2008 के मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का बैंक अकाउंट फिर से चालू कर दिया गया है। उसके अलावा लश्कर और जमात-उद-दावा के चार और आतंकियों पर पाकिस्तान ने यह मेहरबानी दिखाई है।
इन आतंकियों में अब्दुल सलाम भुट्टवी, हाजी एम अशरफ, याह्या मुजाहिद, जफर इकबाल शामिल है। दावा किया जा रहा है कि यह कदम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की सेक्शन कमेटी की इजाजत से उठाया गया है।
इन आतंकियों ने परिवार का खर्च नहीं चला पाने का हवाला देते हुए बैंक अकाउंट पर लगी रोक हटाने की गुहार लगाई थी। जिन पर मेहरबानी दिखाई गई है वे सभी यूएनएससी के आतंकी लिस्ट में शामिल हैं।
Bank accounts of Hafiz Saeed and JuD leaders restored after formal approval from United Nations sanctions committee: Pakistan Media (file pic) pic.twitter.com/znhksGq6hk
इन पर टेरर फंडिंग का आरोप है। पाकिस्तान के पंजाब काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट (CTD) ने इनके खिलाफ वित्तपोषणका मामला दायर किया था। इसके चलते ये सभी लाहौर के जेल में 1 से 5 साल की सजा काट रहे हैं। वहीं हाफिज को मई में कोरोना संक्रमण का खतरा बताकर लाहौर जेल से रिहा कर दिया गया था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आतंकी सरगनाओं ने अपने बैंक खातों को बहाल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र से अपील की थी। उन्होंने कहा था कि परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें बैंक खाते संचालित करने की इजाजत दी जाए।
एएनआइ को पाक मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार इन सभी ने पाकिस्तान सरकार से किए अनुरोध में अपनी वित्तीय आय और कमाई के सोर्सेज के बारे में जानकारी दी थी। जिसे इनके बैंक खातों के विवरण के साथ UN की समिति के पास भेज दिया गया था।
वहीं, दुनियाभर में टेरर फंडिंग पर नजर रखने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पिछले दिनों पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में रखने का फैसला किया था। दरअसल, एफएटीएफ का मानना था कि पाकिस्तान आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देता है। पाक अपने यहाँ लश्कर और जेईएम जैसे आतंकी समूहों की टेरर फंडिंग को रोकने में नाकामयाब रहा है।
कौन है हाफिज सईद
आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक हाफिज सईद भारत की सर्वाधिक वांछित अपराधियों की सूची में शामिल है। मुंबई की 26/11 की घटना में 166 लोग मारे गए थे। इसका मास्टरमाइंड हाफिज सईद था। उस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से उसे सौंपने को कहा था। वहीं अमेरिका ने दुनिया में ‘आंतकवाद के लिए जिम्मेदार’ लोगों की सूची में हाफ़िज़ सईद को दूसरे स्थान पर रखा है। सईद एक करोड़ डॉलर का इनामी भी है।
हाफिज सईद दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले का भी मास्टरमांइड था। इसके अलावा सईद जुलाई 2006 में मुंबई लोकल ट्रेनों में में हुए सिलसिलेवार धमाकों का आरोपी है। हाफिज सार्वजनिक कार्यक्रमों में अक्सर भारत के खिलाफ जहर उगलता है। भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, रूस और ऑस्ट्रेलिया ने उसके दोनों संगठनों जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा को प्रतिबंधित कर रखा है।
हमने एक के बाद एक ख़बरों में केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के सीईओ रहे दीपक कुमार के बारे में कई खुलासे किए थे, जिनमें उनका ईसाई मिशनरियों से साँठगाँठ सबसे अहम मुद्दा था। अब नई जानकारी सामने आ रही है कि दीपक कुमार ने CARA के सीईओ रहते मध्य प्रदेश में भी दो ईसाई मिशनरियों को रातों-रात मान्यता दिलाई थी। इस मामले में दो स्थानीय अधिकारी भी रडार पर हैं।
कहानी मध्य प्रदेश की दो संस्थाओं की, जो दीपक कुमार की कृपापात्र बनीं
केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) से हटाए जा चुके CEO दीपक कुमार के काले कारनामे लगातार उजागर हो रहे हैं। अब हमें पता चला है कि CARA में अपनी हैसियत के बूते पर दीपक कुमार ने 2017 में मध्य प्रदेश में ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित दो संस्थाओं को रातों-रात एडॉप्शन एजेंसी के रूप में मान्यता दिलाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया था। महिला बाल विकास विभाग के अधिकारियों की मदद से उसने इन संस्थाओं को मान्यता दिलवा भी दी थी।
इन दोनों संस्थाओं में सैकड़ों बच्चे थे। ये संस्थाएँ पहले बिना मान्यता के ही बच्चों की सेवा के नाम पर धर्मांतरण के लिए कुख्यात रहीं थीं। इनकी कई शिकायतें मिलने के बाद सरकार ने इनकी जाँच भी कराई थी, लेकिन महिला बाल विकास विभाग में कई सालों से जमे अधिकारियों ने जाँच पर लीपापोती करा दी थी। डिप्टी डायरेक्टर हरीश खरे और असिस्टेंट डायरेक्टर आशीष सिंह की भूमिका संदेह के दायरे में है, जो कई सालों जमे हैं। लंबे समय से विवादास्पद हरीश खरे का नाम चर्चित हनीट्रैप मामले में आने के बावजूद उसे भोपाल से नहीं हटाया गया।
