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22 लोगों के लिए नौकरी, सब सीट पर खास समुदाय की भर्ती: पश्चिम बंगाल या पाकिस्तान का ऑफिस? – Fact Check

इन दिनों सोशल मीडिया पर पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य विभाग का एक सर्कुलर वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में 22 लोगों की वैकेंसी में से सभी सीटों पर सिर्फ समुदाय विशेष के अभ्यर्थियों के ही नाम हैं। व्हाट्सएप पर वायरल हो रहे इस फोटो में ममता सरकार को घेरते हुए सवाल भी किया जा रहा है कि 22 में से 22 सीटों पर खास समुदाय ही क्यों? ये पश्चिम बंगाल का ऑफिस है या फिर पाकिस्तान का?

व्हाट्सएप पर वायरल हो रहा पेज

हम बताते हैं आपको कि वायरल हो रहे इस फोटो की सच्चाई क्या है और क्यों ममता बनर्जी सरकार पर इस तरह से सवाल उठाए जा रहे हैं। दरअसल पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य विभाग के एक सर्कुलर में विभिन्न पदों पर चयनित हुए अभ्यर्थियों के नाम, पोस्ट और रिपोर्टिंग की तारीख एवं तिथि अंकित की गई है।

सच क्या है?

70 सीटों पर की गई यह वैकेंसी पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले की है। यह सर्कुलर 8 जुलाई 2020 को जारी किया गया था। इसमें स्टाफ नर्स (NUHM) और कई विभागों में लैब टेक्नीशियन से लेकर कुक एवं मेडिक ऑफिसर के पद पर अभ्यर्थियों का चयन किया गया है। इन्हें 17 जुलाई 2020 को रिपोर्ट करना है।

गौर करने वाली बात यह है कि 70 सीटों की वैकेंसी में से 26 सीटों पर मजहब विशेष के कैंडिडेट का चयन हुआ है। यानी कुल वैकेंसी में से 37.14% पर समुदाय विशेष के कैंडिडेट का सेलेक्शन हुआ है। बाकी सीटों पर अन्य धर्म के लोगों के नाम हैं।

बता दें कि सोशल मीडिया पर जो पेज वायरल हो रहा है, उसमें 22 के 22 सीटों पर जिन लोगों का चयन हुआ है, वो सब समुदाय विशेष के हैं। इसलिए ऐसा दावा किया जा रहा है कि वहाँ सभी सीटों पर सिर्फ समुदाय विशेष के अभ्यर्थियों का ही चयन हुआ है। लेकिन यह जानकारी आधी-अधूरी है।

जब हम आधिकारिक सर्कुलर को देखते हैं तो पाते हैं कि इसके अलावा भी अन्य पेज पर 4 समुदाय विशेष के कैंडिडेट के नाम हैं। और ये सारे के सारे OBC-A (OBC क्रीमी लेयर) कैटेगरी में हैं। लोगों ने इसी पेज को वायरल कर ममता सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।

जारी किए गए सर्कुलर का एक पेज यह भी है

आखिर क्यों उठ रहे सवाल

अगर हम इन आँकड़ों के साथ पश्चिम बंगाल की जनसंख्या और वहाँ पर खास समुदाय के प्रतिशत पर गौर करें तो ये बातें वाकई सोचने पर मजबूर करती हैं। आपको बता दें कि 2011 के जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले की जनसंख्या 5,167,600 थी। जिसमें से 1382682 यानी कुल जनसंख्या का 26.76 % मजहब विशेष की आबादी है। जबकि हिंदुओं का प्रतिशत 72.15 है।

72.15 फीसदी हिंदुओं के बावजूद दूसरे समुदाय के तकरीबन 27 फीसदी लोगों में से 37.14 फीसदी सीटों पर समुदाय विशेष के छात्रों का चयन हो जाता है। अगर इनका चयन आरक्षण के आधार पर किया गया है तो भी यह सवालों के घेरे में है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में सरकारी नौकरी में समुदाय विशेष को 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। और यहाँ तो समुदाय विशेष के 37 फीसदी को नौकरी दी जा रही है।

एक बात और जो नागवार गुजर रही है, वो ये कि यह कैसे संभव है कि OBC-A (OBC क्रीमी लेयर) कैटिगरी में सिर्फ खास समुदाय वाले ही सेलेक्ट हुए? उसमें किसी अन्य जाति के एक भी लोग क्यों नहीं हैं? ये तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तानाशाही बढ़ती ही जा रही है। ममता बनर्जी की वोट बैंक की राजनीति के कारण बंगाल के कई इलाके मजहब विशेष बहुल हो चुके हैं और हिंदुओं का इन इलाकों में जीना भी दूभर हो गया है।

राज्य में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है। अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसंख्या का समीकरण बदल दिया है। उन्हें सियासत के चक्कर में देश में वोटर कार्ड, राशन कार्ड जैसी सुविधाएँ मुहैया करवा दी जाती हैं और इसी आधार पर वे देश की आबादी से जुड़ जाते हैं। बांग्लादेश के रास्ते पहले इन्हें पश्चिम बंगाल में प्रवेश दिलाया जाता है। फिर उनका राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर कार्ड बनवा जम्मू से केरल तक पहुँचा दिया जाता है।

40 वर्षों से अधिक वामपंथी वर्चस्व के राज्य में हिन्दुओं की आबादी कुछ क्षेत्रों में लगातार घटती गई जहाँ से हिन्दुओं को पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया गया। 24 परगना, मुर्शिदाबाद, बिरभूम, मालदा आदि ऐसे कई उदाहरण सामने हैं। हालात तब ज्यादा बिगड़ने लगे हैं जबकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थी भी राज्य में डेरा जमाए हुए हैं।

राज्य में हिन्दू आबादी का संतुलन बिगाड़ने की साजिश लगातार जारी है। और अभी भी ममता सरकार दूसरे समुदाय को अधिक से अधिक मौका देकर उन्हें खुश करना चाहती हैं। वोट बैंक के दम पर ही वो शासन करती आई हैं, तो ऐसे में उनके पास तुष्टिकरण के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है।

यूपी में शनिवार-रविवार लॉकडाउन, रोज 50000 टेस्ट: कोरोना पर काबू पाने का योगी सरकार का प्लान

कोरोना संक्रमण को बढ़ते मामलों को देखते हुए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राज्य में हर हफ्ते राज्य में दो दिन का लॉकडाउन रखने का फैसला किया है। शुक्रवार को शुरू हुए 55 घंटे के लॉकडाउन के बाद यह फैसला किया गया है।

