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CBI करेगी सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच, केंद्र ने मंजूर की बिहार सरकार की माँग

केंद्र ने सुशांत सिंह राजपूत मौत मामले की सीबीआई जाँच शुरू करने के बिहार सरकार के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। अब बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच सीबीआई करेगी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश पर राजीव नगर थाना कांड संख्या 241/ 20 की सीबीआई जाँच की सिफारिश मंगलवार (अगस्त, 04, 2020) को केन्द्र सरकार को भेज दी गई थी। इससे पहले राज्य पुलिस मुख्यालय ने इसका प्रस्ताव तैयार किया। जल्द ही सीबीआई इस मामले में नई एफआईआर दर्ज कर पड़ताल शुरू कर सकती है।

गौरतलब है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में हर दिन नए खुलासे सामने आए हैं। इसमें उनकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के साथ उनके संबंधों से लेकर उनके मानसिक स्वास्थ्य, बैंक अकाउंट से लेकर उनकी मैनेजर रही दिशा सालियान की मौत से जुड़े कई सवाल सामने आए हैं।

सुशांत सिंह की कथित आत्महत्या को लेकर उनके पिता कृष्ण किशोर सिंह ने पटना के राजीवनगर थाने में FIR दर्ज कराई है। 25 जुलाई को यह प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। इसमें आईपीसी की धारा 341, 342, 380, 406, 306, 420, 506 और 120 (बी) की धाराओं के अंतर्गत मामले दर्ज किए गए हैं।

FIR में सुशांत की गर्लफ्रेंड एवं अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती, उसके माता-पिता और भाई समेत 6 लोगों को नामजद किया गया है। इसी केस की जाँच सीबीआई से कराने की अनुशंसा की गई थी।

इस मामले में जाँच को लेकर इसको लेकर महाराष्ट्र राज्य सरकार और बिहार पुलिस में खासी नाराजगी देखी गई। इस टकराव के बाद सुशांत सिंह के परिजनों ने मामले की जाँच सीबीआई से कराने की माँग की थी।

12:34 मिनट का दुर्लभ वीडियो: कारसेवकों पर बरस रही थीं गोलियाँ और जय श्रीराम के नारों से गूँज रहा था आसमान

बाबरी मस्जिद को दिसंबर 1992 में ध्वस्त कर दिया गया था। उससे 2 साल पहले नवंबर 1990 में मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उस महीने जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण की माँग लिए रामभक्त जुटे थे, तब मुलायम सिंह यादव ने उन पर गोलियाँ चलवाई थीं। यही वो घटना थी, जब कारसेवकों पर गोली चलवा कर सपा के संस्थापक ने “मुल्ला मुलायम’ की ‘उपाधि’ पाई थी। आधिकारिक आँकड़े कहते हैं कि इसमें 16 कारसेवकों की मौत हुई थी।

लेकिन, कहा जाता है कि असली आँकड़े इससे कहीं ज्यादा है। ‘रिपब्लिक टीवी’ के एक स्टिंग में पता चला था कि मृत श्रद्धालुओं को न सिर्फ मार डाला गया था बल्कि हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार तक नहीं होने दिया गया था। उन्हें दफना दिया गया था। नीचे हम वो वीडियो संलग्न कर रहे हैं, जिसमें आप कारसेवकों के साथ हुई क्रूरता को देख सकते हैं। इस वीडियो में यूपी पुलिस द्वारा कारसेवकों पर किए गए अत्याचार का एक नमूना दिख रहा है:

(चेतावनी: ये वीडियो डिस्टर्ब करने वाला है)

मुलायम ने कारसेवकों पर चलाई थी गोलियाँ

इस वीडियो में पुलिस को कारसेवकों पर हमला करते हुए और गोली चलाते हुए देखा जा सकता है। जिस तरह से पुलिस गोली चला रही है, उससे स्पष्ट है कि वो रामभक्तों की हत्या के इरादे से और उन्हें गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए निशाना लगा रही है। इस वीडियो में मुलायम सिंह यादव की पुलिस ‘जय श्री राम’ बोलती भीड़ को खदेड़ कर गोली चलाते हुए दिख रही है। ये दुर्लभ वीडियो है।

इस वीडियो में कारसेवकों के मृत शरीर को सड़कों पर पड़े हुए देखा जा सकता है। सड़कों पर खून के धब्बे पड़े हुए हैं और माहौल काफ़ी भयावह दिख रहा है। हालाँकि, वीडियो की क्वालिटी ठीक नहीं है लेकिन तब भी इसमें नवंबर 1990 की उस क्रूरता को स्पष्ट देखा जा सकता है। एक साधु इस वीडियो में ये कहता दिख रहा है कि यूपी पुलिस की फायरिंग में अब तक 100 से भी अधिक लोग मर चुके हैं।

इस वीडियो में लोग कहते दिख रहे हैं कि पुलिस ने कारसेवकों के घरों में घुस-घुस कर उन्हें पकड़ा और उनके साथ क्रूरता की। श्रद्धालु बिलख-बिलख कर रो रहे थे और असहाय नजर आ रहे थे। एक रोते हुए श्रद्धालु को तो ये भी कहते देखा जा सकता है कि चाहे उनके साथ कितना भी अत्याचार हो, वो अयोध्या में भव्य राम मंदिर बना कर ही रहेगा। यही कारण था कि कल्याण सिंह ने दिसम्बर 1992 में कारसेवकों पर गोलियाँ नहीं चलने दी।

बाद में कल्याण सिंह ने कहा था कि अयोध्या करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्रबिंदु है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होता है तो इससे करोड़ों भारतीयों की इच्छा पूरी होगी। उन्होंने कहा कि वो राम मंदिर निर्माण का समर्थन करते हैं। तब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था। उन्होंने कहा था, “हम लोग कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं। फैसला आने के बाद केंद्र सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।’

अपने CM पिता से जाकर ये 7 सवाल पूछो: सुशांत की मौत के मामले में कंगना ने आदित्य ठाकरे की लगाई क्लास

सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या के मामले में बिहार पुलिस द्वारा सीबीआई जाँच की सिफारिश के बाद अभिनेत्री कंगना रनौत ने सवाल पूछे हैं। अब सीबीआई जाँच का आदेश भी दे दिया गया है। सुशांत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में उपजे विवादों के बाद आदित्य ठाकरे ने खुद को पाक-साफ बताया है। कंगना रनौत ने उनके बयान पर प्रक्रिया देते हुए 7 सवालों की झड़ी लगा दी।

उन्होंने कहा कि किस तरह की गंदी राजनीति कर के उद्धव ठाकरे ने सीएम पद पाया था, ये किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने आदित्य से कहा कि वो अपने पिता से ये 7 सवाल पूछें। नीचे हम कंगना के सातों सवालों को आपके समक्ष पेश कर रहे हैं, जो उन्होंने आदित्य ठाकरे से अपने पिता से पूछने को कहा था:

  1. सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड रही रिया चक्रवर्ती फ़िलहाल कहाँ हैं?
  2. सुशांत सिंह राजपूत की अप्राकृतिक मौत के मामले की एफआईआर मुंबई पुलिस ने क्यों नहीं दर्ज की?
  3. जब फ़रवरी 2020 में सुशांत सिंह राजपूत की जान को खतरे के बारे में मुंबई पुलिस को आगाह किया गया था, बावजूद उसके उनकी लाश मिलने के बाद पहले ही दिन मुंबई पुलिस ने इसे आत्महत्या क्यों कह दिया?
  4. उनकी हत्या से पहले उन्होंने किस-किस से बात की थी, इसका पता लगाने के लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मदद से उनके फोन के पिछले एक सप्ताह के कॉल एवं मैसेज का डेटा क्यों नहीं चेक करवाया गया?
  5. पटना के आईपीएस अधिकारी विनय तिवारी को क्वारंटाइन कर के क्यों रखा गया है?
  6. आखिर महाराष्ट्र सरकार सीबीआई जाँच से डर क्यों रही है?
  7. आखिर सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया और उसके परिवार वालों ने उनके सारे रुपए क्यों लूट लिए?

कंगना रनौत ने स्पष्ट किया कि इन सवालों का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं है। बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में केंद्र सरकार ने सीबीआई जाँच का आदेश दिया है, जिसके बाद अब इस मामले में न्याय मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। आदित्य ठाकरे ने खुद के ऊपर लग रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि वो बालासाहब के पोते हैं और ऐसा कोई गलत कार्य नहीं कर सकते।

गोधरा पीड़ितों ने राम मंदिर के भूमि पूजन को बताया बलिदान का फल, कहा- सपना पूरा होता दिख रहा है

आज राम मंदिर के भूमि पूजन के शुभ अवसर पर पूरा अयोध्या रौशनी से जगमगा रहा है। ऐसे में उन लोगों को नहीं भुलाया जा सकता जिनके त्याग और श्रद्धा के कारण आज रामलला टेंट से निकलकर अपने भव्य मंदिर में प्रस्थान के लिए तैयार हैं।

18 साल पहले कारसेवा करके लौट रहे 59 कारसेवकों को गोधरा कांड में जिंदा जलाया गया था। तब से उनके परिवार वाले अपने बलिदान के बदले श्रीराम का भव्य मंदिर देखने के अभिलाषी थे। आज उनका वह सपना पूरा होने जा रहा है।

भगवती बेन ठाकौर राधाबेन की बेटी हैं। वही राधाबेन जिन्होंने 18 साल से अपने घर में एक दीपक जलाया हुआ है और आज भूमि पूजन के साथ ही वह उसकी लौ को तेज करने के लिए दोबारा तेल डालेंगी।

इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार भगवती बताती है, “18 साल पहले, वह लोग मेरे भाई का शव घर पर लेकर आए थे, तभी 28 फरवरी 2002 से मेरी माँ ने दीपक जला रखा है।”

बता दें, राधाबेन ने गोधरा कांड में अपने बेटे राकेश वघेला को खो दिया था। उसके बाद जैसे परिवार तबाह हो गया। 80 वर्षीय सरदारजी वघेला (राकेश के पिता) पैरालाइज्ड हो गए और अब वह बिस्तर से उठ भी नहीं सकते। उनकी माँ को भी इधर से उधर चलने में दिक्कत होती है। उनके पास आजीविका का कोई स्त्रोत नहीं है।

राकेश की पत्नी को सरकार से मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपए मिले भी थे। मगर उसने उस राशि का थोड़ा हिस्सा ससुराल के साथ शेयर नहीं किया। राकेश के भाई आज एक सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्य करते हैं और घर पर आते-जाते रहते हैं।

परिवार के मुखिया का कहना है कि जब भूमि पूजन होगा, तब वह प्रार्थना कर रहे होंगे। उनके बलिदान का आखिरकार उन्हें फल मिल जाएगा। लेकिन ये सच है कि वह अपना सब खो चुके हैं।

राकेश की शादीशुदा बहन भगवती कहती हैं, “मेरे भाई की मृत्यु के बाद किसी ने हमारे बारे में नहीं पूछा। कोई हमसे मिलने नहीं आया। हम कभी पैसे वाले नहीं थे मेरी भाई की पत्नी को मुआवजा भी मिला था।” वह कहती हैं कि राम मंदिर के भूमि पूजन अवसर पर उनकी प्रार्थना यही है कि वह लोग कठिन परिश्रम वाले जीवन से मुक्त हो जाएँ।

इसी प्रकार जेसल सोनी जिन्होंने अपने बहनोई को गोधरा में खोया था। वह भूमि पूजन पर आमंत्रण न पाकर नाराज दिखते हैं और कहते है हाईकोर्ट ने 4 साल पहले 5 लाख रुपए मुआवजा देने के निर्देश दिए थे। लेकिन उन्हें वो पैसा नहीं मिला।

दुर्गा वाहिनी की सदस्य माला रवाल कहती है कि ये वो समय नहीं है जब नकारात्मक कुछ भी कहा जाए। लेकिन ये सच है कि कई ऐसे परिवार हैं जिन्होंने इस संघर्ष में अपने परिवार को खोया।

