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‘परिवार’ और उसके चाटुकार एक राजवंश को ही विपक्ष मानते हैं, उनके सिवा सभी दल सरकार के साथ: चीन तनाव पर बोले नड्डा

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कॉन्ग्रेस के गाँधी परिवार पर निशाना साधते हुए कहा है कि भारत-चीन तनाव मसले पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सभी राजनीतिक पार्टियाँ सरकार के साथ खड़ी थीं लेकिन सिर्फ़ एक परिवार ऐसा था जो सरकार के साथ नहीं था। बुधवार (जून 24, 2020) को नड्डा ने बयान दिया कि पहले तो राजवंश झूठे बयान देता है और फिर उसके चाटुकार झूठ फैलाने में जुट जाते हैं।

भाजपा अध्यक्ष ने सोशल मीडिया पर कई ट्वीट्स के माध्यम से लिखा कि एक राजवंश और उसके चाटुकार एक ही परिवार को विपक्ष की तरह मान रहे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या बाकी विपक्षी राजनीतिक दल विपक्ष की भूमिका में नहीं हैं? उन्होंने कहा कि एक राजपरिवार झूठ पर झूठ बोलता है और उसके वफादार उसे चारों ओर फैलाने में लग जाते हैं, अभी भी वो लोग इस वक्त ये सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।

जेपी नड्डा ने स्पष्ट कहा कि जनता ने राजवंश को रिजेक्ट कर दिया है और अलग-थलग कर दिया है, इसीलिए वो अकेली राजनीतिक पार्टी नहीं है। उन्होंने दोहराया कि राजपरिवार ही सिर्फ़ विपक्ष नहीं है। बकौल नड्डा, आज जब देश हमारी सशस्त्र सेनाओं के पीछे एकजुट होकर खड़ा है और उनका मनोबल बढ़ा रहा है, ये एकता और सौहार्द दिखाने का समय है। उन्होंने कहा कि अनगिनत बार राजपरिवार के एक वंशज को लॉन्च किए जाने के लिए इंतजार किया जा सकता है।

हालाँकि, जेपी नड्डा ने ये भी कहा कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में एक अच्छे विपक्ष का काम ही है सवाल पूछने का और सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष सभी विपक्षी नेताओं ने अपनी बात रखी और अपने सुझावों से सरकार को अवगत कराया। उन्होंने जानकारी दी कि सभी दलों ने मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों के प्रति विश्वास जताया और कहा कि वो इस समस्या को सुलझाएँ लेकिन एक परिवार अपवाद है। उन्होंने लोगों से कहा कि वो परिवार कौन है, आप पता कर सकते हैं।

जेपी नड्डा का कॉन्ग्रेस पर निशाना

जेपी नड्डा ने कहा कि एक परिवार का हित देशहित नहीं होता है और एक परिवार पूरा विपक्ष नहीं होता है। जेपी नड्डा ने याद दिलाया कि एक परिवार की गलती के कारण ही हमारे देश ने हजारों स्क्वायर किलोमीटर की जमीन गँवा दी। उन्होंने याद दिलाया कि कसी तरह सियाचिन का ग्लेशियर भी लगभग भारत से अलग होते-होते रह गया था। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि इन्हीं सब कारणों से देश की जनता ने उन्हें नकार दिया।

इससे पहले सर्वदलीय बैठक को लेकर विपक्ष के दुष्प्रचार का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कार्यालय के माध्यम से बयान जारी कर कहा था कि  ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ के साथ छेड़छाड़ करने की किसी भी प्रकार की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बकौल पीएम मोदी, पहले इस तरह की छेड़छाड़ पर सरकारें इसे नज़रअंदाज़ कर देती थीं लेकिन अब सेना के जवाब ऐसा करने वालों को रोकते-टोकते हैं।

पीएमओ ने कहा था कि भारतीय क्षेत्र की क्या परिभाषा है, ये आधिकारिक नक़्शे से तय होता है। पिछले 60 साल में किस तरह से देश की 43,000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में चली गई, इस बारे में भी सभी दलों को बताया गया कि ऐसे समय में जब हमारे जवान सीमा पर हमारी सुरक्षा करते हुए खड़े हैं, पीएम मोदी के बयान को लेकर इस तरह का दुष्प्रचार फैलाया जाना उनके आत्मविश्वास को डिगाने वाली दुर्भाग्यपूर्ण हरकत है।

IMA ‘हलाल’ पोंजी घोटाला: निलंबित IAS विजय शंकर ने की आत्महत्या, ₹1.5 करोड़ घूस लेने पर हुई थी गिरफ्तारी

IMA ‘हलाल’ पोंजी घोटाले में आरोपित व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विजय शंकर ने बेंगलुरु के अपने आवास पर मंगलवार (जून 23, 2020) को आत्महत्या कर ली। SIT ने विजय शंकर को पिछले साल ₹1.5 करोड की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था।

विजय शंकर की आत्महत्या की पुष्टि बेंगलुरु पुलिस आयुक्त भास्कर राव ने की है। उन्होंने बताया, “बेंगलुरु के पूर्व डिप्टी कमिश्नर विजय शंकर ने अपने घर पर सुसाइड कर ली है। ये असामान्य मौत है और हम इस मामले पर जाँच कर रहे हैं।”