इसके अनुसार प्रदेश में सोमवार से शुक्रवार वर्किंग डे होगा। शनिवार और रविवार को बाजार, मॉल, मंडी, गैर जरूरी ऑफिस बंद रहेंगे। हालाँकि आर्थिक गतिविधियाँ (बैंक) और रोजमर्रा के जरूरत की दुकानें खुली रहेंगी।

योगी सरकार की और से जारी दिशा-निर्देश में कहा गया;

  • सोमवार से शुक्रवार दुकानें खोलने का आदेश दिया गया है। शनिवार और रविवार को बंदी की घोषणा की गई है।
  • साप्ताहिक बंदी के दौरान सभी बाजारों और दुकानों में सैनिटाइजेशन और स्वच्छता का कार्यक्रम सरकार के द्वारा चलाया जाएगा।
  • औद्योगिक इकाइयों को स्वयं अपने यहाँ सैनिटाइजेशन का काम करने का निर्देश दिया गया है।
  • सभी कोविड- 19 के अस्पतालों में ऑक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
  • सारे निर्माण कार्य सोशल डिस्टेंसिग को ध्यान में रख कर करने का निर्देश दिया गया है।
  • कोविड-19 से बचाव और सावधानियों को लेकर प्रदेश में प्रचार-प्रसार किया जाएगा।
  • कोरोना वायरस को रोकने के लिए पूरे प्रदेश में घर-घर पहुँच कर सर्वे करने का निर्देश जारी।
  • टेस्टिंग क्षमता को बढ़ाकर 50 हज़ार प्रतिदिन टेस्टिंग करने का निर्देश
  • कानपुर, देवरिया, कुशीनगर, बलिया और वाराणसी में अधिक सतर्कता बरतने के निर्देश

आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में कोरोना का प्रसार तेजी से हो रहा है। रोजाना कोरोना संक्रमितों संख्या में दुगुनी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। जिसको नियंत्रित करने के लिए सरकार ने यह फैसला लिया हैं। इससे पहले सरकार ने उत्तर प्रदेश में तीन दिनों का संपूर्ण लॉकडाउन भी घोषित किया था, जो बीते 10 जुलाई की रात 10 बजे से शुरू होकर 13 जुलाई सुबह 5 बजे तक लागू रहेगा।

रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने टीम-11 के साथ कोरोना महामारी को लेकर हुई समीक्षा बैठक की थी। इसमें दो दिन के लॉकडाउन पर सहमति बनी। अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश कुमार अवस्थी ने इस बात की जानकारी देते हुए कहा कि 55 घंटे हुए लॉकडाउन की तरह ही सरकार ने अब शनिवार और रविवार लॉकडाउन रखने का फैसला लिया है। कोरोना वायरस को लेकर की जा रही लापरवाही को देखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। अब प्रदेश में संक्रमितों की संख्या 35092 हो गई है। इनमें से 11490 एक्टिव मामले हैं। 22689 मरीजों को डिस्चार्ज भी किया गया है। स्वास्थ्य विभाग के लिए मृतकों की बढ़ती संख्या चिंता का कारण बन गई है। अब तक कुल 913 लोग इस महामारी से अपनी जान गँवा चुके है।

‘BJP के संपर्क में सचिन पायलट’ और कपिल सिब्बल ने की ‘घोड़े’ की बात: कॉन्ग्रेस में भारी नुकसान की आशंका

राजस्थान में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कॉन्ग्रेस की गहलोत सरकार पर संकट गहराता जा रहा है। राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच के तनातनी अब खुल कर सामने आ गई है। सचिन पायलट का आरोप है कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। सरकार के फैसलों में अहमियत नहीं दी जाती है। उधर अशोक गहलोत खेमे के लोगों का आरोप है कि सचिन पायलट बीजेपी के संपर्क में हैं।

इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया कि राजस्थान में व्याप्त राजनीतिक संकट के बीच, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे के वफादार लोगों ने आरोप लगाया है कि डिप्टी सीएम सचिन पायलट भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं, उनके साथ बातचीत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान में जारी सियासी उठापटक के बीच उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट अपने विधायकों के साथ दिल्ली पहुँच चुके हैं। बताया जा रहा है कि सचिन पायलट कॉन्ग्रेस आलाकमान के साथ मीटिंग करेंगे। इधर गहलोत सरकार पर संकट मंडराते हुए देख कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने चिंता जाहिर की है। उन्होंने ट्विटर पर राजस्थान सरकार का जिक्र किए बगैर इशारे में ट्वीट करते हुए दु:ख व्यक्त किया है।

कपिल सिब्बल ने ट्विटर पर लिखा, “अपनी पार्टी के लिए चिंतित हूँ। क्या हम तभी जागेंगे, जब घोड़े हमारे अस्तबल से निकल जाएँगे।” जाहिर सी बात है कि उन्होंने इशारों भरे इस ट्वीट से पार्टी आलाकमान को भी संदेश दिया है कि वक्त रहते अगर सही फैसला नहीं लिया गया तो पार्टी को भारी नुकसान हो सकता है। इसके साथ ही उन्होंने इस तरफ भी इशारा कर दिया कि राजस्थान में शायद सब कुछ ठीक नहीं है।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान में अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार उसी रास्ते पर बढ़ रही है, जिस पर मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार चली थी। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया थे, अब राजस्थान कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट हैं, जो राजस्थान के टोंक में खासा प्रभाव रखते हैं।

बताया जा रहा है कि राजस्थान के कॉन्ग्रेस के 24 विधायक हरियाणा और दिल्ली स्थित होटलों में पहुँच गए हैं। भयभीत राज्य सरकार ने सभी सीमाओं को सील कर दिया है। ऊपरी तौर पर तो कहा जा रहा है कि ये कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए ये फैसला लिया गया है लेकिन इसे कॉन्ग्रेस के भीतर भारी अंदरूनी फूट को दबाने और विधायकों को बाहर जाने से रोकने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।

शनिवार (जुलाई 11, 2020) को सीएम अशोक गहलोत जब कैबिनेट मीटिंग कर रहे थे तो, बतौर डिप्टी सीएम सरकार के दूसरे बड़े नेता होने के बावजूद सचिन पायलट इस मीटिंग में शामिल नहीं हुए। कहा गया कि सचिन पायलट दिल्ली मे हैं, इसीलिए वो इस बैठक में शामिल नहीं हो पाए।

