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इतिहास की पुस्तक में छेड़छाड़ कर राजस्थान सरकार ने महाराणा प्रताप को बताया धैर्य, योजना की कमी वाला सेनानायक

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने महाराणा प्रताप से जुड़ी ऐतिहासिक संघर्ष की कहानी को हटाते हुए उसमें विवादित संशोधन किया है। राजस्थान बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (RBSE) की वेबसाइट में मौजूद कक्षा-10 की सामाजिक विज्ञान की ई-पाठ्यपुस्तक के दूसरे पाठ ‘संघर्षकालीन भारत 1206AD-1757AD’ में कहा गया है कि 16वीं सदी में मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप में शत्रुतापूर्ण परिस्थितियों में एक सैन्य कमांडर के रूप में धैर्य, नियंत्रण और योजना की कमी थी।

सामाजिक विज्ञान की किताब के दूसरे पाठ ‘संघर्षकालीन भारत 1206AD-1757AD’ में लिखा है, “सेनानायक में प्रतिकूल परिस्थितियों मे जिस धैर्य, संयम और योजना की आवश्यकता होनी चाहिए, प्रताप में उसका अभाव था।”

राजस्थान सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध पाठ्यपुस्तक का स्क्रीनशॉट (साभार: The Indian Express)

प्रताप के ऐसिहासिक शौर्य के किस्सों से छेड़खानी

यह पाठ महाराणा प्रताप और मुगल राजा अकबर के बीच लड़ी गई हल्दीघाटी की लड़ाई के बारे में है। पाठ में कहा गया है कि मुग़ल सेना पहाड़ी इलाकों में लड़ने के लिए निपुण नहीं थी, जबकि मेवाड़ सेना खुले मैदान में लड़ने के लिए सक्षम नहीं थी। आगे कहा गया है कि जब मुगल सेना पीछे हटने लगी तो प्रताप की सेना उनका पीछा करते हुए बादशाह बाग़ मैदान में पहुँच गई और इसके परिणाम महाराणा प्रताप के लिए प्रतिकूल थे।

हल्दीघाटी का युद्ध आमेर के राजा मान सिंह के नेतृत्व में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच लड़ा गया था। महाराणा प्रताप की सेना ने हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर पर विजय प्राप्त की थी।

महाराणा प्रताप से जुड़ी ऐतिहासिक संघर्ष की कहानी को हटाया

मेवाड़ के पूर्ववर्ती शाही परिवार, जो महाराणा प्रताप के वंशज हैं, ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार द्वारा स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में किए गए संशोधनों पर कड़ी आपत्ति जताई है। शाही परिवार ने माँग की है कि राज्य शिक्षा बोर्ड या तो पाठ्यपुस्तक में किए गए दावों को प्रमाणित करने के सबूत प्रदान करे या फिर पुस्तक से विवादित सामग्री को तुरंत हटाए।

प्रताप के वंशज लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने साफ किया कि महाराणा प्रताप के जीवन के ऐतिहासिक पहलुओं को किताब से हटाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन पहलुओं को समाजिक विज्ञान के वर्ष 2020 के संस्करण हटाया गया है, वो तथ्य आने वाली पीढ़ी के बच्चों के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने पाठ्यक्रम मंडल के सदस्यों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि आखिर ऐसी क्या वजह थी जिसके चलते जल्दबाजी में पाठ्यक्रम में बदलाव करना पड़ा, जबकि पाठ्यक्रम में बदलाव हुए कुछ वर्ष ही हुए हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अशोक गहलोत सरकार ने सत्ता में आने के 6 महीने के भीतर स्कूल की तमाम किताबों में बदलाव किया था।

राजस्थान सरकार ने कक्षा 12 की पाठ्यपुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर वाले चैप्टर में सावरकर के नाम के आगे से ‘वीर’ हटा दिया था। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि कॉन्ग्रेस की नज़र में सावरकर, वीर नहीं हैं और अब महाराणा प्रताप के शौर्य के किस्सों को हटाकर उनके बारे में विवादित चीजें प्रकाशित की जा रही है। 

क्या वाकई ‘कोरोनिल’ बेचने के​ लिए रामदेव को प्रचार की जरूरत है?

बाबा रामदेव ने मंगलवार (जून 23, 2020) को ‘कोरोनिल’ नाम से एक दवा बाजार में उतारी। दावा है कि आयुर्वेदिक तरीके से शोध और अध्ययन के बाद बनाई गई यह दवा कोरोना के उपचार में सक्षम है। मुझे नहीं पता कि इसमें कितनी सच्चाई है। इसके तकनीकी पक्षों को मैं जानता भी नहीं। अब खबर आई है कि केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय ने पंतजलि से इस दवा का विज्ञापन बंद करने को कहा है।

क्या वाकई कोरोनिल बेचने के​ लिए रामदेव को प्रचार की जरूरत है? मुझे ऐसा नहीं लगता, क्योंकि मैं रामदेव की घरों में घुसपैठ को जानता हूँ।  

2005 का साल था। कविवर को सत्ता से गए सालभर से ज्यादा हो गए थे। मनमोहन सिंह की सरकार वामपंथियों के बैसाखी पर टिकी थी। प्रकाश करात माकपा के महासचिव बन चुके थे। उस समय देश के राजनीतिक गलियारों के वे हॉटकेक थे। उनकी पत्नी वृंदा करात की भी खूब चर्चे थे। पीएम मोदी की भाषा में कहें तो, खान मार्केट गैंग में कोई ऐसा नहीं था जो वृंदा करात से नजदीकी नहीं चाहता था। 

अपवाद एक दंपती थे। एनडीटीवी वाले प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय। इनकी पहले से वृंदा से नजदीकी थी। रिश्ते में प्रणय, वृंदा के बहनोई तो राधिका बहन लगती हैं।

एक दिन वृंदा करात ने आरोप लगाया कि बाबा रामदेव जो आयुर्वेदिक दवाएँ बनाते हैं, उसमें पशु अंग और मानव की हड्डियाँ होती हैं। उस समय रामदेव का रसूख आज जैसा नहीं था। या यूँ कहे कि देश को रामदेव की ताकत का भान ही नहीं था। जंतर-मंतर पर रामदेव के खिलाफ कार्रवाई को लेकर वामपंथी दलों का एक प्रदर्शन भी हुआ था। अगले दिन सुदूर भारत के अखबारों में भी ये प्रदर्शन सुर्खियों में था। उसे संबोधित करती वृंदा करात की बड़ी तस्वीर भी। 

लेकिन इस खबर के प्रकाशित होने के बाद अलग ही तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। देश के कई शहरों में रामदेव के समर्थन में स्वत: स्फूर्त प्रदर्शन हुआ। तब देश को पहली बार रामदेव की लोगों के बीच पैठ और लोकप्रियता का एहसास हुआ। प्रतिक्रिया देख वृंदा करात भी महीनों चुप रहीं। 

2006 के शुरुआत में उन्होंने फिर मुँह खोला और आरोप दोहराए। इस बार प्रतिक्रिया और तीव्र हुई। इसके बाद वृंदा बोलती रहीं, लोगों ने नोटिस करना छोड़ दिया। अमेरिका से परमाणु करार पर राजदीप सरदेसाई (जी हाँ, मैंने गलती से यह नाम नहीं लिखा) की दगाबाजी से कॉन्ग्रेस ने सरकार बचा ली और उनके ​पति का भी जलवा-जलाल खत्म हो गया।

2006 के मई में मैं सीतामढ़ी गया था। मेरे पिताजी के मौसेरे भाई वहाँ रहते हैं। खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। रात को खाने के वक्त मैंने उन्हें रुखा-सूखा खाते देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। चाची से सुबह पूछा तो पता चला कि वे बीमार रहते हैं और हरिद्वार जाकर रामदेव से इलाज करवा रहे हैं। उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि ये आदमी छोटे शहरों, गाँवों में भी घुस चुका है।