इससे पहले विजयशंकर को SIT ने ₹4000 करोड़ के आईएमए स्कैम में संलिप्ता पाए जाने के बाद 8 जुलाई को गिरफ्तार किया था। उन्हें इस दौरान बेंगलुरु के परप्पना अग्रहारा जेल में न्यायिक हिरासत में रखा गया था। मगर, एक महीने बाद विशेष अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी।

इस मामले के संबंध में पिछले साल 30 अगस्त को सीबीआई ने 3 एफआईआर दायर की थी। इनमें से एक में जाँच एजेंसी ने आईएमए संस्थापक मंसूर खान समेत 19 लोगों को आरोपित बनाया था। विजय शंकर का नाम तीसरी एफआईआर में था।

बता दें कि शुरुआत में कर्नाटक सरकार ने विजयशंकर और एलसी नागराज को IMA घोटाले की छानबीन के लिए जाँच अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया था। लेकिन सीबीआई ने पाया कि इन्होंने तो अपनी रिपोर्ट आईएमए के समर्थन में दी, जिसके कारण हजारों लोगों का रुपया डूबा।

पूछताछ में दोनों ने स्वीकारा कि उन्होंने आईएमए निदेशकों से घूस ली थी। विजयशंकर को इस काम के लिए 1.5 करोड़ रुपए मिले थे। 11 जून 2020 को सीबीआई ने राज्य सरकार से विजय शंकर व दो अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ पोंजी घोटाले में मुकदमा चलाने का अनुरोध किया।

IMA हलाल निवेश घोटाला 

आईएमए की हलाल पोंजी स्कीम को आईएमए ग्रुप के संस्थापक मोहम्मद मंसूर खान व उसके साथियों द्वारा संचालित किया जा रहा था। इसके तहत निवेशकों से वादा किया गया था कि उनका पैसा इस्लामी तरीके से निवेश करके उन्हें उच्च रिटर्न दिया जाएगा। इसी लालच में कम से कम 40 हजार निवेशकों ने अपने पैसे लगाए और 4000 करोड़ रुपए से ज्यादा के घोटाले को अंजाम दिया गया।

ये केस कर्नाटक में धोखाधड़ी के मामलों में सबसे बड़े केसों में से है। इसके कारण 40,000 से ज्यादा लोगों का नुकसान हुआ। लोगों को ज्यादा रिटर्न का लालच देकर फँसाया गया। सच्चाई पता चलने के बाद करीब 41000 शिकायतें IMA संस्थापक के ख़िलाफ़ दर्ज हुईं और मंसूर खान को गिरफ्तार किया गया। इस पूरे मामले में BZ जमीर अहमद खान और पूर्व विधायक रोशन बेग जैसे कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं का भी नाम सामने आया था। इसके कारण यह केस हाई प्रोफाइल केस बन गया था।

श्रीनगर की वह खौफनाक रात: सुरक्षा में तैनात DSP की मस्जिद के बाहर पीट-पीटकर हत्या, नंगा कर घसीटा

आज से करीब 3 साल पहले रमजान के दौरान श्रीनगर के जामिया मस्जिद के बाहर एक जांबाज पुलिस ऑफिसर को इस्लामिक भीड़ ने कथित तौर पर कश्मीरी पंडित समझकर पीट-पीटकर मारा डाला था। 

23 जून 2017 की वह सुबह हर किसी के लिए हैरान करने वाली थी। नौहट्टा के जामिया मस्जिद के बाहर एक डीएसपी के शव पड़े होने की खबर तब तक सामने आने लगी थी। मोहम्मद अयूब पंडित नामक इस पुलिस अधिकारी की हत्या 22 जून की रात कर दी गई थी।

हर कोई अयूब पंडित की हत्या की खबर सुनकर सकते में था। चारों ओर बस यही सवाल घूम रहा था कि आखिर कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है कि अपनी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी के साथ ऐसी बर्बरता करे।

57 साल के मोहम्मद अयूब पंडित का शव 23 जून को श्रीनगर के मुख्य मस्जिद के बाहर से क्षत-विक्षत स्थिति में बरामद हुआ था। उससे एक रात पहले उसी मस्जिद में हजारों की संख्या में शब-ए कद्र की नमाज अदा करने के लिए मुस्लिम भीड़ इकट्ठा हुई थी। इन्हीं लोगों की सुरक्षा में अयूब को वहाँ तैनात किया गया था। लेकिन अगले दिन उनका शव उसी मस्जिद के बाहर ऐसे मिला जैसे कोई टूटा हुआ गन्ना हो।

इस्लामिक भीड़ की हर बर्बरता को मीडिया के सामने रखते हुए शीर्ष अधिकारियों ने बताया था कि एसपी पर हमले के बाद उन्हें नंगा किया गया और फिर बहुत ही हिंसक तरह से उन्हें भीड़ ने मार दिया।

उनके हाथ-पाँव ऐसे मुड़े हुए थे, जैसे खाने से पहले गन्ने को तोड़ा जाता है। पड़ताल होने पर मालूम चला कि अधिकारी को मारने के लिए इस्लामिक आतताइयों ने लोहे की छड़ तक का इस्तेमाल किया था।

अब आखिर मोहम्मद अयूब की गलती क्या थी? बस ये कि वे रमजान के महीने में उस दिन उन लोगों की सुरक्षा में बिन वर्दी के तैनात हुए, जिन्हें इंसानियत का मतलब तक नहीं मालूम था।

