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काबुल की अँधेरी कब्र में बाबर और उजाले में आज की अयोध्या: राम हमारे DNA में और हमारी गर्भनाल अयोध्या में

लखनऊ में एक हार के बाद बाबर ने अपने गिरोह से मीर बाकी ताशकंदी को उसके लुटेरे हमलावरों की टुकड़ी के साथ अलग कर दिया था। ताशकंदी ने अपनी किसी गुमनाम कब्र से काबुल के पास दफन बाबर को ताजा खबरें दी होंगी। उसने नहीं तो दिल्ली के लाल मकबरे से हुमायूँ ने अपने अब्बू को दिल्ली, लखनऊ और अयोध्या की आज की रौनकदार अपडेट दी होगी।

भारत के ये शुभ समाचार सुनकर बेचैन बाबर अंधेरी कब्र में करवट बदल रहा होगा। क्या मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने का उसका सवाब आखिरत के दिन मुकम्मल नहीं माना जाएगा? क्या वह जन्नत जाने से रह जाएगा? उसने अवश्य ही अपनी औलादों पर दाँत पीसे होंगे, जो 330 साल के कब्जे में हिंदुस्तान का हिसाब बराबर नहीं कर पाईं थीं।

आगरा से लेकर खुलताबाद तक जाने कितनी बेनूर कब्रों में कितनी रूहें तड़प रही होंगी! इस दृश्य को आगे बढ़ाने के लिए मैं शीघ्र ही इतिहास की परतों में उतरने वाला हूँ। किंतु आज का शुभ मुहूर्त अयोध्या के स्मरण का है। 

1528 का साल हजारों वर्ष पुरानी अयोध्या पर भीषण वज्रपात का साल है। जैसे किसी प्रतिष्ठित ऋषि के आश्रम में कोई दुर्दांत आतंकी उनकी प्रतिष्ठा को पल भर में मिट्‌टी में मिला दे। उस साल अयोध्या में एक नया धर्म द्वार नहीं खटखटा रहा था।

आज्ञा लेकर आने की शिष्टता तो भूल ही जाइए। वह द्वार-दीवार तोड़कर घुसे और गर्दन दबोच ली। सुरमे लगी और लालच से उबलती लाल आँखों ने घर की हर मूल्यवान चीज पर अपनी डरावनी दृष्टि दौड़ाई। हजारों हाथ हथौड़े लिए टूट पड़े। बारूद की गंध हवाओं में घुल गई। मंदिर मटियामेट कर दिए गए और आश्रम उजाड़ दिए गए। गलियों में लूटपाट और मारकाट का शोर मच गया। अयोध्या का वैभव धूल में मिल गया। अयोध्या अनादिकाल से भारत की माँग में भरा हुआ चमकता सिंदूर थी, जो पोंछ दिया गया था।

इतिहास ने उस साल अयोध्या को पथराई आँखों वाली एक निरीह और निर्वस्त्र स्त्री की तरह सामने देखा था। आभूषणों से सज्जित सुगंधित देह पर खूनी खरोंचें थीं। केश धूल-धूसरित थे। मस्तिष्क सुन्न था। वह अवाक् थी। हजारों वर्षों की स्मृतियों में ऐसा पहली बार देखा और भाेगा था। राक्षस कुल के विभीषण को रूपांतरित और अजेय रावण को मारने वाले राम स्मृतियों में थे, लेकिन अयोध्या को लगा कि वे सारे राक्षस नाम और रूप बदलकर लौट आए हैं।

अयोध्या ने पहली बार अल्लाहो-अकबर का हो-हल्ला और माले-गनीमत की वीभत्स घोषणाएँ सुनीं! कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजाओं का बनवाया हुआ विष्णु हरि के मंदिर से धूल का गुबार वायुमंडल में बिखर गया। मलबे पर एक मस्जिद का ढाँचा उगाया गया ताकि धर्म भी हमारे हिसाब से चले! कैसा धर्म!

अयोध्या शून्य में ताक रही थी। चार सदियों तक लोग लड़े और मरे। अधूरी स्वतंत्रता के इन 70 सालों में सेक्युलर कीड़े-मकोड़े घावों पर मँडराते रहे। पीड़ित अयोध्या मूक दर्शक बन गई। क्या भाग्य लेकर आई थी अयोध्या! उसने राम का युग देखा, राजाओं के वैभवशाली कालखंड देखे। दासता में सब उजड़ते देखा और स्वतंत्रता पश्चात शातिर ठगों के सेक्युलर गिरोह भी। धर्म को उसने बीज से वृक्ष बनते हुए त्रेतायुग में देखा था और धर्म के नाम पर आतंक को जड़ें जमाते कलयुग में देखा। वह ढाँचा इन्हीं दुष्ट शक्तियों का प्रतीक बनकर खड़ा रहा था। 

अयोध्या गहरे मौन में थी। उसे अपने बच्चों पर पूरा विश्वास था। वे कभी चैन से नहीं बैठे थे। मैदान में भी लड़े थे। अदालतों में भी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि प्रसाद किसे मिला, महत्वपूर्ण यह है कि यज्ञ-अनुष्ठान संपन्न हुआ। सफल हुआ। सबने अपनी आहुतियाँ अर्पित कीं। किसी ने शीश कटाए। किसी ने नारे लगाए। कोई ईंट ले आया। कोई जल ले आया। आज का दिन सबके हिस्से का परम प्रसाद है!

अयोध्या संकल्प शक्ति की प्रतीक है। यह दिन 492 साल लंबी प्रतीक्षा के बाद आया है, जब अयोध्या की गलियों में बारूद की गंध नहीं है। जन्मभूमि मंदिर में हथौड़ों की ठक-ठक और धूल नहीं है। अयोध्या की आँखों की नमी सरयू में बह रही है। बच्चे रँग-रोगन कर रहे हैं। नदी-सरोवरों के जल से अभिषेक कर रहे हैं। श्रृंगार कर रहे हैं। सुगंध से भर रहे हैं। संसार भर से उपहार आए हैं। अयोध्या के मुख पर मुस्कान लौट रही है।

राम ने 14 वर्ष लंबे वनवास में तरह-तरह के नाम वाले राक्षसों का बोझ धरती से कम किया था। वे लंका से लौटे थे तब ऐसी ही रंग और रोशनी आ गई थी। आज फिर स्वर्णिम अतीत इतिहास की अंधेरी सुरंगों से बाहर झाँक रहा है। दीपावली आते ही दीवारों पर टँगे मकड़ियों के जाले झाड़ दिए जाते हैं। साल भर की धूल और काई साफ हो जाती है। जीवन श्वांस लेने लगता है। अयोध्या भी भारत के जीवन में एक गहरी और नई श्वाँस भर देगी।

