Home Blog Page 4734

दिल्ली: गृहमंत्री अमित शाह ने 10,000 बेड वाले राधा स्वामी सत्संग व्यास COVID-19 केंद्र की जिम्मेदारी ITBP को सौंपी

आईटीबीपी की टीम ने नई दिल्ली स्थित राधास्वामी व्यास छतरपुर में 10,000 से भी ज्यादा बिस्तरों वाले प्रस्तावित कोविड केयर सेंटर में तैयारियों के साथ और 26 जून से प्रारंभ होने वाले राजधानी के इस विशालतम कोविड केयर सेंटर के संचालन की नोडल एजेंसी के तौर पर कार्यभार संभाल लिया है। 

आईटीबीपी के अनुभवी डॉक्टरों और प्रशासकों की टीम ने आज (जून 24, 2020) सुबह नई दिल्ली के राधा स्वामी ब्यास छतरपुर में आकर तैयारियाँ युद्ध स्तर पर प्रारंभ कर दी है। आइटीबीपी की टीमों ने दिल्ली सरकार और जिला प्रशासन के अधिकारियों और आश्रम के विभिन्न अधिकारियों के साथ लगातार बैठकें भी कीं। 

आईटीबीपी कर्मियों की कई टीमों सहित मेडिकल और सहायक कर्मचारियों ने आश्रम का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर स्टेकहोल्डर्स से कई चर्चाएँ भी की। यह भवन भारत की सबसे बड़ी कोविड केयर फैसीलिटी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार कोरोना वायरस मरीजों के लिए समर्पित इस केयर सेंटर में फिलहाल 2000 बेड उपलब्ध हैं। बताया जा रहा है कि जल्द ही इसमें 10,000 बेड की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस केयर सेंटर में डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य सीएपीएफ सहित 1000 से अधिक आईटीबीपी कर्मियों को तैनात किया जाएगा।

दिल्ली सीएम को जवाब देते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार (24 जून, 2020) को बताया कि 10,000 बेड वाले कोविड-19 देखभाल केंद्र स्थापित करने का काम जोरों पर है और आईटीबीपी को जल्द से जल्द इस सेंटर को सौंप दिया जाएगा।

अमित शाह ने ट्विटर के जरिए यह जानकारी दी, “केजरीवाल जी, तीन दिन पहले ही हमारी बैठक में यह कुछ बातें पहले ही तय हो चुकी थी। गृह मंत्रालय ने दिल्ली के राधा स्वामी ब्यास में 10 हजार बेड के कोविड सेंटर के संचालन का काम आइटीबीपी को सौंपा है। इसका बड़ा हिस्सा 26 जून तक चालू हो जाएगा।”

बता दें गृह मंत्री ने यह जवाब तब दिया जब सीएम अरविंद केजरीवाल ने गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखकर उन्हें छतरपुर में कोरोना वायरस के इलाज के बनाए जा रहें 10,000 बेड वाले सेंटर का निरीक्षण करने का अनुरोध किया था। राधा स्वामी सत्संग ब्यास परिसर में अस्थायी सुविधा लगभग 10,000 की बेड क्षमता वाली दिल्ली में सबसे बड़ी कोविड-19 सुविधा होगी।

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते दिल्ली में कोरोना वायरस के मामले काफी तेजी से बढ़ रहे है। दिल्ली में कोरोना वायरस की रोकथाम को लेकर अब केंद्र गृहमंत्री अमित शाह ने खुद मोर्चा सँभाल लिया था। दिल्ली के हालात को लेकर गृहमंत्री ने सबसे पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इसके बाद स्थिति का जायजा लेने के लिए एलएनजेपी अस्पताल में कोरोना वायरस की तैयारियों को देखते हुए अस्पताल का दौरा भी किया था।

कथित तौर पर शाह ने कोरोना वायरस के चलते मरने वाले मरीजों के आँकड़े, महामारी से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या और भी अन्य जानकरियों को लेकर पूछताछ की थी।

इस वक़्त महाराष्ट्र के बाद दिल्ली सबसे ज्यादा कोरोना वायरस के प्रकोप को झेल रहा है। राजधानी दिल्ली में कोरोना वायरस के मामलों की संख्या 62,655 तक पहुँच गई है। वहीं इस घातक महामारी से 2,233 लोग अपनी जान गँवा चुके है।

फैक्ट चेक: क्या हॉन्गकॉन्ग ने चीन के कब्जे वाले अक्साई क्षेत्र और तिब्बत को बताया भारत का हिस्सा? जानिए सच

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में कुछ दिनों से कई तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही है। जिनमें यह दावा किया गया कि हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव कैरी लैम चेंग ने एक ट्वीट के जरिए बताया कि ‘रिपब्लिक ऑफ हॉन्गकॉन्ग’ एक नए नक्शे को मंजूरी देने जा रहा है, जिसमें चीनी-अधिकृत अक्साई चिन, ठग ला रिज, खिनज़मान और तिब्बत ऑटोनोमस क्षेत्रों को केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के अंतर्गत भारत के हिस्से के रूप में शामिल किया गया है।

अलग-अलग सोशल मीडिया यूज़र्स ने ट्विटर के जरिए इस फर्जी पोस्ट को शेयर करते हुए यह दावा किया कि रिपब्लिक ऑफ हॉन्गकॉन्ग ने अपने देश का एक नया नक्शा जारी किया है, जिसमें उसने भारत के हिस्से के रूप में चीनी-अधिकृत क्षेत्रों को मंजूरी दी है।

बता दें ये सारी पोस्ट ऐसे समय में वायरल हुए थे जब लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारत और चीन के बीच गतिरोध चल रहा था, जिसके कारण दोनों देशों में 15 जून को हिंसक झड़प हुई थीं।

वहीं एक यूजर ने दावा किया कि ‘रिपब्लिक ऑफ हॉन्गकॉन्ग’ ने एक नए नक्शे को मंजूरी दे दी है। जहाँ अक्साई चिन, ठग ला रिज, खिनज़मान और तिब्बत ऑटोनोमस क्षेत्रों को भारत के रूप में लद्दाख के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। साथ ही यूजर ने यह भी कहा कि ऐसे समय में भारत चीन से हॉन्गकॉन्ग की स्वतंत्रता का समर्थन करता है।