बता दें कि सरकार गिराने के प्रयास में कॉन्ग्रेस और निर्दलीय विधायकों को 20-25 करोड़ रुपए का ऑफर देने के आरोप में राजस्थान पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार भी किया है। इसके अलावा इसकी जाँच के लिए सरकार ने एक एसओजी का गठन किया है, जिसने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को नोटिस भेजा है ताकि उनका बयान दर्ज हो सके। इससे पायलट नाराज हो गए हैं और वो अपने समर्थक विधायकों संग दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं।

क्या अमिताभ अपने घर को साफ़ नहीं कर सकते: बिना प्रोटोकॉल समझे पत्रकार ने केंद्र पर लगाए आरोप, रोया टैक्स का रोना

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए हैं। शनिवार (जुलाई 11, 2020) को ही उनके बेटे अभिषेक बच्चन के भी कोरोना संक्रमित होने की ख़बर आई। पूरा देश महानायक की सलामती की प्रार्थना कर रहा है, क्योंकि उन्होंने 5 दशक तक देश-दुनिया का मनोरंजन किया है। लेकिन वामपंथियो ने इस मौके को भुनाने के लिए संवेदनहीनता का नया रूप दिखाना शुरू कर दिया है। इसमें नया नाम विद्या कृष्णन का जुड़ा है।

दरअसल, अमिताभ बच्चन के अस्पताल में भर्ती होने के बाद बृहन्मुम्बई महानगरपालिका (BMC) के लोग उनके घर पर पहुँचे और उनके बंगलों ‘जलसा’ और ‘जनक’ में सैनिटाइजेशन की प्रक्रिया पूरी की। दोनों ही बंगलों को ‘कन्टेनमेंट जोन’ घोषित कर दिया गया है और नोटिस भी चिपका दिया गया है। जुहू पुलिस ने अपने ब्रेकर्स वहाँ पर लगा दिए हैं। नानावती सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में अमिताभ बच्चन का इलाज चल रहा है।

लेकिन, ‘कारवाँ मैगजीन’ और ‘द हिन्दू’ में लेख लिखने वाली और ख़ुद को विज्ञान व स्वास्थ्य पत्रकार बताने वाली विद्या कृष्णन को ये सब रास नहीं आया। उन्होंने अमिताभ बच्चन के बंगलों को सैनिटाइज किए जाने का विरोध किया। विद्या ने गाली बकते हुए पूछा कि क्या अमिताभ बच्चन अपने घर को साफ़ नहीं कर सकते? साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा कर के करदाताओं के पैसों को बर्बाद किया जा रहा है।

साथ ही उन्होंने पूछा कि क्या BMC मुंबई के प्रत्येक कोरोना वायरस पॉजिटिव मरीज के घर के लिए यही नियम अपनाने वाला है? साथ ही उन्होंने इसके लिए केंद्र सरकार को दोष दे दिया। मुद्दा BMC से जुड़ा है लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी घृणा के कारण केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगा दिया। बच्चन के घर को सैनिटाइज करने केंद्र के अधिकारी नहीं, बल्कि नगरपालिका के लोग गए थे।

इसके बाद विद्या ने दावा किया कि अगर कोई अमीर है तो ‘केंद्र सरकार के लोग’ उनके घर की साफ़-सफाई करने आएँगे और गरीबों को सड़क पर कुत्ते की तरह मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा और उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं होगा। साथ ही उन्होंने ‘वन नेशन, वन हेल्थ स्कीम’ की वकालत करते हुए लिखा कि या तो सभी को समान सेवाएँ मिलनी चाहिए या फिर किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए।

साथ ही विद्या कृष्णन ने लिखा कि उन्हें ये बात समझ नहीं आती कि अमीर, फासिस्ट और बिगड़ैल लोग नगरपालिका से अपने घर की साफ़-सफाई करवाते हैं। विद्या कृष्णन का जैसा इतिहास है, वो झूठ फैलाने के लिए ही जानी जाती हैं। उनके लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के प्रति घृणा से सने होते हैं और वो देश को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़तीं। इस बार भी उन्होंने झूठ ही फैलाया।

सबसे पहले ये बता दें कि ये प्रोटोकॉल ही है कि कोरोना संक्रमित मरीजों के घर और आसपास के क्षेत्र को नगरपालिका द्वारा सैनिटाइज किया जाएगा। अगर अमिताभ बच्चन प्रोटोकॉल के विरुद्ध कुछ करते, तब कहा जा सकता था कि वो अपनी पहुँच और पैसे का फायदा उठा रहे हैं। लेकिन क्या एक ‘स्वास्थ्य पत्रकार’ को कोरोना के साधारण प्रोटोकॉल्स भी नहीं मालूम? प्रोटोकॉल का पालन करने पर किसी को गाली क्यों?

दूसरी बात, इसमें विद्या कृष्णन ने करदाताओं और टैक्स वाला एंगल घुसाया। क्या अमिताभ बच्चन इस देश के नागरिक नहीं हैं? अकेले 2018-19 में उन्होने 70 करोड़ रुपए बतौर टैक्स दिए थे। ऐसे में विद्या कृष्णन को झूठ फैला कर टैक्स के नाम पर सवाल उठाने का अधिकार है क्या? अमिताभ का नाम हर साल उन सेलेब्रिटीज में टॉप की लिस्ट में आता है, जो सबसे ज्यादा टैक्स देते हैं। ऐसे में इसमें टैक्स वाली बात घुसाना कहाँ तक उचित है?