अयोध्या का श्रृंगार किसे प्रसन्न नहीं करेगा? जो प्रसन्न न हो वह भारतीय नहीं। अयोध्या केवल उन सौभाग्यशाली हिंदुओं की ही नहीं है, जो दस सदियों की दासता के क्रूर दमन में अपनी हिंदू पहचान बचाकर निकल आने में सफल हुए। अयोध्या उन हिंदुओं की भी है, जिनकी पहचानें गुलामी की भगदड़ में गुम हो गईं! जिन्होंने किसी सदी में खुद को नए नाम और नई शक्ल में देखा! वह सच नहीं है। वह पहचान भी गुलामी का प्रमाण है। चलते-फिरते ढाँचे जिन्हें स्वयं ही ढहाना है और लौटना है अपनी अयोध्या में। अयोध्या यही याद दिला रही है।

भले ही पहचान बदली हुई हो किंतु यह किसी के लिए भी रूठने या क्रोध करने की घड़ी नहीं है। अपने पूर्वजों का स्मरण करने का इससे अच्छा शुभ मुहूर्त दूसरा नहीं आएगा। घर के एकांत कोने में सोचें कि इतिहास के किस अपमानजनक मोड़ पर नाम, धर्म और पहचान बदल गई थीं? राम का रास्ता छोड़कर जाने की क्या विवशता रही होगी, कैसे लालच घेरे होंगे, किसने तलवार अड़ा दी थी? यह मुँह लटकाने और मन मसोसने का दिन नहीं है।

यह मन के सब मैल धोकर बाहर निकालने का दिन है। अयोध्या उन्हें और उनके पुरखों को भी कभी भूल नहीं सकती, जो अयोध्या को भुलाए अब तक ढाँचे में लटके हैं। वह ढाँचा इतिहास में खो गया है, जैसे एक दिन उनकी मूल पहचानें खो गई थीं। यह रूठने का नहीं, याददाश्त पर जोर मारने का समय है। यह प्रायश्चित्त का अवसर है।

हम सब राम के वंशज हैं! हमारे महान पुरखे ही राम की कथा में कोई न कोई पात्र रहे हैं। नदी पार कराने वाले, समुद्र पार तक ले जाने वाले हजारों पात्र। अनगिनत राजवंशों के समय अयोध्या की चमक को बढ़ाने वाले पात्र, जिनके हाथ अनगिनत राम मंदिरों को बनाने में लगे थे। अयोध्या के हर घर में मंदिर हैं। उजाला अयोध्या में न होता तो कहाँ होता? राम की आहट है।

अयोध्या के दीप्त मुख पर हँसी लौट रही है। कलाइयों में कँगन खनक रहे हैं। नेत्र प्रकाश से भर गए हैं। माँग अब सूनी नहीं है। कंठ से स्वर फूट रहे हैं। पवित्र नदियों के जल से धुले केश मोगरे से महक रहे हैं। सारी दुनिया में लोग टकटकी लगाए हैं। दिवाली के पहले सबसे बड़ी दिवाली का दिन है।

वाल्मीकि और तुलसी किसी लोक में आनंदित होंगे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला राम की शक्तिपूजा झूमकर गा रहे होंगे। रामचंद्र दास परमहँस की आँखें झर रही होंगी। अमृतलाल नागर मानस के हँस में ही मगन होंगे। रामानंद सागर करबद्ध प्रणाम की मुद्रा में मौन होंगे। अरुण गोविल अपने बच्चों को तीस साल पुराने किस्से सुना रहे होंगे। लालकृष्ण आडवाणी को राम रथयात्रा के ऊर्जा से भरे दिन याद आ रहे होंगे। राम हमारे डीएनए में हैं और हमारी गर्भनाल अयोध्या में…

यह लेख विजय मनोहर तिवारी द्वारा लिखा गया है

भगवान राम के स्वागत में सजी-सँवरी अयोध्या नगरी: इन 15 तस्वीरों में देखिए साकेत की सुंदरता

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की औपचारिक शुरुआत आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भूमिपूजन के साथ ही हो जाएगी। इसके लिए पूरी अयोध्या नगरी को सजाया गया है। जलाशयों से लेकर सड़कों तक को सजाया गया है। पूरा शहर जगमग हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ख़ुद सारी तैयारियों पर नज़र रखी थी। नीचे इन तस्वीरों में आप जगमग अयोध्या नगरी को देख सकते हैं, जो भगवान राम के मंदिर के स्वागत के लिए तैयार है:

श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने इन तस्वीरों को शेयर करते हुए तुलसीदास के रामचरितमानस की पंक्ति ‘रामराज्य बैठे त्रैलोका। हरषित भये गए सब सोका॥‘ की चर्चा करते हुए लिखा कि श्री रामजन्मभूमि मन्दिर निर्माण कार्य के शुभारंभ की पूर्व संध्या पर अयोध्या नगरी सज-धज कर वैसे ही तैयार है, जैसे त्रेता में वनवास पश्चात भगवान के शुभागमन पर हुई थी। अयोध्या नगरी दीपोत्सव की अद्भुत छटा से दैदीप्यमान है।

अयोध्या में होने वाले राम मंदिर भूमि पूजन की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी हैं। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में अहम है। ख़बरों के मुताबिक़ ट्रस्ट लोगों से दान और आर्थिक सहयोग भी लेने वाला है। चाहे वह राशि के तौर पर हो या किसी वस्तु का दान हो। इसके लिए कोई नियम नहीं होगा, श्रद्धालु अपनी-अपनी श्रद्धा से दान कर सकेंगे। 

‘राम मंदिर- घृणा, कट्टरता और हिंसा का स्मारक’ – भूमि पूजन से पहले मीडिया गिरोह में सूजन

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के पहले होने जा रहे भूमि पूजन से एक ओर जहाँ देश की अधिकांश जनता में खुशी की लहर है तो वहीं दूसरी ओर मीडिया गिरोह के लोगों व कट्टरपंथियों में शोक पसरा हुआ है। नतीजतन 5 अगस्त के शुभ अवसर पर ये सभी जहर उगलने में व्यस्त है।

ऑल इंडिया मुस्लिम बोर्ड तो अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके धमकियाने अंदाज में बोल ही चुका है कि बाबरी मस्जिद थी और हमेशा मस्जिद ही रहेगी। हागिया सोफिया इसका एक बड़ा उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टिकरण निर्णय द्वारा जमीन पर पुनर्निमाण इसे बदल नहीं सकता है। दुखी होने की जरूरत नहीं है। कोई स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती है।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर 10 हजार फॉलोवर्स के साथ अच्छी पकड़ रखने वाला हाशिम इसी प्रकार अमित शाह के ट्वीट पर राम मंदिर की तस्वीर देखकर रिप्लाई करता है, “तड़ीपार फिक्र मत कर। बाबरी मस्जिद की जगह सत्ता के बल पर चाहे राम का मंदिर बना लो। लेकिन इंशाअल्लाह हम फिर बाबरी मस्जिद वहीं बनाएँगे।”

