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महाराष्ट्र: 2 महीने से नहीं मिली थी सैलरी, सरकारी कर्मचारी ने की आत्महत्या

महाराष्ट्र में कोरोना वायरस का विस्फोट जारी है। इसका असर अब लोगों पर भी पड़ने लगा है। महामारी के चलते सैलरी नहीं मिलने की वजह से बड़ी संख्या में लोग डिप्रेशन से ग्रस्त हो रहे हैं। राज्य परिवहन निगम के एक कर्मचारी ने पिछले दो महीनों की सैलरी नहीं मिलने के कारण आत्महत्या कर ली है।

इस्लामपुर पुलिस के अनुसार, अमोल माली एसटी के इस्लामपुर डिपो के मैकेनिक विभाग में काम कर रहा था। कोरोनोवायरस संक्रमण के कारण लगाए गए लॉकडाउन में एसटी यातायात कुछ हद तक बंद है। इस दौरान एसटी कर्मचारियों को उनका उचित वेतन नहीं मिला। वहीं काम के अनुसार वेतन नहीं मिलने के कारण अमोल काफी दिनों से परेशान था।

रिपोर्ट के अनुसार, 35 वर्षीय अमोल ढोंडीराम माली ने गुरुवार (30 जुलाई, 2020) की देर रात फाँसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी। वह सांगली जिले के इस्लामपुर डिपो में काम करता था। पिछले 2 महीने से वेतन न मिलने के कारण वह काफी तनाव में था।

अमोल दिन-रात सिर्फ इसी चिंता में डूबा रहता था कि कैसे इस लॉकडाउन में अपने परिवार का पालन-पोषण करेगा। वह पिछले 2 महीने से मजदूरों की तरह काम कर रहा था। लेकिन सैलरी नहीं मिलने की वजह से वह दिनभर परेशान रहता था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अपनी माँ, पत्नी, पाँच साल का बेटा और तीन साल की बेटी का भरण-पोषण न कर पाने की वजह से हताश हो चुका था। इसी कारण आखिरकार उसने आत्महत्या कर ली।

इससे पहले यह खबर आई थी कि न केवल महाराष्ट्र सरकार के कर्मचारी, डॉक्टरों और नर्सों का वेतन भी महाविकास अघाड़ी सरकार द्वारा काफी देर से दिया गया था। इस वजह से कई डॉक्टर और नर्स वापस अपने घर केरल चले गए थे। उन्होंने यह आरोप लगाया था कि बीएमसी द्वारा लगातार उनकी सैलरी समय पर नहीं दी जा रही।

गौरतलब है कि, कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन की वजह से राज्य को आर्थिक रूप से काफी नुकसान हुआ है। इस वक्त राज्य के एक बड़े वर्ग को आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है। लेकिन इसी दौर में जहाँ एक तरफ महाराष्ट्र सरकार अपने कर्मचारियों को सैलरी नहीं दे पा रही है और स्वास्थ्य देखभाल संसाधनों के लिए अन्य राज्यों से अनुरोध कर रही है, वहीं ऐसे गंभीर हालातों में राज्य सरकार ने हाल ही में अपने मंत्रियों के लिए 6 नए लक्जरी वाहनों की खरीद की इजाजत दी थी।

उल्लेखनीय है कि उद्धव ठाकरे सरकार ने यह मँजूरी ऐसे समय में दी है, जब राज्य कोरोना वायरस महामारी के चलते हुए लॉकडाउन की वजह से आर्थिक संकट से जूझ रहा है।

राज्य सरकार ने लोअर परेल मुंबई, मधुबन मोटर्स प्राइवेट लिमिटेड से 22,83,086 रुपए की इनोवा क्रिस्टा 2.4 ZX (7 सीट) की खरीद के लिए अपनी मँजूरी दी थी। यह बात ध्यान देने लायक है की सरकार ने खरीद की सीमा 20 लाख रुपए रखी थी,। जो इस माड़ में निर्धारित राशि से ज्यादा थी। इसके बाद नई गाड़ी के लिए वित्त विभाग की राज्य स्तरीय वाहन समीक्षा समिति और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विशेष रूप से इसकी मँजूरी दी थी।

पूर्व सपा नेता अमर सिंह का निधन: मणिशंकर अय्यर को पटक के पीटा था, लगाया था नाम में चौकीदार

समाजवादी पार्टी के पूर्व दिग्गज नेता रहे अमर सिंह का निधन हो गया है। वो लम्बे समय से किडनी से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित थे। अमर सिंह समय-समय पर अम्बानी, बच्चन और मुलायम परिवार के बेहद करीबी रहे हैं। उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव से पहले अपने नाम में न सिर्फ़ चौकीदार लगा लिया था बल्कि अपना जीवन नरेंद्र मोदी को समर्पित करने की भी बात कही है। उनके निधन के बाद कई नेताओं ने दुःख जताया।