मध्य प्रदेश में ईसाई मिशनरियों द्वारा ये संस्थाएँ पिछड़े इलाक़े बुंदेलखंड के सागर और दमोह में संचालित हैं। सागर में सेवाधाम और दमोह की मरुथाल नाम की संस्थाओं को 2017 में एडॉप्शन एजेंसी के रूप में कानूनी मान्यता के लिए दीपक कुमार ने ही जोर लगाया था। इन्हें चाइल्ड प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 41 और 65 के तहत एक साथ बालगृह, शिशुगृह और बालिका गृह की मान्यता दे दी गई थी। अर्थात, ये हर उम्र के शिशुओं, बच्चों और बच्चियों को अपने यहाँ रख सकते थे।
विभाग ने मान्यता देने के पहले इन संस्थाओं के कामकाज पर उठते रहे सवालों को दरकिनार कर दिया था। मुख्यमंत्री कार्यालय में इन संस्थाओं को लेकर बच्चों और गरीब परिवारों के धर्मांतरण की शिकायतें आने के बाद एक जाँच भी शुरू हुई थी। तब पता चला था कि यहाँ आने वाले बच्चों को शुरू से ही ईसाई बनाने की प्रक्रिया में डाल दिया जाता है। वे गले में क्रॉस लटकाते हैं। परिसर में ही चर्च में प्रेयर्स करते हैं।
इस जाँच के समय मरुथाल में 600 बच्चों की संख्या सामने आई थी और सेवाधाम में भी 300 से ज्यादा बच्चे होना बताए गए थे। जाँच के कारण तब इन्हे एडॉप्शन एजेंसी की मान्यता नहीं दी गई थी। लेकिन, कुछ समय बाद ही विभाग के अधिकारियों ने दीपक कुमार के दबाव में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इनका रास्ता साफ कर दिया। मान्यता मिलते ही यहाँ के सैकड़ों बच्चे CARA के जरिए देश-विदेश में गोद जाने के लिए तैयार हो गए।
ऑपइंडिया के सूत्रों का कहना है कि इन संस्थाओं से विदेशों में गोद गए बच्चों की संख्या अच्छी-खासी है, जो दीपक कुमार का भांडा फूटने के बाद अब जाँच का विषय है। पता चला है कि दीपक कुमार ने हाल ही में भोपाल की एक ऐसी ही संस्था को मान्यता देने के लिए विभाग को पत्र लिखा था, लेकिन इस पर कार्रवाई होने के पहले ही उसके कारनामे उजागर हो गए और केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने उसे पद से हटा दिया।
मिशनरियों के कारनामे और CARA के दीपक से साँठगाँठ
इन मिशनरियों के परिसरों में कार्यरत ज्यादातर कर्मचारी ऐसे हैं, जो जन्मजात ईसाई नहीं थे। वे सालों पहले कभी किसी आर्थिक मजबूरी के चलते मिशनरी में लाए गए थे और यहीं पले-बढ़े। उनके परिवारों को बच्चों की बेहतर परवरिश औैर नौकरी वगैरह के लालच दिए गए थे। चाइल्ड राइट्स के हिसाब से तो उनका पुनर्वास होना था, लेकिन वे वहीं बने रहे और अब वे ईसाई हैं। मध्य प्रदेश के महिला बाल विकास विभाग ने इन संस्थाओं की लगातार शिकायतों के बावजूद कभी जाँच नहीं की।
ईसाई मिशनरियों का रसूख ऐसा है कि राज्य के अधिकारियों भी झाँक कर भी नहीं देखा कि सैकड़ों की संख्या में गरीब परिवारों के बच्चे वहाँ किस कानून के तहत रखे जा रहे हैं। यहाँ तक कि इन बच्चों का कोई रिकॉर्ड नियमानुसार स्थानीय पुलिस के पास भी नहीं था। अफसरों के कारण ही एक जाँच पर लीपापोती की गई और दीपक कुमार ने इन्हें एडॉप्शन एजेंसी की मान्यता दिलाकर धर्मांतरण को कानूनी आवरण पहना दिया।
दीपक ने मध्य प्रदेश से अनुराग पांडे को CARA में बनाए रखा
दीपक कुमार ने हरीश खरे के कहने पर अनुराग पांडे नाम के एक व्यक्ति को CARA में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर नियुक्त किया। उसे बाद में मनमाने ढंग से यंग प्रोफेशनल का पदनाम दे दिया और मध्य प्रदेश का प्रभारी तक बना दिया। हरीश खरे के इशारे पर CARA से यही अनुराग पांडे मध्य प्रदेश की बाल संस्थाओं पर दबाव डालता था।
विभागीय स्तर पर मध्य प्रदेश में ये आम शिकायतें थीं कि उसके इशारे पर बच्चों के एडॉप्शन में अनावश्यक देरी की जा रही है और कुछ संस्थाओं को टारगेट कर कागजी कार्रवाई में अटकाया जा रहा है। अनुराग पांडे CARA में दीपक कुमार द्वारा नियुक्त उन दर्जनों मनमानी नियुक्तियों का ही एक हिस्सा है, जिन्हें ऐसे पदनाम दिए गए, जो सरकारी विभागों में कभी सुने नहीं गए। CARA में मूलत: सदस्य सचिव का ही पद होता है, जिस पर दीपक कुमार को लाया गया था।
लेकिन CARA को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह संचालित करने की फिराक में दीपक कुमार ने आते ही CEO का पदनाम गढ़ लिया था। जबकि ऐसा कोई पद था ही नहीं। दीपक कुमार और हरीश खरे के गठजोड़ ने जिस तरह मध्य प्रदेश की संस्थाओं पर अपनी मनमानी की, उसी तरह अन्य राज्यों के भी मामले सामने आ रहे हैं। बिहार से अमेरिका में गोद दी गई एक मासूम बच्ची की हत्या का मामला भी इनमें से एक है।
हनीट्रैप में फँसा अधिकारी अब भी CARA के पद पर काबिज