वहीं मीडिया गिरोह की सक्रिय सदस्य और इस्लामी पत्रकारिता करने वाली राणा अय्यूब इस भूमि पूजन के भव्य कार्यक्रम से आहत होकर #5अगस्त के लिए लिखती हैं कि ये वह भारत नहीं है, जिसे वो जानती है। वह हालिया ट्वीट में वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने लेख को शेयर करते हुए लिखती है कि 5 अगस्त- भारत की विभिन्न संस्कृतियों के उन्मूलन का एक और दिन है, यह भारत के खून और मिट्टी का एक और दिन है।

इसी तरह आरफा खान्नुम शेरवानी लिखती हैं, “ये क्या वही देश है, जिसके लिए मेरे पूर्वजों ने लड़ाई लड़ी। मैं अब अपने देश को नहीं पहचान पा रही।”

ऑद्रे ट्रुश्के तो राम मंदिर निर्माण को नफरत का स्मारक बताती हैं। वह लिखती हैं, “आज 5 अगस्त को अयोध्या राम मंदिर की आधारशिला डलेगी। यह घृणा, कट्टरता, हिंसा का स्मारक है, जो केवल हिंदू राष्ट्र का उपयुक्त आधार है।”

पूर्व सांसद व नई दुनिया के मैनेजिंग एडिटर लिखते हैं कि यह शर्मनाक है कि कुछ तथाकथित वामपंथी लिबरल दोस्त राम मंदिर निर्माण के मौके पर हिंदुत्व की सवारी कर रहे हैं। यह लोग इस राक्षस के हाथों पीड़ित होंगे, जिसे इन्होंने पिछले कुछ दशकों में अपने अवसरवाद से बनाया है।

पत्रकार अभिषेक बक्शी आज के दिन अपनी प्रोफाइल पिक बदलकर उसे काली करते हुए कश्मीर से माफी माँगते हैं और भाजपा पर अपना गुस्सा दिखाते हैं। वह लिखते हैं, “सॉरी कश्मीर, धिक्कार है भाजपा सरकार पर।”

गौरतलब है कि आज भूमिपूजन के दिन से ठीक एक साल पहले जब मोदी सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर ऐतिहासिक फैसला लिया था उस समय भी इसी तरह का रोष कट्टरपंथियों में देखने को मिला था। दूसरी तरफ, लिबरल गैंंग ने भी इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जमकर प्रतिक्रिया दी थी। बरखा दत्त, सागरिका घोष, स्वाति चतुर्वेदी समेत कई गिरोह के लोगों ने तब भी सवाल उठाए थे और फैसले की आलोचना की थी।

‘जब कारसेवक बाबरी गिराकर निकले, तो अयोध्या दीपों से जगमगा रही थी, ऐसी दिवाली कभी नहीं देखी’

भगवान राम की जन्मभूमि पर सदियों से खड़ा कलंक का बाबरी ढाँचा सदा ही हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती देता रहा था। मैं 1984 में संघ का स्वयंसेवक बना। संयोग से उन्हीं दिनों श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति का नव आन्दोलन आरम्भ हुआ था।

1984 में ही रामलीला मैदान दिल्ली में श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन का एक कार्यक्रम इन्द्रप्रस्थ विश्व हिन्दू परिषद के तत्वाधान में आयोजित किया गया था। मैं स्वयंसेवक तो नया था, लेकिन एक प्रसिद्द चित्रकार के रूप में जाना जाता था। तब भी मंच सज्जा का कुछ कार्य मेरे जिम्मे लगा था।

ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में आमंत्रित अथितियों की सूची में तत्कालीन इंदिरा गाँधी के मंत्रीमंडल के सदस्य बसंत साठे जी का नाम भी था। मुझे अच्छी तरह से स्मरण है कि कार्यक्रम आरम्भ हुए आधा घंटा हो चुका था, मैं भी प्रबंधको में मंच के पीछे ही था।

संघ के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रचारक ब्रह्मदेव जी बेचैनी से टहल रहे थे। तभी उन्होंने एक साथ खड़े अधिकारी से कहा – “इंदिरा अम्मा ने मना कर दिया होगा, इसीलिए साठे जी नहीं आए।”

उस समय राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के सबसे बड़े चेहरे स्वर्गीय श्री बैकुंठ लाल शर्मा प्रेम ही थे। ये मेरा सौभाग्य रहा कि उनके साथ मिलकर संघर्ष के अनेक कार्यों में सहभागी होने का अवसर मिला।

मैंने इस आन्दोलन के प्रारम्भ से ही उसके हर अवसर पर पूरी शक्ति से भाग लिया था। पहले हम नारे लगाते थे – “आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो।”

इसके लिए खूब जलसे जुलूस निकाले गए। राजीव गाँधी की सरकार के समय जन्मभूमि का ताला खुल गया। फिर राम शिलाएँ एकत्र की जाने लगीं। उन्हें लेकर भी बहुत बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए। गली गली में राम मंदिर के नारे लगते थे।

सारा मीडिया और सेकुलर दरिन्दे पूरी ताकत से भगवान राम के मुकाबले बाबर को खड़ा करने का षड्यंत्र करते रहे। मैं 1988 में प्रचारक था। हाथों में माइक लेकर अनेक स्थानों पर नुक्कड़ सभाएँ होती थीं। हिन्दू समाज की जागृति के लिए भरसक प्रयास किए।

आडवाणी जी ने रथयात्रा के माध्यम से ढोंगी सेकुलरों को कड़ा उत्तर दिया था। 1990 में कारसेवा की घोषणा हुई। देशभर से लाखों लोग अयोध्या के लिए चले। मुलायम सिंह ने हर रामभक्त कारसेवक पर भयंकर अत्याचार किए।

जेल भर दिए गए, लेकिन फिर भी निश्चित तिथि तक हजारों रामभक्त अयोध्या में पहुँच चुके थे। मुलायम सिंह ने हजारों जिहादियों को पुलिस के वेश में नियुक्त कर दिया था। रामभजन करते भक्तों पर गोलियाँ चलवाई गईं। सैकड़ों को मार दिया गया। फिर भी अनेक रामभक्तों ने मुलायम सिंह के मुख पर कालिख पोतते हुए अपने प्राणों की परवाह नहीं की और बाबरी ढाँचे पर भगवा फहरा ही दिया।

माथे पर घाव लिए लहुलुहान अशोक सिंघल जी भी अयोध्या पहुँच गए थे। कालान्तर में सरकार बदली। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। दिसंबर 06, 1992 को मोक्षदा एकादशी का दिन कारसेवा के लिए चुना गया।

देशभर से लाखों लोग अयोध्या जाने के लिए तैयार थे। बहुत नियोजित रूप से जत्थे बनाकर, वाहिनियाँ बनाकर उनके प्रमुख तय कर कारसेवक भेजे गए। मैं भी 1 दिसंबर को अपने यहाँ की एक वाहिनी के साथ गया।

देश के हर कोने से कारसेवक पहुँचे थे। आतंकग्रस्त कश्मीर और पंजाब से भी योद्धा हिन्दू अपने शस्त्रों के साथ पहुँचे थे। अयोध्या में नित्य ही रात को अलग-अलग स्तर पर बैठकें होती थी।