अमर सिंह विभिन्न वजहों से कई बार विवादों में भी रहे। एक बार उन्होंने एक वाकया सुनाया था कि कैसे उन्होंने 1999 में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की पिटाई की थी। मणिशंकर अय्यर ने उन्हें अवसरवादी कहा था और शराब के नशे में कुछ भी बकने का आरोप लगाया था। जब अय्यर ने उन्हें माँ की गाली दी और मुलायम को भी गाली दी तो उन्होंने वहीं पटक कर अय्यर की पिटाई कर दी।

64 वर्षीय राज्यसभा सांसद अमर सिंह का निधन सिंगापुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान हुआ। सोशल मीडिया के माध्यम से उन्होंने ईद की शुभकामनाएँ भी दी थीं और साथ ही बाल गंगाधर तिलक की 100वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया था। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के निधन पर दुःख जताते हुए कहा कि स्वभाव से विनोदी अमर सिंह की सार्वजनिक जीवन के दौरान सभी दलों में मित्रता थी।

आपने गोली चलवा कर हज़ारों कारसेवकों को क्यों नहीं मरवाया?: NDTV चाहता था बिछ जाए रामभक्तों की लाश

दिसंबर 1992 में उत्तर प्रदेश में विवादित ढॉंचे का ध्वंस के बाद कल्याण सिंह को अपनी सरकार गँवानी पड़ी थी। भले ही उनकी सरकार चली गई और बाद में कुछ कारणों से वे भाजपा से सस्पेंड भी किए गए, लेकिन राम मंदिर पर उनका स्टैंड ज्यों का त्यों रहा। एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी को दिसंबर 2009 में दिए गए इंटरव्यू में भी ये साफ़ झलकता है। यही वो इंटरव्यू है, जिससे पता चलता है कि किस कदर एनडीटीवी रामभक्तों की लाशों पर ठहाके लगाना चाहता था।

बुधवार (अगस्त 5, 2020) को राम जन्मभूमि अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर का भूमिपूजन कार्यक्रम है। इसमें कल्याण सिंह भी मौजूद रहेंगे। कल्याण सिंह का रुख आज भी वही है, लेकिन एनडीटीवी भी नहीं बदला है। कल को विजय त्रिवेदी रामभक्तों की लाश देखना चाहते थे, अब रवीश कुमार राम मंदिर से खार खाए बैठे हैं। आइए, आपको बताते हैं कि क्या था उस इंटरव्यू में।

दरअसल, विजय त्रिवेदी इस बात पर कल्याण सिंह को घेरने में लगे हुए थे कि आखिर ढाँचा गिरने के बाद उन्होंने उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की, जिनके रहते ये सब हुए। आखिर पुलिस अधिकारियों ने गोली चलाने का निर्देश क्यों नहीं दिया? त्रिवेदी के शब्दों का अर्थ ये था कि रामभक्तों पर गोली चला कर उनका कत्लेआम क्यों नहीं मचाया गया, वो भी एक विवादित ढाँचे को बचाने के लिए।

इस पर कल्याण सिंह ने उन्हें ये बता कर सन्न कर दिया कि उन्होंने ही अधिकारियों को सख्त आदेश दिए थे कि वहाँ जुटे लोगों पर गोली न चलाई जाए, जिसका उन्होंने पालन किया। सारा दोष अपने ऊपर लेते हुए कल्याण सिंह ने अधिकारियों को पाक-साफ़ बताया। इसके बाद एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी ने उन्हें जो सलाह दी, वो न सिर्फ़ चैनल की हिन्दूघृणा की सोच को दर्शाता है, बल्कि राम मंदिर के प्रति उसकी घृणा को भी दिखाता है।

तब एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी ने उन्हें कहा कि आखिर कल्याण सिंह ने गोली न चलवा कर हजारों लोगों के मारे जाने के बदले करोड़ों लोगों को बाँटने का फैसला कैसे ले लिया? यानी, एनडीटीवी अपनी एक धारणा के बदले हज़ारों रामभक्तों की लाश चाहता था। त्रिवेदी ने ये धारणा बना ली थी थी ‘लोग बँट गए’। बस इसके लिए हज़ारों श्रद्धालुओं की लाशें बिछा दी जाएँ, ऐसा उनका सोचना था।

एनडीटीवी के इस इंटरव्यू में विजय त्रिवेदी बार-बार इसी बात पर कल्याण सिंह को घेरने की कोशिश करते हुए नज़र आए कि आखिर उन्होंने कारसेवकों पर गोली क्यों नहीं चलवाई? हज़ारो लोगों के मरने’ की बात वो इतनी आसानी से कह रहे थे, जैसे कि वो सभी आतंकवादी हों। जबकि वे सभी आमजन थे। यही एनडीटीवी आतंकियों और नक्सलियों को Whitewash करता रहता है।