एक सोशल मीडिया यूजर ने भी एक इसी तरह की खबर को शेयर किया, जिसमें यह दावा किया गया कि हॉन्गकॉन्ग की सरकार ने इस नए नक्शे को मंजूरी दे दी है जिनमें चीनी-अधिकृत क्षेत्र शामिल हैं।

फैक्ट चेक

बता दें हॉन्गकॉन्ग की तरफ से नए नक्शे जारी करने का दावा गलत है। हॉन्गकॉन्ग सरकार ने ऐसे किसी भी नए नक्शे को मंजूरी नहीं दी है, जिसमें चीन के कब्जे वाले क्षेत्र को भारत के हिस्से के रूप में दिखाया गया हो।

हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव कैरी लैम चेंग द्वारा हस्ताक्षर किए गए अध्यादेश की तस्वीरें नए नक्शे से संबंधित नहीं हैं, बल्कि इस महीने की शुरुआत में हॉन्गकॉन्ग के विधान परिषद द्वारा पारित राष्ट्रीय गान अध्यादेश से संबंधित हैं। तस्वीरों में चीफ एग्जीक्यूटिव कैरी लैम चेंग राष्ट्रीय गान अध्यादेश पर हस्ताक्षर कर रही है, न कि नए नक्शे पर।

सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही तस्वीरों के पड़ताल करने पर यह मालूम पड़ा कि यह इमेज हॉन्गकॉन्ग सरकार के द्वारा की गई एक प्रेस रिलीज से संबंधित थी। जो कि चीफ एग्जीक्यूटिव द्वारा साइन किया गया राष्ट्रीय गान अध्यादेश है। यह अध्यादेश हॉन्गकॉन्ग में चीन के राष्ट्रीय गान के प्रचार और संरक्षण के लिए पेश किया गया था।

गौरतलब है कि कई समाचार रिपोर्टों ने भी इसी तरह की तस्वीरों को राष्ट्रीय गान अध्यादेश से जोड़ते हुए साझा किया था।

जिस सोशल मीडिया एकाउंट से इन तस्वीरों को शेयर किया गया था वो हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव के कैरी लैम चेंग नाम के नाम पर बनाया गया एक फर्जी अकाउंट है। दरअसल हॉन्गकॉन्ग सीई का आधिकारिक ट्विटर एकाउंट नहीं है। 2014 में, इसी फर्जी अकाउंट से भारत से ट्वीट पोस्ट किए थे। हैंडल पर उपलब्ध पुराने सारे ट्वीट भारत से संबंधित हैं और भारत से ही किए गए हैं।

इस प्रकार फैक्ट चैक में यह बात साबित होता है कि हॉन्गकॉन्ग के समाचारों में नए नक्शे को मंजूरी देने वाली खबर जिसमें केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के तहत भारत के हिस्से के रूप में चीन के कब्जे वाले क्षेत्र को शामिल किया है, सरासर गलत हैं।

इसके अलावा कोई ‘रिपब्लिक ऑफ हॉन्गकॉन्ग’ नहीं हैं। हॉन्गकॉन्ग एक विशेष मेट्रोपोलिटन क्षेत्र है जो वर्तमान में चीन के प्रशासन के अधीन है। इसकी एक विधान परिषद है जिसके चीफ एग्जीक्यूटिव कैरी लैम चेंग हैं। यह शहर 1997 तक ब्रिटेन के शासन में था, लेकिन चीन को उनके समझौते के अनुसार इसको सौंप दिया गया था। जिसके चलते अब हॉन्गकॉन्ग के लोग चीन से इसे पूर्ण लोकतंत्र की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

‘अन्नपूर्णा योजना’ अब ‘इंदिरा रसोई’: अशोक गहलोत ने BJP सरकार की योजनाओं को किया इंदिरा-राजीव के नाम

कॉन्ग्रेस में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार कॉन्ग्रेस हाईकमान को खुश करने के लिए किस तत्परता से जुटी हुई है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने हाल ही में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कार्यकाल में शुरू की गई योजनाओं को इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस की वर्तमान अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पति राजीव गाँधी के नाम पर कर दिया है। ख़ास बात यह है कि अशोक गहलोत ने पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की योजनाओं का ही नामकरण कर उन्हें ‘गाँधी परिवार’ के रंग में रंग दिया है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने नगरीय क्षेत्रों में ‘इंदिरा रसोई योजना’ शुरू करने की घोषणा की है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अशोक गहलोत ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ का ही नाम बदलकर ‘इंदिरा रसोई योजना’ कर दिया है।

इस बारे में भाजपा नेता वसुंधरा राजे ने भी ट्वीट करते हुए लिखा है- “नाम बदल कर ही सही, आख़िर जनता की माँग पर हमारी अन्नपूर्णा रसोई योजना को शुरू करना ही पड़ा। नाम नहीं अपने आप को भी बदलो सरकार। नहीं तो जनता सब कुछ बदल डालेगी।”

इसी तरह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना’ का नाम बदलकर ‘राजीव गाँधी जल स्वावलंबन योजना’ कर दिया है।

अशोक गहलोत सरकार ने करीब पौने दो साल के कार्यकाल में पिछली वसुंधरा राजे सरकार की एक दर्जन योजनाओं के नाम बदले हैं। यह देखना दिलचस्प है कि अचानक से ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इतिहास की किताबों में महाराणा प्रताप के शौर्य के किस्सों को हटाने के साथ ही भाजपा के कार्यकाल में शुरू की गई योजनाओं का नाम गाँधी परिवार के नाम पर करने का काम किया है।