5 दिसंबर की रात तक भी कारसेवा का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ। सभी बहुत दुखी थे। सोचते थे कि अगर कारसेवा नहीं हुई तो क्या मुख लेकर वापस जाएँगे। अधिकारियों ने घोषणा की कि सभी कारसेवक जत्थों में सरयू तक जाएँगे और सांकेतिक रूप से एक एक मुठ्ठी रेत कारसेवा के लिए लाएँगे।

ये सब बहुत अपमानजनक सा लग रहा था। 6 दिसंबर को सुबह ही हम ढाँचे के निकट पहुँच गए, सभी गलियाँ भरी पड़ी थीं। अनेक स्वयंसेवक दंड लिए ढाँचे के चारों और खड़े थे। कलंक के ढाँचे को देखकर सभी की आँखों में आँसू थे।

उसी समय लगभग साढ़े 9 बजे आडवाणी जी वहाँ पहुँचे। आगे-पीछे ढेर सारे ब्लैक कैट एनएसजी कमांडो दौड़ते चल रहे थे। हमने सरयू से रेत लाने के स्थान पर सभा स्थल पर साध्वी ऋतंभरा जी का भाषण सुनना चुना।

अभी आचार्य धर्मेन्द्र जी का भाषण समाप्त ही हुआ था कि कुछ शोर सा उठा। सब निगाहें ढाँचे की ओर उठीं थीं। देखा तो दो जने हाथों में ध्वज लिए ढाँचे के एक गुम्बद की ओर बढ़ रहे थे।

एक क्षण में मस्तिष्क में ढेरों विचार कौंध गए। सबसे पहले, 1990 में चली गोलियाँ याद आईं। फिर स्वयं के दिए बलिदान वाले भाषण याद आए। एक क्षण में मैंने निर्णय कर लिया। मेरे साथी इतनी देर में कुछ सोचते, मैं बहुत तेजी से भागा।

ढाँचे की परिधि में जाने का द्वार दूर था। आस-पास लगभग 15 फुट ऊँची कंटीली तारे लगी थीं। हम कई जने आनन-फानन में उन्हीं पर चढ़कर परिसर में कूद गए। अभी ढाँचे के निकट बहुत कम लोग पहुँचे थे। मैंने देखा, वहाँ स्थित सुरक्षाकर्मियों पर कई कारसेवक काबू करने का प्रयास कर रहे हैं।

मैंने सोचा पहले इन सुरक्षाकर्मियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद करूँ। तब तक और अनेक कारसेवक पहुँच गए। फिर तो जिसे जहाँ मौक़ा मिला, बाबरी ढाँचा ध्वस्त करना आरम्भ हो गया।

नीचे से भी तोड़ रहे थे… ऊपर से भी तोड़ रहे थे। ऊपर से छत गिरती तो नीचे और ऊपर वाले दोनों का मरना तय था। लेकिन रामभक्ति का ऐसा जूनून था कि अनेक लोग देखते ही देखते प्राण गँवाकर भी कारसेवा में जुटे रहे।

साध्वी ऋतंभरा लगातार ओजस्वी वाणी में भाषण दे रहीं थीं। मेरे लिए उस समय की मनोदशा का वर्णन करना कठिन है। शाम होते-होते तीनों ढाँचे ढह गए। अजीब उल्लास सा छा गया था।

तभी आकाश में हेलीकॉप्टर मंडराने लगे। साध्वी जी ने कहा – देखो बाबर के मरने पर ये चील कव्वे मंडरा रहे हैं। हजारों कारसेवक अयोध्या तक आने वाली सड़कों को अवरुद्ध करने में जुट गए, ताकि केंद्र से भेजे गए सुरक्षाबल ना पहुँच सकें।

फिर तुरंत सरयू तक कतारें लग गईं। हाथों-हाथ मलबा नदी तक पहुँचाया गया। हर कारसेवक को एक एक ईंट घर ले जाने के लिए सूचना मिली। शाम होते-होते चबूतरा बनना आरम्भ हो गया। राम लला विराज दिए गए। रात को जब सीढ़ियाँ बनाई जा रही थीं, मैंने भी उनमें थोड़ा योगदान दिया।

शाम ढलने के बाद जब अयोध्या की गलियों में निकले तो हर घर के बाहर दिए जले हुए थे। मानो वर्षों के बाद राम अयोध्या लौटे हों। ऐसी दिवाली कभी नहीं देखी थी। एक घर में टीवी पर सुना – नरसिंह राव इसे राष्ट्रीय शर्म बता रहे थे। शायद उसी दिन भाजपा सरकारों को हटाने की और संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा हो गई थी।

अब कारसेवकों को वापस भेजने की योजना बनने लगी। मेरे साथ जामिया के पास समुदाय बहुल क्षेत्र के सुरेश जी, और अनेक कारसेवक भी आए हुए थे। देशभर से कट्टरपंथियों के आक्रमण के समाचार आने आरम्भ हो गए थे।

हमने सबसे पहले ओखला वाले कारसेवकों को रात को ही रेल में चढ़ा दिया। पता चला कि रास्ते में अनेक स्थानों पर कट्टरपंथियों ने रेल पर पथराव किया। मैं 10 दिसंबर के बाद ही दिल्ली वापस आ पाया। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन यह एक अकाट्य सत्य है कि स्वतन्त्र भारत का इतिहास अब दिसंबर 06, 1992 से पहले और बाद के इतिहास के रूप में जाना जाएगा।

पहली बार हिन्दुओं ने विरोधियों के सीने पर लात रख कर जूतों की ठोकर से अपने अधिकार को प्राप्त करके दिखाया था। ये स्मृति सदैव बनी रहनी चाहिए। और अब, नवम्बर 09, शनिवार 2019 को उच्चतम न्यायालय के निर्णय के साथ श्री रामजन्मभूमि पर भगवान राम के भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ और श्रीराम जन्मभूमि संघर्ष के एक बहुत बड़े अध्याय का पटाक्षेप हुआ।

जिसने भी इस संघर्ष में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अपना योगदान दिया, बलिदान दिया, उन सभी के चरणों में एक रामभक्त सनातनी हिन्दू के नाते मैं नमन करता हूँ। अयोध्या में भव्य श्रीरामजन्म भूमि मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने वाले सभी लोगों के प्रति मैं ह्रदय के अंतरतम से आभार और अभिनन्दन प्रकट करता हूँ।

पिछले तीस वर्षों में मैंने एक चित्रकार के नाते भी राम मंदिर आन्दोलन के लिए हजारों ही डिजाइन बनाए। अनेकों शुभकामना पत्रों और काल-निर्णयों के भी डिजाइन बनाए। पिछले वर्ष, संवत 2075 के लिए वैदिक गणनाओं वाला एक बारह पेज का टेबल कालनिर्णय मैंने मनमोहन गुप्ता जी के सूर्य इम्प्रेशन के लिए तैयार किया था। अब जब भगवान के भव्य मंदिर का निर्माण होगा, तो उसमें मैं भी अपनी सेवाएँ प्रदान करके जीवन को धन्य बनाने का अवश्य प्रयास करूँगा।