पुलिस के अनुसार, उस दिन मस्जिद के बाहर चार उपद्रवियों की नजर उनपर पड़ गई। इसके बाद उन चारों ने पुलिस अधिकारी से ही पूछताछ करनी शुरू कर दी। जब बात आगे बढ़ी तो उपद्रवियों ने मोहम्मद अयूब से पहचान पत्र दिखाने को बोला। लेकिन डीएसपी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद उपद्रवियों ने उनसे हाथापाई शुरू कर दी और फिर कई अन्य लोग भी वहाँ इकट्ठा होते गए। भीड़ को बढ़ता देख डीएसपी ने सर्विस रिवाल्वर से कमर के नीचें कुछ गोलियाँ चलाईं। जिसमें तीन हमलावर घायल हो गए। भीड़ इसके बाद और आक्रमक हो गई और उन्हें तब तक मारती रही जब तक उनका दम नहीं निकला।

बताया जाता है कि डीएसपी को मारकर करीब 400 मीटर कर घसीटा गया और फिर पहचान पता करने के लिए उन्हें नंगा भी किया। लेकिन उस समय तक वे खत्म हो चुके थे।

आतताइयों ने डीएसपी की हालत ऐसी कर दी थी कि उनकी शिनाख्त करने में बहुत वक्त लगा। उनका शरीर पूर्ण रूप से विकृत था और हाथ-पाँव टूट चुके थे।

जिस समय डीएसपी के साथ ये बर्बरतता हुई उस समय हुर्रियत अध्यक्ष मीरवाइज उमर वहीं मस्जिद में मौजूद था। कुछ स्थानीय युवकों ने इस घटना की वीडियो बनाई थी। इसे देखने के बाद पुलिस अधिकारियों ने 20 लोगों को गिरफ्तार किया। इनके पास से डीएसपी की पिस्तौल और दूसरे कुछ सामान भी बरामद किए गए।

ये बात भी मालूम चली कि हत्या का मास्टरमाइंड घटना के बाद कुछ दिन बाद ही आतंकी गिरोह में शामिल हो गया था। लेकिन 12 जुलाई 2017 को एक मुठभेड़ में उसे मार गिराया गया। उसका नाम सज्जाद अहमद गिलकर था।

73% भारतीयों का मोदी में भरोसा बरकरार, 61% की नजर में राहुल गाँधी भरोसे के लायक नहीं: सर्वे

चीन के साथ हालिया तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बनी हुई है। ताजा सर्वे में करीब 73 फीसदी लोगों ने उनके नेतृत्व में भरोसा जताया। वहीं सर्वे में शामिल करीब 61 फीसदी लोगों का कहना था कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भरोसे के लायक नहीं हैं।

यह स्नैप पोल एबीपी न्यूज़ और सी वोटर की ओर से कराया गया था। इस दौरान 10,500 लोगों से बातचीत की गई है। अलग-अलग सवालों पर उनसे रायशुमारी की गई।

सर्वे में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पूछे गए सवाल पर 72.6 प्रतिशत लोगों ने नरेंद्र मोदी पर विश्वास जताया। सिर्फ 14.4 प्रतिशत लोगों ने ही अपना विश्वास राहुल गाँधी को लेकर दर्शाया।

इस सर्वे में लोगों ने पाकिस्तान की तुलना में चीन को भारत के लिए अधिक घातक बताया। सर्वेक्षण के अनुसार, 68 प्रतिशत भारतीयों का मानना है कि पाकिस्तान की तुलना में चीन भारत के लिए अधिक चिंता का विषय है।

73.6 प्रतिशत भारतीयों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार चीन की धोखेबाजी का बदला लेने में सक्षम है। केवल 16.7 प्रतिशत लोगों ने माना कि कॉन्ग्रेस बेहतर तरीके से उससे निपट सकती।

गौरतलब है सर्वे में पीएम मोदी और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की लोकप्रियता में ज़मीन-आसमान का अंतर देखने को मिला। 61% लोगों का कहना था कि राहुल गाँधी देश के लिए विश्वास पात्र नहीं हैं। उनका मानना हैं कि इस वक़्त सीमा में तनाव का माहौल होने के बावजूद राहुल गाँधी अपने ‘असफल कूटनीति’ के तहत सरकार पर हमला करने में चूक नहीं रहे हैं।

गलवान में हुए हमले के बाद 68% देश के नागरिकों का यह भी मानना है कि वे चीन निर्मित सामानों का बहिष्कार कर उसकी इकोनॉमी को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। 31 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे चीनी माल खरीदना जारी रखेंगे, क्योंकि उन्हें इस गतिरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता।

60% लोग चाहते हैं कि चीन को मुँहतोड़ जवाब दिया जाए। 39 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा कि मोदी सरकार ने गलवान घाटी में चीन को कठोर प्रतिक्रिया दी।

बॉलीवुड के सारे शेर कायर बन बिल में छिप गए हैं, सुशांत मामले में सच्चाई कुछ और: शेखर सुमन ने कहा- यह सुसाइड नहीं

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले में न्याय के लिए कई लोगों ने अभियान शुरू किया है। इनमें से एक नाम अभिनेता शेखर सुमन का भी है। उन्होंने इस मामले की सीबीआई जाँच के लिए आवाज़ उठाई है।

