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16 भिक्षुओं और एक साध्वी को गाड़ी से निकाला, मारा, आग में फेंक दिया: वामपंथियों के कोलकाता में हुई थी बिजोन सेतु नरसंहार

पालघर में दो साधुओं की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जिस निर्मम तरीके से साधुओं को पीटा गया और पुलिस ने उनकी मदद करने से इनकार कर दिया, उससे पूरा देश अचंभित है। जिस क्रूरता के साथ इस भयानक घटना को अंजाम दिया गया, ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि जब देश को इस तरह की दुखद घटना देखने को मजबूर किया गया हो। आज से 38 साल पहले पालघर से भी अधिक एक क्रूर घटना घटी थी। उस घटना को वर्षों से बिजोन सेतु नरसंहार (Bijon Setu Massacre) के रूप में जाना जाता रहा है।

30 अप्रैल 1982 को कोलकाता में बॉलीगंज (Ballygunge) के निकट दिनदहाड़े हिंदू संगठन आनंद मार्ग के 16 भिक्षुओं और एक साध्वी की निर्मम तरीके से हत्या कर उन्हें आग में फेंक दिया गया था। उन्हें उनकी टैक्सियों से उस समय बाहर खींच लिया गया था, जब वे कोलकाता के तिलजला स्थित अपने मुख्यालय में आयोजित एक शैक्षिक सम्मलेन में भाग लेने जा रहे थे।

हत्याओं को तीन अलग-अलग स्थानों पर अंजाम दिया गया था। इतना ही नहीं, इन घटनाओं को अपनी आँखों से एक दो नहीं बल्कि हजारों लोगों ने देखा था, इसके बावजूद भी आज तक एक की भी गिरफ्तारी नहीं हो सकी। जबकि 2012 में ही पश्चिम बंगाल सरकार ने इन हत्याओं की जाँच के लिए एकल सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था।

इन हत्याओं के तत्काल बाद के वर्षों में माकपा सरकार ने इस मामले से संबंधित तथ्यों को छिपाना जारी रखा। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1996 के अंत में इस मामले की जाँच बिठाई थी, लेकिन ज्योति बसु और उनकी सरकार के सहयोग न मिलने के कारण यह जाँच आगे नहीं बढ़ सकी। इतना ही नहीं, मई 1999 तक दो रिमांडर भेजे गए, लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया।

इस बीच पश्चिम बंगाल के एक आईएएस अधिकारी शेर सिंह ने इस मामले से संबंधित दस्तावेजों के साथ तथ्यों को सामने लाने की पेशकश की थी। दरअसल भिक्षुओं के नरसंहार के समय शेर सिंह 24 परगना के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट थे। सिंह ने केंद्रीय प्रशासन न्यायाधिकरण (CAT) में लगाई अपनी याचिका (1994 की संख्या-1108) में आरोप लगाया था कि उन्हें इस बात के लिए निलंबित कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने मामले पर कम्युनिस्ट सरकार की बातों को मानने से इनकार कर दिया था।

शेर सिंह ने कैट को सूचित किया था कि वह आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम से बंधे हुए हैं, इसलिए यदि किसी सक्षम अधिकारी द्वारा कहा जाता है तो वे केवल रहस्यों का खुलासा कर सकते हैं, लेकिन उनकी याचिका ने पर्याप्त संकेत दिए थे कि कम्युनिस्टों के साथ भूमि विवाद को लेकर आनंद मार्गियों की हत्या की गई थी। माकपा को डर था कि आनंद मार्गी कस्बा बेल्ट में अपना वर्चस्व बना सकते हैं, जो कि उस समय कम्युनिस्टों का एक गढ़ था।

आनंद मार्ग के जनसंपर्क सचिव आचार्य त्रंबकेश्वरानंद अवधूत ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि “बसु सरकार की एक मात्र सफलता राज्य के सबसे बड़े नरसंहार मामले में अपने शामिल होने को छिपाने की रही है।” उनके अनुसार कम्युनिस्ट आनंद मार्ग के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना चाहते थे, लेकिन उनके गुंडों ने गलतफहमी में संगठन से जुड़े साधारण भिक्षुओं की हत्या कर दी।

कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि भिक्षुओं की हत्या इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि लोगों को उन पर बच्चों के अपहरण का संदेह था, लेकिन वे इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि यह स्पष्ट नहीं था कि उन्हें इस तरह का संदेह क्यों था। पुलिस ने कहा था कि भीड़ ने लकड़ियों के जलते हुए ढेर में उन्हें फेंक दिया था।

आनंद मार्ग प्रचारक सभा ने 1999 में इस मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जाँच की माँग की थी। तब केंद्र सरकार की ओर से ओडिशा में ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या की जाँच के लिए एक जाँच बिठाई गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखे 66 पन्नों के एक पत्र में सरकार से आग्रह किया गया था कि वे कलकत्ता में दिनदहाड़े 17 आनंद मार्गियों की हत्याओं की जाँच के लिए एक समान पैनल गठित करे। पत्र में कहा गया था, “कलकत्ता शहर या हमारे देश के किसी भी हिस्से में इस तरह के अमानवीय, क्रूर और व्यवस्थित हत्याकांड को अंजाम नहीं दिया गया, जिसमें डेढ़ घंटे तक पुलिस द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया, जबकि पुलिस स्टेशन घटना स्थल से कुछ ही दूरी पर था।”

पत्र में जोर देकर कहा गया था कि अगर इस मामले की सही समय पर सही तरीके से जाँच की गई होती तो, अल्पसंख्यक समुदाय (आनंद मार्ग के मानने वाले) पर पिछले 17 वर्षों में लगातार इस तरह हमले नहीं हुए होते।” आनंद मार्ग यह दावा करता है कि वह हिंदू धर्म से जुड़ा नहीं है। इसने एक बार तो खुद को एक अलग धर्म के रूप में नामित करने की माँग की थी, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि आनंद मार्ग अलग धर्म नहीं है, यह हिंदू धर्म का केवल एक ‘धार्मिक संप्रदाय’ है।” हालाँकि आनंद मार्गी लगातार दावा करते रहे हैं कि ‘तंत्र’ कभी हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं माने गए।”

इसके बाद 2012 में ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में निर्वाचित किया गया था, तब राज्य सरकार ने लिंचिंग की घटनाओं की जाँच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था। कानून मंत्री मलय घटक ने तब कहा था कि मुख्यमंत्री ने जाँच आयोग के गठन पर सहमति दे दी है।

न्यायमूर्ति अमिताव लाला के न्यायिक आयोग की जाँच में पाया गया कि 6 फरवरी 1982 को कस्बा-जादवपुर क्षेत्र के CPI(M)के महत्वपूर्ण नेताओं ने आनंद मार्गियों से चर्चा करने के लिए पिकनिक गार्डन के कॉलोनी बाजार में मुलाकात की थी। कथित तौर पर बैठक में पिछले वाम मोर्चा मंत्रिमंडल में मंत्री रहे कांति गांगुली, CPM के पूर्व विधायक सचिन सेन, जिनकी अब मौत हो चुकी है, स्थानीय CPM नेता निर्मल हलदर, वार्ड नंबर 108 (तिलजला-कस्बा) के पूर्व पार्षद अमल मजूमदार और सोमनाथ चटर्जी, जो उस समय जादवपुर से सांसद और बाद में लोकसभा अध्यक्ष बनाए गए, शामिल थे।

आनंद मार्गियों को कम्युनिस्टों के गुस्से का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे वैचारिक रूप से उनके विरोध में थे। आनंद मार्गियों पर पहला हमला 1967 में उनके पुरुलिया स्थित ग्लोबल मुख्यालय में हुआ था, जिसमें CPI(M) के कैडरों द्वारा कथित तौर पर पाँच सेवकों की हत्या कर दी गई थी। इसके दो साल बाद आनंद मार्गियों की कूचबिहार मण्डली पर हमला किया गया था।

बिजोन सेतु हत्याकांड के बाद भी अप्रैल 1990 में CPI(M) के कैडरों द्वारा कथित तौर पर आनंद मार्ग के पाँच सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। 1982 की जघन्य हत्याओं के बारे में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने बड़ी ही बेशर्मी से कहा था, “क्या किया जा सकता है? ऐसी बातें होती रहती हैं।” बंगाल में माकपा के दशकों के शासनकाल के दौरान इन घटनाओं पर कोई न्याय नहीं हुआ, न ही अब तक हुआ है।

ऐसे और भी लोग हैं, जिन्हें कम्युनिस्टों के नरसंहार वाले रास्ते पर चलने से इनकार करने की बदौलत मुश्किलें झेलनी पड़ीं। अप्रैल 2017 में न्यायमूर्ति अमिताव लाला आयोग ने तिलहला थाने के ओसी गंगाधर भट्टाचार्य की पत्नी ममता भट्टाचार्य के घर का दौरा किया था। आपको बता दें कि गंगाधर भट्टाचार्य को 31 अक्टूबर 1983 को बेहाला में बयान रिकॉर्ड करने को लेकर गोली मार दी गई थी।