मध्य प्रदेश में 2018 में कॉन्ग्रेस सरकार बनने के बाद बदनाम हरीश खरे मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर का ओएसडी तक बन गया, लेकिन चर्चित हनीट्रैप में फँसने के बाद उसे महिला बाल विकास विभाग में वापस भेज दिया गया। जब उसे मूल विभाग में भेजा गया तब तत्कालीन मंत्री इमरती देवी को विभाग के महिला स्टाफ ने इस कुख्यात अधिकारी को भोपाल से बाहर भेजने के लिए कहा था, लेकिन अफसरशाही में अपनी ऊँची पहुँच के कारण हरीश खरे भोपाल में ही बना रहा।
बिना बताए महीनों गायब रहता था हरीश खरे: मुख्य सचिव को लिखे गए पत्र से खुलासा
पिछले 10 सालों से भोपाल में जमे हरीश खरे के खिलाफ कई जाँचें लंबित हैं। उस पर अपनी ही सर्विस बुक को गायब कर मनमाने ढंग से प्रमोशन लेने का आरोप है। लोकायुक्त में भी उसकी जाँच ठंडे बस्ते में है। हनीट्रैप में फँसने के बावजूद सरकार ने उसे राजधानी में टिकाए रखा और बाल संरक्षण आयोग में नियुक्ति दे दी, लेकिन अब भी संचालनालय में उसके बिना कोई फैसला नहीं होता। अब असिस्टेंट डायरेक्टर आशीष सिंह उसकी जगह पर हैं।
हनीट्रैप में फँसा था हरीश खरे
मासूम बच्चों को मनमाने ढंग से विदेश भेजने वाले दीपक कुमार के कारनामे उजागर होने के बाद सरकार के अंदर के कुछ लोग भी हैरत में हैं कि वो इतने दिन टिका कैसे रहा। सबको आश्चर्य है कि केंद्र में 2014 में सरकार बदलने के बावजूद महिला बाल विकास मंत्रालय में CARA में दीपक कुमार की नियुक्ति और बच्चों को गोद देने की प्रक्रिया में यह मनमानी आखिरकार किनके इशारे पर चलती रही।
पत्र का अगला भाग
इसी तरह मध्य प्रदेश में भी भाजपा या कॉन्ग्रेस की सरकार आने-जाने का अधिकारियों के इस ताकतवर गिराेह पर कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। मध्य प्रदेश में भी भाजपा की सरकार के रहते माया सिंह, रंजना बघेल और अर्चना चिटनीस महिला बाल विकास मंत्री रहीं। 2018 में कॉन्ग्रेस सरकार बनी तो ज्योतिरादित्य सिंधिया की करीबी इमरती देवी मंत्री बनीं। इस दौरान चार आईएएस अफसर प्रमुख सचिव और इतने ही कमिश्नर बनकर आए और चले गए, लेकिन विभागीय मुख्यालय में हरीश खरे और आशीष सिंह जैसे अधिकारियों का ही सिक्का जमा रहा।
इन दोनों अधिकारीयों के काला चिट्ठे को लेकर हम एक अलग एक लेख लेकर आएँगे, जिसमें इनके इतिहास के बारे में विस्तृत विवरण होगा। बच्चों की तस्करी का मामला दबाने हनीट्रैप तक, अगर सारे तारों को जोड़ा जाए तो ये एक बहुत बड़ा मामला बन सकता है। इससे पहले ऑपइंडिया ने CARA के दीपक कुमार के बारे में जो खुलासे किए थे, उससे इन सबका सीधा सम्बन्ध जुड़ता नज़र आ रहा है।
CARA के सीईओ रहे दीपक कुमार के बारे में ऑपइंडिया का खुलासा
वैज्ञानिक एसके डे विश्वास ने बताया था कि संस्था में उनके पीठ पीछे अपमानजनक बातें कही जाती हैं। उन्होंने बताया था कि उनके वेतन में जान-बूझकर देरी की जाती है और बिना किसी कारण के वेतन में से रकम काट ली जाती है। साथ ही उन्होंने ये भी आरोप लगाया था कि सीसीटीवी कैमरों में से एक को उन पर ही केंद्रित रखा जाता है, ताकि उनकी सारी गतिविधियाँ रिकॉर्ड की जा सके। CEO दीपक कुमार पर काउन्सलेट्स के साथ अभद्र व्यवहार और गाली-गलौज करने का आरोप लगाया गया था।
भारतीयों को कारा से बच्चा गोद लेने के लिए तीन से सात साल तक प्रतीक्षा सूची में रहना पड़ता है लेकिन विदेशी ईसाई परिवारों को बहुत कम समय में बच्चा मिल जाता है। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव का आलम यह है कि कारा के सीईओ दीपक कुमार ने कोरोना संकट और लॉकडाउन के समय भी बच्चों को विदेश भेजा। अप्रैल माह में भी विशेष विमान से ये बच्चे इटली, अमेरिका, माल्टा और जॉर्डन भेजे गए।
उनके दो भतीजे हैं अमन और शिशिर। इन दोनों को पहले तीन महीने तक एमटीएस के पद पर 10 हजार रुपए के मासिक वेतन के साथ रखा गया, उसके बाद यंग प्रोफेशनल्स के पद पर बिठा कर वेतनतीन गुना बढ़ा दिया गया। 9 महीने बाद तो इन दोनों को सलाहकार का पद थमा दिया गया और 60 हज़ार रुपए प्रतिमाह दिए जाने लगे। इस तरह की उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि कई नियुक्तियाँ की हैं।
गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को कॉन्ग्रेस ने राज्य में पार्टी का अध्यक्ष (कार्यकारी) बनाया है। लेकिन, हुआ यूँ कि हार्दिक पटेल अपनी नियुक्ति के बाद किए गए ट्वीट में गणित ही भूल बैठे।
हार्दिक ने राज्य में एक तिहाई बहुमत से कॉन्ग्रेस की सरकार बनाने का दावा कर दिया। इसके बाद उनकी खूब किरकिरी हुई। बाद में उन्होंने अपनी ट्वीट को डिलीट किया और सुधार कर उसे दो तिहाई बनाया।
हार्दिक पटेल ने कर दी थी एक तिहाई बहुमत से सरकार बनाने की बात
लोगों ने उनसे पूछा कि क्या वो कॉन्ग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद की ख़ुशी में गणित भी भूल बैठे हैं? एक ने तो पूछा डाला कि एक तिहाई से सरकार बनाने वाले हार्दिक अब दो तिहाई की बातें कर रहे हैं, इतने विधायक इतनी जल्दी कहाँ से जुगाड़ लिए?