दरअसल, भले ही सैनिटाइजेशन की प्रक्रिया प्रोटोकॉल के तहत राज्य सरकार और BMC द्वारा किया जा रहा हो, जहाँ दोनों ही जगह शिवसेना की सत्ता है। लेकिन, विद्या कृष्णन ने इसे केंद्र सरकार पर हमले का मौका बनाया, क्योंकि अमिताभ बच्चन वामपंथी गैंग की हाँ में हाँ नहीं मिलाते। गुजरात में बिना एक भी रुपया लिए उन्होंने पर्यटन के लिए अपना चेहरा दिया।

विद्या कृष्णन के बारे में बताया दें कि उन्होंने कारवाँ के अपने लेख में दावा किया था कि आईसीएमआर के टास्क फोर्स में 21 वैज्ञानिक हैं जो मोदी सरकार को कोरोना से निपटने के उपायों पर सलाह देने वाले थे, लेकिन उन्हें नज़रंदाज़ किया जा रहा है। एक अनाम सदस्य के हवाले से ये सूचना दी गई थी कि एक सप्ताह में टास्क फोर्स की एक भी बैठक नहीं हुई। सच्चाई ये है कि 15 अप्रैल तक 1 महीने में 14 बैठकें हुई थीं। साथ ही ये दावा भी किया गया था कि पीएम मोदी ने लॉकडाउन बढ़ाने से पहले भी उनकी कोई सलाह नहीं ली।

अमिताभ बच्चन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का देश के लिए उठाए गए हर क़दम के बाद समर्थन किया था। सीएए हिंसा के दौरान भी वामपंथी उनसे दंगाइयों के पक्ष में बोलने की अपील कर रहे थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अमिताभ ने लॉकडाउन से पहले पीएम मोदी की अपील पर दीये भी जलाए थे और 1 दिन के ‘जनता कर्फ्यू’ का समर्थन किया था। इससे भी लिबरल गिरोह उनसे नाराज़ है।

अगर लॉजिक को ताक पर रख कर आलोचना करनी ही है तो विद्या ने BMC और महाराष्ट्र सरकार की जगह भारत सरकार पर निशाना क्यों साधा? सिर्फ इसीलिए, क्योंकि शिवसेना आजकल लिबरलों की चहेती बनी हुई है। शिवसेना और भाजपा वरोधी पार्टियाँ हैं, इसीलिए भाजपा के विरोधियों की आलोचना तो वामपंथियों की डिक्शनरी में आता ही नहीं। अमिताभ बच्चन को जान-बूझकर निशाना बनाया जा रहा है।

कुछ इसी तरह का कारनामा रूपा सुब्रह्मण्यम ने भी किया। उन्होंने अमिताभ बच्चन के एक ट्वीट को लेकर अपनी असंवेदनशीलता दिखाई। बकौल रूपा, बच्चन ने अपने ट्वीट में ‘जनता कर्फ्यू’ का समर्थन करते हुए लिखा था कि इसे रणनीतिक रूप से अमावस्या के दिन रखा गया है, क्योंकि उस दिन ताली बजाने से पॉजिटिव वाइब्रेशन होगा, जिससे कोरोना का असर कम होगा। उनका दुःख ये है कि 22 मार्च को पीएम मोदी की अपील पर हुए ‘जनता कर्फ्यू’ का बच्चन ने समर्थन क्यों किया।

अगर किसी ने अपनी आस्था के अनुसार कुछ ट्वीट किया या फिर किसी ने अपने विचार रखे तो फिर उसे उसकी बीमारी के वक़्त याद करना और फिर असंवेदनशीलता दिखाना कहाँ तक उचित है? रूपा ने अपना पूरा टाइमलाइन अमिताभ बच्चन के प्रति घृणा से भर रखा रखा है। उनका कहना है कि बच्चन तुरंत अस्पताल में भर्ती हो गए, ये दिखाता है कि मुंबई के अस्पतालों में स्थिति नियंत्रण में है। उनका ये भी पूछना है कि जब उनमें कोरोना के लक्षण कम थे तो फिर अस्पताल में क्यों भर्ती किया गया?

किसी की मौत पर या फिर किसी की बीमारी पर मजाक बनाना वामपंथियों और इस्लामी कट्टरवादियों की साझा फितरत है। अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद भी कुछ लोगों ने खुशियाँ मनाई थीं। पीएम मोदी या फिर भाजपा से जुड़े या फिर जिसे उनके करीब माना जाता हो, उनकी मौत की दुआ माँगना सोशल मीडिया के इन वॉरियर्स के लिए कोई नई बात नहीं है। हालाँकि, अमीरों को गाली देने वाली खुद अमीरों से मिलने वाले फ़ायदों का लाभ उठाने से नहीं हिचकते।

J&K: तहरीक-ए-हुर्रियत अध्यक्ष अशरफ सेहराई गिरफ्तार, बेटा था हिजबुल आतंकी

जम्मू कश्मीर पुलिस ने अलगाववादी नेता अशरफ सेहराई को गिरफ्तार किया है। सेहराई को रविवार (12 जुलाई 2020) को सुबह 5 बजे श्रीनगर स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया गया। 

सेहराई तहरीक-ए-हुर्रियत के अध्यक्ष हैं। वे हुर्रियत के इतिहास में चुनाव के माध्यम से चुने जाने वाले पहले पहले नेता हैं। इसके अलावा प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के कुछ सदस्य भी हिरासत में लिए गए हैं। सभी पर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुखिया दिलबाग सिंह ने इसकी पुष्टि की है। 

सेहराई 2018 के मार्च में मजलिस-ए-शोरा द्वारा तहरीक-ए-हुर्रियत के कार्यकारी अध्यक्ष चुने गए थे। कुछ समय बाद उन्हें अध्यक्ष चुन लिया गया था। 1965 में मोहम्मद अशरफ़ सेहराई को देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के चलते उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा था। 1959 में सैयद अली शाह गिलानी के सहयोगी के रूप में सक्रिय हुआ था।  

सेहराई का बेटा जुनैद प्रबंधन की पढ़ाई के दौरान हिजबुल का आतंकी बन गया था। कुछ दिन पहले ही श्रीनगर में एक मुठभेड़ में वह मारा गया था।

जब नेहरू-इंदिरा खुद ले रहे थे भारत-रत्न… तब उनके शोध से बची थी लाखों जिंदगियाँ, जो मर गए गुमनामी में

भारत में एक से बढ़ कर एक प्रतिभाओं का जन्म हुआ है और उन्होंने अपने बलबूते बड़े से बड़ा मुकाम भी हासिल किया है लेकिन उनमें से अधिकतर को शासन-सत्ता का सहयोग तो दूर की बात, उनसे उचित सम्मान तक नहीं मिला। वर्ष 1884 में रॉबर्ट कॉख ने हैजा के जीवाणु की खोज की थी। इसके लगभग 75 वर्षों बाद बंगाल के शंभूनाथ डे ने पता लगाया कि हैजा के जीवाणु द्वारा पैदा किए गए ज़हर से शरीर में पानी की कमी हो जाती है और खून गाढ़ा हो जाता है।

कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के पैथॉलजी विभाग के पूर्व निदेशक और शोधकर्ता शम्भूनाथ डे ने कई मुसीबतों और परेशानियों का सामना करने के बाद अपनी लगन, अध्ययन और शोध से हैजा के जीवाणु द्वारा पैदा किए जाने वाले खतरनाक व जानलेवा टॉक्सिन के बारे में कोलकाता के बोस शोध संस्थान में पता लगाया था। उनके पास साधनों की कमी थी क्योंकि विदेशों में इन्हीं विषयों पर पूरी सुविधा व साधन के साथ विशेषज्ञों की टीम रिसर्च में लगी हुई थी।

उनके ही गहन शोध से निकले परिणामों का प्रभाव था कि हैजा के कई मरीजों के शरीर में पानी की पर्याप्त व्यवस्था कर के उनकी जान बचाई गई। हैजा पहले महामारी का रूप ले लेता था और गाँव के गाँव इसकी चपेट में आने के बाद ख़त्म हो जाते थे। आज हैजा की दवा उपलब्ध है, इससे बचाव के लिए तमाम साधन हैं लेकिन हमें पता होना चाहिए कि बंगाल के शम्भूनाथ डे की खोज के कारण ही ये सब संभव हो पाया।

1985 में शम्भूनाथ डे की मृत्यु हो गई लेकिन आज भी शायद ही कोई उनका नाम भी जानता हो। भारत का एक महान वैज्ञानिक गुमनामी के अँधेरे में कहीं खो गया, करोड़ों लोगों की जान बचाने की जुगत कर के भी उसे उचित सम्मान नहीं मिल पाया। उनके परिवार की ये इच्छा भी अधूरी रह गई कि कलकत्ता यूनिवर्सिटी में उनकी याद में कम से कम सालाना लेक्चर आयोजित की जाए। हालाँकि, दिल्ली में उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर ज़रूर कुछ भाषण-आयोजन वगैरह हुए थे। नवम्बर 2015 में ‘नवभारत टाइम्स’ से उनके बेटे ने कहा था:

“उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय विज्ञान समुदाय ने उनकी खोज करने के कई वर्षों बाद महत्व देना शुरू किया। 60 के दशक के अंतिम दौर में विदेशी वैज्ञानिक व शोधकर्ता उनके काम का संदर्भ इस्तेमाल करने लगे। 1978 में नोबेल फाउंडेशन ने उनसे संपर्क साधा और उन्हें हैजा पर आयोजित एक संगोष्ठी में भाग लेने का आमंत्रण दिया। 1990 में ‘साइंस टुडे’ पत्रिका ने उनके ऊपर एक विशेष अंक छापा, लेकिन उनके काम को भारत में कभी ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। बहुत कम लोगों ने उनके शोध और अध्ययन को अपने शोध में संदर्भ की तरह इस्तेमाल किया। हालाँकि, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह अपनी खोजों और प्रयोगों के साथ खुश रहते थे।”

दरअसल, वो ब्रिटिश राज का दौर था, जब 40 के दशक में भारत में हैजा ने अपना भयंकर रूप बार-बार दिखाना शुरू कर दिया था। शम्भूनाथ डे हैजा के बढ़ते प्रकोप से दुःखी रहते थे और उन्होंने इससे निपटने के लिए बृहद रिसर्च आरम्भ किया। हैजा से होने वाली मौतों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी। आधिकारिक रूप से तो वो लंदन स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज हॉस्पिटल के मेडिकल स्कूल के एक शोध में व्यस्त थे, लेकिन उनके लिए उनकी मातृभूमि के संकट का निदान पहली प्राथमिकता थी।

अन्य बीमारी पर हो रहे रिसर्च के कई ऑफरों को छोड़ कर वो 1949 में भारत लौट आए। तब तक देश स्वतंत्र हो चुका था और जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने हैजा के किडनी पर दुष्प्रभावों पर शोध शुरू किया। 1949 से 1955 के बीच एक बाद एक इस विषय पर कई शोधपत्र प्रकाशित हुए। 1955 ही वो साल था, जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ख़ुद को भारत रत्न दिया और लगभग इसी दौर में शम्भूनाथ डे ने पाया कि हैजा से शरीर में एक प्रकार के टॉक्सिन का निर्माण होता है।

इस बीमारी से मरीज की मौत कैसे हो जाती है, डे ने इसका पता लगा लिया था। लेकिन, विदेशी वैज्ञानिक भी उनके शोध व उससे निकले निष्कर्षों को लेकर संतुष्ट नहीं थे। शम्भूनाथ डे के पुत्र श्यामल डे के अनुसार, उनके पिता को विश्वास था कि उन्होंने जो निष्कर्ष निकाला है, वह एक नई खोज है। हर रात वह बोस संस्थान के फिजिकल व प्रोटीन रसायन प्रयोगशाला जाया करते थे। उनके उपकरण वहीं पर थे। वो खरगोशों पर अपना शोध कर रहे थे।

उस समय मेडिकल कॉलेज में ज़हर को अलग-थलग कर देने तक की भी कोई तकनीक नहीं थी। शम्भूनाथ डे घंटों शोध करते, अध्ययन करते और अपने निष्कर्षों को नोट किया करते थे। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। यहाँ तक कि उन्हें नोबेल पुरष्कार के लिए भी नामांकित किया गया। चिकित्सा क्षेत्र के लिए नोबेल ले चुके वैज्ञानिक जोशुहा लेडरबर्ग ने उन्हें नामांकित किया था, जो अमेरिकी अंतरिक्ष प्रोग्राम के बड़े नामों में से एक रहे हैं। वो मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट थे, जिन्होंने आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और माइक्रोबियल जेनेटिक्स पर दक्षता हासिल की थी।

70-80 के दशक में नेहरू युग के बाद भी उन्हें भारत सरकार द्वारा कोई सम्मान नहीं दिया गया। इंदिरा गाँधी की सरकार में भी उन्हें कोई सम्मान नहीं मिला। यहाँ तक कि देश की जनता भी उन्हें भूल चुकी थी। हालात आज भी वही है क्योंकि मशहूर गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण के साथ क्या हुआ, वो किसी से छिपा नहीं है। उनकी तरह शम्भूनाथ डे का जन्म भी हुगली के गरीबटी गाँव में हुआ था। शम्भूनाथ के चाचा परिवार में एकमात्र शिक्षित व्यक्ति थे, जिनसे वो प्रेरित हुए।