ममता के मुताबिक, उनके पति एक ईमानदार अधिकारी थे। उन्हें आनंद मार्ग के भिक्षुओं के नरसंहार का समर्थन न करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। ममता भट्टाचार्य के अनुसार उन्होंने ज्योति बसु से मदद माँगते हुए अपने पति को आवंटित किडरपोर में पुलिस क्वार्टर पर ही अपना निवास जारी रखने की माँग की थी, लेकिन इसके लिए इनकार कर दिया गया।

तब से आज तक हर साल 30 अप्रैल को आनंद मार्गियों के नरसंहार की सालगिरह पर आनंद मार्गी जुलूस निकालते हैं और उन भिक्षुओं को श्रद्धांजलि देते हैं, जिन्हें दिनदहाड़े मारने के बाद आग में फेंक दिया गया था। उन्हें घटना के चार दशक बीत जाने के बाद भी आज तक न्याय नहीं मिल सका है। कभी माओ ने कहा था, “राजनीतिक शक्ति बंदूक की नोंक से बढ़ती है।” वर्षों से ये लोग दूसरों के सिर पर बंदूक रखकर राजनीतिक सत्ता हासिल करने में कामयाब रहे हैं। हालाँकि उन्हें राजनीतिक रूप से अलग कर दिया गया है, फिर भी उन्हें न्याय की बारीकियों का अनुभव करना बाकी है।

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने कोरोना वायरस टेस्ट किट को लेकर फैलाई गलत जानकारी, ICMR ने बताया फेक न्यूज

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने रविवार (अप्रैल 26, 2020) को ट्विटर पर दावा किया कि 17 कंपनियाँ 500 रुपए में कोरोना टेस्ट किट बनाकर देने के लिए तैयार थी, लेकिन पीएम मोदी ने इसका ठेका गुजरात की एक कंपनी को दिला दिया, जो इस कोरोना टेस्ट किट को 4500 रुपए में बेच रहा है।

हालाँकि, उदित राज का ये झूठा दावा ज्यादा देर तक नहीं टिक सका। सोमवार (अप्रैल 27, 2020) इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने इस खबर को फेक न्यूज करार देते हुए बताया कि ICMR द्वारा PT-PCR के लिए स्वीकृत कीमत 740 से 1150 रुपए है जबकि रैपिड टेस्ट किट के लिए यह 528 से 795 रुपए है।

ICMR ने स्पष्ट किया कि 4,500 रुपए में कोई कोरोना टेस्ट किट नहीं खरीदी गई है और यदि कोई भारतीय कंपनी कम दर पर किट की आपूर्ति करना चाहती है तो उसका स्वागत है।

इससे पहले महीने की शुरुआत में, ICMR ने मीडिया के उन दावों का खंडन किया था, जिसमें कहा गया था कि मोदी सरकार ने चीनी कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए 3 मई तक देशव्यापी लॉकडाउन करने से पहले विशेषज्ञों से परामर्श नहीं किया था। बता दें कि कारवाँ ने अपने लेख में दावा किया था कि आईसीएमआर के टास्क फोर्स में 21 वैज्ञानिक हैं जो मोदी सरकार को कोरोना से निपटने के उपायों पर सलाह देने वाले थे, लेकिन उन्हें नज़रंदाज़ किया जा रहा है। एक अनाम सदस्य के हवाले से ये सूचना दी गई कि पिछले एक सप्ताह में टास्क फोर्स की एक भी बैठक नहीं हुई। साथ ही ये दावा भी किया गया कि पीएम मोदी ने लॉकडाउन बढ़ाने से पहले भी उनकी कोई सलाह नहीं ली।

नीति आयोग के सदस्य और इस टास्क फोर्स के अध्यक्ष विनोद पॉल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा था, “भारत के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ COVID-19 की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएँ दे रहे हैं। यह टास्क फोर्स इस लड़ाई में तमाम विशेषज्ञों को जोड़ने और इस विषय में निर्णायक कार्य करने में अग्रणी है। साथ ही, मैं स्वयं प्रधानमंत्री जी को लगातार सूचित करता रहता हूँ और उनके सुझाव भी पाता रहता हूँ। ऐसे समय में, इस तरह की सनसनी फैलाना दुर्भाग्यपूर्ण है। मीडिया की ऐसी हरकतों से, महामारी के इस दौर में, एक राष्ट्रीय स्तर की लड़ाई में हानि ही होती है।”

इसके साथ ही कारवाँ ने लेख में दावा किया था कि ये कमिटी सिर्फ़ दिखावे के लिए बनाई गई है। एक दूसरे अनाम सदस्य के हवाले से ये भी दावा किया गया कि बैठकों के डिटेल्स सीधे कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए, लेकिन टास्क फोर्स के साथ साझा नहीं किए गए। कॉन्ग्रेस नेता इससे पहले भी कोरोना पर झूठ फैला चुके हैं

जम्मू-कश्मीर: कुलगाम में 4 आतंकी ढेर सर्च ऑपरेशन जारी, 2020 में अबतक मारे गए 50 आतंकी

जम्‍मू कश्‍मीर के कुलगाम में लोवरमुंडा इलाके में इस समय सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ जारी है। कुलगाम, नॉर्थ कश्‍मीर में आता है और फिलहाल यहाँ पर इलाके को घेर लिया गया है। कश्‍मीर जोन की पुलिस की तरफ से कहा गया है कि वह स्थिति पर नजर रखे हुए है। भारतीय सेना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, पुलिस और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ के करीब 30 मिनट बाद सेना की तरफ से पुष्टि की गई कि जम्मू कश्मीर के कुलगाम एनकाउंटर में 4 आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया है। लोवरमुंडा में सर्च ऑपरेशन अभी जारी है। एक आतंकी का शव बरामद कर लिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रविवार को यह मुठभेड़ उस समय शुरू हुई जब आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों के गस्ती दल पर फायरिंग की। इससे पहले शनिवार को भी जम्‍मू कश्‍मीर में हुए एनकाउंटर में तीन आतंकी ढेर हो गए थे। यह एनकाउंटर साउथ कश्‍मीर के पुलवामा जिले के अवंतिपोरा में हुआ था।

कोरोना वायरस के चलते शवों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह

रिपोर्ट्स के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल राजू घुसपैठ रोधी ग्रिड (सीआईजी) को और चाक चौबंद करने के लिए सैन्य अधिकारियों के साथ नियमित तौर पर बैठक कर रहे हैं ताकि आतंकवादियों को नियंत्रण रेखा पार करने का कोई मौका नहीं मिले। अधिकारियों ने बताया कि आतंकियों के साथ नियंत्रण रेखा पर ​संघर्ष और मुठभेड़ की स्थिति में, सैनिकों से शवों को लेकर अत्यंत सावधानी बरतने को कहा गया है क्योंकि वे कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं।

2020 में अब तक 50 आतंकी हुए ढेर

जम्मू कश्मीर में इस वर्ष अब तक आतंकवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों के अभियानों में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के कई शीर्ष कमांडरों समेत 50 आतंकवादी मारे गए हैं। अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि केन्द्र शासित प्रदेश में आतंकवादियों के खिलाफ अभियानों में सुरक्षा बलों के 17 जवान शहीद हुए हैं। मारे गए 50 आतंकवादियों में से 18 आतंकवादी कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन के दौरान मारे गए हैं।

अधिकारी ने बताया कि लश्कर के जिला कमांडर मुजफ्फर अहमद भट समेत चार आतंकवादी को 15 मार्च को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के डायलगाम इलाके में सुरक्षा बलों के साथ हुए मुठभेड़ में मारा गया था। इससे पहले 25 जनवरी को दक्षिण कश्मीर के जिला पुलवामा के त्राल इलाके में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच हुई मुठभेड़ में जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर कारी यासिर सहित तीन आतंकवादी मारे गए। इसमें हमारे तीन सैनिक भी घायल हो गए थे।

9 अप्रैल को उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के सोपोर में सुरक्षाबलों ने जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर सजाद नवाब डार को मार गिराया था। उन्होंने बताया 15 जनवरी को हिजबुल मुजाहिदीन के एक शीर्ष कमांडर हारून वानी को जम्मू-कश्मीर के डोडा के गुंडाना इलाके में सुरक्षा बलों के साथ हुए भीषण मुठभेड़ में मार गिराया गया था।

आगे की जानकारी देते हुए, कहा कि 14 मार्च से केंद्र शासित प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान 18 आतंकवादी मारे गए थे। इस वर्ष नौ नागरिकों को भी आतंकवादियों द्वारा मार दिया गया है। इसी अवधि के दौरान 17 सुरक्षा बल के जवान भी मारे गए, जिसमें 13 सुरक्षाकर्मी, 3 विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) और एक पुलिसकर्मी शामिल है।

पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह के अनुसार जम्मू-कश्मीर में 2019 में 160 आतंकवादी मारे गए और 102 गिरफ्तार किए गए थे।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगे की मुख्य साजिशकर्ता सफूरा जरगर है प्रेग्नेंट, जेल में डालने पर लिबरल गिरोह कूट रहा छाती