यह लेख बलराज जी द्वारा लिखा गया है, जो कि आरएसएस में रहते हुए श्रीराम जन्मभूमि के संघर्ष के प्रत्यक्ष गवाह रह चुके हैं।

J&K में 500+ अधिकारियों की जाएगी नौकरी: भारत के प्रति फैला रहे थे घृणा, शामिल थे देशद्रोही गतिविधियों में

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खत्म होने के 1 वर्ष पूरे हो गए हैं और इसके साथ ही प्रदेश के 500+ ऐसे अधिकारियों पर सरकार की नज़र है, जो राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। इन सभी की नौकरी जाने वाली है।

जम्मू कश्मीर की सरकार ने पिछले ही सप्ताह एक कमिटी गठित की थी, जिसने इस संबंध में जाँच कर के अनुशंसा की थी। कमिटी ने इन सभी के पिछले रिकार्ड्स की छानबीन करने के बाद इन्हें बर्खास्त करने की अनुशंसा की थी।

इए कमिटी की अध्यक्षता जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव ने की थी। इसमें डीजीपी और सीआईडी के ADGP भी मौजूद थे। इससे पहले सरकार ने अनुच्छेद 311(2)C को लागू कर दिया था, जिससे सरकार को वहाँ के अधिकारियों को विभिन्न कारणों से बर्खास्त करने का अधिकार मिल गया। इसमें देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त अधिकारियों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। इस अनुच्छेद के प्रावधान पहले कम्मू कश्मीर में लागू नहीं होते थे क्योंकि इसे विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त था।

इस अनुच्छेद के लागू होने के बाद वहाँ के प्रशासनिक विभागों को अधिकार मिल गया कि वो इस प्रकार के मामलों को गृह मंत्रालय को भेज सके, जो जाँच समिति की रिपोर्ट के बाद उचित कार्रवाई करेगा। यहाँ तक कि IAS और IPS अधिकारियों को भी इसमें छूट नहीं दी गई है।

दोषी पाए जाने पर इन दोनों कैडर (IAS और IPS) के अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जा सकती है। जिन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, वो ऐसे कार्यों में लिप्त थे, जिनसे देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा था।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है, जब जम्मू कश्मीर में किसी अधिकारी को बर्खास्त किया गया हो। कमिटी ने पाया कि ये अधिकारी सोशल मीडिया सहित विभिन्न माध्यमों से राजनेताओं को धमकी दे रहे थे और अगस्त 5, 2019 को सरकार द्वारा लिए गए निर्णय के आलोक में देश के प्रति घृणा फैला रहे थे। इस मामले में गठित कमिटी ने इन अधिकारियों से पूछताछ भी की थी। अब 500 अधिकारियों को बर्खास्त किया जाएगा।

‘बाबरी मस्जिद थी और हमेशा रहेगी… परिस्थति हमेशा ऐसी नहीं होगी’ – भूमिपूजन से ठीक पहले मुस्लिम लॉ बोर्ड की धमकी

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन समारोह से कुछ ही घंटों पहले, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए धमकी भरा सन्देश जारी किया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक ट्वीट में लिखा है कि दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि कोई भी परिस्थिति हमेशा नहीं रहती।

इस ट्वीट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने लिखा है –

“बाबरी मस्जिद थी, और हमेशा एक मस्जिद रहेगी। हागिया सोफिया हमारे लिए एक बेहतरीन उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टिकरण वाले फैसले से भूमि का पुनर्निमाण इसे बदल नहीं सकता है। दुखी होने की जरूरत नहीं है। परिस्थति हमेशा के लिए नहीं रहती है।”

आज, 05 अगस्त 2020 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भूमिपूजन को लेकर देशवासियों में उत्साह का माहौल है। ऐसे में AIMPLB का यह धमकी भरा सन्देश स्पष्ट करता है कि उच्चतम न्यायलय के फैसले के बावजूद भी श्रीराम मंदिर निर्माण के फैसले को लेकर सेक्युलर समाज पूरी तरह से खुश नहीं है।

चर्च और संग्रहालय के बाद दोबारा मस्जिद में तब्दील हुई है हागिया सोफिया

हागिया सोफिया दुनिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक रहा है। हागिया सोफिया तुर्की में एक ऐतिहासिक संरचना है, जो कई वर्षों से एक संग्रहालय था। ग्रीक ऑर्थोडॉक्स कैथेड्रल के रूप में 1500 से अधिक साल पहले निर्मित यह गुंबदाकार संरचना एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के साथ-साथ एक ऐतिहासिक स्थल रहा है।

1953 में संग्रहालय बनने से पहले 1453 में ओटोमन विजय के बाद इसे एक मस्जिद में बदल दिया गया था। यह यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है। गत जुलाई माह की शुरुआत में ही, तुर्की की एक अदालत ने हागिया सोफिया के संग्रहालय की चली आ रही स्थिति को रद्द करते हुए कट्टरपंथी मुस्लिमों को खुश करने के लिए इसे वापस एक मस्जिद में बदल दिया। इस मस्जिद में अब नमाज शुरू हो गई है।

AIMPLB के ट्वीट में एक प्रेस बयान भी शामिल है। AIMPLB उन वादियों में शामिल था, जिन्होंने पिछले साल नवंबर में अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार को अयोध्या में एक मस्जिद के निर्माण के लिए पाँच एकड़ जमीन आवंटित करने का भी निर्देश दिया था।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 9 नवंबर को केंद्र सरकार को अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए स्थल सौंपने का निर्देश दिया था। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए 5 फरवरी को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की गई थी और श्रीराम मंदिर के निर्माण की देखरेख के लिए केंद्र सरकार द्वारा ट्रस्ट को अनिवार्य किया गया है।

हालाँकि, कोर्ट के फैसले के खिलाफ AIMPLB ने कहा कि वह वैकल्पिक पाँच एकड़ जमीन को स्वीकार नहीं करेगा। एक अन्य मुस्लिम निकाय, जमीयत उलमा-ए-हिंद (JUH) ने कहा था कि वो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोध करते हैं।

‘बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी… इशांअल्लाह’ – भूमि पूजन के दिन सुबह-सुबह ओवैसी ने उगला जहर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (5 अगस्त 2020) अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करने वाले हैं। इसी बीच AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने एक आज सुबह-सुबह एक ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। इशांअल्लाह।” इस ट्वीट के साथ ओवैसी ने दो तस्वीरें भी शेयर की हैं। एक तस्वीर में मस्जिद खड़ा नजर आ रहा है और दूसरे में उसके विध्वंस की घटना है।

ओवैसी के इस ट्वीट पर कई यूजर्स की प्रतिक्रियाएँ आई हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय विशेष के हैं। इनका भी ओवैसी की तरह यही कहना है कि बाबरी मस्जिद थी और रहेगी।

