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दिल्ली के शाहीन बाग से लौटे कोरोना संदिग्ध की मौत के बाद परिवार के पाँच सदस्य मिले पॉजिटिव, बाकी की तलाश जारी

मुजफ्फरनगर के खतौली क्षेत्र में दिल्ली के शाहीन बाग से इस्लामनगर लौटे व्यक्ति की होम क्वारंटाइन के दौरान मौत के बाद उसके स्वजनों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आ रही हैं। मृत व्यक्ति के भाई की कोरोना रिपार्ट भी रविवार को पॉजिटिव आई है, जबकि उसके परिवार के चार लोग पहले ही कोरोना पॉजिटिव मिल चुके हैं। 

कोरोना संदिग्ध के जनाजे में शामिल लोगों की तलाश तेज

यानी कि अभी तक उसके परिवार से पाँच लोगों की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आ चुकी है। अब पुलिस उन लोगों की तलाश में जुट गई है, जिन्होंने लॉकडाउन का उल्लंघन करके मृतक के अंतिम संस्कार में भाग लिया था।

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संक्रमित शख्स 12 अप्रैल को लॉकडाउन के दौरान दिल्ली से इस्लामनगर स्थित अपने घर लौटा था। बताया जा रहा है कि दिल्ली में रहने के दौरान मृतक ने कई बार शाहीन बाग का दौरा किया था। यहाँ तबियत बिगड़ने पर उसे 13 अप्रैल को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया था। 14 अप्रैल को उसकी मौत हो गई।

मृतक का नहीं हुआ था कोरोना टेस्ट

इसके बाद परिजन और रिश्तेदारों के अतिरिक्त आस पास के गाँव तक के लोगों ने उसके जनाजे में हिस्सा लिया। नजदीक के घर में उसके शव को नहलाया गया। इसके बाद कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। बता दें कि उसका कोरोना टेस्ट नहीं हुआ था। प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग ने उसका सैंपल भी नहीं लिया था।

उसकी मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने उसके परिवार के सदस्यों के सैंपल लिए थे, जिनमें मृतक की माँ के अलावा दो साल का बेटा, 4 साल की बेटी और 10 साल की बहन भी कोरोना पॉजिटिव आ चुके हैं। रविवार को आई जाँच रिपोर्ट में मृतक का भाई भी कोरोना संक्रमित मिला है। इस रिपोर्ट से इस्लामनगर और पुलिस प्रशासन में भी हड़कंप मचा है। स्वास्थ्य विभाग ने संक्रमित पाए गए युवक को कोविड-19 अस्पताल बेगराजपुर मेडिकल कॉलेज भेज दिया है। फिलहाल मृतक की बीबी का सैंपल नहीं लिया गया है, क्योंकि वो रोजा रख रही है।

इस्लामनगर पहले से ही हॉटस्पॉट है। स्वास्थ विभाग करीब 150 लोगों के सैंपल लेकर जाँच के लिए भेज चुका है, जिनकी रिपोर्ट का इंतजार है। उधर, नए कोरोना संक्रमित मिलने के साथ ही जनपद में कोरोना पॉजिटिव की संख्या टोटल 23 हो गई है, जिनमें से चार मरीज कोरोना पर विजय पाकर स्वस्थ हो चुके हैं।

गौरतलब है कि सीएए विरोध के नाम पर दिल्ली के शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी कई दिनों तक धरने पर बैठे हुए थे और लगातार नियम-क़ानून को धता बता रहे थे। उन्होंने कोरोना वायरस से बचाव व सावधानी को लेकर सरकार, डॉक्टरों व विशेषज्ञों की सलाहों को धता बताया था। किसी ने कहा था कि ये क़ुरान का वायरस है जो मजहब वालों को कुछ नहीं करेगा, तो किसी ने पूछा था कि क्या गारंटी है कि भीड़ न जुटाने से कोरोना वायरस नहीं होगा? 17 अप्रैल को वहाँ पर तीन कोरोना पॉजिटिव पाए गए। जिसके बाद 24 अप्रैल को बुल्डोजर चला कर धरनास्थल से तंबू हटा दिए गए।

कोरोना: प्लाज्मा थेरेपी को ICMR ने बताया खतरनाक, लिबरल गिरोह साबित कर रहा था तबलीगी जमात का मानवता पर उपकार

प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोना वायरस (COVID-19) के उपचार की बात पर स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा है कि यह थेरेपी अभी तक साबित नहीं हुई है और अभी सिर्फ प्रायोगिक चरण में ही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि कोरोना वायरस के उपचार में यदि प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग दिशानिर्देशों के अनुसार नहीं हुआ तो यह जान के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।

जानलेवा हो सकता है प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग – ICMR

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के संयुक्‍त सचिव लव अग्रवाल ने कहा – “आइसीएमआर (ICMR) द्वारा प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग किया जा रहा है। हालाँकि, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसे उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके प्रभाव का अध्ययन करने के लिए आइसीएमआर (ICMR) द्वारा राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन शुरू किया गया है। जब तक आइसीएमआर (ICMR) अपने अध्ययन का समापन नहीं करता है और एक मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है, तब तक प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग केवल अनुसंधान या परीक्षण के उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए। यदि उचित दिशा-निर्देश के तहत प्लाज्मा थेरेपी का सही तरीके से उपयोग नहीं किया जाता है तो यह जीवन के लिए खतरा भी पैदा कर सकता है।”

इसके साथ ही आइसीएमआर ने यह भी सुझाव दिया है कि प्लाज्मा थेरेपी के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्त्व आवश्यक है। दरअसल, सार्स-सीओवी (SARS-CoV), एच1एन1(H1N1) और मर्स सीओवी (MERS-CoV) जैसे खतरनाक वायरस के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया गया था।

भारत में भी कोरोना वायरस का पहला प्लाज्मा परीक्षण (Plasma for Corona Treatment) देश में सफल रहा है। लेकिन इसके बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह जानकारी भी दी गई कि यह थेरेपी अभी सिर्फ और सिर्फ ट्रायल और टेस्टिंग के लिए ही अप्रूव हुई है और इसका इलाज के लिए प्रयोग खतरनाक हो सकता है।

प्लाज़्मा थेरेपी पर लिबरल मीडिया गिरोह की रूचि

प्लाज़्मा थेरेपी के चर्चा में आते ही अचानक से ‘सेक्युलर’ राजनेता और ‘वाम-उदारवादी’ लिबरल गिरोह सक्रीय हो उठे। प्लाज्मा डोनेट करते हुए एक तबलीगी की तस्वीर को आधार बनाकर बहस का मुद्दा यह बना दिया गया कि मुस्लिम भी कोरोना वायरस के इलाज के लिए आगे आ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग आज तक यह स्वीकार करने में कतराते रहे कि देश में कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा स्रोत तबलीगी जमात रहा है, वह भी इस बात पर गद्य लिखते नजर आने लगे।

सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं तस्वीरें

मीडिया के वाम-उदारवादी वर्ग ने तबलीगियों की एक तस्वीर को इतना भुनाने का प्रयास किया कि यदि प्लाज्मा पर ICMR का स्पष्टीकरण न आता तो शायद अब तक प्लाज़्मा को सेक्युलर साबित कर दिया गया होता। इस वर्ग ने प्रलाप कर के ‘तबलीगी जमात’ के बदले ‘सिंगल सोर्स’ लिखने पर मजबूर किया।

हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों को भुनाकर आज दिल्ली की सत्ता पर बैठे अरविन्द केजरीवाल ने भी फ़ौरन प्लाज्मा को गंगा-जमुनी तहजीब की ही अगली योजना साबित करने का प्रयास करते हुए बयान दिया कि हिंदू का प्लाज्मा मुस्लिम और मुस्लिम का प्लाज्मा हिंदू की जान बचा सकता है।

उल्लेखनीय है कि तबलीगी जमात का तांडव महीने भर से ही पहले से जारी है, बावजूद इसके किसी भी नेता और सेक्युलर मीडिया ने यह हिम्मत नहीं जुटाई कि वह मुस्लिमों की हरकतों पर खुलकर कह सके। इस देश के बुद्धिजीवी वर्ग के हालात यह हैं कि उन्हें यह कहने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ कि उन्हें यह साबित करने का प्रयास करना पड़ रहा है कि मुस्लिम भी चाहते हैं कि कोरोना ठीक हो जाए।

वास्तव में यह तो स्पष्ट सन्देश है कि मुस्लिम यदि कुछ सकारात्मक पहल करते हैं तो यह उनकी तरफ से समाज पर उपकार माना जाने लगा है। वरना मुस्लिमों के अलावा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने निरंतर शासन और व्यवस्था के साथ तालमेल बनाने के बजाए उन्हें बदतर बनाने की कोशिश की हो।

उदाहरण के तौर पर यदि तबलीगी जमात को ही लिया जाए तो 2002 में कारसेवकों को साबरमती एक्सप्रेस में जिन्दा जलाने से लेकर अलकायदा के हर दूसरे आतंकी अभियान में मौजूद यह संगठन इस बार भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के बड़े हिस्से में कोरोना का प्रमुख स्रोत बनता गया। प्लाज़्मा थेरेपी में मुस्लिमों की एक तस्वीर से मीडिया का जो वर्ग बवाल काट रहा है उसमें आज तक इतना भी दम विकसित नहीं हो सका है कि वह इन सभी मुद्दों पर चर्चा भी कर सके।

अच्छे मुस्लिम-बुरे मुस्लिम

देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर के लोगों ने अच्छे और बुरे मुस्लिमों के मुद्दे पर जमकर साहित्य लिखा है। एक पीढ़ी ने जहाँ अब्दुल कलाम के नाम पर मुस्लिमों के गुनाहों को ढकने की कोशिश कर दी वहीं दूसरी पीढ़ी भी एक ऐसे मुस्लिम को तलाश रही है जिसके आधार पर वो अगली दो-तीन पीढ़ियाँ काट दें। इस बीच सभी जानते हैं कि इन गिने-चुने नामों को छोड़कर बाकी के 99.99% मुस्लिम क्या कर रहे होंगे।

यह ऐसे ही है जैसे एक ताजमहल की भव्यता को मिसाल बनाकर इसी लिबरल गिरोह की जमात ने नालंदा की बर्बादी को गायब कर दिया। इसी तरह मुस्लिमों की एक बिरियानी को इस तरह से पेश किया जाता रहा है जैसे भारतीय इसके बिना कुपोषण से मर रहे थे। कुछ समय पहले ही सबा नक़वी मुस्लिमों द्वारा समाज पर किए गए एहसानों को गिनाती हुई नजर आ रहीं थीं। हालाँकि, यह उन्हें महंगा ही पड़ा।

प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग होना एक बात है। यह भी हो सकता है कि यह प्रयोग आगे सफल भी हो या असफल भी, लेकिन तमाम लिबरल गिरोह की कवरेज की भाषा ऐसी है मानो कोरोना वायरस का एकमात्र समाधान यही है और वो भी इस समय सिर्फ तबलीगियों के पास है, जैसा कि दिखाया भी जा रहा है।

फिलहाल ICMR ने प्लाज़्मा थेरेपी की सार्वजानिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध की बात कही है। तब तक कम से कम लिबरल गिरोह को इसे मुस्लिमों द्वारा मानवता पर किया गया उपकार साबित करने की जल्दबाजी से बचना चाहिए।

पुलिस व डॉक्टरों से बदसलूकी की 25 ख़बरें: जब समुदाय विशेष ने कोरोना वारियर्स को भी नहीं बख्शा

कोरोना वायरस आपदा के बीच देश भर में समुदाय विशेष के लोगों और जमातियों ने डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों पर हमले के साथ-साथ कई ऐसी हरकतें की, जिनसे महामारी और ज्यादा फैली और इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो गया। इससे पहले हमने पिछले 1 महीने की 30 ऐसी ख़बरों का ब्यौरा दिया था, जिसमें जमातियों ने इसी तरह की घृणित हरकतें की। अब हम आपके समक्ष समुदाय विशेष द्वारा की गई हिंसक व अन्य घृणित करतूतों का ब्यौरा प्रस्तुत कर रहे हैं।

कोरोना वायरस: जब समुदाय विशेष ने फैलाई हिंसा और घृणा

1 अप्रैल: तेलंगाना के गवर्नमेंट गाँधी अस्पताल के एक मरीज ने डॉक्टरों पर अचानक से हमला बोल दिया। उसका बड़ा भाई भी उसी हॉस्पिटल में भर्ती था, जिसकी मौत की ख़बर सुनते ही उसने उग्र होकर हमला बोल दिया। दोनों भाई दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ मस्जिद से लौटे थे। डॉक्टरों ने कहा था कि इस विकट परिस्थिति में जब मेडिकल कर्मचारी आगे बढ़ कर काम कर रहे हैं, उन्हें ऐसे लोगों के हमले भी झेलने पड़ रहे हैं।

1 अप्रैल: गुजरात के अहमदाबाद स्थित गोमतीपुर में भीड़ द्वारा पुलिस पर पत्थरबाजी की घटना सामने आई। गोमतीपुर में पुलिस उन लोगों की तलाश में गई थी, जिन्होंने तबलीगी जमात के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। तभी पुलिस पर हमला कर दिया गया। हमलावरों में महिलाएँ और किशोर उम्र के बच्चे भी शामिल थे। पुलिस को सूचना मिली थी कि इलाक़े में मरकज़ से लौटे कई मुस्लिम छिपे हुए हैं।

2 अप्रैल: बेंगलुरु ने सादिक लेआउट में आशा कर्मचारियों पर हमला कर दिया गया। वो सभी हेल्थ सर्वे कर रही थीं। उन्हें प्रशासन द्वारा इलाक़े के उन लोगों का ब्यौरा जमा करने का काम सौंपा गया था, जिन्हें बुखार या सर्दी के लक्षण आ रहे हैं। हमलावर नमाज वाली टोपी पहने हुए थे। वो सभी स्थानीय ही थे। उन्होंने आशा की महिला कर्मचारियों को प्रताड़ित भी किया और सूचना देने से इनकार कर दिया।

2 अप्रैल: इंदौर में इरशाद नाम के युवक ने व्हाट्सएप पर ‘मस्ती की पाठशाला’ नाम से ग्रुप बना रखा था। इस ग्रुप में जुड़े कई युवक लगातार लोगों को संदेश भेजकर यह भ्रम फैला रहे थे कि कोरोना के इलाज की आड़ में जो डॉक्टर उनके मोहल्लों में आ रहे हैं, वे जहरीला इंजेक्शन दे रहे हैं। इसलिए उनका बहिष्कार करें। पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया। वह कोहिनूर कॉलोनी, आज़ादनगर का निवासी है।