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में कट्टरपंथी समूह PFI का नाम सामने आने के बाद पुलिस ने जामिया के 2 छात्रों को इस संबंध में गिरफ्तार किया। एक नाम मीरान हैदर और दूसरा प्रेग्नेंट सफूरा जरगर (Safoora Zargar)। दोनों पर उत्तरपूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की साजिश रचने का आरोप है। जिसके कारण इनके खिलाफ़ गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालाँकि, हैदर की गिरफ्तारी को लेकर अप्रैल माह के शुरूआत में खूब सवाल उठाए गए थे। लेकिन संगीन आरोपों के कारण ये आवाज हल्की पड़ गई। इसके बाद सफूरा की गिरफ्तारी पर कट्टरपंथियों ने आवाज बुलंद की और दिल्ली पुलिस का क्रूर चेहरा दर्शाने के लिए उसकी प्रेग्नेंसी को लेकर बवाल खड़ा कर दिया।

सफूरा के लिए अलजजीरा की मार्मिक रिपोर्टिंग

हिंदुओं पर अक्सर आक्रामक रिपोर्टिंग करने वाला अलजजीरा जैसे मीडिया संस्थान ने इस एंगल को लेकर बेहद मार्मिक रिपोर्ट पेश की। अपनी रिपोर्ट में अलजजीरा ने लिखा कि 27 वर्षीय गर्भवती (प्रेग्नेंट) महिला सफूरा जरगर को 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और उसपर साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया। 

इसके अलावा उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कुछ अन्य बातों का भी उल्लेख किया जैसे जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी के बयान को, जिसमें उन्होंने सीएए को मुस्लिम विरोधी बिल बताया और जरगर के परिजनों के बयान को भी शामिल किया जिसमें उन्होंने कहा कि रमजान का पहला दिन सफूरा के बिन बहुत दुख में बीता।

इतना ही नहीं, रिपोर्ट में तिहाड़ के हालातों का भी उल्लेख किया गया कि और बताया गया है कि तिहाड़ जेल का परिसर भारत की सबसे भीड़भाड़ वाली जेलों में से एक है जिसमें लगभग दोगुने कैदी बंद हो सकते हैं।  

सोशल मीडिया पर सफूरा के समर्थन में कट्टरपंथी व सेकुलरों की माँग

अब अलजजीरा की इस रिपोर्ट के बाद अगले चरण में मीडिया गिरोह के लोगों ने अपना काम करना शुरू किया। ये रिपोर्ट तेजी से शेयर की जाने लगी और सबा नकवी जैसे लोग ये सवाल करने लगे कि लोकतंत्र सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का अधिकार देता है। तो एक प्रेग्नेंट महिला को एंटी टेरर चार्ज के नाम पर लॉकडाउन और महामारी के बीच क्यों गिरफ्तार किया गया? उसका बच्चा क्या जेल में पैदा होगा?

इसके बाद, विजेता सिंह ने भी इसपर अपना दुख जाहिर किया। विजेता ने रिपोर्ट को शेयर करते हुए कहा, “तीन महीने की गर्भवती (प्रेग्नेंट) सफूरा जरगर तिहाड़ जेल में एकांत कारावास में है, उसका अपराध केवल सीएए का विरोध करना है।”

कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय संयोजक हसीबा आमीन ने लिखा, “27 वर्षीय जामिया की स्कॉलर ने, जो कि 3 माह की गर्भवती है, उसने अपने रमजान का पहला दिन तिहाड़ जेल में बिताया। क्यो? क्योंकि उसने सरकार द्वारा किए जा रहे गलत कामों के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत दिखाई।”

इसके बाद सीएनएन की पत्रकार जेबा वारसी ने लिखा कि ये जामिया की मीडिया कॉर्डिनेटर है और ये जामिया के बाहर हुए शार्तिपूर्ण प्रोटेस्ट में शामिल थी। ये गर्भवती हैं। अलजजीरा की रिपोर्ट कहती है कि इसे तिहाड़ में एकांत में रखा गया है।

इसी तरह अलजजीरा की इस खबर को दलित विरोधी इरेना अकबर समेत कई लोगों ने सोशल मीडिया पर शेयर किया और एक माहौल बनाने की कोशिश की, कि क्योंकि जामिया की छात्र नेता सफूरा जरगर 3 महीने की गर्भवती हैं। इसलिए उस समय में जब उन्हें उचित देखभाल और चिकित्सकीय देख-रेख की आवश्यकता है। तब उन्हें गिरफ्तार किया गया है और तिहाड़ में अकेले रखा गया है। कुछ लोगों ने तो सोशल मीडिया पर इस खबर के आधार पर मानवता के मरने का दावा भी किया है। कुछ ने कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की है।

अब हालाँकि, किसी भी महिला से संबंधित ऐसी खबर सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाना आम बात है। लेकिन दिल्ली पुलिस पर सवाल उठाने से पहले, केंद्र सरकार को कोसने से पहले ये भी जानने की आवश्यकता है कि आरोपित महिला पर कैसे इल्जाम लगे हैं और मात्र प्रेगनेंसी का हवाला देकर उसपर लगे आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता और न ही इस बात से मुँह फेरा जा सकता है कि मीडिया गिरोह कैसे इस पूरे मामले को अलग कोण दे रहा है।

विचार करिए! आज जब आरोपित महिला के ऊपर लगे आरोप इतने संगीन है उस समय उसके लिए रिपोर्ट में ‘छात्र’ और ‘स्कॉलर’ शब्द का प्रयोग हो रहा है। व उसके प्रोफेसर उसे उसके अपराधों से निजात दिलाने के लिए उसके अकादमिक रिकॉर्ड का हवाला दे रहे हैं। उस समय सोचने वाली बात है कि सफूरा के लिए जो उसकी प्रेगनेंसी के नाम पर ट्रेंड चलाया जा रहा है उसमें उसके 3 महीने से प्रेग्नेंट होने की बात हैं, जबकि दिल्ली में हुई हिंसा 2 महीने पुरानी घटना है।

आज अगर वाकई ही इस एंगल से किसी के अपराध पर होने वाली कार्रवाई पर इतना फर्क पड़ता है, तो क्या जरूरत थी प्रेगनेंसी के दौरान सड़कों पर आने की, आंदोलनों में अपनी सक्रियता दिखाने की? अगर आज इस आधार पर सफूरा के लिए दया माँगी जाती है, उनकी जाँच को रोका जाता है, तो कल को क्या हर अपराधी महिला या अपराध करने के इल्जाम में गिरफ्तार हुई महिला प्रेगनेंसी के नाम पर अपने लिए छूट नहीं माँगेगी?

लोकतंत्र की बातें करने वाले ही ये बताएँ कि किस किताब में लिखा है कि गर्भवती होने के बाद लोगों को भड़काओ और जब पकड़े जाओ तो विक्टिम कार्ड खेल लो? आज सोशल मीडिया पर गिरोह का दोहरापन देखकर ऐसे तमाम सवाल तैर रहे हैं। लेकिन अलजजीरा की तर्ज पर अन्य मीडिया संस्थान इस एंगल से रिपोर्ट पेश करके इसे और मार्मिक रूप देने में लगे हैं और ये बता रहे हैं कि उसे सफूरा को क्वारंटाइन के नाम पर कैसे अलग रख कर परेशान किया जा रहा है। जबकि सच क्या है? ये किसी से छिपा नहीं हैं।

ज्ञात रहे कि दिल्ली में हुई हिंदू विरोधी हिंसा में मीरान हैदर के साथ सफूरा जरगर को साजिश करने के आरोप में आरोपित बनाया गया है। जिसमें उस समय 50 से ज्यादा निर्दोष लोगों की लाशें गिरी थीं और राष्ट्रीय राजधानी ने 1984 में सिखों नरसंहार के बाद मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनते देखा था। जिसमें दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काटकर नृशंस हत्या की वारदात को अंजाम दिया गया था और आईबी के अंकित शर्मा को सुनियोजित ढंग से मारा गया था।

तबलीगी जमातियों के 30 कारनामे: शुरुआत से अभी तक की सारी खबरें एक साथ

दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में तबलीगी जमात के मजहबी कार्यक्रम हुए, जिसमें प्रशासन के दिशा-निर्देशों और लॉकडाउन का खुला उल्लंघन किया गया। इसके बाद हज़ारों लोग अलग-अलग राज्यों में जाकर छिप गए। उन्हें खोजने गए पुलिसकर्मियों और उनकी स्क्रीनिंग के लिए गई मेडिकल टीम पर हमले हुए। ऐसी एक-दो नहीं बल्कि दसियों घटनाएँ हुईं। यहाँ हम ऐसी कुछ घटनाओं की सूची आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

जमातियों की करतूतें: पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला – कब और कहाँ?