आज इस अवसर पर गोधरा कांड में घायल होने वाले लोग भी भावुक हैं। मौत के मुँह से निकले कारसेवकों को एक ओर जहाँ अपना सपना पूरा होता सामने दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर वह वो मंजर भी नहीं भुला पा रहे जिसे उन्होंने खुद महसूस किया और अपनों को अपनी आँखों के आगे खो दिया।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जयंतीभाई पटेल की 56 वर्षीय माता चंपाबेन उस नरसंहार का शिकार होने वाले लोगों में से एक नाम हैं जो उस दिन उस ट्रेन में अपनी एक महिला रिश्तेदार के साथ थी।

वही, महिला रिश्तेदार आज 62 वर्षीय है और अपनी पहचान नहीं बताना चाहतीं। लेकिन उस भयावह मंजर के अनुभवों को साझा करते हुए कहती हैं कि जब आग की लपटें उस दिन उनके कोच तक पहुँची तो उन्होंने अपनी ननद को पकड़ा हुआ था। लेकिन पता नहीं कैसे उन दोनों की पकड़ ढीली पड़ गई और वह तो किसी तरह खिड़की से बच निकली मगर चंपाबेन नहीं बच पाईं।

जयंतीभाई की आंटी और चंपाबेन की वह रिश्तेदार कहती हैं, “पिछली बातों को लेकर किसी के मन में नफरत नहीं। हमारा मानना है कि यह भगवान के लिए किया गया एक बलिदान था। मैं मंदिर निर्माण से बहुत खुश हूँ। अगर आज यह महामारी न होती तो यह खुशी दोगुनी हो जाती।”

बता दें चंपाबेन के 58 वर्षीय बेटे जयंतीभाई एक किसान हैं। उन्हें इस बात कोई गम नहीं है कि वह आज अयोध्या में नहीं मौजूद हैं। वह कहते हैं कि अगर कोरोना नहीं भी फैला होता तो इतने लोगों को एक जगह कर पाना बहुत मुश्किल होता।

वहीं, गुजरात के वादनगर के नवीनचंद्र ब्रह्मदत्त जिनकी पत्नी भी आगजनी में मारी गई थीं वह कहते हैं कि एक बार कोरोना वायरस जैसे ही खत्म होगा वह अपने दोनों बच्चों को लेकर एक दिन अयोध्या लेकर जाएँगे और रामलला के दर्शन करवाँएगे।

ऑरिजनल संविधान के पेज पर भगवान राम-सीता का चित्र: केन्द्रीय कानून मंत्री के ट्वीट पर ‘सेक्युलर’ लोगों में दहशत

अयोध्या में आज भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण का भूमिपूजन होने जा रहा है, जिसे लेकर पूरा देश उत्साहित है। इसी अवसर पर केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक ट्वीट में भारतीय संविधान के कुछ मूल पन्नों की याद दिलाई है, जिनमें भगवान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की तस्वीरें अंकित हैं।

केन्द्रीय संचार और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान के मूल पन्नों की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है – “भारत के संविधान के मूल दस्तावेज में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण का एक सुंदर चित्र है, जो रावण को हराकर अयोध्या लौट रहे हैं। यह मौलिक अधिकारों से संबंधित अध्याय की शुरुआत में उपलब्ध है। आप सभी के साथ इसे शेयर करने का मन हुआ। #जय श्री राम।”

लेकिन, ऐसे भी लोग हैं जिन्हें शायद इस बात का ज्ञान नहीं है कि भगवानों की यह चित्र भारतीय संविधान की मूल प्रति का हिस्सा थे, या फिर वो लोग केन्द्रीय मंत्री के इस ट्वीट के पीछे कोई सन्देश तलाशने का प्रयास कर नाराज हो गए!

उन्होंने केन्द्रीय मंत्री के इस ट्वीट पर आपत्ति जताते हुए लिखा है कि देश के कानून मंत्री संविधान में भगवानों को ठूँसना चाह रहे हैं, जबकि इसका उद्देश्य धर्म और कानून के बीच दायरा तय करना था। इस ट्विटर यूजर ने कटाक्ष करते हुए लिखा है – ‘वाह!’

गौरतलब है कि जब संविधान तैयार हुआ तो उसमें ऊपर और नीचे के हिस्सों में बहुत जगह खाली छूट गई थी। ऐसे में इस खाली जगह पर भारत की 5000 साल पुरानी संस्कृति को प्रदर्शित करने पर विचार किया गया।

तब खुद जवाहरलाल नेहरू ने ही इस काम के लिए नंदलाल बोस को सत्यनिकेतन जाकर आमंत्रित किया था। बाद में समिति से जुड़े सभी लोगों ने इन चित्रों को संविधान के रिक्त स्थान पर शामिल करने पर सहमति देते हुए उस पर हस्ताक्षर किए। संविधान की मूल कॉपी यदि देखें तो आज भी वहाँ श्री राम भगवान और श्रीकृष्ण की तस्वीर चित्रित है। आखिरी पृष्ठ पर समिति के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस मौके पर ट्वीट किया और मंदिर निर्माण शुरू होने पर खुशी जताई। योगी आदित्यनाथ ने अपने ट्वीट में लिखा, “जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥ रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।। प्रिय राम भक्तों, आपका अभिनंदन, आपको बधाई जय श्री राम!”