फिर इस आदमी को जानने की ललक हुई। अपने आसपास के गाँवों को टटोला। धनबाद के आसपास के गाँवों में जाता तो लोगों से उसके बारे में पूछ लेता। फीडबैक सकारात्मक ही मिल रहे थे। कुछ साल बाद हरिद्वार भी गया। इस आदमी से मिला भी। 

फिर आया जून 2011। मैं दिल्ली आ चुका था। रामदेव कालाधन के मसले पर रामलीला मैदान से आंदोलन करने वाले थे। यूपीए सरकार ने तीन मंत्रियों को उनकी अगवानी के लिए एयरपोर्ट ही भेज दिया। कई उस दिन आश्चर्यचकित हुए। मैं नहीं हुआ। कुछ इसे अन्ना हजारे का दबाव बता रहे थे। मुझे ऐसा नहीं लगता था।

मेरा हमेशा से मानना है कि उस समय की यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे को कभी भाव ही नहीं दिया। उसने अन्ना को उसके हाल पर छोड़ दिया था। वो तो जनभावनाएँ जुड़ी थी कि अन्ना के चेले सितारे बन गए। 

वो सरकार असल में रामदेव की चुनौती से घबराई हुई थी। इसलिए उसे रामदेव का रामलीला मैदान में बैठना गँवारा नहीं था। उसने रातों-रात लाठीचार्ज करवा दी। रामदेव की इस ताकत को मोदी भी बखूबी समझते थे। वे जानते थे कि बिना शोर-शराबे के स्वामी रामदेव के समर्थक उनके कहे पर वोट डाल आते हैं।

अब उसी मोदी सरकार के आयुष मंत्रालय का फैसला देख रहा हूँ तो हँसी आ रही है। क्या आपको लगता है कि वाकई माल बेचने के लिए रामदेव को प्रचार की जरूरत है। वो तो शुक्र मनाइए कि रामदेव बनिया बन गए तो कई मीडिया हाउस चल रहे हैं। जरा मीडिया कंपनी के मालिकों से पूछिए कि नोटबंदी के बाद रामदेव के विज्ञापन का सहारा न होता तो उनका क्या हुआ होता?

चीनी मीडिया ने किया मॉस्को में राजनाथ सिंह से मुलाकात का झूठा दावा, भारतीय रक्षा मंत्रालय ने बताया फर्जी

रक्षा मंत्रालय ने ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट का खंडन करते हुए स्पष्ट बताया है कि राजनाथ सिंह मॉस्को में अपने चीनी समकक्ष से नहीं मिलेंगे। दरअसल, चीनी सरकार के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स‘ द्वारा ट्विटर पर भारतीय रक्षा मंत्री की चीनी रक्षा मंत्री के साथ मुलाकात को लेकर प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है, जिसे ‘द क्विंट’ जैसे भारतीय प्रोपेगेंडा वेबसाइट द्वारा भी प्रकाशित किया जा रहा है।

चीन के सरकारी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने मंगलवार (जून 23, 2020) को दावा किया कि उसके रक्षा मंत्री वेई फ़ेंगहे रूस में बुधवार को अपने भारतीय समकक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात कर सीमा विवाद पर बातचीत करेंगे।

ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, “चीनी रक्षा मंत्री वेई फेंग बुधवार को मास्को में रूस की विजय दिवस परेड में भाग लेंगे, और संभवत: अपने भारतीय समकक्ष राजनाथ सिंह के साथ एक बैठक आयोजित करेंगे।”

हालाँकि, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के कार्यालय ने ग्लोबल टाइम्स के दावों को खारिज कर दिया, कहा कि बुधवार के लिए ऐसी कोई बैठक निर्धारित नहीं है।

भारतीय रक्षा मंत्री ने ऐसी किसी सम्भावना के बारे में कोई जिक्र नहीं किया है, जिसका तात्पर्य यह है कि चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स चाइनीज प्रोपेगेंडा को हवा देने का प्रयास कर रहा है और इसके द्वारा वह भारत के रक्षा मंत्री से सीमा विवाद पर किसी भी तरह से बात करना चाहता है। भारत सरकार ने चीनी रक्षा मंत्री के साथ ऐसी किसी भी प्रकार की बातचीत से इनकार किया है।

रूस में विजय दिवस (Victory Day Russia) के जश्न के लिए मॉस्को पहुँचे भारत के केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह (Defense Minister Rajnath Singh) मंगलवार (जून 23, 2020) शाम मॉस्को पहुँच गए हैं, जहाँ उन्होंने भारतीय दूतावास में महात्मा गाँधी की मूर्ती पर पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

राजनाथ सिंह ने ट्वीट करते हुए लिखा – “मैं कल 75वीं विजय परेड में भाग लेने के लिए उत्सुक हूँ। मैं रूस के मैत्रीपूर्ण लोगों, विशेष रूप से दिग्गजों को अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ, जिन्होंने हमारी आम सुरक्षा में इतना योगदान दिया है।”

चीन के साथ गलवान घाटी को लेकर चल रहे ताजा विवाद के बीच रूस दौरे पर गए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि वे अपने दौरे से पूरी तरह संतुष्ट है। उन्होंने कहा कि उनकी चर्चा पॉजिटिव और प्रोडक्टिव रही। रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें यह आश्वासन मिला है कि पहले से जारी रक्षा कांट्रैक्ट को न सिर्फ बरकरार रखा जाएगा बल्कि उसे जल्द पूरा भी किया जाएगा।

तब्लीगियों को तो गाली दे रहे थे, खुद रथ यात्रा? वो इसलिए कि थूकने वालों और पूजने वालों में अंतर है, और रहेगा

जैसा कि अपेक्षित था, रथ यात्रा शुरु हुई नहीं कि कट्टरपंथियों और वामपंथी लम्पटों का गिरोह कटकाहा कुत्तों की तरह सोशल मीडिया पर झाँव-झाँव करने लगा है और दूर से मूसड़ों के पीछे से रदनक दाँत दिखा रहा है। अचानक से देश को तोड़ने का एकसूत्री अजेंडा ले कर चलाने वाले कलाकार उड़ीसा के हिन्दुओं को ले कर चिंतित हो गए हैं कि ‘अरे कोविड फैल जाएगा भीड़ से’।

यही बात मैंने कल अपने वीडियो में भी स्पष्ट की थी कि यह यात्रा पूरी तरह से प्रशासन और न्यायालय के आदेशों और निर्देशों को अनुसार, एक सीमित दायरे में हो रही है। सारी सावधानियाँ बरती गई हैं, हर व्यक्ति जो रथ यात्रा में शामिल होगा, उसका परीक्षण हुआ है, इसके बाद ही वो उस जगह पर जा सकते हैं।

खैर, इसे कुछ चतुर चम्पू तब्लीगियों के मरकज से जोड़ कर देख रहे हैं। वो अचानक से भावविह्वल हो कर मार्च के उस दौर में पहुँच गए जब पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा था और तब्लीगियों के निज़ामुद्दीन मरकज में सैकड़ों कोरोना मरीज न सिर्फ बैठे हुए थे, बल्कि प्रशासन के निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाई।

मौलाना साद बार-बार अपने ऑडियो में यह कहता सुना जा सकता था कि ‘अगर अल्लाह ने कोरोना भेजा है तो डॉक्टर क्या करेंगे? मस्जिदों में जाओ, उन्हें आबाद करो, वहाँ फरिश्ते उतरेंगे और वही कोरोना भगा देंगे’। वो डॉक्टरों का मजाक बना रहा था। रथ यात्रा में इसके विपरीत, पुजारियों ने स्वयं ही डॉक्टरों से परीक्षण का निर्णय लिया, भीड़ जुटने से मना किया और सीमित संसाधन में रथ यात्रा के आयोजन का फैसला किया।

उसके बाद का दौर याद कीजिए कि कोर्ट से ले कर पुलिस और प्रशासन, इन तब्लीगियों को खोज-खोज खोज कर निकाल रही थी। ये मस्जिदों में छुपे हुए थे, भारत के लगभग हर राज्य के किसी न किसी गाँव में तब्लीगी जमात के लोगों में कोरोना के लक्षण होने के बाद भी छुप रहे थे? लेकिन क्यों?