2 अप्रैल: लॉकडाउन के बावजूद उज्जैन की एक मस्जिद में मौलवी बुधवार की रात 25-30 लोगों को नमाज अदा करवा रहा था। पुलिस ने मौलवी के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए मस्जिद में ताला लगवा दिया। रात 8.30 बजे प्रशासन को उज्जैन के आगर रोड स्थित गाँधी नगर के मोहम्मद मस्जिद में लोगों के इकट्ठा होने की खबर मिली। पुलिस मौके पर पहुँची। नमाज पढ़ते इन सभी लोगों को बाहर निकाला। मौलवी हाजी मोहम्मद युनूस वफाती खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।

3 अप्रैल: कन्नौज में जुमे की नमाज अता करने के लिए जुटी भीड़ को हटाने गई पुलिस पर पत्थरबाजी हुई। इस घटना में कई पुलिस वाले गंभीर रूप से घायल हो गए। लॉकडाउन के बावजूद जुमे की नमाज के लिए जामा मस्जिद में नमाजियों की भीड़ जमा हो गई थी। कई पुलिसकर्मियों को वहाँ से जान बचा कर भागना पड़ा। इसके बाद उच्चाधिकारियों को घटनास्थल पर आना पड़ा लेकिन तब तक नमाजी रफूचक्कर हो चुके थे।

3 अप्रैल: राँची के हिंदपीढ़ी इलाके में मलेशिया की एक महिला कोरोना पॉजिटिव पाई गई। जिस घर से महिला मिली, उसके आसपास के घरों में रहने वालों के स्वास्थ्य की जाँच के लिए जिला प्रशासन ने स्वास्थ्य कर्मियों की एक टीम को वहाँ भेजा। टीम जैसै ही लोगों की जाँच करने पहुँची तो स्थानीय लोगों ने इनका विरोध किया। लोगों के विरोध के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम को वहाँ बैरंग लौटना पड़ा।

3 अप्रैल: इंदौर में महिला डॉक्टरों तक को नहीं बक्शा गया। एक वीडियो वायरल हुए, जिसमें पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स) पहने दो महिला डॉक्टरों पर हमला किया गया। उन पर लगातार पत्थरबाजी हुई। हमले के बावजूद महिला डॉक्टरों ने कहा कि इससे वो अपनी ड्यूटी करना नहीं छोड़ देंगी। ये दोनों एक सघन इलाक़े में टेस्टिंग के लिए गई थीं, जहाँ मुस्लिमों का ज्यादा प्रभाव है।

3 अप्रैल: अलीगढ़ में नमाज़ पढ़ रहे लोगों ने एक मस्जिद से निकल कर पुलिस को घेर लिया और हमला कर दिया। इसके तुरंत बाद पुलिस ने 3 लोगों को गिरफ़्तार कर के मामले की जाँच शुरू की। सराय रहमान क्षेत्र में नेशनल लॉकडाउन के बावजूद 25-30 की संख्या में लोग जुट गए थे और उन्होंने नमाज पढ़ना चालू कर दिया। जब पुलिस वहाँ सूचना मिलने पर पहुँची तो उन्होंने पुलिस पर ही हमला कर दिया।

3 अप्रैल: कर्नाटक के हुब्बली स्थित एक मस्जिद में भारी संख्या में नमाजी जुट गए। उन सभी ने पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। मस्जिद में सारे के सारे सोशल डिस्टन्सिंग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए जुटे थे। पत्थरबाजी करने वालों में अधिकतर युवा थे। पत्थरबाजों में महिलाएँ भी शामिल थीं। एक महिला कॉस्टेबल गंभीर रूप से घायल हो गई। पुलिस को इलाक़े में बड़ी संख्या में जवान तैनात करने पड़े।

3 अप्रैल: बिहार के दरभंगा में डीएम त्यागराजन एसएम को जान से मारने की धमकी दी गई। सिर्फ़ इसीलिए, क्योंकि उन्होंने राज्य के बाहर से आए लोगों को स्क्रीनिंग कराने की सलाह दी थी। इसके लिए सर्वेक्षण का काम चल रहा था। एक युवक ने डीएम दरभंगा के फेसबुक पेज पर एक कमेंट किया, जिसमें डीएम को गोली मारने वाले को दो लाख रुपए इनाम देने की बात कही गई। उसकी पहचान मो. फैजल के रूप में की गई।

4 अप्रैल: मधुबनी जिले के अंधाराठाढ़ी प्रखंड के हरना गॉंव में सामूहिक रूप से नमाज अदा की गई। यहॉं से तबलीगी जमात के 11 सदस्य क्वारंटाइन में भेजे गए हैं। बताया जाता है कि वे भी नमाज में शामिल थे। पुरुष जब भीतर नमाज अदा कर रहे थे दर्जनों औरतें लाठी और मिर्च पाउडर लेकर बाहर खड़ी थीं। सिवान के महाराजगंज के सिकटिया पंचायत के खानपुरा गॉंव की मस्जिद में भी शुक्रवार को नमाज अदा की गई। करीब 50 लोग इसमें शामिल हुए। 

5 अप्रैल: अहमदाबाद के सोला सिविल अस्पताल में जमातियों ने दवा और इंजेक्शन लेने से इनकार कर दिया। उन मरीजों का कहना था कि सरकार उन्हें मार डालना चाहती है। 26 जमातियों को दरियापुर से लाकर आइसोलेशन सेंटर में रखा गया था। जमाती वहाँ एक कोने में जमा हो गए और कहने लगे कि उन्हें उनकी इच्छा के विपरीत वहाँ पर रखा गया है। इनमें से 6 नाबालिग थे। आलाधिकारियों से दरख्वास्त कर मुस्लिम डॉक्टरों की ड्यूटी लगवाई गई, जिसके समझाने पर वो माने।

5 अप्रैल: ओडिशा के कटक में जब कर्फ्यू लगाया गया तो समुदाय विशेष ने गुस्से में पुलिस पर पत्थरबाजी की। पुलिस ने इसके बाद एक केस रजिस्टर किया। ये घटना केशरपुर इलाक़े की है, जहाँ पुलिस ‘कम्प्लीट शटडाउन’ के बाद पेट्रोलिंग कर रही थी। तभी उन्हें मस्जिद के पास लोगों के जुटने की ख़बर मिली। जैसे ही पुलिस वहाँ पर पहुँची, समुदाय विशेष ने हमला बोल दिया। कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए।

6 अप्रैल: लखनऊ सदर के कसाईबाड़ा में स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया। उस क्षेत्र में 12 जमाती कोविड-19 पॉजिटिव मिले थे, इसीलिए मेडिकल टीम को चेकअप के लिए भेजा गया था। इसके बाद स्थानीय मुस्लिमों ने उनकी पिटाई शुरू कर दी। यहाँ तक कि महिला स्वास्थ्यकर्मियों तक को नहीं बख्शा गया। मेडिकल टीम के सर्वे रिपोर्ट को भी फाड़ने की कोशिश की गई।