अक्सर कॉन्ग्रेस शासित राज्य के मुख्यमंत्री अपने हाईकमान को संतुष्ट करने के लिए इसी शैली में काम करते नजर आते हैं, जिसमें इतिहास के पन्नों में बदलाव कर हिन्दू राजाओं को कमतर बताना, अकबर और टीपू सुलतान का गुणगान करना और राज्य की योजनाओं का नामकरण नेहरू से लेकर राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी तक कर देना शामिल है। राजस्थान की सत्ता में आते ही अशोक गहलोत ने सभी सरकारी दस्तावेजों से पंडित दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीर हटा दी थी।

भीड़ को सड़कों पर उतारने के लिए CAA विरोधियों ने ही फैलाई थी अफवाह, कपिल मिश्रा ने किया इंडियन एक्सप्रेस की फर्जी रिपोर्ट का खंडन

पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को लेकर मीडिया में दावा किया जा रहा है कि एक चार्जशीट में इस बात का जिक्र है कि उपद्रवियों के बीच जानबूझकर ये अफवाह फैलाई गई थी कि कपिल मिश्रा के लोगों ने एंटी सीएए (CAA) प्रोटेस्ट के पंडाल में आग लगा दी है, जिसके बाद भीड़ हिंसक हो गई थी। वहीं, दिल्ली पुलिस के अनुसार ये अफवाह जानबूझकर उपद्रवियों ने ही फैलाई थी, ताकि उपद्रवी भीड़ को सड़कों पर उतारा जा सके।

भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी मीडिया के दावे को झूठ बताते हुए अपने ट्विटर एकाउंट पर लिखा है कि मीडिया द्वारा चलाई जा रही चार्जशीट की बातें भ्रामक और अफवाह हैं।

वास्तव में जिस ‘गवाह’ के नाम पर सोशल मीडिया पर भाजपा नेता कपिल मिश्रा को दोषी साबित करने का प्रपंच किया जा रहा है, वह इस खबर का मात्र एक ही हिस्सा है, जबकि पुलिस द्वारा किए गए नए खुलासे, जिसमें की इस अफवाह को उपद्रवियों की ही करामात बताया गया है, की बात इसमें छिपाई जा रही हैं।

कपिल मिश्रा ने NDTV की पूर्व पत्रकार निधि राजदान को झूठा बताते हुए ट्विटर पर लिखा – “प्रिय निधि राजदान आप झूठ बोल रही हैं या NDTV झूठ बोल रहा है? झूठ तो आपस मे मिलकर बोल लिया करो।”

दरअसल, NDTV की ही रिपोर्ट में एक और खुलासे का जिक्र किया गया है, जिसमें यह स्पष्ट लिखा गया है कि दिल्ली पुलिस ने खुलासा किया है कि चाँदबाग इलाके में उपद्रवियों के बीच ये अफवाह जानबूझकर फैलाई गई थी कि बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के लोगों ने एंटी सीएए प्रोटेस्ट के पंडाल में आग लगा दी है, जिसके बाद भीड़ हिंसक हुई थी।

मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट जिसमें पुलिस के खुलासे का स्पष्ट जिक्र किया गया है

लेकिन NDTV की पूर्व पत्रकार निधि राजदान ने NDTV के बजाए इन्डियन एक्सप्रेस की खबर को ट्वीट करते हुए इंडियन एक्सप्रेस के ‘गवाह’ का ही जिक्र करते हुए कपिल मिश्रा पर आरोप लगाया है।

‘इन्डियन एक्सप्रेस’ का गवाह नजम उल हसन; जिसने देखा नहीं, बस सुना

इन्डियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हिस्सा

‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की मानें तो नजम उल हसन नाम का गवाह उस दौरान विरोध प्रदर्शन में मौजूद था, लेकिन उसने 24 फरवरी को हुई कथित घटना को ‘नहीं देखा’, और केवल दूसरों को इसके बारे में चिल्लाते हुए सुना।

इन्डियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ इस गवाह यानी, नजम उल हसन को ‘महत्वपूर्ण गवाहों’ के बीच आरोप पत्र में सूचीबद्ध किया गया है, जो चाँदबाग में विरोध प्रदर्शनों की ‘साजिश और योजना के बारे में पूरी तरह से अवगत थे’।

पत्रकार दीपक चौरसिया ने भी ट्वीट में लिखा है – “CAA के खिलाफ प्रदर्शन और दिल्ली दंगों पर अब नया खुलासा हुआ है। दिल्ली पुलिस के मुताबिक उपद्रवियों के बीच जानबूझकर ये अफवाह फैलाई गई कि कपिल मिश्रा के लोगों ने नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शन के पंडाल में आग लगा दी है, जिसके बाद भीड़ हिंसक हो गई थी। भीड़ को सड़कों पर निकालने के लिए ये अफ़वाह फैलाई गई।”

दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले में अलग से करीब 1100 पेज की चार्जशीट दाखिल हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्य चार्जशीट में भाजपा नेता कपिल मिश्रा का कहीं कोई जिक्र नहीं है।

वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि हेड कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या के मामले में दायर चार्जशीट में कपिल मिश्रा के खिलाफ नज़म उल हसन नाम के एक गवाह के बयान को भी शामिल किया गया है। इस गवाह ने दावा किया है कि 24 फरवरी को कपिल मिश्रा के लोगों को उस पंडाल को आग लगाने के बारे में बात करते सुना था, जहाँ कुछ लोग नागरिकता कानून को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे।

NDTV में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, “‘सूत्रों’ का कहना है कि दिल्ली दंगों में मारे गए दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल मामले में पुलिस की चार्जशीट में कहा गया है कि दिल्ली स्थित चाँदबाग इलाके में दंगाइयों के बीच ये अफवाह जानबूझकर फैलाई गई थी कि कपिल मिश्रा के लोगों ने एंटी-सीएए प्रोटेस्ट के पंडाल में आग लगा दी है, जिसके बाद भीड़ हिंसक हुई थी।”

हालाँकि, NDTV की ही रिपोर्ट में यह भी बात कही गई है कि दिल्ली पुलिस के अनुसार यह अफवाह दंगाइयों ने ही जानबूझकर फैलाई थी ताकि उपद्रवियों की भीड़ को सड़कों पर निकाला जा सके।

सोनिया और राहुल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, 2008 में चीन से हुए ‘गुप्त’ समझौते पर NIA जाँच की माँग