एक यूजर तौसिफ रजा अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखता है, “मंदिर चाहे जितना बड़ा बन जाए। मगर हम अपनी 7 पुश्तों को बताएँगे कि पहले यहाँ बाबरी मस्जिद थी, जिसको भारतीय न्यायपालिका द्वारा तोड़कर यहाँ मंदिर बनाई गई। मस्जिद थी, ये बात भारत की न्यायपालिका ने भी माना था और बार-बार दोहराया भी था।”

वह आगे लिखता है, “अंत में भारत की न्यायपालिका ने भी अपना धर्म बदल कर हिंदुत्व अपना लिया था। हम अगर मर भी गए तो ये बताकर और नसीहत देकर जाऊँगा, ये बात अपने पुश्तों को बताऊँगा कि हम पर ज़ुल्म होते रहे, बर्बरता की सारी हदें पार हो गई हमारे ऊपर लेकिन हमें भारतीय न्यायालयों से इंसाफ़ नहीं मिला।”

वहीं, आकिफ मिर्जा नाम का दूसरा यूजर कामना करते हुए लिखता कि वक्फ बोर्ड को इस मामले में रीअपील करनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अगर, वक्फ बोर्ड ऐसा करता तो शायद इस फैसले पर रोक लग जाती।

आलमगीर नाम का यूजर इस मामले पर निराशा जताते हुए कहता है, “वास्तव में यह समुदाय के दुनिया भर के लोगों के लिए अपमान की सदी है! यहाँ तक ​​कि दुनिया में 1.8 अरब के साथ एक देश में 200 मिलियन मजहबी आबादी एक मस्जिद की रक्षा के लिए असहाय हैं।”

बता दें कि गत वर्ष 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवादित जमीन को लेकर अपना फैसला सुनाया था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन राम लला को सौंप दिया था। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में 5 एकड़ की जमीन दी जाए।

इस फैसले के बाद से कट्टरपंथियों में रोष उमड़ गया था। एक ओर जहाँ फैसले से पहले हर कोई शांति की अपील कर रहा था। वहीं दूसरी ओर फैसले के बाद उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए गए थे। ऐसे में जब राम मंदिर के भूमि पूजन की तारीख नजदीक आई तो ये परेशानी और बढ़ गई। नतीजतन ओवैसी जैसे लोग खुलकर इस फैसले के कारण हर पार्टी का विरोध करने लगे।

आजतक से बातचीत में ओवैसी ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस हमेशा खामोशी से हिंदुत्व की राजनीति करती आई है। कॉन्ग्रेस को खुलकर कह देना चाहिए कि वह हिंदुत्व की विचारधारा को मानती है। कॉन्ग्रेस पहले भी मिली हुई थी। अब उनको यह तय करना है कि वो टीम हिंदुत्व का साथ देंगे या टीम इंडिया का जो धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास रखती है।”

इसी प्रकार उन्होंने मुलायम सिंह यादव को भी आड़े हाथों लिया और कहा, “मुलायम सिंह यादव ने भी अपनी सियासी रोटी हमारे खून पर सेकी है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब दोबारा मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने तो वो इस मामले में सोते रहे। उन्होंने केस में कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया। जिन लोगों को हमने रक्षक समझा, उन्हीं लोगों ने हमें नुकसान पहुँचाया है।”

इसके अलावा ओवैसी ने प्रियंका गाँधी के एक ट्वीट पर टिप्पणी करते हुए लिखा, “खुशी है कि वे अब और नाटक नहीं कर रहे हैं। यह अच्छी बात है कि वो भी अतिवादी विचारधार को गले से लगा रही हैं। लेकिन भाईचारे के मुद्दे पर वो खोखली बातें क्यों करती हैं। शर्म मत कीजिए, आप इस बात पर गर्व महसूस करिए कि किस तरह से आपकी पार्टी ने उस आंदोलन में योगदान दिया, जिसकी वजह से हमारे बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।”

जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है नई अधिवास नीति, आतंकी सोच पर चोट के लिए नियम हो और सरल

भारतवासियों और भारत की केंद्र सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर आजादी के बाद से ही चर्चा और चिंता का विषय रहा है। आजादी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलयन के समय कुछ ‘अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधान’ संविधान में किए गए थे। इन प्रावधानों को अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए के नाम से जाना जाता रहा है।

इन विशेष प्रावधानों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों की तुलना में ‘अस्थायी रूप से कुछ अधिक स्वायत्तता’ प्रदान की गई थी। जम्मू-कश्मीर राज्य विदेश, रक्षा और दूरसंचार जैसे तीन विषयों के सन्दर्भ में भारत पर निर्भर होने के अतिरिक्त अपना नीति-नियामक स्वयं था। यहाँ तक कि उसका दंड विधान भी भारतीय दंड विधान से पृथक ‘रणवीर पीनल कोड’ के नाम से जाना जाता था।

वहाँ की विधानसभा का कार्यकाल भी अन्य राज्य विधानसभाओं से अलग 6 वर्ष का था। जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले और सबसे जोरदार ढंग से जम्मू-कश्मीर को अलगाने वाले इन विशेष प्रावधानों का संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक विरोध किया।

जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण-विलयन और राष्ट्रीय एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया उनका नारा – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!” बहुचर्चित है। ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के एकीकरण और जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण-विलयन की लड़ाई लड़ते हुए ही जून 23, 1953 को श्रीनगर के निकट निशात बाग़ में नज़रबंदी के दौरान उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु हुई।

डॉ मुखर्जी के बलिदान के बाद से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाने का मुद्दा लगातार जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारात्मक और भावनात्मक रहा है। इसी वैचारिक प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप अगस्त 05, 2019 को भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इन दोनों अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में पूर्ण विलय कर दिया।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 को संसद के दोनों सदनों में पारित करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेश – जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बना दिए गए। लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की मूल वजह वहाँ के निवासियों की ऐसी माँग थी, जिसका आधार जम्मू-कश्मीर राज्य के शासन-प्रशासन द्वारा लम्बे समय तक लद्दाखवासियों के साथ किया गया भेदभाव और उपेक्षा थी। हालाँकि, आजादी से लेकर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन तक इस भेदभाव और उपेक्षा के शिकार जम्मू संभाग के लोग भी रहे हैं।

मार्च 31, 2020 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य विधि का अनुकूलन) आदेश-2020 अधिसूचित किया था। इस आदेश के तहत राज्य में पूर्व-प्रचलित 129 कानूनों में आंशिक संशोधन किया है और 29 कानूनों को पूर्ण रूपेण निरस्त किया गया है। इसी आदेश में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (विकेंद्रीकरण और भर्ती) अधिनियम-2010 के खंड 2 में आंशिक बदलाव करते हुए ‘स्थायी निवासी’ शब्द के स्थान पर ‘अधिवासी’ शब्द जोड़ा गया है।