बता दें कि सरकार बनाने के लिए विधानसभा सीटों की कुल संख्या के आधे से एक सीट ज्यादा लानी होती है लेकिन नेतागण प्रचंड बहुमत के लिए दो तिहाई सीटों की बात करते हैं। हार्दिक ने अध्यक्ष बनने के बाद जारी किए गए बयान में कहा:
“गुजरात कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पार्टी ने मुझे जो ज़िम्मेदारी दी है वो मेरे लिए पद नहीं लेकिन चुनौती है। मेरे जैसे ग़रीब किसान परिवार से आए व्यक्ति को इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी मिली है, उससे साबित हो गया की पार्टी सामान्य परिवार एवं नौजवान को आगे बढ़ाती हैं। लोकतंत्र एवं संविधान के बचाव के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी लड़ती रहेगी। गुजरात के विभिन्न मुद्दों को महत्व दिया जाएगा और 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में 1/3 बहुमत के साथ कॉन्ग्रेस सरकार बनाएगी। मुझ पर भरोसा जताने के लिए मैं पुनः सभी का आभार व्यक्त करता हूँ।”
कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद हार्दिक पटेल का बयान
इस दौरान हार्दिक पटेल ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को धन्यवाद दिया और कहा कि गुजरात में पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, प्रदेश प्रभारी राजीव सातव, प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा और नेता प्रतिपक्ष परेश धनानी के नेतृत्व में आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेगी। बता दें कि गुजरात में कुछ ही दिनों में 8 सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं, जिसे आगामी विधानसभा चुनाव का सेमीफइनल माना जा रहा है।
युवा और सक्रिय हार्दिक पटेल को गुजरात का प्रदेश अध्यक्ष बना कर कॉन्ग्रेस अब लड़ाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य में में जाकर भाजपा पर एक प्रकार का मानसिक दबाव बनाना चाहती है। 2017 विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा था और इसके लिए हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की तिकड़ी को जिम्मेदार माना गया था, जो राज्य में राहुल गाँधी की टीम के प्रमुख चेहरे थे।
अब इन तीनों में हार्दिक पटेल ही हैं जो हाल तक कॉन्ग्रेस के साथ खड़े रहे हैं और उनके अध्यक्ष चुने जाने वाले फैसले पर राहुल गाँधी की छाप नज़र आ रही है। हाल ही में सोनिया से कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं व सांसदों ने राहुल की वापसी की माँग की थी। सीएए विरोधी आन्दोलनों में भी हार्दिक पटेल कॉन्ग्रेस के लिए सक्रिय रहे थे। राहुल गाँधी पार्टी के पुराने सिपहसालारों के हस्तक्षेप के खिलाफ रहे हैं, ऐसे में क्या ये राहुल के लिए ज़मीन तैयार करने की कवायद है?
सोनिया गाँधी अब तक गुजरात ही नहीं बल्कि पार्टी के कई आंतरिक मामलों में अहमद पटेल पर निर्भर रही हैं, जो ईडी के शिकंजे में बुरे फँसे हुए हैं और कहा जाता है कि अहमद पटेल को पसंद न करने वाले राहुल गाँधी राज्य में नया समीकरण बनाना चाहते हैं। अब तक गाँधी परिवार से एक भी व्यक्ति के अहमद पटेल के पक्ष में आवाज़ नहीं उठाई है, क्या इसे रणनीति में बदलाव के रूप में देखा जा सकता है?
आप गौर करेंगे तो पाएँगे कि तिहाड़ में रहने के दौरान भी कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार और बड़े नेता पी चिदंबरम और डीके शिवकुमार के लिए मुखर रहे थे। हार्दिक पटेल को चुने जाने के बाद वरिष्ठ नेताओं को एक सन्देश देने की कोशिश की गई है और भाजपा पर भी उपचुनाव से पहले दबाव बनाने का प्रयास किया गया है। अब देखना है कि गुजरात में कॉन्ग्रेस का गणित एक तिहाई और दो तिहाई के बीच कहाँ जाकर अटकता है?
खुद को धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी बताने वाला कैम्प की पहचान दिखावटी घमंड और मूर्खता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल भी इसी समूह से आते हैं। अमिताभ बच्चन के कोरोना पॉजिटिव होने की ख़बर आने के बाद हर कोई चाहे वह उनका प्रशंसक हो या न हो, उनकी सलामती की दुआएँ कर रहा। लेकिन आकार पटेल जैसे लोग भी हैं, जिनकी न तो मानसिकता आम है और न ही तौर-तरीके।
आम इंसानों से ठीक विपरीत रवैया अपनाते हुए आकार पटेल ने खबर सुनते ही अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गजों के लिए नफ़रत फैलाना शुरू कर दिया। पटेल के मुताबिक़ यह 3 हस्तियाँ साबित करती हैं कि ‘पैसे से क्लास नहीं आता।’ अपनी विकृत मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए आकार ने तीनों को ‘मिडिल क्लास ऑपोरच्युनिस्ट’ (मध्यमवर्गीय अवसरवादी) भी कहा।
अपनी बात के अगले हिस्से में आकार पटेल ने कहा इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि ‘तीनों लोग (अमिताभ, अक्षय, सचिन) कितने पैसे कमाते हैं। यह छोटे ही रहने वाले हैं, इनकी मानसिकता कुएँ के मेढक जैसी ही है।’ हकीक़त कुछ और ही है। तीनों का संघर्ष और परिश्रम दुनिया ने देखा है, पूरे देश और दुनिया में लोग इन्हें पसंद करते हैं। ऐसे में आकार पटेल जैसे व्यक्ति की बात का क्या ही अर्थ निकलता है।
मेहनत करके अपना नाम कमाने वाले लोगों के लिए जिस तरह का नज़रिया पश्चिमी देशों के रईस रखते थे, ठीक उस तरह की मानसिकता आकार पटेल की भी है। आकार पटेल के पास भले अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और सचिन तेंदुलकर की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन फिर भी वह उन्हें अवसरवादी मानता है। आकार पटेल की मानें तो तीनों लोग जिन्होंने इतनी मशक्कत के बाद इतना सम्मान, पैसा और प्यार कमाया है, वह इसके हक़दार नहीं हैं।