शेखर सुमन ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें इस बता पर यकीन नहीं है कि सुशांत सिंह राजपूत जैसा मजबूत इरादों वाला और प्रतिभाशाली व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता तो वो कोई न कोई सुसाइड नोट ज़रूर छोड़ जाते।

उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में सीबीआई जाँच के लिए दबाव बनाने हेतु ‘जस्टिस फॉर सुशांत फोरम’ की स्थापना की है। उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य है तानाशाही और गुटबाजी ख़त्म करना और माफियाओं पर लगाम लगाना।

उन्होंने सोशल मीडिया में एक ट्वीट के माध्यम से इस बात की सूचना दी। उन्होंने निवेदन किया कि वे इस फोरम के लिए जनता के सहयोग की अपेक्षा रखते हैं।

शेखर सुमन ने अपने ट्वीट में ‘बॉलीवुड के माफियाओं’ पर लगाम लगाने के लिए लोगों से आवाज़ उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि सुशांत सिंह राजपूत एक बिहारी थे और इसीलिए बिहारियों की भावनाएँ इस घटना के बाद उबाल पर है।

साथ ही उन्होंने कहा कि ये हर राज्य के प्रतिभाशाली लोगों की समस्या है और हमें प्रयास करना चाहिए कि भविष्य में फिर से कोई युवक सुशांत सिंह राजपूत की गति को न प्राप्त हो।

उन्होंने कहा कि कई लोगों की तरह उनके भी दिल से आवाज़ उठ रही है कि सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले में जो दिख रहा है, सच्चाई उससे कहीं परे हैं। शेखर सुमन ने गुटबाजों पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि फिल्म इंडस्ट्री के सारे शेर बनने वाले कायर सुशांत के चाहने वालों के कहर से चूहे बन कर बिल में घुस गए हैं, उनके मुखौटे गिर गए हैं।

उन्होंने कहा कि दोहरे रवैये वालों की पोल खुल गई है और न्याय होने तक देश या बिहार चुप नहीं बैठेगा।

उधर दिवंगत अभिनेता इरफ़ान खान के बेटे बाबिल ने सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद गर्म हुए चर्चाओं के बाजार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि नेपोटिज्म का विरोध सही है, लेकिन इसमें किसी के नाम को लेकर अपनी लड़ाई न लड़ें। उनका कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद सभी को दोष देने का खेल शुरू हो गया है और इसका कोई अर्थ नहीं बनता है। उन्होंने लोगों से कहा कि वो सुशांत का नाम लिए बिना नेपोटिज्म के खिलाफ आवाज़ उठाएँ।

बता दें कि अभिनेत्री कंगना रनौत और रवीना टंडन के अलावा निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप ने भी बॉलीवुड में गुटबाजी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी। बकौल अभिनव, वो लोग ऐसे सफेदपोश हैं जिनके सभी से अच्छे सम्बन्ध हैं और इस खेल में सभी शामिल हैं। उनकी थ्योरी है- “हमाम में सब नंगे हैं, जो नहीं हैं, उनको नंगा करो क्योंकि अगर एक भी पकड़ा गया तो सभी पकड़े जाएँगे।

इरफ़ान के बेटे बाबिल ने इंस्टाग्राम के माध्यम से दिया बयान

वहीं कंगना ने कहा था कि बॉलीवुड के लिए सुशांत ने इतनी अच्छी फिल्में कीं। मगर उन्हें कभी कोई अवॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने ‘काय पो छे’ से डेब्यू किया। उन्हें डेब्यू तक का अवॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने 6-7 साल के अंतराल में केदारनाथ, धोनी और छिछोरे जैसी अच्छी फिल्में बनाईं। मगर, फिर भी उन्हें कोई अवॉर्ड नहीं मिला। कोई सराहना नहीं मिली। वहीं, गली बॉय जैसी वाहियात फिल्म को अवॉर्ड मिल जाते हैं।

केवल एक गाँव नहीं, 10 जगहों पर नेपाल की 33 हेक्टेयर जमीन चीन ने निगली: नदियों का प्रवाह भी बदला

चीन ने तिब्बत में सड़कों के निर्माण में आक्रामक रूप से तेज़ी लाई है। इसी क्रम में वह एक के बाद एक नेपाल की जमीन हडपता जा रहा है।

अंदेशा जताया गया है कि चीन इन सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाल की हड़पी हुई जमीन पर बॉर्डर आउटपोस्ट भी स्थापित कर सकता है। नेपाल सरकार की रिपोर्ट के हवाले से ANI ने इस बात का खुलासा किया है

हालाँकि, अभी तक वह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। बगदारे खोला और करनैल नदी की तरफ चीन ने कंस्ट्रक्शन का काम शुरू भी कर दिया है। रासुवा जिले में नेपाल की 6 हेक्टेयर जमीन चीन ने हड़प ली है।

शिनजेन, भूर्जक और जम्बू खोला क्षेत्रों में तिब्बत में हो रहे आक्रमण निर्माण कार्य से गड़बड़ी आई है। इससे पहले नेपाल की 11 हेक्टेयर जमीन चीन ने पहले ही हड़प रखी है।

चीन का कहना है कि ये जमीन तिब्बत में पड़ती है, इसीलिए चीन की है। सिंदुपकचौक जिले के खरने खोला और भोटे कोसी इलाक़ों में चीन ने ये कृत्य किया है।