क्या रथ यात्रा में शामिल कोई भी व्यक्ति छुप रहा है? किसी पुजारी ने कहा कि उसके धर्म के खिलाफ है? कहीं सुना कि उन्होंने कहा हो कि सेनिटाइजर में अल्कोहल होता है तो हम मंदिर में, या रथ पर, या अपने हाथों में नहीं लगाएँगे? जी नहीं, पूरे इलाके को सेनिटाइज किया गया, हर व्यक्ति जो इससे जुड़ा है, चिकित्सकीय परामर्श लेने के बाद ही इस आयोजन का हिस्सा बना है।

वापस याद कीजिए कि जब इन तब्लीगियों को डॉक्टर के पास ले जाया जा रहा था, क्वारंटाइन करने की कोशिश हो रही थी तो ये क्या कर रहे थे? ये बस पर थूक रहे थे, डॉक्टरों पर थूक रहे थे, रास्ते में थूक रहे थे, और जहाँ रखा गया थी, वहाँ थूक रहे थे। लग रहा था आदमी नहीं थूक का कुदरती पम्प है!

किसी रथ यात्री के बारे में ऐसा सुना कि वो गैर-हिन्दुओं पर थूक रहे हैं? ये काम एक्सक्लूसिव डोमेन है तब्लीगियों का, और कई मजहबी फल विक्रेता का, जो पूरी दुनिया ने वीडियो पर देखा है। तो उनकी इन बेहूदगियों के कारण आम आदमी उन्हें तिरस्कृत कर रहा था। समुदाय के सभी लोगों को तो किसी ने गाली नहीं दी, बुरा-भला नहीं कहा।

अब और याद कीजिए कि कैसे इन्होंने पुलिस पर मधुबनी में गोली चलाई, कई जगह पत्थरबाजी हुई, नमाज पढ़ने को तब इकट्ठा हुए जब लॉकडाउन था। क्या ऐसा कुछ जगन्नाथ यात्रा के बारे में सुना? नहीं सुना, क्योंकि वो गोली नहीं चलाते, पत्थरबाजी के लिए उनको गुरुकुल में शिक्षा नहीं मिलती, न ही मूर्खतावश वो लॉकडाउन में आरती और रामनवमी कर रहे थे।

तो, अंत में, कोरोना को हल्के में लेने वाले, डॉक्टरों पर हमला करने वालों, थूकने, मल-मूत्र त्यागने वाले अधम श्रेणी के मनुष्यों की तुलना स्वामी जगन्नाथ के सेवायतों से करना धूर्तता है। मीडिया ने तब्लीगियों को अपराधी की तरह नहीं दिखाया, तब्लीगी स्वयं हर जगह कपड़े उतार कर नग्न हो रहे थे। नर्सों को देख कर पैंट उतारने वाले तो याद ही होंगे?

ऐसे ज़लील और नराधमों से महाप्रभु जगन्नाथ के सेवायतों की तुलना तो रहने दो, वहाँ के धूल का एक कण भी इन विष्ठाप्रेमी थूकलीगियों से लाख गुणा पवित्र और कोरोनामुक्त है। यूँ तो, इस कुत्सित चर्चा का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, लेकिन कई बार जो बातें स्वयंसिद्ध हों, उन्हें भी कहना पड़ता है ताकि कोई स्वयं को पीड़ित और दूसरे को शोषक की तरह न दिखाए।

सफूरा जरगर को मिली बेल: आखिर मोदी सरकार ने ‘शैतान’ के साथ ‘मानवीयता’ क्यों दिखाई?

दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफूरा जरगर को जमानत दे दी है। बता दें कि दिल्ली दंगा भड़काने में सफूरा जरगर मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक है। जफूरा के कई वीडियो उपलब्ध हैं, जिसमें वो कश्मीर को आजादी, केरल को आजादी, बिहार को आजादी और इंकलाब की बातें करती है।

इसके अलावा जफूरा के खिलाफ सबूत हैं कि ये जाफराबाद से महिलाओं की टोली को शाहीनबाग लाती थी और दंगे से पहले जाफराबाद में जो जाम लगा था, वहाँ भी ये सक्रिय रूप से उपस्थित थी और लोगों को उकसा रही थी।

ऐसे लोग जब हार जाएँगे तो सबूत के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना बढ़ जाती है। इसके बावजूद इसे बेल दी गई। आज दिल्ली पुलिस की तरफ से सरकार का पक्ष रख रहे सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वयं कहा कि उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं है, इसे बेल दे दिया जाए।

सफूरा जरगर की जमानत पर अजीत भारती का नजरिया

ये वही सफूरा है, जिसने कहा था कि पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ‘आतंकी’ हैं और अगर इसके लिए अगर हमें जेल में भी डालें तो मैं तैयार हूँ। सफूरा आजादी और इंकलाब की बातें करती है, जो कि वामपंथियों का पसंदीदा टॉपिक है। अगर आपको कोई भी वामपंथी आजादी का नारा लगाता दिखे तो इसका मतलब 15 अगस्त वाले स्वतंत्रता से नहीं है, इसका एक ही मतलब है- हिंदुओं से आजादी। ये नारा कश्मीर से चलता आ रहा है। जहाँ पर कट्टरपंथियों ने हिंदुओं का नरसंहार किया।

मुख्य तौर पर ये चाहते हैं कि हिंदुओं को देश से ही निकाल दिया जाए और इनको अपना देश बनाने की आजादी दी जाए, इन्हें अलग वोटिंग का अधिकार मिले। ये देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं। ये सफूरा उसी टुकड़े-टुकड़े गैंग की सदस्य या शायद सरगना है। आपने शाहीन बाग का छलावा देखा है, जहाँ पर हिंदुत्व की कब्र खोदने की बात होती है, बुर्का में माँ काली को दिखाया जाता है, फक हिंदुत्व के पोस्टर लगाए जाते हैं, स्वास्तिक को छिन्न-भिन्न करते दिखाया जाता है।

सफूरा को बेल क्यों दिया गया, इस बारे में जब हमने गृह मंत्रालय के सूत्रों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने हमें कई बातें बताई। उन्होंने बताया कि सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने खुद लिखकर दे दिया कि ‘मानवीयता के आधार पर’ इसे बेल दे दिया जाए। और वो मानवीय आधार है उसका प्रेगनेंट होना।

तुषार मेहता ने जफूरा की जमानत के लिए पहली शर्त यही रखी कि आगे किसी को इस आधार पर बेल ना दिया जाए, जिसे कोर्ट ने मान लिया। वामपंथियों की हमेशा से चाल रही है कि वो नैरेटिव जीतने के लिए ही सही, स्वयं को भी नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति वाले हैं।

इसी कारण इस प्रकरण को ऐसे भी देखा जाना चाहिए कि सरकार ने ऐसी किसी भी आशंका से बचने के लिए बेल के लिए स्वीकृति दी। ये लोग ऐसा करते रहे हैं, लोगों को गायब करना, मोलेस्टर और बलात्कारियों को बचाना, स्वयं का ही सर फोड़ कर सरकार पर आरोप मढ़ना इनकी दिनचर्या है।

अतः, गृह मंत्रालय के सूत्रों द्वारा दिए गए इस दृष्टिकोण को जब हम इनके पुराने कुकर्मों को देखते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार ने एक योजनाबद्ध तरीके से वामपंथियों का मुँह बंद करने के लिए एक तीर से दो शिकार किया है।

अगर दिल्ली पुलिस चाहती तो उसे बेल नहीं मिलती लेकिन सरकार ने कुछ सोचकर ही ये निर्णय लिया है। वामपंथियों और उनके गिरोह को ये बात नहीं भूलना चाहिए कि जिस कानून-व्यवस्था में उन्हें यकीन नहीं है, आज उसी ने उन्हें मानवीय आधार पर जमानत दी। ये चीज वामपंथियों को याद रखना चाहिए।