1 अप्रैल: दिल्ली के तुगलकाबाद में क्वारंटाइन किए गए तबलीगी जमात के लोगों ने डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया। कुल 160 जमातियों को क्वारंटाइन किया गया था। वो डॉक्टरों पर थूक रहे थे। साथ ही उन्होंने परोसे जा रहे भोजन को लेकर भी आपत्तिजनक बातें कही। जमाती इधर-उधर घूम रहे थे और मना करने के बावजूद हंगामा कर रहे थे। इन सबके ख़िलाफ़ उच्चाधिकारियों को शिकायत की गई।

1 अप्रैल: बिहार के मधुबनी में पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। पुलिस वहाँ लॉकडाउन का पालन कराने पहुँची थी लेकिन मजहब विशेष के स्थानीय लोगों ने हमला कर दिया। वहाँ पुलिस और लोगों के बीच झड़प भी हुई। ये घटना अंधारठाढ़ी के गिरधरगंज गाँव में हुई। वहाँ पुलिस को बड़ी संख्या में लोगों के तबलीगी जमात के बैनर तले जुटने की ख़बर मिली थी, जिसके बाद पुलिस वहाँ पहुँची। इसके बाद पुलिस पर हमला कर दिया गया।

1 अप्रैल: गुजरात के अहमदाबाद में पत्थरबाजी हुई। गोमतीपुर में दिल्ली के निजामुद्दीन से लौटे जमातियों के छिपे होने की सूचना मिली थी। जैसे ही पुलिस वहाँ पर पहुँची, लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। पत्थरबाजी का वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें कई बच्चे भी शामिल थे। बाद में वहाँ भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ी। इस पत्थरबाजी में एक जवान को चोट भी आई। सीसीटीवी फुटेज वायरल हुए।

1 अप्रैल: हैदराबाद के गाँधी हॉस्पिटल में एक जमाती के सम्बन्धियों ने डॉक्टर पर हमला बोल दिया। 49 वर्षीय मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था लेकिन उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसके परिजनों ने हंगामा किया। मरीज के सम्बन्धियों ने हॉस्पिटल में तोड़फोड़ मचाई और खिड़कियाँ फोड़ डाली। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री एटला राजेंद्र ने भी इस घटना की निंदा की। डॉक्टर्स एसोसिएशन भी नाराज़ दिखा।

1 अप्रैल: न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ अभद्रता की गई, बल्कि वे लोग वहाँ मौजूद लोगों पर थूकने भी लगे। ये घटना हजरत निजामुद्दीन की ही है, जहाँ जमातियों को मरकज़ मस्जिद से निकाल कर क्वारंटाइन सेंटर ले जाया जा रहा था। उन्होंने बसों में भी बदतमीजी की। स्वास्थ्य विभाग की टीम, पुलिस और मीडिया के लोगों से अभद्र व्यवहार किया गया। बस की खिड़की बंद की जाने लगी तो ये इधर-उधर थूकने लगे।

3 अप्रैल: महाराष्ट्र के शोलापुर स्थित पिंपरी में एक 56 वर्षीय व्यक्ति पर इसीलिए हमला किया गया क्योंकि उसने स्थानीय ग्रामसेवक को तबलीगी जमात के कार्यक्रम से लौटने वाले 7 लोगों के बारे में सूचित किया था। उसने उन लोगों के कोरोना वायरस टेस्ट कराने की माँग की थी। इसके बाद जमातियों व उनके रिश्तेदारों ने उक्त व्यक्ति पर सूचनाएँ लीक करने का आरोप लगा कर हमला किया। बाद में उन सभी का कोरोना टेस्ट हुआ।

3 अप्रैल: इंदौर में एक कोरोना के संदिग्ध की जाँच करने पहुँची स्वास्थ्यकर्मियों की टीम पर हमला किया गया। डॉक्टरों, नर्सों और आशा कर्मचारियों को वहाँ से खदेड़ दिया गया। बता दें कि इंदौर अब तक कोरोना के सबसे बड़े हॉटस्पॉट्स में से एक बन चुका है। दो महिला डॉक्टरों के पैरों में गहरी चोटें आईं। वो किसी तरह तहसीलदार की गाड़ी में छिप गईं, जिससे उनकी जान बच पाई। बाद में पुलिसकर्मियों ने स्वास्थ्य टीम को बचाया।

3 अप्रैल: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जब एक मस्जिद में पुलिस ने सोशल डिस्टनिंग का पालन करने की सलाह दी तो उन पर हमला कर दिया गया। वहाँ बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे होकर नमाज़ पढ़ रहे थे, जिन्हें मना करने पर वो उग्र हो उठे। ये मस्जिद बन्नादेवी पुलिस स्टेशन के सराय रहमान क्षेत्र में स्थित है। कुल 25-30 लोग उस मस्जिद में लॉकडाउन का उल्लंघन करते हुए जमा हुए थे। पुलिस को वहाँ से भागना पड़ा।

3 अप्रैल: दरभंगा के डीएम त्यागराजन एसएम ने जब राज्य में बाहर से आने वाले लोगों की स्क्रीनिंग की घोषणा की तो उन्हें जान से मार डालने धमकी दी गई। मोहम्मद फैसल नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया के माध्यम से धमकी दी और उन पर 2 लाख रुपए का इनाम भी रखा। जिलाधिकारी ने अपील की थी कि लोग देशहित में आगे आकर ख़ुद जाँच कराएँ, जिसे फैसल भड़क गया। उसने कहा कि जो डीएम को मार डालेगा, उसे वो 2 लाख रुपए देगा।

3 अप्रैल: उत्तर प्रदेश के बस्ती के मेडिकल कॉलेज में 31 जमातियों को क्वारंटाइन किया गया था, जो देश भर में घूम-घूम कर आए थे। उन्हें खाने में सुबह पोहा व चाय, उसके बाद फल, और लंच व डिनर में चावल-दाल-रोटी-सब्जी दी जा रही थी लेकिन उन्होंने शाकाहारी खाना खाने से इनकार कर दिया। रोज सब्जी बदल-बदल कर दी जा रही थी। जमातियों ने कर्मचारियों को कई बार धमकी भी दी। जबकि अधिकारियों का कहना था कि मेन्यू के तहत ही खाना परोसा जा रहा था।

3 अप्रैल: देहरादून के अस्पताल में भी जमातियों ने वही सारी हरकतें शुरू कर दीं, जो वो देश के अन्य हिस्सों में कर रहे थे। उन्होंने इधर-उधर थूकना शुरू कर दिया और परोसे जा रहे खाने में गलतियाँ निकालने लगे। चिकित्सकों और मेडिकल स्टाफ को इन जमातियों ने परेशान कर के रख दिया। वो कभी खाने में कमी निकाल दे रहे थे और कभी खाने की मात्रा को कम बता रहे थे। मना करने पर बदतमीजी पर उतर आते थे।

3 अप्रैल: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद हॉस्पिटल में जमातियों ने नर्सों के साथ अश्लील व्यवहार किया। कभी वो नर्सों के सामने कपड़े उतार देते तो कभी अश्लील इशारे करते। सभी आरोपितों के ख़िलाफ़ एनएसए के तहत कार्रवाई की गई। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ऐसे लोग मानवता के दुश्मन हैं और उनसे कड़ाई से निपटा जाएगा। जमातियों ने संक्रमण फैलाने वाली हरकतें भी की थीं।

4 अप्रैल: कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज में भर्ती जमातियों ने स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया। ये सभी दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ मस्जिद से लौटे हुए जमाती थे, जिन्हें वहाँ क्वारंटाइन किया गया था। वो सोशल डिस्टन्सिंग का पालन नहीं कर रहे थे और लॉकडाउन के नियमों की भी धज्जियाँ उड़ा रहे थे। साथ ही वो हॉस्पिटल कर्मचारियों से अजोबोग़रीब डिमांड्स भी कर रहे थे, जिन्हें पूरा करना मुश्किल था।

4 अप्रैल: पीलीभीत में मौलाना जरताब रजा खां को सोशल मीडिया के माध्यम से धमकाया गया। उनका ‘गुनाह’ सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने जमातियों की करतूतों की आलोचना की थी। उन्होंने पूछा था कि जब पूरे मुल्क के साथ ही दुनिया भर में कोरोना वायरस का प्रकोप फैला हुआ है, तब तबलीगी जमात के लोगों ने ऐसे हालात क्यों पैदा किए, जिससे इस वायरस का संक्रमण अन्य लोगों में फैल रहा है। क्या देश के लोगों की हिफाजत के लिए बोलना गुनाह है?