हालाँकि, सुरक्षा के इंतजाम न रहने के आरोपों और खुद के मजबूत मुख्यमंत्री की छवि पर उठे सवालों का जवाब में उदाहरण गिनाते हुए कल्याण सिंह ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति की सुरक्षा के पूरे इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। इंदिरा गाँधी की सुरक्षा के पूरे इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। राजीव गाँधी की सुरक्षा के पक्के इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। उन्होंने इसे राष्ट्रीय गर्व का दिन भी करार दिया।

बता दें कि 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढाँचा गिराए जाने के 10 दिन बाद गृह मंत्रालय ने लिब्राहन आयोग का गठन किया था। इस आयोग को ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल लोगों का नाम सामने आए। इस आयोग ने लगभग 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें कल्याण सिंह को अहम किरदार बताया था। कोर्ट की सुनवाई इस मामले में अभी तक चल रही है।

राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के तुरंत बाद भी उन्होंने कहा था कि अयोध्या करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्रबिंदु है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होता है तो इससे करोड़ों भारतीयों की इच्छा पूरी होगी। दोबारा बीजेपी का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को राम मंदिर मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कहा था। अब वे 5 अगस्त को भव्य राम मंदिर भूमि पूजन के साक्षी बनेंगे।

बकरीद के लिए घर लौट रहे पश्तून मजदूरों पर पाकिस्तान ने किया हमला, कई की मौत

अफगानिस्तान सीमा पर बलूचिस्तान स्थित चमन सीमा (Chaman Border) चौकी पर पाकिस्तानी रेंजर्स की गोलीबारी में करीब 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि 80 से ज्यादा लोग घायल हो गए।

घटना बृहस्पतिवार (जुलाई 30, 2020) को तब घटी जब चमन-स्पिन बोल्डक सीमा पार से लगभग 150 लोग पाकिस्तानी सीमा पर एकत्र हुए। उनमें से कई ईद के लिए अफगानिस्तान में प्रियजनों से मिलने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन सीमा को बंद कर दिया गया था।

अफगान अधिकारियों ने शुक्रवार (जुलाई 31, 2020) को कहा कि पाकिस्तान ने अपनी दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर रॉकेटों से गोलाबारी की, जिसमें कई लोगों की जानें गई हैं और 80 से अधिक लोग घायल हो गए। पाकिस्तान ने कहा कि अफगान सीमा रक्षकों ने पहले गोलीबारी की और इस हमले के लिए उन्हें दोषी ठहराया है।

बृहस्पतिवार को भारी संख्या में लोग यहाँ फ्रेंडशिप गेट पर धरने पर बैठ गए और सीमा चौकी को खोलने की माँग करने लगे। इस पर वहाँ मौजूद पाकिस्तान के कर्मचारियों ने कहा कि जब तक प्रदर्शनकारी इस जगह से नहीं चले जाते, गेट नहीं खोला जाएगा। इस बात पर प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए और वे फ्रेंडशिप गेट पर फ्रंटियर कोर और अन्य सरकारी एजेंसियों के कार्यालयों पर हमला करने लगे। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी प्रतिक्रिया में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं।

सीमा पर तनाव बढ़ने के कारण अफगानिस्तान ने अपनी आर्मी और एयरफोर्स को भी हाई अलर्ट पर कर दिया है। जुलाई माह की शुरुआत में ही, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्वी कुनार प्रांत में रॉकेट दागे, जिसमें तीन लोग मारे गए थे।

पाकिस्तान 1893 में औपनिवेशिक काल के विभाजन को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि अफगानिस्तान ने कभी सीमा को मान्यता नहीं दी है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही एक-दूसरे पर अपने दुश्मनों को शरण देने का आरोप लगाते आए हैं। पाकिस्तान का कहना है कि उसे आतंकवादियों को पार करने से रोकने के लिए बाड़ की आवश्यकता है।

पाकिस्तान का कहना है कि पाकिस्तानी विद्रोही, जैसे कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी, जिसने जून में कथित तौर पर दक्षिणी बंदरगाह शहर कराची में स्टॉक एक्सचेंज बिल्डिंग पर हमला किया था, अफगानिस्तान के दक्षिणी कंधार प्रांत में छिपे हुए हैं।

ज्ञात हो कि चमन सीमा चौकी को मार्च से ही कोरोना वायरस महामारी के चलते बंद था। बकरीद को लेकर गत बुधवार को इसे खोला गया था, ताकि दोनों तरफ के लोग अपने मूल स्थानों पर जा सकें।

पाकिस्तान में रहने वाले कई पश्तून, अफगानिस्तान में मजदूरों के रूप में काम करते हैं, काम के लिए सीमा पार करते हैं और रात में घर लौटते हैं।

सोशल मीडिया पर इस हमले की भयानक तस्वीरें शेयर की जा रही हैं और मरने वालों की संख्या के अलग-अलग दावे भी किए जा रहे हैं। तस्वीरों में हताहतों के बीच छोटे मासूम बच्चे भी देखे जा सकते हैं। लोगों ने इन तस्वीरों की तुलना सीरियाई बच्चे एलेन कुर्दी से की है।