7 अप्रैल: डॉक्टर दीपा शर्मा सोशल मीडिया पर इस्लामी कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार बनीं। उनका ‘गुनाह’ सिर्फ इतना था कि उन्होंने तबलीगी जमात के मजहबी कार्यक्रम से लौटे डॉक्टर इदरीस अकबानी पर सवाल खड़ा किया था। अकबानी सेल्फ-क्वारंटाइन के बावजूद लोगों का इलाज करते रहे और हॉस्पिटल आकर दूसरों की ज़िंदगी भी ख़तरे में डालते रहे। कट्टरपंथियों ने दीपा पर फेक न्यूज़ फैलाने का आरोप लगाया।

7 अप्रैल: बिहार के मधुबनी के बिस्फी विधान सभा अंतर्गत रहिका प्रखंड के सतलखा मानी दास टोल में रविवार (अप्रैल 5, 2020) रात को दीप जलाने को लेकर हुए हिन्दू-मुस्लिम विवाद में कैली देवी की मुस्लिम परिवारों ने मिलकर हत्या कर दी। कैली देवी की हत्या करने वालों में सुलेमान नदाफ, खलील नदाफ, मलील नदाफ, जलिल नदाफ आदि शामिल थे। इन लोगों ने हिन्दू महिला को गला दबाकर मार दिया।

7 अप्रैल: भोला स्थित तलैया थाना क्षेत्र में इस्लामपुरा इलाके में विशेष समुदाय की भीड़ ने पुलिस पर धारधार हथियारों से हमला बोला और हमले में 2 से 3 पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया। रात के करीब साढ़े दस बजे एक बदमाश ने अपने दर्जन भर साथियों के साथ मिलकर छह पुलिस कर्मियों पर हमला किया और 2 पर चाकू चला दिया। इस हमले में एक पुलिसकर्मी के हाथ में और दूसरे पुलिसकर्मी के कंधे में चोट आई।

8 अप्रैल: छत्तीसगढ़ के भिलाई में जैसे ही 2 महिला स्वास्थ्यकर्मी एक व्यक्ति के यहाँ पहुँची और उनकी जानकारी माँगी, घर की महिलाएँ दोनों स्वास्थ्यकर्मियों पर भड़क उठीं। फिर उनपर हमला कर दिया। इस दौरान बीच-बचाव करने पर भीड़ से भी मारपीट हुई। इस संबंध में पुलिस ने 30 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। उन लोगों ने दोनों स्वास्थ्यकर्मियों को एनआरसी का सर्वे करने वाला बताया। फिर उनसे विवाद शुरू कर दिया।

15 अप्रैल: मुरादाबाद के हाजी नेब मस्जिद के पास मेडिकल टीम की एक गाड़ी पर हमला कर दिया गया, जिसमें कोरोना वायरस के संदिग्धों को ले जाया जा रहा था। इसके बाद पुलिस की गाड़ी उन डॉक्टरों को भीड़ के चंगुल से छुड़ाने आई, जिस पर पथराव किया गया। पुलिस ने बताया कि वहाँ कम से कम 1 हज़ार लोग उपस्थित थे। एम्बुलेंस के ड्राइवर ने बताया कि भीड़ ने अचानक से हमला कर कई डॉक्टरों को घायल कर दिया।

15 अप्रैल: भागलपुर जिले के नवगछिया नगर पंचायत से एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है। यहॉं के एक मुस्लिम बहुल वार्ड के 25 परिवारों ने स्क्रीनिंग से ही इनकार कर दिया। विवाद से बचने के लिए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने संबंधित टीम को भी आगे बढ़ जाने को कहा। 25 मुस्लिम परिवारों के 250 लोगों ने स्क्रीनिंग कराने से ही इनकार कर दिया। पुलिस को सख्त कार्रवाई की हिदायत देनी पड़ी।

21 अप्रैल: हापुड़ जनपद में शहर कोतवाली क्षेत्र के सरावा गाँव में दो समुदायों के बीच शुरू हुई मामूली कहासुनी खूनी झड़प में बदल गई। जिसके बाद जमकर पथराव और चाकू से हमला हुआ जिसमें करीब 5 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। मामले में इमरान, साजिद, हासम, मेहताब, नौशाद, इरफान, मोहसिन, अमन, परवेज आलम, यामीन. सफी उल्ला, गुल मोहम्मद, रिजवान और फुरकान को आरोपित बताया गया।

21 अप्रैल: हैदराबाद के एक परिवार के बारे में ख़बर छपी कि उस परिवार के एक मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार समुदाय विशेष ने किया। मृतक के भाई ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की इस ख़बर को नकारते हुए कहा कि कुछ समुदाय वहाँ आकर ख़ुद को मृतक का दोस्त बताने लगे और उन्होंने ख़ुद मदद की पेशकश की। फिर अंतिम संस्कार में भाग लेते हुए फोटो क्लिक करवा के पब्लिसिटी स्टंट किया गया।

22 अप्रैल: गया जिले के शेरघाटी नगर सुमाली मोहल्ले में लॉकडाउन के दौरान नियमों का उल्लंघन कर मंगलवार को कुछ दुकानें खुली हुई थीं। इस बात की जानकारी जब पुलिस को हुई तो पुलिस की एक टीम लॉकडाउन के बीच खुली दुकानों को बंद कराने के लिए पहुँच गई। जैसे ही वहाँ खुली चूड़ी की दुकान को पुलिस बंद कराने लगी ऐसे ही स्थानीय लोगों ने पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया। कई पुलिसकर्मी घायल हुए।

26 अप्रैल: वार्ड में खाना देने गए वार्ड ब्वॉय को मारने के लिए दौड़े तो वह किसी तरह वहाँ से भागा। जमाती पीछे-पीछे नीचे तक उतर आए। वार्ड ब्वॉय ने पूरे घटनाक्रम से अस्पताल प्रशासन को अवगत कराया। जमाती खाना खाने से इनकार कर रहे थे और भड़के हुए थे। उन्होंने खाने की थाली में भी लात मार दी। इन सभी को तीसरी मंजिल पर रखा गया था। जबकि उन्हें चाय-नाश्ता सहित मिनरल वाटर और फल भी दिए जा रहे थे।

मध्य प्रदेश: कोरोना संक्रमित शाहिदा बी की बहन की भी मौत के बाद जनाजे में शामिल हुए दर्जनों लोग दहशत में

मध्य प्रदेश में कोरोना पॉजिटिव शख्स शाहिदा बी के जनाजे में शामिल होने वाले लोगों के बीच यह जानकर दहशत फैल गई कि उसकी बहन की भी कुछ दिनों पहले मौत हो गई है। फिलहाल, इस बात का पता नहीं चला है कि शाहिदा की बहन की मृत्यु किस वजह से हुई है।

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश के जबलपुर के हनुमानताल थानांतर्गत चाँदनी चौक निवासी कोरोना पॉजिटिव शायरा बी उर्फ शाहिदा बी (62) के जनाजे में अनुमति से अधिक लोगों के शामिल होने पर पुलिस ने FIR दर्ज कर लिया है।

शाहिदा की मौत 20 अप्रैल को हुई थी। उसके जनाजे में भी अनुमति से अधिक भीड़ होने की वजह से गोहलपुर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज किया गया है।

शाहिदा के जनाजे में जुटाई गई 40 लोगों की भीड़

हनुमानताल पुलिस ने बताया कि शाहिदा की 19 अप्रैल को कोरोना वायरस की वजह से मौत हो गई थी। जिसके बाद अधिकारियों ने बीमारी पर अंकुश लगाने के लिए गाइडलाइंस के मुताबिक जनाजे में शामिल होने वाले लोगों की एक सीमा तय की थी, मगर इसके बावजूद शव यात्रा में रिश्तेदारों और परिवार के 40 लोगों की भीड़ जमा की गई और रात में 11 बजे शव को मोतीनाला से होते हुए मंडी मदार टेकरी कब्रिस्तान में दफनाया गया। इसकी वजह से इलाके में दहशत फैल गई है, क्योंकि इस मार्ग से पूरे शहर में कोरोना वायरस फैलने का खतरा है।