आपको याद दिलाते चलें कि पटना यूनिवर्सिटी में लोग वशिष्ठ नारायण सिंह को देखने व छूने के लिए इतने लालायित रहते थे कि उनसे जानबूझ कर टकरा जाते थे। अमेरिका ने उन्हें ‘जीनियसों का जीनियस’ कहा था। जब वो अमेरिका से लौट कर आए थे, तब पटना यूनिवर्सिटी में अपना कमरा देखने गए थे। वहाँ उन्हें ये देख कर आश्चर्य हुआ कि उस कमरे के बाहर अभी भी उनका ही नाम लिखा हुआ था। लेकिन, सरकारों की बेरुखी के कारण उनका जीवन नरक बन गया।

फरवरी 1, 1915 को जन्मे शम्भूनाथ डे के पिता दशरथी डे ने अपने पिता की मृत्यु के बाद दुकान में सहायक के रूप में काम रकना शुरू कर दिया था क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। हालाँकि, बाद में उन्होंने अपना छोटा सा व्यवसाय शुरू कर दिया। शम्भूनाथ के रिश्तेदारों में से ही किसी ने उनकी पढ़ाई का ख़र्च उठाया था और उन्हें स्कॉलरशिप भी मिली थी। उन्होंने लंदन में पीएचडी की थी।

शम्भूनाथ डे का लगन इतना था कि वो रोज अपनी ड्यूटी ख़त्म होने के बाद हैजा पर शोध किया करते थे। उन्होंने ही पता लगाया था कि वाइब्रियो कॉलेरी खून के रास्ते नहीं बल्कि छोटी आंत में जाकर एक टॉक्सिन, अर्थात जहरीला पदार्थ छोड़ता है। ऑरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) का विचार भी उनके शोध के बाद ही आया। 1973 में वो रिटायर हो गए। 1978 में नोबेल फाउंडेशन ने उन्हें लेक्चर के लिए बुलाया था।

जिस डायरिया ने उस समय तक 2 करोड़ लोगों की ज़िंदगी छीन ली थी, उस बीमारी से निपटने के लिए किए गए उनके खोजों को विदेश से सम्मान मिला लेकिन अपने ही देश की सरकारों का सहयोग और सम्मान के लिए वो तरस गए। शम्भूनाथ डे के कारण आज हैजा असाध्य नहीं है और हम इससे उबर जाते हैं। हैजा 1817 में ही अस्तित्व में आया था। जिस महान वैज्ञानिक ने इसका निदान निकाला, देश उसे ही भूल गया।

जिसने किया चीन का बचाव, वो WHO अब कर रहा महाराष्ट्र की सराहना… जहाँ देश के एक तिहाई संक्रमित!

चीन से शुरू हुए कोरोना वायरस के पूरी दुनिया में फैलने पर शुरुआत में अपना मत स्पष्ट न करने की वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन सबके निशाने पर है। अभी तक सामने आए आरोपों के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन पर कोरोना वायरस को लेकर चीन की सरकार के प्रति नर्म रवैया रखने का भी आरोप लग रहा है। 

दुनिया के तमाम देशों में फैली महामारी का असर भारत पर भी खूब हुआ है, खासकर महाराष्ट्र में। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मरीज़ होने के बावजूद राज्य सरकार की कार्यप्रणाली की प्रशंसा की है। 

डब्ल्यूएचओ के निदेशक टेद्रोस एधनोम (Tedros Adhanom) ने एक वर्चुअल प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए इस बारे में कई अहम बातें बताईं। हालाँकि उन्हें खुद कोरोना वायरस के मुद्दे पर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बात करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसे तमाम देश हैं, जहाँ इस महामारी का असर बहुत ज़्यादा हुआ है। 

डब्ल्यूएचओ ने कोरोना वायरस को रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार के प्रयासों की सराहना की है। विशेष रूप से दुनिया की सबसे बड़ी बस्ती ‘धारावी’ जहाँ संक्रमण फैलने का ख़तरा सबसे ज़्यादा था, वहाँ की तारीफ की गई है। आश्चर्यजनक यह है कि मुंबई में कोरोना वायरस के मामलों की संख्या चरम पर है, फिर भी इसकी तारीफ! 

डब्ल्यूएचओ के निदेशक ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा, 

“इटली, स्पेन और दक्षिण कोरिया दुनिया के कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने महामारी को रोकने के लिए सार्थक प्रयास किए हैं। उसमें भी मुंबई स्थित दुनिया की सबसे बड़ी बस्ती ‘धारावी’ जहाँ हालात काफी नियंत्रण में है।”

यह बात उल्लेखनीय है कि मुंबई स्थित धारावी दुनिया की सबसे बड़ी बस्तियों में एक है। केवल 2.5 स्क्वायर किलोमीटर की जगह में फैली इस बस्ती में 6,50,000 लोग रहते हैं। महामारी की शुरुआत में इस जगह को महाराष्ट्र के भीतर कोरोना वायरस का केंद्र माना जा रहा था, जिसकी वजह से पूरा मुंबई क्षेत्र प्रभावित हुआ था। 

फिलहाल धारावी में कोरोना वायरस के 291 सक्रिय मामले हैं और 1815 लोग ठीक होकर वापस घर जा चुके हैं। अभी तक धारावी में कोरोना वायरस के कुल 2400 मामले सामने आ चुके हैं। वहीं मुंबई में कुल 91500 प्रभावित मामले सामने आ चुके हैं और 5241 लोगों की मौत हो चुकी है। 

भले धारावी में हालात बेहतर हो रहे हों लेकिन महाराष्ट्र के अन्य शहरों में स्थिति अच्छी नहीं है। महाराष्ट्र की वजह से देश के औसत कोरोना वायरस प्रभावित मरीज़ों की संख्या भी बढ़ रही है। वर्तमान राज्य सरकार को इस मामले पर काफी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है, सिर्फ महाराष्ट्र में ही कोरोना वायरस के 2.4 लाख मरीज मौजूद हैं। 

महाराष्ट्र में पूरे देश के लगभग एक तिहाई संक्रमित लोग हैं। कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था दर्शाता हुआ एक वीडियो सामने आया था, जिसमें एक अस्पताल के भीतर मरीज़ बेड साझा करने के लिए मजबूर थे। मुंबई के सियोन अस्पताल में बेड की कमी के चलते दो मरीज़ों को एक ही बेड साझा करना पड़ रहा था।             

इसके अलावा सोशल मीडिया पर मुंबई के अस्पताल का एक और वीडियो सामने आया था, जिसमें हालात कुछ ऐसे बने हुए थे कि मरीज़ एक के ऊपर एक लेटे हुए थे। कुछ स्ट्रेचर पर लेटे हुए थे तो वहीं कुछ को ज़मीन पर ही लेटाया गया था।