14000 फीट की ऊँचाई, LOC से सटे 3 गाँव: आजादी के 73 साल बाद बिजली से होंगे रौशन

साल के 6 महीने भारी बर्फबारी के कारण देश से कटे रहने वाले कश्मीर के तीन गाँवों को आजादी के 73 साल बाद अब बिजली मिल सकी है। पाकिस्तानी गोलाबारी के कारण साल के कई मौकों पर तनाव के साए में रहने वाले इन गाँवों में अब उम्मीद का बल्ब जलने को तैयार है।

14000 फीट की ऊँचाई पर रहने वाले इस इलाके में अब तक लोग सोलर पावर या जेनसेट्स के जरिए बिजली की व्यवस्था कर पाते थे, लेकिन अब यहाँ इलेक्ट्रिफिकेशन होने के साथ ही पावर सप्लाई का रास्ता सुनिश्चित हो सका है।

बिजली पहुँचने से रौशन हुए ये गाँव उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में स्थित हैं। नियंत्रण रेखा के संवेदनशील हिस्से में आने वाले गाँव केरन, मुंदियाँ और पतरू गाँव में एक 33केवी के पावर स्टेशन से बिजली पहुँचाई गई है।

दो साल में पूरा हुए इस प्रोजेक्ट को कश्मीर पावर डिस्ट्रिब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने पूरा किया है। केरन के जिस गाँव में बिजली पहुँचाई गई है, वह नियंत्रण रेखा से महज 500 मीटर की दूरी पर है। इस प्रोजेक्ट में 979 यूटिलिटी पोल लगाए गए हैं।

केपीडीसीएल के एमडी मोहम्मद एजाज असद ने कहा कि प्रोजेक्ट को लॉकडाउन के कारण तेजी से पूरा किया जा सका है। एजाज असद ने कहा कि ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र में इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में तमाम भौगोलिक मुश्किलें भी आईं।

इसके बावजूद तमाम पर्वतीय क्षेत्रों में हाइटेंशन तार और यूटिलिटी पोल्स लगाए गए। एजाज असद ने कहा कि चूँकि ये सारा प्रोजेक्ट डिफेंस लैंड पर पूरा किया जाना था, ऐसे में तमाम विभागीय अप्रूवल लेने के बाद ही प्रोजेक्ट को पूरा किया गया।

अधिकारियों ने बताया कि इस इलाके में अब तक सोलर पावर या डीजल इंजन के जरिए बिजली पहुँचती थी। अब इस हिस्से में इलेक्ट्रिफिकेशन का काम पूरा करने के बाद काम आसान हो गया है। इस इलाके के किसानों का कहना है कि कश्मीर के हिस्से में 24 घंटे बिजली का सपना अब भी हकीकत से बहुत दूर है। हालाँकि इसकी उम्मीद की जा सकती है कि बिजली पहुँचने से इस इलाके में रोजगार और संभावनाओं के रास्ते खुलेंगे।

गौरतलब है कि इससे पहले केंद्र सरकार की ‘सौभाग्य योजना’ के तहत दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ जिले के केल्लर (Kellar) क्षेत्र के कई दूरदराज के गाँवों में आजादी के लगभग सत्तर साल बाद बिजली पहुँची थी। इसके लिए क्षेत्र में पाँच ट्रांसफार्मर लगाए गए और महज सात दिनों के भीतर चालू कर दिए गए, जिसके बाद इलाके में बिजली पहुँच गई।

इलाके में पहली बार बिजली पहुँचने पर सहायक कार्यकारी अभियंता, बिजली विकास विभाग (पीडीडी) फारूक अहमद ने कहा था, “केल्लर, शोपियाँ के ये सुदूर इलाके सदियों से ही गैर-विद्युतीकृत गाँव थे और केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित ‘सौभाग्‍य योजना’ के तहत हमने पाँच ट्रांसफार्मर बनाए थे। बाद में ये सात दिनों के भीतर चालू कर दिए और केलरी शोपियाँ के इन गाँवों में बिजली की आपूर्ति की गई।”

बकरीद हिंदुओं का त्योहार होता तो कैसा होता लिबरल मीडिया और सेलेब्स का रिएक्शन: 10 तस्वीरों से समझें

शनिवार (अगस्त 1, 2020) को बकरीद का मनाया जा रहा है और दुनिया भर में मजहब विशेष के लोग इस दिन लाखों जानवरों को काटने में मशगूल हैं। ये पहली बार नहीं हो रहा। बकरीद पर हमेशा ऐसा ही होता आ रहा है जब लाखों निर्दोष जानवरों की जान जाती है। PETA समेत तमाम पशु अधिकार संगठन तब अपनी आँख मूँदे रहते हैं और चूँ तक नहीं करते। लेकिन, बकरीद अगर हिन्दुओं का त्योहार होता तब?