हमारा मन्त्र व्यापार नहीं उपचार है, परमिशन न भी मिले तो गरीब-अमीर को फ्री में दवा देंगे: बाबा रामदेव

आयुष मंत्रालय द्वारा पतंजलि आयुर्वेद द्वारा कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज करने का दावा करने वाली आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल के प्रचार पर फिलहाल रोक लगाने की खबर के बाद बाबा रामदेव ने कहा है कि उनका ‘व्यापार’ नहीं ‘उपचार’ करने का मंत्र है और परमिशन न भी मिले तो गरीब-अमीर को फ्री में दवा देंगे। आयुष मंत्रालय ने कंपनी को दवा की संरचना और कंपनी द्वारा लॉन्च से पहले किए गए शोध के विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा है।

बाबा रामदेव ने यहाँ बयान आयुष मंत्रालय की प्रेस रिलीज के तुरंत बाद रिपब्लिक भारत न्यूज़ चैनल पर दिया है। उन्होंने कहा कि हमारी आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल का 100% रिकवरी रेट है और डेथ रेट जीरो है।

ज्ञात हो कि आयुष मंत्रालय ने पतंजली कंपनी से इस दवा की संरचना का विवरण और इसे तैयार करने से पहले किए गए शोध को प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इसके साथ ही आयुष मंत्रालय ने मीडिया की खबरों पर संज्ञान लेते हुए फिलहाल पंतजलि आयुर्वेद लिमिटेड को इस दवा यानी, ‘कोरोनिल’ का विज्ञापन और ऐसे दावे को प्रकाशित करने से रोक दिया है।

आयुष मंत्रालय ने पतंजलि की दवा पर स्टेटमेंट जारी करते हुए कहा है कि मंत्रालय को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने पतंजली कम्पनी से कहा है कि पहले वो अपने कागज मंत्रालय में जमा करवाएँ और तब तक किसी भी तरह का विज्ञापन या दावा करने से बचें, जब तक इस पर जाँच पूरी नहीं होती।

आयुष मंत्रालय ने राज्य सरकार, उत्तराखंड से भी इस दवाई कोरोनिल को लेकर जरूरी जानकारी माँगी है। मंत्रालय ने राज्य लाइसेंसिंग ऑथोरिटी को लाइसेंस कॉपी और प्रोडक्ट को मंजूर किए जाने से जुड़े सभी डॉक्यूमेंट माँगे हैं।

आयुष मंत्रालय ने 21 अप्रैल को जारी गैजेट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि आयुर्वेदिक दवाओं की रिसर्च को लेकर बाकायदा नियम कानून जारी किए गए थे उसी के तहत कोरोना वायरस पर रिसर्च की जा सकती है।

आयुष मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा- “पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को COVID उपचार का दावा करने वाली दवाओं के नाम और संरचना के शुरुआती विवरणों को प्रदान करने के लिए कहा गया है; जगह / अस्पताल, जहाँ COVID​​-19 के लिए शोध अध्ययन आयोजित किया गया था; प्रोटोकॉल, सैंपल साइज, इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी क्लीयरेंस, सीटीआरआई (CTRI) रजिस्ट्रेशन, स्टडी और रिजल्ट, और तब तक इस तरह के दावों का विज्ञापन / प्रचार करना बंद कर दें, जब तक कि इस मुद्दे की विधिवत जाँच नहीं हो जाती।”

पतंजली ने आर्युर्वेदिक दावा द्वारा कोरोना के उपचार का दावा किया है

कोरोनिल बनाने वाली आयुर्वेदिक कंपनी पतंजली का दावा है कि यह नोवेल कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 वायरस के कारण होने वाली साँस की बीमारी यानी, COVID -19 के इलाज का पहला आयुर्वेदिक इलाज है।

पतंजलि योगपीठ बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कोरोना वायरस से जंग को ‘दिव्य कोरोनिल टैबलेट’ समेत तीन दवाइयाँ लॉन्च की हैं। इस ‘कोरोना किट’ में कोरोनिल के अलावा श्वासारी वटी और अणु तेल भी हैं। रामदेव का कहना है कि तीनों को साथ इस्तेमाल करने से कोरोना का संक्रमण खत्म हो सकता है और महामारी से बचाव भी संभव है।

पतंजली कंपनी के अनुसार, कोरोना किट, जो 30 दिनों के लिए है, केवल ₹545 में उपलब्ध कराया जाएगा। रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस दवा ने 3-7 दिनों के भीतर ‘100 फीसदी रिकवरी रेट’ दिखाया है।

Plurals के जनरल सेक्रेटरी की कम्पनी ने बिना नोटिस दिए कर्मचारियों को निकाला, पुष्पम करती हैं लाखों जॉब्स देने के दावे

बिहार की राजनीति में एक पार्टी एक नई धुरी बन कर भरने की कोशिश में है और उसका नाम है Plurals, जिसकी संस्थापक पुष्पम प्रिया चौधरी हैं। वो जदयू के विधान पार्षद रहे विनोद चौधरी की बेटी हैं। उनके दादा उमाशंकर चौधरी समता पार्टी के दिनों में नीतीश ने क़रीबी रहे हैं। बिहार में उनके प्रचार अभियान के बाद उनका नाम नया नहीं है, ख़ासकर युवाओं को उनके बारे में सब कुछ पता है। Plurals ने लाखों जॉब्स क्रिएट करने का वादा किया है। Plurals के ही एक नेता हैं अनुपम सुमन।

लेकिन, अब पार्टी के बारे में कुछ ऐसा सामने आया है जो इसके द्वारा प्रचारित की जा रही नीतियों और सिद्धांतों के एकदम विपरीत है। ये इस पार्टी के दोहरे रवैये की ओर इशारा करता है। Plurals से सम्बद्ध ‘Young Bihar Movement’ (YBM) ने कई लोगों को नौकरी पर हायर किया और बाद में अचानक से निकाल दिया। यहाँ तक कि उन्होंने नोटिस तक नहीं दिया और सैलरी भी लगभग एक महीने की देरी से दी, वो भी बार-बार तगादा करने के बाद।

YBM और Plurals का रिश्ता: क़रीबी हैं अनुपम सुमन और पुष्पम प्रिया चौधरी

YBM के प्रेसिडेंट हैं अनुपम सुमन, जैसा कि उसकी वेबसाइट पर भी दिखाया गया है। राजधानी पटना के पूर्व नगर निगम आयुक्त अनुपम सुमन Plurals के जनरल सेक्रेटरी हैं। इसीलिए, इस बात से अचम्भा नहीं होना चाहिए कि YBM के कर्मचारियों ने उनसे Plurals के लिए काम कराए जाने की बात कही है। हालाँकि, जॉइनिंग से पहले उनसे ये बात छिपाई गई थी कि YBM का Plurals से कोई रिश्ता है।

पुष्पम प्रिया चौधरी ने कभी सार्वजनिक रूप से आईआरएस अधिकारी रहे अनुपम सुमन से समर्थन माँगा था। वो अनुपम सुमन के साथ पहले भी काम कर चुकी हैं। पुष्पम ने कहा था कि वो अनुपम से निवेदन करती हैं कि हम सब साथ आकर बिहार को बदलें। जब अनुपम बिहार टूरिज्म डेवलपमेंट काॅरपोरेशन में थे, तब पुष्पम प्रिया चौधरी भी उनके ही साथ थी। बाद में उन्होंने Plurals जॉइन की और राजनीति में आ गए