4 अप्रैल: बिहार के शेखपुर मस्जिद से पकड़े गए जमाती हॉस्पिटल में कभी डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों को गाली बक रहे थे और कभी उन पर थूक फेंक रहे थे। इससे इलाज में ख़ासी परेशानी हुई। इसके अलावा उन्होंने खाने में बीफ की माँग की, जो प्रतिबंधित है। पुलिस ने इन्हें व‌र्द्धमान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, पावापुरी (विम्स) के आइसोलेशन वार्ड में रखा था। डॉक्टरों ने उनके व्यवहार से नाराज़गी जताई।

4 अप्रैल: उत्तर प्रदेश के बिजनौर के जिला अस्पताल में 13 जमातियों को हिरासत में रखा गया था। इन सभी जमातियों ने अंडे और बिरयानी के लिए हंगामा किया। इनमें से 8 इंडोनेशिया के थे और 5 भारत के थे। वो अंडा-करि और बिरयानी की माँग करते हुए हॉस्पिटल कर्मचारियों को तंग कर रहे थे। मामला सुलझाने के लिए डीएम, एसपी और सीएमओ को हॉस्पिटल आना पड़ा। समझाने के बाद वो शांत हुए।

5 अप्रैल: प्रयागराज के बख्सी मोड़ क्षेत्र में दलित लोटन निषाद की इसीलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने तबलीगी जमात की आलोचना की थी। लोटन निषाद ने बातचीत के क्रम में कहा था कि अगर जमात नहीं होता तो देश में कोरोना के मामले कम होते। मोहम्मद सोना ने साथियों संग मिल कर उनकी हत्या कर दी। हत्या के बाद भी परिवार डरा हुआ था क्योंकि गाँव का मुखिया दूसरे मजहब से है। परिवार गाँव छोड़ने की बातें कर रहा है।

5 अप्रैल: लुधियाना के शेरपुर एरिया में कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीजों को लेने गई स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला कर दिया गया। संदिग्ध मरीज तबलीगी जमात से जुड़े हुए थे। जब उन्हें एम्बुलेंस में बिठाया गया तो उन्होंने वीडियो बनानी शुरू कर दी। जब इसका विरोध किया गया तो वो धक्का-मुक्की पर उतर आए। वहाँ और भी लोग जुट गए और उन सभी ने एम्बुलेंस का रास्ता रोक लिया। कई स्वास्थ्यकर्मियों को चोटें आईं।

6 अप्रैल: लखनऊ के कसाईबाड़ा में जब पुलिस ने एरिया को सील किया तो जमातियों ने मेडिकल टीम पर हमला बोल दिया। उस क्षेत्र में तब तक 12 जमाती कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए थे, जिसके बाद एरिया को सील करने का फ़ैसला लिया गया था। इसके बाद मेडिकल टीम लोगों के स्क्रीनिंग के लिए पहुँची थी, जिस पर जमातियों ने हमला बोल दिया। भीड़ ने सर्वे रिपोर्ट फाड़ कर फेंकने की कोशिश की।

6 अप्रैल: एक कोरोना संक्रमित जमाती को जब कानपुर के सरसौल सीएचसी के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराया गया तो उसने वहाँ जमकर उत्पात मचाया। कोरोना संक्रमित जमाती ने पहले तो मेडिकल टीम और डॉक्टर पर थूक दिया और फिर कहा– “मुझे मौत से डर नहीं लगता, क्या होती है मौत?” इसके बाद उसने आइसोलेशन रूम के दरवाजे काे अंदर से बंद कर लिया। उसे मछरिया खैर मस्जिद से पकड़ा गया था।

7 अप्रैल: दिल्ली के नरेला में तबलीगी जमात वालों ने एक कमरे के सामने भी शौच कर दिया। इसके बाद दो जमातियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया। क्वारंटाइन सेंटर के सैनिटेशन कर्मचारियों ने जमातियों की इस हरकत को देखा, जिसके बाद पुलिस को इस बारे में सूचित किया गया। वो दोनों पहले से ही डॉक्टरों की बातें नहीं मान रहे थे। एफआईआर के अनुसार, उन्होंने दूसरे मरीजों की ज़िंदगी दाँव पर लगा दी।

7 अप्रैल: तेलंगाना के रिम्स आदिलाबाद में एक डॉक्टर तबलीगी जमात के कार्यक्रम से लौट कर मरीजों का इलाज करता रहा। जब डॉक्टर दीपा शर्मा ने उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ ही इस्लामी कट्टरपंथियों ने मोर्चा खोल दिया। डॉक्टर इदरीस अकबानी कोरोना नेगेटिव टेस्ट किए गए थे लकिन उन्हें 14 दिन के सेल्फ-क्वारंटाइन की सलाह दी गई थी। बावजूद इसके वो सक्रिय रहे।

8 अप्रैल: सीतापुर अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कोरोना पॉजिटिव एक मरीज ने एक रात बिरयानी नहीं मिलने पर हंगामा शुरू कर दिया। वह वार्ड में घूमने लगा। दवा खाने से भी इंकार करने लगा। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को वहाँ आना पड़ा। पुलिस ने उसे किसी तरह धमकी देकर शांत कराया। खैराबाद इलाके में बांग्लादेश से आए 10 जमातियों और उनके दो सहयोगियों को पकड़ा गया था। ये जमाती उनमें से ही एक था।

15 अप्रैल: दिल्‍ली के लोकनारायण जयप्रकाश हॉस्पिटल में महिला डॉक्‍टर से बदसलूकी की गई। 25 साल का जमाती मरीज यहाँ एडमिट था। वार्ड 5ए में मौजूद महिला डॉक्‍टर पर उसने अभद्र टिप्पणियाँ की। अन्य कर्मचारियों ने जब बचाव किया तो बाकी भीड़ उग्र हो गई। मज़बूरी में डॉक्‍टर्स को अपने दफ्तरों में छिपना पड़ा। वहाँ मरीजों ने इकट्ठा होकर दरवाजा तोड़ने की कोशिश की। परेशान डॉक्टरों ने हॉस्पिटल डायरेक्टर से शिकायत की।

15 अप्रैल: मोरादाबाद में डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। वहाँ भी जमातियों को क्वारंटाइन करने की कोशिश की जा रही थी। उनमें से कई में कोरोना वायरस के लक्षण देखे गए थे। पुलिस व डॉक्टरों की गाड़ियों में तोड़फोड़ मचाई गई और उन पर पत्थरबाजी की गई। सभी हमलावर तबलीगी जमात से ही जुड़े हुए थे। छत से महिलाओं ने भी ईंट-पत्थर बरसाए। मेडिकल टीम को लौटना पड़ा।

15 अप्रैल: उत्तराखंड के हलद्वानी स्थित बलभुनपुरा में एक इमाम को क्वारंटाइन करने गई टीम पर हमला कर दिया गया। उस क्षेत्र में तब तक 15 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए जा चुके थे। इनमें से 8 जमाती थे। इमाम सहित 14 अन्य लोग कोरोना मरीजों के सम्पर्क में आए थे, इसलिए उन्हें क्वारंटाइन करना ज़रूरी था। अफवाह फैला दी गई थी कि पुलिस लोगों के साथ दुर्व्यवहार कर रही है और इसीलिए भीड़ उग्र हो गई।

18 अप्रैल: मध्य प्रदेश के देवास में एक गाँव है खाटेगाँव। वहाँ एक समुदाय विशेष बहुल एरिया में सैनिटेशन वर्कर्स पर ही हमला कर दिया गया। आदिल नामक व्यक्ति ने अपने साथियों के साथ सफाईकर्मियों की तब घेर लिया, जब वो सैनिटाइजेशन के काम में लगे हुए थे। लाठी-डंडे, कुल्हाड़ी और रॉड्स लेकर उन पर हमला बोल दिया गया। दीपक नामक सफाईकर्मी बुरी तरह घायल हो गए, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

19 अप्रैल: ओडिशा के जाजपुर में जमातियों ने अपने रिश्तेदारों और समर्थकों के साथ मिल कर सरकारी कर्मचारियों को ही बंधक बना लिया। ये घटना कुआखिया थाना क्षेत्र के गोपीनाथपुर गाँव में हुई। जब बीडीओ और तहसीलदार चेकिंग कर रहे थे, तब बिना मास्क के तीन व्यक्ति बाइक से आगे निकल गए । जब अधिकारी उनका पीछे करते हुए गाँव में पहुँचे, तो उलटा उन्हें ही बंधक बना लिया गया।

21 अप्रैल: हापुड़ के सरवाना गाँव में ग्रोसरी की ख़रीददारी को लेकर हुए मामूली विवाद के कारण तनाव व्याप्त हो गया। कट्टरपंथियों ने एक त्यागी परिवार सहित गाँव के कई हिन्दू परिवारों पर हमला बोल दिया। वो लोगों के घरों पर हमला करने लगे। गाँव में तभी से तनाव व्याप्त था, जब जामतियों के बारे में पुलिस को सूचना मिली थी और कार्रवाई हुई थी। तोड़फोड़ और हमले की शुरुआत इमरान और उसके समर्थकों ने की थी।

22 अप्रैल: बंगलौर के पडनारायणपुरा में हेल्थ कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया, जिसके बाद 60 आरोपितों की गिरफ्तारी हुई। ये क्षेत्र भी जमातियों के प्रभाव वाला था और यहाँ लोग विभिन्न मजहबी कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर लौटे थे। जब मेडिकल टीम वहाँ गई, तो उस पर हमला हुआ। इसमें अधिकतर आशा कार्यकर्ताएँ शामिल थीं। सभी आरोपितों के ख़िलाफ़ नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।

सभी धर्मों को सब्जी बेचूँगा, पर ठेले से भगवा झंडा नहीं हटाऊँगा, जिसको पावर है रोक ले: दलित सब्जी विक्रेता

बिहार के बेगूसराय के एक सब्जी विक्रेता ने बताया है कि उसने अपने ठेले पर भगवा झंडा क्यों लगाया। जब उसने ऐसा किया तो उसके अपने ही मोहल्ले के दूसरे समुदाय के लोगों ने उसे प्रताड़ित किया और भगवा झंडा लगाने पर आपत्ति जताई। दलित सब्जी विक्रेता ने बताया कि जब वो दो लोग ठेले पर भगवा झंडा लगा कर जा रहे थे तो कुछ लोगों ने उन्हें रोका और पूछा कि तुम ये झंडा लगा कर क्या साबित करना चाहते हो?