आकार पटेल की नज़रों में सब अवसरवादी हैं क्योंकि वह किसी रईस के सामने झुके नहीं। जबकि हम तीनों के जीवन पर ध्यान दें तो सभी ने बिलकुल शुरुआत से संघर्ष किया है। अमिताभ बच्चन के पिता स्व. हरिवंश राय बच्चन उस ज़माने के मशहूर कवि थे फिर भी उन्होंने अपने हिस्से का संघर्ष पूरा किया। सचिन तेंदुलकर और अक्षय कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, दोनों ने ही अपने जीवन में हर तरह के हालातों का सामना किया है। आज की तारीख़ में देश का कोई भी नया क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर जैसा बनने का सपना रखता है।
खैर आकार पटेल जैसे लोगों के लिए परिश्रम शब्द के मायने समझना ज़रा कठिन है। उन्हें वाकई इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि जीवन में जिस तरह हर बड़ा इंसान कुछ हासिल करता है, उसके लिए वह कितनी कीमत चुकाता है। आकार पटेल को इस बात से बहुत घृणा है कि सचिन तेंदुलकर जैसे लोग अपने जीवन में अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते हैं। लेकिन आकार पटेल जैसे लोगों की दिक्कत किसी और बात से नहीं बल्कि इस बात से है कि सचिन ब्राह्मण जाति से आते हैं। उनके मुताबिक़ सचिन ने जीवन में संघर्ष नहीं किया, बल्कि अपनी जाति की वजह से उन्होंने इतना कुछ हासिल किया है।
वोक कैम्प और आकार पटेल जैसे लोग हर सफल ब्राह्मण से नफ़रत करते हैं। ठीक इसी तरह अक्षय कुमार ने भी करियर की शुरुआत बेहद निचले पायदान से की है और आज जहाँ हैं उसके लिए बहुत संघर्ष किया है। आज वह बॉलीवुड के सबसे हुनरमंद कलाकार के तौर पर पहचाने जाते हैं लेकिन अक्षय का कसूर यह है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सराहना कर दी। इसके बाद वह संभ्रांत वामपंथी समूह के निशाने पर आ गए।
सिर्फ़ यही 3 लोग नहीं बल्कि वोक और आकार पटेल की निगाह में हर वह इंसान दोषी है जिसने अपने जीवन में मेहनत की है। आज का वामपंथ असल में केवल रईसों की नुमाइंदगी करता है, ऐसा वर्ग जिसके लिए संघर्ष शब्द का कोई ख़ास मतलब नहीं होता है। वह ऐसे परिवारों में पले होते हैं जहां उन्हें सब कुछ अपने आप मिलता है। उन्हें अपनी बुनियादी ज़रूरतों और अधिकारों के लिए लड़ना नहीं पड़ता है। इनकी मंशा केवल यहीं तक सीमित है कि शक्ति और धन केवल उच्च वर्ग के लोगों तक सीमित रहे। समाज की अंतिम पंक्ति से आने वाला व्यक्ति कभी समाज में अपना नाम न बना पाए।
राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार पर गहराते संकट के बीच अपने गुट के विधायकों सहित बागी सुर लेकर दिल्ली पहुँचे उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने पुराने कॉन्ग्रेसी नेता व साथी ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाकात की।
इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट कर कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर निशाना साधा। सिंधिया ने ट्वीट किया, “यह देखकर दुखी हूँ कि मेरे पुराने सहयोगी सचिन पायलट को भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा दरकिनार किया जा रहा है। यह दिखाता है कि कॉन्ग्रेस में प्रतिभा और क्षमता पर कम ही भरोसा किया जाता है।”
Sad to see my erstwhile colleague, @SachinPilot too, being sidelined and persecuted by Rajasthan CM, @ashokgehlot51 . Shows that talent and capability find little credence in the @INCIndia .
— Jyotiraditya M. Scindia (@JM_Scindia) July 12, 2020
इधर उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ विवाद के बाद राजस्थान में जारी संकट को लेकर सीएम अशोक गहलोत ने आज रात कॉन्ग्रेस विधायकों की बैठक बुलाई है। वहीं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे के वफादार लोगों ने आरोप लगाया है कि डिप्टी सीएम सचिन पायलट भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं, उनके साथ बातचीत कर रहे हैं।
Chief Minister of Rajasthan & Congress leader Ashok Gehlot calls a meeting of party MLAs and ministers in #Jaipur tonight. (file pic) pic.twitter.com/3G18GAet2P
राजस्थान के डेप्युटी सीएम सचिन पायलट के बागी तेवरों से जयपुर से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चढ़ा हुआ है। पायलट दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। उनके साथ 23 से 24 विधायक बताए जा रहे हैं। जयपुर में सीएम अशोक गहलोत का शनिवार रात से ही विधायकों, नेताओं के साथ बैठकों का सिलसिला जारी है।
गहलोत और पायलट के बीच जारी खींचतान अब आर-पार की लड़ाई का रूप लेती जा रही है। अब मामला राज्य के स्तर से ऊपर जा चुका है और अगर आलाकमान ने समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया तो राज्य कांग्रेस में जारी यह सत्ता संघर्ष पार्टी के लिए महँगा पड़ सकता है।
राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार की हालत इतनी पतली हो गई है कि प्रशासन ने वहाँ सख्ती के नाम पर बॉर्डर ही सील कर दिया। ऊपरी तौर पर तो कहा जा रहा है कि ये कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए ये फैसला लिया गया है, लेकिन इसे कॉन्ग्रेस के भीतर भारी अंदरूनी फूट को दबाने और विधायकों को बाहर जाने से रोकने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।
वैसे तो 2018 में गहलोत सरकार बनने के बाद से ही जब-तब सीएम और डेप्युटी सीएम में अनबन की खबरें छनकर आती रही हैं। पिछले महीने हुए राज्यसभा चुनाव के बाद से ही सूबे का सियासी पारा चढ़ा हुआ है। हालाँकि, इस बार की खींचतान कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के ट्वीट से लगाया जा सकता है।
उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए आगाह किया है कि क्या पार्टी तभी जागेगी जब अस्तबल से उनके घोड़े निकल जाएँगे। उन्होंने इशारों भरे इस ट्वीट से पार्टी आलाकमान को भी संदेश दिया है कि वक्त रहते अगर सही फैसला नहीं लिया गया तो पार्टी को भारी नुकसान हो सकता है।
राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार पर संकट के बादल घने होने के साथ ही एक बार फिर छत्तीसगढ़ को लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म है। वैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकारों की आतंरिक कलह से अकाल मौत के कयास उस दिन ही लगने शुरू हो गए थे, जब 2018 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तीनों राज्यों के लिए राहुल गाँधी ने मुख्यमंत्री फाइनल किया था।
जिस तरह मध्य प्रदेश में ज्योतिदारित्य सिंधिया अपनी उपेक्षा से आहत थे, उसी तरह राजस्थान में भी सचिन पायलट को अपनी मेहनत की मलाई अशोक गहलोत को सौंपा जाना खटक रहा था। छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव को खुद के छले जाने का अहसास हो रहा था। पहल सिंधिया ने की। अब लपटें पायलट के खेमे से निकल रही है और सोशल मीडिया में सिंहदेव के भी जल्द धधकने के दावे किए जा रहे हैं।
यह सच है कि सियासी बाजियाँ सोशल मीडिया के पोस्ट के हिसाब से नहीं चली जातीं। लेकिन, यह भी उतना सच है कि सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार तभी गर्म होता है, जब खिचड़ी पक रही होती है। हालाँकि सिंहदेव अभी भी इन दावों को खारिज कर रहे हैं। पहले भी खारिज किया था।
मध्य प्रदेश में सिंधिया की बगावत के बाद उन्होंने कहा भी था, “लोग दावे करते रहें लेकिन मैं भाजपा में शामिल नहीं होऊँगा। सौ जीवन मिलने के बाद भी मैं उस विचारधारा से कभी नहीं जुड़ूँगा। जो व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के कारण भाजपा में शामिल होता है, उसे कभी सीएम नहीं बनना चाहिए।”
लेकिन, हम सब जानते हैं कि नेता बयानों के हिसाब से नहीं चलते। वे फैसले अपने सियासी भविष्य को देखकर करते हैं। कॉन्ग्रेस में ये बगावत मुख्यमंत्री बनने की भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो शिवराज की जगह सिंधिया को मध्य प्रदेश का सीएम होना था।
असल में यह आत्मसम्मान बचाने की लड़ाई है। हाईकमान लगातार इनकी उपेक्षा कर रहा है। पार्टी जिस तरीके से चलाई जा रही उससे इनकी असहमति है। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने से लेकर चीन से सीमा विवाद तक के मसलों पर पार्टी स्टैंड ने कई नेताओं को असहज कर रखा है। डिप्टी सीएम होने के बावजूद न तो पायलट की राजस्थान सरकार में सुनी जाती है और न मंत्री होते हुए सिंहदेव की छत्तीसगढ़ में।
लिहाजा इनके पास विकल्प सीमित हैं। या तो अपनी ही सरकार में उपेक्षित बने रहे या फिर उस रास्ते चलें जो सिंधिया ने चुना। राजस्थान में सियासी घटनाक्रम जिस तरह से चल रहे हैं उससे स्पष्ट है कि पायलट ने फैसला कर लिया है।
खबरों के अनुसार, राजस्थान के कॉन्ग्रेस के 24 विधायक हरियाणा और दिल्ली स्थित होटलों में पहुँच गए हैं। भयभीत राज्य सरकार ने सभी सीमाओं को सील कर दिया है। ऊपरी तौर पर तो कहा जा रहा है कि ये कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए ये फैसला लिया गया है, लेकिन इसे कॉन्ग्रेस के भीतर भारी अंदरूनी फूट को दबाने और विधायकों को बाहर जाने से रोकने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अधिकतर कॉन्ग्रेस विधायकों का फोन स्विच ऑफ है।
इधर मुख्यमंत्री गहलोत ने भी आज रात पार्टी विधायकों और मंत्रियों की बैठक बुलाई। पायलट के अहमद पटेल से भी मिलने की खबरे हैं। ऐसे में पूरी राजनीतिक तस्वीर स्पष्ट होने में मध्य प्रदेश की तरह ही कुछ वक्त लग सकता है।
Chief Minister of Rajasthan & Congress leader Ashok Gehlot calls a meeting of party MLAs and ministers in #Jaipur tonight. (file pic) pic.twitter.com/3G18GAet2P
यहाँ यह भी गौर करने वाली बात है कि पायलट ने अचानक से सियासी पारा तब चढ़ाया है, जब प्रदेश सरकार को गिराने की कथित साजिशों के मद्देनजर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने उन्हें और गहलोत को बयान जारी करने का नोटिस भेजा है। साथ ही कुछ कॉल रिकॉर्ड भी हैं जो बताते हैं कि कॉन्ग्रेस में खेमेबंदी जोरों पर है।
ऐसे ही एक कॉल के दौरान बातचीत में यह बात सामने आई कि महेन्द्रजीत सिंह मालवीय पहले उप मुख्यमंत्री के साथ थे, अब उन्होंने पाला बदल लिया है। ऐसे में पायलट को यह भी चिंता सता रही होगी कि अब और देरी करने पर गहलोत एक-एक कर उनके समर्थकों को तोड़ उन्हें अलग-थलग कर सकते हैं।
पर उनके इस कदम ने छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस की आंतरिक कलह को भी चर्चा में ला दिया है। सिंहदेव ने बीते महीने ही विधानसभा चुनाव के वक्त जारी कॉन्ग्रेस के जन-घोषणा पत्र में किए गए वादे पूरे नहीं होने को लेकर सरकार से नाराज होने के संकेत दिए थे। उन्होंने ट्वीट कर कहा था, “सभी बेरोज़गार शिक्षा कर्मियों, विद्या मितान, प्रेरकों एवं अन्य युवाओं की पीड़ा से मैं बहुत दुखी और शर्मिंदा हूँ।”
यही कारण है कि सोशल मीडिया में उनको लेकर भी पोस्ट की भरमार है। जैसा कि जशपुर के रहने वाले विवेकानंद झा लिखते हैं, “माना कि ठाकुर के हाथ नजर नहीं आते। पर ये हाथ न होते तो जय-वीरू जेल से आजाद न होते। सूत्रों की मानें तो ठाकुर भी जल्द ज्वाइन करेंगे जय-वीरू को।”
ठाकुर यानी टीएस सिंहदेव। वे सरगुजा के राजा भी हैं। मुख्यमंत्रियों का ऐलान करते हुए राहुल गाँधी ने सिंधिया और पायलट को भविष्य बताकर संकेत दिया था कि आगे उन्हें भी मौका मिल सकता है। पर 67 साल के सिंहदेव को लेकर ऐसा कोई भरोसा उन्होंने भी नहीं दिया था। सो, सिंहदेव भी जानते ही होंगे कि उनके पास सिंधिया और पायलट के उलट मौके भी सीमित ही हैं।
राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार पर संकट गहराता जा रहा है। अपने गुट के विधायकों सहित बागी सुर लेकर दिल्ली पहुँचे उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने पुराने कॉन्ग्रेसी नेता व साथी ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाकात की। यह मुलाकात दिल्ली में रविवार (12 जुलाई, 2020) को तब हुई जबकि आज के ही दिन शाम में सचिन पायलट और राहुल गाँधी की मुलाकात होनी थी।
#Jaipur: राहुल-पायलट मुलाकात को लेकर परस्पर विरोधी खबरें !