चीन से गतिरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट में कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्‍यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ एक याचिका दायर की गई है। वकील शशांक शेखर झा की ओर से दायर इस याचिका में 2008 में यूपीए सरकार और चीनी सरकार के बीच हुए समझौते के संबंध में जानकारी माँगी गई है। 

साथ ही सुप्रीम कोर्ट से माँग की गई है कि वो राष्‍ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) से इस मामले की जाँच गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत कराने के संबंध में आदेश या निर्देश जारी करे।

याचिकाकर्ता शशांक शेखर झा और सेवियो रॉड्रिग्स ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह जनहित याचिका दायर करके कॉन्ग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के बीच समझौते के विस्तृत डिटेल को उजागर करने की माँग की है। शशांक शेखर झा पेशे से वकील हैं, जबकि रॉड्रिग्स गोवा क्रॉनिकल के एडिटर-इन-चीफ हैं। 

बुधवार (जून 24, 2020) को दायर याचिका में में यह भी कहा गया है कि पार्टी ने इस समझौते की बारीकियों से देश को अंधेरे में रखा। राष्ट्रहित से जुड़ी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं हुई। लिहाजा NIA जाँच जरूरी है।

याचिका में कॉन्ग्रेस और चीन की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ चाइना के बीच 2008 में हुए करार के संबंध में जानकारी देने की माँग की गई है। इस करार के तहत दोनों के बीच हाई लेवल जानकारी का आदान प्रदान और सहयोग शामिल है।

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने भी गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम के तहत समझौते की एनआईए जाँच की माँग की थी।

उल्लेखनीय है कि दोनों पार्टियों ने महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर एक दूसरे से परामर्श लेने और उच्च स्तरीय संपर्क को सुलभ बनाने के लिए 2008 में इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। बता दें कि 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान UPA चेयरपर्सन सोनिया गाँधीऔर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी चीन गए थे। इसी दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के बीच समझौता हुआ था। ये समझौता शी जिनपिंग की मौजूदगी में हुआ था।

बता दें कि बात सिर्फ़ इस समझौते ज्ञापन की नहीं है। राहुल के संबंध चीन के साथ कुछ समय पहले डोकलाम विवाद पर भी उजागर हुए थे। जब उन्होंने चीन के साथ एक नहीं दो बार गुप्त बैठकें की थी।

पहली मीटिंग 2017 में हुई थी, जब उन्होंने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई के साथ उस समय बैठक की थी, जब भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद छिड़ा था। इसके बाद कैलाश मानसरोवर मामले पर चीन के नेताओं से हुई गुप्त बैठक के बारे में तो राहुल गाँधी ने खुद ही खुलासा कर दिया था। राहुल उस समय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। जिसके कारण उनका इस तरह चीन अधिकारियों व नेताओं से बैठक करने ने कई सवाल खड़े कर दिए थे।

लिबरलमैन: देखें लिबरलों-वामपंथियों के पाखंडों की पोल खोलती वायरल हो रही ये 5 वीडियो क्लिप

इन दिनों सोशल मीडिया पर लिबरलमैन नाम का एक कैरेक्टर काफी वायरल हो रहा है। हालाँकि यह कैरेक्टर काल्पनिक है, मगर इससे देश के उन लोगों के पाखंड को आइना दिखाने की जरूरत है, जो खुद को ‘उदारवादी’ कहते हैं, मगर वास्तव में उनका इससे कोई लेना देना नहीं होता है, वो इससे कोसों दूर होते हैं।

सोशल मीडिया पर The Daily Switch नाम के राजनीतिक, मीडिया और कल्चर वेबसाइट ने विश्व के नए सुपरहीरो ‘लिबरलमैन’ और ‘उदारवादियों’ की हरकतों को शेयर किया है।

वायरल वीडियो में से एक में एक बिल्डिंग जल रहा होता है, जिसमें एक 4 साल का बच्चा फँसा होता है। बिल्डिंग के बाहर दो एनिमेटेड कैरेक्टर बच्चे के पेरेंट्स के रूप में असहाय खड़े होते हैं। तभी उन्हें ऊपर से सुपरपावर के साथ ‘लिबरलमैन’ उड़ता हुआ दिखाई दिया। उनके अंदर उम्मीद जगी कि सुपरहीरो उनके बच्चे को बचा लेगा। हालाँकि लिबरलमैन ने ‘मदद’ के लिए कुछ नियम व शर्तें रखीं।

जब पेरेंट्स ने बताया कि उनकी चार साल की बच्ची बिल्डिंग के अंदर आग में फँसी है, तो लिबरलमैन उसकी सहायता के लिए ये कहते हुए सहमत हो जाता है वो जरूर सेक्सिज्म का शिकार हुई होगी। इसके बाद वो मदद के नाम पर कैंडललाइट मार्च, ‘dafli of doom‘ और कुदरती बिरयानी का विकल्प देता है। जाहिर है, लिबरलमैन की अपनी प्राथमिकताएँ हैं।

एक अन्य वीडियो में ‘लिबरलमैन’ शुरू में इस बात से सहमत था कि सोनू सूद ने प्रवासियों को उनके गृहनगर तक पहुँचाने की दिशा में काफी अच्छा काम किया। मगर जैसे ही एक वीडियो में सोनू सूद ने कहा कि वह पीएम मोदी के प्रशंसक हैं, तो लिबरल का कहना था कि सोनू सूद गैर-जिम्मेदार थे क्योंकि प्रवासियों को वापस भेजने से गाँवों में कोरोना वायरस फैल सकता है। साथ उसने सोनू सूद को ‘हत्यारा’ बताते हुए उनसे ‘अज़ादी’ की भी माँग की।

जिनकी कॉमेडी पर कोई नहीं हँसता या फिर जिन्हें फिल्मों में रोल मिलना बंद हो गया हो, भारत में ‘उदारवादियों’ के पास उनके करियर को फिर से शुरू करने का एक उपाय है। और वो है प्लेकार्ड और वोक मैसेज कॉम्बिनेशन। हो सकता है कि यह उन्हें कॉमेडियन व बना पाए, लेकिन कम से कम यह उन्हें फेमस तो बना ही देगा। इसमें ‘विक्टिम कार्ड’ स्वीकार्य होने की भी बात कही गई है।