सुमजुंग, कामखोला और अरुण- तिब्बत में हो रहे तेज़ निर्माण कार्य के कारण इन तीनों नदियों का रुख भी बदल गया है और इनके प्रवाह में विघ्न उत्पन्न हुआ है। चीन ने इन नदियों के प्रवाह को बदल कर नेपाल के साथ अपनी सीमा को भी सुविधानुसार बदल दिया है।

नेपाल की ‘सर्वे डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर इंडस्ट्री’ ने अपनी रिपोर्ट में ये बातें बताई गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल मिला कर चीन ने अब तक 10 अलग-अलग क्षेत्रों में नेपाल की 33 हेक्टेयर की जमीन का अवैध अतिक्रमण किया है।

तिब्बत में बह रही कुछ नदियों का तो चीन ने रुख ही बदल दिया है, जिससे वो नेपाल की तरफ बहने लगी हैं। ये नदियाँ नेपाल के अधिकार वाले क्षेत्रों को घटा रही हैं और अगर ऐसा ही चलता रहा तो नेपाल की अधिकतर जमीन तिब्बत में चली जाएगी, ऐसा रिपोर्ट का कहना है।

हुम्ला जिले में 10 हेक्टेयर की नेपाली जमीन पर चीन ने कब्जा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नदियों का प्रवाह बदलने मात्र से नेपाल की सैकड़ों किलोमीटर जमीन यूँ ही तिब्बत में चली जाएगी। अंदेशा जताया गया है कि चीन इन कब्जाए हुए क्षेत्रों में बॉर्डर ऑब्जरवेशन पोस्ट स्थापित करेगा। नेपाल ने 1960 में सर्वे के बाद सीमा पर कुछ पिलर स्थापित किए थे, जिसके बाद उसने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए कुछ नहीं किया है।

जहाँ नेपाल ने भारत के साथ अपनी सीमाओं पर ज्यादा ध्यान देते हुए इस तरफ 8553 पिलरों का निर्माण कराया, उसने चीन के साथ लगती उत्तरी सीमा पर महज 100 पिलर गाड़ कर उन्हें यूँ ही छोड़ दिया। अब समस्या उधर से ही आ रही है।

हालिया दिनों में चीन ने अपने सभी पड़ोसियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया है। ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और तिब्बत पर अपना कब्ज़ा बनाए रखने के लिए चीन तानाशाही रवैया भी अपना रहा है।

इससे पहले ख़बर आई थी कि नेपाल के एक गाँव पर चीन ने कब्जा जमा लिया है। चीन ने नेपाल के गोरखा जिले के रुई गाँव पर कब्जा किया है। अब ये हिस्सा चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत के कब्जे में आ चुका है। मगर, नेपाल सरकार इस सच्चाई को बताने से गुरेज कर रही है।

रुई नामक इस गाँव को भले ही नेपाल अब भी अपने मैप में दर्शा रहा है, लेकिन ये पूर्ण रूप से चीन के कब्जे में है। चीन ने वहाँ अपना व्यापार स्थापित करने के लिए सभी सीमाओं को हटा दिया है।

भारत-चीन के हिंसक झड़प के बाद गर्बाधार से चीन सीमा लिपुलेख तक सड़क निर्माण के बाद नेपाल ने भी दार्चुला-टिंकर सड़क पर काम तेज कर दिया है। इस निर्माण कार्य में नेपाल के नहीं बल्कि 30 चीनी इंजिनियर लगे हुए हैं। इन्हें नेपाल ने नेपाली सैनिकों की वर्दी में सैनिक हेलीकॉप्टर के जरिए वहाँ पहुँचाया है और उसी से निर्माण कार्य में लगने वाले समान को भी मुहैया कराया जा रहा है।

मनमोहन जमाने का एक और फ्रॉड: ₹21000 करोड़ का मामला, SBI के नेतृत्व वाले बैंकों ने वीडियोकॉन को पहुँचाया फायदा

जाँच एजेंसी CBI ने वीडियोकॉन ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर वेणुगोपाल धूत के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है। आरोप है कि उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के नेतृत्व वाले भारतीय सरकारी बैंकों के समूह को तगड़ा वित्तीय नुकसान पहुँचाया है। वीडियोकॉन को गलत तरीके से लाभ पहुँचाने के मामले में धूत के अलावा कम्पनी के अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी जाँच शुरू कर दी गई है।

इससे पहले वीडियोकॉन लोन मामले में चंदा कोचर और उनके पति दीपक कोचर के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इस केस की खासी चर्चा भी हुई थी। धूत के ख़िलाफ़ अब भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया गया है, जो लोन मामले में पहले से ही कोचर दम्पति के साथ आरोपित हैं। सीबीआई ने पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय एवं एसबीआई के नेतृत्व वाले बैंकों के कंसोर्टियम के अधिकारियों के खिलाफ जाँच करने के बाद वेणुगोपाल धूत के विरुद्ध FIR दर्ज की

CBI ने अपनी जाँच के दौरान पाया है कि 2008 में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज की ही कम्पनी वीडियोकॉन हाइड्रोकार्बन होल्डिंग लिमिटेड (VHHL) ने मोजम्बिक में अमेरिकी कंपनी अनादारको से रोउमा क्षेत्र में गैस ब्लॉक में 10% की हिस्सेदारी ली। बता दें कि तब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-1 की सरकार चल रही थी। बाद में इसे ओएनजीसी विदेश लिमिटेड और ऑयल इंडिया लिमिटेड ने जनवरी 2014 में खरीद लिया था