— First India News Rajasthan (@1stIndiaNews) July 12, 2020
इससे पहले चर्चा थी कि आज शाम 5.30 बजे राहुल गाँधी और सचिन पायलट की मुलाकात होगी। लेकिन अब मीडिया रिपोर्टों की मानें तो दोनों नेताओं के बीच मुलाकात को लेकर समय तय नहीं हुआ है। और इसके साथ ही राजस्थान सरकार की स्थिरता को लेकर भी संशय बना हुआ है।
राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार की हालत इतनी पतली हो गई है कि प्रशासन ने वहाँ सख्ती के नाम पर बॉर्डर ही सील कर दिया। ऊपरी तौर पर तो कहा जा रहा है कि ये कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए ये फैसला लिया गया है लेकिन इसे कॉन्ग्रेस के भीतर भारी अंदरूनी फूट को दबाने और विधायकों को बाहर जाने से रोकने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे के वफादार लोगों ने आरोप लगाया है कि डिप्टी सीएम सचिन पायलट भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं, उनके साथ बातचीत कर रहे हैं। गहलोत सरकार पर संकट मंडराते हुए देख कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने चिंता जाहिर की है। उन्होंने ट्विटर पर राजस्थान सरकार का जिक्र किए बगैर इशारे में ट्वीट करते हुए दु:ख व्यक्त किया है।
शनिवार (जुलाई 11, 2020) को सीएम अशोक गहलोत जब कैबिनेट मीटिंग कर रहे थे तो, बतौर डिप्टी सीएम सरकार के दूसरे बड़े नेता होने के बावजूद सचिन पायलट इस मीटिंग में शामिल नहीं हुए। कहा गया कि सचिन पायलट दिल्ली मे हैं, इसीलिए वो इस बैठक में शामिल नहीं हो पाए।
विकास दुबे के एनकाउंटर से उसके साथी दहशत में हैं। अरविंद उर्फ़ गुड्डन त्रिवेदी ने मुंबई से कानपुर प्लेन से भेजने की गुहार कोर्ट से लगाई है।
ठाणे में पकड़े जाने के बाद गुड्डन को 21 जुलाई तक की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। वह तलोजा जेल में बंद है। उसने कोर्ट में एक अजीबोगरीब अर्जी दाखिल की है। इसमें कानपुर प्लेन से भेजने की डिमांड रखी है। उसे सड़क मार्ग से ले जाए जाने पर एनकाउंटर का डर सता रहा है। उसकी अर्जी पर कोर्ट ने अभी फैसला नहीं दिया है।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र ATS ने विकास दुबे के साथी गुड्डन त्रिवेदी को ठाणे से धर-दबोचा था। गुड्डन त्रिवेदी को सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उत्तर प्रदेश लाया जाएगा। महाराष्ट्र ATS ने गुड्डन त्रिवेदी और उसके साथ पकड़े गए सोनू तिवारी की गिरफ़्तारी की पुष्टि की थी। गुड्डन त्रिवेदी को सपा के मुखिया अखिलेश यादव के साथ कई तस्वीरों में देखा गया है। गुड्डन सपा के बड़े नेताओं का क़रीबी बताया जा रहा है।
महाराष्ट्र ATS द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, मुंबई पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी की कानपुर एनकाउंटर मामले में एक आरोपित ठाणे में छिपा हुआ है। गुड्डन त्रिवेदी पर यूपी पुलिस ने 25 हज़ार रुपए का इनाम रखा हुआ था। एटीएस की जूहू यूनिट ने कोलशेट रोड पर छापा डालकर आरोपी अरविंद उर्फ ‘गुड्डन रामविलास त्रिवेदी’ और उसके ड्राइवर सोनू तिवारी की गिरफ़्तारी को अंजाम दिया।
यूपी एसटीएफ इस मामले में महाराष्ट्र एटीएस के संपर्क में है। गुड्डन त्रिवेदी के बारे में बता दें कि उसने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर बायो में ‘समाजवादी पार्टी ज़िंदाबाद’ लिख रखा है। वो कानपुर का रहने वाला है। सोनू तिवारी उसका ड्राइवर है।
गुड्डन त्रिवेदी के बारे में बता दें कि वो 2001 में राज्यमंत्री संतोष शुक्ला हत्याकांड में भी शामिल रहा है। विकास दुबे के साथ मिल कर उसने कई हत्याकांड व अन्य वारदातों को अंजाम दिया था। गुड्डन त्रिवेदी का नाम उस पोस्टर में भी शामिल है, जिसमें विकास दुबे के 12 सहयोगियों की तस्वीर लगाई गई है और सूचनाएँ दी गई हैं।
देश के तमाम राज्यों में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की हालत पहले ही बहुत अच्छी नहीं है। इसके बावजूद सबसे पुराने दल को कोई न कोई झटका मिल ही जाता है। हालाँकि कॉन्ग्रेस के हालात राजस्थान में नाज़ुक है लेकिन उसके अलावा उसे एक झटका मध्य प्रदेश में भी मिला है। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस विधायक प्रद्युम्न लोधी ने इस्तीफ़ा देकर भारतीय जनता पार्टी का हाथ थाम लिया है।
कॉन्ग्रेस को यह झटका ऐसे समय में लगा है, जब प्रदेश में उप चुनाव होने ही वाले हैं। प्रद्युम्न लोधी मध्य प्रदेश के बड़ा मलहरा क्षेत्र से विधायक हैं। उन्होंने अपना इस्तीफ़ा प्रोटेम स्पीकर रामेश्वर शर्मा को सौंपा, जिसे स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद वह शिवराज सिंह चौहान से मिलने के लिए मुख्यमंत्री आवास पहुँचे।