एक अन्य वीडियो में दिखाया गया है कि जब तक आप लिबरलों से सहमत नहीं हैं, आप ‘आईटी सेल’ से हैं या फिर आरएसएस से। एक सच्चा उदारवादी कभी भी पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत में किसी भी अधिकार से सहमत नहीं होगा।

इसी तरह एक वीडियो में दिखाया गया है कि देश जब कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है, तो इस समय विभिन्न शिक्षण संस्थानों के छात्र किस तरह से काम कर रहे हैं। इसमें एम्स, आईआईटी, आईआईएम और जेएनयू के छात्र होते हैं। जहाँ एम्स, आईआईटी और आईआईएम के छात्र कोरोना को लेकर उनके द्वारा किए जा रहे शोध के बारे में बताते हैं, वहीं जेएनयू का छात्र कोरोना को फासिस्ट बताते हुए डफली बजाकर आजादी की माँग करता है।

इस तरह की और भी वीडियो देखने के लिए आप The Daily Switch को फॉलो कर सकते हैं।

वार्निंग की बत्ती जलती रही, पाकिस्तानी पायटल कोरोना पर चर्चा करते रहे, प्लेन क्रैश से पहले बोले: मैनेज कर लूँगा

कराची में हुए प्लेन हादसे की जाँच रिपोर्ट पेश करते हुए पाकिस्तान के उड्डयन मंत्री सरवर खान ने कहा कि पाकिस्तान की सरकारी एयरलाइंस में 40% पायलटों के पास फर्जी लाइसेंस हैं और इस हादसे के वक्त पायलट कोरोना वायरस पर चर्चा कर रहे थे।

पाकिस्तान के दक्षिणी बंदरगाह शहर कराची में पिछले महीने 22 मई को हुए विमान हादसे में में 98 लोगों की मौत के लिए पायलट और हवाई यातायात नियंत्रण (एटीसी) जिम्मेदार पाए गए हैं। पाकिस्तान की संसद में अंतरिम रिपोर्ट पेश करते हुए, वहाँ के उड्डयन मंत्री गुलाम सरवर खान ने कहा कि जाँच बोर्ड द्वारा की गई निष्पक्ष जाँच में पता चला है कि कि हवाई दुर्घटना मानवीय भूल के कारण हुई थी।

उन्होंने कहा कि इस प्लेन क्रैश के लिए पायलट, केबिन क्रू और एटीसी जिम्मेदार हैं। क्रैश के पहले पायलट कोरोना वायरस पर चर्चा कर रहे थे। रिपोर्ट पेश करते हुए सरवर खान ने कहा कि इसकी रिकॉर्डिंग उनके पास है।

सरवर खान ने कहा कि अंतिम रिपोर्ट को पूरा होने में एक साल लगेगा। उन्होंने संसद में कहा – “विमान में कोई तकनीकी खराबी नहीं थी। यह उड़ान के लिए पूरी तरह से फिट था। पायलट और को-पायलट, जो दोनों चिकित्सकीय रूप से फिट और अनुभवी थे, ने पूरे उड़ान में एटीसी के लिए किसी भी तकनीकी गलती का उल्लेख नहीं किया।

‘हमारी सरकारी एयरलाइंस में 40% पायलट ऐसे हैं जो फर्जी लाइसेंस से एयरक्राफ्ट उड़ा रहे हैं’

पाकिस्तान के उड्डयन मंत्री सरवर खान ने पाकिस्तान एयरलाइंस (पीआईए) पर हैरान करने वाला खुलासा करते हुए कहा, “हमारी सरकारी एयरलाइंस में 40% पायलट ऐसे हैं जो फर्जी लाइसेंस से एयरक्राफ्ट उड़ा रहे हैं। इन लोगों ने न तो कभी एग्जाम दिया और न इनके पास फ्लाइंग एक्सपीरिएंस है। इनकी भर्ती में सियासी दखलंदाजी होती है। 4 पायलट्स की तो डिग्री भी जाली पाई गईं हैं।”

उल्लेखनीय है कि पिछले माह की 22 मई को, पाकिस्तान के पूर्वोत्तर शहर लाहौर से उड़ान भरने वाली पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस की फ्लाइट कराची के जिन्ना इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास एक रिहायशी इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गई, जिसमें सवार 99 यात्री और चालक दल के लोग सवार थे। इस दुर्घटना में कुल 97 यात्री और जमीन पर मौजूद एक लड़की की मौत हो गई, जबकि दो यात्री बच गए।

संसद में पेश की गई जाँच रिपोर्ट के अनुसार, सरवर खान ने कहा कि विमान जब हवाई अड्डे से 10 समुद्री मील दूर था, तो वह आवश्यक 2,500 फीट की ऊँचाई के मुकाबले 7,220 फीट की ऊँचाई पर था।

संसद में सरवर खान ने कहा, “पायलट ओवर कॉन्फिडेंट थे। उन्होंने एयरक्राफ्ट पर ध्यान नहीं दिया। एटीसी ने उनसे प्लेन की ऊँचाई बढ़ाने को कहा। जवाब में एक पायलट ने कहा कि वो सब संभाल लेगा। पूरी फ्लाइट के दौरान दोनों पायलट कोरोना वायरस से परिवार को बचाने के बारे में बातचीत करते रहे।”

उन्होंने कहा कि एटीसी ने पायलट को ऊँचाई के मुद्दे को बार-बार बताया लेकिन ‘उन्होंने चेतावनी नहीं दी।’

सरवर खान के अनुसार – “दुर्भाग्य से, पायलट कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास में था और उसका ध्यान केंद्रित नहीं था। उसने आखिर तक भी एटीसी की चेतावनियों को कई बार नजरअंदाज किया। लैंडिंग के पहले असफल प्रयास के बाद विमान के इंजन में आग लग गई, लेकिन एटीसी ने दूसरी लैंडिंग के लिए रवाना होने से पहले पायलट को सतर्क नहीं किया। पायलट्स ने तीन बार लैंडिंग गियर खोले बिना उतरने की कोशिश की। इससे प्लेन के इंजिन खराब हो गए।”