इसी संशोधित अधिनियम के खंड 3 ए के अंतर्गत ‘अधिवासी’ शब्द का स्पष्टीकरण करते हुए उसे परिभाषित किया गया है। इस परिभाषा के अनुसार कम-से-कम 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में रहने वाले व्यक्ति ‘अधिवासी’ माने जाएँगे। इसके अलावा, केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों से अपनी 10 वीं/12 वीं की पढ़ाई को मिलाकर कम-से-कम 7 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राएँ भी अधिवासी माने जाएँगे।

कम-से-कम 10 वर्ष तक जम्मू-कश्मीर में सेवा देने वाले केन्द्रीय सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों/अन्य उपक्रमों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केन्द्रीय स्वायत्तशासी निकायों आदि के कर्मचारी/अधिकारी और उनके बच्चे भी अधिवासी माने जाएँगे।

इसके साथ ही, जम्मू-कश्मीर के राहत एवं पुनर्वास आयुक्त कार्यालय में पंजीकृत विस्थापित भी अधिवासी माने जाएँगे। इस अधिवासन नीति का परिणाम यह होगा कि उपरोक्त श्रेणियों के सभी व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया को पूरा करके अपना अधिवास प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकेंगे। तहसीलदार कार्यालय द्वारा आवेदन के 15 दिन के अंदर अधिवास प्रमाण-पत्र जारी करना अनिवार्य है।

आवेदन को नामंजूर करने की स्थिति में भी 15 दिन में कारण बताने की बाध्यता होगी। ये सभी अधिवासी जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिकों के लिए निर्धारित सभी सुविधाओं के पात्र होंगे। वे जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों में प्रवेश, सभी प्रकार की सेवाओं/नौकरियों में भागीदारी कर सकेंगे और घर, जमीन–जायदाद खरीद सकेंगे।

हालिया लागू की गई इस नई अधिवासन नीति से लम्बे समय से वंचित/उपेक्षित बहुत से तबकों को लाभ होगा। इन तबकों में वाल्मीकी समुदाय के ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें सन 1957 में पंजाब से लाकर जम्मू-कश्मीर में बसाया गया था। तत्कालीन सरकार द्वारा यहाँ के सफाईकर्मियों की लम्बे समय से जारी हड़ताल को तुड़वाने के लिए ऐसा किया गया था। लेकिन सन 1957 से मार्च 31, 2020 तक किसी ने अपना घर–द्वार छोड़कर आए इस अभागे दलित समुदाय की सुधि नहीं ली।

इसी प्रकार इस नई नीति से पश्चिमी पाकिस्तान से खदेड़े गए शरणार्थियों को भी उनके मानव अधिकार और नागरिक अधिकार मिल सकेंगे। यह नीति सन 1990 में कश्मीर घाटी से भगाए गए कश्मीरी पंडितों के जख्मों पर भी कुछ मरहम लगा सकेगी।

कश्मीरी पंडितों का उनके घर में किया गया कत्लेआम और फिर क्रूर विस्थापन स्वातंत्र्योत्तर भारत का अपराधबोध है। इस पाप का परिमार्जन अतिआवश्यक है। यह नीति इसका अवसर देती है। इसी प्रकार यह नीति जम्मू-कश्मीर से बाहर विवाह करने वाली लड़कियों और उनके बच्चों के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित करती है। इससे पहले उन्हें उनके  नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा।   

जम्मू-कश्मीर केन्द्रित राजनीति करने वाले कई राजनीतिक दलों, मसलन- नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और पैंथर्स पार्टी आदि ने केंद्र सरकार की नई अधिवास नीति का विरोध किया है। वास्तव में, ये दल तो अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाए जाने का भी विरोध कर रहे हैं।

परन्तु यह विरोध वैधानिक और सत्य प्रेरित न होकर राजनीतिक और स्वार्थ प्रेरित है। वे साधनों, संसाधनों और शासन-प्रशासन में अपना विशेषाधिकार और वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। उनका तर्क यह है कि इस नीति से जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी बदल जाएगी, बाहर के लोग यहाँ आकर बस जाएँगे और यहाँ के साधनों-संसाधनों को हड़प लेंगे और बाहरी लोगों के आने और बसने से न सिर्फ जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संस्कृति और जीवन-शैली संकट ग्रस्त हो जाएगी बल्कि अपराध भी बढ़ जाएँगे।

वस्तुतः उपरोक्त सभी तर्क खाली और खोखले हैं। भारत में संघीय व्यवस्था है। एक राज्य के नागरिकों को कहीं भी बसने, जमीन-जायदाद खरीदने, नौकरी-व्यवसाय करने की आज़ादी और अधिकार संविधान-प्रदत्त हैं। अपने ही देश के नागरिक ‘बाहरी’ कैसे हो जाते हैं, किनके लिए और क्यों हो जाते हैं, यह विचारणीय प्रश्न है।

उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार 1957 में वाल्मीकी समुदाय ने पंजाब से आकर जम्मू-कश्मीर की सेवा की थी, उसी प्रकार आज भारत के कोने-कोने से आकर लोग जम्मू-कश्मीर की सेवा कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में घरेलू कामगारों, ढाँचागत निर्माण मजदूरों और कृषि मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि के प्रवासियों की है। बल्कि, बहुत से उद्योग और निर्माण कार्य पूरी तरह उनके ऊपर ही निर्भर हैं।

कोरोना काल के आँकड़े निकालकर देखे जाने जरूरी हैं कि जम्मू-कश्मीर में/से भी कितने प्रवासियों की आवाजाही हुई है। जो अपने जीवन का सर्वोत्तम जहाँ लगा रहे हैं, अगर वे वहाँ अपने अधिकार नहीं माँगेंगे तो और कहाँ माँगेंगे? क्या जम्मू-कश्मीर के नागरिक दिल्ली, बम्बई, बंगलौर में नौकरी और व्यवसाय नहीं करते?

क्या वे भारत के अन्यान्य शहरों में जमीन-जायदाद नहीं खरीदते? क्या देश के किसी भी कोने में उनके बसने, काम करने पर पाबंदी या प्रतिबन्ध है? यदि अन्य राज्य भी अपनी-अपनी सीमाओं पर अपनी-अपनी लौह-दीवारें खड़ी कर दें, तो फिर एक राष्ट्र और राष्ट्रीयता का क्या अर्थ रह जाएगा? एक राष्ट्र में छोटे-छोटे स्वार्थों और सहूलियतों संबंधी किलेबंदी की नीति और राजनीति अब अतीत का अध्याय है।

युवा पीढ़ी अवसर चाहती है, प्रतिस्पर्धा चाहती है, शिक्षा और रोजगार के लिए पूँजी निवेश चाहती है और नई संभावनाएँ चाहती है। इन चाहतों को पूरा करने के लिए हमें ‘बाहरियों’ का स्वागत करने की मनोभूमि बनानी पड़ेगी।