शाहिदा की बहन के जनाजे में शामिल हुए 50 लोग

शाहिदा की मौत के एक दिन बाद ही 20 अप्रैल को उसकी छोटी बहन फिरदौस बेगम (50) की मौत हो गई। वो तलैया की रहने वाली थी। शाहिदा के जनाजे की तरह ही फिरदौस के पति मोहम्मद फ़िरोज़ ने भी उसके जनाजे में रिश्तेदारों की लगभग 50 लोगों की भीड़ इकट्ठा की थी। जिससे पूरे शहर में फिर से दहशत फैल गई। दोनों थानों में, पुलिस ने अंतिम संस्कार जुलूस में शामिल लोगों के खिलाफ धारा आईपीसी की धारा 188, 269 और 270 के तहत मामला दर्ज किया है।

पुलिस ने भले ही दोनों के जनाजे में शामिल लोगों पर एफआईआर दर्ज कर लिया है, लेकिन प्रशासन की चूक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कोरोना संदिग्ध का पहले बिना जाँच रिपोर्ट आए शव परिजनों के सुपुर्द कर दिया और फिर बिना प्रोटोकॉल का पालन कराए अंतिम संस्कार होने दिया। जबकि इस तरह के मामले में तहसीलदार और आरआई की मौजूदगी में कोरोना प्रोटोकाल का पालन कराया जाना कलेक्टर की जवाबदेही थी।

गौरतलब है कि पिछले दिनों महाराष्ट्र के मालेगाँव में जनाजे के लिए 500-600 लोगों की भीड़ जुटी थी। ये सभी लोग कब्रिस्तान जा रहे थे। जबकि सरकार का आदेश है कि किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में 5 से ज्यादा लोग नहीं होने चाहिए, बावजूद इसके मालेगाँव में 500 से ज्यादा लोगों की भीड़ जुट गई। पुलिस ने रास्ते में ही उन सबको रोका और भीड़ को किसी तरह तितर-बितर किया। बावजूद इसके 25-30 लोग कब्रिस्तान पहुँच गए। इसी तरह तमिलनाडु में डॉक्टरों के मना करने के बावजूद कोरोना संक्रमित मरीज का जनाजा नहीं सुनी, कोरोना संक्रमित पिता का निकाला जनाजा निकाला।

‘मुख्तार अब्बास नकवी शिया मुस्लिम, समुदाय पर कलंक’ – तबलीगियों को जिम्मेदार ठहराने की ऐसी मिली सजा

भाजपा नेता और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को तबलीगी जमात को खुद को कोरोना वॉरियर्स बताने पर लताड़ा। उन्होंने उद्दंड जमातियों पर वास्तविक कोरोना वॉरियर्स को अपमानित करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हर हिंदुस्तानी मुस्लिम को तबलीगी साबित करने की ‘सुनियोजित घटिया तबलीगी साजिश’ रची गई है।

मुख्तार अब्बस नकवी ने इसको लेकर दो ट्वीट किए। एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, “भारत में कोरोना फैलाने वाले तबलीगी अपने आप को ‘कोरोना वारियर्स’ बता रहे हैं। कमाल है… तबलीगी अपने गुनाहों पर शर्म करने के बजाय लाखों कोरोना वॉरियर्स का अपमान कर रहे हैं। इसे कहते हैं ‘चोरी और सीनाजोरी’।”

इसके तुरंत बाद ही उन्होंने एक और ट्वीट करते हुए लिखा, “बेशक कुछ राष्ट्रभक्त मुस्लिमों ने जरूरतमंदों को प्लाज्मा दिया है पर उन्हें तबलीगी कहना ठीक नहीं। हर हिंदुस्तानी मुस्लिम को तबलीगी साबित करने की ‘सुनियोजित घटिया तबलीगी साजिश’ है।”

उनके इस बयान के बाद उन्हें समुदाय विशेष के एक वर्ग द्वारा सोशल मीडिया पर बुरी तरह से ट्रोल किया गया। कुछ लोगों ने उनके शिया होने की तरफ इशारा किया और दावा किया है कि शिया समुदाय ने पूरी दुनिया को भारी नुकसान पहुँचाया है।

दूसरे ने इस तरफ इशारा किया कि भाजपा ने अभी तक ‘घरवापसी’ क्यों नहीं की?

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर समुदाय विशेष के कई लोगों ने उनकी इस टिप्पणी के लिए गालियों की बौछार कर दी।

इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री नकवी को समुदाय का कलंक भी कहा गया, लानतें दी गईं, क्योंकि उन्होंने तबलीगी जमात की आलोचना की थी। उसी तबलीगी जमात की, जिसने कोरोना वायरस के फैलने में अहम भूमिका निभाई थी।

इसमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने उन पर चाटुकारिता करने का आरोप लगाया और साथ ही लगे हाथों उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा।

दरअसल कुछ जमातियों ने कोरोना से ठीक होने के बाद प्लाज्मा डोनेट करने का फैसला किया। जिसके बाद समुदाय विशेष के लोग उनके उन कुकर्मों को छिपाने में लगे थे, जिसकी वजह से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था खतरे में है। मुख्तार अब्बास नकवी ने इन्हीं लोगों को जवाब देते हुए ये ट्वीट किया था।

दरअसल दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में तबलीगी जमात के मजहबी कार्यक्रम हुए, जिसमें प्रशासन के दिशा-निर्देशों और लॉकडाउन का खुला उल्लंघन किया गया। इसके बाद हज़ारों लोग अलग-अलग राज्यों में जाकर छिप गए। उन्हें खोजने गए पुलिसकर्मियों और उनकी स्क्रीनिंग के लिए गई मेडिकल टीम पर हमले हुए। ऐसी एक-दो नहीं बल्कि दसियों घटनाएँ हुईं। इस तरह देश के कोने-कोने में छिपे जमातियों के संपर्क में आने से कोरोना केस में धड़ल्ले से वृद्धि देखने को मिली।

हावड़ा में लॉकडाउन का पालन करवाने गई पुलिस पर हमला, घेर कर मारने लगी भीड़: रैपिड एक्शन फोर्स ने बचाया

सरकार ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा को गैर जमानती अपराध बनाया है। साथ ही ऐसा करने वाले को सात साल की सजा हो सकती है। लेकिन इसके बाद भी पुलिसकर्मियों पर हमले रूक नहीं रहे हैं। देश के कई हिस्सों से चिकित्साकर्मियों और पुलिस बल पर हमले की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसा ही एक मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा से सामने आया है, जहाँ लॉकडाउन लागू करा रहे पुलिसकर्मियों पर लोगों ने हमला कर दिया।

बताया जा रहा है कि इस हमले में दो से तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए। दरअसल यह घटना बेलिलियस रोड इलाके में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) दोपहर बाद घटी। जब पुलिस सड़क पर घूम रहे लोगों को घर में जाने के लिए कह रही थी तभी लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया।