भूमि पूजन पर अमेरिका में भारतीयों ने लहरा दिया भगवा: निकाली झाँकी, जलाएँगे दीप

5 अगस्त के इस ऐतिहासिक दिन की गूँज आज अमेरिका तक में है। भले ही मुस्लिम समूहों के विरोध के बाद एक कंपनी ने श्रीराम की तस्वीर टाइम्स स्क्वायर इमारत पर प्रदर्शित करने से मना कर दी हो, लेकिन वहाँ रह रहे भारतीय हिंदुओं ने इस दिन को तब भी महोत्सव में तब्दील कर दिया है।

एएनआई समाचार एजेंसी के अनुसार अमेरिका में रहने वाले भारतीय, अयोध्या में ऐतिहासिक राम मंदिर के शिलान्यास समारोह का जश्न मनाने के लिए वॉशिंगटन डीसी के कैपिटल हिल पर भगवा झंडा हाथ में लेकर इकट्ठा हो गए हैं।

वहाँ कुछ देर में एक झाँकी ट्रक राम मंदिर की डिजिटल तस्वीरों को प्रदर्शित करते हुए कैपिटल हिल के चक्कर लगाएगा। इस बात की जानकारी स्वंय समुदाय नेताओं ने अपने बयान में दी है।

बयान में कहा गया, “विश्व भर के एक अरब हिंदुओं के लिए पवित्र स्थल पर ऐतिहासिक मंदिर निर्माण की शुरुआत के उपलक्ष्य में अयोध्या श्री राम मंदिर झाँकी ट्रक अमेरिकी कैपिटल हिल के चक्कर लगाएगा।”

इतना ही नहीं, आज के दिन अमेरिका में रहने वाले हिंदुओं ने भी वहाँ के मंदिरों में विशेष पूजा की व्यवस्थाएँ की हैं। वहाँ कई जगहों पर अयोध्या के भूमि पूजन को बड़ी स्क्रीन लगाकर अमेरिका में भी देखा जाएगा।

हिंदू मंदिर कार्यकारी सम्मेलन और हिंदू मंदिर पुजारी सम्मेलन ने इस समारोह का आनंद लेने के लिए पूरे अमेरिका में डिजिटल रूप से सामूहिक राष्ट्रीय प्रार्थना करने का भी आह्वान किया है। इसी तरह न्यूयॉर्क शहर में भी, हिंदू समुदाय के नेताओं ने ऐतिहासिक अवसर का जश्न मनाने का फैसला किया है।

बता दें कि यूएस में बड़ी संख्या में हिंदू रहते हैं, जिन्होंने अयोध्या में होने वाले पूजन को सेलिब्रेट करने के लिए तैयारियाँ की हैं। अयोध्या में भूमि पूजन के बाद वहाँ के लोग घरों में दीपक जलाएँगे।

काबुल की अँधेरी कब्र में बाबर और उजाले में आज की अयोध्या: राम हमारे DNA में और हमारी गर्भनाल अयोध्या में

लखनऊ में एक हार के बाद बाबर ने अपने गिरोह से मीर बाकी ताशकंदी को उसके लुटेरे हमलावरों की टुकड़ी के साथ अलग कर दिया था। ताशकंदी ने अपनी किसी गुमनाम कब्र से काबुल के पास दफन बाबर को ताजा खबरें दी होंगी। उसने नहीं तो दिल्ली के लाल मकबरे से हुमायूँ ने अपने अब्बू को दिल्ली, लखनऊ और अयोध्या की आज की रौनकदार अपडेट दी होगी।

भारत के ये शुभ समाचार सुनकर बेचैन बाबर अंधेरी कब्र में करवट बदल रहा होगा। क्या मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने का उसका सवाब आखिरत के दिन मुकम्मल नहीं माना जाएगा? क्या वह जन्नत जाने से रह जाएगा? उसने अवश्य ही अपनी औलादों पर दाँत पीसे होंगे, जो 330 साल के कब्जे में हिंदुस्तान का हिसाब बराबर नहीं कर पाईं थीं।

आगरा से लेकर खुलताबाद तक जाने कितनी बेनूर कब्रों में कितनी रूहें तड़प रही होंगी! इस दृश्य को आगे बढ़ाने के लिए मैं शीघ्र ही इतिहास की परतों में उतरने वाला हूँ। किंतु आज का शुभ मुहूर्त अयोध्या के स्मरण का है। 

1528 का साल हजारों वर्ष पुरानी अयोध्या पर भीषण वज्रपात का साल है। जैसे किसी प्रतिष्ठित ऋषि के आश्रम में कोई दुर्दांत आतंकी उनकी प्रतिष्ठा को पल भर में मिट्‌टी में मिला दे। उस साल अयोध्या में एक नया धर्म द्वार नहीं खटखटा रहा था।

आज्ञा लेकर आने की शिष्टता तो भूल ही जाइए। वह द्वार-दीवार तोड़कर घुसे और गर्दन दबोच ली। सुरमे लगी और लालच से उबलती लाल आँखों ने घर की हर मूल्यवान चीज पर अपनी डरावनी दृष्टि दौड़ाई। हजारों हाथ हथौड़े लिए टूट पड़े। बारूद की गंध हवाओं में घुल गई। मंदिर मटियामेट कर दिए गए और आश्रम उजाड़ दिए गए। गलियों में लूटपाट और मारकाट का शोर मच गया। अयोध्या का वैभव धूल में मिल गया। अयोध्या अनादिकाल से भारत की माँग में भरा हुआ चमकता सिंदूर थी, जो पोंछ दिया गया था।

इतिहास ने उस साल अयोध्या को पथराई आँखों वाली एक निरीह और निर्वस्त्र स्त्री की तरह सामने देखा था। आभूषणों से सज्जित सुगंधित देह पर खूनी खरोंचें थीं। केश धूल-धूसरित थे। मस्तिष्क सुन्न था। वह अवाक् थी। हजारों वर्षों की स्मृतियों में ऐसा पहली बार देखा और भाेगा था। राक्षस कुल के विभीषण को रूपांतरित और अजेय रावण को मारने वाले राम स्मृतियों में थे, लेकिन अयोध्या को लगा कि वे सारे राक्षस नाम और रूप बदलकर लौट आए हैं।

अयोध्या ने पहली बार अल्लाहो-अकबर का हो-हल्ला और माले-गनीमत की वीभत्स घोषणाएँ सुनीं! कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजाओं का बनवाया हुआ विष्णु हरि के मंदिर से धूल का गुबार वायुमंडल में बिखर गया। मलबे पर एक मस्जिद का ढाँचा उगाया गया ताकि धर्म भी हमारे हिसाब से चले! कैसा धर्म!