बदमाशों ने पूछा कि क्या तुम ये भगवा झंडा लगा कर अपनी बिक्री बढ़ाना चाहते हो, ज्यादा रुपए कमाना चाहते हो? साथ ही उन्होंने धमकी दी कि ऐसा कुछ भी नहीं कर पाओगे। सब्जी विक्रेता ने जवाब दिया कि जिसे पसंद है वो सब्जी लेगा, जिसे नहीं पसंद है वो सब्जी नहीं ख़रीदेगा लेकिन मैं झंडा तो लगाऊँगा। इसके बाद बदमाशों ने ठेले को धकेलना शुरू कर दिया और सब्जी विक्रेताओं में से एक को वहाँ से भगा दिया।

दूसरे सब्जी विक्रेता ने बताया कि वो अड़ गया कि वो नहीं जाएगा। साथ ही उसने कहा कि उसे सड़क पर सब्जी बेचने का अधिकार है और उसे वहाँ से कोई नहीं हटा सकता। उसने पूछा कि वो किसी दूसरे की ज़मीन में ठेला लगा कर नहीं खड़ा है कि उसे कोई भगा देगा। ग़रीब दलित सब्जी विक्रेता ने बदमाशों के सामने झुकने से इनकार करते हुए कहा कि वो उसका ठेला पलट पर दिखाएँ।

साथ ही उसे इस बात की भी चिंता थी कि अगर माल नहीं बिका तो उसकी लगाई हुई पूँजी बर्बाद हो जाएगी। उसका कहना था कि उसके जैसे लोग रोज कमाते हैं, तब जाकर उस दिन का खाना नसीब होता है। ऐसे में, अगर किसी दिन सब्जी ही नहीं बिकी तो घर में खाना कहाँ से आएगा? आजकल लॉकडाउन के कारण कई अन्य लोगों ने भी सब्जी बेचने का कारोबार शुरू कर दिया है, जिससे कमाई बँट गई है और कम हो गई है।

सब्जी विक्रेता का कहना है कि वो भगवा झंडा लगा रहा है, इसका मतलब ग़लत नहीं है। वो हिन्दू को भी सब्जी बेचेगा और दूसरे मजहब को भी, किसी भी धर्म-मजहब का व्यक्ति सब्जी ख़रीदने आए, किसी को वापस नहीं किया जाएगा। उसने कहा कि उसने सबूत के रूप में झंडा लगाया है क्योंकि वो हिन्दू है। उसने बताया कि अगर उससे लोग पूछेंगे तो वो किसे-किसे अपना आधार कार्ड दिखाएगा, इसीलिए उसने झंडा ही लगा दिया।

उक्त सब्जी विक्रेता के साथ मारपीट भी की गई। ‘स्वराज्य मैग’ की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने सब्जी विक्रेता से बातचीत का वीडियो शेयर किया, जिसे सोशल मीडिया पर लोगों ने हाथोंहाथ लिया। बता दें कि झारखण्ड में कुछ फल विक्रेताओं का बैनर सिर्फ़ इसीलिए हटा दिया गया क्योंकि उस पर ‘हिन्दू’ लिखा हुआ था और देवी-देवताओं के चित्र थे। पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास सहित कई प्रबुद्ध नेताओं ने इसे अन्याय करार दिया।

राँची की राफिया नाज: योग सिखाती हैं, और मुस्लिम कट्टरपंथियों की गाली, धमकी, जानलेवा हमले झेलती हैं

योग की शिक्षा देकर देश का नाम रौशन वाली झारखंड की राजधानी राँची की राफिया नाज (Rafia Naz) पिछले कई सालों से मजहबी कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं। राफिया नाज आज योग के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम हैं। योग को धर्म से परे मानने वाली राफिया को आज योग के कारण ही निशाना भी बनाया जा रहा है। राफिया का योग प्रेम कट्टरपंथियों को रास नहीं आता है। इस वजह से उन्हें लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। उनके खिलाफ फतवा भी जारी किया जा चुका है।

योग की वजह से ऑनलाइन फतवा

हमने इस बाबत राफिया नाज से बात की। हमने उनसे पूछा कि ये सब कब से हो रहा है और क्यों हो रहा है? तो वो कहती हैं कि अब तो ये सब उनके लिए सामान्य दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। वो सालों से इन कट्टरपंथियों के गाली-धमकी और हमले को झेल रही हैं। वो कहती हैं कि 8 नवंबर 2017 को तो जी न्यूज पर ऑनएयर कहा गया था कि राफिया नाज के जनाजे में मुस्लिम नमाज नहीं पढ़ेंगे। इसके एक दिन बाद ही, यानी कि 9 नवंबर 2017 को उसके घर पर पत्थरबाजी की गई।

वो कहती हैं कि योगा सिखाने की वजह से उन्हें भद्दी-भद्दी गंदी गालियाँ दी गई, उन्हें जान से मारने की कोशिश की गई। ये पूछने पर वो लोग ऐसा क्यों कर रहे तो वो कहती हैं कि उनका कहना है कि मैं एक मुस्लिम होकर योग कैसे सिखा सकती हूँ। राफिया कहती हैं, “मेरे ऊपर ना सिर्फ कमेंट किए जाते हैं बल्कि मुझे मारा भी गया है। 20 जून 2016 को मेरे ऊपर शारीरिक हमला किया गया। उस समय भी रोजा चल रहा था और मुझे बहुत बुरी तरह से मारा गया। मैं सड़क पर चलकर आ रही होती थी, तो मेरे ऊपर गमला फेंक दिया जाता था, कभी दुपट्टा खींचकर कोई चला जाता। एक बार रॉड से मेरे कमर पर मारा गया। बहुत कुछ हुआ है मेरे साथ।”

राफिया कहती हैं कि जितना कुछ उन्होंने सहा है, उनकी जगह पर कोई और होती तो कब का सुसाइड कर चुकी होती। वो अभी इस तरह से हमसे हँसकर बात नहीं कर रही होती। वो बताती हैं कि उनकी न्यूड फोटो बनाई गई। वो कहती हैं, “दूसरी लड़की की बॉडी में मेरा चेहरा लगाकर सर्कुलेट किया गया। वो कहती हैं कि उन्होंने उसकी आईडी, यूआरएल, लिंक वगैरह सब दिए, लेकिन आईडी ब्लॉक नहीं हुआ।”

19 साल की उम्र में जान से मारने के लिए किया गया अगवा

19 साल की उम्र में राफिया को जान से मारने के लिए उठवाया भी गया था। रात भर घर से बाहर रही थी। वो कहती हैं कि जब उन्हें स्कूटी से अगवा किया जा रहा था, तो रास्ते में गिर गई थी और फिर भाग कर रात भर बाहर ही छुपी रही। इधर ये गुंडें उनको ढूँढने के लिए उनके घर आए थे। इसी तरह एक बार धमकी दी गई कि उन्हें 48 घंटे के अंदर मार दिया जाएगा। एक बार उनके ऊपर इस तरह से रॉड से हमला किया गया कि वो एक साल तक जमीन पर सोईं। स्थिति ऐसी थी कि वो बेड पर बैठ भी नहीं पाती थी।

जब हमने राँची की राफिया नाज से ये जानने की कोशिश की कि उनके साथ ये सब कुछ इतने सालों से होता चला रहा है तो क्या उन्हें राज्य सरकार की तरफ से किसी तरह की सुरक्षा नहीं मिली? इसके जवाब में वो कहती हैं, “2017 में झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने मेरी सुरक्षा का संज्ञान लिया था और मुझे 24 घंटे सुरक्षा मुहैया करवाया गया था, जो कि अभी हटा लिया गया है। मुझे नहीं पता कि किस वजह से हटा लिया गया है। उस समय मेरे घर के बाहर रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और सीआरपीएफ के जवान तैनात रहते थे। आप सोचिए, घर के बाहर RAF और CRPF के जवान मौजूद होंगे तो सिचुएशन कितना गंदा रहा होगा, क्योंकि कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए भी अबी तक CRPF को नहीं उतारा गया और उस टाइम उतारा गया तो आप सोच सकते हैं कि मेरे साथ कितना गंदा हुआ होगा।”

अपने ही समाज के कट्टरपंथियों के विरोध का सामना

यह पूछने पर कि इस तरह के माहौल में परिवार की तरफ से किस तरह का समर्थन है तो वो कहती हैं कि परिवार ही उनकी असली ताकत है। वो उन्हें हौसला देते रहते हैं।