इस देश में हिन्दुओं को हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहराने और उन्हें फालतू ज्ञान देने वालों की भीड़ लगी हुई है। भले ही अधिकतर हिन्दू शाकाहार का पालन करते हों, जानवरों को न मारने का ज्ञान उन्हें ही दिया जाएगा। भले ही उनके त्योहारों में हिंसा वर्जित हो, अहिंसा का पाठ उन्हें ही पढ़ाया जाएगा। भले ही आठ-आठ बच्चे किसी और मजहब के लोग पैदा कर रहे हों, लेकिन ठीकरा हिन्दुओं पर ही फोड़ा जाएगा।

होली पर हिन्दुओं को पानी बचाने की सलाह दी जाती है। महाशिवरात्रि पर कहा जाता है कि शिवलिंग पर दूध मत चढ़ाओ। गणेश चतुर्थी के दौरान जल प्रदूषण पर बात किया जाता है। दीवाली पर पटाखे न फोड़ने की सलाह दी जाती है। होली पर तो सीमेन भरे बैलून तक की अफवाह फैलाई गई और हिन्दुओं को बदनाम किया गया। लेकिन, इस्लामी त्योहारों के दौरान लाख गलतियाँ हों लेकिन इन सेलेब्रिटीज की घिग्घी बँध जाती है।

उस दिन ये सेलेब्रिटीज लोगों को बधाइयाँ देते हैं, सोशल मीडिया पर खुशियाँ मनाते हैं, लेकिन, सोचिए कि अगर बकरीद कोई हिन्दू त्योहार होता तब क्या होता? क्या तब जीवहत्या के ठेकेदार कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होकर हिन्दुओं को गाली नहीं दे रहे होते? क्या तब सारे एनजीओ, पत्रकार, सेक्युलर-लिबरल गैंग और सेलेब्स का समूह हिन्दुओं की आलोचना में नहीं लगा रहता? इन 10 चित्रों में समझिए अगर बकरीद हिन्दू त्योहार होता तो क्या होता?

अगर बकरीद हिन्दुओं का त्योहार होता तो प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में जीवहत्या के खिलाफ याचिका डालते और आधी रात को सुनवाई भी हो रही होती:

गणेश जी की मूर्ति के साथ कोई कोटेशन लगा कर ज्ञान बाँटा जा रहा होता:

पश्चिम बंगाल में तो सरकार जीवहत्या पर त्वरित प्रतिबन्ध लगा देती:

स्वरा भास्कर को हिन्दू और हिंदुस्तानी होने में शर्म आ रही होती:

असदुद्दीन ओवैसी बरखा दत्त को बयान दे रहे होते कि अगर जीवहत्या हिन्दुओं के धर्म का हिस्सा है तो उन्हें नया धर्म अपना लेना चाहिए:

‘द प्रिंट’ में एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय का बयान आता कि जीवहत्या के अलावा भी बकरीद में कई बुराइयाँ हैं और ये पुरुष-प्रधान त्योहार है:

कॉमेडियन कुणाल कामरा हिन्दुओं को अत्याचारी और क्रूर बताते भारत का नक्शा शेयर कर बताता कि बकरीद के दौरान कितना खून बहता है:

‘स्क्रॉल’ ओपिनियन लिख कर हिन्दुओं को ज्ञान दे रहा होता:


मजहबी मुल्कों का समूह बकरीद की आलोचना कर रहा होता:

इतिहासकार रामचंद्र गुहा पाकिस्तान की तारीफ करते हुए हिन्दुओं की आलोचना कर रहे होते:

नोट: सभी को ईद की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। ये लेख इसीलिए है ताकि पता चले कि जो लिबरल लोग हिन्दुओं को ज्ञान देते रहते हैं वो कितने दोहरे रवैये वाले हैं और उनकी सारी आलोचना और गालियाँ एक ही समुदाय के लिए हैं, जिसे वो बार-बार निशाना बनाते रहते हैं। मेरा किसी को भी ठेस पहुँचाने का कोई इरादा नहीं है। ये लेख ‘लिबरल’ ब्रीड के लिए है।

भक्त बनकर आए आतंकी, रामलला से मात्र 50 मीटर की दूरी पर मचाई तबाही: 5 अगस्त से पहले 5 जुलाई की दास्ताँ

राम जन्मभूमि अयोध्या में अब एक भव्य मंदिर बनने जा रहा है। इसकी नींव बुधवार (अगस्त 5, 2020) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भूमिपूजन के साथ रखी जाएगी। इसी बीच इस्लामी कट्टरपंथी आतंकियों द्वारा अयोध्या में हमले की साजिश रचने की भी ख़ुफिया सूचना आई है। इसे देखते हुए कई राज्यों को अलर्ट कर दिया गया। क्या आपको याद है कि 5 जुलाई 2005 को भगवान राम की नगरी में आतंकियों ने कत्लेआम मचाया था?