अयोध्या शून्य में ताक रही थी। चार सदियों तक लोग लड़े और मरे। अधूरी स्वतंत्रता के इन 70 सालों में सेक्युलर कीड़े-मकोड़े घावों पर मँडराते रहे। पीड़ित अयोध्या मूक दर्शक बन गई। क्या भाग्य लेकर आई थी अयोध्या! उसने राम का युग देखा, राजाओं के वैभवशाली कालखंड देखे। दासता में सब उजड़ते देखा और स्वतंत्रता पश्चात शातिर ठगों के सेक्युलर गिरोह भी। धर्म को उसने बीज से वृक्ष बनते हुए त्रेतायुग में देखा था और धर्म के नाम पर आतंक को जड़ें जमाते कलयुग में देखा। वह ढाँचा इन्हीं दुष्ट शक्तियों का प्रतीक बनकर खड़ा रहा था। 

अयोध्या गहरे मौन में थी। उसे अपने बच्चों पर पूरा विश्वास था। वे कभी चैन से नहीं बैठे थे। मैदान में भी लड़े थे। अदालतों में भी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि प्रसाद किसे मिला, महत्वपूर्ण यह है कि यज्ञ-अनुष्ठान संपन्न हुआ। सफल हुआ। सबने अपनी आहुतियाँ अर्पित कीं। किसी ने शीश कटाए। किसी ने नारे लगाए। कोई ईंट ले आया। कोई जल ले आया। आज का दिन सबके हिस्से का परम प्रसाद है!

अयोध्या संकल्प शक्ति की प्रतीक है। यह दिन 492 साल लंबी प्रतीक्षा के बाद आया है, जब अयोध्या की गलियों में बारूद की गंध नहीं है। जन्मभूमि मंदिर में हथौड़ों की ठक-ठक और धूल नहीं है। अयोध्या की आँखों की नमी सरयू में बह रही है। बच्चे रँग-रोगन कर रहे हैं। नदी-सरोवरों के जल से अभिषेक कर रहे हैं। श्रृंगार कर रहे हैं। सुगंध से भर रहे हैं। संसार भर से उपहार आए हैं। अयोध्या के मुख पर मुस्कान लौट रही है।

राम ने 14 वर्ष लंबे वनवास में तरह-तरह के नाम वाले राक्षसों का बोझ धरती से कम किया था। वे लंका से लौटे थे तब ऐसी ही रंग और रोशनी आ गई थी। आज फिर स्वर्णिम अतीत इतिहास की अंधेरी सुरंगों से बाहर झाँक रहा है। दीपावली आते ही दीवारों पर टँगे मकड़ियों के जाले झाड़ दिए जाते हैं। साल भर की धूल और काई साफ हो जाती है। जीवन श्वांस लेने लगता है। अयोध्या भी भारत के जीवन में एक गहरी और नई श्वाँस भर देगी।

अयोध्या का श्रृंगार किसे प्रसन्न नहीं करेगा? जो प्रसन्न न हो वह भारतीय नहीं। अयोध्या केवल उन सौभाग्यशाली हिंदुओं की ही नहीं है, जो दस सदियों की दासता के क्रूर दमन में अपनी हिंदू पहचान बचाकर निकल आने में सफल हुए। अयोध्या उन हिंदुओं की भी है, जिनकी पहचानें गुलामी की भगदड़ में गुम हो गईं! जिन्होंने किसी सदी में खुद को नए नाम और नई शक्ल में देखा! वह सच नहीं है। वह पहचान भी गुलामी का प्रमाण है। चलते-फिरते ढाँचे जिन्हें स्वयं ही ढहाना है और लौटना है अपनी अयोध्या में। अयोध्या यही याद दिला रही है।

भले ही पहचान बदली हुई हो किंतु यह किसी के लिए भी रूठने या क्रोध करने की घड़ी नहीं है। अपने पूर्वजों का स्मरण करने का इससे अच्छा शुभ मुहूर्त दूसरा नहीं आएगा। घर के एकांत कोने में सोचें कि इतिहास के किस अपमानजनक मोड़ पर नाम, धर्म और पहचान बदल गई थीं? राम का रास्ता छोड़कर जाने की क्या विवशता रही होगी, कैसे लालच घेरे होंगे, किसने तलवार अड़ा दी थी? यह मुँह लटकाने और मन मसोसने का दिन नहीं है।

यह मन के सब मैल धोकर बाहर निकालने का दिन है। अयोध्या उन्हें और उनके पुरखों को भी कभी भूल नहीं सकती, जो अयोध्या को भुलाए अब तक ढाँचे में लटके हैं। वह ढाँचा इतिहास में खो गया है, जैसे एक दिन उनकी मूल पहचानें खो गई थीं। यह रूठने का नहीं, याददाश्त पर जोर मारने का समय है। यह प्रायश्चित्त का अवसर है।

हम सब राम के वंशज हैं! हमारे महान पुरखे ही राम की कथा में कोई न कोई पात्र रहे हैं। नदी पार कराने वाले, समुद्र पार तक ले जाने वाले हजारों पात्र। अनगिनत राजवंशों के समय अयोध्या की चमक को बढ़ाने वाले पात्र, जिनके हाथ अनगिनत राम मंदिरों को बनाने में लगे थे। अयोध्या के हर घर में मंदिर हैं। उजाला अयोध्या में न होता तो कहाँ होता? राम की आहट है।

अयोध्या के दीप्त मुख पर हँसी लौट रही है। कलाइयों में कँगन खनक रहे हैं। नेत्र प्रकाश से भर गए हैं। माँग अब सूनी नहीं है। कंठ से स्वर फूट रहे हैं। पवित्र नदियों के जल से धुले केश मोगरे से महक रहे हैं। सारी दुनिया में लोग टकटकी लगाए हैं। दिवाली के पहले सबसे बड़ी दिवाली का दिन है।

वाल्मीकि और तुलसी किसी लोक में आनंदित होंगे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला राम की शक्तिपूजा झूमकर गा रहे होंगे। रामचंद्र दास परमहँस की आँखें झर रही होंगी। अमृतलाल नागर मानस के हँस में ही मगन होंगे। रामानंद सागर करबद्ध प्रणाम की मुद्रा में मौन होंगे। अरुण गोविल अपने बच्चों को तीस साल पुराने किस्से सुना रहे होंगे। लालकृष्ण आडवाणी को राम रथयात्रा के ऊर्जा से भरे दिन याद आ रहे होंगे। राम हमारे डीएनए में हैं और हमारी गर्भनाल अयोध्या में…

