क्या जिस धर्म के हर गणना का आधार चन्द्रमा हो वो सूर्य सिद्धान्त पढ़ाएगा?"

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