जैसा कि हमने कई बार देखा है, कपटवेश में आकर अपने खूनी इरादों को अंजाम देना आतंकियों की पुरानी चाल रही है। कभी वो सेना की वर्दी में आते हैं तो कभी आम नागरिक बन कर छलावा देते हैं। इन आतंकियों ने अयोध्या में भी उस दिन यही किया था। उन्होंने श्रद्धालुओं की वेशभूषा में वहाँ पहुँचने में कामयाबी पाई थी। वो रजिस्ट्रेशन वाली एक जीप में बैठ कर आए थे, जिसमें लगा झंडा किसी राजनीतिक दल का प्रतीत होता था।

सुरक्षा के नाम पर वहाँ लोहे की फेंसिंग भर की हुई थी। चूँकि धर्मस्थानों में पहले और जल्दी दर्शन के लिए श्रद्धालु उतावले रहते हैं, इसीलिए पहली नज़र में सभी को यही लगा कि ये श्रद्धालुओं की ही गाड़ी है जो थोड़ी जल्दी में हैं। लेकिन, इससे पहले कि महिंद्रा मार्शल जीप में बैठे आतंकियों को रोका जाता, वो उससे उतर गए। बम से लैस उस जीप को राख होने में पल भर का भी समय नहीं लगा। चारों और अफरातफरी मच गई।

पाँच आतंकियों ने इसके बाद हमले की पोजीशन बना कर सुरक्षा बलों पर ग्रेनेड फेंकना शुरू कर दिया। साथ ही वो एके-47 से लगातार फायरिंग भी कर रहे थे। लगभग डेढ़ घंटे तक फायरिंग चलते रही और उसके बाद पाँचों आतंकी मार गिराए गए। लेकिन, उससे पहले उन्होंने तबाही का मंजर दिखाते हुए वो डर पैदा किया, जिसने जनता को एहसास दिलाया कि अब भारत में शायद ही कोई जगह सुरक्षित हो।

ये जुलाई 5, 2005 की सुबह थी, जिसने पूरे भारत में भय का माहौल पैदा कर दिया था। आतंकियों ने सोच-समझ कर अयोध्या को निशाना बनाया था, क्योंकि उन्हें पता था कि ये वो जगह है, जहाँ से दुनिया भर के हिंदुओं की आस्था तो जुड़ी ही हुई है, साथ ही यहाँ एक पत्ता भी खड़के तो ये पूरे देश मे बड़ी ख़बर बनती है। शायद ये हमला एक चेतावनी था, इससे भी बड़ी आतंकी कार्रवाई का।

यही बात तब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कही थी। दूरदर्शी नेता ने कहा था कि आयोध्या हमला एक चेतावनी है, इसीलिए सरकार को सुरक्षा व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रखनी चाहिए। तब नए प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा था कि आतंकवाद पर सरकार कोई समझौता नहीं करेगी। मनमोहन को यही राग पुणे, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद और गया मे होने वाले आतंकी हमलों में भी अलापना था।

तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव, जिन्होंने तो सुरक्षा-व्यवस्था में चूक की सारी बातें ही नकार दी थी। भाजपा नेता जसवंत सिंह ने इसे स्पष्ट रूप से सुरक्षा-व्यवस्था में चूक का मामला मानते हुए उनके इस्तीफे की माँग की थी। ये हमला तब टेंट मे विराजमान रामलला के 50 मीटर की दूरी पर ही हुआ था। सारे आतंकी युवा थे। आखिर वो वहाँ घुस कैसे गए? तब रामलला की सुरक्षा-व्यवस्था की बात करें तो 1400 की संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान गश्त लगाते रहते थे।

13 वाच टॉवर्स को 2 टायर सिक्योरिटी के हिसाब से बनाया गया था। ‘इंडिया टुडे’ की खबर की मानें तो अयोध्या में सुरक्षा-व्यवस्था देखने में ऐसी ही लगती थी, जैसी किसी विमान में चढ़ते समय एयरपोर्ट्स पर होती है। मुलायम सिंह के शब्दों में तो वहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता था, लेकिन इतनी सुरक्षा के बावजूद RDX लदी जीप के साथ हथियारबंद आतंकी मंदिर परिसर में घुसने में कामयाब हो गए थे।

2 स्थानीय लोगों की जान चली गई थी और सीआरपीएफ के 7 जवान घायल हो गए थे। 2005 में प्रयागराज की एक स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में 4 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही उन सभी पर 2.4 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। दोषी आतंकियों में डॉक्टर इरफ़ान, शकील अहमद, आसिफ इकबाल और मोहम्मद नसीम शामिल थे। वहीं मोहम्मद अजीज के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला, वो बच निकला।