राफिया कहती हैं, “परिवार का मेरा सपोर्ट करने की वजह से उन्हें गंदी गालियाँ दी जाती है। उनसे कहा जाता है कि बेटी को कितने में बेचा है। मैं रास्ते पर चलती हूँ तो मुझसे कहा जाता है कि ये तो RSS की रखैल है। दोस्त के साथ जाती हूँ तो कहा जात है कि देखो रं** की बहन जा रही है। इनकी नजर में मेरा गुनाह एक ही है- योग। और योग मेरा जिद है। जिद इसलिए है, क्योंकि ये भारतीय संस्कृति है और इसे फॉलो करने में हमें शर्म नहीं आनी चाहिए। अगर इन्होंने प्यार से बोला होता तो शायद मैं इसे छोड़ देती, लेकिन अब नहीं। अब तो योगा मैं मरते दम तक करती रहूँगी।”

वो आगे कहती हैं, “जब मैं पुलिस स्टेशन जाती थी तो वहाँ भी मुझे गंदी गालियाँ दी जाती थी। उस समय काफी लोग सलाह दे रहे थे कि सुसाइड कर लो। यही इसका सबसे अच्छा और सरल समाधान है। लोगों ने तो और भी बहुत कुछ कहा, जो कि मैं आपसे कह नहीं सकती। जब मै पुलिस स्टेशन में FIR करवाने जाती थी तो मुझसे कहा जात था, ‘रं** मेरे इलाके का माहौल बिगाड़ रही है साली तू।’ इसके बावजूद भी मैं जिद पर अड़ी रहती थी कि जब तक मुझे FIR की रसीद नहीं दी जाएगी, मैं नहीं जाऊँगी।”

राँची की राफिया नाज अपने साथ हुए एक हादसे का जिक्र करती हुई कहती हैं, “एक बार मेरे से कहा गया कि खेलगाँव में प्रोग्राम है, आ जाओ। अगर आज नहीं आओगी तो फिर तुम्हें आगे से कोई प्रोग्राम नहीं करने दिया जाएगा। मैं हड़बड़ाकर गई। वहाँ जाकर देखती हूँ कि कोई प्रोग्राम नहीं था। कोई भी नहीं था वहाँ पर। फिर मैं वापस घर आई। रास्ते में एक ट्रक ने मेरी गाड़ी को इतनी जोर से टक्कर मारा कि गेट के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उस समय मेरे साथ कार के अंदर एक सरकारी सिपाही थे। हमलोगों ने पुलिस को फोन किया कि सर यहाँ पर मेरे साथ ऐसा-ऐसा हुआ है तो जवाब मिलता है कि कहाँ से पकड़ेंगे। आधे घंटे से ज्यादा हो गया। अब तक तो वो कहाँ से कहाँ निकल गया होगा। कहाँ से पकड़ेंगे? फिर जब मैंने कहा कि सीसीटीवी फुटेज चेक कीजिए, उसमें ट्रक का नंबर दिख जाएगा, तो कहते हैं कि इलाके का पूरा सीसीटीवी फुटेज खराब है।”

इसके साथ ही वो अपनी सिचुएशन बताती हुई कहती हैं कि अब तो वो बोलने से भी डरने लगी हैं। पहले तो कहीं भी कुछ भी गलत होता था, वो आंदोलन करने के लिए निकल पड़ती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। राफिया कहती हैं, मैं अपने लिए नहीं डरती। मैं अपने परिवार के लिए डरती हूँ कि उन्हें कोई किसी तरह का नुकसान न पहुँचा दे। मैंने लोगों का असली चेहरा देखा है। लोग ऑन कैमरा कैसे होते हैं और ऑफ कैमरा कैसे होते हैं, वो मैंने देखा है। मैंने लोगों को बिकते हुए देखा है। इसलिए अब मैं ऐसी हो गई हूँ। पहले मैं ऐसी नहीं थी, इन लोगों ने मुझे ऐसा बना दिया है।

चार साल की उम्र से कर रही है योग

राफिया नाज की योग में रुचि का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकती हैं कि वो 4 साल की उम्र से ही योग कर रही हैं। अब तक उन्होंने योग के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर 52 मेडल जीते हैं। राफिया को जम्मू-कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय योगा फेस्टिवल में ‘नेशनल पतंजलि योगा प्रमोटर पुरस्कार’ से नवाजा गया था। इसी तरह लखनऊ के अखिल भारतीय योग महासम्मेलन में ‘योगप्रभा’ की उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें खुद योगगुरु बाबा रामदेव सम्मानित कर चुके हैं। वो सबसे बड़े मदरसे में भी योग करवा चुकी हैं।

राफिया नाज कहती हैं कि योग आत्मा से परमात्मा को जोड़ने का माध्यम है। इससे धर्म से कोई लेना देना नहीं है। राफिया ने ‘Yoga beyond religion’ नाम से एक स्कूल खोला है। इसमें वो गरीब और अनाथ बच्चों को मुफ्त में योग सिखाती हैं और अब तक कई लोगों को उन्होंने योग सिखाकर योग शिक्षक के रुप में नौकरी भी उपलब्ध करवाई है।

मंत्र पढ़ने के लिए किसी मुस्लिम को मजबूर नहीं करती

राफिया से जब ‘योग में मंत्र पढ़ने और सूर्य नमस्कार से परेशानी’ के संबंध में पूछा तो बेबाक राफिया ने कहा, “मुझे मुस्लिम होने के बावजूद मंत्र पढ़ने से कोई परेशानी नहीं है। अगर, किसी को परेशानी है तो वे मंत्र नहीं पढें। कहीं भी योग में मंत्र की अनिवार्यता नहीं है। मैंने कभी भी किसी भी मुस्लिम से नहीं कहा कि वो मंत्र पढ़कर योग करें। दरअसल, योग की वजह से मेरा विरोध करने वाले योग की वास्तविकता को ही नहीं जानते हैं।”

वो कहती हैं कि इन घटनाओं की वजह से बहुत सारे दोस्त छोड़कर चले गए। बहुत सारे रिश्तेदारों ने मुँह मोड़ लिया। इन चीजों की वजह से उन्होंने काफी लोगों को खो दिया। अब सिर्फ मम्मी-पापा और भाई-बहन ही हैं। राफिया कहती हैं कि जब रात को सोती हूँ तो सोचती हूँ कि पता नहीं कल का सवेरा देखना नसीब होगा या नहीं। खैर, सवाल तो अब भी वही है कि उन्हें राफिया नाज का योग करना गुनाह क्यों लगता है?

बांग्लादेशी अब्दुल हक बुखार से तड़पते हुए कोशियारी नदी पार कर पहुँचा भारत, बोला- मेरा इलाज करवा दो, मुझे कोरोना है

बांग्लादेश में कोरोना के इलाज की पर्याप्त सुविधाएँ न होने के कारण एक बांग्लादेशी व्यक्ति रविवार (अप्रैल 26, 2020) को कुशियारा नदी को पार करके भारत के असम की सीमा में आ गया। व्यक्ति की पहचान अब्दुल हक के रूप में हुई। अब्दुल जिस समय भारत पहुँचा वो तेज बुखार से तड़प रहा था। पूछताछ में उसने बताया कि उसे कोरोना है और वह इलाज कराने के लिहाज से भारत आया है। हालाँकि, बाद में इसकी सूचना बीएसएफ को दी गई और उन्होंने बांग्लादेश की सिक्योरिटी फोर्स को सूचित करके उसे वापस भेज दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीमगंज जिले के मुबारकपुर इलाके में पहुँचने के बाद 35 वर्षीय अब्दुल पर ग्रामीणों को संदेह हुआ। जब उससे पूछताछ हुई तो उसने ग्रामीणों के सामने खुद के कोरोना संक्रमित होने की बात कही और अपना इलाज कराने को बोला। इसके बाद गाँव के लोगों ने घबराकर उसकी सूचना बीएसएफ को दी। बीएसएफ को पूछताछ में उसने बताया कि वे बांग्लादेश के सुनामगंज जिले का रहने वाला है। जो 4 किमी तक नदी को तैर करके सीमा पार आया।

सिलचर में बीएसएफ के प्रवक्ता और डीआईजी जेसी नायक ने इस संबंध में बताया, ”बांग्लादेशी नागरिक अब्दुल हक कुशियारा नदी तैरकर पार कर गया, जो दोनों देशों की सीमाओं के बीच में है। रविवार सुबह करीब 7 बजे वह भारतीय सीमा में दाखिल हुआ। गाँव वालों ने उसे देखा तो उन्होंने उसे वहीं रोक दिया और हमें सूचना दी।”

नायक ने बताया, ”उसे कोरोना था या नहीं, इसके बारे में जानकारी नहीं है। मगर, उसे तेज बुखार था। वो देखने में अस्वस्थ नजर आ रहा था। ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। उसका दावा था कि वह कोरोना से संक्रमित है और भारत में इलाज कराने के लिए नदी पार करके आया है।”

बता दें, बीएसएफ ने पहले बांग्लादेशी अब्दुल को हिरासत में लेकर पूछताछ की और फिर उसकी सूचना बांग्लादेशी सेना को दे दी। इसके बाद करीब 10 बजे बांग्लादेशी सेना के अफसर दो बोट से करीमगंज स्थित सीमा के पास पहुँचे। इसके बाद युवक को उनके हवाले कर दिया गया।