इसके अलावा हावड़ा के टिकियापारा इलाके में भारी भीड़ जमा हो गई थी। जब लॉकडाउन का उल्लंघन होता दिखा तो पुलिस वहाँ पहुँच गई। पुलिस ने इस दौरान भीड़ को वहाँ से हटाने की कोशिश की तो भीड़ में कुछ अराजक तत्वों ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया और बोतलें भी फेंकीं गईं।

बताया जा रहा है कि अराजक तत्वों ने पुलिस की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की है। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें भीड़ को पुलिस के ऊपर हमला करते हुए देखा जा सकता है। ये भीड़ इतनी बेकाबू और आक्रामक थी कि रैपिड एक्शन फोर्स की टीम को बुलानी पड़ी।

पुलिस पर पथराव की यह पहली घटना नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव किया। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए। मामले में पुलिस ने अब तक 15 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि पुलिस पर पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।

वहीं शुक्रवार को उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर लॉकडाउन का उल्लंघन कर सामूहिक रूप से नमाज अदा की गई। बहराइच, शाहजहाँपुर में नमाजियों ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया। फिरोजाबाद में घंटों मजहबी नारे लगाए। इसके बाद एम्बुलेंस को निशाना बनाते हुए तोड़फोड़ की गई। इसी तरह दिहवाकला स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने की सूचना मिली तो नमाजियों ने सिपाहियों पर हमला बोल दिया।

NITI आयोग के अधिकारी में कोरोना वायरस की पुष्टि के बाद 48 घंटे के लिए बंद की गई बिल्डिंग

देश में कोरोना के फैलते संक्रमण ने नीति आयोग (NITI Aayog) को भी अब अपनी चपेट में ले लिया है। मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को नीति आयोग में काम करने वाला एक अधिकारी कोरोना पॉजिटिव पाया गया। यह सूचना आज सुबह 9 बजे मिली। इसके बाद पूरी बिल्डिंग को 48 घंटों के लिए सील कर दिया गया है। इसकी जानकारी नीति आयोग ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से दी है।

ट्वीट में नीति आयोग की ओर से कहा गया, “नीति भवन में काम करने वाले एक कर्मचारी को कोविड-19 (COVID-19) पॉजिटिव पाया गया है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय की ओर से जारी सभी दिशानिर्देशों का नीति आयोग पालन कर रहा है। बिल्डिंग को सील कर दिया गया है।”

नीति आयोग में सलाहकार आलोक कुमार ने इस संबंध में कहा, “NITI भवन में एक निदेशक स्तर का अधिकारी कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। आज सुबह 9 बजे, उन्हें अपनी रिपोर्ट मिली और फिर उन्होंने अधिकारियों को सूचित किया।”

उन्होंने ये भी बताया कि इस सूचना मिलने के बाद बिल्डिंग को 48 घंटे के लिए बंद कर दिया गया है। वहाँ डिसइन्‍फेक्‍शन और सेनिटाइजेशन का काम किया जा रहा है और कोविड पॉ‍जिटिव पाए गए अधिकारी के संपर्क में आए सभी लोगों को सेल्‍फ क्‍वारंटाइन में रहने को कहा गया है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का एक कर्मचारी भी कोरोना संक्रमित पाया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक वो 16 अप्रैल को 2 रजिस्ट्रार के कॉन्टैक्ट में आया था। इसके बाद दोनों को सुरक्षा लिहाज से सेल्फ क्वारंटाइन करने की सलाह दी गई। इसके अलावा, संक्रमित पाए गए कर्मचारी का इलाज फिलहाल दिल्ली के सरकारी अस्पताल में चल रहा है। प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए कुछ अन्य लोगों को भी ढूँढा जा रहा है, जो उसके संपर्क में थे।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में इससे पहले नागर विमानन मंत्रालय के मुख्यालय को भी सील किया गया था। वहाँ भी एक कर्मचारी कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया था जो 15 अप्रैल को दफ्तर गया था।

बता दें कि देशव्यापी लॉकडाउन और सख्ती के बाद भी देशभर में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटे में 1543 नए मामले सामने आए हैं और 62 लोगों की मौत हो गई है, जो अब तक सर्वाधिक है।

तेज प्रताप ने अर्नब को कहा ‘वायरस’, लोगों ने पूछा- ‘तुम्हारे अब्बा किस प्रकार के वायरस थे, जो उन्हें वैक्सिंग की जरूरत पड़ी है’

महाराष्ट्र के पालघर में भीड़ द्वारा तीन साधुओं की पीट-पीट कर हत्या के संदर्भ में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के खिलाफ टिप्पणी करने को लेकर रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी से मुंबई पुलिस ने सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को लगभग 12:30 घंटों तक लगातार पूछताछ की। इसी कड़ी में सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं तेज प्रताप जिन्होंने अर्नब को ‘वायरस’ कह दिया।

पूछताछ की वजह से सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को दोनों चैनलों पर आने वाले अपने नियमित कार्यक्रमों में भी अर्नब उपस्थित नहीं हो सके। हालाँकि, पूछताछ के बाद वो फिर से चैनल पर दिखे और सोनिया गाँधी से सवाल पूछे। पूछताछ के बाद अर्नब गोस्वामी ने कहा कि वो अपने बयान पर अब भी कायम हैं।

इस बीच राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे ने अर्नब गोस्वामी को ‘वायरस’ कहा है। उन्होंने अर्नब गोस्वामी को निशाने पर लेते हुए ट्विटर पर लिखा, “उस ‘वायरस’ को उसी प्रकार के ‘वैक्सीन’ की जरूरत थी। मैं मुंबई पुलिस के साथ हूँ।”

हालाँकि, लोगों ने उन्हें असली तरह से समझा दिया कि वायरस कौन है और वैक्सीन कौन है। इंदौर से भाजपा विधायक रमेश मेंडोला ने लिखा, “गलत समझ रहे हो आप। वो वायरस नहीं, खुद वैक्सीन है।”

एक यूजर ने लिखा, “तुम्हारे अब्बा किस प्रकार के वायरस थे, जो उन्हें वैक्सिंग की जरूरत पड़ी है, चोर जेल में है।”

राजेन्द्र सिंह विशेन नाम के एक यूजर ने लिखा, “चोर की औलाद और किसके साथ हो सकती थी। पर कौन सी वाली पुलिस वही जिसने दो संन्यासियों का हाथ पकड़ हत्यारों को सौंप के सो गई।”

प्रभात कुशवाहा ने लिखा, फिर तो लालू नाम के वायरस के साथ जो हो रहा, उससे भी सहमत होगे?