इस मामले में उस जीप के ड्राइवर को भी गिरफ्तार किया गया था, जिसने उन आतंकियों को मंदिर तक पहुँचाया था। ड्राइवर रेहान आलम कुछ दूर पहले ही जीप से उतर गया था। उसने पुलिस को दिए बयान में कहा था कि आतंकियों ने कहा था कि वो श्रद्धालु हैं और रामलला के दर्शन करना चाहते हैं। दरअसल, वहाँ आतंकी दो गाड़ियों से पहुँचे थे, जिनमें से एक में आत्मघाती हमलावर सवार था। उसने ही गाड़ी को ब्लास्ट किया था।

इस मामले में स्पेशल कोर्ट को फैसला सुनाने में 14 साल लग गए थे। कुल 371 सुनवाइयों के दौरान 63 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, तब जाकर इस मामले में सज़ा मिली। जहाँ इरफ़ान यूपी के ही सहारनपुर का था, बाकी आरोपित जम्मू-कश्मीर के पूँछ के रहने वाले थे। इनके तार खूँखार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे। आज जब राम मंदिर का सपना साकार होने जा रहा है, हमें इस घटना को याद करने की ज़रूरत है।

बकरीद पर पाकिस्तान में हिंदू कारोबारी की हत्या, राजा किशन पर घर लौटते वक्त किया गया हमला

पाकिस्तान के खैरपुर में बकरीद के मौके पर हिंदू कारोबारी राजा किशन चंद की अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी। राजा किशन चंद सुक्कुर पर यह हमला तब किया, जब वे अपने घर लौट रहे थे।

कुछ दिन पहले ही एक अन्य हिंदू व्यापारी मैनक मल की कार पर कुछ बंदूकधारियों ने गोलियाँ चलाई थी, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं पर आए दिन किसी ना किसी प्रकार का अत्याचार का मामला सामने आ रहा है। अल्पसंख्यक हिन्दू व्यापारी राजा किशन चंद की मौत की जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है। लोगों का कहना है कि इसी कारण भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून की जरूरत थी।

राजा किशन की हत्या को लेकर अभी तक भी मुख्यधारा की मीडिया में कोई चर्चा नहीं है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर लोग उनके लिए न्याय माँग रहे हैं।

गौरतलब है कि पाकिस्तान की केंद्रीय कैबिनेट द्वारा इसी मई 05, 2020 को वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान खान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की गई थी। दावा किया जा रहा था कि पाकिस्तान में इस अल्पसंख्यक आयोग के गठन का प्रमुख उद्देश्य पाकिस्तान में मौजूद अल्पसंख्यकों को धार्मिक स्वतन्त्रता उपलब्ध कराना था।

लेकिन इस आयोग के गठन के बाद भी पाकिस्तान में हिन्दुओं पर होने वाले अपराधों में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। लगभर हर दिन ही पाकिस्तान में हिन्दू नाबालिग लड़कियों के अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्मांतरण और हत्या के मामले सामने आते रहे हैं।

इसके अलावा, पाकिस्तान के सिंध में हिन्दू, पंजाब में ईसाई धर्म और खैबर पख़्तूनख़्वाह का कैलाश समुदाय, जबरन धर्मांतरण की शिकायत पिछले कई वर्षों से करते आया है। यहाँ तक कि मानवाधिकार आयोग समेत ही अन्य संगठन भी इन मामलों की पुष्टि कर चुके हैं।

जम्मू-कश्मीर: अब नहीं बचेंगे देश विरोधी गतिविधियों में शामिल सरकारी कर्मचारी, कार्रवाई के लिए बनी समिति

जम्मू-कश्मीर में देश विरोधी गतिविधियों में शामिल सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए सरकार ने 6 सदस्यीय एक समिति का गठन किया है। इस समिति का गठन गुरुवार (जुलाई 30, 2020) को संविधान के अनुच्छेद 311 (2) (c) के तहत मामलों की जाँच और सिफारिश करने के लिए किया गया।

ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार इस समिति का गठन देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त कर्मचारियों का पता लगाने और उन्हें नौकरी से बर्खास्त करने के लिए किया गया है।

इस पैनल की अध्यक्षता मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रह्मण्यम द्वारा किया जाएगा। इस पैनल में गृह सचिव और पुलिस प्रमुख के अलावा अन्य सदस्य भी शामिल होंगे। समिति उन सभी मामलों की जाँच करेगी, जिनका उल्लेख गृह विभाग और पुलिस द्वारा किया गया है। बताया जा रहा है कि ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय संविधान की धारा 311 के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

खबर है कि पैनल की सिफारिश के आधार पर, देश विरोधी गतिविधियों में शामिल कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा उन सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है, जो इस वक्त हिरासत में हैं।

बता दें, सोशल मीडिया पर फर्जी एकाउंट बनाकर देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाले कर्मचारी भी इस प्रावधान के दायरे में आएँगे। इसके अलावा हिरासत में बंद कर्मचारियों के ऊपर भी ये प्रावधान लागू होगा।