आजादी के बाद PAK की राजधानी इस्लामाबाद में 20,000 वर्गफुट में बनेगा पहला कृष्ण मंदिर, सरकार देगी ₹10 करोड़

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हिंदुओं के लिए पहला मंदिर बनने जा रहा है। इसकी आधारशिला मंगलवार को रख दी गई। इस मंदिर को इस्लामाबाद के H-9 इलाके में 20 हजार वर्गफुट क्षेत्र में बनाया जाएगा। इसका नाम श्री कृष्ण मंदिर होगा। इसे बनाने में लगभग 10 करोड़ रुपयों का खर्चा आएगा। ये सभी खर्चा इमरान सरकार उठाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल में इस्लामाबाद के एच-9 सेक्टर क्षेत्र में एक सादा समारोह आयोजित किया गया था। इस समारोह में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर पहले हिंदू मंदिर को बनाने के लिए चार कनाल भूमि आवंटित की गई। इस समारोह को आयोजित करने वाले मानवाधिकार मामलों के संसदीय सचिव लाल चंद मल्ही थे।

लाल चंद मल्ही ने मंदिर की आधारशिला रखते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में राजधानी में हिंदू आबादी काफी बढ़ी है, जिससे उनके पूजा करने के लिए मंदिर बनाना महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा, इस्लामाबाद में हिंदू समुदाय लंबे समय से मंदिर बनाने की माँग कर रहा है। यहाँ कई हिंदू मंदिर खंडहर की हालत में हैं। इसके अलावा इस्लामाबाद में कोई श्मशान घाट नहीं है।

मल्ही ने आयोजन में शामिल लोगों को संबोधित करते हुए बताया कि साल 1947 से पहले इस्‍लामाबाद और उससे सटे हुए इलाकों में कई हिंदू मंदिर थे। इसमें सैदपुर गाँव और रावल झील के पास स्थित मंदिर शामिल है।

हालाँकि, बाद में उन्‍हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया और कभी इस्‍तेमाल नहीं किया गया। उन्‍होंने इस बात पर भी दुख जताया कि इस्‍लामाबाद में अल्‍पसंख्‍यकों के अंतिम संस्‍कार के लिए जगह बहुत कम है।

वहीं, धार्मिक मामलों के मंत्री पीर नूरुल हक कादरी ने भी इसका ऐलान किया कि सरकार इस मंदिर के निर्माण पर आने वाला 10 करोड़ रुपए का खर्च वहन करेगी।

उन्‍होंने कहा कि मंदिर के लिए व‍िशेष सहायता देने की अपील प्रधानमंत्री इमरान खान से की गई है। इस्‍लामाबाद हिंदू पंचायत ने इस मंदिर का नाम श्रीकृष्‍ण मंदिर रखा है। इस मंदिर के लिए वर्ष 2017 में जमीन दी गई थी।

बता दें, इस मंदिर को लेकर माँग बहुत समय से की जा रही थी। लेकिन कुछ औपचारिकताओं, जैसे मंदिर निर्माण की मंजूरी मिलने के बाद सीडीए और अन्य अधिकारियों द्वारा साइट मानचित्र की मंजूरी आदि के कारण ये मामला 3 साल लटक गया।

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो इस मंदिर परिसर में एक अंतिम संस्कार स्थल भी होगा और अन्य हिंदू मान्यताओं के लिए अलग जगह बनाई जाएगी।

ध्यान रहे कि एक ओर जहाँ पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्‍तान अल्‍पसंख्‍यकों के लिए नरक बन चुका है और यहाँ आए दिन हिंदू समुदाय की बच्चियों का अपहरण करके उन्‍हें इस्लाम कबूलने पर मजबूर किया जाता है।

वहीं मंदिर निर्माण की खबर उस समय सामने आई है जब पाकिस्तान सरकार भारत की आलोचना करके ये जाहिर करने की कोशिश करती रही है कि भारत में समुदाय विशेष के लिए मस्जिदों के दरवाजें बंद हो रहे हैं और मस्जिदों की जगहों पर हिंदू मंदिर बनाने की बात हो रही है।

सैटेलाइट तस्वीरों में नजर आए PLA के शिविर, क्या LAC के इस ओर फिर लौट रहे हैं चीनी सैनिक?

भारत और चीन के सैनिकों के बीच लद्दाख स्थित गलवान घाटी में गत 15 जून को हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के सैन्‍य अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई और अब दोनों देशों ने अपने सैनिकों को पीछे हटाने पर आपसी सहमती बनाई थी।

सेना के सूत्रों ने मंगलवार (23 जून) को बताया कि सोमवार (22 जून) को दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच हुई बातचीत सौहार्दपूर्ण, सकारात्मक और रचनात्मक माहौल में हुई।

लेकिन गलवान घाटी की ताजा सैटलाइट तस्‍वीरें से नजर आ रहा है कि PLA (People’s Liberation Army) के सैनिक एक बार फिर इस जगह लौटकर अपने बंकरों का निर्माण कर रहे हैं। लेकिन क्या इन तस्वीरों का आशय यह है कि चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में घुस आए हैं? बताया जा रहा है कि यह क्षेत्र उस इलाके से भी 19 किलोमीटर दूर है, जहाँ भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी।

इन नवीनतम सैटेलाइट तस्वीरों से यह भी पता चलता है कि एलएसी के दूसरी तरफ पैंगोंग त्सो झील (Pangong Tso Lake) के पास चीनी सेना व्यापक स्तर पर गतिविधियों को अंजाम दे रही है। इन चित्रों में देखा जा सकता है कि चीनी पीएलए सैनिक यहाँ चौकियों का निर्माण कर रहे हैं।