एक ने लिखा, “देखो देखो कौन भौंक रहा है, जिसका खुद का बाप जेल में सड़ रहा है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “हे मंदबुद्धि, जिनके पिता खुद बेज़ुबानो को ठग चुके हो। उनके मुँह से ऐसे विचार अच्छे नही लगते। ये तो वही बात कर दी। 100 चूहे खा के बिल्ली हज को चली।”

काजल सिंह नाम की एक यूजर लिखती हैं, “मैं भी तिहाड़ जेल की पुलिस के साथ हूँ, जिन्होंने एक चारा चोर को बाँध कर रखा हुआ है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “मैं आपके विरोध में हूँ। आपके परिवार ने बिहार को लूटा है, बस यह याद रखिएगा। बाकी मिस यू पापा बोलने से काम नहीं चलेगा गुनाह की सजा मिली है उन्हें।”

एक ने लिखा, “लगता है चरसी को चरस का डोज #AntonioMaino ने भिजवा दिया है इस लॉकडाऊन में। मैं अर्नब के साथ हूँ।”

रितेश कुमार सिंह ने इस पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि जितनी पूछताछ अर्नब गोस्वामी से की, अगर इतनी पूछताछ पालघर में साधुओं की नृशंस हत्या करने वालों से कर लेते तो अब तक असली कातिल देश के सामने आ जाते।

सुनील कुमार ने लिखा, “कुछ वायरस तो ऐसे थे जो जानवरों का चारा खा गए, लेकिन खुशी है की उस वायरस का इलाज हो गया।”

बता दें कि अर्नब ने पूछताछ के बाद कहा कि उन्होंने पुलिस का पूरा सहयोग किया है और अगर उन्हें फिर से बुलाया जाता है तो भी वो जाएँगे। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें गिरफ़्तार होने का भी डर नहीं है। अर्नब गोस्वामी ने कहा कि मुद्दा वो नहीं हैं बल्कि असली मुद्दा पालघर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या का है। अर्नब गोस्वामी ने आरोप लगाया था कि मुंबई पुलिस उन पर हुए हमलों के मामले में कॉन्ग्रेस की साज़िश को कवर-अप करने में जुट गई है। 

लॉकडाउन में बांद्रा स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों को भड़काकर भीड़ जुटाने वाले विनय दुबे को जमानत, केंद्र सरकार को दी थी चेतावनी

देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान मुंबई में बांद्रा रेलवे स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ जुटाने के आरोपित विनय दुबे को आज (अप्रैल 28, 2020) स्थानीय कोर्ट से जमानत मिल गई। बांद्रा की एक अदालत ने मंगलवार को दुबे को 15 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दी। दुबे को 14 अप्रैल को बांद्रा रेलवे स्टेशन पर भीड़ जुटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उसे एरोली की नवी मुंबई पुलिस ने पकड़ा गया था।

बता दें, दुबे के ऊपर आईपीसी की धारा 117, 153A, 188, 269, 270, 505(2) और सेक्शन 3 के तहत मामला दर्ज किया गया था। इससे पहले उसने 15 अप्रैल को कोर्ट में पेश किया गया था।

गौरतलब है कि बीते 14 अप्रैल को बांद्रा और व मुंब्रा में हजारों प्रवासी सड़क पर आ गए थे। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को बल का प्रयोग कर व मजहबी नेताओं को अल्लाह का हवाला देकर भीड़ को तितर-बितर करना पड़ना। इस संबंध में नवी मुंबई पुलिस ने विनय दुबे को गिरफ्तार किया था।

विनय पर आरोप लगा था कि वह 18 अप्रैल को कुर्ला में प्रवासी मजदूरों के बड़े आंदोलन की धमकियाँ पुलिस को दे रहा था। इसके अलावा उसका एक वीडियो भी सामने आया थे। जिसमें वह न केवल राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के ख़िलाफ़ ह़़जारों प्रवासियों को भड़काता दिखा था, बल्कि सरकार को चेतावनी भी दे रहा था।

बता दें, फेसबुक पर पोस्ट वीडियो में दुबे उत्तर प्रदेश तक प्रवासियों की पदयात्रा का नेतृत्व करने की बात कर रहा था। साथ ही लोगों से अपील कर रहा था कि अगर, लोग उसका साथ देना चाहते हैं, तो वे उससे व्हॉट्सअप पर संपर्क करें।

इसके अलावा विनय अपनी वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की और केंद्र सरकार की आलोचना करता दिखा था। उसने लॉकडाउन के संबंध में केंद्र सरकार को अल्टीमेटम दिया कि या तो वे 14 और 15 अप्रैल तक सभी परेशानियों का निवारण करें वरना वो 20 अप्रैल से पदयात्रा शुरू कर देगा। 

गौरतलब है कि खुद को सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी बताने वाले विनय दुबे भाजपा के खिलाफ लगातार जहर उगलता रहा है। कई तस्वीरों में एनसीपी और मनसे के नेताओं से उसकी करीबी दिखाई पड़ती है। उसके फेसबुक अकाउंट से अपलोड फोटोज में से एक में वह मनसे प्रमुख राज ठाकरे के साथ दिखाई देता है।

इमरजेंसी में स्नेहलता, आज अर्नब: विरोधियों के दमन का कॉन्ग्रेसी तरीका

महाराष्ट्र में हुई साधुओं की हत्या के बाद रिपब्लिक भारत के संस्थापक अर्नब गोस्वामी से हो रही पूछताछ ने एक बार फिर कॉन्ग्रेस काल की झलक दिखाई है। महज एक कांड से ही कॉन्ग्रेस ने स्पष्ट कर दिया कि वह आज भी विरोधी स्वर को कुचलने के अपने तरीकों में कितनी स्पष्ट है। यह झलक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र में 2014 के व्यापक सत्ता परिवर्तन के बाद देशभर में मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फ़ासिज़्म जैसे शब्द बच्चे-बच्चे के मुँह से सुने जाने लगे।

मानो इन विशेषणों का उद्भव ही केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद हुआ हो। लेकिन ये लोग कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी (Snehalata Reddy) की कहानी पर बात नहीं करते, जिनका जीवन इस आपातकाल ने सिर्फ एक आरोप के चलते खत्म कर दिया कि वह ‘एक राजनीतिक शरणार्थी’ से दोस्ती रखतीं थीं। एक लोकतान्त्रिक देश में आपातकाल की दलील पर एक अभिनेत्री को ऐसे कठिन दौर से गुज़रना पड़ा, जब उन्हें अनेक यातनाएँ झेलनी पड़ीं और अंत में उनकी तड़पकर मौत हो गई।

‘लौह महिला’ इंदिरा गाँधी के आपातकाल की वह नारकीय यातनाएँ

स्नेहलता रेड्डी की कहानी भारतीय लोकतंत्र के उन स्याह 19 महीनों के दौरान की है जिस त्रासदी को संविधान आपातकाल का नाम देता है। कहा जाता है कि यह निर्णय कॉन्ग्रेस की लौह महिला इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में ‘फासीवादी शक्तियों’ से लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए लिया गया था। उस समय के बड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस को पकड़ने के लिए पुलिस द्वारा उनकी मित्र और कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी पर किए गए बेहिसाब शोषण का यह किस्सा शायद ही लोगों तक आज भी पहुँच सका हो।

आपातकाल के नाम पर लाखों बेकसूर लोगों पर मनचाहे कानून के तहत कार्रवाई कर के उन्हें जेल की नारकीय यातनाओं में भेज दिया गया। इनमें से कुछ वो लोग भाग्यशाली ही कहे जा सकते हैं जो या तो जीवित रह सके या फिर मौत के बाद ही सही लेकिन कहानियों का हिस्सा बन सके। जेल में अटल बिहारी वाजपयी की बगल की ही जेल में रखीं गईं स्नेहलता रेड्डी की चीख ने उन्हें शायद मृत्यु तक पीछा किया होगा लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता में रहते जितने वाम-उदारवादियों और ‘विचारकों’ की जमात तैयार की, उसे यह चीखें और निर्मम कहानियाँ नहीं सुनाईं दीं।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी के सैनिक, लाखों निर्दोषों को बिना कारण बताए जेल में ठूँस रहे थे। इनमें से अधिकतर की गिरफ्तारी मीसा (मैंनेटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट/ MISA/Maintenance of Internal Security Act) के तहत हुई थी। कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता पर आरोप लगाया गया कि वो डाइनामाइट से दिल्ली में संसद भवन और अन्य मुख्य इमारतों को धमाका कर उड़ाना चाहती थीं। स्नेहलता पर IPC की धारा 120, 120A के तहत आरोप लगाए गए। हालाँकि आखिर में इनमें से कोई भी आरोप साबित नहीं हुआ और राज्य ने उन्हें वापस ले लिया। लेकिन ‘मीसा’ के तहत स्नेहलता की कैद जारी रही।