यहाँ हमने अनुपम सुमन और Plurals के रिश्ते की बात इसीलिए की है क्योंकि हम जो बताने जा रहे हैं, उसके लिए ये आवश्यक है। पुष्पम प्रिया चौधरी ने दो पन्नों का पत्र लिख कर अनुपम सुमन की तारीफ की थी और साथ ही उन्हें ‘इंटेलिजेंस और अंडरस्टैंडिंग’ वाला व्यक्ति बताया था। उन्होंने कई बार लिखा था कि अनुपम सुमन को उनके साथ आना ही होगा और अंततः हुआ भी यही। अब आते हैं वापस YBM पर।

YBM की वेबसाइट पर अनुपम सुमन की बायोग्राफी दी गई है

पटना में 2019 के मानसून में आए बाढ़ को याद कीजिए, जब जलजमाव से पूरा शहर परेशान था। तब बिहार के नगर विकास मंत्री ने अक्टूबर में पटना के म्युनिसिपल कमिश्नर रहे अनुपम सुमन पर आरोप लगाया था कि उनकी वजह से नालियों और ड्रेनेज की साफ़-सफाई का काम अटका रहा। उनका कहना था कि अनुपम सुमन उनकी बात नहीं सुनते थे और सीधा CMO से बातचीत करते थे। बकौल मंत्री, सुमन ने पूरे 1 साल के कार्यकाल में जरा सा भी काम नहीं किया।

2 महीने काम करवाया, अचानक नौकरी से निकाला: क्या कहते हैं YBM के पूर्व-कर्मचारी

ऑपइंडिया ने ‘यंग बिहार मूवमेंट (YBM)’ के तीन कर्मचारियों से बातचीत की, जिन्होंने इस बात की पुष्टि की कि उनसे दो महीने काम करवाया गया और फिर अचानक से टर्मिनेशन लेटर देकर नौकरी से निकाल दिया गया। यहाँ तक कि नियमानुसार उन्हें नोटिस भी नहीं दिया गया और 2 महीने लगभग पूरे होने के बाद सैलरी दी गई। अचानक नौकरी से निकाले जाने से इन कर्मचारियों का करियर संकट में आ गया है।

हमारी बात YBM में कार्यरत रहे राजीव (बदला हुआ नाम) से हुई। राजीव को भी अप्रैल 2020 में ज्वाइन कराया गया था। YBM की तरफ से उनका इंटरव्यू लिया गया और उसके बाद उन्हें जॉइन करने कहा गया। उनके साथ ही 4-5 लोगों को हायर किया गया था। राजीव बताते हैं कि उन्हें पोलिटिकल रिफॉर्म्स पर रिसर्च का काम दिया गया था। उन्होंने 15 अप्रैल से YBM में काम करना शुरू किया था।

Plurals के जेनरल सेक्रेटरी हैं YBM के प्रेसिडेंट अनुपम सुमन

उन्होंने बताया कि पहले उन्हें नहीं बताया गया था कि उन्हें Plurals के लिए काम करने को कहा जाएगा। वो बताते हैं कि कम्पनी ने उन्हें ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद बताया कि वो Plurals के लिए काम करते हैं। उनसे बार-बार कहा जाता था कि वो ऐसे काम करें कि Plurals जब सत्ता में आ जाए तो ये चीजें काम आ जाएँ। उन्होंने बताया कि उनलोगों को काम करते हुए 50 दिन हो गए थे लेकिन उन्हें एक रुपए भी सैलरी नहीं दी गई।

राजीव ने बताया कि जब सैलरी के लिए तगादा किया जाता था तो वो कभी ‘टेक्निकल ग्लिच’ की बातें करते थे तो कभी लॉकडाउन की वजह से बैंक ट्रांज़ैक्शन में समस्या होने की बात कहते थे। बार-बार ये कहा जाता था कि 2 दिन में सैलरी आ जाएगी या फिर कभी अगले हफ्ते सैलरी आने की बात कही जाती थी। राजीव बताते हैं कि अंत में जून के पहले हफ्ते में उनलोगों को 2 महीने की सैलरी देकर निकाल दिया गया।

ऑपइंडिया को पता चला है कि कुल 4 लोगों को इसी तरह से निकाल बाहर किया गया। इनमें से 3 से हमने बातचीत की, जिन्होंने इस सूचना की पुष्टि की है। राजीव ने कहा कि भिखारी की तरह बार-बार अपने हक़ के रुपए माँगने के बावजूद उन्हें सैलरी नहीं दी जाती थी और उलटा सुनने को मिल जाता था। उन्होंने कहा कि जो पार्टी लाखों जॉब्स क्रिएट करती है, उसके द्वारा इस तरह का व्यवहार किया जाता आश्चर्यजनक है।

इसके बाद हमारी बात पूजा (बदला हुआ नाम) से हुई, जिन्होंने राजीव की बातों से अपना समर्थन जताया। पूजा ने बताया कि सबके घर में रुपए की ज़रूरत थी, किसी का लोन था तो किसी को अपने बीमार माता-पिता की देखभाल करनी थी लेकिन बावजूद इसके सैलरी जॉइन करने के 2 महीने बाद दी गई और ऊपर से बिना किसी नोटिस पीरियड के निकाल बाहर किया गया। पूजा ने बताया कि उन्होंने सैलरी के लिए जब कम्पनी के व्हाट्सप्प ग्रुप में लिखा तो उलटा उन्हें ही फटकार लगाया गया।

उन्हें इकनोमिक रिफॉर्म्स पर काम दिया गया था। उन्हें रिपोर्ट्स बना कर शेयर करने को कहा जाता था। बाद में उन्होंने जब संस्थान को सैलरी के लिए लिखते हुए ‘Accountability’ और ‘Communication’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया था, जिस पर सीनियर्स ने आपत्ति जताई। कम्पनी के व्हाट्सप्प ग्रुप में सभी कर्मचारियों ने जब सैलरी के लिए लिखा, तब जाकर उन्हें सैलरी तो मिली लेकिन नौकरी से निकाल दिया गया।

कर्मचारियों को भेजे गए ‘टर्मिनेशन लेटर’ में YBM ने लिखा कि उनका प्रमुख उद्देश्य ज़मीनी स्तर पर काम करना था और कोरोना वायरस आपदा की वजह से कम्पनी अपने प्रोजेक्ट को जारी रखने में अक्षम है, इसीलिए कोई सकारात्मक विकल्प सामने न आने के कारण प्रोजेक्ट को बंद किया जा रहा है। YBM ने लिखा कि काफी विचार-विमर्श करने के बाद वो बड़े दुःख से कर्मचारियों को ये सूचना देता है कि वो उनकी सेवाएँ समाप्त करता है और भविष्य में प्रोजेक्ट फिर से शुरू होने पर उन्हें काम देने में उसे ख़ुशी होगी।

इसके बाद हमारी बात माधव (बदला हुआ नाम) से हुई, जिन्होंने कहा कि उनके साथ भी YBM ने इसी तरह का व्यवहार किया। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि उनलोगों से Plurals का सदस्यता फॉर्म भी भरवाने की कोशिश की गई थी लेकिन उन्होंने किसी तरह इससे इनकार कर दिया। साथ ही उनसे ये भी कहा जाता था कि वो Plurals के लिए चुनाव प्रचार हेतु वालंटियर्स जुटाएँ। एक कर्मचारी को 100 वालंटियर्स लाने कहा गया था।

ऑपइंडिया ने YBM की एचआर समीक्षा से संपर्क किया, जिन्होंने पहले तो कहा कि वो इस विषय पर बाद में बात करेंगी। बाद में कॉल करने पर उन्होंने पूछा कि आरोप किसने लगाया है। इसके बाद वो पूछने लगीं कि उनका नंबर हमारे पास कहाँ से आया। उन्होंने द्वारा सवालों का जवाब दिए बिना और अपना पक्ष रखे बिना ही कॉल कट कर दिया गया। बाद में कॉल करने पर पता चला कि उन्होंने हमारे नंबर को ब्लॉक कर दिया है।

आयुष मंत्रालय ने जाँच पूरी होने तक पतंजली को कोरोना के लिए ‘दिव्य कोरोनिल’ दवा का प्रचार करने से रोका

बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद द्वारा कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज करने का दावा करने वाली आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल को लॉन्च करने के बाद, आयुष मंत्रालय ने कंपनी से इस दवा की संरचना का विवरण और इसे तैयार करने से पहले किए गए शोध को प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इसके साथ ही आयुष मंत्रालय ने मीडिया की खबरों पर संज्ञान लेते हुए फिलहाल पंतजलि आयुर्वेद लिमिटेड को इस दवा यानी, ‘कोरोनिल’ का विज्ञापन और ऐसे दावे को प्रकाशित करने से रोक दिया है।

आयुष मंत्रालय ने पतंजलि की दवा पर स्टेटमेंट जारी करते हुए कहा है कि मंत्रालय को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने पतंजली कम्पनी से कहा है कि पहले वो अपने कागज मंत्रालय में जमा करवाएँ और तब तक किसी भी तरह का विज्ञापन या दावा करने से बचें, जब तक इस पर जाँच पूरी नहीं होती।

आयुष मंत्रालय ने राज्य सरकार, उत्तराखंड से भी इस दवाई कोरोनिल को लेकर जरूरी जानकारी माँगी है। मंत्रालय ने राज्य लाइसेंसिंग ऑथोरिटी को लाइसेंस कॉपी और प्रोडक्ट को मंजूर किए जाने से जुड़े सभी डॉक्यूमेंट माँगे हैं।

आयुष मंत्रालय ने 21 अप्रैल को जारी गैजेट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि आयुर्वेदिक दवाओं की रिसर्च को लेकर बाकायदा नियम कानून जारी किए गए थे उसी के तहत कोरोना वायरस पर रिसर्च की जा सकती है।

आयुष मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा- “पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को COVID उपचार का दावा करने वाली दवाओं के नाम और संरचना के शुरुआती विवरणों को प्रदान करने के लिए कहा गया है; जगह / अस्पताल, जहाँ COVID​​-19 के लिए शोध अध्ययन आयोजित किया गया था; प्रोटोकॉल, सैंपल साइज, इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी क्लीयरेंस, सीटीआरआई (CTRI) रजिस्ट्रेशन, स्टडी और रिजल्ट, और तब तक इस तरह के दावों का विज्ञापन / प्रचार करना बंद कर दें, जब तक कि इस मुद्दे की विधिवत जाँच नहीं हो जाती।”

गौरतलब है कि आज ही हरिद्वार में योग गुरु स्वामी रामदेव ने कोरोना वायरस की दवा ‘कोरोनिल’ को लॉन्च करते हुए दावा किया था कि आयुर्वेद पद्धति से जड़ी-बूटियों के गहन अध्ययन और अनुसंधान के बाद बनी यह दवा कोरोना वायरस के इलाज में सक्षम है।

पतंजली का दावा- 3 से 7 दिनों के भीतर ‘100% रिकवरी रेट’

कोरोनिल बनाने वाली आयुर्वेदिक कंपनी पतंजली का दावा है कि यह नोवेल कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 वायरस के कारण होने वाली साँस की बीमारी यानी, COVID -19 के इलाज का पहला आयुर्वेदिक इलाज है।

पतंजलि योगपीठ बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कोरोना वायरस से जंग को ‘दिव्य कोरोनिल टैबलेट’ समेत तीन दवाइयाँ लॉन्च की हैं। इस ‘कोरोना किट’ में कोरोनिल के अलावा श्वासारी वटी और अणु तेल भी हैं। रामदेव का कहना है कि तीनों को साथ इस्तेमाल करने से कोरोना का संक्रमण खत्म हो सकता है और महामारी से बचाव भी संभव है।

पतंजली कंपनी के अनुसार, कोरोना किट, जो 30 दिनों के लिए है, केवल ₹545 में उपलब्ध कराया जाएगा। रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस दवा ने 3-7 दिनों के भीतर ‘100 फीसदी रिकवरी रेट’ दिखाया है।

बाबा रामदेव ने कहा कि पूरा देश और दुनिया जिस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था वह आज आ गया है, कोरोना की पहली आयुर्वेदिक दवा तैयार हो गई है। बाबा रामदेव ने कहा कि मेडिसिन के ट्रायल के दौरान तीन दिन के अंदर 69% संक्रमित इससे ठीक हो गए। इसके अलावा, मेडिसन के ट्रायल के दौरान सात दिन में 100% कोरोना मरीज नेगेटिव हो गए।

जासूसी का अड्डा बने पाक उच्चायोग के 50% कर्मचारियों को भारत छोड़ने का आदेश, भारतीय उच्चायोग से भी वापस आएँगे कर्मी

भारत ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को मंगलवार (जून 23, 2020) को करारा झटका दिया है। आतंकी और जासूसी गतिविधियों को लेकर भारत अब नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या घटाकर आधी कर देगा। यह जानकारी विदेश मंत्रालय ने दी है।

विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत सरकार ने फैसला किया है कि दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में 50 फीसदी कर्मचारी कम किए जाएँगे। इसी तरह इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में भी 50 फीसदी कर्मचारी कम करने का फैसला लिया गया है।

दिल्ली स्थिति पाकिस्तानी उच्चायोग के प्रभारी अधिकारी को विदेश मंत्रालय ने फिर से तलब किया। इस दौरान उच्चायोग के अधिकारियों के जासूसी करने और आंतकी संगठने के संपर्क में रहने का मुद्दा उठाया गया। जिसमें हाल में दो अधिकारियों के रंगे हाथ पकड़े जाने का भी उदाहरण दिया गया, जिन्हें देश से बाहर कर दिया गया था।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता अनुराग श्रीवास्‍तव ने कहा कि पाकिस्तान का व्यवहार वियना कन्वेंशन के अनुरूप नहीं है। द्विपक्षीय समझौतों के तहत उनके राजनयिक, कांसुलर अधिकारियों का व्‍यवहार उचित नहीं है। पाकिस्तान ने समानांतर रूप से इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को उनके वैध राजनयिक कार्यों को करने से रोकने के लिए लगातार प्रयास करता रहा है।

हाल ही में पाकिस्तान में उच्चायोग में काम करने वाले दो भारतीय अधिकारियों का बंदूक की नोक पर अपहरण किया गया और उनके साथ बेहद ही बुरा व्यवहार किया गया जिसे लेकर भारत ने पाकिस्तान को फटकार भी लगाई थी।

यही नहीं पाकिस्तान की ओर से झूठे दावे किए गए कि इन अधिकारियों की गाड़ी से एक शख्स गंभीर रूप से घायल हो गया था और अधिकारी उसे छोड़कर फरार हो गए थे, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। हालाँकि, भारत के पाकिस्तान पर दबाव बनाने के बाद इन अधिकारियों को उनके वाहन सहित इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में पहुँचाया गया।

भारतीय अधिकारी ने पाकिस्तानी एजेंसियों की बर्बरता का जिक्र करते हुए कहा कि पड़ोसी मुल्क के इस तरह के बर्ताव से साफ होता है कि वह भारतीय अधिकारियों के साथ किस तरह का सलूक करता रहा है। भारत लौटे इन अधिकारियों ने पाकिस्तानी एजेंसियों के हाथों हुए बर्बर व्यवहार का पूरा विवरण भारत सरकार को दिया है। जिसके बाद भारत ने यह फैसला किया है।

जब चीनी मीडिया नेहरू को ‘साम्राज्यवाद का दौड़ता कुत्ता’ कहती थी, तब नेहरू लोकसभा में अक्साई चीन को लेकर झूठ बोल रहे थे

चीन द्वारा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के कुछ कटु अनुभवों का नतीजा है। भ्रमजीवी मीडिया लाख प्रयास करें फिर भी वह ये सत्य नहीं छुपा सकते कि लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में हो रही सैनिकों की रक्तरंजित झड़प युगद्रष्टा जवाहरलाल नेहरू के मन में पलने वाली कम्युनिस्ट राज्य के ‘माओ-चाऊ व्हाट्सएप ग्रुप’ का सदस्य बनने की इच्छा का ही परिणाम है।