यह लेख विजय मनोहर तिवारी द्वारा लिखा गया है

भगवान राम के स्वागत में सजी-सँवरी अयोध्या नगरी: इन 15 तस्वीरों में देखिए साकेत की सुंदरता

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की औपचारिक शुरुआत आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भूमिपूजन के साथ ही हो जाएगी। इसके लिए पूरी अयोध्या नगरी को सजाया गया है। जलाशयों से लेकर सड़कों तक को सजाया गया है। पूरा शहर जगमग हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ख़ुद सारी तैयारियों पर नज़र रखी थी। नीचे इन तस्वीरों में आप जगमग अयोध्या नगरी को देख सकते हैं, जो भगवान राम के मंदिर के स्वागत के लिए तैयार है:

श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने इन तस्वीरों को शेयर करते हुए तुलसीदास के रामचरितमानस की पंक्ति ‘रामराज्य बैठे त्रैलोका। हरषित भये गए सब सोका॥‘ की चर्चा करते हुए लिखा कि श्री रामजन्मभूमि मन्दिर निर्माण कार्य के शुभारंभ की पूर्व संध्या पर अयोध्या नगरी सज-धज कर वैसे ही तैयार है, जैसे त्रेता में वनवास पश्चात भगवान के शुभागमन पर हुई थी। अयोध्या नगरी दीपोत्सव की अद्भुत छटा से दैदीप्यमान है।

अयोध्या में होने वाले राम मंदिर भूमि पूजन की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी हैं। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में अहम है। ख़बरों के मुताबिक़ ट्रस्ट लोगों से दान और आर्थिक सहयोग भी लेने वाला है। चाहे वह राशि के तौर पर हो या किसी वस्तु का दान हो। इसके लिए कोई नियम नहीं होगा, श्रद्धालु अपनी-अपनी श्रद्धा से दान कर सकेंगे। 

‘राम मंदिर- घृणा, कट्टरता और हिंसा का स्मारक’ – भूमि पूजन से पहले मीडिया गिरोह में सूजन

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के पहले होने जा रहे भूमि पूजन से एक ओर जहाँ देश की अधिकांश जनता में खुशी की लहर है तो वहीं दूसरी ओर मीडिया गिरोह के लोगों व कट्टरपंथियों में शोक पसरा हुआ है। नतीजतन 5 अगस्त के शुभ अवसर पर ये सभी जहर उगलने में व्यस्त है।

ऑल इंडिया मुस्लिम बोर्ड तो अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके धमकियाने अंदाज में बोल ही चुका है कि बाबरी मस्जिद थी और हमेशा मस्जिद ही रहेगी। हागिया सोफिया इसका एक बड़ा उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टिकरण निर्णय द्वारा जमीन पर पुनर्निमाण इसे बदल नहीं सकता है। दुखी होने की जरूरत नहीं है। कोई स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती है।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर 10 हजार फॉलोवर्स के साथ अच्छी पकड़ रखने वाला हाशिम इसी प्रकार अमित शाह के ट्वीट पर राम मंदिर की तस्वीर देखकर रिप्लाई करता है, “तड़ीपार फिक्र मत कर। बाबरी मस्जिद की जगह सत्ता के बल पर चाहे राम का मंदिर बना लो। लेकिन इंशाअल्लाह हम फिर बाबरी मस्जिद वहीं बनाएँगे।”

वहीं मीडिया गिरोह की सक्रिय सदस्य और इस्लामी पत्रकारिता करने वाली राणा अय्यूब इस भूमि पूजन के भव्य कार्यक्रम से आहत होकर #5अगस्त के लिए लिखती हैं कि ये वह भारत नहीं है, जिसे वो जानती है। वह हालिया ट्वीट में वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने लेख को शेयर करते हुए लिखती है कि 5 अगस्त- भारत की विभिन्न संस्कृतियों के उन्मूलन का एक और दिन है, यह भारत के खून और मिट्टी का एक और दिन है।

इसी तरह आरफा खान्नुम शेरवानी लिखती हैं, “ये क्या वही देश है, जिसके लिए मेरे पूर्वजों ने लड़ाई लड़ी। मैं अब अपने देश को नहीं पहचान पा रही।”

ऑद्रे ट्रुश्के तो राम मंदिर निर्माण को नफरत का स्मारक बताती हैं। वह लिखती हैं, “आज 5 अगस्त को अयोध्या राम मंदिर की आधारशिला डलेगी। यह घृणा, कट्टरता, हिंसा का स्मारक है, जो केवल हिंदू राष्ट्र का उपयुक्त आधार है।”

पूर्व सांसद व नई दुनिया के मैनेजिंग एडिटर लिखते हैं कि यह शर्मनाक है कि कुछ तथाकथित वामपंथी लिबरल दोस्त राम मंदिर निर्माण के मौके पर हिंदुत्व की सवारी कर रहे हैं। यह लोग इस राक्षस के हाथों पीड़ित होंगे, जिसे इन्होंने पिछले कुछ दशकों में अपने अवसरवाद से बनाया है।

पत्रकार अभिषेक बक्शी आज के दिन अपनी प्रोफाइल पिक बदलकर उसे काली करते हुए कश्मीर से माफी माँगते हैं और भाजपा पर अपना गुस्सा दिखाते हैं। वह लिखते हैं, “सॉरी कश्मीर, धिक्कार है भाजपा सरकार पर।”

गौरतलब है कि आज भूमिपूजन के दिन से ठीक एक साल पहले जब मोदी सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर ऐतिहासिक फैसला लिया था उस समय भी इसी तरह का रोष कट्टरपंथियों में देखने को मिला था। दूसरी तरफ, लिबरल गैंंग ने भी इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जमकर प्रतिक्रिया दी थी। बरखा दत्त, सागरिका घोष, स्वाति चतुर्वेदी समेत कई गिरोह के लोगों ने तब भी सवाल उठाए थे और फैसले की आलोचना की थी।