सियोन अस्पताल का हैरान कर देने वाला एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें मरीज़ों के पास लाशें रखी हुई थीं। बीएमसी द्वारा संचालित जोगेश्वरी अस्पताल का मामला भी सामने आया था, जिसमें अधिकारियों की अनदेखी के चलते ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी हुई। 

अंततः इस लापरवाही के चलते दो हफ्ते के भीतर 12 लोगों की मौत हो गई। महाराष्ट्र 246600 मरीज़ों से साथ देश में सबसे ज़्यादा कोरोना प्रभावित मरीज़ों का राज्य बना हुआ है। इसके अलावा राज्य में 8993 मौतें भी हो चुकी हैं। केवल मुंबई में ही रिकॉर्ड 91547 मरीज़ मिल चुके हैं, जिसमें से 5241 की मौत हो चुकी है। 

‘पाकिस्तान और बांग्लादेश का राष्ट्रगान याद करो’ – शिक्षिका शैला परवीन ने LKG और UKG के बच्चों को दिया टास्क

झारखण्ड के घाटशिला से एक मामला आया है। यहाँ नंदलाल स्मृति विद्या मंदिर नामक स्कूल में छात्रों को भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश का राष्ट्रगान याद करने का होमवर्क दिया गया था।

स्कूल में एलकेजी और यूकेजी के छोटे-छोटे बच्चों को पाकिस्तान और बांग्लादेश का राष्ट्रगान पढ़ाने का मामला अब तूल पकड़ रहा है। साथ ही बच्चों को उन मुल्कों के राष्ट्रीय प्रतीकों के बारे में भी पढ़ाया जा रहा है। कई अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन से इस बात को लेकर आपत्ति जताई है।

‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, स्कूल प्रबंधन की ओर से एलकेजी और यूकेजी के बच्चों को तीन अलग-अलग समूहों में बाँट कर भारत के साथ ही पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के राष्ट्रगान को याद करने का टास्क दिया गया है। अभिभावकों का कहना है कि वो अपने बच्चों को पाकिस्तान और बांग्लादेश का राष्ट्रगान नहीं पढ़ने देंगे।

घाटशिला के नंदलाल स्मृति विद्या मंदिर स्कूल में ये टास्क ऑनलाइन क्लास में दिया गया क्योंकि कोरोना के कारण सभी शैक्षिक संस्थान बंद हैं। दरअसल, स्कूल में बच्चों को 3 अलग-अलग समूहों में बाँटा गया। इनमें से अलग-अलग भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का राष्ट्रगान याद करने का टास्क दिया गया।

व्हाट्सप्प ग्रुप में पाकिस्तान और बांग्लादेश का राष्ट्रगान पोस्ट भी किया गया। बच्चों को उन मुल्कों का राष्ट्रगान याद कराने के लिए यूट्यूब से वीडियो लेकर वहाँ डाला गया। कहा जा रहा है कि स्कूल के ही एक शिक्षिका ने ये टास्क दिया। स्कूल प्रबंधन ने मामला तूल पकड़ते देख टास्क वापस ले लिया है।

स्कूल में बच्चों की पढ़ाई फिलहाल ऑनलाइन ही चल रही है। अलग-अलग क्लास के बच्चों का अलग-अलग व्हाट्सप्प ग्रुप बना कर पढ़ाई कराई जा रही है। उक्त घटना 7-8 जुलाई, 2020 की है। जब शिक्षिका शैला परवीन ने बच्चों को पाकिस्तान व बांग्लादेश के राष्ट्रगान व प्रतीक चिह्नों के बारे में याद करने को कहा। शिक्षिका का कहना है कि उन्होंने स्कूल प्रबंधन के निर्देश पर बच्चों को ऐसा टास्क दिया है।

इधर प्रशासन ने बताया है कि इस मामले को लेकर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। पूर्वी सिंघभूम के जिला शिक्षा पदाधिकारी जीतेन्द्र कुमार ने कहा कि अगर कोई स्कूल ऐसा करने के लिए दबाव बना रहा है तो ये बिलकुल ग़लत है।

जिला शिक्षा पदाधिकारी ने स्पष्ट किया कि इन दोनों मुल्कों का राष्ट्रगान स्कूलों में नहीं पढ़ाया जा सकता और ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। वहीं शिक्षिका इसके लिए प्रिंसिपल को जिम्मेदार ठहरा रही हैं।

वहीं विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि अभिभावकों की आपत्ति के बाद इस टास्क को वापस ले लिया गया है। लोगों ने विद्यालय प्रबंधन को असंवेदनशील बताते हुए शिक्षिका पर कार्रवाई की माँग की है और साथ ही प्रशासन से विद्यालय के खिलाफ कार्रवाई करने की भी माँग की है। जबकि प्रबंधन कह रहा है कि बच्चों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए ऐसा किया गया। उनका कहना है कि उन्हें नहीं पता था कि ये बड़ा मुद्दा बन जाएगा।

अपनी बहन को घर भेज 12 साल की बच्ची के साथ जाहिद, राशिद और साहिर ने किया गैंगरेप, सांप्रदायिक तनाव

उत्तर प्रदेश के सीतापुर में सामूहिक दुष्कर्म का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। खबरों के मुताबिक़ 12 साल की एक नाबालिक लड़की के साथ 3 लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया जिसके बाद उसकी हालत खराब हो गई। फिलहाल लड़की को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

घटना के बाद लड़की के घर वालों ने तीन मुख्य आरोपितों के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई है। तीनों आरोपित उसी गाँव के रहने वाले (जिस गाँव की पीड़िता है) हैं और फिलहाल पुलिस उनकी तलाश कर रही है। 

घटना के बाद से पूरे इलाके में माहौल संवेदनशील बना हुआ है, इसलिए गाँव में भारी मात्रा में पुलिस फ़ोर्स लगा दी गई है। सामूहिक दुष्कर्म की यह घटना सीतापुर के मानपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत आने वाले पकरिया गाँव की है।

यहाँ के रहने वाले एक किसान की 12 वर्षीय नाबालिग बेटी नज़दीक में रहने वाले जाहिद नाम के युवक के खेत में धान रोप रही थी। घटना वाले दिन लड़की के साथ जाहिद की बहन भी खेत में काम कर रही थी। 