शिव अरूर द्वारा ट्विटर पर पोस्ट की गई सैटेलाइट तस्वीरों में 16 जून और 22 जून की स्थिति दिखाई गई है। 16 जून को जिन जगहों पर चीनी सेना के गन पोजिशन और उनकी मौजूदगी के निशान नजर आ रहे थे तो वहीं 22 जून की तस्वीरों में यहाँ पर बड़ी मात्र में बंकर देखे जा सकते हैं।

यह सैटेलाइट तस्वीरें इस कारण चिंता का विषय हैं क्योंकि यह दोनों देशों के बीच बातचीत के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार की मंशा को और स्पष्ट कर रही हैं। दरअसल, भारत और चीन के शीर्ष सैन्य कमांडरों के बीच सोमवार (22 जून) को हुई बैठक के दौरान दोनों देशों की सेनाओं के बीच पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले सभी स्थानों से हटने पर सहमति बनी थी।

गलवान घाटी में भारतीय सैनिक और चीनी सैनिकों की स्थिति

बातचीत के दौरान भारत की ओर से स्पष्ट कह दिया गया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा में जैसी स्थिति 5 मई के पहले थी वैसे ही होनी चाहिए। यानी भारत द्वारा साफ शब्दों में चीन को अपनी सीमा पर वापस लौटने का कह दिया गया था।

सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही इन तस्वीरों से भ्रम की स्थिति भी बनती नजर आ रही है। यानी, कुछ लोगों का यकीन है कि चीन की सेना वास्तविक नियन्त्रण रेखा के इस पार आकर बंकरों का निर्माण कर रही है जबकि कुछ लोगों का कहना है कि जिस क्षेत्र में चीनी सैनिक लौटे हैं वह अभी भी भारत द्वरा तय की गई वास्तविक नियन्त्रण रेखा से बाहर ही है।

इसका आशय यह भी लगाया जा रहा है कि हाल ही में हुई झड़प में मीडिया में खबर आइन थीं कि भारतीय सैनिकों ने चीन की सेना को दो किलोमीटर खदेड़ दिया है, यानी यह इतिहास में पहली बार हुआ है जब चीनी सैनिक अपने द्वारा कब्जाए गए हिस्से से पीछे हटे हों, ऐसे में यदि वह वापस 100 मित्र के दायरे में आकर बंकरों का निर्माण करते हैं, तो वो तब भी उस हिस्से से दूर ही हैं, जिस पर वह वर्षों से अपना अधिकार बताते आ रहे थे।

हालाँकि, सैटलाइट तस्वीरें अभी भी कोई स्पष्ट दावा कर पाने में असमर्थ हैं कि गलवान घाटी में क्या चल रहा है। लेकिन यह तस्वीरें पूर्वी लद्दाख क्षेत्र को लेकर चीन का कुटिल रवैया जरुर स्पष्ट कर रहा है। यानी, एक ओर जहाँ वह सेना और अधिकारियों के साथ बातचीत का दिखावा कर रहा है, उसी समय उनके सैनिक भारतीय क्षेत्र में वापस घुसपैठ करने की योजना बना रहे हैं।

दर्द कोरोनिल नहीं, आयुर्वेद है: वामपंथी गैंग को चाहिए गोरों का सर्टिफिकेट, रामदेव से इनका गुर्दा छिल जाता है

कोरोना वायरस संक्रमण की चपेट में पूरी दुनिया है। एक तरफ भारत में ग्लेनमार्क और सिप्ला ने अपनी दवाओं को बाजार में उतारा है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में वैक्सीन को लेकर रिसर्च जारी है। इजरायल, रूस और अमेरिका जैसे देशों ने आंशिक सफलता का दावा भी किया है। अब बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी ने ‘कोरोनिल’ नामक दवा उतार कर संक्रमितों को ठीक करने का दावा किया है।

इसकी लॉन्चिंग की खबर आते ही अंधविरोध भी शुरू हो गया। विरोध सिर्फ़ इसीलिए किया गया क्योंकि भारत में आयुर्वेद और योग के प्रचारक ने वो कर दिखाने का दावा किया, जिसके लिए पूरी दुनिया प्रयासरत है।

वामपंथी गिरोह ने दवा में कोई खोट आने की वजह से विरोध नहीं किया। न ही उन्होंने इस दवा का परीक्षण किया। उनका विरोध तो केवल इस बात को लेकर है कि इससे पतंजलि, दिव्य फार्मेसी, बाबा रामदेव और आयुर्वेद का नाम जुड़ा है।

उदाहरण के रूप में अमेरिका स्थित साउथ डकोटा की एक बॉयोमेडिकल कम्पनी को ले सकते हैं। उसने दावा किया कि गायों के शरीर में बने एंटीबॉडी से कोरोना का इलाज हो सकता है और ये वर्तमान प्लाज्मा थैरेपी से 4 गुना बेहतर है। इसके लिए ट्रायल भी हुआ। बताया गया कि एक गाय द्वारा दी गई एंटीबॉडी से सैकड़ों मरीजों को ठीक किया जा सकता है। ‘साइंस’ मैगजीन ने भी इस ख़बर को जगह दी।

क्या आपने किसी भी भारतीय लिबरल या वामपंथी गैंग को इसका विरोध करते हुए सुना? अगर यही दावा किसी आयुर्वेदिक कम्पनी या फिर भारत में स्थित किसी व्यक्ति ने किया होता तो शायद इसे लेकर न जाने कितने मीम्स बनते और मजाक उड़ाया जाता। इसका विरोध इसीलिए नहीं किया गया क्योंकि दावा विदेशी कम्पनी ने किया था। लिबरल गैंग को गोरों के सर्टिफिकेट की आवश्यकता होती है, किसी भी चीज को प्रामाणिक मानने के लिए।

इसी तरह बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने जैसे ही ऐलान किया कि उन्होंने कोरोना वायरस की पहली ‘एविडेंस बेस्ड’ आयुर्वेदिक औषधि का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की है, लिबरल गिरोह चालू हो गया। पतंजलि आयुर्वेद का दावा है कि इसे पूरे साइंटिफिक ट्रायल और डॉक्यूमेंट्स के साथ लॉन्च किया गया है। बाबा रामदेव ने कहा कि ‘कोरोनिल श्वसारी वटी’ के लॉन्च से आयुर्वेद की प्रतिष्ठा बढ़ी है।