हालाँकि, बावजूद इन सभी तथ्यों के, नेहरू के नमक में डूबे ‘नेहरूवादी दल’ तत्परता से अपने उस भूलों के पर्याय ‘महानायक’ के लिए फील्डिंग करते देखे जा सकते हैं, जिसकी छत्रछाया में वो आज किसी की फील्डिंग करने लायक बन सके हैं।

चीन की सेना द्वारा पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में किए जा रहे उपद्रव के बाद सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल्स तक में प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए बयानवीर यह कहते सुने जा रहे हैं कि मोदी ने चीन के सामने समर्पण कर दिया है। राहुल गाँधी तो पीएम मोदी को ‘सरेंडर मोदी’ तक कह चुके हैं।

लेकिन क्या पूर्वी लद्दाख की सीमा पर चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत ने पहली बार अपने जवान खोए हैं? क्या वास्तव में चीन को लेकर भारत की स्थिति आज नेहरू के समय से कमजोर है? लेकिन प्रमाण तो यह बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने यही बात स्वीकार करने में कई वर्ष गँवा दिए कि लद्दाख में कुछ हो रहा है, जो ‘चिंताजनक’ है।

इस समयावधि में भारत ने लद्दाख में अपनी सीमा के एक बड़े भू-भाग को ही नहीं, बल्कि कई जवानों तक को खो दिया था, लेकिन उस दौरान साम्राज्यवादी कम्युनिस्टों के देश में ‘चाऊ-माओ’ (चाऊ एन-लाइ और माओत्से तुंग) के बीच अपने लिए वैश्विक छवि तलाश रहे नेहरू को कभी इतनी फुर्सत नहीं हो सकी कि वह इस बात की सार्वजानिक घोषणा करते या कम से कम इसे स्वीकार करते।

आज बात-बात में ’56 इंच’ की डिबेट करने के लिए उत्सुक भारतीय मीडिया शायद ही यह तथ्य जानता हो या स्वीकार करने की हिम्मत रखता हो कि जवाहरलाल नेहरू जब चाइनीज कम्युनिस्ट कॉकटेल का हिस्सा बनने और उनकी वाहवाही के लिए मरे जाते थे, तब चाइनीज आधिकारिक मीडिया नेहरू के लिए जो विशेषण इस्तेमाल करता था वो कुछ इस तरह थे – ‘ब्रिटिश साम्राज्यवादी और दौड़ता कुत्ता’ (Running dog of imperialism), ‘राष्ट्रवाद का नाटक करने वाला नेहरू’, ‘च्यांग-काई-शेक का दूसरा नाम’।

मीडिया के एक हिस्से के भ्रमजीवियों की मानें तो 1962 में नेहरू द्वारा संसद में पहली बार जब अक्साई चीन का नाम लिया गया था, तब तक भारत के गश्ती दलों ने चीन के साथ झड़प में जान नहीं गँवाई थी? जबकि सवाल यह बनता है कि क्या तब तक जवानों के बलिदान और चीन की घुसपैठ को तत्कालीन सरकार ने स्वीकार किया था?

यह सब उस दौर की बात है जब भारत में सूचना और संचार के माध्यम आज के चीन जितने ही उपलब्ध हुआ करते थे। यह दौर तथ्यों के व्हाइटवाश का ‘स्वर्णिम युग’ था। दोहरे संवाद की तो गुंजाईश तक नहीं थी, जो जनता तत्कालीन प्रधानमंत्री को ट्विटर पर टैग कर उनसे ‘लद्दाख में क्या चल रहा है?’ जैसे सवाल करती।

एक तरह से देखा जाए तो मीडिया की जो स्थिति आज चीन की है, वह उस दौरान भारत की हुआ करती थी। हालाँकि, भारत की मजबूरी तब संशाधन-विहीनता थी। संसद ही उस समय आम लोगों और राजनेताओं की सूचना का प्रमुख जरिया हुआ करता था।

आख़िरकार जब सीमा पर हो रही हलचल की बातें खुलने लगीं तो नेहरू द्वारा दबाई गई सभी जानकारियों का ठीकरा नेहरू की कमजोर याददाश्त पर थोप दिया गया। यह तब की बात है जब चीनी आक्रमणकारियों ने तिब्बत को अपने नियन्त्रण में ले लिया था और कम्युनिस्टों को महत्व देने वाले नेहरू ने तिब्बत की बजाए चीन के पक्ष में अपना झुकाव रखा।

तिब्बत की धार्मिक पृष्ठभूमि पर चायनीज कम्युनिस्ट सत्ता के इस बलात अतिक्रमण पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी क्योंकि उस समय चीन में भारत के राजदूत माधव पणिक्कर ने नेहरू को ‘एशिया में शांति का सूत्र’ देते हुए सलाह दी थी कि यदि इस समय चीन का साथ दिया जाए और उनसे दोस्ताना सम्बन्ध रहे तो आगे वही उनके काम आ सकते हैं।

तिब्बत में चीन ने भारत तक सड़क बनाने का काम 1950 के दशक में ही शुरू कर दिया था। लेकिन नेहरू ने अगस्त 1959 तक भी इस तथ्य को छिपाकर रखा। जब यह समाचार किसी भी प्रकार छुपा पाना नेहरू के लिए गले की हड्डी बन गया तब एक दिन आखिरकार लोकसभा में यह खबर रख दी गई और नेहरू ने कहा कि ‘तिब्बत-सिंकियांग हाइवे’ बना दिया गया है।

नेहरू द्वारा तब तक इस तथ्य को छुपाने के इस दावे की पुष्टि कुछ ही वर्ष पहले सीआईए (CIA) द्वारा सार्वजानिक किए गए एक डॉक्यूमेंट में भी होती है। सीआईए द्वारा जारी किए गए इन डॉक्यूमेंट्स में इस बात का खुलासा किया गया था कि अक्साई चिन तक आने वाली सड़क को बहुत पहले ही बना लिया गया था और भारत के लोगों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलने दिया गया।

सीआईए द्वारा बाहर लाए गए इन टॉप सीक्रेट में जुलाई 15, 1953 में लिखा गया एक नोट भी था जिसमें भारत की उत्तरी सीमाओं को लेकर कुछ जानकारी मौजूद थीं। इसका शीर्षक था- ‘चाइनीज कम्युनिस्ट ट्रूप्स, वेस्ट तिब्बत, रोड कंस्ट्रक्शन, सिंकियांग टू तिब्बत एंड लद्दाख’ (सिंकियांग से तिब्बत और लद्दाख तक सड़क का काम/Chinese Communist Troops, West Tibet, Road Construction, Sinkiang to Tibet and Ladakh)

अक्साई चिन

यह नोट उन सभी दावों की पुष्टि करता था, जिनका अब तक कितने ही भारतीय इतिहासकार सिर्फ अनुमान लगाते रहे थे, यानी चीन ने 1950 के दशक की शुरुआत में ही भारतीय क्षेत्र में एक सड़क का निर्माण शुरू कर दिया था।

यह खुलासा वर्ष 1959 में तब हुआ, जब सीआरपीएफ़ का 70 जवानों का एक गश्ती दल पूर्वी लद्दाख स्थित अक्साई चिन में देश की सीमा रेखा खींचने के लिए पास को क्रॉस कर रहा था, यहाँ उन्हें चीन की PLA (पीपल्स लिबरेशन पार्टी) के लोगों ने रोक लिया।

अक्टूबर 20, 1959 में चीनी सैनिकों ने 3 भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया और अगले दिन 9 जवान मार दिए गए जबकि 7 को बंधक बना लिया था। यह विषय अब इतना गंभीर हो चुका था कि अब नेहरू के पास इस तथ्य को सार्वजनिक करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प शेष नहीं था कि अक्साई चिन क्षेत्र पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया है।

यानी, तकरीबन एक दशक पहले से जो काम भारत की उत्तरी सीमा पर हो रहा था, दिल्ली को तब इसकी भनक तक नहीं थी या शायद तत्कालीन भारतीय नेतृत्व तब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत को ऐसी ऐतिहासिक विवादादास्पद धरोहरें देने में व्यस्त था और उसे फर्क ना पड़ता हो कि ‘लद्दाख की उस बंजर भूमि’ में कुछ उगता भी है या नहीं!