डीआईजी नायक ने बताया, ”कुशियारा नदी में मानसून के समय बाढ़ आ जाती है। लेकिन, इस वक्त पानी का स्तर बहुत ही कम है और जो तैरना जानता है, वह आसानी से इसे पार कर सकता है। जिस जगह की यह घटना है, वहाँ अभी तक दोनों देशों के बीच फेंसिंग नहीं हुई है। इसलिए, वह आसानी से सीमा के अंदर घुस गया है। कोरोना के मद्देनजर जवानों को ज्यादा से ज्यादा गश्त करने का आदेश दिया गया है। लोगों को भी जागरूक किया गया है। यही कारण है कि लोगों ने तुरंत हमें इसकी सूचना दे दी।”

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ ये खबर आई है कि कोरोना का शक होने के कारण बांग्लादेशी इतनी लंबी नदी को पार करके भारत आ गया, ताकि यहाँ उसका इलाज हो सकें। वहीं भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण के एक दिन में 1975 मामले आए हैं और 47 लोगों की मौत हुई है। देश के सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र में मरने वालों की संख्या 323 हो गई है। देश में कोरोना वायरस पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 26,917 हो गई है। इनमें से 20,177 सक्रिय हैं। 5913 लोग स्वस्थ हो चुके हैं। 826 लोगों की अब तक मौत हुई है।

CRPF जवान को हथकड़ी लगा कर पीटा, नंगा घुमाया, पानी भी नहीं दी: कर्नाटक पुलिस पर आरोप

कर्नाटक में एक सीआरपीएफ (CRPF) जवान पर पुलिस ने कार्रवाई की है। कोविड-19 को लेकर देश भर की पुलिस लॉकडाउन के पालन में जुटी है। इसी दौरान कर्नाटक के बेलागावी से एक सीआपीएफ जवान की तस्वीर वायरल हुई है। जवान को चैन में जकड़ कर पुलिस स्टेशन में फर्श पर बिठाया गया है। ये घटना चिक्कोड़ी तालुका के यकसंबा गाँव की है। ये तस्वीर सोशल मीडिया पर भी वायरल हुई।

ये घटना गुरुवार (अप्रैल 23, 2020) की है। चैन में जकड़ कर फर्श पर बिठाए गए CRPF जवान का नाम सुनील सावंत है। वो कोबरा कमांडो हैं। दरअसल, वो बेलागावी में अपने घर के बाहर बाइक साफ़ कर रहे थे। पुलिस ने उस पर लॉकडाउन के उल्लंघन का आरोप लगाया क्योंकि उन्होंने मास्क नहीं पहन रखा था और प्रतिबंधों के बावजूद घर के बाहर घूमने का आरोप भी लगाया गया। पुलिस उन्हें थाने लेकर गई

आरोप है कि वो बार-बार कहते रहे कि वो CRPF में काम करते हैं लेकिन फिर भी पुलिस ने उनकी पिटाई की। सुनील फ़िलहाल छुट्टी पर थे। आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने उन्हें कोई भी चेतावनी दिए बिना ही उनकी पिटाई शुरू कर दी। वीडियो के हवाले से बताया गया है कि पुलिस ने पहले उन्हें पीटना शुरू किया। उनके कपड़े फाड़ डाले गए, उन्हें हथकड़ी पहना दी गई और पैदल ही गलियों में घुमाया गया।

इसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया। एसएचओ ने बिना कंट्रोलिंग अथॉरिटी को सूचित किए ही उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर दी। सीआरपीएफ जवान की पत्नी ने आरोप लगाया है कि उनके पति को कई घंटों तक पानी तक पीने को नहीं दिया गया, जबकि वो प्यास से व्याकुल हो रहे थे। कहा जा रहा है कि सीआरपीएफ के जवान काफी अनुशासित होते हैं और ख़ासकर कोबरा कमांडो तो पूरी तरह नियम-क़ानूनों के पालन के मामले में सख्त होते हैं।

ट्विटर यूजर मीथांसू चौधरी ने ये जानकारी शेयर करते हुए कर्नाटक पुलिस पर एक सीआरपीएफ (CRPF) जवान के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाया और कहा कि ये पूरे देश के लिए शर्म की बात है। उन्होंने आरोप लगाया कि सुनील को नंगे पाँव गलियों में घुमाया गया। सोशल मीडिया पर लोग इसे पुलिस की ज्यादती बता रहे हैं। अभी तक कर्नाटक पुलिस या सरकार की तरफ से इस मामले में कोई बयान नहीं आया है।

कमांडो पर शांति भंग करने और ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारियों को उनके काम में बाधा पहुँचाने की धाराएँ लगाई गई हैं। पुलिस ने आरोप लगाया कि सीआरपएफ जवान सुनील ने पहले एक पुलिस कमांडो का कॉलर पकड़ा और उसे पीटने शुरू कर दिया। इसीलिए, लाठी का प्रयोग किया गया। कहा जा रहा है कि कोबरा कमांडोज को सालों तक किसी भी हमला का जवाब देने की ट्रेनिंग दी जाती है। ऐसे में, वो हमले बर्दाश्त करने के आदी नहीं होते।

इससे पहले हैदराबाद में पुलिस द्वारा ज्यादती की ख़बर आई थी। हैदराबाद में सब्जी की दुकान पर भगवा झंडा देख एक मुस्लिम ने आपत्ति जताई है। इसको लेकर ट्वीट करते हुए उसने साइबारबाद पुलिस को टैग किया है। उसने पुलिस से कार्रवाई की मॉंग की। इसके बाद पुलिस भी हरकत में आ गई। इससे पहले झारखण्ड में फल-विक्रेताओं पर सिर्फ इसीलिए कार्रवाई की गई, क्योंकि उन्होंने बैनर पर हिन्दू लिखा था और भगवान की फोटो लगाई थी।

इनाम खान ने लड़की को दी एसिड अटैक की धमकी, लगातार कर रहा अश्लील टिप्पणी: लोग कर रहे कार्रवाई की माँग

फेसबुक पर इनाम ख़ान नामक व्यक्ति ने एक लड़की पर एसिड अटैक की धमकी दी है। उसने अपनी प्रोफाइल पिक्चर के रूप में भगवान श्रीराम और माँ सीता की तस्वीर लगाई हुई है। एक लड़की की तस्वीर पोस्ट करते हुए उसने लिखा कि इसके चेहरे पर जो भी तेज़ाब फेंकेगा, उसे 20000 रुपए मिलेंगे। उसने कहा कि ये उसका वादा है। वो लड़की कौन है, ये साफ़ नहीं है। लेकिन, वो उस लड़की की तस्वीर के साथ और भी ऐसी टिप्पणी कर चुका है।

एक अन्य पोस्ट में उसने इसी लड़की की तस्वीर के साथ लिखा- “इस लड़की को याद ही नहीं है कि इसके घर की बगल वाली गली में मैं जब इसका #$@ चाट…” एक लड़की की तस्वीर के साथ इस तरह की भद्दी टिप्पणी करने वाला इनाम ख़ान बिहार के पूर्वी चम्पारण स्थित मोतिहारी का है। उसके फेसबुक प्रोफाइल के अनुसार, उसने शहर के ही ‘इक़रा पब्लिक स्कूल’ से पढ़ाई की है।

वो मुजफ्फरपुर के बाबासाहब भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर चुका है। फ़िलहाल वो यूएई की राजधानी अबूधाबी में है। कुछ लोगों द्वारा उसके दुबई में होने की बात भी कही जा रही है। उसके कारनामों से ये स्पष्ट है कि उसने अपनी प्रोफाइल में राम-सीता की फोटो हिन्दू धर्म और देवी-देवताओं को बदनाम करने के लिए लगा रखी है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इनाम ख़ान के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की माँग की है।

इनाम ख़ान फेसबुक पर एक लड़की को कर रहा है बदनाम

इनाम ने फेसबुक पर ख़ुद को शाहरुख़ ख़ान का फैन बताया है। किसी ने जब उसके नंबर पर कॉन्टैक्ट किया तो बताया गया कि इनाम दुबई में है और ये फेसबुक अकाउंट उसका भाई चला रहा है। साथ ही उसने पुलिस में शिकायत करने का भी दावा किया। इस मामले में कुछ ऐसे कॉमेंट्स भी वायरल हुए हैं, जिसमें इनाम ख़ान अपने दोस्तों से कह रहा है कि उस लड़की का कोई सेक्सी वीडियो हो तो वायरल करो।

इससे पहले एक इंस्टाग्राम पेज को लेकर ख़बर आई थी कि कैसे इस सोशल साइट को धीरे-धीरे हिन्दू विरोध और हिन्दू घृणा का हब बनाया जा रहा है। इसी क्रम में एक व्यक्ति ने एक ऐसा पेज बनाया था, जहाँ हिन्दू देवी-देवताओं को भद्दी-भद्दी गालियाँ दी जाती हैं। इस पेज पर इस्लामिक हस्तियों को हिन्दू देवी-देवताओं से ज्यादा श्रेष्ठ बता कर दिखाया जाता है। हाल ही में भगवान राम और सीता पर आपत्तिजनक कमेंट करने के कारण फारूकी मुनव्वर पर FIR दायर की गई थी।

inam khan of motihari bihar threatens girl of acid attack