अप्रैल 2012 में एसबीआई के नेतृत्व वाले बैंकों के एक समूह ने मोजम्बिक, ब्राजील और इंडोनेशिया में अपने तेल एवं गैस परिसंपत्तियों के विकास के लिये ‘स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट’ (एसबीएलसी) सुविधा प्रदान की थी। उसे 2773.60 मिलियन डॉलर का एसबीएलसी दिया गया। इसमें से 1103 मिलियन डॉलर की एसबीएलसी फैसिलिटी को रीफाइनेंस किया गया, जिसमें से 400 मिलियन डॉलर स्टैंडर्स चार्टर्ड बैंक (एससीबी) लंदन को चुकाए गए।

तब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी और सोनिया गाँधी उस सरकार की सर्वेसर्वा हुआ करती थीं। जाँच के अनुसार, एसबीआई के नेतृत्व में लोन देने वाले बैंकों के कई अधिकारियों ने धूत के साथ साजिश रच कर वीएचएचएल को एससीबी से लगातार लाभ पहुँचाया।

यह भी आरोप है कि फरवरी 2013 में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने बैंकों के समूह को बताया था कि एससीबी लोन 530 मिलियन डॉलर अतिरिक्त हो गया है, इसलिए इस लोन को चुका कर तेल और गैस संपत्ति का अधिग्रहण कर लिया जाए।

सीबीआई के अनुसार, बैंकों के समूह ने बिना किसी छानबीन के ही बढ़ी हुई धनराशि मँजूर कर दी। कुल मिला कर लगभग 20,880 करोड़ रुपए के क्रेडिट सैंक्शन किए जाने का यह मामला है।

नाबालिग हिंदू को वजीर हुसैन ने किया अगवा, जबरन इस्लाम कबूल करवा किया निकाह: पाकिस्तान के सिंध की घटना

पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के अपहरण और धर्मांतरण का सिलसिला जारी है। हालिया मामला सिंध के जकोबाबाद का है। यहाँ से 18 जून को एक नाबालिग हिंदू लड़की का वजीर हुसैन ने अपहरण किया और फिर जबरन धर्मपरिवर्तन करवाकर उससे निकाह भी कर लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामले के तूल पकड़ने के बाद, आरोपित पक्ष ने पीड़िता पर दबाव बनाकर एक हलफनामा भी दायर करवाया है। इसमें लड़की की तरफ से कहा गया है कि वह 19 साल की है और उसने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूला है। हलफनामे के अनुसार उसका नाम अब बशीरन कर दिया गया है। 

गौरतलब हो कि पाकिस्ताम में अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार की घटनाएँ बेहद आम हैं। हिंदू लड़कियों के अपहरण और धर्म परिवर्तन की खबरें मीडिया में आए दिन आती रहती है। ऐसी घटनाओं पर सरकार और प्रशासन की चुप्पी भी कोई नई बात नहीं है। 

वहाँ भले ही इमरान सरकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बड़े-बड़े दावे करती है। मगर, वास्तविकता यही है कि वहाँ पर अल्पसंख्यकों का दमन धड़ल्ले से जारी है। आलम ये है कि अब पाकिस्तान के हालातों से पूरा विश्व वाकिफ हो गया है कि पाकिस्तान वो देश है जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता में किसी का जबरन धर्मांतरण का अधिकार भी निहित है।

पाक की मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सालाना पाकिस्तान में कम से कम 1000 लड़कियाँ इस्लाम कबूलती हैं। इनमें से अधिकांश सिंध में रहने वाली हिंदू समुदाय की होती हैं।

सैकड़ों अपहरण और जबरन धर्मपरिवर्तन के मामले आने के बाद भी पाकिस्तान सरकार का इन मामलों पर कोई एक्शन नहीं है। साल 2016 और 2019 में एक विधेयक लाने की बात जरूर सामने आई थी। जिसमें किसी भी धर्म की आयु सीमा 18 साल तक करने की बात थी। साथ ही उसमें यह भी प्रावधान था कि अगर कोई इसके बाद भी दोषी पाया जाता है तो उसे जेल भेजा जाएगा और पीड़ित को 21 दिन का समय दिया जाएगा कि वह स्वतंत्र होकर अपना फैसला ले।

मगर, साल 2016 में इस बिल को खारिज करते हुए सिंध के गवर्न सईदुज्जमां सिद्दीकी ने तर्क दिया कि जब हज़रत अली (सुन्नी संप्रदाय में चौथा ख़लीफ़ा और शिया के लिए पहला इमाम) कम उम्र में परिवर्तित हो सकते हैं (9 वर्ष) तो हिंदू लड़कियाँ क्यों नहीं कर सकती हैं?”