कहा जाता है कि जब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी अपने ओजस्वी भाषणों और उससे भी धारदार नारों के चलते बेंगलुरु जेल में बंद कर दिए गए थे, तभी उनके साथ भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी को भी रखा गया था। उस समय भारतीय जनसंघ के युवा और उर्जावान चेहरों में यही दो नाम सबसे पहले आते थे।

स्नेहलता को धोखे से जेल में डाल दिया गया। बैंगलोर केंद्रीय कारावास पहुँचते ही उन्हें ढेरों अपमानजनक अनुभवों का सामना करना पड़ा। वहाँ उन्हें एक हवादार कोठरी में बंद कर दिया गया, जिसका आकार एक व्यक्ति के हिसाब से पर्याप्त था। इस कोठरी में पेशाबघर की जगह पर कोने में एक छेद बना हुआ था, और दूसरे छोर पर लोहे का एक जालीदार दरवाजा लगा हुआ था।

आपातकाल के नाम पर यातनाएँ

स्नेहलता ने फर्श पर सोकर रातें गुजारीं। जेल में उनकी रातें इस भय में ज्यादा गुजरने लगीं कि उनके पीछे उनके परिवार से क्या सलूक किया जा रहा होगा, क्योंकि वह उनसे जेल में मिलने भी नहीं आए थे। किसी तरह आखिरकार उनके घरवाले यह पता लगाने में कामयाब रहे कि स्नेहलता को किस जेल में बंद किया गया है। ऐसे समय में, जब नागरिकों के सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था, उन्हें आठ महीने तक बिना मुकदमा चलाए हुए असीम यातनाओं के बीच बेंगलुरु सेंट्रल जेल में रखा गया।

उसी समय जेल में दोनों नेताओं को किसी महिला की चीखें सुनाई देती और बाद में उन्हें पता चला कि वह कोई अपराधी या नेता नहीं बल्कि कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी थीं। स्नेहलता पर डायनामाईट केस में शामिल होने का आरोप लगाया गया और उन्हें मई 02, 1976 को गिरफ़्तार किया गया था।

बेंगलुरु की ही जेल में क़ैद उनके साथ बेहद अमानवीय दुर्व्यवहार किए गए। मधु दंडवते जो कि उस समय उसी बैंगलोर के जेल में थे, उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा था कि उन्हें रात के सन्नाटे में स्नेहलता की चीखती हुई आवाजें सुनाई देतीं थीं।

जेल में लिखी हुई एक छोटी सी डायरी में स्नेहलता ने लिखा-

“जैसे ही एक महिला अंदर आती है, उसे बाकी सभी के सामने नग्न कर लिया जाता है। जब किसी व्यक्ति को सजा सुनाई जाती है, तो उसे पर्याप्त सजा दी जाती है। क्या मानव शरीर को भी अपमानित किया जाना चाहिए? इन विकृत तरीकों के लिए कौन जिम्मेदार है? इन्सान के जीवन का क्या मकसद है? क्या हमारा मकसद जीवन मूल्यों को और बेहतर बनाना नहीं है? इन्सान का उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, उसे मानवता को आगे बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।”

खुद जेल की यातनाओं का हिस्सा होने के बावजूद स्नेहलता ने अन्य कैदियों के अधिकारों के लिए जंग जारी रखी। उन्होंने साथ के कैदियों का मनोबल बढ़ाया। आखिरकार उनकी मेहनत कुछ हद तक रंग लाई और कम से कम कैदियों को पहले से बेहतर खाना दिया जाने लगा। उन्होंने लिखा-

“महिलाओं को पहले बुरी तरह से पीटा जाता था, लेकिन अब इसमें कुछ कमी आई। कम से कम मैंने उनके अंदर के भय को तो दूर कर ही दिया है। मैंने तब तक भूख हड़ताल की, जब तक कैदियों को मिलने वाले खाने की गुणवता में सुधार नहीं हुआ।”

स्नेहलता अस्थमा की मरीज थीं, बावजूद इसके उन्हें घोर यातनाएँ दीं जाती और जेल में उन्हें निरंतर उपचार भी नहीं दिया गया। यह बातें स्वयं स्नेहलता ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समक्ष रखीं थीं। जेल में मिलने वाली क्रूर यातनाओं ने और उस वास्तविकता ने स्नेहलता को बेहद कमजोर कर दिया और उनकी हालत गंभीर हो गई। जनवरी 15, 1977 को उन्हें पैरोल पर रिहा कर दिया गया। और रिहाई के 5 दिन बाद ही 20 जनवरी को हार्ट अटैक के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

सवाल यह भी रह गया कि ऐसी ही न जाने और कितनी स्नेहलताएँ इंदिरा गाँधी और कॉंग्रेस की सत्ता में बने रहने की चाह की बलि चढ़ीं। स्नहेलता की मृत्यु के बाद मानवाधिकार आयोग ने उनकी डायरी के कुछ पन्ने जारी किए, जिनमें उन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचार और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का वर्णन किया था।

स्नेहलता द्वारा जेल में लिखी गई डायरी के पन्ने

जून, 2015 में ‘द हिंदू’ के एक लेख में स्नेहलता की बेटी नंदना रेड्डी ने बताया कि उनकी माँ औपनिवेशिक ब्रिटिश राज की प्रबल विरोधी थीं। जब वह कॉलेज गईं तो उन्होंने अपने भारतीय नाम को वापस अपना लिया था और वह केवल भारतीय कपड़े और एक बड़ा ‘बॉटू’ पहनती थी। नंदना ने लिखा कि उनकी माँ ने प्रसिद्ध श्री किट्टप्पा पिल्लई से भरतनाट्यम सीखा और एक बहुत ही कुशल नर्तकी बन गईं।

कॉन्ग्रेस को कम कर आँकने की भूल कर रहा है देश

कॉन्ग्रेस ने सत्ता और शासन के लिए हमेशा हर तरीके को अपनाया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ पूरा देश आज कॉन्ग्रेस को एक सिमट चुकी कहानी समझते आ रहा है, वह महाराष्ट्र जैसे राज्य में एक पत्रकार को 12 घंटों तक पुलिस की पूछताछ के लिए बिठा सकती है। विरोधियों के स्वर को कुचलने और असत्य को स्थापित करने में यह पार्टी आज भी उतनी ही नीतिकुशल, शक्तिशाली और बलवान है, जितनी की आपातकाल के समय थी।

यह शासन के साम-दाम-दंड भेद को जानती है इसके एक इशारे पर किसान से लेकर साहित्यकार सड़कों पर उतर आते हैं और ख़ास बात देखिए कि सत्ता की भूख ले लिए स्नेहलता जैसी कहानियों की जिम्मेदार इस कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने तंत्र के जरिए कभी किसी को सोचने का अवसर नहीं दिया कि वास्तव में फ़ासिस्ट कौन रहे हैं?