जम्मू-कश्मीर की नई अधिवासन नीति वस्तुतः जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है। यह नीति जम्मू-कश्मीर की महत्वाकाँक्षी निर्माण परियोजना में अपना श्रम, कौशल, प्रतिभा और पूँजी लगाने वाले भारतीयों का स्वागत-द्वार है। आज राज्य को सुविधाओं और विशेषाधिकारों की सुरक्षित चहारदीवारियों से घेरकर न राज्य के नागरिकों का भला किया जा सकता है और न ही देशहित किया जा सकता।

संभवतः, वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और स्थायीभाव बन चुके तुष्टिकरण के दबाव में ही केंद्र सरकार ने अधिवासन की पात्रता के इतने कठिन नियम बनाए हैं। अन्यथा, उसे अन्य राज्यों जैसे ही अधिवासन के सरल नियम बनाकर जम्मू-कश्मीर के विलयन की प्रक्रिया पर पूर्ण-विराम लगाना चाहिए था।

इस अधिवासन नीति में कम-से-कम कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की दिशा में भी साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता थी। यह कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी ही थी, जिसने जनवरी 1990 में 3000 से अधिक निर्दोष कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया और लाखों को घर-द्वार और जड़-जमीन से बेदख़ल और विस्थापित किया।

कश्मीर घाटी में न सिर्फ कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की कोई ज़मीनी योजना बनाई जाए, बल्कि जम्मू-कश्मीर में एक दिन भी सेवा करने वाले भारतीय सेना और अर्ध सैन्य बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों और सैनिकों को कश्मीर घाटी में बसने पर तत्काल अधिवासन अधिकार दिए जाएँ, ताकि आतंकवाद और आतंकी मानसिकता की जनसांख्यिकी को संतुलित किया जा सके।

राम मंदिर के लिए कॉन्ग्रेस के समर्थन के बाद केरल में सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने बुलाई आपातकालीन बैठक

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने राम मंदिर के पक्ष में कई कॉन्ग्रेस नेताओं के बयानों के बारे में जानने के बाद बुधवार (अगस्त 5, 2020) को अपने शीर्ष अधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। बता दें कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग केरल में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले UDF का दूसरा सबसे बड़ा घटक है।

पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी सहित कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं ने समारोह के पक्ष में बयान जारी किए हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने घर पर हनुमान चालीसा का आयोजन किया। प्रियंका गाँधी ने अपने बयान में कहा कि कार्यक्रम भगवान राम के आशीर्वाद से हो रहा है। उन्होंने आगे कहा, “भगवान राम की कृपा से यह कार्यक्रम उनके संदेश को प्रसारित करने वाला राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का कार्यक्रम बने।”

कॉन्ग्रेस नेताओं के इस तरह के बयान से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेताओं के बीच असंतोष पैदा हो गया है। वरिष्ठ सांसद पीके कुन्हालीकुट्टी और पार्टी सुप्रीमो पणक्कड़ हैदराली शिहाब थंगल उन नेताओं में शामिल हैं जो आपात बैठक में भाग लेने जा रहे हैं। बुधवार को अयोध्या में भूमि पूजन के समापन तक बैठक का परिणाम सामने आ जाएगा।

केरल में कॉन्ग्रेस और IUML का गठबंधन

कॉन्ग्रेस ने केरल में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रोड शो में वायनाड में बड़ी संख्या में मुस्लिम लीग (IUML) के झंडे देखे गए। सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए थे, जहाँ आईयूएमएल के झंडे लहराते हुए देखे गए थे। कॉन्ग्रेस पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन में है, जो जमात-ए-इस्लामी और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) के साथ गठबंधन में है। बता दें कि इन दोनों ही पार्टी पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने केरल में कट्टरपंथ फैलाने का आरोप लगाया है।

राहुल गाँधी जब अपना नामांकन दाखिल करने के लिए वायनाड गए थे तो इस दौरान IUML के सदस्यों ने नरेंद्र मोदी को गाली देते हुए रैलियाँ निकालीं थी। वायनाड यात्रा के दौरान IUML के सदस्यों को “S*ala K*tta नरेंद्र मोदी” चिल्लाते हुए सुना गया।

IUML की पृष्ठभूमि

बता दें कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), जो 1948 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद अस्तित्व में आने का दावा करती है, वह वास्तव में पाकिस्तान के संस्थापक और इस्लामवादी मोहम्मद अली जिन्ना की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की एक उपशाखा है।

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग द्वारा सफल बनाया गया था। अपनी वेबसाइट में, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का दावा है कि इसका आदर्श वाक्य धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव है, मगर अक्सर इन्हें अपने आदर्श वाक्य के विपरीत काम करते हुए देखा गया है। मुस्लिम लीग ने मुस्लिम बहुल राष्ट्र-राज्य की स्थापना की पुरजोर वकालत की थी।

दिल्ली दंगों को लेकर DU प्रोफेसर अपूर्वानंद से स्पेशल सेल ने 5 घंटे पूछताछ के बाद मोबाइल किया ज़ब्त

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद (Apoorvanand) से सोमवार (अगस्त 03, 2020) को दिल्ली पुलिस ने इस साल फरवरी में राजधानी में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के सिलसिले में पूछताछ की और उनका मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया गया है।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है। दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हिंसा के पीछे की बड़ी साजिश का पता लगाने के लिए UAPA यानी, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत केस दर्ज किया है।

अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं और टीवी चैनलों पर वह अक्सर राजनीतिक विश्लेषक भी भूमिका में भी नजर आते रहे हैं। उन्होंने CAA और NRC के विरोध में बयान दिया था।

ट्विटर पर शेयर किए गए एक बयान में, DU के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि यह देखना दुखद है कि नागरिकता अधिनियम विरोध प्रदर्शन के समर्थकों को हिंसा का स्रोत माना जा रहा है और उम्मीद करते हैं कि पुलिस निष्पक्ष होकर इस मामले की जाँच करेगी।

टि्वटर पर मंगलवार (अगस्त 02, 2020) को जारी अपूर्वानंद के बयान के अनुसार, “सोमवार को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने मुझे एफआईआर संख्या-59/20 की जाँच के सम्बन्ध में हाजिर होने के लिए कहा था। यह शिकायत उत्तरी दिल्ली में इसी साल फरवरी में हुई हिंसा से जुड़ी थी। मैंने वहाँ पाँच घंटे बिताए। दिल्ली पुलिस को जाँच के लिए मेरा फोन जब्त करना भी ठीक लगा, सो उन्होंने किया।”

फरवरी माह में दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को लेकर स्पेशल सेल ने हाल ही में जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद से भी लगभग 5 घंटे पूछताछ की थी, जिसके बाद उमर खालिद का मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया था।

उमर खालिद का नाम दिल्ली दंगों की जाँच कर रही क्राइम ब्रांच की जाँच में भी सामने आया था। क्राइम ब्रांच ने दिल्ली दंगों को लेकर दायर चार्जशीट में ये बात लिखी थी कि उमर खालिद, खालिद सैफ़ी और ताहिर हुसैन की दिल्ली दंगों को लेकर शाहीन बाग में मुलाकात हुई थी। ज्ञात हो कि दिल्ली हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।