‘ऑल्ट न्यूज़’ के प्रतीक सिन्हा को तो इस बात से भी दिक्कत थी कि सारे न्यूज़ चैनल बाबा रामदेव की प्रेस कॉन्फ्रेंस दिखा ही क्यों रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक आरोप लगाया कि ये सारे चैनलों को बाबा रामदेव से काफ़ी एडवर्टाइजमेंट मिलते हैं, इसीलिए वो लगातार उनकी दवा को ‘प्रोमोट करने में’ लगे हुए हैं। उन्होंने बाबा रामदेव की दवा को फर्जी करार दिया और कहा कि उसके बारे में बात करने वाले मीडिया संस्थानों का समर्थन न करें।

दरअसल, उन्हें ये मौक़ा मिला आयुष मंत्रालय के बयान से जिसने ये कहा था कि उसे पतंजलि के दावों और अध्ययन के बारे में जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने दवा के विज्ञापन के तरीकों पर आपत्ति जताई थी और साथ ही इसके बारे में सारी सूचनाओं को साझा करने को कहा था। ये तो रही सरकारी प्रक्रिया की बात जो सबके लिए समान है। जो लोग इस सरकार को दिन-रात कोसते हैं, वही कह रहे कि सरकार के मंत्रालय ने आपत्ति जताई तो कुछ गड़बड़ी है।

ऐसा नहीं है कि पतंजलि आयुर्वेद ने मंत्रालय द्वारा माँगी गई सूचनाओं से आँख बंद कर लिया। बयान जारी कर एक-एक बात से जनता को अवगत कराया गया। कम्पनी के सीईओ आचार्य बालकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि यह सरकार आयुर्वेद को प्रोत्साहन व गौरव देने वाली है और जो कम्युनिकेशन गैप था, वह दूर हो गया है। इसके बाद पतंजलि ने सरकार को बताया कि उसने सारे तय मानकों और Randomised Placebo कंट्रोल्ड क्लिनिकल ट्रायल्स भी पूरा किया है।

पतंजलि का दावा है कि इस दवा के परीक्षण के बाद सभी मरीज 3 से 14 दिनों में कोरोना पॉजिटिव से नेगेटिव हो गए और एक की भी मृत्यु नहीं हुई। साथ ही यह भी जानकारी दी कि जल्द ही किसी अंतरराष्ट्रीय साइंस रिसर्च जर्नल में इस सम्बन्ध में शोधपत्र प्रकाशित किया जाएगा। किसके नेतृत्व में क्लिनिकल अध्ययन हुए, किन शहरों में इसे अंजाम दिया गया, कम्पनी ने सोशल मीडिया पर ये सब बताया। ‘पतंजलि’ ने बताया:

“ये औषधियाँ मनुष्य के फेफड़ों से लेकर पूरे शरीर की कम्युनिटी को त्वरित रूप से बूस्ट करती है और कोरोना के संक्रमण चैन को तोड़ती है। कोरोना के कारण होने वाले अन्य सिम्प्टम्स और बीमारियों को ख़त्म करने में भी ये ये औषधियाँ अहम भूमिका निभाती है। पूरे शरीर की ऊर्जा को संतुलित और जागृत करती है। ये औषधि ऋषियों के तप के साथ-साथ वैज्ञानिकों के प्रयासों का संयुक्त फल है। कोरोना से मुक्ति दिलाने वाला यह सफल अनुसंधान है।”

लेखक सुमैया शेख ने तो ‘इंडिया टीवी’ की ही आलोचना करते हुए पूछा कि उसने बाबा रामदेव को बोलने के लिए बुलाया ही क्यों? प्रतीक सिन्हा ने इसका समर्थन किया। ये वही लोग हैं जो आतंकियों का भी पक्ष दिखाने के लिए प्रयासरत रहे हैं। इन्होने आरोप लगा दिया कि ये ड्रग अटेस्टेड है, लोगों के जीवन से खिलवाड़ है और चैनलों को बाबा रामदेव को बोलने के लिए जगह तक नहीं देनी चाहिए।

पतंजलि ने आयुष मंत्रालय के बयान के बाद स्पष्टीकरण भी जारी किया

दरअसल, अगर इसी तरह का कोई दावा कोई छोटी सी विदेशी कम्पनी यूरोप या अमेरिका में कर दे तो यही लोग नाचने-कूदने लगेंगे। इन्हें दिक्कत दवा से नहीं बल्कि बाबा रामदेव और आयुर्वेद से है। हमारी पुरातन प्रणाली पाश्चात्य से श्रेष्ठ हो सकती है, वो कभी ऐसा मान ही नहीं सकते।

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन से लेकर अन्य ड्रग्स तक, दुनिया भर में हुए विभिन्न अध्ययनों में अलग-अलग निष्कर्ष सामने आए हैं। ये मेडिकल एक्सपर्ट्स और विशेषज्ञ तय करेंगे कि किसके दावों में कितना दम है और वास्तविकता सामने आ ही जाएगी, जब इसका इस्तेमाल होगा (इजाजत मिलने के बाद)। लेकिन, बिना किसी आधार के किसी कम्पनी या दवा को सिर्फ़ इसीलिए फ्रॉड बता देना कहाँ तक सही है, क्योंकि वो भारतीय संस्कृति की उपज है?

वैसे भी उस इकोसिस्टम पर कैसे विश्वास किया जा सकता है जो शुरू से पतंजलि आयुर्वेद या बाबा रामदेव के खिलाफ जहर उगलता रहा है? वो इकोसिस्टम, जिसके लोग बाबा रामदेव को बदनाम करने के लिए उनकी दवाओं में हड्डी होने से लेकर उन पर लोगों से रुपए ठगने तक के झूठे इल्जाम लगाते रहे हैं? क्या ऐसी ही स्क्रूटनी विदेशी कंपनियों की होती है? क्या उनके साथ इस तरह का मीडिया ट्रायल होता है?