‘जब कारसेवक बाबरी गिराकर निकले, तो अयोध्या दीपों से जगमगा रही थी, ऐसी दिवाली कभी नहीं देखी’

भगवान राम की जन्मभूमि पर सदियों से खड़ा कलंक का बाबरी ढाँचा सदा ही हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती देता रहा था। मैं 1984 में संघ का स्वयंसेवक बना। संयोग से उन्हीं दिनों श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति का नव आन्दोलन आरम्भ हुआ था।

1984 में ही रामलीला मैदान दिल्ली में श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन का एक कार्यक्रम इन्द्रप्रस्थ विश्व हिन्दू परिषद के तत्वाधान में आयोजित किया गया था। मैं स्वयंसेवक तो नया था, लेकिन एक प्रसिद्द चित्रकार के रूप में जाना जाता था। तब भी मंच सज्जा का कुछ कार्य मेरे जिम्मे लगा था।

ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में आमंत्रित अथितियों की सूची में तत्कालीन इंदिरा गाँधी के मंत्रीमंडल के सदस्य बसंत साठे जी का नाम भी था। मुझे अच्छी तरह से स्मरण है कि कार्यक्रम आरम्भ हुए आधा घंटा हो चुका था, मैं भी प्रबंधको में मंच के पीछे ही था।

संघ के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रचारक ब्रह्मदेव जी बेचैनी से टहल रहे थे। तभी उन्होंने एक साथ खड़े अधिकारी से कहा – “इंदिरा अम्मा ने मना कर दिया होगा, इसीलिए साठे जी नहीं आए।”

उस समय राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के सबसे बड़े चेहरे स्वर्गीय श्री बैकुंठ लाल शर्मा प्रेम ही थे। ये मेरा सौभाग्य रहा कि उनके साथ मिलकर संघर्ष के अनेक कार्यों में सहभागी होने का अवसर मिला।

मैंने इस आन्दोलन के प्रारम्भ से ही उसके हर अवसर पर पूरी शक्ति से भाग लिया था। पहले हम नारे लगाते थे – “आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो।”

इसके लिए खूब जलसे जुलूस निकाले गए। राजीव गाँधी की सरकार के समय जन्मभूमि का ताला खुल गया। फिर राम शिलाएँ एकत्र की जाने लगीं। उन्हें लेकर भी बहुत बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए। गली गली में राम मंदिर के नारे लगते थे।

सारा मीडिया और सेकुलर दरिन्दे पूरी ताकत से भगवान राम के मुकाबले बाबर को खड़ा करने का षड्यंत्र करते रहे। मैं 1988 में प्रचारक था। हाथों में माइक लेकर अनेक स्थानों पर नुक्कड़ सभाएँ होती थीं। हिन्दू समाज की जागृति के लिए भरसक प्रयास किए।

आडवाणी जी ने रथयात्रा के माध्यम से ढोंगी सेकुलरों को कड़ा उत्तर दिया था। 1990 में कारसेवा की घोषणा हुई। देशभर से लाखों लोग अयोध्या के लिए चले। मुलायम सिंह ने हर रामभक्त कारसेवक पर भयंकर अत्याचार किए।

जेल भर दिए गए, लेकिन फिर भी निश्चित तिथि तक हजारों रामभक्त अयोध्या में पहुँच चुके थे। मुलायम सिंह ने हजारों जिहादियों को पुलिस के वेश में नियुक्त कर दिया था। रामभजन करते भक्तों पर गोलियाँ चलवाई गईं। सैकड़ों को मार दिया गया। फिर भी अनेक रामभक्तों ने मुलायम सिंह के मुख पर कालिख पोतते हुए अपने प्राणों की परवाह नहीं की और बाबरी ढाँचे पर भगवा फहरा ही दिया।

माथे पर घाव लिए लहुलुहान अशोक सिंघल जी भी अयोध्या पहुँच गए थे। कालान्तर में सरकार बदली। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। दिसंबर 06, 1992 को मोक्षदा एकादशी का दिन कारसेवा के लिए चुना गया।

देशभर से लाखों लोग अयोध्या जाने के लिए तैयार थे। बहुत नियोजित रूप से जत्थे बनाकर, वाहिनियाँ बनाकर उनके प्रमुख तय कर कारसेवक भेजे गए। मैं भी 1 दिसंबर को अपने यहाँ की एक वाहिनी के साथ गया।

देश के हर कोने से कारसेवक पहुँचे थे। आतंकग्रस्त कश्मीर और पंजाब से भी योद्धा हिन्दू अपने शस्त्रों के साथ पहुँचे थे। अयोध्या में नित्य ही रात को अलग-अलग स्तर पर बैठकें होती थी।

5 दिसंबर की रात तक भी कारसेवा का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ। सभी बहुत दुखी थे। सोचते थे कि अगर कारसेवा नहीं हुई तो क्या मुख लेकर वापस जाएँगे। अधिकारियों ने घोषणा की कि सभी कारसेवक जत्थों में सरयू तक जाएँगे और सांकेतिक रूप से एक एक मुठ्ठी रेत कारसेवा के लिए लाएँगे।

ये सब बहुत अपमानजनक सा लग रहा था। 6 दिसंबर को सुबह ही हम ढाँचे के निकट पहुँच गए, सभी गलियाँ भरी पड़ी थीं। अनेक स्वयंसेवक दंड लिए ढाँचे के चारों और खड़े थे। कलंक के ढाँचे को देखकर सभी की आँखों में आँसू थे।

उसी समय लगभग साढ़े 9 बजे आडवाणी जी वहाँ पहुँचे। आगे-पीछे ढेर सारे ब्लैक कैट एनएसजी कमांडो दौड़ते चल रहे थे। हमने सरयू से रेत लाने के स्थान पर सभा स्थल पर साध्वी ऋतंभरा जी का भाषण सुनना चुना।