नए प्रावधान के तहत जाँच की जरूरत नहीं

जानकारी के मुताबिक अगर जम्मू-कश्मीर पुलिस, केंद्र शासित प्रदेश की सुरक्षा को खतरे में डालने में शामिल कर्मचारियों के खिलाफ आरोपों को दबाती है, तो ही इन मामलों की जाँच के लिए सामान्य प्रशासन विभाग से सिफारिश की जाएगी।

कथित तौर पर, पुलिस जाँच रिपोर्ट और कोलैटरल सबूत के आधार पर अपने मामले को वापस ले सकते है। इस प्रकार इसमें किसी भी जाँच की आवश्यकता नहीं होगी। विभाग इसके बाद ही निलंबन या बर्खास्तगी का आदेश जारी करेगा।

बता दें कि सरकार को पहले पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासनिक लापरवाही के बारे में कई शिकायतें मिली थीं। मगर राजनीतिक दबाव के कारण, सुरक्षा को खतरे में डालने या सशस्त्र बलों के खिलाफ लोगों को उकसाने के लिए कर्मचारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 1990 में 5 सरकारी कर्मचारियों को देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और अन्य कर्मचारियों के 73 दिन की हड़ताल के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया। इसके अलावा 1993 में एक पुलिस विद्रोह के बाद लगभग 130 पुलिसकर्मियों को निकाल दिया गया था, लेकिन फिर उन्हें फायर विभाग और अन्य सेवाओं में रखा गया था।

बिहार पुलिस को नहीं दी सुशांत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट, रिया चकवर्ती के अंडरग्राउंड होने की अटकलें

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच करने मुंबई पहुँची बिहार पुलिस की टीम को तेजी से सफलता मिल रही है। नए-नए क्लू हाथ लग रहे हैं। लेकिन कदम कदम पर मुंबई पुलिस बिहार पुलिस की जाँच की राह में रोड़े अटका रही है।

अब खबर आ रही है कि जब बिहार पुलिस की टीम आरएन कूपर म्यूनिसिपल हॉस्पिटल में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के पास पहुँची तो डॉक्टरों ने रिपोर्ट से संबंधित कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वो मुंबई पुलिस को सुशांत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट दे चुके हैं। उन्हें इसके बारे में जो भी बात करनी है, वो मुंबई पुलिस से करें। पटना आईजी ने भी इस बात की पुष्टि की कि बिहार पुलिस को अब तक सुशांत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं मिली है।

इससे पहले शुक्रवार (जुलाई 31, 2020) को मुंबई पुलिस ने बिहार पुलिस के साथ शर्मनाक हरकत कर सबको हैरत में डाल दिया था। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें बिहार पुलिस ने जब मीडिया से बात करनी चाही तो मुंबई पुलिस ने बात करने से रोक दिया और उन्हें तेजी से धक्का देते हुए पुलिस वैन में बैठा दिया।

मामला सामने के बाद बिहार से लेकर मुंबई तक हलचल मच गई। इसी बीच सीएम उद्वव ठाकरे ने कहा कि मुंबई पुलिस अपना काम कर रही है। उन्होंने कहा, “अगर किसी के पास इस मामले को लेकर कोई सबूत है तो मुझे दे। उसके आधार पर आरोपितों से पूछताछ की जाएगी और दोषियों को सजा भी दी जाएगी। इस मामले को बेवजह बिहार और महाराष्ट्र के बीच झगड़े का विषय न बनाएँ।”

बताया जा रहा है कि बिहार पुलिस को जाँच के दौरान रिया के खिलाफ कई अहम सबूत मिले हैं। आगे भी पुलिस ठोस सबूत जुटाने में लगी है। पुलिस ने बैंक से दस्तावेज भी लिए हैं जो रिया से जुड़े अहम सबूत हो सकते हैं। अब जल्द ही बिहार पुलिस कोर्ट में रिया की गिरफ्तारी के लिए अर्जी लगाकर रिया के नाम का वारंट ले सकती है। पुलिस रिया की तलाश में है जो अपने परिवार संग अपना ठिकाना बदल रही है। खबर है कि रिया परिवार के साथ अंडरग्राउंड हो गई हैं।

भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्स्वामी ने भी पीएमओ को पत्र लिखकर अभिनेता के मौत की सीबीआई जाँच का अनुरोध किया था। इसके साथ ही सुशांत की बहन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्याय की गुहार लगाई है। 

गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के केस में उस वक्त नया मोड़ आ गया जब सुशांत के पिता केके सिंह ने पटना के राजीव नगर थाने में रिया चक्रवर्ती समेत 4 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई।

इसके बाद बिहार पुलिस की एक विशेष टीम सुशांत सिंह राजपूत के केस की जाँच करने के लिए मुंबई पहुँच गई।हालाँकि टीम के पहुँचने के बाद से ही ऐसी खबरें आ रही हैं कि मुंबई पुलिस उनका सहयोग नहीं कर रही है।