संसद में नेहरू का झूठ

इतनी लम्बी अवधि तक लोगों को गुमराह करने के बाद बजाए चीनी सेना के अतिक्रमण को स्वीकार करने के, तब नेहरू ने संसद में बिना अक्साई चिन का नाम लिए बयान दिया था- ”हमारे देश की ज़मीन पर कोई दावा नहीं किया गया है।”

अप्रैल 22, 1959 को लोकसभा में चीन द्वारा भारत के हिस्से को अपने नक़्शे में दिखाने को लेकर चल रही बहस के दौरान नेहरू का जवाब था –

“नहीं सर, मैं माननीय सदस्यों को सुझाव दूँगा कि वे कभी-कभी हांगकांग से और कभी-कभी अन्य विषम स्थानों से निकलने वाली खबरों पर ज्यादा ध्यान न दें। हमारे ऊपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है। मेरे लिए उस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। हमने एक या दो छोटे सीमांत विवादों पर चर्चा की है जिसमें क्षेत्र के छोटे पथ शामिल हैं, शायद इस तरह से एक मील या ऊँचे पहाड़ों में, जहाँ कोई भी नहीं रहता है और जो लंबित हैं। हमने उनकी चर्चा की है और वर्तमान में कोई समझौता नहीं हुआ है।”

खुद को अक्साई चिन जैसी किसी चीज से एकदम अनजान बताने का प्रयास करते हुए नेहरू ने कहा- “कुछ चीनी एक मील आगे बढ़े हैं या दो.. शायद, ऊँचे पहाड़ों में। यह सत्य है। हम इसमें पूछताछ कर रहे हैं।” इस सबके बीच नेहरू पंचशील जैसे कागजी भरोसों से चीन के कम्युनिस्ट नेतृत्व को खुश करने में ही तल्लीन नजर आते थे।

नेहरू की मित्रता शायद ही अपनी निजी छवि और गौरव के अलावा किसी अन्य चीज से रह सकी हो। यदि ऐसा न होता तो भारत आज भी अपने पहले प्रधानमंत्री की भूलों के लिए अपने सैनिकों का बलिदान नहीं दे रहा होता और कॉन्ग्रेस इन सैनिकों के बलिदान में अपने सत्ता में लौटने का मार्ग नहीं तलाश रही होती।

ख़ुफ़िया विभागों से मिली जानकारी के बावजूद चुप थे नेहरू

जवाहरलाल नेहरू सरकार के दौरान इंटेलिजेंस चीफ बीएन मलिक ने भी इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा था कि ख़ुफ़िया विभाग को उनके जासूसों ने चाइनीज पीएलए की घुसपैठ की जानकारी देते हुए 1952 में ही बता दिया था कि करीब 2000 चीनी मजदूरों को अक्साई चीन इलाके में खच्चर और घोड़ों की जगह गाड़ी का रास्ता तैयार करने के काम में लगा दिया गया है।

1953 तक भारत सरकार को इस बात की स्पष्ट जानकारी थी कि गाड़ी का रास्ता पश्चिमी तिब्बत के रुडोक तक तैयार किया जा चुका है। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने ख़ुफ़िया विभागों की रिपोर्ट तक को कोई महत्व नहीं दिया था। इस सबके बाद 1962 की वह अपमानजनक हार नेहरू के खाते आई।

नेहरू के ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ के नारों के परिणामस्वरूप कई भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गँवाई और आज एक बार फिर उसकी कीमत चुकाते नजर आ रहे हैं। और नेहरूघाटी सभ्यता के पत्रकार इस विश्लेषण में व्यस्त हैं कि क्या मोदी के नेतृत्व ने चीन के सामने समर्पण कर दिया है?

चीन की मीडिया जहाँ कुछ दिन पहले तक चीनी सैनिकों के साथ हुई इस हिंसक झड़प को ही नकार रही थी, वहीं अब यह कहते नजर आने लगी है कि चीन ने भी अपने अफ़सर गँवाए हैं हालाँकि वह स्पष्ट रूप से आँकड़े सामने नहीं रख रहे।

रही भारत के पड़ोसी देश नेपाल की बात, तो उसका इस्तेमाल विस्तारवादी कम्युनिस्ट चीन हमेशा से ही समय-समय पर विश्व का ध्यान भटकाने के लिए करता आया है। इस समय चीन लगभग हर बड़ी-छोटी आर्थिक महाशक्ति के निशाने पर है।

चीन ने इस बार एक बड़ी भूल करते हुए भारत के वर्तमान नेतृत्व को भी नेहरू जितना ही अकर्मण्य और सेना के हितों के प्रति उदासीन मान लेने की कर डाली है। चीन का मानना शायद यह था कि वर्तमान सरकार को भी नेहरू की तरह ही पंचशील की आड़ में तिब्बत से पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर करने जितना ही आसान काम होगा।

नेहरु ने तिब्बत से पीछे हटने को लेकर 1954 में लोकसभा में बयान दिया था – “सच तो यह है कि अगर हम उन्हें छोड़ने पर राजी नहीं होते तो हमें भी छोड़ना पड़ता।”

यह वही तिब्बत था, जिसे ऋग्वेद में ‘त्रिवष्टप’ नाम से बुलाया गया है, जो भारतभूमि का एक पवित्र हिस्सा था, जो कनिष्क और कुषाण वंश के प्रदेश थे , जिसे नेहरू ने चीन को सौंप दिया था। वर्ष 1949 तक यह तिब्बत स्वतंत्र राष्ट्र था और नेहरू ने विस्तारवादी चीन को इसे हथियाने में अनुचित सहयोग कर एक और विरासत अपनी ‘वैश्विक छवि’ के नाम कर दी।

नेहरू का तिब्बत के पक्ष पर मौन और तिब्बत में चीनी आक्रमणकारियों की सेना के प्रवेश को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के समर्थन की नीति का विरोध तब युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। वाजपेयी ने अगस्त, 1959 में भारतीय संसद में तिब्बत की मदद के बजाए आक्रमणकारियों के साथ खड़े होने वाली तत्कालीन नेहरू सरकार को कोसते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बतियों को उनके ही देश में अल्पसंख्यक बना देने वाले चीन को मान्यता दिलाने के लिए भारत एक हद से आगे जाकर उनके साथ खड़ा है।

और यह सब जवाहरलाल नेहरू की नाक के ठीक नीचे और उनके ‘दूरदर्शी फैसलों’ से ही सम्भव हुआ। नतीजा यह हुआ कि इन फैसलों के कारण नेहरू कभी ‘माओ-चाऊ’ के व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा भी नहीं बन सके और आज जब भी चीन आँख भारत को आँख दिखाने की कोशिश करता है, तो न चाहते हुए भी नेहरू का स्मरण हो आता है।

जो आज कहते हैं कि मोदी ने समर्पण किया है, चीन ने पहली बार भारत के सैनिकों का खून अगर कभी बहाया है तो वह मोदी सरकार के दौरान हुआ है, उन्हें इतिहास के उन पन्नों को जाकर टटोलना चाहिए जहाँ नेहरू के फैसलों की शर्मिदगी के अलावा बाकी कुछ भी नहीं है।

सत्य यही है कि नेहरू ने जवानों का खून भी बहने दिया था, उस बलिदान को स्वीकार तक नहीं किया, तथ्यों की लीपापोती की, सीमा भी चीन को सौंप दी थी, चीनियों की चाटुकारिता के लिए भारतीय सेना को कभी पूरी तरह विश्वास में नहीं लिया।