अभी आचार्य धर्मेन्द्र जी का भाषण समाप्त ही हुआ था कि कुछ शोर सा उठा। सब निगाहें ढाँचे की ओर उठीं थीं। देखा तो दो जने हाथों में ध्वज लिए ढाँचे के एक गुम्बद की ओर बढ़ रहे थे।

एक क्षण में मस्तिष्क में ढेरों विचार कौंध गए। सबसे पहले, 1990 में चली गोलियाँ याद आईं। फिर स्वयं के दिए बलिदान वाले भाषण याद आए। एक क्षण में मैंने निर्णय कर लिया। मेरे साथी इतनी देर में कुछ सोचते, मैं बहुत तेजी से भागा।

ढाँचे की परिधि में जाने का द्वार दूर था। आस-पास लगभग 15 फुट ऊँची कंटीली तारे लगी थीं। हम कई जने आनन-फानन में उन्हीं पर चढ़कर परिसर में कूद गए। अभी ढाँचे के निकट बहुत कम लोग पहुँचे थे। मैंने देखा, वहाँ स्थित सुरक्षाकर्मियों पर कई कारसेवक काबू करने का प्रयास कर रहे हैं।

मैंने सोचा पहले इन सुरक्षाकर्मियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद करूँ। तब तक और अनेक कारसेवक पहुँच गए। फिर तो जिसे जहाँ मौक़ा मिला, बाबरी ढाँचा ध्वस्त करना आरम्भ हो गया।

नीचे से भी तोड़ रहे थे… ऊपर से भी तोड़ रहे थे। ऊपर से छत गिरती तो नीचे और ऊपर वाले दोनों का मरना तय था। लेकिन रामभक्ति का ऐसा जूनून था कि अनेक लोग देखते ही देखते प्राण गँवाकर भी कारसेवा में जुटे रहे।

साध्वी ऋतंभरा लगातार ओजस्वी वाणी में भाषण दे रहीं थीं। मेरे लिए उस समय की मनोदशा का वर्णन करना कठिन है। शाम होते-होते तीनों ढाँचे ढह गए। अजीब उल्लास सा छा गया था।

तभी आकाश में हेलीकॉप्टर मंडराने लगे। साध्वी जी ने कहा – देखो बाबर के मरने पर ये चील कव्वे मंडरा रहे हैं। हजारों कारसेवक अयोध्या तक आने वाली सड़कों को अवरुद्ध करने में जुट गए, ताकि केंद्र से भेजे गए सुरक्षाबल ना पहुँच सकें।

फिर तुरंत सरयू तक कतारें लग गईं। हाथों-हाथ मलबा नदी तक पहुँचाया गया। हर कारसेवक को एक एक ईंट घर ले जाने के लिए सूचना मिली। शाम होते-होते चबूतरा बनना आरम्भ हो गया। राम लला विराज दिए गए। रात को जब सीढ़ियाँ बनाई जा रही थीं, मैंने भी उनमें थोड़ा योगदान दिया।

शाम ढलने के बाद जब अयोध्या की गलियों में निकले तो हर घर के बाहर दिए जले हुए थे। मानो वर्षों के बाद राम अयोध्या लौटे हों। ऐसी दिवाली कभी नहीं देखी थी। एक घर में टीवी पर सुना – नरसिंह राव इसे राष्ट्रीय शर्म बता रहे थे। शायद उसी दिन भाजपा सरकारों को हटाने की और संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा हो गई थी।

अब कारसेवकों को वापस भेजने की योजना बनने लगी। मेरे साथ जामिया के पास समुदाय बहुल क्षेत्र के सुरेश जी, और अनेक कारसेवक भी आए हुए थे। देशभर से कट्टरपंथियों के आक्रमण के समाचार आने आरम्भ हो गए थे।

हमने सबसे पहले ओखला वाले कारसेवकों को रात को ही रेल में चढ़ा दिया। पता चला कि रास्ते में अनेक स्थानों पर कट्टरपंथियों ने रेल पर पथराव किया। मैं 10 दिसंबर के बाद ही दिल्ली वापस आ पाया। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन यह एक अकाट्य सत्य है कि स्वतन्त्र भारत का इतिहास अब दिसंबर 06, 1992 से पहले और बाद के इतिहास के रूप में जाना जाएगा।

पहली बार हिन्दुओं ने विरोधियों के सीने पर लात रख कर जूतों की ठोकर से अपने अधिकार को प्राप्त करके दिखाया था। ये स्मृति सदैव बनी रहनी चाहिए। और अब, नवम्बर 09, शनिवार 2019 को उच्चतम न्यायालय के निर्णय के साथ श्री रामजन्मभूमि पर भगवान राम के भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ और श्रीराम जन्मभूमि संघर्ष के एक बहुत बड़े अध्याय का पटाक्षेप हुआ।

जिसने भी इस संघर्ष में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अपना योगदान दिया, बलिदान दिया, उन सभी के चरणों में एक रामभक्त सनातनी हिन्दू के नाते मैं नमन करता हूँ। अयोध्या में भव्य श्रीरामजन्म भूमि मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने वाले सभी लोगों के प्रति मैं ह्रदय के अंतरतम से आभार और अभिनन्दन प्रकट करता हूँ।

पिछले तीस वर्षों में मैंने एक चित्रकार के नाते भी राम मंदिर आन्दोलन के लिए हजारों ही डिजाइन बनाए। अनेकों शुभकामना पत्रों और काल-निर्णयों के भी डिजाइन बनाए। पिछले वर्ष, संवत 2075 के लिए वैदिक गणनाओं वाला एक बारह पेज का टेबल कालनिर्णय मैंने मनमोहन गुप्ता जी के सूर्य इम्प्रेशन के लिए तैयार किया था। अब जब भगवान के भव्य मंदिर का निर्माण होगा, तो उसमें मैं भी अपनी सेवाएँ प्रदान करके जीवन को धन्य बनाने का अवश्य प्रयास करूँगा।

यह लेख बलराज जी द्वारा लिखा गया है, जो कि आरएसएस में रहते हुए श्रीराम जन्मभूमि के संघर्ष के प्रत्यक्ष गवाह रह चुके हैं।