Madhya Pradesh: Pradhyuman Singh Lodhi, Congress MLA from Bada Malhera meets Chief Minister Shivraj Singh Chouhan in Bhopal to join Bharatiya Janata Party (BJP). pic.twitter.com/vYsul3pxsX
शिवराज सिंह चौहान से मिलने के बाद उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती से भी मुलाक़ात की। अंत में वह भाजपा के प्रदेश कार्यालय गए और वहाँ उन्होंने पार्टी की सदस्यता ले ली। इस दौरान मौके पर शिवराज सिंह चौहान, वीडी शर्मा समेत कई नेता मौजूद थे।
क्योंकि उप-चुनाव नज़दीक हैं इसलिए कॉन्ग्रेस के सामने चुनौतियाँ बढ़ने ही वाली हैं। वहीं लोधी का इस मुद्दे पर कहना था कि वह बुंदेलखंड का विकास करने के लिए भाजपा में शामिल हुए हैं। उन्होंने बुंदेलखंड क्षेत्र में भाजपा सरकार द्वारा किए गए कार्यों की सराहना भी की। उनके मुताबिक़ कॉन्ग्रेस की सरकार इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल रही है। तुलनात्मक रूप से भाजपा ने उस क्षेत्र में जिस तरह कार्य किया है, वह सराहनीय है।
सचिन पायलट और अशोक गहलोत
इस बीच राजस्थान में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कॉन्ग्रेस के हिस्से में आने वाले राजनीतिक समीकरण बहुत सुलझे हुए नज़र नहीं आ रहे हैं। कॉन्ग्रेस की गहलोत सरकार पर संकट गहराता जा रहा है।
राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच के तनातनी अब खुल कर सामने आ गई है। सचिन पायलट का आरोप है कि उन्हें नज़र अंदाज किया जा रहा है। सरकार के फैसलों में अहमियत नहीं दी जाती है। उधर अशोक गहलोत खेमे के लोगों का आरोप है कि सचिन पायलट बीजेपी के संपर्क में हैं।
बॉलीवुड स्टार अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद अब ऐश्वर्या राय बच्चन को भी कोरोना हो गया है। ताजा जानकारी के मुताबिक ऐश्वर्या राय बच्चन और उनकी बेटी आराध्या बच्चन का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है। महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने इस बात की पुष्टि की है।
उन्होंने ट्वीट किया, “ऐश्वर्या राय बच्चन और उनकी बेटी आराध्या बच्चन भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। जया बच्चन की कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई है। हम बच्चन परिवार के जल्द ठीक होने की कामना करते हैं।”
Aishwarya Rai Bachchan and her daughter Aaradhya Bachchan test positive for #COVID19. Jaya Bachchan tests negative: Maharashtra Health Minister Rajesh Tope pic.twitter.com/lpLvLGufxk
बता दें कि शनिवार (जुलाई 11, 2020) रात ऐश्वर्या राय बच्चन, आराध्या और जया बच्चन का टेस्ट नेगेटिव आया था। हालाँकि अब ऐश्वर्या और आराध्या के टेस्ट पॉजिटिव हैं। लेकिन जया बच्चन अभी भी कोरोना नेगेटिव ही हैं।
रविवार (जुलाई 12, 2020) सुबह अमिताभ के बंगले जलसा को BMC से सैनिटाइज किया है। बताया जा रहा है कि ऐश्वर्या राय बच्चन और आराध्या में कोरोना का कोई लक्षण नहीं था। अभी इस बात का खुलासा नहीं किया गया है कि ऐश्वर्या और आराध्या को होम क्वारंटाइन किया जाएगा या फिर उन्हें भी अस्पताल में भर्ती करवाया जाएगा।
गौरतलब है कि शनिवार रात अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया था। इन दोनों को मुंबई के नानावती अस्पताल में एडमिट करवाया गया। दोनों का इलाज इस समय अस्पताल के आइसोलेशन वॉर्ड में चल रहा है। बताया गया है कि दोनों में कोरोना के हल्के लक्षण थे। अभी उनकी हालत स्थिर है।
कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद अमिताभ बच्चन ने अपने ट्वीट में लिखा था, “मैं कोरोना पॉजिटिव पाया गया हूँ, मुझे अस्पताल में भर्ती किया जा रहा है।” इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि जितने भी लोग पिछले 10 दिन के दौरान उनके संपर्क में आए हों, ज़रूर अपनी जाँच करा लें।
अमिताभ बच्चन के कोरोना पॉजिटिव होने के बाद से ही कई बड़े सेलेब्स के भी संक्रमित होने की खबरें काफी वायरल हो रही हैं। नीतू सिंह, करन जौहर, रणवीर कपूर के बाद खबरें थीं कि हेमा मालिनी भी संक्रमित हो चुकी हैं। हालाँकि ये खबरें झूठी साबित हुईं। इस पर अब एक्ट्रेस ने खुद एक वीडियो मैसेज जारी कर अपने ठीक होने की जानकारी दी है।
ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी ने रविवार सुबह अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो जारी किया है। इसमें उन्होंने कहा, “हैलो, राधे राधे। कुछ लोग मेरे बारे में न्यूज सुनकर काफी परेशान हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं भगवान कृष्ण के आशीर्वाद से पूरी तरह से ठीक हूँ।”
इस वीडियो को शेयर करते हुए हेमा लिखती हैं, “डियर ऑल, इनती फिक्र दिखाने के लिए शुक्रिया। मैं भगवान कृष्ण के आशीर्वाद से पूरी तरह ठीक हूँ। राधे राधे। आप सभी घर पर रहें, और सुरक्षित रहें।”