उल्लेखनीय है कि सिंध के जकोबाबाद से जो मामला सामने आया है। उससे पहले सिंघ के चुंदिको नगर से ऐसे ही अपहरण और धर्मांतरण का केस आया था। तब दो हिंदू लड़की- सुथी और शमा को स्थानीय नेता के भाई ने अपहरण कर लिया था। लड़कियों के परिवार वालों ने बताया था कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिल रहीं थी।

इसी तरह मार्च 2019 में हिंदू लड़की रीना और रवीना को घोटकी से उठाया गया था और होली की शाम उन्हें इस्लाम कबूल करवाकर उनका निकाह मजहब विशेष के युवकों से करवा दिया गया था। एक अन्य मामले में एक सिख लड़की जगजीत कौर के अपहरण और धर्मांतरण का मामला ननकाना साहिब से सामने आया था। वहीं 13 साल की पूजा सोथाहर कुमारी के साथ भी यही सब हुआ था।

इतिहास की पुस्तक में छेड़छाड़ कर राजस्थान सरकार ने महाराणा प्रताप को बताया धैर्य, योजना की कमी वाला सेनानायक

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने महाराणा प्रताप से जुड़ी ऐतिहासिक संघर्ष की कहानी को हटाते हुए उसमें विवादित संशोधन किया है। राजस्थान बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (RBSE) की वेबसाइट में मौजूद कक्षा-10 की सामाजिक विज्ञान की ई-पाठ्यपुस्तक के दूसरे पाठ ‘संघर्षकालीन भारत 1206AD-1757AD’ में कहा गया है कि 16वीं सदी में मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप में शत्रुतापूर्ण परिस्थितियों में एक सैन्य कमांडर के रूप में धैर्य, नियंत्रण और योजना की कमी थी।

सामाजिक विज्ञान की किताब के दूसरे पाठ ‘संघर्षकालीन भारत 1206AD-1757AD’ में लिखा है, “सेनानायक में प्रतिकूल परिस्थितियों मे जिस धैर्य, संयम और योजना की आवश्यकता होनी चाहिए, प्रताप में उसका अभाव था।”

राजस्थान सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध पाठ्यपुस्तक का स्क्रीनशॉट (साभार: The Indian Express)

प्रताप के ऐसिहासिक शौर्य के किस्सों से छेड़खानी

यह पाठ महाराणा प्रताप और मुगल राजा अकबर के बीच लड़ी गई हल्दीघाटी की लड़ाई के बारे में है। पाठ में कहा गया है कि मुग़ल सेना पहाड़ी इलाकों में लड़ने के लिए निपुण नहीं थी, जबकि मेवाड़ सेना खुले मैदान में लड़ने के लिए सक्षम नहीं थी। आगे कहा गया है कि जब मुगल सेना पीछे हटने लगी तो प्रताप की सेना उनका पीछा करते हुए बादशाह बाग़ मैदान में पहुँच गई और इसके परिणाम महाराणा प्रताप के लिए प्रतिकूल थे।

हल्दीघाटी का युद्ध आमेर के राजा मान सिंह के नेतृत्व में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच लड़ा गया था। महाराणा प्रताप की सेना ने हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर पर विजय प्राप्त की थी।

महाराणा प्रताप से जुड़ी ऐतिहासिक संघर्ष की कहानी को हटाया

मेवाड़ के पूर्ववर्ती शाही परिवार, जो महाराणा प्रताप के वंशज हैं, ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार द्वारा स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में किए गए संशोधनों पर कड़ी आपत्ति जताई है। शाही परिवार ने माँग की है कि राज्य शिक्षा बोर्ड या तो पाठ्यपुस्तक में किए गए दावों को प्रमाणित करने के सबूत प्रदान करे या फिर पुस्तक से विवादित सामग्री को तुरंत हटाए।

प्रताप के वंशज लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने साफ किया कि महाराणा प्रताप के जीवन के ऐतिहासिक पहलुओं को किताब से हटाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन पहलुओं को समाजिक विज्ञान के वर्ष 2020 के संस्करण हटाया गया है, वो तथ्य आने वाली पीढ़ी के बच्चों के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने पाठ्यक्रम मंडल के सदस्यों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि आखिर ऐसी क्या वजह थी जिसके चलते जल्दबाजी में पाठ्यक्रम में बदलाव करना पड़ा, जबकि पाठ्यक्रम में बदलाव हुए कुछ वर्ष ही हुए हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अशोक गहलोत सरकार ने सत्ता में आने के 6 महीने के भीतर स्कूल की तमाम किताबों में बदलाव किया था।

राजस्थान सरकार ने कक्षा 12 की पाठ्यपुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर वाले चैप्टर में सावरकर के नाम के आगे से ‘वीर’ हटा दिया था। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि कॉन्ग्रेस की नज़र में सावरकर, वीर नहीं हैं और अब महाराणा प्रताप के शौर्य के किस्सों को हटाकर उनके बारे में विवादित चीजें प्रकाशित की जा रही है। 

क्या वाकई ‘कोरोनिल’ बेचने के​ लिए रामदेव को प्रचार की जरूरत है?