तभी जाहिद और उसके दो साथियों राशिद और साहिर ने अपनी बहन को पानी लेकर आने के लिए घर की तरफ भेज दिया। उसके बाद तीनों युवकों जाहिद, राशिद और साहिर ने खेत में काम कर रही 12 वर्ष की नाबालिग लड़की को खेत से उठा लिया। पड़ोस के खेत में लेकर गए और वहीं उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद लड़की की हालत बिगड़ गई, जिसे देख कर तीनों युवक उसे खेत में छोड़ कर फ़रार हो गए।    

पीड़िता काफी देर तक बेहोशी की हालत में पड़ी थी। होश आने के बाद उसने अपने घर वालों को पूरी घटना की जानकारी दी। क्योंकि उस वक्त तक लड़की की स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए उसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।

लड़की के परिजनों ने तीनों आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है, जिसके बाद पुलिस ने उनकी तलाश शुरू कर दी है। क्योंकि मामला दो अलग समुदायों से जुड़ा हुआ है, इसलिए पूरे गाँव में सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है। गाँव में काफी संख्या में पुलिस फ़ोर्स तैनात कर दी गई है।  

घटना पर मीडिया वालों से बात करते हुए क्षेत्र के उप पुलिस अधीक्षक राजीव दीक्षित ने कहा, “आज लगभग 11:30 बजे मानपुर थाना क्षेत्र ग्राम पकरिया की एक बच्ची के साथ गाँव के ही तीन युवकों द्वारा दुष्कर्म की जानकारी मिलने के बाद स्थानीय फ़ोर्स रवाना हुई। कप्तान साहब से लेकर जिलाधिकारी ने भी घटनास्थल का मुआयना किया है। अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम बना कर लगातार दबिश दी जा रही है। जल्द ही अभियुक्तों को गिरफ्तार करके उचित कार्रवाई पूरी की जाएगी।” 

24 MLA होटल में, दिल्ली में जमे पायलट: CM गहलोत की नींद उड़ी, राजस्थान बॉर्डर सील

राजस्थान में भाजपा पर अपनी सरकार गिराने का आरोप लगाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियाँ ने पहले अपना घर सँभालने की सलाह दी थी। अब उनकी बातें चरितार्थ हो रही हैं क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने बगावती तेवर अपना लिए हैं।

राजस्थान में अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार उसी रास्ते पर बढ़ रही है, जिस पर मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार चली थी। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया थे, अब राजस्थान कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट हैं, जो राजस्थान के टोंक में खासा प्रभाव रखते हैं।

खबरों के अनुसार, राजस्थान के कॉन्ग्रेस के 24 विधायक हरियाणा और दिल्ली स्थित होटलों में पहुँच गए हैं। भयभीत राज्य सरकार ने सभी सीमाओं को सील कर दिया है। ऊपरी तौर पर तो कहा जा रहा है कि ये कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए ये फैसला लिया गया है लेकिन इसे कॉन्ग्रेस के भीतर भारी अंदरूनी फूट को दबाने और विधायकों को बाहर जाने से रोकने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।

अब राजस्थान से बाहर जाने के लिए सरकारी अनुमति जरूरी होगी। अन्य राज्यों से आने वालों की भी सीमा पर जाँच की जाएगी। हालाँकि, कलेक्टरेट, थाने और रेलवे स्टेशन पर पास बनवाया जा सकेगा लेकिन इस बार ऑनलाइन सुविधा नहीं दी गई है।

हरियाणा के मानसेर स्थित एक होटल में शनिवार (जुलाई 11, 2020) को ही कॉन्ग्रेस नेताओं का जमावड़ा शुरू हो गया था। सचिन पायलट भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह राहुल गाँधी की ‘यंग ब्रिगेड’ का हिस्सा रहे हैं लेकिन सिंधिया के साथ उनके मजबूत संबंधों को देखते हुए यह भी माना जा रहा है कि वो भारतीय जनता पार्टी से संपर्क में हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अधिकतर कॉन्ग्रेस विधायकों का फोन स्विच ऑफ है। आनन-फानन में राज्य में कॉन्ग्रेस के प्रभारी व पार्टी महासचिव अविनाश पांडेय भी जयपुर पहुँच गए हैं। देर रात अशोक गहलोत ने सरकार बचाने की कवायद शुरू तो की लेकिन उनके द्वारा बुलाई गई बैठक में पायलट-गुट के मंत्रीगण नदारद रहे। कहा जा रहा है कि सचिन पायलट दिल्ली मे हैं, इसीलिए वो इस बैठक में शामिल नहीं हो पाए।

हालाँकि, राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के साथ ही पायलट की नाराज़गी किसी से छिपी नहीं है। कहा जा रहा है कि राजस्थान से बाहर निकलने वाले विधायक पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मिल कर अपनी बात रखेंगे।

गहलोत ने सभी मंत्रियों को अपने-अपने जिलों के विधायकों के संपर्क में रहने और किसी भी घटनाक्रम के लिए उन्हें सूचित करने की हिदायत दी है। ‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, डूंगरपुर व बाँसवाड़ा के विधायकाें काे प्रलाेभन देने के मामले में एसीबी ने शनिवार काे तीन निर्दलीय विधायकाें के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

इनमें महुवा से ओमप्रकाश हुड़ला, अजमेर किशनगढ़ से सुरेश टांक तथा पाली मारवाड़ जंक्शन से निर्दलीय विधायक खुशवीर सिंह का नाम शामिल है। कहा जा रहा है कि ये तीनों विधायकों को प्रलोभन देने में लगे हुए थे। इनकी कॉन्ग्रेस से संबद्धता भी तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी गई है। गहलोत का दावा है कि विधायकों को 25-25 करोड़ रुपये का लालच दिया जा रहा है। अब देखना है कि राजस्थान की राजनीति में क्या बदलाव आता है।

पूनियाँ ने गहलोत को सलाह दी थी कि झगड़ा खुद का है अपने घर को सँभाल लें, हमें तोहमत न दें। वहीं सीएम गहलोत ने कहा था कि ऐसा वाजपेयी जी के समय पर नहीं था, लेकिन 2014 के बाद धर्म के आधार पर विभाजन करने में गर्व किया जा रहा है। विधायकों की खरीद-फरोख्त मामले में ब्यावर के दो भाजपा नेताओं भरत मालानी और अशोक सिंह पर आरोप लगा है। इन्हें उदयपुर से स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने गिरफ्तार कर लिया है।