बाबा रामदेव ने मंगलवार (जून 23, 2020) को ‘कोरोनिल’ नाम से एक दवा बाजार में उतारी। दावा है कि आयुर्वेदिक तरीके से शोध और अध्ययन के बाद बनाई गई यह दवा कोरोना के उपचार में सक्षम है। मुझे नहीं पता कि इसमें कितनी सच्चाई है। इसके तकनीकी पक्षों को मैं जानता भी नहीं। अब खबर आई है कि केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय ने पंतजलि से इस दवा का विज्ञापन बंद करने को कहा है।

क्या वाकई कोरोनिल बेचने के​ लिए रामदेव को प्रचार की जरूरत है? मुझे ऐसा नहीं लगता, क्योंकि मैं रामदेव की घरों में घुसपैठ को जानता हूँ।  

2005 का साल था। कविवर को सत्ता से गए सालभर से ज्यादा हो गए थे। मनमोहन सिंह की सरकार वामपंथियों के बैसाखी पर टिकी थी। प्रकाश करात माकपा के महासचिव बन चुके थे। उस समय देश के राजनीतिक गलियारों के वे हॉटकेक थे। उनकी पत्नी वृंदा करात की भी खूब चर्चे थे। पीएम मोदी की भाषा में कहें तो, खान मार्केट गैंग में कोई ऐसा नहीं था जो वृंदा करात से नजदीकी नहीं चाहता था। 

अपवाद एक दंपती थे। एनडीटीवी वाले प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय। इनकी पहले से वृंदा से नजदीकी थी। रिश्ते में प्रणय, वृंदा के बहनोई तो राधिका बहन लगती हैं।

एक दिन वृंदा करात ने आरोप लगाया कि बाबा रामदेव जो आयुर्वेदिक दवाएँ बनाते हैं, उसमें पशु अंग और मानव की हड्डियाँ होती हैं। उस समय रामदेव का रसूख आज जैसा नहीं था। या यूँ कहे कि देश को रामदेव की ताकत का भान ही नहीं था। जंतर-मंतर पर रामदेव के खिलाफ कार्रवाई को लेकर वामपंथी दलों का एक प्रदर्शन भी हुआ था। अगले दिन सुदूर भारत के अखबारों में भी ये प्रदर्शन सुर्खियों में था। उसे संबोधित करती वृंदा करात की बड़ी तस्वीर भी। 

लेकिन इस खबर के प्रकाशित होने के बाद अलग ही तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। देश के कई शहरों में रामदेव के समर्थन में स्वत: स्फूर्त प्रदर्शन हुआ। तब देश को पहली बार रामदेव की लोगों के बीच पैठ और लोकप्रियता का एहसास हुआ। प्रतिक्रिया देख वृंदा करात भी महीनों चुप रहीं। 

2006 के शुरुआत में उन्होंने फिर मुँह खोला और आरोप दोहराए। इस बार प्रतिक्रिया और तीव्र हुई। इसके बाद वृंदा बोलती रहीं, लोगों ने नोटिस करना छोड़ दिया। अमेरिका से परमाणु करार पर राजदीप सरदेसाई (जी हाँ, मैंने गलती से यह नाम नहीं लिखा) की दगाबाजी से कॉन्ग्रेस ने सरकार बचा ली और उनके ​पति का भी जलवा-जलाल खत्म हो गया।

2006 के मई में मैं सीतामढ़ी गया था। मेरे पिताजी के मौसेरे भाई वहाँ रहते हैं। खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। रात को खाने के वक्त मैंने उन्हें रुखा-सूखा खाते देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। चाची से सुबह पूछा तो पता चला कि वे बीमार रहते हैं और हरिद्वार जाकर रामदेव से इलाज करवा रहे हैं। उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि ये आदमी छोटे शहरों, गाँवों में भी घुस चुका है।

फिर इस आदमी को जानने की ललक हुई। अपने आसपास के गाँवों को टटोला। धनबाद के आसपास के गाँवों में जाता तो लोगों से उसके बारे में पूछ लेता। फीडबैक सकारात्मक ही मिल रहे थे। कुछ साल बाद हरिद्वार भी गया। इस आदमी से मिला भी। 

फिर आया जून 2011। मैं दिल्ली आ चुका था। रामदेव कालाधन के मसले पर रामलीला मैदान से आंदोलन करने वाले थे। यूपीए सरकार ने तीन मंत्रियों को उनकी अगवानी के लिए एयरपोर्ट ही भेज दिया। कई उस दिन आश्चर्यचकित हुए। मैं नहीं हुआ। कुछ इसे अन्ना हजारे का दबाव बता रहे थे। मुझे ऐसा नहीं लगता था।

मेरा हमेशा से मानना है कि उस समय की यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे को कभी भाव ही नहीं दिया। उसने अन्ना को उसके हाल पर छोड़ दिया था। वो तो जनभावनाएँ जुड़ी थी कि अन्ना के चेले सितारे बन गए। 

वो सरकार असल में रामदेव की चुनौती से घबराई हुई थी। इसलिए उसे रामदेव का रामलीला मैदान में बैठना गँवारा नहीं था। उसने रातों-रात लाठीचार्ज करवा दी। रामदेव की इस ताकत को मोदी भी बखूबी समझते थे। वे जानते थे कि बिना शोर-शराबे के स्वामी रामदेव के समर्थक उनके कहे पर वोट डाल आते हैं।

अब उसी मोदी सरकार के आयुष मंत्रालय का फैसला देख रहा हूँ तो हँसी आ रही है। क्या आपको लगता है कि वाकई माल बेचने के लिए रामदेव को प्रचार की जरूरत है। वो तो शुक्र मनाइए कि रामदेव बनिया बन गए तो कई मीडिया हाउस चल रहे हैं। जरा मीडिया कंपनी के मालिकों से पूछिए कि नोटबंदी के बाद रामदेव के विज्ञापन का सहारा न होता तो उनका क्या हुआ होता?